Post – 2017-07-17

[मेरी टक्कर के एक मित्र आतिथेय बनकर कौसानी में मिले थे, नाम्ना रवीन्द्र शुक्लः । मुझे उनसे शिकायत थी कि वह अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए इतने विस्तार में क्यों चले जाते हैं कि कथ्य फ़ैल कर ओझल हो जाता है। पर अपनी लत का पता तक न था। मुझे अपनी लत का पता होता तो क्या उनसे यह शिकायत होती? उनको मुझसे भी ठीक यही शिकायत थी परन्तु मेरा साथ देनेवाला कोई नहीं था और उनसे किसी को शिकायत भी नहीं थी। कई बार आप अपने को अपने से बाहर जाकर देख पाते हैं और यह दूसरों की नज़र से अपने देखने पर होता है। पहली बार मैं यह मानने को तैयार हूँ कि जिसे छोटी बात सोचकर दो वाक्यों में समेटना चाहता हूँ वह बढ़कर एक अलग पोस्ट बन जाता है और उस पर एक टिप्पणी के उत्तर में जो कहना चाहता हूँ वह इतना फैल जाता है कि लगता है इसे अलग से पोस्ट करें। जब तक मैं संक्षेप में अपनी बात कहने की कला विकसित नही कर लेता तब तक आपको यह झेलना ही है, सो यह गुबार:]

हिन्दू समाज को दो खतरों का सामना करना है और दोनों की प्रकृति सामी है – एक कट्टर मुस्लिम और दूसरे कट्टर हिन्दू। दोनों में समानता यह नहीं है की दोनों के अपने धर्म ग्रंथ हैं, बल्कि यह कि एक के पास किताब है और दूसरे के पास गाय है। दोनों दोनों के लिए सामान रूप से पवित्र, अपने अर्गल और अनर्गल के साथ। दोनों इनकी आड़ में भावनाएं भड़का कर अपने समाज को निश्चेत करके उसे अपना औजार बनाने का प्रयत्न करते हैं और यदि ये सफल हो जाय तो, जहाँ जहाँ सफल होंगे वहाँ, कयामत नही तो छोटी कयामत आ ही जायेगी। जिस धर्म में भावनाओं और आवेगों को षड्रिपुओं में गिना जाता हो, उन्हें भड़काने वाले उसके रक्षक तो नहीं हो सकते, वे किताब की आड़ में ऐसा करें, या इस्लाम खतरे में के नाम पर ऐसा करें, या गाय के नाम पर ऐसा करें। जिसकी रक्षा का दावा करते हैं उसके लिए भी संकट पैदा करते है और कोई न कोई बहाना लेकर उन्माद फैलाते हैं।

मेरे एक फेसबुक मित्र उदय सिंह हैं। उन्होंने सरस्वती शिशुमंदिर से अपनी शिक्षा आरम्भ की जिस की शिक्षा पर उन्हें गर्व है। हिन्दू विचारों, मूल्यों, मान्यताओं के प्रति उनमें आदर है और इन पर चोट हो तो पीड़ित होते हैं। पर हाल ही में अपने गाँव जाकर अपने परिवार के पालित पशुओं की दशा और दिशा पर आज ही एक पोस्ट की है। जो लोग उनकी उलझन का विवेकपूर्ण और व्यावहारिक समाधान दे सकते हों, उनको ऐसा करने के बाद किसी सवाल को लेकर प्रश्न करना चाहिए। मोदी उस सच को जानते हैं जिसका प्रत्यक्ष अनुभव उदय ने किया है और जो गाय को लेकर भावनाओं को भड़का रहे हैं वे उनके साथी हैं जो किताब को लेकर भावनाएं भड़काते हैं। दोनों उस हिंदुत्व के शत्रु हैं जो मानसिक उद्वेग के सभी रूपों को अपना शत्रु मानता है और इसलिए गाय के नाम पर भावनाएं भडकानेवाले मोदी के भी शत्रु बनते जा रहे हैं।

