डर लगे है
हो रहा है इतनी तेजी से विकास
कल को राहुल भी उछलकर
आदमी हो जाएगा।
तोड़ने की लत है उसकी
गोड़ पाएगा नहीं
डर है परती खेत में
केवल जहर बो जाएगा।
(राहुल =लाहुर छोटा, बच्चा जैस लहुरा बीर= बुद्ध, क्योंकि बड़े वीर =महावीर, आदमी= प्रौढ़)
डर लगे है
हो रहा है इतनी तेजी से विकास
कल को राहुल भी उछलकर
आदमी हो जाएगा।
तोड़ने की लत है उसकी
गोड़ पाएगा नहीं
डर है परती खेत में
केवल जहर बो जाएगा।
(राहुल =लाहुर छोटा, बच्चा जैस लहुरा बीर= बुद्ध, क्योंकि बड़े वीर =महावीर, आदमी= प्रौढ़)
#संस्कृत_की_निर्माण_प्रक्रिया( (8)
‘ऋ’ ध्वनि के विषय में हम दो बातें जानते हैं, पहली यह कि इसका शुद्ध उच्चारण सामान्य बातचीत में कोई नहीं करता। सुशिक्षित लोग जब इसका शुद्ध उच्चारण करते हुए बात करते हैं तो वे सामान्य से कुछअलग और विचित्र लगते हैं। यह ध्वनि न तो प्रकृति में रही (उसमें इर्, रिर्, किर्,उर्, रुर्, कुर् जैसे नाद या अनुनाद संभव हैं), न ही भारत की किसी बोली में, न ही देशांतर में फैली उस भाषा परिवार की किसी शाखा में। स्वाभाविक ध्वनियों के साथ ऐसा नहीं होता। वे मरती नहीं हैं। इस तरह की स्थिति तभी उत्पन्न होती है, जब किसी ध्वनि के उच्चारण में किसी समुदाय को कठिनाई होती है और वह अपने पूरे आयास से जो उच्चारण करता है वह कामचलाऊ होता है और उसमें अस्थिरता बनी रहती है, पर शास्त्रीय विवेचन में उनके लिए कोई नियत स्थान और प्रयत्न सुझा दिया जाता है । इस दृष्टि से मेरी पिछली पोस्ट पर प्रचंड प्रद्योत जी की टिप्पणी दर्शनीय है। परंतु इस स्थिति में भी कम से कम उस भाषा में उसका सही उच्चारण अवश्य किया जाना चाहिए, जिसकी ध्वनि का अनुकरण किया जा रहा था। ‘ऋ’ के मामले में हम ऐसा भी नहीं पाते, जब कि ‘ञ्’, ‘ङ्’, के विषय में निराश हाथ नहीं लगती।
ध्वनि वैज्ञानिकों ने इसका एक और कारण सुझाया है। वे मानते हैं हैं कि हमारे काकु की स्थिति में परिवर्तन आया है। हमारे पुराने विभाजन कंठ्य, तालव्य. मूर्धन्य, दन्त्य और ओष्ठ्य, के स्थान पर वे इनका उच्चारण स्थान निम्न रूप में रूप में प्रस्तुत करते हैंः
दन्त्योष्ठ्य, फ. दन्त्य, त, थ, द, ध. वर्त्स्य, न, स, ज, र, ल, ळ. मूर्धन्य, ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, र, ष. कठोर तालव्य, श, च, छ, ज, झ. कोमल तालव्य, क, ख, ग, घ, ञ, ख़, ग़. पश्च-कोमल-तालव्य … थ, ध, फ, भ, ड़, ढ़ – व्यंजन महाप्राण हैं। वर्गों के पहले, तीसरे और पांचवे वर्ण अल्पप्राण हैं। (विकीपीडिया)
इससे मिलते जुलते नतीजे पर अपने निजी तरीके राजवाडे भी पहुंचे थे। संस्कृत भाषेचा उलगडा में पाणिनि के सूत्र ‘ससजुषो रुः’ ८।२।६६ की व्याख्या करते हुए उन्होंने यह पता लगाने का प्रयत्न किया था कि वह कौन सी स्थिति हो सकती है जिसमें एक ही ध्वनि स‘, ‘‘ह‘, और र‘ तीन रूपों में परिवर्तित हो सके। वह संस्कृत पर दूसरी भाषाओं के प्रभाव की कल्पना नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने आर्यों के ही कई समुदायों के कई चरणों पर मिलने के तर्क से संस्कृत की ‘आंतरिक समस्या’ को सुलझाने का प्रयास किया था। उन्होंने कल्पना की कि बहुत पहले हमारे उच्चारण तंत्र में कंठ की स्थिति कुछ भिन्न थी। इसलिए एक ध्वनि ऐसी थी जिसका उच्चारण स, ह और र के बीच किया जा सकता था, या जिसे सुनते समय स् ‘, ह् ‘, या र् ‘ की श्रुति होती थी।
हम संस्कृत के विकास में दूसरे भाषा-भाषियों की भूमिका को निर्णायक मानकर चल रहे हैं, जब कि आधुनिक पाश्चात्य विद्वान भी भाषा के आन्तरिक ध्वनिनियम से ऐतिहासिक क्रम में हुए परिवर्तन की बात करते रहे हैं, इसलिए हमें उनके समाधान अग्राह्य प्रतीत होते हैं, फिर भी उनकी टिप्पणी का एक विशेष संदर्भ है।
हम आद्य भारोपीय की कल्पित ध्वनिमाला की ’बारीकियों’ को नहीं समझ पाते, न ही ही अपनी व्याख्या के लिए इनकी जरूरत समझते हैं।
वे दूसरी भाषाओं के प्रभाव की बात आक्रामकों द्वारा लाई गई भाषा के स्थानीय भाषा के ऊपर आरोपण और इस में आए परिवर्तनों को अधस्तर के प्रभाव के रूप में करते रहे हैं । कहें, बाहर से आई हुई भाषा को यूरोपीय अपेक्षाओं के निकटतम रखकर उसमें आए परिवर्तनों को इस अधस्तर के कारण घटित मानते रहे हैं जो कि सभी दृष्टियों से गलत है।
यूरोप के कतिपय विद्वानों को (Kuiper)बहुत विलंब से यह स्पष्ट हुआ कि आर्य भाषा के विकास क्रम में ही तीन भाषा समुदायों का योगदान है, परंतु इसे स्वीकार करने के बाद भी वे पहले से चली आ रही अवधारणाओं में अपेक्षित बदलाव नहीं कर सके, न कर सकते हैं, क्योंकि यह उस योजना के ही किए कराए पर पानी फेरने जैसी कृतघ्नता होगी, जिसके लिए उनकी कई पीढ़ियों ने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। इसलिए अपनी गलती का आभास हो होने पर भी उन्होंने कभी खुलकर अपनी गलती मानने या इसे सुधारने का प्रयत्न नहीं किया। भारतीय अध्येता भी उन्हीं के निर्देशन में काम करते रहे, इसके कारण पुरानी लीक को पीटते रहे हैं।
