जो लोग विलियम जोंस के हिन्दुत्व संबंधी विचार पर मुग्ध हों वे इसे पढ़ कर अपनी समझ सही कर सकते हैं।
The Bible is the light of my understanding, the joy of my heart, the fullness of my hope, the clarified of my affections, the mirror of my thoughts, the consoler of my sorrows, the guide of my soul through this gloomy labyrinth of time, the telescope went from heaven to reveal to the eye of man the amazing glories of the far distant world.
William Jones
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Post – 2017-04-06
हम अपने आप को उनकी नज़र से देखते हैं
वह हमको देखिये उलटी नज़र से देखते हैं
हमारे सामने दो प्रश्न हैं। एक तो यह कि जब हमारे इतिहास, समाज और मनीषा के विषय में पाश्चात्य अध्येताओं का सारा काम वर्चस्ववादी इरादे से, हमे बौद्धिक रूप से परजीवी बनाने के इरादे से किया गया है और सभी क्षेत्रो में पहल और कर्मठता मुख्य रूप से उनकी ही रही है तो उनकी लिखी सामग्री को दरकिनार करने के बाद हमारे पास उपजीव्य के रूप में बचता क्या है? दूसरा प्रश्न यह कि उनकी इस नीति की सफलता से तैयार हुए मानस को बदलने का क्या उपाय है?
इन दोनों प्रश्नों का समाधान हम कुछ समय के लिए स्थगित रख सकते हैं। अभी हम उन अध्येताओं की बात करें जो भारतीय इतिहास का अवमूल्यन करने वाले पश्चिमी विद्वानों का स्वयं विरोध करते हैं और भारतीय अतीत की सराहना करते हैं और जिनके कथन को दुहराते हुए कुछ लोग दिवास्वप्न में चले जाते हैं और उन्हें कुछ इस भाव से याद करते हैं मानो वे हमारे उद्धारकर्ता हैं जब कि अपने को मार्क्सवादी कहने वाले उनसे घबराहट अनुभव करते हुए भी उनके मूर्खतापूर्ण सुझावों को आप्तवाक्य की तरह दुहराते हैं।
भारतप्रेमी या हिन्दुत्व के प्रति सदाशयी और संवेदनशील दीखने का ढोंग रचने वाले पंडितों में सबसे पहला नाम रोबेर्तो दि नोबिली का है जो हिंदुओं के बीच पैठ बनाने के लिए पुरातनपंथी ब्राह्मणों की जीवन शैली अपना कर पांचवें वेद के रूप में बाइबिल के चुने हुए अंशों का प्रचार करते हुए ईसाईयों तक से छूतछात बरतता था।
धर्म की आड़ में पाखण्ड और फरेब के नमूने सर्वत्र मिलते हैं, परन्तु वे व्यक्ति की निजी गिरावट के कारण होते हैं और धर्म और तंत्र उनका अनुमोदन नहीं करता, पश्चिमी समाज राजनीति में ही नहीं, धर्म के मामले में भी धोखाधड़ी, मक्कारी, उत्पीड़न, आगजनी और नरसंहार तक का सहारा लेता रहा है और फिर भी दूसरे धार्मिक समुदायों और विश्वासों के लोगों का उद्धार करने को व्याकुल रहा है और ईसाई समाज इसको जन, धन के साथ नैतिक और कूटनीतिक समर्थन देता रहा है जिसका सबसे ताजा उदाहरण है अमेरिकी सीनेट के पक्ष और विपक्ष दोनों के बहुत सारे सदस्यों द्वारा इस प्रयोजन से गठित एक संगठन को विदेशी धन पर रोक के विरुद्ध पत्र।
जो काम नोबिली इतने प्रपंच के बाद भी नहीं कर पाए थे उसे गाँधी और नेहरू को छलावे में लेकर वेरियर एल्विन ने इतनी सफलता से किया की पृवोत्तर को जिसके लिए नेहरू ने उन्हें सलाहकार बनाया था ईसाई बहुल और भारत विमुख बना दिया और वनांचलों में कई स्थानों पर रहते हुए किसी उम्र की लड़की से, जिनमें एक मामले में जब उसकी अपनी उम्र चालीस थी और लड़की की आठ साल, शादी की, बच्चे पैदा किये और तलाक और गुजारे का प्रबंध करके दूसरी शादी की और इस तरह ईसाइयत और धर्मान्तरण की जड़ें जगह जगह कायम कीं जो आज असाधारण तेजी से बढ़, फल और फूल रही है।
परन्तु एल्विन के साथ एक खास बात थी। वह चौरीचौरा की दुर्घटना से पहले के भारतीय स्वतंत्रता ज्वार से ब्रिटिश शासन के अंत को ब्रिटिश राजविदों की तरह पढ़ सका था कि भारत की आज़ादी टाली जा सकती है, पर रोकी नहीं जा सकती। वह इस निश्चय के साथ आया था कि ब्रितानी राज्य के विदा होने के बाद ईसाइयत का साम्राज्य विस्तार हो और इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जुड़ कर गाँधी जी और नेहरू जी का आत्मीय बना, भारतीय नागरिक बना, आटविक जनों के बीच काम करते हुए भारतीय नृतत्व का पहला उप निदेशक बना और उसे इन कारणों से पद्मभूषण सम्मान भी मिला।
यह एक ऐसी स्थिति है जिसमे कोई भी धोखा खा सकता है। यहां तक कि सावधान रहने वाले या संदेह करने वाले की क्षुद्रता का एक प्रमाण इसे भी बनाया जा सकता है। मैं इस भर्त्सना का स्वागत करते हुए अपने को सिद्धदोष की तरह हाज़िर भी कर देता यदि वह गाँधी के सादी रहन के रास्ते उनका स्नेह और सद्भाव इस हद तक जीतने के बाद कि वह उसे पुत्रवत मानने लगते, वह उससे भी अधिक शुद्ध प्रकृतिवाद की तलाश में आदिवासियों की ओर न मुड़ता और मुड़ने के बाद पुरातात्विक सरोकार से बाहर न जाता और जिसको सर्वोपरि मानता था उसे मिटा कर ईसाइयत के विस्तार के केंद्र न बनाता। उनकी भाषा से अरुचि पैदा करके उनकी जबान को किनारे डाल कर अंग्रेजी को बढ़ावा न देता।
हमारा प्रयोजन यहां उनके मजहबी हस्तक्षेप और घुसपैठ से नहीं है जिसने प्रतिरोध और जाग्रति पैदा की और जिसकी आरम्भिक अवस्थाओं में इसे ब्रह्मसमाज, आर्यसमाज और बाद में गाँधी जी के निजी प्रतिरोध में और संघ के दृढ प्रतिरोध और संकल्प में लक्ष्य किया जा सकता है।
जो खतरनाक बात थी और जिसकी घुट्टी विलियम जोंस, मैक्समूलर सहित दूसरे सभी ने पिलाई और जिसका शिकार होने से कोई न बच सका, वह है, पश्चिम और पूर्व का वह भेद जिसमे पश्चिम को भौतिकवादी और पूर्व को अध्यात्मवादी बताते हुए इसको अंतर्मुखी, व्यक्तिवादी, सामाजिक सरोकारों से शून्य, भाववादी, अतार्किक, अवैज्ञानिक, ढकोसलेबाज, कुहाछ्न्न या ऑब्स्क्योरैंटिस्ट और ब्राह्मणवादी निरंकुशता से ग्रस्त सिद्ध किया जाता रहा । इस चालबाज़ी को लक्ष्य इसलिए नहीं किया जा सका कि उसमे प्रकट रूप में जोर अध्यात्म और अतीन्द्रिय बोध पर दिया जाता रहा । इसलिए इसके जाल से कोई न बच सका और आज इससे सबसे अधिक ग्रस्त संघ और भाजपा और दूसरे हिन्दू संगठनों के लोग हैं जो ईसाइयत के मोर्चे पर अकेले सतर्क दिखाई देते हैं पर अध्यात्म और योगसाधना के चक्कर में भावुक और आत्मघाती रुझानों को बढ़ावा देते हैं।
जब घबराहट की स्थिति आ जाये तो कुछ कर गुजरने से अच्छा है, एक क्षण को अपने को सक्रियता के सभी मोर्चो पर, जो करते जा रहे थे, उसे रोककर, यह सोचना कि क्या हमें कुछ और करना चाहिए? सक्रिय राजनीति से जुड़े लोगों के पास अपने को बर्वाद करने वाले तरीक़ो को, उनका परिणाम जानने के बाद भी, उनको जारी रखने के लिए तरह तरह के बहाने और ढेर सारा समय होता है, पर यह समझने के लिए समय नहीं होता कि जो कुछ कर रहे हैं वह ठीक भी है या नहीं। बुद्धिवादी अपनी बुद्धि पर इतना भरोसा करता है कि जो उससे सहमत नहीं होते उनसे नाता तोड़ लेता है, पर यह पता लगाने की कोशिश नहीं करता कि उससे भी कोई ग़लती हुई हो सकती है। अपनी मूर्खता के परिणाम झेलते हुए भी वह यह नहीं समझ पाता कि जो अनपढ़ हैं वे भी सोचते हैं!
