Post – 2017-04-25

देववाणी (१5)

पूर्वाग्रह

मैं जो लिखता हूँ उसे कितने लोग पढ़ते हैं? क्या उतने लोग भी मुझसे पूरी तरह सहमत हो पाते हैं? जो सहमत होते हैं वे अपने कथन या लेखन में क्या उसे उसी साहस और विश्वास के साथ रख पाते हैं? ठीक उसी समस्या पर पहले से बानी राय को पूरी दृढ़ता से माननेवालों की संख्या के अनुपात में यह नकिंचन (नैनो) गणना में आता है? यह बोध हमें एक और नम्र बनाता है और दूसरी अधिक दृढ, क्योंकि नकिंचनता भी शून्य से असंख्य गुना अधिक होती है।

इससे यह जिम्मेदारी भी पैदा होती है की जिसे हम दो टूक प्रमाणित कर आये हैं उसे भी कुछ दूसरे तरीकों से अपने मित्रों के ज्ञान और विश्वास का अंग बनायें।

जानने के बाद भी पूरा विश्वास न जम पाने के कई कारण हैं:
एक तो है हमारे असाधारण मेधा के भाषाविदों की मान्यता, उनका काम आज के कम्प्यूटर युग में भी अविश्वसनीय मेधा की देन प्रतीत होता है। फिर उनकी किसी मान्यता को तनिक भी डिगा पाना और वह भी एक ऐसे व्यक्ति द्वारा जो खुद भी अपने को भाषावैज्ञानिक न मानता हो, प्रामाणिक लगने पर भी विश्वसनीय नहीं लगता। बात केवल संस्कृत के एक मनीषी की नहीं संस्कृत और प्राकृत के सभी पंडितों द्वारा यह माना जाता रहा है कि वैदिक की संतान संस्कृत है जिसकी संतान प्राकृते हैं और उनसे अपभ्र्रंश पैदा हुई और उससे हमारी बोलियां।

तीसरा कारण तो बिलकुल साफ दिखाई देता है की बोलियों में ऐसे शब्द भरे पड़े हैं जो अपने संस्कृत सम तत्सम रूपों के तद्भव या बिगड़े हुए रूप हैं।

अंतिम कारण यह कि आधुनिक काल में तुलनात्मक भाषाविज्ञान की समस्या इस जानकारी से पैदा हुई कि संस्कृत के संख्यावाचक से लेकर सर्वनाम, संज्ञा और क्रियारूप सभी यूरोप की भाषाओँ से इतने मिलते हैं कि यूरोप की भाषाएं और देवशास्त्र संस्कृत से लिए गए प्रतीत होते हैं. प्रवाह की दिशा इतनी स्पष्ट थी कि जैसा मैक्समूलर मैक्डनल्ड आदि अनेक अध्येताओं ने कहा था, हम भारत में उन्हें जन्मलेते, विकसित होते अपने शुद्ध रूप में देखते हैं जब कि पश्चिम में उनके प्रतिरूपों में इनका ह्रास और विद्रूप दिखाई देता है।

इसलिए उनकी सबसे बड़ी समस्या गोरीजाति की आन और सोलहवीं शताब्दी से उपजी श्रेष्ठता ग्रंथि की रक्षा के लिए इसकी आदिम अवस्था को खीँच तान कर भारत से बाहर किसी ऐसे क्षेत्र में ले जाने की थी जहॉ के निवासी काले न हों. ग्रीक और लैटिन की तुलना तो बाद की चीज़ है. रंग सबसे अधिक हावी था इसलिए नॉर्डिक नैन नक्श की चर्चा पहले आरम्भ हुई।

फिर जब रोमांस भाषाओँ का अध्ययन आरम्भ हुआ तो पता चला की लैटिन के पूर्व रूप तो इसकी बोलियों में हैं।. अब एक नया और बहुत जोरदार तर्क हाथ आया की यदि भारत के वैयाकरणों के अनुसार संस्कृत यहां की प्राचीनतम भाषा है और भारत की दूसरी भाषाएं संस्कृत में विकृति आने से पैदा हुई हैं तो संस्कृत के निर्माण की प्रक्रिया कहीं और घटित हुई होगी जहां से यह अपने परिपक्व चरण के बाद भारत में पहुंची होगी।

जितनी निष्ठां से अधिकांश यूरोपीय भाषाशास्त्रियों ने सामग्री जुटाई और नियमों और अपवादों के तुक ताल बैठाते रहे उसमें हमें नहीं लगता की वे जान बूझ कर फर्जी साक्ष्य तैयार कर रहे थे, अपने हित या गरिमा के अनुकूल पड़ने वाले विचारों को हम क्षीणतम सम्भवना या संदिग्ध साक्ष्य पर भी मान लेते हैं और अधिक बारीकी से परीक्षा नहीं करते, इसीलिए हम मानते हैं कि जिस सद्विश्वास के शिकार संस्कृत के वैयाकरण बने थे उसी के शिकार पश्चिमी भाषाविज्ञानी भी बने।

