Post – 2017-05-23

कोई पूछे पता मेरा तो ऐ कासिद बता देना
निकाले हैं गए दिल्ली से गार्डेनिया में रहते हैं ।
कहा गैरों ने जो कुछ उसमें भी कुछ सच मिलेगा ही
मगर हम आप मे बसते हैं और आपे मे रहते हैं ।

Post – 2017-05-23

वह पत्थर जब हिला तो देखिए क्या शोर बरपा था
मगर सदमे में थे हम, हममें जुम्बिश तक नहीं बाकी ।
कहेंगे कुछ, करेंगे कुछ, बहुत कुछ सह लिया हमने
जबां तक खोलने की अपनी ख्वाहिश तक नहीं बाकी।

Post – 2017-05-22

देववाणी (उनतालीस)
शब्दनिर्माण की प्रक्रिया

कल – पत्थर;
स्वर भेद और निपात के योग से:

कल – बटिका, पत्थर;
कल् त.- रोड़ी, रोड़ा, बटिका
लातिन कैलकुलस रोड़ा, बटिका; (Calculus : from Latin calculus, literally “small pebble used for counting on an abacus” यूरोपीय परिदृश्य में यह बोध नदारद है कि इसका सचमुच कल या रोड़ी रोड़े से कोई संबन्ध है और लुप्त है यह बोध भी कि जहां से गिनती का यह तरीका अपनाया गया वहां कल या रोड़ी का कलन या गिनती के लिए प्रयोग में लाया जाता रहा। बाद में अनाज के दानों, खास करके मटर या गुंजा के दानों का प्रयोग किया जाता रहा जिसका ही प्रत्यंकन शलाका गणित में हुआ और फिर अक्षमाल और मनके का नामजप आदि के लिए प्रचलन में आया। अंग्रेजी में इसे अक्षरो के क्रम के अनुसार ऐबेकस अथार्थ एबीसी क्रम की संज्ञा दी जिनका गणना से सीधा संबन्ध ही नहीं है) ।

कली – पत्थर का, जैसे कली चूना
कली – सुनिर्मित, जुड़ी हुई, अविकच
कलित – समग्र, गिना हुआ, जोड़ा हुआ, सुन्दर
कलि – कलह ;
कील – नुकीले सिरे वाली;
कीला / किल्ला -खूंटा, सिवान का पत्थर, और इसके सादृश्य पर दरवाजे की किल्ली

व्यंजनभेद से शब्द निर्माण:

कड़-कड़ – मूर्धन्य प्रेमी समुदाय में पत्थर टूटने का अनुनाद > कंकड़,
कड़ा, कड़ाई, भोज. कड़ेर,

खल/खड़ – टूटने की ध्वनि। वह वस्तु अर्थात पत्थर या कंकड़ जिसके तोड़ने से यह ध्वनि पैदा होती है, अर्थात बटिका, क्योंकि कंकड़ न उनके किसी उपयोग का था न उसे तोड़ने की जरूरत थी। आदिम अवस्था में नदी की धार में उपलब्ध बटिकाएं ही तोड़ी जा सकती थीं और उनसे उनकी संज्ञा, पत्थर की संज्ञा।
खल- मार पीट करने वाला, दुष्ट, 2. वह स्थान जहां डां से दाना अलग करने के लिए उसे दांया और पीटा जाता है (ऋ. खले न पर्षान् प्रति हन्मि भूरि) ।
खड़ – *पहाड़ ।
खड़खड़, खड़खड़ाहट – रोड़ पत्थर गिरने की ध्वनि, इससे मिलती जुलती ध्वनि
खड़ा – पर्वत की तरह सीध उठा हुआ, तना हुआ,
खंड – टुकड़ा
खड्ड – भोज. गड़हा, हि. गड्ढा
गड्ड – जोड़ा हुआ, तु- सं- कर्त, अं- कार्ट, ऋ.- गर्त – गाड़ी, और उसके समूह, ढेर, गडर – जानवरों का झुंड, गडरिया – जानवरों को चराने वाला, गड्डी -ढेरी, पुलिन्दा जैसे नोट का
खलु = अवश्य (ऋ. मित्रं कृणुध्वं खलु मृळता नो)
खाल – *ऊपरी पर्त जिसे तराश और छील कर अलग किया जा सके, छाल, 2. चमड़ी 3. गड्ढा, नीची जमीन,
खाली – जिसके भीतर कुछ न हो, टूटने से खाली हुई जगह,
खिल – टूटा हुआ, फॅला हुआ, छितराया हुआ टुकड़ा
खील – भुने हुए धान का लावा खोलना द्वार बनाना, रोक हटाना, खुला अुआ

