Post – 2016-09-29

पता मुझे न अदालत को पता है तो सही ।
जबां से जो नहीं निकला वह कहा है तो सही ।।
तेग की धार पर चलना है मुहब्‍बत करना ।
कहा मैंने नहीं पर मैंने सुना है तो सही ।।
न जिन्‍दगी सही, अफसाना सही तो होता।
निशान एक मगर फिर जुड़ा है तो सही ।।
तुझको जो खत लिखे मैंने वे मेरे पास नहीं ।
जिस पर आंसू गिरा वह सादा सफा है तो सही।
सोचता हूं कि कहां चूक हुई थी मुझसे
लकीर सीधी है मजमून खुला है तो सही ।।
एे मेरी जां तुझे हर हाल में अपना माना
खुश नहीं मुझसे न हो, मुझसे खफा है तो सही।
मिलना भी ठाना तो रिश्‍ते को तर्क करने को
आह भरने की वजह अबकी दफा है तो सही ।।
28.9.16

Post – 2016-09-28

समझदारों के बीच एक सही समझ की तलाश – 6

“तुम विषय को इस तरह घुमा देते हो कि काले में भी चमक पैदा हो जाती है और उजले में भी दाग ही दाग दिखाई देने लगता है, पर यह बताओ, एक बार यह आदमी जम गया तो फिर बड़े पैमाने पर गुजरात नहीं दुहराया जाएगा, इसकी कोई गारंटी है?”

”गुजरात क्यों न दुहराया जाएगा, भाई ? वहीं से तो इस आदमी ने सीखा है कि धमकियों और खतरों के बीच भी विकास को प्राथमिकता देकर सांप्रदायिक बिगाड़ को बनाव की दिशा में बढ़ाया जा सकता है । जिन दिनों दूसरे राज्‍यों में कई तरह के उपद्रव होते रहे, उसके शासन में तेरह साल तक सांप्रदायिक शान्ति का जो उदाहरण गुजरात ने पेश किया वह दूसरे राज्‍यों में तो दुर्लभ था ही, ठीक उससे पहले या बाद के गुजरात में भी दुर्लभ था। यह तो किसी अन्‍य ने नहीं वस्‍तनवी ने स्‍वीकार किया था कि गुजरात में मुसलमानों को आगे बढ़ने का मौका मिला है।”

”या तो तुम समझे नहीं कि गुजरात से मेरा मतलब क्‍या है, या जानबूझ कर धूर्तता कर रहे हो, वही आदत, बात को घुमाने की।”

”यदि तुमने कोई नया कोश तैयार किया है जिसमें गुजरात का अर्थ सांप्रदायिक दंगा लिखा हुआ है, तो पहले बताना चाहिए था। दंगा तो हुआ था। वह किसी लंगे गुस्‍से की अभिव्‍यक्ति या किसी अन्‍याय से पैदा आक्रोश की अभिव्‍यक्ति, उसे रोकने और संभालने का अनुभव न हो, राजनीति में कोई नया नया आया हो तो जब तक वह स्थिति पर नियन्‍त्रण करे, काफी नुकसान हो चुका होता है । अमेरिका जिसकी पुलिस हमसे अधिक कुशल और प्रशिक्षित है, जिसे शताब्दियों से ऐसे विस्‍फोटों का सामना करने का अनुभव है, वह भी इन्‍हें आसानी से रोक नहीं पाता और दंगा एक शहर से दूसरे में ही नहीं एक राज्‍य से दूसरे राज्‍य में फैलता चला जाता है, यह तो अभी हाल की घटनाओं से भी समझ सकते हो !”

”तुम पैंतरे क्‍यों बदल रहे हो, क्‍या यह किसी से छिपा है कि इसमें प्रशासन की शह थी। लोग आज भी मानते हैं कि इसके लिए मोदी जिम्‍मेदार थे और इसके कारण कुछ लोग तो उन्‍हें सीधे हत्‍यारा कहते हैं। तुम उस पर परदा क्‍यों डाल रहे हो।”

”क्‍या तुममे इसे समझने का धैर्य है कि असल अपराधी कौन है या कुछ लोग और बहुत से लोग जो कहते हैं उसे दुहराने का शौक है और तुम उसे पूरा करना चाहते हो। पहली स्थिति में तुमसे बात हो सकती है, दूसरी स्थिति में बात की नहीं, तुम्‍हें एक डफली थमाने की जरूरत है जिस पर ताल देते हुए तुम इसे दुहराते और नाचते रहो। सच कहो तो यह नाच गुजरात के समय से ही चल रहा है और डफलियां हजारों हाथों में है और तुम उसमें शामिल हो रहे हो।”

”समझने को इसमें है क्‍या । सीधा मामला है। सारी दुनिया जानती है। अमेरिका तक ने इसी बात पर मोदी का वीजा नामंजूर कर दिया था।”

”इससे केवल यह सिद्ध होता है कि माफियातन्‍त्र कितना ताकतवर होता है, उसकी ताकत कितनी अधिक होती है, उसका चेहरा कितना भोला होता है, याद है न तुम्‍हे गॉड फादर का। और वह अपने को बचाए रखने और अपनी सत्‍ता को बचाए रखने के लिए कितने उपद्रव करता रहता है और उन पर किस तरह के आवरण डालता रहता है। इसलिए यदि तुम सचमुच समझना चाहो तो मेरे पास एक मशीन है उसमें किसी ने क्‍या कहा, क्‍या समझा, यह दुहराने की जरूरत नहीं पड़ती, वह स्‍वयं जांच कर बता देती है कि देखो इसका सच और झूठ क्‍या है ।”

मशीन की बात से वह एकाएक सकते में आ गया। मुझे इस तरह देखने लगा जैसे हम पहली बार मिले हों और वह मुझे पहचानने का प्रयत्‍न कर रहा हो। कुछ देर बाद उसके मुंह से निकला, ”मशीन, कौन सी ऐसी मशीन बन गई यार सच और झूठ का फैसला करने वाली। तुम लाईडिटेक्‍टर की बात कर रहे हो। पर …पर… वह।” वाक्‍य उससे पूरा ही नहीं हो रहा था।

”ठीक समझा तुमने । मैं लाइ डिटेक्‍टर की ही बात कर रहा हूं। यह मशीन तुम्‍हारे पास भी है लेकिन अफवाहों की धूल भर जाने के कारण वह बिगड़ी हुई है इसलिए उसे खाेलते हो तो धूल धक्‍कड़ की बाहर आता है। इसे बहुत बचा कर रखना होता है। मैं अपनी मशीन खोलता हूं और बताता हूं वह क्‍या कह रही है। मशीन तुम्‍हें दिखाऊंगा नहीं। जाे वह कहेगी उसे तुम्‍हें बताऊंगा और कागज कलम तो यहां है नहीं।”

उसने मदद की, ”कलम तो है ही और कागज नहीं है तो यह अखबार तो है, इसके सादे छूटे हिस्‍से का इस्‍तेमाल कर सकते हैं।”

”ठीक है, यह तो मुझे सूझा ही नहीं था।” मैंने हथेली आगे की और उसमें बहुत ध्‍यान से देखते हुए कहा, एक कालम में लिखो, दिल्‍ली… मेरठ… मलियाना …हाशिमपुरा… भागलपुर… रांची… अमृतसर… गोधरा…. इसमें दूसरे बहुत छोटी लिखावट में सैकड़ों नाम हैं जो पढ़े नहीं जा रहे है।
”दूसरे कालम में उससे भी अधिक नाम हैं लिखावट और पतली है पर एक नाम मोटे अक्षरों में है गुजरात।
पहले कालम के ऊपर शीर्षक है योजनाबद्ध रूप से किसी व्‍यक्ति द्वारा किए या कराए गए हत्‍याकांड ।
दूसरे कालम के ऊपर शीर्षक है किसी घटना या क्रिया की प्रतिक्रिया में भड़के उपद्रव।

” पहले कालम के नीचे दो टिप्‍पणियां है:
1. इनमें प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप में कांग्रेस का या सच कहें तो राजीव गांधी का हाथ। परोक्ष की व्‍याख्‍या करते हुए कहा गया है कि इसमें अकाली दल के सत्‍ता में आने के बाद उसे सत्‍ता से बेदखल करने के लिए उससे भी अधिक कट्टर खालसा उग्रवादियों का संरक्षण, संवर्धन भी आता है और उनके बेकाबू होने पर सीधा दमन और हरमिन्‍दर साहब का कांड भी।
2. में एक व्‍याख्‍या है, जिसमें लिखा है,’ भौतिकी का नियम यह है कि प्रतिक्रिया क्रिया के समान परन्‍तु उल्‍टी दिशा में होती है। समाजशास्‍त्र में नियम यह है कि प्रतिक्रिया क्रिया के कई गुना अधिक और उल्‍टी दिशा में होती है, परन्‍तु यदि क्रिया करने वाला इतना शक्तिशाली हो कि प्रतिक्रिया करने के परिणाम किया से कई गुना अधिक होंगे, तो प्रतिक्रिया दब जाती है और लोग आह तक नहीं भर पाते। इसलिए इन हत्‍याकांडों की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।
”दूसरे कालम के नीचे एक टिप्‍पणी है : ‘यहां सामाजिक विज्ञान का वह नियम काम करता है जहां प्रतिक्रिया या तो क्रिया के कई गुना होती है या प्रतिक्रिया होती ही नहीं और इसलिए हीनताग्रन्थि और क्षमादान बन कर उसी समाज के अलग अलग लोगों पर कई रूपों में व्‍यक्‍त होती है । इन दोनों का कारण यह है कि इसमें दमनतन्‍त्र शिथिल, निष्क्रिय या उदार होता है।

”अब हम मेरी मशीन से मिले आंकड़ों की शुद्धता पर विचार करें कि कहीं कोई चूक तो नहीं हुई क्‍योंकि मशीने भी ताप या घेर के घटने बढ़ने के साथ कुछ गलतियां करती हैं। मुझे इसमें कहीं कोई गलती नहीं दिखाई देती। व्‍यौरे में कमी मेरी आंखे कमजोर और लिखावट बहुत बारीक होने के कारण हो सकती है । तुम्‍हें कही चूक लगती हो तो बताओ ।”