हम लम्बी चर्चा से बचते हुए कुछ ऐसे विद्वानों कि पड़ताल करते हुए अपनी बात रखें तो समझने में आसानी होगी. इनमे अग्रणी हैं विलियम जोंस। उन्हें अधिक सावधानी से पढ़ा जाना चाहिए। वह तीसरे व्याख्यान में ज्ञान, विज्ञान और कला का क्रोड एशिया को मानते हैं (Asia was the “nurse of sciences” and the “inventress of delightful and useful arts।”) पर जब एशिया के भीतर किसी भूभाग की बात आती है तो उसे भारत से बाहर ईरान में केंद्रित कर देते हैं। जो दावा जोंस ने किया वह उससे पहले बंगाली भाषा का व्याकरण लिखते हुए हालहेड अधिक सलीके से कर चुके थे.
हालहेड ने आधुनिक भारतीय भाषाओँ को संस्कृत से निकला माना था और संस्कृत को ही ग्रीक और लैटिन की भी जननी माना था। जोन्स हालहेड के विचारों को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे थे। संस्कृत को आधुनिक भाषाओँ की जननी और उसका आदि क्षेत्र भारत मानना गोरों को काले बंगालियों की औलाद मानने जैसा था. ऊपर से किसी सुदूर अतीत में यूरोप को हिंदुओं के अधीन मानना था। जोंस इस शर्मिंदगी से यूरोप को बचाने के लिए सचाई को तोड़ मरोड़ रहे थे और अपने प्रस्ताव को स्वीकर्य बनाने के लिए अनर्गल लफ्फाजी से काम ले रहे थे:
Jones had read the Jesuit missionary sources with their occasional report of similarities between Sanskrit, Greek, and Latin.
Jones knew Nathaniel Halhed, read his books, quoted from them, and was probably influenced by Halhed’s Sanskrit-Latin-Greek comparisons grammar of Bengali, which he sent to Jones, spoke of Sanskrit as the parent of Greek and Latin, and it contained a list of Sanskrit roots and infinitives which, as already mentioned, may have had some impact on Jones’ idea of “affinity in the verb roots”. Jones accepted the grounds on which Halhed established the kinship of Sanskrit with Greek and Latin; he accepted Halhed’s view that Sanskrit was very ancient; but he did not accept Halhed’s suggestion that Sanskrit might be the parent language।
यह तो उस व्यक्ति का हाल है जिसे हम तुलनात्मक भाषा विज्ञान का जनक मानते हैं। भाषाओँ की उसकी समझ कैसी
थी कि उसका नमूना यह कि :
Hindus had a common origin with a vast array of nations, including the Egyptians, Phoenicians, Chinese, Japanese, even Peruvians…
ऊपर के उद्धरण एक ही पुस्तक से हैं WHY SIR WILLIAM JONES GOT IT ALL WRONG, OR JONES’ ROLE IN HOW TO ESTABLISH LANGUAGE FAMILIES Lyle Campbell (University of Canterbury, New Zealand) .
इतने समझदार आदमी को यूरोप का बड़ा से बड़ा भाषाविज्ञानी सर चढ़ाता रहा और यह भूलता रहा कि उसके कथन का जो रक्षणीय सत्य है वह उससे पहले किसी दूसरे ने अधिक तार्किक ढंग से रखा था और उसे इसलिए तुलनात्मक भाषाविज्ञान की चर्चा से बाहर कर दिया गया कि उसने भारत से लेकर यूरोप तक की भाषाओँ की जननी संस्कृत को माना था जो यूरोप को सह्य न था.
रोचक यह है कि जोंस के हेरफेर के बाद भी यूरोप में संस्कृत और भारत और आदि इंडो-युरोपियन का अकाट्य सम्बन्ध मान्य रहा और बना रहा काले बंगालियों की संतान होने का संताप । इससे बाहर निकलने का कोई तर्क तलाशा जाता रहा जो उनको इस आत्मग्लानि से बचा सके। तुलनात्मक भाषाविज्ञान में विलियम जोंस का महत्व और इसका विकास इसी ग्लानि से बचने की कवायद है पर इसे न पश्चिमी विद्वान् इसके नंगे रूप में पेश कर सकते हैं, न हमारे अपने अधिकारी विद्वानों ने इसे समझा न हमें समझने का मौका दिया। हम इस पड़ताल को आगे जारी रखेंगे।
Post – 2017-04-05
कहना चाहा उसे कहा ही नहीं
हम लम्बे समय से पराधीनता में रहते आए है, जिसके पीछे सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक तीनो कारण रहे हैं। इससे हम तालमेल बैठाते आये हैं; यह हमारे स्वभाव का हिस्सा बनता चला गया है, इसलिए हमने क्या गंवाया है, इसका बोध तब तक नहीं होता जब तक हमारा पाला ऐसे समाजों से नहीं पड़ता जिनको उन अनुभवों से उतने लंबे समय तक और उस रूप में नहीं गुजरना पड़ा।
ऐसी नौबत आने पर यदि आप सतर्क हैं तो आपको आभास होता है इसके चलते हमारे मनोबल और आत्मविश्वास का क्रमिक क्षरण होता आया है। हम जो कुछ हैं, जिस भी दशा में हैं, उसी में संतुष्ट हो लेना या गर्व के कारण तलाश लेना पिछड़ी मानसिकता है, जिससे नई चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता। इसकी क्षतिपूर्ति अपना सबकुछ त्याग कर दूसरे जैसा बनने की दौड़ में होती है जो उससे भी दयनीय, गुलामी की, मानसिकता है।
स्वतंत्रता, समानता और बंधुता ये नई अवधारणाएं हैं जो आकांक्षा के रूप में अति प्राचीन काल से सभी सभ्य समाजों में रही है और अर्थतंत्र तथा धर्मतंत्र इसमें बाधक भी रहे हैं और इनका दिखावा भी करते रहे हैं।
ये प्रत्येक मनुष्य के जन्मसिद्ध अधिकार हैं, यह बोध नया है, अतीत में इनका बोध क्षीण रहा है और हमें अपनी स्थितियों से समझौता करना पड़ता रहा है या कहें अपनी विवशताओं को अपनी नियति मान कर अपने को समझाना पड़ता रहा है। इसलिए यदि पहले हम इस विषय में सतर्क न रहे तो इसके लिए अपराधबोध की आवश्यकता नहीं। फिर भी जिन व्याधियों के प्रति हम सचेत न रहे हों उनके परिणाम से तो नहीं बच सकते।
