Post – 2019-02-19

हमें भी जानना था लोग क्यों बर्बाद होते हैं
हमें भी जानना था इश्क का अंजाम क्या होगा ।।
अजीजों से उलझते , पूछते थे तुम ही बतलाओ
हुए रुस्वा, हुए बेघर, फिर इसके बाद क्या होगा।।
पता यह इत्तफाकन चल गया तंजों से लोगों के
मिटे जिसकी अदा पर वह निहायत बेवफा होगा।।
इसे सच मानकर दो चार डग आगे बढ़े ही थे
कभी सोचा नहीं था आपका ही सामना होगा।।

Post – 2019-02-18

#इतिहास_दुबारा_लिखो
पुराण और सामाजिक इतिहास

वादाखिलाफी ही सही, पुराणों में लिखे सामाजिक इतिहास की चर्चा से पहले यह बताना जरूरी तो है ही कि हम किस पुराण की बात कर रहे हैे।

जिन पुराणों से हम परिचित हैं वे पुराण के विकृत रूप हैं। इनकी भाषा से पता चलता है कि ये बहुत बाद में लिखे गए। जिन पुराणों से हम परिचित हैं वे किसी एक पुराण की नकल हैं इसलिए सभी के कुछ विवरण एक दूसरे से पूरी तरह मिलते हैं। उस सामग्री में अपने सांप्रदायिक आग्रहों के अनुसार काल्पनिक कथाएं भरी गई हैं। कुछ कथाएं ऐसी भी हैं जो ब्राह्मणों के अपने हित के लिए जोड़ ली गई हैं। जोड़-तोड़ करने के लिए पुरानी ज्ञान संपदा को एक ओर तो छोड़ा गया, दूसरी ओर बदलाव किए गए। जिस युग में इन पुराणों का लेखन हुआ उनमें सामाजिक मूल्य बहुत बदल चुके थे। पुराणों के लेखन का उद्देश्य भी बदल चुका था। प्राचीन काल के वे मूल्य या विवरण जो पुराणों के लेखन के समय के मूल्यों के विपरीत या उनसे अनमेल पड़ते थे, उन्हें इनमें स्थान नहीं दिया गया। इसे इतिहासकार संशोधनवाद कहते हैं। इनकी भर्त्सना की जाती है और की जानी चाहिए, परंतु हमारा दुर्भाग्य है कि हमें संशोधनवादी इतिहास ही पढ़ने को मिले हैं।

पुराणों में बाद में जोड़ी गई सामग्री को आसानी से पहचाना जा सकता है। उसे अलग करने के बाद जो सामग्री बची रहती है उसकी अलंकृति को हटाकर निर्वचन किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं किया गया। पश्चिमी आरोपों के दबाव में आकर उनकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने को सही सिद्ध करने के प्रयत्न में हमारे पुराणकारों का परिश्रम व्यर्थ चला गया। उनका ध्यान राजवंशों पर रहा और वे वंशावलियां तलाश करते रहे। वंशावलियां इतिहास नहीं होतीं। इतिहास सामाजिक अनुभव का सार सत्य है जिसमें घटनाओं तक का महत्व नहीं होता। उनको वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में रखकर देखना और समझना होता है।

पुराणों के विषय में यह बात अवश्य की जा सकती है कि उन्हें आज के अर्थ में विश्वकोश बनाने का प्रयत्न किया गया। इसका एक धनात्मक पक्ष है कि भारत में इतने पहले इस बात की चिंता की गई कोई ऐसा ग्रंथ होना चाहिए जिससे हमें पहले की ‘समूचे’ ज्ञान का पता चल सके। परंतु आज की अपेक्षाओं को देखते हुए यह निहायत बचकाना था और अपनी ज्ञान संपदा का परिचय तक नहीं करा सकता था। इसका ऋणात्मक पक्ष यह है कि इसने प्राचीन ज्ञान संपदा का बहुत बड़ा अंश खो दिया या सचेत रूप में नष्ट कर दिया।

जब हम पुराण की बात करते हैं तो प्राचीन ज्ञान की बात करते हैं। पुराण अट्ठारह नहीं हो सकते, ज्ञान अट्ठारह नहीं हो सकता, इतिहास 18 नहीं हो सकता। फिर भी इनकी शाखाएं और अभिव्यक्तियां अट्ठारह सौ रूपों में हो सकती हैं।

मैं उस पुराण की बात करता हूं जिसका उल्लेख ऋग्वेद में आया है, परंतु जिस का पूरा परिचय हमें ऋग्वेद से नहीं मिल सकता। प्राचीनतम माने जाने के बाद भी ऋग्वेद बहुत बाद की रचना है। उससे हम अपने पुराण या इतिहास को नहीं समझ सकते। फिर भी वह जिस जिस पुराण की बात कर रहा है, जिस इतिहास की बात कर रहा है, उसके माध्यम से हम सामाजिक इतिहास, शासकीय इतिहास, और वैचारिक इतिहास के अंतर को समझ सकते हैं।

