Post – 2016-08-23

निदान ‘ 28

गो ब्राह्मण प्रतिपालन

”डाक्‍साब, हम तो आपको इतना प्‍यार करते हैं कि आपके सामने अपना दिल खोल कर रख देते हैं और आप उसी में छुरी घुसा देते हैं।”

”प्‍यार का ही प्रमाण वह छुरी भी है जो आपकी शल्‍यक्रिया के लिए जरूरी है। यदि आप अपने ट्यूमर के साथ खुश हैं, डरते हैं कि इसे छेड़ा गया तो आपको असह्य पीड़ा होगी, तो भी आप की शल्‍यक्रिया आपके हित में है! सर्जन केवल यह कर सकता है कि वह आपको किसी शामक या पीड़ाहारी, इंजेशन देकर या क्‍लोरोफार्म सुंघा कर उस अवस्‍था में पहुँचाने के बाद छुरी हाथ में उठाए। क्‍या आपको नहीं लगा कि अन्तिम टिप्‍पणी से पहले का आ्ख्‍यान पीड़ाहारी उपचार ही था ?”

” पर पीड़ा तो इसके बाद भी हुई ही।” शास्‍त्री जी के स्‍वर में आक्रोश या अनुताप का भाव नहीं था, एक अपराधबोध था जिससे वह बचना चाहते थे।

”जहॉं तक छूरी का प्रश्‍न है, उसे तो शल्‍यचिकित्‍सक भी प्‍यार नहीं करता, उसे एक बार इस्‍तेमाल करने के बाद ही किनारे फेंक देता है। जरूरत हुई तो दूसरी छुरी उठाता है। यदि निर्वेद करने के उपाय के बाद भी, यह दिखाने समझाने के बाद भी कि देखो, इसी अतिरिक्‍त भावुकता के कारण इनकी यह दशा हुई, इनकी यह दशा हुई और तुम्‍हारी भी होगी। अपनी नियति से बचो, पछतावा बना रहता है तो व्‍याधि अधिक उग्र हो चली थी ।”

”आप भी अर्थव्‍यवस्‍था को इतना महत्‍व देते हैं । सिर्फ पैसे के लिए हम ऐसे जघन्‍य कृत्‍य करें जिसकी अनुमति अन्‍तरात्‍मा नहीं देती, इससे अच्‍छा तो मर जाना है। ऐसे शरीर की रक्षा करके क्‍या होगा जो रोटी के लिए आत्‍मा को ही बेच खाए। आपको पता है कितने हजार, या लाख लोगों ने मात्र सांस्‍कृतिक प्रतीकों की रक्षा के लिए प्राण गँवाए हैं। कितने लाख क्षत्रियों ने मरने की ठान कर पर झुकने से इन्‍कार करते हुए वीरगति प्राप्‍त की है और कितनी हजार क्षत्राणियों ने आत्‍मसम्‍मान की रक्षा के लिए जीते जी जौहर का वरण किया है। यदि आप अपना ही इतिहास भूल गए तो दूसरों को इतिहास की शिक्षा कैसे देंगे और वर्तमान संकट को कैसे समझ पाऍंगे ? आप तो स्‍वयं एक बार स्‍वीकार कर चुके हैं कि हिन्‍दू एक संकटग्रस्‍त समाज है । फिर …” शास्‍त्री जी विगलित हो गए । आगे कुछ कहा नहीं गया, लगा बोलेंगे तो अपने को सँभाल नहीं पाऍंगे।

वह इतने गहन आवेग में थे कि कुछ कहता तो भी सुन न पाते । चुप रहा। कुछ देर तक अवाक् । इस बीच उन्‍होंने अपने को सँभाला, कई बार तो जी में आता है, जब मरना ही है तो कुछ को मार कर मरूँ। ऐसी नपुंसक जिन्‍दगी से क्‍या।” अब उनके स्‍वर में रोष तो था परन्‍तु पराजय बोध भी था।”

”मैं इसी का दृष्टान्‍त तो राक्षसों के इतिहास काे दुहरा कर तो दे रहा था। उनकी भावना का सम्‍मान किया जाय तो वे इतने उदार, इतने सहृदय, मेधा में इतने प्रखर और अपने कौल के इतने पक्‍के थे जिसका उदाहरण इतिहास में कम मिलेगा। एक बार वचन हार जाने के बाद, यह जानते हुए कि उनके साथ छल किया जा रहा है, उन्‍होंने अपनी अधोगति का वरण तो किया पर वचन से पीछे नहीं हटे। वलि और वामन की कथा में यही तो है। इसी का दंड तो क्षत्रियों ने भी भोगा, प्राण दे देंगे लेकिन छल छदम से जीत कर अपने शौर्य का अपमान नहीं करेंगे।

मैंने एक बार कहा था कि जिन मूल्‍यों को हम सनातन मूल्‍य कहते हैं, और जिनके कारण हम हिन्‍दु समाज को विश्‍व सभ्‍यता में अग्रणी मानते हैं, मानते हैं कि आधुनिक भौतिकवादी, अतिउपभोगवादी और संहार के ब्रह्मास्‍त्रों से लैस संसार की रक्षा उन मूल्‍यों को समस्‍त मानवता का मूल्‍य बना कर ही संभव है, वे उन्‍हीं से तो आए हुए हैं।

उनकी जो दुर्गति हुई वह भी उनकी भावुकता का ही परिणाम थी। आज वे सबसे अरक्षित हैं और वनांचलों में चले जाइए वे अपने जीवनमूल्‍यों को कूड़ेदान में फेंक कर बिकने के लिए कतार लगाए खड़े हैं। उनकी कतार आप को दिखाई नहीं देगी। केवल बिके और अनबिके का फर्क दिखाई देगा, पर जो अनबिके हैं उनके मन में ‘अपने निजत्‍च की रक्षा करूँ या बिक जाऊँ’ का जो द्वन्‍द्व चल रहा है वह आपको नहीं दिखाई देगा। इस द्वन्‍द्व के अनुपात में ही वे अदृश्‍य कतार में आगे-पीछे खड़े दिखाई देते हैं और मैं जब कहता हूँ हिन्‍दू समाज संकटग्रस्‍त समाज है तो उसमें संकट का एक पक्ष इस से भी जुड़ा है। यह दुर्गति इसलिए कि उन्‍हीं पुरातन मूल्‍यों से चिपके रह जाने के कारण उन्‍होंने न तो सही समय पर अपने आर्थिक उन्‍नयन की दिशा में कदम नहीं बढ़ाया, न ही अपनी पुरानी ऊर्जा की रक्षा कर सके, आर्थिक पिछड़ेपन के कारण अरक्षणीय हो गए। समय रहते चेता होता तो उनकी दशा में भी सुधार हुआ होता और यह दिन न देखना होता। तभी उनके उन मूल्‍यों की भी रक्षा हो सकी होती। उनकी अपनी भी।

”प्र‍कृति से अतिसंवेदी भावुकतावश वे नये चरण की ओर बढ़ने वाले अपने ही समाज के लोगों को समझने में भूल की। नयी क्रान्तिकारी शक्ति की जीवन्‍तता को समझने में चूक की। सोचा इन मुट्ठीभर अपघातियों को खत्‍म करके अपने मूल्‍यों की रक्षा कर लेंगे। पर हुआ क्‍या
? उनकी संख्‍या बढ़ती गई, संगठन शक्ति बढ़ती गई, सामरिक शक्ति बढ़ती गई और इन सभी दृष्टियों से पिछड़ते गए। अन्‍तत: उन्‍हें उनकी सेवा में भी जुटना पड़ा, वे काम भी करने पड़े जिनसे वे बचना चाहते थे, वह अहंकार और स्‍वाभिमान भी खोना पड़ा जिसके चलते वे अपनी समकक्षता में देवों को कुछ समझते ही नहीं थे और उनमें से जो इसके बाद भी अपनी सीमा में बँधे सबसे असहाय, अरक्षित और दुर्गति की अवस्‍था में जीने पर अड़े रहे, वे अपने मूल्‍य मान सहित बिक रहे हैं और ईसाइयत की आड़ में विदेशी शक्तियों के संकेत पर अपने देश तक से विद्रोह करने के लिए तत्‍पर हो सकते हैं या हैं। उन्‍हें समझाया जाता है और वे मान लेते हैं कि वे हिन्‍दू समाज के अंग नहीं हैं, जब कि हिन्‍दू उन्‍हीं की मूल्‍यव्‍यवस्‍था की रक्षा के लिए प्रयत्‍नशील रहे हैं। वे अपने तक को भूल गए । वह ऊर्जा और सृजनशीलता भी खो दी जो उनसे अलग हो कर, तन्‍त्र से जुड़ जाने के कारण, अग्रणी समाज की सेवा में लगे उनके स्‍वजनों में बची रही।

दाे
”शास्‍त्री जी, रोटी को बहुत सरलीकृत न कीजिए । यह समस्‍त भौतिक प्रगति का प्रतीक है। अध्‍यात्‍म की बातें करने वाले बिना धेला खर्च किए अपना कारोबार जमाने के लिए नैतिक, बौद्धिक और आत्मिक दृष्टि से गिर हुए जो लोग करते हैं और अपने वैभव पर गर्व करते हैं वे स्‍वयं अध्‍यात्‍म की तुच्‍छता और कामदेव की महिमा का गान करते हुए ऑंख खोलते हैं और आप जैसे भक्‍तों की ऑंखें बन्‍द करने के प्रयत्‍न में लगे रहते हैं।

”मैंने कभी इन पाखंडियों की आलोचना आप से नहीं सुनी। सुविधाएँ आपके पास भी वे सारी हैं। मैं इन्‍हें छोड़ने की बात नहीं करता। अध्‍यात्‍म का आत्‍मराग गाने से पहले सचाई को ऑख खोल कर देखने का आग्रह कर रहा हूँ। ये पाखंडी लोग आपका काम नहीं कर रहे हैं। जो काम धर्मान्‍तरण कराने वाले ईसाई कर रहे हैं वही ये भी कर रहे हैं धार्मिकता और अन्‍धविश्‍वास को उत्‍तेजित करके अपने ही समाज को पीछे ले जाने का काम। यह अपनी अग्रता को सुनिश्चित करने वाले देशों की योजना का अंग है कि शेष जन उन सवालों से जूझते रहें जिनका अारंभ और अंत भावुकता के विस्‍तार, बौद्धिकता के ह्रास और पारस्‍परिक विघटन से होना है । इस सचाई को जानते नहीं और इसकी ओर ध्‍यान दिलाया जाय तो आप भी मानने को तैयार नहीं होंगे। बचाव के लिए तर्क तलाशेंगे और आप जैसे ज्ञानी के लिए यह कोई कठिन काम न होगा फिर भी मुझे समझाने से पहले अपने को समझाने के लिए इस पर सोचिएगा।”

”मैं आपको क्‍या समझाऊँगा डाक्‍साब, परन्‍तु जिस से हमारा माता जैसा नाता है…”

” यदि कहूँ, यहॉं भी अर्थशास्‍त्र काम करता है तो क्‍या आप झेल पाऍंगे? शास्‍त्री जी ने न तो उत्‍तर दिया, न ही चुनौती की मुद्रा में मेरी ओर मुड़े ही ।

शास्‍त्री जी ने समय लिया फिर दबे स्‍वर में कहा, ”समझना तो चाहूँगा, हम तो विरोधियों के दृष्टिकोण को भी समझने का प्रयत्‍न करते हैं।”

”पहले आप यह बताऍं कि आप असुर परंपरा से अपने को जोड़ते हैं या देव या ब्राह्मण परंपरा से ?”

