Post – 2017-07-05

मैं सोच रहा था की घिसी उपमाओं और जुमलों में भी सर्जनात्मकता पैदा हो सकती है क्या, और नतीजा यह रहा :

चाँद तो था नहीं पर उसके ही मानिंद था वह।
आसमाँ में न ज़मीं पर था वहीं पर था वह।
शर्म से छिपता हुआ दर्द से घबराया हुआ
अपने को खोने की गर्दिश में कहीं पर था वह।।

प्यार कहना है अगर इसको प्यार कह लीजे
जान पहचान न थी उसको यार कह लीजे
शर्म इकतरफा न थी दर्द आर पार भी था
खलिश में लिपटा कहीं था तो, कहाँ पर था वह ?

Post – 2017-07-05

दिल जो अपना है तो यह दर्द पराया तो नहीं
साथ लम्बा है औ’ आगे भी चलेगा साहब।
इसको सहलाइये बहलाइये न तो उसको
मिट गया एक तो दूजा न मिलेगा साहब।।

Post – 2017-07-05

अहंकारवश नहीं

‘‘तुमसे जवाब मांगता हूं तो तुम नसीहत देने लगते हो कि हमें क्या करना चाहिए। दूसरी कलाविधाओं के लोग जिस तरह विचार विमुख रहते हैं, उसी तरह साहित्यकार को भी बनाना चाहते हो। और मुझसे कहते हो यह समझ कर आना वह समझ कर आना। तुममें इतना अहंकार कैसे आ गया कि तुम सबको सिखाते रहो पर उनसे कुछ भी सीखने को तैयार न होओ। जब मैं कहता हूं इस इतने संवेदनशील विषय पर क्यों नहीं लिखते तो जानते हो मैं क्या करता हूं? मैं सीधे तुम्हारे ऊपर यह आरोप लगाता हूं कि तुम भी ऐसी गतिविधियों का मौन समर्थन करते हो। बोलो अपने बचाव में कुछ कहना है?’’

जाहिर है मुझे घेरने की लगातार कोशिशों के बाद वह खीझ कर मुझे शूली पर चढाने की पूरी तैयारी के साथ आया था।

मैंने अपना गुनाह कबूल करते हुए कहा, “तुम दोस्त होने के नाते मेरा कुछ लिहाज कर गए। मैं गोरक्षा के नाम पर की जा रही गुंडागर्दी पर चुप रहकर उसका ही मौन समर्थन नहीं कर रहा हूँ, सरे राह औरतों की इज़्ज़त उतारनेवालों, लोगों को ज़िंदा जला देने वालों पर, परिवार को बंधक बना कर पति और पिता की आँखों के सामने उनकी पत्नियों और बेटियों की इज़्ज़त उतारनेवालों के विरोध में न लिख कर उनका भी मौन समर्थन कर रहा हूँ, आये दिन सबसे पहले सुनाए जानेवाले गैंगरेप के किस्सों पर चुप रहकर उनका भी मौन समर्थन कर रहा हूँ, अभी बशीरहाट में जो कुछ होरहा है, उस पर भी मौन, जिसमे मुर्दे को अन्त्येष्टि तक जाने के रस्ते तक नहीं मिल रहे और मैं मौनरह कर इनका समर्थन कर रहा हूं। मेरे गुनाहों का तो कोई अंत है ही नहीं, और तुम दोस्ती में इतने सारे अपराधों में मेरी भागीदारी के बावजूद, सिर्फ गोरक्षा के नाम पर चल रही गुंडागर्दी पर मौन रहने का अपराधी बता रहे हो। इतना पक्षपात ठीक नहीं । इससे अच्छा तो यह होता की तुम पूछते मौन क्यों हूँ?”

