Post – 2017-09-15

उजाले के तो कई रंग हैं देखा होगा
अंधेरै के भी कई रंग हैं देखा कि नहीं।।

मैं पहले आंखो के प्रति इस खिंचाव का कारण नहीं समझ पाता था। बहुत सारे रहस्य लिखने के क्रम में सुलझते हैं। लिखते समय मैं अपना जाना हुआ दूसरों को बताता नहीं हूं, जो चरित्र, वस्तु, क्रिया सामने आती है उसे समझने की कोशिश करता हूं। यह कोशिश शब्दबद्ध होती है और वह लिपिबद्ध होता चलता है। यही मेरा लेखन है। ज्ञान नहीं, जिज्ञासा मेरी शक्ति है। दृश्यमान के सौंदर्य, क्रीड़ा, यातना, विषाद से गुजरना और उनके अनुरूप अभिव्यक्ति की तलाश जो कभी तो इतनी निरायास होती है जैसे लिख न रहे हों, तरंगाघात के साथ उछलते बहते चले जा रहे हों, और कभी इतना उलझा जैसे जमकातर में फंस गए हों, बाहर निकलने का कोई उपाय नहीं। हंसना, रोना और कभी गर्वानुभूति और कृतार्थता का ऐसा क्षण कि इस बोध से ही अपना विन्यास लिए दर्पोक्ति बाहर आती है और लिखना स्थगित। दर्पोक्तियां मैने बहुत लिखी हैं। दर्पोक्ति इस बोध की उपज है कि मैं दूसरों से इतना विशिष्ट, इतना ऊपर या अपने समय से इतना आगे हूं कि लोगों में मुझे समझने की अल्पतम योग्यता का भी अभाव है, इसलिए खेद इस बात का नहीं होता कि मेरी उपेक्षा हो रही है, गर्वमिश्रित असंतोष ‘उत्पस्यते हि नः कोपि समानधर्मा, कालोह्ययं निरवधिर्विपुलाश्च पृथिवी’ जैसी उक्तियों का रूप ले लेता है। इसलिए प्रशंसा की लालसा नहीं पैदा होती, आलोचना की अपेक्षा अवश्य रहती है। ऐसे ही किन्हीे पलों में उभरी थीं ऐसी पंक्तियाः

कौन समझेगा तुझे ऐ भगवान
किसने पाई है ऐसी दानाई
वे सितारों की बात करते हैं
तू सितारों से बात करता है।

या

आसमानों पर कदम रखते हुए चलता है
तुमने भगवान को देखा कभी आते जाते ।

दर्पोक्तियों के विषय में एक राज की बात यह है कि अन्यत्र कहीं भी कोई अतिरंजना करे, दर्पोक्तियों में अतिरंजना नहीं होती। इनमें शुद्ध आत्मविश्वास होता है – खुद को ही गढ़ना और खुद को ही सजदा करना । दुनिया को खोजना और अपने को पाना और अपने में डूबना और दुनिया को एक नए विस्मयकारी रूप में पाना और आह्लादित होकर अपनी खोज पर जानते हुए भी विश्वास न कर पाना कि यह मुझसे ही संभव हुआ है। गर्वोक्तियां ऐसे ही क्षणों में प्रकट होती हैं, जैसे अपना अवचेतन मुग्ध होकर प्रशस्तिपत्र पेश कर रहा हो। कथनभंगी प्रशस्तिपत्र वाली ही होती है।

यह सब कुछ चेतना में पहले से था पर आज से पहले, ठीक इस क्षण से पहले चाहता तो भी नहीं लिख सकता था। कोई मेरी रचना प्रक्रिया पर लिखने को कहता तो भी नहीं। लिखना हमारे वश में नहीं। हमारे आवेग, तर्कशृंखला, औचित्य और अभिव्यक्ति का तोष लेखन की दिशा और विस्तार को इस तरह प्रभावित करते हैं कि उनके दबाव में जो कहने चले थे वह अनकहा रह जाता है या अधकहा रह जाता है। मैं कहने चला था कि लेखन के क्षण में विषय ही नहीं, महान चिंतकों के उससे संबंधित विवेचन और सूत्रबद्ध विचार भी लेखन को प्रभावित करते हैं।

यदि आप ज्ञानार्जन के क्रम में उन तक पहुंचे हों तो आपको वे विचार अकाट्य प्रतीत होंगे, आपकी विचार प्रक्रिया को नियंत्रित करेंगे, आप को बौद्धिक करतब दिखाने छूट देंगे, पर सही सिद्ध होने के लिए उन्हीं निष्कर्षों पर पहुंचना होगा। आप इस भ्रम के शिकार होंगे कि आप सोच रहे हैं और आप वैचारिक गुलामी का निर्वाह कर रहे होंगे। विचार करेंगे. विचारमंथन करेंगे, पर विचार उसी बिंदु पर ठहरा रहेगा, आगे नहीं बढ़ेगा।

