Post – 2016-04-08

पुस्तक के काउंटर पर आने में दो चार दिन तो लगेंगे ही। प्रकाशक किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, िदल्ली – ११०००२ हैं।

Post – 2016-04-04

समय होत बलवान

”रुकावटों का कोई अन्त नहीं, सारे पढ़े लिखे अंग्रेजी के साथ, भारतीय भाषाओं को प्रमुखता देने की किसी दल या सरकार में इच्छाशक्ति नहीं, फिर भी तुम कहते हों अंग्रेजी यह गई, वह गई, और ताली बजाने लगते हो। अच्छा तमाशा है!

‘’मैं अंग्रेजी को भगाना नहीं चाहता। वह अपने देश-परिवेश में एक महान भाषा है। हमारे देश में उसने अपने जैसी दर्जनों भाषाओं का रास्ता रोक रखा है। हम उनको भी आमंत्रित करने को व्यग्र है, पर इन सभी को उनकी सही औकात में रखने का सपना देखते हैं। अंग्रेजी संस्‍कृत दोनों का सम्मान करता हूँ। दोनों को उनके दायरे में रखना चाहता हूँ। भाषा कोई भी हो, यहॉं तक कि बोलियॉं, ये सभी अनन्य‍ हैं।‘’

’’तुम किसी चीज की तारीफ करते हो तो आसमान पर चढ़ा देते हो। कहॉं विकसित विश्व- भाषाऍं और कहाँ हमारी अपनी भाषाऍं जिनमें तकनीकी शब्द उनसे उधार ले कर अनुवाद करना या गढ़ कर समझना पड़ता है और कहॉं बोलियॉं जिनका विश्वबोध भी सिमटा हुआ है और शब्दभंडार भी। सबको बराबर कर दिया।‘’

’’मैंने सभी को अनन्य अर्थात् दूसरे सभी से अलग, अनूठा, कहा, समान नहीं। तुम यह मान कर चलते हो कि मैं जो कुछ कहूँगा वह गलत होगा, इसलिए ध्यान से सुनते नहीं और अधसुने वाक्य को अपने ढंग से गढ़ कर हमला कर देते हो। दोष तुम्हारा नहीं उस पूरी जमात का है जिसका तुम हिस्सा बने हो। देखो तो कैसी कैसी सत्यानाशी व्याख्यायें सामने आ रही हैं।

“मैं जिस अनन्यता की बात कर रहा था उसे समझ लो। मुझे यह लगता रहा कि संस्‍कृत में इतस्तत: की जगह इत: अत:या इतो अत: होना चाहिए। इसके विस्तार में जाउूँगा तो तुम बोर हो कर बेहोश हो जाओगे पर कुछ समझ न पाओगे। इसकी पुष्टि जिन्हें तुम भारतीय आर्य भाषाऍं और बोलियॉं कहते हो उनसे नहीं, अपितु द्रविड़ समुदाय में गिनी जाने वाली एक नामालूम सी बोली जिसे अपने अज्ञान के कारण मैं कुछ समय तक मुंडा परिवार की भाषा समझता रहा, उससे हुई। उसमें यहॉं और वहॉं के लिए इतरं अतरं का प्रयोग होता है। और तमिल में, तुम्हें पता होगा, मध्य तकार का दकार के रूप में उच्चारण होता है। तो कुछ बोलियों में इसका उच्चारण इदरं अदरं के रूप में होता रहा होगा। इसका अर्थ हुआ, संस्कृत का विकास जिस रेल-मेल से हुआ उसमें विविध परिवारों में गिनी जाने वाली बोलियों की भूमिका थी और संस्कृत ने बहुत कुछ उनसे लिया है, और गौर करो तो हमारी बोलियों का इधर उधर संस्कृत के इत: तत: से नहीं सीधे उस प्राचीन स्तर से जुड़ा है। यह है उनकी अनन्यता और उपयोगिता।‘’

‘’मैं तुम्हारी बक-धुन से बेहोश तो नहीं हो सकता पर सिरदर्द का क्या करें। कल से गोली ले कर आया करूँगा। मैंने सवाल क्या किया था और तुमने उसे कहॉं पहुँचा दिया। किस चक्‍की का आटा खाते हो यार। बकवास का इतना जबरदस्त स्टैमिना!’’

‘’मैं केवल यह समझाना चाहता था कि जिनको तुच्छ समझ कर हम उनकी उपेक्षा करते हैं, वे भाषाऍं हों या मानव समुदाय, यहॉं तक कि व्यक्ति, उनमें से प्रत्येक से जो कुछ मिल सकता है वह किसी अन्य से नहीं मिल सकता। वे सभी अनन्य‍ हैं। उन भाषाओं का भी जिनका कोई साहित्य नहीं, किसी क्षेत्र की स्वी‍कृत भाषाऍं नहीं, उनको सीखने समझने के लिए व्यग्र रहा हूँ। अंग्रेजी और संस्कृत सीखने की कोशिश में तो मैं स्वयं लगा रहा हूँ। सत्तर साल की कोशिश के बाद भी सीख किसी को नहीं पाया सिवाय हिन्दी के। मगर उसमें भी गलतियॉं अनगिनत करता हूँ। हर तरह की। अपनी भाषा में आप गलती करते हुए भी छोटे नहीं होते, सबको विश्वास होता है कि भाषा तो आप जानते ही हैं, पर विदेशी या सीखी हुई भाषा में आपको निखोट होना चाहिए, अन्यथा आपके अपने ही आप को अपने उपहास से रसातल में पहुँचा देंगे। मातृभाषा मॉं जैसी है, उससे आप जिद कर सकते हो, शरारत कर सकते हो, लापरवाही कर सकते हो और फिर भी उसके अपने हो, सीखी हुई भाषा मैट्रन की तरह होती है। सिखाये का पालन होना चाहिए। कोई विचलन क्षम्य नही।‘’

’’हरज क्या है इसमें। मैट्रन तो लोग अपने बच्चों के भले के लिए ही लगाते हैं। वह तुम्हारा विकास करती है, उससे ही द्रोह!’’

’’ मैट्रन उन बच्चों की होती हैं जिनके पितरों के पास संपन्नता होती है परन्तु अपने बच्चों के लिए समय नहीं होता। उनकी मैट्रन भी यदि मॉं की जगह लेने लगे तो वह समृद्धि-जनित मूर्छना भी टूटेगी। मैट्रन बाहर हो जाएगी और बच्चे को उसकी मॉं मिल जाएगी यह मामूली समीकरण तुम्हामरी समझ में आया?‘’

‘’मेरे पास अक्ल होती तो तुम्हारा दोस्त होता, कम से कम यह तो सोचा होता।‘

‘मैं पिछले सत्तर साल से संस्कृत और अंग्रेजी सीखने का प्रयत्न करता रह्ा । किसी को काबू न कर सका।‘’

‘’तुम्हारी तो एक किताब भी है अंग्रेजी में। तुम ऐसा कैसे कह सकते हो।‘’

‘’किताब से क्या होता है, भाषा को अक्षर नहीं, इसे जबान, लैंग्वेज, टंग, वाक् कहते हैं। जो तुम्हारी जबान पर नहीं है वह तुम्हारी भाषा नहीं है। जानते हो, हिन्दी से एम. ए. कर चुका था पर बोलता भोजपुरी था। भाषा लिखी या छपी हुई इबारत नहीं है, जिसे ऑंखों से पढ़ा और हाथों से टॉका जाता है। इसे सुना और बोला जाता है। जो सुन नहीं सकता वह बोल नहीं सकता। इसलिए जो भाषा परिवेश में बोली जाती है उससे अलग सभी भाषाऍं श्रमसाध्य भाषाऍं हैं और उनका आधिकारिक ज्ञान हो ही नहीं सकता। हम उनके उूपरी छिल्के से नीचे पहुँच ही नहीं पाते जहॉं भाषा की आत्मा होती है। हिन्दी के परिवेश में आने के बाद अब भोजपुरी बोलना कठिन होता है, परन्तु यह कठिनाई भोजपुरी क्षेत्र में जाते ही अचेत रूप में ही समाप्त हो जाती है। अंग्रेजी इसीलिए कष्टसाध्य भाषा है। उसे भगाने की जगह उस जैसी दूसरी बहुत सी भाषाओं का स्वागत करने को तैयार हूँ परन्तु उनको उनकी जगह पर ही रखना होगा। मैं मातृभाषाओं की गरिमा की वापसी चाहता हूँ और यह तभी संभव है जब उनके माध्य म से उच्चतम अवसर प्राप्त हों।‘’

‘’समझ गया। तुमने इसे मूछ का सवाल बना लिया है, भले आदमी, यदि ऐसा है तो खुद भी मूछ तो रखते।‘’

’’मूछ का सवाल नहीं है, गरीब से गरीब और देश के किसी कोने में पड़े हुए बच्चों के लिए शिक्षा के माध्यम में समानता के अधिकार की समस्या है। अपनी भाषा मोलभाव से नहीं खरीदी जाती, वह सरे राह लुटाई जाती है और बिना इस विषय में सचेत हुए हम उस पर अधिकार कर लेते हैं।‘’

’’छोड़ो ये बार बार दुहराई गई बातें। यह बताओ जब सभी ग्रह इसके विरोध में है, कम से कम कोई साथ देने को तैयार नहीं तो तुम भारतीय भाषाओं को उनका स्थान दिलाओगे कैसे।‘’