वह हंसने लगा, ”मैं क्‍या बताऊं तुम्‍हारी मशीन को तो यह भी पता नहीं कि राजीव गांधी इन्दिरा जी के दिवंगत होने के बाद बड़ी अनिच्‍छा से राजनीति में आए थे। इन्दिरा जी ने खालसा उग्रवादियों का काम तमाम कर दिया था फिर राजीव के लिए भिंडरवाला और चौहान बचे ही नहीं थे। इसे राजीव के सिर लादने वाली तुम्‍हारी मशीन या ताे नकली है या तुम्‍हारे दिमाग का कोई पुर्जा ढीला है।”

उसकी हंसी के जवाब में हंसना भी जरूरी था और उसकी नासमझी पर अलग से हंसना जरूरी था इसलिए मैं दो बार हंसा। जवाब देना भी जरूरी था इसलिए जवाब भी दिया, ”देखो, मुलायम सिंह यादव के खानदानी शासन को देख कर तुम चकित होते हो कि क्‍या इन्‍होंने उत्‍तर प्रदेश काे अपनी जायदाद समझ रखा है। ठीक यही विचार लालू के जेल और राबड़ी के मुख्‍यमंत्री और अब लालूवंश को नीतीश को धक्‍का देते हुए देख कर तुम्‍हें लगता होगा। ये बेचारे भारतीय परंपरा के रक्षक है। आजादी के बाद ही नेहरू जी ने अघोषित किया कि आजादी मैंने ली है, शिमला मसौदे पर मैंने हस्‍ताक्षर किया, इसलिए यदि मुझे प्रधानमंत्री न बनाया गया तो मैं आजादी को वापस कर दूंगा और माउंट बैटेन को लिख कर दे दूंगा, तब तक राज करो जब तक मेरे खानदान का कोई उत्‍तराधिकारी सर्वस‍म्‍मति से आजाद भारत का शासक नहीं मान लिया जाता। इसके आगे सभी झुक गए, गांधी भी और पटेल भी और जब राजा बने तो यह पूरे नेहरू खानदान का राज था। जो बालिग थे, रिश्‍ते-नाते में जहां भी जैसे थे उनके बीच इस सावधानी से सत्‍ता का बंटवारा हुआ कि वे पुत्री के उत्‍तराधिकार में बाधक न बन सकें। पुत्री को जिन भी परिस्थितियों में अपना घर बर्वाद कर के पिता का घर बसाना पड़ा, उसका एक लक्ष्‍य था कि कल के शासन का प्रशिक्षण लो। देश काबू से बाहर नहीं जाना चाहिए इसलिए कहने को नेहरू जी प्रधानमन्‍त्री थे पर जैसा कि अखिलेश में पता नहीं कहां से इतिहास का यह रहस्‍य जान कर कहा कि आदेश तो पिता जी का ही चलता है, पर कुछ फैसले मैं भी करता हूं, उसके उलट नेहरू ने कहा था, आदेश तो मेरा ही चलेगा, कुछ फैसले तुम भी लिया करो और यह काम इन्दिरा जी ने पति के घर में रहते हुए ही संभाल लिया था। पन्‍त जी को मुख्‍यमंत्री के पद से हटा कर भारत सरकार का गृहमंत्री इसलिए बनाया गया था क्‍योंकि उस नाचीज ने एक ऐसा फैसला लिया था जो इन्दिरा जी को नागवार गुजरा था। नेहरू जी को लिखा, राज हमारे खानदान का और यह नामुराद हमें आंख दिखाता है। नेहरू जी ने उस व्‍यक्ति को जिसने अपना स्‍नेह भाजन समझ कर नेहरू को डंडे खाने से बचाने के लिए उन्‍हें सुरक्षा देते हुए अपने ऊपरी मेरु दंड पर चोट खाई थी जिसके कारण उनकी गर्दन उसके बाद आजीवन हिलती रही, उनके सम्‍मान की चिन्‍ता किए बिना, उनकी इच्‍छा के बिना केन्‍द्र में बुला लिया था।
प्रधानमंत्री नेहरू जी ही थे, पर केरल की नम्‍बूदरी सरकार इन्दिरा जी के फैसले से ही गिराई गई थी। पूरे देश पर एकक्षत्र राज्‍य चाहिए।”

”यार तुम हद करते हो, बात कहां की कहां चक्‍कर मार रहे हो। धीरज खत्‍म हो जाता है।”

”जो है ही नहीं वह खत्‍म कैसे होगा। इसकी आदत डालो, आ जाएगा। मैं कह रहा था कि पूरे खानदान का देश की अवधारणा और पूरे खानदान का शासन की परंपरा के जन्‍मदाता वही हैं। इसलिए इन्दिरा जी के शासनकाल में भी पारिवारिक शासन ही चलता रहा। छोटे बच्चे अधिक नटखट होते हैं, वे हमेशा चंचलता में बड़ों से बाजी मार ले जाते हैं और छोटे होने के बाद भी अधिक चंचल, अधिक वाचाल होने के कारण अधिक प्रतिभाशाली लगते हैं फिर यह तो किसी ने सोचा न था कि नेहरू जी का क्‍या और कब अंत होगा इसलिए एक आटोमोबाइल की समझ पैदा करके व्‍यापार खड़ा करना चाहता था और दूसरा हवाई जहाज उड़ाते हुए दिन काट रहा था इसलिए नेहरू जी के बाद बदली हुई और शास्‍त्री जी की रहस्‍यमय मृत्‍यु के बाद स्‍वायत्‍त राज्‍य को चलाने के लिए इन्दिरा जी को भी सहायक की जरूरत हुई और वह ‘कुछ निर्णय मैं स्‍वयं भी लेता हूं’ की स्थिति में आ गया था और अधिक निर्णय लेने लगा था। फिर उसकी मृत्‍यु जिस दुर्घटना में हुई उसकी जांच करने को कोई कमीशन नहीं बैठा। और इस खाली जगह पर राजीव को बुलाया गया तो वह हाजिर हो गए और राज अपने हाथ में रहे, इसलिए भावी प्रधानमंत्री का प्रशिक्षण इन्दिरा जी की तरह फैसले लेने के क्रम में ‘कुछ फैसले वह खुद ही करने लगे थे और इसकी ही परिणति थी भिंडरवाले को सन्‍त बनाया जाना, संसद की मर्यादा की चिन्‍ता किए बिना तलवार के साथ उसका प्रवेश, यह सब राजीव के निर्णय से हुआ।”

”तुम्‍हारा दिमाग सड़ गया है। तुम इन्दिरा जी को नहीं समझ सकते। वह एक महान नेता थीं।”

”हो सकता है, समझ तो मेरी सचमुच कम है, पर काम तो इसी समझ से लेना पड़ता है। इन्दिरा जी महान थी, वह एक महान वंश में पैदा हुई थीं, वह कुछ मामलों में नेहरू जी से भी अधिक दृढ़निश्‍चयी नेता थी। देशभक्ति और परिवारभक्ति में संतुलन नहीं कायम कर पाती थीं। उन्‍‍होंने देश को जोड़ने का काम किया, तोड़ने का काम नहीं किया। पूरे देश को अपनी मुट्ठी में रखना चाहती थीं यह उनकी दुर्बलता अवश्‍य थी। उन्‍होंने जो फैसले राजीव को सौंप दिये उन्‍हें विचलित मन से सहन किया और जब वह असह्य हो गया तो ब्‍लू आपरेशन का निर्णय लिया। ब्‍लू का मतलब जानते हो। नहीं, नीला नहीं होता, ब्‍लो होता है, सफाया कर दो। और फिर उसके बाद जो हुआ वह सर्वविदित है, फिर भी शास्‍त्री जी की मृत्‍यु की तरह ही उनकी मृत्‍यु के कुछ प्रश्‍न अनुत्‍तरित रह गए। अनुत्‍तरित यह भी रह गया कि यदि उन पर गोली चलाने वाले पकड़े या मारे जा चुके थे तो बेगुनाह सिक्‍खों का कत्‍लेआम किसी के आदेश से किस अपराध को छिपाने के लिए किया गया। अनुत्‍तरित यह रह गया कि इन्दिरा जी का हत्‍यारा कौन था और उसने किनका इस्‍तेमाल किया। अनुत्‍तरित यह भी कि ये निर्णय कौन ले रहा था।”

”इस समय तो मुझे गा‍लिब का एक शेर याद आ रहा है, पुर हूं मैं शिकवे से यूं राग से जैसे बाजा। इक जरा छेडि़ये फिर देखिए क्‍या होता है। तुम्‍हारे सामने चुप रहना भी मुश्किल, बोलना भी दुश्‍वार।”

मैं हंसने लगा, ”तुम ठीक कहते हो, पर सोचो इतिहासकार बीते जमानों का सही इतिहास क्‍या लिखेंगे जो हमारी आंखों के आगे घटी घटनाओं को भी नहीं समझ पाते और उनकी तोड़ मरोड़ करने वालों पर भरोसा करते हैं। तुम कमजोर दिमाग के हो, मैं तुम्‍हें थकाना नहीं चा‍हता था, पर यह देखो कि इस तालिका में हत्‍यारे और दुष्‍प्रचार के मारे का चेहरा कैसे सामने आ जाता है। सभी प्रायोजित नरसंहार कांग्रेस ने कराए इसलिए गोधरा के पीछे भी उसी का हाथ हो सकता है, यह सुनियोजित था। इसकी प्रतिक्रिया को तो रोका नहीं जा सकता था न उसके आयाम को समझा जा सकता था। यह पता लगाओ कि गोधरा में मुसलमानों के बीच कांग्रेस की कितनी पैठ थी और जिस व्‍यक्ति की उसमें प्रमुख भूमिका था वह कांग्रेस के संपर्क में था या नहीं।”
”मैं चलता हूं यार । तुम तो मुझे भी पागल बना दोगे।”
”जाओ। मैं रोकूंगा नहीं । परन्‍तु रात में यह सोचते हुए सोना कि मुसलमान जज्‍बात से इतना अधिक और अक्‍ल से इतना कम काम क्‍यों लेते हैं कि उनका योजनाबद्ध संहार करने वाला, भले सच्‍चे दिल से नहीं, हिन्‍दू वोट बैंक की लालसा में ही सही, उनका संरक्षक बन जाता है और जिसने अपनी अनुभवहीनता के दौर में कोई शिथि‍लता बरती भी तो बाद में इस बात का ध्‍यान रखा कि दुबारा ऐसा न होने पाए, उसे हत्‍यारा बता दिया जाता है, उस पर विश्‍वास करके वे अपने हत्‍यारों के वोटबैंक बन जाते हैं। हो सकता है सपने में तुमको इसका उत्‍तर भी मिल जाए कि प्रचारेण एतदपि संभवम्।

