Post – 2019-04-22

अब कुछ नहीं बचा है आज रात के लिए
बस एक नाम, एक जाम, वह भी नहीं है।

Post – 2019-04-22

इतना दगाबाज कोई हो सकता है?
मैं सोच रहा था उसको अपनी तुकबंदियों की भूमिका लिखने को कहूंगा। किसने खबर कर दी कि उसने ठान ली कि मर जाऊंगा पर इतना गलत काम न करूंगा।
शेरजंग! भूमिका लिखने से पहले तुमको मरने नहीं दूंगा।

Post – 2019-04-21

#मुस्लिम_समाज और #नेतृत्व_का_संकट -7

हमने बहुत सलीके से तो नहीं, फिर भी अब तक जो चर्चा की है उसका सार यह है नेतृत्व का एक पर्यावरण होता है जिससे उसकी शक्यताएं जुड़ी होती है। इसका एक पक्ष है समाज की समझ और उस की बाध्यकारी अपेक्षाओं की पहचान।

समाज एक जटिल संरचना है जिसकी पूरी समझ किसी को नहीं हो सकती। इसके बावजूद अपने परिवेश की जानकारी के बल पर हम यह भ्रम पाल लेते हैं कि हम अपने समाज को तो जानते ही हैं ।

यहां मैं उन लोगों की बात कर रहा हूं, जो अपने समाज का अंग बन कर रहते हैं, उनकी नहीं जो सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और पदीय दृष्टि से ऊंचे दर्जों पर होने के कारण, न केवल अपने को शेष समाज से काट कर रखते हैं, अपितु आपसी स्पर्धा के कारण एक दूसरे से भी बिना दुराव के मिल नहीं पाते फिर भी दूसरों से बढ़कर दावा करते हैं कि वे सुशिक्षित होने के कारण अपने समाज को अधिक अच्छी तरह जानते हैं जबकि । वे अपने ही समाज के अजनबी होते और अजनबी बने रहने पर गर्व भी करते है।

कुछ और आगे बढ़ें तो पाएंगे, वे अपने लिए भी अजनबी बने रहते हैं, और आत्मनिर्वासन की अनुभूति से ग्रस्त रहते हैं । ऐसे लोग अपने किताबी पांडित्य के कारण आतंकित भले करें, वस्तुतः सूचनाओं का गोदाम होने के बावजूद वे कुछ नहीं जानते। उन्हें अपने देश की, अपने समाज की, और उस समाज में अपनी भूमिका की खोज करनी पड़ती है, परंतु उनके चरित्रगत आभिजात्य के कारण यह खोज भी, इकहरी और अधूरी रह जाती है। वे अपनी सारी कोशिशों के बावजूद अपने समाज से एकात्म्य स्थापित नहीं कर पाते। प्रकृतिस्थ नहीं हो पाते। उनकी जानकारी हमारे काम की नहीं होती; हमारी जानकारी को वे तुच्छ समझते हैं। समाज का सबसे अनिष्ट ऐसे ही लोगों के द्वारा होता है।

समाज को समझने के लिए, सच कहें तो किसी को समझने के लिए, हमें अपने मन को उसके अनुसार ढालना होता है। हम हठ और अहंकार के साथ अपने स्वजनों को भी नहीं समझ सकते, समाज और दुनिया को समझना दूर की बात है। समाज में सहज भाव से मिलना, समझदार लोगों को अपनी तौहीन प्रतीत होती है। उनके प्रति आदर रखना, उनको समझने का प्रयत्न करना, और इसके लिए उनकी जड़ों की खोज करना, उस महा-प्रयोगशाला में उतरने की मांग करता है जिसे इतिहास कहते हैं। परंतु इस प्रयोगशाला में पहुंचने की इस प्राथमिक योग्यता के बिना, अपने ज्ञानदंभ के कारण वे बौद्धिक आतताई की तरह प्रवेश कर सकते हैं, उसमें मनचाही उलट फेर कर सकते हैं, परंतु उनको वह त्रिकालभेदी दृष्टि मिल सकती है जो समर्पित भाव से इतिहास में प्रवेश करने वाले को मिलती है।

मोहम्मद साहब ने अपने इतिहास को समझने की जगह उसे नष्ट करने का प्रयत्न किया। यह एक ऐसी चूक थी जिसके लिए हम उनको दोष नहीं दे सकते क्योंकि आज से डेढ़ हजार साल पहले उनसे जो भूल हुई वह भूल तो मार्क्सवादी इतिहासकार आज भी लगातार करते हैं। इसे आप एक अच्छा सा नाम देते हुए चाहें तो क्रान्ति कह सकते हैं। इस्लामी और मार्क्सवादी इतिहास दर्शन में काफी समानता है। कौन किसका ऋणी है यह
बताने की जरूरत नही

