Post – 2019-01-09

हम नहीं जानते हैं ऐ हमदम
तेरा कोई कसूर है कि नहीं।
पास इतना कि रगड़ होती है
फिर भी तू मुझसे दूर है कि नहीं।

Post – 2019-01-09

जितने खुदा बना के पूजते थे हम नदीम
उतनी जगह नहीं थी किसी आसमान में।
जिस दर से बढ़ रहे हैं आदमी पर आदमी
उतनी जगह नहीं है हमारे जहान में।

Post – 2019-01-08

बहुबंसे निर्बन्स

ऋग्वेद के जिस सूत्र का उल्लेख हम ऊपर कर आए हैं, उसका एक भोजपुरी संस्करण है – बहु बन्से निर्बन्स। इसका ज्वलंत उदाहरण है मुगल वंश जिसका कोई नामलेवा नहीं रह गया। मध्यकालीन भारत का सबसे चमकीला, रोबीला वंश, जिसे उस दुनिया की बादशाहत का गुमान था, उसका कोई नामलेवा नहीं!

सैकड़ों हजारों की संख्या में पुश्त-दर-पुश्त बसने वाले हरम। कितनी सन्तानें पैदा हुईं? उनका क्या हुआ? इसकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। लखनऊ के नवाब का वंशधर होने का दावा करने वाले हजारों में हैं। उनमें से कुछ कभी तांगा चलाया करते थे, आज भी कुछ करते होंगे। हो सकता है, वजीफे की रकम का धेला पाने के लिए सजते हुए रुपया खर्च करते थे, उन पर दया करते हुए इंदिरा जी ने राजाओं का प्रीवीपर्स बंद करते हुए उनका वजीफा भी बंद कर दिया हो। ऐसा ही हाल टीपू सुल्तान की बच्चों का जो, सुना, रिक्शा चलाया करते हैं। तंगहाली में ही सही, कोई तो होता इस दिल्ली शहर में, जो अपने को मुगल खानदान का उत्तराधिकारी घोषित करता!

जवाब मुश्किल नहीं है। 1857 के दमन में अंग्रेजों ने बर्बरता से मुगल खानदान का ही नहीं दिल्ली के मुसलमानों का भी सफाया करने का प्रयास किया था। वे जीवित रह ही नहीं सकते थे।

हमारे सामने जो प्रश्न है वह यह कि जब मुगल सल्तनत कायम थी, जब बादशाहों की कई तरह की औलादें हुआ करती थीं, जब उनकी कुछ ही बीवियों की संतानों को उनका जायज पुत्र माना जाता था और उनमें सत्ता का संघर्ष होता था, तब उन्हीं के हरम से, उन्हीं की एक रात की सुहागनों और असंख्य रखैलों से पैदा हुई संतानों की नियति क्या होती थी? इसे समझने में इतिहासकार हमारी मदद नहीं कर पाते।

दिल्ली के लोगों का एक मनोरंजन मुग़ल बादशाहों के अंत:पुर की कहानियों को सुनना और सुनाना था । सैकड़ों सुंदरियों से भरे हुए हरम पर बंदिशें जितनी ही लगाई जाएं, कुछ किस्से तो बाहर निकलेंगे ही। परंतु इन शगूफों में भी उन अभागों को शायद ही जगह मिलती हो, जो शाही औलाद होने के दावेदार तो थे, पर जिनकी हालत महल के नौकरों से भी बुरी थी। सवाल खानदानी इज्जत का था। भीतर का सच बाहर न जाने पाए, इसलिए उनको रहने के लिए किले के भीतर एक जेलनुमां घेरा बनाकर बंद कर दिया जाता था, भले उसे जेल न कहा जाता हो। उर्वरता में कोई किसी से कम न था। सूफीमिजाज बहादुर शाह जफर के 31 संतानें थी।

पूरा मुगल वंश लाल किले में ही रहता था। यह कुनबा नाजायज या जायज समझे जाने वालों का था, यह मुश्किल सवाल है, क्योंकि जायज माने वाले जाने वाले लड़कों में से एक बादशाह बनता था, जो दूसरे भाइयों को खत्म कर देता था। यदि जीवित रह भी गया तो अपनी जिंदगी जैसे भी गुजारे उसके वंश का वही हाल होना था जो उपेक्षित लड़कों का। विवाह भी आपस में ही करते रहे होंगे। इनको सलातीन के नाम से जाना जाता था। इनकी दशा क्या थी इसे एक इतिहासकार (विलियम डालरिंपल, दि लास्ट मुगल, 2008) के शब्दों में रखना चाहेंगे :
Life for the senior princes could be extremely comfortable and Zafar’s own children had a fair degree of freedom to live their own lives and follow their own interests and amusements, whether these lay in scholarly and artistic directions, or in hunting, pigeon flying and quail fighting. But the options open for junior salatin or Palace-born princes and princesses could be extremely limited. Besides the senior princes, there were over 2000 poor princes and princesses – and grandchildren, and great grandchildren and great great grandchildren of previous monarchs- most of whom lived a life of poverty in their own walled quarter of the palace, to the southwest of the area occupied by Zafar and his family. This was the darker side of the life of the Red Fort, and its greatest embarrassment; for this reason many of the salatin were never allowed out of the Gates of the Fort, least of all on so ostentatious an occasion as the very public festivities in Daryaganj. according to one British observer:
The salatin quarter consists of an immense high wall so that nothing can overlook it. Within this are numerous mat huts In which these wretched objects live. When the gates were opened there was a rush of miserable half naked, starved beings who surrounded us. Some men apparently nearly 80 years old were almost in a state of nature. (Major George gunningham, quoted in T.G.P. Sapir. The Mughal family and court in 19th century Delhi, journal of Indian history Volume 20, 1941 page 40.

मुगलों ने बादशाहत की, अपने को दुनिया का बादशाह समझते रहे। उनसे नसीहत लेकर अंग्रेज दुनिया के बादशाह बनने की चाह पाल बैठे और एक ऐसा साम्राज्य सचमुच स्थापित किया जिसमें सूरज कभी डूबता नहीं था, और जब डूबा तो भी इस तरह नहीं डूबा की ब्रिटेन कहीं दिखाई ही न दे। यह मुगल थे जो अपने विशाल हरमखानों की छाया में अपना ही सर्वनाश करते रहे और सल्तनत रहते हुए भी जब दूसरे अच्छी भली हालत में थे, वे अपने महल के नौकरों से भी दयनीय थे और कंगाली की दशा में पहुुंच गए थे और अंततः उनका कोई नाम लेवा तक न बचा। बादशाहों ने यतीम पैदा किए, अपनी संतानों को अपने ही भाइयों को, अपने ही कुनबे को, यातनाएं देते रहे। उनके एक हाथ में बादशाहत थी दूसरे हाथ में अपना ही सर्वनाश। 57 के दमन में यदि अंग्रेजों ने उनके पूरे वंश का सफाया कर दिया तो यह उनकी योजना नहीं थी, इसकी पूरी तैयारी मुगलों ने खुद कर रखी थी।