हम इस कटु सत्य से तो आँख नहीं चुरा सकते कि आज की तिथि में आत्मविश्वास और देशाभिमान के मामले में हमारा आरेख कबीलाई समाजों की तुलना में भी नीचे जाता है, पाश्चात्य देशों की तुलना में नीचे जाता ही है।
विचित्र तुलना है, जिसमे मैं पाश्चात्य देशों को निष्ठा के मामले में कबीलाई समुदायों से भी गया बीता पाता हूँ और इस बात पर खेद जताता हूँ की पाश्चात्य देशों में जिस स्तर का आत्माभिमान और देशाभिमान मिलता है वह भी हममें नहीं है।
रहस्य यह है कि समाज के स्तर पर पश्चिम कबीलाई निष्ठा की तुलना में पिछड़ा है। सच कहें तो जिस आधुनिक राष्ट्रवादी भावना का पूंजीवादी ने अपने हितो की रक्षा के लिए इस्तेमाल किया उसकी प्रकृति कबिलाई है। एक रक्त, एक भाषा, एक विश्वास और एक क्षेत्र। पूंजीवाद ने इसका इस्तेमाल किया, इसको नष्ट किया और उस समाज का हर तरह से अनिष्ट किया जिसकी कबीलाई भावनाओं को उत्तेजित करके उसने सस्ते, कर्मठ और अपना प्राण उत्सर्ग करने वालों की सेवाएं कौड़ी के मोल प्राप्त की थीं और फिर अपने नंगे रूप में सामने आ गया था।
ऐसी स्थिति में अपनी रक्षा के लिए अपने ही समाज की सबसे सम्वेदनशील पीढ़ी को ड्रग एडिक्ट बनाने वाली व्यवस्था और अन्धाधुंध कमाई के लोभ में दूध से लेकर दवा तक में मिलावट करने वाले समाज को कहाँ रखें?
इन दुहरी चुनौतियों के बीच हम क्या हैं, कहाँ हैं, यह जांचना तो हमें ही पड़ेगा। आरम्भ हमें अपने आप से करना होगा।
आत्मविश्वास का एक मानदंड यह है कि आप अपने कार्य से स्वत: कितने आश्वस्त रहते हैं और कहाँ तक दूसरों के अनुमोदन की अपेक्षा करते हैं?
अनुमोदन में तुलनात्मक महत्व अपने समानधर्मियों को अधिक देते हैं या उनको जो स्वामित्व या बड़दाबोध के प्रकट या छद्म भाव से आपके साथ पेश आते हैं?
समर्थन में तर्क और औचित्य कि अपेक्षा रखते हैं, या मात्र पीठ पर हाथ रखने से तुष्ट हो जाते हैं।
पराधीनता के कुछ मूल्य अनुशाशन, शिष्टाचार, आस्था, विश्वास आदि के नाम से सभी समाजों में होते हैं । इनके दबाव से हम बच नहीं सकते। कुछ का निर्वाह सामाजिकता के अलिखित करार का हिस्सा है। अतः हम स्वेच्छा और स्वविवेक से अपनी स्वतंत्रता को अंशतः या अल्पकालिक रूप में या समग्रतः समर्पित कर देते हैं। इसका निर्णय जब तक हमारा है तब तक स्वतंत्रता का यह त्याग भी स्वतंत्रता का हिस्सा है। जहां इसके लिए हमें बाध्य किया जाता है वहां वही कार्य हमारे आत्माभिमान को खोखला करता है।
यह बाध्यता जरुरी नहीं कि बाहुबल के रूप में आये। प्रलोभन, यशवृद्धि, बहिष्कार के भय, अनेक रूपो में पेश आ सकती है और कई बार तो आप्त व्यक्ति या ग्रन्थ की मान्यता बन कर आ सकती है।
प्रश्न यह है कि हम स्वत: अपनी समझ की सीमा में इन दबावों की कहाँ तक परख और प्रतिरोध करते हैं।
इसलिए सांस्कृतिक स्तर पर अपनी धौंस जमाने के लिए कृतसंकल्प समाज या देश
अध्ययन, वर्गीकरण, संपादन, अनुसन्धान के सभी क्षेत्रों में पहल और प्राधिकार अपने हाथ में रखने के प्रबंध करते और अपने समाज के अध्येताओं को प्रमाण पुरुष बनाने के प्रयत्न करते हैं और जिस पर धौंस जमा कर उसके मनोबल को तोड़ना चाहते हैं उसे पहल, प्रयत्न, और अधिकार से दूर रखते हैं।
उसने यदि स्वयम कोई काम अपनी पहल से किया तो उसको या तो नज़रअंदाज़ करते हैं या उसे अपना कृपाकांक्षी बनाने का प्रयत्न करते है।
गुलाम मानसिकता में पले देश के बुद्धिजीवी उनकी शिष्यता पर गर्व करते हैं और उनके द्वारा अनुमोदन को किसी कार्य के स्तरीय होने की अनिवार्य शर्त बना देते हैं और यह तक नहीं समझ पाते कि उनका सारा प्रयत्न आपके समाज को गुमराह करने, मूल्यांकन और अध्यवसाय को गलत दिशा में भटकाने और पूरी ‘सदाशयता’ से आपको गिराने अपना उपजीवी बनाए रखने के लिए होता है।
मुझे आज तक किसी ऐसे पश्चिमी विद्वान का पता नही जो इस षड्यन्त्र से अनिभज्ञ रहा हो,या जो इसमें शामिल न रहा हो। मुझे कोई ऐसा भारतीय चिंतक नहीं दिखाई देता जिसने इस कुचक्र को समझा हो या इससे किसी न किसी अनुपात में प्रभावित न हुआ हो। यह निवेदन करते समय मेरे सामने राममोहन रॉय और विद्यासागर से लेकर, अरविन्द, रवींद्र, विवेकानंद, स्वामी दयानंद, तिलक, सहित प्रख्यात इतिहासकारों, भाषाशास्त्रियों और दार्शनिकों का पूरा सभागार याद आ जाता है। अंतर अनुपात का अवश्य दिखाई देता है।
इसका कारण यह है की राजनीतिक सफलता सुनिश्चित करने के साथ ही उन्होंने मनोबल को तोड़ने और अपने प्रभुत्व को सुनिश्चित करने के लिए सारा पहल अपने हाथ में ले लिया, और खेल के नियम स्वयं बनाने लगे। उन्होंने जितनी दूरदर्शिता, कौशल, अध्यवसाय, स्वराष्ट्रनिष्ठा और दृढ़ता से काम लिया वह असाधारण ही नही, अभूतपूर्व भी है।
हमारे लिए जो षड्यंत्र है वह उनके लिए व्यापक योजना थी और इसको इतनी कुशलता से अमल में लाया गया कि वे अपना काम (क्रिया) करते रहे हम प्रतिक्रिया करते रहे। ऐसे भारतीय मनीषी भी जिन्होंने उनकी योजना पर संदेह करते हुए बचने का प्रयत्न किया और किसी खेत्र में अनन्य कीर्तिमान कायम भी किया उनकी महत्वाकांक्षा भी उनके अधिकारी विद्वानों की समकक्षता में आने मात्र की थी ।
वे भारतीय उपलब्धियों की जहां मुक्तभाव से प्रशंसा करते हैं उसे ध्यान से देखें तो वह एक तरह का भितरघात सिद्ध होगा।
[परंतु क्या आज की पोस्ट भी अधूरी भूमिका बन कर नहीं रह गई ?