शिंशुमार (डॉल्फिन) पानी से छलांग लगाता है, और कुछ समय तक आसमान में रह कर, कलैया मार कर फिर उसी पानी में गिरता है। हम इतिहास को उलट कर, अपने को समझा लेते हैं, कि पुराने इतिहास से मुक्त हो गए परंतु अंततः पाते हैं कि मात्र लिफाफा बदला है अंतर्वस्तु में अधिक अंतर नहीं आया।

विकास, प्रगति, छलांग, और क्रांति यह इतिहास के औजार हैं। छोटे पैमाने से लेकर बड़े पैमाने तक, सचेत और अचेत रूप में, ये सक्रिय रहते हैं। हम इतिहास को मनुष्य की जय यात्रा के रूप में देखते हैं, इसलिए यह याद रखना चाहते हैं कि सत्य के साथ असत्य की सत्ता की तरह, इतिहास के साथ अनितिहास के भी दौर आते हैं जिनमें ठहराव, पिछड़ापन, या पुनरुत्थान वाद को औजार बनाया जाता है। यह किसी समाज के पराजयबोध जनित आत्मरक्षा के उपाय होते हैं, जिनके महत्त्व को, पराजित समाजों के संदर्भ में, कम करके नहीं आंका जा सकता, परंतु ये तरीके उसे मिटने से भले बचा लें, पिछड़ने से नहीं बचा पाते। पहले की अपेक्षा अधिक निरूपाय होने से नहीं बचा पाते।

रोचक बात यह है कि कई बार इतिहास और अनितिहास एक ही समाज में, या कहें सभी समाजों में, किसी न किसी रूप में सत्य में मिले झूठ और झूठ में मिले सच की तरह एक साथ विद्यमान होते हैं । क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया कि ब्रिटेन और अमेरिका अधिकांश दृष्टियों से अग्रणी होने के बाद भी माप और तौल में दाशमिक प्रणाली नहीं अपना सके क्योंकि इसका आरंभ फ्रांस ने किया था जिससे ब्रिटेन की शत्रुता थी और अमेरिका कनाडा ऑस्ट्रेलिया आबादी के मामूली हेरफेर के बावजूद ब्रिटेन की परंपरा से जुड़े हुए हैं। स्वाभिमान की रक्षा इतनी बड़ी कीमत देकर वैज्ञानिक युग में यदि की जाती है, तो जो समाज वैज्ञानिक युग में प्रवेश न कर सके उन्हें कैसे दोष दे सकते हैं?

छोटे पैमाने की क्रांतियां अक्सर क्रांति मानी ही नहीं जातीं, जबकि पैमाना छोटा होने के कारण उन को नियंत्रित करने के औजार हमारे पास होते हैं इसलिए वे हमेशा अपने प्रयोजन में सफल होती है। स्वतंत्र भारत में आपने कितनी क्रांतियां की हैं और किनको कांति की संज्ञा दे पाए हैं? गांधी ने मशीनीकरण के विरुद्ध एक सुविचारित क्रांति की थी जो प्रतिक्रांति जैसी प्रतीत हो सकती है। इसके बीज हमारे इतिहास में थे। इसके जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र थे, वाहक बंगाल के विप्लववादी थे, परंतु मैं इसे गांधी के साथ इसलिए जोड़ना चाहता हूं कि गांधी के पास इसका पूरा दर्शन था। लेने को तो उन्होंने अपने सारे औजार, अपनी परंपरा से ही लिए थे और मौलिक होने का कोई प्रलोभन उनके मन में कहीं नहीं था।

गांधी का दर्शन स्पष्ट था। जब तक मनुष्य का पेशीय बल प्रयोग में नहीं आता है, और इसके कारण उसे अभाव से गुजरना पड़ता है, तब तक मनुष्य की रोटी छीन कर मशीन को खिलाने, और मनुष्य को भूखा रखने वाली व्यवस्था मानववादी हो ही नहीं सकती। यह कुछ लोगों के कभी तृप्त न होने वाले लोभ को उत्तेजित करके कुछ लोगों के लिए वैभव तो ला सकती है, वंचित समाज का और प्रचुरता से अघाए हुए लोगों का अपमानवीकरण तो करेगी ही।