‘’यह काम मेरे वश का नहीं है, यह काम अंग्रेजी स्वयं करने जा रही है। मैंने कहा था न, पहले यह ज्ञान की भाषा थी, अब यह भ्रष्टाचार की भाषा बन चुकी है। इसका स्तरीय ज्ञान दिलाने वाले स्कूलों की फीस ही इतनी उूँची है कि मध्यवर्ग के कदाचार को इससे औचित्य मिलता है। इतनी तो आय है, फीस इतनी, बच्चों को पढ़ाना तो होगा ही। और इसका जो दूर दूर तक विस्तार हुआ है उसमें साधनहीन जन पिस जाते हैं। अंग्रेजी अपनी सर्जनात्मकता खो कर एक जघन्य बोझ में बदल चुकी है जिसके कारण भाषा सीखने पर जान लड़ाने के कारण बच्चे दूसरे विषयों की ओर पूरा ध्यान नहीं दे पाते और जिस पर ध्यान देते हैं उसे सीख नहीं पाते। इसका परिणाम है महामारी के स्त‍र पर नकल का कारोबार। हमारे समय में यह लगभग असंभव था, और फिर लड़कों की संख्या बढ़ती गई और उनका दुस्साहस भी बढ़ता गया। मान बहादुर प्रिंसिपल थे, नकल पर रोग लगाई थी और उनकी हत्या‍ उनके ही कालेज के छात्र ने कर दी। अब यह आश्चर्य का विषय नहीं रह गया है। नकल कराने में छात्र ही नहीं, उनके अभिभावक और शिक्षक तक शामिल होने लगे है। उनको अच्छे नंबर चाहिए, स्कूल को अपना नाम। पर्चे लीक कराने का कारोबार व्यापमं या क्या नाम है जो मध्य प्रदेश में सुनने में आया था। खैर जो भी हो, उसकी चर्चा से तो अवगत हो। ये एक दूसरे से असंबद्ध परिघटनाऍं और प्रवृत्तियॉं नहीं हैं। और इनके पीछे प्रधान कारण अंग्रेजी का चलन और उसका दबदबा है।

‘’मैंने एक बार कहा था न कि इतिहास का फैसला वर्चस्वी की अपनी ही व्यर्थता और अव्यवहार्यता के रूप में आता है और तब असंभव प्रतीत होने वाले परिवर्तन स्व्ल्प आयास से भी हो जाते हैं, परन्तु प्रयास तो करना ही पड़ता है।‘’

उसने लगभग समर्थन का खतरा उठाते हुए एक नीतिवाक्य जड़ दिया, ‘’नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:।

‘’इतनी देर बाद आया समझ में इतिहास का वह संकेत। सांस्कृतिक विजय के लिए पश्चिम ने कितना लंबा और जी जान से संघर्ष किया इसे तुम जानते हो। सांस्कृतिक मुक्ति के लिए हमें अपनी भाषाओं की ज्ञान संपदा का विस्तार करना होगा और यह अंग्रेजी में जो लिखा है उसका भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने से नहीं होगा। हमें विविध क्षेत्रों में मौलिक अध्ययन और अनुसंधान से ज्ञान का उत्पादन करना होगा। अंग्रेजी, संस्कृत या अन्य भाषाऍं जिनका ज्ञान है वे भी स्रोत भाषाऍं बनी रहेंगी। यदि हिन्दी के लोग विश्व हिन्दी सम्मे‍लन, हिन्दी दिवस आदि के आयोजनों से दूरी बना कर रहें तो भाषागत सौहार्द स्थापित करने में इससे भी बढ़ावा मिलेगा। मैंने पहले ही कहा था हिन्दी क्षेत्र में राष्ट्र भाषा प्रचार समितियाँ दक्षिण भारत की किसी भाषा की शिक्षा का केन्द्र बन जाऍं या उनमें राष्ट्र की दूसरी भाषाओं की कक्षाऍं लगाना आरंभ करें और हिन्दी भाषी इसमें रुचि लेने लगें तो इसका जादू जैसा असर होगा। परन्तु इसे आन्दोलन का रूप देने में नेतृत्व दलित समाज ही समर्थ हो सकता है।

Post – 2016-04-03

”बात अपनी कह सकें, यारब जबॉं अपनी तो हो।”

‘’तुम्हें क्या। लगता है। यह जो आप सरकार है, शिक्षा प्रणाली में सुधार तो इसकी प्राथमिकताओं में है। यह तुम्हारे सपने पूरा करने की दिशा में कुछ करेगी।‘’

‘’मैं सरकारों और राजनीतिक दलों पर बात नहीं करना चाहता। यह एक सोच और समझ से जुड़ी समस्या है, किसी दल से नहीं। इसके पनपने में आधी सदी लगी है, इसे समझने में भी समय लग सकता है और इसके बाद निराकरण का चरण आता है, जिस अवधि तक के लिए यदि हम मान भी लें कि कोई दल इसका सही निदान कर पाया है और उसका उपचार कर लेगा, तब तक जरूरी नहीं कि वह सत्ता में रहे। इसलिए हमें उस मानसिकता को समझना होगा जिससे वह सोच पैदा हुई‍ जिसने उद्धारकों को लुटेरों की एक नई कौम में बदल दिया, कम्युनिस्टों को साम्राज्यवादियों और आन्तरिक उपनिवेशवादियों का दलाल बना दिया, जिसके कारण एक दौर का अंग्रेजी विरोधी अपने बच्चों का भविष्य अंग्रेजी माध्यम में तलाश करने लगता है। यह मत भूलो कि अपने क्रान्तिकारी तेवर के बाद भी आप सरकार भी दो तरह की शिक्षाप्रणाली के पक्ष में है, उन निजी कारोबारी स्कूलों में गरीबों की कुछ प्रतिशत भर्ती के पक्ष में है, यह अवसरवाद है। परन्तु मैं इसके लिए उस सरकार के इरादों का निर्णायक नहीं बन सकता। राजनीतिक अपरिहार्यताऍं कमीनेपन की भी परिभाषा बदल कर बलिदानियों की एक नई कोटि खड़ी कर लेती हैं, इसलिए राजनीतिक दलों का मूल्यांकन करने में समय लिया जाना चाहिए।

”हमारा सोच विचार भी राजनीतिक श्रेणियों में बँट चुका है इसलिए हमें विचारक माने जाने वालों की पोजिशन का तो पता चलता है और जिसे हम उनका विचार मानते हैं, वह विचार होता ही नहीं, वह पूर्व ग्रहीत मान्यता के समर्थन में नए ऑकड़ों के साथ ऐसे खेल में बदल जाता है जिसमें अदा समझ में आती है, अदायगी का पता नहीं चलता।

”भाषा की समस्‍या राजनीतिक समस्या नहीं है, वैचारिक समस्या है।‘’

‘’तुम मानते हो राजनीतिज्ञों के पास दिमाग नहीं होता, सोच और समझ नहीं होती? कभी इस पहलू पर भी ध्यान दिया कि तुम हवा में बातें करते हो? हवाई बातें करते हो और, माफ करना, हवा का रुख देख कर दिशा बदल लेते हो। अपने को एकमात्र मार्क्सवादी कहते हो और काम उनका करते हो जो हिटलर को अपना आदर्श मानते हैं। जमीन पर पॉंव रखो तो सचाई का भी पता चलेगा।’’

‘’मैं इस तरह सोचता ही नहीं जैसे तुम सोचते हो जिसमें सोचने की पहली शर्त होती है, तू मुझ सा बन जा और फिर सोच, और तू सोच भी रहा है या नहीं, यह तब पता चलेगा जब यह सिद्ध हो जाएगा कि गहन सोच विचार के बाद तू उसी नतीजे पर पहुँचा जिस पर हम बहुत पहले पहुँच चुके थे और उस पर दृढ़ता से जमे हुए थे, न पीछे हटे न आगे बढ़े, न उूपर उठे न नीचे गिरे। त्रिशंकु की कल्पना करने वालों को कम्यूनिज्म का पूर्वाभास कैसे हो गया था इस पर तुम उन विश्वविद्यालयों में अनुसंधान की व्यवस्था करो जिनमें कक्षाऍं कम लगती हैं, हंगामे अधिक होते हैं, तो तुम अपने को भी समझ पाओगे और आगे बढ़ने, उूपर उठने के रास्ते और प्रेरणाऍं भी मिल जाऍगी।

”तुम हिटलर की जीवनी पढ़ने से घबरा जाते हो, दूसरे उन शब्‍दों का अर्थ जानना चाहते हैं जिनका तुम तकिया कलाम की तरह इस्‍तेमाल करते हो। ना‍जिज्‍म उनमें एक है और हिटलर उसे समझने के लिए जरूरी है। भारत में यही उपलब्‍ध है। तुम ज्ञान को व्‍यवहार मान लेते हो इसलिए सशंकित रहते हो।

‘’पहले उन शब्दों का अर्थ समझो जिनको तुम बार बार दुहराते हो पर किसी के पल्ले यह नहीं पड़ता कि तुम कहना क्या चाहते हो। तुम जिसे वायवीयता और धरती का यथार्थ कहते हो, उसकी एक व्याख्या तुलसी दास ने की है जिसे मैं अपने लिए प्रयोग में लाना चाहूँगा, वह वायवीयता को शुद्धता की कसौटी मानते हैं और यह मानते हैं कि जब तक पार्थिव मलिनताओं से संपर्क नहीं होता तब तक जल की शुद्धता बनी रहती है और भूमि का स्पर्श करते ही वह जल ढाबर या मटियाला हो जाता है।

”मेरे‍ लिए इसका अर्थ है, सैद्धान्तिक विवेचन की प्राथमिक अपेक्षा वायवीयता, अर्थात् इतर सरोकारों, आग्रहों और बन्धनों से निरपेक्षता है और तुम्हारी सोच के अनुसार भूमि पड़े ढाबर पानी को पानी की शुद्धता की कसौटी बनाया जा सकता है। पहले इस बुनियादी अन्तर को समझने का प्रयत्न करो। ध्यान रखो, हम हिन्दी पर, भाषा पर, या शिक्षा नीति पर बात नहीं कर रहे हैं। हम भारतीय मानसिकता पर, गुलामी के नये रूप पर, उससे मुक्ति की संभावनाओं पर बात कर रहे हैं और भाषा इसमें इसलिए सबसे पहले आ जाती है कि भाषा के अभाव में हम बेजबान हो जाते हैं। बात अपनी कह सकें, यारब जबॉं अपनी तो हो।

Post – 2016-04-01

हिन्दी का भविष्य (20)

‘यदि सभी रुकावटों की पहचान पूरी हो गई हो तो उनको दूर करने के लिए तन्त्र-मन्त्र, मनौती-यज्ञ का विधान किया जाए।’

‘तुम्हारे रहते रुकावटें दूर कैसे हो सकती हैं। उसके लिए तुम्हारा सफाया करना होगा।‘

