Post – 2017-05-16

सच वह नहीं है जिसको सभी देख रखे हैं
‘हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं।’
जो कुछ है निगाहों में, निगाहों से भी पीछे
हम उससे भी पीछे के भरम देख रहे हैं।

Post – 2017-05-16

देववाणी ( चौंतीस )
इतिहास दुबारा लिखना है

सन, चन, चंद्र, चन्द्रमन, चंद्रमस, चन्द्रमा के सामाजिक पक्ष को समझे बिना हमारा इतिहासबोध, वर्तमान की समझ और भविष्य के सपने सब अधूरे रह जायेंगे और आपकी मानसिक दासता आगे भी जारी रहेगी। अपनी भाषा को समझे बिना आप अपने समाज को नहीं समझ सकते। यह भाषा हिंदी, तमिल या हो नहीं है। इसका एक एक शब्द इन विभाजनों की राजनीती को भी उजागर करता है और उसके बाद भी विविधता को अधिक वैभवपूर्ण बनाता है। यह एक गलत सोच थी की हमारी सभी भाषाएं संस्कृत से निकली हैं। इस सीमा तक पादरी काल्डवेल सही थे। परन्तु किसी अन्य की तुलना में वह स्वयं अधिक अच्छी तरह जानते थे की भारतीय समाज के बीच भिन्नताएं तो थीं परन्तु कटुता न थी। क्योंकि भाषाओँ का और दक्षिण भारतीय परम्परा का उनका ज्ञान बहुत गहरा था। वह इस सौहार्द को भितरघात करते हुए तोडना चाहते थे क्योंकि वह जानते थे की दूध को तलवार से नहीं फाड़ा जा सकता, नीबू की कुछ बूंदें इसके लिए काफी है। मन में खटास पैदा करने से ही ईसाइयत के प्रचार का मनोवैज्ञानिक पर्यावरण तैयार हो सकता है। इसके लिए उन्होंने तमिल जातीयता को उत्तेजित करते हुए उसे संस्कृत के प्रतिस्पर्धी के रूप में स्थापित किया। इस तरह की प्रतिस्पर्धा उत्तर भारत में भी संस्कृत के विरुद्ध पैदा की जा सकती थी क्योंकि केवल दक्षिण में ही नहीं अपनी बोलियों के प्रति अगाध आसक्ति उत्तर भारत में भी थी। भावनाएं उत्तेजित करने की समस्या थी। यहां वही काम सवर्णों और आवरणों की आड़ में संस्कृत भाषियों को आक्रमणकारी सिद्ध करते हुए और शेष जनों को उनके द्वारा परास्त किये और पराधीन बनाकर रखने की कहानियों से पूरा किया गया।
इन सभी समस्याओं के समाधान भाषा के अध्ययन से अधिक निर्णायक रूप में किया जा सकता है न कि दर्शन और औचित्य बघार कर।
उन दौरों का इतिहास जिनके न तो मौखिक परंपरा से आई कोंई जानकारी हमारा साथ दे पाती है न ही ग्रन्थों में लिखित पुरातन कालों के आख्यान। यदि देते भी हैं तो उन पर लोग यह कह कर विश्वास नहीं कर पाते कि इनमें अतिरंजना का सहारा लिया गया होगा, भाषा के इस विवेचन से समझा जा सकता है। हमारी भाषाएं और उनकी बोलियां आदि काल से आज तक परस्पर जीवन्त संबंध बनाए हुई हैं इसलिए भाषा का अध्ययन भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में जितना अव्याहत है उतना उन देशों और क्षेत्रों का नहीं जहां स्थानीय बोलियों पर एक उन्नत भाषा का एकाएक प्रसार होता है और जो वहां की उच्च सांस्कृतिक आकांक्षाओं के अनुरूप् षब्दभंडार का जनन करती हुई उनकी अपनी प्राचीन बोलियों को अव्यावहारिक बना देती है। वे इस आगत भाषा के ध्वनितत्व को और कुछ सीमा तक विन्यास को तो प्रभावित करती हैं परन्तु सहभागिनी की भूमिका नहीं निभा पातीं। यह भूमिका वे तभी निभा पाएंगी जब उनकी अपनी बिसरी हुई बोलियों के तत्वों की खोज हो और यह समझने का प्रयास किया जाय कि यदि यह बनी बनाई भाषा उनके पास न पहुंचती और उन्होंने स्वयं विकास करते हुए आधुनिक युग तक की यात्रा की होती तो उनकी अपनी बोलियों में नई अपेक्षाओं के अनुसार किस तरह के परिवर्तन आए होते।
संस्कृत ने हड़प्पा सभ्यता के निर्माण की प्रक्रिया में अपना वह विकास किया जिसमें उसके स्तर को देखते हुए पूर्णता का भ्रम पैदा होता है और तकनीकी शब्दावली के गठन के लिए उसने जिस इंजीनियरी का विकास किया उसका भारत में ही नहीं सर्वत्र अनुकरण किया गया। भारत से यूरोप तक की भारोपीय भाषाओं को यह सहज सुलभ थी इसलिए उन्होंने अपने जार्गन के लिए भी अपनी ध्वनिव्यवस्था में ढली इसी की शब्दावली और घटकों का सहारा लिया। लातिन और ग्रीक के यूरोपीय भाषाओं के जार्गन के लिए स्रोत भाषा बनने का यह प्रधान कारण प्रतीत होता है।