निपात युक्त:
खंडन – तोड़ना, खनन, खन्दक
खिल्या – कंकरीली जमीन, ऊसर भूमि (उत खिल्या उर्वराणां भवन्ति)
खिलना – फूलना
खल्वाट – छीला हुआ, मुड़ा हुआ सर,
खडाक या खटाक – टूटने की ध्वनि और विशेषता
खड़खड़, खड़खड़ाहट – रोड़ पत्थर गिरने की ध्वनि, इससे मिलती जुलती ध्वनि
खड़िया – घीया पत्थर
खोंढ़र – कोतड़ा, खोल – आवरण,
(फा. खलल – व्यवधान},
कांकर
कंकरीला
कोड़ना / गोड़ना, गड़ा, गड़ा, भोज- गड़हा हिं- गड्ढा, (तु. सं-कर्त – कृत या जोड़ कर बनाया हुआ, अं- कार्ट, गर्त, – गाड़ी
कंड, कांड, कडिका, प्रकांड, खाड,
उपसर्ग आदि के साथरू
अकाल] अतिकाल दुष्काल कालान्तर, कालजयी, कालोचित, त्रिकालदर्शी,
कंड, कांड, कडिका, प्रकांड,
खाड, खंडनीय, अखडित, आखंडलक,
यही स्थिति दावाग्नि के प्रकोप से पैदा कल की आदिम और हमारी अपनी कड़ तड़ की आवाज की है। सच कहें तो इससे भी बुरी। यदि प्रलयाग्नि की अचधारणा चेतना में कहीं काम न कर रही होती, यदि रुद्र के तांडव नृत्य के समय उनके तीसरे नयन के खुलने की छाप न होती तो मैं अग्नि से कल या काल को जोड़ने की सोचता भी नहीं, क्योंकि यह मेरे मूलभूत सिद्धान्त के विपरीत था कि जिस वस्तु और क्रिया से किन्हीं परिस्थितियों में ध्वनि नहीं पैदा होती उन्हें अपनी संज्ञा उन स्रोतों से मिली है जिनसे ध्वनि उत्पन्न होती है और जिनका अवकर्ष, अपकर्ष, उत्कर्ष अर्थ के लिए संबंध, सायुज्य, सादृश्य, विरोध आदि के नियमों से किया जाता है।
हम विस्तार से बचने और यह याद दिलाने के लिए कि इतना अवश्य कहना चाहेंगे कि दावानल से उत्पन्न ध्वनियां जो तड़तड़ाहट जो हमारी उुपरी व्याख्या के अनुसार कड़कड़ाहट से ले कर गड़गड़ाहट केा छेंक कर फैली हुई है, उनकी ओर हमारा ध्यान ही न जाता। ऐसी घटनाएं कम घटित होती थीं, और वे मनीषियों के विचार का हिस्सा बन कर रह जाती थीं । फिर भी दावाग्नि के अनुभव से विचार क्षेत्र में आए उन विश्वासों के कार्यकारण संबंध को समझने का तो हम प्रयत्न कर ही सकते थे। मुझे ऐसा कोई अध्ययन देखने में न आया। प्रयत्न तक नहीं। इससे निराशा पैदा होती है और अपराधी की तलाश करने की प्रबल इच्छा होती है और जब पता चलता है कि इसके लिए हमारी औपनिवेशिक मानसिकता उत्तरदायी है तो अपराधियों की बिरादरी में अपने को भी पाता हूं ।

यहां हम यही निवेदन कर सकते हैं कि काल, काला, काली, कलंक के विषय में तो हम निश्चिन्त हो सकते हैं कि इनका संबन्ध दावाग्नि से है।

जिस बात को आप तक पहुंचाने के लिए इतनी कवायद की उसके विषय में मैं स्वयं निःशंक नहीं हूं। वह है देववाणी से संस्कृत के यान्त्रिक चरण तक के विकास की अवस्थाएं, जिन्हे मैं एक प्रस्ताव के रूप में रख सकता हूं, स्थापना के रूप में नहीं। वह यह है कि देववाणी अर्थभेद के लिए स्वरभेद का सहारा लेती थी, दूसरे समूहों के साथ मिलन के दौर में उसने उनकी ध्वनियों को अपनाया और उनमें यह सोच कर कि यह भाषा किस क्षेत्र की बोली के उत्कर्ष से पैदा हुई है और हमें इसके जाल में फंसना है या जो इससे हट गए हैं उन्हें कोसना और खारिज करना है मुझे सारी दुनिया के भाषाविज्ञानियों में अकेले राम विलास शर्मा दिखाई देते हैं परन्तु मैं कि उनसे पूरी तरह संतुष्ट नहीं अनुभव करता।

प्रस्ताव मात्र यह है कि देववाणी या आदिम चरण की बोलियां श्रुत ध्वनि में स्वरभेद और बालाघात के माध्यम् से अर्थभेद करती थी और उनका शबद निर्माण उनकी ध्वनिव्यवस्था तक सीमित था। आवश्यमताएं सीमित थीं इसलिए इनसे उनका काम चल जाता था। बाद में दूसरे भाषाभाषियों के संपर्क में आने के बाद उनकी ध्वनिमाला का भी प्रवेश हुआ और उदनके द्वारा इनके अपने या उनके निजी शब्दों को ग्रहण मरने में एक ही अर्थ के श्वनिभेद युक्त शब्द उपस्थिति थे। आगे उन्होंने निपात या अक्षर जोड़ कर अन्तर्वर्ती चरण की एक समृद्धतर भाषा का निर्माण किया और इस या.ा के अन्तिम चरण पर एक तो कौरवी प्रभाव में असवर्ण सुयोग जहां अपेक्षित नहीं था वहां पैदा करके योग करने की प्रवृत्ति बढ़ी और फिद उन्नत चरण के लिए अशिक्षितों के बोधवृत्त से बाहर की दार्शनिक या विशिष्ट शब्दावली जिसे हम जार्गन या तकनीकी शब्दावली कहते हैं, उसकी पूर्ति के निए भाषाई इंजीनियरी का और सही अर्थों सें संस्कूतीकरण की प्रकिया आरंभ हुई। जैसा हम देख आए हैं, यह विकास भारतीय भूभाग में हुआ था। अपने उन्नत चरण पर पहुंच जाने पर किसी बहुत सुव्यवस्थिति और अपने हित में स्वीकार की गई भाषा का वहां के संभ्रान्त जनों का प्रभव बझ़ा है।