हमें इसका ध्यान नहीं आता यदि एक नई सुगबुगाहट की ओर ध्यान न जाता। यह है मुसलमानों में नितांत गरीबी की स्थिति में रहने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी। ईसाइयों में सुना अविश्वसनीय तरीके अपनाकर कुछ को नितांत विपन्नता में पहुंचाने का प्रयत्न किया जा रहा है। मुसलमानों और ईसाइयों में भी यह दावा कि वर्णव्यवस्था तो उनमें भी है इसलिए उनको भी संरक्षण दिया जाना चाहिए बहुत महत्वपूर्ण। सभी मतों के अपने आधारभूत सिद्धांत होते हैं। भारत में कोई ऐसा मत नहीं है जो वर्ण व्यवस्था का समर्थन करता हो, परंतु एक अर्थव्यवस्था है जिसका प्रवेश समाज व्यवस्था में हो गया है, और इसे केवल हिंदुओं का लक्षण माना जाता है, जिसके लिए सबसे अधिक गालियां ब्राह्मणों को दी जाती हैं और उन्हें दी भी जानी चाहिए, परंतु ब्राह्मणों ने ही इसके विरोध में विद्रोह भी किया है । जो भी हो केवल इस बुराई या लक्षण को हिंदुत्व से जोड़ा जाता है। यदि यह दोष मुसलमानों और ईसाइयों में भी है, तो ऐसे मुसलमानों और ईसाइयों को हिंदू मानना चाहिए, उन्हें हिंदू धर्म, रीतिनीति अपनानी चाहिए और उसके बाद आरक्षण का दावा भी करना चाहिए। इससे पहले नहीं। यह पद-व्याघात है।

ध्यान भले इस कारण आया हो, पर इसका दूसरा पक्ष है कि यह बताया जाता है हिंदू समाज की वर्ण व्यवस्था से प्रताड़ित व्यक्तियों ने इस्लाम या ईसाईयत स्वीकार किया, जब कि सच्चाई यह है कि हमारे पास इसको समझने का कोई भरोसे का जमीनी अध्ययन है ही नहीं, और हम खयालों को हकीकत में बदलने की आदत डाल चुके हैं। मजहब बदल भी जाए तो भी रोटी की समस्या मजहब की समस्या नहीं है । सभी लोग हिंदू धर्म अपना लें और उनकी प्रवृत्ति न बदले, पूरा देश हिंदुओं का देश हो जाए तो क्या समस्या का समाधान होगा।

गरीबी नई चीज नहीं है परंतु वह रफ्तार, जिससे विभिन्न धार्मिक समुदायों में सबसे गरीब तबके में आबादी का अधिक तेजी से विस्तार हुआ है, नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए ।

जो लोग अभागे, गरीब, और आत्मसम्मान के लिए अपनी धार्मिकता पर विश्वास करते हुए मुल्लों की पकड़ में आ जाते हैं जनसंख्या उनसे बढ़वाई जाती है, राजनीतिक लाभ इनको मिलता है। यह एक ऐसी त्रासदी है जिसका बोध सताए हुए लोगों में पैदा तक नहीं किया जा सकता।

Post – 2019-01-06

महालीला

संभव है यह मेरा भ्रम हो कि जिन दिनों दिल्ली दरबार के शायर भाषा को ऐसी बनाना चाहते थे जिसमें एक कहे तो दूसरा समझ जाय, उन्हीं दिनों ऐसे प्रयोग भी हो रहे थे कि या तो लिखने वाला अपने लिखे को स्वयं समझे या कोई समझ ही न सके, क्योंकि निश्चयात्मक ढंग से ऐसा दावा करने के लिए जैसे निर्णायक प्रमाण होने चाहिए वैसे मेरे पास नहीं हैं, यद्यपि पार्श्विक साक्ष्यों का अभाव भी नहीं है।

यह मात्र भाषा से जुड़ा प्रश्न नहीं है, मिजाज से जुड़ा प्रश्न है, इस भावना से जुड़ा प्रश्न है कि आप इस देश और समाज के साथ हैं, या इनसे अपने को ऊपर समझते हैं । आपकी भाषा देश के लोगों के लिए है, या नफीस महफिलों के लिए। विविध कारणों से दिल्ली के नाममात्र के बादशाह और लखनऊ के नवाब जितना मुसलमान रह सकते थे, उतना मुसलमान रहते हुए, जितना हिन्दुस्तानी बन सकते थे, उतना हिन्दुस्तानी बनने का प्रयत्न कर रहे थे। इसी का नतीजा था उस समय जब दिल्ली के बादशाह दूसरों की मर्जी से बनाए जाते थे, हिंदुओं ने भी 1857 बहादुरशाह जफर को बादशाह माना था। विदेशी मूल के मुसलमानों का धार्मिक अलगाव के होते हुए भी देश से जुड़ाव विदेशी शासकों के लिए खतरे की घंटी थी, इसलिए मुसलमानों को साथ लेने के लिए वे उनमें भी इस देश में बाहर से आए हुए विजेता का भाव उभारते हुए ‘पराजितों से ऊपर और अलग’ होने की चेतना को उभारने का प्रयत्न कर रहे थे।

इसी का सुदूर इतिहास में प्रक्षेपण करते हुए अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अपने अधिकारों का क्रमिक विस्तार करने के लिए पूरे देश को एकजुट करने को तत्पर नेतृत्व को हिंदू और फिर हिंदुओं को आर्यों की संतान और आर्यों को स्वयं विदेशी आक्रान्ता और आदिम अवस्था से आगे न बढ़ पाए आटविक जनों को उनसे पहले से बसा, परंतु फिर भी बाहर से आया सिद्ध करने का महाजाल रचते हुए, इसका मूल निवासी निगरों या ठिगने कद के काले जनों को सिद्ध किया जाता रहा (जिनके लिए सुनीति बाबू ने नीग्रोवत (negrito) का प्रयोग किया था और प्रूफ की गलती से नीग्रोबटु हो गया था।) ये केवल अंडमान निकोबार में नाममात्र को बचे रह गए हैं। अंडमान निकोबार, कालापानी का दंड पाए हुए भारतीयों की आबादी के कारण, आज भले भारत का एक भाग है, पर भौगोलिक रूप में यह कभी भारत का हिस्सा रहा ही नहीं। अर्थात् भारत का आदिम निवासी वह है जो यहां है ही नहीं। यहां सदा आक्रमणकारियों का निवास और राज रहा है, इस तर्क से किसी को अंग्रेजी राज्य का विरोध करने का नैतिक अधिकार है ही नहीं।

इस तरह दो कुतर्कजालों को वे एक साथ साथ रचते रहे। इसमें विविध विशेषज्ञताओं के विद्वान और इनके कायल, अपना पाठ तैयार करने, और मंच पर उतरने वाले भारतीयों को हर तरह का संरक्षण, प्रोत्साहन और पहचान देते रहे, जिनमें से एक परदे का काम करता रहा और दूसरे को मंचित किया जाता रहा। परदे के पीछे के परदे एक दूसरे की काट करते थे, और जरूरत के अनुसार कभी-कभी उठा कर उपकथा को दिखा दिया जाता था। यह महालीला हमारी मनोरचना और राजनीतिक सक्रियता को नियंत्रित करती रही; आज भी करती है।

Post – 2019-01-03

भूला हुआ रास्ता

भारत के सामने, और सच कहे तो दक्षिण एशिया के सामने, आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने समय में पहुँचना चाहता है या बीते हुए समय में कहीं न कहीं लौट कर, अपने आप से टकराता, टूटता-बिखरता रहना चाहता है। पश्चिमी देशों से तुलना करने पर लगता है कि उनका पिछड़ा से पिछड़ा देश इक्कीसवीं शताब्दी में जी रहा है, जब कि तीसरी दुनिया के देश उनकी अठारहवीं शताब्दी में भी नहीं पहुंचे हैं और उससे पीछे ले जाने वाली समस्यायें उनके सरोकार के केन्द्र में है।