कितनी परतों की जहालत हैं दिमागों में भरी ।
कितने जाहिल हैं जो फरमान लिए घूमते हैं
हम भी कुछ हैं कि नहीं?
हम कहीं हैं कि नहीं ?
वे जो फरमाएं उसे चूमते हैं झूमते हैं। ]
Post – 2017-04-04
[आज मैं सारे दिन उद्विग्न रहा । बार बार याद आती रहीं पंक्ति – शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले. वतन पर मरने वालों का यही नामो निशाँ होगा।’ वे यह सवाल तक नहीं कर रहे थे कि मैं अपने देश के सम्मान के लिए अपनी जान दे रहा हूँ तुम हमें सम्मान दोगे न? उनकी एकमात्र प्रेरणा थी उनका यह विश्वास कि उनके वलिदान को देश याद रखेगा और इतना प्रतिदान ही उनके लिए पर्याप्त था. जो देश को हासिल करना चाहते थे, जिनके लिए स्वाधीनता ट्रांसफर ऑफ़ पावर मात्र थी उन्होंने उसी पावर का इस्तेमाल तब भी और बाद में भी उसी तरह किया जैसे अँगरेज़ करते.
मेरे लिए लिखना भाषा और विचार का खेल नहीं है इसलिए मैं लिखते समय विगलित हो जाता हूँ और हो सकता है इसी कारण कुछ मित्रों को मेरा लिखा पसंद आता हो. साधर्म्य के कारण. आज की पोस्ट की भूमिका ही लिख पाया पर लगा दिमाग सुन्न हो गया है इसलिए आज आप बोर होने से बच गए:]
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हम वह नहीं थे जैसा दिखाया गया हमको
थे वैसे नहीं जैसा बनाया गया हमको
होना न था जैसा कि आज होक़े भी खुश हैं
देखो भी कि किस ढब से मिटाया गया हमको
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मैं किसी भी ऐसे देश के विद्वान् को संदेह से परे नहीं पाता जिसका हमारे देश, समाज, धर्म और मूल्य-प्रणाली में निहित स्वार्थ हो।
जो जितना ही बड़ा विद्वान उस पर उतना ही अधिक संदेह।
अनाड़ी आप को जहर दे और आप मर भी जाएँ तो भी वह पकड़ा जायेगा. डॉ. जहर देगा तो आपको लगेगा आप की बेचैनी दूर कर रहा और आपका जहर असर करने में इतना समय लेगा की आप मरने से पहले कोमा में चले जाएंगे और डॉ या वह अस्पताल उसे रास्ते से हटाने के लिए उसकी मदद लेने वाले से खुले और दबे दो दरों से उगाही करेगा और इस तरह बेमौत मारेगा कि न तो डॉ पर कोई ऊँगली उठा सकेगा, न अस्पताल की साख पर न उसे रास्ते से हटाने वाले पर. हम जिस देश के वासी हैं उस देश में ऎसी मौतें होती हैं जिनमे खर्च उठाने वाला मरने वाले के परिजनों तक को उनके कोमा काल तक में मिलने या देखने की अनुमति नहीं दी जाती. परंतु जो असाधारण दक्षता वाले डॉ होते हैं वे द्रुतविलम्बित प्राणघात से भी बचे रहते हैं! वे ऐसे शामक का उपयोग करते हैं जिससे पैदा हुई दिव्यानुभूति के आप इतने आदी हो जाते हैं की उससे बाहर निकलना ही नहीं चाहते। आप को पागलखाने तक की ज़रूरत नहीं पड़ती और उनका काम हो जाता हैं।
Post – 2017-04-04
[मैं उन दिनों सातवीं में था. एक पतली सी किताब बड़ी मार्मिक वेदना के साथ किसी कवि ने प्रकाशित कराई थी जो आज़ाद की माँ की करुण दशा पर थी. कवि का नाम भूल गया, उसकी गहरी छाप मन पर बनी रही. आज इस पोस्ट को पढ़ कर जख्म हरा हो गया.
वह महिमामयी माँ ही ऐसा वीर सपूत पैदा कर सकती थी. कुछ दिन पहले एक पोस्ट में पढ़ा था आज़ाद वेश बदल कर नेहरू से मिलने गए थे उसके अगले दिन ही पुलिस उनको घेरने में कामयाब हुई थी. नेहरू की ‘महानता’ के ऐसे अनगिनत किस्से मिलेंगे.
भगवान सिंह ]
सुरेश कात्यायन की वाल के माध्यम से
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भारत माता के अजर अमर बलिदानी सपूत चंद्रशेखर आज़ाद और उनकी माता की पुण्य स्मृतियों के साथ यमराजी कांग्रेस सरकार द्वारा किये गए खूनी तांडव के राक्षसी सच से परिचित होंने से पहले चंद पंक्तियों में उस सच की पृष्ठभूमि से भी परिचित हो लीजिये…
27 फ़रवरी 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी. आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी. अत्यंत निर्धनावस्था में हुई उनके पिता की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माताश्री उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं. लेकिन वृद्ध होनेके कारण इतना काम नहीं कर पाती थीं कि भरपेट भोजन का प्रबंध कर सकें. अतः कभी ज्वार कभी बाज़रा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं क्योंकि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं रह गयी थी उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद(1949 ) तक जारी रही। (यहां आज की पीढ़ी के लिए उल्लेख कर दूँ कि उस दौर में ज्वार और बाज़रा को ”मोटा अनाज” कहकर बहुत उपेक्षित और हेय दृष्टि से देखा जाता था और इनका मूल्य गेंहू से बहुत कम होता था ).