Post – 2017-05-21

बहुत दिन बाद देखा तुझको हँसते
बहुत दिन बाद रोना याद आया
हुई मुद्दत कि भूले खुद को थे अब
तेरे होने से होना याद आया

Post – 2017-05-21

देववाणी (अड़तीस)
शब्दनिर्माण की प्रक्रिया (2)
( कल जो कुछ लिख रहा था उसका एक हिस्सा उड़ गया इसलिए बचे हुए अंश को खंडित रूप में पेश किया उसका अगला अंश दुबारा लिखा है जिसे उसी क्रम में पढ़ना ठीक रहेगा।)

(२) व्यंजन भेद से:
यह मुख्य रूप से घोषप्रेमी और महाप्राण प्रेमा समुदायों के मिलने के क्रम में उन्ही अघोष अल्पप्राण ध्वनियों में आए अन्तर का परिणाम है, अलग अलग मामलों में इसे उलट या बदल कर भी पढ़ा और समझा जा सकता है। संस्कृतीकरण या कौरवी प्रभाव में स्वरलोप अथवा अन्तस्थ (य,व,र,ल) और सकार के योग का परिणाम है । इसके करिणाम स्वरूप कल खल, स्खल, गल, घल में बदलते हुए नये विचारों, वस्तुओं और क्रियाओं के लिए शब्द तैयार किए गए है , जैसे पानी के आशय में खल जो पानी के उबाल की धवनि खलबली के पहले पद में है । फिर खल का अर्थ हुआ द्रव का बह या रीत जाना, जो (अरबी) खलास कहने से या खाली से प्रकट होता है प्रकट होता है अथवा द्रव या तेल निकल जाने पर खल या खली में दिखाई देता है, और स्खल और स्खलित में गिरने या च्युत होने से प्रकट होता है । गल, ग्ल- ग्लानि, अं. ग्लू, ग्लास, ग्लो, ग्लैड आदि में पहुंचा लगता है, घल, घाल, घुल, घोल, और फिर हल- पानी में चलना, हल्ला, हलचल, हेला – जिसका अर्थ यदि जल के स्रोत से खेल है तो पत्थर और आग के स्रोत से आयक्रमण और तिरस्कार आदि हो जाता है ।

उपसर्ग, प्रत्यय और निपात, विभक्ति के योग से नई संकल्पनाओं (सं +कल्प+ना+ओं) के लिए शब्दावली अगले चरण पर तैयार होनी होनी आरम्भ होती है । संस्कृतीकरण का यह चरण क्षेत्र, समुदाय या बोली से निरपेक्ष है। इसके सूत्र देववाणी में और दूसरी बोलियों में थे परन्तु संस्कृत ने इसे पूर्णता पर पहुंचा दिया । ये सारी युक्तियां कल के तीनों शब्दों के सन्दर्भ में सही हैं। हम सभी के उदाहरण देने की स्थिति में नहीं हैं। सच कहें तो जैसे हमने काल के मामले मे देखा इसकी गति, विनाशलीला और मूर्तीकरण में क्रमश: तीनों की भूमिका है उसी तरह कुछ दूसरी संकल्पनाओं जैसे कलुष, कल्मष, कलंक में जल और आग अर्थ में प्रयुक्त कल का हाथ है।

अब पहले हम इस बात का संकेत मात्र करेंगे कि कल.पानी में वहीं उपसर्ग और प्रत्यय लगने पर ठीक वही अर्थ नहीं रहता जो कल – पत्थर में लगने पर होता है। अतः कल के समनादी तीन अलग शब्द ही नहीं है, उपसर्ग आदि से युक्त समनादी शब्द भी अलग हैं। कहें जिसे हम इस रूप में समझते हैं कि एक ही शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, वह एक भ्रम है वास्तव में वे अलग समनादी शब्द होते हैं। उदाहरण के लिए जलर्थक कल में वि उपसर्ग लगने पर जो विकल बनता है वह है पिपासा जनित विकलता, परन्तु पाषाणार्थी कल में वि उपसर्ग लगने से जो विकल बना उसका अर्थ है छांट या तराश कर अलग करना, किसी राशि या संख्या में से कुछ को अलग करना। इसका एक बोध भारतीय वैयाकरणों को रहा है जो कहते रहे हैं कि एक शब्द का केवल एक ही अर्थ होता है, परन्तु हमारे कोशकार इसका सचुचित निर्वाह नहीं कर पाते अतः व्युत्पत्तियों इसके कारण भी अधूरी और लंगड़ी रह जाती हैं।
इसी तरह सभी उपसर्ग सभी शब्दों के साथ नहीं लगते, और कुछ के कारण एक आशय वाले समनादी शब्द में जो परिवर्तन होते हैं, वे दूसरे में नहीं होते। उदाहरण के लिए सं, आ, प्रा, पाषाणी कलन के साथ – संकलन, आकलन, प्राक्कलन – लगेंगे पर जलर्थक कल के साथ नहीं। चकार प्रेमी समुदाय के संपर्क में कलन का चलन बनने और विचलन प्रवाही आशय स्पष्ट होता है क्योंकि जल के प्रवाही आशय में कल का सीधे प्रयोग नहीं मिलता। इसे चल ने विस्थापित कर दिया। परन्तु पाषाणी कल चवर्गीय समुदाय के उच्चारण से प्रभावित नहीं हुआ।