ऋग्वेद में एक स्थल पर गाथा और पुराण का प्रयोग हुआ है। इसमें गाथा या व्यक्ति केंद्रित आख्यान को ही आधुनिक इतिहास का आदि रूप कहा जा सकता है। इसके पूरक पुराण में सामाजिक अनुभवों के भंडार की ओर संकेत है। ऋग्वेद की एक दूसरी ऋचा है, कि मैंने पितरों से दो परंपराओं का ज्ञान प्राप्त किया है। इनमें से एक सृष्टि और विश्वप्रपंच से संबंधित है और दूसरा मानव से संबंधित है। इनके भीतर ही समस्त ज्ञान समस्त मानसिक ऊहापोह चलता रहता है। इन्हीं की परिधि में हमारे पूर्वजों का इतिहास भी है- द्वे स्रुती अशृण्वं पितृणां अहं, देवानां उत मर्यात्यानां। ताभ्यां इदं विश्वमेजति समेजति। तदन्तरा पितरा मातरा च। इसी को लक्ष्य करके मैने सामाजिक इतिहास और वैचारिक इतिहास का अंतर बताया।

यहां मैं ऋग्वेद में आए पुराण को रेखांकित करते हुए याद दिलाना चाहता हूं कि ऋग्वेद की रचना मैं पौराणिक प्रतीकात्मक ता और आख्यान का उपयोग तो हुआ है पर उसमें पौराणिक सामग्री बहुत कम है। उसकी तुलना में ब्राह्मणों में कथाओं में महीकाव्योंं में और जो बचा रह जाता है वह पुराणों में अधिक पुरानेपन के साथ सुरक्षित रहता है। हम इस बात को दोहराते हैं कि पुराणों में बहुत कुछ मिलावट की गई है इसके बाद भी उनमें उपलब्ध कुछ सामग्री प्चीानतम अवस्था को समझने में सहायक होती है।

सामाजिक इतिहास के मामले में भारत से अधिक सजग दुनिया का कोई देश दिखाई न देगा क्योंकि इसमें आधुनिक इतिहास के बीज भी अधिक विवेक से सुुरक्षित किए गए हैं। गाथा का अर्थ है श्लाघ्य व्यक्तियों का यशोगान। जिस प्रशस्तिलेखन से इतिहास आरंभ हुआ, उसमें राजाओं के लिए स्थान था, परंतु समाज को प्रभावित करने वाले महान पुरुषों के लिए स्थान न था। गाथा में सभी के लिए स्थान था।

जब हम आरंभिक चरणों की बात कर रहे हों तो उन कालों की सीमाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए, यदि आप ऐसा नहीं कर पाते तो आप इतिहासकार नहीं हैं। परंतु मैं तो स्वयं इतिहासकार नहीं हूं, मैं कैसे कह दूं कि जो इतिहासकार माने जाते रहे हैं इतिहासकार थे ही नहीं। वे नोट तैयार करने वाले और उन नोटों को अपने ढंग से पेश करने वाले मुसाहिब थे। फिर भी मुझे यह मानने का अधिकार तो है ही कि उनकी कुर्सी का काठ उनके दिमाग में घर गया था। वे दिमाग से नहीं कुर्सी से काम ले रहे थे और इतिहास का लकड़धोंधों पाठ रहे थे ।

यह अच्छी आदत नहीं है। मैं स्वयं भी यह मानता हूं, कि मेरा तरीका बहुत सही नहीं है। बार बार पुराने लोगों के पूर्वाग्रहों को सामने लाकर अपना पक्ष रख कर, उनसे बड़ा बनने की चेष्टा यदि कहीं है तो यह मेरे कद को छोटा बनाती है। मैं स्वयं नहीं जानता कि मुझ में यह प्रवृत्ति है या नहीं, संदेह होता है कि मेरे प्रयत्न के बाद भी यह बनी रह सकती है इसलिए मेरी आलोचना करते हुए मुझे पढ़ें। परंतु जब हम प्राचीन मूर्तियों को देखते हैं और पाते हैं उनका मुंह तोड़ा गया है और फिर इतिहास पर नजर डालते हैे और पाते हैं इसे प्रयत्नपूर्वक विकृत किया गया है तो दरिंदगी के दोनों रूपों में अभेद दिखाई देता है।