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वह शब्‍दकोश केवल कांग्रेस ही तैयार करा सकती है, दूसरा कोई नहीं। उसमें गुजराज के बहुत से पर्याय देने होंगे – । यह करना और गुजरात की आड़ में अपने काले कारनामों पर परदा डालना कांग्रेस के ही वश का है जिसके पास भाड़े के प्रचारकों की फौज रही है। इस शब्‍दावली से बचो, इससे प्रत्‍येक घटना के चरित्र को समझने में बाधा पड़ती है और असंख्‍य अपराधों से लिप्‍त और उन्‍हीं को अपनी नीति का गुप्‍त हिस्‍सा बनाने वाले को अपनी प्रचारशक्ति के बल पर छिपने की आड़ मिलती है। कांग्रेस ने जो भी किया सब राज्‍य द्वारा प्रायोजित था, गुजरात कांग्रेस की ही साजिश से घटित गोधरा कांड की स्‍वाभाविक और स्‍वतस्‍फूर्त प्रतिक्रिया। इसे किसी भी शासक के लिए रोक पाना असंभव था, कुछ हद तक विघातक भी। यदि दुबारा वैसी ही परिस्थितियां पैदा हो जाएं तो वह पुन: हो सकता है। परन्‍तु कांग्रेस ने जो कुछ किया वह राज्‍य प्रायोजित क्रिया थी जिसकी प्रतिक्रिया का दमन कई गुना दुखदायी हो सकता था इसलिए खुल कर कराह तक नहीं पाए । इन दोनों स्थितियों को समझा जाना चाहिए। नरसंहार कराना, जो कांग्रेस ने कई बार कराया और दंगों का भड़कना और प्रशासन का उसमें पूरी तरह सफल न हो पाना, दोनों अलग चीजें हैं। एक अपराध है दूसरा प्रशासनिक दक्षता से जुड़ा सवाल। अमेरिका जिसकी पुलिस हमसे अधिक दक्ष है, वह भी इन्‍हें आसानी से रोक नहीं पाता और दंगा एक शहर से दूसरे में ही नहीं एक राज्‍य से दूसरे राज्‍य में फैलता चला जाता है, यह तो अभी हाल की घटनाओं से भी समझ सकते हो !

”यह दंगा भाजपा शासित राज्‍य में हुआ । भाजपा के साथ भारत जुड़ा है, तुम उसे हिन्‍दू पढ़ते हो। हिन्‍दू शब्‍द के प्रति तुमने इतनी घृणा पैदा कर रखी है कि भाजपा का नाम आते ही वे मुसलमान भी दहशत में आ जाते हैं जिनको निशाना बना कर कांग्रेस शासन में हलाल किया गया और हलाल करने वालों के साथ हो जाते हैं। मुसलमान हैं तो सबसे पहले हिन्‍दू से लड़ेंगे, यह तक नहीं देखेंगे कि हिन्‍दू कार्ड खेलना कांग्रेस जानती है और हिन्‍दू शब्‍द को बदनाम करना भी वही जानती है। अपने तेरह साल के शासन में न तो मोदी ने, दस पन्‍द्रह साल के शासन में भाजपा शासित राज्‍यों ने, अपने आधे अधूरे तीन बार के शासन में बाजपेयी ने एक बार भी यह कार्ड नहीं खेला और मोदी जोड़ने की राजनीति करते हैं तो सांप्रदायिक जहर पर पले उनके ही दल या सहयोगियों में जाने कितने उनका ही गला काटने को दौड़ते हैं। वे संघ के पुराने एजेंडे से जुड़े लाेग है और आज भी सचमुच हिन्‍दू के हित से कम और मुसलमान के नुकसान से अधिक प्रसन्‍न होते हैं। वाजपेयी को वे नेहरूवादी कहते और संघ के उद्देश्‍यों से भटका हुआ मानते थे और अपनी ओर से गिराने का प्रयत्‍न तो नहीं करते थे पर भीतर से चाहते थे कि उनकी सरकार गिर जाय और जब उनकी तेरह दिन की सरकार गिरी थी तो अपने ऐसे ही एक मित्र को तालियां बजा कर अपनी प्रसन्‍नता प्रकट करते देखा था।”

जिसे मिटाने को बुद्धिजीवियों से लेकर दूसरे समस्‍त दल, विचार और समाचार माध्‍यम अपनी साख से लेकर अपना सिद्धान्‍त तक दांव पर लगाने को तैयार थे, इसलिए उनके लिए गुजरात का मतलब मोदीशासन प्रेरित सांप्रदायिक उपद्रव हो गया।

समाचार माध्‍यमों का प्रताप, इसे, इसके कारणों और परिणतियों से अलग करके मोदी जनित वज्रपात के रूप में पेश किया गया। मानो इससे पहल गाेधरा कांड न हुआ हो, या यदि हुआ तो उसे भी भाजपा ने कराया हो। अलीगढ़ में प्रोफेसर रहे, हिन्‍दी के एक बहुत अच्‍छे लेखक ने जो लेखन के कारण कम और अपने सेक्‍युलर दावे के कारण अधिक स्‍वीकार्य थे, गोधरा के बारे में लिखा कि वह स्‍वयं गोधरा कांड की कहानी गलत है। यदि बाहर से किरोसिन या पेट्रोल फेंका गया होता तो वह जमीन पर बिखरता, धुंए के निशान फर्श पर दिखाई देते । उन्‍हें उल्‍लू का पट्टा कहूं तो वह पूछ सकते हैं, क्‍या यही मुहावरा बचा रह गया था मुझसे संवाद के लिए, इसलिए मन में जो आए, इसे कह नहीं सकता, फिर भी उस सज्‍जन से पूछ तो सकता ही था या कोई चीज जला कर दिखा तो सकता ही था कि धुंए की कालिमा केवल ऊपर ही दिखाई देती है। रेलविभाग लालू के अधीन था, उनके द्वारा नियुक्‍त आयोग ने या पता नहीं वह आयोग था या कुछ और, इस उम्र में याद तो सही रहती नहीं, पर उसने कहा, अपने को जलाने के लिए आग उन यात्रियों ने खुद लगाई थी।”
यदि इतनी अनर्गल बातों को, जिनका सच लंबे समय बाद चला, सच का पर्याय बनाया जा सकता है तो क्‍या यह नहीं कहा जा सकता कि गोधरा कांड और गुजरात का दंगा कांग्रेस ने अपनी बदहवासी में कराया था और केन्‍द्र में अपने शासन के कारण उसका अभियोग भाजपा, और उसके ओजस्‍वी नेता के ऊपर लगा दिया था। कहा तो जा सकता है, पर मैं ऐसा कह नहीं सकता, क्‍योंकि मैं जानता हूं गोधरा न भाजपा की योजना का परिणाम था न कांग्रेस या साझी सरकार का। वह नये नये मुख्‍यमंत्री बने, कुछ करके दिखाने को आतुर, प्रशासनिक अनुभव से शून्‍य नरेन्‍द्र मोदी की अयोध्‍या में साबरमती एक्‍सप्रेस से बाबरी ध्‍वंस की वार्षिकी पर अकारण ‘मन्दिर यहीं बनाएंगे’ का नारा लगाने वालों के नारों, यात्रापथ में उनके व्‍यवहार की परि‍णतियों का चक्र था, जिसके आरंभ के लिए मोदी की प्रशासनिक अयोग्‍यता को दोष दिया जा सकता है, उसकी नीयत को नहीं। यह चूक उससे बड़ी नहीं थी, जिसमें अर्जुन सिंह ने अयोध्‍या के लिए उससे पहले ट्रेन रिजर्व करके रामजन्‍मभूमि के विरोध में आन्‍दोलन करने वालों को भेजा था। हमारा नियंत्रण कुत्‍ते की जंजीर खोलने तक रहता है, खुल जाने के बाद, शिकार पर दांंत गड़ा देने के बाद नहीं रह जाता। अत: पहली चूक के लिए हम उन्‍हें दोष दे सकते हैं, बाद का घटनाक्रम ऐतिहासकि होता है जिसमें किसी एक का सोचनाृ, विचारना या रोकना कोई अर्थ नहीं रखता। इतिहास प्रेरित घटनाएं एक रेला की तरह होती हैं जिनके विरोध में खड़े हो कर हम स्‍वयं पिस तो सकते हैं, परन्‍तु उन्‍हें रोक नही सकते। लैंड स्‍लाइड की तरह।

जो लोग इसे नहीं समझते उन्‍हें अनिवार्य जनाक्रोश सरकार प्रायोजित लग सकता है और जहां सरकार की पुलिस आइएस के पैदा होने से पहले उसी तर्ज पर नौजवानों को हांक कर ले जा कर गोली से उड़ा देती है, जिसके फोटोग्राफ तक उपलब्‍ध हैं, उस दल को एक मात्र विकल्‍प मान कर तुम्‍हें सत्‍ता में रखना है, इसलिए उधर भूल कर भी न तुम्‍हारा ध्‍यान जाता है न उनका जिन्‍होंने यह दर्द झेला, पर तुम्‍हारे बार बार दुहरा कर पैदा की गई दहशत से बाहर नहीं निकल पाते। जो स्‍वत: हुआ उसके कारण उपस्थित हों तो वह पुन: हो सकता है, क्‍योंकि उसे आज तक दुनिया का कोई प्रशासक रोकने का उपाय करे तब तक भारी नुकसान हो चुका होता है। इसके लिए शासन बदलने की नहीं, जनशिक्षा की, लोगों की मानसिकता बदलने की जरूरत होती है। बौद्धिकों की भूमिका इसी क्षेत्र तक सीमित है- हमारी