कुछ भी अकारण नहीं होता। आज की दुनिया, जिसमें प्रचार हथियार से अधिक मारक क्षमता रखता है, बाजार का माल भी हमारी सोच को बदलने में शिक्षा संस्थाओं से अधिक कारगर भूमिका निभाता है, आपका कोई निर्णय केवल आपका निर्णय नहीं होता। हमारे मन में पलने वाले आग्रह और आवेग पूरी तरह हमारे नहीं हैं। उन्हें प्रेरित और उत्तेजित करने वाली ताक़तों के बारे में हम सतर्क तक नहीं रह पाते। चुनौतियाँ जितनी ही बड़ी हों, हमारी स्वतंत्रता को बाधित करने वाली शक्तियाँ जितनी ही प्रबल हों, उनके दबाव से बाहर निकलने का हमारा संकल्प उतना ही दृढ़ हो तो ही हम अपने लिए हितकर दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

कालक्रम की दृष्टि से आगे या पीछे होना, हमेशा प्रगति या पिछड़ेपन का सूचक नहीं होता। अरब की विरासत पर गर्व करने वाला मुस्लिम जगत, अपने मध्यकाल से भी पीछे उस युग में जा चुका है, जिसे वह जाहिलिया कहा करता है, जिसमें फसाद होते रहते थे, पर हार या जीत नहीं होती थी। वह अपने भविष्य के रूप में उस चरण को देखता है जो इस्लाम का आरंभ है । हिंदू समाज पश्चिम की समकक्षता में आने की चुनौती का सामना करना चाहता है और मध्यकाल से बाहर निकलने का प्रयत्न तक नहीं करना चाहता।

हमें यह भ्रम है कि हम अग्रणी देशों द्वारा तैयार नए से नए माल का उपयोग और उपभोग करते हैं, जिनका वे करते हैं, इसलिए हम उनसे नाममात्र को ही पीछे हैं। जब कि यदि किसी भी युक्ति से ऐसे माल के उत्पादन का तरीका सीख कर स्वयं उसका उत्पादन करने तक इससे अपने को रोक रखते तो यह सचमुच उनसे स्पर्धा का सही तरीका होता।

हम इस पिछड़ेपन को पहल, मनोबल, अध्यवसाय, जिजीविषा, और जीवन मूल्यों के मानक पर रख कर देखना चाहते हैं न कि केवल उपभोक्तावादी विलासिता के स्तर की कसौटी पर। आज के भारत के भविष्य पर कब्ज़ा जमाने वाले पतनशील मुगलकालीन रास्ते पर चल रहे हैं। औरंगज़ेब के अवसान काल का चित्रण करते हुए इराली लिखते हैं :
Outwardly, the Mughal Empire still glittered mesmerizingly, but within the golden, jeweled Chrysalis, the flesh was rotting the spirit was dead. The land was desolate, the empire crumbling, it’s economy shattered, its government inefficient, and irredeemably corrupt,… its culture effete, its people broken and spiritless. only the Marathas displayed any vitality. But there was no future with the Marathas either. They could have seized the Imperial scepter: it was theirs to take. But they had no vision. India seemed to be a land where the future had died.
आज की अवस्था से साम्य इतना अधिक है कि एक दो अपवादों के साथ, जहां तहां से संज्ञा बदलने की जरूरत पड़ेगी।

मुगल काल का सब कुछ नकारात्मक नहीं था। शहरीकरण और मुद्रा का चलन बढ़ा था। राज्य विस्तार के साथ मुद्रा का मानकीकरण, माप तोल में सुधार से व्यापार को बढ़ावा मिला था। इससे किसानों को राहत नहीं मिली थी। परंतु इन सब के बावजूद भारत यूरोप से ही नहीं चीन जापान और प्राचीन रत से भी पीछे था। और इसका सबसे दारुण पक्ष नैतिक स्खलन थाः
Most shocking of all was the debasement of the character of man in Mughal India. From the highest amir, indeed from the emperor himself, down to the man in the street there was a near total absence of civic morality and personal integrity. “No one ever says a word to be relied upon,” writes Manucci . “ it is continuously requisite to think the worst and believe the contrary of what is said… They deceive both the acute and the careless.” … Adds Pelsaert, “Everything in the kingdom is uncertain: wealth, position, love, friendship, confidence, everything hangs on a thread.”
Hypocrisy and sycophancy where the characteristic traits of the Indian ruling class. ….The amir probably viewed sycophancy nearly as good manners, a formal courtesy, and had therefore no feelings of personal degradation in being a sycophant, especially as the practice was universal. But sycophancy was not just good manners. Lack of earnestness in speech – using words to dress up and disguise thoughts and feelings – rather than to reveal them led to lack of earnestness in thought and action, corrupted values and perverted both individual characters and social process.

मुगल मौज मस्ती और वैभव प्रदर्शन की पतनशील प्रवृत्ति स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले केवल अमीरों, राजाओं, नवाबों, जमींदारों, में संक्षेप में कहें तो गुलाम मानसिकता के लोगों में बनी हुई थी। कांग्रेस ने, विशेषत: गांधी के प्रवेश के बाद, सचेत या अचेत रूप में, मर्यादावादी हिंदू मूल्यों को अपना आदर्श बनाया था। यह था साध्य की पवित्रता के साथ, साधन या तरीके की पवित्रता का निर्वाह। नफीस विदेशी माल की जगह स्वदेशी का उत्पादन और उपभोग। यह एक किसान की स्वाभिमानी सोच है जो अपने रूखे सूखे उत्पाद की जगह बाजार से उम्दा किस्म के चावल आदि खरीदने को अपनी तौहीन समझता था। इसे राष्ट्रवादी सोच भी कह सकते हैं और चाहें तो प्राचीन भारतीय दृष्टि भी कह सकते हैं।

इसकी ओर, इस प्रसंग में, इराली ने ही ध्यान दिलाया है। उसने मध्यकाल की भारत की तुलना यूरोप के अंधकार युग से की है:
The jungle itself of course antedated the Mughals. It in fact antedated even the establishment of the first Muslim Empire in India at the end of the twelfth century for then the Dark Ages in India, which roughly coincided with a similar epoch in Europe, were already some 500 years old.

इससे बाहर निकलने की कोशिश अकबर ने अवश्य की थी, पर यह कोशिश उनके शासनकाल में विलंब से आया और उनके बाद ही समाप्त हो गया। अकबर का सच्चा उत्तराधिकारी दारा शिकोह था और ‘यदि’ के लिए इतिहास में जगह होती तो भारत का उससे बाद का इतिहास क्या होता, इसकी जुगाली की जा सकती थी। नहीं है, इसलिए जो सचमुच था और जिसे हमने मध्यकाल में खो दिया और जो पश्चिमी जगत में भी नहीं था, जिसे उसने भारतीय जीवनमूल्यों से परिचय के बाद आत्मसात करके अपना कायाकल्प किया, उसकी ओर ध्यान अवश्य दे सकते हैं।

उनकी आगे की टिप्पणी इस संदर्भ में रोचक हैः
The decline of India’s position relative to the rest of the civilized world, especially Europe is reflected in the contrasting perceptions of travelers in ancient and medieval India. Some 2000 years before Mughal times Megasthenes, the Greek envoy in the Mauryan Court, said of Indian character: “ truth and virtue they hold alike in esteem.” seven hundred years after Megasthenes, Fa Hsien, A Chinese Traveler add about the same thing to say of Indians as did Hsuan Tsang In the seventh century, who wrote: “ they do not practice deceit, and they keep their sworn obligations … they will not take anything wrongfully, and they yield more than fairness requires.

These are no doubt sweeping generalizations, expressions of sentiment rather than statement of fact – and this is equally true of the blanket condemnations of Mughal India by European travelers. Yet undeniably they contain substantial elements of truth.
Abraham Eraly, The Mughal Throne, 2004, pp. 517-21.