गांधी आज की सभी समस्याओं का समाधान स्वावलंबन से करना चाहते थे। प्रयोग के बिना उन्हें गलत नहीं कहा जा सकता, परंतु पूंजीवादी विकास के, जिसकी जड़ें भारी उद्योग में हैं, परिणामों को देखने के बाद
यह मानने का प्रलोभन पैदा होता है कि गांधी सही थे। छुआछूत की समस्या का गहरा संबंध क्या उन समुदायों से नहीं है जो श्रम से बचने का प्रयत्न करते रहे हैं और उसके कई तरह के बहाने निकालते रहे। पर्यावरण की समस्या हो, या विश्वशांति की, या पूंजीवादी विस्तार को नियंत्रित करने की, या प्राकृतिक संसाधनों का संयम के साथ उपयोग करने की, जिससे वे बहुत लंबे समय तक हमारे हित में प्रयोग में आ सकें हैं, और सब से ऊपर श्रम के सर्जनात्मक आनंद और आत्मिक उत्फुल्लता का जिसे हम उसी तरह भूल गए हैं जैसे नाव का सहारा लेने वाला तैराकी के आनंद को नहीं समझ पाता। मार्क्स और गांधी में कितनी गहरी
समानता है, मशीनीकरण से उत्पन्न अमानवीकरण के विरुद्ध दोनों कैसे एक ही भाषा में बात करते हैं यह सोच कर आश्चर्य होता है। मार्क्स का दुर्भाग्य है कि वह गांधी से पहले पैदा हो गए । गांधी का दुर्भाग्य है कि विश्व इतिहास में उनको समझने की मेरा रखने वाला अकेला व्यक्ति उनके बाद पैदा नहीं हुआ ।

आत्मावलंबन जनसंख्या के अनियंत्रित विस्फोट का भी उत्तर था। तुम अपनी कमाई से जानो कि तुम कितने बच्चों को पाल सकते हो, उसी के अनुरूप अपनी संतानों की संख्या निश्चित करो।

गांधी मोहम्मद साहब के विलोम हैं। उनसे अधिक जटिल। अधिक दूरदर्शी। मानवतावादी तो अधिक हैं ही। परंतु इतिहास की विडंबना है अपनी सीमित समझ के कारण लोग दूरदर्शी महान नेताओं को समझ नहीं पाते, और तात्कालिक समस्याओं का जज्बाती हल निकालने वाले समाज को कहां से कहां बहा ले जाते हैं ।

हमारी इस चर्चा में गांधी के लिए तो कोई जगह नहीं थी। विचार शृखला में कहां से कहां पहुंच गए और बीच की कई स्थापनाओं को, स्पष्ट करने से रह गए। क्या विडंबना है, इस उम्र तक लिखना नहीं आया और लिखने से बाज नहीं आता। क्षमहिं जे सहहिं प्रवाद।

Post – 2019-04-21

मैने 19 अप्रैल को तुलसी पर एक लाइन लिखी थी, उसे बहुत से मित्रों ने पसन्द किया पर टिप्पणियों से पता चला कि वे तुलसी में कमियां तलाशने वालों को दुष्ट समझते हैं।

मैने यह वाक्य यह याद दिलाने के लिए लिखा था कि उसी तुलसी में उन्हें जो दिखाई देता है, वह आप को दिखाई नहीं देता, जो आप को दिखाई देता है उस पर उनकी नजर नहीं जाती। यह टिप्पणी मैंने अपने पिछले कथन के दृष्टांत के रूप में लिखी थी। तटस्थता की उस मांग को उदाहृत करने के लिए कि दूसरों को कभी उनकी नजर से भी देखें तभी उनके साथ न्याय कर पाएंगे।

जब सरल हिंदी में लिखे वाक्य का अभिप्राय समझने में पूर्वाग्रह के कारण इतनी कठिनाई पैदा होती है तो दूसरों के शास्त्र और धर्मग्रंथ समझने में कितनी कठिनाई होगी?

आप को वह कैसा दिखता है इसे बेझिझक कहें जिससे वे भी चाहें तो अपने को आपकी नजर से देख सकें, (लोग क्या सोचते होंगे इसका ध्यान तो हम रखते ही हैं) पर अपना मन्तव्य कुछ रियायत देते हुए और सम्मान के साथ प्रस्तुत करें। खाट खड़ी करने के इरादे से नहीं।

Post – 2019-04-21

खयालों से आगे खयालों की दुनिया।
मिली भी तो बस आसमानों की दुनिया।।
जमीं पांव रखने को भी मिल न पाई
मिली तोहमतों की बवालों की दुनिया।।
जिसे हम समझते थे अपनी, नहीं है
है जिनकी वे परचम हैं, इंसां नहीं हैं
छिदरते गुजिस्ता जमानों की दुनिया
यही बच रही है बचाने को दुुनिया।।
यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
यह दुनिया अगर मिट भी जाए तो क्या है।

