Post – 2016-08-06

निदान – 13
खंडित चेतना और विश्‍वसमाज

मेरा मित्र आज तैयारी के साथ्‍ा आया था। अपने स्‍वभाव के विपरीत उसने स्‍वर को संतुलित रखते हुए कहा, ”हमने धर्मआधारित सोच और राजनीति की भारी कीमत चुकाई है। जिन समस्‍याओं को सुलझाने के लिए यह कीमत दी गई वे पहले से उग्र हो गईं। स्‍वतन्‍त्र भारत में हमारा एकमात्र लक्ष्‍य था कि अब यह खंडित चेतना समाप्‍त हो। मुस्लिम लीग भारत में समाप्‍त हो गई थी। हिन्‍दू सांप्रदायिकता बनी रही, और इस चिन्‍ता में कि हमें धर्म और जाति से ऊपर उठ कर देशहित की राजनीति करनी चाहिए, विश्‍वसमाज का अंग बनना है, हमारे दल ने ही नहीं खुली सोच के सभी लोग उन मूल्‍यों और रीतियों व्‍यहारों की आलोचना करते रहे जिनसे संकीर्णता को बढ़ावा मिलता है। इसी में खानपान की अतिसंवेदनशीलता को कम करने के लिए ही प्राचीन ग्रंथों और खानपान के विधि निषेध का हवाला दिया जिसे हिन्‍दूवादी सोच के लोगों ने अपने ऊपर आक्रमण मान लिया और भावुक प्रतिक्रिया प्रकट की। शास्‍त्री जी, क्‍या आपको नहीं लगता कि स्‍वतन्‍त्र भारत में सांप्रदायिक राजनीति के लिए कोई जगह नहीं और यदि यह जारी रहती है तो इसके कारण अनिष्‍ट ही होगा, देश का भला नहीं।”

शास्‍त्री जी ध्‍यान से सुनते रहे और जब जवाब देने का समय आया तो भी अपने स्‍वर को संयत ही रखा, ”सर, लंबे समय तक एक ही तरीके से सोचते रहने के कारण कई बार आदमी को लगता है वह जो मानता है, वह लंबे सोच-विचार के बाद मानता है, जब कि अनजाने ही वह बहुत सारी बातों को ओझल करके अपनी मान्‍यता पर टिका रहता है। अाप लोगों ने तो वे दिन भी देखे हैं जब यह घटनाचक्र बदला था, आप मुझे यह समझने मे सहायता करें कि उत्‍तर भारत में मुस्लिम लीग का एक बहुत व्‍यापक संजाल बन गया था जिसके नेता कांग्रेस के नेताओं से अधिक मुखर थे। क्‍या पाकिस्‍तान बनने के बाद वे सभी पाकिस्‍तान चले गए थे ? ”

मेरा मित्र तत्‍काल कोई जवाब नहीं दे पाया।

शास्‍त्री ने कहा, ”उनका नब्‍बे प्रतिशत यहीं रह गया। वे राजनीतिक लोग थे। राजनीति के बिना जीवित नहीं रह सकते थे। बेनीपुरी जी ने लिखा है कि वे रातोंरात खादी पहन कर कांग्रेसी बन गए थे और इसके साथ ही कांग्रेस का चरित्र बदल गया था। कहें, मुस्लिम लीग कांग्रेस की आत्‍मा बन गई थी और कांग्रेस उसकी काया मात्र रह गई थी।

”आपकी पार्टी के बारे में तो डाक्‍साब ने प्रमाण और आपके नेताओं के बयान के साथ यह सिद्ध किया था कि आपकी पार्टी ने ही विभाजन को संभव बनाया था, उसने मुस्लिम लीग का एजेंडे को अपने घोषित एजेंडे से भी अधिक महत्‍व दिया और हिन्‍दुओं की पीड़ा पर अट्टहास करते रहे। याद है न आपको कामरेड डांगे का विभाजन से पूर्व हुए नरसंहार पर बयान। कान्ति के लिए खून बहाने की आदत डाली जा रही थी।

”समाजवादियों का एक दल था जो मार्क्‍स से प्रेरित था, पर अपने परंपागत मूल्‍यों और मानों का उपहास नहीं करता था, उसके प्रति आलोचनात्‍मक दृष्टि रखता था और एक समय में उसका भी लेखन प्रगतिशील माना जाता था, उसे हाशिए पर डाल दिया गया और जो अपने गलित रूप में अवतरित हुआ वह पतनोन्‍मुख बौद्ध मत के लोक मत में प्रवेश और पंचमकारी बनने की याद दिलाता है।

”इसके बावजूद इन सभी ने केवल और केवल प्राचीन इतिहास, हिन्‍दू मूल्‍यों और जीवनादर्शों , हिन्‍दू शास्‍त्रों पर ही प्रहार करना आरंभ नहीं किया अपितु अपनी समझदारी में हिन्‍दू को ब्राह्मणवाद और हिन्‍दू समाज की विकृतियों के लिए केवल ब्राह्मणों को उत्‍तरदायी बना कर सभी दिशाओं से तीर चलाए जाते रहे। आप कहते हैं कि स्‍वतंत्र भारत में मुस्लिम लीग समाप्‍त हो गई और मुझे लगता है इसके बाद उसने रक्‍तबीज की तरह फैल कर अपने को सेक्‍युलर कहने वाले सभी संगठनों में प्रवेश कर लिया। अब एक नया समीकरण उभरा जिसमें मुस्लिम लीग का हिन्‍दू नाम सेक्‍युलरिज्‍म हो गया और जिन दलों की आत्‍मा में पहले से ही इसका प्रवेश हो चुका था वे अपने पुराने सभी लक्ष्‍य छोड़ कर सेक्‍यलरिज्‍म के बचाव के लिए मस्लिम पूर्व के इतिहास और संस्‍क़ृति को नष्‍ट करने के एक बृहद आयोजन में सीधे या परोक्ष रूप से एकजुट होते गए और यदि किसी मार्क्‍सवादी ने इस हद तक झुकना पसन्‍द नहीं किया तो उसकी भी खाट खड़ी करने लगे। आप मुझे यह समझने में मदद करें कि हिन्‍दूव्‍यतिरिक्‍त भारत का जो आदर्श आपने इन दबावों में अपनाया उसमें हिन्‍दू की आत्‍मरक्षा की आवश्‍यकता पहले से अधिक बढ़ी या घटी और इसके लिए हम उत्‍तरदायी हैं या आप लोग जो अपने को उदार और सहनशील दिखाने के उत्‍साह में मैसोकिज्‍म के शिकार हो गए और हमसे भी यही अपेक्षा करते हैं, कि हम भी आप जैसे बन जायं?हिन्‍दू की पीड़ा को आनन्‍द का स्रोत मान लें वह इस देश में हो या किसी अन्‍य में। हम धर्म और जाति निरपेक्ष भाव से किसी संकटग्रस्‍त भारतीय की पीड़ा को अनुभव करते हैं और इसके लिए अपनी जान लगा देते हैं, यह हमने अपने नारों से नहीं नीति और व्‍यवहार से सिद्ध किया है, विश्‍वमानवता की चिन्‍ता भी हमें है, आपको कभी रही ही नहीं। आपके आदर्श में तो उसी देश का पूरा समाज दोस्‍त और दुश्‍मन में, शिकारी और शिकार में बदल दिया जाता है।”

Post – 2016-08-06

सभी रहते हैं अपनी ही जमीं पर आसमानों मे
मैं अपने आसमां को सबसे ऊंचा और बड़ा समझा
जमाने को समझता क्‍या जमीं को जब नहीं समझा
तुम्‍हीं देखो कि तुम क्‍या थे और मैंने तुमकाे क्‍या समझा
बड़ी मुश्किल में जां थी जान के दुश्‍मन हजारों थे
मगर हर दुश्‍मने जां को मैं अपना और सगा समझा।
मिले धोखों पर धोखे फिर भी इत्‍मीनान कायम था
पिया जहराब उससे आबे जमजम का मजा समझा ।
कहाँ की बात करते किस समय की बात करते हो
अरे भगवान तूने आदमी को ही कहां समझा।
*** *** ***
हम न समझेंगे तुम्‍हारी बात फिर भी देखना
तुमको समझाएंगे तुमको क्‍यों समझ पाया नहीं।

Post – 2016-08-05

वह मेरे पास था पर साथ वह रहा ही नहीं।
जो मेरे नाम से उसने कहा कहा ही नहीं।
व ह तो मुझमें ही समाया हुआ दुयमन था मेरा
मार कर मुझको देखिए कि खुद मरा भी नहीं।

Post – 2016-08-05

निदान – 12

राष्‍ट्रीय सैडोमैसोकिज्‍म का दौर

”शास्‍त्री जी, कल आपने इस भले मानस को चुप तो करा दिया, पर क्‍या अपनी बात भी मनवा सके ?”