Post – 2019-02-17

#इतिहास_दुबारा_लिखो
इतिहास हाजिर है

इतिहास वर्तमान के लिए जरूरी है, जैसे आपका पांव शरीर को खड़ा रखने के लिए जरूरी है; जैसे आप का मेरुदंड आपके तन कर खड़ा रहने के लिए जरूरी है, जैसे आपकी स्मृति आपको होश हवास में रखने के लिए जरूरी है। जो अपने इतिहास को नष्ट कर देता है वह अपने अतीत का गुलाम हो जाता है। वह अपने ही अतीत के किसी दरबे में पूरे समाज को घेर कर रखने वाले आतताइयों के आगे निरुपाय अनुभव करता है। यह कटु सत्य पोपतांत्रिक ईसाइयत, और उसकी दबोच में छटपटाने वाले यूरोप के विषय में भी सच है और उसके दबाव में, उससे मुक्त होने की कोशिश में, उसका अनुकरण करने वाले इस्लाम के विषय में भी सच है।

यूरोप का नवजागरण उस मोड़ पर होता है जब उसे ईसाइयत से पहले के अपने इतिहास का ज्ञान अरबों के साथ टकराव में लगातार मात खाने और उसका शिष्य बनने के बाद पैदा होता है। आत्मोद्धार का मार्ग शत्रुओं के शिविर से भी निकलता है, परंतु तभी जब आप शिष्य भाव से उसके सम्मुख उपस्थित होते हैं।

पुनर्जागरण का अर्थ है अपने विस्मृत अतीत का याद आ जाना, हम कभी जिंदा थे, और दुबारा जिंदा हो सकते हैं, इसका विश्वास पैदा होना।

ईसाई यूरोप ने जो पाठ अरबों के माध्यम से सीखा था , उसे अरब इस्लाम के प्रभाव में स्वयं भूल गए, कि उनका भी एक इतिहास था, भले वह बद्दुओं का इतिहास न रहा हो।

इतिहास विस्मृत पोपतांत्रिक यूरोप एक अर्धविक्षिप्त भूभाग था। अतीत से जुड़ने के बाद उसने आत्मज्ञान और इस ज्ञान से अपना पुनर्जन्म पाया, आधुनिकता के पथ पर अग्रसर हुआ और अपने इस्लामपूर्व के इतिहास से अपने को जोड़ न पाने के कारण, उससे प्रेरणा न ले पाने के कारण मुस्लिम समाज का आचरण आज भी अर्ध विक्षिप्त सा बना रह गया है। अर्ध विक्षिप्त का अर्थ है, उद्विग्न, बेचैन।

जो कहना था उसके लिए क्या यही भूमिका हो सकती थी? मेरा भी इलाज नहीं। कहना यह था, कि यह आरोप लगाया जाता रहा है कि भारत के पास इतिहास नहीं था। मिल ने तो यह भी जोड़ दिया कि किसी समाज के सभ्य होने का प्रमाण है उसका अपना इतिहास होना। भारत के पास इतिहास था ही नहीं, इसलिए भारत असभ्य था। अब आप यह समझ सकते हैं कि सभ्यता का आरंभ भारत में 1817 में हुआ जब पहली बार जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भारत का इतिहास लिखा। दहशतगर्दी का इतना बड़ा समर्थक और प्रचारक इतिहास में ढूंढे न मिलेगा। उसने एक ही प्रहार से भारत को जो अपने को विश्व सभ्यता का जनक मानता आया था उसे धूल में मिला दिया। असभ्य सिद्ध कर दिया। हमें इस पर आश्चर्य नहीं है, आश्चर्य इस बात पर है कि भारतीय विद्वानों ने उसके इस कथन को न-न-नचु करते हुए स्वीकार भी कर लिया।

हम यह याद दिलाना चाहते हैं कि यूरोप के पास इतिहास का अंतिम पन्ना हाथ आ गया, उसकी किताब में पीछे के पन्ने ही गायब हैं। कृतज्ञता अनुभव करने, स्वीकार करने, और अपने गुरुजनों के प्रति विनय से पेश आने की तमीज तक भूल गया है। सफलता चढ़ न गई होती गुरुजनों के प्रति अदब से पेश आते, और यदि ऐसा नहीं कर सकते तो अपने को सभ्य नहीं कह सकते थे।

मिल के इतिहास में इतिहास वहां से शुरू होता है जहां इतिहास को नष्ट किया गया था, ईसाइयत के आरंभ से। उससे पहले के इतिहास को जानते हुए भी वह उसके प्रति अवज्ञा से पेश आता है, वह रोमन हो या ग्रीक, क्योंकि वे पैगन थे और उनके पास जो कुछ था इसलिए निंदनीय था, क्योंकि वह बहुदेववादी था, ईसाइयत की नजर में गर्हित था, इसलिए वे इतिहासबोध से वंचित थे।

