Post – 2017-06-23

सच का सामना

हमने कल की पोस्ट अधूरी छोड़ दी। उसी क्रम में उस सच को बयान नहीं किया जा सकता था जिसके बिना यह चर्चा व्यर्थ है। सच का सामना करना सामान्य स्थितियों में भी आसान नहीं होता। जो बहुत सुलझे और बेदाग किस्म के लोग हैं वे भी ऐसा नहीं कर पाते अप्रिय कथन से बचने के लिए वे चुप लगा जाते है या पीछे हट जाते हैं। उन्हें सच से अधिक इस बात की चिंता होती है उस व्यक्ति पर क्या बीतेगी जो झूठ या पाखंड या बड़बोलेपन का सहारा लेता आया है और यह विश्वास पाले हुआ है की दूसरों को उसके छद्म का पता न चलेगा। ऐसी स्थितियां भी होती हैं जिसमे दूसरा व्यक्ति पाखंडी नहीं होता असावधान होता है. उसे स्मरण दिलाया जाय तो उपकृत अनुभव करे, अति सज्जन लोग इसमें भी साफगोई से काम नहीं ले पाते. मैं प्रयत्न करता हूं कि इसे हास्य में बदल कर स्मरण दिला दूँ जिससे वह अपनी भूल सुधार ले, या उसकी असलियत उजागर हो जाय. परन्तु अनेक स्थितियों में मुझसे भी यह संभव नहीं हो पाता . यदि हो पाता तो वहीं, उसी हॉल में, भाषणबाजी और फोटोग्राफी के आयोजन को दिखाते हुए यह भी पूछता की इन दुखियारों को यहां तक क्यों बुलाया था. इनको राहत दिलाने के लिए या अपराधियों को दण्डित करने या बाध्य करने के लिए आपके पास कोई योजना है? नहीं तो इस पर आपने उपस्थित लोगों से पूछा की अब हमें क्या करना चाहिए? यह आशंका भी जताता कि मुझे इससे अमुक की गंध आती है. नहीं कर सका। ये सवाल तक इतने साफ़ साफ इस मौके पर नही सूझे. हम इच्छाशक्ति रहते हुए भी आवेग, अपनापन या लिहाज के कारण न सचाई को उसकी समग्रता में देख पाते हैं न ही पूरी दृढ़ता और सहस से उसका सामना कर पाते हैं. कुछ स्थितियां तो ऐसी होती है जिनमें सचाई को केन्द्र में लाना अत्याचारियों का पक्ष लेने जैसा लगता है।

हम जिन सचाइयों की ओर ध्यान दिलाना चाहतें हैं उनमें पहला यह कि पिछड़े हुए समाजों, देशों या तबकों में पिछड़ेपन के अनुपात में ही उसके प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी लोग अपने को आगे बढ़ाने के लिए अपनो से ही विश्वासघात करते हैं और इस मानी में वे नैतिक दृष्टि से अपने ही समुदाय के पिछड़े लोगों से भी अधिक चरित्रहीन होते हैं. वे उनका अपने हित के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं और इसलिए मात्र उस देश, समाज या तबके हा होना इस बात की पूरी गारंटी नहीं देता कि वह उसका सही प्रतिनिधित्व कर सकता है या कर रहा है ! इसे राम इक़बाल से आरम्भ कर के उसी समज के प्रतिभाशाली सुशिक्षितों तक तो दुरवस्था से बाहर आने के बाद भी पीढ़ी दर पीढ़ी उन सुविधाओं को छोड़ना नहीं चाहते और आरक्षण आदि के लाभ को नवोदित वर्णेतर ब्राह्मणों के भीतर रखना चाहते हैं. यह विकृति राजनेताओं में, वे दलित हों या पिछड़े, पारदर्शी और सर्वव्यापी हो जाती है. वे अपने समुदाय के प्रति उतनी ही चिंता प्रकट करते हैं जितनी उनको अपने इस्तेमाल के लिए ज़रूरी मानते हैं.
परन्तु समस्या इससे अधिक जटिल है. उससे भिन्न देश, समाज या तबके का कोई व्यक्ति उसका सही प्रतिनिधित्व कर ही नहीं सकता। वह उसे समझने का दावा करते हुए भी उसकी यातना को समझ ही नहीं सकता. उसमें निस्पृह, त्यागी और निडर नेतृत्व का उभरना एक मात्र विकल्प रह जाता है। परन्तु वह अंग्रेजी के वर्चस्व की स्थिति में संभव नहीं है. यह तभी संभव है जब भाषा की अलंघ्य दीवार बाधक न बने और अधिक से अधिक प्रतिभाशाली युवक बड़ी संख्या में आएं और चेतना का सामान्य स्तर ऊपर उठे. परन्तु इस विषय में शिक्षित दलित समाज की जागरूकता का स्तर बहुत पिछड़ा हुआ है. कही बाबा साहब ने लिख दिया कि अंग्रेजी शेरनी का दूध है उसे पीकर आदमी दहाड़ता है. और मैंने ऐसे बुद्धिजीवियों के लेख पढ़े हैं जो अपने समाज में दहाड़ने वाली भाषा में आरम्भ से शिक्षा के पक्षपाती हैं जब कि उन्हें बोलने और सोचने वाली भाषा के लिए संघर्ष करने की तैयारी करनी चाहिए और दहाड़ने वाली पशु भाषा के बहिष्कार का आंदोलन चलाना चाहिए. समाजिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए कृतसंकल्प समुदायों को ब्राह्मणों को और मनु को कोसने की जगह उनसे सीखना चाहिए जैसे पिछड़े देशों को उन्नत देशों की नकल यही करना चाहिए, उनसे सीखना चाहिए. ब्राह्मणों ने अपनी सामाजिक श्रेष्ठता, धन, बाहुबल से प्राप्त नहीं की थी कुछ दूर तक इसका सम्बन्ध संस्कृत को सैद्धन्तिक ज्ञान की भाषा बनाने और इस पर एकाधिकार कायम करने, दूसरों को इससे दूर रखने की योजना से है और इसका उपचार है जिस भाषा तक कम लोगों की पहुँच हो सकती है , उसके वर्चस्व को समाप्त करना. कल तक यह भाषा संस्कृत थी, मध्य काल में फ़ारसी बन गई. आज अंग्रजी है जो बौद्धिक से लेकर सामाजिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है. यह ज्ञान की शक्ति थी पर शूद्रों के पास कौशल था.
ब्राह्मण के वर्चस्व का स्रोत था उसका नैतिक प्राधिकार जिसे उसने अपने को दूसरों से अधिक निस्पृह, अधिक न्यायपरायण, अधिक निडर सिद्ध करके या प्रचारित करके हासिल किया था, इसकी दिशा में मैंने दलितों को ध्यान देते नहीं देखा. जहां तक मनुवाद का प्रश्न है, वह भारतीय संविधान द्वारा व्यर्थ किया जा चुका है और चेतना के स्तर पर यह दलितों में अधिक प्रबल है, सुविधाओं का लाभ उठाकर आगे बढे दलित और पिछड़े अपनी मानसिकता में ब्राह्मणों से भी अधिक वर्चस्ववादी है. वे बोलना सीखने से पहले दहाड़ना सीखना चाहते हैं.
अपूर्ण