इतिहास और पुरातत्व और नयी वैदिक अधीति ने उस तस्वीर को उलट दिया। और अब भाषा शास्त्रीय विवेचन को फिर उसी ज़मीं से आरम्भ करना होगा। भाषाशास्त्र में हमारे सारे अध्य्यन उसी अवधारणा के तहत किये गए हैं। नामवर जी का रामविलास जी से कुछ विरोध इस कारण भी रहा हो सकता है कि वह शुक्ल जी को द्विवेदी जी से बड़ा आलोचक मानते थे जो गुनाह मैं भी करता हूँ, पर असली कारण जिसे वह खुल कर कह नहीं सकते थे, यह था कि अपभ्रंश पर नामवर जी का काम भी अन्य सभी लोगों की तरह उसी ज्ञानव्यवस्था में किया गया था. नामवर जी का अपभ्रंश पर संस्कृत जैसा ही अधिकार है। मैंने उन्हें अपभ्रंश पढ़ते न सुना होता तो विश्वास नहीं कर सकता था। उनका यह शोध भी उस परिदृश्य में बहुत माने रखता है पर भ्रामक अवधारणाओं के दबाव में किए गए काम सचाई सामने आने पर स्वप्न में किए गए काम की तरह व्यर्थ हो जाते हैं।

अब हम एक उदाहरण से झूठ, अर्धसत्य और सत्य को समझते हुए इस पूरे उलझाव का निराकरण करने का प्रयत्न करेंगे। विज्ञान ऋग्वेद में जजान, जज्ञान, संज्ञान आदि रूपों में प्रयुक्त हुआ है। उदाहरण के लिए आग के लिए एक प्रयोग है – सद्यः जज्ञानः हव्यः बभूथ । 10-6-७ इसका अर्थ है (हे अग्नि ) तुम जन्म लेते ही हव्य हो गए. हव्य का अर्थ विषयांतर के डर से नहीं करूंगा, परन्तु जज्ञान का यहां अर्थ जनन (जन्म लेते ही ) से है न कि ज्ञान से। यही स्थिति तो नहीं, पर मिलती जुलती स्थिति दूसरे प्रयोगों के साथ है। उनसे यह लगता है कि यह जानने के क्रिया या विशेषण के रूप में प्रयोग हो रहा है न कि भाववाचक संज्ञा के रूप में।

ऐसा एक ही प्रयोग है जो दशवें मेंडल के इकहत्तरवें सूक्त के देवता अर्थात वर्ण्यविषय के रूप में है। हम जानते हैं कि सूक्तों के ऋषि और देवता का निर्धारण उस संपादक ने ऋचाओं की रचना के हजार दो हजार साल बाद किया था इसलिए यह नहीं सोच सकते कि ऋग्वेद के रचना काल में भाववाचक संज्ञा के रूप में ज्ञान का विकास हो चुका था। संस्कृत में यह प्रचलित है। प्राकृत में यह नाण हो जाता है और बोलियों में यह स्वतंत्र नहीं मिलता पर अनाड़ी में मिलता है.

हम इस भ्रम के शिकार हो सकते हैं कि बोलियों में संस्कृत के प्रयोग प्राकृत के माध्यम से आए। ऐसा ही भ्रम हम अपभ्रंश के संन्दर्भ में भी पाल सकते हैं। पर ध्यान इस बात पर देना होगा कि संस्कृत का ज्ञान भोज. में नाण से ग्यान कैंसे बन गया। अब एक दूसरी समस्या यह कि संस्कृत का ज्ञान अधिक पुराना है या भोज. का ग्यान । यह उलझालने वाला सवाल है। पर इसके भीतर भी एक रहस्य छिपा हो सकता है इसकी पड़ताल तो करनी ही होगी। इसे निम्न रूप में बयान कर सकते हैं:
1- हमे यह न भूलना होगा कि जब हम देववाणी को बनचर भाषा से उठी अवस्था की भाषा मानते हैं तो उसमें भाववाचक ही नहीं जातिवाचक शब्दों का भी अभाव रहा होगा। बौद्धिक विकास निम्नतम से कुछ ही ऊपर रहा होगा। ऐसे में यदि ज्ञान के लिए उसकी भाषा में शब्द न रहा हो तो उसने अमूर्त संकल्पनाओं के लिए शब्द अपनी पहुंच के साधनों से अपनी ध्वनिमाला के अनुरूप ढालते हुए ही लिए होंगे। ऐसी स्थिति में ज्ञान शब्द और उसका भाववाचक आशय उसमे सीधे संस्कृत से या प्राकृत के माध्यम से आ सकता था। परन्तु यदि यह प्राकृत के माध्यम से उसकी ध्वनि व्यवस्था में ढलकर नाड़ रूप में आया तो ग्यान कैसे पहुंचा?
२- दूसरा सवाल जब जातिवाचक और भाववाचक संज्ञाएँ नहीं थीं तो इनको प्राथमिक अवस्थाओं में कोई समुदाय किस युक्ति से बोधगम्य बनाता था? इसका उत्तर बहुत महत्व का है पर इसे हम कल समझने का प्रयास करेंगे।

Post – 2017-04-25

अब जरा इस सक/सुख की ध्वनि से निकले शब्द भंडार पर विचार करें :
सुख/चुक – १. पानी, २. सुख, ३. चोका= धारोष्ण दुग्ध पान , २>४- सौख्य > ५. फा. शौक / शौक़ीन, ६- सोखना > ७- सूखना>८. सं. शुष्क, ६>९. शोषण / शोषित /शोषक, १०. चोषण, ११. चूसना, १२. चस्का, १३. सु- (उपसर्ग) १४. सु-तर (सुंदर),> १५. सुधर /सुधार, १६. सं.(धातु) चूष पाने, १७. शुष शोषणे.
हमने अपनी सीमा के कारण यूरोपीय प्रतिरूपों को छोड़ दिया. ऊपर के आंकड़ों पर ध्यान दें तो धातुओं से ये शब्द नहीं निकल रहे हैं. धातुएं इस शब्दभंडार में से कुछ को समझने के लिए गढ़े घटक हैं. यात्रा धातु से शब्द की ओर न होकर क्रिया विशेष से उत्पन्न ध्वनि से शब्द श्रृंखला से धातु की दिशा में हैं और अब यह धातु उनमें से कुछ का अर्थ समझने में तो सहायता करेगी पर इस पहेली का जवाब न दे पायेगी कि इस ध्वनि से वह अर्थ जुड़ा कैसे.