गांधी उन्हीं स्रोतों अपनी शक्ति ग्रहण करते थे जिन्हें मध्यकाल में ध्वस्त कर दिया गया। मध्यकालीन जीवन मूल्य मुग़लों की देन नहीं थे, मध्य एशियाई बर्बरता की देन थे, जिनमें हिंसा, छल, फरेब, विश्वासघात, रिश्वत, वादाखिलाफी, सब कुछ जायज था, क्योंकि सही और गलत का फैसला सफलता से तय होता था। दारा शिकोह को पराजित करने के लिए औरंगज़ेब द्वारा ईश्वर की और मुहम्मद की कसम खाते हुए, सहयोग के लिए मुराद को लिखा गया संधि पत्र और उसके बाद उसके साथ किया गया सलूक, इसका कुछ आभास दे सकता है। इसकी अंतिम पंक्तियाँ देना ही पर्याप्त होगा:
As soon as the idolater is routed out and the bramble of his tumult has been weeded out of the garden of the empire – in which work your help and comradeship is necessary – I shall without the least delay give you leave to this territory. As to the truth of this desire I take God and the prophet as witness.

अन्यथा कुछ मामलों में औरंगज़ेब गांधी जैसी सादगी का परिचय देता है।

इस्लाम से केवल सादगी और भाईचारा ग्रहण किया जा सकता है जो हिंदुओं के लिए भी उतना ही जरूरी है जितना मुसलमानों के लिए। प्राचीन भारत से जीवनमूल्य जो मुसलमानों के लिए भी उतना ही जरूरी है जितना हिंदुओं के लिए। इनका किसी धर्म से कोई संबंध नही। ईसाई होते हुए भी पश्चिम ने इसे अपनाया, हम अपने ही घर का रास्ता भूल गए। यह एशियाई जरूरत है।

सामुदायिक सौहार्द की तात्कालिक आवश्यकता है मुगलकालीन खुमार से मुक्ति। इसी में सामाजिक सौहार्द की संभावना भी छिपी है। अभी तक राजनीतिक दल अपने स्वार्थ साधन के लिए मुसलमानों की चापलूसी करते हुए उनकी सामाजिक विकृतियों का समर्थन करते हुए, प्रतिगामी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रहे हैं और उसी के समानान्तर हिंदुओं में मध्यकालीनता को उत्तेजित किया जा रहा है। दोनों राष्ट्र के लिए अहितकर हैं।

Post – 2019-01-01

खयालों में समूचा आसमां है पर जमीं गायब

(यह लेख माला भारतीय मुसलमान पर है। इसके लिए मुस्लिम समाज की बात प्रायः आती है। इसका उद्देश्य उन तत्वों की पहचान करना है जिन्होंने एक समुदाय के रूप में मुस्लिम चेतना को प्रभावित किया है।)

हम सभी में बहुत सी बातें दूसरों से अलग होती हैं। इनसे हमारा व्यक्तित्व (indiduality) निर्धारित होता है। निजी विशेषताओं में प्रेरणा का हाथ होता है जिसके कारण हम अपने परिवार, पड़ोस या समाज के व्यक्तियों की अपेक्षा दूसरे देशों, कालों, या संस्कृतियों के कतिपय लोगों से अधिक निकटता अनुभव कर सकते हैं, जबकि हमारे बीच कुछ बातें ऐसी हो सकती हैं जो अपने परिवार,समुदाय, समाज या मजहबी लोगों से मेल खाती हों, और इस मामले में हम दूसरे परिवारों समुदायों या समाजों से हम अलग पड़ते हों।

ऐसा इसलिए होता है कि हम अपने संपर्क विस्तार के साथ इन विविध संस्थाओं का प्रभाव ग्रहण करते हैं। हमारा इतिहास यदि दूसरों के इतिहास से अलग है, तो हमारे प्रेरणा के स्रोत उन लोगों से मिलेंगे जो उसे अपना इतिहास मानते हैं। यह इतिहास भी अपने व्यापक रूप में विश्व इतिहास और संकुचित रूप में वंश परंपरा तक आ सकता है और हम सचेत हों या नहीं, परंतु हमारे ज्ञान के अनुरूप सभी स्तरों पर हमें बदलता है।

इतिहास से भी अधिक गहरा असर पुराणकथाओं और पौराणिक चरित्रों, यहां तक कि काल्पनिक चरित्रों का होता है। इतिहास वह नहीं है जो किसी समय का सच रहा है, अपितु वह है जिसे हम सही मानते हैं और इसलिए हमारे निजी और सामूहिक चरित्र के निर्माण में मिथकों की भूमिका अधिक प्रधान होती है।

समान इतिहास होते हुए भी धर्म और विश्वास के कारण हम अपने इतिहास को नकार देते हैं। सभी धर्मों के लोग अपने इतिहास में उसके प्रवर्तक से पहले के इतिहास को अपना इतिहास नहीं मानते, या उसमें रुचि नहीं रखते। उसकी जानकारी होती है तो उसकी व्याख्या भिन्न रूप में करते हैं।

इस तरह व्यक्तित्व, पारिवारिकता, कुलीनता ( कुल-परंपरा), जातीयता, और राष्ट्रीयता के अनेक समान लक्षणों वाले समावर्ती कुलक और संकुल बनते हैं। ये हमारे चित्त के आवर्त हैं।

इनका एक अन्य रूप दिक् से अर्थात् भौगोलिकता से निर्मित होता है। यह ग्राम, जनपद, अंचल, प्रदेश, देश, और महादेश के रूप में पहचाना जाता है, और इसके साथ भी गुणों दोषों को जोड़ लिया जाता है। यह विशिष्टों की पहचान पर निर्भर नहीं करता, समग्र के औसत पर निर्भर करता है ।

इन सभी आवर्तों और चक्रों में कुछ यांत्रिकता रहेगी इसे मानने के बावजूद, इनके महत्व को कम नहीं किया जा सकता। यह दोष सभी वैज्ञानिक वर्गीकरणों में होता है।

भारत से बाहर के देशों में आज भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के निवासी हिंदी हैं, उसके बाद या तो हिंदू हैं, या मुसलमान। मुसलमान हैं तो उनसे कुछ नियमों का कठोरता से पालन करने की मांग की जाती है।

यूरोपीय देशों के लिए यह सीमा और फैल जाती है। एशिया के निवासी जो पीछे रह गए हैं, एशियाई रूप में पहचाने जाते हैं, उसके बाद देश और धर्म भी आता है, अन्यथा कुछ देशों में भारतीयों को वीजा की छूट न होती और कुछ में हिंदुओं के लिए जो छूट है, उसे मुसलमानों के लिए अधिक कठोर न किया जाता।

यह हमारा सामाजिक यथार्थ है। जो इसे नहीं मानता, नहीं जानता, और सब कुछ एक जैसा, सभी भले, सभी बुरे, सभी ऐसे-वैसे के रूप में सोचता है वह अपने यथार्थ से कटा हुआ मनोरोगी है, भले यह मनोरोग सदाशयता के कारण हो। सच तो यह है कि अपने अतिरेकी रूप में सदाशयता और प्रेम अपने विरोधी दुर्गुणों से अधिक खतरनाक हो जाते हैं, और यह भी मनोव्याधि ही माने जाते हैं। जो इसे नहीं समझते, और सदायतावश बचकानी बातें करते हैं, उन्हें अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए, कि ‘वयस्कता के बाद के बाद भी मेरा भावात्मक विकास क्यों नहीं हो रहा है?’