Post – 2017-06-22

यातना का कारोबार

बात बीसेक साल पुरानी है। जहां तक याद है लालबहादुर वर्मा ने इतिहासबोध प्रकाशन का आरंभ किया था उसी समय उन्होंने एक मासिक पत्रिका किसी दूसरे नाम से आरंभ की थी और इससे विकासनारायण राय और जेएनयू के के एक अध्यापक भी बहुत उत्साह से जुड़े थे। मैं इसका ग्राहक भी बना था। लालबहादुर वर्मा कुछ भी करें, सोते जागते, उसमें सामाजिक सरोकार न हो तो मान लीजिए यह वर्मा जी का मुखौटा लगाए कोई दूसरा आदमी है। मुझे उनकी राजनीति गलत लगती रही है, उनका यह सरोकार चुंबकीय लगता रहा है खास कर इसलिए कि वह इससे कव्य के रूप में नहीं हब्य के रूप में जुड़ते हैं, जिस पर मैं अपने को उनसे बहुत पीछे पाता हूं। जेएनयू के वह तरुण अध्यापक इसलिए भी बहुत ओजस्वी लगते थे कि वह वाल्मीकि उपाधि लगाने वाले समुदाय से आते थे और उनकी टिप्पणियां सामान्य व्यवहार में इन सेवाओं में लगे लोगों के साथ किस तरह की संवेदनशून्यता से लोग पेश आते हैं, उसको उदाहृत करते हुए समानुभूति और छटपटाहट से भरी लगती थी।

वह उन दिनों बहुत उत्साह से लिख रहे थे और पत्रों पत्रिकाओं में भी उपस्थित रहते थे। उनके लेख तथ्य और प्रमाण और आंकड़ों से पुष्ट होते थे इसलिए उनके लेखों का मैं बहुत प्रशंसक था और कहीं भी दिख जाते तो पढ़ता अवश्य था।

जिस घटना या दुर्घटना का यहां जिक्र कर रहा हूं वह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना से आहत हो कर संभवतः कंस्टीच्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हाल में आयोजित की गई थी। गाजियाबाद में एक मैनहाल में उतरने के बाद एक सफाई कर्मी की मौत हो गई थी। वहां सफाई का काम ठेके पर दिया गया था और ठेकेदार म्युनिस्पैलिटी से तो पूरा पैसा लेता थ, परन्तु अपनी ओर से सफाई कर्मियों को लगा कर उनको मात्र पांच हजार देता था। उस नौजवान की मृत्यु को उसके परिवार की यातना के सिरे से देखें जिसका नौजवान बेटा व्यवस्था की चूक के कारण मारा गया है, जिसे एक तरह से दिहाड़ी या मासिक वेतन पर ठेकेदार ने रखा था, जिसने उसकी मौत के बाद किसी तरह की क्षतिपूर्ति करने का प्रयास नहीं किया, जिसे काम के दौरान मारे जाने के एवज में आजीवन वेतन और ओर उसके बाद उस पर निर्भर जनों में से किसी को नौकरी देने आदि का कोई प्रबन्ध नहीं था। इतना संवेदनशील मुद्दा जिसमें उसके परिजनों को जिनमें उसकी मां भी थी, पत्नी भी रही होगी, उसका ध्यान नहीं, बड़े आदर से बुलाया गया था। मैं यह सोच कर गया था इस पर कोई आन्दोलन खड़ा किया जाएगा, कोई कार्ययोजना बनेगी। यही सोचकर उसके परिजन भी आए होंगे। पर हुआ क्या?

हुआ यह कि मंच से एक प्रभावशाली भाषण दिया गया विदेशों में किस तरह की व्यवस्था है, हमारे यहां यह नहीं है। ऐसा होता तो यह मौत न होती। म्युनिस्पैलिटी सीधे सफाई कर्मियों को नियुक्त करने की जगह यह काम ठेके पर दे रही है, इसमें किस तरह का भ्रष्टाचार है, सफाई कर्मचारी अपने वेतन से कुछ दे नहीं सकता पर ठेकेदार से कमाई हो सकती, इसलिए यह ठेकेदारी प्रथा आरंभ की गई है। देश विदेश के आकड़ों, मानकों और अपने देश में इस बदहाली के ओजस्वी भाषण के बाद फोटों सेशन चला और कार्यक्रम समाप्त। भाषण को भी रेकार्ड किया गया था।