Post – 2017-04-24

सत्यान्वेषण

गलतियों को पहचानने और उनको दूर करते रहने का ही दूसरा नाम सत्य की खोज है। जब मैंने महापुरुषों तक की गलतियां गिना दीं तो मैं किस गिनती में आता हूं। मैं जिन आंकड़ों को पेश करता हूं उनमें जो गलतियां होंगी उनमें से कुछ को आप ताड़ सकते हैं और इसके लिए पत्थर की नजर की भी जरूरत न पड़ेगी। आप कह सकते हैं ‘आप अपना काम कर रहे हैं, कीजिए, हम इस पर अपना समय क्यों लगाएं। मैं कहना कई बहानों से यह कह आया हूं कि यह मेरा काम नहीं है, हिन्दी का काम है। इसीलिए मैं अपनी पूरी सेवाएं ऐसे किसी व्यक्ति को अर्पित करने को तैयार रहा हूं जो इस काम को करे। इसीलिए मैंने इसे एक महायज्ञ मानते हुए आप सबको अपनी आदुति झोंकने के लिए निमन्त्रित किया।

अब मैं गलतियों और कमियों पर आऊँ। मेरी कुछ गलतिया तो इस कारण होती हैं की कृतिदेव में लिख कर यूनिकोड में बदलता हूँ तो नई ग़लतियाँ हो जाती है। कुछ जल्दबाजी के कारण और कुछ शाम की आर्द्रता के कारण। इन्हे आप पहचान भी लेते हैं इनकी उपेक्षा भी कर देते हैं।

तथ्यों के साथ भी ऐसा हो सकता है । आज के उदाहरण में सुकमा को चंडीगढ़ के उच्चारण के बहाव में सुखमा कर दिया। आज एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना न होगई होती तो इस चूक की और ध्यान भी न जाता।

पर अंतिम हैं विवेचन में कुछ कमियां जिनकी और मेरा ही ध्यान जा सकता है। एक बार मैंने कहा था आज तक मैं एक ही किताब की कमियां दूर करने की कोशश में लिखता और नए लिखे में नई कमियां तलाशते उन्हें दूर करने की कोशिश तो करता आया हूँ पर कभी ऐसा कुछ लिख पाऊँगा जिसमे मेरी नज़र में कोई कमी न रह जाय यह संभव न होगा।

गड़बड़ी मेरे साथ नहीं है, सत या परिघटना के चरित्र के कारण है। छोटी से छोटी सत्ता के यथार्थ के इतने स्तर होते हैं की एक पर्दे को उतारें तो उसके नीचे सात परदे नज़र आते है। मज़ा तब आता है जब रौशनी भी पर्दा बन जाती है।

इसे समझने के लिए फिर सुक पर आएँ । सुक का अर्थ पानी है तो यह पानी वाला अर्थ देववाणी या उसकी परिष्कृत भाषा अर्थात संस्कृत में क्यों नहीं। इससे निकला या उपार्जित अर्थ सुख ही क्यों है? इसका अर्थ पानी कैसे हुआ इसे समझने में हमारी मदद अंग्रेजी का सक (suck ) = चूसना और (succulent ) रसीला ही नहीं (success / succession ) आगे बढ़ना, उत्तर क्रम और प्रकारांतर से सफलता जो इसका मुख्य अर्थ बन गया, तथा सकर (succour ) परित्राण कर सकता है। कहें जल को यह सज्ञा किसी रसीली चीज़ या रसीले फल को चूसते समय पैदा ध्वनि के आधार पर मिली और फिर अर्थविस्तार तो जल के गुणों और क्रियाओं और उनके परिणामों के अनुसार होना ही था। समस्या सुलझने लगी तो एक नई उलझन सामने आ गई।

यदि इसका अर्थ यूरोप में जाकर खुलता है तो यह भरोपीय शब्द हुआ। यह इसका प्रमाण भी है की भाषा यूरोप से भारत में आई।

इसी तरह के ढकोसलों पर तुलनात्मक भाषा विज्ञानं पला और बढ़ा। प्रश्न यह है की यूरोप की किसी भाषा में पानी के लिए सक/ सुक जैसा कोई शब्द क्यों नहीं मिलता?

प्रश्न यह है की यूरोप की किसी भाषा में सक से निकटता वाला कोई शब्द क्यों नहीं मिलता? मिलता तो है, एकुआ का suck से कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता? हो तो सकता है पर अक से सक नहीं बन सकता, सक से हक और अक, शेक, हैक, सिक कुछ भी बन सकता है ?

यह अपने मूल अर्थ में मूल ध्वनि के साथ संस्कृत में गायब और एक पिछड़ी, ‘आर्येतर’ भाषा में कैसे बची रह सकती है?