पत्थर और आग के आशय में विकसित शब्दावली पर आज की पोस्ट में विचार करेंगे.

Post – 2017-05-20

देववाणी (अड़तीस)
शब्दनिर्माण की प्रक्रिया (1)

अब हम उस शब्दभंडार पर ध्यान दें जो इन अनुनादी ध्वनियों से पैदा हुए हैं और फिर उनके पीछे कम करनेवाले तर्क को उलटे सिरे से समझें :
कल = जल, स्वरभेद से:
कल = (१. बीता हुआ दिन, २. आने वाला दिन। इसके पीछे संकल्पना बह गए जल और बहकर आने वाले जल की है ।); कलपना = विलाप करना; कलरव= मधुर ध्वनि; कली – अविकच फूल; कल्क – तेल के वर्तन में जमा गाद, उसका अर्थविस्तार — कान की मैल, कोई अन्य गन्दगी; कल्प – १. विधि-विधान, २. ब्रह्मा का एक दिन=४अरब बत्तीस करोड़ मानव वर्ष; ३. *विचार, ४. संकल्प, विकल्प, ५. कल्पना, ६ (क्रिया) कल्पयाति (ऋ. सो अध्वरान् स ऋतून् कल्पयाति = निर्माण करता है; अन्येन मत् प्रमुद: कल्पयस्व = प्रदान करो); कलाय- मटर; काल = प्रवहमान, गुजरने वाला (काल: कलयति ), किल = निश्चय ही, किलोल – अटखेली करना; ऋ. कीलाप = अन्न, रस; कुल = वंश परम्परा; कुलीन = खानदानी; कुल्ला, कुल्ली, तमिल कुडि = पी, हिं. कुंड, सं. कुलीर – जलकर प्राणी विशेष अर्थात केंकडा; कुलबुलाना, कुल्या= कृत्रिम नदी अर्थात नहर; कुलांचना – तरंगित भाव से या उछाल लेते हुए दौड़ना; कूल = तट (कूल का अर्थ भी पानी, तट का अर्थ भी पानी जिसे हिं. तड़ाग, त. तण+नीर – तन्नी = पानी), केलि = कामक्रीड़ा, कौल / कवल = ग्रास; भोज. कउरा – किसी प्राणी के लिए भोजन से पहले निकल कर रखा गया ग्रास = सं. अग्रासन; सं. कौल = कुलीन, श्रेष्ठ.

Post – 2017-05-19

हम भी देखेंगे तेरा जलवा मगर ऐ सैयाद
तुझको बेपर्दा करेंगे और तुझे देखेंगे
हम नहीं जानते दीखेगा दूसरो को क्या
हम तुझे झेलेंगे और तुझको सह कर देखेंगे !