उस अभागे के परिजनों की मुखमुद्रा देख कर ही समझा जा सकता था कि उनके बेटे की मौत पहले एक ठेकेदार के कारण हुई थी और यह दूसरी मौत है जो एक दूसरे ठेकेदार के हाथों हो रही है। मेरे मन में इतनी जुगुप्सा हुई कि उस व्यक्ति को पढ़ना भूल गया, उस पत्रिका को पढ़ना छोड़ दिया। पत्रिका का नाम तक याद न रहा। उसका अपना नाम तक भूल सा गया था इसलिए उसे जेएनयू का अध्यापक कह रहा था, परन्तु इस बीच ही याद आ गया, नाम सुभाष गाताड़े था। था, है नही, वह मेरे लिए उसी दिन हो कर भी न रहा। वे आंकड़े कहां से जुटाए गए थे, यह कार्यक्रम किसलिए आयोजित किया गया था, यह फोटोग्राफी किसे पहुंचाने के लिए की जा रही थी? क्या वह अपनी बिरादरी की यातना को अन्तर्राष्ट्रीय बाजार से मोल वसूलने के लिए एकत्र कर रहा था? कुछ दिनों के बाद अज्ञात कारणों से वर्मा जी का भी मोहभंग हो गया और पत्रिका बंद हो गई!
incomplete

Post – 2017-06-21

हर आदमी को मयस्सर तो हो इंसां होना (3)

मानव यातना और उत्पीड़न के असंख्य रूप हैं. हमारा ध्यान केवल इनके उन रूपों की ओर जाता है जिनसे ग्रस्त लोगों की संख्या अधिक है. राजनीतिज्ञों के लिए यह सही हो सकता ह, क्योंकि इसका गणित उसके लिए लाभकर होता है. साहित्यकार और विचारक के लिए इसका सबसे यंत्रणादायक रूप – भले उससे एक, दो या कुछ ही लोगों को मिलने वाली अकल्पनीय यंत्रणा- सबसे अधिक उद्वेलनकारी प्रतीत हो. परन्तु राजनीतिज्ञों का पिछलग्गू होने के कारण नामी साहित्यकारों, पत्रकारों का ध्यान भी उधर नहीं जाता. उनका बाजारभाव इतना कम है कि कहीं दर्ज ही नहीं होता फिर साहित्य और कला में कैसे हो.

यातना का गणित नहीं होता, इसका शूलमाप होता है और कालवेध होता है. कितनी प्रखरता से और कितनी अवधि तक किसी को इससे गुजरना पड़ा? किन विवशताओं में, अन्य विकल्पों के अभाव में, इसे चुनना भी पड़ा। आप को अस्पृश्यता विकल कर देती है, क्योंकि यह हिन्दू समाज में लम्बे समय से चली आरही है और इसका राजनितिक सूचकांक काफी ऊपर है। इससे मुझे भी क्लेश होता है, परन्तु फँसी हुई मलप्रणाली को खोलने के लिए उसके मलकूप में बिना किसी सुरक्षा और मलरोधी पोशाक के और बिना मास्क और ऑक्सीजन व्यवस्था के उतरने वाले और कभी गैस से प्राण गवाने वाले, कभी उस गैस से नशा पाने के लिए सीवर होल में उतरने के लिए उत्साहित निष्प्राण पर साँस लेने वाले प्राणियों के अमानवीकरण, और अधोगति को देखा है?उनके अमानवीकरण ही नहीं कृमि-कीटीभवन की आप कल्पना नहीं कर सकते। परन्तु एक तो यह आधुनिक सीवर प्रणाली की दे है, जैसे सर पर टोकरा ढोते हुए मलनिस्तारण मध्यकालीन समाज की देन है, इसलिए न तो राजनीति में न ही साहित्य में इसे यातना और अमानवीकरण से जोड़ा गया न तो साहित्यकारों की नज़र इस, न दलित राजनीति करने वालों ने कभी इस पर ध्यान दिया, इसको लेकर मनु को भी कोसा नहीं जा सकता अत: हमारा प्रगतिशील लेखक पार्टी के निर्देश पर किसान मजदूर, धनी गरीब और अस्पृश्य के मुर्दे मुद्दों को साहित्य का मुद्दा बताता रहा और चमत्कारी पर मुर्दा साहित्य लिखता रहा, जिसके कलात्मक उत्कर्ष के अनुपात में ही भारतीय गाहक घटते गए और जनता से कटने के बाद राजाश्रय की तलाश के कारण साहित्यकार अपने को अपने ही समाज से निर्वासित और विश्वविजेता मान कर अपनी भूमिका को दूसरों के उपयोग की चीज मान कर तुष्ट रहने लगा.?

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मैं कुछ वर्षों तक अपनी कॉलोनी का अध्यक्ष भी रहा। काम इतना कि हेराफेरी पर नज़र रहेगी। इसे मैंने लोगों को जोड़ कर इसपर एकाधिकार रखने वालों से मुक्त कराया था इसलिए यह उत्तरदायित्व बनाता था। मुझे,मैं जो कुछ भी करता हूँ उसमें सर्जनात्मक आनंद मिलता है, इसलिए यह उत्तरदायित्व भी सर्जनात्मक तुष्टि देता था। मैंने एक चेतना जगाने का प्रयत्न किया कि जैसे तुम्हारा डाक्टर और सर्जन तुम्हे नीरोग करता है वैसे ही ये सफाई कर्मी भी हैं. इनको धन नहीं दे सकते तो सम्मान तो दे सकते हो। इसमें सफल नहीं हुआ या बहुत कम हुआ। परन्तु राम इक़बाल हो जिसने हमारी कॉलोनी की सीवर लाइन का ठेका ले रखा था, या रामचंद्र जिससे पॉलिश वाले इसलिए डरते थे कि एक चपत लगाते भी यदि यह स्वर्ग सिधार गया तो उनका जीवन नर्क हो जाएगा. नाली फसने पर इक़बाल रामचंद्र को बुलाता था. एक बार उसने बताया वह नशे के लिए सीवर में उतरने के बाद मलयुक्त पानी भी पी जाता है।
मुझे ज़िन्दगी में कोसने वाले तो मिले हैं पर गाली देनेवाले नहीं और ऐसे गाली देने वाले तो विरल जिनकी गाली सुनकर मन में आया हो कि मैं इसी लायक था। इनमें सबसे ऊपर नाम रामचंद्र का आता है। उसकी भाषा आप भी समझ कर अपनी भाषेतर व्यंजनाओं को अधिक प्रखर बना सकते हैं ।
सीवर फँस गया था. मलजल उफन कर सड़क के किनारों से बह रहा था। इक़बाल और रामचंद्र मेरे साथ चल रहे थ। बीच में खुली जगह थी, परन्तु रामचंद्र उस मल भरे सिरे पर चल रहा था गन्दे पानी में पांव रखता हुआ। मुझे व्यग्रता हो रही थी। मैंने कहा उधर क्यों चल रहे हो? इधर साफ सड़क है इस पर क्यों नहीं चलते? उसने मेरी बात सुनी और उसे अपने ढंग से समझी। अभी तक जो उस गंदे पानी में पांव रखता चल रहा था अब छपकोरियां मारते हुए चलने लगा. लंबा समय लगा यह समझने में कि वह छपकोरियां भरते हुए मुझे गाली दे रहा था कि अभागों मेरे पांव गंदे पानी में पड़ रहे हैं तो तुम्हे दर्द हो रहा है, जब मैं सीवर में उतरता हूँ तब कुछ नहीं होता. उन शब्दातीत गालियों को दर्ज नहीं किया जा सकता पर मुझे लगा मैं सचमुच इसका पात्र था. परन्तु क्या साहित्य में कहीं मजूर के आगे की यह यातना जगह पा सकी?