हम चन्द्रमा के विविध नामों पर लौटें। यह शब्द न केवल उस षड्यन्त्र का भंडाफोड़ करता है जिसमें संस्कृत बोलने वाले किसी समुदाय को आक्रमणकारी या किसी भी अन्य तरीके से भारत में घुसपैठिया बताया गया था, अपितु इस ढकोसले का भी कि संस्कृत का किसी विशेष नस्ल या से संबन्ध था। यह सच है कि आरंभ में इसमें अग्रणी भूमिका किसी एक समुदाय की थी जिसे पहचाना तक नहीं जा सकता, क्योंकि इसका आरंभ झूम खेती तक जाता है जिसमें एक एक कर कई समुदायों ने अपनाया था। स्थायी खेती में उनमें से किए एक की भूमिका अग्रणी रही है और उनके अनुभवों, प्रयोगों, और तरीकों को दूसरों द्वारा अपनाने की विवशता के कारण उसकी भाषा की भूमिका प्रधान थी जिसे कृषि अपनाने वाले दूसरे समुदायों को भी अपनाना पड़ता था। परन्तु यह स्वयं इच्छुक था कि अधिक से अधिक लोग खेती अपनायें ताकि उसकी संगठित शक्ति भी बढ़े और जंगली जानवरों और जनों के उपद्रव में भी कमी आए इसलिए यह एक खुला समाज था जिसमें समय समय पर कम से कम चार पांच भाषाई समुदायों के लोग शामिल होते रहे। इनके द्वारा ही उस भूस्वामिवर्ग का निर्माण हुआ जिसके सामाजिक गठन का परिणाम वर्णवाद था।
ऐसी स्थिति में सवर्ण और असवर्ण का प्रश्न पहल और प्रयोग की तत्परता और इसके अभाव या इस दिषा में उदासीनता का अन्तर बन जाता है। हमसे पहले के जिन अध्येताओं ने इस समस्या पर विचार किया है उनमें डा- अंबेडकर की दृष्टि सबसे प्रखर और तार्किक थी जिसे समझने की क्षमता अपने स्वार्थ के कारण सवर्णों में भी नहीं थी, परन्तु उनकी नजर में भी इतिहास का यह विराट फलक नहीं था, इसलिए पहल और इसकी कमी के पहलू पर उनका भी ध्यान नहीं गया।

समता की अवधारणा नई है और लंबे समय तक सपना ही बनी रहने वाली है। परन्तु इसके पहले आज तक मानवीयता के नाम पर दया ओर दान और सवावर्त के जो भी उपाय किए जाते रहे हैं उनमें से कोई पहल और उपक्रम को प्रेरित करने वाला नहीं रहा है। आज की सुविधाएं भी पहल की जगह पराश्रयता पैदा करने वाली ही हैं।