ये बहकी बहकी बातें भी वे तभी तक कर सकते हैं जब तक मोदी के कारण भाजपा की सरकार केंद्र में है, अन्यथा जब तिकड़म से बहुमत सिद्ध करने वाली कांग्रेस सोनिआ प्रभाव में यह कानून बना रही थी कि किसी साम्प्रदायिक फसाद में यदि एक पक्ष हिन्दू हो तो जाँच किये बिना हिन्दू को दोषी माना जाये और जब कांग्रेस के बबुआ भविष्य अमेरिका को समझा रहे थे कि सबसे खतरनाक हिन्दू आतंकवाद है, (भारत में ईसाइयत का प्रचार करने को कृतसंकल्प अमेरिका को यह रास भी आता था), जब इस आरोप को प्रामाणिक बनाने के लिए कुछ लोगों को अभियुक्त बना कर जेल में डाल दिया गया पर संलिप्तता सिद्ध न की जा सकी, तब ऐसे मुखर हिन्दुत्ववादियों की मुसलामानों और सेक्युलरिस्टों से एक ही समानता थी। सभी इन सुदूर ईसाई योजनाओं से अनभिज्ञ थे, या जान बूझ कर चुप थे और अपने बिलों में समाये हुए थे। आज ये सभी अपने अपने कारणों से मोदी विरोध में सक्रिय हैं यह भी इनके बीच नई समानता है। मोदी के न रहने और कांग्रेस के किसी भी तिकड़म से सत्ता में आने के बाद यदि सोनिआ ने फरमान जारी कर दिया की मंदिरों के सामने और बाज़ारों के बीच खुले आम गोवध होगा, यह मनुष्य के खानपान की स्वतन्त्रता का प्रश्न है, तो एक तीसरी समानता दिखाई देगी। सभी चुप लगा जायेंगे। इसलिए जिन्हे हिन्दू समाज की बलि नहीं देनी है उन्हें उस नेता पर विश्वास रखना चाहिए जो देश की समस्याओं से अवगत है, किसी से कम हिन्दू नहीं है, पर देश को साम्प्रदायिकता से आगे ले जाना चाहता है। आप मेरी बात न मानें यह आपके हित में हे। मैं तो मोदी का वकील ठहरा।

Post – 2017-07-17

हिन्दू समाज को दो खतरों का सामना करना है और दोनों की प्रकृति सामी है. एक कट्टर मुस्लिम और दूसरे कट्टर हिन्दू. दोनों में समानता यह नहीं है की दोनों के अपने धर्म ग्रंथ हैं, बल्कि यह कि एक के पास किताब दूसरे के पास गाय है. दोनों इनकी आड़ में भावनाएं भड़का कर अपने समाज को निश्चेत करके उसे अपना औजार बनाने का प्रयत्न करते हैं और यदि ये सफल हो जाय तो जहाँ जहाँ सफल होंगे वहाँ कयामत नही तो छोटी कयामत आ ही जायेगी. जिस धर्म में भावनाओं और आवेगों को षड्रिपुओं में गिना जाता हो, उन्हें भड़काने वाले उसके रक्षक तो नहीं हो सकते, वे किताब की आड़ में ऐसा करें, या इस्लाम खतरे में के नाम पर ऐसा करें या गाय के नाम पर ऐसा करें. वे उन्माद फैलाते हैं.
मेरे एक फेसबुक मित्र उदय सिंह हैं. उन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर से अपनी शिक्षा आरम्भ की जिस की शिक्षा पर उन्हें गर्व है. हिन्दू विचारों, मूल्यों, मान्यताओं के प्रति उनमें आदर है और इन पर चोट हो तो पीड़ित होते हैं. पर हाल ही में अपने गाँव जाकर अपने परिवार के पालित पशुओं की दशा और दिशा पर आज ही एक पोस्ट की है. जो लोग उनकी उलझन का विवेकपूर्ण और व्यावहारिक समाधान दे सकते हों, उनको ऐसा करने के बाद किसी सवाल को लेकर प्रश्न करना चाहिए. मोदी उस सच को जानते हैं जिसका प्रत्यक्ष अनुभव उदय ने किया है और जो गाय को लेकर भावनाओं को भड़का रहे हैं वे उनके साथी हैं जो बिताब को लेकर भावनाएं भड़काते हैं. दोनों उस हिंदुत्व के शत्रु हैं जो मानसिक उद्वेग के सभी रूपों को अपना शत्रु मानता है और इसलिए गाय के नाम पर भावनाएं भडकानेवाले मोदी के भी शत्रु बनते जा रहे हैं. ये बहकी बहकी बातें भी वे तभी तक कर सकते हैं जब तक मोदी के कारण भाजपा कि सरकार केंद्र में है, अन्यथा जब तिकड़म से बहुमत सिद्ध करने वाली कांग्रेस सोनिआ प्रभाव में यह कानून बना रही थी कि किसी साम्प्रदायिक फसाद में यदि एक पक्ष हिन्दू हो तो जाँच किये बिना हिन्दू को दोषी माना जाये और जब कांग्रेस के बबुआ भविष्य अमेरिका को समझा रहे थे कि सबसे खतरनाक हिन्दू आतंकवाद है, तो भारत में ईसाइयत का प्रचार करने को कृतसंकल्प अमेरिका को रास भी आता था, जब इस आरोप को प्रामाणिक बनाने के लिए कुछ लोगों को अभियुक्त बना कर जेल में दाल दिया गया पर संलिप्तता सिद्ध न की जा सकी तब ऐसे मुखर हिन्दुत्ववादियों की मुसलामानों, सेक्युलरिस्टों से एक ही समानता थी. सभी इन सुद्दुर ईसाई योजनाओं से अनभिज्ञ थे, या जान बूझ कर चुप थे और अपने बिलों में समाये हुए थे. आज ये सभी अपने अपने कारणों से मोदी विरोध में सक्रिय हैं यह भी इनके बीच नै समानता है. मोदी के न रहने और कांग्रेस के किसी भी तिकड़म से सत्ता में आने के बाद यदि सोनिआ ने फरमान जारी कर दिया की मंदिरों के सामने और बाज़ारों के बीच खुले आम गोवध होगा तो एक तीसरी समानता दिखाई देगी. सभी चुप लगा जायेंगे. इसलिए जिन्हे हिन्दू समाज की बलि नहीं देनी है उन्हें उस नेता पर विश्वास रखना चाहिए जो देश को आगे ले जाना चाहता है, उसकी समस्याओं से अवगत है, किसी से कम हिन्दू नहीं है पर देश को साम्प्रदायिकता से आगे ले जाना चाहता है. आप मेरी बात न मानें यह आपके हित में हे। मैं तो मोदी का वकील ठहरा.