जब आप अनुभव प्रक्रिया से गुजरने के बाद उन्ही विचारों तक पहुंचते हैं तो उन विचारों और मान्यताओं की परीक्षा होती और उनका बहुत कुछ वागाडंबर सिद्ध होता है।

Post – 2017-09-14

कहीं का कंकड़ कहीं का रोड़ा

मां के मरने के बाद से माई के आने तक मैंने मां को याद तो अनेक बार किया होगा पर उसकी कोई याद नहीं। हमें रोटी-पानी उस बीच कौन देता, मेरी देखभाल कौन करता यह भी याद नहीं। बहुत बाद तक एक नाम याद आता तो झुरझुरी सी अनुभव होती- लालचुनी। उसकी कोई याद नहीं, बस इस नाम से सोचता वह लाल चुनरी पहनती रही होगी। वह पट्टीदारी में किसी के घर आई रिश्ते की एक बालविधवा थी। केवल कल्पना कर सकता हूं कि वह मुझे बहुत प्यार करती रही होगी, इस भाषातीत संवेदनात्मक स्मृति का कोई अन्य आधार नहीं हो सकता।

मां का कोई चित्र तो हो ही नहीं सकता था, जो दृश्यबिंब स्मृतिपटल पर अंकित हैं वे भी अधूरे और किंचित् अविश्वसनीय, फिर भी इतने ठोस और अकाट्य कि मैं बदलना चाहूं तो भी टस से मस न हों। कुछ कुछ स्वप्नजागृति जैसा।

स्वप्नजागृति में आप जो देखते उसे असंभव मानते हुए, तर्क करते हैं, ऐसा तो नहीं हो सकता। निद्रा में, जोर लगाकर पलकों को खोल कर ध्यान से देखते हैं और पाते हैं, है तो वही। हो तो वही रहा है। आप तर्क को स्थगित कर देते हैं। प्रतीति को प्रत्यक्ष मानकर और तर्कगम्य को भ्रम मान कर अपने को उस मरीचिका का सहभोक्ता और कर्ता मान लेते हैं।

आकांक्षाओं से जुड़े लोग, विचारधाराओं से जुड़े लोग, विश्वासधाराओं से जुड़े लोग, धर्मो-संप्रदायों, परंपराओं से जुड़े लोग, अपने अपने सपनों से जुड़े लोग, अपने सपने में व्यवधान डालने वाले किसी तर्क, विचार, प्रमाण को नहीं सहन कर सकते। वे अपने समस्त ज्ञान, अनुभव और कौशल का प्रयोग अपने सपने को सही और उससे अनमेल पड़नेवाले यथार्थ को भ्रम सिद्ध करने का प्रयत्न करेंगे।

मेरा इरादा, अपनी व्यथा में समकालीन विमर्श को लाने का न था। मैं कोई काम सलीके कर नहीं पाता सो यह तो होना ही था।

मां का जो समृतिबिंब सबसे ठोस है उसमें वह अरगनी पर ठोढ़ी टिकाए, एक पांव को दूसरे की फीली पर टिकाए, आंगन में खड़ी किसी महिला से परिहास कर रही थीं। उनकी आंखों में एक शरारत भरी चमक थी, जो युवतियों के आपसी विनोद में ही संभव है। आंगन में कौन था इसका कोई आभास नहीं। यह याद है कि मैं ओसारे में था। मां से पीछे की ओर। ऐसी दशा में, मुझे उसकी आंखें कैसे दीख सकती थीं। परंतु वे बड़े डोले, वे चमकती आंखें मेरा फिक्सेशन रही हैं, वे अनन्य हैं, पर उनसे मिलता जुलता कहीं कुछ दीख जाये, वह पशु में हों या पक्षी में, शिशु में हो या युवा या बृद्ध, रूप कुरूप के पार कहीं भी किसी में भी, मैं रीझ जाता हूं।
असमाप्त

Post – 2017-09-13

अपूर रिक्तता

अभाव के कुछ रूप होते हैं जो किसी दूसरी चीज से भरते नहीं खालीपन का विस्तार करते हैं। मां के प्यार का अभाव । इस खालीपन को भरने के हम जो उपाय करते हैं वह खालीपन को भी बढ़ाता है और खालीपन के अहसास को भी। जैसे दुख और अवसाद में हमें अकेला छोड़ दिया जाय तो हम उसके भोग से उसे कम कर लेंगे। जब दूसरे हमें बाहर लाने के लिए उसमें व्यवधान डालते हैं तो वह दौरे का रूप ले लेता है, व्याधि बन जाता है। अकेला छोड़ दो अवसादग्रस्त को, वह आप्तकाम होकर उससे बाहर आ जाएगा। एक नई गरिमा के साथ जो उससे गुजरे बिना संभव न था। आप्तकामता सुख की नहीं, काम्य की होती है और एेसे अनुभवों से गुजरना पड़ सकता है जिनमें अवसाद ही काम्य हो जाय। जैसे कच्चे फोड़े के साथ करते हो, दुख को पकने दो वह स्वयं अपने विष का निस्सारण कर लेगा। यही स्थिति मां के प्यार से वंचित रह जाने से उत्पन्न रिक्तता का है। उसे बने रहने दो । भरने के कृत्रिम उपायों से रिक्तता और बढ़ जाएगी।