योग्यता अर्जित करने में समान सुविधाओं या पिछड़े हुए जनों को कुछ अधिक सुविधाओं की व्यवस्था न्यायोचित और देशहित में है, परन्तु चुनौतियों को कम करना, रियायती दर पर आगे बढ़ाना न उन समुदायों के हित में है न पूरे समाज के। योग्यता की परख में पक्षपात को समाप्त करने के तरीके निकालना एक जरूरी उपाय है जिसके कारण जो आगे बढ़े हुए तबके हैं वे अपने स्वजनों को आगे बढ़ा कर दूसरों के अवसर कम करते हैं परन्तु अयोग्यता को प्रश्रय देना किसी समाज या राष्ट्र के हित में नहीं हो सकता।

अन्तिम बात यह कि तुलनात्मक भाषाविज्ञान का समस्त ढांचा, इसके अन्तर्गत किए गए सभी काम, बहुत सीमित उपयोग के रह जाते हैं। भाषा परिवारों की अवधारणा, भाषा के क्रोडक्षेत्र की कल्पना, पूर्वरूपों की सर्जना तथा दूसरे निष्कर्ष या तो पूरी तरह खंडित हो जाते हैं या सीमित आंचिलिक उपादेयता के रह जाते हैं जहां तथ्यों से इन्कार नहीं किया जा सकता, निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

Post – 2017-05-15

खुदा देता जिन्हे हैं उनको थोड़ी अक़्ल देता हैं
मिली जिनको अधिक उनको मिटाकर छोड़ देता हैं.
कोई उसके बराबर होना चाहे उसको क्यों चाहे
उसी की जहन में आकर इरादे तोड़ देता हैं .
न उसकी याद हो तुमको तुम्हे वह याद रखता हैं
जहां तुम ऐंठ जाते हो वहीँ से तोड़ देता हैं .

Post – 2017-05-15

देववाणी (तैंतीस)

घालमेल

चन्द्रमा का अंतिम शब्द है मन या मस। मैं स्वयं दुविधा में हूँ कि ये दो शब्द है या एक ही शब्द को दो भाषाई समुदाय अपनी ध्वनिसीमा के कारण दो तरह से बोलते रहे।

इनका सबसे रोचक पहलू संस्कृत व्याकरण में मिलता है। इसमें चंद्रमा को नपुंसक माना गया है परन्तु रूपावली में एक नई समस्या सामने आती है. दूसरे नपुंसक लिंगी शब्दों की रूपावली में प्रथमा एक वचन में नपुंसकलिंगी रूप आता है। उदहारण के लिए फलं की रूपावली है फलं फले फलानि परन्तु चंद्र्मन की रूपावली आरम्भ होती है चंद्रमा चन्द्र्मसौ चन्द्रमस: । यदि ध्यान दें तो पाएंगे कि एक समुदाय के लोग चंद्रमा को पुलिंग मानते थे। दुसरे इसे नपुंसक लिंग मानते थे। नपुंसक रूप एक ग़लतफ़हमी का परिणाम लगता हैं ।
मन जैसा हम कह आये हैं स्वत: चन्द्रमा के लिए प्रयोग में आता था। चन – चं +और (तर-) / दर – द्र = चन्द्र चलन में आचुका था। लगता हैं उसके बाद मन बोलने वाला समुदाय मुख्या धारा का अंग बनकर द्विभाषी बना और मन का जन की तरह मन: मनौ मना: रूप चलता रहा. यह एक संभावित कारण लगता है।

जब हम देववाणी से संस्कृत की दिशा में आये बदलावो की बात कर रहे हैं तो ऋग्वेद काल से पहले पांच हजार या इससे भी लम्बी अवधि में आये परिवर्तनों के जहाँ तहाँ से जुटाए, मिटने से बचे रह गए, पदचिन्हों के सहारे उस विकास यात्रा को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं । इस अवधि में कई तरह के मेल मिलाप हुए हैं और फिर भी उन्ही समुदायों के कुछ लोगों ने दूसरे समुदायों में मिल कर उन्हें भिन्न रूप में प्रभावित किया हैं और जहां तहाँ हर तरह के मेलजोल से बचते रहे हैं ( गो मेलजोल से बच कोई नहीं पाया हैं। उस प्रक्रिया पर बात करने से भटकाव होगा) । इन्हीं में उस आशंकाओं के किवारण के सूत्र भी छिपे हैं।