Post – 2017-07-17

छोटी छोटी बातें

“सरदार पटेल और नेहरू की स्वतंत्र भारत में मुसलमानों के प्रति दृष्टिकोण में क्या अंतर था?“

“सरदार यथार्थवादी थे, नेहरू आत्मवादी थे। सरदार उस दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय को नेहरू की तरह ही मानने को तैयार होगए थे कि यदि लीग और जिन्ना विभाजन न होने की स्थिति में दंगे कराते रहेंगे तो अच्छा है देश बट जाय और लोग अपनी अपनी जगह शांति से रहें। यह सभी मान रहे थे कि यह फैसला भावावेश का है, इसलिए यह टिक नहीं पायेगा और जल्द ही मुसलमान भी अपनी भूल समझ कर पूरे देश को एक रखने के पक्ष में हो जाएंगे, इसलिए कांग्रेस के नेता चाहते थे कि लोग अपना घर द्वार छोड़ कर मारे मारे न फिरें। यह मियादी बुखार कुछ दिन के बाद उतर जाएगा। जिन्ना इस फितूर को सचाई बनाना चाहते थे इसलिए हिन्दुओं और मुसलमानों की आबादी के अदलबदल के हिमायती थे। विभाजन पर सहमति कांग्रेस के नेताओं की भी थी, इसलिए यह सुनिश्चित करना उनका काम था की जहां भी जो रहे वह सुरक्षित और ससम्मान रहे। इसकी गारंटी उन्हें उन मुसलमानों को भी देनी थी जो भारत में रह गए थे।

“इस बिंदु पर दोनों के नज़रिये में एक अंतर था। पटेल पाकिस्तान में रह गए हिन्दुओं की सुरक्षा और सम्मान की कीमत पर ही मुसलामानों को सुरक्षा और सम्मान की गारंटी देना चाहते थे और यह चाहते थे की भारत में रह कर वे फिर अपने पुराने हथकंडे की हिन्दुओं के साथ वे शांति से रह ही नही सकते, उसे त्याग कर मेल मिलाप से रहने की आदत डालें। नेहरू इस मामले में दुहरे मानदंड अपना रहे थे। उनका मानना था कि भारत सेक्युलर और लोकतान्त्रिक देश है जब कि पकिस्तान बना ही धार्मिक आधार पर है इसलिए वह हिन्दुओं के साथ जैसा बर्ताव करता है, वैसा बर्ताव हम मुसलमानों से भारत में नहीं कर सकते।

“इस सेकुलरिज्म के खोल के पीछे एक गहरी सचाई थी कि यदि मुसलमानों और दलितों का समग्र समर्थन उन्होंने सुनिश्चित नहीं किया तो कांग्रेस के भीतर हिंदुत्व की ओर झुकाव रखने और पटेल के जैसे को तैसा तरीके को सही मानने वालों की संख्या अधिक थी और आजिज आकर पटेल कभी भी तख्ता पलट सकते थे। इसलिए उनके सेकुलरिज्म में ही इस्लामिक रुझान या उनको पसंद न आने वाले निर्णयों से कतराना शामिल था। इससे मुस्लिम कठमुल्लावाद को वीटो पावर मिल गया।