हम अपनी विमाता को माई कहते । किसने यह सुझाया था, यह पता नहीं। रोटी पकाने के लिए एक पंडितानी कुछ समय आती रहीं और उनकी सहायता के लिए नोहर की मां। इन्हीं में से एक का सुझाव रहा होगा। यह एक तरह की हिंसा थी। यदि विश्वास न हो तो उन उम्रदराज महिलाओं की प्रतिक्रिया को याद करें जिन्हे किसी ने आदरवश ही माता जी कह दिया तो वे अपने को रोक नहीं पातीं और उलट कर पूछती हैं, ‘मैं तुमको माता जी लगती हूं?’

आपको ऐसी महिलाएं मुखर लगी हों तो मुझे ये नारीवादी नारों के बिना भी अपने सम्मान की लड़ाई लड़ने वाली नारियां लगती हैं। जिस मूल्यव्यवस्था में स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसका सौंदर्य और इसलिए उसका यौवन माना जाता हो (यद्यपि यह सही नहीं है। उसकी सबसे बड़ी
शक्ति उसका मातृत्व है) उसमें अपने ऊपर बुजुर्गी लादने वाले, कुरूपता का आभास देने वाले किस तरह का अत्याचार करते हैं, इसका न तो हमें बोध होता है न इन पर ध्यान देते हैं।

यदि उसे मासी, चाची, छोटी मा कहना पड़ता तो रिश्तों की दूरी या अलगाव के कारण वह अपने को अलग और सुरक्षित रख लेती। माई के संबोधन के साथ वे संभावनाएं नष्ट हो गईं।

परन्तु इससे दुखद यह कि पिता जी ने माई को पत्नी नहीं बनाया, विवाह के बाद सालियों सलहजों के बीच किसी प्रसंग में उन्होने कहा था, ‘मैने अपने बच्चों की देखरेख के लिए शादी की वर्ना करता ही नहीं।’

उन्होंने अपनी पत्नी को उसके पत्नीत्व से वचित करते हुए अपनी पूर्वपत्नी की सन्तानों की दाई बना दिया और अपने इस अन्याय का न तो उन्हें तब बोध हुआ होगा न बाद में पुनर्विचार की आवश्यकता हुई। गलत आदर्शों, गलत मूल्यव्यवस्थाओं का निर्वाह करते हुए हम कितने अत्याचार, कितनी हिंसा करते हैं इसका बोध क्या हमें होता है?

पता चला कि बारात कोटिया तक, जो हमारे घर से दो फर्लांग दूर थी, पहुंच गई है, हमें एक कमरे में बन्द कर दिया गया। यह जिसकी भी सूझ से आई परंपरा हो, थी वैज्ञानिक। यदि गृहप्रवेश करते समय बधू से उसकी सपत्नी की सन्तानें लिपट जायं तो जानें उसके मन पर क्या गुजरे ?

दीदी हममें सबसे बड़ी थीं। वह भैया को समझाती रहीं, यह हमारी मा नहीं है। मुझे अपनी मां चाहिए थी। उनकी बातें अच्छी नहीं लग रही थीं।

अन्तत: जब वह कोने के कमरे में स्थापित हो गईं तो एक एक को उसके पास परिचय के लिए भेजा गया। सबसे अन्त में मेरी बारी आई। प्रश्न मैंने ही पूछा, ‘तू हमसे रिसिया के क्यों चली गई थीं? मुझसे क्या भूल हुई थी?’ मुझे याद है, वह इस प्रश्न से विगिलत हो गई थी। कुछ बोली नहीं थी। मुझे स्पर्श किया था। यह याद नहीं कि सिर कर या गाल पर। उसमें व्यथा थी। आक्रोश नहीं। पर यही वह क्षण था जब उसका सबसे बड़ा शत्रु उसके सामने था जिसमें उसकी सौत सबसे अधिक जीवित थी।

Post – 2017-09-13

जिन्हें वर्तमान सरकार से हर दृष्टि से निराशा है उनके भाग्य जग गए. राहुल ने घोषित कर दिया वह प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं. अब ऐसे लोगों को चन्दा करके उनकी कुर्सी का आर्डर किसी बढ़ई को दे देना चाहिए.