वह हंसने लगा, ‘बड़े घटिया आदमी हो यार। मैं हमेशा तुम्हारे भले की सोचता हूँ तुम मेरे बुरे की सोचते हो। मैं चाहता हूँ तुम बने रहो और अपनी बेवकूफियॉं करते रहो जिससे हम भी उन बेवकूफियों को दूर करने के लिए बने रहें। और कोई काम तो, तुमने खुद कहा है, हमारे पास बचा नहीं है, और तुम हमें मिटाने की बात करते हो। तुम्हारी चले तो दुनिया से शराफत भी उठ जाएगी।‘’

’’शराफत की जो परिभाषा तुमने रची है, बन्दूक की, बारूद की, समरी ट्रायल की, हत्या की, यातना शिविरों की, जहॉं तुम्हारा शासन नहीं है, यातना शिविर नहीं बनाए जा सकते वहॉं दुष्प्रचार के यातना शिविर बनाने की, इसे मिटाए बिना शराफत बची रह ही नहीं सकती। शराफत को बचाने के लिए ही हम तुम्हा रा सफाया चाहते हैं।

‘’देखो, तुम्हें भी उसी चीज की चिन्ता है जिसकी हमें। तुम उसका जो अर्थ लेते हो यदि वही स्वीकार्य हो जाय तो मानवता खतरे में हैं। लाल तुम्हारा सबसे प्रिय रंग है, वह हमारा भी प्रिय रंग है। लाल का अर्थ तुम्हारे लिए लहू का रंग है, और हमारे लिए अनुराग का। जिस तन्त्र-मन्त्र की बात करते हो, उसकी साधना तुमने की है। उच्चाटन और वशीकरण के मंत्रों की सिद्धि तुम्हें है, लगातार एक ही रट को पूरे विश्वास से लगाते रहने से दिमागी धुलाई का जो यन्त्र तुमने नाजियों से विरासत में पाया है, उसी का परिणाम है कि मेरी बात सुनने को भी लोग तैयार नहीं होते और तुम्‍हारे खतरनाक कार्यक्रम के बाद भी तुम्हारे बहकावे में आ जाते है। ‘लाली मेरे लाल की जित देखो तित लाल। मैं आली देखन गई मैं भी हो गई लाल।’ इसका हमारा अर्थ अलग है और तुम्हारा अर्थ अलग है। मुझे चिन्ता इस बात को ले कर है कि संचार और प्रचार के माध्यमों पर तुम्हारे एकाधिपत्य के कारण उपद्रव और हिंसा, यहॉं तक कि देशद्रोह को भी उचित बता कर तालियॉं बजाने, जुलूस निकालने, और शान्ति व्यवस्था भंग करने के तरीके अपनाने वालों को लोग देश का हितैषी मान लेते हैं और हम प्रेम, शान्ति, सौहार्द और न्याय की बात करते हैं तो तुम हमें ही अपराधी बताने लगते हो। मुझे तो आश्चंर्य मोदी की समझ पर है, उसने वंशवाद और कांग्रेस को खत्म करने की कसम क्यों खाई, तुम्हारा सफाया तो उससे भी अधिक जरूरी था। खात्मे के एजेंडे पर सबसे उूपर तुम्हारा नाम आना चाहिए था और उसके बाद कांग्रेस का। पर फिर सोचता हूँ, सोचा होगा, ये तो अपनी करनी से ही मर रहे हैं, मरे को मारने से हत्याारी का पातक तो लगेगा, विजय का आनन्द नहीं मिलेगा।‘’

‘’देखो, यह अकेली मेरी समस्या नहीं है, सभी प्रतिभाशाली लोगों की समस्या है। समाज या कम्यु‘निटी के हित की चिन्ता से नैतिक सरोकार रखने वाले सभी कातर होते हैं। अमल में इसके दो ही रूप दिखाई देते हैं। कम्युिनलि‍ज्म या कम्युनिज्म । जो तुम जैसे नासमझ होते हैं, जिन्हें देश दुनिया का ज्ञान नहीं होता, वे पहला रास्ता चुनते हैं और जिनका दृष्टिकोण व्या‍पक होता है, देश-दुनिया की खबर रखते हैं, वे कम्युहनिस्टं हो जाते हैं। मेरी लाचारी है कि मैं दूसरी कोटि में आता हूँ। तुम पहली श्रेणी में हो। मैं तुम्हें फलता फूलता देखना चाहता हूँ कि हमारा भी कारोबार चलता रहा; तुम हमारी जड़ खोदने को तैयार रहते हो। हर बुराई तुम्हें मुझमें नजर आती है। हम लोगों को अपनी बुराई समझने के लिए तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं, अपनी आलोचना हम स्वयं कर लेते हैं।‘’

‘’जड़ें तुम्हा‍री कौन खोद सकता है यार, उसके लिए कहीं जड़ हो तो सही। तुम लोग तो आकाशबेलि के तरह पूरे भारतीय परिदृश्य‍ पर छाए हो। जड़ मूल गायब है पर जड़ता और मूढ़ता का अन्त नहीं। और इसी पूँजी पर सर्वत्र विराजमान ।’

‘हैल्युपशिनेशन में, जो चित्त में होता है वही बाहर दिखाई देता है। वह जड़ता भी हो सकती है और मूढ़ता भी । चित्रकूट के घाट पर चंदन घिसते हुए तुलसी दास को रघुवीर दिखाई दे गए थे और जब कृष्ण की मूर्ति के सामने खड़े हो कर कहा, ‘तुलसी मस्तक तब नवै जब धनुष बाण लो हाथ’ तो वही मूर्ति धनुष बाण लिए दिखाई पड़ी थी। उस जमाने में मैं होता तो भी उनकी कोई मदद नहीं कर सकता था, परन्तु् आज जब तुम उसी श्रुति भ्रम और दृष्टि भ्रम के शिकार हो, हर चीज पर मैं ही छाया दिखाई देता हूँ, तो मैं तुम्हें किसी मनोचिकित्सक तक पहुँचाने का काम तो कर ही सकता हूँ।‘ वह अपनी बात पूरी करके इस तरह तना कि लगा छप्पन इंच का सीना वह भी फुला सकता है।

मैंने कहा, ‘’देखो, मैं उस शिक्षा-प्रणाली की बात कर रहा हूँ जिसे तुमने नष्ट कर दिया। जो चीज मुझे सर्वत्र दिखाई देती है वह है यूनियनबाजी। तुम्हारी आत्मालोचना का हाल यह है कि तुमने कभी रुक कर सोचने की फुर्सत ही नहीं निकाली कि लोग कुछ करने के लिए संगठित होते हैं और तुमने लोगों को कुछ न करने, जो उनकी अपनी जरूरत की चीजें और संस्थाऍं हैं उनका सत्यानाश करने और उसका भी इनाम वसूलने के लिए लोगों को संगठित किया। तुमने निकम्मेपन का प्रसार ही नहीं, नैतिक समर्थन किया, और उसी में से भ्रष्टाचार की विषवेलि पैदा हुई। हम तो काम नहीं करेंगे। जिसे काम कराना हो वह अपने प्रयत्न से करा ले। उनके सारे पाप नारों से धुल जाते हैं, और सारी जरूरतें नारे लगाने से पूरी हो जाती हैं । तुमने उस समाज से द्रोह किया जिसकी भलाई की चिन्ता तुम भी जताते थे पर अपने कारनामों से तुमने उसको ही कंगाल बना दिया और आज तक अपनी चूक का अहसास तक नहीं।‘

वह आत्म विश्वाास में इतना सराबोर था कि उसे इसकी कल्पना तक नहीं थी कि उसका प्रतिवाद भी हो सकता है। वह मेरे त्वरित और सटीक प्रतिवाद से असंतुलित हो गया। मैंने अपनी बात जारी रखी, ‘देखो भारतीय भाषाओं के अभ्युदय के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली अर्थात् प्राइमरी, यह तो मेरे जमाने का शब्द है, हो सकता है उसे आज किसी दूसरे नाम से पुकारा जाता हो, माध्यमिक और उच्चमर माध्यमिक शिक्षा संस्थानों में अध्यापक अपने छात्रों को पढ़ाऍं, जिस योग्यता और दायित्व के आधार पर उन्हें चुना गया है उसे पूरा करें। वे किसी स्तक पर ऐसा नहीं करते। तुम जानते हो, योग्यताओं के आधार पर सबसे योग्य, प्रशिक्षित और महत्वाकांक्षी प्रत्याशी, सरकारी विद्यालयों में शिक्षक बनने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि सरकारी नौकरियों में वेतन अधिक सम्मानजनक है, उूपर से सेवानिव़ृत्ति के बाद पेंशन की सुविधा है, जो यहॉं से निम्नतर योग्यता के पाए जाते हैं और छॅट कर अलग हो जाते हैं वे उन व्यावसायिक स्कूॉलों में जाते हैं जिनके लिए पब्लिक स्कूंल का प्रयोग किया जाता है। शब्दाें के अनर्थ का यह भी एक नमूना है। जिन सार्वजनिक विद्यालयों के लिए पब्लिक स्कूल शब्द प्रयोग में लाया जाना चाहिए, उनकी साख गिराने के लिए उन्हेंं सरकारी स्कूल, म्युनिसपैलिटी का स्कूल कह कर अंग्रेजी के शिक्षा व्यवसायियों ने प्रयोग में लाना आरंभ किया और वह मान्य हो गया। इस पर कोई आयत्ति तक नहीं करता। यह इस बात का प्रमाण है कि तुम बाहर से इतने विराट दीखते हुए भी भीतर से कितने खाली हो गए हो और अपनी ही अतियों के कारण तुम मिटने के कगार पर हो।