Post – 2017-06-20

हर आदमी को मयस्सर तो हो इंसां होना (2)

यह बीमारी मेरे साथ नई नहीं है, इसलिए अब इसके साथ अनुकूलित हो गया हूं। बीमारी यह कि भूमिका बनाने में इतना खो जाता हूं कि जो बात कहने के लिए भूमिका बनाई थी उसे कहे बिना ही बात खत्म कर देता हूं। वापस लौटने के बहुत बाद याद आता है कि कहना तो यह था और …उसके बाद मुझ पर क्या बीतती है यह बताने भी चलूं तो नतीजा वही होगा। कुशल है कि इस बार वह याद आ ही गई ।

हमारी चर्चा आरंभ हुई थी दलित समाज की विडंबनाओं से। सहारनपुर हाल ही में घटित हुआ था इसलिए उसकी पीड़ा और उलझन तो थी ही। विषय लगभग आरंभ में ही उठ गया था, याद नहीं किस भूमिका के साथ।

वर्णव्यवस्था की मेरी समझ दूसरों से अलग है। उसको किसी चालू चर्चा में दूसरों को समझा नहीं सकता। मोटे तौर पर इसके पीछे आर्थिक शक्तियां रही है और उनके भी पीछे पहल की कमी या उससे वंचित करने की योजना। मैं उन जड़ लोगों में हूं जो सभी उपक्रमों के पीछे अर्थशास्त्र तलाश करते हैं और मानते हैं कि नैतिकता, भावुकता, सम्मान, श्रद्धा और सौन्दर्यशास्त्र का भी अर्थशास्त्र होता है। कुछ मामलों में अर्थतन्त्र का अर्थविस्तार करना जरूरी हो सकता है – वह जो हमारे लिए उपादेय या हानिरहित है। मैं जानता हूं कोमल सोच के लोग इससे असमत होंगे। पर मैं सभी पक्षों पर ध्यान देने के बाद मानता हूँ कि यह सच है।

इसलिए वर्णव्यवस्था की समाप्ति या सामाजिक संबंधों में बदलाव अर्थतन्त्र में बदलाव से बहुत गहराई से जुड़ा है। अर्थतन्त्र में बदलाव लेखक या चिन्तक के वश का काम नहीं। यह सत्ता परिवर्तन से जुड़ा प्रश्न है, इसलिए किसी समस्या को इस भरोसे छोड़ देना कि आर्थिक रूपान्तरण होगा तब सामाजिक रूपान्तरण भी हो जाएगा, इसलिए सारा ध्यान आर्थिक रूपान्तरण या आमूल परिवर्तन पर दो, यह आन्दोलनकारियों के लिए सही हो सकता है, विचारक के लिए नहीं।

वह वर्तमान परिस्थितियों में जो चेतना के रूप में परिवर्तन के माध्यम से संभव है उसके लिए प्रयत्न कर सकता है। जो प्रश्न व्यवस्था से जुड़ा है उसके विषय में जागरूकता पैदा कर सकता है। जागरूकता पैदा करने का यह काम, मैं कह आया हूं, स्वयं में एक क्रान्तिकारी काम है। यह भी राजनीतिक सक्रियता का एक रूप है जिसे आन्दोलनों से जुड़े लोग समझ नहीं पाते।

यह भी एक कारण था कि कम्युनिस्ट पार्टियां सामाजिक सवालों को सही परिप्रेक्ष्य में न तो रख सकीं, न उनके लिए कोई ऐसा पहल कर सकीं कि सभी उत्पीड़ितों को अपने साथ जोड़ सकें ।

इसका भी प्रधान कारण कम्युनिस्ट पार्टियों का लीगीकरण रहा है जिसकी कभी गहरी छानबीन नहीं की गई। मेरे इस कथन को सांप्रदायिक रंगत दी जा सकती है, परन्तु इसे समग्र सामाजिक परिदृश्य में देखा जाना चाहिए। कम्युनिस्ट विचारधारा से या कहे रूसी क्रान्ति से सर्वप्रथम आकर्षित होने वाले पाश्चात्य शिक्षाप्राप्त, कहें इंग्लैंड में शिक्षाप्राप्त और वहां के वामचिन्तन से प्रभावित अभिजात भारतीय थे। परन्तु इनकी साझी समझ यह थी कि अहिंसक तरीके अपना कर स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं की जा सकती और पाई भी गई तो सत्ता सामन्ती सोच के लोगों के हाथ में आएगी जिससे सत्ता परिवर्तन तो होगा, परन्तु सामाजिक और आर्थिक विषमता बनी रहेगी।