इसे गर्क होने दो, खुद को बचाओ
जलालत से शर्मिंदगी से बचाओ
यही है हमारे ठिकानों की दुनिया
यही रह गई नौनिहालों की दुनिया।
मेरे पास आओ, मेरे साथ आओ।
यही बस है अगले जमानों की दुनिया

Post – 2019-04-21

हम जिन्दगी के साथ थे, पर जिन्दगी को क्या कहें।
हँसते रहे हर चोट पर, इस सादगी को क्या कहें ।।
प्यासे तो सहरा सामने, सपनों तलक में गर्द थी
वह आँच जैसी आँच थी, उस तिश्नगी को क्या कहें ।।
हीरा बनाता पत्थरों को ताप-अन्तर्दाह से
सोचा तो आंखें भर गईं इस बन्दगी को क्या कहें।।
दुख में कमी कुछ रह गई, कुछ और दे, कुछ और दे
मांगा तो कांटे बिछ गए, अपनी खुशी को क्या कहें ।।

Post – 2019-04-19

वस्तुपरकता की अपेक्षा

वस्तुपरकता आत्मासक्ति से मुक्त होकर किसी घटना, क्रिया व्यापार, या वस्तु को देखने और समझने ही जरूरी मांग है। इसका आसान तरीका है अपने को दूसरों की नजर से देखना, और दूसरों को उनकी नजर से देखना। कहने में यह जितना आसान है, व्यवहार में उतना ही कठिन। ऐसा दावा करने वाले, प्रयत्न के बाद भी, इसे पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाते। परंतु वह सीमित लाभ उन्हें दूसरों से बहुत अलग और कुछ हद तक ऊपर उठा हुआ सिद्ध करता है। अपर के विचारों को अपनाकर हम इनके उन पहलुओं को देखने में समर्थ होते हैं जो हमारी नज़र से ओझल रह जाते हैं, कभी तो बार-बार देखते हुए उनको सामान्य रूप में देखने की आदत पड़ जाती है इसलिए, और कभी इसलिए कि अपने राग द्वेष के कारण उन्हें देखने का साहस नहीं जुटा पाते। इन दोनों के मेल से हम यथार्थ को पहले से अधिक अच्छी तरह समझ पाते हैं यद्यपि पूरी तरह समझने के लिए तो युगों का समय भी पर्याप्त नहीं होता असंख्य लोगों की दृष्टि भी पर्याप्त नहीं होती। यथार्थ बहुत जटिल है और इसकी जटिलता इस कारण भी दुर्बोध हो जाती है कि यह स्वयं भी लगातार बदलता रहता है और पहले के अनुभवों से तैयार किए गए हमारे औजारों को व्यर्थ करता रहता है।
यह इतनी घिसी हुई बात है कि इसे पढ़ते हुए आपको ऊब अवश्य हुई होगी, परंतु इसकी याद दिलाना किस लिए जरूरी हुआ, इसे भी आप जानते हैं।

एक व्यक्ति के रूप में मोहम्मद साहब की अनन्यता की स्वीकृति के बाद मेरी यह आलोचना कि वह अरब समाज को सही नेतृत्व प्रदान नहीं कर सके मेरे उस समय के अरब जगत के आकलन और उसकी मुख्य समस्या की मेरी समझ पर निर्भर करता है। अपने समय के दबाव में जो सबसे बड़ी समस्या प्रतीत हुई उसे हम बयान कर आए हैं फिर भी अपने पाठकों को समझाने में संभवत सफल नहीं हुए। अरब जगत में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति प्रदत्त साधनों का घोर अभाव था। उसकी अपनी सुगबुगाहट दूसरों की गतिविधियों से पैदा हुई थी जिनमें रोमनों की भूमिका सबसे प्रधान थी जिनका यूरोप के बाजार पर नियंत्रण था। उनकी अपनी गतिविधियां फीनीशियनों को निष्क्रिय बनाने के बाद तेज हुई थी। भारत के व्यापार की इसमें सबसे निर्णायक भूमिका थी, जिसके चार मार्ग थे दो स्थलमार्,. दो जल और स्थल मार्ग। प्रधान भूमिका फारस की खाड़ी और दजला फरात मार्ग की थी। नाम मात्र का व्यापार उस लंबे मार्ग से होता था जो लाल सागर के द्वारा स्वेज को पार करके भूमध्य सागर से जुड़ता था।