Post – 2016-09-28

समझदारों के बीच एक सही विचार की तलाश- 4

[पिछली पोस्‍ट पर आई चार प्रतिक्रियाएं ऐसी थी जिनमें यह आशंका जताई गई थी कि मैं आलोचना में मोदी का पक्ष ले रहा हूं। उनका ध्‍यान जो लिखा गया था उस पर न था, जिसे खोज रहे थे और मिल नहीं रहा था उस पर था। उसी चीज से उन्‍हें खीझ हरे रही थी इसलिए जो लिखा था वह उनकी समझ में नहीं आ रहा था। वे मेरे पिछले पोस्‍टों से परिचित नहीं हैं अन्‍यथा मैं लिख चुका हूं कि एक ऐसे समय में जब समस्‍त बुद्धिजीवी ‘ साहित्‍यकार, पत्रकार, अध्‍यापक लगभग आ‍क्रामक तेवर अपना कर मोदी की भर्त्‍सना कर रहे थे, मैंने कहा था, मैं मोदी का वकील हूं क्‍योंकि लेखक सताए हुए का साथ देता है। यह एक चुनौती थी कि आप इतने सारे बुद्धिजीवी अकेले मेरा उत्‍तर दे सकें तो दें। मैंने तीखी शब्‍दावली में उनके इस अभियान की निन्‍दा की क्‍योंकि किसी को पता नहीं था कि वह क्‍या कर रहा है और क्‍यों कर रहा है। कई तरह की आकांक्षाएं और घबराहटें थी। अपने ही किए से डरे हुए थे। इसलिए यदि किसी का सबसे बड़ा आरोप यह है कि मैं मोदी का पक्ष लेता हूं तो यह सही न होते हुुए भी सही माना जाय तो मुझे आपत्ति न होगी। मैं जो कुछ मानता हूं उसका कारण और तर्क प्रस्‍तुत करता हूं। जो असहमत हैं वे अपने कारण और तर्क देते हुए अपना पक्ष रखें और जो मानते हैं वह सिद्ध करने का प्रयत्‍न करें, बहस तार्किक और बौद्धिक तो हो। अमुक का भक्‍त या अमुक का चेला, अमुक का माल अमुक का थैला, से आगे की भाषा जो नहीं जानते उनको मेरे नाम तक का पता नहीं। नाम का अर्थ होता है अब तक जो कुछ लिखा है उस पर आधारित पहचान। भ‍क्‍तों के पास तर्क नही होता, जो अपनी तर्कशुद्ध विचार रखता है वह दार्शनिक या विचारक होता है। अब से ही सही, इसेे हम एक बहस मान लें और मैं जो सिद्ध करता हूूं उसे असिद्ध करे। बौद्धिक गिरावट और तू तू मैं मैं भाषा में तो सुधार होगा।
एक ओर ऐसे बुद्धिजीवियों की जमात जो अपने को तर्कवादी मानती है और अभियोग और आक्षेप, आवेग और आवेश से आगे बढ़ नही पाती, और दूसरी ओर अकेले मैं आवेश को तार्किक प्रतिरोध में बदलना चाहता हूं, इसलिए नहीं कि मैं उनमें से किसी से अधिक सूचना या ज्ञान संपन्‍न हूं, अपितु इसलिए कि मैं सत्‍य और न्‍याय के पक्ष में हूं और मोदी का तब तक समर्थक हूं जब तक उनके कार्य, विचार या कथन मेरी अपेक्षा के अनुरूप है। मैं आज तक कभी हारा नहीं, क्‍योंकि मैं जीतना नहीं चाहता, समझना चाहता हूं। कहीं त्रुटि नजर आई, किसी दूसरे के दिखाने से हो या अपने ही पुनर्विचार से, तो अपनी मान्‍यता को बदल लेता हूं। दूसरे के सही सिद्ध होने से मुझे सही होने का अवसर मिलता है। अब मैं अपेक्षा करूंगा कि जिनसे भी संभव हो मेरी निर्ममता से आलोचना करें और जैसा मैं दुहराता रहता हूं, आयु और ज्ञान का ध्‍यान न रखते हुए। खेलत में को काको गुसैंया। हां, अपने को भोड़ा और वाहियात सिद्ध होने से, खुद अपनी ही नजर में गिरने से अवश्‍य बचाएं। मेरा उससे कुछ नहीं जाता, पर बहस का स्‍तर गिरता है, यह न होने दें। अाज की पोस्‍ट को मैं इसी विषय पर प्रश्‍नोत्‍तर के रूप में रखूंगा]
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– सारे के सारे बुद्धिजीवी जिसके विरोध में खड़े हों आखिर उसमें कुछ तो कमी होगी ।

– सारे के सारे बुद्धिजीवी यह तक न बता सकें कि उसमें कौन सी कमी है, तो वे बुद्धि से काम ले ही नहीं रहे हैं। आवेग से काम ले रहे है। वे भावाकुल है या शोकाकुल, पर शोक का कारण तक नहीं जानते क्‍योंकि कारण पर भी कभी गहराई से सोचा विचारा नहीं। यदि वे तार्किक होते तो उनका लेखन स्‍वयं यह सिद्ध करता, उनको अलग से कह कर बताने की जरूरत न होती। कभी कभी कारण ऐसे होते हैं, जिसके लिए मुहावरा है, चोर की मां अकेले में रोती है।

– तुम्‍हारा मतलब है कि वे बुद्धिजीवी नहीं हैं, नैतिक नहीं है । अकेले तुम हो जिसने बुद्धि और नैतिकता का इजारा ले रखा है।

– बुद्धि का इजारा नहीं होता, बुद्धिजीवियों का कारागार अवश्‍य हुआ करता है । वह कभी विचारधारा के रूप में आता है, कभी व्‍यभिचारधारा के रूप में जिसके लिए हिन्‍दी का मुहावरा बना है बहती गंगा में हाथ धोना। जिन्‍हें तुम समस्‍त बुद्धिजीवी कह रहे हो, वे समस्‍त बुद्धिजीवियों के बीच से कांग्रेस की वैतरणी में हाथ धोने वाले रहे है, या दिमाग को बंधक बना कर अपने साथ रखने वाली विचारधाराओं की कारा में बन्‍द बुद्धिजीवी रहे हैं जिन्‍हें सोचने से अधिक आंख मूंद कर मानना और कुछ चीजों से नफरत करना सिखाया गया है क्‍योंकि नफरत को ये कारगर हथियार मानते हैं।

– नफरत जिन चीजों से पैदा होती है, उनसे नफरत हो जाती है। इसके लिए सोच विचार की जरूरत नहीं पड़ती सोचना तुम्‍हें है कि सारे के सारे लोग किसी से नफरत क्‍यों करने लगते हैं।

– पहली बात यह कि तुम ‘सारे’ और ‘कुछ’ का भी मतल‍ब नहीं जानते। सारे नफरत करते हों अौर कोई ऐसे बहुमत से जीत कर आए और जिसकी स्‍वीकार्यता का ग्राफ लगातार कायम रहे, तो यह एक कमाल ही होगा। करिश्‍मा । यदि नहीं, तो मानना होगा, लगभग सारे लोग जिसके साथ हैं, उसके साथ बुद्धिजीवी नहीं रह सकते, क्‍योंकि उन्‍होंने अपने को दूसरों से कुछ उम्‍दा समझ कर उसकी फीस उगाहनी शुरु कर दी। सत्‍ता से उनका जुड़ाव हो गया और जनसाधारण से विमुख हो गए। जिस सत्‍ता से या सत्‍ता के जिन रूपों से उनका जुड़ाव हो गया था उसके पछाड़ खाकर गिरने के साथ वे भी पछाड़ खा कर गिर गए थे । जिसे तुम बुद्धिजीवियों के विरोध का स्‍वर मान रहे थे, वह उस गिरने से लगी चोट से फूटने वाली चीत्‍कार थी। आह थी, कराह थी और जिसे तुम रोज मोदी के मखौल के रूप में सुनते हो वह भी कराह का एक रूप ही है क्‍योंकि चेाट की पीड़ा मोदी की सफलताओं के साथ टीस में बदल जाती है, जिसको विफलता सिद्ध करने से उन्‍हें हल्‍की सेंक का सुकून महसूस होता है और दर्द से क्षणिक राहत मिलती है। मेरी संवेदना उनके साथ है और समर्थन मोदी के साथ ।

Post – 2016-09-27

समझदारों के बीच एक सही विचार की तलाश’ 3

क्या मोदी भारत हैं ?
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मोदी के चुनाव अभियान का एक स्थाई घटक था, ‘मोदी मोदी मोदी’ क अभिनन्दन नाद। इसने करतल ध्वनि का स्थान ले लिया था। स्थान कोई भी हो, समय कोई भी, लगभग आह्लादित भाव से ‘मोदी मोदी मोदी’ का गान इतना गगनभेदी हो गया था कि कर्णभेदी भी लगने लगा था। लगता था इसके पीछे एक योजना है और यह मोदी की लोकप्रियता को नहीं, उनके प्रबन्ध-कौशल का द्योतक है, जिसके पीछे कुछ घरानों का हाथ हो सकता है। इस जयकारे का अमेरिका मे प्रवेश, ब्रिटेन में इसकी आवृत्ति इस आशंका को उलझा देता था। बनारस में हर हर मोदी घर घर मोदी चालू हुआ था। आज संचार माध्यमों और सामाजिक माध्यमों पर उनके निन्दकों और प्रशंसकों द्वारा सभी चर्चाओं को मोदी केन्द्रित बना कर देखने का प्रबन्धन कौन कर रहा है, और इसके पीछे कौन हैं, यह जानना हमारे हित में होगा। इसका उत्तर कोई दे तो धुन्ध कुछ छंटे ।

एक समय था कांग्रेस के तत्समय अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने नारा दिया था ‘इन्दिरा इज इंडिया।’ यह आपात काल का नारा था। आज आप भारत विषयक समस्त चर्चाओं को मोदी से जोड़ रहे हैं। क्या इन्द्रा गांधी का वह सपना जो अपने अध्यक्ष के माध्यम से यह नारा देकर पूरा करना चाहती थीं, कर नहीं सकीं, उस सपने को आप सभी ने मिल कर मोदी के बारे में सही साबित नही कर दिया? मोदी को हर जबां पर मोदी, हर बयां में मोदी ।

अधिकांश लोग कहेंगे कि हम तो निन्दा कर रहे हैं, हम कैसे मोदी का हित साध सकते हैं ? हम तो उनकी परंपरा में आते हैं जिन्होंने मोदी को अमेरिका का वीजा देने का विरोध किया था।