इतिहास अतीतबोध और आत्मबोध का दूसरा नाम है, और इसलिए यह वहां से नहीं आरंभ होगा जहां से सम्राट अपने को अमर बनाने के लिए अपने कीर्तिगान अंकित कराते हैं, जहां से तिथि वार घटनाओं दर्ज किया जाना आरंभ होता है। इस इतिहास ने ही इतिहास निर्माताओं को इतिहास से वंचित कर दिया। यह सभ्यता का इतिहास हो ही नहीं सकता क्योंकि इसमें सभ्यता की नींव का भी पता नहीं है।

घटनाओं का क्रमबद्ध होना लाभकर है। यह कार्य और कारण को, पूर्वापर संबंध को समझने में सहायक होता है, इसलिए इसका उपहास नहीं किया जा सकता, परंतु इससे हमें बहुत छोटे काल खंड का, एक पक्षीय विवरण मिलता है, जिससे समाज ही गायब होता है। इसके पीछे के विवरण तो हासिल हो ही नहीं पाते।

दुनिया में दो तरह की इतिहास देखने में आते हैं। एक लेखन के आविष्कार के बहुत बाद, अपनी महिमा दर्ज कराने के लिए शासकों द्वारा प्रायोजित इतिहास है, दूसरा, वह, जिसके पास लेखन पूर्व के दसियों हजार साल का परंपरालब्ध विवरण है, जिसमें सामाजिक अतीतबोध किसी न किसी रूप में सुरक्षित है, जिसमें लेखन के बाद सैद्धांतिक ज्ञान की विभिन्न शाखाओं का पुरातन संघर्ष सुरक्षित है, और तीसरा जो विचार की परंपरा से जुड़ा हुआ है। भारत में तीनों तरह के इतिहास पुस्तकालयों और संग्रहालयों के विध्वंस के बाद भी बचे रहे हैं। राजाओं का कीर्ति गान और उनका इतिहास निश्चय ही यहां नहीं पाया जाता। मार्क्सवादी इसे इतिहास मानते ही नहीं । लेकिन आश्चर्य होता है कि वे जनता का इतिहास खोजने की जगह उस इतिहास के स्रोतों को ही नकार देते हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो, विशद मानवीय इतिहास बोध उनके पास सुरक्षित रहा है जो किसी क्षेत्र में बहुत प्राचीन काल से बसे हुए हैं, अधूरा उनका जो कहीं अन्यत्र से आकर किसी भूभाग में बसे हुए हैं। पहले का इतिहास 30,000- 40,000 वर्ष का है जिसे वह कल्पनातीत दीर्घता के कारण सृष्टि के आदि से जोड़ कर लाखों वर्षों का इतिहास मानता रहा है।

यह इतिहास उस धूमिल अतीत तक जाता है जब न राजा थे, न मनुष्य का स्थाई निवास। देश के नाम पर एक विचरण क्षेत्र था, इसमें उत्पन्न होने वाले आहार के स्रोतों का उसे ज्ञान था। यह इतिहास तब से आरंभ होता था जब मनुष्य के पास अभिव्यक्ति और संचार के विकसित साधन नहीं थे। अंग चेष्टा से इतर कोई संकेत प्रणाली नहीं थी। इस विशेष स्थिति के कारण, इस इतिहास को:-
(1) सामाजिक इतिहास होना था;
(2) इसको मौखिक परंपरा से हस्तांतरित करना था;
(3) इसकी रक्षा के लिए मौखिक विवरणों को रोचक बनाने की आवश्यकता थी;
(4) रोचकता के लिए अतिरंजना आदि का सहारा लिए जाने के कारण, इतिहास को बचाए रखने के बावजूद उसे विश्वसनीय रूप में बचाया नहीं जा सकता था;
(5) मौखिक परंपरा से सीमित अनुभवों और घटनाओं को ही बचाया जा सकता था;
(6) काल की दीर्घता को देखते हुए, पुराने वृत्तों को बचाने की चिंता के कारण नई घटनाओं को इसमें तभी स्थान मिल सकता था जब वे सामाजिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण हों;
(7) इतिहास का यह अंतरण किसी योजना के अनुसार नहीं था इसलिए अलग-अलग अंचलों में, अलग-अलग समुदायों में भिन्न विरासत के कारण, अधिकाधिक स्रोतों से उपलब्ध जानकारी का स्तर दूसरों की अपेक्षा बहुत ऊंचा हो जाता था;
(8) लेखन का आरंभ होने से पहले तक, सच कहें तो हजारों साल बाद तक, जब लिखित ज्ञान भंडार बहुत सीमित था, ज्ञानी व्यक्ति को बहुपठित नहीं सुश्रुत, बहुश्रुत, श्रुतज्ञ और श्रुतवान कहा जाता था;
(9) इतने विराट इतिहास में अतिरंजना के कारण असाधारण क्षमता वाले नेताओं और राजाओं के सम्मुख व्यक्तियों का, वे शासक ही क्यों न हो, कोई महत्व नहीं था;
(10) राजाओं की तुलना में साधकों और चमत्कारी पुरुषों का महत्व अधिक था जो समाज को नई दिशा देने और बदलने में राजाओं की तुलना में अधिक समर्थ थे और अपना महत्व प्रकट करने के लिए अपने विषय में भी अतिरंजित दावे करते थे;
(11) ऐसे समाज में लेखन के बाद भी गाथाओं और साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से प्राचीन काल में हुए व्यक्तियों के चरित्र का समावेश आरंभ हुआ;
(12) भारत में जो मूल्य प्रणाली विकसित हुई उसमें आत्मप्रदर्शन, दंभ और भौतिक सुख हेय माने जाते रहे, इसलिए राजाओं ने भी अपनी मुद्राओं पर ना तो अपना नाम अंकित कराया, न ही की मूर्तियां स्थापित कीं, न ही प्रशस्तिगान को प्रश्रय दिया, फिर भी उनसे दान दक्षिणा पाने वाले कवि उनका विरुद गान करते रहे और ताम्र पत्रों आदि पर लिखे गए अतिरंजित विरुद मामूली जमीदारों को भी महाराज के रूप में याद कर सकते थे।
जो भी हो हमारी जानकारी के अनुसार भारत अकेला देश है जिसमें सामाजिक इतिहास के अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर उपलब्ध हैं। ये समाधान विकास के विविध चरणों से संबंधित है और इतने विश्वसनीय हैं कि इनका खंडन नहीं किया जा सकता। इनकी और दूसरे चरण की जो सूचनाएं हमें अपने प्राचीन साहित्य में मिलती हैं उनकी चर्चा हम कल करेंगे।