”मैं यहॉं इस प्रश्‍न का औचित्‍य नहीं समझ पाया ।”

”खैर, मेरा प्रश्‍न भी बहुत सही नहीं था, क्‍योंकि हमारे समाज का पिछड़ा वर्ग असुर परंपरा तक सीमित रहा है, देव परंपरा के विधान उस पर आरोपित रहे हैं जिनको वह मानता नहीं था, परन्‍तु पालन करने को विवश था। परन्‍तु वन्‍य समाज उससे अनजान तक बना रहा। जिसे हम ब्राह्मणवाद कहते हैं वह मिश्र परंपरा है । इसलिए आप तो दोनों परंपराओं के संवाहक हैं।”

शास्‍त्री जी की समझ में फिर भी नहीं आया कि मैं इस बहस में पड़ा ही क्‍यों। वह बिना कुछ बोले विस्मित भाव से मुझे देख रहे थे ।

”सामाजिक न्‍याय की परंपरा असुर परंपरा है। यह मेलमिलाप बहुत पहले आरंभ हो गया था, इसलिए ऋग्‍वेद में अग्निधान की परंपरा, यज्ञ की परंपरा, इन्‍द्र और विष्‍णु का महत्‍व देव परंपरा से आया है और जिनको अदेवयून कह कर निन्‍दा की गई है और जो अग्नि को उसके औद्यो‍गिक उपयोग के कारण महत्‍व देते थे वे असुर परंपरा में आते है। बहुत पहले, कई हजार साल पहले, कृषि का श्रमभार भी असुरों पर आ पड़ा था। इसलिए जब गोपालन आरंभ हुआ, और गाय के दूध आदि का उपयोग आरंभ हुआ तो गाय को अघ्‍न्‍या कहने वाले, माता मानने वाले ये असुर पृष्‍ठभूमि के लोग थे, जो तब भी गणव्‍यवस्‍था में जीते थे। इसलिए ऋग्‍वेद के आठवें मंडल से सूक्‍त 101 में पन्‍द्रहवां सूक्‍त है जिसमें गाय को अदिति कहा गया है उसमें उसके साथ माता, पुत्री, भगिनी का संबंध जोड़ने वाले, तीनों गणसमाज के प्रतिनिधि हैं जो अब वैदिक देवों में समाहित हो चुके हैं पर अलगाव समाप्‍त नहीं हुआ है। ये ही प्रकृति की शक्तियों और तत्‍वों को मातृवत या पितृवत मानते थे। इनको सोमयाजी परंपरा का मान सकते हैं, वरुण और महेन्‍द्र के उपासकों की परंपरा। पूजा की परंपरा, ध्‍यान की परंपरा, योग की परंपरा आदि के जनक ये ही हैं।

‘देवों का उन्‍हीं प्राकृतिक तत्‍वों से बहुत भिन्‍न संबंध था। असुर प्रकृति में स्‍वत: उपलब्‍ध स्रोतों पर निर्भर होने के कारण उन्‍हें अपना पालक मानते थे। देव उनसे आगे बढ़ कर उत्‍पादन अपने हाथ में ले चुके थे। वे उन ओषधियों और वनस्‍पतियों को पैदा कर सकते थे, सींच कर बड़ा कर सकते थे, पेड़ लगा सकते थे इसलिए बिना अधिक दुविधा के काट भी सकते थे। पेड़ उनके लिए देव नहीं थे, पर असुरों के लिए देवस्‍थान थे। मूर्तिपूजा इस आसुरी पृष्‍ठभूमि से आई, मन्दिर की भी कल्‍पना इनकी ही रही हो सकती है। अध्‍यात्‍म चिन्‍तन, उपनिषद, बाद के संन्‍त आदि आंदोलन इसी परंपरा में आते हैं।”

”बात फैलती तो जा रही है, पर समझ में नहीं रही है।” शास्‍त्री जी ने टोका।

”मैं कहना यह चाहता था कि जब तक आपका असुर मूल्‍यों से समन्‍वय नहीं हुआ था तब तक और उसी के प्रभाव से बाद में भी ब्राह्मणों की दृष्टि यह थी कि जिसे हम उगा सकते हैं, पाल सकते हैं, पैदा कर सकते हैं, वह हमारा पालित है और हम उसको काट, उबाल, भून पका कर खा सकते हैं। यह पाकशास्‍त्री परंपरा भी आपकी ही है। उनकी नजर में वन‍स्‍पतियॉं मॉं हैं, देवों की परंपरा में वे पत्नियॉं हैं, यह तो जानते ही हैं आप। आसुरी परंपरा में नदियॉं माताऍं हैं, देवियॉं है, देव परंपरा की छाया के प्रभाव से शान्‍तनु गंगा नदी से विवाह कर सकता है सन्‍तान उत्‍पन्‍न कर सकता है।”

”बौद्धमत की प्रतिक्रिया में अहिंसा को अपना मूल्‍य बना कर जैसे ब्राह्मणों ने इसे चरम पर पहुँचा दिया और लहसन प्‍याल तक अखाद्य हो गए उसी तरह गाय के मामले में उस पुराने मातृभाव का पुन: आविष्‍कार करते हुए गाय से भावुकता को अति पर पहुँचा दिया गया और अब राजा का कर्तव्‍य गोब्राह्मण प्रतिपालन बना दिया गया। दोनों में साम्‍य स्‍थापित कर दिया गया। यदि गाय पशु हो कर भी गोवंश में उत्‍पन्‍न होने के कारण पवित्र है तो ब्राह्मण निरक्षर हो कर भी पूज्य हुआ और साक्षर और विद्वान और साधना में असाधारण शूद्र से, और सच कहिए तो किसी भी ब्राह्मणेतर से श्रेष्‍ठ रहेगा ही। इस गो ब्राह्मण के समीकरण ने गाय के प्रति हमारी संवेदना को अतिसंवेदी बना दिया। गोहत्‍या, ब्रह्महत्‍या का पर्याय बन गया। यदि एक को सहन किया जा सकता है तो दूसरे की भी नौबत आ सकती है। अब आप चाहें तो इसके पीछे के अर्थशास्‍त्र और समाजशास्‍त्र को समझ सकते हैं। गो, मैं यह अपनी समझ से कह रहा हूँ कोई दूसरा इसे गलत भी सिद्ध कर सकता है और तब उसकी बात पर ध्‍यान दूँगा।”

Post – 2016-08-23

हँसते हो तो लगता है कि तुम खुश हो, मगर।
क्‍यों हँस कर दिखाते हो आज खुश हो अगर।
उल्लास की भाषा तो लहू बोलता है
अपनी शिरा से उप शिरा से, खुश हो अगर।
हम भी तो सुनें इश्‍क की बर्वादियों को
जिनकी दहक से लगता है तुम खुश हो मगर।
है अन्‍त, न है आदि, न है बीच में कुछ
भगवान बन दिखाओ कभी, खुश हो अगर ।।

Post – 2016-08-22

निदान – 27
पुराने राक्षस : नये राक्षस

”सभ्‍यता के मार्ग में बाधा डालने वाले आरंभ से ही रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती नैतिक और भावनात्‍मक दृष्टिकोण के कारण रही है। अवरोध डालने वालों ने प्रगति को रोकने के लिए ऐसे उपद्रव किए जिनकी तुलना मानव संहार के आज के नमूनों से की जा सकती है तो प्रगति के लिए कृतसंकल्‍प लोगों ने भारी बलिदान देते हुए भी अपने व्रत से मुड़ने का नाम नहीं लिया । उनके त्‍याग और बलिदान की कथा को उस मिथकीय भाषा में ही लिखा जा सकता था जिसमें राक्षसों द्वारा बहाए गए ब्राह्मणों के रक्‍त से भरे घट से ही सीता (कृषिदेवी, हराई, कृषिभू‍मि) का जन्‍म होता है।”

”ब्राह्मणों के रक्‍त से क्‍यों ? ब्राह्मण तो किसी से लड़ता ही नहीं था, लड़ने वाले तो क्षत्रिय रहे हैं।”

”यह लड़ाई बाद के कामचोर ब्राह्मणों की नहीं, कृषि कर्म में पहल करने वाले समुदाय के साथ थी जो अपने को देव और ब्राह्ण कहते थे, या संभवत: इसमें दो भाषाई समुदायों के लोगों ने पहल की थी। इनमें से एक आग के लिए ती/दी का प्रयोग करता था दूसरा बर/भर का जिनसे देव और ब्रह्म का विकास हुआ और इनका भी अर्थ जलाने वाला, और अर्थविकास प्रकाशित करने वाला, प्रकाशित रहने वाला, और ज्ञानी आदि में हुआ। अग्निसाधक या आग का हथियार के रूप में प्रयोग करने वाले समुदा का तीन वर्णों में विभाजन हुआ – तिस्र प्रजा आर्या ज्‍योतिरग्रा -और चौथे की सेवाओं का इसने उपयोग किया। यह पहले भी कह आया हूँ।”

”अौर यही हजारों लोगों का समुदाय, सहस्राक्ष और सहस्रपाद समुदाय धरती पर छा गया और इसी ने आत्‍मविभाजन करके वर्णव्‍यवस्‍था का आरंभ किया जिसने पहले कृषि का विरोध करने वालों की दक्षताओं का अपने लिए उपयोग किया ?”

”संभव है, वास्‍तविकता यही रही हो, पर पुरुष सूक्‍त तक आकर स्‍वयं सूक्‍त के रचनाकार को भी ठीक इसी रूप में इसका बोध रहा हो, यह दावे के साथ कह नहीं सकता।

”कृषि कर्म की ओर बढ़ने वाले लोगों ने जिस चरण पर अधिक बड़े क्षेत्र में खेती करने के लिए झाड़ झंखाड़ जला कर भूमि की सफाई के आयोजन किए उस पर उनका सबसे कठोर विरोध असुरों या राक्षसों से हुआ। असुर का अर्थ है अनुत्‍पादक। यज्ञ का मूल अर्थ है उत्‍पादन यह कह आया हूँ – अतिमानेन ते वै असुरा ‘किं नु वयं जुहुवा‍म् इति स्‍व स्‍व आस्‍ये जुह्वतश्‍चेरु: ।’ फूल, फल, कन्‍द, साग जो भी पेट भरने को मिला उसे छक कर खाया और मस्‍ती में जुट गए ।

” इसके विपरीत, उनके आतंक से डरे, अपने प्राणों की खैर मनाने वाले खेती करने वाले देवों की आफत – जोतना, बोना, सींचना, रखवाली करना, तैयार अनाज को संभाल कर पूरे साल के लिए कंजूसी से खाना और अगले साल के बीजों के लिए घुनने सड़ने से बचा कर रखना और खेती के चक्‍कर में धूप, ताप, शीत, बरसात में खटना या तप और श्रम करना ।

”जैसे खेती का प्रतीकात्‍मक रूप कर्मकांडी यज्ञ हो गया, यज्ञ ही सबसे श्रेष्‍ठ कम बन गया – यज्ञो वै श्रेष्‍ठतमं कम – उसी तरह खेती का श्रम, तप, और संकल्‍प या व्रत कार्यविरत ऐयाशों की साधना और पाखंड में परिवर्तित हुुआ।

”राक्षस असुरो का ही दूसरा पर्याय हुआ। यह प्राकृतिक साधनों की रक्षा के संकल्‍प से जुड़ा था । हम यह पहले भी याद दिला चुके हैं कि ये आज के पर्यावरणवादियों में आदिम रूप हैं, परन्‍तु इसके लिए उन्‍होंने खेती की ओर अग्रसर देवों या ब्राह्मणों को मिटा देने का, उन्‍हें भगाने के लिए जितने अत्‍याचार किए उनके कारण रक्षा वाला पक्ष तो ओझल हो गया, क्रूरता, अत्‍याचार, उपद्रव उनकी पहचान से जुड़ गया। हम इसके ब्‍यौरे में नहीं जाऍंगे।”

”‍फिर इसकी चर्चा से क्‍या लाभ ?”