“एक बार यह नुस्खा कारगर लगा तो वह आम रास्ता बन गया। नेहरू की इस चतुराई से भारतीय मुस्लिम अलगाववाद को प्रोत्साहन मिला। जो लोग पिछले दिनों जे एन यू में भारत की बर्वादी के नारे सुन कर हैरान रह गए थे उन्हें नहीं मालूम कि नेहरू काल में हंस के लिया है पाकिस्तान लड़ कर लेंगे हिंदुस्तान के नारे लगते थे और आज क्रिकेट मैच में कुछ कश्मीरी लड़कों को पाकिस्तान की जीत पर नारे लगाते देख कर यकीन नहीं कर पाते, उनको पता नहीं कि नेहरू काल में यह पूरे भारत में होता था और ऐसा न करने वाला मुसलमान अपवाद था, और मुमकिन है उन परिवारों और उनके रिश्तेदारों तक सीमित रहा हो जिनके बच्चे भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी थे। सेकुलरिज्म को मुस्लिमपरस्ती का पर्याय बनाने में जेएनयू का नहीं स्वयं नेहरू का ही हाथ रहा है। परन्तु नेहरू के समय में भारतीय इतिहास और संस्कृति पर वैसा हमला नहीं हुआ था जैसा सत्तर के दशक से आरम्भ हुआ जिसमे प्रतिरोध और क्षोभ पैदा किया और मनमोहन सिंह के मुंह में यह जुमला ठूंस कर कि भारत के संसाधनों पर पहला हक़ माइनोरिटी का है, अंतिम जुमले के कि इस पर पहला हक़ ईसाईयों का है, विज्ञापित होने से पहले पासा ही पलट गया।

“पर ध्यान दो इस अंतर पर कि न तो अपने कथन, कार्य और व्यवहार से वाजपेयी सरकार ने यह कहा कि इसके संसाधनों पर पहला हक़ हिन्दुओं का है, न ही नरेंद्र मोदी सरकार ने, यह हिन्दू मिजाज से मेल नहीं खता। मनमोहन और सोनिआ जुग को नेहरू के बोए बीज का फल कह सकते हो तो नरेंद्र मोदी युग को पटेल कि विरासत का विस्तार। जोड़ कर रखनेवाला कील से काम लेता है या रस्सी से यह परिस्थिति पर निर्भर करता है, पर मनमानी की छूट नहीं देगा। सब लोग मनमानी करते रहे और इसे ही स्वतंत्रता की परभाषा बना दें तो इसका परिणाम अराजकता, भ्रष्टाचार और विनाश होता है जिसके कगार पर देश को छोड़ कर वे गए हैं।

“यदि मेरे कहने में कुछ कमी रह गई हो तो तुम मेरे कल की पोस्ट पर मेरे एक मित्र नलिन चाौहान के द्वारा सुझाया एक लिंक देख सकते हो।“

Post – 2017-07-16

हताशा और विवेक

हालात हमारे अच्छे नहीं हैं. नर्वसनेस की स्थिति है और वह भी ऐसे लोगों में जो समाज को राह दिखाने की जिम्मेदारी अपने सर माथे लेते हैं. ऐसे ही एक मित्र ने यह सिद्ध करने के लिए कि मुसलामानों को भारत से हिन्दुओं से अधिक प्रेम है,राही मासूम रज़ा का एक फिकरा पेश कर दिया.

उन्होंने किसी मुंहफट को जवाब देते हुए कहा था, देखो मैं मुसलमान हूँ. मेरे पास यह यह चुनाव था कि मैं पाकिस्तान चला जाऊं या भारत में रहूं. मैंने पाकिस्तान के मुकाबले हिंदुस्तान को चुना. तुम्हारे पास ऐसा विकल्प न था, इसलिए हिंदुस्तान में रहे. अब बताओ, हिंदुस्तान को तुम अधिक प्यार करते हो या मैं?

राही बहुत हाज़िर जवाब थे. उन्होंने बहुत डूब कर महाभारत के संवाद लिखे थे और वह मिजाज से सचमुच हिन्दुस्तानी थे और ऐसा आदमी ही आधा गाँव लिख सकता था. उसके लिए जिस ईमानदारी की जरुरत होती है वही लेखक की कलम को मशाल बना देती है.

राही ने आधा गाँव में इसका जवाब दे दिया है कि मुसलमानों ने किस भ्रम का शिकार होने के कारण विभाजन का समर्थन किया था और यदि उनके ही उस चरित्र की भाषा में बात करें तो उसके बाद उसे पता चला कि उसे और पाकिस्तान का समर्थन करने वालों को चूतिया बनाया गया था, क्योंकि उनका सब कुछ तो यहां था , इसे छोड़कर वे जा ही नहीं सकते थे. अब सचाई राही की ही कलम से बाहर आ जाती है. लाचारी हिन्दुओं की नहीं थी, उनकी थी जिन्होंने पाकिस्तान बनाया और जो वहां जा भी नहीं सकते थे?

इसका दूसरा पक्ष यही जवाब पाकिस्तान में रह जाने वाले हिन्दू क्या दे सकते हैं. यह कि उन्हें भारत जाने का विकल्प था और फिर भी न गए, इसलिए पाकिस्तानी मुसलामानों की तुलना में वे पाकिस्तान को अधिक प्यार करते और अपमान और दमन के शिकार होते हैं?