यह मार्ग भी बहुत पुराना था और लाल सागर के दोनों तटों पर कई जनों का दावा था। रोमन साम्राज्य के प्रभुत्वकाल में रोमन ओं का सीधा अधिकार उत्तरी लाल सागर तक ही था। रोमन साम्राज्य के कमजोर पड़ने और पतन के बाद भी रो मनो का हस्तक्षेप किसी न किसी रूप में पश्चिमी अरब की पट्टी पर बना हुआ था। ईसाइयत की प्रचंडता के दौर में यह परोक्ष नियंत्रण ईसाइयों के माध्यम से हुआ करता था। अरब कबीलों की आपसी प्रतिस्पर्धा को पारस्परिक कलह मैं बदलते हुए ईसाई पश्चिमी अरब पर एक प्रबल शक्ति बन चुके थे। ईसाइयत के दबाव की जो बात मैने की थी वह इसी संदर्भ में।

यदि मोहम्मद साहब को यह खतरा सबसे प्रधान मालूम हुआ और उन्होंने एक सिपहसालार की भूमिका अपनाते हुए अरबों को कठोर अनुशासन में संगठित करते हुए एक युगांतरकारी शक्ति में परिवर्तित किया तो यह मामूली उपलब्ध नहीं थी। संभव है जिस तरह के नेतृत्व को मैं आदर्श मानता हूं, उस समय उसकी इतनी अधिक आवश्यकता न रही हो।

मेरी समस्या यह है किसी देश का कोई भी एक नेता अपने समाज को पूरी तरह सही रास्ते पर नहीं ले जाता और उसे कुछ दूर तक ही आगे बढ़ा पाता है। बाद के नेताओं को उन कमियों को दूर करना चाहिए था जो उनमें से प्रत्येक से पैदा होती जाती। विज्ञान की तरह सामाजिक नेतृत्व एक एक कदम आगे बढ़ता है तभी कोई समाज उन्नति के शिखर पर पहुंच पाता है। इसका प्रयास आरंभिक खलीफों ने किया, और इसमें भारत की बहुत सक्रिय भूमिका थी इसका उल्लेख कर आए हैं। वह आगे नहीं चल पाया, और मोहम्मद साहब और कुरान शरीफ को प्रस्थान बिंदु बनाने की जगह, अंतिम उपलब्धि मानकर बार-बार वही लौटा जाता रहा। इसकी सही मीमांसा मुस्लिम बुद्धिजीवी कर सकते हैं, परंतु उनका पराजयबोध मुस्लिम समाज की एक त्रासद समस्या है।

Post – 2019-04-19

कुछ लोगों को तुलसीदास में ब्राह्मणों के महिमागान, शूद्रों और महिलाओं की निंदा, जप, माला, छापा, तिलक के अतिरिक्त कुछ नहीं दीखता। समझने के लिए जिस तरह पढ़ा जाता है, उस तरह पढ़ना वे जरूरी नहीं मानते।

Post – 2019-04-18

तू जिस जबां में सोचता है उस जबां में लिख।
रौशन हो नजर, धुंध छंटे इस अदा से लिख।।

किसी व्यक्ति, समुदाय, समाज या मजहब का अपमान करने के लिए लिखने वाला, उसका अपमान कर पाए या नहीं, एक व्यक्ति के रूप में, लेखक के रूप में, धर्म और समाज के प्रतिनिधि के रूप में अपना और अपने से जुड़ी हुई हर चीज का अपमान अवश्य करता है। यह एक तरह का आत्मघात है। इस बात को समझाने के प्रयत्न अपने लेखों और टिप्पणियों के माध्यम से मैंने अनेक बार किया है।

ऐसा नहीं लगता मेरे पाठक मुझे समझ पाते हैं अन्यथा उनकी प्रतिक्रियाओं में इसका आभास मिलता। मैं कठोरतम सत्य को निर्ममता पूर्वक कहने का दुस्साहस करता हूं। इसे एक जरूरी लेखकीय कार्यभार मानता हूं। परंतु आहत करने के लिए नहीं, शॉक ट्रीटमेंट देने के लिए।

मेरे अनेक सुधी प्रतीत होने वाले पाठकों का स्तर ऐसा है कि वे निर्मम का अर्थ भी न समझ सकें। निर्मम का अर्थ – निः+मम – अपने पराए के भेदभाव से ऊपर उठकर कोई कार्य या कथन, जिसे हम निःसंगता या वस्तुपरकता कहते हैं। ‘अप्रियस्य च सत्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः’ के नियम से निर्मम का अर्थ कठोर हो गया, जो गलत है फिर भी व्यवहार में आता है।