जब हम सोचते थे की जो प्रयोग यूरोप से लेकर भारत तक पाए जाते हैं वे भारोपीय हुए और यूरोप की भाषाओँ में जो नहीं हैं पर संस्कृत में हैं वे विशेषताएं भारतीय आर्य भाषा ने भारत में आकर ग्रहण कीं, तब हमारा ध्यान इस बात की ओर नहीं जाता था की यूरोप तक संस्कृत का नहीं हडप्पा की कारोबारी भाषा का प्रसार हुआ था, जिसमेँ तमिल का onru संस्कृत का उन बनकर यूरोप तक उनुस और वन बन कर पहुँच सकता था और ओनली, onorous , वन्स, यूनिट, यूनियन, यूनाइटेड जैसे प्रयोगो को प्रेरित कर सकता था, पर अब घर की ओर लौटें तो शुक्ल – श्वेत का कोई सम्बन्ध सुक से हो सकता है या नहीं?

एक और चूक की ओर ध्यान दिलाएं। हमने कहा सुख में अंत में अकार का आकार हो जाने के कारण पानी का अर्थ उलट कर सूखा हो गया। इसे समझने में भी अंग्रेजी के सक से मदद मिलेगी। चूसना के आशय से सोखना या पानी का लोप बना लगता है। इसका मूल चोषण बना और फिर शोषण। अब यह पुनर्विचार की मांग करता है कि क्या सुक देववाणीं के प्रभाव में चुक से सुक बना। चूसना, चूकना, चूक, चुकाना (अर्थात अपना घर खली कर के दूसरे को पंहुचाना आदि प्रयोग उस देवेतर वाणी के प्रभाव के कारण हैं। अपनी निर्माण प्रक्रिया में देववाणी ने अपने उपक्रम में शामिल होने वालों के प्रयोगों को आत्मसात किया और वे उसकी सम्पदा बन गए। उसके देशांतर प्रसार में ये सभी तत्व पहुंचे और उनमें से कुछ को वहां की बोलियां अपने अनुसार ग्रहण कर सकीं।

अब जरा इस सक/सुख की ध्वनि से निकले शब्द भंडार पर विचार करें :
सुख/चुक – १. पानी, २. सुख, ३. चोका= धारोष्ण दुग्ध पान , २>४- सौख्य > ५. फा. शौक / शौक़ीन, ६- सोखना > ७- सूखना>८. सं. शुष्क, ६>९. शोषण / शोषित /शोषक, १०. चोषण, ११. चूसना, १२. चस्का, १३. सु- (उपसर्ग) १४. सु-तर (सुंदर),> १५. सुधर /सुधार, १६. सं.(धातु) चूष पाने, १७. शुष शोषणे.
हमने अपनी सीमा के कारण यूरोपीय प्रतिरूपों को छोड़ दिया. ऊपर के आंकड़ों पर ध्यान दें तो धातुओं से ये शब्द नहीं निकल रहे हैं. धातुएं इस शब्दभंडार में से कुछ को समझने के लिए गढ़े घटक हैं. यात्रा धातु से शब्द की ओर न होकर क्रिया विशेष से उत्पन्न ध्वनि से शब्द श्रृंखला से धातु की दिशा में हैं और अब यह धातु उनमें से कुछ का अर्थ समझने में तो सहायता करेगी पर इस पहेली का जवाब न दे पायेगी कि इस ध्वनि से वह अर्थ जुड़ा कैसे.

कौन कह सकता है की यह समाधान सही है पर यह खेल तो सही है ही। लत लग गई तो सब कुछ छूट जायेगा, यह न छूटेगी।

Post – 2017-04-24

Before proceeding further, another idea must be introduced: that of semiological facts in societies. Let us go back to the language considered as a product of society at work: it is a set of signs fixed by agreement between the members of that society; these signs evoke ideas, but in that respect it’s rather like rituals, for instance.

Post – 2017-04-24

देववाणी (१३)
देवसमाज का गठन

मैं जब देव और ब्राह्मण को दो भिन्न भाषाई पृष्ठभूमियों के स्थाई खेती में लगने की बात कर रहा था तो एक तीसरे समुदाय का जिक्र करने से रह गया था क्योंकि इनके साथ आग लगा कर झाड़ झंखाड़ जलाने का सन्दर्भ नहीं आता । ये अपने को सुर कहते थे । सुर, सर, सिर, सिल, सबका अर्थ पानी होता है पर यही अर्थ चुर, चर, चुल, चिल का भी है । पर इतने सारे शब्दों से सन्तोष नहीं। ये सू और चू का भी अर्थ पानी करते थे । सन्तोष की बात इसलिए नहीं कि ये शब्द नहीं हैं पानी के टपकने से लेकर बहने तक की असंख्य ध्वनियों में से कुछ । सू की ध्वनि पानी की धार निकलने से भी पैदा होती है । इसी तर्क से यह पैदा होने, पैदा करने, किसी पदार्थ से रस के बाहर निकलने आदि के आशय वहन कर सका। सुत=पेर कर निकाला हुआ रस, आसवित द्रव या सुरा, सुत पैदा किया हुआ बच्चा। इसी सु =जल को आप सुखना झील में पाते हैं जो चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, और असम तक फैला मिलेगा।

यही जल तृषा मिटने, तृप्ति या सुख का सूचक बना और द्रविड़ नियम से आ जुड़ने पर जल के अभाव का द्योतक सूखा भी बन गया। हमने यह छोटा सा हवाई सर्वे यह याद दिलाने के लिए किया कि सुर असुर के चक्कर को समझा जा सके । अपने को सुर या उत्पादक कहने वाले उसी असुरर समाज के विद्रोही थे जो आहार संग्रह को अपने लिए गौरव की बात मानता था और कृषि कर्म से घृणा करता था। इस चवर्ग प्रेमी समाज से देवों ब्राह्मणों के समुदाय का संपर्क कुछ बाद में परन्तु बहुत विलंब से नहीं हुआ। इसके आने से देव वाणी में ही परिवर्तन नहीं हुआ देववाणी सीखने के क्रम में यह च की ध्वनि का ही स के रूप में भी उच्चारण करे लगा। कभी स कभी च।