ये फ़िक़रे उनके काम आते हैं जिनको आप कमजोर करना चाहते हैं, और इससे उनकी ताक़त बढ़ती और आप की घटती है। मुसलमानों में यह सन्देश जाता है कि हम तो सही हैं, सारी गलती हिन्दुओं की है और हिन्दुओं को वे सारे कारनामे और आज की करतूतें याद आ जाती हैं जिनसे वह समस्या अधिक उग्र होती है जिससे निपटना हमारी आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

Post – 2017-07-16

कलम का सिपाही

अमृत रॉय ने प्रेमचद के लिए बहुत सही शब्द का प्रयोग किया कि वह कलम के सिपाही थे . प्रत्येक लेखक और विचारक, यदि उसके लेखन की कोई सार्थकता है तो, वह कलम का सिपाही तो होता ही है कलम लगाने और गुल खिलाने वाला माली भी होता है. परन्तु जब वह अपने हथियार से काम नही लेता तो ख़ासा दयनीय और हास्यास्पद भी हो जाता है. जिसके हथियार का प्रयोग करता है उसकी नज़रों में तुच्छ भी, क्योंकि वह जिस कौशल से अपने हथियार का प्रयोग करता है, उतने कौशल से दूसरों के हथियार का प्रयोग कर ही नहीं सकता.
लेखक की राजनीति होश ठिकाने लाने और मुर्दों में जान फूंकने की, नाइट्रोजन और बारूद की गंध को ऑक्सीजन में बदलने की राजनीति होती है, और यदि वह समर्थ है तो उसकी बादशाहत देश और काल की सीमाओं के पार तक फैली होती है. भारत में यह जानकारी बहुत पुरानी है फिर भी दुर्भाग्य से वह भौतिक प्रलोभनों में पड़ कर स्वयं अपनी महिमा भूल कर याचकों की भीड़ का हिस्सा बन जाता है.

Post – 2017-07-16

एक लेफ्ट टु दि राइट मित्र कोराइट टु दि लेफ्ट हो कर एक तुकबन्दी सुना दी। शायरी के उस्ताद ठहरे, सुनकर शेर अता फर्मा दियाः

दाद मांगे है फकत मुझसे दाद मांगे है!
मुल्क को खाज दिया, दाद भी देनी होगी?

Post – 2017-07-15

समाज और साहित्य

अभिव्यक्ति की प्रक्रिया, जहां वह कलात्मक रूप नहीं लेती है वहां भी कुछ जटिल होती है जिसमें हम ऐसे अनेक पूर्वापेक्षाओं से अनुकूलित रहते हैं जिसका प्रभाव हमारे शब्दचयन, वाक्यविन्यास, आवाज के चढ़ाव उतार और मुद्रा पर पड़ता है जिनको हम लगभग पूरा कर पाते हैं परन्तु पूरी तरह संन्तुष्ट नहीं हो पाते। अक्सर बाद में सोचते हैं कि यदि इस तरह अपनी बात रखता या इतने संयत होकर या आवेश से अमुक बातों को कहता तो अधिक अच्छा रहा होता। किसी परिचित से, आत्मीय मित्र से, अपने से छोटे बच्चों से, पत्नी से, प्रेमिका से, दुश्मन से आपने सामने, या बहुतों से एक साथ मंच से, गोष्ठी में, क्लास में समझाने या प्रभाव जमाने के लिए अपने को व्यक्त करते हैं तो इनके अनुसार सभी का अनुकूलन हो जाता है।

कहें सामान्य संचार में भी कलात्मकता का पुट होता है। जहां सचेत रूप में कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रश्न आता है, आवेग का पक्ष अधिक प्रबल और विचारपक्ष कुछ दब सा जाता है वहां पूर्वानुमेयता उसी अनुपात में घट जाती है और रहस्यमयता अधिक प्रधान हो जाती है। परन्तु सभी अवस्थाओं में अभिव्यक्ति का सामाजिक चरित्र होता है और हमारे भाव, विचार, भाषा सभी को दूसरा, वह उपस्थित हो या अनुपस्थित, बड़े सूक्ष्म रूप में प्रभावित करता है।

सर्वोत्तम स्थिति वह होती है जिसमें मन मिलता है, भिन्नता विचारों या संवेदनाओं तक सीमित रहती है। भाषा का संकट उपस्थित नहीं होता, जिसके होने पर संचार अन्य के भाषाज्ञान के स्तर से प्रभावित होता है। यह संकट भाषा से आरंभ होता है, पर भाषा तक सीमित नहीं रहता, रुचि और संवेदन के चरित्र को भी प्रभावित करता है, और ऐसी स्थिति में रचनात्मक चुनौतियां बढ़ जाती हैं।