Post – 2019-02-16

नेतृत्व का संकट (2)

मध्यकाल में किसी जन आंदोलन की संभावना नहीं थी। धार्मिक उत्पीड़न, निर्मम आर्थिक दोहन, स्थानीय अधिकारियों की उद्दंडता, न्याय व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार से उत्पन्न आक्रोश अक्सर विक्षोभ का रूप ले लिया करते थे और उनका अधिक क्रूरता से दमन कर दिया जाता था। इसलिए वह कभी जन-आंदोलन का रूप नहीं ले सका।

मध्यकालीन शासक स्वेच्छाचारी थे। वे कुछ भी कर सकते थे और अपने कुकृत्यों पर गर्व भी कर सकते थे। कारण, उन्होंने मुसलमानों के ऊपर कोई अत्याचार नहीं होने दिया। इस्लाम प्रेम और सद्भावना का मजहब है, परंतु यह मुसलमानों तक सीमित रहा है। उसी मजहब में दूसरे धर्म के लोगों के साथ या किसी धर्म को मानने वालों के साथ वे उसी तरह पेश आते थे जिस तरह शिकारी जानवरों के साथ पेश आता है। इसका अपना आनंद था। वे हिंदुओं पर अत्याचार कर रहे थे और ऐसा करते हुए एक पवित्र कार्य कर रहे थे। आधुनिक काल में एक हिटलर पैदा हुआ, मध्यकाल के हिटलर मजहबी पोशाक में ऐसा काम करते थे इसलिए यूरोप में आज तक उनकी पूजा की जाती है और भारत में आज भी वे भेस बदल कर काम कर रहे हैं।

यूरोप के मध्यकाल को अंधकार युग कहा जाता है। वह भारत के मध्य युग से मिलता-जुलता था। अंतर केवल इतना कि यूरोप में पोपतंत्र शासन पर हावी था और अत्याचार सीधे पोप और पादरी करते थे और शासक उनकी सत्ता के आगे निरुपाय अनुभव करता था, या धर्मांधता के कारण, उनकी प्रशंसा पाने के लिए, धर्म विमुख या विधर्मी लोगों के प्रति, स्वयं कभी-कभी उतने ही नृशंस अत्याचार करता था (ब्लडी मेरी)।

भारत में मुल्लों और मौलवियों की नजर में अपने को धर्मरक्षक सिद्ध करने के लिए शासक स्वयं वह जघन्य और अमानुषिक अत्याचार करता था।

अंधकार युग का दूसरा नाम धर्मांध युग है, अंधकार ग्रस्त समाज का दूसरा नाम धर्मांध समाज है। मुस्लिम समाज आज भी अपने अंधकार युग से बाहर नहीं निकल सका और धर्मांधता को गौरवान्वित करता हुआ अंधकार युग की सृष्टि के लिए कृत विकल्प है। उसका नेतृत्व करने वाले आधुनिक मुहावरों में मध्यकालीन इबारतें दोहराते हैं और बुद्धिजीवी उनके सामने सिकुड़ कर केंचुओं मे बदल जाते हैं।