हमने कहा एक समुदाय मन को चन्द्रमा के लिए प्रयोग में लाता था और उसमें मन पुल्लिंग था और गहरे मेल मिलाप के बाद जब सभी के शब्दों के मेल से रूप बने तो एक जो पुल्लिंग मानता था उसने चंद्रमस चन्द्र्मसौ चन्द्रमसः जारी रखा और दूसरा समुदाय चंद्रमन की नपुंसक रूपावली चलाता रहा। उसकी रूपावली तो न चल सकी, शब्द के रूप में चन्द्रमन चलता रहा जिसमें मन बचा रहा और चन्द्रमस केवल रूपावली में दृष्टिगोचर होता हैं।

संस्कृत में मस/ मास =चन्द्रमा तो लुप्त हो गया पर उसके एक चक्र के लिए मास बचा रहा। फ़ारसी में माह और मह और महीना तीनो सुरक्षित हैं और संस्कृत में भी इन आशयों में बहुत पहले प्रयोग में आने को प्रमाणित करते हैं जब की हम देख आये हैं की मन अनेक बदलावों के बाद अंग्रेजी मून और मंथ, मेन्सुरेशन में तथा मन या ज्ञान पक्ष में मेन्टल/ माइंड आदि में सुरक्षित हैं।

कुछ शंकाओं का निराकरण करते चलें। क्या यह सम्भव हैं की एक ही भाषा में कुछ लोग किसी शब्द का एकलिंग में प्रयोग करें और दूसरे भिन्न लिंग में। हिंदी में बहुत से लोग सामर्थ्य का प्रयोग स्त्रीलिंग में करते हैं, जो गलत हैं। दूसरे पुल्लिंग में जो सही हैं. परन्तु जैसा पतंजलि और भर्तृहरि ने कहा हैं, और जो बात पश्चिमी भाषाशस्त्रियों को कुछ देर से समझ आई, भाषा का निर्माण लोक करता हैं, वैयाकरण नहीं, इसलिए लोकव्यवहार में आने पर सही गलत की और ध्यान नहीं दिया जाता । न तान लोकप्रसिद्धत्वात कश्चित तर्केण बाधते (भर्तृहरि ) ।

संस्कृत में लिंग को लेकर खासी अनियमितता हैं । हिंदी में उर्दू के कारण कुछ अनियमितताएं आई हैं। संस्कृत में लिंग की अनियमितता के पीछे भी यही कारण हैं।हिंदी में तो एक भाषा की संगत का परिणाम हैं की ‘हम तुम्हारे साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर चलने वाले हिंदी और हिंदुत्व से ऊपर उठे सेक्युलर हैं ‘ यह दवा करने के लिए उर्दू की उन गलतियों का भी प्रयोग करते हैं जिससे हिंदी सीखनेवालों की उलझन बढे और उनके लेखन से मुग्धा होकर उन जैसी ग़लतियाँ दुहराने वालों की संख्या बढ़कर सही प्रयोग करने वालों से अनुपात में आगे चला जाय.