Post – 2017-05-19

देववाणी (सैंतीस)
पानी, आग और पत्थर (3)
हम कल, खल आदि पर विचार करें इससे पहले यह कहना चाहेंगे की हमें जलधाराओं में मिलने वाले शिलाखंडों को अपने क्षेत्र तक ढो कर लाने के क्रम में हुए प्रयोगो और विकासों के क्रम मे आविष्कृत दूसरे उपकरणों के रूप, आकार और क्रिया से जुडी शब्दावली की,
जिनकी अंतिम परिणति ठोस पहिया और विकसित रूप अरायुक्त चक्र था , उपेक्षा करते हुए चलने की विवशता है, अन्यथा विषयान्तर होने की समस्या आ जाएगी।.
हम उस प्रबुद्ध चरण पर आएं जब मनुष्य प्रकृति में अपने हस्तक्षेप से उत्पन्न ध्वनियों से भी नामकरण करने का साहस जुटा लेता है और उन ध्वनियों से जुड़े कार्यों, परिणामो और गुणों को के लिए शब्दावली का निर्माण करता है.
शिलाखंडों को तोड़ने से उत्पन्न ध्वनि का अनुकरण ‘कल’ और इसके उच्चारभेद (कड़, खड़, गड़, घड़) इसी चरण के द्योतक हैं. क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि जब आप कड़ा कहते हैं तो ‘पत्थर के समान’ और जब कठोर कहते हैं तो काठ की तरह, (भोजपुरी में कठोर हृदयवाले के लिए कठकरेज प्रयोग में आता है)। यही अन्तर कड़ाई, कड़क और कठिन, कठेस कठिनाई, सं- काठिन्यमें भी है । हम अभाव के लिए कड़का पड़ने की बात करते हैं तो आशय होता तो पत्थर से ही है, परन्तु यह किसान के उस अनुभव से जुड़ा शब्द है जिसमें ओले पड़ने से उसकी खड़ी फसल बर्वाद हो जाती है। ओले के लिए पत्थर या उपल का प्रयोग होता है, यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है।
हम तोड़ते है कुछ बनाने के लिए इसलिए टूटने वाले की ध्वनि उसी की संज्ञा नहीं बनती, वह टूटने की क्रिया को भी व्यक्त करती है और साथ निर्माण को भी। अब इस शब्दावली पर ध्यान दें: कल्प, कल्पना, कलन – जोड़ना, जो उपसगों के साथ आकलन, संकलन, विकलन, आदि उत्पन्न हैं। रोचक है कि विकलन की क्रिया या काट कर अलग करने की क्रिया से कलन और संकलन के लिए शब्द पैदा हो रहा है।
कल्पना का अर्थ खयालों में चीजें गढ़ने से नहीं है, गढ़ने और बनाने से था जिसका स्थान निर्माण ने ले लिया और कल्पना का मनोवैज्ञानिक पक्ष ही बचा रहा। इसी कल से कला,ए कल्याण या योग, जो तमिल में विवाह का सूचन और हमारे यहां मंगल कामना के रूप में प्रचलित है। यदि यह तय करना हो कि यह किसका शब्द है तो कहना होगा उन सबका जो बहुत प्राचीन काल से इनका व्यवहार करते आ रहे हैं। कारण हमारी अधिकांश प्राथमिक शब्दावली ऐसी है जिसकी जन्मकुंडली तैयार नहीं हो सकती। अब तमिल के निम्न शब्दों पर ध्यान देंः
कल् . पत्थर, रोड़ी, रोड़ा।
कलै . बिखरना, टूटनाए छितराना,
कल्लकम् – खलल
कल् / कल्लु – खोदना, तोड़ या खोद कर बाहर निकालना या बहा देना (Eng. cull out)
कल – मिलाना, मिश्रण करना, कलप्पु – मिश्रण कलकलक्कु – कलकलनाद कलै.- एक अंक, सोलहवां भाग ,
कल्लूरि. विद्यालयए महाविद्यालय।
कल्वम्. चक्कीके नीचे का पाट।
कल् . सीख, ज्ञानार्जन कर, पढ़।
कलैयोत . विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करना।
सौंदर्य और चमक और चमलीली धातु के आशय जो जलार्थक कल से व्युतपन्न हैं :
कलपम् – मोर का वर्ह, तु. कलापी
कळवुदम – चांदी, तु. कलधौत – सोना
कलशम् – कलश
कलम् – जलपात्र,
कलिपलि – खलबली,
फिर भी तमिल में कला का उन्नयन ज्ञान और विज्ञान के लिए हो गया है इसलिए इस बात की संभावना मानी जा सकती है कि यह शब्द उसने देवभाषा से ही लिया हो।
यदि कल से पहिया के लिए कोई शब्द बना होता तो हम यह कह सकते थे कि काल, और उसका वह रूप जो बीते हुए और आने वाले दिनों के लिए कल के रूप में हमारी भाषा में है, कल के पाषाणी स्रोत से निकला है, परन्तु ऐसा नहीं है और पत्थर में इससे भिन्न स्थिति में कोई गति नहीं होती इसलिए मानना होगा कि काल की अवधारणा जल के कल कल प्रवाह से जुड़ी है और हिन्दी पहल, पहले, पहला, पहेली की अवधारणा पहिए से और काल की गति के लिए जल प्रवाह की भूमिका है परन्तु तर्क के लिए कोई कह सकता है की जल में भी चक्कर या जलावर्त होता है जिसे आकार के अनुसार जमकातर, भंवर या भंवरी कहा जाता है, पर कुशल है की जलचक्र नहीं अतः हमारा दिमागी चक्कर, भ्रम, भ्रान्ति और छेड़ने के औजारों भ्रम (बरमा), भृमि (बर्मी) का सम्बन्ध इनसे ही है। परन्तु भ्रमण, घूम फिर कर वापस अपनी जगह लौट आना, क्या इसी से सम्बंधित है ? मैं इस पर कुछ कहने से बचना चाहूंगा, क्योंकि, यह शब्द प्रसंगवश आ गया। यह अवश्य कहा जा सकता है कि कालचक्र में जल और पाषाणी दोनों स्रोतों का योग है।
पाषाणी स्रोत स्वतः भी जल से चर सर से संबन्ध रखता परन्तु इसका सीधा संबंध जल से नहीं चक्र निर्माण से है।
परन्तु उस कालदेव का संबंध क्या दावाग्नि में कल कल (जिसे हम तड़, कड़ रूप में भी अनुनादित करते हैं), से नहीं है जो गुजरते ही नहीं हैं विनाश करते हैं, जिसके कारण प्रलय लाने वाले शिव के तीसरे नेत्र और उससे फूटने वाला ज्वाला की कल्पना की कई है और जिसके प्रभाव में कालदेव को सूर्य और उनके लोक को सूर्यप्रभ माना गया और उसकी सूर्यलोग या स्वरलोक या स्वर्ग के रूप में भी कल्पित किया गया – यत्र ज्योति अजस्रः यस्मिन लोके स्वर्हितः । हमें ऐसा लगता है कि इस काल की कल्पना दावाग्नि का काल्पनिक उत्कर्ष है।कहें काल की अवधारणा में कल के तीनों रूपों जल, पत्थर और आग का हाथ है।
क्या यह अच्छा न होगा कि हम कल को लेकर एकबार फिर कलह करें?