मैंने अपने कल के लेख में मोहम्मद साहब के नेतृत्व की विफलता का प्रधान कारण यह बताया था अपने समाज में विवेक पैदा करने की जगह, उन्होंने भावावेग के तूफान का सहारा लिया।

यह मेरा गढ़ा हुआ आरोप नहीं है, न ही इसमें मोहम्मद साहब के व्यक्तित्व का अवमूल्यन करने का इरादा है।

मैं जानता था महान लोगों के विषय में आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने पर इस तरह की संभावना पैदा हो सकती है, इसलिए आरंभ में ही कहा था कि आज तक के इतिहास में कभी कोई ऐसा नेतृत्व किसी समाज को नहीं मिला, जिसे निर्दोष कहा जा सके जबकि मैंने विभिन्न धर्मों के प्रवर्तकों को भी अपने समाज का नेता और अपने समाज को एक नई दिशा देने वाला व्यक्तित्व माना था।

मोहम्मद साहब के बारे में मैंने उक्त टिप्पणी इसलिए की थी की अरबी में कुरान का सस्वर पाठ सुनते हुए कोई व्यक्ति भले वह अरबी न जानता हो, भावाकुल हो जाता है (यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कहता हूं)। एक काव्य के रूप में कुरान एक अद्भुत रचना है। अपने समाज को सही दिशा देने की दृष्टि से यह बहुत खतरनाक रचना है क्योंकि अपने समाज को सही दिशा और दृष्टि देने की जगह उसे अंधा बना देती, भावाकुल कर देती है।

मेरे इस आरोप को समझने के लिए मैं कुरान के जिस अनुवाद का सहारा लेता हूं, उसकी छोटी सी भूमिका से कुरान का अनुवाद करने वाले विद्वान सैयद अबुल आला मौदूदी की निम्न पंक्तियों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूंः

“इन पृष्ठों में कुरान के भावानुवाद एवं प्रबोधन की कोशिश की गई है ….

“पहली चीज, जो एक शाब्दिक अनुवाद को पढ़ते समय महसूस होती है, वह इबारत की रवानी, वर्णन-शक्ति, भाषा-लालित्य और वाणी का प्रभाव है। कुरान की पंक्तियों के नीचे आदमी को एक प्राणहीन इबारत मिलती है जिसे पढ़ कर न उसकी आत्मा विभोर होती है, न उसके रोंगटे खड़े होते हैं, न उसके नेत्रों से अश्रुधार बहती है, न उसके भाव लोक में कोई तूफ़ान उठता है, न उसे यह महसूस होता है की कोई चीज बुद्धि एवं विचार वशीभूत करती हुई उतरती चली जा रही है।…

“कुरान की वर्णन शैली लेख की नहीं, भाषण की है।

“कुरान मजीद की हर सूरा वास्तव में एक भाषण थी, जो इस्लामी आह्वान के किसी विशेष चरण अवतरित होती थी। इसकी एक विशेष पृष्ठभूमि होती थी। कुछ विशेष परिस्थितियां उसकी मांग करती थीं और कुछ आवश्यकताएं होती थी जिन्हें पूरा करने के लिए वह उतरती थी।”

अब इसी क्रम में आप पूरे कुरान को पढ़ जाएं, छोटी से छोटी बात में, अल्लाह की नजर आप पर है और वह रहीम और करीम तो इसलिए है क्योंकि उसने यह कायनात बनाकर तुम्हें सौंप दी, परंतु उसके बाद कोई रहम नहीं करता। उसकी नजर तुम्हारे हर छोटे बड़े काम पर है, यहां तक कि इस पर भी अपनी पत्नी के पास कब जाते हो, किस रास्ते जाते हो। वह किसी गुनाह को क्षमा नहीं करता।

यह दहशत कुरान के हर पन्ने पर कई रूपों में कई तरह से लगातार पैदा की जाती है। मुस्लिम समाज की चेतना पर छाया हुआ यह आतंक बना रहे इसके लिए एक ऐसे तंत्र का होना जरूरी था जो इसे बार-बार दोहरा कर अपने समाज को सम्मोहन की ऐसी अवस्था में रखे कि जादू से बेअसर होने का दावा करने वाले भी अपने परिवेश के प्रभाव के कारण इसके असर से बाहर न निकल पाएँ।