आत्म सम्मान की रक्षा के लिए जितनी निर्भीकता से सानिया मिर्जा ने मुल्लों को मुंहतोड़ जवाब दिया, उतनी निर्भीकता से मुस्लिम समाज के किसी बुद्धिजीवी ने दिया हो, इसकी मुझे याद नहीं। यह याद अवश्य है कि अपने को प्रगतिशील कहने वाले मुसलमानों ने तस्लीमा नसरीन को कभी सम्मान नहीं दिया।

ऐसा नहीं है भारतीय मध्यकाल में सराहना के योग्य कुछ हुआ ही न हो। ऐसा भी नहीं कि यूरोप के मध्यकाल में सराहना के योग्य कुछ हुआ ही न हो। सचाई यह है कि वह तलवार की धार पर चलते हुए संभव हुआ।

भारत में आने वाले यूरोपीय व्यापारी सौ-दो सौ साल पहले अपने मध्य युग से उबर चुके थे। इसलिए उन्होंने जो कुछ किया वह विधि-विधान की मर्यादाओं के सहारे किया। विधि-विधान का सहारा लेकर भी कितने जघन्य अपराध किए जा सकते हैं, इसके उदाहरण अंग्रेजी शासन के दौर में कम न मिलेंगे। फिर भी अपने को न्याय और नियम के अनुसार चलने वाला शासन सिद्ध करने के लिए उनको खुले आम बर्बरता का अधिकार नहीं था जो भारतीय मध्यकाल और यूरोपीय मध्यकाल का नियम था।

उनके इस अभिनय का लाभ हिंदू समाज ने उठाया, परंतु मुस्लिम समुदाय इसका उपयोग नहीं कर पाया।

हंटर के कूटनीतिक कथन पर भरोसा करने के कारण हम स्वयं इस भ्रम में रहे हैं कि अंग्रेजों ने मुसलमानों को सत्ता से वंचित कर के अपना आधिपत्य स्थापित किया था, इसलिए वह मुसलमानों पर विश्वास नहीं करते थे। प्रमाण इस बात के हैं कि वे अपनी सत्ता को निर्विघ्न बनाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों का विश्वास प्राप्त करना चाहते थे।

मुस्लिम समाज अपनी धर्मांधता के कारण अपने मध्य युग से बाहर निकल ही नहीं पाया और उसने विद्रोह भी किया तो सत्ता या आर्थिक विपन्नता के विरुद्ध नहीं, धार्मिकता के आधार पर किया। सैयद अहमद खान बरेलवी का विद्रोह ऐसा ही था। आवेग जनित विद्रोह को मोड़कर उसके अपने लक्ष्यों के विरुद्ध इस्तेमाल करने की कला अंग्रेज जानते थे। अंग्रेजों के विरुद्ध उत्पन्न हुए विद्रोह को उन्होंने किस कला से रणजीत सिंह के विरुद्ध मोड़ दिया और सैयद अहमद खान की अपमान जनक मृत्यु को संभव बनाया इससे हम अनभिज्ञ हैं। इसकी खोज इतिहासकारों को करनी चाहिए।

हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि धर्मांध समुदायों को चालाक लोग उनके इरादों के विरुद्ध इस्तेमाल करते हुए उनका अपना अहित तो कर ही सकते हैं, उनका भला चाहने वालों को भी संकट में डाल सकते हैं। उनके तरीके बहुत परिष्कृत हैं। मध्यकालीन चेतना में इस कारीगरी को समझने की शक्ति नहीं है। मुहावरा पुराना है दाना दुश्मन नादान दोस्त से अधिक अच्छा है और नादान दोस्त अपनाने का प्रयास भारत लंबे समय से कर रहा है। भारत का नाम लेना इस मूर्खता का अपमान करना है, समस्या तो एशिया की है। नेतृत्व का अभाव केवल भारत में नहीं है, अफ्रो-एशियाई जगत में है।

Post – 2019-02-15

मुस्लिम समाज और नेतृत्व का संकट

यह बात शायद कुछ लोगों को ठीक न लगे कि एकेश्वरवादी मजहबों में असहमति की छूट नहीं रही है। फिर भी सही नेतृत्व के लिए स्वतंत्र चिंतन और असहमति का अधिकार आधारभूत शर्तें हैं। असहमति के अधिकार के अभाव के कारण उनमें बौद्धिक वर्ग उत्थान ही न हो सका।

वे अपनी असहमति के लिए जिन तर्कों का सहारा लेंगे उनका क्षीण आभास मुझे है। जिस छोटे से दौर में यह छूट मिली थी, उसकी संक्षिप्त चर्चा हम पहले कर आए हैं। उसमें भारतीय, यूनानी और ईरानी चिंतन को मान्यता देने के कारण वह ऊर्जा पैदा हुई थी जिसने, कुछ समय के लिए, अरब को शिखर बिंदु पर पहुंचा दिया था। परंतु उसमें भी विश्वास केंद्रित प्रश्नों पर असहमति का अधिकार का नहीं।