किसी अन्य भाषा की ध्वनियों का उच्चारण कठिन होता है और कुछ का उच्चारण तो प्रयत्न करने के बाद भी सही नहीं हो पाता। अंग्रेजों जैसी फर्राटेदार अंग्रेजी सीखने का प्रयत्न करने वाले अंग्रेजों की तरह नहीं बोल पाते । मुझे इस तरह की कठिनाई तमिल के उस वर्ण के उच्चारण में होती है जो तमिल में ‘ल’ के रूप में अंकित है। बहुत प्रयत्न से कई संभव रूपों में उच्चारण करने के बाद भी कोई उच्चारण, सही उच्चारण सिखाने वालों को सन्तुष्ट नहीं कर सका। समस्या केवल मेरे साथ नहीं है, इस ध्वनि का सही उच्चारण उत्तर भारत के व्यक्तियों के लिए लगभग असंभव है और इसलिए इसके उच्चारण की दुष्करता के प्रभाव से इससे पहले की ध्वनियां तक प्रभावित हो सकती है। संस्कृत के विद्वान तमिझ़ को द्रविड़ लिखते थे, अज्ञेय जी ने इस ध्वनि के लिए ‘ष़’ चिन्ह चलाया था। वर्धा की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने इसके लिए ’ऴ’ का चिन्ह सुझाया था और मैंने अभी ‘झ़’ लिखा है। इनमें से कोई उसके सही उच्चारण में सहायक नहीं हो सकता। ये सुझाव विफलता के अलग अलग रूप हैं, और किसी नई भाषा की ध्वनि से उत्पन्न समस्या की गंभीरता को प्रकट करते हैं।
अब इस पृष्ठभूमि में ही हम यह कल्पना कर सकते हैं की वास्तविकता क्या रही हो सकती है। पूर्वी बोली में ‘र’ हलंत तो हो सकता है, पर दूसरी ध्वनियां हलंत हो कर ’र’ से नहीं मिल सकती। हम जहां से इस समस्या को समझने के लिए अलग हुए थे वहां लौटते हुए कहें कि पूर्वी में बर्फ हो सकता है परंतु ब्रफ नही, बर्न/ वर्न (वर्ण) चल सकता है, व्रण नहीं। ऋग्वेद की मात्र एक ऋचा है जिसमें पूर्वी प्रभाव बहुत स्पष्ट हैः
सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू नैतोशेव तुर्फरी पर्फरीका ।
उदन्यजेव जेमना मदेरू ता मे जराय्यवजरं मरायु ।। 10.106.6
परंतु इस ऋचा में पहला शब्द ही उसकी प्रकृति के अनुरूप नहीं है। हम इसकी आगे छानबीन करने से पहले यह बता दे कि नई ध्वनियां – य, व, श, ण – आदि सीखना उस भाषिक परिवेश में रहने के कारण कुछ पीढ़ियों के बाद समस्या नहीं पैदा करती थी, परंतु असवर्ण संयोग समस्या पैदा करता था। ‘वर’ का ‘विर्’ और यहां तक कि ‘विर्र’ उसकी प्रकृति मैं है (बिरावल, बिर्रावल, घिर्रावल, कर्र्हावल, फर्राटा) ‘व्री’ आज भी उसकी प्रकृति के अनुरूप नहीं है। ऐसे प्रयोग केवल सीखी हुई भाषा संस्कृत हिंदी या अंग्रेजी वह सीखने और बोलने वाले ही करते हैं।
भोजपुरी में ‘र’ की दो तरह की ध्वनियां है यही स्थिति तमिल और तेलुगु की भी है। एक सामान्य जिसे हम मूर्धन्य करते हैं और दूसरा कंपित ‘र‘ जिसका उच्चारण उसी तरह प्रतिध्वनित होता था, जैसे तारवाद्य या तंत्री वाद्य ( तांत) के छेड़ने पर कुछ देर तक होता रहता है। व्री, क्री जैसी ध्वनियों को बहुत प्रयत्न के बाद वे उसी कंपित ‘र’-कार से युक्त करके बोलते थे जो सारस्वत जनों के लिए एक पहेली थी। मेरे अनुमान के अनुसार ‘ऋ‘-कार का आविर्भाव इसी असमंजस की देन था और इसलिए केवल संस्कृत और वैदिक वैदिक तक सीमित रह गया। इससे बोलियां प्रभावित नहीं हुई न ही देशांतर की भाषाएं।
#संस्कृत_की_निर्माण_प्रक्रिया( (7)
टवर्ग की -ट्, ठ्, ड्, ढ् -चार ध्वनियां पूर्वी बोली में ही सक्रिय रही लगती हैं। ‘ट‘-कार तो किसी अन्य भाषा की तुलना में असमी में अधिक प्रबल दिखाई देता है, बांग्ला में भी इसकी उपस्थिति स्वाभाविक है। महाप्राणीकरण का अतरिक्त आग्रह केवल भोजपुरी की विशेषता है । इसके कारण बांग्ला का ‘टि‘/‘टा‘ भोजपुरी में ‘ठो‘ हो जाता है। पूर्वी बोलियों में घोष अल्पप्राण ‘ड‘ के अतिरिक्त ‘ड़‘ ध्वनि अपना रखी थी। ‘ड‘ का महाप्राणीकरण इसने ‘ढ‘ के रूप में कर रखा था और ‘ड़‘ महाप्राणीकरण करते हुए ‘ढ़‘ की एक अलग ध्वनि बना ली थी। यह अकेला वर्यग है जिसमें एक की जगह दो सघोष महाप्राण ध्वनियां हैं। यह इस बात का प्रमाण है की जिस भी बोली के कारण हो भोजपुरी मैं पहले से ही इतनी सक्रिय थी कि इसके ‘ट‘-वर्ग में छह वर्ण थे , और वह भी इसके बावजूद कि इसमें ‘ण‘ की अनुनासिक ध्वनि नहीं थी।
‘ड़‘, ‘ढ‘ और ‘ढ़‘ का उच्चारण सारस्वत वासियों के लिए कष्टसाध्य था, इसलिए वे आयास पूर्वक ‘ड़‘ का उच्चारण ‘ळ‘ और ‘ढ़‘ का ‘ळ्ह‘ के रूप में करते थे। ‘ण‘ ध्वनि सारस्वत बोली में अवश्य विद्यमान थी, जो भोजपुरी में ही नहीं पूरब की किसी भी बोली में आज तक अपनी जगह न बना सकी। इस गड़बड़ी को रामविलास जी के इस सुझाव से समझा जा सकता है कि यदि किसी भाषा में किसी वर्ग की कोई या कुछ ध्वनि/ ध्वनियां मिलती है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसमें उस वर्ग की सभी ध्वनियां पाई जाएंगी।
यह विचार कि पश्चिम की जिन बोलियों में ‘ण‘ ध्वनि इतनी सक्रिय है कि वे ‘न‘ को अनिवार्य रूप से ‘ण‘ मैं बदल लेती हैं, उनकी बोलियों में ‘ट‘-वर्ग की दूसरी ध्वनियों का अभाव था कुछ चौंकाने वाला लग सकता है। हमें स्वयं भी यह बात कुछ अविश्वसनीय लगी इसलिए हमने इन ध्वनियों की आवर्तिता को समझने का प्रयत्न किया जिसके परिणाम निम्न प्रकार हैंः