मुस्लिम समाज को शिक्षित, प्रेरित और नियंत्रित करने वाले चार तत्व रहे हैं-

पहला, उनकी किताब, जिसके सामने पड़ने पर दूसरे सारे ग्रंथ, ग्रंथागार, शिक्षा संस्थान, यहां तक की विज्ञान तक व्यर्थ हो जाता है।

दूसरा, धर्म गुरु या मुल्ला, जिसने किताब की व्याख्या करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रख रखा है और जिसके बल पर वह मध्यकालीन जहालत में बादशाहों तक को गुलाम बनाता आया है। वह अपना अधिकार छोड़ नहीं सकता। आधुनिक बनने के लिए, अपने दिमाग से काम लेने के लिए, उससे पंगा ले कर ही दूसरे मुसलमान उससे अपना दिमाग और अपनी समझ वापस पा सकते हैं। आदमी बनने के लिए सबसे पहले उन्हें अपनी गुलामी की बेड़ियों को पहचानना, उनको तोड़ना और अपनी आंतरिक स्वतंत्रता प्राप्त करनी होगी।

तीसरे, राजनीतिक नेता, जो उन्हें दहशत में रखते आए हैं और आज भी यही कर रहे हैं। भारत में अल्पसंख्यता के असंख्य रूप हैं, जिनकी अपनी समस्याएं हैं। वे अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करते हैं, जब तक वे सुलझ नहीं जातीं, अपना असंतोष व्यक्त करते हैं। संघर्ष इसलिए करते हैं, क्योंकि वे देश में थे, इसे अपना मानते हैं, इससे भाग नहीं सकते, इसलिए यहीं रह कर अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा। दुर्गति में रहते हुए भी वे निरंतर दहशत और असुरक्षा में नहीं रहते। यह भावना केवल मुस्लिम नेतृत्व ने पैदा की है। उसने लड़ने की जगह भागकर जान बचाने का रास्ता चुना, जो भाग नहीं सकते थे उनको उनके रहम और करम पर छोड़ कर जिनसे वे असुरक्षित अनुभव करते थे। विभाजन इसी भगोड़ेपन की अभिव्यक्ति थी। नेतृत्व ऐसा मिला जिसने अपने घर में ही आग लगा दी, अलग घर बसाने के लिए। यह उसका रईस तबका नहीं था, वे अपनी जमीन जागीर छोड़कर भागने के लिए तैयार नहीं थे। यह धर्मांतरित कामकाजी मुसलमानों का तबका भी नहीं था जिनमें से अधिकांश को यह समझ भी नहीं थी कि राजनीति होती क्या है। यह मोहम्मद इकबाल के प्रभाव में आंदोलित शिक्षित मुस्लिम मध्य वर्ग था जिसने अपनी सही भूमिका का निर्वाह नहीं किया, लोगों को गुमराह किया, भाग खड़ा हुआ, पर दूसरों को उसी जले हुए घर में रहने के लिए मजबूर किया ।

चौथा है, इतिहास और जीवन शैली। इन्हीं के प्रभाव के कारण पूरे समुदाय का व्यवहार दूसरे समुदायों से अलग होता है। सामान्य जनों की जीवन शैली को उस समाज का भद्र वर्ग प्रभावित करता है (यत् यत् आचरति श्रेष्ठ: तत् एव इतरे जना:, स यत् प्रमाणं कुरुते लोक: तत् अनुवर्तते), जो स्वयं राजाओं की जीवन शैली से प्रभावित होता है। इस पर अंकुश केवल आर्थिक सीमाएं लगाती हैं। आकांक्षा में गरीब आदमी भी अपने बच्चे को राजा या राजकुमार बनाना चाहता है और अपने अतिथि को सोने की थाली में जेवना परोसना चाहता है। सूखी रोटी खिलाते समय भी 64 प्रकार के व्यंजनों की बात करता है।

इन विविध कारणों से हम जिस सामाजिक यथार्थ का सामना करते हैं उसे अपने शब्दों में न रखकर एक इतिहासकार के शब्दों में रखना चाहेंगे और उसी के माध्यम से आज की कुछ विडंबनाओं को भी सामने लाना चाहेंगे। परंतु पाठकों के धैर्य का ध्यान रखते हुए यहां हम उसका केवल एक अंश देंगे और एक अन्य पोस्ट में उसके दूसरे निष्कर्षों को प्रस्तुत करना चाहेंगे।
What the Mughals were, was what the rich and powerful everywhere in India aspired to be. In customs and manners, dress and cuisine, architecture and gardening, Language and literature, art and music and dance, the standards of excellence for a long time thereafter would be Mughlai….

What changed was lifestyle, not life, and that too only of a minuscule elite…There was no transmutation of civilization. Behind the Mughal facade, lay the immense body of Hindu culture ancient and torpid, but still breathing. The Hindu world did not change under Muslim influence, nor did the Muslim world change under Hindu influence, despite their 600-odd-year coexistence…

लेखक को यह भी बताना चाहिए था, कि मुस्लिम अभिजात वर्ग आज तक मुगल काल में जीवित रहा, मुग़लों के संपर्क में आने वाले दूसरे जन अकबर के उत्तरकालीन सर्वजन समावेशी मानसिकता से अभिभूत होने के कारण, चेतना के स्तर पर बहुत पहले से ही धर्मनिरपेक्ष थे, जिससे मुसलमानों को चिढ़ थी, जब कि वे अपनी धर्मनिरपेक्षता के बावजूद उन मुसलमानों से ब्राह्मणों की अपेक्षा अधिक निकटता अनुभव करते रहे क्योंकि अपने जातिभेद और अस्पृश्यता के कारण परंपरावादी हिंदू उन्हें परंपरावादी मुसलमानों से अधिक पिछड़ा प्रतीत होता था, जो एक सच्चाई भी है, और इससे हिंदुओं को और ब्राह्मणों को स्वयं भी शिक्षा लेनी चाहिए थी। मध्यकालीन ब्राह्मण दुनिया का सबसे पिछड़ा हुआ व्यक्ति है जो अपनी परंपरा से भी कटा हुआ है और अपने आप से भी। तीन कनौजिया 13 चूल्हा का मुहावरा मध्यकालीन भारत की उपज है।

Post – 2018-12-31

मैं सच को नहीं तुझको बार बार देखता
अपनी खुदी को तू जो एकबार देखता
तू क्या था, क्या बना है, कभी यह तो सोचता
हम थे जो नहीं, क्यों बने ऐ यार देखता।।

Post – 2018-12-31

अच्छे बच्चे अच्छी बातें सोचते हैं।
अच्छे बच्चे सिखाई हुई बाते दुहराते हैं।
अच्छे बच्चे बुरी चीजों पर नजर नहीं डालते।
अच्छे बच्चे मेरा लिखा समझ नहीं पाते । इसमें अच्छी नहीं सच्ची बातें होती हैं।

Post – 2018-12-30

चले कहां को, देखिए तो कहां ठहरे हैं

(मैं चाहता था सांप्रदायिक भेदभाव के बीच सबके लिए सम्मानजनक जीवन निर्वाह का क्या आधार हो सकता है, इस पर विचार करूँ। अपनी बात समझाने के क्रम में फैलाव ऐसा हो गया कि बीच में ही रुक जाना पड़ा और जो शीर्षक चुना था उसे भी बदल कर इस रूप में रखना पड़ा, जिस रूप में आप इसे ऊपर देख रहे हैं।)

कांग्रेस ने जिस राष्ट्रवाद को अपनाया था, वह पश्चिमी राष्ट्रवाद नहीं था। उसकी जड़ें भारतीय जन-मानस में थीं। अनेक भाषाओं, अनेक राज्यों और राजाओं, खानपान की अनेक रीतियों, अनेक धर्मों, विश्वासों, परंपराओं, दर्शनों के बावजूद हिमालय से कन्याकुमारी तक एक देश की कल्पना और इससे गहरे जुड़ाव की भावना पश्चिमी जनों और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को चकित करती हैं। एक अनपढ़ भारतीय को यह इतनी वास्तविक लगती है कि वह इस बात पर चकित होता है कि कोई इसे अविश्वसनीय मान सकता है।