तुलसी की एक चौपाई है ‘उल्टा नाम जपत जग जाना, बा‍ल्मीकि भये ब्रह्म समाना।’ हम उल्टा नामजाप करने वालों को ‘भये मोदी समाना’ कह सकते हैं क्या? यह उन्हीं से पूछना होगा। कारण लगातार मोदी को चर्चा के केन्द्र में रखते हुए वे दूसरी सभी समस्याओं, दूसरे सभी दलों और नेताओं और दूसरे सरोकारों को सबकी आंखों से ओझल कर देते हैं। मोदी को मिटाने के चक्कर में ऐसे लोग उन विकल्पों को भी ओझल करने में लगे हैं जिनका बना रहना जरूरी है। यह विकल्प कांग्रेस नहीं बन सकती। दूसरे बहुविधि और बहुधा बदनाम दल भी नहीं बन सकते। अपनी तनी रीढ़ को झुकाने के बाद नीतीश भी उसके योग्य नहीं रह गए। मुलायम सिंह इसी आशा में सूबेदारी छोड़ कर खाली हो गए थे और अब अपने ही बेटे से लड़ नहीं पा रहे हैं। वाम विकल्प बन सकता था, पर वह कांग्रेस के पीछे खड़ा हो गया, जिसका जहाज डूबने से वह निर्वात पैदा हुआ था, जिसे भरने के लिए लोगों ने मोदी को चुन लिया। जहाज डुबेगा तो वाम भी डूबेगा। हम एक वैकल्पिक शून्य के दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी चर्चा मैंने कभी किसी विश्लेषण में देखी ही नहीं, क्योंंकि आप अपनी समझदारी में मोदी को नष्ट करने के चक्कर में, उन्हें मजबूत कर रहे हैं और नष्ट उन्हें कर रहे हैं जिनके सारे पाप भूल कर उनमें से किसी के भी गुन गाने लगते हैं।

”मोदी इज इंडिया में यदि कोई कमी रह गई हो और ऐसा लग रहा हो कि मैं कुछ खींचतान कर रहा हूं, तो याद करें कि मोदी के टुकड़े-टुकड़े करने के पागलपन में आप भारत तेरे टुकड़े होंगे गाने लगते हैं और टुकडे करने वालो का इस हद तक साथ देते हैं कि आतंकवादियों से आप के हाथ मिल जाते हैं। यह जान लेने के बाद भी कि इशरत जहां आतंकवादी थी आप उसे बचाने के लिए अपने बयान तक बदल लेते हैं,या बयान बदलने वालों की अनदेखी कर देते हैं, आतंकवादियों को दंडित करने से कतराते हैं, उनको दंडित करने के बाद उनके समर्थकों की भीड़ के साथ खड़े हो जाते हैं।

इस मोदी से जिसे आपने इंडिया या भारत का पर्याय बनाया है, उसके एक व्यक्ति से देश बन जाने की विडंबना से मुझे डर लगता है ।
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छप्पन इंच का सीना

इस इबारत को दुहरा कर समय बेसमय हास्य, पैदा करने वालों में ऐसे समझदारों की संख्या कितनी है जो यह नहीं जानते कि शब्द, का अर्थ सन्दर्भ-सापेक्ष्य होता है। खसमाखाणी कहने वाली सहेली लाड़ प्रकट करती है परन्तु यही वाक्य वह उसके विवाहिता हो जाने के बाद कहे तो वह उसका झोंटा पकड़ कर घुमा देगी।

कितने लोगों को यह पता नहीं है कि यह मुहावरा मोदी ने उत्तर प्रदेश में बिजली न पहुंच पाने और बेरोजगारी बढ़ने के सन्दर्भ में कही थी और इसके लिए इतने चौड़े सीने की बात यह दावा करने के लिए कही थी कि विकास के लिए त्याग, ईमानदारी, कार्यनिष्ठा और दृढ़ता की आवश्यककता होती, जो मुझमें है। ऐसा चौड़ा सीना, यह उदार भाव, सैफई महोत्सव मनाने वाले, अपने कार्यकाल में अपनी आय सौगुनी हजारगुनी बढ़ाने वाले, अपने दल को अपनी खानदानी जागीर बनाने वाले, अपराधियों और भ्रष्टा्चारियों के माध्यम से राष्ट्रीय संपदा का दोहन करने वाले नहीं रखते, न उनका जिगरा इतना बड़ा हो सकता है। क्‍या मोदी ने गलत कहा था। हो सकता है अर्थ करने में मुझसे चूक हो रही हो। ऐसा है तो मेरा मार्गदर्शन करें, नहीं है तो आत्मनिरीक्षण करें कि आप का सीना कितना चौड़ा है। बेवकूफों की भीड़ में छप्पन-इंच-छप्पन-इंच की फब्तियों से आप तालियां बजवा और ‘खूब कही’ लिखवा सकते हैं, पर भाषा की समझ रखने वालों के सामने आप स्वयं अपना उपहास करते दिखाई देते हैं । ऐसी फिकरेबाजियों से मोदी का कुछ नहीं बिगड़ता, आप का और गंभीर मसलों का अहित अवश्य होता है।

व्यक्तिगत रूप में मुझे मोदी की वक्तृता शैली अच्छी नहीं लगती। अपरिष्कृत लगती है और उनके पद के गरिमा के अनुरूप नहीं लगती। परन्तु यही इस बात को भी सिद्ध करती है कि वह बहुत साधारण स्थिति से अपनी असाधारणता के बल पर विरोधों के बीच से ऊपर उठ कर आया हुआ एक बड़ा नेता है। संस्कारों से मुक्त हो पाना कठिन है, सुनते हैं माओ मां बहन की गालियां भी दे बैठते थे और विश्वविजय का स्वप्न देखने वाला नैपोलियन पूंजीपतियों से खम खाता था। कुछ अयोग्यताएं बड़ों बड़ों में हो तो उन्‍हें भी क्षम्य माना जा सकता है। मोदी की जगह तय कीजिए। वह तो झाडू लेकर सड़क पर भी खड़ा मिल सकता है और आप उसे फेंकू कह कर फेंक भी सकते हैं, परन्‍तु यह भूल सकते हैं कि आप की नासमझी उसकी जड़ों को खूराक देती है। आज भी उसकी लोकप्रियता की दर अस्‍सी प्रतिशत है, ऐसा किसी सर्वे में पढ़ा था।
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क्रमश:

Post – 2016-09-27

बीते कल 04:36 अपराह्न बजे ·

बाद्धिक विकलांगता अौर वस्‍तुसत्‍य
हम जानते हैं कि रतौंधी से ग्रस्‍त व्‍यक्ति को धुंधलका होते ही दीखना बन्‍द हो जाता है, वर्णान्‍ध व्‍यक्ति को कुछ रंग नहीं दीखते, परन्‍तु हम इस विषय में सचेत नहीं होते कि कुछ दशाओं में प्रखर बुद्धिवालों को भी कुछ बातें समझ में नहीं आतीं, या कुछ बातों को सुनने समझने से उसे घबराहट होती है। इसलिए नशाखोर को नशे की लत से होने वाली क्षति की बात करे तो वह छूट कर भागना चाहेगा। उर्दू कविता में नासेह या नसीहत देने वाले को ले कर बहुत तंज कसे गए हैं, यद्यपि वह तन्‍ज इस बहाने कठमुल्‍लेपन पर भी तंज हुआ करता है।
एक स्थिति होती है जिसमें अच्‍छी चीज बुरी और बुरी चीज अच्‍छी दिखाई देने लगती है। इसके चलते एक जमाना था जब ईसाई कठमुल्‍लों को सोचने विचारने वाले या अनुसंधान करने और नए सत्‍य उजागर करने वाले शैतान नजर आते थे और इस शैतान की कल्‍पना सामी पुराण में शैतान या सांप के रूप में की जिसे देखते ही खत्‍म न किया गया तो वह खुराफात करेगा और ईसाइयों ने न जाने कितने विद्वानों को मौत के घाट उतार दिया और मूर्खों का महिमा मंडन करते रहे, असंख्‍य सुन्‍दरियों काे मनमोहिनियां या एनचैंट्रेस कह कर जिन्‍दा जला दिया। यह सोच शताब्दियों तक यूरोप में हावी रही और इसके विरुद्ध आवाज उठाने वाले दिखाई ही नहीं देते । इसलिए यदि किसी दौर में किसी कारण से ऐसे लोगोंका बाहुल्‍य हो जाय, चारों ओर से उनकी ही आवाजें आने लगें तो यह नहीं समझना चाहिए कि जब इतने सारे लोग कुछ मानते हैं, तो वह सही ही होगा। ऐसा भी हो सकता है कि किन्‍हीं रहस्‍यमय कारणों से देश के देश शताब्दियों तक बौद्धिक विकलांगता का शिकार बने रहें और उनको इससे बाहर लाने का प्रयास करने वालों को इतना लांछित कर दिया जाय कि न केवल उनकी बात अनसुनी रह जाय, अपितु उन पर होने वाले अन्‍याय, उपहास का पूरा समाज गर्व से समर्थन करता रहे।
इसकी परीक्षा कठिन नही है कि आप सचमुच ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं या नहीं। आप देखिए विचार सत्‍ता पर अधिकार रखने वाले तर्क की भाषा में बात करते हैं या आरोप और अभियोग की भाषा में। वे वस्‍तुसत्‍य को देख पाते हैं या किन्‍हीं विचारधाराओं, विश्‍वासों के मंत्रोपचार से केवल उतना ही देख पाते हैं जिसकी उसमें अनुमति दी गई है, शेष को देखने समझने की जरूरत नहीं समझते, या दिखाने पर देख नहीं पाते और जिसे दिखाना चाहते हैं उसके विषय में भी तर्कसंगक ढंग से गुणदोषपकरक विचार नहीं कर पाते। यदि हम चाहते हैं कि इस मानसिक विकलांगता से समाज को मुक्‍त किया जाय जो हमारे बौद्धिक उत्‍थान और आत्‍मावलंबन के लिए जरूरी है तो इसे समझना होगा और इससे लड़ना होगा। लड़ने का औजार भी तर्क और विचार ही हो सकता है, हथियार नहीं।
विचार हथियार से अधिक ताकतवर होता है, क्‍योंकि यही असंख्‍य लोगों को हथियार उठाने काेे भी प्रेरित करता है और प्रतिरोध के दूसरे रूपों को भी उभारता है, इसलिए तानाशाह सबसे पहले निडर विचारकों का सफाया करता है, तानाशाही का समर्थन करने वाले अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता को प्रतिब‍न्धित करते हैं, और इसके दमन के लिए हथियारों और निर्वासन या बहिष्‍कार तथा उपेक्षा द्वारा उत्‍पीडित करते हैं।
विचारशून्‍यता में भी कुछ इबारतों काेे बदल बदल कर दुहराया जाता है जिनसे वैचारिकता का भ्रम पैदा होता है पर कारण या तर्क नहीं प्रस्‍तुत किए जाते और वे इबारते भी लांछन का विस्‍तार होती हैं।
इस स्थिति का सामना करने के लिए किसी भीड़ की आवश्‍यकता नहीं होती। अकेला चिन्‍तक ही आधारहीन आक्षेपों, विश्‍वासाें और मान्‍यताओं का खंडन कर सकता है और उसके बाद पहले की उससे अनमेल मान्‍यताएं और विश्‍वास सभी को बदलना होता है। विज्ञान में यही होता है, समाजविज्ञान में उसके विरोध में भीड़ को खड़ा कर दिया जाता है और मुख्‍यधारा और उससे असहमत धारा के रूप में उसे पेश करते हुए घटाटोप तैयार किया जाता है, पर तर्क और प्रमाण वहां भी गायब होते हैं या लचर।