मामूली से मामूली एतराज के कारण आप गैर मुसलमानों से ही नहीं मुसलमान होने का दावा करने वालों से भी बैर-विरोध ठान सकें इसी व्यवस्था कुरान में ही है,
[कुछ लोग ऐसे भी हैं क्यों कहते हैं कि हम अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान लाते हैं, हालांकि वास्तव में ईमान वाले नहीं हैं। वे अल्लाह और ईमान वालों के साथ धोखेबाजी कर रहे हैं, मगर वास्तव में वे अपने आप को ही धोखे में डाल रहे हैं और इसे जान नहीं पा रहे हैं। उनके दिलों में एक रोग है जिसे अल्लाह में और अधिक बढ़ा दिया और जो झूठ बोलते हैं उनके फलस्वरूप उनके लिए दुखदाई यातना है। जब कभी उनसे कहा गया धरती में बिगाड़ न पैदा करो तो उन्होंने यही कहा कि “ हम तो सुधार करने वाले हैं” – सावधान, वास्तव में यही लोग बिगाड़ पैदा करते हैं। सूरा अल-बक़रा ]

कोष्ठक में उद्धृत अंश पर ध्यान दें पता चल जाएगा अपनी समझ से काम लेने, मामूली से मामूली असहमति या संशोधन का सुझाव रखने, कठोर पाबंदी से तनिक भी विचलित होने को इतना असंभव बना दिया गया है कि यह फैसला करने वाला भी कोई होना चाहिए कौन सही है कौन गलत।

जो यह कहा जाता है इस्लाम में किसी मध्यस्थ की कोई भूमिका नहीं, वह शायद सही नहीं है। सही गलत का निर्णय करने वाला कोई होना चाहिए। अपने आदेश से खलीफा बैठाने का विधान उसी सूरा में है जिसका हम उल्लेख कर आए हैं।

शिया, सुन्नी, अहमदी, और दूसरे जितने भी संभव मत हो सकते हैं अपने को सही मानते हुए दूसरे को बिगाड़ पैदा करने वाला मानते हुए उसे मिटाने की कोशिश करते रहने वाले क्या कभी चैन से रह सकते हैं? जो स्वयं चैन से नहीं रह सकते उनके कारण जो पर्यावरण निर्मित होगा उसमें कोई चैन से रह पाएगा?

मुसलमानों को एक सामाजिक और राजनीतिक शक्ति बनने के लिए, दूसरों का मोहरा बनने से बचने के लिए, एक दूसरे से जुड़ना होगा , जुड़ने के लिए किताब से बाहर आना होगा, और बाहर आने पर केवल एक ही निकष बचा रहेगा कि आज के समय में, आज की परिस्थितियों में, हमारे समाज को क्या करना चाहिए, कैसे रहना चाहिए, और क्या बनना चाहिए?

इसके अभाव में वे संमोहन से बाहर आ ही नहीं सकते और बाहर आ गए तो उनके दोस्त और दुश्मन की परिभाषा बदल जाएगी।

Post – 2019-04-17

#मुस्लिम_समाज और #नेतृत्व_का_संकट -5

एक समाज जिसे प्राण वायु की आवश्यकता उसे तूफान खड़ा करके बचाने का प्रयत्न सही नहीं माना जा सकता। ऐसा तूफान उठाने वाला पराक्रमी हो सकता है, समाज का सही नेतृत्व नहीं कर सकता। वह समझ नहीं सकता कि उसका समाज क्या है, उसकी अंतर्निहित शक्तियां और संभावनाएं क्या हैं। वह अपने समाज का अपनी झक के लिए इस्तेमाल कर सकता है परंतु उसका नेतृत्व नहीं कर सकता।

मेरी समझ से, ईश्वर करें कि यह गलत हो, मोहम्मद साहब अपने समाज के आदर्श नेता नहीं सिद्ध होते। उनकी सामाजिक और आध्यात्मिक क्रांति ईसाइयत के दबाव में एक पैनिक रिएक्शन थी जो अपने समाज को ही ले डूबी। यह असुरक्षा और दहशत से आरंभ होकर दहशतगर्दी को सम्मानजनक बनाने की विश्वास धारा में परिणत हो जाती है।

हम ‘इस्लाम खतरे में’ का नारा मामूली से मामूली उकसावे पर, यहां तक कि अकारण भी सुनने के आदी हैं।

इसका ही संशोधित संस्करण अपने को शिष्ट और विशिष्ट समझने वाले लोगों में देखने में आता है।

वे खुद खतरे की कल्पना करते हैं और उस कल्पना में ‘असुरक्षित अनुभव करने’ लगते हैं। अनुभूति के स्तर पर मनोव्याधियों में ऐसा सुनने में आता है, इसलिए ऐसा दावा करने वाले आदमी की अनुभूति को भी संभव माना जा सकता है।