”इसमें दुविधा कहॉं से पैदा हो गई । मैंने तो प्रमाण देते हुए अपनी बात रखी थी, यदि इसके बाद भी दुविधा बनी रह जाय तो हम जीवन पर्यन्‍त वाद-विवाद करते रहें, किसी निर्णय पर पहुंच ही नहीं पाएंगे।”

”वाद जीतना सत्‍य की प्रतिष्‍ठा नहीं होती। उन सन्‍देहों का निराकरण भी जरूरी है जो तर्कातीत होते हैं।”

”मैं समझ नहीं पाया आप क्‍या कहना चाहते हैं।”

”कहना यह चाहता था कि यह कानून लंबे समय से रहा है, परन्‍तु इसे ले कर इतनी अतिसंवेदनशीलता जो क्रूरता की सीमाएं लांघ जाय, जिससे अपना ही समाज खंडित हो जाय, मन में गहरे जख्‍म पैदा हो जायं, यह तो न समाज के हित में है न राष्‍ट्र के। हाल में ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें आपके प्रतिनिधियों की संलिप्‍तता न भी रही हो तो उन्‍होंने उसका समर्थन किया है, या ऐसी चुप्‍पी साधे रहे हैं, जिससे लगे कि वे ऐसी प्रतिक्रियाओं का समर्थन करते हैं।”
”डाक्‍साब, आपकी बात अब मेरी समझ में आ गई, मैंने वाद जीता था, उन्‍हें कन्विंस नहीं कर सका था, अन्‍यथा वह डैमेज कंट्रोल जैसा कटाक्ष न करते। और समझ में यह बात इसलिए आई कि इस समय मैं भी आपकी व्‍यख्‍या और अारोप के समक्ष निरुत्‍तर हूं, इसलिए कहें वाद तो आप जीत गए, पर मैं अपनी हार स्‍वीकार नहीं कर पाता।”

”इसका कोई कारण तो होगा।”

”कारण यह कि, इस समस्‍या को जितना सरलीकृत बना दिया जाता है और फिर गणित के निर्भ्‍रान्‍त उत्‍तर जैसा उत्‍तर गढ़ लिया जाता है और उससे असहमत होने वालों से किसी को किसी भी तर्क से जोड़ कर अपराधी सिद्ध कर दिया जाता है उतना इकहरा और सरल यह प्रश्‍न है नहीं। मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि मैंने इस प्रश्‍न पर बहुत गहराई से सोचा है। हो सकता है इसके कुछ पहलू मेरे पूर्वाग्रहों के कारण मेरी समझ में ठीक से न आ सके हों परन्‍तु मुझे यह भ्रम है कि आप लोग इस पर यान्त्रिक ढंग से सोचते हैं, हिन्‍दू समाज को एकपिंडीय और यन्‍त्रमानवों का समुदाय मान लेते है। पूरे हिन्‍दू समाज में किसी ने कुछ ऐसा किया या कहा हो जो आप को ठीक न लगे तो उसके लिए उसे हिन्‍दू मुल्‍यों की चिन्‍ता करने वाले सगठन से जोड़ कर अपनी मनमानी सिद्ध करते हैं। अापकी सोच में में हिन्‍दू समाज की संवेदनाओं और पीड़ाओं के लिए कोई स्‍थान नहीं होता, जब कि दुनिया के प्रत्‍येक दूसरे समाज की भावनाओं का आपको इतना खयाल होता है कि लगता है हमने गुलामी के मूल्यों का आभ्‍यन्‍तरीकरण कर लिया है। वे अपमान हमारी चेतना में इस तरह उतार दिए गए हैं मानो उनसे अपमानित न हुए तो सम्‍मानित रह ही नहीं सकते।”

मित्र को मौका मिला, ”क्‍या गजब का पदव्‍याघात है, अपमानित न हुए तो सम्‍मानित रह ही नहीं सकते।”

शास्‍त्री जी इससे उत्‍तेजित नहीं हुए, उल्‍टे अधिक शालीन हो गए, ”आप ने ठीक समझा । और यही पदव्‍याघात मुझे आहत भी करता है। आप अपने को हिन्‍दू भी कहते हैं, हिन्‍दुओं का, पूरे हिन्‍दू समाज का, इसके मूल्‍यों, मान्‍यताओं, विश्‍वासों सभी का उपहास भी करते हैं और इससे गौरवान्वित भी अनुभव करते हैं और कभी यह सोचने का कष्‍ट भी नहीं करते कि अापके आचरण में यह अन्‍तर्विरोध आया कैसे ? और आया तो अबतक विद्यमान क्‍यों है ? अपने को बुद्धिमान का आत्‍मप्रमाण देने वाली पूरी पीढ़ी की पीढ़ी इससे मुक्‍त क्‍यों नहीं हो पाती ?”
”यदि हमारी समझ में नहीं आता तो आप ही समझाइये।” मित्र से चुप न रहा गया।
”समझा तो सकता हूं, पर पहली बात तो यह कि डाक्‍साब से प्रश्‍न करना अच्‍छा लगता है, अपना पक्ष रखना भी आश्‍वस्तिकर होता है, परन्‍तु इनके सामने खुल कर बोलते हुए थोडी झिझक बनी रहती है कि पता नहीं कौन सी बात इन्‍हें अटपटी लगे और मन ही मन उसका आनन्‍द लेने लगे।”

”मुझे आनन्‍द भी नहीं लेने देना चाहते आप ?” मैंने हंस कर कहा ।

शास्‍त्री जी ने भी हंसते हुए ही जवाब दिया, ”मैं अपने संकोच की बात कर रहा था। हां, एक शर्त है, हम इसे जीत-हार का प्रश्‍न बना कर बात न करें। ए‍क गंभीर समस्‍या समझ कर इसको सुलझाने का प्रयत्‍न करें। मैं कुछ ऐसी बातें अपने मन्‍तव्‍य को स्‍पष्‍ट करने के लिए कह सकता हूं जो संभव है सुनने में कठोर लगें पर मेरा आशय व्‍यक्तिगत नहीं, समस्‍यागत ही होगा। समस्‍या के जिन जटिल पहलुओं की मैं बात कर रहा था उसे लें। किसी समाज के बुद्धिजीवी या कहिए ऐसे अवसरवादी तत्‍वों को लें जो अपनी मंजिलें तय करने के लिए अनुचित या अापत्तिजनक विचारों को भी आत्‍मसात् कर लेते हैं और इस दिशा में असावधान होने के कारण उसी पर गर्व करने लगते हैं। यह तो डाक्‍साब का ही सुझाव था जिसे मैंने स्‍वयं भी समझने का प्रयत्‍न किया। इसे सैडिज्‍म और मैसोकिज्‍म कहा जाता है और इसकी ओर यौन व्‍यवहार का अध्‍ययन करते समय मनोवैज्ञानिकों का ध्‍यान गया इसलिए उसी तक इस पक्ष को रख कर ही बात की जाती रही। ये दोनों प्रवृत्तियां विपरीत हैं जिनमें लगातार अपमान और यंत्रणा सहते हुए एक व्‍यक्ति विशेषत: जिसे हम नारी से जोड़ते हैं, इसे अपने यौन व्‍यवहार से इस तरह जोड़ लेता है कि यह रिफ्लेक्‍स ऐक्‍शन जैसा हो जाय। पीड़ा सहते हुए तड़पना और फिर उसका आदी हो कर उसमें आनन्‍द लेने लगना या उसके बिना अतृप्‍त अनुभव करना। ठीक इसके विपरीत पीडि़त करने में ही आनन्‍दानुभूति। दोनों का कई बार एक ही व्‍यक्ति में लक्षण पाया जाने लगता है जिसे सैडोमैसोकिज्‍म कहते हैं। परन्‍तु इसे काम क्षेत्र से बाहर ले जा कर कामनापूर्ति के व्‍यापक क्षेत्र में भी देखा जाना चाहिए जिसमें अपमानजनक शर्तों को सहर्ष स्‍वीकार कर लेने पर सम्मान और पुरस्‍कार आदि का लाभ होने के कारण व्‍यक्ति उस पर गर्व अनुभव करने लगता है और उन लोगों से घृणा करने लगता है जो अपने सम्‍मान या आत्‍मगौरव के लिए कष्‍ट झेलना, उपेक्षित रहना, अवसरों और सुविधाओं से वंचित रहना तो स्‍वीकार कर लेते हैं परन्‍तु झुकते नहीं। न परपीड़न में सुख पाते हैं न आत्‍मपीड़न के लिए तैयार होते हैं। सर, आप लोग जो सेक्‍युलरिज्‍म की आड़ में कहते और करते हैं, उस पर इस दृष्टिकोण से विचार कीजिएगा और किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचे तो मुझे भी समझाइयेगा।”

”आपने तो बड़े तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी शास्‍त्री जी। मुझे तो इसकी उम्‍मीद ही न थी।” मैंने कहा तो शास्‍त्री जी गदगद हो गए। मेरे मित्र ने भी तत्‍काल कोई प्रतिक्रिया नहीं की।