Post – 2016-09-26

बाद्धिक विकलांगता अौर वस्‍तुसत्‍य

हम जानते हैं कि रतौंधी से ग्रस्‍त व्‍यक्ति को धुंधलका होते ही दीखना बन्‍द हो जाता है, वर्णान्‍ध व्‍यक्ति को कुछ रंग नहीं दीखते, परन्‍तु हम इस विषय में सचेत नहीं होते कि कुछ दशाओं में प्रखर बुद्धिवालों को भी कुछ बातें समझ में नहीं आतीं, या कुछ बातों को सुनने समझने से उसे घबराहट होती है। इसलिए नशाखोर को नशे की लत से होने वाली क्षति की बात करे तो वह छूट कर भागना चाहेगा। उर्दू कविता में नासेह या नसीहत देने वाले को ले कर बहुत तंज कसे गए हैं, यद्यपि वह तन्‍ज इस बहाने कठमुल्‍लेपन पर भी तंज हुआ करता है।
एक स्थिति होती है जिसमें अच्‍छी चीज बुरी और बुरी चीज अच्‍छी दिखाई देने लगती है। इसके चलते एक जमाना था जब ईसाई कठमुल्‍लों को सोचने विचारने वाले या अनुसंधान करने और नए सत्‍य उजागर करने वाले शैतान नजर आते थे और इस शैतान की कल्‍पना सामी पुराण में शैतान या सांप के रूप में की जिसे देखते ही खत्‍म न किया गया तो वह खुराफात करेगा और ईसाइयों ने न जाने कितने विद्वानों को मौत के घाट उतार दिया और मूर्खों का महिमा मंडन करते रहे, असंख्‍य सुन्‍दरियों काे मनमोहिनियां या एनचैंट्रेस कह कर जिन्‍दा जला दिया। यह सोच शताब्दियों तक यूरोप में हावी रही और इसके विरुद्ध आवाज उठाने वाले दिखाई ही नहीं देते । इसलिए यदि किसी दौर में किसी कारण से ऐसे लोगोंका बाहुल्‍य हो जाय, चारों ओर से उनकी ही आवाजें आने लगें तो यह नहीं समझना चाहिए कि जब इतने सारे लोग कुछ मानते हैं, तो वह सही ही होगा। ऐसा भी हो सकता है कि किन्‍हीं रहस्‍यमय कारणों से देश के देश शताब्दियों तक बौद्धिक विकलांगता का शिकार बने रहें और उनको इससे बाहर लाने का प्रयास करने वालों को इतना लांछित कर दिया जाय कि न केवल उनकी बात अनसुनी रह जाय, अपितु उन पर होने वाले अन्‍याय, उपहास का पूरा समाज गर्व से समर्थन करता रहे।

इसकी परीक्षा कठिन नही है कि आप सचमुच ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं या नहीं। आप देखिए विचार सत्‍ता पर अधिकार रखने वाले तर्क की भाषा में बात करते हैं या आरोप और अभियोग की भाषा में। वे वस्‍तुसत्‍य को देख पाते हैं या किन्‍हीं विचारधाराओं, विश्‍वासों के मंत्रोपचार से केवल उतना ही देख पाते हैं जिसकी उसमें अनुमति दी गई है, शेष को देखने समझने की जरूरत नहीं समझते, या दिखाने पर देख नहीं पाते और जिसे दिखाना चाहते हैं उसके विषय में भी तर्कसंगक ढंग से गुणदोषपकरक विचार नहीं कर पाते। यदि हम चाहते हैं कि इस मानसिक विकलांगता से समाज को मुक्‍त किया जाय जो हमारे बौद्धिक उत्‍थान और आत्‍मावलंबन के लिए जरूरी है तो इसे समझना होगा और इससे लड़ना होगा। लड़ने का औजार भी तर्क और विचार ही हो सकता है, हथियार नहीं।
विचार हथियार से अधिक ताकतवर होता है, क्‍योंकि यही असंख्‍य लोगों को हथियार उठाने काेे भी प्रेरित करता है और प्रतिरोध के दूसरे रूपों को भी उभारता है, इसलिए तानाशाह सबसे पहले निडर विचारकों का सफाया करता है, तानाशाही का समर्थन करने वाले अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता को प्रतिब‍न्धित करते हैं, और इसके दमन के लिए हथियारों और निर्वासन या बहिष्‍कार तथा उपेक्षा द्वारा उत्‍पीडित करते हैं।
विचारशून्‍यता में भी कुछ इबारतों काेे बदल बदल कर दुहराया जाता है जिनसे वैचारिकता का भ्रम पैदा होता है पर कारण या तर्क नहीं प्रस्‍तुत किए जाते और वे इबारते भी लांछन का विस्‍तार होती हैं।
इस स्थिति का सामना करने के लिए किसी भीड़ की आवश्‍यकता नहीं होती। अकेला चिन्‍तक ही आधारहीन आक्षेपों, विश्‍वासाें और मान्‍यताओं का खंडन कर सकता है और उसके बाद पहले की उससे अनमेल मान्‍यताएं और विश्‍वास सभी को बदलना होता है। विज्ञान में यही होता है, समाजविज्ञान में उसके विरोध में भीड़ को खड़ा कर दिया जाता है और मुख्‍यधारा और उससे असहमत धारा के रूप में उसे पेश करते हुए घटाटोप तैयार किया जाता है, पर तर्क और प्रमाण वहां भी गायब होते हैं या लचर।

Post – 2016-09-25

कुछ नसीहत उन्‍हें भी दे नासेह
जो नहीं जानते हुआ क्‍या है ।
बददुआ को दुआ समझते हैं
यह नहीं जानते दुआ क्‍या है ।
क्‍यों कहें, क्‍या कहें, समझ ही नहीं
चुप रहें कब, इसे सीखा ही नही
मानते खुद को जमाने का खुदा
पूछते हैं कि माजरा क्‍या है ।
पूछो भगवान से उसको वजह पता होगी
पता न हो तो पता करके बताए तो सही
पढ़े लिखों का सर फिरता हैं कैसे हंसते हुए
हया का मोल दिखाता ये बेहया क्‍या है ।

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भगवान मुझे देख कर डरता है देखिए
कहता हूं सामने आ पर आ कर नहीं देता ।

Post – 2016-09-25

समझदारों के बीच एक सही विचार की तलाश’

[परन्‍तु ओम थानवी जी की एक पोस्‍ट***
मैं इस पर टिप्‍पणी करने से अधिक उचित अपनी वाल पर एक पोस्‍ट लिखना समझता हूं, ‘समझदारों के बीच’। बहस जैसे भी छिड़ी, बहुत उत्‍तेजक रही, यह इस पर आई प्रतिक्रियाओं से प्रकट है। यह जारी रहनी चाहिए और संयत भाषा में जारी रहनी चाहिए, हुड़दंग के बीच समझ की जरूरत बढ़ जाती है। जिन्‍हें थानवी जी के लेख और अपनी टिप्‍पणियों का मूल्‍यांकन देखना हो वे आज की मेरी पोस्‍ट देखें और सहमति असहमति तर्क और प्रमाण के साथ दें। हां, पोस्ट लंबी होती है, बोर भी कर सकती है इसलिए जो इसे देख कर घबरा उठें वे ‘पढ़ न सका’ या ‘बोर हो गया’ भी लिख सकते हैं।]
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मैं अाज अपने कल की पोस्‍ट का किसी तकनीकी चूक से उड़ गया अंश प्रस्‍तुत करना चाहता था। परन्‍तु ओम थानवी जी की एक पोस्‍ट पर जो नरेन्‍द्र मोदी के कल के वक्‍तव्‍य पर थी, आई टिप्‍पणियों से बहुत प्रभावित हुआ। प्रभावित होने के पीछे तीन कारण थे, पहला तो बौद्धिक जगत में अाज की स्थितियों से पैदा व्‍याकुलता, दूसरे यह तथ्‍य कि इस पर सकारात्‍मक और नकारात्‍मक विचार व्‍यक्‍त करने वालों की नजर से कुछ बातों का ओझल हो जाना, और तीसरे वह जड़ता जिसमें किन्‍हीं कारणों से कुछ आशंकाएं दहशत या फोबिया का रूप ले लेती हैं और इसलिए हो कुछ भी आप की घृणा या आशंका मन से जाती ही नहीं, अर्थात् आपका दिमाग उस खास संदर्भ में भीतरी गांठ या निक्रियता का शिकार हो जाता है, जिसे हम दूसरे शब्‍दों में कहें तो पार्टली मेंटली डेड कह सकते हैं। इसलिए जरूरी नहीं कि हम किसी व्‍यक्ति या संगठन के तात्‍कालिक बयानों को उसकी अन्‍तरात्‍मा की आवाज मान कर उस पर पूरी तरह विश्‍वास कर लें, अपितु यह कि हम तथ्‍यों और प्रमाणों के साथ अपनेे दृष्टिकोण को प्रस्‍तुत करते हुुए उन लोगों को भी सचेत करें जो एक बार के बयान के कारण किसी भुलावे में आ गए हैं।
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सबसे पहले मैं यह स्‍पष्‍ट कर दूं कि संघ से जिससे नरेन्‍द्र मोदी निकले हैं, मेरी राय अच्‍छी नहीं रही है। मरी राय किसी भी संकीर्ण सोच वाले दल या संगठन के बारे में, जिसमें मुस्लिम लीग, सिम्‍मी, जैसे माेहम्‍मद, हिन्‍दू महासभा, शिवसेना, मनसे, बजरंगदल के बारे में अच्‍छी नहीं रही है न आज है न कल हो सकती है । परन्‍तु मैं इनसे जुड़े लोगों, इनकी मान्‍यताओ, विचारों से घृणा नहीं करता। घृणा करने का अर्थ है आवेग का प्रबल हो जाना और बुद्धि का सुन्‍न हो जाना। इससे घृणा और घृणा पैदा करने और इन पर पलने वाले व्‍यक्तियों, संगठनों, विचारधाराओं और विश्‍वासधाराओं को फूलने, फलने, फैलने और बढने का मौका मिलता है और हमारी समग्र सामाजिक प्रतिरोध क्षमता उसी अनुपात में कम होती जाती है।