उन्होंने जनता से जुड़ने, उसके बीच अपने विचारों के प्रचार-प्रसार का, उनकी क्षमताओं और मनोबाधाओं को समझने का कोई प्रयत्न नहीं किया। ये महत्वाकांक्षी, पर कामचोर लोग थे जो अपराधियों की तरह खतरे उठा कर एक झटके सब कुछ हासिल कर लेना चाहते थे। इन्होने कल कारखानों के मजदूरों के साथ भी एकजुट हो कर उनके बीच अपने विचारों का प्रचार करने और उन्हें अपने से जोड़ने का काम नहीं किया।

ये सभी एक्टर थे। अधिक की जानकारी नहीं पर बकौल श्रीकान्त व्यास जो अमृतराय के साथ कभी जुड़े रहे थे, अमृत रॉय मजदूर सभाओं के लिए एक फटा, कुछ मैला कुरता पजामा अलग रखते और उन्हीं मौकों पर पहनते थे. यही हालत दूसरे कम्युनिस्टो की भी थी। कम्युनिस्ट पार्टी को आरम्भ में ही बहुरूपियों की पार्टी बना दिया गया, क्योंकि उसने एक ऐसी भूमिका अपना ली थी जिसे वह जी नहीं सकती थी, दिखाने और दिखने के प्रबंध कर सकती थी। साहित्य और कला इस पाखण्ड के ड्रेसिंग रूम थे और एक्टर के सामने जो हैसियत ड्रेस मेकर की होती है कलाकार और सहित्यकार की वही हैसियत व्यावहारिक राजनीतिज्ञों के सामने हो गई। यह तो होना ही था, इसपर आश्चर्य नहीं। आश्चर्य यह कि लेखकों और कलाकारों ने इस भूमिका को स्वीकार कर लिया और इस पर इतराने लगे।

ये लोग मजदूरों में असंतोष पैदा करके कुछ अधिक सुविधाएं दिलाने के एकमात्र आश्वासन के बल पर उनको नारेवाजी और लफ्फाजी से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील रहे, इसलिए आर्थिक सवालों से आगे, सामाजिक कुरीतियों और विषमताओं को सीधे अपने कार्यभार में शामिल ही नहीं कर सके। शेष भारत के लिए वे कांग्रेस और खास तौर से गांधी के द्वारा पैदा की गई जागरूकता को झपटने के प्रयत्न में रहे।

जब मैं इसकी लीगी मानसिकता की बात करता हूं तो इसलिए कि लगभग सभी मुसलमानों को लोकतन्त्र डरावना लगता रहा है। इसका एक कारण तो इस्लाम की अपनी मानसिकता है जो खलीफा, राजा या तानाशाह को पसन्द करती है लोकतन्त्र को मुस्लिम बहुल देशों में भी सहन करती है। भारत में जहां सामाजिक समीकरण भिन्न था वहां यह उन्हें लोकतन्त्र नहीं, बहुमतवाद, मेजारिटिज्म, प्रतीत होता रहा है, और इसके पीछे उनकी अल्पमतवादी चेतना रही है जिस पर हावी होने के जाहिर और छिपे तरीके वे अपनाते रहे हैं। मुस्लिम बुद्धिजीतियों को इससे मुक्त होने के दो ही तरीके दिखाई देते रहे हैं। एक अभिजनवाद या आलीगैर्की, दूसरा तानाशाही। कम्युनिज्म उन्हें इसलिए नहीं आकर्षित कर रहा था कि सामाजिक और आर्थिक न्याय में उनकी कोई दिलचस्पी थी, अपितु यही लोकतांत्रिक व्यवस्था से, जो उनके अल्पमत में होने के कारण मुस्लिम समाज के लिए खतरनाक विकल्प प्रतीत होता था, मुक्ति दे सकता था। इसकी सबसे बेलौस अभिव्यक्ति इकबाल की पंक्ति – न संभलोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालो, तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में हुई है और हिन्दोस्तां वालों से उनका तात्पर्य हिन्दुस्तान के मुसलमानो से ही है। इसी की परिणति और अन्तिम उपाय था देश का विभाजन जिसको उन्होंने और उनके दबाव में पूरी पार्टी ने स्वीकारा और इसके पक्ष में जनमत तैयार करने में अपनी भूमिका निभाई।

इतिहास को दोषारोपण के लिए नहीं पढ़ा जाता। ऐसे लोग अपने समय के लिए इतिहास से कलह जुटाते है और इसके बाद किसी दूसरी चीज की उन्हें जरूरत ही नहीं होती। परन्तु इतिहास से कुछ भी न सीखने और अपने को न बदलने के लिए कटिबद्ध लोग वर्तमान के लिए उससे भी बड़े कंटक हैं जितना इतिहास से कलह जुटाने वाला। वह इतिहास से कलह नहीं जुटाता, अपितु वर्तमान के कलहों को देख कर इतिहास की पड़ताल करने को विवश होता है और उसे जो कुछ मिलता है उसे वह पेश करता है तो सदाशयी लोगों को उपद्रवी प्रतीत होता है। इतिहास का अध्ययन वर्तमान से कट कर किया ही नहीं जा सकता। इतिहास में हम क्या तलाशते हैं वह भी वर्तमान से ही निर्धारित होता है और इसी अर्थ में इतिहास का अध्ययन वर्तमान का गहन पाठ होता है । दुर्भाग्य है कि न तो मुसलमानों ने इतिहास से कुछ सीखा, वे जीरो टाइम या हिज्रत को अपना वर्तमान और कुरान को समस्त ज्ञान का सार मानते रहे और आगे की शिक्षा का उपयोग उसे सही सिद्ध करने के लिए करते रहे, वैसा ही कुछ कम्युनिस्टों के साथ हुआ। वे देशविभाजन के ही अपराधी नहीं हैं, लगातार देश को उन स्तरों पर खंडित करने के भी अपराधी है जिसमें इसकी योजना बनाने वाले अंग्रेजों को भी सफलता नहीं मिली, यद्यपि बीज, खाद, पानी और विद्या सब कुछ उन्होंने अंग्रेजों से ही लिया और आज तक औपनिवेशिक और मिशनरी शक्तियों के भरोसे ही अपनी साख बनाए हुए हैं।