‘बुरा मत मानो। मेरे मित्र हो। स्वयं देखो, समाज को दिशा दिखाने वाली शिक्षा व्यखवस्था ही गड़बड़ है और यह तुम्हारी कृपा से है। मैं आज से तीस साल पहले की एक घटना का हवाला दूँ । उस समय एक साहसी शिक्षा निदेशक ने, तुम्हेंं यह भी याद दिला दूँ कि उन दिनों दिल्ली राज्य नहीं बना था, इसे दिल्ली प्रशासन कहा जाता था। उन दिनों, उसने निजी स्कूलों में पालन किए जाने वाले एक नियम को दिल्ली सरकार के स्कूलों पर लागू करना चाहा, जिसमें यह व्यवस्था थी किे कोई अध्यापक, जैसा वह निजी स्कूलों के करने को बाध्य‍ है, ट्यूशन नहीं करेगा । यही वह व्याधि है जिसमें अघ्यापक अपनी क्लास उपस्थिति दर्ज कराने के लिए और अपना समय काटने के लिए लेते थे, और यह जताते रहते थे कि यदि कुछ जानना है तो ट्यूटर रखो। यदि मैं रहा तो तुम्हारा कल्याण और न रहा तो भगवान तो है ही। इसमें शिक्षक जो निजी स्कूटलों की तुलना में अधिक योग्य्, सुप्रशिक्षित और अधिक सम्मानजनक वेतन पाते थे, और जिनका नैतिक दायित्व था कि वे इस निर्देश का सम्मान करते, उनकी यूनियन अर्थात् अखिल भारतीय शिक्षक संघ ने जो तांडव किया उसके परिणाम स्वरूप उस निदेशक को जाना पड़ा, ट्यूशन प्रणाली की विजय हुई। यदि तुममे आत्मालोचन की शक्ति बनी हुई है तो ऐसे देशद्रोही, समाजद्रोही, अर्थव्युवस्था को नष्ट करने वालों का साथ छोड़ो। उनकी आलोचना करो या यदि नहीं कर सकते तो उस समय चुप रहा करो जब आलोचना हो रही हो। यह सिद्ध करो कि तुम्हारा होना देश और समाज के हित में है और इसके साथ ही हमारी वह अड़चन दूर हो जाएगी जो तुम्हारे कारण है। फिर तो हम एक ही भाषा में बात करेंगे। लाल का वह अर्थ तुम्हें समझ में आ जाएगा जो हम लगाते आए हैं और सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में सुधार सुशिक्षित होने के विश्वास के साथ ही अनावश्यक हो जाएगी माथापच्‍ची और मिट जाएगा वह दैन्य जिसके कारण लोग शिक्षा का अर्थ अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा लगाने लगे हैं।

Post – 2016-03-31

हिन्‍दी का भविष्‍य (19)

“दूसरी रुकावट भारतीय भाषाओं के लेखक हैं। इन्हें अपनी भाषाओं पर गर्व है, पर विश्वा स नहीं। थोड़ा-बहुत विश्वास संस्कृत पर है जो अज्ञान पर आधारित है क्यों कि वे स्वयं संस्कृत जानते नहीं। इसलिए संस्कृ त के प्रसंग में प्रशंसा सहमते हुए और निन्दा गरजते हुए करते हैं। अंग्रेजी पर विश्वास है पर अपने अंग्रेजी ज्ञान पर विश्वास नहीं है क्योंकि भाषा ज्ञान नहीं अभ्याेस की चीज है जो अपने भाषा-परिवेश में ही संभव होता है। अंग्रेजी में प्रार्थनापत्र से आगे की कोई चीज पूरे विश्वास से नहीं लिख सकते, फिर भी अंग्रेजी को कुछ प्रयत्न से समझ लेते है, और ज्ञान का एक मात्र श्रोत अंग्रेजी में उपलब्धं सामग्री को मानते हैं इसलिए अंग्रेजी अधिक आयास से और अपनी भाषा में उपलब्ध सामग्री को सदभावनावश पढ़ते हैं। ‘’

’’तुम अपना परिचय दे रहे हो या भारतीय लेखकों, पत्रकारों और अध्यापकों की बात कर रहे हो।‘’

मैंने उसके फिकरे पर ध्या न ही नहीं दिया, ‘’अपनी भाषा में लिखे ज्ञान साहित्य को वे बिना पढ़े ही यह जान लेते हैं कि इसका स्तर उसी विषय पर अंग्रेजी में लिखी किसी पुस्तक या लेख की तुलना में घट कर होगा और अधिक संभावना यह है कि अंग्रेजी से ही यहॉं-वहॉं से कुछ झटक कर सजा दिया गया हो, इसलिए उसे यदि पढ़ना भी पड़ा तो कृपा भाव से पढ़ते हैं।

उनका विश्वा स है कि यदि सचमुच कोई आधिकारिक काम होता तो अंग्रेजी में लिखा गया होता और इसलिए यदि स्वयं कोई शोध या ‘आधिकारिक’ लेखन करना होता है तो अंग्रेजी का उस स्तयर का ज्ञान प्राप्त‍ करने के लिए संघर्ष करते हैं जिसके बाद अपनी बात उस भाषा में कह सकें। उसके किसी पत्र या प‍त्रिका में नामोल्लेेख तक को भारतीय भाषा में अपने लेखन से अधिक महत्व देते हैं। दूसरे शब्दों में ये अपनी भाषा से अधिक सम्मान अंग्रेजी का करते हैं और यदि अंग्रेजी का महत्व कम करने या उसे ऐच्छिक विषय बनाने की बात आए तो उसका सीधे विरोध न भी करें तो विरोध करने वालों के पीछे भीड़ बन कर खड़े हो जाऍंगे।‘’

‘’जिसे तुम अपराध की तरह पेश कर रहे हो वह एक सचाई है। ऐसे लोगों को खड़ा कर दो जा अपनी भाषा या उसके साथ किसी अन्य भारतीय भाषा को भी जानते हैं, परन्तु अंग्रेजी का मात्र कामचलाउू ज्ञान रखते हों, और तुम्हें फर्क समझ में आ जाएगा।‘’

’’अंग्रेजी में जो सचमुच सहजता से लिख बोल लेते हैं वे ऐसे लोग हैं जिनकी घरेलू बोल चाल की भाषा अंग्रेजी रही है। हम उसके गुण-दोष पर नहीं जाऍंगे, परन्तु अंग्रेजी के प्रति गहन आसक्ति के कारण वे अपने परिवेश की भाषा को बोल तो लेते हैं, परन्तु लिखने में या व्याख्यान देने में उन्‍हें उसी तरह की कठिनाई होती है जो भारतीय भाषाओं के अभ्यस्त लोगों को अंग्रेजी लिखने बोलने में होती है। दोनों इसमें असहज अनुभव करते हैं, इसीलिए मैंने कहा था, भाषा ज्ञान की चीज से अधिक व्यवहार की चीज है।

’’अब जो तुलना तुम ले कर बैठ गए अग्रेजी से अपरिचित या अल्पपरिचित परन्तु भारतीय भाषाओं तक का ज्ञान रखने वालों के बीच तुलना का, वह आभासिक है। यह अंग्रेजी के दबदबे के कारण है, विषय की समझ के कारण नहीं है। नफीस अंग्रेजी में धाराप्रवाह बोलने और लिखने वाले अधिक समझदार होते हैं यह बात तुम तभी कह सकते हो यदि इतिहास या भाषा पर किसी अंग्रेजी में दक्ष इतिहासकार को मेरी स्थापनाओं को खंडन करते दिखा सको। पूरी मंडली रही है उनकी, सभी संस्थांओं पर अधिकार रहा है उनका, इसके लिए कवायद भी करते रहे परन्तु ऐसा हो नहीं पाया और इसके बाद भी उनका नाम फारसी सलाम करते हुए ही लेने की आदत बनी हुई है लोगों म वे अंग्रेजी जानते हैं, अपना विषय नहीं जानते।”

‘’पहली बार तुम्हेंब इस तरह अहंकार पूर्वक और वह भी अपने बारे में बात करते हुए सुन रहा हूँ। सुन कर भी विश्वास नहीं होता कि तुम होश हवास में हो या कुछ खा-पी लिया है और उसके असर में ऐसी बातें कर रहे हो।‘’

‘’तुम अपनी ओर से समझदारी की बात करते हो तो भी तुम्हारी असलियत का पता चल जाता है। अरे भई, मैं अपनी बात नहीं कर रहा था, मैं यह बता रहा था कि अंग्रेजी ज्ञान पर भरोसा करने के कारण आधा समय तो ये लोग पराई भाषा पर स्वभच्छ अधिकार पाने पर खर्च कर देते हैं और फिर इतने श्रम से सीखी गई भाषा में जो कुछ भी लिखा गया है उसको गटक जाते हैं, उसका आलोचनात्मक पाठ तक नहीं करते और इसलिए अंग्रेजी का ज्ञान विषय के अटपटे और जपाट ज्ञान का रूप ले लेता है। जिसे पराई भाषा के प्रति ऐसी आसक्ति नहीं है वह अपने विषय की समझ और ज्ञान के कारण ही अपनी जगह बना सकता है। अंग्रेजी के आधिकारिक ज्ञान का अभाव जॉंचने-परखने और अधिक गहराई में उतरने को प्रेरित करता है। अपना उदाहरण इसलिए कि जब प्रमाण की बात आएगी तो अपने अनुभव और टकराव और सभी अयोग्यताओं और सुविधाओं से वंचित मुझ अकिंचन के एक प्रहार से सर्वसाधन संपन्नों के दाँतों में धूल झाड़ कर खड़े होने के बाद भी मानो कुछ हुआ ही नहीं, किरकिरी की याद तो दिलानी ही पड़ेगी। यह तो पूछना ही पड़ेगा कि अंग्रेजों से ले कर अंग्रेजी दॉं विद्वानों का इतिहास चार पॉंच हजार साल से पीछे नहीं जा पा रहा था और अपनी बोलियों की समझ रखने वाले एक अदना ने उसे दस हजार साल और स्यांत् उससे भी पीछे अकेले पहुँचा दिया और जब यह दुस्साेहस किया था तो पुरातत्व तक से कोई रोशनी नहीं मिल रही थी, पुरातत्व बाद में आया, गुणसूत्रों के विश्लेपषण बाद में आए। 1985 में लिखित और 87 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में एकमात्र ज्ञात स्थल मेह्रगढ़ के बारे में लिखा था कि यह भारतीय इतिहास के पन्ने पर हाशिए की लिखावट है, इसका प्रसार क्षेत्र भारत में है और आहार संग्रह के चरण से बाद के नागर चरण तक के विकास का एक खाका प्रस्तुृत किया था और वह इसलिए कि अंग्रेजी ज्ञान की भाषा है, इस भ्रम का शिकार नहीं हुआ था।‘’

‘’वह सब तो ठीक है यार, लेकिन फिर भी अगर तुम अपने बारे में चुप रहते तो क् अच्छा नहीं होता।‘’