एक प्रसंग याद आ गया . मेरे एक मित्र हैं राजकुमार सैनी. मित्र इसलिए हैं की कोई कितना भी बड़ा हो अगर गलत कह रहा हैं उससे भिड़ जाते हैं. मुझ से भी भिड़ गए. हो सकता हैं मैं ही उनसे भिड़ गया होऊं. पचीस साल पुरानी बात हुई. सवाल था सुनहरी मौका का . मैंने कहा यह गलत हैं. सैनी जी डट गए यह प्रयोग तो कमलेश्वर ने भी किया हैं. मुझे ऐसे मौकों पर खास मज़ा आता हैं, मैंने कहा, कमलेश्वर कहानियां बहुत अच्छी लिखते हैं पर उनको हिंदी नहीं आती. सैनी जी भड़कते हैं तो देखते बनता हैं. कहा क्या बकते हैं आप. जब दूसरा आपा खोता हैं तो मुझे खास मज़ा आता हैं. वह उग्र और मैं मुस्कराता रहा. वः अपनी ही उग्रता के शिकार हो कर मेरी बात सुनने को तैयार हो गए . मैंने पूछा मौका स्त्रीलिंग हैं या पुल्लिंग. कुछ देर तक वह समझ ही न सके की मैं कह क्या रहा हूँ.
मैंने दूसरा प्रश्न किया, आप अच्छा मौका कहेंगे या अच्छी मौका. या अच्छा मौका?
उनके मुंह से निकला अच्छा मौका।
मैंने पूछा फिर सुनहरी मौका ठीक है या सुननहरा मौंका?
सैनी जी इतने साफपाक थे की अपनी गलती का अहसास करते हुए जब वह माथा पीटते थे तो उनके मुंह के बल गिरने का धमाका भी सुनने देती थी. इस बार भी ऐसा ही हुआ.

पर सोचिये हिंदी को अपनी छोटी सी जिंदगी में उर्दू से पाला पड़ गया और हम तुम्हारे साथ हैं के चक्कर में इसने आपतोषवाद को भाषा तक पहुंचा दिया हैं. देववाणी को संस्कृत बनने से पहले उन हज़ारों सालों में कितने समझौते या समायोजन करने पड़े इसका कोई हिसाब दे सकता हैं! हम एक कोशिश कर रहे हैं. इसमें दूसरा कोई साथ आ सकता हैं?

मन का प्रयोग भाषा भेद से मत, मथ, मद, मध्, मन, मड और मण आदि कई रूपों में होता रहा लगता हैं फिर ये सभी रूप सामान्य व्यवहार में आने लगे। इनमे भाषों की घोषप्रियता और महाप्राणन की प्रवृत्ति देखी जा सकती हैं। एक दूसरी प्रवृत्ति स्वरभेद की हैं!

Post – 2017-05-15

जिस बात की मुझे शिकायत है वह यह कि मेरे मित्रगण आनन्द लेते हुए, स्वयं सोचते और शब्दों से खेलते हुए, जो मुझसे छूट गया उसकी ओर ध्यान देते और दिलाते हुए नहीं पढ़ते हैं। ज्ञान बटोरने पर यह बोझ बन जाता है। मैं एक उदाहरण से अपनी बातर कहूं। जब मैंने यह कहा कि जिस की वस्तु क्रिया या सत्ता में अपनी ध्वनि नहीं है उसे अपनी संज्ञा जल से मिली है जिसकी अनन्त ध्वनियां हैं और फिर तर से तार, आंख के तारे, आसमान के तारे तक का क्रम जोड़ा तो किसी का ध्यान इस ओर जाना चाहिए था कि तार या धागा, तर्क, तर्कु का भी संबंध क्या तर से ही नहीं है, प्रवाह में न दिखाई दे पर गुदाज छिल्के वाले पौधों को तोड़ने पर उनकी आर्द्रता तार के रूप में दिखाई देती है पीजा की तरह। इससे तार का संबंध तो जुड़ता ही है । और फिर एक नई दिशा अर्थ और शब्द की खुलती तार के लेकर तारतम्य तक जाती । इसी तरह तर्ज, तरह, तरीका, तौर, तरफ के पीछे क्या है। जब आप सर्जजनात्मक पाठ करते हैं तो जैसा मनोरंजन होता है वैसा जुए के खेल या बुझौवल में ही मिल सकता है। कोशिश करें तो बहुत कुछ जुड़ेगा भी और छंटेगा भी ।

Post – 2017-05-14

दिल को हमने दिल नहीं समझा था फिर समझा था क्या
डाक्टर की जाँच का कोई सिला समझा था क्या
टूटता पहले था अब तो बैठ जाता है जनाब
यह हुआ कैसे यह है किसकी अदा समझा था क्या .