एकता की यह भावना, आजीवन अपने गांव जवार में ही सिमटे रह जाने वाले अनपढ़ या मात्र साक्षर में कैसे पैदा हुई, इसे दोनों में से कोई नहीं जानता। पहले को जानने की जरूरत नहीं, जो प्रत्यक्ष है, वह है। इस पर इतना सर क्यों खपाना? दूसरे को जानने की जरूरत तो है, परंतु वह सभ्यता के निर्माणकाल को इतनी छोटी सीमा में रखकर देखना चाहता है कि इस रहस्य को समझ ही नहीं सकता। पश्चिमी कूटनीतिज्ञों को यह एकता माया, या आभासी लगती रही है और वे इसे रेत का ऐसा ढूह समझते रहे हैं जो तेज हवा से बिखर सकता है। यही मानकर वे अपनी कूटनीति करते रहे।

उनके इतिहासकारों को भी यह पता नहीं था कि कितने अंधड़ और तूफान सहने के बाद भी यह ज्यों का त्यों बना हुआ है। अपनी आशा के विपरीत वे पाते रहे हैं कि आपसी रगड़-झगड़ के बाद भी बाहरी आघात होने के क्षणों में यह एक महाशक्ति के रूप में तन कर खड़ा हो जाता है; कुछ न कर पाने की दशा में आहत अनुभव करता है। चोट कहीं लगे, दर्द की अनुभूति तेज कहीं भी हो, इसकी चेतना और सिहरन पूरी काया में अनुभव की जाती है।

इसका रहस्य क्या है, इसे न तो पश्चिमी विद्वान समझ सके, न भारतीय राजनीतिज्ञ। उन्होंने इसे विविधता में एकता की कामचलाऊ संज्ञा दी । यह संज्ञा सर्वप्रथम रिजले ने दी थी, जिसे भारतीय पंडित दुहराते रहे, परंतु यह समझने का प्रयास नहीं किया कि भारत में ही विविधता में यह एकता कैसे स्थापित हो पाई। अन्य देशों की विविधताओं के बीच ऐसी एकता क्यों नहीं स्थापित हुई?

यदि अपनी कल्पना शक्ति का सर्जनात्मक उपयोग करते, तो यह समझ जाते की इस्लाम के विस्तार के साथ, पूरे ईसाई जगत में ऐसी ही एकात्मता की अनुभूति पैदा हुई थी। यह सच है भारत में मजहब की वह एकता भी नहीं थी। यहां तो एक ही घर में एक वैष्णव और दूसरा शाक्त हो सकता था, एक हिंदू और दूसरा जैन हो सकता था, एक परिवार हिंदू और उसका बड़ा बेटा सिख हो सकता था। क्या यह देव समाज की साझी विरासत थी? इस पर किसी ने गौर नहीं किया। इसके साथ फिर वही समस्या सामने आ जाती थी कि यह साझा कैसे पैदा हुआ?

इसे हम उस आदिम अवस्था मैं लौट कर ही समझ सकते हैं जब भारतवर्ष में विचरने वाले समुदाय पर्वतीय और समुद्री बाधाओं के भीतर आहार और शिकार के लिए पूरे क्षेत्र में विचरण करते और प्राकृतिक उत्पादों की प्रचुरता के दिनों में किन्हीं क्षेत्रों में, आसानी से पहचाने जा सकने वाले, निश्चित स्थानों पर – नदी के संगम, उद्गम, मुहाने या किसी विशाल सरोवर के निकट, या समुद्र तट पर विशिष्ट पहचान वाले स्थलों पर समागम किया करते थे। यही आगे चलकर तीर्थ स्थानों के रूप में समादृत हुए। मोटे तौर पर पूरा देश उनका परिक्रमा क्षेत्र था। इसकी नदियों पहाड़ों को छोड़कर भूभाग की अलग पहचान न थी।

इसी का परिणाम है, सभी भाषाओं में, किसी न किसी रूप में, दूसरे सभी के तत्वों का पाया जाना।

मैं इस बात को कुछ स्पष्ट कर दूँ।

संस्कृत में, ‘एक’ के लिए, ‘एक’ का प्रयोग होता है। बहुत पहले, इसके लिए ‘ऊन’ का प्रयोग होता था। इससे पहले उनका ‘ऊ’ प्रयोग दूर के लिए, बड़े के लिए, व्यापक के लिए प्रयुक्त होता था। और इसके ठीक विपरीत ‘ई’ का प्रयोग. निकट के लिए, यहां के लिए लघु के लिए होता था। ‘ऊन’ का अर्थ था ऊ-न, वह जो व्यापक नहीं है, बड़ा नहीं है, अर्थात् छोटा है और इसी तरह से यह संख्याओं में सबसे छोटी संख्या ‘एक’ के लिए प्रयोग में आता था।

काफी विश्वास के साथ यह बात करने के बाद भी यह निवेदन करना बाकी रह जाता है कि मैं स्वयं यह नहीं कह सकता कि यह स्वर ‘ऊ’ था या ‘ओ’ । ‘ऊ’ में ‘न’ जुड़ने के बाद ‘ऊन’ बना जो यूनुस, यूनिट, यूनियन आदि में बचा हुआ है या ‘ओ’ में ‘न’ जुड़ने के बाद ‘ओन’ जो अंग्रेजी के ‘वन’, तमिल से ‘ओन्र’ में बचा हुआ है, या ‘ओ’ में ‘म’ जुड़ने के बाद ‘ओम’ में जिसका उच्चारण अ+ऊ+म के संपृक्त उच्चारण, अर्थात् एक अक्षर के रूप में, ‘ऊँ’ के रूप में होता था – ‘ओम इत्येकाक्षरं विद्धि’।

इसी से एक ओर ‘ऊन’, दूसरी ओर ‘ओं’, तीसरी ओर ओन्र और चौथी ओर ‘ओन’ (onorous, onimid) रूढ़ हुए। अर्थ सबका एक ही, एक, अनन्य, सर्वोपरि, और सबसे छोटा। सबसे छोटा इसलिए कि तब तक (0) की कल्पना नहीं हुई थी। कम और सबसे छोटा का अर्थ एक ही था।

एक दूसरा शब्द है, पद, जिस के इतिहास में हम नहीं जाना चाहेंगे। पर इतना बताना जरूरी है कि इसका एक अर्थ सर्वोपरि, सबसे बड़ा, हुआ करता था जो गीता के ‘पदवी कवीनां’ और हमारे व्यवहार के ‘पद’ और ‘पदवी’ मे बचा हुआ है।

गणना के आदिम चरणों पर सबसे बड़ी संख्या के रूप में कभी ‘त्री’ का प्रयोग हुआ, फिर ‘चार’ का प्रयोग हुआ, फिर ‘पांच’ का प्रयोग हुआ, फिर ‘सस्’ / ‘षष्ट’ का प्रयोग हुआ, फिर ‘सत्त/ सप्त’ का प्रयोग हुआ, फिर आठ/ ‘अष्ट’ का प्रयोग हुआ और अंतत: ‘*तस/दस’ का प्रयोग हुआ। 8 और 10 के बीच इससे काम नहीं चल रहा था, इसलिए संस्कृत में ‘नौ/नव’ का प्रयोग हुआ जिस का अर्थ था नया यद्यपि या 10 की संकल्पना के बाद पैदा हुआ था। हम इनके विस्तार में नहीं जाएंगे, पर यह याद दिलाना चाहेंगे कि पद अर्थात् 10, इसी का द्योतक है।