‘’होता, यदि उस सच को दबाने या उससे ध्यान हटाने की कोशिश लगातार किसी न किसी रूप में जारी न रहती और उसे कहने वाला कोई दूसरा होता तो। तुम सच को व्याक्त करते हो उसकी रक्षा के लिए, यदि उसे किसी शरारत के तहत अनसुनी करने का प्रयत्न हो रहा हो तो थप्पड़ मार कर भी उसकी ओर ध्या न दिलाना होता हैा तुम अपने तर्क का विस्तार करते हुए कह सकते हो हिन्दी तुम्हारी अपनी भाषा है, इसकी शक्ति और उपादेयता की बात करना भी आत्मासक्ति है। तुमने मेरा ध्यान विषय से हटा दिया। मैं केवल यह याद दिला रहा था कि हमारे मन में कहीं गहरे यह भाव जमा हुआ है कि अंग्रेजी के अभाव में हम ज्ञानशून्य हो जायेंगे, जब कि हमने यह पाया कि अंग्रेजी पर भरोसा करने के कारण हम ज्ञानशून्य नहीं तो ज्ञानजड़ बने हुए हैं।”

“तुमने जो उदाहरण दिया वह अपवाद भी तो हो सकता है। क्या यह नहीं मानोगे कि हमारी भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान संपदा नगण्य है।‘’

’’किसी का दिया हुआ ज्ञान उसके काम का होता है, हमारे काम का नहीं। यदि ज्ञानसंपदा नगण्यं है तो उसका उत्पादन करना होगा और उसमें अंग्रेजी बाधक बनी रहेगी। भारतीय भाषाओं के साहित्यकार हों या पत्रकार या अध्यापक ये सभी पढ़ते अंग्रेजी में, सोचते घालमेल भाषा में हैं, बोलते हिंग्लिश जिसमें बीच बीच में इंडिश का पुट होता है जो शब्दों तक सीमित नहीं होता, वाक्यो और उद्धरणों को विरामचिऩ्हों की तरह प्रयोग में लाते है, और लिखते अपनी भाषा में हैं, और लिखते समय भाषा की पवित्रता का इतना ध्यान रखते हैं कि अपने ही सोच के हिन्दीतर शब्दों का हिन्दी् में अनुवाद करना जरूरी समझते हैं। इसलिए अंग्रेजी से वंचित होने की कल्पना से उन्हे डर लगेगा ही । वे जुआकड़यों की तरह दिवा-स्वप्न देखते हैं और लुटेरों की जमात का हिस्सा बनते चले जाते हैं जैसे अधिक पानी से तर धरती की लोनी फूल कर ऊपर चली आती है और उर्वर भूमि को ऊसर क्षेत्र में बदल देती है वैसे ही समाज के अघाए हुए, दूर से चमकने वाले, फूले हुए ये लोग किसी भी तरह की पहल की क्षमता खो चुके होते हैं। पता भी है, तुम भी इसी तबके में आते हो।”

“और तुम?”

मैं उनमें आता हूँ जो अल्प से अपार पाने और भोग के पीछे भागने के खतरों को जानते हैंऔर ऊसर क्षेत्र को उर्वरा भूमि में बदलने के लिए जीतोड़ कोशिश करते हुए तुमसे लगातार टकराते रहते हैं । पर वह आग जिसकी ऊर्जा से युगान्तर होता है, मेरे पास भी नहीं है वह उस दबे कुचले और उपेिक्षत तबकेां में है जो इन्सान बनने की छटपटाहट से गुजर रहे हैं, और ऊपर वाले तिरस्कार के साथ बार बार उन्हें नीचे धकेल देते है़, और जो लाचारी में अपने को समझा लेते हैं कि शायद यही हमारी नियति है, और इसलिए सपने उनके पास भी नहीं हैं। उन्हें तो यह विश्वास दिलाना तक कठिन है कि वे भी इन्सान हैं। जो आदमी ही नहीं बन पाए वे सपने नहीं देख सकते। सपने देखने के लिए जिस सुकून की जरूरत होती है वह सुकून छटपटाने वालों के पास नहीं हो सकता। उनके भविष्य के सपने पालने का काम वह कर सकता है जो यातनाओं से गुजरा हो और राहत के क्षणों मे भी उस आग को बचाए हुआ हो जिसकी धीमी आग में सपने पलते और आकार लेते हैं।”f

Post – 2016-03-28

हिन्दी का भविष्य‍ (18)

‘’यदि तुम सचमुच रुकावटों को समझना चाहते हो तो, सबसे बड़ी रुकावट तुम हो, तुम जैसे लोग जो हिन्दी के नाम से घबरा जाते हैं। हिन्दी में ढाई अक्षर हैं। इसे वे अठारह बना कर हिन्दीहिन्दूहिन्दुास्तान पढ़ते हैं और उनके सामने राष्ट्रवाद का खतरा दिखाई देने लगता है। ये फिकरे गढ़े किसने हैं, कब गढ़े यह भी तुम्हें भूल जाता है क्योंकि तुम उनमें ही गर्क हो गए इसलिए तब से आज तक तुम्हारी भूमिका तोड़ने और बिगाड़ने की रही है, अपने आप तक को तोड़ने और मिटाने की । तुमने जो कहा है ठीक उससे उलट काम किया है। दावा मजदूरों और गरीबों की भलाई का करते रहे और काम उपनिवेशवादियों का करते रहे; जो सपने दिखाते रहे हैं उन्हीं को रौंदने के कारनामे करते हैं। समझदार इतने कि इसका इल्म तक नहीं।‘’

मिटटी के घड़ों की तरह टकराते, और टूटते हुए लुढ़कते रहे हो और इसी को प्रगति कहते हो। दुर्गति की इतनी सुन्द र परिभाषा तो कहीं देखी ही नहीं। तुम दूसरों को फासिस्टग कहते हो और स्व्यं फासिज्मप और नाजिज्मद के औजारों का इस्ते माल करते आए हो। साधनों की पवित्रता पर विश्वािस न होने के कारण तुम भ्रष्ट से भ्रष्ट संगठनों से समझौता कर सकते हो और भ्रष्टहता में उनसे बहुत पीछे रहने के कारण उनसे जुड़ने पर भी उनकी दुम बन कर ही लहरा सकते हो।‘’

‘’फासिज्म और नाजिज्म़ में तुम क्या फर्क देखते हो?’’

‘’तुमने गलत सवाल किया। पूछना चाहिए था फासिज्म्, नाजिज्म और कम्युनिज्म में क्या समानताऍं देखते हो और इनमें क्या भिन्नताऍं हैं कि इनके तीन नाम हैं?’’

‘’अरे यार, चलो यही सही’’ उसने मजा लेते हुए कहा।

‘’समानता यह है ये तीनों पूँजीवाद और उसके विस्तार और उस क्रम में होने वाले कदाचार के प्रति विक्षोभ के तीन रूप हैं। तीनों न्याय और औचित्य की अवैज्ञानिक समझ पर आधारित है। अन्तर यह कि फासिज्म का बल राष्ट्रीय अनुशासन और सैन्यैकरण पर था। तुम्हें याद हो या न याद हो, हमारे समय में स्वतन्त्रता के बाद छात्रों में अनुशासन और सैन्यक करण का एक अभियान चलाया गया था। एक का नाम था प्रोविंशियत कैडेट कोर और दूसरे का नेशनल कैडेट कोर, जिन्हें हम PCC और NCC के नाम से जानते थे। प्रलोभन यह था कि यदि तुम़्हारे पास इसका प्रमाणपत्र होगा तो तुम्हें नौकरी में कुछ सहूलियत मिल जाएगी। मैं PCC में था, यार याददाश्तम इतनी कमजोर हो गई है कि इसका कोई और नाम रहा हो तो मैं इस सीमा तक अपने कथन में अदल-बदल कर लूँगा पर इस योजना और इसके पीछे की मानसिकता पर नहीं। मुझे इस बात की ग्लानि थी कि हमारे स्कूल में NCC का आयोजन क्यों न था। कारण NCC को सुविधाऍं अधिक दी जाती थीं जिनसे हमें ईर्ष्या थी । मुझे उस सर्टिफिकेट के लिए दो साल तक कवायद करनी पड़ी, उसे पास भी किया पर जीवन में उसका कोई उपयोग न हुआ। यह समय 1951-53 का है। नेहरू जिन्हों ने सुनते हैं मुसोलिनी से मिलने से इन्कार कर दिया था, उनके ही शासन में हमें मुसोलिनी के फासिस्ट आदर्शों के अनुसार प्रशिक्षित किया जा रहा था। पता नहीं मुसोलिनी ने अनुशासन और सैन्य‍ प्रशिक्षण के लिए किन्हीं प्रलोभनों का प्रयोग किया था या नहीं।‘’

‘’किया होगा, न किया हो तो दहशत का सहारा लिया गया होगा।‘’

’ठीक कहते हो। मैं तुम्हें केवल यह याद दिला रहा था कि इतिहास के विविध चरणों पर उन्हीं शब्दों और प्रत्येयों के अर्थ बदलते रहते है और एक ही समय में अलग अलग हितों से जुड़े लोगों के लिए भी अर्थ भिन्न भिन्न होते हैं। उसी मुसोलिनी से नेहरू ने मिलने से इन्कार कर दिया था। उसी से रवीन्द्रनाथ और गांधी मिलने पर अपने देश को एक अनुशासित देश में ढालने के लिए उससे प्रभावित हुए थे और नेहरू के समय में ही, स्वतन्त्राता के ठीक बाद हमारी शिक्षा प्रणाली छात्रों को फासिस्ट सॉंचे में ढाल रही थी। और इसी फासिज्म को दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक गाली में बदल दिया गया। यह कम मजेदार तो नहीं कि आप फासिज्‍म से नफरत भी करते हैं और उसी पर चलने का प्रयत्‍न भी करते हैं।‘’

‘और नाजिज्म ।‘’