Post – 2017-06-20

वर्णव्यवस्था की मेरी समझ दूसरों से अलग है। उसको किसी चालू चर्चा में दूसरों को समझा नहीं सकता। मोटे तौर पर इसके पीछे आर्थिक शक्तियां रही है और उनके भी पीछे पहल की कमी या उससे वंचित करने की योजना। मैं उन जड़ लोगों में हूं जो सभी उपक्रमों के पीछे अर्थशास्त्र तलाश करते हैं और मानते हैं कि नैतिकता, भावुकता, सम्मान, श्रद्धा और सौन्दर्यशास्त्र का भी अर्थशास्त्र होता है। कुछ मामलों में अर्थतन्त्र का अर्थविस्तार करना जरूरी हो सकता है – वह जो हमारे लिए उपादेय या हानिरहित है। मैं जानता हूं कोमल सोच के लोग इससे असमत होंगे। पर मैं सभी पक्षों पर ध्यान देने के बाद मानता हूँ कि यह सच है।

इसलिए वर्णव्यवस्था की समाप्ति या सामाजिक संबंधों में बदलाव अर्थतन्त्र में बदलाव से बहुत गहराई से जुड़ा है। अर्थतन्त्र में बदलाव लेखक या चिन्तक के वश का काम नहीं। यह सत्ता परिवर्तन से जुड़ा प्रश्न है, इसलिए किसी समस्या को इस भरोसे छोड़ देना कि आर्थिक रूपान्तरण होगा तब सामाजिक रूपान्तरण भी हो जाएगा, इसलिए सारा ध्यान आर्थिक रूपान्तरण या आमूल परिवर्तन पर दो, यह आन्दोलनकारियों के लिए सही हो सकता है, विचारक के लिए नहीं।

वह वर्तमान परिस्थितियों में जो चेतना के रूप में परिवर्तन के माध्यम से संभव है उसके लिए प्रयत्न कर सकता है और जो व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है उसके विषय में जागरूकता पैदा कर सकता है। जागरूकता करने का यह काम, मैं कह आया हूं, स्वयं में एक क्रान्तिकारी काम है। यह भी राजनीतिक सक्रियता का एक रूप है जिसे आन्दोलनों से जुड़े लोग समझ नहीं पाते।

यह भी एक कारण था कि कम्युनिस्ट पार्टियां सामाजिक सवालों को सही परिप्रेक्ष्य में न तो रख सकीं, न उनके लिए कोई ऐसा पहल कर सकीं कि सभी उत्पीड़ितों को अपने साथ जोड़ सकें ।

इसका भी प्रधान कारण कम्युनिस्ट पार्टियों का लीगीकरण रहा है जिसकी कभी गहरी छानबीन नहीं की गई। मेरे इस कथन को सांप्रदायिक रंगत दी जा सकती है, परन्तु इसे समग्र सामाजिक परिदृष्य में देखा जाना चाहिए। कम्युनिस्ट विचारधारा से या कहे रूसी क्रान्ति से सर्वप्रथम आकर्षित होने वाले पाश्चात्य शिक्षाप्राप्त, कहें इंग्लैंड में शिक्षाप्राप्त और वहां के वामचिन्तन से प्रभावित अभिजात भारतीय थे। परन्तु इनकी साझी समझ यह थी कि अहिंसक तरीके अपना कर स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं की जा सकती और पाई भी गई तो सत्ता एक सामन्ती सोच के लोगों के हाथ में आएगी जिससे सत्ता परिवर्तन तो होगा, परन्तु सामाजिक और आर्थिक विषमता बनी रहेगी।

उन्होंने जनता से जुड़ने, उसके बीच अपने विचारों के प्रचार-प्रसार का, उनकी क्षमताओं और मनोबाधाओं को समझने का कोई प्रयत्न नहीं किया। ये महत्वाकांक्षी कामचोर लोग थे तो अपराधियों की तरह खतरे उठा कर एक झटके सबकुछ हासिल कर लेना चाहते थे। इन्होने कल कारखानों के मजदूरों के साथ भी एकजुट हो कर उनके बीच अपने विचारों का प्रचार करने और उन्हें अपने से जोड़ने का काम नहीं किया। ये सभी एक्टर थे। अधिक की जानकारी नहीं पर बकौल श्रीकान्त व्यास जो अमृतराय के साथ कभी जुड़े रहे थे, अमृत रॉय मजदूर सभाओं के लिए इस फटा, कुछ मैला कुरता पजामा अलग रखते और उन्हीं मौकों पर पहनते थे. यही हाल दूसए कम्युनिस्टोपन की भी थी. कम्युनिस्ट पार्टी को आरम्भ में ही बहुरूपियों की पार्टी बना दिया गया क्योंकि उसने एक ऐसी भूमिका अपना ली थी जिसे वः जी नहीं सकती थी, दिखाने और दिखने के प्रबंध कर सकती थी. साहित्य और कला इस पाखण्ड का ड्रेसिंग रूम था और एक्टर के सामने जो हैसियत ड्रेस मेकर की होती है साहित्य और सहित्यकार की वही हैसियत व्यावहारिक राजनीतिज्ञों के सामने हो गई। यह तो होना ही था, इसपर आश्चर्य नहीं। आश्चर्य यह कि लेखक और कलाम=कार को इस भूमिका को स्वीकार कर लिया और इसपर इतराने लगा.