”अब रही बात इस बीफ की । कब से क्‍या रहा है यह मेरे लिए उतना महत्‍व नहीं रखता। वेद में या उससे पहले के दिनों में क्‍या प्रचलित रहा कैसे उसके निषेध के प्रयत्‍न होते रहे इसे ले कर लोग कई तरह की बातें करते हैं, पर वेद में गाय के लिए अघ्‍न्‍या का प्रयोग है इसलिए मैं तो यही मानता हूं कि इसका निषेध था।
मैंने बीच में हस्‍तक्षेप किया, ”हम समझने का प्रयत्‍न कर रहे हैं इसलिए थोड़ा अपने को इससे अलग करके देखें। वैदिक समाज में शायद चिन्‍ता गाय को लेकर अधिक थी इसलिए वेद में भी और अवेस्‍ता में भी गाय को अघ्‍न्‍या / अग्‍न्‍या ही कहा गया, पूरे गो प्रजाति के साथ यह निषेध न था। अवेस्‍ता में जहां गाय को अग्‍न्‍या कहा गया है वहीं, सांड की बलि का स्‍पष्‍ट उल्लेख है, यही स्थिति भारत की भी थी। इसलिए आठवें मंडल में यह बताते हुए कि गाय रुद्रों की माता है, वसुओं की पुत्री है, आदित्‍यों की बहन है, अमृत स्‍वरूप दूध देती है, इसलिए इसका वध न किया जाय, केवल गाय पर जोर है, गोप्रजाति पर नहीं। यह पहली बार शतपथ ब्राह्मण में आता है।”

”क्षमा करें डाक्‍साब, मैं उस इतिहास में जाना ही नहीं चाहता। मैं कहना यह चाहता हूं कि इस्‍लाम और ईसाई मतों का जन्‍म भी नहीं हुआ था, उस समय से ही हमारी संवेदनाए गाय और गो प्रजाति से बहुत गहराई से जुड़ी हैं। यह बहुत लंबा समय है। आप इसको खाद्य या अखाद्य के कोण से ही न देखिए। यह देखिए कि हमारी भावनाओं को आहत करने के लिए लगातार इसका प्रयोग किया जाता रहा है। यही काम आपके सैडोमैसोकिस्‍ट इतिहासकार भी करते रहे अन्‍यथा ये भावनाएं इतनी प्रखर न होतीें। भावनाएं बहुत सारी बातों से जुड़ी रहती हैं और उनकी रक्षा के लिए हम उन प्रसंगों की ओर ध्‍यान नहीं देते। यह अकारण इतिहास का सत्‍य बता कर इसे उभारा जाता रहा, केवल हिन्‍दू भावनाओं को आहत करने के लिए।”

मित्र ने संयत स्‍वर में ही कहा, ”यह आपकी कल्‍पना भी ताे हो सकती है।”

”होती, यदि इसे सन्‍दर्भ, अनुपात और औचित्‍य का ध्‍यान रखते हुए किसी प्रसंग में कहा गया होता। इसका उसी तरह विज्ञापित और गर्वित भाव से संचार माध्‍यमों से प्रचार किया जाता रहा जिस तरह बीफ की दावत वगैरह आयोजित और विज्ञापित करके। वहां खाने से अधिक अपमान करने का प्रयत्‍न था और अपमानित समाज में कुछ लोग तो अनुपात से अधिक उग्र प्रतिक्रिया दिखाएंगे ही । अपराधी क्रिया करने वाला, फसाद को शुरू करने वाला, उसे ढोल बजा कर उत्‍तेजित करने वाला हुआ, या उत्‍तेजित होने वाला, या दोनों और या अाप तथा आपके प्रेस, अपने को बुद्धिजीवी कह कर खुद ही अपनी बुद्धि के दिवालेपन का प्रमाण देने वाले। यदि देश में शान्ति और सद्भाव चाहिए तो क्‍या इसमें सबका सहयोग आवश्‍यक नहीं है ?”

बात शास्‍त्री की सही लगी, मैंने मित्र से कुछ कहा नहीं, पर यह इशारा किया कि अब बोलो। मित्र दूसरी ओर देखने लगा तो बोलना पड़ा, ”यदि यह योजनापूर्वक हो रहा है तो यह योजना किसकी थी, इसकी तैयारी कितनी लंबी थी, इसका इनाम क्‍या था कि जिस बात को कोसंबी और काणे बहुत पहले लिख चुके थे उसी को दूहराने वाला एक इतिहासकार कह रहा था कि यह उसकी खोज है और उसी को लेकर नाचना गाना बजाना जारी रखे था। यह तो योजनाकारों को पता ही था कि इसकी यह प्रतिक्रिया हो सकती है। जवाब तो देना पड़ेगा किसी को।”

मेरा मित्र उठा और बिना कुछ बोले, बिना किसी उद्विग्‍नता के, विचारो में डूबा सा आगे बढ़ गया।

Post – 2016-08-05

न ही उस शोर में शामिल न इस सन्‍नाटे में
न मुनाफे की ही सोची न रहे घाटे में ।
कहा कुछ भी तो कहा जोड़ कर न छोड़ कर कुछ
गरूर वालों को भी कुछ तो मिला चॉटे में।
प्‍यार से उनको खारजार में ले जाता हूं
जो फर्क करना जानते न फूल कांटे मे ।
यूं ही भगवान को भगवान नहीं कहते लोग
वह बदल देता है हर शोर को सन्नाटे में ।।

Post – 2016-08-04

निदान 11
डैमेज कंट्रोल

आप कल मेरे उत्‍तर से सन्‍तुष्‍ट नहीं थे। आप का तो यही अध्‍ययन क्षेत्र है। बताइए आपने तबलीग की बढ़ती प्रवृत्ति को कब लक्ष्‍य किया और किस रूप में?”

”क्‍या आपको जालीदार टोपियों के चलन और इनकी संख्‍या में उछाल दिखाई नहीं देता।”

”दिखाई देता है। नजर इतनी धुंधली नहीं हुई है, पर जानना चाहता था कि आपको यह कब से नजर आने लगा? जानते हैं आप इसे एक दो दशक से पीछे नहीं ले जा सकेंगे। हद से हद तीन। मैं ठीक कह रहा हूु ?”

शास्‍त्री जी मेरी बात से सहमत हो गए।

”और क्‍या आप को पता है अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र के अरब देशों का पैसा किस पैमाने पर भारत में पंप होना आरंभ हुआ और कब से ?”

शास्‍त्री जी के चेहरे से लगा उन्‍हें इनके बीच कुछ संबन्‍ध दिखाई देता है। कहा उन्‍होंने कुछ नहीं।

मैंने कहा, ”क्‍या आप ने उस सन्‍यासी और मठ के गोसाईं की कथा पढ़ी है, पढ़ी तो होगी ही, वह कहानी आपको याद है जिसमें चूहें के उछल कर खूंटी पर टंगी पोटली काटने की घटना आती है और जिस पर अतिथि सन्‍यासी ने सुझाया था कि पैसे में बहुत गर्मी होती है। इसके ठिकाने का पता लगाओ, इसने बहुत सा धन जमा कर रखा है अन्‍यथा इतनी ऊंची उछाल नहीं ले सकता था और फिर आगे की कहानी तो याद ही होगी।”

शास्‍त्री जी चुप रहे, पर उस चुप्‍पी का अर्थ था, हां याद आ गया।

मैंने कहा, ”अरब देशों में तो गर्मी वैसे ही असह्य होती है। फिर सोने में तो कहते हैं गर्मी के साथ नशा भी धतूरे से अधिक कही गई है। उसके साथ जाली टोपी आ गई तो उस पर तो आप को प्रसन्‍न होना चाहिए। हवा लगेगी तो दिमाग तो ठंढा रहेगा। इस पैसे के कारण उनमें कितनी छटपटाहट है और उससे बचने काे वे कितने बेचैन है यह भी तो देखिए।”

अभी तक जो शास्‍त्री जी सहमति में मौन से काम ले रहे थे, वह अपना माथा पीटने लगे। यह तो कह नहीं सकते थे कि आप से बड़ा अनाड़ी मैंने जीवन में कभी देखा ही नहीं। माथा भी कुछ संभाल कर दबाते हुए पीट रहे थे कि यह भ्रम बना रहे कि सिर भारी सा है और मैं इसे अपना अपमान न समझ लूं। उनकी परेशानी देख कर मैंने कहा, ”देखिए, जब हम किसी कारण से अपने को दूसरों से श्रेष्‍ठ सिद्ध करना चाहते हैं तो जहां यह श्रेष्‍ठता उसे स्‍वीकार्य होती है वहां भी इससे तनाव पैदा होता है, क्‍योंकि इसका अभिप्राय होता है कि दूसरे में उस गुण का अभाव है। आप यह न कहिए कि मैं तो सच बोलता हूँ, सच बोलिए, लोग जान लेंगे। श्रेष्‍ठता बघारने की चीज नहीं होती, यह हीरा छिपा कर रखा जाता है कि कहीं हमारे किसी आचार व्‍यवहार से दूसरों की नजर न इस पर पड़ जाय।

“मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि हमारा समाज किसी दूसरे समाज से अच्‍छा है, क्‍योंकि इस बहस के शुरू होते ही वह अच्‍छा नहीं रह जाएगा, क्‍योंकि इसका अर्थ हो जाएगा तुम्‍हारा समाज या धर्म अच्‍छा नहीं है। वह अपने को झगड़ालू सिद्ध करके पहले से कम अच्‍छा तो हो ही जाएगा। मेरे मित्र की चूक यह है कि वह यह बताते फिरते हैं कि कुर’आन दूसरे धर्म ग्रन्‍थों से अच्‍छा है। या यह भी हो सकता है कि वह इस खयाल से परेशान हों कि इस्‍लाम के नाम पर जो कुछ किया जा रहा है उससे लोगों के दिमाग में कुरआन और इस्‍लाम के बारे में यह धारणा बन रही होगी कि इसमें ऐसे ही विचार है इसलिए उनकी यह गलतफहमी दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए। वह बहुत संजीदा स्‍वभाव के इंसान हैं और उन्‍हें कभी वह जाली टोपी भी लगाते नहीं देखा। सुनते बहुत कम हैं इसलिए उनसे पूछ भी नहीं सकता कि उनका मकसद क्‍या है। तबलीग पर हम बाद में बात करेंगे।