हमने देव भूमि का जो आदि क्षेत्र सुझाया है उससे नीचे मैदान में आने पर नदी= ताल से सट् चिलवां, चिल्लूपार, चुरिया, चुरहट, सुरहा ताल जैसे नाम देउिरया, देवकली, लहुरा देवा जैसे स्थान नाम ही नहीं मिलते, कोलडिहवा, चौपानी मंडो, महगरा जैसे पुराने स्थान है। महगरा में मगहर का वर्णविपर्यय है, परन्तु ये नाम तो कोलों, मुंडारियों और मगों की बस्तियाें की ओर ही संकेत करते हैं जो आठ हजार साल पहले स्थाई बस्ती बसा और किसानी अपना चुके थे । हमने जिन स्थानों का नाम गिनाया है उनसे न बँधकर यह देखें की इन तीन जमातों से बनी थी वह सामाजिकता जिसे आर्य या कृषिकर्मी समाज कहा जाता रहा। दूसरे लोगों से आगे बढ़े होने और भू स्वामित्व के कारण ये अपने को दूसरों से श्रेष्ठ और और आदरणीय समझते थे, अतः यह शब्द सभ्यता और श्रेष्ठता का भी वाचक बना। नागर सभ्यता और व्यापारिक गतिविधियों के चलते श्रेष्टिन या सेठ की तरह यह व्यापारियों के लिए और सुदूर देशों में उनकी बस्तियों के नाम के साथ भी जुड़ा।

ये सभी उसी असुर या उत्पादन विमुख समाज से निकले थे. इनकी भाषाओँ के घातप्रतिघात से विकसित हुई थी वह ध्वनिमाला जिसे देववाणी की ध्वनिमाला कह सकते हैं।

ये तीन समुदाय हैं जिनकी पहचान क्विपर (kuiper) ने भी की थी जिसका हवाला हम कुछ समय पहले दे आये है, परन्तु एक चौथा प्रभाव अभी आना था. यह आया कुरु भूमि में इन किसानी करने वालों के पहुँचने के बाद जिससे ऋग्वेदिक भाषा अस्तित्व में आई।

अब हम कुछ रुककर देववाणी की विशेषताओं पर बात कर सकते हैं जो देवों की बोली-बानी अपनाने वालों के संपर्क में विकसित हुई थी.

इसमें घोष और महाप्राण ध्वनियों के प्रति विशेष आग्रह था. घोष महाप्राण ध्वनियाँ मुंडा अपनी सीमा में मुंडा समुदाय में गिनी जानेवाली बोलियों में भी थीं इसे किसानी से विमुख जत्थों द्वारा दिए गए नामों से समझा जा सकता है – झाँसी, झूंसी, झज्झर, झारखंड, झड़ौदा कलां, झुमरी, झुंझनूं आदि. हिंदी में ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनमें झ ध्वनि पाई जाती है- झरोखा, झमेला, झाड़ी, झाड़ू आदि। हिंदी और भोजपुरी में अंतर सवर्णता से बचने और सवर्णता को अधिक पसंद करने के भेद के कारण है। भोज. झांझ, झोंझ, झिझिया, झांझर, झंझवा आदि।

हिंदी में जहाँ ज मिलेगा उसे भी भोज. में कई बार झ में बदल दिया जाता है. हिंदी जटा – भो. झोंटा, जंजाल- झंझट, चट – झट आदि. हिंदी के ऐसे सभी शब्द जिनमें झ की ध्वनि है विरल अपवादों को छोड़कर पूर्वी प्रभाव माने जा सकते हैं, और इसका एक कारण यह है कि हिंदी का आरम्भिक चरण भोजपुरी और अवधी प्रभाव में रहा है।

दूसरी घोष महाप्राण ध्वनियों में भी संस्कृत/ हिंदी और भो. का यह अंतर् लक्ष्य किया जा सकता है: गहन – घन, गहगहा – घघाइल आदि.
सबसे प्रधान अंतर् यह है कि देववाणी में सवर्ण सयोग होता था. परन्तु अन्तस्थ वर्ण ह के साथ जुड़ते हैं। ऐसा प्रयोग वैदिक में मिल जाएगा पर संस्कृत में नहीं जैसे वै. मील्ह! भोज. मेल्हल, कर्हिआंव (कमर), कर्हावल (भैंस को कर्र्ही की उूंची आवाज देकर अपने पास बुलाना)। कल्हारल, मीर् हल आदि. हिंदी में मल्हार मे और कश्मीरी कल्हण, विल्हण में इसे देखा जा सकता है.पर रह का संयोग नहीं मिलेगा।