असंतोष पैदा करके उनको कुछ अधिक सुविधाएं दिलाने के एकमात्र आष्वासन के बल पर उनको नारेवाजी और लफ्फाजी से जोड़ने के लिए प्रयत्नषील रहे इसलिए आर्थिक सवालों से आगे, सामाजिक कुरीतियों और विषमताओं को सीधे अपने कार्यभार में शामिल ही नहीं कर सके। शेष भारत के लिए वे कांग्रेस और खास तौर से गांधी के द्वारा पैदा की गई जागरूकता को झपटने के प्रयत्न में रहे।
जब मैं इसकी लीगी मानसिकता की बात करता हूं तो इसलिए कि लगभग सभी मुसलमानों को लोकतन्त्र डरावना लगता रहा है। इसका एक कारण तो इस्लाम की अपनी मानसिकता है जो खलीफा, राजा या तानाषाह को पसन्द करती है लोकतन्त्र को मुस्लिम बहुल देषों में भी सहन करती है। भारत में जहां सामाजिक समीकरण भिन्न था वहां यह उन्हें लोकतन्त्र नहीं, बहुमतवाद मेजारिटिज्म प्रतीत होता रहा है, और इसके पीछे उनकी अल्मतवादी चेतना रही है जिस पर हावी होने के जाहिर और छिपे तरीके वे अपनाते रहे हैं। मुस्लिम बुद्धिजीतियों को इससे मुक्त होने के दो ही तरीके दिखाई देते रहे हैं। एक अभिजनवाद या आलीगैर्की, दूसरा तानाषाही। कम्युनिज्म उन्हें इसलिए आकर्षित कर रहा था कि सामाजिक और आर्थिक न्याय में उनकी कोई दिलचस्पी थी, अपितु यही लोकतांत्रिक व्यवस्था से जो उनके अल्पमत में होने के कारण मुस्लिम समाज के लिए खतरनाक विकल्प प्रतीत होता था। इसकी सबसे बेलौस अभिव्यक्ति इकबाल की पंक्ति – न संभलोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालो, और हिन्दोस्तां वालों से उनका तात्पर्य हिन्दुस्तान के मुसलमानो से ही है। इसी की परिणति और अन्तिम उपाय था देष का विभाजन जिसका उन्होंने और उनके दबाव में पूरी पार्टी ने स्वीकारा और इसके पक्ष में जनमत तैयार करने में अपनी भूमिका निभाई।
इतिहास को दोषारोपण के लिए नहीं पढ़ा जाता। ऐसे लोग इतिहास से कलह अपने समय के लिए जुटा लेते है और इसके बाद किसी दूसरी चीज की उन्हें जरूरत ही नहीं होती। परन्तु इतिहास से कुछ भी न सीखने और अपने को न बदलने के लिए कटिबद्ध लोग वर्तमान के लिए उससे भी बड़े कंटक हैं जितना इतिहास से कलह जुटाने वाला। वह इतिहास से कलह नहीं जुटाता, अपितु वर्तमान के कलहों को देख कर इतिहास की पड़ताल करने को विवष होता है और उसे जो कुछ मिलता है उसे वह पेष करता है तो सदाषयी लोगों को उपद्रवी प्रतीत होता है। इतिहास का अध्ययन वर्तमान से कट कर किया ही नहीं जा सकता। इतिहास में हम क्या तलाषते हैं वह भी वर्तमान से ही निर्धारित होता है और इसी अर्थ में इतिहास का अध्ययन वर्तमान का गहन पाठ होता है । दुर्भाग्य है कि न तो मुसलमानों ने इतिहास से कुछ सीखा, वे जीरो टाइम या हिज्रत को अपना वर्तमान और कुरान को समस्त ज्ञान का सार मानते रहे और आगे की षिक्षा का उपयोग उसे सही सिद्ध करने के लिए करते रहे, वैसा ही कुछ कम्युनिस्टों के साथ हुआ। वे देषविभाजन के ही अपराधी नहीं हैं, लगातार देष को उन स्तरों पर खंडित करने के भी अपराधी है जिसमें इसकी योजना बनाने वाले अंग्रेजों को भी सफलता नहीं मिली, यद्यपि बीज, खाद, पानी और विद्या सब कुछ उन्होंने अंग्रेजों से ही लिया और आज तक औपनिवेषिक और मिषनरी षक्तियों के भरोसे ही अपनी साख बनाए हुए हैं।

Post – 2017-06-20

मैं खुद से परेशान था तुम मुझसे परेशान
अक्सर इसी मुकाम पर हम मिलते रहे हैं.
बोये तो थे कांटे ही कि यह रास्ता रुके
काँटों के बीच फिर भी फूल खिलते रहे है!!

Post – 2017-06-20

आदमी से भुलक्कड़ दूसरा कोई जीवधारी नहीं होगा। तिलचट्टे को भी आचरण में यह नहीं भूलता कि वह तिलचट्टा है और इूसरे तिलचट्टे भी तिलचट्टे हैं। आदमी अक्सर भूल जाता है कि वह आदमी है। दूसरे भी आदमी हैं यह तो वह समझ ही नहीं पाता।

Post – 2017-06-20

बातूनी लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जबान से बातूनी लोग जल्द पकड़ में आ जाते हैं, कलम के बातूनी लोग अधिक धोखेबाज होते हैं। बातूनी जबान का हो या कलम का, उसे भरोसा होता है कि लोग या तो मूर्ख हैं या निरे भोले भाले और इसलिए उन्हें बेवकूफ बनाया जा सकता है। यही वजह है मैं कहता हूं कला और साहित्य के बातूनियों पर भी भरोसा करना सुरक्षित नहीं है। वे कहेंगे सेना की कार्रवाई से शान्ति में खलल पड़ रहा है, वे छिपा जाएंगे कि शान्ति में खलल पैदा करने वालों के कारण ही सेना और पुलिस की जरूरत पड़ती है और वे अपना सही ढंग से काम न करें तो शान्ति के उपासकों को अपमानित, प्रताडित, कंगाल और अन्ततः आततायियों का गुलाम बन कर जीने का एकमात्र रास्ता बचा रहेगा। इसलिए शान्ति की और दूसरे ऊँचे आदर्शों की एकाएक याद दिलाने वालों को भी परखें कि वह कौन है, उसे अचानक आदर्श कैसे याद आ गया, उसकी मंशा क्या है और कब और किस कीमत पर शान्ति की बात कर रहा है। वह ऊपर से आपका मित्र और भीतर से आतताइयों का हमप्याला हमनिवाला भी हो सकता है। बातूनी लोगा तथ्यों से बचते हैं, प्रमाण देने से कतराते हैं, गोल मोल अनेकार्थी जुमले बोलते हैं कि घिर जाने पर बयान बदल सकें या कह सकें कि उन्हें समझने में भूल की गई या उनको बदनाम करने के लिए खींचतान की जा रही है। अपने भोलेपन में वे खासे शातिर होते है.