”सबसे पहले हमें अपनी भाषा और आचरण में केवल इस बात ध्‍यान देना चाहिए कि उससे किसी दूसरे को कष्‍ट तो नहीं हो रहा है, इस बात पर कि हमारी कितनी बातें मानवता के हित में हैं या नहीं हैं, न इस कि इस बहस में पड़ना कि इस्‍लाम का मतलब क्‍या है। इस्‍लाम का मतलब अगर शान्ति है तो इसे भी, हमें अपने व्‍यवहार से यह सिद्ध करना होगा कि हम जो कुछ करते या कहते हैं उससे दुनिया में शान्ति पैदा हो, डिक्‍शनरी दिखाने से कुछ नहीं होता, शब्‍द व्‍यवहार में सार्थकता पाते हैं।”

शास्‍त्री जी का सिरदर्द कुछ कम हो गया, पर मेरा इरादा उसे कुछ और बढ़ाने का था इसलिए उनकी ओर ही मुड़ पड़ा, ”आप तो कहेंगे कि हिन्‍दू धर्म सबसे मानववादी है और इसकी धर्म की परिभाषा के साथ सर्वभूतहिते रत: और बसुधैव-कुटुंबकम् का जाप आरंभ कर देंगे, पर वसुधा को तो छोड़ दें, क्‍या आप हिन्‍दू समाज को कुटुंब बना सके हैं? आप की तानाशाही का हाल यह कि आप अपनी शर्तों के अनुसार दुनिया को चलाना चाहते हैं, यदि कुछ पीढि़यों से शाकाहारी है तो शाकाहार को पवित्रता की उस पराकाष्‍ठा पर पहुंचा देंगे की साग के अलावा यदि कोई कुछ खाता है तो घृणा का पात्र हो जाएगा और उसका ही सफाया करने की सोचने लगेंगे। यह कैसी अहिंसा और कैसा शाकाहार जो आमिषभोजी मनुष्‍य की हत्‍या करने को तैयार हो जाय या दूसरों को तैयार करने लगे। अहिंसा को भी क्रूरता का पर्याय बनाया जा सकता है, यह आपको देख कर लगता है।”

शास्‍त्री जी मुझे हैरानी से देखने लगे, पर मैं उन्‍हें कुछ और दुखी करना चाहता था।

”शास्‍त्री जी, ईसाइयत और इस्‍लाम दोनों बहुत बुरे हैं । इन्‍होंने आपके हनुमान जी की तरह जन्‍म लेते ही प्रकाश के स्रोत अपने पुस्‍तकालयों और पुरानी संस्‍थाओं और देवालयों और संस्‍कृतियों का सर्वनाश कर दिया और अन्‍धकारयुग का आरंभ किया – बाल समै रबि भक्ष लियो तब तीनहुं लोक भयो अंधियारो। को न‍हिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो। न रहै बांस न बजै बांसुरी।

”परन्‍तु आप ने तो इसी अतिसंवेदनशीलता के कारण अपने इतिहास को भुला कर स्‍वयं भी नष्‍ट कर डाला। आप जै श्रीराम के नारे लगाते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि राम जी को मांसाहार बहुत पसंद था, पावन म्रिग मारहिं जिय जानी। और मार कर फेंक नहीे देते थे, खाते थे। फेंकते तो सचमुच बुरा होता। उनका विवाह हो रहा है और उनकी बारात के लिए मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कंहारन आने।’ आप को भूल जाता है और कुछ पीछे का और भी पाठ जिसमें वंध्‍या बछिया या वशा, बधिया होने से रह गए अनुपयोगी बछड़े और सांड़, घोड़े, बकरे, भेड़ को अग्नि समर्पित किया जाता था – यस्मिन् अश्‍वास: वृषभाश्‍च उक्षण: वशा मेषा अवसृष्‍टास आहुता : । यदि आप अपने इतिहास को अपव्‍यख्‍या से नष्‍ट स्‍वयं भी नहीं करते तो खानपान में मामले में आप इतने हाइपर सेंसिटिव नही हो जाते कि मरी हुई गाय का चमड़ा उतारने पर आदमी का चमड़ा उतारने लगते।”

शास्‍त्री जी की सहन सीमा जवाब दे रही थी, ”देखिए डाक्‍साब, मैं आपकी व्‍यख्‍या से सहमत नहीं हूं। ऋग्‍वेद की ऋचाओं का आप लोग बहुत स्‍थूल अर्थ लेते हैं। जिस आधी ऋचा को आपने अभी पढ़ा उसमें जो अवसृष्‍टास आया है उसे तो समझिए। अवसृष्‍टास का अर्थ है किसी दूसरे पदार्थ का, जैसे आटे या मिट्टी से उन जानवरों की आकृति बना कर उसे आग में डाला जाता था। शतपथ ब्राह्मण में बहुत स्‍पष्‍ट शब्दों में आटे का बकरा बना कर उसकी आहुति देने का वर्णन है, यह आप ने भी देखा होगा।”

मैं हंसने लगा, ”शास्‍त्री जी उसी स्‍थल पर यह भी तो लिखा है कि पहले मनुष्‍य की बलि दी जाती थी, फिर घोड़े की, गोरू की, बकरे की, भेड भी और अब उसके स्‍थान पर आटे का पशु बना कर उसकी आहुति दी जाने लगी। अविकसित समाजों में नर बलि बाद तक जारी रही, जैसे सवरों में धरती की उर्वरता बढ़ाने के लिए नरबलि।”

शास्‍त्री जी कुछ बोलते, इससे पहले ही मेरा मित्र जो आज कल शास्‍त्री जी से मेरी नोकझोंक मजे ले कर सुनने का आदी हो रहा था, बोल पड़ा, ”अरे यार शास्‍त्री तो आज भी नरबलि देने के प्रोग्राम बनाता रहता है। देखा नहीं, इसने गोरक्षक सेना भी इसी काम के लिए बना ली है जो कानून को अमल में लाने के लिए राेज कोई न कोई कांड करता फिरता है।”

शास्‍त्री जी खीझ कर मित्र की ओर मुड़ गए। पहले वह मित्र के लिए श्रीमान जी के संबोधन से हट कर सर पर आ गए थे, लेकिन आज खीझ में फिर श्रीमान जी पर लौट गए, ”श्रीमान जी, आप मेरे कुछ सीधे सवालों का जवाब देंगे?’

”पूछिए।”

”यह गोवध पर प्रतिबन्‍ध का कानून किसके शासन में बना था? ”
मित्र सिर खुजलाने लगा।

”नहीं, मेरे सामने बैठ कर आप अपने ऊपर इतना अन्‍याय मत कीजिए। इस उम्र में त्‍वचा पतली हो जाती है। आपको याद करने में कठिनाई हो रही है तो मैं मदद करता हूँ, असत्‍य हो तो हस्‍तक्षेप कीजिएगा, कांग्रेस ने?”

मित्र चुप रहा।

”जिन राज्‍यों में कांग्रेस शासन नहीं था उनमें यह लागू नहीं हुआ। जैसे आपके पश्चिम बंगाल में ।”

मित्र चुप रहा ।

”आप आज उसी कांग्रेस की गोद में जगह तलाश रहे हैं क्‍योंकि आपकी साख कांग्रेस से भी गिर गई है और आप जो उसको हो पसंद वही काम करेंगे वह दिन को अगर रात कहे रात कहेंगे।”

इस बार मित्र के होंठ खुले, ‘अरे भई, कानून बनाया था, इस तरह उस पर अमल तो नहीं किया था कि लोगों का जीना मुश्किल हो जाय।”

”कानून जीना मुश्किल करने वाला बनाएंगे और कानून को ही धता बता कर कानून का उल्‍लंघन भी करेंगे और इसके लिए दूसरों को भी उकसाएंगे, क्‍या आप मानेंगे कि कांग्रेस दुनिया की सबसे अराजक पार्टी है, जो अपने बनाए कानून को भी सत्‍ता में रहते हुए स्‍वयं तोड़ती है?”

मित्र को फिर सांप सूंघ गया ।

शास्‍त्री जी एक पल के लिए मेरी ओर मुड़े, ”डाक्‍साब कह रहे थे, पैसा पंप करके लोगों का दिमाग फेरा जा सकता है, उनसे कुछ भी कराया जा सकता है, सीआइए के एक खलीफे के शब्‍द बहुत पहले याद दिलाए थे जिसने कहा था मुझे इतने बिलियन डालर दो और मैं सोवियत संघ की सेना तक में ऐसी फूट पैदा कर दूंगा कि वह अपनी घरेलू समस्‍याओं से ही निबट नहीं पाएगा। मैं असत्‍य कह रहा हूं डाक्‍साब ?”