अगस्त 1947 तक कभी जेल कभी फरारी में फंसे रहे चंद्रशेखर आज़ाद के क्रन्तिकारी साथी सदाशिव राव मलकापुरकर को जब आज़ाद की माता की इस स्थिति के विषय में पता चला तो वे उनको लेने उनके घर पहुंचे. उस स्वाभिमानी माँ ने अपनी उस दीनहीन दशा के बावजूद उनके साथ चलने से इनकार कर दिया था। तब चंद्रशेखर आज़ाद जी को दिए गए अपने एक वचन का वास्ता देकर सदाशिव जी उन्हें अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आये थे,क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र भगवान दास माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा और सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था. अपनी भयानक आर्थिक स्थिति के बावजूद सदाशिव जी ने चंद्रशेखर आज़ाद को दिए गए अपने वचन के अनुरूप आज़ाद की माताश्री को अनेक तीर्थस्थानों की तीर्थ यात्रायें अपने साथ ले जाकर करवायी थीं।
अब यहाँ से प्रारम्भ होता है वो खूनी अध्याय जो कांग्रेस की राक्षसी राजनीति के उस भयावह चेहरे और चरित्र को नंगा करता है जिसके रोम-रोम में चंद्रशेखर आज़ाद सरीखे क्रांतिकारियों के प्रति केवल और केवल जहर ही भरा हुआ था।
मार्च 1951 में चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री के देहांत के पश्चात झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक प्याऊ की स्थापना की थी. प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने प्याऊ के निर्माण को झाँसी की जनता की अवैध और गैरकानूनी गतिविधि घोषित कर दिया था,किन्तु झाँसी के राष्ट्रभक्त नागरिकों ने कांग्रेसी सरकार के उस शासनादेश को “टॉयलेट पेपर” से भी कम महत्व देते हुए उस प्याऊ के पास ही चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला कर लिया था।
आज़ाद के ही एक अन्य साथी तथा कुशल शिल्पकार रूद्र नारायण सिंह जी ने आज़ाद की माताश्री के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी थी. झाँसी के नागरिकों के इन राष्ट्रवादी तेवरों से तिलमिलाई बिलबिलाई कांग्रेस की सरकार अब तक अपने वास्तविक राक्षसी रूप में आ चुकी थी. उसने अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश,समाज और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर के पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगाकर चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी थी ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति की स्थापना ना की जा सके. कांग्रेसी सरकार के इस यमराजी रूप के खिलाफ आज़ाद के अभिन्न मित्र सदाशिव जी ने ही कमान संभाली थी और चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति अपने सिर पर रखकर इस एलान के साथ कर्फ्यू तोड़कर अपने घर से निकल पड़े थे कि यदि चंद्रशेखर आज़ाद ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए थे तो आज मुझे अवसर मिला है कि उनकी माताश्री के सम्मान के लिए मैं अपने प्राणों का बलिदान कर दूं।
अपने इस एलान के साथ आज़ाद की माताश्री की मूर्ति अपने सिर पर रखकर प्याऊ की तरफ चल दिए सदाशिव जी के साथ झाँसी के राष्ट्रभक्त नागरिक भी चलना प्रारम्भ हो गए थे।अपने रावणी आदेश की झाँसी की सडकों पर बुरी तरह उड़ती धज्जियों से तिलमिलाई कांग्रेस की उस यमराजी सरकार ने अपनी पुलिस को सदाशिव जी को गोली मार देने का आदेश दे डाला था किन्तु आज़ाद की माताश्री की प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर प्याऊ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव जी को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में लेकर आगे बढ़ना शुरू कर दिया था अतः सरकार ने उस भीड़ पर भी गोली चलाने का आदेश दे डाला था। परिणाम स्वरूप झाँसी की उस निहत्थी निरीह राष्ट्रभक्त जनता पर यमराजी कांग्रेस सरकार की पुलिस की बंदूकों के बारूदी अंगारे मौत बनकर बरसने लगे थे सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों लोग जीवन भर के लिए अपंग हुए और तीन लोग मौत के घाट उतर गए थे।
यमराजी कांग्रेसी सरकार के इस खूनी तांडव का परिणाम यह हुआ था कि चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी थी और आते जाते अनजान नागरिकों की प्यास बुझाने के लिए उनकी स्मृति में बने प्याऊ को भी पुलिस ने ध्वस्त कर दिया था।
अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की 2-3 फुट की मूर्ति के लिए उस देश में 5 फुट जमीन भी देने से यमराजी कांग्रेस सरकार ने इनकार कर दिया था जिस देश के लिए चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।
श्री Rajkumar Lakhmani जी की पोस्ट।
Post – 2017-04-03
देववाणी = आदिम भारोपीय = आदिम भोजपुरी
शीर्षक में प्रयुक्त अंतिम पद वह मनोवरोध पैदा करता रहा, जिसके कारण मैं भारोपीय की विकासरेखा की पड़ताल को टालता रहा। कारण मैं स्वयं भोजपुरिया हूँ । मन में यह आशंका थी कि कहीँ कोई ऐसा पूर्वाग्रह वस्तुपरकता पर हावी न हो जाय, जिसे मैं स्वयं भी लक्ष्य न कर सकूं और वह मेरे विचारप्रवाह को ऐसा मोड दे दे कि मैं उन साक्ष्यों को लक्ष्य करने से चूक जाउूं जिनसे निष्कर्ष प्रभावित होता है। यदि आपने बीच धारा में कहीं अटके छोटे से पत्थर या पेटी में बह कर आए किसी कुश को जड़ जमाते और उसके कारण प्रखर धारा में आए बदलाव को लक्ष्य किया हो तो विचार प्रवाह में मालूली चूक से आए भटकाव का अनुमान लगा सकते हैं। विचार में मामूली विचलन से भी भारी अनर्थ हो सकते हैं इसलिए वस्तु सत्य को देखते हुए ही नहीं, आत्मगत शिथिलता के क्षणों से बचते हुए ही हम सही निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं।
यह सावधानी इसलिए कि पश्चिमी विद्वानों को, यदि हम धूर्त न मानें, तो उनमें से अधिकांश इसके शिकार हुए। गरज कि खीझ में नीयत में खोट का जो आरोप उन पर लगाया जा सकता है, वही आरोप मुझ पर भी लगाया जा सकता है।
यह भी एक कारण था जिसमें ‘जन जन जाँचत दीन ह्वै दर दर माँगत जाय’ वाली स्थिति पैदा हुई। जिसे भी देखता कि उसकी भाषा में रुचि है, काम करने की क्षमता है, आगे लंबा समय बचा है, हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता, भाई! तुम इसे समझो और इस काम को संभालो।
बहुमन्य और आत्मसीम पंडित आहत होते और आहत कर भी देते थे। सभी दिशाओं से निराश होकर ‘कर बहियाँ बल आपनी छोड़ पराई आस’ का सहारा लेना पड़ा। परन्तु यदि आपमें किसी को कहीं लगे कि स्वभाषा प्रेम से कातर होकर अमुक तथ्य को अमुक रूप में प्रस्तुत किया गया है, और अपने तथ्य और तर्क भी रखें, तो वस्तुपरकता के निर्वाह में सुविधा हो जाएगी।