Post – 2017-09-12

वह ज़िंदगी तो थी नहीं मगर गले लगा लिया

अपनी सनक में पूरी जिन्दगी विविध प्रकार की मूर्खताएं करता रहा, पर सिवाय एक के, एक तरह की मूर्खता दुबारा नहीं की। एक मात्र मूर्खता जिसे मैं बार-बार करता रहा, वह थी लोगों से धोखा खाना और फिर भी अपरिचितों तक पर विश्वास कर लेना। पिछले अनुभवों के कारण यह जानते हुए भी कि धोखा हो सकता है, मैं यह खतरा उठा कर भी, जिसे बचाना चाहता था, वह था मनुष्यता में विश्वास।

ओछेपन से जब भी पाला पड़ा, उसे व्याधि या विवशता मानता रहा। सबसे गिरे हुए लोग मुझे सिद्धांतवादी तेवर अपनाने वाले वकीलों में मिले। जीतने के लिए अपराधियों को सलाह देते और उसकी तरकीबें बैठाते उनकी नैतिक चेतना का इतना ह्रास हो जाता है कि उनमें से अनेक अपराधियों से आगे बढ़ जाते हैं फिर भी अपनी शिक्षा, आय और बुद्धिकौशल के बल पर बाह्य आचार व्यवहार में संभ्रांत दीखने के कारण वे गॉड फादर के प्रतिरूप बन जाते हैं। उससे कुछ ही कम राजनीतिक आकाक्षाओं से जुड़े लोग। परिस्थितियां और आकांक्षाएं जो भी बनाएं, आदमी प्रकृति से अधम हो सकता है, यह बात आजतक गले उतर नहीं पाई । मुझे लगता रहा, अपने को जोखम से बचाने के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरतते हुए जिस दिन मनुष्यमात्र की मनुष्यता में विश्वास खो गया, लोगों को शक की नजर से देखने लगूंगा, उस दिन कुछ न बचेगा, वह आग भी मंद पड़ जायेगी जो शब्दों में ढलती है और जिसके बल पर अपने को लेखक मानता हूँ।

यह मेरी उदारता नहीं विवशता है कि मैं किसी से नफ़रत नहीं कर पाता। उससे भी नहीं किया जिसने धोखा दिया या नुकसान पहुँचाया। उससे भी नहीं जिससे मुझे इतनी यातना मिली कि यातना ही मेरे शैशव का पर्याय बन गयी। जिन्होंने क्षति पहुंचाई उनके प्रति भी मन में करुणा उपजती है, वे शत्रु नहीं रुगण लगते हैं।

यह मेरे ज्ञान, अध्ययन या किसी सत्संग से उपजा भाव नहीं है। यह उस समय ही विद्यमान था जब एक ओर मैं विमाता के उत्पीड़न से बचना चाहता था और दूसरी ओर उसे अन्य विमाताओं की तुलना अथिक दयालु पाता था।

रुकिए, वे कौन सी विमाताएं थीं जिनसे तुलना करने पर मैं उसे अधिक सदय पाता था? उसके अतिरिक्त तो किसी अन्य विमाता को जानता तक न था।

लीजिए, जो मेरे लिए आज तक एक समस्या बनी हुई थी उसका रहस्य इस प्रश्न के साथ ही खुल गया। वे कहानियों की विमाताएं थीं और इसके साथ ही एक मिनट पहले लिखा मेरा ही कथन गलत हो गया। यह उन कहानियों का असर था जिन्हें सुनने बचानी की मां के पास शाम को जाया करता था।

ऐसी कहानियाँ वह स्वयं भी सुनाती थी। मैं सोता उसी के साथ था। अकेले में डर लगता था। सो यह कहना गलत था कि इसका बोध मुझे किसी बाहरी स्रोत से न हुआ था। ये कहानियाँ सीत-बसन्त की, रानी केतकी की, और ऐसी विमाता रानियों की होती थीं जो सौतेले बच्चों को बधिकों के हवाले कर के दूर जंगल में उनका वध करके उनका कलेजा लाने का आदेश देती थीं और वधिक उन पर तरस खाकर, उनको जीवित छोड़ देते थे । उनका पालन वन के जीव जंतु करते थे। वधिक अपने प्राण की रक्षा के लिए किसी जानवर का शिकार करके उसका कलेजा रानी को सौंप देते थे।

जब तक उसे अपना पुत्र नहीं हुआ था तब तक हमारे लिए जिउतिया (जीवित पुत्रिका ) का निर्जला व्रत रखती। यह व्रत पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिमी बिहार में स्त्रियां अपने पुत्र के आरोग्य और शत्रु पर विजय के लिए रखती हैं। इसमें एक थाल में फूल आदि सजाकर बरियार के एक नितांत अनाकर्षक पौदे की तलाश करते हुए जाती हैं और उसका पूजन करते हुए गाती हैं :
ए अरियार
का बरियार
रामजी से जा के कहिह अमुक के माई जिउतिया भुक्खल बाटी
हमार पूत मारि आवें, मरा न आवें ।