“यहॉं इसे दुहराने की आवश्‍यकता इसलिए हुई कि मुख्‍यत: प्रकृति में उपलब्‍ध खाद्य पदार्थो पर निर्भर रहने के कारण औजारों के विकास, मछियारी, नौचालन, जलप्रवाह के नियन्‍त्रण आदि में असुरो का योगदान असाधारण था। इसलिए यह भी न सोचा जाय कि खेती का विरोध करने वालों ने सभ्‍यता के विकास में कोई योगदान नहीं किया। हुआ मात्र यह कि तात्‍कालिकता के दबाव में न तो ये किसी लंबी और समय-साध्‍य योजना बनाने को इच्‍छुक थे न कोई अन्‍य पहल जो किसानी करने वालों में थी। इनकी दक्षता का उपयोग इनके भोजन का प्रबन्‍ध करके किसानों ने करना आरंभ किया। इनकी प्रतिभा के बिना सभ्‍यता का विकास संभव न था। मजेदार बात यह कि सभ्‍यता का दबाव इसके विरोधियों का भी उपयोग कर लेता है, पर निर्णय अपने हाथ में रखता है ।

”विचित्र न्‍याय या मूढ़ता है। जिस भूमि को किसी ने कृृषियोग्‍य बनाया उसका उस पर शाश्‍वत अधिकार । अब आप स्‍वयं अपने मनोबन्‍धों के कारण उन्‍हीं तरीकों को अपना कर भूमि की सफाई करके स्‍वत: उत्‍पादक नहीं बन सकते परन्‍तु रोटी के लोभ में उनकी अपेक्षाओं के अनुसार अपनी सेवायें उन्‍हें देने को तैयार हैं। यहां तक कि खेती का श्रम भी भूस्‍वामित्‍व के बल पर इन राक्षसों या वन्‍यसंपदा की रक्षा करने वालों की सन्‍तानों के सिर आ गया और भूमि का स्‍वामी वह वर्ग बना रहा जिसका आत्‍मविभाजन सुविधा के लिए तीन में हुआ, जिसका केवल एक ही आगे अपने को ब्राह़्मण कहता रहा। उनकी स्‍वतन्‍त्र दक्षताओं का भी उन्‍हें अपना सेवक बनाए बिना भी यही करता रहा।

”इनक सहयोग से नौवहन, पशुपालन आदि में भी प्रगति हुई और खेती को उन्‍नत बनाने में भी क्‍योंकि पशु श्रम का उपयोग किए बिना हल, गाड़ी आदि विकास और प्रयोग संभव न था। जंगली पशुओं को पकड़ने, साधने में इन असुरों की इतनी सिद्धि रही है कि वे आज भी सॉंप, रीछ, बन्‍दर आदि को पकड़, पाल और प्रशिक्षित करके असंभव को संभव कर सकते हैं। हाथी जैसे जानवर को पकड़ कर पाल‍‍तू बनाना और उसका उपयोग हाथी को पकड़ने में करना और वह अपने लिए नहीं, इसके बदले मिलने वाले आहार के लिए। ऋग्‍वेद में पिजड़े में बन्‍द सिंह का हवाला है, दुर्गा को सिंह की सवारी करते दिखाया ही जाता है। यदि नरबलि और पशुबलि करने वाली यह देवी सिंह के मांसाहार की जरूरत पूरी कर सकती थी तो वह उसे अपनी पीठ पर भी सवारी करा सकता था। सामान्‍य नागरिकों से लिए यह मँहगा सौदा था इसलिए त्‍याग दिया गया। पर सुनते हैं अफगानिस्‍तान में शेर और कुत्‍ते के क्रास से बहुत भयानक पर आज्ञाकारी कुत्‍ते विकसित किए गए थे।

”मैं यह याद दिलाना चाहता था कि जंगल जला कर सफाई करने के घृणित काम को छोड़ कर पशुपालन, पशु के पेशीय बल के उपयोग, उसे काबू में रखने के लिए नाथने, बॉंधने की युक्तियॉं निकालने, उनकी चंडता को कम करने के लिए उनका बधियाकरण आदि करने के सारे उपाय उनके द्वारा होते रहे, या हम कहें अन्‍न उत्‍पादन के स्रोतो और साधनों का विस्‍तार करके, मात्र एक मनोबन्‍ध सें कि हम उन मातृतुल्‍य वनस्‍पतियों को जलाने का अपराध नहीं करेंगे वे सेवक बने रहे और इस मनोबन्‍ध को तोड़ आगे बढ़ने के कारण किसानी करने वालों ने उनको भी अपनी सेवा में उन्‍हीं पालतू जानवरों की तरह लगा लिया जो हाथी, शेर, सांप और रीछ जैसे जानवरों को ही नहीं गगनचारी पक्षियों तक को पालतू बना सकते थे।
यह थी वह प्रक्रिया जिससे समस्‍त योग्‍यताओं से लैस होने के बाद भी कृषि भूमि का उद्धार अौर संस्‍कार न करने के कारण विविध शिल्‍पों में दक्ष लोग किसानी करने वालों के इशारे पर काम करने को बाध्‍य रहे।”

”यह तुम्‍हारी अपनी कल्‍पना तो नहीं ?”

”जो इस तर्क को नहीं समझते वे अनाड़ी कई सौ साल उपनिवेशवादियों के जाल में ‘आर्य आए, स्‍थानीय लोगों को अपना गुलाम बनाया, शूद्र की कोटि में डाल दिया ।’ का जाप करते रहे। समाज रचना इस तरह प्रभावित होती तो अब तक तथाकथित ऊँची जातियों के सभी लोग शूद्र बन चुके होते । दसियों बार तो इस देश को आंशिक या व्‍यापक पराधीनता स्‍वीकार करनी पड़ी । मूर्खता ही हद यह कि किसी ने यह भी नहीं सोचा कि ये आक्रमण करने वाले आर्य जानवर चराते थे, जानवर चराने वालों को किसी को गुलाम बनाने की क्‍या जरूरत। ऊटपटांग बातें समझदार लोग तक अपने बौद्धिक आलस्‍य के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी मानते चले जा सकते हैं, यह हमारी बौद्धिक गुलामी का परिणाम और प्रमाण दोनो है। यदि आप यह नहीं समझ सकते कि किसी समस्‍या की या व्‍यवस्‍था की जड़ें कहॉं तक जाती हैं तो आप सामाजिक न्‍याय के नाम पर हुड़दंग मचाते हुए समाज को क्षुब्‍ध तो कर सकते हैं, उस समस्‍या का समाधान नहीं कर सकते । समस्‍या पहल के अभाव की थी और पहल के अभाव को आज भी बढ़ाया जा रहा है कि सरकार या समाज सब कुछ कर दे तो हम निश्चिन्‍त आगे बढ़ सके । बढ़ सकें भी नहीं, वही हमें खींच कर आगे बढ़ाए ।

”खैर, हम कह रहे थे कि अब सभ्‍यता के दो पक्ष हो गए। एक पहल, संपदा पर अधिकार और उसके विस्‍तार का । और दूसरा प्रौद्योगिकी, आविष्‍कार, दर्शन, साहित्‍य कला आदि का जिसमें जाति निरपेक्ष रूप में सभी को संपत्ति के स्रोतों पर अधिकार करने वालों के द्वारा इस्‍तेमाल किया जाता रहा है। इस्‍तेमाल होने वालों को अपनी विशेषज्ञता में इतना आनन्‍द आता रहा कि उनकी मुख्‍य चिन्‍ता अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में कमाल करने की रही। इसमें हम भी आते हैं। इस माने में ब्राह्मण की स्थिति शूद्र से भिन्‍न नहीं थी, जो ज्ञानसाधना में इतना मग्‍न रहा कि उसके बाद किसी तरह पेट भरने का प्रबन्‍ध हो जाय तो वह परम भाव से डकार लेता और आशीर्वाद देता, जब तब जयकारा लगाता हुआ विदा हो जाएगा।

”लेकिन आज मैंने इस प्रसंग को एक अन्‍य कारण से भी छेड़ दिया। यदि प्रकृति के किसी उपादान या प्राणी के प्रति आप की भावुकता इतनी प्रबल हो जाय कि उसे बचाने के लिए आप मनुष्‍यों का संहार कर सकते या उनको यातना दे सकते हैं तो आप उसकी रक्षा करने का अभिनय तो कर सकते हैं, रक्षा नहीं कर सकते क्‍योंकि उसका अर्थतन्‍त्र होता है। उसके अभाव में आप अपनी भी रक्षा नहीं कर सकते। हॉं आप बस यह नहीं जानते कि आज के राक्षस आप हैं। चाहे गोरक्षा के नाम पर ही हो, मनुष्‍य का उत्‍पीड़न और संहार उस भावाकुलता का परिणाम है जो प्रगति विरोधी है, आपकी आदिम प्रवृत्ति से जुड़ा और आदिम सोच का नतीजा है और उस पूरे समाज के जो इस व्‍याधि से ग्रस्‍त है, बौद्धिक ही नहीं, नैतिक गिरावट का प्रमाण है।”

उसने हाथ बढ़ा कर मेरा मुँह बन्‍द कर दिया, ”चुप रह यार, देख उधर से शास्‍त्री जी आ रहे हैं। तेरी सामत आ जाएगी ।”

Post – 2016-08-22

हम उन्‍हें देख न पाए हैं मगर देखेंगे
पहले चिलमन वह उठाऍं तो उन्‍हें देखेंगे
सात परदों में उन्हें देखा है हर बार मगर
सिर्फ पर्दा वह नजर आए, जिन्‍हें देखेंगे ।

Post – 2016-08-21

शिकायत तुमको भी मुझको भी थी इस जिन्‍दगी से पर
तुम्‍हें ही कल तलक कहता था ‘मेरी जिन्‍दगी’ जानां ।
न मैं कुछ सोच सकता हूँ न तुम कुछ जान सकती हो
जमाने से जिसे हम मानते हैं तुमने भी माना ।