किसी एक विषय की चर्चा के बीच यदि कोई दूसरा प्रसंग आ जाये तो, विषयांतर का खतरा तो बढ़ता ही है, यदि आप बहुत सचेत रहे, दोनों को अलग रखने का prytn किया तो भी जलरंग चित्रण में एक रंग के सटे पास में कच्ची अवस्था में दूसरे रंग में उतर आता है। चित्र में यह शायद गलत माना जाए, सटीक होने में भी यह बाधा पैदा करता है। पर जो सहज और स्वाभाविक है वह, हमारे लिए अग्राह्य, तर्क से सही भी हो सकता है। इसलिए हम उस मनोविज्ञान और वस्तुवाद पर भी चर्चा करते हुए आगे चलेंगे।
मैंने यह दावा करने का साहस इसलिए किया कि जिसे मैं उतनी ही स्पष्टता से जानता था जैसे यह कि मेरे हाथ में पांच उँगलियाँ है, जिसे कहने वाले दुनिया के सारे गणितज्ञ थे, संदेह या खंडन करने वाला कोई नहीं।
सबसे पहले ध्वनि नियम पर भरोसा करने वाले और उसके आधार पर मूल भाषा का चरित्र निर्धारण करने वाले इस नतीजे पर पहुंचे कि आदि भाषा में, उसे इंडो-यूरोपियन कहे, आर्य कहे, या हिंदी में भारोपीय कहें, ये सभी गढ़े हुए ठप्पे हैं, और इनसे वास्तविकता का पता नहीं चल सकता। ध्वनि नियमों से प्राचीन अवस्थाओं का पता लगाया जा सकता था। यहां भी एक सत्याभास था। क्योंकि भारोपीय ध्वनि नियम न तो द्रविड़ भाषाओँ पर लागू होते हैं, न दूसरे परिवारों की भाषाओँ पर ।
हमारा सरोकार भारोपीय क्षेत्र से है जिसमे ये नियम काम करते हैं और फिर भी भौतिक नियमों की तरह काम नहीं करते । पाणिनि ने भी इनकी सार्वदेशिकता को सीमित करते हुए अपवादों का विधान किया था और इसे ध्यान में रखते हुए रामविलास शर्मा ने ध्वनि नियमों की जगह ध्वनि प्रवृत्तियों का सुझाव रखा जो किसी की समझ में ही न आया। फिर भी हमारे बड़बोले उनको समझने की जगह उन्हें उखाड़ने पर लगे रहे, पर उनका जो न उखाड़ सके उसके बारे में मुहावरे तो हैं पर ऐसे कि जबान पर लाये न जा सकें । आदतन यही काम वे आज भी कर रहे हैं ।
ध्वनि नियम मानक भारोपीय भाषा की प्राचीन अवस्थाओं को समझने में सहायक थे और जब तक उनका निर्वाह किया गया, उसके निर्णय एक ऐसी भाषा की और इंगित करते रहे जो संस्कृत से पूर्ववर्ती थी और जिसमे घोष महाप्राण के पहले घोष महाप्राण ध्वनि का चलन था।
यदि ध्वनि नियम आप्त थे तो तलाश उस भाषा का या उस क्षेत्र का होना चाहिए था जहाँ वह नियम आज भी सक्रिय है। नियम वही थे, पहली बार लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया में ग्रिएर्सन ने स्वीकार किया कि आदि भाषा के लक्षण भोजपुरी या पूर्वी हिंदी में मिलते है। जरूरत थी कि इसे भारोपीय का उद्भव क्षेत्र मानकर भारोपीय के आदि रूप को समझने के लिए इसमें आदि भाषा के लक्षणों के अवशेषों का पता लगाया जाय, पर ऐसा नहीं किया गया।
बाद में चाटुर्ज्या को लगा कि बात तो सही है पर वह आर्य आक्रमण से इतने बंधे हुए थे कि उन्हें यह अजूबा बन कर रह गया। उन्होंने भी नहीं सोचा कि पुरानी मान्यताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
पदों, सुविधाओं और लाभ से जुड़ा व्यक्ति हतचेत होता है। जैसे लोक कथाओं में राक्षस के प्राण दूर बैठे किसी सुग्गे से पास होते हैं उसी तरह उसकी चेतना की कंुजी उसके हाथ में होती है जिसके हाथ में ये सुविधाएं देने का तन्त्र होता है। एक बार उसी से बंध जाने और उसी सोच में ढल जाने के बाद वह सत्य का साक्षात्कार नहीं कर पाता या करना ही पड़ा तो उससे डरता है। समरस समर सकोच बस पांव न ठिक ठहरात । यही स्थिति सुनीति बाबू की भी थी।
अच्छा हो हम फिर सस्युर को याद करें। उसने कहा, तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के नाम पर जो कुछ किया जाता रहा वह एक षब्द क्रीड़ा थीः
In fact, from then on scholars engaged in a kind of game of comparing different Indo-European languages with one another, and eventually they could not fail to wonder what exactly these connections showed, and how they should be interpreted in concrete terms. Until nearly 1870, they played this game without any concern for the conditions affecting the life of a language.
पहली बात, लिखित भाषा भाषा नहीं होती, वह उसकी अधूरी प्रस्तुति होती है, भाषा अपनी वचनीयता में ही अपने आप्त रूप में आती है और इसलिए बोलियों का महत्व लिखित भाषाओं से अधिक हैं और उन्हीं के माध्यम से भाषा के विकास को समझा जा सकता है। यहीं आकर हमारी बोलियों का महत्व संस्कृत से अधिक बढ़ जाता है. जो इससे खीझता है वह अपने को मलिन दर्पण के रूप में प्रस्तुत करता है जो बाहर का बिंब ग्रहण नहीं कर सकता पर उसके लेप के बिम्ब को वस्तुसत्य मान सकता है।
Post – 2017-04-03
बौद्धिक परनिर्भरता
गुलामी की समाप्ति के बाद अमेरिका में एक नई समस्या पैदा हुई। बहुत सारे मुक्त किए गए गुलाम अपने मालिकों के पास वापस आ कर यह फरियाद करने लगे कि उन्हें फिर गुलाम बना लिया जाय। कारण बहुत सीधा था, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे अपनी आजादी का करें क्या? उनमें काम करने की शक्ति थी परन्तु पहल करने का साहस नहीं। वे जोखिम नहीं उठा सकते थे, जब कि यह आजादी की पहली शर्त है। वे गुलाम नही बनाए जा सकते थे इसलिए आज़ाद रहने को अभिशप्त थे। वे अल्पतम के साथ ही सही, सुरक्षित जीवन जीना चाहते थे, अनिश्चितता का सामना नहीं करना चाहते थे।
ऐसा बड़े पैमाने पर न हुआ । जो सामान्य रूप में घटित हुआ, वह था, अपनी अस्मिता की खोज, अपनों की तलाश, अपनी अफ्रीकी परंपरा का पुनराविष्कार, अपनी अलग ढंग की भाषा, अपना अलग चर्च, अलग उपासनाविधि, अलग पादरी । यह उनके स्वाभिमान की रक्षा के लिए भी जरूरी था और हीनता से मुक्त भविष्य के निर्माण में भी सहायक।
मुक्ति के बाद भी संपदा के स्रोतों पर उनका अधिकार नहीं हो सकता था। इसके अभाव में वे लाख कोशिश करके भी संपदा के स्वामियों की बराबरी पर नहीं आ सकते थे। अब भी उन्हें जीना पुराने स्वामियों की सेवा करते हुए ही था। सेवा करने वाला ऊंचे पदों पर पहुंच सकता है, अच्छा वेतन पा सकता है, अपनी योग्यता के कारण स्नेह और सम्मान भी पा सकता है पर बराबरी का दर्ज नहीं । उसके समक्ष वह सदा अर्धदास की तरह आचरण करेगा, इसका तीखा बोध उसे हो या न हो।
स्वतन्त्रता के बाद हमने किन क्षेत्रों में पहल किया है, किस अनुपात में किया है और उन्हीं क्षेत्रों में हमारे ही समाज में दूसरे देशों का कितना दखल है, इसका हमारी मानसिक मुक्ति से सीधा संबंध है। मिसाल के लिए भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीति, पर हमारे इतने सारे विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थाओं के होते हुए कितना और किस स्तर का काम किया गया है और इन्हीं क्षेत्रों में दूसरे देशों के विद्वानों द्वारा कितना काम किया गया है इसकी तुलना करने चलूं तो उसके आंकड़े नहीं मिलेंगे, परन्तु यदि भारतीय विद्वानों द्वारा लिखे ग्रंथों में सन्दर्भग्रन्थों पर नजर डालें तो अनुपात कम से कम 1:9 का तो होगा ही ।
इसका प्रधान कारण है आत्मविश्वास की कमी, दृष्टिहीनता, आलस्य, अल्प से अधिक से अधिक नाम से लेकर सुख साधन तक जुटाने की लालसा। अतः न काम स्तरीय होता है, न उनमें व्यक्त विचारों को इस स्तर का समझा जाता है कि उनको उद्धृत किया जा सके।