ट – 2, ट्- 50, ठ 40, ठ् -0, ड- 2, ड् – 12, ड़ – 0, (ळ – 135) ढ – 0, ढ़ – 0 (ळ्ह – 34), ण – 1334, ण् – 537, (ण्व- 231, ण्ट – 0, ण्ठ – 0, ण्य – 306)
यहां हम ‘त‘- वर्ग की ध्वनियों से इसकी तुलना करें तो अंतर है इतना चौकाने वाला मिलेगा कि हमें विश्वास न होगाः
त – 9003, त् – 1625, थ – 736, थ्- 17, द- 5240, द् – 1353 ( द् -937, द्य – 416), ध – 1742, ध् – 1003 ( ध् – 3, ध्य -200, ध्या – 211, ध्यै – 70, ध्व – 475, ध्वा -47) , न – 7523, न् – 5710 (न् -2066, न्य – 577, न्व – 515, न्म -345, न्त 1264, न्द – 370, न्न – 573)।
परंतु यह एक विवादास्पद तुलना होगी, क्योंकि यह कहा जा सकता है हिंदी और संस्कृत के रूपों में भी ट-वर्गीय ध्वनियों की आवर्तिता बहुत कम है। हम मानते हैं हिंदी और संस्कृत दोनों का विकास पश्चिमी क्षेत्र में हुआ है जहां ण के अतिरिक्त अन्य ट-वर्गीय ध्वनियों के लिए उपेक्षा का भाव था। इसके कारण इनकी संख्या इतनी कम दिखाई देती है पूर्व की बोलियों में ऐसे शब्दों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत अधिक पाई जाती है। तवर्गीय ध्वनियों के दबाव में इनकी अपनी शब्दावली का बहुत बड़ा अंश लुप्त हो गया और नए शब्दों की सर्जना बंद हो गई। परंतु सभी को संतुष्ट नहीं कर सकता इसलिए हम केवल ‘ट‘-वर्ग की अन्य ध्वनियों की तुलना में ‘ण‘ आवर्तिता की ओर ध्यान दिलाना चाहेंगे और इस तथ्य को रेखांकित करना चाहेंगे कि पूरे वर्ग की समस्त ध्वनियों की तुलना में अकेले ‘ण‘ की आवर्तिता कई गुना है। यदि दूसरी ध्वनियां इसकी अपनी होती तो उनकी आवर्तातिता अपेक्षाकृत अधिक होती।
यहां हम याद दिला दे कि हमने मात्राओं के साथ इन ध्वनियों को नहीं लिया है और उस दशा में अनुपात में मामूली अंतर भी दिखाई दे सकता है परंतु वह एक अधिक बोझिल और नीरस काम होता, इसलिए पुस्तकाकार प्रकाशन उसका स्थान जरूरी हो सकता है, प्रस्तुत लेख में नहीं।
एक दूसरी समस्या एक ऐसी ध्वनि जुड़ने की है जिसके उच्चारण के विषय में, न तो यह कहा जा सकता है कि कभी कोई इसका सही उच्चारण करता था, न ही यह कि आज कोई करता है। परंतु वैदिक में और संस्कृत में ही यह इतनी लोकप्रिय ध्वनि हो गई कि इसका दीर्घ भी कल्पित कर लिया गया जिसका प्रयोग किसी एक दो शब्द में (जैसे निर्ऋृति) हुआ हो तो हुआ हो, अन्यथा नहीं। यह है ऋ ध्वनि। इसके अनुकरण पर लृ की भी एक ध्वनि कल्पित कर ली गई, जिससे न कोई शब्द आरंभ होता है, नही इसका शब्द के मध्य या अंत में प्रयोग देखने में आता है। हम यह मानते हैं, कि इसकी उत्पत्ति के पीछे किसी अन्य ध्वनि के उच्चारण की अशक्यता का हाथ है । इसके लिए हमें कुछ विस्तार में जाना होगा इसलिए इसे हम आज नहीं उठा सकते।
#संस्कृत_की_निर्माण_प्रक्रिया( (6)
हमारे सामने यह बात बहुत स्पष्ट होनी चाहिए की जिसे हम भारोपीय क्षेत्र कहते हैं उसमें जिस भाषा का प्रसार हुआ वह संस्कृत नहीं थी, न ही इसका प्रसार एक झटके में हुआ था। इसमें एक लंबा समय लगा था जो कृषि के आरंभ से लेकर वाणिज्य के चरण तक, जिसे हम परिपक्व हड़प्पा काल कहते हैं, फैला है। बाहर जाने वालों में भी अलग-अलग कारणों से अलग अलग चरणों पर विभिन्न भाषा भाषी समुदायों काे भारत से प्रस्थान करना पड़ा था। इनमें से कुछ का संपर्क भारत से बना रहा, कुछ वहीं बस गए और कुछ के मन में वापसी की लालसा तो बनी रही परंतु वापसी के दरवाजे बंद थे। इसलिए इस विशाल क्षेत्र में कुछ ऐसे अंचल हैं जिनमें आर्य भाषा के अतिरिक्त, आज की शब्दावली में मुंडा और द्रविड़ भाषाओं के सघन प्रभाव लक्ष्य किए गए हैं। इनमें कुछ तो अपने अंचल में अपना दबदबा कायम करने में भी सफल रहे थे।
जिस चरण पर उस संपर्क भाषा का प्रसार हुआ जिसे वैदिक भाषा के बोलचाल का रूप कह सकते हैं, उस समय अपनी उन्नत अर्थव्यवस्था के कारण इसका प्रभाव एक साथ बहुत विशाल क्षेत्र पर पड़ा और भारत से लेकर यूरोप तक और दक्षिण में ईरान और मिस्र तक इसने समस्त क्षेत्रों को आप्लावित कर दिया। उनकी अपनी भाषाएं इसके अनुसार समायोजित होने का प्रयास करती हुई अलग-अलग भाषाओं के रूप में प्रकट हुईं। इनसे पारिवारिकता का भ्रम पैदा होता है, परंतु यह सभी भाषाएं अनेक भाषा परिवारों की थीं ।
स्वयं भारत में संस्कृत का विकास मुंडा और द्रविड़ भाषाओं से कितनी गहराई तक प्रभावित है इसका सही आकलन करना एक स्वतंत्र अध्ययन की अपेक्षा रखता है। उदाहरण के लिए यह संभव है कि अनुनासिक ध्वनियां ङ्, ञ् किसी ऐसी बोली से आई हों जिसे आज मुंडा परिवार में और न् तथा म् किसी अन्य से जिसे द्रविड़ परिवार में रखना अधिक न्याय संगत होगा। यह बात शब्द के अंत में न् और म् ध्वनियों के प्रयोग के विषय में अधिक आश्वस्त होकर कही जा सकती है। ण् ध्वनि का स्रोत क्या है यह हम तय नहीं कर सकते।
ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि ङ और ञ से आरंभ होने वाला कोई शब्द संस्कृत में नहीं मिलता जब कुछ मुंडा भाषाओं में ऐसा प्रयोग होता है। द्रविड़ मैं तमिल और मलयालम में नाम के साथ आज भी म् और न् ध्वनियों का अंत में प्रयोग किया जाता है।