मैंने कहा, ”आप सत्रह आने सच कह रहे हैं क्‍योंकि आज तो लोग इतिहास को इस हद तक भूल गए हैं कि उन्‍हें पता भी न होगा कि रूपये में सोलह आने होते थे या बीस।”

”‍फिर आंख मूंद कर पूरे देश को नादिरशाह के बाद किसने उससे भी बेरहमी से लूटा है, क्‍या कांग्रेस का दावा यह नहीं है कि उसके आगे दुर्रानी एक मेमना था? और क्‍या यह सच नहीं है कि वह पैसा कई चेहरों से जगह जगह बोल कर अपनी खोई हुई साख पाना चाहता है। हुड़दंग के सभी कार्यक्रमों में किसकी उपस्थिति दिखाई देती है ? उसकी और उसके साथ आप की या हमारी जो हुड़दंग को रोकने के अपराध में अपराधी बना दिए जाते हैं? ”

”आप क्‍या अनाप शनाप बके जा रहे हैं, पता है ?”

”पता है, पर आप मुझे पता लगा कर बताइएगा कि गोरक्षक दल के बाने में किसके पालतू या चाराभाेगी काम कर रहे हैं। पंजाब में कुरआन की बेकद्री तो सामने आ चुकी, इसकी आप लाइए। जहां तक हमारी स्थिति है न हमने हिन्‍दू वोट बैंक के लिए कोई कानून बनाया, न मुस्लिम वोट बैंक का सपना देख सकते हैं। हम बैंक प्रणाली को अर्थव्‍यवस्‍था तक सीमित रखना चाहते हैं। यदि आप ने न पढ़ा हो तो आज का ही समाचार पढि़ए, ”आरएसएस ने ऊना में दलितों काे कोड़े मारने की निन्‍दा की है।”

”वह तो डैमेज कंट्रोल है।”

”हो सकता है, हो। पर कुछ आप भी तो हमसे सीखिए, डैमेज कंट्रोल ही सही। आप को तो डैमेज की लत सी पड़ती जा रही है। यह नशा जान के साथ ही जाता है।”

इस तेवर की तो मुझे शास्‍त्री से उम्‍मीद ही न थी। ताली बजाते हुए उठ खड़ा हुआ।

Post – 2016-08-03

निदान 10

तबलीग

”तबलीग का अर्थ जानते हैं डाक्‍साब ?”

जानता तो था, पर इसे समझाने का बोझ शास्‍त्री जी के कंधो पर डाल दिया।

उन्‍होंने अपने कर्तव्‍य का निर्वाह करते हुए बताया, ‘तबलीग का अर्थ होता है धर्म प्रचार । प्रचार के लिए जरूरी होता है नैतिक और तार्किक औचित्‍य। आपकाे शायद पता न हो कि इस पर दूसरे मुस्लिम देशों और ईसाई देशों का कितना पैसा भारत में पंप किया जा रहा है और उसकी हवा उन्‍हें कितना जोम और जुनून में रखती है। इसके प्रकट और प्रच्‍छन्‍न कई रूप हैं और …”

शास्‍त्री जी आगे की कड़ी जोड़ने लगे कि मैं बीच में ही हस्‍तक्षेप कर बैठा, ”इसे आप ने कब से लक्ष्‍य किया ?”

”जो इसे लक्ष्‍य नहीं कर सकता वह जिस अवस्‍था में पहुंचा हुआ है उसका आप से बात करते हुए नाम लूं तो प्रायश्चित्‍त करना होगा, क्‍योंकि तुलसीदास ने उन्‍हें सबसे भला कहा है, और आगे कुछ और जोड़ दिया है।”

”आप को प्रायश्चित्‍त नहीं करना होगा, क्‍योंकि मैं इसे जानता हूं। आपको इसका व्‍यक्तिगत अनुभव न होगा पर मुझे इसका व्‍यक्तिगत अनुभव है। मैं जिस सोसायटी में रहता था उसे भारत का गुटका संस्‍करण कह सकते हैं। पूरे देश के और लभी धर्मो के लोग उसमें रहते हैं। जाहिर है उसमें अनेक मुस्लिम परिवार भी रहते हैं। उसमें एक सज्‍जन है जिन्‍होंने अपना सेवानिवृत्ति के बाद का पूरा जीवन ही इसी कार्य को समर्पित कर रखा है। हाथ में हिन्‍दी की चार पांच पुस्तिकाओं की प्रतियां लिए घूमते हैं और हमें यह जानने का मौका देते हैं कि इस्‍लाम दुनिया का सबसे अच्‍छा मजहब है और इसमें मानवता से प्रेम का ही सन्‍देश दिया गया है। वह कुछ अधिक ऊंची आवाज ही सुन पाते हैं इसलिए अपनी बात कह कर बात पूरी मान लेते हैं। कुर’आन की आयतें इतने प्रभावशाली और मधुर स्‍वर से पढ़कर सुनाते हैं कि अर्थ पल्‍ले न पड़ते हुए भी उसके नाद से ही मन मुग्‍ध हो जाय। मेरे अच्‍छे सम्‍बन्‍ध हैं, दुआ सलाम ही नहीं दूसरे धर्मेतर सवालों पर साथ देने तक के भी। एक बार सोचा अरबी सीखने का् अच्‍छा मौका है, प्रस्‍ताव रखा, सिखाइए, तो बोले अरबी नहीं आती है, पर कोई इन्‍तजाम करेंगे। कुछ दिन बाद ही इधर से इधर आ गया। मैं जानता था, संस्‍कृत के श्‍लोक पढ़ने और मधुर और मोहक स्‍वर में पाठ करने वालों को संस्‍कृत भी आती हो, यह जरूरी नहीं।

उन्‍होंने मेरी सहभागिता को देख कर एक बार सोचा इस आदमी को तो मुसलमान बनाया ही जा सकता है।

कहा, ”एक दिन मैं आपसे मिलने आपके घर (जिसका मतलब हुआ फ्लैट पर) आना चाहता हूं।”

”बिल्‍कुल आइए। खुशी होगी।”

बोले, ‘अकेले नहीं, एक डाक्‍टर साहब हैं उनके साथ ।”

मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती थी। आए। आने के साथ दो तीन पुस्तिकाएं, जिन्‍हें वह बांटा करते थे, साथ लाए और कहा, इसे पढि़ए। उनमें से एक किसी पीठ के आचार्य का था जो इस्‍लाम की प्रशंसा में था, और दूसरा किसी अन्‍य का, पर वह भी हिन्‍दू ही थे। तीसरे में कुरान के कुछ उच्‍च विचार थे या ऐसा कुछ, यदि आप चाहें तो मेरी सोसायटी के स्‍वागत कक्ष में भी वे रखी रहती हैं, आपको ला कर दे दूंगा, परन्‍तु तब जब उनसे बात हो रही थी एसी नौबत नहीं आई थी। वह अलग अलग लोगों को यह सिद्ध करने के लिए कि इस्‍लाम दुनिया का सर्वश्रेष्‍ठ धर्म है, उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ बिरादरी में जगह देने के लिए तैयार अवश्‍य थे।”

मैंने पहले सोचा था, उनके साथ आए नौजवान डाक्‍टर किसी विषय के अधिकारी विद्वान होंगे, पता चला वह होमियोपैथ डाक्‍टर थे। यह प्रसंगवश कह गया।

अतिथि सत्‍कार की औपचारिकता पूरी करने के साथ उन पुस्तिकाओं को उलटता पलटता रहा। उन्‍होंने कहा, ‘पहले आप इनको पढ़ जाइए, फिर हम इतने दिन बाद मिलेंगे।’

मैंने उन्‍हें रोक लिया। अपने शेल्‍फ से कुर’आन की एक अरबी हिन्‍दी पाठ वाली, एक सऊदिया से अंग्रेजी में प्रकाशित और एक किसी तबलीगी मुहिम में मेरे अपने जिले के व्‍यक्ति द्वारा मुफ्त भेजी गई प्रतियों, हदीथ और फतवों की किताब जिन्‍हें मैंने एक दो बार नजर से गुजारा था, हदीथ और फतवों की प्रव़त्ति देख कर अधिक पढ़ा भी नहीं था, पर यह मौका दूसरा था, मैंने कहा, ”देखिए मैं इन बारह पन्‍नों वाली किताबों से इस्‍लाम काे नहीं जानता, उसे समझने के लिए मैंने इनकाे पढ़ा है। आप बताइए, आप लोगों में से किसी ने रामायण, महाभारत, गीता, पुराण कुछ भी पढ़ा है।”

”उत्‍तर तो मैं पहले से जानता था। उनको सांप सूंघ गया।

मैंने कहा, ”आप जब कुरान और हदीथ के अलावा कुछ नहीं जानते तो यह कैसे तय कर लिया कि सबसे अच्‍छा धर्म इस्‍लाम ही है। मैं आपको समझने और जानने की कोशिश के बाद अपनी ओर से हमला करूं तो क्‍या आप अपने को बचा पाएंगे।

”मैंने कहा दुबारा आइए जरूर पर मुझसे बहस की तैयारी करके आइये। दूसरे धर्मो और विचारो को समझ कर आइए। मैं यही तो चाहता हूं, हम एक दूसरे को समझे जानें। घोंघाबसन्‍त बन कर न रहे।