इससे उन देशों का हमारे आन्तरिक मामलोें में हस्तक्षेप करने का अवसर बढ़ता है और आप उनके खिलौने बन कर रह जाते हैं।
यह मेरी ग्रन्थि मानी जा सकती है कि विदेशों में अपनी ख्याति तलाशने वालों को मैं विदेशी उपयोग के लिए अपने को समर्पित करने वालों से अधिक महत्व नहीं दे पाता। ऐसे अवसरों पर मुझे याज्ञवल्क्य-मैत्रायणी संवाद याद आता है कि दूसरा तुम्हेंशी तुम्हारे लिए (तुम्हारे गुणों के कारण) प्रेम नहीं करता, वह अपने लिए (तुम्हे अपने उपयोग की चीज समझकर) प्यार करता है।
वह इस चीज के लिए तुम्हारी तारीफ करता है कि तुम उसके पास आने के लिए, उस जैसा या वह जिनको पसन्द करता है उनके जैसा बनने को कितने लालायित हो या अपने समाज और देश को कितना पिछड़ा और गर्हित रूप में प्रस्तुत करते हो। यदि वह तुम्हारे समाज में तुम्हारा अपना बन कर प्रवेष करता है तो उसका लक्ष्य तुम्हारे देश या मत की सेवा करना नहीं है, वह तुम्हारा बन कर भितरघात करना चाहता है। इसके लिए साधन वह देश प्रदान कर रहा है जिसकी योजना के अनुसार वह काम कर रहा है।
जिन दिनों मन्दिर मस्जिद विवाद जोरों पर था दो ऐसे अमेरिका पोषित युवकों संघ से अपनी निकटता कायम की जो हिन्दुत्व प्रेम से कातर थे। एक प्राचीन वेद की भी जानकारी रखता था। उसने अपने ईसाई नाम के साथ हिन्दू नाम भी रख रखा था, दूसरा आधुनिक गतिविधियों का अध्येता। उन्होंने ढेर सारी सामग्री पुस्तकाकार प्रकाशित कराईं । मेरा दक्षिणपंथी संगठनों के प्रति उस तरह का कुत्सापूर्ण रुख कभी नहीं रहा जो मेरे अधिकांश मित्रों का रहा है, इसलिए मैंने उन्हें आगाह किया और एक दो बार मंच से भी सांकेतिक रूप में यह सन्देश दिया कि वे विघटनकारी भूमिका निभाने के लिए हिन्दुत्व प्रेम प्रदर्शित कर रहे हैं । दबे स्वर में कहा कि इनसे सावधान रहना चाहिए।
संघ के समझदार लोगों की भी समझ इतनी ही दूरी तय कर पाई कि देखो अब अमेरिका और यूरोप के विद्वान भी हिन्दुत्व की महिमा को समझने लगे हैं और हमारी नीतियों के प्रशंसक है। इसका परिणाम वाजपेयी जी के शासन काल में इनमें से एक को पद्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। मेरी समझ से यह एकमात्र ऐसा उदाहरण होगा जिसमें पद्म पुरस्कार किसी विदेशी को दिया गया। परन्तु इससे भी बड़ी बात यह कि मोदी सरकार के आने पर जिस सज्जन को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का अध्यक्ष बनाया गया उन्होंने इसकी सलाहकार समिति का भी सदस्य उस व्यक्ति को बना लिया। यह भी मेरी जानकारी में पहली बार हुआ होगा जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की सलाहकार समिति में किसी विदेशी को रखा गया।
इंडियन एंटिक्विटी पर जिस सेमिनार में इसका अधिक प्रखरता से अनुभव हुआ उसका आयोजन भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद ने ही किया था। मुझसे संपर्क किया गया तो मैने प्रस्ताव देख कर बताया था कि मैं भाषा इतिहास और भारतीय चिन्तन पर हिन्दी में अपनी बात रखना चाहूंगा। इस पर उन्हें आपत्ति न थी।
सेमिनार के उद्घाटन समारोह में इसकी योजना के विषय में अध्यक्ष ने बताया कि उन्होंने कितनी सूझबूझ से इसका विषय निर्धारित किया है। उनकी समझ में नहीं आ रहा था तो उन्होंने उस विदेशी विद्वान की सलाह ली और उसने इसके लिए सुझाव रखे।
विषय कोई हो, इसकी दिशा कौन तय कर रहा है? यह इतिहास किसके उपयोग में आएगा? कारण यह है कि आज का शासन संघ से निकले नेतृत्व के हाथ में है। मोदी ने इसकी पुरानी सीमाओं को तोड़ते हुए एक नई ओर व्यापक राष्ट्रीय दिशा दी जो उनके अब तक के कथन और कार्य में परिलक्षित भी है। परन्तु संघ ने अपने को सांस्कृतिक संगठन कहते हुए भी सबसे अधिक उपेक्षा संस्कृति की ही की है। इसने अध्ययन और ज्ञान की दिशा में कोई पहल ही नहीं किया । वह अपने विषाल काडर पर गर्व करता है।
राजकाज का संचालन करने के लिए बहुत अधिक ज्ञान की जरूरत नहीं होती। समझ की जरूरत होती है। इसीलिए दुनिया के अनेक सबसे सफल प्रशासक अल्पशिक्षित या अशिक्षित रहे हैं, परन्तु समाज और अर्थतन्त्र को दिशा देने के लिए उसके पास सुयोग्यतम व्यक्तियों की पहचान और उनका उपयोग करने की योग्यता उनमे थी. इस योग्यता की पहचान के लिए संकीर्णताओं से ऊपर उठना जरूरी है। इसका परिचय अभी तक नहीं मिला है।
अतीत का एक दुखद अनुभव यह रहा कि मार्क्सवादी सोच को विध्वंसकारी सोच बना कर उसके सुयोग्यतम व्यक्तियों के माध्यम से देश और समाज का अनिष्ट अधिक कराया गया और उसी से वह निर्वात पैदा हुआ जिसमें भाजपा का प्रवेश हुआ। इसलिए उनसे परहेज का पर्याप्त कारण था।
यदि संघ में शिक्षा और ज्ञान की दृष्टि से असाधारण प्रतिभाएं होतीं और वह उन्हीं से शिक्षा, संस्कृति और अनुसंधान के पदों को भरता तो यह आदर्श स्थिति न होती फिर भी, इससे शिकायत न होती। उसमें अध्ययनशील जनों का दारुण अभाव है इसलिए देश की ऐसी प्रतिभाओं की पहचान और उनके उपयोग की दक्षता तो उसमें होनी ही चाहिए जो किसी राजनीति से न जुड़े हों और अपने क्षेत्र के साथ न्याय कर सकें। जिन्हें हम अल्पशिक्षित या अशिक्षित परन्तु असाधारण सफल प्रशासक मानते हैं, उन्होंने अपने अभाव को इसी तरह पूरा किया था।
ऐसा न कर पाने के की अनिवार्य परिणति है अपने देश के शत्रुओं के हाथ में खेलना और इस बात पर गर्व करना कि देखो, हमें विदेशी परामर्शदाता मिल गए हैं। एक जमाने में नेहरू जी को भी विदेशी परामर्शदाता उसी अमेरिका से मिल गए थे जो उनको समझाने में सफल हुए थे कि भारत अपनी विशाल आबादी के कारण अपनी खाद्य समस्या को हल नहीं कर सकता। इसमें अमेरिका उसका सच्चा सहयोगी है जो पीएल 480 के द्वारा अभाव की स्थिति नहीं आने देगा। इससे जुड़े अपमान के अतिरिक्त इसके माध्यम से कूटनीतिक दबाव भी डाले जाते रहे । नेहरू जी के गुजरने के बाद शास्त्री जी ने पहली बार जै जवान जै किसान का नारा ही नहीं दिया इन दोनों मोर्चों पर काम भी करना शुरू किया। कृषि का बजट दूना कर दिया, खेती का क्षेत्र और सिंचाई सुविधाओं का ऐसा विस्तार किया कि उसके बाद सूखे की मार का भी अनिष्टकर प्रभाव नहीं पड़ा।
Post – 2017-04-02
आग पिघली हुई ऐसी कि सम्भाले न बने
भाप के इंजन में एक बायलर होता था जिसके नीचे होता था अग्निकुंड या फायर बॉक्स. इसमें लगातार कोयला झोंक कर भाप के दबाव से इतनी शक्ति पैदा की जाती थी कि भाप की धार पहियों को वह गति दे सके कि वे इतने डिब्बों और उसमें भरे हुए माल या मुसाफिरों के भार को संभाले जाने कितने घोड़ों के सकल शक्ति से दौड़ सके. इंजिन को अश्वशक्ति से ही मापा भी जाता था. यदि बायलर में भाप का दबाव इतना बढ़ जाय कि वह सुरक्षित सीमा को पार कर जाये तो बायलर फट भी सकता था. इसके लिए एक उन्मोचक यन्त्र होता था . इसे स्टीम रिलीज़ कॉक कहते थे.