इस यात्रा में जुते हुए खेत से होकर जाना मना है। जुती भूमि तो घायल है इसलिए अशुभ।
इससे जुडी एक विमाता की क्रूरता की कहानी थी, जो भी उसी ने सुनाई थी:

एक विमाता ने जिउतिया व्रत रखा था। वह बरियार पूजने चली तो उसका सौतेला बेटा भी साथ था। रास्ते में एक खेत पड़ा जिसमें एक हलाई का निशान था। उसे पार किया नही जा सकता था। इसलिए उसने सौतेले बेटे को उस पर लिटा दिया और उसकी छाती पर पाँव रख कर उसे पार कर लिया।

वह मुझे अक्सर धमकाती कि किसी दिन जहर देकर मार डालेगी। मुझे लगता वह ऐसा कर सकती है। सौतेली माताएं तो ऐसा करती ही हैं, पर जहर दिया नहीं, जिसके कारण मैं ये इबारतें लिख पा रहा हूं और जो दिया वह भी किसी कारण अमृत में बदलता गया। मै जिउतिया व्रत में बरियार की तलाश में उसके पीछे पीछे चला जाता। रास्ते में हलाई पड़ती तो पता नहीं क्या होता? कभी पड़ी नहीं, छाती पर कोई घाव नहीं।

असाधारण क्रूरता की ये कहानियां उसके क्रूर व्यवहार को सह्य और दूसरी विमाताओं की तुलना में उसे अधिक दयालु सिद्ध करतीं। ऐसी कहानियां सुनाते हुए उसके मन में क्या भाव होता, यह कभी न जान पाया। यह कह सकता हूं कि मुझे आतंकित करने का भाव नहीं होता, क्योंकि उसके स्वर में व्यथा होती। मैं कहानी को भी समझता था, उस स्वर को भी समझता था। यह मेरी कोईअलग विशेषता नहीं थी। बच्चे भाषा जानने से पहले ही भाषातीत का आशय ग्रहण करने में दक्ष हो जाते हैं।

तब तो नहीं कह सकता था पर आज कह सकता हूं, सौतेले बच्चों की यातनाओं के विवरणों की लोक साहित्य से से लेकर शिष्ट साहित्य तक कोई कमी नहीं, परन्तु अपने समवयस्क किसी युवक के सपने देखने वाली बालिका के किन्ही कारणों से विवाह के साथ ही अनेक सन्तानों की मां बन जाने,, और एक क्रूर निर्णय के कारण ऐसे पुरुष से बंध जाने की त्रासदी को, जो उसे अधूरा मिला हो, जिसका स्नेह पूर्वपत्नी, जो मर कर भी अपनी संतानों में जिन्दा हो, और उसके बीच बंटा हो, उसे पूरा पाने के कितना संघर्ष करना पड़ता है, उसे समाज की नजरों में कैसे पिशाचिनी बना दिया जाता है, उसे एक शिशुजो उसी पर पूरी तरह निहो, अपना शत्र्भरु समझ कर उससे क्ररूरता करते हुए किन यातनाओं से गुजरना पड़ता इस पर, मेरे परिचित विश्व साहित्य में कहीं कुछ नहीं मिलता । क्यों?

शैशव में मैं अपने दुख पर रोता रहा कि मुझे मातृस्नेह नहीं मिला, आजीवन विमाता के उस संघर्ष और उस पीड़ा को समझने में लगाया जो मेरी विमाता को अपना पूरा पति पाने के लिए करना पड़ा और वह फिर भी न मिला। पूरा पति मिलने का अर्थ था सपत्नी का निश्शेष होना, उसका नाम निशान मिट जाना, उसकी संतानों की समग्र उपेक्षा. उनका स्वामित्व के सभी रूपों से बेदखल हो जाना, उनकी जिन्दगी को नरक बना देना। कितने गहन अंतर्द्वंद्व से गुजरना पड़ता है एक संवेदनशील युवती को जिसे विमाता की भूमिका में डाल दिया
जाता है कि वह अपनी लड़ाई भी पूरे आवेग से नहीं लड़ सकती. स्त्री के अधिकारों का हंगामा मचाने वाली महिलाओं में से कोई विमाता के इस अन्तर्द्वन्द्व पर लिखेगा?