विश्वास की सीमा में बंद हो कर बौद्धिक करतब दिखाए जा सकते हैं परंतु समाज को आगे ले जाने वाला नेतृत्व पैदा नहीं किया जा सकता। शंकराचार्य पैदा किए जा सकते हैं, अलगजाली (अबू हामिद मुहम्मद इब्न मुहम्मद अल-गज़ाली) पैदा किए जा सकते हैं, तुलसीदास पैदा किए जा सकते हैं, रामानंद और कबीर नहीं पैदा किए जा सकते।

यहां मैं एक छोटा सा अंतर करना चाहूँगा। नेता का काम आगे ले जाना होता है। उसकी तुलना चालक (मोटर) से की जा सकती है और चालक की शक्ति की तुलना गति प्रवर्धक (एक्सीलरेटर) से की जा सकती है।

ऐसे अवसर भी आते हैं, जब आगे बढ़ना खतरनाक हो जाता है, जरूरत ब्रेक की पड़ती है। ऐसे मौकों पर ही हम जानते हैं कि चालक और गति प्रवर्धक जरूरी तो हैं, परंतु उससे भी जरूरी है आगे बढ़ने के लिए अपने को जिंदा रखना, भले वह पीछे लौट कर ही संभव हो पाए। कुछ स्थितियों में रुकना और आत्म रक्षा के लिए पीछे लौटना आँख मूंद कर आगे बढ़ने से भी अधिक जरूरी है। तुलसीदास ऐसे ही व्यक्ति हैं जिनके लिए मेरे मन में बहुत गहन आदर है पर मैं उनको नेता नहीं मान सकता, न ही जान बचाने के बाद उसी स्थिति में पड़े रहने को हितकर। ब्रेक को एक्सीलरेटर तो नहीं कहा जा सकता। यथास्थितिवादी को उद्धारक तो कहा जा सकता है, नेता नहीं कहा जा सकता।

तुलसीदास हमें आगे नहीं ले जाते, एक संकटकालीन स्थिति में हमें उबारते हैं। इसे हम समाज का नियंत्रण तो कह सकते हैं, नेतृत्व नहीं कह सकते। परंतु यह याद रखना होगा कि आगे बढ़ने वाला गलत रास्ता भी अपना सकता है। निर्णायक स्थितियों में कौन सा निर्णय अधिक तर्कसंगत है, यही एकमात्र कसौटी है। इसमें ही हम प्रगति की आकांक्षा और प्रगति के खतरों को समझ सकते हैं, और कुछ समय के लिए यथास्थितिवाद और पश्चवाद की उपयोगी भूमिका को भी स्वीकार कर सकते हैं। हमारी विवशता है कि हम उपयोगिता के आधार पर अग्रगति या नेतृत्व का निर्णय नहीं कर सकते। गलत नतीजों की ओर बढ़ने के बावजूद, प्रगति अगति नहीं हो सकती, प्रतिगमन भी नहीं हो सकती, परंतु सभी स्थितियों में वांछनीय नहीं हो सकती ।

नेता के रूप में मेरे सामने गोरखनाथ, कबीर और भ्रमित नेतृत्व जनित भटकाव से उत्पन्न संकट से उद्धारक के रूप में मेरे सामने तुलसीदास आते हैं। समन्वयकारी के रूप में नानक देव आते हैं। यह बात रोचक है तुलसी कबीर की निंदा करते हैं, गोरखपंथियों की भर्त्सना करते हैं, परंतु नानकपंथ की आलोचना नहीं करते।

जो भी हो मैंने यह स्पष्टीकरण इसलिए दिया यह समझा जा सके कि चिंतक, स्वतंत्र विचारक, उद्धारक और नेता और नेतृत्व से मेरा आशय क्या है।

अरबों में चिंतक हुए, विद्वान हुए, परंतु नेता नहीं हो पाए, क्योंकि वहां मानना जानने से अधिक जरूरी था। जाना हुआ गलत हो सकता था माना हुआ गलत नहीं हो सकता था। इससे जड़ता पैदा होती है, बुद्धि का यांत्रिक करतब सामने आता है, परंतु बुद्धि की भूमिका सामने नहीं आती, जिसका दूसरा नाम नेतृत्व है।

Post – 2019-02-15

यदि कोई आप को आतंकित करना चाहता है तो आप का सही जवाब है कि आप सदमा झेल कर भी आतंकित न हों, घबरायें नहींं, उसे यह कहने का अवसर न दें कि उसने खलबली मचा दी। जिन्हें उसका जवाब देना है उन्हें यह तय करने दें कि अब क्या करना है और उसमें जिस रूप में आपका सहयोग अपेक्षित हो उसके लिए तैयार रहें। जब लंदन पर नाजियों की बमबारी हो रही थी चर्चिल ने कहा लोग अपना काम, नाच गाना तक, इस तरह करें जैसे कुछ हो ही न रहा हो। अपने मनोबल को बनाए रखने और दुश्मन के मंसूबों को तोड़ने का यह सबसे कारगर तरीका है।