”मैंने उन्‍हें विदा किया। वे फिर नहीं आए। पर हमारी मेल-मुलाकात आज भी बदस्‍तूर है। इसे आप भी देखते होंगे।”

”आप कहना क्‍या चाहते हैं।”

”मैं यह कह रहा हूं कि मनुष्‍य में कुछ अनन्‍य काम या आम लोगों से कुछ ऊपर और अलग काम करने की प्रवृत्ति प्रकृति ने उसे दिमाग देने के साथ ही पैदा कर दी। वह नाम कमाने या सबसे ऊपर होने की आकांक्षा में जितने मूर्खतापूर्ण काम कर सकता है उससे गिनीज बुक आफ रिकार्ड्स भरी पड़ी है। उनको उनके इस मंसूबे से समझो। इस तरह के मूर्खों ने अपने घर परिवार को, दुनिया को, बर्वाद करने का खेल भी खेला है और मनुष्‍यता को नई चुनौतियों के लिए तैयार भी किया है। इनकी मूर्खता पर ध्‍यान जाएगा तो पत्‍थर मारोगे, इनके उत्‍सर्ग पर ध्‍यान जाएगा तो फूल चढ़ाओगे। जरूरत समझने के नजरिए में बदलाव करने की है।”

”मगर मैं जो कहना चाहता था, वह तो आपने सुना ही नहीं।”

”उसे कल के लिए रहने दें ।”

Post – 2016-08-02

न ही उस शोर में शामिल न इस सन्‍नाटे में
न मुनाफे की ही सोची न रहे घाटे में ।
कहा कुछ भी तो कहा जोड़ कर न छोड़ कर कुछ
गरूर वालों को भी कुछ तो मिला चॉटे में।
प्‍यार से उनको खार जार में ले जाता हूं
जो फर्क करना जानते न फूल कांटे मे ।
यूं ही भगवान को भगवान नहीं कहते लोग
वह बदल देता है हर शोर को सन्नाटे में ।।

Post – 2016-08-02

निदान -9

इस्‍लामी नैतिकता

”मुस्लिम जगत के पिछड़ेपन के और कौन से कारण आप बताना चाहते थे?”

”इस्‍लामी नैतिकता से जुड़े कुछ विधान जिनके चलते वह आधुनिक अर्थतन्‍त्र की चुनौतिकयों का सामना नहीं कर सकता। जीवन को अर्थतन्‍त्र नियन्त्रित करता है, और मुल्‍लाबाद जीवन से अधिक अपनी पकड़ को बनाए रखना चाहता है, इसलिए पिछड़ापन उसके लिए गर्व का विषय बन जाता है। यह समाज आगे बढ़ ही नहीं सकता।”

”मैं आपकी बात समझा नहीं ।”

” सैयद अहमद यह तो चाहते थे कि अपनी आर्थिक प्रगति के लिए मुसलमान भी उद्योग व्‍यापार में भाग लें, परन्‍तु एक ओर वह ब्रितानी हथकंडों के कारण उद्योग से बचना चाहते थे तो दूसरी ओर हिन्‍दू व्‍याप‍ारियों से प्रतिस्‍पर्धा के बिना उन क्षेत्रों में आपूर्ति को हाथ में लेने की सलाह दे रहे थे जिनमें अभी विदेशी पहल थी, जैसे चमड़़े, हड्डी आदि की आपूर्ति। कारण हिन्‍दू व्‍यापारियाें को इससे परहेज था। अंग्रेजों को इसके लिए किसी देसी आपूर्तितन्‍त्र की जरूरत थी, क्‍योंकि यह काम संभालने में उन्‍हें असुविधा होती थी। इसलिए अधिक संभव है यह सुझाव भी उनका ही रहा हो। जिन क्षेत्रों में हिन्‍दू व्‍यापारी घुसे हुए थे उनमें उनके साथ प्रतिस्‍पर्धा में वे टिक न सकते थे। इससे व्‍यापारिक गतिविधियों के लिए एक छोटा सा कोना ही मिल पाता था। मिला भी। जूते वगैरह की दूकानें भी पहले मुस्लिम दूकानदारों के हाथ में हुआ करती थी, यह मैंने अपने बचपन में देखा था।

”इस्‍लाम में बड़े कारोबार के लिए बैंक प्रणाली का विकास नहीं हो सकता था क्‍योंकि जिस मत में व्‍याज को ही वर्जित माना जाता हो उसमें बैकप्रणाली का विकास संभव नहीं। इसके अभाव में कोई किसी को अपना पैसा क्‍यों देगा ? अब अपनी जमा पूंजी का ही सहारा रह जाता है। मध्‍यकालीन ऐश आराम वाली जिन्‍दगी के आदी हो जाने के कारण और, परिश्रम से बचने की आदत के कारण अमीरों के पास भी पूंजी का निर्माण नहीं हो सकता था और अपनी आरामतलबी में खलल डालते हुए वे किसी कारोबार में फंसना भी पसन्‍द नहीं कर सकते थे। इसलिए केवल भारत में ही नहीं, अन्‍य मुस्लिम देशों में भी सूद लेने की मनाही और उसक परिणाम स्‍वरूप बैंक प्रणाली का अभाव मुसलमानों के आर्थिक पिछडेपन एक बहुत बड़ा कारण रहा है। सम़ृद्धदेशों में भी समृद्धि के बावजूद आर्थिक पिछड़ापन।”

”व्‍याज को वर्जित करार देने का कारण क्‍या रहा हो सकता है ?”

”मैं उस दौर के अरबी अर्थतन्‍त्र के बारे में जो रोमन साम्राज्‍य के पतन के बाद या कहें उग्र ईसाइयत के उभार के बाद अरब देशों में रही होगी कोई जानकारी नहीं रखता। यह एक तरह की अराजकता का दौर था इसलिए ईसाई देशों का व्‍यापार तन्‍त्र इससे प्रभावित हुआ। रोम का पूर्वी देशों के साथ होने वाला व्‍यापार तन्‍त्र नष्‍ट हो गया। पर स्थिति कोई भी हो जनता की जरूरते किसी न किसी रूप में पूरी की जाती हैं और अनुमान है कि रोम के व्‍यापार तन्‍त्र के कमजोर पड़ने पर पहल अरबों के हाथ आई और इसमें नये नये मालदार बने परिवारों में समृद्धि के साथ मौजमस्‍ती, नाचगाना, जुआ आदि में परिवारों की बर्वादी के अनुभव आम रहे हो सकते हैं। संभव है लूटपाट के संभावित खतरों के कारण व्‍याज की दर भी इतनी बढ़ गई हो कि उसके कारण बहुत से लोग बर्वाद हो जाते रहे हों। यह सब मेरा अनुमान मात्र है, यह समझने का कि क्‍यों इस्‍लाम में व्‍याज को हराम या वर्जित मान लिया गया। नाच गाने बजाने आदि पर या कहे कलात्‍मक अभिव्‍यक्तियों पर भी रोक लगा दी गई। मूर्तिकला और चित्रकला को तो बढ़ावा मिल ही नहीं सकता है। कला केवल कलात्‍मक लिखावट और ज्‍यामितीय तक्षण तक सीमित रह गई । ये सभी एक दूसरे से जुड़े प्रश्‍न लगते हैं। कम से कम मुझे।”

”बात कुछ समझ में आ रही है।”

”बात को समझने का प्रयत्‍न कीजिए। मेरी जानकारी या व्‍याख्‍या पर भरोसा न कीजिए। इस पर आप लोगों को काम करना चाहिए । आप के संगठन का तो सीधा टकीराव मुसलमान से ही दिखाई देता है। मानिए, दुश्‍मन ही सही। दुश्‍मन की रगों को भी तो जानिए। यह आपने अंग्रेजों से ही सीखा होता कि जिन दिनों वे मुसलमानों को अपना दुश्‍मन नंबर एक मानते थे, उनको सेना में नहीं रखते थे, लगानवसूली का पुराना धंधा भी छीन लिया था, उस समय भी उनकी हर एक चीज का कितनी बारीकी से अध्‍ययन करते रहे और 1858 के क्रूर दमन के बाद भी उनके द्वारा की गई अंग्रेजों की सैकड़ो हत्‍याओं के बावजूद वे उनके दमन के लिए जो भी तरीका अपनाते रहे हो, साथ ही ठंडे दिमाग से उस मानसिकता को समझने का भी प्रयत्‍न करते रहे और इसका परिणाम था कि वे दुश्‍मन को भी दोस्‍त बना सके और जिनके साथ उसकी दोस्ती हो सकती थी उसी के विरोध में उसे खड़ा कर दिया। आप लोग तो बात बात में जय बजरंगबली कह कर छुट्टी कर देते हैं। मैं बहुत सारी बातें अनुमान के आधार पर कहता हूं और इन्‍हें आधिकारिक मानने से अच्‍छा है इस पर सन्‍देह करते हुए स्‍वयं अधिक गहराई से समस्‍या को समझना। बोलने बतियाने में अधपके विचार भी सामने तो आते ही हैं। बस इस सीमा का ध्‍यान रख कर मुझसे बात कीजिए।

”तो मैं कह रहा था मुस्लिम देशों में पूंजीवादी विकास हो नहीं सकता था और साम्‍यवाद जो उनकी सोच के सबसे निकट था उस ओर उनके मुल्‍ले उन्‍हें जाने नहीं दे सकते थे। इसका एक बहुत अच्‍छा उदाहरण अल्‍जीरिया का था जो भी औपनिवेशिक शासन में था पर फ्रेंच की शिक्षा के कारण उसमें एक मध्‍यवर्ग भी पैदा हो चुका था। इसने साम्‍यवादी रास्‍ता अपनाना चाहा पर मुल्‍लातन्‍त्र के कारण वह विफल हो गया
A clear indication of radicalization of the Islamic movement is reflected in an article published in its journal Humanisme Musulman, in 1965, a declaration that was similar to the tatalitarianism of Islamic fundamentalism in Egypt, Syria, and Iran. According to the article, all political parties, all regimes and all leaders who do not base themselves on Islam are illegal.and dangerous. A communist party, a secular party, a Marxist party, a Natinalist party, (the latter putting in question the unity of the Muslim world) can not exist in the land of Islam.