मेरी समझ में यह न आता कि भाई साहब उसकी कोई बात नहीं मानते। पकड़ने को दौडाती तो भाग खड़े होते। दीदी उसका कहा मानती नहीं। उलटे दोनों बाबा से शिकायत कर देते। बाबा लाठी पर ठेंगते हुए घर में प्रवेश करते और उसे फटकार लगाते।

मैं ही उसके छोटे मोटे हुक्म बजाता। कभी बाबा से शिकायत न की। शिकायत न करने का एक कारण यह था कि भाई तो भाग कर बच जाते मैं उतना तेज भाग नहीं सकता था। पकड़ में आ जाता और वह इतनी निर्ममता से कान उमेठती और पिटाई करने के साथ धमकाती कि रोया और किसी से कहा तो और पीटूंगी। मैं बिना रोये पिटता, बाहर निकलते हुए आंसू पोछ लेता। फिर कोई एकांत कोना तलाश कर अहक अहक कर रोता, कलेजा फटने वाली रुलाई और बाहर आने से पहले आंसुओं को पोंछ और सुखा लेता कि किसी दूसरे को पता न चले। चेहरे का भाव तक मानो मन में कोई क्लेश न हो।

कोई दूसरा पूछता तुम्हारी मैभा सताती तो नही, तो एक तो यह सोच कर कि यदि कोई शिकायत की और इसकी खबर उसे लग गई तो मेरी खैर नहीं। दूसरे मन में कुछ गुरूर भी था। यातना सहूंगा पर दैन्य नहीं प्रकट करूंगा।

कहता वह बहुत प्यार करती है। मेरा ऐसा कहना धीरे धीरे उसकी ख्याति में बदल गया। लोग उदाहरण पेश करते, ‘मैभा हो तो उस जैसी।’

मैं सोचता इससे उसकी क्रूरता में कमी आयेगी पर इससे उसके व्यवहार के सामाजिक या दिखावटी और निजी दो रूप हो गए थे। एक में वह मेरा नाम बड़े प्यार से जी लगाकर पुकारती और सुनने वाले प्रशंसा से गदगद होकर लौटते । दूसरे में मुझे गबडघूईस कहती और व्यवहार बदल जाता। इस शब्द का प्रयोग मैंने किसी दूसरे से सुना नहीं। घूस या छिपा कर अनुचित लेन देन और गड़बड़ जिसका प्रयोग वहां विकट के आशय में हुआ लगता है.।इसका अर्थ उसके बाद प्रयोग में आने वाले मुहावरे से स्पष्ट होता, ‘चरहा भरहा के अंत है घुइसे के अंत नाहीं।’

Post – 2017-09-11

एक राज की बात

मेरे मित्रों में जो मेरी आलोचना करते हैं वे मुझे अपने से अधिक समझदार प्रतीत होते हैं और इसलिए यदि आप इज्जत पाना चाहते हैं तो मेरी आलोचना करें, यह सहमत होने से अच्छा विकलप है और तारीफ से कई गुना अच्छा।

एक विगत सन्दर्भ में पता चला कि कुछ लोग मुझे विद्वान भी समझते हैं और इसलिए, कम से कम मुझसे, उस तरह की मूर्खताओं की उम्मीद नहीं करतेथे जिसका नमूना मैंने प्रस्तुत किया। ऐसे लोग झूठ बोलते हैं, क्योंकि असली विद्वान् तो वे स्वयम् है। मैं उनके जैसा सोचता तो वह मूर्खता न करता। जैसा होता है और होना ही चाहिए मूर्ख अपनी इज्जत बचाने के लिए समझदारों से डरते हैं और समझदार लोग मूर्खों से बचते हैं। वे समझदार तो होते ही हैं, सही भी इतने होते हैं कि किसी को अपने से असहमत होने का अधिकार नहीं देते और इसके बावजूद शिकायत करते है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी अन्य के कारण खतरे में है, जब कि मुझे लगता है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वे किसी को न दे सकते हैं, न उसे सहन कर सकते हैं।

मैं उन विरल मूर्ख़ों में आता हूँ जो जो स्वयं लोगों को आगाह करते हैं कि कभी मेरी बात में न आना। मेरा लिखा विचार, तब तक किसी विषय को देखने समझने के अनेक प्रयत्नों में से एक है, जब तक तुम्हारी जानकारी और सोच विचार से वह सही नहीं लगता। इस विचार प्रक्रिया से गुजरने और आत्मसात् किये जाने के बाद वह मेरा विचार रह ही नही जाता। वह तुम्हारा हो चुका रहता है। इसी प्रक्रिया से हम भाषा सीखते है, ज्ञान अर्जित करते और आत्मसात करते है, अन्न ग्रहण करते और उसे पचा कर अपने रक्त और रस में बदलते है. ग्रहीत आत्मसात होने के बाद हमारा हो जाता है । अंतत: हम अपनी बुद्धि और विवेक से ही काम लेते है और ऐसा करना ही हमारे हित में है।