समस्या यह पैदा होती है कि हम कैसे भिन्न संस्कृति के उत्तम को आत्मसात करें और अपने समाज के लिए ग्राह्य बनाएं। यह अकेले रचनाकार की समस्या नहीं है । यह उस बोध से जुड़ी समस्या भी है जो हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारे समाज की अपनी सौन्दर्याभिरुचि क्या है और उसके मर्म की रक्षा करते हुए, जो नया है, उसको पुनराविष्कृत किया जाय कि उसका अजनबीपन कम हो सके। यदि किन्हीं कारणों से समाज में कलाविमुखता पैदा हो चुकी है तो उस तक कैसे पहुंचा जा सके । यह इस समझ पर निर्भर करता है कि वह साहित्य से क्या अपेक्षा रखता है। यह उनकी भी समस्या है, जो कलामान तय करते हैं और रचनाकार और भावक के बीच सेतु का काम करते हैं। इस समस्या को एक उदाहरण से मूर्त किया जा सकता है।

भारत से पश्चिम का सांस्कृतिक टकराव हुआ तो दोनों एक दूसरे की विशेषताओं से अभिभूत हुए और उसे ग्रहण करने की आतुरता दिखाई। हम कह आए है कि हमारे विचार और साहित्यिक कृतियों ने पश्चिम को इतनी गहराई से झकझोरा जो जर्मन दार्शनिकों और कवियों से आरंभ हो कर क्रमशः पूरे येरोप में फैल गया और उससे नई साहित्यिक चेतना और कई आन्दोलनों का जन्म हुआ। परन्तु पश्चिम ने इसे इस तरह आत्मसात किया कि वह यूरोपीय समाज में सहज रूप में, वायु की नई तरंगों की तरह पुलक और उत्फुल्लता पैदा करता हुआ अपनी परंपरा का ही विकास बन कर उपस्थित हुआ और पाठकों को पराएपन का भान तक नहीं हुआ। ।

हमने भी उनसे ग्रहण किया और इससे लाभान्वित हुए। सबसे बड़ा लाभ तो गद्यविधा की शक्ति और गद्यसाहित्य का महत्व समझ में आया । हमने गाने की जगह खुल कर बोलना सीखा और इसका सबसे अघिक लाभ विचार और संचार के साधनों को मिला। फिर भी कहीं कोई चूक हुई कि हमारा पहले का साहित्य जिस स्तर तक पहुंच पाता था उस स्तर तक हमारी पैठ न हो पाई। मैं यहां किसी को दोष देने के लिए यह विचार नहीं रख रहा हूं। केवल इस समस्या को याद दिलाना चाहते हैं कि कि जिस समाज को सुरुचि और संस्कार के सबसे प्रभावशाली साधन सााहित्य से विमुख कर दिया जाता है वह संस्कारहीन, उद्दंडों, अहंकारियों और अपराधियों का समाज बनता चला जाता है और उसका साहित्य यदि अपने समाज के निम्नतम स्तर तक अपनी विश्वसनीयता नहीं पैदा कर पाता है तो साहित्यकार राजनीतिज्ञों का अजागलस्तन बन कर रह जाता है।

पाठक या भावक की अपेक्षा के सन्दर्भ में तुलसी और कबीर का ध्यान इसलिए जरूरी लगा कि दोनों की पहुंच एक ही समाज के भिन्न भिन्न तबकों तक रही है। तुलसी भक्ति के कारण नहीं, उस ज्ञान कोश के रूप में उस सवर्ण समाज के भीतर स्वीकृत रहे जिसको इसकी जरूरत थी। दलित समाज को ज्ञान की नहीं उस आत्मोत्थान से वंचित किए जाने की सबसे गहरी पीड़ा थी इसलिए उसमें कबीर के वे व्यंग्य भरे प्रहार जिन पर वर्णसमाज मुग्ध होता है, वे दोहे और साखिया उतनी लोकप्रिय नहीं हुई जितनी अन्तःसाधना के पद और रहस्य कथन जिसमें वे पंडितों के किताबी ज्ञान के समक्ष अपने सूक्ष्मवेद के ज्ञान का विश्वास पालते हुए पंडितों को भी अनाड़ी समझा करते थे। ये मात्र दो उदाहरण पूरी सचाई बयान नहीं करते।

जनता को अपनी थकान और खीझ भरी जिन्दगी से अलग आह्लाद और तन्मयता के एक संसार में ले जाने वाला साहित्य चाहिए इसलिए प्रगतिशीलता के नाम पर लिखी जोशीली कविताएं और कहानियां मजदूरों के काम की नहीं होती, वे अपने आल्हा, बिरहा, फाग और भजन से अधिक आनन्द मग्न होते हैं।