यहां का शासन 1970 में फिर वाम की ओर झुका परन्‍तु उसका उद्देश्‍य थ्‍ाा अब वे दुहरा जिहाद करने जा रहे हैं, पर पता है किसके खिलाफ :
against forces of international athiesm and in Algeria, against the Fracophone Marxist voluntary brigades thaज were leading the agricultural revolution and against the decadent morals of the West.

एक समय था इस्‍लाम ने अपनी पूरी माइथालोजी, पूरा इतिहास, नाम और रीतिरिवाज, त्‍यौहार उसी ईसाइयत से लिए थे क्‍योंकि मुहम्‍मद साहब के उदय समय जो अनेक मतमतान्‍तर अरब देशों में चल रहे थे उनमें सबसे प्रभावशाली ईसाइयत ही थी, और अब उसका सिरे से निषेध ।

मैंने इतने दूर के दृष्‍टान्‍त को इसलिए रखा कि यह बता सकूं कि यत्र यत्र इस्‍लाम: तत्र तत्र मनोबन्‍ध:। राष्‍ट्रीयता के प्रति भी वही रवैया जब कि पूरा देश उन्‍हीं का ।यह न समझें कि इस सोच के पीछे किसी की सोच या किसी तन्‍त्र के कारिन्‍दाें की कारगुजारी नहीं है। मुस्लिम मुल्‍लातन्‍त्र खलीफाओं के दौर में एक प्रबल तन्‍त्र था और आज उस तन्‍त्र को पूंजीवादी अमेरिका ने अपनी मुट्ठी में कर चुका है जिससे उसमें औद्योगिक विकास संभव ही न हो पाए। उसे अपने कठमुल्‍लेपन से बाहर निकलने का रास्‍ता ही न रहे, वह आगे बढ़ने की जगह कई शताब्‍दी पहले की लड़ाई में जुटा रहे। उसके मालोजर पर अमेरिकी कारोबार चले। उसे देख कर छटपटाए पर फिर भी कारगर हथियार और रणनीति विकसित करने की जगह उसके इशारे पर उसको काटने दौड़े ।

”उनके लिए व्‍याज हराम है, बस अपना पैसा सुरक्षित चाहिए, इसलिए बैंक अपना चल नहीं सकता। उसका पैसा अमेरिकी बैंकों में जमा रहे और उसे इसका दुहरा लाभ हो। सारा पैसा दूसरे के घर गाड कर वह उस पर और निर्भर हो जाये, विश्‍व करेंसी पर अमेरिकी कब्‍जा रहे, उसके अपने देश में व्‍याजदर को न्‍यूनतम पर रखने का अवसर बना रहे और अरब देशों के पैसे से ही वह अपने कारोबार का प्रसार कर सके। दूसरे देशों को मानिटरी फंड के माध्‍यम से कर्ज दे कर उस पर व्‍याज कमाए । अपने देश में बैंक दर जितना ही कम, उद्योग धन्‍धों के लिए उतनी ही कर्ज सुलभ।

” इसलिए आतंकवाद को पिछले रास्‍ते से उभारना, मुल्‍लातन्‍त्र को मजबूती देना और शिक्षा आदि में मद्रसों और मकतबों को पिछले दरवाजे से नैतिक समर्थन और भौतिक मदद देना और सउदी अरब जैसे अपने प्रभाव के देशों के माध्‍यम से माध्‍यम से मुल्‍लातन्‍त्र और मस्जिद और नमाज को बढ़ावा देना और तबलीगी मुहिम के माध्‍यम से कट्टरता का प्रसार, मुस्लिम देशों में यह खुशफहमी पैदा करके कि उनका आतंकवाद कल उनको दुनिया पर कब्‍जा जमाने में सहायक होगा, यूरोप उनके डर से थर्रा उठा है, उनके प्रतिभाशाली नौजवानों की प्रतिभा का विनाशकारी उपयोग उसकी योजना का अंग बनाना। इतनी जटिल योजना बनाने की योग्‍यता अभी किसी मुस्लिम देश में आई नहीं है।”

’ जहां तक मैं समझता हूं, मुसलमानों में प्रतिभा की कमी तो नहीं है।‘’ शास्त्री जी ने प्रश्न नहीं किया, अपने विचार का अनुमोदन या निषेध चाहते थे।‘’

‘’प्रतिभा की कमी पिछड़े से पिछड़ देश और समाज में भी नहीं हुआ करती और सच कहें तो आदमी का दिमाग चूहे के दिमाग से कुछ ही कदम आगे है। पर उस प्रतिभा को अपने विकास की सही जमीन मिली है या नहीं। यदि औद्योगिक विकास ही न होगा, आपकी तकनीकी प्रतिभा भी तो दूसरों के उपयोग में आएगी और वह भी यदि उसका अकुंठित विकास हुआ तो। यदि उसे गलत दिशा में मोड़ने वाली ताकतें उसके भीतर ही मजबूत हैं और वे मजबूत बनी रहें इसमें दुनिया की सबसे मजबूत ताकत की दिलचस्पी हो तो वह ध्वंसात्मक दिशा लेगी जिसका वह दुहरा इस्तेमाल करेगा। डरने का नाटक करके, ‘यह मारा, वह मारा,’ करेगा और उसका हौसला बढ़ाएगा और उसके कुकृत्यों को जघन्यतम रूप में विज्ञापित करके उसे इतना बदनाम करके रखेगा कि उसके विरुद्ध कभी जरूरत होने पर क्रूरतम उपाय भी उसे मुक्तिदाता बना देगा, ‘दुष्टदलन रघुनन्‍दन, जगमंगलकारी। जय जगदीश हरे।‘’

”शास्त्री जी अपना सिर खुजलाने लगे । सिर खुजलाने का एक लाभ होता है, यदि कोई विचार भीतर न धंस रहा हो, सिर के ऊपर ही रेंग रहा हो तो सिर खुजलाने से सिर के कुछ पोर खुल जाते हैं और उसे भीतर उतरने में मदद मिलती है। परन्तु उन्हें असली मजा तब आया जब मैंने कहा, ”ये सब महज मेरे खयाल हैं। इनको अधिक गंभीरता से मत लीजिएगा। अपनी आदत है किसी भी विषय पर बोलते चले जाने की। जिसे नहीं जानता उस पर अधिक विश्वास से बोल लेता हूं इसलिए मेरी नजर में एक ही समाधान है, मुस्लिम समाज में एक मुखर और निडर और अपने समाज के हित के लिए कृतसंकल्प बुद्धिजीवीवर्ग का विकास। पर आप मेरी बात मान मत लीजिएगा। नीम हकीम का इलाज खतरा बढ़ाता है, ऐसा मुहावरों में दर्ज है।‘’

शास्त्री जी ने उठने की तैयारी के साथ कहा, ‘’मानना मुझे है नहीं, मेरे मानने से कुछ होना नहीं। जिन्हें मानना चाहिए वे आपको पढ़ेंगे ही नहीं। जय जय जय जय हे।‘’

Post – 2016-08-01

निदान 8

मध्यवर्ग का अभाव

”प्राच्यविदों ने प्राचीन भारत का जिस तरह आकलन किया था और विलसन और मैक्समुलर ने मिल के जिस तोड़ मरोड़ का खंडन किया था क्या यह भी एक कारण है कि तथाकथित मार्क्सवादी इतिहासकार उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह् लगाते रहे।”

”इसमें सचाई तो है, परन्तु, परन्‍तु आधी क्‍योंकि उसी मैक्‍समूलर के काल निर्धारण को वे इस तरह पीटते रहे जैसे यह वैज्ञानिक सत्‍य हो जब कि स्‍वयं मैक्‍समुलर ने माना था कि यह एक अटकलबाजी है और आज कोई यह नहीं बता सकता कि यह ईसवी सन से दो हजार साल पुराना है या ढाई हजार या तीन हजार। जिन बातों को प्रामाणिक ढंग से कहा, वे केवल उनका विरोध करते रहे क्‍योंकि प्राचीन भारत का जैसा वे चित्र पेश करना चाहते थे, करते रहे थे, उसमें उनकी टिप्‍पणियां बाधक थीं। परन्‍तु यदि इस ओर मुड़ेंगे या यह बताने चलेंगे कि दूसरे यूरोपीय इतिहासकारों ने प्राचीनकाल और मध्य’काल के विषय में क्या विचार व्यक्त किए हैं, तो विषयान्तर होगा। सच तो यह है कि मैं किसी पश्चिमी विद्वान के विचार को, वह प्रशंसा में हो या निन्दा में कूटनीतिक दायरे से बाहर नहीं मानता इसलिए उन पर भरोसा करने की जगह उनको जांचते परखते हुए पढ़ने की सलाह देता हूं।