संस्कृत में जिन शब्दों के अंत में म् या न् लगा होता है, संबोधन में इन ध्वनियों का लोप हो जाता है। एक वचन प्रथमा में फलम्, परन्तु संबोधन में हे फल, ब्रह्मन् , हे ब्रह्म।
संस्कृत में वैयाकरणिक लिंग तो निश्चित रुप से या तो सीधे मुंडा से या किसी द्रविड़ भाषा या बोली के माध्यम से लिया गया है और इसीलिए संस्कृत में लिंग को लेकर खासी अराजकता पाई जाती है। बहुवचन के रूप दूसरी भाषाओं से बहुत अधिक प्रभावित हुए हैं । यह प्रभाव ध्वनिकेंद्रों के पारस्परिक संपर्क में रहने के कारण नहीं आए हैं, अपितु अपने क्षेत्र विस्तार के क्रम में भिन्न भाषा समुदायों के अंचलों से गुजरते हुए और उन्हें अपने समुदाय का अंग बनाते हुए जो लोग सारस्वत क्षेत्र में पहुंचे थे उनमें स्वयं ही अनेक जातीयताओं के लोग मिले हुए थे। यदि इन सभी को आर्य कहा जाता था तो केवल इसलिए वे कृषि कर्मी बन चुके थे और स्वयं को भी आर्य कहने लगे थे । जाहिर है कि वे वह भाषा बोलने लगे थे जिसे आर्य भाषा या किसानों की भाषा कहा जा सकता था, परंतु आरंभ में पूरी भाषा का ज्ञान न होने के कारण जहां-तहां अपनी भाषा के पदों का भी प्रयोग करते थे और यह छूट भाषा की ध्वनि प्रकृति के कारण उनके उच्चारण को प्रभावित करती थी और इस तरह इस विकासमान भाषा में नई ध्वनियां भी जुड़ जाती थीं।
सारस्वत अंचल के लोग भी, भरसक सही भाषा बोलने का प्रयत्न करते थे, परंतु उनकी भाषा में सघोष ध्वनियां तो थीं परंतु सघोषमहाप्राण ध्वनियों का अभाव था। यदि अकेली सघोषमहाप्राण ध्वनि आती तो वे प्रयत्न करने पर उनका उच्चारण कर लेते। एक साथ दो सघोषमहाप्राण ध्वनियों के होने पर पहले अक्षर का महाप्राणन हटाने के बाद ही उसका उच्चारण कर पाते। पुरानी भाषा में भूतकालिक क्रिया बनाने के लिए क्रियापद की आवृत्ति की जाती थी और उसका संक्षेपण करने के लिए पहले आए क्रियापद था पहला अक्षर ही परवर्ती पद से जुड़ता। चर – चल, चार – चला, *चारचार.> चचार – चला था । कर – करो, कार – किया, *कारकार> *ककार – किया था । सारस्वत जनों को ककार का उच्चारण करने में कठिनाई होती थी इसलिए वह इसका उच्चारण चकार करते थे। इसका अर्थ है, उनकी ध्वनि माला में क की ध्वनि नहीं थी संभव है कंठ्य ध्वनियोंका का ही अभाव रहा हो। सघोष महाप्राण ध्वनियों का अभाव इसी का परिणाम रहा हो सकता है। ऋग्वेद में कवर्ग और च वर्ग की ध्वनियों की आवर्तिता निम्न प्रकार हैः
क 1885 च 2443
ख 67 छ 49
ग 1695 ज 3602
घ 512 झ 0
अमहाप्राणित ध्वनियों के मामले में चवर्गीय ध्वनियों की आवर्तिता अपेक्षाकृत अधिक हैं, महाप्राणित अघोष ध्वनियों के मामले में कम, और घोष महाप्राण चवर्गीय ध्वनि का सर्वथा अभाव। कृषिकर्मी समुदाय का सरस्वती क्षेत्र में प्रवेश आज से लगभग आठ साढ़े आठ हजार साल पहले हुआ था। ऋग्वेद की उपलब्ध ऋचाओं का रचनाकाल हम आज से पांच साढ़े पांच हजार साल पहले से आरंभ माने तो यह स्थिति लगभग 3000 साल तक लगातार भाषाई समीभवन के बाद की है, जिस बीच बाहर से आने वालों की संतानों को भी आपना इतिहास लगभग भूल चुका रहा होगा। सभी एक ही भाषा बोलने का प्रयत्न कर रहे थे। इसके बाद भी अकेली सघोषमहाप्राण ध्वनियां लगभग सुरक्षित थीं। वर्णमाला में उनका प्रवेश हो चुका था। परंतु स्थानीय प्रभाव के कारण जहां सघोष महाप्राण ध्वनियाँ एक साथ आती थीं उनका उच्चारण कष्टसाध्य होता था और इसलिए पहले अक्षर का महाप्राणन हटा दिया जाता थाः भू – होना, भूव – हुआ. * भूवभूव >बभूव।
पूर्व की बोली में महाप्राण ध्वनियों के लिए विशेष अनुराग दिखाई देता और इसलिए इनकी आवर्तिता से वहां कोई समस्या नहीं है, वे अघोष हों या सघोष ः
खखाइल, छछाइल, ठठावल, थथमथाइल, फफाइल
घाघ, झोंझ, ढिढोरा, धधाइल, भभाइल
प्रमाणों का विस्तार किया जा सकता है परंतु उसका कोई लाभ नहीं।
हमारे प्रयोजन के लिए इतना ही पर्याप्त है कि सारस्वत क्षेत्र के अन्य लोग घोष महाप्राण भाषा को बहुत उत्सुकता से यथासंभव शुद्ध रूप में सीखने का प्रयत्न कर रहे थे. परंतु घोष महाप्राण ध्वनियों के कारण उन्हें कठिनाई अनुभव हो रही थी और वे उनका महाप्राणीकरण हटाकर सघोष बना लेते थे। इसके बाद भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। इसे ऋग्वेद और बाद के प्रतिरूपों को एक साथ रख कर समझा जा सकता है धा – दा, घर्म – गर्म, घ – ह, अद्रोघ -अद्रोह, घस – ग्रस, मघत्त- महत्व, दभन् – दबाना, आभर-आहर।
कभी कभी समाचार न मिलना ही अच्छा समाचार होता है। पहला झटका झेल जाने के बाद और सुयोग्य डाक्टर का सहारा मिल जाने के बाद आशा है राजकिशोर जी की हालत पूरी तरह सुधर जाएगी, इस समय भी सुधर जारी होगा फिर भी यदि किसी को उनकी अद्यतन हालत का पता हो तो सूचित करें।
#संस्कृत_की_निर्माण_प्रक्रिया( (5)