‘’करेले के बारे में एक मुहावरा है, एक तो करेला दूसरे नीम चढ़ा। फासिज्म जातीय संहार और अपने ही समाज के अरक्षणीय लोगों के संहार की क्रूरताओं को ढकने के लिए विचार, संचार और मनोरंजन के सभी साधनों पर एकाधिकार करके गलत को सच और सच को गलत सिद्ध करने की कवायद है और यदि गौर करो तो इप्टा के समय से ही मनोरंजन, संचार, विचार, साहित्य, कला सभी माध्यमों पर एकाधिकार सा करके उल्टे को सीधा बताने का काम तुमने लगातार किया है और उसी धौंस और आतंक के साथ किया है जिसके लिए तुम फासिज्मा को दोष देते हो।
‘’हिन्दी भाषी क्षेत्र में तुम्हारा प्रभाव सबसे अधिक रहा है और आज तक बना हुआ है, इसलिए तुम देशद्रोह को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिद्ध कर लेते हो। यदि भारतीय भाषाओं में शिक्षा और उच्चतम अवसरों की उपलब्धता और अंग्रेजी को गौण स्थान देने की बात आए तो सबसे पहले तुम इसका विरोध करोगे। हिन्दी के नब्बे प्रतिशत साहित्यकार और पत्रकार तुम्हारे सम्मोहन में आज भी है इसलिए वे स्वयं जो अन्यथा हिन्दी का राग अलापते हैं, भारतीय भाषाओं का विरोध वे करेंगे या ऐसा करने में लज्‍जा अनुभव हो तो मैदान से पीछे अवश्य हट जाऍंगे, इसलिए कहता हूँ कि पहली और सबसे बड़ी रुकावट तुम स्वायं हो क्यों कि तुम्हारे हित अमेरिकी नवसाम्राज्यवाद से जुड़ चुके हैं और वह यह नहीं चाहेगा कि अंग्रेजी का वर्चस्व समाप्त हो।

Post – 2016-03-26

हिन्दी का भविष्य (17)

‘’तुम्हें उन रुकावटों का पता है जो तुम्हारे सपनों को धूल में मिला सकती है ?’’

‘’जिनका एक जमदूत सटे पास बैठा को उन्हें जानूँगा कैसे नहीं। मुझे रूकावटों का तो पता है ही, उस पस्तहिम्मती का भी पता है जिसमें सपने तक देखने का हौसला बुझ जाता है, उन दार्शनिकों का भी पता है जिन्हें किसी इमारत के ईंट गारे नहीं दिखाई देते पर उसकी तबाही से उड़ती धूल गर्द उनकी ऑंखों में भर जाती है और परेशान कर देती है। नि:सत्व समाज का महामन्त्र होता है, ‘हमारे करने से क्या होगा’ जिसे दुहराते हुए उसे चादर तान कर सोने की आदत पड़ जाती है।‘’

‘’तुमने तो समाज का बहुत निराशाजनक चित्र खींच दिया यार। कुछ तो सोचा होता कि इसी समाज के अंग तुम भी हो।‘’

‘’तुमने ठीक कहा, समाज शब्द सही नहीं है, समाज का नि:सत्व तबका कहना चाहिए था। किसी भी समाज के सभी तबके कभी नि:सत्व नहीं होते, परन्तु यदि सत्ता और साधन नि:सत्व तबके के पास सिमट आऍं तो जिनमें सत्व होता है वे घुट कर रह जाते हैं। उनकी उूर्जा लौ और प्रकाश देने की जगह धुँआ देने लगती है। उसकी बर्वादी निराशा को और बढ़ा देती है। जिनको यथास्थिति से संतोष है वे बदलाव का विरोध करते हैं, और जिन्हें बदलाव चाहिए वे अपनी बौखलाहट में उनके हाथ का खिलौना बन जाते हैं जो उस दबे कुचले तबके को अनन्त काल कें लिए गुलाम बनाए रखना चाहते हैं और इसके लिए उन्हीं की व्यर्थ जा रही आग का इस्तेमाल लुकाठे के रूप में करते हुए उनका घर जलाने का नाटक रचते हुए, जिन्होंने उन्हें वशवर्ती बना कर कभी रखा था और आज भी समानता का अधिकार नहीं देना चाहते उनका अपना ही घर जला देते हैं। इस आगजनी का उन पर कोई असर नहीं होता जिन्‍हें वे जला कर सुधारना चाहते है, उनके अपने भीतर यह समझ तक नहीं पैदा होती कि स्थिति में इच्छित बदलाव क्यों नही आता और कैसे लाया जा सकता है। उल्टें वे उनके चंगुल में फँस जाते हैं और उन प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं जो उनके भविष्य को अधिक अन्ध‍कारमय बनाती हैं। मैं इसका उत्तहरदायी उनको नहीं मानता। शिकारियों को न दोष दिया जा सकता है, न उपदेश। उन्‍हें अपने लक्ष्य पूरे करने हैं।‘’

‘’तुम बहकते बहुत हो, किनको शिकारी कह रहे हो, मैं भी तो जानूँ।‘’

‘’मैं बहकता नहीं हूँ, तुम अपने अनाप-शनाप सवालों से मुझे बहका देते हो। यदि शिकारियों की ओर चर्चा मुड़ी तो उन बाधाओं की बात अधूरी रह जाएगी जिनकी आशंका तुम मुझे दिखा रहे थे और जिनकी शक्ति और सीमा का पता मुझे है। इसलिए इस सवाल को अगली शृंखला तक स्थगित रहने दो जब मैं उस तबके को केन्द्र में रख कर अपनी समझ से, तुम्हें, और तुम जैसे दूसरे मित्रों को, अवगत कराने का प्रयत्न। करूँगा। इस समय तो इतनी ही बात तुम्हारी समझ में आ जाय तो मूढ़ कक्षा से अगली कक्षा में जाने का रास्ता खुल जाय जहॉं ज्ञान का ककहरा सीखा जाता है और विज्ञान तक की उड़ान भरी जाती है।‘’

वह हँसता रहा और मैं टी हाउस और काफी हाउस के उन दिनों को याद करके मुस्कराता रहा जब हमारी समझ से टॉंग को अल्लााताला ने चलने के लिए नहीं, खींचने के लिए बनाया था और हम उसके इरादे पर पानी नहीं फेरना चाहते थे इसलिए बकवास को बुद्धिमानी और सही सोच-विचार को बोरंबोर मानते थे। समय कट जाता था, तबीयत भी हल्की हो जाती थी, पर दिमाग पहले से अधिक खाली हो कर लौटता था, इसलिए सिर पर किसी तरह का बोझ होता ही नहीं था। इसी में एक पूरी पीढ़ी की बौद्धिक उूर्जा लोनी में बदल गई और सतह से उूपर दिखने की ललक में एक पीढ़ी इतिहास पर कब्‍जा करने की कोशिश में इतिहास से बाहर हाे गई।

वह कुछ कहने को तैयार दिखा, मैंने रोक दिया, ”यार बात बढ़ जाएगी। तुम्हें अपने पहले आलोचक सीताराम बारी की टिप्परणी सुनाउूँ । वह अनपढ़ थे। मेरे घर के छोटे मोटे काम कर दिया करते थे। कलकत्ते में नौकरी करने वाले अपने भाई को चिट्ठी लिखवाने आते थे। यह मेरे मिडिल स्कूल तक का समय था। वह बताते अमुक का सलाम, अमुक का सलाम और यह दर्जन के करीब पहुँच जाता। मैं उनकी बात सुन कर लिखता अमुक अमुक का सलाम। वह लंबा पँवारा लिखवाने के बाद लिखने को कहते थे, थोड़ा लिखना बहुत समझना, चिट्ठी को तार समझना और लौटती डाक से इतना रुपया भेज देना। वह उस पत्र को इत्मीनान के लिए कई लोगों से पढवा कर जानना चाहते थे कि उनकी बात सही सही लिखी गई है या नहीं और उनकी आलोचना जिससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ यह थी कि भगवान बाबू, आप की लोग इतनी तारीफ करते हैं, लेकिन आप को तो चिट्ठी भी लिखनी नहीं आती है।‘’

”तब उनका यह कथन मूर्खतापूर्ण लगता था, यह समझने में लंबा समय लगा कि सीताराम मेरी जानकारी में मेरे सबसे बड़े आलोचक थे और जिन नामों के साथ यादों और स्नेंहस्मरणों का पुनरावर्तन था, उनका संवेदनात्मक संचार कितना गहन होता है इसका ध्‍यान जगन्नाथ दास रत्नामकर के ‘हमको लिखो है कहा, हमको लिखो है कहा, हमको लिखो है कहा, कहन सबै लगीं, पढ़ने के समय भी नहीं आया। लंबा समय लगा। व्यर्थ प्रतीत होने वाली उक्तियों के मर्म को समझने में युग लग जाते हैं।

‘परन्तु इस समय मुझे अपने एकमात्र विश्ववसनीय आलोचक सीताराम बारी की याद इसलिए आई कि अनुभव से पता चला कि फेस बुक पर थोड़ा कहने पर लोग बहुत अधिक समझते हैं और अधिक कहने पर समझने की जरूरत ही नहीं समझते। अब शामत तुम्हा री है, एक ही विषय या पक्ष को टुकड़ों टुकड़ों में गिलहरी की तरह कुतरना और दुम लहराते भागना होगा।”

उसने ठहाका भरा, ‘’तुमने अपने लिए बहुत सही उपमा चुनी है।‘’

Post – 2016-03-25

हिन्दी का भविष्य (16)

‘’जब तुम हिन्दी‍ के भविष्य की बात करते हो तो लगता है तुम भारतीय भाषाओं पर हिन्दी को लादने की बात कर रहे हो। अन्तर नाक पकड़ने के तरीके में है, सीधे नहीं तो घुमा कर पकड़ लिया। इसलिए मेरे कई मित्र तो शीर्षक से ही इतना उततेजित हो जाते हैं कि तुम्हें पढ़े बिना ही अपनी कल्पना से जान और मान लेते हैं कि तुमने लिखा क्याे होगा। इससे तो अच्छा होता तुम संस्कृुत के भविष्य की बात करते जिस पर आज कल सरकार की भी कुछ दिलचस्पीे पैदा हुई है।‘’