उपाय एक ही है कि इन्‍हें व्‍याधि या विकृति मानना और इस बात की व्‍याख्‍या करना कि इसका कारण क्‍या है, यह फैला किन कारणों से है, और इसका निराकरण कैसे किया जा सकता है। यदि नष्‍ट करना है तो मच्‍छर को, मच्‍छर काटने से बीमार को नहीं। जहां बीमारियों का वायरस इतिहास में हो, वह बहुत धैर्य और अनासक्‍त पर अविरक्‍त भाव से उसके कारकों, कारणों और परिणामों को समझना होगा। जहां इसके वायरस हमारे विश्‍वास या मत-मतान्‍तर में हैं, वहां हमें उनकी मीमांसा करते हुए उनको आधुनिक जीवन, ज्ञान और विज्ञान के अनुरूप बनाना होगा। जहां ऐसा केवल अपने निजी या अपने राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है वहां हमें राजनीतिक नेतृत्‍व के खतरों से जन साधारण को अवगत कराते हुए उन्‍हें उससे बाहर लाने और स्‍वयं बाहर आने का प्रयत्‍न करना होगा।

जहां अपनी जाति, समुदाय के व्‍यापक हित में स्‍वयं भी बलिदान और त्‍याग करते हुए किसी ने ऐसा निर्णय लिया जिसके दूरगामी परिणाम अहितकर रहे वहां उन महापुरुषों के प्रति आदर रखते हुए भी यह स्‍वीकार करना होगा कि वे उस मामले में गुमराह थे और उनसे हुई गलतियों से बाहर आना होगा। यह मेरी अपनी समझ है और इसी के अनुसार मैं अपनी राय बनाता और उस पर तक तक दृढ़ रहता हूं जब तक कोई ऐसे तथ्‍य, साक्ष्‍य या तर्क देते हुए मेरे मत का खंडन न कर दे ।
*****

मैंने जिस आहत मानसिकता की चर्चा ऊपर की है उससे हमारे समाज के नब्‍बे प्रतिशत लोग ग्रस्‍त हैं इसका पता मुझे फेब बुक पर, फुर्सत होने पर, लोगों की प्रतिक्रियाओं, उनकी भाषा, उनके विचारो की अपरिवर्तनीयता को देखते हुए चला। जाति, धर्म, और विचारधारा को ले कर इतने दो फांक कि जिससेे अनुकूलन है उसकी मूर्खतापूर्ण या काापटिक उक्तियों का भी आंख मूद कर, उसके छद्म को जानते हुए भी ‘क्‍या खूब कही, क्‍या खूब कही’ करने लगें, और उसकी तार्किक आलोचना से भी खिन्‍न हो उठें, और जिससे मन उचटा हुआ है उसका आभास मिलते ही या तो आगे बढ़ जायं, या चुप लगा जायं, और उसमें दिए गए तथ्‍यों या प्रमाणों से क्षुब्‍ध हो जायं । यह विभाजन है, यह तो जानता था, पर इतने बड़े पैमाने पर है यह फेसबुक पर आ कर ही समझ पाया।

जब विचार इतने बंटे हुए हो तो किसी गहन सोच या विश्‍लेषण की जरूरत नहीं, फिकरेबाजी से भी काम चल जाता है और हमारे देश और समाज के लिए गंभीर और हमारे वर्तमान और भविष्‍य को प्रभावित करने वाले गंभीर मसलों पर चुटकुलेदार टिप्‍पणियों के माध्‍यम से बहुत सारे लोगों का समर्थन तो जुटा सकते हैं, परन्‍तु अपने और उनके समय को क्षय करते हुए, एक दुर्लभ मंच को व्‍यर्थ कर सकते हैं। हमारा बौद्धिक स्‍तर बहुत उथला हो चला है और उस उथलेपन में ही प्रसन्‍न और तुष्‍ट रह कर हम अपने साथ भी अन्‍याय करते हैं क्‍योंकि हम उसी व्‍याधि को अपनी ओर से भी बढ़ाते हैं जिसे मैंने आहत मानसिकता कहा है। जरूरी है यह समझना कि यह कैसे पैदा हुई, कैसे दिलों को उस तरह फाड़ने में सफल हुई जैसा यह दिखाई दे रहा है और यह समझने की भी जरूरत है कि आज के दिन यह काम कौन कर रहा है या उसकी चाल को न समझ पाने के कारण कौन कौन इसमें शामिल हैं और अपने सीमित दायरे में ही सही क्‍या हम इस विच्छिन्‍नता को दूर या कम कर सकते हैं। यह विवेचन फिकरों में नहीं किया जा सकता। यह एक न्‍याय विचार है और आप जानते हैं फतवे और आदेश तो एक वाक्‍य में दिए जा सकते हैं, फिकरे एक वाक्‍य में किए जा सकते हैं, परन्‍तु न्‍यायविचार कुछ समय लेता है और उसे फतवे की भाषा में नहीं लिखा जा सकता। न्‍याय का सार अवश्‍य एक वाक्‍य में दिया जा सकता है। वह वाक्‍य जिस ऊहापोह के बाद किया कया है इसे लिपि‍बद्ध करने में कई दस्‍ते कागज लग जाते हैं। मेरी पोस्‍टों के लंबा हो जाने का भी यह एक कारण है और यदि मैं अपना मन्‍तव्‍य आज भी कतिपय सीमाओं को ध्‍यान में रख कर न पूरा कर सकूं तो जिन्‍हें लगे कि यह एक जरूरी और उपयोगी प्रयास है उन्‍हें आगे भी मेरे साथ रहना होगा।
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हमारे समाज में बहुरूपता अनादि काल से है। हितों का टकराव भी। खंड के भीतर भी कई तरह के खंड। परन्‍तु दिल उस तरह न फटा था जिसकी योजना बहुत दूरदर्शिता से उपनिवेशी शासकों ने बनाई और उसका सफलतापूर्वक कार्यान्‍वयन भी कर दिया। यह था बांटो और राज करो की नीति। नीति भारतीय है और सबसे पुराना नमूना बुद्ध के उस उत्‍तर में था कि जब तक लिच्‍छवियों में एकता है तब तक उन्‍हें कोई परास्‍त नहीं कर सकता जिसके बाद का इतिहास हमें मालूम है।

बांटो और राज करो का प्रयोग शत्रु के प्रति किया जाता रहा है, अपने ही देश या समाज के भीतर नहीं। अंग्रेजों ने ऐसा किया तो मैं उनकी चतुराई का सम्‍मान करता हूं और जितने धैर्य से किया वह जिस परिपक्‍वता की मांग करता है वह हमारे राजनेताओं में आरंभ से ही नहीं दिखाई देता। परन्‍तु स्‍वतंत्र भारत में हमने उत्‍तराधिकार में उनकी भाषा और उनकी नीति भी अपना ली और उनका उपयोग अपने समाज के विरुद्ध करने लगे, यह सबसे दुर्भाग्‍यपूण है और उनकी समाजचिन्‍ता को सन्दिग्‍ध बनाता है कि उन्‍होंने अपने समाज को तरह तरह के वोट बैंकों में बांट दिया। यह दूसरी बात है कि यह काम भी शुद्ध भारतीय परंपरा के अनुसार ही आरंभ हुआ और पहला वोट बैंक नेहरू को पंडित नेहरू बनाते हुए, ब्राह्मणों का कायम हुआ – का नहि बाभन करि सकै, का न समुद्र समाय। वह ईसाई को भी ब्राह्मण बना सकता है, अब नये पंडित, राहुल गांधी है, और नई पंडितानी का नाम आप सुझाएं। हम समाज नहीं है, वोट बैंको के अदना खाते हैं जिनमें हमारे हिस्‍से में हमारा दुर्भाग्‍य जमा होता चला गया है। और इसे जमा करने वाला कौन रहा है इसका फैसला भी आप करें। सुना मोदी ने वोट बैेक बनने का विकल्‍प चालू बैंकों में असली खाता धारक बनने की व्‍यवस्‍था कर दी जिसमें से आपत विपत पर खाते से दुर्भाग्‍य नहीं दो लाख की सहायता राशि निकल सकती है। यह सच है या अफवाह, अपनी राय दें यह दुर्भाग्‍य जमा करने वाले खाते से धाता धारक में परिवर्तन उन सबके लिए अच्‍छे दिनों की शुरुआत है या बुरे दिनों की वापसी, इसका फैसला भी करें और यदि दिमाग सचमुज जवाब दे गया हो तो इन पंक्तियों के लेखक को मोदी भक्‍त कह कर गाली तो दे ही सकते हैं, क्‍योंकि सड़े दिमाग में पहुंचने पर विचार भी गालियों में बदल जाता है ।
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आगे जारी

Post – 2016-09-25

मुझे आज अपनी शृंखला से हट कर ओम थानवी की एक पोस्‍ट और उस पर आई प्रतिक्रियाओं से प्रभावित हो कर अपनी टिप्‍पणी देने की आवश्‍यकता अनुभव हुई। प्रतिक्रिया के रूप में लिखा कि आज की पोस्‍ट मैं इसी पर केन्द्रित करूँगा । वह लिखना शुरू ही किया कि मेरी चेतना में यह तथ्‍य कि कितने समय से कितने सारे लोग लगातार एक ही व्‍यक्ति के एक ही पक्ष को लेकर सोच, गढ़ और कह रहे हैं, और उससे बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं, दूसरा कुछ दिखाई ही नहीं पढ़ रहा है, दिखाई भी पड़ता है तो कितना धुंधला, कि अवचेतन ने एक मिसरा ठोक दिया

गौर से देखिए उस जुल्‍फे परेशां को मगर
यह भी तो जानिए खुद आप परेशान से हैं।

सोचा चलो इसकी भी खलिश पूरी हो गई कि कुछ देर बाद एक और

दीवाने के हर काम में दीवानगी मत ढूंढ़
कुछ ऐसा भी करे है, लोग याद करेंगे।

अब वह पोस्‍ट तो शाम तक आएगी, पर रचनाप्रकिया के इस दुहरे चरित्र को तो शेयर किया ही जा सकता है। चेतन कुछ सोच रहा है अवचेतन कुछ और, और दोनों के बीच एक ऐन्‍द्रजालिक रिश्‍ता।