अब आप समझ सकते हैं कि मैं क्यों इस काम को किसी ऐसे योग्य व्यक्ति को सौंपना चाहता था जिसके पास लगन हो, समय हो, शक्ति हो, जिनमें से पहले को छोड़ कर सभी का अभाव अपने साथ देखता हूं। हमारी बालियों की वर्णमाला से अधिक महत्वपूर्ण है ध्वनिमाला जिसके लिए नागरी जैसी समृद्ध लिपि में भी बहुत सी ध्वनियों के लिए चिन्ह नहीं है, इनकी पूरी पड़ताल नहीं हुई है और ध्वनिमाला से भी जरुरी है स्वर-व्यंजन विन्यास की तालिकाएं और उनकी परिवार या भाषा समुदाय के भीतर भी तुलनात्मक अध्ययन और अन्य परिवारों या समुदायों के साथ भी।
तुलनात्मक अध्ययन. यदि मेरे मित्रों में से कुछ ने भी रूचि दिखाई तो वे कोई न कोई बोली लेकर छोटे पैमाने से यह काम आरम्भ कर सकते हैं। नई सूझ आंकड़ों के मिलान से पैदा होती है, किसी पोथी से नहीं। जिसे हम आर्य भाषा कहते हैं उसमें सभी भारतीय परिवारों की भाषाओँ की भूमिका है। जिसे हम अपना समाज कहते हैं उसमें किसी न किस अनुपात में सभी का संकरण हुआ है। यही हाल हमारी संस्कृति का है।

हमें उपलब्ध सामग्री के आधार पर हम कह सकते हैं कि धुरंधर कहे जाने वाले विद्वानों की पोथियों में इनके बारे में दी गई जानकारी या तो सतही है या गलत। आप इसे समझ भी लें तो पश्चिम के विद्वानों की धौंस आप के दिमाग से उतर जाए और हम बहुत कुछ कर सकते हैं यह विश्वास तो पैदा हो ही सकता है।

Post – 2017-04-23

मैं कभी इस बात का आग्रह नहीं करता कि आप मेरी पोस्ट पढ़ें। मैं अपनी किताब फेस बुक पर लिखता हूँ, जिन्हें पठनीय लगेगा वे पढ़ेंगे। जो न पढ़ेंगे वे पढ़ने चलेंगे तो भी नहीं पढ़ पाएंगे। ऐसा राजनीति से जुड़े या अपने कार्यक्षेत्र को राजनीति का कुरुक्षेत्र समझने और बनाने वालों के साथ होना ही है। वे समझना छोड़ चुके होते है इस लिए सीख नहीं सकते, जहां तक आप की व्याख्या उनको रास आएगी, वे आप का समर्थन और उपयोग करेंगे, जो टिप्पणियां उनकी कमियां बताएगी उन्हे
धैर्य से पढ़ ही नहीं पाएंगे, पढ़ेंगे तो समझ नहीं पाएंगे। जो बातें इतनी तीखी होंगी की उनकी उपेक्षा करने की कोशिश के बाद भी गहरे धंस गईं उनके अनुसार अपने सोच में बदलाव लाने की जगह तिलमिलाते रहेंगे की इससे बदला कैसे लिया जाय? तर्क से सम्भव होता तो चुभन की जगह हंसी आती और उसे उसकी औकात समझा देते, सम्भव नहीं इस लिए अपघात, आरोप, शिष्ट से लेकर अभद्रतम गालियों की खाई में दुबक कर मोर्चा संभालेंगे। जीतना हर हाल में है। वे जीते नहीं है, जूझते हैं। जीने के लिए कुछ ऐसा करना होता है जिससे कुछ पैदा हो और अापने जो कुछ पैदा किया है उसके बदले में आप दूसरों ने जो पैदा किया है उसे अपनी जरूरत के अनुसार लेकर अपने को सर्वसम्पन्न कर सकें।

,जूझने का मतलब तो आप में से कुछ लोगों को पता ही नहीं होगा। यह युज से बना है जिसका अर्थ है जुड़ना यह आप सभी जानते हैं, यहां तक की आप यह भी जानते हैं की युत और युक्त का भी अर्थ यही होता है। पर आप में से बहुत कम लोग जानते होंगे कि युत में युज का ज कैसे घुसा और कैसे अंतिम त को क्त बना बैठा। जो सोचते हैं कि वे जानते हैं वे आप से भी कम जानते हैं क्योंकि वे इसे धातु प्रत्यय के नियम से जानते हैं जो construct हैं और बहुत में बाद गढ़ा गया है।

जब कि हम उसे समाजरचना से समझना चाहते हैं, जहां चूक हो आप से समझना चाहते हैं और इस तरह अपने सामाजिक इतिहास को भाषा के इतिहास के साथ समझना और समझाना चाहते हैं और आपको विश्वास दिलाना चाहते हैं कि इस विधि में सुपठित, अल्पपठित, अपठित और कुपठित ही नहीं अधिपठित भी एक स्तर पर आजायेंगे, क्योंकि उन्हें कोरी पट्टी से आरम्भ करना होगा।

आप को उन्हीं शब्दों का गहरा अर्थ उद्भास की तरह दिखाई देगा जिनका रूढ़ार्थ आप को पता है। मिसाल के लिए युवक और युवती का अर्थ धुंधले रूप में आप जानते हैं, पर शायद इस रूप में न जानते हों कि यह जोड़ खाने। मेल खाने की या जिसे अंग्रेजी में प्रॉपर मेटिंग ऐज कहा जा सकता है उसका सूचक है और तब संभव है आप को अंग्रेजी के मेटिंग का मीटिंग से सम्बन्ध भी नजर आने लगे।

बात तो हमने जूझना से आरम्भ किया था। युत युद्ध बन कर मिलने की जगह टकराने का, लड़ने का आशय ले बैठा और युज वाले समाज ने युद्ध को झुझ बनाया जो झुंझलाना में मिल जायेगा, पर उस भाषाई समूह की जबान की लाचारी कि झ के साथ झ उसी तरह उच्चारित नहीं कर सकता था जैसे भभूव का उच्चारण बभूव के रूप में ही कर सकता था। जूझने का अर्थ है जान देना, जान लेना , जो कुछ जाने कितने श्रम और साधनों से बनाया गया है उसे तोड़ना और मिटाना, कुछ भी ऐसा न पैदा करना जो किसी दूसरे के और स्वयं अपने उपयोग में आ सके पर ऐसी नौबत ला देना कि दुश्मन हार जाय, जो बच रहा है वह हमारे कब्जे में आ जाय और फिर हम उसका मनमाना उपयोग कर सकें।