हम पश्चिमी प्रभाव में रची रचनाओं को पढ़ कर वाह वाह करते रहें, पर जीवन में दरबारी कहे जाने वाले साहित्य और सूक्तियों से ही काम लेते हैं और इस मामले में भाषा की दीवारे काफी हद तक टूट जाती हैं क्योंकि मिजाज के स्तर पर इनमें अंतर नहीं है, शब्दावली की रुकावाट अवश्य कुछ समस्या पैदा करती है। हम अपनी कलाकारिता को जनता से तभी जोड़ सकते हैं जब वह जन समाज की अपेक्षाओं की पूर्ति करे और अजनबीपन से मुक्ति देते हुए करे। यह एक मोटी सी समझ है जिस पर अधिक जानकार लोग अपनी प्रतिक्रिया से हमें भी समृद्ध कर सकते हैं।

मैं जो बीच बीच में कुछ तुकबन्दियां जो स्वतः उभर आती हैं पेश करता रहता हूं वह इस प्रयत्न में कि संभव है यह उस अवरोध को तोड़ कर अधिक जनों तक ग्राह्य हो सके। होता यह शब्दों का खेल ही है जैसे कल मृत्यु सुन्दरी पर ये पंक्तियांः
दिल भी अपना था और जां भी थी
तुम्हारे पास थी यहां भी थी
बच सका कौन तुझसे दुनिया में
लोग मरते रहेजहां भी थी ।

Post – 2017-07-14

क्या क्या गंवा दिया ये मुझे याद तक नहीं
तू हो तो बहुत कुछ है, सुना तू भी नहीं है ।

Post – 2017-07-12

कवि तो हूं नहीं, कभी सोचता था हूं और कविता भी करता था। कविता छोड़ने का कारण यह प्रश्न था कि कवियों के बीच का एक कवि बन कर रह जाने का क्या मतलब? यदि कोई मतलब नहीं तो कविता लिखने का क्या मतलब?

बुरी आदतें आसानी से नहीं जातीं । उनका हैंगओवर भी होता है और छोड़ दो तो कुछ समय बाद निश्चिंतता जन्य असावधानी के क्षणों में हमला भी होता है जिसके लिए अंग्रेजी में विड्राअल सिम्प्टन का प्रयोग होता है पर वह उस आक्रामकता का सही चित्र पेश नहीं कर पाता।

मैंने उसे हावी न होने दिया। हमला होता और मैं उसे कुचल देता। इबारतें बनी बनाई उभरतीं फिर भी पहले दर्ज नहीं करता था। फिर दर्ज यह सोच कर करने लगा कि इसमें उूची कविता करने या सुकवि बनने की झंझट से छुट्टी है और इसके बाद भी मेरे उस सरोकार से गहरा नाता है जिसमें मैं कविता को अपनी निजी नहीं, अपने समाज की जरूरत मानता हूँ।

वह जिस भी स्तर की हो, जो प़ढ सकते हैं और पढ़ने का समय निकाल सकें उनके लिए बोधगम्य और ग्राह्य भी हो और कविमनस्क मित्रो को भी कुछ दूर तक कविता ही लगे। मेरे इन प्रयोगों में मेरी अपनी आपबीती से अधिक अपने समाज की जरुरत को कसौटी बना कर समझें और इनकी कमियां उस आधार पर जांचें।

इस दिशा में अनेक समर्थ कवियों ने प्रयोग किये। इनमे पंत, अपनी बाद की कविताओं के निराला, दिनकर. बच्चन, नागार्जुन, त्रिलोचन, और उनके भी बाद रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर और वे कवि भी जो इस समय मुझे याद नहीं आ रहे हैं, मसलन नीरज और मंचों के हास्य कवि। इन्होंने दायरे का विस्तार किया पर कोई ऐसी चूक थी कि वे तुलसी और कबीर के स्तर तक नहीं पहुँच सकें और न यह समझ सके कि दोनों किन स्तरों तक और क्यों पहुँचते हैं। इसी में छिपी है भारतीय काव्यशास्त्र की आधुनिक समस्या, जिसे किसी आलोचक या रचनाकार ने समझा नहीं या समझने की कोशिश तक न की। इसका जवाब मैं कल दूँगा। उसी में मैं क्या तुक भिड़ाता हूँ इसका भी जवाब हो सकता है ।