हमारे सामने पूरा चित्र बहुत साफ नहीं है। भारत की भाषाओं में संस्कृत और उत्तर भारत की भाषाओं की मोटी जानकारी तथा तमिल और तेलुगु की कामचलाऊ समझ के बाद मुंडा समुदाय में गिनी जाने वाली बोलियों में से कुछ एक की परिचयात्मक पुस्तकों और शब्दसंग्रहों की ही पूंजी है। जो काम मैं कर रहा हूं उसे करने के लिए प्राथमिक स्तर के बहुत से अध्ययन उपलब्ध होने चाहिए जिनसे मदद लेकर आसानी से भरोसे लायक आधार सामग्री जुटाई जा सके। परंतु न तो इसकी प्रतीक्षा करने का समय है, न अपनी ज्ञान संपदा बढ़ाने का अवकाश।
कंप्यूटर की सुविधा के कारण ऋग्वेद के विश्लेषण परक अध्ययन से मेरी जो दृष्टि बनी, उसका मुझे भरोसा है। यह विश्वास है कि मुझसे पहले के अध्येताओं के पास वह दृष्टि नहीं थी, न हो सकती थी, न ही इस समय के किसी अध्येता के पास वह दृष्टि है।
यह अकेला भरोसा है जिसके बल पर मैं अपनी ऊहा पोह जारी रख पाता हूं। परंतु साथ ही इस बात से डरा रहता हूं कि मेरे कथन को इस चरण पर उपलब्धि के रूप में न ग्रहण कर लिया जाए। खोज सत्य की सिद्धि नहीं है उस दिशा में आने वाली उलझनों को सुलझाते हुए सत्य की दिशा में बढ़ने का एक प्रयास है, जिसमें कुछ भटकावों और गलतियों की संभावना बनी रहती है। इसलिए मैं अपने आलोचकों से नहीं डरता, परंतु प्रशंसा करने वालों से डरता हूं । वे असमय प्रशंसा से भटका तो सकते हैं, पर सही दिशा में बढ़ने में मदद नहीं कर सकते हैं । ध्यान रहे मैं जिनका प्रशंसक हूं उनकी गलतियां अधिक निकालता हूं। किसी की प्रशंसा का यह सर्वोत्तम रूप है – उसके काम नहीं बाकी रह गई कमियों को दूर करते हुए उन्हें अधिक स्वीकार्य बनाना।
रामविलास जी ने प्राचीन आर्य भाषा की ध्वनि माला को समझने के लिए भारत में अनेक ध्वनिकेंद्रों की कल्पना की थी।उनका यह मानना था कि प्राचीन अवस्थाओं में इन सभी की ध्वनिमाला में बहुत कम ध्वनियां थी। संस्कृत की वर्णमाला को उन्होंने इन ध्वनि केंद्रों के पारस्परिक संपर्क में आने का परिणाम बताया था। पारस्परिक संपर्क का रूप क्या था, यह उनके सामने स्पष्ट नहीं था। इससे आगे की विकास प्रक्रिया को समझने का भी उन्होंने कोई प्रयत्न नहीं किया था। राजवाडे जी ने ऐसा प्रयत्न तो किया परंतु उनका विवेचन आर्यवादी था, इसलिए उसमें दूसरी भाषाओं के योगदान के लिए कोई स्थान नहीं था। अतः हमें एक ओर तो हमें आधार सामग्री की तलाश करनी है और दूसरी ओर विकास रेखा को स्पष्ट करना है जिसके लिए राजवाड़े जी ने 15000 साल के लंबे दौर का प्रस्ताव रखा था। इस लंबी कालावधि में बहुत मामूली कम-बेस की गुंजाइश है। यह हमारे काम की गुरुता और उसके समक्ष मेरी अकिंचनता का कुछ आभास करा सकता है।
भाषाओं के परिवार की अवधारणा और उससे जुड़ी किसी आद्यभाषा की कल्पना हमें अस्वीकार्य है। ऐसा नहीं कि यह मान्यता पूरी तरह व्यर्थ हो। परंतु भाषाओं के विकास में सामाजिक अंतरावलंबन की महत्वपूर्ण भूमिका है। भाषा परिवार की अवधारणा में उसके लिए स्थान नहीं रह जाता या रहता है तो अधस्तर और ऊपरी स्तर के रूप में। सांस्कृतिक और आर्थिक अंतर्क्रिया के दौरान उनमें निरंतर आदान प्रदान के लिए, उसमें स्थान नहीं होता। फिर भी भाषा समूहों के लिए ढीले ढाले रूप में परिवार का प्रयोग करना हमारी भी विवशता है।
भारत में बहुत प्राचीन काल से 4 भाषा परिवार रहते रहे हैं। रहते रहे हैं, कहना भी ठीक नहीं है । अधिक उपयुक्त यह कहना होगा कि यह भूभाग बहुत प्राचीन काल से उन समुदायों का विचरण क्षेत्र रहा है जिनकी भाषाओं को इन परिवारों में गिना जाता है। इनमें से कुछ फूटकर भारत से बाहर दूर-दूर तक चले जाते रहे हैं और वहीं बस जाते अथवा फिर वापस आते रहे हैं, जिनमें सबसे गोचर उदाहरण नगा भाषा समुदाय का है।
परंतु दूसरे समुदाय इसके अपवाद नहीं रहे हैं इनमें तथाकथित आर्यजन, मुंडारी और द्रविड़ सभी आते हैं। कोलंबो, कोल्लम बीच और कोलमी भाषा जो आज द्रविड़ परिवार में गिनी जाती है, यदि कोलों की याद दिलाते हैं तो मुंडीगाक मुंडा भाषियों की, मागी मगों की जिनके पांवों के निशान मगहर, महगरा आदि में बचे रह गए हैं। भारतीय इतिहास के इस अध्याय को हम यहां चाहें भी तो सलीके से प्रस्तुत नहीं कर सकते फिर भी यह याद रखना होगा कि सबसे साहसिक विस्तार तथाकथित आर्यों ने किया था, जिनकी महायात्राओं ने बर्बर जनों को भी सभ्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत की वर्तमान भाषाओं के विकास में तीन परिवारों में गिनी जाने वाली बोलियों की बहुत निर्णायक भूमिका रही है। इस भूमिका को अधस्तर और ऊपरी स्तर के रूप में रखकर नहीं समझा जा सकता । पूरे इतिहास में ये एक दूसरे को प्रभावित करती और स्वयं दूसरों से प्रभावित होती रही हैं और आज भी यह सिलसिला बंद नहीं हुआ है। इन परिवारों के भीतर गिनी जाने वाली भाषाओं के भीतर भी गहरी भिन्नता रखने वाली भाषाएं रही हैं, जिनको एक ही परिवार में नहीं रखा जा सकता। इसका एक उदाहरण सारस्वत क्षेत्र की भाषा और पूर्वी हिंदी प्रदेश की भाषा स्वयं है। ऐसी ही स्थिति दूसरे परिवारों के साथ भी हो है, परंतु उनमें से किसी का इतना प्राचीन साहित्य उपलब्ध नहीं है जो इस गुत्थी को सुलझाने में हमारी सहायता कर सके।