Post – 2017-05-18

देववाणी (छत्तीस)
पानी, आग और पत्थर (2)

ध्वनि ही शब्द बनती है इसका सबसे प्रबल प्रमाण यह है कि यदि कई वस्तुओं की अपनी भिन्न क्रियाओं से एक जैसी ध्वनि की प्रतीति हो तो वही ध्वनि उन क्रियाओं, वस्तुओं और उनसे किसी भी तरह का संबंध रखने वाली वस्तुओं, क्रियाओं, भावो, या विशेषताओं को मिलेगी ।

यदि भाषा पर हमारा वश चलता तो अर्थभेद के लिए इनमें अलगाव कर लेते। परन्तु ऐसा हो नहीं पाता है, क्योंकि यह विचार भी एक सीमा तक ही सही है कि शब्द लोक गढ़ता है, पूरा यच यह है कि शब्द अपने अर्थ के साथ हमारे सक्रिय जगत में उत्पन्न ध्वनिपरिवेश से पैदा होता है और हम उसकी पहचान करके उसे ग्रहण करते हैं। लोक भी शब्द निर्माण में स्वतन्त्र नहीं होता, पहले से चली आई भाषा संपदा से और अपने क्रियाव्यापार से उत्पन्न ध्वनि से निर्देशित होने के कारण इतनी सटीक अभिव्यक्तियां तैयार कर लेता है कि उनका आशय ग्रहण करने में किसी को कठिनाई नहीं होती। इस रहस्य को उद्घाटित करने में कल की ध्वनि बहुत उपयोगी है।

कल, खल, गल, घल ये पानी से भी उत्पन्न होने वाली ध्वनियां हैं। या हम कह सकते हैं कि कल ध्वनि को अपनी ध्वनियों की सीमा में घोषप्रेमी और महाप्राणप्रेमी समुदायों ने भी ग्रहण किया और जिस भाषा की ध्वनिव्यवस्था में उनके उसमें मिल कर एकमेक होने के कारण इन सभी का समावेश था उसमें इनके अर्थ में सूक्ष्मभेद भी किए गए जब कि जिन भाषाओं में ऐसा संभव न था उन्हें उन सभी अर्थों में अपनी ध्वनिसीमा में उनका प्रयोग किया जाता रहा और अर्थभेद, सन्दर्भभेद के अनुसार, किया जाता रहा।

हमारे पास इस समय तीन कल हैं।
1. जल की कलकल ध्वनि से उत्पन्न, जो सौन्दर्य, आर्द्रतायुक्त पदार्थों, उनके कार्यव्यापार से जुड़े लोगों, क्रियाओं, और उनकी विशेषताओं और भाववाचकों से जुड़ा है। उदाहरण के लिए जल – कल, कलश, कलछुल, कलेवा -जलपान, कलाल / कलवार – सुराबिक्रेता, कलित – ललित और जल की चंचलता के कारण केलि , खेल आदि की दिशा में शब्दों का जनन करता है। जल परक शब्दों का सभी तरल पदार्थो के लिए प्रयोग हुआ है जिसमें अमृत से लेकर गरल तक आता है । तेल से इसका संबन्ध इतना स्पष्ट है कि दिल्ली की स्थानीय बोली में पानी के लिए तेल का प्रयोग आज भी होता है। अतः कलछुल में गर्म तरल पदार्थ को निकालने का भाव है तो भोज. कल्हारना में फ्राई करने का । स्वयं कडाही में कल का कड हुआ है अतः उसका नामकरण इसी से जुड़ा है, पर कल्हारने से क्या क्लेश का और क्लिष्ट का संबन्ध नहीं जुड़ता?