लिखना किसी भी ईमानदार लेखक के लिए यन्त्रणा से गुजरना और फिर भी उससे भी त्रासजक बेचैनी से मुक्त होने की प्रक्रिया है. लेखक स्वभाव से आलसी होता है. वह लिखने से बचना चाहता है परन्तु उसके भीतर संचित वाष्पीकृत आग से मुक्ति का एक ही उपाय है. लेखन के माध्यम से निकास का अवसर देकर ही उसे चैन मिल सकता है.
दूसरों की नहीँ जनता, कम से कम, मेरी स्थिति यही है. सोचकर लिखना या जैसा या जो हम लिखना चाहते है वही, और उसी तरह लिख पाना सम्भव हो सके तो लेखन निष्प्राण होगा. अपनी भाषा और दिशा वह आग स्वयं तय करती है और हमारी इच्छित योजना को तोड़ कर हमें निरुपाय सा बना देती है. इसके कारण रचना के क्षणों में हम अपना अविष्कार भी करते हैं और उस पर स्वयं चकित भी होते है.
प्रयत्नपूर्वक लिखना कष्टसाध्य भी है और यातना दायक भी, क्योंकि न इसमें भाषा साथ देती है न विचार. आनंद का न तो स्वयं लाभ होता है न इसे पढ़ने वाले को आनंद मिल सकता है. बहुत से लोगों का आग्रह है और यह जरूरी भी है कि मैं अपना एक जीवनवृत्त तैयार करूँ. कई साल से कोशिश में लगा हूँ. आज तक तैयार नहीं कर पाया. पकड़ में आने पर कुछ इस तरह जैसे अभी ICHR के एक सेमिनार के लिए देना पड़ा:
भगवान सिंह, जन्म 1 जुलाई 1931 ।
शिक्षा – हिन्दी साहित्य से एम.ए.
कभी किसी कालेज या विश्वविद्यालय में अध्यापन नहीं किया न ही इतिहास, पुरातत्व, नृतत्व, संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं या विभागों में काम किया।
सर्जनात्मक साहित्य और अनुसंधान कार्य में आरंभ से ही रुचि के कारण भारत की लगभग सभी भाषाओं का परिचयात्मक ज्ञान अर्जित करने और उनकी लिपियों का अभ्यास करने के बाद इनके आपसी संबन्धों को समझने के प्रयत्न में पाया कि इन सभी की निर्माण प्रक्रिया इतनी सर्वमिश्र है और इसके कारण ये एक दूसरे के इतने करीब है कि किसी को किसी अन्य पर आरोपित नहीं माना जा सकता न ही यह दावा किया जा सकता कि अपनी प्राथमिक अवस्थाओं में भी इनमें कोई इतनी शुद्ध रही हो कि उसमें दूसरे के तत्वों को न तलाषा जा सके । इन प्रश्नों से जूझते हुए वह भाषाविज्ञान, इतिहास, वैदिक वांग्मय और पुरातत्व और नृतत्व के अध्ययन और शोधकार्य में लगे रहे जिसकी कुछ झलक उनकी कृतियों से मिल सकती है:
इसके आगे प्रकाशित पुस्तकों का नाम.
पर इसे लिखना भी आसान नही. जीवन परिचय आत्मविज्ञापन है. मेरा प्रयत्न यह कि कोई गलती से मुझे विद्वान न मान ले. जो लिखा उससे अलग कुछ न था न कुछ हूँ , पर जो परिचय छपा उसमें मै प्रोफेसर बन गया . अक्सर डॉ बता दिया जाता हूँ. मेरा काम इसके बिना चल सकता है, उनका नहीं चलता.
मेरा आग्रह यह कि यदि आपको मेरा लिखा ठीक लगता है तो इसके लिए किसी पद या उच्च योग्यता की जरूरत नहीं. मात्र दृढ संकल्प, निर्भीकता और सत्यनिष्ठा की आवश्यकता है जो रागद्वेषहीनता के बिना सम्भव नहीं. मेरे पाठकों में कोई भी यदि किसी एक क्षेत्र को चुन ले तो यह काम अधिक अधिकार से कर सकता है.
यदि ऐसा हो सके तो किसी लेखक की इससे बड़ी कोई उपलब्धि नहीं हो सकती कि वह अपने पाठकों में से कुछ को अपने से अच्छा लेखक या विचारक बना सका. अब तक की मेरी उपलब्धि यह है कि मेरे मित्रों में से कुछ के लेखन में पहले से अधिक सफाई आई है जो भाषा, विचार और साहस तीनो स्तरों पर दिखाई देती है.
परन्तु मैंने आज का यह पोस्ट जो लिखा उसे लिखने के लिए आरम्भ नहीं किया था, अपितु यह बताने के लिए किया था कि यदि लिखना सचमुच यन्त्रणा है तो भाषा पर काम चल ही रहा था फिर अपनी राष्ट्रीय पराश्रयी मानसिकता को क्यों ले बैठा. इसका उत्तर फायर बॉक्स में कोयला झोंकने वालों के पास भी न होगा जो अपने कारनामों से भाप का स्तर इतना बढ़ा देते हैं कि यदि स्टीम रिलीज़ कॉक का सहारा न लें तो अधिक बड़ी त्रासदी घटित हो जाय. इसे आज तो बयान न कर सका सम्भव है कल कर सकूँ.
Post – 2017-04-02
सच हो तुम सच से जियादा कुछ हो
तुम्हारी सोच, इरादा कुछ हो
तुम बहरहाल हमारे हो अज़ीज़
कितनी फितरत, मगर सादा कुछ हो.
तुम को चाहा है और चाहेंगे
आईने में भी और सामने भीं
तुम हो लाचार अपनी आदत से
हमारा कौल औ’ वादा कुछ हो.
—-
ऐ मुहब्बत तेरी बर्वादियों का है भी हिसाब
कितने रौशन हुए घर ख़ाकदान होने को
सुझाया तुमने ही होगा किसी वहशी को यह
खुशामदीद के पीछे से इशारा कुछ हो
Post – 2017-04-01
सच हो तुम सच से जियादा कुछ हो
तुम्हारी सोच, इरादा कुछ हो
तुम बहरहाल हमारे हो अज़ीज़
कितनी फितरत है, गो सादा कुछ हो.
तुम को चाहा है और चाहेंगे
आईने में भी और सामने भीं
तुम को करना है जिसकी आदत है
हमारा कौल औ’ वादा कुछ हो.
—-
ऐ मुहब्बत तेरी बर्वादियों का है भी हिसाब
कितने रौशन हुए घर ख़ाकदान होने को
सुझाया तुमने ही होगा किसी वहशी को यह
खुशामदीद के पीछे से इशारा कुछ हो.