Post – 2016-08-21

इसका दूसरा भाग अभी पूरा किया है, जो लोग पहला भाग पढ़ चुके हों वे इसका दूसरा भाग ही पढ़ सकते हैे।
निदान – 26
एक
”तुम भले कहो कि तुम विश्‍व सभ्‍यता को विश्‍वमानवता की साझी विरासत मानते हो, परन्‍तु एक तो यह बात कुछ अतिरंजित लगती है और दूसरे तुम्‍हारे अपने मित्र भी इसका सीमित अर्थ ही लेते हैं कि भारत सबसे अच्‍छा देश, हिन्‍दू सभ्‍यता सबसे उन्‍नत सभ्‍यता और ….”
”सभी मनुष्‍यों में वे सबसे अच्‍छे ।” मैंने हँसते हुए उसका वाक्‍य पूरा किया।
“हाँ, यह भी कह लो !”
“यह हमारा राष्ट्रीय चरित्र है. जब तुम अपने को सबसे अधिक धर्म निरपेक्ष सिद्ध करने के लिए वाहियात आरोप गढ़ते हुए अपने को सिर्फ इसी आधार पर दूसरों से अधिक अच्छा सिद्ध करना चाहते हो तब तुम भी यही कर रहे होते हो. यह हमारी सांस्‍कृतिक अन्तःसलिला का प्रवाह है जिसे हम जब लक्ष्य नहीं करते या दबाने का प्रयत्न करते हैं तब भी प्रवाहमान रहती है. यह तुम भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों में भी पाओगे. उनमें भी जो घोषित रूप में हिन्दुत्व का विरोध या इसकी निंदा करते हैं. सिर्फ शक्ल का अंतर नहीं, मिजाज का यह अंतर भी उन्हें दूसरे देशों के मुसलामानों और ईसाइयों से अलग करता है भले वे इस विषय में सचेत न हों. इसलिए वे यदि हिन्‍दुओं को विश्व सभ्यता का जनक मान बैठें तो उनके इस भरम का मैं बुरा नही मानूँगा. हाँ उनकी समझ पर भरोसा नहीं करूँगा.”
“सच तो यह है कि वे तुम्हारी समझ पर भरोसा नहीं करते. वे इसको कन्सीव ही नही कर पाते.”
“जब मेरे इतने निकट होकर तुम नहीं कर पाते हो तो उनसे शिकायत क्यों करूँ ? मैं इसका कारण जानता हूँ, तुम्हे शायद पता न हो. कन्सीव करने के लिए यूँ भी जैसे शारीरिक विकास का एक स्तर अपेक्षित होता है, उसी तरह वैचारिक विकास का एक स्तर अपेक्षित होता है. उसके अभाव में पूरी बात ग्रहण नहीं हो पाती. फिर जानकारी का एक दायरा जरूरी होता है. उसमे पहले से कुछ उहापोह की ज़रूरत होती है. परंतु सबसे अधिक ज़रूरी होता है उस मान्यता के निकट पड़ने वाली कुछ आधी अधूरी ही सही, बातों को किसी न किसी सन्दर्भ में पढ़ा या सुना होना. यदि बात इतनी नई हो और अतीत में इतने पीछे खींच ले जाती हो जहां तक पहले के धुरीण विद्वानों में भी कोई न पहुँचा हो तो वह कितनी भी प्रामाणिक क्यों न हो, हमें लाजवाब करने के बाद भी, बिलकुल सच प्रतीत होते हुए भी, अपेक्षा से बहुत आगे चले जाने के बाद जादू के खेल जैसा लगेगी जिसे हम प्रत्यक्ष देखते हुए भी विश्वास नहीं कर पाते. और ऊपर से यह प्रस्ताव यदि किसी ऐसे व्यक्ति की और से आ रहा हो जिसके विरुद्ध एक छिपा दबा अभियान लंबे समय से चलता आया हो तो उसके किसी विचित्र प्रस्ताव को तो यह कह कर ही ख़ारिज किया जा सकता है कि भी इनको तो चौंकाने वाली बातें करने की आदत है. अब तुम सुन भी रहे हो, बात समझ में भी आरही है, पर इस एक लटके के साथ तुम्हारी ही बुद्धि पर पत्थर पड़ जाएगा जैसे तुम्हारी बुद्धि पर पड़ा हुआ है.
परन्‍तु सभ्‍यता अपने सभी चरणों पर वैश्विक ही रही है, इसमें किसी का शोषण और उसकी संपदा की लूट का योगदान हो, दूसरे के लोभ का, तीसरे के कौशल का, चौथे के हाथ और पॉंचवे की पीठ का, एक के कारखाने और दूसरे के कच्‍चे माल और बाजार का । ये भूमिकाएं जीवट, पहल और जागृति के अनुसार बदलती रहती हैं। देखना यह होता है कि हम पिस रहे हैं या पीस रहे है और हमें अपने को बचाना या अपनी भूमिका बदल कर रंगमंच पर नये तेवर से उपस्थित होना है।
दो
यदि सभ्‍यता के निर्माण और विकास में समस्‍त मानवता का योगदान रहा है और आज के नितान्‍त पिछड़े समाजों ने भी किसी न किसी चरण पर अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया है तो वहीं कोई ऐसा चरण न रहा जब इसके शत्रु और विनाश के लिए तत्‍पर लोग न रहे हों। आत्‍मगौरव जरूरी है, परन्‍तु आत्‍मगौरव वश यह सोच लेना कि हम सबसे अग्रणी रहे हैं, इसलिए दूसरे हमसे ग्रहण करें, हम किसी से कुछ न लेंगे। पिछड़े समाजों के पिछड़ेपन का कारण उनका बुद्धि और कौशल के माने में दूसरों से कम रह जाना नहीं, अहंकार वश उस चरण के बाद भी दूसरों से सीखने में अपनी हेठी अनुभव करना रहा है। हमें पिर‍ामिडों के कौशल और वास्‍तुशिल्‍प पर उस काल की सीमा का ध्‍यान रखते हुए आश्‍चर्य होता है परन्‍तु उससे कम आश्‍चर्यजनक सन्‍तुलन का वह बोध नहीं है जिसे हम एक पर एक बिना किसी गारे मसाले के रखे अनगढ़ शिलाखंडों की चिति नहीं है जो आंधियों तूझानों को झेलती अपने सन्‍तुलन के बल पर टिकी रहती है। इन दोनों के बीच एक संबंध है और क्रूर सचाई भी है। संबंध यह कि नगर निर्माण, पुल निर्माण, पथ निर्माण, दिशा बोध, प्राथमिक खगोलविद्या सभी के सूत्र इन जनों से जुडे़ हुए हैं । अपनी कला और ज्ञान और इसमें असाधारण निपुणता के प्रति इनका समर्पण भाव इतना गहन था कि किसी तरह पेट भरने का प्रबन्‍ध हो जाय तो ये अपना सारा समय अपनी कला में ही लगा देंगे। इसके चलते इनका शोषण भी हुआ और यदा कदा दमन भी।
” इनकी छाप भारत के मेगालिथ, चीन के मेगालिथ, फ्रांस, स्‍काटलैंड, बुल्‍गारिया और मिश्र तक ही नहीं माया सम्‍यता में भी पाई जाती है और इनके योगदान की सही समझ न होेने के कारण विद्वानों ने भी मूर्खतापूर्ण अटकलें लगा रखी हैं। मूलत: जिस भी क्षेत्र में इस कला और वस्‍तुदृष्टि का विकास हुआ इनका बिखराव मेरी समझ से हिमयुगीन आपदा के कारण हुआ, दोनों गोलार्धों में।
”ये विज्ञान के जनक हैं परन्‍तु इसके बाद अपने अभिमान में ये अपने आत्‍मराग के कारण न समय के साथ चल सके, न अपनी पुरानी योग्‍यता की रक्षा कर सके और तक्षकों के रूप में इन्‍होंने कुशल श्रमिक बन कर वास्‍तुकला, मूर्तिकला, और सिविल इंजीनियरी आदि का विकास किया परन्‍तु धन के स्रोतो पर अधिकार करने वाले चतुर लोगों के सेवक बन कर रह गए। इनकी पाषाणी कला से अनाज नहीं पैदा होता था और अनाज पैदा करने वाले दूसरे कलाकारों को रोटी के मोल खरीदते और नचाते रहे। इसी तरह का पागलपन उन जनों में था तो प्रकृति की कृपा से कम समय में ही अपना पेट भरने का प्रबन्‍ध कर लेते थे, इसलिए खाली समय नाचने गाने में लगाते थे। इन्‍होंने क‍विता, नृत्‍य, अभिनय, संगीत में असाधारण प्रगति की परन्‍तु प्रकृति प्रदत्‍त आहार से उनकी अपनी आवश्‍यकताऍं पूरी हो जाती थीं इसलिए कृषिकर्म की ओर कृषिकर्मियों के उकसाने के बाद भी ध्‍यान न दे सके और बाद में जब रोटी की पोषकता और स्‍वाद का पता चला तो रोटी पैदा करने वालों के हाथ के खिलौना बन गए। जानते हो किन्‍नरों, यक्षों, गन्‍धर्वों का संबन्‍ध नृत्‍य, अभिनय और संगीत से तो है ही, इनका क्षेत्र पर्वतीय क्‍यों है ?”
वह चें बोल गया, ”मुझसे ऐसे सवाल क्‍यों करते हो ? मैं हिन्‍दी का अध्‍यापक रहा हूँ कल्‍चरल ऐंथ्रापोलोजी का नहीं ।”
”इसलिए कि पर्वतीय बनों को ठेकेदारों द्वारा नष्‍ट करने और निर्माण कार्यों के उपयुक्‍त पेड़ों को लगा कर जिस तरह के जंगल पहाड़ों पर अब बचे रह गए है, पहले वैसी स्थिति नहीं थी। अपार विविधता थी।
ऋग्‍वेद का एक पद है, गिरिर्न भुज्‍यु, उपमा में कहा गया है कि पर्वतीय क्षेत्रों की तरह भोज्‍य पदार्थों से भरपूर । वहीं ऐसी रंगबाजी संभव थी जिससे रंगमंच का जन्‍म हो सके, नाटक का विकास हो सके। देखो तो, इनमें से किसी का श्रेय खेती करने वालों को नहीं जाता, परन्‍तु उत्‍पादन के महत्‍व को समझने वालों ने संपत्ति के स्रोतों पर अधिकार करके दूसरों का नचाया कहते हुए झिझक होती है, क्‍योंकि वे तो दूसरों को भी कह रहे थे, आहार संग्रह छोड़ कर खेती पर आओ, इसमें अधिक लाभ है, यह अधिक पौष्टिक आहार सुलभ कराता है। उनको अपना जनबल बढ़ाने की इतनी चिन्‍ता थी कि अधिक से अधिक संतान पैदा करना एक पुण्‍य का काम था और कोई भी पुण्‍य का काम करना सन्‍तान प्राप्ति के समान था।”
”तुम कहना क्‍या चाहते हो?”
”कहना यह चाहता हूँ कि तुम मूर्ख हो पर कह नहीं सकता। पूरी बात सुनते तो। चलो, जब छेंड़ ही दिया तो कहूँ कि एक समय में हम भी माइनारिटी सिंड्रोम से ग्रस्‍त थे, परन्‍तु हमारी यह मनोग्रस्‍तता समाज को आगे ले जाने के अभियान से जुड़ी थी, आर्थिक उन्‍नयन से जुड़ी थी और जो जुड़ न पाए वे अपने असाधारण कौशल और संवेदना के बाद भी पिछड़ गए और उन्‍हें सामाजिक अधो‍गति का सामना करना पड़ा जब कि सभ्‍यता का सारा तामझाम उनकी योग्‍यता और अपनी विशेषज्ञता के प्रति समर्पण भाव का ऋ‍णी है।”
उसे एक शेर याद आ गया । याद आ ही गया तो शेर तो शेर है, छलांग लगाकर बाहर तो आएगा ही और आया, ”हमीं से रंगे गुलिस्‍तां हमीं से रंगे बहार । हमीं को नज्‍में गुलिस्‍तॉं पर अख्तियार नहीं।”
”कहो तो ताली बजा दूँ पर यह समझ लो शायरी से समस्‍यायें पैदा होती हैं सुलझती नहीं हैं और कई बार इनका अर्थ उल्‍टा होता है। मुसीबत यह कि मैं खुद सलीके से कोई बात कह पाता ही नहीं।”
”कल कागज पर लिख कर आना और सरकारी फरमान की तरह पढ़ना । हो सकता है, मैं भी मान लूँ।”

Post – 2016-08-21

निदान – 26

एक

”तुम भले कहो कि तुम विश्‍व सभ्‍यता को विश्‍वमानवता की साझी विरासत मानते हो, परन्‍तु एक तो यह बात कुछ अतिरंजित लगती है और दूसरे तुम्‍हारे अपने मित्र भी इसका सीमित अर्थ ही लेते हैं कि भारत सबसे अच्‍छा देश, हिन्‍दू सभ्‍यता सबसे उन्‍नत सभ्‍यता और ….”

”सभी मनुष्‍यों में वे सबसे अच्‍छे ।” मैंने हँसते हुए उसका वाक्‍य पूरा किया।

“हाँ, यह भी कह लो !”

“यह हमारा राष्ट्रीय चरित्र है. जब तुम अपने को सबसे अधिक धर्म निरपेक्ष सिद्ध करने के लिए वाहियात आरोप गढ़ते हुए अपने को सिर्फ इसी आधार पर दूसरों से अधिक अच्छा सिद्ध करना चाहते हो तब तुम भी यही कर रहे होते हो. यह हमारी सांस्‍कृतिक अन्तःसलिला का प्रवाह है जिसे हम जब लक्ष्य नहीं करते या दबाने का प्रयत्न करते हैं तब भी प्रवाहमान रहती है. यह तुम भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों में भी पाओगे. उनमें भी जो घोषित रूप में हिन्दुत्व का विरोध या इसकी निंदा करते हैं. सिर्फ शक्ल का अंतर नहीं, मिजाज का यह अंतर भी उन्हें दूसरे देशों के मुसलामानों और ईसाइयों से अलग करता है भले वे इस विषय में सचेत न हों. इसलिए वे यदि हिन्‍दुओं को विश्व सभ्यता का जनक मान बैठें तो उनके इस भरम का मैं बुरा नही मानूँगा. हाँ उनकी समझ पर भरोसा नहीं करूँगा.”

“सच तो यह है कि वे तुम्हारी समझ पर भरोसा नहीं करते. वे इसको कन्सीव ही नही कर पाते.”