केवल एक अंतर है। ये अभिव्यक्ति के माध्यमों से जुड़े हुए विशिष्ट जन हैं और उनके सामने कुछ राजनीतिक योजनाएं भी हैं, इसलिए ये अनुभव से अधिक इसका प्रचार करने में विश्वास करते हैं।

हम यह नतीजा निकाल सकते हैं कि इस्लाम खतरे में है, मुसलमान खतरे में है, सेकुलर होने का दावा करने के बावजूद, मुसलमान होने के कारण, कुछ मुसलमान भी खतरे में है, और उनके साथ अपनी गुणकारी सहानुभूति के कारण अपने को सेकुलर बताने वाले हिंदू अपने को इन दोनों से इतने अधिक खतरे में अनुभव करते हैं, कि उनकी गुहार पर भारतीय मुसलमानों को अपने खतरे में होने की याद आती है। यह एक कुचक्र या दुष्चक्र है (vicious circle) है।

दुनिया के किसी दूसरे धर्म या समाज में यह नारा कभी न लगा कि हम या हमारा धर्म संकट में है। हिंदुओं को मध्यकाल में कितनी यातनाओं से गुजरना पड़ा, हिंदू समाज के विविध मतों और संप्रदायों को, उनके संस्थानों, आस्था के प्रतीकों, शिक्षा के केंद्रों, पुस्तकालयों, विद्वानों, ग्रंथों और उत्सवों-समारोहों को किन अत्याचारों को सहना पड़ा, इसकी याद दिलाने वालों को अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के एकाधिकार के युग में अपमानित होना पड़ता है।

ब्रिटिश शासनकाल में स्थिति उतनी विक्षोभकारी भले न रही हो, ब्रिटिश नीति के कारण हिंदुओं को घोर असुरक्षा के वातावरण में रहना पड़ा, परंतु कभी उन्होंने अपने असुरक्षित होने का नारा नहीं लगाया।

स्वतंत्र भारत में कश्मीरी पंडितों को जिस अपमान और जिन यातनाओं से गुजरना पड़ा उसका इतिहास और भूगोल सबको मालूम है, सिवाय मुसलमानों और निरपेक्षता की चादर ओढ़ने वालों के। बांग्लादेश और पाकिस्तान में उनको जिन यातन ओं का शिकार होते हुए शिफर की ओर जाना पड़ रहा है, उसमें उन्हें कभी किसी ने हिंदुत्व संकट में है, नानक पंथ संकट में है, नारा लगाते हुए न सुना न देखा।

उनके विषय में हमारे जानकारों की जानकारी में कमी नहीं है, वे फासिज्म को आने से रोकने के लिए इतनी ताकत लगा रहे थे कि इस ओर ध्यान देने का अवसर ही नहीं मिला, और उसका खतरा इतना जबरदस्त था कि वह इनके रोकने के कारण ही पैदा हुआ, रोकते-रोकते बढ़ता गया, और इतना बढ़ गया कि पूरी ताकत से
आओ प्यारे भाई आओ
इस संकट को दूर भगाओ
स्वयं बचो
और हमें बचाओ
जुट कर, मिलकर जोर लगाओ
जोर लगाओ हइसा।

को कौमी तराने के रूप में स्वीकार करने के बाववजूद, न ताल मिल रहा है, न लय मिल रही है, न यह विश्वास बचा है कि हमसे कुछ हो सकता है । भाग्यवाद, जो होगा देखा जाएगा, संघबद्ध विसंगत दलों का अंतिम भरोसा रह गया है, जिसमें भाग्यचक्र के फेर से प्रधानमंत्री बनने को तैयार बैठी विभूतियों में से कोई भी प्रधानमंत्री बन सकता है। बिल्लियों का भाग्य छींके के टूटने की प्रतीक्षा में है।

परन्तु मैंने वर्तमान राजनीति पर आने के इरादे से यह आलेख तो आरंभ नहीं किया था। यह तो अपनी विचारप्रक्रिया के सामने मेरी अपनी ही पराजय है। कहना मैं यह चाहता था कि पैनिक रिएक्शन होने के कारण मुहम्मद साहब के मन में, कुरान मजीद में, इस्लामी इतिहास में, मुस्लिम समाज में, मुस्लिम समाज के संपर्क में जीने वालों के मन में एक ही चीज समाई दीखती है- दहशत। इस्लाम अरबी नहीं दहशत की जबान बोलता और समझता है और इसके प्रमाण भी कुरान मजीद में दर्ज हैं, भले बहुत सारी जरूरी बातों की अनदेखी करने के आदी लोगों ने उसे देख कर भी दरगुजर कर दिया हो।