हम इस चर्चा के माध्यम से आपको इस सोच से बाहर लाना और आप जो कहते हैं उसका अर्थ समझाना चाहते है। यह किताब लिखने से अलग है, एक विचार मंच है । अपने लेखन में पहली बार मैं आप सबसे अनुरोध करता हूँ की इस महासभा में शामिल हों और यह समझने के प्रयास में शामिल हों कि एक भी शब्द के सम्यक ज्ञान को तत्वविदों ने इस लोक और परलोक तक के लिए कामधेनु क्यों कहा है। मैं आप को शबरदुघा वाणी के दुग्ध पान समारोह की दावत देता हूँ। आगच्छ, पश्य, आचर।

Post – 2017-04-23

देववाणी (बारह)

आदिम समाज रचना

जिस भाषा को हम देववाणी कहते आ रहे हैं उसे देउबानी कहा जाता था और जो लोग इसे बोलते थे उन्हें देव नही देउ कहा जाता था। ठीक इसी तरह ब्रह्म को बरम कहा जाता था क्योंकि न तो भोजपुरी में व की ध्वनि है न ण की और न ही इसमें असवर्ण अर्थात एक अक्षर का किसी दूसरे से संयोग होता है। इसमें राजा राव बनने की जगह रउआं बन जाता है। ब्राह्मण को बाभन और ब्रह्म बरम कहा जाता है। उच्चारण की जिन आदतों को इतने लंबे टकराव के बाद भी नहीं बदला जा सका वे इस अंचल में बद्धमूल मानी जा सकती हैं।

हमारे सामने कुछ समस्यायें हैं। हमारे प्रस्ताव के अनुसार स्थाई खेती (किसी एक मुकाम पर टिक कर खेती), से पहले खेती का उपक्रम करने वाले समुदायों को सभी जगहों से भगा दिया जाता था। कारण उनकी झूमखेती में वनसंपदा की भारी हानि होती थी। इसके कारण वे जगह जगह भागते फिरे थे। इसकी छाप देवली, देवस्थली, देवास, देवघर और कई अंचलों में प्रचलित उपाधिनामों में बची हुई है। नेपाली का देउबा भी इसी कोटि में आता है, बंगाली का देव भी और झारखंड का बीर सिहं जू देव भी।

अपनी चर्चा में आगे बढ़ने से पहले हमें कुछ परेशान करने वाले सवालों का सामना करना होगाः
1- आज न भी रह गए हों तो कल तक झूम खेती करने वाले इस देश में हुआ करते थे जिन्होंने स्थाई कृषि की दिशा में कदम न बढ़ाया और उनकी भाषा देववाणी नहीं कही जा सकती। ऐसा क्यों हुआ कि कुछ समुदायों ने झूम खेती (अर्थात जंगल जलाओ, और उसकी राख में कुछ दिनों तक खेती करो और उर्वरता घट जाने पर वहां से अलग चले जाओ) की तरकीब से आगे बढ़ना पसन्द नहीं किया? क्या इस अहंकार के कारण कि झूम खेती उन्होंने आरंभ की, दूसरों ने उनसे नकल की। अपनी नकल करने वालों की नकल करने का अपमानजनक काम वे नहीं कर सकते? यदि हां तो देवों को हम खेती का जनक नहीं मान सकते।
2- एक दूसरा प्रश्न असुरों के प्रतिरोध और हिंसा का जैसा सामना देवों को करना पड़ा ओर वे देश देशान्तर में भागते रहे वैसा विरोध इन्हें क्यों नहीं सहना पड़ा?
3- एक तीसरा प्रश्न जो प्रश्न से अधिक एक संभावना है वह यह कि उनकी नकल करने वाले अकेले देव ही थे और कोई नहीं? यदि कुछ अन्य ने इस युक्ति को सीखा तो वे स्थाई खेती की ओर बढ़े या नहीं ओर बढ़े तो कब और कैसे। क्या यह संभव नहीं कि स्थाई खेती अपनाने वाले इस देव समाज का गठन कई समुदायों के मिलने से हुआ हो? क्या यह संभव है कि देव, ब्राह्मण (तेउआ, भरम / बरम) दो भिन्न भाषाई पृष्ठभूमियों के लोग रहे हों जिनमें से एक की बोली में आग के लिए ती का प्रयोग होता था और दूसरे में भर का।
हम एक ऐसे क्षेत्र में काम कर रहे हैं जहां मार्गदर्शन के लिए कुछ नियम तो हैं पर आकड़े आधे अधूरे ही हैं।

हम पहले प्रश्न को लें तो इसकी दुहरी संभावनाएं हैं और यदि यह काम किसी ने पहले किया हो और उसी चरण पर ठहरा रह गया हो तो हमें इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वन्य अनाजों का उपयोग मनुष्य बहुत पहले से कर रहा था। पीछे का इतिहास बहुत धुंधला है और जब हम स्थायी खेती के आरंभ की बात कर रहे हैं तो झूम खोती उसमें विशेष महत्व नहीं रखती।