अब तमिल के ओन्बदु (ऊन+पदु) = नव और संस्कृत के/हिंदी के भी ऊनविंशति/ उन्नीस और इसी क्रम में ऊपर की संख्याओं पर ध्यान दें तो शब्द विकास और अर्थविकास की अंतर्धारा को समझ पाएंगे जो आर्य और द्रविड़ दोनों में प्रवाहित है। इसी से हम उस अंतःसूत्र को पहचान सकते हैं जिससे भारतीयता का निर्माण हुआ है।

इसी क्रम में वे जीवन मूल्य विकसित हुए थे जिन्हें हम भारतीय मूल्य-प्रणाली का अंग कह सकते हैं। अन्य भिन्नताओं के होते हुए यही वे सर्वनिष्ठ सांस्कृतिक सूत्र रहे हैं जो पृथक दीखने वाले मनकों को एक में भी पिरोते हुए वैजयंती माला को अदृश्य रूप में भारतीयों के गले का हार बनाए रहे और जिनसे इसे यह शक्ति मिली कि वह अपने से भिन्न मूल्यों, मानो, रीतियों और विश्वासों का सम्मान कर सके। भारत की राष्ट्रीयता की आत्मा यही है। बाद में, स्थायी बस्ती बसने के बाद विकास के एक स्तर पर अलग अलग संवर्तों की सृष्टि हुई और उनके निवासी अपने अपने आवर्त से बाहर जाना अनिष्टकर मानने लगे।

आर्यावर्त का निवासी यदि तीर्थ को छोड़कर किसी अन्य प्रयोजन से उससे बाहर जाता है तो भ्रष्ट हो जाता है, परंतु यदि वहां से उसका कोई संबंध ही नहीं था, तो उसके तीर्थ उन क्षेत्रों में कैसे पड़ गए? यही वह सूत्र है जो हमे इतिहास की सुदूरतम अवस्था तक ले जाता है।

इसे आप हिंदुत्व कह सकते हैं, भारतीयता कह सकते हैं, और यह समझ सकते हैं कि अपनी ओर से किसी को अपना बनाए बिना समय-समय पर किसी भी रूप में आने वालों को यह कैसे आत्मसात करता रहा है। केवल इस्लाम को जिसके जन्म के साथ ही युयुत्सा और गृहकलह जुड़ा हुआ है, जो किसी का न हुआ, एक ही ग्रंथ में विश्वास रखने वालों को भी जोड़ कर नहीं रख सकता, उसके भारत में आने से यह प्रक्रिया बाधित हुई तो हैरानी की बात नहीं।

Post – 2018-12-29

देश, धर्म और राष्ट्र

आप मुसलमानों के साथ प्रेम से नहीं रह सकते। मित्र बनकर भी नहीं रह सकते। वह अपनी सदाशयता दिखाते हुए मनोवैज्ञानिक रूप से आप पर हावी होने का, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी रुचि के अनुसार आप को ढालने का प्रयत्न करेगा। यदि दो हैं तो एक को दब कर रहना या दबाकर रखना ही पड़ेगा। यदि प्रकृति में भिन्नता है तो दो या अधिक, बराबरी पर नहीं रह सकते। ऐसा करते हैं, तो नुकसान में रहेंगे। यह मेरा कहना नहीं है। मुसलमानों में वे लोग जिन्होंने अपने समाज को दिशा दी उनका कहना है:
It is necessary that one of them should conquer the other and thrust it down. To hope that both could remain equal is to desire the impossible and the inconceivable. (सर सैयद. मेरठ, 1888)

.. if the Muslims want to live in this country, they must understand religion to be a merely private affair which should be confined to individuals alone. Politically they should not regard themselves as a separate nation: they should rather lose themselves in the majority. इकबाल. पू., 305

“Hindus and Muslims belong to two different religious philosophies, social customs and literary traditions. They neither intermarry nor eat together, and indeed they belong to two different civilisations which are based mainly on conflicting ideas and conceptions.” ( जिन्ना. लाहौर, 1940)

मोहम्मद अली जिन्ना ने एक दूसरे अवसर पर यह भी कहा था कि “हिंदुओं के नायक हमारे खलनायक हैं और हमारे नायक उनके खलनायक।” यह मात्र लफ्फाजी नहीं है, कठोर सच है। इसे आज भी काम करते देख सकते हैं। पहल भले ही किसी ने की हो, पर्दे के पीछे प्राम्प्ट करने वाला कौन था, यह जानते हुए भी, इस सचाई को मुस्लिम नेताओं ने ही नहीं माना, हिंदू नेताओं – भाई परमानंद, सावरकर, गोलवलकर – ने भी इसे स्वीकार किया।

अंग्रेजी कूटनीतिज्ञों की चाल को भांपते हुए इस जाल से निकलने और आपसी भाईचारा कायम करने की वकालत करने वालों को पाखंडी, कांइया और अविश्वसनीय ठहराया जाता रहा।

दोनों की दृष्टि में अंतर यह नहीं था इनमें से कोई हिंदू और मुसलमान के भेद को नहीं मानता था या उनकी निजता का सम्मान नहीं करता था। परंतु दार्शनिक समझे जाने वाले शब्दजीवी अपने ही समुदाय को गुमराह करने के लिए, वाक्यों को तोड़-मरोड़ कर यही समझा रहे थे:
The Maulana has not realised that by offering his interpretation he has put before the Muslims two wrong and dangerous views. First, that the Muslims as a nation can be other than what they are as a millat. Secondly, because as a nation they happen to be Indian, they should, leaving aside their faith, lose their identity in the nationality of other Indian nations or in “Indianism”. It is merely quibbling on the words qaum and millat. इकबाल,305
****
He (Nehru) thinks wrongly in my opinion, that the only way to Indian Nationalism lies in a total suppression of the cultural entities of the country through the inter-action of which India can evolve a rich and enduring culture. वही, 215

अंतर केवल यह था की एक का मानना था कि मजहबी और सांस्कृतिक भिन्नताएं होते हुए भी साथ साथ रहा जा सकता है। जबकि दूसरे कहते थे ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि वे मजहब को राजनीति से अलग नहीं कर सकते।
…the majority community in this country and its leaders are every day persuading the Indian Muslims to adopt, viz. that religion and politics are entirely separate, and if the Muslims want to live in this country, they must understand religion to be a merely private affair which should be confined to individuals alone. Politically they should not regard themselves as a separate nation: they should rather lose themselves in the majority.

व्यक्तित्व को मिटा कर, मतों को मिटा कर एक करने और झुंड में बदल जाने का आग्रह स्वयं इकबाल करते है:
1. मिटा दे अपनी हस्ती को अगर तू मर्तबा चाहे।
2. तू बचा बचा के न रख इसे तेरा आईना है वह आईना।
कि शिकस्ता हो ताे अजीजतर है निगाहे आईनासाज में।।
3.The second evil from which the Muslims of India are suffering is that the community is fast losing what is called the herd instinct. पू. 27
अपने ही समाज को भीड़ में बदलने वालों से उसका क्या भला हो सकता है?