वह कुछ सकपका तो गया पर संभल कर बोला, “उसी का मौक़ा तो दिया है ।”

“तो सुनो। मैं इसलिए मौन हूँ कि कानून और व्यवस्था का काम लेखक के जिम्मे नहीं है। यदि मैं हंगामा करूं तो जिनकी यह जिम्मेदारी है उनका काम बढ़ जायेगा। पुरानी समस्या में मुझे समझने, समझाने और चुप रखने की समस्या उस समस्या से भी अधिक उग्र हो जाएगी जिससे मूल समस्या को हल करने में उसे बाधा पड़ेगी।

“यदि सभी लोग पूरी निष्ठा से केवल अपना काम करें तो दुनिया अधिक सुथरी दिखाई देगी। यदि अपना काम छोड़कर दूसरों का काम करने लगें तो कोई काम सही न होगा और समस्यों के भीतर से समस्याएं पैदा होंगी और उनकी बाढ़ आजायेगी, जैसा कि तुम्हारी अतिसक्रियता से हुआ है और इस अतिसक्रियता के पीछे किसी की पीड़ा से कातर होने का भाव नहीं है। घटिया सौदेबाजी है। राजनीतिक लाभ है। चिताओं पर रोटी सेंकने का कमीनापन है, अन्यथा तुम चीत्कार भरते या नहीं पर तुम्हारी नज़र में यातना के सारे रूप आते और तुम अपने आप से सवाल करते, “यह समाज किसने बनाया जिसमें जघन्यतम हिंसा मनोरंजन का स्थान ले चुकी है और मनोरंजन की जिम्मेदारी लेने वाले इसी का कारोबार कर रहे है। और तब शायद मेरी तरह तुम्हे भी लगता इन गुनाहों कि कुछ जिम्मेदारी हम पर भी है क्योंकि हम अपना काम ठीक से नहीं कर सके, मानव चेतना और सुरुचि निर्माण का काम नहीं कर सके। दूसरों के काम में भी खलल डालते रहे। हमने साहित्य-संगीत-कला-विहीन करके अपने समाज को पुच्छ-विषाण-हीन पशुओं के समाज में बदल दिया। इतना समझ में आजाय तो कल आना यह जानने के लिए कि तुम्हे हल्ला मचाने की जगह सोचने की सलाह मैं अहंकारवश नहीं, व्यग्रतावश देता हूँ।

Post – 2017-07-04

बहुत दिन बाद मुझसे रूबरू हो
बहुत दिन बाद छुप कर देखता हूँ।
बहुत दिन बाद आँखें नम हुई हैं
बहुत दिन बाद खुद को देखता हूँ।
बहुत दिन बाद दिन में रौशनी है
बहुत दिन बाद रातें जगमगाती
बहुत दिन बाद खुद से पूछता हूँ
यह सच है क्या जिसे मैं देखता हूँ।

Post – 2017-07-04

हम दिल के बुरे हैं नही तू जानता है पर
जब दिन ही बुरे हों तो कहो क्या करे कोई!

Post – 2017-07-04

सच के पीछे भी कई सच हैं इन्हे देखिये तो

आज मैं तुम्हे कन्नी काटने नहीं दूंगा। यह बताओ गोरक्षा के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उसे तुम ठीक मानते हो?

तुम्हारे रात दिन मनाने के बाद भी पागल तो नहीं हुआ हूँ कि किसी भी तरह की बेहूदगी को ठीक मान लूँ।

तो फिर इसके विरोध में कुछ लिखा क्यों नहीं? मोदी और भाजपा को बचाना चाहते थे?

मोदी से मेरा क्या लेना देना? उसका स्वयंसेवी वकील तभी तक हूँ जब तक तुम्हारे हमले के कारण वह भला आदमी संकट में है। इतने सारे, अपने हुनर में माहिर, हमलावर उसे इसलिए मिटा देना चाहते हैं कि वह देश को एक नई दिशा में ले जाना चाहता है। इंसानियत पर वकालत नहीं चलती फिर भी वकीलों में भी कुछ इंसान अभी तक बचे हुए है। जिस दिन तुम तुम्हे अक्ल आजायेगी, तुम उस पर अन्याय करना बंद कर दोगे मैं तुम्हारा हूँ तुम हो हमारे सनम गाता हुआ तुम्हारे साथ हो लूंगा। अभी तो मैं तुम्हें बचाना चाहता हूँ। सच कहो तो अपनी और अपनों की इज़्ज़त बचाना चाहता हूँ।”

अजीब घामड़ आदमी हो यार! क्या मैं यह सब करा रहा हूँ?