‘’सरकारों में पढ़ लिखे लोग नहीं होते, नारे लगाने वाले लोग होते हैं। संस्कृत बीते हुए कल की भाषा है, और उस कल में भी वह किताबों की भाषा थी, सामाजिक व्;वहार की भाषा न थी। दैनिक व्यवहार में संस्कृत के विद्वान भी क्षेत्रीय बोलियों का ही व्यवहार करते थे, यह पहले भी निवेदन कर चुका हूँ। जो पूरे समाज के व्यवहार की भाषा न बन सके उसके अतीत में भी कभी उसका वर्तमान न था, आज के लिए तो वह केवल ग्रन्थ भाषा है और उसका बहुमूल्यं हजार साल पहले ही रचा जा चुका था। दूसरे शब्दों में कहें तो वह एक ऐसी भाषा है जिसका चलन एक छोटे से समुदाय में, जिस युग में, था, उसे हम भूल चुके हैं और चाहें तो भी उसकी कल्पना नहीं कर सकते। उसके बहुल रूप वैदिक की बारीकी से छानबीन करें तो उसका कामचलाउू चित्र गढ़ सकते हैं। जिस युग में इसका बाजार और कारोबार के लिए विविध भाषाऍं बोलने वालों द्वारा उपयोग होने लगा था, उस दौर में उस छोटी जमात को छोड़ कर दूसरे सभी अपनों के बीच अपनी बोली का व्यावहार करते थे जिसके कारण आज तक हमारी बोलियॉं जीवित हैं।

संपर्क साधने के लिए वे पूरे क्षेत्र में वैदिक काल की ही तरह किसी बोली को निर्विरोध स्वीकार कर लेते थे। कहें ज्ञात इतिहास में संस्कृत का वर्तमान न था और भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसे इतना सरल बनाया जा सकता है कि उसमें वचन, लिंग और सन्धिरूपों की गतानुगतिकता न हो। ऐसा संभव नहीं है इसलिए संस्कृत में ग्रीक की तरह पुरानी ग्रीक जिसमें पुराना साहित्य है और नयी ग्रीक जो आज के व्यवहार की भाषा है, जैसा अन्तर संभव नहीं है। कोई इतना बड़ा रचनाकार संस्कृत का हुआ नहीं जो जयदेव से आगे बढ़ कर इस भाषा में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सके और संस्कृत को लोकग्राह्य और व्यहवहार्य बना सके। और यदि कोई ऐसा कर भी पाता तो भी वह संस्कृत उतनी सशक्त भाषा नहीं होती जितनी हिन्दी है।‘’

‘’यही तो मैं तुमसे उगलवाना चाहता था। तुमने जो मायाजाल फैला रखा था भारतीय भाषाओं के अभ्युदय का उसके पीछे हिन्दी को लादने की लालसा है, इसका शक मुझे बराबर बना रहा है और तुमने हिन्दी को संस्कृत से भी अधिक सशक्त मान कर मेरी आशंका की पुष्टि कर दी।‘’

‘’तुम्हारा दिमाग कभी ठीक हो ही नहीं सकता, क्योंकि ठीक होने के लिए पहले से उसका होना जरूरी है। मैंने एक बार कहा था न कि पार्टी कार्ड थमाते ही काडर का दिमाग उसकी सहमति से रखवा कर फ्रीज कर दिया जाता है और उसकी जगह एक प्रतिनादी यंत्र फिट कर दिया जाता है। जोर जितना भी डालो तुम्हारे दिमाग से वही बाहर आएगा जिसे पहले से भर दिया गया है।

‘’भाषा की सशक्तता यह कि हिन्‍दी संस्‍कृत का सब कुछ अपना सकती है, बोलियों की संपदा भी। हिन्‍दी का व्‍यवहार करने वाले जो छोटी मोटी गलतियॉं करते हैं, हिन्‍दी उनको सहन कर सकती और अपनी शैली का हिस्‍सा बना सकती है और यह किसी भाषा के ऐसे शब्‍दों को पचा सकती है जो व्‍यवहार का हिस्‍सा बन चुके हैं। संस्‍कृत में यह लोच नहीं थी, वह अकड़ी हुई भाषा है, पर हमारे सबसे समृद्ध स्रोतों में से एक है। परन्‍तु यदि भाषा की सशक्‍तता व्यावहारिकता का आधार होती तो अंग्रेजी हिन्दी से बीस तो पड़ेगी ही, उसे विस्थापित करने का प्रश्न ही न उठता। अखिल भारतीय स्तर पर अंग्रेजी जानने वाले हिन्दी जानने वालों की तुलना में कम न मिलेंगे।‘’

‘’यही तो हम कहते हैं, जब एक बार पूरे देश में शिक्षित समुदाय में अंग्रेजी व्यवहार की भाषा बन चुकी है तो उसे उखाड़ने पछाड़ने की जरूरत क्या, है ? यह तो रही मेरी पहली आपत्ति और दूसरी यह कि अखिल भारतीय संपर्क की जरूरत पूरी करने के लिए हिन्दी की जरूरत पड़ेगी यह तुम मान कर चल रहे हो, मतलब कहीं न कहीं हिन्दी साम्राज्य‍वाद की लालसा तुम्हारे भीतर काम कर रही है और इसे कोई स्वी कार नहीं करेगा। तुम्हारी सारी योजना यहीं धरी की धरी रह जाएगी।‘’

‘’तुम ठीक कहते हो, यदि कोई भी भाषा साम्राज्यवादी लालसा पाले तो उसका विरोध एक नैतिक दायित्व बन जाता है और इसीलिए मैंने कहा था, जिस चरण पर इसे सरकारी कामकाज की भाषा बनाने के विरोध में तमिल प्रतिरोध इतना उग्र हो गया था कि आवेश में कुछ ने आत्मदाह तक कर लिया, उस चरण पर इसके आसार भी थे। परन्तु हम हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात नहीं कर रहे हैं। राजकीय हस्तक्षेप से भाषाओं का अहित अधिक होता है, हित कम। हम कहते हैं शिक्षा और उच्चतम अवसर तक पहुँचने का माध्यंम मातृभाषाऍं बनें और मातृभाषाओं की बात करते हुए मैं मातृबोलियों और भाषाओं में अन्तर करना जरूरी समझता हूँ। राजभाषाओं को उन राज्यों की मातृभाषा मानने में कोई हरज नहीं है। मुख्य भाषाऍं वे हों, संपर्क के लिए जो भी भाषा उचित समझी जाए वह गौड़ भाषा हो। उसका आधिकारिक नहीं कामचलाउू ज्ञान जरूरी हो। और वह भी सबके लिए नहीं।‘’

‘’मैं इस आधिकारिक, कामचलाउू और कामचलाउू रहित शिक्षाप्रणाली का रहस्या नहीं समझ पाया।‘’

‘’मैं तुम्हें समझाता हूँ, तुम समझना चाहो तो। माजरा 1977 के आसपास का है। जनता दल के हाथ में सत्ताा आई थी। सत्ता प्राप्ति तक का तरीका उन्हें मालूम था, सत्ता सँभाली कैसे जाती है, यह मालूम नहीं था। नादानी के साथ उत्साह और बड़बोलापन बढ़ जाता है और काम का स्थान बयानबाजी ले लेती है। हिन्दी को ले कर भी ऐसी ही बयानबाजी चल रही थी। जमीनी स्त र पर कुछ करने के लिए जो तैयारी चाहिए वह तो इच्छा मात्र से हो नहीं जाती, फिर भी आवेशपूर्ण बयानों से सुनने वाले विचलित तो होते ही हैं। उन्हीं दिनों भाषा के सवाल पर नंबूतिरिपाद ने एक परामर्श गोष्ठी बुलाई और प्रश्न पार्टी से जुड़ा न हो कर एक समस्या‍ से था, मैं जलेस से जुड़ा था, इसलिए मुझे भी उसमें उपस्थित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने अपनी चिन्ता जताते हुए समझाया कि लोग यह समझते हैं कि दक्षिण भारत के लोग अंग्रेजी अधिक आसानी से सीख जाते हैं, इसलिए वे अंग्रेजी के पक्ष में और हिन्दी के विरोध में हो जाते हैं, यह धारणा सही नहीं है। हिन्दीे को लादना ठीक नहीं है।‘’

‘’तुम्हारी याददाश्त की दाद देनी होगी कि लगभग चार दशक पहले की घटनाऍं और बयान तुम्हें हूबहू याद हैं।‘’ पता नहीं चला कि वह तारीफ कर रहा था या व्यंग्य।

‘’देखो, मैं ठीक उन्हीं शबदों या वाक्यों का प्रयोग नहीं कर रहा हूँ जो उस समय बोले गए थे, मैं उनके मर्म के आधार पर उनकी पुनर्रचना कर रहा हूँ। खैर, मैंने उनसे उस समय की समझ के अनुसार कुछ ऑंकड़ों के साथ अपनी बात रखी। मेरा तर्क निम्न प्रकार था:
(1) किसी भाषा को लादना या किसी लदी हुई भाषा को ढोना दोनो समान रूप में गलत है। मुख्‍य प्रश्न औचित्य का है।

(2) प्रश्न केन्द्रीय कामकाज की भाषा का है। उसको अंग्रेजी रखने से ही काम चलता है तो उन लोगों को जिनको केन्द्रीय नौकरियों में नहीं जाना है या जाने का अवसर नहीं मिलता उन्हें उस भाषा को जानने को बाध्य क्यों किया जाय?