Post – 2019-02-14

#इतिहास_दुबारा_लिखो

इस बात को दुहराना जरूरी है कि जो महत्व चिकित्सा में रोग निदान और पुरावृत्त का है, वही समाज की व्याधियों के निराकरण में इतिहास का है।

जिस तरह राग या द्वेषवश रोगनिदान में कोई रियायत या घालमेल नहीं किया जाता, उसी तरह इतिहास की आधार सामग्री में किसी इरादे से अपनी ओर से घालमेल नहीं किया जाना चाहिए।

आधार सामग्री के संकलन, वर्गीकरण, विश्लेषण और निष्कर्ष ग्रहण में वैसी ही तटस्थता बरती जानी चाहिए जैसी रोग निदान में बरती जाती है।

इतिहासबोध आत्मबोध से भी जुड़ा हुआ है। समाज की शिथिल या निष्क्रिय पड़ी शक्तियों को जाग्रत, स्वस्थ और सक्रिय बनाने में इसकी भूमिका लगभग वही होती है जो व्यायाम, मनोरंजन और पोषण की होती है।

इतिहास की गलत व्याख्या से किसी समाज को रुग्ण बनाया जा सकता है, नष्ट किया जा सकता है, उसमें हीनताबोध और श्रेष्ठताग्रंथि पैदा करके उसे गलत रास्तों पर भटकाया जा सकता है।

किसी देश या समाज के शत्रुओं ने, या उसे अपने अधीन रखने वालों ने इसी कारण उसके इतिहास की व्याख्या का अधिकार अपने पास रखने का प्रयत्न किया है और अपने द्वारा गढ़े गए मिथक को प्रामाणिक इतिहास बनाने के सभी संभव तरीकों का प्रयोग किया है।

इनका देसी होना होना या परदेसी होना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह तथ्य कि हम किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए इतिहास को गढ़ रहे हैं, या उसे वस्तुपरक रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

इतिहास के विकृतिजन्य दुष्प्रभावों को दूर करने का एक ही उपाय है – इतिहास का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण।

वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण का अर्थ है निराधार सामग्री को आधार बनाने से बचना; किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए, अपनी ओर से मिलावट करने से बचना और क्षीण आधार पर कोई निर्णायक निष्कर्ष निकालने से बचना। असामान्य प्रतीत होने वाले दावों को सभी दृष्टियों से परखने के बाद ही स्वीकार करना।

हम अपनी सभी विकृतियों के लिए अंग्रेजों को या यूरोपियों को दोष देकर छुट्टी नहीं पा सकते।

सच तो यह है कि उन्होंने भारत में, या कहें, अफ्रीका और एशिया मैं पहुंचकर वहां की विकृतियों को अधिक चतुराई से इस्तेमाल करते हुए उन्हें पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया, इसलिए उनके अपने देश में सामान्य व्यवहार और उन्हीं के औपनिवेशिक देशों में उनके आचरण में भारी अंतर रहा है।

वर्णवादी समाज-व्यवस्था और व्यवहार में सवर्णो द्वारा अवर्ण और हीनवर्ण जनों के प्रति जैसा व्यवहार किया जाता रहा है वैसा ही व्यवहार उन्होंने अपने अधीनस्थ लोगों के साथ करना आरंभ किया।

मुगल काल में जिस क्रूरता से भूराजस्व वसूल किया जाता रहा उससे कुछ अधिक वसूल करने का प्रयत्न उन्होंने किया।

उन पर दोषारोपण करके अपना बचाव करने से पहले हमें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और अब जब वे परिदृश्य से ओझल हो चुके हैं, अपनी विकृतियों के लिए हमें अपनी जिम्मेदारी को अधिक गंभीरता से समझना चाहिए। इसके बाद ही हमें यह अधिकार प्राप्त होता है कि हम उन्हें दोष दे सकें।

भारतीय समाज में हिन्दुओं और मुसलमानों को पश्चिम से या एक दूसरे से लड़ने से पहले अपने आप से लड़ना है। आत्म परिष्कार करने के बाद ही वे उस महिमा का दावा कर सकते हैं, जो न्यायसंगत समाज के निर्माण से उत्पन्न एकनिष्ठता में व्यक्त होती है।

Post – 2019-02-13

जिंदगी अपनी न थी, मौत भी क्यों कर होती
लोग रोते रहे मैं हंसता बला से गुजरा।