“जब मेरे इतने निकट होकर तुम नहीं कर पाते हो तो उनसे शिकायत क्यों करूँ ? मैं इसका कारण जानता हूँ, तुम्हे शायद पता न हो. कन्सीव करने के लिए यूँ भी जैसे शारीरिक विकास का एक स्तर अपेक्षित होता है, उसी तरह वैचारिक विकास का एक स्तर अपेक्षित होता है. उसके अभाव में पूरी बात ग्रहण नहीं हो पाती. फिर जानकारी का एक दायरा जरूरी होता है. उसमे पहले से कुछ उहापोह की ज़रूरत होती है. परंतु सबसे अधिक ज़रूरी होता है उस मान्यता के निकट पड़ने वाली कुछ आधी अधूरी ही सही, बातों को किसी न किसी सन्दर्भ में पढ़ा या सुना होना. यदि बात इतनी नई हो और अतीत में इतने पीछे खींच ले जाती हो जहां तक पहले के धुरीण विद्वानों में भी कोई न पहुँचा हो तो वह कितनी भी प्रामाणिक क्यों न हो, हमें लाजवाब करने के बाद भी, बिलकुल सच प्रतीत होते हुए भी, अपेक्षा से बहुत आगे चले जाने के बाद जादू के खेल जैसा लगेगी जिसे हम प्रत्यक्ष देखते हुए भी विश्वास नहीं कर पाते. और ऊपर से यह प्रस्ताव यदि किसी ऐसे व्यक्ति की और से आ रहा हो जिसके विरुद्ध एक छिपा दबा अभियान लंबे समय से चलता आया हो तो उसके किसी विचित्र प्रस्ताव को तो यह कह कर ही ख़ारिज किया जा सकता है कि भी इनको तो चौंकाने वाली बातें करने की आदत है. अब तुम सुन भी रहे हो, बात समझ में भी आरही है, पर इस एक लटके के साथ तुम्हारी ही बुद्धि पर पत्थर पड़ जाएगा जैसे तुम्हारी बुद्धि पर पड़ा हुआ है.

परन्‍तु सभ्‍यता अपने सभी चरणों पर वैश्विक ही रही है, इसमें किसी का शोषण और उसकी संपदा की लूट का योगदान हो, दूसरे के लोभ का, तीसरे के कौशल का, चौथे के हाथ और पॉंचवे की पीठ का, एक के कारखाने और दूसरे के कच्‍चे माल और बाजार का । ये भूमिकाएं जीवट, पहल और जागृति के अनुसार बदलती रहती हैं। देखना यह होता है कि हम पिस रहे हैं या पीस रहे है और हमें अपने को बचाना या अपनी भूमिका बदल कर रंगमंच पर नये तेवर से उपस्थित होना है।

दो

यदि सभ्‍यता के निर्माण और विकास में समस्‍त मानवता का योगदान रहा है और आज के नितान्‍त पिछड़े समाजों ने भी किसी न किसी चरण पर अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया है तो वहीं कोई ऐसा चरण न रहा जब इसके शत्रु और विनाश के लिए तत्‍पर लोग न रहे हों। आत्‍मगौरव जरूरी है, परन्‍तु आत्‍मगौरव वश यह सोच लेना कि हम सबसे अग्रणी रहे हैं, इसलिए दूसरे हमसे ग्रहण करें, हम किसी से कुछ न लेंगे। पिछड़े समाजों के पिछड़ेपन का कारण उनका बुद्धि और कौशल के माने में दूसरों से कम रह जाना नहीं, अहंकार वश उस चरण के बाद भी दूसरों से सीखने में अपनी हेठी अनुभव करना रहा है। हमें पिर‍ामिडों के कौशल और वास्‍तुशिल्‍प पर उस काल की सीमा का ध्‍यान रखते हुए आश्‍चर्य होता है परन्‍तु उससे कम आश्‍चर्यजनक सन्‍तुलन का वह बोध नहीं है जिसे हम एक पर एक बिना किसी गारे मसाले के रखे अनगढ़ शिलाखंडों की चिति नहीं है जो आंधियों तूझानों को झेलती अपने सन्‍तुलन के बल पर टिकी रहती है। इन दोनों के बीच एक संबंध है और क्रूर सचाई भी है। संबंध यह कि नगर निर्माण, पुल निर्माण, पथ निर्माण, दिशा बोध, प्राथमिक खगोलविद्या सभी के सूत्र इन जनों से जुडे़ हुए हैं । अपनी कला और ज्ञान और इसमें असाधारण निपुणता के प्रति इनका समर्पण भाव इतना गहन था कि किसी तरह पेट भरने का प्रबन्‍ध हो जाय तो ये अपना सारा समय अपनी कला में ही लगा देंगे। इसके चलते इनका शोषण भी हुआ और यदा कदा दमन भी।

” इनकी छाप भारत के मेगालिथ, चीन के मेगालिथ, फ्रांस, स्‍काटलैंड, बुल्‍गारिया और मिश्र तक ही नहीं माया सम्‍यता में भी पाई जाती है और इनके योगदान की सही समझ न होेने के कारण विद्वानों ने भी मूर्खतापूर्ण अटकलें लगा रखी हैं। मूलत: जिस भी क्षेत्र में इस कला और वस्‍तुदृष्टि का विकास हुआ इनका बिखराव मेरी समझ से हिमयुगीन आपदा के कारण हुआ, दोनों गोलार्धों में।

”ये विज्ञान के जनक हैं परन्‍तु इसके बाद अपने अभिमान में ये अपने आत्‍मराग के कारण न समय के साथ चल सके, न अपनी पुरानी योग्‍यता की रक्षा कर सके और तक्षकों के रूप में इन्‍होंने कुशल श्रमिक बन कर वास्‍तुकला, मूर्तिकला, और सिविल इंजीनियरी आदि का विकास किया परन्‍तु धन के स्रोतो पर अधिकार करने वाले चतुर लोगों के सेवक बन कर रह गए। इनकी पाषाणी कला से अनाज नहीं पैदा होता था और अनाज पैदा करने वाले दूसरे कलाकारों को रोटी के मोल खरीदते और नचाते रहे। इसी तरह का पागलपन उन जनों में था तो प्रकृति की कृपा से कम समय में ही अपना पेट भरने का प्रबन्‍ध कर लेते थे, इसलिए खाली समय नाचने गाने में लगाते थे। इन्‍होंने क‍विता, नृत्‍य, अभिनय, संगीत में असाधारण प्रगति की परन्‍तु प्रकृति प्रदत्‍त आहार से उनकी अपनी आवश्‍यकताऍं पूरी हो जाती थीं इसलिए कृषिकर्म की ओर कृषिकर्मियों के उकसाने के बाद भी ध्‍यान न दे सके और बाद में जब रोटी की पोषकता और स्‍वाद का पता चला तो रोटी पैदा करने वालों के हाथ के खिलौना बन गए। जानते हो किन्‍नरों, यक्षों, गन्‍धर्वों का संबन्‍ध नृत्‍य, अभिनय और संगीत से तो है ही, इनका क्षेत्र पर्वतीय क्‍यों है ?”

वह चें बोल गया, ”मुझसे ऐसे सवाल क्‍यों करते हो ? मैं हिन्‍दी का अध्‍यापक रहा हूँ कल्‍चरल ऐंथ्रापोलोजी का नहीं ।”

”इसलिए कि पर्वतीय बनों को ठेकेदारों द्वारा नष्‍ट करने और निर्माण कार्यों के उपयुक्‍त पेड़ों को लगा कर जिस तरह के जंगल पहाड़ों पर अब बचे रह गए है, पहले वैसी स्थिति नहीं थी। अपार विविधता थी।

ऋग्‍वेद का एक पद है, गिरिर्न भुज्‍यु, उपमा में कहा गया है कि पर्वतीय क्षेत्रों की तरह भोज्‍य पदार्थों से भरपूर । वहीं ऐसी रंगबाजी संभव थी जिससे रंगमंच का जन्‍म हो सके, नाटक का विकास हो सके। देखो तो, इनमें से किसी का श्रेय खेती करने वालों को नहीं जाता, परन्‍तु उत्‍पादन के महत्‍व को समझने वालों ने संपत्ति के स्रोतों पर अधिकार करके दूसरों का नचाया कहते हुए झिझक होती है, क्‍योंकि वे तो दूसरों को भी कह रहे थे, आहार संग्रह छोड़ कर खेती पर आओ, इसमें अधिक लाभ है, यह अधिक पौष्टिक आहार सुलभ कराता है। उनको अपना जनबल बढ़ाने की इतनी चिन्‍ता थी कि अधिक से अधिक संतान पैदा करना एक पुण्‍य का काम था और कोई भी पुण्‍य का काम करना सन्‍तान प्राप्ति के समान था।”

”तुम कहना क्‍या चाहते हो?”

”कहना यह चाहता हूँ कि तुम मूर्ख हो पर कह नहीं सकता। पूरी बात सुनते तो। चलो, जब छेंड़ ही दिया तो कहूँ कि एक समय में हम भी माइनारिटी सिंड्रोम से ग्रस्‍त थे, परन्‍तु हमारी यह मनोग्रस्‍तता समाज को आगे ले जाने के अभियान से जुड़ी थी, आर्थिक उन्‍नयन से जुड़ी थी और जो जुड़ न पाए वे अपने असाधारण कौशल और संवेदना के बाद भी पिछड़ गए और उन्‍हें सामाजिक अधो‍गति का सामना करना पड़ा जब कि सभ्‍यता का सारा तामझाम उनकी योग्‍यता और अपनी विशेषज्ञता के प्रति समर्पण भाव का ऋ‍णी है।”

उसे एक शेर याद आ गया । याद आ ही गया तो शेर तो शेर है, छलांग लगाकर बाहर तो आएगा ही और आया, ”हमीं से रंगे गुलिस्‍तां हमीं से रंगे बहार । हमीं को नज्‍में गुलिस्‍तॉं पर अख्तियार नहीं।”

”कहो तो ताली बजा दूँ पर यह समझ लो शायरी से समस्‍यायें पैदा होती हैं सुलझती नहीं हैं और कई बार इनका अर्थ उल्‍टा होता है। मुसीबत यह कि मैं खुद सलीके से कोई बात कह पाता ही नहीं।”

”कल कागज पर लिख कर आना और सरकारी फरमान की तरह पढ़ना । हो सकता है, मैं भी मान लूँ।”

Post – 2016-08-20

निदान – 25

फूलहिं फलहिं न बेत

”घालमेल तो तुम भी कुछ कम नहीं करते हो भाई । जब मिल कहता है आल थ्योरीज फ्राम द वेस्ट तो वह तुम्हेंं शैतान नजर आता है। उसी इतिहास को भारत के अभिजात मुस्लिम विद्वानों ने सबसे अधिक महत्व दिया, और वे भी तुम्हें दुष्ट प्रतीत होते हैं। और तुम जब सिद्ध करते हो कि विश्व सभ्यता का जनक भारत है और विचार से ले कर भाषा और ज्ञान और संस्कृति का प्रवाह भारत से पश्चिम की ओर रहा है तब तुम इन्हीं आरोपों से मुक्त हो जाते हो। इसी आधार यदि मैं तुम्हेंं दुष्ट कहूँ तो अपना बचाव कर पाओगे ?

” तुम्हें याद है अंधेर नगरी के राजा का वह न्याय जिसमें वास्तविक अपराधी का पता न चल पाने पर उसने कहा कि फांसी का फन्दा जिसके गले में ठीक बैठेगा, उसे फांसी दी जाएगी और वह फन्दा जब किसी के गले में ठीक बैठा ही नहीं तो सभासदों ने कहा, राजा काे भी इसे पहन कर देखना चाहिए। वह उसे ठीक बैठा और उसे अपने ही न्या‍य के अनुसार फांसी दे दी गई। सच मानो तो ठीक यही हाल तुम्हारा भी होना है। और कोई मुझसे सलाह ले तो मैं कहूँगा गोलचक्कर पर फांसी दो जिससे दूसरों को भी नसीहत मिले।” अपने विचार को वजन देने के लिए वह उठ कर ताली भी बजाने लगा।

”तुम्हारे जैसे मूर्ख श्रोता रहें तो कुछ भी हो सकता है। आए दिन बवाल करने में तुम्हारा इतना समय निकल जाता है कि कोई पूछे कि कर क्या रहे हो, यह हो क्या रहा है ? तो जवाब तक न दे सको । सोचने समझने की फुर्सत तो दूर, धैर्य से सुनने तक की फुर्सत नहीं। कहूँ कुछ, पर उसका एक वाक्य कहीं से लेकर पतंगबाजी करने लगोगे।”

”मैं तो तुम्हारा ही दिव्य वचन दुहरा रहा था। कहने में कोई चूक हो गई क्या?”