”उनमें से किसी का अध्ययन न तो व्यर्थ है न विश्वसनीय। प्राचीन भारत के विषय में तो दो दशक पहले तक का भी हमारा ज्ञान बहुत अधूरा था।

”मैं जिस तथ्य की ओर ध्यान दिलाना चाहता था वह यह कि मुस्लिम शिक्षा पर हंटर का जादू चल गया और चल इसलिए गया कि अमीर मुसलमानों के मन में वे ग्रन्थियां पहले से थीं जिनको उसने अपनी रपट में तूल दे कर सांप्रदायिक भावना उभारने का प्रयत्न किया था। उसकी वह पुस्तक ‘The Indian Musalmans: Are They Bound in Conscience to Rebel Against the Queen?’ 1871 में आई थी जब कि सैयद अहमद की उपयोगिता भांप कर अंग्रेज कूटनीतिक जाल उससे एक दशक पहले से रोप कर उनको अपने शीशे में उतारने में लगे थे। वे मुसलमानों का गुस्सा अंग्रेजों की ओर से हटा कर हिन्दुओं की ओर मोड़ना चाहते थे क्यों कि 1858 के क्रूर दमन के बाद भी मुसलिम विद्रोह जारी था। उन्हाेंने सबसे अधिक परेशानी पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त में पैदा की थी जहां बार बार कठोर कार्रवाई करने, गांव के गांव जला देने के बाद भी उनको अधिकार जमाने में कामयाबी नहीं मिल रही थी और इसका सबसे रोचक पहलू यह था कि इसके लिए नैतिक और भौतिक समर्थन ब्रिटिश राज में ही वहाबी नेताओं द्वारा जुटाया जा रहा था, जिनका मुस्लिम समुदाय पर गहरा असर था।

”यह बात तो एक बार आप कह ही चुके हैं आप यह बताएं आपकी समझ से मुसलमानों के पिछड़ेपन का कारण क्या हो सकता है।”

”यह बात किसी मुसलमान से न कहिएगा, क्यों कि उनको लगातार जिस तरह के ईरानी श्रेष्ठताबोध में पाला गया है, वे इसे स्वीतकार नहीं करेंगे। हम आज से हजार दो हजार साल पहले के हिन्दू समाज के सामान्य आचार व्यवहार से परिचित नहीं हैं, परन्तु उसमें राजा और दरबार में कुछ मर्यादाओं और प्रतिबन्धों का चलन तो था परन्तु पश्चिमी तर्ज की वह तड़क भड़क, वह दरवारी संस्‍‍कृति, सलीके और आन बान का प्रदर्शन न रहा होगा और उसे आप सरलता कहेंगे, वे लद्धड़ता कहेंगे। यह कहिए कि वे पिछड़ क्यों गए या पिछड़ते क्यों चले गए तो यह बात उनकी समझ में आ जाएगी।”

” मैंने हंटर का जिस प्रसंग में नाम लिया था वह यह कि उसका यह जादू चल ही गया कि मुसलमान हिन्‍दुओं पर राज कर चुके हैं, उनको अपने से तुच्‍छ समझते रहे हैं इसलिए वे उन्‍हीं स्‍कूलों में हिन्‍दू बच्‍चों के साथ बैठ कर पढ़ नहीं सकते। उनमें अशिक्षा का यही कारण है और अंग्रेजी शिक्षा के अभाव में उन्‍हें नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं, उनकी दशा दिनो दिन खराब होती जा रही है और इसलिए इस दिशा में सरकार को कुछ करना चाहिए।

इस दिशा में केवल सरकार ही कुछ करती आ रही है चाहे वह ब्रितानी रही हो या कांग्रेसी ।

”चलिए, यही सही। परन्‍तु जिन्हें अंग्रेजी शिक्षा मिली वे भी अपनी मान्यताओं में इतने पुरातनपंथी तो हैं ही कि मध्यकाल से बाहर नहीं आना चाहते।”

‘इसके कई कारण हैं। एक तो वह सांस्कृहतिक मनोग्रस्तता है जिसमें वे मद्रसे से निकले, अाधुनिक शिक्षा तक पहुंचे भी तो अपने अलग स्कूाल, अलग कालेज, अलग विश्वसविद्यालय की मांग करते रहे। इसमें जैसा कहा, सैयद अहमद भी आ गए थे। इससे जो लगाव के बीच भी अलगाव पैदा होता है वह निजी घरौंदे तैयार करता है, एक निजी संसार, जिसमें बन्द या लगभग बन्द, सीक्रेटिव मानसिकता पनपती है।

”‍फिर पहले तो शिक्षा केवल उनके अमीर घरानों तक सीमित रही, आज भी शिक्षित मुसलमानों में आधे अपने ऊंचे घराने की बात करते मिल जाएगे, क्योंकि उनमें मुल्ला और मौलवी तो थे, उस बड़े पैमाने पर शिक्षा जीवी वर्ग नहीं था जो हिन्दुओं में ब्राह्मणों और कायस्थों के रूप में बहुत पहले से मौजूद था। इसने अंग्रेजी शिक्षा का अवसर मिला तो उसे बढ़ कर अपनाया, जब कि मुल्ला मौलवी उसके विरोध में लगे रहे अत: जिस भी पैमाने पर मकतब मद्रसे चलाने वाला वर्ग था वह उसी को कायम रखने की जद्दोजहद में लगा रहा। सैयद अहमद को भी लंबी लड़ाई तो इन्‍हीं से लड़नी पड़ी जिसमें उन्‍हें आधी ही जीत मिल पाई। हिन्दू़ समाज में आरंभ से ही सभी प्रकार का नेतृत्व आरंभ से शिक्षित मध्यवर्ग के हाथ में रहा है और इस दौर में भी रहा और इसने इसे शक्तिशाली और मुखर बनाया। इस हद तक मुखर‍ कि वह हिन्दू मूल्यों और मान्यताओं की धज्जियां तक उड़ा सके।

”मुसलिम समाज में नेतृत्व अमीरों और रईसों के हाथ में आ जाया जिनकी शिक्षा में न तो पहले गहरी रु‍चि थी न बाद में या थी तो शेरो शायरी तक। हिन्दू समाज के नेत़त्व में जमीदारों और रजवाड़ों के लिए कोई जगह न थी, न उनकी कोई भागीदारी थी। उनके हित और मुस्लिम रईसों ताल्लेकेदारों के सरोकार बिल्कुल एक जैसे थे और यदि नेतृत्व इनके हाथ में आया होता तो ठीक उसी तरह के खेल शुरू होते। वे अधिक से अधिक सरकार से अपनी सुरक्षा और कुछ इज्जत अफजाई की मांग कर सकते थे जिन्हेंव वे भारी मोल दे कर खरीद भी सकते थे। जनसाधारण की दशा में सुधार लाने वाली कोई मांग वे भी न रखते।

एक बार इनके मुस्लिम लीग के रूप में इन रईसों का एक मुखर संगठन बन जाने के बाद हिन्दू हिन्दू सभा की स्थापना 1909 में हुई जिसने आगे चल कर हिन्दूे महासभा और राष्ट्रीय स्वीयं सेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद का जन्म दिया, जिनका रवैया हिन्दू राजाओं और जमींदारों के प्रति नरम भले रहा हो परन्तु इसकी स्थापना से लेकर इसके संचालन में भी अग्रणी भूमिका जमीदारों या रियासतदारों की न होकर सुशिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग की रही।

मध्य वर्ग किसी भी समाज का सबसे ऊर्जावान और विविध संभावनाओं से भरपूर वर्ग होता है जिसकी समाज को आगे ले जाने में ही नहीं अपनी रक्षणीय संपदा की रक्षा और व्यंवस्थाक में भी निर्णायक भूमिका होती है।

”मुसलमानों में भारत में तो फिर भी स्थिति कुछ भिन्न मिलेगी। पूरे इस्लामी जगत में किसी देश में मुखर और प्रभावशाली मध्यवर्ग नहीं पैदा हो सका और शिक्षा के प्रसार के बाद भी भारत में भी अजागलस्तन की तरह ही है। अनुत्‍पादक। इस्लामीमूल्यों और मान्य‍ताओं में इतना दबा हुआ कि वह परदा प्रथा और तलाक और एकाधिक विवाह जैसे मामलों पर भी चुप लगाए रहता है। वह भी सारे सुधार और अधिकारों की सारी लड़ाइयां हिन्‍दू समाज में ही चाहता है जिसके मध्‍यवर्ग ने अनेकानेक कुरीतियों को दूर किया और अधूरे और कालसाध्‍य समस्‍याओं पर भी जुझारू तेवर रखता है। पूरे इस्लाभमी जगत के पिछड़े पन का मैं इसे मुख्यल कारण मानता हूं, यद्यपि कारण और भी हैं जिनकी चर्चा कल करूंगा ।