Post – 2017-05-14

दिल मेरा है वही लेकिन सुबूत हैं ही नहीं
कभी लिक्खे थे उसे वे खुतूत हैं ही नहीं
लिये फोटो थे साथ दिल का उनमें अक्स न था
जख्म दिखलाने के देखो सुलूक हैं ही नहीं.

Post – 2017-05-14

मैंने भी तेरे हुस्न को हर कोण से देखा
तू है तो बहुत कुछ है, मगर है कि नहीँ है
हर चीज़ में तू है तो बता चीज़ कहाँ है
उस चीज़ से बाहर भी कहीं है कि नहीं है !

Post – 2017-05-14

मैं शोहरत से घबराता हूं। काम स्वयं इतना आनन्द देता है कि चाहता हूं काम भले मुझसे कोई कराए पर काम सलीके से हो, और उसकी शोहरत वह ले जाये जो इसे सलीके से, बहुग्राह्य और बहु मान्य बना सके। हम जिस युग में जी रहे हैं उसमें इस बात का विश्वास दिला पाना कठिन है, परन्तु वे कृतियां जिन्हें मैं अनन्य कह सकता हूें, उन्हें लिखने को मैं दूसरों को उकसाता रहा। मैं काम को निखोट बनाना चाहता हूं। सर्ववमान्य बनाना चाहता हूें। जिनके पास समय, रुचि, समर्पणभाव दिखाई देता है उनसे याचक भाव से अनुरोध करता हूं कि इस काम को समझो, और वे उसे ग्रहण नहीं कर पाते तो ही सोचता हूं कि इसे अभिलिखित तो कर दूं। मेंरे सभी काम अभिलेख हैं, मेरी नजर में असन्तोषजनक पर साथ ही अनन्य, क्योंकि उस दृष्टि से दुनिया के किसी विद्वान ने इस तरह सोचा ही न था। आत्मविश्वास की कमी नहीं है, इस बात का डर अवश्य है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। अकेला व्यक्ति सही होते हुए भी पूरी तरह सही नहीं हो सकता। उसे उन कमियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए । ऐगेल्स और मार्क्स को जो सुविधा प्राप्त न थी और वे दोनों आपस में ही बहस करते हुए अपनी सोच को दुरुस्त करने का प्रयत्न करते थे वह सुविधा मुझे प्राप्त है, पर उसका लाभ नहीं मिल रहा। वह आलोचना से, कठोर हो तो भी, मिल सकता है। वह मुझे नहीं मिल रहा । आश्वस्त करें कि आप तारीफ न करेंगे, आपतित्यां दर्ज करेंगे। फेयबुक ये अच्छा मंच इसके लिए मिलेगा भी नहीं।

Post – 2017-05-14

मुझे जिस बात का डर था वह सामने आ गया। मैंने सोचा था लोग हस्तक्षेप करेंगे, गलतियों को चिन्हित करेंगे और इस तरह यह काम अधिक सुलझे रूप में संपन्न हो सकेगा। पसन्द का इसमें कोई खास मतलब नहीं क्योंकि इस विषय के अधिकारी लोगों की पसन्द ही कोई मानी रखती है, इस तरह का कोई व्यक्ति मुझे इस देश में ही नहीं अन्यत्र भी नजर नहीं आता। यह सोच ही पिछली सोच से बिल्कुल अलग है। कमियां सामधारण जानकारी रखने वाला भी निकाल सकते हैं और वे मेरे कहने में चूक या कोई बात छूट जाने या विषय को स्पष्ट न कर पाने से ले कर किसी भी तरह की हो सकती हैं। ऐसा हो नहीं रहा है इसलिए भाषा पर मैं मात्र एक सामान्य पोस्ट और करूंगा और वह बोलियों की स्वीकृति, हिन्दी से उनके संबंध और इसका राष्ट्रभाषा के भविष्य से होगा। बाकी का लेखन मैं पुस्तकीय अपेक्षाओं को ध्यान में रख कर अपने तक सीमित रखूंगा जिससे सार्वजनिकता से होने वाले सरलीकरण से बचा जा सके और तथ्यांकन में किसी की बोरियत या रुचि की बाधा से स्तर प्रभावित न हो।