(3) इस देश में इतने बच्चे प्राथमिक कक्षाओं में दाखिला लेते हैं, इतने माध्यमिक तक पहुँचते हैं, और केवल इतने उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। उच्‍चतम स्तर तक पहुँचने की जिनकी आकांक्षा, अर्हता, या पात्रता तक नहीं होती और जिन्हें जिन्दगी भर अपनी भाषा के सहारे ही काम करना होता है उनके ज्ञानार्जन के बहुमूल्य वर्षों को एक ऐसी भाषा सीखने पर क्यों बर्वाद किया जाय जिसका वे कभी उपयोग नहीं करेंगे और जिस बाध्य‍ता के कारण वे उतना कुछ सीखने से वंचित रह जाते है जिसे उन्हें एक ऐसी भाषा को सीखने पर बर्वाद करना पड़ा जिसका उनके लिए कोई उपयोग नहीं है।

(4) यह देश की जरूरत नहीं है कि अमुक भाषा में काम हो, यह केन्द्रीय सरकार की जरूरत है कि जिस भाषा में वह केन्द्र का काम कराना चाहती है, उसमें काम हो। इसका सीधा समाधान यह है कि योग्यता का आधार ज्ञान और प्रतिभा हो। इसकी परख उनकी भाषाओं के माध्यम से हो। इसका भी कोटा हो तो कोई हरज नहीं, परन्तु चयन का आधार कोई ऐसी भाषा न हो जो उनकी अपनी न हो। चयन के बाद जैसे दूसरी शाखाओं में लोगों को प्रशिक्षण पर रखा जाता है, केन्द्री य सेवाओं में चुने गए सभी लोगों को दो साल की शिक्षा उस भाषा की दी जाय जिसमें सरकार अपना कामकाज कराना चाहती है। इसके बाद मैंने यह सुझाया था कि इससे पूरे राष्ट्र की उूर्जा, धन, साधन की कितनी बचत होगी। और उस बचे हुए धन से शिक्षा के विस्ता र में कितना संसाधन उपलब्ध हो सकता है।

‘’अंग्रेजी के बचाव में एक दूसरा तर्क जो दिया जाता है, वह है, अनुसंधान का। हमारी सन्दर्भ भाषा अंग्रेजी है, पहले संस्कृत हुआ करती थी। जब संस्कृत होती थी तब किसी भी विद्रोही परंपरा के दार्शनिक उत्था‍न के साथ संस्कृंत उस भाषा पर हावी हो जाती थी जिससे यह विद्रोह पनपा था। परन्तु यह एक भ्रम है कि अंग्रेजी विश्व भाषा है। अनुसंधान के लिए हमें दूसरी अनगिनत भाषाओं की जरूरत है। उनकी शिक्षा देने वाली संस्थाओं को प्रोत्सानहित करना और विश्व ज्ञान संपदा के सम्मुख अवरोध बनी अंग्रेजी से मुक्ति पाना, अल्प व्ययसाध्य होगा और अपार लाभ दायी होगा, इसलिए जो लोग अनुसंधान आदि का मंसूबा रखते हैं उन्हेंं इंटरमीडिएट के बाद अपनी चुनी हुई भाषा और उसकी ज्ञानसंपदा हासिल करने में किसी तरह का अवरोध न होना चाहिए। उन्हें सिखाने वाले शिक्षण और अनुसंधान के केन्द्र होने चाहिए।‘’

‘’तुम इस तरह की हॉंकते हुए बोर नहीं होते ? कमाल का स्टै्मिना है। मैं तो फेंट होते होते बचा।‘’ उसको आगे कुछ सुनना ही न था। मैं मिन्नत करता रह गया कि अभी तो भाषा के आधिकारिक ज्ञान, काम चलाउू ज्ञान और उससे मुक्त शिक्षा के मसले आए ही नहीं, पर उसने मेरी मिन्नत पर ध्यान ही न दिया।

Post – 2016-03-23

हिन्दीे का भविष्य (15)

‘’दिल पर हाथ रख कर बोलो, क्या तुम सचमुच मानते हो कि अंग्रेजी का स्थान भारतीय भाषाऍं लेने वाली हैं।‘’

“मैं ऐसा नहीं मानता कि मौसम अनुकूल हो तो खेत अपने आप लहलहा उठते है। उसके लिए पहले से कई स्तरों पर तैयारी करनी होती है, प्रयत्न करना होता। जमीन तैयार करने से ले कर सही समय पर बोआई और देख भाल करनी होती है। कुछ न करो तो मौसम की कृपा से जो उर्वरता बढ़ी है उससे झाड़-झंखाड़ उग आते है, जंगल की वापसी हो जाती है। जंगल के कानून काम करने लगते हैं। उत्पादक लुंचक में बदल जाता है और अपनी अपनी मनमानी करने की पशुता को प्रभुता समझने लगता है और आदमी व्यक्ति के रूप में और देश और समाज के रूप में कमजोर और विपन्न होता चला जाता है?”

‘’हमारे साथ यही हुआ है, यही हो रहा है।‘’

मैं हैरान उसका मुँह देखने लगा। यह इतनी आसानी से मेरी बात समझ कैसे गया और समझ भी गया तो मान कैसे गया। ‘’इस तरह घूर क्यों रहे हो, मैंने कुछ गलत कहा।‘’ उसने मुझे ललकारते हुए से स्वर में कहा।

‘’तुमने शत प्रतिशत सही कहा, मैं तो इस बात पर हैरान था कि तुम भी कभी कभी सोचते हो और पार्टी से पूछे बिना अपनी बात कह भी लेते हो। पर जानते हो यह क्यों हुआ है ?’’

वह मेरा मुँ‍ह तकने लगा, कारण उसे नहीं मालूम था। मैंने जबाव देने की जगह प्रश्‍न कर दिया, आदमी और जानवर में फर्क क्‍या है, जानते हो ? शहर, बस्तीे और जंगल में फर्क क्या है जानते हो?’’

नहीं जानता था, क्योंकि अब भी जिज्ञासा से मुझे ही ताक रहा था। मैंने कहा, ”आदमी के पास भाषा होती है, जानवर के पास आवाज जो मिमियाहट, टर्राहट और सरसराहट से ले कर दहाड़ तक पहुँचती है। शहर के लोगो के पास कहने को भाषा होती है परंतु वे जो कहते हैं उसका मतलब वही नहीं होता जो उनके शब्‍दों से प्रकट होता है, इसलिए उनके पास शोर होता है भाषा नहीं होती। बस्ती के लोग जब व्यंजना में बात करते हैं तब भी उनके मन का भाव आईने की तरह साफ समझ में आता है। जंगल में दहाड़ सुनाई देती है, और भय पैदा होता है, पर इससे अधिक कुछ समझ में नहीं आता कि हम जंगल में हैं और किसी भी समय जान पर बन आ सकती है।‘’

तुम हर चीज को इतना फैला देते हो कि शक होता है तुम्हारा दिमाग सही है या नहीं, सीधे नहीं कह सकते ?’’

‘’तुम्हारा उल्लू खींचने में मजा आता है यार, उसे कैसे छोड़ दू और दूसरों को यह समझाने का भी एक मजा है कि देखो, यह मेरा दोस्त तो है पर यह न समझ लेना कि मेरा दोस्त होने के कारण इसके पास धेले की अक्ल भी है।

”अब रही सीधी बात तो यह समझों कि हमारे पास भाषा थी, अब भाषा नहीं रह गई है। एक भाषा लादी हुई जिसे हम सभी समरसता से सीख और समझ नहीं सकते इसलिए वह भाषा से अधिक दहाड़ है, कुछ कहने के लिए नहीं, आतंकित करने के लिए कि मैं अमुक भाव की अंग्रेजी जानता हूँ, वह अमुक मोल की और … आगे तुम कल्प ना से काम ले सकते हो, अक्ल नहीं है तो भी कल्पना तो होगी। अंग्रेजी इंग्लैं ड, कनाडा, अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया आदि में कुछ बदले नामों और गुणों के साथ एक भाषा है, भूतपूर्व उपनिवेशों में एक दहाड्। इस दहाड़ की प्रतिध्वनि यह कि वह चला गया, पर उसकी जबान तो हमारे पास है, तुम तब उसके गुलाम थे, अब मेरे। न पहले उसका तुमसे और हमसे सीधा संचार था न हमारा तुमसे आज सीधा संचार है। हम विचार के लिए नहीं दहाड़ के लिए हैं और रहना चाहते हैं। इसलिए अंग्रेजी जानने वाले भारतीय संदर्भ में एक तरह के पशु हैं और जो अंग्रेजी ज्ञान से वंचित हैं, केवल अपनी भाषा के ज्ञान तक सीमित होने को बाध्य है या अभिमान बस अपनी भाषा पर करते हैं, अपनी बोली पर करता है और दोनों का फर्क समझता है, फिर भी हमने स्वतन्त्रता दिवस के बाद से…’’

मैं अपना वाक्य पूरा करता उससे पहले ही वह बोल उठा, ‘‘स्वतन्त्र ता दिवस की जगह स्वतन्त्रता प्राप्ति भी तो कह सकते थे।‘’

‘’कहता, अगर स्वतंत्रता को सभी ने स्वतन्त्रता माना होता । उसी दिन से लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह आजादी झूठी है और वह रट आज तक जारी है। मैं इस रट के साथ हूँ पर रट लगाने वालों के साथ नहीं, क्योंकि वे अपने को बेच कर आजादी का नारा बुलन्द कर रहे है। बिके हुओं की आजादी मोलभाव करने की आजादी होती है, समाज को उसकी बेडि़यों से मुक्ति देने वाली नहीं। इसे जहाँ पहचाना जाना चाहिए था वहॉं पहचाना नहीं गया। प्रश्ऩ यह नहीं है कि हम आजाद नहीं है, प्रश्न यह है कि हम जंगल को आदर्श मानते हैं और जंगल की आजादी चाहते हैं क्योंकि स्वतंत्रता शब्‍दों में आई, कमीनेपन, धोखाधड़ी और माले गनीमत के रूप में प्रकट हुई और उसी रूप में बनी रही और इसे बनाये रखा उस भाषा ने जो विचार की भाषा नहीं, श्रेष्ठता की दहाड़ की भाषा है। अंग्रेजी से वंचित जनों की भाषा को संचार से बाहर कर दिया गया या ऐसा हीन दर्जा दे दिया गया जिसमें भाषा भाषा न रह कर मिमियाहट बन जाती है। भाषा व्यर्थ हो गई है इसलिए बात बात पर लोग ऐक्शान में आ जाते है। शब्द संचार अवरुद्ध हो गया है इसलिए बल प्रयोग ने भाषा को स्थानान्तरित कर दिया है। अपनी भाषा के तिरस्कार के बाद समाज गूँगा हो जाता है। उसके पास आवाज होती है शब्द नहीं होते। शब्द कोशों में होते हैं और सजीव लगते हैं, हम अपने शब्दों के अनुसार आचरण नहीं करते इसलिए वे मर जाते हैं। शब्‍द अपनी क्रिया के द्वारा जीवित रहते हैं। संज्ञा का क्रिया से संबंध कटते ही भाषा मर जाती है। उसका स्थान पाशविक शक्ति प्रदर्शन ले लेता है।‘’

पहली बार उस पर मेरा प्रभाव पड़ा, ‘’यार इस तरह तो पहले सोचा ही न था।‘’

इस उम्र में भी विद्या बालन हावी हो गई, कहा, ‘’नहीं सोचा था तो अब सोचो।‘’
होली में यह भी संभव है, क्या कीजे।