”मैं कभी किसी व्य‍क्ति या समुदाय को दुष्ट नहीं कहता, न ऐसा मानता हूँ। यदि मान लूँ तब न तो उसके सुधार की चिन्ता होगी, न उपचार का ध्या्न न रोगनिदान का झमेला। यूँ भी इतिहास में नैतिकता का पहलू वहॉं भी नहीं आता जहाँ किसी काम का परिणाम अनिष्टकर हो रहा हो या हुआ हो। मैं प्रयत्न यह करता हूँ कि उन कारणों, परिस्थितियों और अवरोधों को उजागर कर सकूँ जिनके परिणाम स्वरूप उससे ऐसा हो रहा है या हुआ था। मैं पहले भी इस बात को रेखांकित करता आया हूँ कि इतिहास के समक्ष हम जहाँ अपने को कर्ता समझते हैं वहॉं भी निमित्त बन कर रह जाते हैं। कोई निमित्त अपराधी नहीं हो सकता, न कालदेव को जिनके भीतर क्रियाशील सहकारी और प्रतिरोधी शक्तियों का खेल चल रहा है दोष दिया जा सकता है। इसलिए हम उन शक्तियों या कारकों को समझते हुए उनसे सावधान रह सकें अौर वर्तमान में उनके निवारण या संवर्धन की दिशा में अपने दायित्व का निर्धारण कर सकें, इतना ही हमारे वश का है।

”यदि मिल कहता कि आज की तिथि में यूरोप अग्रणी है और नए सिद्धा्त, विचार और आविष्कार यहॉं पैदा हो रहे हैं और यहाँ से शेष जगत में फैल रहे हैं तो मुझे इस कथन पर आपत्ति न होती। यह बात तो विलियम जाेन्स ने भी कही थी अपने पहले ही व्या्ख्यान में, परन्तु वह यह भी मानते थे कि पूर्व सभ्यता की नर्सरी है, यह भी मानते थे कि हमने सभ्य ता के तत्व एशिया से पाए हैं, यह बात तो हीगेल भी मानता था। परन्तु वैज्ञानिक विवेचन यह भी न होता।

”मिल मानता था जिस देश के पास इतिहास नहीं वह सभ्य नहीं है और भारत के पास इतिहास और इतिहासबोध दोनों नहीे था, यह पहली बार मुस्लिम काल के साथ आया। यदि वह यह भी बताता कि सचेत रूप में इतिहास को अपव्याख्या से नष्ट करने वालों के पास और अपना ही इतिहास नष्ट करने वालों के पास इतिहास बोध होता है, तो सभ्यता के चरित्र को समझने में उससे भी चूक न होती और हम भी समझ पाते कि इतिहासबोध का वह कौन सा रूप था जिसमें भारत ने पुरा पाषाण काल से ले कर बाद के कालों के उन रेशों तक को अपने सास्कृसतिक प्रतीकों, रीतियों, व्यवहारो, भाषा और साहित्य में बचा रखा और यह आश्चर्य इतिहासबोध के बिना ही हो गया।”

”जब इतिहास ही नहीं है, आगे पीछे का तारतम्य तक नहीं मालूम, तो इतिहासबोध कैसे हो सकता है, यार । तुम भी कमाल करते हो।”

”टी.एस. ईलियट का वह प्रसिद्ध लेख ट्रैडिशन ऐंड इंडिविजुअल टैलेंट ‘ पढ़ा है ? पढ़ा तो होगा, तुम लोग तो उनके कचरे की टोकरी में से भी टुकड़े बटोर कर झालर की तरह टाँगे रहते हो। उसमें वह जो ग्रीक काल से अद्यतन के समकाल समुपस्थित होने की बात करता है वह इसलिए कि उसे भारतीय दार्शनिक चिन्तन का स्पर्श मिला था और इसे वह स्वीकार भी करता था। इतिहास के तथ्य और इतिहास के गढ़े हए सबूत इतिहासबोध में सहायक नहीं होते, यह वह तथ्यातीत बोध है जिससे एक बच्चाे जो बोलना तक नहीं जानता यह समझ लेता है कि कौन उसे प्यार करता है, कौन नहीं। इसे तुम नहीं समझ पाओगे, क्योंकि तुम स्वयं इतिहास ध्वंस के उस जघन्य कृत्य में सबसे आगे रहे, अपने को सेक्युलर सिद्ध करने की परीक्षा से गुजरने के कारण। तुम बस इतना जानो कि मिल उस मूल्यांकन से बौखलाया हुआ और इसलिए मानसिक रूप से विक्षुब्ध नस्ल वादी और रंगभेदी बहुज्ञ था जिसे विद्वान कहने में मुझे संकोच है परन्तु उसकी प्रतिभा की प्रखरता को स्वीकार करने में संकोच नहीं है। उस पर तरस आता है, इस टुच्चेपन से बच पाता तो वह अपने बेटे का बाप या बेंथम का मित्र होने के नाते याद नहीं किया जाता, वह एक महान विभूति हो सकता था। यही सीमा उसके गुरु डूग्लस स्टीवर्ट की थी जिसने वैसी ही बौखलाहट में घोषित किया था कि अलेक्जेंडर के हमले के बाद ग्रीक भाषा के संपर्क में आने के बाद भारत के फरेबी ब्राहूमणों ने संस्कृत नाम की एक जाली भाषा तैयार कर दी, अन्यथा उसका भी मैं बहुत आदर करता हूँ । जानते हो, इन्हें क्या समझता हूॅे?”

वह चुप रहा । ऐसे प्रश्न प्रश्न होते भी नहीं ।

”मैं इन्हें बौद्धिक मृगी का, इंटेलेक्चुअल एपिलेप्सी का मरीज मानता हूँ जो अपने देश, धर्म, भूभाग के प्रति अन्ध आसक्ति के कारण उसकाे किसी अन्य की तुलना में किसी भी काल और किसी भी क्षेत्र में पिछड़ा होने की कल्पना तक नहीं कर पाते और इसका साक्षात्कार होने पर उनकी अपनी बुद्धि का उपयोग उसके निषेध और विनाश के लिए करने को बाध्य हो जाते हैं जिस पर उनका स्वयं का नियन्त्रण नहीे रहता।”

”मैंने जब कहा था कि सभ्यता का आविर्भाव, खेती का आविष्का्र भारत में हुआ था तो यह भी बताया था क्यों ? बताया था कि किन परिस्थ्तियों में कितनी संस्कृतियों के लोग भारत में शरण लेने को बाध्य हुए थे और उनके बीच मारकाट से ले कर मिल कर बॉंटने खाने, शादी व्याह करने तक के बहुत तरह के संबंध थे और इनकी तकनीकी का आदान-प्रदान भी किन्हीं अंशों में हुआ था। फिर हिमयुगीन दुर्दिनों के बीतने पर, ऊष्म काल आने पर, थोड़ी निश्चिन्त‍ता हुई तो उन कौशलों का कमाल कई रूपों में सामने आया। आहारसंग्रह के चरण के सीधे आग पर भून कर जौ की बालियाँ खाने से लेकर उन्नत चरण का पूरा इतिहास हमारे रीतिविधानों से ले कर भाषा में और जहां तहॉं पुरातत्व में और हमारे नृतत्व में सुरक्षित है। इसकी ओर हमारे समाजशास्त्रियों, नृतत्वविदों और इतिहासकारों का ध्यान ही नहीं जाता क्योंकि उनका इतिहास आर्यों के आक्रमण से आरंभ होता है। इसे बोध कहोगे, या कुबोध या बुद्धिनाश ?

”मैं उन परिस्थितियों, कौशलों, प्रमाणों को सामने रख कर तथ्य निरूपण कर रहा था जिसमें भले यह कमाल भारतीय भूभाग में हुआ हो, इसमें विश्वमानवता का योगदान था, यह भी याद दिलाया। जैसे अपने दबाव की सांकेतिक भाषा में प्रकृति ने आदेश दिया हो, सभी आकर मिलो और अपनी अगली मंजिलों की दिशा और रूप निर्मित करो – उच्छ्र्वस्व महते सौभगाय । दिमाग तुम्हारा इतना कच्चा है कि यह पूरा खाका उसमें अट नहीं पाता इसलिए एक तिनका चोंच में दबा कर उड़ चलते हो।

”मिल नस्ल की बात कर रहा था, बिना किसी तर्क के दिशा की बात कर रहा था, इतनी प्रखर प्रतिभा का होते हुए भी वह जिद्दी जाहिलों जैसी बातें कर रहा था। मैं दिशा की नहीं न किसी नस्ल की बात कर रहा था, हमारी चेतना में नस्ल है ही नहीं। हो ही नहीं सकती। यहां तो एक ही पिता की दो पत्नियों की सन्तानों की समस्या है जिनकी जीवनदृष्टि भिन्नं है, एक दूसरे के प्रतिकूल तक है, परन्तु यह रक्त के कारण, या जगह के कारण नहीं, उसी यथार्थ के विषय में दो तरह की दृष्टियों के कारण है।

”और वह जो तुम लोग वैज्ञानिकता की बात करते हो, उसको तो पश्चिमी नजरिया अपना लेने के बाद समझा ही नहीं जा सकता जिसमें एक के होते दूसरा नहीं रह सकता या उसको मिटा कर ही रह सकता है। ज्ञान और विज्ञान है तो विश्वास के लिए जगह नहीं रह जाएगी। यह वैज्ञानिक दृष्टि है ही नहीं।”

”फिर वैज्ञानिक दृष्टि क्या है, मैं भी तो जानूँ ।”

”एक किस्सा तुम्हें सुनाऊँ। अभी, इसी समय याद आ गया। कहीं पढ़ा था। एक बार चन्द्र शेखर वेंकट रामन् किसी विदेशी सज्जन के अतिथि थे, उनके परिवार में किसी को तेज बुखार था, उन्होंने उसे पास बुलाया और एक तार उसके हाथ में बॉध दिया। बुखार उतर गया। आतिथेयी ने समझा यह भी इनका कोई आविष्कार होगा। जिज्ञासा की ताे उन्हों ने बताया, बचपन में मॉं ऐसे ही बॉंध देती थी, मैंने भी बस वही किया। तुम समझे मैं क्या कहना चाहता हूँ। छोड़ो नहीं समझोगे तुम। फूलहिं फलहिं न बेत जदपि सुधा बरसहिं जलद । अगली अर्धाली किसी से पूछ लेना। पर यार जिस बात को कहने की भूमिका कल बनाई थी, कल भी नहीं कह पाया और आज भी वह कहने से रह गई।”

”किसी बात को कहने के लिए दिमाग पर नियन्‍त्रण होना चाहिए । वही नहीं है तो पूरी होगी कैसे । तुम अधूरे वाक्‍यों के बादशाह हो।”

”शायद तुम ठीक कहते हो। बादशाहत भी‍ मिली तो भाषा के चिथड़ों की ।”