वास्तविकता यह है कि जो मुस्लिम नेता अलगाव की बात पर अडे़ थे वे भी इस सच्चाई को अस्वीकार नहीं कर सकते थे कि दोनों का एक साथ रहना संभव है। उदाहरण के लिए सर सैयद अहमद दो कौमों की बात करते हुए, केवल अपनी कौम की तरक्की की बात सोचते थे। जिस रईस वर्ग की चिंता उनको थी, वह अपनी जमीन जायदाद छोड़ कर किसी पराए देश में जाने को तैयार नहीं हो सकता था, इसलिए उसके लिए देश को बांट कर रहना कल्पनातीत था। मुस्लिम लीग ऐसे ही रईसों के हित की चिंता करते हुए स्थापित हुई थी इसलिए उसकी कार्य योजना में भी बंटवारे की बात नहीं आ सकती थी। चिंता अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के कारण अवश्य थी। जब मोहम्मद इकबाल भारतीय संघ में ही मुस्लिम बहुल राज्यों को स्वायत्तता देने की बात करते थे, तो उसमें यह निहित था कि वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं को उसी तरह की असुविधा का सामना करना पड़ेगा, जिसका अंदेशा उन्हें अविभाजित देश में था, और शेष हिंदुस्तान में अल्पसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों को बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ रहना ही था।

जिन्ना ने पाकिस्तान बनने के बाद अपने भाषण में जब कहा था, आप सभी यहां स्वतंत्र हैं। जिस को मंदिर जाना है वह मंदिर जाए, जिसे मस्जिद जाना है मस्जिद में जाए। किसी पर कोई रोक नहीं है। अर्थात् हिंदू मुसलमान एक साथ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक होने के बाद भी शांति और सम्मान से रह सकते हैं। इसलिए यह दावा ही मूर्खतापूर्ण था कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, या हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। ऐसी दशा में विभाजन के लिए जिद पालने वाले सिरफिरे लोग थे, यह भी उन्होंने ही सिद्ध किया।

उनके ही प्रयोग से यह सिद्ध हुआ कि मुसलमानों के बहुमत के बाद, किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति ही नहीं, दूसरे मत का मुसलमान भी शांति और सम्मान से नहीं रह सकता। दूसरी भाषा बोलने वाला शांति से नहीं रह सकता। मुस्लिम समाज में, अंत:कलह की प्रवृत्ति इसकी बुनियाद में ही पड़ी हुई है, इसलिए अल्पसंख्यक होते हुए भी, वह केवल मुसलमान के होने के कारण एक राष्ट्र नहीं हो सकता।

इसके विपरीत हिंदुस्तानी होने के कारण, सभी मिलकर अपने भेदभाव को दरकिनार करते हुए, राष्ट्र के रूप में संगठित हो सकते हैं और पूरी स्वतंत्रता के साथ, ससम्मान रह सकते हैं , उसी प्रयोग से सिद्ध हुआ। केवल कांग्रेस के साथ जुड़ा हुआ राष्ट्रीय विशेषण राष्ट्रीयता का सूचक हो सकता था, और उन संकीर्णताओं से भी मुक्त रह सकता था, जो धर्म या नस्ल की एकता को आधार बनाने के कारण यूरोपीय राष्ट्रवाद में अपरिहार्य हो जाती हैं। मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्रवाद, दोनों राष्ट्र विरोधी संकल्पनाएं हैं और इसलिए सच्ची राष्ट्रीयता हासिल करने में बाधक हैं।

राष्ट्रीयता एक नई संकल्पना है, परंतु यह भावना अनंत काल से चलती आ रही है। इसको पूंजीवाद ने अपने लिए सबसे सस्ती दर पर, अधिकतम निष्ठा के साथ, अपनी प्रतिभा, शक्ति, यहां तक कि जीवन समर्पित करते हुए काम करने के लिए काम में लाया । इसका जातक ही कुटिलता पूर्ण था और इसकी परिणति भी पूंजीवादी, विस्तारवादी, साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की प्रतिस्पर्धा के कारण विध्वंसकारी रही।

इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करके किसी देश की बिखरी हुई ऊर्जा को एकजुट करते हुए उच्चतम संभावनाओं और लक्ष्यों को प्राप्त करने में लगाई जाए। कांग्रेस के नाम के साथ राष्ट्रीय शब्द जुड़ा हुआ था, परंतु वह शिक्षित मध्यवर्ग की लालसाओं की पूर्ति के लिए प्रयोग में लाया जा रहा था और यद्यपि इसने स्वतंत्रता को भी अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लिया था, पर बिखरी शक्तियों को जोड़ने का और इसे एक जनआंदोलन में बदलने का काम गांधी ने ही किया। भारत में राष्ट्र की चेतना पैदा करने वाले को, राष्ट्रपिता की संज्ञा देने वाला उसके लिए सही शब्द का प्रयोग कर रहा था। शायद इसका प्रयोग सुभाष चंद्र बोस ने किया था जैसे महात्मा का विरुद गुरुदेव ने दिया था। राष्ट्र की गलत समझ रखने वालों ने तो उन्हें केवल गालियां दी हैं, वे मुस्लिम राष्ट्रवादी हों, या हिंदू राष्ट्रवादी। संकीर्णता विराटता को नहीं समेट सकती।

राष्ट्रीयता किसी भूभाग में बिखरे हुए शक्ति पुंजको जोड़ती है, बिखराव पैदा नहीं करती। अलगाव और बिखराव पैदा करने वाले, शक्तिपुंजों को किसी लक्ष्य की सिद्धि के लिए एकाग्र करती है । यह लक्ष्य ऐसा होता है जिससे सभी को किसी न किसी रूप में राहत मिलती है, या सभी किसी दूसरे रूप में लाभान्वित होते हैं। यही उन्हें उस त्याग और बलिदान के लिए मानसिक रूप में तैयार करता है।

भारत के सामने लक्ष्य था विदेशी दासता से मुक्ति, जिससे सबका लाभ था, क्योंकि इसके कारण ही कारीगरों और मजदूरों को कामकाज और लाभ के अवसर से वंचित होना पड़ा था। इसके कारण ही मुसलमानों को दुर्गति का सामना करना पड़ा था और हिंदुओं को धार्मिक आधार पर पहले के भेदभाव से मुक्ति तो मिली थी, परंतु पूरे देश का आर्थिक दोहन हो रहा है इसकी समझ केवल उनके पास थी। इसे न समझ पाने के कारण तात्कालिक लाभ के लिए चिरकाल तक अंग्रेजों का गुलाम बने रहने का विकल्प चुनने वाले भावातुर मूर्ख थे, यह कहना सही तो होगा पर इसके परिणाम सही नहीं होंगे।

राष्ट्रीयता का आधार मजहब नहीं हो सकता। यदि होता तो पूरा यूरोप एक राष्ट्र होता। भाषा नहीं हो सकती। होती तो ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया एक राष्ट्र होते। एक शासन तो हो ही नहीं सकता , अन्यथा ब्रिटिश साम्राज्य का एक राष्ट्र होता।

विकलन पद्धति से, जो ही वैज्ञानिक पद्धति है, हम अंततः जिस एक तत्व पर पहुंचते हैं, वह है देश। यह देश की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है, अपितु ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति है जिससे तात्कालिक रूप में सभी को किसी न किसी रूप में लाभ होगा और बाकी समस्याएं साधनों के अपने हाथ में आ जाने के बाद अधिक आसानी से सलटा सकेंगे। अपनी समस्याओं का हल दुश्मनों के हाथ में सौंपना उनके हाथ का खिलौना बनना है। गांधी की यह समझ थी और इस कसौटी पर गांधी सही सिद्ध हुए।

धार्मिक भावनाएं भड़का कर, भावना को दिमाग समझने वाले बुनियादी समस्याओं और अनुषंगिक समस्याओं के बीच भेद करने की योग्यता नहीं रखते थे। उन्होंने राष्ट्रीयता के सबसे महत्वपूर्ण घटक देश को ही दिमाग से ओझल कर दिया। जिनके पास, ठोस जमीन थी, वे होश हवास खो कर हवा में किले बनाने लगे:
मुस्लिम हैें हम वतन है सारा जहां हमारा।
और मुस्लिम देशों में भी उनको हिंदी के रूप में पहचाना जाता है। हिंदी थे तुम वतन था हिंदोस्तां तुम्हारा। आखिर दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश आज भी हिंदुस्तान ही है जिसे तुम्हारे विश्वासघात के कारण हिंदुस्थान कहने वालों से तुम्हें डर लगता है।