सारस्वतक्षेत्र की भाषा को खींचतान कर भी उसी परिवार की भाषा नहीं कहा जा सकता जिस परिवार में भोजपुरी हो रखना होगा। एक स्वर प्रधान दूसरी व्यंजन प्रधान। एक की वर्णमाला में सघोष महाप्राण ध्वनियों की प्रधान भूमिका दिखाई देती है तो दूसरी की वर्णमाला सघोष महाप्राण ध्वनियों के लिए स्थान नहीं है। यह बहुत निर्णायक भिन्नता है। परंतु पूर्वी क्षेत्रों के कृषिकर्मियों प्रवेश के बाद सारस्वत्य प्रदेश की भाषा में महाप्राण ध्वनियों को भी स्थान मिला और इस क्षेत्र में परिष्कृत होकर मानक रूप ग्रहण करने वाली संस्कृत के माध्यम से इन ध्वनियों का प्रवेश दूसरी सभी भाषाओं में होता रहा। स्वयं पूर्वी हिंदी का चरित्र इतना बदल गया कि रामविलास जी के शब्दों में यह पूरा क्षेत्र हिन्दी प्रदेश के अंतर्गत आता।
भारतीय भाषाओं में एक भाषा भोजपुरी के ठीक दूसरे सिरे पर दिखाई देती है, जिसमें अघोष अल्पप्राण और अनुनासिक ध्वनियों को छोड़कर दूसरी वर्गीय ध्वनियां नहीं थी। तमिल को छोड़कर, इस परिवार में गिनी जाने वाली दूसरी भाषाओं में संस्कृत ध्वनियों का प्रवेश हो चुका है और स्वयं तमिल में मध्य स्थानीय अघोष अल्पप्राण का घोषीकरण हो जाता है। आगे का आभास तिरु को रोमन तिपि में थिरु लिखने में झलक सकता है।
इसे देखते हुए भोजपुरी में भी यदि पहले केवल घोष महाप्राण ध्वनियां रही हों तो यह आश्चर्य की बात न होगी। सघोष महाप्राण ध्वनियों के प्रति भोजपुरी में आज भी गहरा लगाव है, पश्चिमी का गहगहा भोजपुरी में घाघ हो जाता है, और नामधातु बनाने की अपनी प्रवृत्ति के कारण वह इससे घघाना गढ़ लेती है, दूसरी ओर महाप्राण ध्वनियों के उच्चारण में पश्चिमी हिंदी प्रदेश में खासी असुविधा का सामना करना पड़ता है पंजाबी तक पहुंचते-पहुंचते घोष महाप्राण ध्वनियां काकल्य होकर अघोष अल्पप्राण श्रुति भ्रम उत्पन्न करती हैं।
इसकी चर्चा हम कल करेंगे।
भारत अकेला देश है जिसमें मुल्लों के फतवों, पादरियों के संकल्प और वेटिकन के आशीर्वाद से सेकुलरिज्म और लोकतन्त्र की रक्षा संभव है।
#संस्कृत_की_निर्माण_प्रक्रिया((4)
समस्या वहां से आरंभ होती है जहां स्वर प्रधान बोली का व्यंजन प्रधान बोली के क्षेत्र में प्रवेश होता है। अपनी सामुदायिक सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को सुरक्षित रखने के लिए सभी समुदाय यथासंभव सदा से प्रयत्नशील रहे हैं । यही बात पूर्व से सारस्वत क्षेत्र में पहुंचे दल और उसके वंशधरों के विषय में भी सच है । अन्यथा अजन्त शब्द बचे नहीं रह सकते थे। बचे रहे और आज तक बचे हैं यह इसी का परिणाम है।
अपनी निजता की रक्षा के समस्त प्रयत्न के बाद भी सांस्कृतिक मुठभेड़ के बाद दोनों पक्षों मेंसे कोई भी पहले जैसा नहीं रह जाता।
इस क्षेत्र में स्वर लोप की प्रवृत्ति आज भी बची रह गई है । स्वर लोप की क्षतिपूर्ति व्यंजन के आगम से की जाती है। मैंने का ‘ऐ’ निकलता है तो व्यंजन सावर्ण्य से ‘मन्ने’ बन जाता है। स्वरान्त शब्दों के उच्चारण को किसी व्यंजन अथवा अर्धव्यंजन (य, व, र) के अन्तःसर्ग से सुकर बना लिया जाता है यद्यपि पूर्वी आग्रह के कारण कुछ मामलों में पुराना रूप बना जाता है । सत सत्य बन जाता है और एक नए रूप श्रत् का उदय होता है जो श्रद्धा में परिणत हो जाता है ।
हम यह नहीं कह सकते कि मूल बोली में हलंत ध्वनियों का उच्चारण हो ही नहीं सकता था। सचाई यह है की प्राकृतिक ध्वनियों में आकस्मिक क्रियाओं का नाद हलंत की मांग करता है- पट्, फट्, धड़्, आदि ध्वनियां हलंत सुनाई देती और परन्तु वे इनका उच्चारण करते समय वआकस्मिकता का आभास कराने के लिए हलन्त के बाद उस वर्ण का अजन्त या उसी व्यंजन को स्वरयुक्त बना कर उसमें जोड़ कर – पट्ट, फट्ट, धड़्ड़ – अपनी समस्या हल कर लिया करते थे, यद्यपि शब्दनिर्माण के समय मिथ (सावर्ण्यता) या आवर्तिता की आवश्यकता नहीं पड़ती थी – पटकना, फटकना, धड़कना।
पश्चिमी बोली में ऐसी स्थितियों में लिखते तो पटकना, फटकना, धड़कना हैं पर बोलते पट्कना, फट्कना, धड़्कना। जिसे उपयुक्त चिन्ह के अभाव में हमने हलन्त दिखाया है उसका सही संकेत हलन्त की जगह अधोरेखा लगाना हो सकता है, क्योंकि ये अर्धमात्रिक है। इसे खटराग और खट्राग के उच्चारण के अन्तर से समझा जा सकता है। पर इससे बोलने वाले को हलन्त उच्चारण की छूट मिल जाती है।
व्यंजनप्रियता के प्रभाव से दूसरे स्वर भी अर्धमात्रिक हो जाते हैं अर्थात् अन्तिम दीर्घ स्वर ह्रस्व में और ह्रस्व अर्धस्वर में बदल जाता है। इस प्रवृत्ति को स्वरभक्ति कहा गया है। यहां भक्ति का अर्थ बंटना या आधा रह जाना है (द्राघीयसी सार्धमात्रा)। यह सूत्र ऋक्प्रातिशाख्य का है, कहें व्यंजन प्रधान भाषाक्षेत्र का दबाव वैदिक काल से लेकर आज तक बना है। ध्वनियां कितनी आग्रही होती हैं यह इसका प्रमाण है।