इस मूर्खता के कारण ही मेरा उन बुद्धिजीवियों से विरोध है जिनके पास इतना सही ज्ञान, विचार या दर्शन है, ऐसा बंधा हुआ नज़रिया है, जिससे अलग जाने की अनुमति किसी को नहीं देते, ऐसा करने वाले पर हल्ला बोल देते है, और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की भी बात करते हैं। स्वयम्, जो रास न आये उसे ख़त्म करने का अभियान चलाते हैं और असुरक्षित भी अनुभव करते हैं। मैं अपनी मूर्खता में सोचता हूँ जो आज़ादी वे अपने लिए चाहते हैं, वह सबको हासिल हो, इसे सहन नही कर पाते। कुछ चीजें सिर्फ उनके लिए बनी हैं, उनके पास ही होनी चाहिये, क्योंकि सब कुछ अपने पाद होने बाद ही वे सर्वहारा का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। वे कबीर को पढ़ते हैं और उनकी उलटवाँसियों पर मुग्ध हो जाते हैं, मैं कबीर की नजर रखता हूँ तो उन्हें डरावना लगता हूँ।

मैं पाता हूँ उनकी जिनसे लड़ाई है वे भी ठीक उन जैसे ही है। पक्के औरे दुरुस्त विचारों और मान्यताओं वाले। उनके होने से ही पता चलता है कि सही विचार एक दूसरे के उलटे भी हो सकते हैं और सही विचार का कारोबार करनेवालों की नजर में जो गलत है वह बिना उलटे पलटे सही काम कर सकता है। सही विचारों के दो आढ़ती हैं, कारोबार एक जैसा है. दोनों दूसरे को मिटा कर पूर्ण सत्य पर एकाधिकार करना चाहते है। पूर्ण सत्य के इन आढ़तियों को एक ही कारोबार से जुड़े होने के कारण एक दूसरे का विरोधी नहीं, एक ही खेल के मैदान के भिन्न पालों से गोल करने और गोल होने वाला खिलाड़ी मानता हूँ। विरोधी पक्षों के खिलाड़ियों के लिए एक ही संज्ञा का प्रयोग होता है। यहाँ नाम भिन्न पर क्रिया एक है और जैसा मानता आया हूँ, एक का अस्तित्व दूसरे पर टिका है।

संघ, मुस्लिम लीग, एक ही स्थिति और परिस्थिति की उपज है। इनके अनेक छद्मनाम हैं पर कार्यक्रम एक दूसरे को ही मिटाने का ही नही है, अपितु एक जिस चीज और मूल्य प्रणाली से जुड़ा है उसे भी मिटाने का है। यहीं पता चलता है कि विविध अच्छे नामो और एक जैसे बुरे इरादों के होने के कारण हम नाम पर न जाकर इरादों और कारनामों से ही इन्हें पहचान सकते है और यदि हमारे इरादे भी उन जैसे नहीं हैं तो यह प्रयत्न कर सकते हैं कि वे अपना नज़रिया बदलें, अपना पुनराविष्कार करें, अपना उद्धार करें तो सबका उद्धार हो।

अभी एक जगह पढ़ा यदि संघ को मिटा दिया जाय तो ही यह देश बच सकता है। यह शुभ संकल्प मुझे बहुत पसंद आया । देश को बचाने के लिए मैं इसमें सहयोग करने को तुरत तैयार हो गया। पर फिर सोचने लगा तो पाया कि लीग के कार्यक्रम पर चल कर ये लीग को बचायेंगे, देश को नही।

देश को बचाने की चिंता न लीग को थी न संघ को। दोनों अपने-अपने संप्रदाय अर्थात मुसलमानों और हिन्दुओं को बचाने की चिंता करते थे ।

किससे पैदा हुए खतरे से किसका जन्म हुआ इसका आज कोई मतलब नही, पर इस बात से मतलब है कि ये दोनों अपने समुदाय के हित की जो समझ रखते आये हैं उसके अनुसार दूसरे को आहत करना अपने समुदाय को खुश करना और दूसरे को मिटाना अपने समाज को बचाना है।

एक को अपने समुदाय का आदमी आदमी लगता है दूसरे का आदमी आंकड़ा। एक को चोट पहुंचे तो वह तड़प उठता है, दूसरे की जान भी चली जाय तो ध्यान नहीं देता या और दिलाने पर कहता है ऐसा तो हो ही जाता है या इसका कारण दूसरे के किसी कृत्य में तलाश लेता है।

आहत करने का सबसे सरल तरीका है दूसरे के मूल्यों, मानों, विश्वास, व्यवस्था, इतिहास पर चोट करना और अपने उन्हीं मूल्यों मानों, विश्वासों, व्यवस्था और इतिहास पर तनिक भी खरोंच न आने देना। ये काम सुधार के नाम पर भी किये जा सकते हैं, सत्य की खोज के नाम पर भी, आलोचना या भर्त्सना के रूप में भी।