कहेंगे सेनाध्यक्ष को बयान से बचना चाहिए परन्तु स्वय सेना पर, सेनाध्यक्ष पर बयान देने को अपना अधिकार मानेंगे और तंग आकर अपना और अपने सैनिकों का मनाबल बनाए रखने के लिए उसे बचाव का भी अधिकार न देंगे। फाासिज्म सेना के दखल से आता नहीं है लोग फासिज्म लाने और उसे प्रथम आपात में उचित सिद्ध होने का पर्यावरण स्वयं तैयार करते हैं।

Post – 2017-06-19

मेरे मन कछु और है बिधना के कछु और

मैं तीन दिनों से उस विषय पर बात करना चाहता हूं जिसे हमने अपने अभियान के लिए चुना। कर नहीं पा रहा। कई तरह के व्यवधानों के कारण। फिर भी हम सोचते है कर्ता हम हैं जो चाहें कर सकते हैं। आज की शाम चेगुआरा पर इंटरनेट पर एक लेख पढ़़ने में गुजर गया। एक दूसरा लेख आइंस्टाइन पर आज ही पढ़ना पड़ा जिसमें वह धर्मशास्त्रों के ईश्वर को नहीं मानते परन्तु विश्व ब्रह्मांड में क्षुद्रतम से लेकर महत्तम तक एक अचूक और सर्वत्र विद्यमानता की प्रतीति , उस शक्ति के अणु परमाणु में उपस्थिति को देखकर किसी निर्वचनीय सत्ता कों एक प्रमेय के रूप में मानते हैं। मैं यहाँ नासदीय सूक्त की याद दिला कर आप्तकाम नहीं होना चाहता परन्तु हमारा सबकुछ व्यर्थ था. पश्चिम के उन्नत ज्ञान के समकक्ष न था इसे भी नकारते हुए आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करना चाहता हूँ. वह हो पाए तो.
आज का दिन भी बीता पर सार्थकता के साथ .

Post – 2017-06-18

दिमाग उसका है लेकिन जबान मेरी है

यह टिप्पणी मैंने कुछ आवेश में लिखी. यह एक व्यक्ति की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया होते हुए भी केवल उसी पर केंद्रित नहीं है, बल्कि मुझे उन सज्जन का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने अपनी कुरेद से इसका अवसर दिया. यह उन सभी लोगों पर प्रहार है जो मार्क्सवादी तेवर और फासीवादी तरीके अपनाते हैं.

सड़े हुए दिमाग में चन्दन भी डाल दो तो वह बदबू लेकर बाहर निकलेगा। पहले दिन से जो केवल नफरत ही करते आए उनकी अपनी सड़ाध ही लगातार बाहर आती रही और वे समझ नहीं पाए कि वे जिसे उखाड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं और वह जमता क्यों जा रहा है। पूरे देश को क्या दीख रहा है जिसे वे देख नहीं पा रहे, यह सोचने तक की बुद्धि इसलिए नहीं कि नफरत ने उसको दबोच लिया है, वह विचार को बदबूदार बना देती है। बदबू उनके भीतर है उन्हें लगता है बाहर से आ रही है। ऐसा न होता तो गर्ग जी जैसे वरिष्ट और ज्ञानी व्यक्ति को यह तो दिखाई देता कि मोदी पहला आदमी है जो स्वच्छता की तरह ही स्किल डेवलपमेंट को अपनी टेक बनाए हुआ है। रोजगार मांगने की जगह लोग अपने रोजगार चलाएं, इसके लिए उनको प्रोत्साहित करता है, गांधी के यन्त्र विमुख कुटीर उद्योग की जगह विद्युतचालित लघु इकाइयों के लिए कर्ज का अभियान चलाया, लोग सरकार पर निर्भर भिखरियों की जगह आत्मनिर्भर बनें जो पूरे इतिहास में रहे है। केवल उन उपक्रमों के लिए जिनका संबंध यातायात, प्रतिरक्षा आदि से है जहां भारी और इन्नोवेटिव प्रविधि की उपरिहार्यता है, पूंजीपतियों को देश में निवेश करने, विदेशियों को अपने सामान इस में बनाने, इसे बाजार के स्थान पर उत्पादक देश बनाने, कमीशनखोरी को कम करने, आदि की दूरदर्शिता दिखाई। इनमें से कुछ दिखाई न दिया, दिखाई दिया और उसमें दोष दिखाई दिया तो उसकी आलोचना तक नहीं की, सड़क के किनारे की पुलिया पर बैठ कर आते जाते लोगों पर फिकरे कसने वाले छोकरों की भाषा में मेरे निवेदन के बाद ही फिकरे कसते हैं, तो आप स्वयं सोचें कि इस देश की दुर्गति में कितनी भागीदारी कांग्रेस की रही है और कितनी ऐसे फिकरेबाज बुद्धिजीवियों की रही है।

यही वह बिंदु है जहाँ महाकार यंत्रो के का एक पुर्जा बन कर पहले के अमानवीकरण और आज के पिस्सूकरण के विरुद्ध मार्क्स का विरोध, उनकी इस समझ की कि लोकतंत्र समाजवाद का यात्रापथ है, गांधीवाद, आधुनिकता और साम्यवाद का भविष्य – क्योंकि मार्क्स के अनुसार भी समाजवाद पूंजीवाद के बाद की और उसके निःसत्व हो जाने की स्वाभाविक परिणति या ऐतिहासिक अनिवार्यता है – सभी का संगम. यह भी एक व्यंग ही है की इतना गुरुभार वह व्यक्ति निभा रहा है जो मार्क्सवाद का ककहरा न जानता होगा, उस संगठन से निपजा है (कबीर की नकल पर कह दिया, पता कीजिये शब्दवेधी विद्वानों से प्रयोग गलत तो नहीं हो गया) यह नाचीज उस ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह कर रहा है जिसे लक्ष्य करके मैंने बहुत पहले कहा था यह व्यक्ति स्वतः कुछ न होकर भी इतिहास की मांग है. इतिहासपुरुष है.