यह एक विचित्र स्थिति है कि हम लिखते पूर्वी हिंदी की अपेक्षाओं के अनुसार हैं और शुद्ध उच्चारण के नाम पर बोलते पश्चिमी हिंदी के तर्ज पर। कहते हैं हिंदी में जो लिखा जाता है ठीक वही पढ़ा जाता है, परंतु यह सही नहीं है। पूर्वी हिंदी का व्यक्ति या दक्षिण भारतीय हिंदी बोलता है तो हमें गाने जैसा इसलिए लगता है कि वह लिखित पाठ का ठीक उसी तरह उच्चारण करता है जबकि पश्चिमी हिंदी क्षेत्र में उच्चारण स्वर भक्ति से प्रभावित रहता है।
संभव है यह भी एक कारण रहा हो जिससे वैदिक पाठ गायन जैसा लगता है। संस्कृत में सही उच्चारण पर विशेष ध्यान देते हुए शुद्ध उच्चारण का ‘शिक्षा’ का एक अलग विधान करना पड़ा। संस्कृत पश्चिमी हिंदी के अनुसार बोली जाती है और इस क्षेत्र का उच्चारण सीखने के लिए पूरब के लोग आया करते थे और उनके उच्चारण की नकल करते हुए दूसरे अपना उच्चारण सुधारा करते थे। परंतु वैदिक पाठ गेय होता था, उच्चारण की पूर्वी अपेक्षाओं के अनुरूप होता था और इसके लिए एक विशेष विधान किया गया था जिसे हम साम कहते हैं।
यदि हम यह समझना चाहते हैं की स्थानीय आबादी की तुलना में पूर्व से आए बहुत थोड़े से लोगों की भाषा इतनी प्रभावशाली कैसे रही कि स्थानीय लोगों को बाहर से आए हुए लोगों की भाषा सीखनी पढ़ रही थी, (भले अपनी ध्वनि गति सीमा के कारण उसका शुद्ध उच्चारण नहीं कर पा रहे थे और इस तरह एक भाषा अनुकूलन चल रहा था)६, जब कि सामान्यतः होता इससे उलट है। बाहर से आने वाले स्थानीय भाषा सीखते हैं। इसका उत्तर यह है कि इस क्षेत्र में कृषि कर्म का प्रारंभ पूरब से आने वालों ने किया था, उन्होंने भूमि की सफाई करके उर्वरा भूमि पर अधिकार कर लिया था और दूसरे उनके सहायक या प्रजा थे अथवा उनका अनुकरण करते हुए स्वयं भी कृषिकर्म की ओर अग्रसर हो रहे थे। कृषिविद्या सीखने के लिए वे स्वयं आगन्तुकों की भाषा सीखने के लिए उद्यत थे।
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#संस्कृत_की_निर्माण_प्रक्रिया((3)
पूरब की ध्वनिमाला में ‘व‘ के प्रवेश के बाद पश्चिमी बोली में ‘बर‘ का ‘वर‘ हो गया, परंतु इससे उसकी प्रकृति में अंतर नहीं आया। पूर्वी क्षेत्र की बोली इससे अप्रभावित रही और इसी अनुपात में उस शब्द संपदा से भी वंचित रही जो वकार से पश्चिम में निर्मित हुई। आज यह बात कुछ विचित्र लगेगी कि शायद सारस्वत क्षेत्र मे ब की ध्वनि नहीं थी, परन्तु जिस पैमाने पर पूर्वी के बकार का वकार में परिवर्तन हुआ लगता है, उससे यह आशंका पैदा पोती है। यदि पश्चिमी दिशा में अग्रसर हुए कृषि कर्मियों के बीच संपर्क सूत्र किसी भी कारण से बाद में भी बने रह गए हों तो संभव है, सारस्वत क्षेत्र में गढ़़े कुछ शब्द पूर्व में भी पहुंचे हो जिनकी ध्वनि बदलकर वे उनका प्रयोग करते रहे हों। संस्कृत के प्रभाव से बाद के कालों में यह प्रक्रिया और भी तेज हुई हो सकती है।
आज के तीव्र गति के यातायात के साधनों के आतंक में प्राचीन कालों के संदर्भ में इतने सुदूर क्षेत्र से संपर्क सूत्र की बात किंचित अविश्वसनीय लगती है। परंतु पुराने समय में, अतीत कालीन स्थलों से रागात्मक संबंध इतना प्रगाढ़ होता था कि वे स्थल तीर्थ जैसी और वहां की विशेष वस्तुएं तीर्थ के प्रसाद जैसी पवित्रता ग्रहण कर लेती थी। कृषिकर्मियों के आदिम स्थाई निवास को मैं नेपाल की तराई के गंडकी क्षेत्र में इसलिए कल्पित करता हूं कि शालिग्राम का पत्थर पूरे भारत में इसी क्षेत्र से आजतक प्राप्त किया जाता रहा है। इस क्षेत्र की महिमा का अन्य कोई कारण दिखाई नहीं देता। गंडकी सदानीरा का एक नाम नारायणी भी है। मेरी अपनी मान्यता है कि शालिग्राम उस बटिका को कहा जाता था, जिससे प्रसाधन के यंत्रों का विकास होने से पहले धान से चावल अलग किया जाता था अथवा धान के खील को पीसकर शालिचूर्ण बनाया जाता था। प्राचीन काल के उपयोगी साधनों का दैविकरण अनेक रूपों में हुआ है यह बात हम बहुत पहले कह आए हैं। इसे यहां इसलिए दुहराना पड़ रहा है कि इस बात को रेखांकित किया जा सके एक प्राचीन कालों में सुदूर क्षेत्रों से आंतरिक संपर्क कभी टूटा नहीं था, यद्यपि विशिष्ट पहचान वाली क्षेत्रीय इकाइयां किसी न किसी पैमाने पर सदा से विद्यमान रही है और इससे हमारी भाषा संस्कृति और खानपान सभी अदृश्य रूप में प्रभावित होते रहे हैं।
वर की व्यंजन ध्वनियों (व्, र्) को अदल-बदल कर विविध स्वरों के योग से नए संयोजन पूर्वी की प्रकृति में थे, ये पश्चिमी बोली में भी बने रहे। वर का वार, रव, राव, रवा, वरा, वारा, रवि, रावी, विर, वीर, वीरा आदि रूप लेते हुए नई अपेक्षाओं के अनुसार शब्द निर्माण करना पश्चिमी में भी चलता रहा। इससे जो विशाल शब्द भंडार तैयार हुआ है उसकी करना कराना न तो संभव है नहीं मेरे द्वारा उसे तालिका वध किया जा सका है। परंतु एक ही वस्तुस्थिति के लिए भिंन्न स्वरों के उपयोग से शब्दावली का निर्माण कुछ रोचक अवश्य हो सकता है। उदाहरण के लिए वर के वार, वारण आदि पुरुषों से एक और तो दीवार, चारदीवारी, तथा युद्ध -वार-, और आघात, अर्थात वार करना, के लिए शब्द निर्मित हुए, इसलिए वीर, वीर्य, वैर आदि को हम हम मात्र ध्वनि परिवर्तन से गड़े हुए शब्दों मान सकते हैं, परंतु वारा की भांति वीर भी जल की ध्वनि से उत्पन्न एक स्वतंत्र शब्द था। इस विवेचन में पढ़ने पर हम बहुत सकते हैं। अस्तु।