इस कसौटी पर ही हम समझ सकते हैं कौन किसकी भूमिका में है और किसके विरोध में। तटस्थ, वस्तुपरक या निष्पक्ष होने का दावा वह तभी कर सकता है, जब, जो भी काम करे, भेदभाव से मुक्त रह कर करे। नाम नही नीयत और काम से पता चलता है कि आप लीग के कार्यक्रम पर काम कर रहे हैं या संघ के अथवा निरपेक्ष चिन्तक, विचारक, सुधारक या सर्जक के रूप में।

आत्मालोचन करें, अपने नाम को नही सोच को बदलें, अपनी संज्ञा को चरितार्थ करें। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नाम अच्छा है इसकी समझ और राष्ट्र की परिभाषा गलत है। इसकी प्रेरक और जननी मुस्लिम लीग का नाम भी गलत था और काम भी किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं था और भारत विभाजन के बाद धर्म प्रेम के नाम पर जिन्होंने देश को बांटा था घर-परिवार, जमीन-जायदाद, अनिशिचत वर्तमान और उससे भी अधिक विपन्न भविष्य के बीच धर्म की सापेक्षता में देश का महत्त्व समझ आया और वे यहीं रह गए पर चेहरा उजागर न कर सकते थे
इसलिए समर्थन के भूखे संगठनौं में परकाय प्रवेश के जादू से प्रवेश कर गए ।

प्रसंग वश, अपनी भाषा और अभिव्यक्ति के रूप को ऐसा रखे जिससे आग न भड़के, रोशनी पैदा हो। समझ में बदलाव आये। जिसे बदलना चाहते हैं वह ध्यान से सुने, समझे, अपमानित न अनुभव करे। उसमें सोच पैदा हो, आवेश नही।

पर लीगी अंतरात्मा के प्रभावमें यदि आप का इरादा उसे आहत करने का हो और वह आहत न हो तो आपका प्रयत्न व्यर्थ गया। यदि आप अपने इरादे में सफल हो गए, वह आहत हुआ तो सौ आहत और अपमानित होने वालों में कोई एक कुछ ऐसा भी कर सकता है कि आपको नुक्सान पहुंचे। पर्याप्त भड़कावे के बाद आपराधिक काम तक की गुरुता कम हो जाती है और अदालतें इसका भी संज्ञान लेती हैं।

Post – 2017-09-10

आराम बड़ी चीज है अब चल कर सोइय़े
बस मशहरी लगाइये और तन कर सोइये।

Post – 2017-09-10

मुझे यहाँ से देखिये, मुझे इधर से देखिये
पसंद हो न यह तो चाहिये जिधर से देखिये ।।
न फेरिये नज़र असर फिरी नज़र का देखिये
हज़ार बार ना सही पर एक बार देखिये।।
बुरा नहीं हूँ चाहिये बुरी नज़र से देखिये
लगा के आँख या कि यूँ बचाके आँख देखिए ।।
चश्मे हों पास जिस भी रंग के लगाकर देखिये
मगर हुजूर आप बंद कर न आँख देखिये।।

Post – 2017-09-10

जैसी थी मेरी ज़िंदगी वह ज़िंदगी तो थी नहीं
मगर गले लगा लिया तो आसमान कम पड़ा ।।

Post – 2017-09-10

अपने अपने हीरो अपने अपने खलनायक

आज समाचार छपा है “कश्मीर में दो आतंकी ढेर, पुलिस का एक जवान शहीद।” किसी अदृश्य अखबार में यही खबर इस तरह छपी है “कश्मीर में दो स्वतन्त्रता सेनानी शहीद, एक सिपाही ढेर। सुख और शान्ति से भरे एक आदर्श मानवीय समाज में शहीद या ढेर होने की जगह तीनों को हंसते मुस्कराते जीना चाहिए था । एक बिगड़े हुए माहौल में ढेर किए जाने वाले को जीवित रहने देना असंख्य जिन्दगियों को बर्वाद करने की छूट देने जैसा है। हमारी मूल्यप्रणाली की कसौटी हम है, मानवता की परिभाषा हमारे निजी, साुदायिक या राष्ट्रीय हितों के अनुसार बदलती है, वीरता और कायरता की परिभाषाएं भी । हमारा सैनिक वीरतापूर्वक शत्रुओं को मारता और दुश्मनों द्वारा कायरतापूर्वक मार दिया जाता है। विभाजित हितों वाले समाजों मे एक का हीरो दूसरे का खलनायक होता है । कोई भी विचार सबके लिए सही नहीं होता । निष्पक्ष रहें तो किसी वस्तुव्यापार के तथ्यों को अंकित किया जा सकता है, सत्य तक पहुंचा नहीं जा सकता। वह सापेक्ष होता है ।