Post – 2016-08-20

an extract from my post dt. 19.8.16

इस मुखौटे के कारण, उनका इतिहासध्‍वंस भी एक विशाल पाठक वर्ग के लिए जिसमें सभी विचारधाराओं के उदार, मानवतावादी और ‘वैज्ञानिक’ सोच के भूखे बुद्धिजीवियों की नजर में तथ्‍यपरक, वैज्ञानिक और ‘मार्क्‍सवादी’ इतिहास होने का भ्रम पैदा करने में सफल होता है। इनकी व्‍याख्‍या में किस तरह की घालमेल की जाती है, इसका एक नमूना मैं ए.के. रामानुजन के रैबार के उसी अंक में प्रकाशित लेख के एक अंश से पेश करना चाहूँगा जिससे एक उद्धरण कल उपयोग में लाया था। इस लेख का शीर्षक है, Is there an Indian way of Thinking? इस लेख की रणनीति और तरकीब, यदि आप तनिक भी शिथिल हों तो, आप को इस बात का कायल बना सकती है कि गुलाम मानसिकता वस्‍तुपरक और वैज्ञानिक मानसिकता है।
वह अपने पिता के ज्ञान, विषय पर अधिकार और उनके जीवनमूल्‍यों का उल्‍लेख करते हैं जिसे वह अपनी ‘आधुनिक शिक्षा और आधुनिक सोच’ के चलते अलग हट आए थे और अच्‍छी बात है कि वह इसे कनवर्सन की संज्ञा देते हैं:
I had just converted by Russel l to the scienific attitude’. I (and my generation ) was troubled by his holding together in one brain both astronomy and astrology; I looked for consistency in him he didn’t seem to care about, or even think about. When Iasked him what the discovery of Pluto and Neptune did to his archaic nine-planet astrology, he said, ‘You make necessary corrections, that is all.’ Or, in answer to how he could read Gita religiously having bathed and painted on his forehead the red and white feet of Vishnu, and later talk appreciatively about Bertrend Russell and even Ingersoll, he said, ‘The Gita is one’s hygene. Besides don’t you know, the brain has two lobes.
मुझे यह लगता है कि उनके पिता जी पांडित्‍य में उनसे कुछ बीस पड़ते थे क्‍योंकि उन्‍होंने अपनी किसी ग्रन्थि के कारण आधुनिक दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और विज्ञान के आविष्‍कारों और अनुसंधानों के प्रति उपेक्षा न दिखाई थी। उन्‍हें यह बाेध था कि विज्ञान में शाश्‍वत सत्‍य नहीं होता, नये तथ्‍यों के आने के बाद उन्‍हें उनके अनुसार समायोजित करना होता है जो वह कर रहे थे, वह रसेल को और इंगरसोल को पढ़ चुके थे और उनके विचारों का सम्‍मान करते थे और अपने पुत्र को उसकी आपत्तियों का निराकरण करते हुए अपना पक्ष रखते थे, जब कि अपने कनवर्सन के बाद संभवत: रामानुजन वह छूट अपने पुत्र को नहीं दे सकते और उसे जाहिल और नासमझ कह कर प्रतिवाद करने तक से रोक सकते हैं।
उन्‍हें पता था मस्तिष्‍क में दो कोटर हैं और दोनों सजीव और अपने विरोधों के साथ जीवित और सक्रिय रहें तभी हम सही सोच रख सकते हैं। जो कुछ अभी आज की पहुंच में अप्रिय लग रहा है , जब तक वह बाधक नहीं बनता है, उसका निर्वाह करना चाहिए, पता नहीं उनमें क्‍या सत्‍य छिपा हो जो आज हमारी समझ में नहीं आ रहा है, कल समझ में आए। मैंने अक्षत और चावल के संबंध की चर्चा करते हुए इसकी ओर संकेत किया था। कनवर्सन के बाद जैसे व्‍यक्ति अपने ही अतीत से अपना संबंध काट लेता है, अपने इतिहास से मुँह मोड़ लेता है और इसी को अपनी वैज्ञानिक समझ समझने लगता है जिसको प्रमाणित करने के लिए वह आत्‍मतिरस्‍कार के लिए तर्क और प्रमाण तलाशने लगता है, वैसा ही रामानुजन के साथ घटित हुआ लगता है।
अब रामानुनन द्वारा अपनी वैज्ञानिक समझ को स्‍थापित करने के लिए जिस रूप में भारतीय मान्‍यताओं को निकृष्‍ट सिद्ध करने के दृष्‍टान्‍त और प्रमाण दिए गए हैं और पाश्‍चात्‍य विचारों को बिना पकाए सिझाए निगल जाने का प्रमाण मिलता है, उसका नमूना यह है:
Another trait of ‘inconsistency’ is the apparent inability to distinguish self and non-self. One has only to read Manu after a bit of Kant to be struck by the former’s extraordinary lack of universality. He seems to have no clear notion of a uniersal human nature from which one can deduce ethical decrees like ‘Man shall not kill’ or ‘Man shall not tell an untruth’.
Manu VIII.267 (quoted by Muller 1883) has the following. A Kshatriya, having defamed a Brahmana, shall be fined one hundred (panas) ; a Vaishya one hundred and fifty to two hundred (panas); a Sudra shall have corporal punishment.
Even truth telling is not an ubconditional imperative, as Miller’s correspondents discovered:
An untruth spoken by people under the influence of anger, excessive joy, fear, pain, or grief, by infnats, by very old men, by persons labouring under delusion, being under theinfluence of drink, or by mad men, does not cause the speaker to fall, or as we would say, a venial not a mortal sin [Gautam paraphrased by Muller (1883, 70).
गनीमत है कि लंबी बहस के बाद वह आधा तेरा आधा मेरा वाले, लुटे हुए माल का आधा लुटेरे का और आधा लुटने वाले का वाली ‘समझदारी’ पर पहुँचता है। हम उसी के विवेचन से जिस सचाई का सामना करते हैं वह यह कि :
1. यह व्‍यक्ति जिसे अपने परिवार और परिवेश से यह अवसर मिला था कि वह मूल स्रोतों का अ‍ाधिकारिक ज्ञान रखने के बाद अपना मत बनाता वह अंग्रेजी शिक्षा के कारण, रसेल के मैं ईसाई क्‍यों नहीं हूँ की नकल करते हुए बिना उन कारणों पर ध्‍यान दिए, मैं हिन्‍दू क्‍यों नहीं हूँ सिद्ध करने के अभियान पर जुट गया और इस उत्‍साह में जो सुलभ ज्ञान था उससे वंचित हो गया।
2. उसे संस्‍कृत भाषा और साहित्‍य का ज्ञान पाश्‍चात्‍य विद्वानों के माध्‍यम से है ओर वह उन्‍हें जाँचने परखने की योग्‍यता नहीं रखता।
3. वह विधि विधान को दार्शनिक स्‍थापना मान लेता है और दर्शन जिनमें वैश्विक और सार्विक का चिन्‍तन किया जाता है, उनमें से किसी का उसे ज्ञान नहीं और यह ज्ञान तक नहीं कि विधिविधान में बहुत सारे अपवाद और उपविधान होते हैं और इसके बिना वे लट्ठविधान बन जाएँगे। आज भी न्‍याय विचार में उन परिस्थितियों का ध्‍यान रखा जाता है जिनमें वह अपराध हुआ है और इसका इस हद तक पालन किया जाता है कि इसके बल पर अपराध के वकीलों की इमारते न्‍याय से भी ऊपर चली जाती हैं।
4. यह मैक्‍समूलर को उद्धृत तो करता है परन्‍तु इन्‍हीं के माध्‍यम से मैक्‍समूलर भारतीय सभ्‍यता का जो मूल्‍यांकन करते हैं उससे बचने या उसे छिपाने का प्रयत्‍न करता है।
5. इसे अपनी तुलना में कालरेखा का ध्‍यान नहीं, दो हजार साल पहले के भारतीय विधान को आज के दार्शनिक आख्‍यान से जोड़ते हुए देखता है, दर्शन का विधिव्‍यवस्‍था से घालमेल और कालक्रम का घालमेल।
इसी के बल पर यह अतिपठित पर दिमागी तौर पर दिवालिया विद्वान हमारे मार्क्‍सवादी व्‍याख्‍याकारों को तिनके का सहारा ही नहीं देता वे उस तिनके को पहाड़ बना कर पेश करते हैं , पर सचाई तो यही है कि ये सोचने ही नहीं पढ़ने तक में हमारी पैस्सिविटी के कारण हमारे बौद्धिक कायाकल्‍प के लिए प्रयत्‍नशील हैं।

Post – 2016-08-19

निदान -24
बौद्धिक लकड़बग्‍घे

हम दो अतियों के शिकार हैं । एक है जिनजबद्धता, जिसमें हम दु‍निया को न केवल अपनी नजर से देखते हैं अपितु अपने अनुसार ढालना चाहते है। इसमें अपनी बुराइयों की ओर हम नहीं देख पाते या उनको भी उचित ठहराते हैं, परन्‍तु दूसरों की केवल बुराइयॉं दिखाई देती हैं। उनका कोई कारण हमें नहीं दिखाई देता, वे उसमें निसर्गजात मान ली जाती हैं। उसकी अच्‍छाई को हम नहीं देख पाते, या उनमें कोई ऐसा कोण तलाश लेते हैं जिसमें उसका अवमूल्‍यन किया जा सके, नकारा जा सके, या हास्‍यास्‍पद बनाया जा सके। मिल का इतिहासलेखन इसी सोच पर आधारित था।

इसे ही ईरानी सभ्‍यता को भारतीय सभ्‍यता से श्रेष्‍ठ सिद्ध करने के लिए भारत के ईरानी मूल से, फिर किसी भी पश्चिमी देश से, जुड़े हाेने पर गर्व करने वाले अभिजात मुसलमानों ने अपनाया और यह दुहराते रहे कि भारतीयों को न जीने का शऊर था, न कपड़े लत्‍ते का, न सलीके से बोलने चालने और व्‍यवहार करने का । वे उजड्ड रहे हैं और हमने उन्‍हें सभ्‍य बनाया है और उसी में जुड़ कर वह चक्र पूरा होता है कि पुरानी ईरानी या अवेस्‍ता की भाषा में वैदिक भाषा से समानता है तो इन दोनों में अवेस्‍ता की भाषा अधिक पुरानी है और फिर आर्यों की बर्बरता आदि की कहानियॉं गढ़ कर इस चक्र को पूरा किया जाता है।

इस तरह के आत्‍मवादी इतिहास से अपनी शाश्‍वत श्रेष्‍ठता का विश्‍वास अपनों में और सनातन बर्बरता का विश्‍वास दूसरों में उतारा जाता है। इससे अपने भीतर स्‍वामित्‍व का बोध प्रबल किया जाता है और इतरों में गुलामी के मूल्‍यों को उनकी चेतना का अंग बनाया जाता है जिसके लिए उन्‍हें धन मान भी दिया जाता है। यह मूल्‍य जब हमारी बौद्धिकता का अंग बन जाता है और हम इस पर गर्व करने लगते हैं तो यह स्‍मरण दिलाने पर भी घबराहट होती है कि किसी अवस्‍था में स्थिति ठीक इससे उल्‍टी रही है। चन्‍द्रशेखर जी जब प्रधानमन्‍त्री थे उन दिनाें धर्मपाल ने उनके साथ एक बात चीत का हवाला दिया है। उन्‍होंने जब बताया हमारी स्थिति वह नहीं थी जो बताई जाती है, बल्कि यह थी। चन्‍द्रशेखर ने हँस कर कहा, ”जब थी तब थी उसे जान कर क्‍या करेंगे, आज तो यह है।”

ऐसा ही उत्‍तर ऋग्‍वेद के प्रसंग में लोहिया जी के किसी कटाक्ष का सुना था जिसका ठीक सन्‍दर्भ और उनका वाक्‍य याद नहीं आता ।

ये दोनों लोग भारतविमुख नहीं थे जो कम्‍युनिस्‍टों को अन्‍तर्राष्‍ट्रीयता के नाम पर बना दिया गया था। इन सबमें सामान्‍य बात यह थी कि अपनी गर्दन झटकारने के बाद भी इन्‍होंने उस इतिहास का आत्‍मसात्‍करण कर लिया था जो धाक जमाने वाली सभ्‍यताओं द्वारा वशवर्ती समाजों को चिरन्‍तन वशवर्ती बनाए रखने के लिए तैयार किया जाता है।

वे इस मोटे सच से परिचित नहीं थे कि इतिहास की समझ हमारी चेतना के रूप का या कहें हमारी मानसिकता का निर्माण करती है और वर्तमान में सर झटकते रहने से उन बन्‍धनों से मुक्ति नहीं मिल सकती, न उस गति से आगे बढ़ा जा सकता है जैसे सामान्‍य स्थिति में होना चाहिए। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि इन व्‍याख्‍याओं द्वारा हमें कब किस तरह बॉधा गया और इनको अपनी शक्ति और स्थिति का सही परिचय प्राप्‍त करके ही गुलामी की मानसिकता से बाहर किया और फिर पूरे मनोबल से आगे बढ़ा जा सकता है।

इस बात को मैं कई बार दुहरा चुका हूँ अौर आगे भी दुहराता रहूूँगा कि वर्तमान अतीत से अलग नहीं है, उसी का शिखर बिन्‍दु है जो नये शिखरों की ओर बढ़ने के साथ अतीत बनता चला जाएगा। उससे कट जाने पर या तो हम धँस जाऍंगे या उधिया जाऍंगे, अपने पॉंवों पर खड़े नहीं रह सकते।