सच कहो तो मैं इतना कमअक़्ल हूँ कि अपने कार्यक्षेत्र को छोड़कर किसी अन्य के बारे में जो कुछ जानता हूँ वह मात्र सूचना होती है. जानकारी तक नहीं! ठीक वैसे ही जैसे किसी संगीतकार, चित्रकार, अभिनेता, वैज्ञानिक, व्यवसायी, अर्थात अपने सरोकार और महारत के क्षेत्र को ही पूरा संसार मानने और उस संसार को बचाने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगाने वाले के साथ होता है।

उसकी समझ में कुछ आ नहीं रहा था इसलिए वह झल्ला तो रहा था पर अपने को संयत करने में इतनी ताक़त लगा रहा था कि मुझे शक था कि जो कुछ मैं कह रहा हूँ उसे वह ठीक से सुन भी पा रहा था या नहीं। मैंने इसे लक्ष्य किया पर इसका आभास उसे न होने दिया।

ये सभी अपने कार्यक्षेत्र का सम्मान करते हैं, और इसलिए इनके शिखर पुरुषों का सभी, यहां तक कि साहित्यकार भी इतना सम्मान करता है, जितना अपने क्षेत्र के शिरोमणियों का भी सम्मान नहीं करता और यह अकेला निर्णय है जिसमें मैं उनके साथ हूँ । साहित्यकार की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा होने के कारण उसे यह भरम हो जाता है कि भाषा का जितने क्षेत्रों और जितने रूपों में उपयोग होता है, उन सभी पर उसका अधिकार है। वह साम्राज्यवादी मनोवृत्ति का हो जाता है तो अपने देश को छोड़कर उन सभी देशों को जानता है जन पर वह अधिकार करना चाहता है।

तुम जानते हो तुम क्या हो?

उत्तर तो उसे देना न था, मैंने ही कहा, तुम अपनी ग्रह कक्षा से भटके हुए नक्षत्र हो जिसे किसी शक्तिपुंज से टकरा कर उल्का पिंडों में बदलना और जहां गिरे वहां ध्वंस करना ही बदा है।

सार्थकता पाने के लिए अपनी ग्रहकक्षा में लौटना होगा। कर पाओ तो कल बात करेंगे।

Post – 2017-07-04

रोते लिखता हूं लिखके हंसता हूं
किस गुनह की सजा मिली मुझको !

Post – 2017-07-04

कई तरह की हैं आहें तेरी शरारत में
साफ बतला क्या कभी खुल के रो नहीं सकता?
ये हंसी, ऐसे ठहाके, यह मुसलसिल मुस्कान
इतनी पोशीदगी! इंसान ढो नहीं सकता।

Post – 2017-07-04

जिस फर्द को देखूं मैं वही आफताब है।
गर्मी बहुत अधिक है तुम्हारे दयार में।।

Post – 2017-07-03

होनी और करनी का फ़र्क़

“यह बताओ, नटवर लाल से तुम्हारी मुलाक़ात कब हुई थी।“

“बेवकूफों को सभी बातें नहीं बताई जातीं। विषय पर आओ।“

“यार, तुम हर बात को इस तरह उलट देते हो कि तुमसे बात करने पर लगता है, तर्क और प्रमाण का सहारा लेकर भी झूठ को सच सिद्ध किया जा सकता है।“

“इतने जाहिल हो तुम कि यह तक नहीं जानते कि हमारी पूरी न्यायप्रणाली इसी पर टिकी है। जिस दिन लोग सच बोलने लगेंगे अदालतों की और कसमें खाने की और प्रमाण देने, तर्क करने की जरूरत नहीं पड़ेगी । उनका कथन, उनका तेवर स्वयं तर्कातीत प्रमाण में बदल जाएगा।“

“चलो इतनी देर के बाद तुमने माना तो कि तुम जिसे तर्कसंगत और प्रामाणिक और न्यायोचित सिद्ध कर देते हो वह फरेब है।“

“तुम्हे पहली बार जाहिल कहा था तो मज़ा आया था, दुबारा कहते हुए दुःख हो रहा है कि तुमको यह तक याद नहीं कि मैं बहुत पहले अपने को उसका वकील घोषित कर चुका हूँ। जानते हो ऐसा करते हुए मैंने क्या किया?”