2. कल ध्वनि का दूसरा स्रोत है पत्थर या कंकड़ के टूटने से उत्पन्न नाद।अतः इसका अर्थ पानी नहीं हो सकता। इसका अर्थ है पत्थर, या कंकड़। हम कह आए हैं कि नाद को मनुष्य पाषाण युग के आरम्भ से ही सुनता आया था, परन्तु जरूरी नहीं कि इसके वाचिक महत्त्व को भी समझता हो और इस नाद के वाचिक पुनरुत्पादन को उसकी संज्ञा भी बनाया हो। यदि ऐसा होता तो सबसे पहले यह संज्ञा उन शिलाखंडों को मिली होती जिसे पाषाणकालीन मनुष्य जल धाराओं की पेटी से जुटा कर लाता था और जिनको तोड़ कर वह अपने हथियार बनाता था। (विशाल चट्टानों को वह स्वयं तोड़ता भी तो किस हथियार से। इसके लिए वह जलधाराओं पर निर्भर था। जल स्वयं वज्र है = आपो वै वज्र – यह अतिरंजना नहीं एक वैज्ञानिक खोज है। विदेशियों ने हमारे साहित्य का अपनी जरूरत से पाठ किया इसलिए जल्दबाज़ी में बहुत सी बातों को समझ ही न सके या जितना समझे उसे अपनी जरुरत की विपरीत पाकर दबा दिया।)

धारा की पेटी में सुलभ प्रस्तर खण्डों को उन्होंने पाहन कहा। यह पह या पोह मूल से सम्बंधित है जिससे पहिया और पो – जा, प्रवाही या जल, पवि, पवित्र और पवन आदि का सम्बन्ध है। दोनों गतिसूचक हैं और हम निवेदन कर आये हैं कि गति से सम्बन्धित सभी शब्दों को आदिपद जलवाची है। पाहन पानी की तलब या पीते समय होठों से उत्पन्न नाद है जिसका अनुकरण पा, पी, पे, पो की रूप में हुआ जिनका अर्थ पानी है : पा – पानी, पे- पेय, पी – वै. पीतु, और वै. पोष से तो पता चलता ही है. त्राहि कि ही तरह पानी ( प्यासा मर रहा हूँ, पानी पिला कर मेरी रक्षा करो ), पाहि, में भी देखा जा सकता है।

प्रसंगवश यह भी जिक्र करदें कि जिस हड़बड़ी में यूरोप की और से भारत की और बढ़ने वाले आर्यों के लिए सबूत जुटाए जा रहे थे उन दिनों यह सुझाव प्रमाण के रूप में दिया गया था कि अश्वपालन करने में अग्रणी आर्य थे और इसका खंडन किक्कुली अभिलेख से होता था । वर्णविन्यास से देखें तो अश्वपालन का आचार्य मुंडारी था न कि आर्य भाषा भाषी। दूसरा झूठ यह कि अरायुक्त पहिये का आविष्कार करने वाले आर्य थे, जब कि हमारा इतिहास चीखते स्वर में कहता है कि ये इंद्र-विमुख, भृगु थे. पहिये की आविष्कार का सत्य यह है कि इसके लिए कई भाषायी समुदाय प्रयत्नशील थे ।

एक उन्ही शिलाखंडों को, जैसा हम देख आए हैं, पाहन कहता था जिससे पवि, पवन, पो, और पहिया का रिश्ता है तो दूसरा उसे शर्करा कहता था. इसकी भाषा में पानी या धारा के लिए सर और कर का प्रयोग होता था । आप सर का आशय तो समझ चुके होंगे,यदि आपने भोजपुरी का करमोवल अर्थात भिगोना और करमा/ करमुआ , पानी में पलनेवाली एक लतर जिसका पोषक मूल्य है, से परिचित हैं तो पाएंगे कि शर्करा – जलधारा में मिलने वाला घिसा हुआ पत्थर, दूसरे खाद्यों और पेयों की लिए भी प्रयोग में आ सकता था, जैसे सक्कर पर इसका एक दूसरा रूप चरकर भी था। दोनों में दो जलवाची शर/ चर + कर शब्दों का संयोग था। यदि पह से पाहन और पहिया, पहल, पहले का नाता है तो शर्करा / चरकरा बोलनेवालों ने जो आविष्कार किया उससे चक्र, अंग्रेजी सर्कस और सर्कल, सर्कुलेशन आदि का है।

और एक तीसरा समुदाय उसी को बट / बटिका कहता था। इससे संस्कृत का वर्त, वर्तन या चक्कर खाने या घूमने का और गोलाकार या वर्तुल का सम्बन्ध है। इसका विकास पहिये की लिए न हो सका। उसके लिए पहले ही शब्द चलन में आ गया था पर बर्म, बरमा, भ्रम, भृमि और आपके भ्रमण से इसका गहरा संबन्ध है। अब आपको भरम या भ्रम का अर्थ भी समझ आगया होगा।

एक चौथा समुदाय था जो उसी प्रस्तर खंड को रोड़ा कहता था। इसकी भाषा में रोल का अर्थ चक्कर खाना था । हो सकता है यह एक दूसरे से रगड़ खाते हुए बहने वाली बटिकाओं के अनुनाद के आधार पर गढ़ा गया हो। इसकी छाया आपको स्वर भेद और व्यंजन भेद से रोढ, रोह, रोथ, रथ, रोह, रोटरी, रोड, रोलर, रेढ़ा, रेढ़ू में दीख सकती है । संभव है रीढ़ के नामकरण मैं भी इसका हाथ हो. रीढ़ तोड़ देने के लिए रेढ़ मार देने का मुहावरा तो चलता ही है.
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Post – 2017-05-17