Post – 2017-07-12

संस्कृत वर्णमाला

तुच्छतम से महत्तम की विकासयात्रा में हम पाते हैं कि आदिम अवस्था में मनुष्य भी अन्य जानवरों की तरह छोटे छोटे यूथों या दलों में रहता था। आकार बड़ा हुआ तो आहार की आपूर्ति की समस्या पैदा होती और वह बंट जाता । अलग हुआ जत्था किसी दूर के क्षेत्र में पहुंचता जहां उसके पड़ोसी अंचल में बसने वाले जत्थे भिन्न भाषाभाषी हो सकते थे । इसके विपरीत किन्हीं कारणों से यूथ की संख्या घट कर इतनी कम हो सकती थी जिसमें वह सुरक्षित नहीं रह सकता था। ऐसी स्थिति में वह किसी दूसरे यूथ की शरण ले सकता था जो भिन्न भाषाभाषी हो सकता था। इसके अतिरिक्त अपहरण आदि के चलते भी, भिन्न भाषाभाषी तत्वों के प्रवेश की संभावना बनी रहती थी । इन सभी परिस्थितियों में दुर्बल या अल्पसंख्य को प्रबल या बहुसंख्य की भाषा से ले कर रीति नीति अपनानी होती थी इसलिए उस पर गोचर प्रभाव नगण्य पड़ता था इसके बाद भी सभी भाषाएं, या आज की समझ से बोलियां – उपबोलियां आदिम आहार संचय और आखेट के चरण से ही बहुत सूक्ष्म रूप में इतरेतर भाषाओं से प्रभावित हो रही थी।

आदिम अवस्था में मनुष्य का जीवन अधिक सरल था। उसका बौद्धिक, संवेदनात्मक और कल्पना जगत बहुत छोटा था । उसका काम बहुत थोड़े से शबदों से चल जाता था। दक्षिणी अमेरिका में आज भी एक जन है जिसकी भाषा में दो से अधिक की संख्या के लिए शब्द नहीं हैं। तीन उसके लिए असंख्य या समस्त है क्योंकि वह दो से भी बड़ा इसलिए गणनातीत है। कभी हमारी भाषा का भी यही हाल था, इसलिए द्विवचन से आगे बहुवचन यह उल्लेख हम पहले कर आए हैं।

उन नितान्त सीमित शब्दों के लिए बहुत अधिक ध्वनियों की आवश्यकता न थी । उनका काम कुछ ध्वनियों और उनसे जुड़े संकेतों से ही चल जाता था । हमारी सहायता के लिए हमारी एक भाषा तमिल ने उस अवस्था का कुछ अवशेष बचा रखा है। उसमें घोष और महाप्राण ध्वनियों के लिए स्थान न था। इससे हम यह समझ सकते हैं कि उस आदिम अवस्था में भी कोई बोली तक दूसरी बोलियों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नही रह सकती थी. स्थाई आवास और खेती तथा कौशलों के विकासक्रम में यह संपर्क और साझेदारी अपनी निजता बचाए रखने के बाद भी बढ़ी और बड़ी सामाजिक इकाइयां बनने के साथ अनेक का अपने परिवेश की प्रधान भाषा में विलय हो गया. इससे क्षेत्रीय बोलियों का चरित्र उभरा जिनकी तलहटी में कई बोलियों के तत्व लक्ष्य किये जा सकते हैं. तमिल जिसकी पुरातनता की बात हमने की है उसमें अनेक बोलियों की मिलावट के बाद यह रूप बना है जिस पर संस्कृत के तत्वों का समावेश बाद में हुआ, परन्तु स्वयं संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया में सम्मिलित कतिपय बोलियों का प्रभाव तमिल की भी निर्माण प्रक्रिया पर पड़ा था.
आज की तिथि में हम यह तय नहीं कर सकते की उन विलीन होने वाली बोलियों की ध्वनिमाला क्या थी. परन्तु ऐसा लगता है कि बोलियों का आंचलिक स्वरूप निर्धारित हो जाने के बाद भी पारस्परिक सम्पर्क में आने वाली बोलियों में से कुछ में केवल घोष महाप्राण, कुछ में केवल घोष अल्पप्राण ध्वनियाँ थीं और किसी में पाँचों वर्गीय ध्वनियाँ न थीं. एक में तालव्य ध्वनियों का जोर था तो दूसरी में मूर्धन्य ध्वनियों का. सभी स्वर किसी में न थे. यहाँ तक कि अ और आ जैसी ध्वनिया तक कुछ में नहीं थीं, और कुछ में ह्रस्व और दीर्घ स्वरों का अर्थभेदक प्रयोग नहीं होता है. परन्तु ऋग्वेद की भाषा के अस्तित्व में आने से पहले संस्कृत की उस वर्ण माला की सभी ध्वनिया जिनका उल्लेख पाणिनि ने माहेश्वर सूत्र में किया है मानक भाषा में समाहित हो चुकी थीं. इनमे से कुछ ध्वनियाँ, जैसे ऋ और लृ वैयाकरणिक कंस्ट्रक्ट हैं, जिनका व्यवहार किसी बोली में नहीं होता था. पर वैदिक में इनका भी प्रयोग हो रहा था. यह वह मोटा दायरा है जिसमें हम इस लेनदेन को समझ सकते है.