Post – 2016-09-25

समझदारों के बीच एक सही विचार की तलाश’

मैं अाज अपने कल की पोस्‍ट का किसी तकनीकी चूक से उड़ गया अंश प्रस्‍तुत करना चाहता था। परन्‍तु ओम थानवी जी की एक पोस्‍ट पर जो नरेन्‍द्र मोदी के कल के वक्‍तव्‍य पर थी, आई टिप्‍पणियों से बहुत प्रभावित हुआ। प्रभावित होने के पीछे तीन कारण थे, पहला तो बौद्धिक जगत में अाज की स्थितियों से पैदा व्‍याकुलता, दूसरे यह तथ्‍य कि इस पर सकारात्‍मक और नकारात्‍मक विचार व्‍यक्‍त करने वालों की नजर से कुछ बातों का ओझल हो जाना, और तीसरे वह जड़ता जिसमें किन्‍हीं कारणों से कुछ आशंकाएं दहशत या फोबिया का रूप ले लेती हैं और इसलिए हो कुछ भी आप की घृणा या आशंका मन से जाती ही नहीं, अर्थात् आपका दिमाग उस खास संदर्भ में भीतरी गांठ या निक्रियता का शिकार हो जाता है, जिसे हम दूसरे शब्‍दों में कहें तो पार्टली मेंटली डेड कह सकते हैं। इसलिए जरूरी नहीं कि हम किसी व्‍यक्ति या संगठन के तात्‍कालिक बयानों को उसकी अन्‍तरात्‍मा की आवाज मान कर उस पर पूरी तरह विश्‍वास कर लें, अपितु यह कि हम तथ्‍यों और प्रमाणों के साथ अपनेे दृष्टिकोण को प्रस्‍तुत करते हुुए उन लोगों को भी सचेत करें जो एक बार के बयान के कारण किसी भुलावे में आ गए हैं।
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सबसे पहले मैं यह स्‍पष्‍ट कर दूं कि संघ से जिससे नरेन्‍द्र मोदी निकले हैं, मेरी राय अच्‍छी नहीं रही है। मरी राय किसी भी संकीर्ण सोच वाले दल या संगठन के बारे में, जिसमें मुस्लिम लीग, सिम्‍मी, जैसे माेहम्‍मद, हिन्‍दू महासभा, शिवसेना, मनसे, बजरंगदल के बारे में अच्‍छी नहीं रही है न आज है न कल हो सकती है । परन्‍तु मैं इनसे जुड़े लोगों, इनकी मान्‍यताओ, विचारों से घृणा नहीं करता। घृणा करने का अर्थ है आवेग का प्रबल हो जाना और बुद्धि का सुन्‍न हो जाना। इससे घृणा और घृणा पैदा करने और इन पर पलने वाले व्‍यक्तियों, संगठनों, विचारधाराओं और विश्‍वासधाराओं को फूलने, फलने, फैलने और बढने का मौका मिलता है और हमारी समग्र सामाजिक प्रतिरोध क्षमता उसी अनुपात में कम होती जाती है।

उपाय एक ही है कि इन्‍हें व्‍याधि या विकृति मानना और इस बात की व्‍याख्‍या करना कि इसका कारण क्‍या है, यह फैला किन कारणों से है, और इसका निराकरण कैसे किया जा सकता है। यदि नष्‍ट करना है तो मच्‍छर को, मच्‍छर काटने से बीमार को नहीं। जहां बीमारियों का वायरस इतिहास में हो, वह बहुत धैर्य और अनासक्‍त पर अविरक्‍त भाव से उसके कारकों, कारणों और परिणामों को समझना होगा। जहां इसके वायरस हमारे विश्‍वास या मत-मतान्‍तर में हैं, वहां हमें उनकी मीमांसा करते हुए उनको आधुनिक जीवन, ज्ञान और विज्ञान के अनुरूप बनाना होगा। जहां ऐसा केवल अपने निजी या अपने राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है वहां हमें राजनीतिक नेतृत्‍व के खतरों से जन साधारण को अवगत कराते हुए उन्‍हें उससे बाहर लाने और स्‍वयं बाहर आने का प्रयत्‍न करना होगा।

जहां अपनी जाति, समुदाय के व्‍यापक हित में स्‍वयं भी बलिदान और त्‍याग करते हुए किसी ने ऐसा निर्णय लिया जिसके दूरगामी परिणाम अहितकर रहे वहां उन महापुरुषों के प्रति आदर रखते हुए भी यह स्‍वीकार करना होगा कि वे उस मामले में गुमराह थे और उनसे हुई गलतियों से बाहर आना होगा। यह मेरी अपनी समझ है और इसी के अनुसार मैं अपनी राय बनाता और उस पर तक तक दृढ़ रहता हूं जब तक कोई ऐसे तथ्‍य, साक्ष्‍य या तर्क देते हुए मेरे मत का खंडन न कर दे ।
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मैंने जिस आहत मानसिकता की चर्चा ऊपर की है उससे हमारे समाज के नब्‍बे प्रतिशत लोग ग्रस्‍त हैं इसका पता मुझे फेब बुक पर, फुर्सत होने पर, लोगों की प्रतिक्रियाओं, उनकी भाषा, उनके विचारो की अपरिवर्तनीयता को देखते हुए चला। जाति, धर्म, और विचारधारा को ले कर इतने दो फांक कि जिससेे अनुकूलन है उसकी मूर्खतापूर्ण या काापटिक उक्तियों का भी आंख मूद कर, उसके छद्म को जानते हुए भी ‘क्‍या खूब कही, क्‍या खूब कही’ करने लगें, और उसकी तार्किक आलोचना से भी खिन्‍न हो उठें, और जिससे मन उचटा हुआ है उसका आभास मिलते ही या तो आगे बढ़ जायं, या चुप लगा जायं, और उसमें दिए गए तथ्‍यों या प्रमाणों से क्षुब्‍ध हो जायं । यह विभाजन है, यह तो जानता था, पर इतने बड़े पैमाने पर है यह फेसबुक पर आ कर ही समझ पाया।

जब विचार इतने बंटे हुए हो तो किसी गहन सोच या विश्‍लेषण की जरूरत नहीं, फिकरेबाजी से भी काम चल जाता है और हमारे देश और समाज के लिए गंभीर और हमारे वर्तमान और भविष्‍य को प्रभावित करने वाले गंभीर मसलों पर चुटकुलेदार टिप्‍पणियों के माध्‍यम से बहुत सारे लोगों का समर्थन तो जुटा सकते हैं, परन्‍तु अपने और उनके समय को क्षय करते हुए, एक दुर्लभ मंच को व्‍यर्थ कर सकते हैं। हमारा बौद्धिक स्‍तर बहुत उथला हो चला है और उस उथलेपन में ही प्रसन्‍न और तुष्‍ट रह कर हम अपने साथ भी अन्‍याय करते हैं क्‍योंकि हम उसी व्‍याधि को अपनी ओर से भी बढ़ाते हैं जिसे मैंने आहत मानसिकता कहा है। जरूरी है यह समझना कि यह कैसे पैदा हुई, कैसे दिलों को उस तरह फाड़ने में सफल हुई जैसा यह दिखाई दे रहा है और यह समझने की भी जरूरत है कि आज के दिन यह काम कौन कर रहा है या उसकी चाल को न समझ पाने के कारण कौन कौन इसमें शामिल हैं और अपने सीमित दायरे में ही सही क्‍या हम इस विच्छिन्‍नता को दूर या कम कर सकते हैं। यह विवेचन फिकरों में नहीं किया जा सकता। यह एक न्‍याय विचार है और आप जानते हैं फतवे और आदेश तो एक वाक्‍य में दिए जा सकते हैं, फिकरे एक वाक्‍य में किए जा सकते हैं, परन्‍तु न्‍यायविचार कुछ समय लेता है और उसे फतवे की भाषा में नहीं लिखा जा सकता। न्‍याय का सार अवश्‍य एक वाक्‍य में दिया जा सकता है। वह वाक्‍य जिस ऊहापोह के बाद किया कया है इसे लिपि‍बद्ध करने में कई दस्‍ते कागज लग जाते हैं। मेरी पोस्‍टों के लंबा हो जाने का भी यह एक कारण है और यदि मैं अपना मन्‍तव्‍य आज भी कतिपय सीमाओं को ध्‍यान में रख कर न पूरा कर सकूं तो जिन्‍हें लगे कि यह एक जरूरी और उपयोगी प्रयास है उन्‍हें आगे भी मेरे साथ रहना होगा।
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हमारे समाज में बहुरूपता अनादि काल से है। हितों का टकराव भी। खंड के भीतर भी कई तरह के खंड। परन्‍तु दिल उस तरह न फटा था जिसकी योजना बहुत दूरदर्शिता से उपनिवेशी शासकों ने बनाई और उसका सफलतापूर्वक कार्यान्‍वयन भी कर दिया। यह था बांटो और राज करो की नीति। नीति भारतीय है और सबसे पुराना नमूना बुद्ध के उस उत्‍तर में था कि जब तक लिच्‍छवियों में एकता है तब तक उन्‍हें कोई परास्‍त नहीं कर सकता जिसके बाद का इतिहास हमें मालूम है।

बांटो और राज करो का प्रयोग शत्रु के प्रति किया जाता रहा है, अपने ही देश या समाज के भीतर नहीं। अंग्रेजों ने ऐसा किया तो मैं उनकी चतुराई का सम्‍मान करता हूं और जितने धैर्य से किया वह जिस परिपक्‍वता की मांग करता है वह हमारे राजनेताओं में आरंभ से ही नहीं दिखाई देता। परन्‍तु स्‍वतंत्र भारत में हमने उत्‍तराधिकार में उनकी भाषा और उनकी नीति भी अपना ली और उनका उपयोग अपने समाज के विरुद्ध करने लगे, यह सबसे दुर्भाग्‍यपूण है और उनकी समाजचिन्‍ता को सन्दिग्‍ध बनाता है कि उन्‍होंने अपने समाज को तरह तरह के वोट बैंकों में बांट दिया। यह दूसरी बात है कि यह काम भी शुद्ध भारतीय परंपरा के अनुसार ही आरंभ हुआ और पहला वोट बैंक नेहरू को पंडित नेहरू बनाते हुए, ब्राह्मणों का कायम हुआ – का नहि बाभन करि सकै, का न समुद्र समाय। हम समाज नहीं है, वोट बैंको के अदना खाते हैं जिनमें हमारे हिस्‍से में हमारा दुर्भाग्‍य जमा होता चला गया है।
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