“उसने कोई जिज्ञासा न की तो स्वयं बताना पड़ा, “मैंने इस घोषणा के साथ ही अपने को उस किरात में रूपांतरित कर लिया जिसके ऊपर अर्जुन के सारे बाण टकरा कर मात्र गुदगुदी पैदा करते हैं। और यह देखो कि ऐसा करते हुए मैंने तुम्हारे ही हथियारों को तुमसे छीन कर तुम्हे निहत्था कर दिया, क्योंकि पार्टी और पार्टीजन, खूंटे और प्रतिबद्धता का डंका तुम्ही बजाया करते थे. मैंने प्रतिबद्धता की जगह सम्बद्धता का खुला और सम्मानजनक विकल्प चुना। वकील की सम्बद्धता जो तभी तक चल सकती है जब तक मेरा पक्ष मेरी सलाह मानता है।“

“यार लगता है आज फिर वह सवाल नहीं पूछ पाऊँगा जिसे पूछने चला था।“

“पूछो, अब मैं वकील की तरह नहीं एक सच्चे दोस्त की तरह बात करूंगा।“

“यह बताओ यह जो कुछ हो रहा है, वह क्या देश के हित में है?”

“यार, तुमने चीखना और रोना तो पैदा होते ही सीख लिया, इतने मदरसों में जाने के बाद भी बोलना क्यों नहीं सीख पाए, यह बताओगे?”

उसे ऐसे अटपटे जबाब की उम्मीद न थी, जो सवाल बन कर आये । चौंक कर पूछा, “मैंने गलत क्या कह दिया?”

“तुम होना और करना में फ़र्क़ नहीं कर पाए। होने को और होनी को हम रोक नहीँ सकते। बरसात हो रही है, भूस्खलन हो रहे हैं, सूखा पड़ सकता है, हम किसी व्याधि के शिकार हो सकते हैं, यह हमारे हित में या देश हित में हो या नहीं, इसे होना ही है. इसकी शिकायत नहीं की जा सकती। इसलिए तुम्हें कहना चाहिए था, ‘यह जो किया जा रहा है, वह क्या हमारे या देश या मानवता के हित में है। और यहां से सही गलत, अच्छा बुरा का और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को, और जिन्हें ऐसे लोगों को दंडित करने की जिम्मेदारी दी गई है वे यदि उसके होने पर कुछ न कर रहे हों तो उन्हें , हमें दोष देने का अधिकार है।

“परन्तु जो हो रहा है उसे होने से यदि किसी सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता था, तो इसमें शिथिलता बरतने वालों को यदि अपराधी नहीं तो उत्तरदायी तो सिद्ध किया ही जा सकता है ।“

”पर यहां भी होने और करने में फ़र्क़ है. समाज में जो हो रहा है वह समाज की मानसिकता से सम्बंधित है। इसमें धर्म, शिक्षा प्रणाली और साहित्य, कला, संचारमाध्यम और दर्शन की भूमिका है। यदि कुछ अनिष्टकर हो रहा है तो उत्तरदायी इनमें से किसी को, और यदि किसी विचारधारा ने सबको अधिकृत कर रखा हो तो उसे मानना होगा। जो हो रहा है और मानसिक कारणों से नहीं, व्यवस्था की चूक से हो रहा है तो उसके लिए उसे जिम्मेदार मानना होगा।“

“सर्वनाश कर दिया तुमने, अब आगे बात करने का कोई लाभ ही नहीं।“

“लाभ है पर तभी जब तुम यह देखना सीख जाओ की पहले ऐसा होता था तो क्या किया जाता था और भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए क्या किया जा रहा है। कल इस पर सोच कर आना।“