देववाणी (पैंतीस)
पानी, आग और पत्थर

हमने देखा, जब हम चन्द्रमा कहते हैं तो कई बार चांद कहते हैं। अर्थात अपने अपने शब्दों से चांद कहने वालों के मिलने के कारण हम उन सबके शब्दों को मिला कर एक कर देते हैं, इसलिए कई भाषाओं में प्रयुक्त चांद की संज्ञा को एक के बाद एक, ताबड़तोड़ दुहराते हैं और वह एक शब्द बन जाता है।

इसके लिए भाषावैज्ञानिकों ने कोई शब्द गढ़ा अवश्य होगा, वह मुझे याद नहीं. फिर भी भारतीय भजाषाओँ का अध्ययन करने वालों ने इसे अवश्य लक्ष्य किया होगा. तन+नीर, ताल +आब, जल+आब के दृष्टान्त हम दे आये हैं, परन्तु यह भी संभव है कि पॉलीग्लॉस या एक ही क्षेत्र में अनेक भाषाओँ और उनके चलन का ध्यान रखनेवालों को भाषा के विकास में इसकी भूमिका का उन्हें ध्यान न रहा हो, क्योंकि वे भाषा की आनुवांशिकता से इतने ग्रस्त थे की छिटफुट ऐसे प्रस्तावों के आने के बाद भी उन्होंने भाषा की निर्माण प्रक्रिया में इसकी भूमिका का सही आकलन नहीं किया। फिर भी मेरा ज्ञान अपर्याप्त है और किसी को लगे इसमें सुधार अपेक्षित है तो हमारी सहभागिता होगी। यद्यपि इससे हम जिस पक्ष पर बात करने जा रहे हैं उस पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा।

आज हम देखेंगे कि जब हम कल कहते हैं तो एक ही भाषा के तीन शब्दों को एक साथ बोलते हैं, पत्थर, पानी, और आग। सन्दर्भ से ही यह पता चलता है कि इन तीनों में से हम किसकी बात कर रहे हैं । विचित्र स्थिति है परन्तु भाषाविज्ञानियों के लिए यह कोई नई चीज नहीं है। अंग्रेजी में इसे होमोफोनी कहते हैं। सुनने में शब्द एक लगतs है परन्तु वे अलग अलग हैं। यह दूसरी बात है कि जिस स्तर पर उतर कर हम अपनी बात करने जा रहे हैं उस तक पहुंचने का रास्ता ही बन्द रहा है।

परन्तु यदि आप कहना चाहें कि आग और प्रकाश को अपनी संज्ञा जल से ही मिली होगी] आपने स्वयं यह सिद्धांत बघारा है तो इज्जत बचाने के लिए आपकी बात मान लूंगा। कारण,आग और प्रकाश से स्वतः तो कोई ध्वनि नहीं पैदा होती परन्तु आग लगने पर ज्वलन के लिए जो ऑक्सीजन ख़त्म होती है। उससे पैदा हुए निर्वात को भरने के लिए हवा का जो दबाव पैदा होता है उस टकराहट से ज्वाला के अनुपात में ही हाहाकार पैदा होता है। यह ध्वनि भले हवा के दबाव की मानी जाय, पैदा तो यह आग लगने पर ही होती है! एक दूसरा कारण भी है. आग लगने पर जलने वाले काठ के कमजोर पढ़कर टूटने से तड़कने की जो आवाज पैदा होती है, जिसे कोई अपनी भाषा की ध्वनिव्यवस्था के अनुसार कड़, कट , कल, के रूप में अनुनादित या उच्चारित कर सकता है, इसलिए जिस सज्जनता से मैंने आप कि बात मान कर पुनर्विचार किया उसी से आप मेरे इस प्रस्ताव को भी मान सकते हैं कि कल आग से भी पैदा होनेवाली ध्वनि है और इसलिए उसके लिए या उससे जुड़े कार्यव्यापार के लिए इसका अर्थोत्कर्ष किया जा सकता है।

पत्थर में आवाज नहीं होती या होती है तभी जब पानी या हवा या भूकंप के कारण उसके खंड गिर कर किसी चीज से टकरायें। पत्थर को पत्थर से तोड़ने और गढ़ने का काम मनुष्य ने बहुत पहले आरंभ कर दिया था । यह काम इतने प्रारंभिक चरण पर आरंभ हुआ कि यह तय करना कठिन है कि उसने पहले औजार बनाना सीखा या बोलना और इसलिए मनुष्य के हस्तक्षेप से पत्थर से आवाज भी पैदा हो सकती थी और चिनगारियां भी।

कड़, खड़, गड़ ऐसी ही ध्वनियां हैं जिनका प्रयोग कंकड़ से ले कर पत्थर तक के लिए किया जाता है। ध्वनि के उत्पन्न होने और उसके वाचिक मूल्य को पहचानने को हम अवश्य कुछ विलंब से जोड़ सके होंगे। समस्या तब पैदा होता है जब हम पाते हैं कि इनके अन्त में आने वाली ध्वनियां सभी भाषाओं में नहीं पाई जातीं। मूर्धन्य ड़ की निकटतम ध्वनि मूर्धन्य ळ है और वह भी सभी बोलियों में नहीं मिलती ल की ध्वनि अवश्य मिलती है। (incomplete)