पश्चिम की दिशा में बढ़ने वाले केवल भौगोलिक यात्रा नहीं कर रहे थे, अपितु भिन्न भाषा समुदायों के संपर्क में आने के साथ उनको अपनी सामाजिकता का हिस्सा और उनकी बोलियों की विशेषताओं को अपनी भाषा का अंग बनाते हुए पढ़ रहे थे। अन्य ध्वनियों के प्रवेश उनके लिए कोई समस्या नहीं पैदा नहीं हो रही थी। उनकी भाषा अजंत अथवा स्वरांत प्रधान थी। इसमें सवर्ण संयोग ही होता था । ध्वनिगत भिन्नताओं के होते हुए भी भारत की लगभग सभी भाषाओं की प्रकृति ऐसी ही थी, इसलिए नए समुदायों के समावेश से उनकी भाषा की प्रकृति प्रभावित नहीं होती थी। इसका एकमात्र अपवाद कौरवी भाषा की। हरियाणवी के पश्चिम में पंजाबी इंद्र को आज भी इंदर बना लेती है। हम कह सकते हैं अकेले सारस्वत क्षेत्र में एक व्यंजन प्रधान बोली बोली जाती थी जिसकी प्रकृति सामी थी।
हम इसे विगत हिमयुग की अकल्पनीय उथल-पुथल का परिणाम मानते हैं। इस सच्चाई को समझ न पाने के कारण हार्नले और ग्रियर्सन ने कभी आर्यों के दो आक्रमणों का सुझाव दिया था और जिसका अनुमोदन रामप्रसाद चंद्र ने मानववैज्ञानिक (शिरोरचना) के आधार पर किया था। इसके अनुसार आर्यों का दूसरा आक्रमण पहले के आर्यों पर हुआ था और इसके बाद वे अपने क्षेत्र से चारों और बिखर गए थे और केंद्र में नए आर्य बस गए थे जिनकी भाषा ऋग्वेद की भाषा है। पर जिल विशेषताओं की बात हम कर रहे हैं वे तो वे तो तथाकथित द्रविड़ और कोल परिवार में गिनी जाने वाली भाषाओं मेो भी पाई जाती हैं। कितनी असंगतियों और विसंगतियों का घालमेल करते हुए विद्वान आक्रमण के सिद्धांत पर डटे रहे यह सोच कर आज हंसी आती है और जब यह सिद्धांत हमारे विद्वानों द्वारा भी स्वीकार कर लिया गया था तब इस पर किसी को रोना तक नहीं आता था। पहले वाले आक्रमणकारी कहां से आए थे, भारत से बाहर किस क्षेत्र की भाषा में वे प्रवृत्तियां पाई जाती हैं जिनका हम ऊपर उल्लेख कर आए हैं, यह सोचने की किसी को फुर्सत न थी।
जो भी हो, यह व्यंजन प्रधान भाषा जहां से भी आई हो इसने भारतीय भाषाओं को संस्कृत के माध्यम से जितनी गहराई से प्रभावित किया और बाद में भी यह क्षेत्र कई भाषाओं के अखिल भारतीय चरित्र का निर्माण करने में सक्रिय भूमिका निभाता रहा, यह एक रोचक भाषावैज्ञानिक तथ्य है, जिसके रहस्य की सही जानकारी हमें भी नहीं है। साथ ही इस रहस्य की भी जानकारी नहीं है कि उत्तर भारत में नई भाषाओं का जन्मा पूर्वी हिंदी क्षेत्र की सक्रियता से ही क्यों होता रहा है।
इस तरह है भारत में भाषाओं के चरित्र निर्धारण में चार क्षेत्रों की कारक भूमिका रही है एक पूर्वी हिंदी क्षेत्र, दूसरा कौरवी क्षेत्र, तीसरा महाराष्ट्र और चौथा मदुरई जो तथाकथित द्रविड़ भाषाओं के चरित्र निर्धारण में निर्णायक स्थान रखता रहा है।
नई ध्वनियों के प्रवेश से पूर्वी बोली अधिकाधिक समृद्ध होती रही और इस दृष्टि से अपने ऐतिहासिक महत्व के बावजूद भोजपुरी अपने से पश्चिम की बोलियों की अपेक्षा कुझ विपन्न दिखाई देती है और इसी का परिणाम है कि संस्कृत के केंद्रों के बावजूद साहित्यिक दृष्टि से अवधी या ब्रजभाषा की समकक्षता में न आ सकी।
इसके लिए भाषा कहां तक उत्तरदायी है इसका निर्णय करना आसान नहीं है, क्योंकि राम अवधी और कृष्ण व्रज क्षेत्र में पैदा हुए इसलिए भक्ति साहित्य का केंद्र बनने का लाभ इन भाषाओं को मिला। जायसी कुतुबन जैसे किसी सूफी कवि ने भी किन्ही कारणों से भोजपुरी को अपना माध्यम नहीं बनाया, भाषाओं के साहित्य उत्थान में इनकी भूमिका रही है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह तथ्य तब और ुजागर हो जाता है जब आधुनिक काल से पहले हम कौरवी को भोजपुरी से भी तिरस्कृत पाते हैं।
अतः हम अपनी चर्चा भाषा तक ही सीमित रखें को अधिक निरापद होगा। पूर्वी भाषा में एक और तो नई ध्वनियों की सहायता से बने हैं नए शब्दों को अपनाने का प्रयत्न किया दूसरे उनके समानांतर अपने शब्द गढ़े और इससे नई अर्थ छटाओं वाली शब्दावली का विकास हुआ, जिसका पूरा लाभ संस्कृत तो न उठा सकी पर यह लाभ हिंदी को अवश्य मिला। कुछ मामलों में हम यह तय नहीं कर सकते उसके प्रयोग पहले के हैं या बाद के। हम दो समानांतर श्रृंखलाओं में रखकर समझ सकते हैं। पहली के नमूने हम ‘वर’ पर विजार करते हौए दे आए हैं, दूसरी की कुछ बानगी नीचे गाई जा सकती हैः
बर/बड़> बर- 1. बरगद, 2. पत्ता, 3. दूल्हा, 4. किनारा (बरहज, बरहल, बरौनी, बरसाना, बारीसाल -तटीय स्थानों क् नाम), , बारी – 1. पत्ते के पात्र (दोना, पत्तल) बनाने वाले,> बरई/ बरेल – पान या पत्ते का कारोबार करने वाले, 2. बाग, बरोह, बरिआर, बरोह, बारा(बड़ा, त. वडै, बरी (बड़ी), बड़ाई, बढ़, बढ़ना, बढ़ावा, बबढ़ोतरी, बढ़वार, बढ़िया, बढ़ई (गढ़ने वाला, बढ़िया बनाने वाला), बूढ़, बार, बरौनी, बाढ़ आदि।