दूसरी अति इसी का दूसरा सिरा है, अपनी दृष्टि पर विश्‍वास न कर पाना और अपने को और दूसरी चीजों को दूसरों की दृष्टि से देखना। यह उन मूल्‍यों के आभ्‍यन्‍तरीकरण से पैदा होता है जो दूसरो को गुलाम बनाए रखने के लिए तैयार किए गए थे और इनको आत्‍मसात् करने के बाद आप को उनका पालतू बन कर रहना आजाद रहने की अपेक्षा अधिक आरामदेह प्रतीत होता है। इसके प्रमाण स्‍वरूप मैं एक बार उन कीमती कुत्‍तों की याद दिला चुके हैं जिन्‍हें सब कुछ हासिल होता है जो उनके स्‍वामी को हासिल है, बस एक अन्‍तर के साथ जो उस जंजीर से पैदा होती है जिसका एक सिरा आपकी गर्दन में बँधा रहता है और दूसरा उसके हाथ में होता है। आप उन सुखों और सुविधाओं के अभ्‍यस्‍त हो जाने के बाद उसके इशारे पर ही अपनी गर्दन उस पट्टे और जंजीर को बॉंधने के लिए पेश कर देते हैं। न केवल गुलामी से आप समझौता कर लेते हैं, बल्कि उसे अपने स्‍वभाव का अंग बना लेते हैं। इसे ही हिन्‍दू समाज में पैदा करने के प्रयत्‍न में वह आयोजन किया गया जिसे मैं मध्‍यकालीन देवस्‍थलों, मठों और मूर्तियों को नष्‍ट और अपवित्र करने जैसा ही गर्हित मानता हूँ, परन्‍तु इसके जनक सुशिक्षित लोग थे, इसलिए इसे उससे भी अधिक गर्हित मानता हूँ।

”हम पहले भी यह कह आए हैं कि हमारे शिक्षा विभाग को निरापद मान कर नेहरू जी के समय से ही विरल अपवादों को छोड़ कर उन्‍हीं मुस्लिम नेताओं के हाथ में रखा गया जो अमीर परिवारों से आए, आधुनिक शिक्षा प्राप्‍त परन्‍तु मुस्लिम लीेगी मानसिकता के शिकार थे और इस इतिहास का अकाट्य और अपरिवर्तनीय पाठ बनाने का प्रयत्‍न करते हुए इतिहास और साहित्‍य की पुस्‍तकों का एकाधिकार एनसीइआरटी को सौंप दिया और इसके अकूल मानदेय का प्रलोभन दे कर इसे योजनाबद्ध रूप में इतिहास का पेशा करने वाले हिन्‍दुओं से लिखवाया गया जो ऊपर दिए गए दृष्‍टान्‍त के जानवर की तरह पद, प्रतिष्‍ठा और धन से आकृष्‍ट थे यह कहना भी उनके साथ अन्‍याय होगा, क्‍योंकि वे उस विचारधारा से बँधे थे जिसमें उसी अभिजात वर्ग और उनके सरोकारों और आशंकाओं से ग्रस्‍त मुस्लिम साथियों के दबाव में मुस्लिम लीग की कार्ययोजना को अपनी कार्ययोजना में शामिल कर लिया गया था, इसलिए दूसरे तथ्‍य जो अधिक दबाव पैदा करते थे, उस मुखौटे के पीछे चले जाते हैं, और इनकी गुर्राहट भरी व्‍याख्‍याओं के पीछे उनकी जंजीर अपने हाथ में रखने वालों की फितरत का पता नहीं चल पाता। लगता है यह विशुद्ध विचारधारात्‍मक सरोकार से किया जा रहा है।

इस मुखौटे के कारण, उनका इतिहासध्‍वंस भी एक विशाल पाठक वर्ग के लिए जिसमें सभी विचारधाराओं के उदार, मानवतावादी और ‘वैज्ञानिक’ सोच के भूखे बुद्धिजीवियों की नजर में तथ्‍यपरक, वैज्ञानिक और ‘मार्क्‍सवादी’ इतिहास होने का भ्रम पैदा करने में सफल होता है। इनकी व्‍याख्‍या में किस तरह की घालमेल की जाती है, इसका एक नमूना मैं ए.के. रामानुजन के रैबार के उसी अंक में प्रकाशित लेख के एक अंश से पेश करना चाहूँगा जिससे एक उद्धरण कल उपयोग में लाया था। इस लेख का शीर्षक है, Is there an Indian way of Thinking? इस लेख की रणनीति और तरकीब यदि आप तनिक भी शिथिल हों तो इस बात का कायल बना सकती है कि गुलाम मानसिकता वस्‍तुपरक और वैज्ञानिक मानसिकता है।

वह अपने पिता के ज्ञान, विषय पर अधिकार और उनके जीवनमूल्‍यों का उल्‍लेख करते हैं जिसे वह अपनी ‘आधुनिक शिक्षा और आधुनिक सोच’ के चलते अलग हट आए थे और अच्‍छी बात है कि वह इसे कनवर्सन की संज्ञा देते हैं:

I had just converted by Russel l to the scienific attitude’. I (and my generation ) was troubled by his holding together in one brain both astronomy and astrology; I looked for consistency in him he didn’t seem to care about, or even think about. When Iasked him what the discovery of Pluto and Neptune did to his archaic nine-planet astrology, he said, ‘You make necessary corrections, that is all.’ Or, in answer to how he could read Gita religiously having bathed and painted on his forehead the red and white feet of Vishnu, and later talk appreciatively about Bertrend Russell and even Ingersoll, he said, ‘The Gita is one’s hygene. Besides don’t you know, the brain has two lobes.

मुझे यह लगता है कि उनके पिता जी पांडित्‍य में उनसे कुछ उन्‍नीस पड़ते थे क्‍योंकि उन्‍होंने अपनी किसी ग्रन्थि के कारण आधुनिक दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और विज्ञान के आविष्‍कारों और अनुसंधानों के प्रति उपेक्षा न दिखाई थी। उन्‍हें यह बाेध था कि विज्ञान में शाश्‍वत सत्‍य नहीं होता, नये तथ्‍यों के आने के बाद उन्‍हें उनके अनुसार समायोजित करना होता है जो वह कर रहे थे, वह रसेल को और इंगरसोल को पढ़ चुके थे और उनके विचारों का सम्‍मान करते थे और अपने पुत्र को उसकी आपत्तियों का निराकरण करते हुए अपना पक्ष रखते थे, जब कि अपने कनवर्सन के बाद वह छूट अपने पुत्र को नहीं दे सकते और उसे जाहिल और नासमझ कह कर प्रतिवाद करने तक से रोक सकते हैं।

उन्‍हें पता था मस्तिष्‍क में दो कोटर हैं और दोनों सजीव और अपने विरोधों के साथ जीवित और सक्रिय रहें तभी हम सही सोच रख सकते हैं, जो अभी आज की पहुंच में अप्रिय लग रहा है उसे, जब तक वह बाधक नहीं बनता है, उसका निर्वाह करना चाहिए, पता नहीं उनमें क्‍या सत्‍य छिपा हो जो आज हमारी समझ में नहीं आ रहा है, कल समझ में आए। मैंने अक्षत और चावल के संबंध की चर्चा करते हुए इसकी ओर संकेत किया था। कनवर्सन के बाद जैसे व्‍यक्ति अपने अतीत से संबंध काट लेता है, अपने इतिहास से मुँह मोड़ लेता है और इसी को अपनी वैज्ञानिक समझ समझने लगता है जिसको प्रमाणित करने के लिए वह आत्‍मतिरस्‍कार के लिए तर्क और प्रमाण तलाशने लगता है वैसा ही रामानुजन के साथ घटित हुआ लगता है।

अब रामानुनन द्वारा अपनी वैज्ञानिक समझ को स्‍थापित करने के लिए जिस रूप में भारतीय मान्‍यताओं को निकृष्‍ट सिद्ध करने के दृष्‍टान्‍त और प्रमाण दिए गए हैं और पाश्‍चात्‍य विचारों को बिना पकाए सिझाए निगल जाने का प्रमाण मिलता है, उसका नमूना यह है:
Another trait of ‘inconsistency’ is the apparent inability to distinguish self and non-self. One has only to read Manu after a bit of Kant to be struck by the former’s extraordinary lack of universality. He seems to have no clear notion of a uniersal human nature from which one can deduce ethical decrees like ‘Man shall not kill’ or ‘Man shall not tell an untruth’.

Manu VIII.267 (quoted by Muller 1883) has the following. A Kshatriya, having defamed a Brahmana, shall be fined one hundred (panas) ; a Vaishya one hundred and fifty to two hundred (panas); a Sudra shall have corporal punishment.

Even truth telling is not an ubconditional imperative, as Miller’s correspondents discovered:
An untruth spoken by people under the influence of anger, excessive joy, fear, pain, or grief, by infnats, by very old men, by persons labouring under delusion, being under theinfluence of drink, or by mad men, does not cause the speaker to fall, or as we would say, a venial not a mortal sin [Gautam paraphrased by Muller (1883, 70).
गनीमत है कि लंबी बहस के बाद वह आधा तेरा आधा मेरा वाले, लुटे हुए माल का आधा लुटेरे का और आधा लुटने वाले का वाली ‘समझदारी’ पर पहुँचता है। हम उसी के विवेचन से जिस सचाई का सामना करते हैं वह यह कि :
1. यह व्‍यक्ति जिसे अपने परिवार और परिवेश से यह अवसर मिला था कि वह मूल स्रोतों का अ‍ाधिकारिक ज्ञान रखने के बाद अपना मत बनाता वह अंग्रेजी शिक्षा के कारण, रसेल के मैं ईसाई क्‍यों नहीं हूँ की नकल करते हुए बिना उन कारणों पर ध्‍यान दिए, मैं हिन्‍दू क्‍यों नहीं हूँ सिद्ध करने के अभियान पर जुट गया और इस उत्‍साह में जो सुलभ ज्ञान था उससे वंचित हो गया।

2. उसे संस्‍कृत भाषा और साहित्‍य का ज्ञान पाश्‍चात्‍य विद्वानों के माध्‍यम से है ओर वह उन्‍हें जाँचने परखने की योग्‍यता नहीं रखता।

3. वह विधि विधान को दार्शनिक स्‍थापना मान लेता है और दर्शन जिनमें वैश्विक और सार्विक का चिन्‍तन किया जाता है, उनमें से किसी का उसे ज्ञान नहीं और यह ज्ञान तक नहीं कि विधिविधान में बहुत सारे अपवाद और उपविधान होते हैं और इसके बिना वे लट्ठविधान बन जाएँगे। आज भी न्‍याय विचार में उन परिस्थितियों का ध्‍यान रखा जाता है जिनमें वह अपराध हुआ है और इसका इस हद तक पालन किया जाता है कि इसके बल पर अपराध के वकीलों की इमारते न्‍याय से भी ऊपर चली जाती हैं।

4. यह मैक्‍समूलर को उद्धृत तो करता है परन्‍तु इन्‍हीं के माध्‍यम से मैक्‍समूलर भारतीय सभ्‍यता का जो मूल्‍यांकन करते हैं उससे बचने या उसे छिपाने का प्रयत्‍न करता है।

5. इसे अपनी तुलना में कालरेखा का ध्‍यान नहीं, दो हजार साल पहले के भारतीय विधान को आज के दार्शनिक आख्‍यान से जोड़ते हुए देखता है, दर्शन का विधिव्‍यवस्‍था से घालमेल और कालक्रम का घालमेल।

इसी के बल पर यह अतिपठित पर दिमागी तौर पर दिवालिया विद्वान हमारे मार्क्‍सवादी व्‍याख्‍याकारों को तिनके का सहारा ही नहीं देता वे उस तिनके को पहाड़ बना कर पेश करते हैं जिसको गाली देने की प्रबल इच्‍छा के बाद भी ह से आगे बढ़ नहीं पाता, मानहानि के डर से, पर सचाई तो यही है कि ये सोचने ही नहीं पढ़ने तक में हमारी पैस्सिविटी के कारण हमारे बौद्धिक कायाकल्‍प के लिए प्रयत्‍नशील हैं।