दूसरे प्रश्न के उत्तर में हम कह सकते हैं कि जातीयताओं का निर्माण स्थाई बस्ती के बाद की बात है। हम जिस अवस्था की बात कर रहे हैं उसमें यह तो संभव है कि एक ही तरीके को अनेक ने धीरे धीरे अपना लिया हो, परन्तु स्थाई खेती के साथ भूमि की उर्वरता का बना रहना एक जरूरी शर्त थी। दूसरी जरूरत ऐसे क्षेत्र की सुलभता थी, जिसमें किसी दूसरे से टकराव की तत्काल कोई नौबत न आए। जिन दो समुदायों का हम हवाला दे रहे हैं उनमें से कोई एक ही इस दिशा में बढ़ा हो। ये अपेक्षाएं पहाड़ी ढलान के सुरक्षित इलाके में पूरी हो जाती थीं, जिसमें उूपर से बह कर आने वाली मिट्टी के कारण भूमि की उर्वरता बनी रहती थी।

कई हजार साल बाद पुरानी यादों को दुहराते हुए बताया गया है कि देवों की पहली जरूरत यज्ञ को संस्थित करने या स्थाई बनाने की थी और उसके बाद दूसरी जरूरत दूसरों को खेती की ओर प्रेरित करने या यज्ञविस्तार की, जिससे उनकी संगठित शक्ति बढ़े, इसलिए जिस भी समुदाय ने स्थाई खेती आरंभ की वह दूसरों को इसके लिए प्रेरित करने और उसकी सहायता करने को स्वयं उत्सुक था, जिसमें नस्ल या भाषा की समस्या उसी सीमा तक बाधक थी जितनी प्राथमिक अवस्था में वाचिक संचार के लिए जरूरी है।

अन्तिम प्रस्ताव इसलिए कि आग के लिए तमिल का एक शब्द ती है। यह ती देववाणी में दी बना पर तिथि, तिग्म, तेज, तिक्त आदि में बना रहा, यह संकेत हम पहले कर आए हैं। ती ही टी, टिकठी, टीका, टिप्पणी, टीकुर – सूखी जगह, टिकरी, टिकुली, टिमटिमाना, आदि में है। इसके अतिरिक्त आज से बहुत पहले, आर्य द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में मेरा सामना भोगपुरी की ऐसी लोरियों से हुआ जिनका अर्थ तमिल की सहायता से ही समझ में आता था। हम बचपन में उन्हें मात्र उनकी लय के कारण दुहराते थे – ओक्का बोक्का तिन तलोक्का लैया लाची चन्नन काटी – जब कि स्थाननामों आदि से इसका कोई संकेत नहीं मिलता कि वहां कोई समुदाय द्रविड भाषी भी था। अतः इसे नितान्त आदिम अवस्था की लेने देन मानना होगा, भले यह स्थिति स्थाई खेती के आरंभ के हजार दो हजार साल बाद आई हो।

ब्रह्म को बरम तक तो ठीक है पर भरम करने के पीछे एक कारण यह है कि बाद के आचार्यो ने ब्र/ भ्र दोनों को अग्नि और प्रकाशसूचक माना है। भ्र का बर रूप अघोष अल्पप्राण प्रेमी समुदाय के प्रभाव में बना हो सकता है। भोजपुरी में भभाना, भउरा, भड़भूजा, भूजा, भूजल, आदि प्रयोग और आग लगने के लिए आग भड़कने का प्रयोग होता है । इनमें से कुछ प्रयोग तो हिन्दी में भी चलते हैं। इसे इस चरण पर हम मात्र उूहापोह मानें तो अधिक निरापद होगा।

Post – 2017-04-23

छेड़छाड़
यूं तो भाई अरविन्द जी फेसबुक का इस्तेमाल काफीहाउस की मेज के रूप में, छेड़ने, खिझाने, और दिल बहलाने के लिए करते हैं, पर कभी कभी सीरियस भी हो जाते हैं और ये ही मौकै हैं जब वह अंजाम का अनुमान किए बिना खतरा उठा लेते हैं। अभी एक खतरा किसी मुल्ला की पोस्ट को साझा करने वाली किसी महिला का पोट घोषित गंभीरता के साथ साझा किया तो मुझे भी टी मोहन सिहं प्लेस की मेजों की याद आ गई और पूछने को जी हो आया किः
1. क्या वह जानते हैं न्याय में शास्त्र के विधान नहीं देखे जाते यथार्थ देखा जाता है। कोई भी रीतिविधान जब तक रीति निर्वाह तक सीमित रहता है वह पर्सनल ला में आता है, जहां उससे दूसरा प्रताड़ित और आहत होता है और वह उससे मुक्ति की गुहार सरकार से लगाता है तब वह क्रिमिनल ला के दायरे में आ जाता है। वह सती हो, बालिका वध हो, या संगसार हो, या तीनतलाक।
2. यदि तीन तलाक की न्यायसंगत मर्यादाएं हैं और उनका पालन नहीं किया जाता तब तो खास तौर से दुहरा अपराध बन जाता है। एक जिसका संज्ञान मुल्लों को लेना चाहिए और दूसरा जिसका संज्ञान अपराध संहिता को।
3. हलाला के पक्ष में खड़ा होना, एक महिला को एक दुर्भग्यपूर्ण स्थिति में डाल कर उसकी इच्छा के विरुद्ध दबाव बना कर किसी अन्य पुरुष से संबंध कायम करने को बाध्य करना नैतिक अपराध भी है औ भौतिक भी।
4. यह सफाई यह सिद्ध करने के लिए ऐसे मौके पर दी जा रही है जब पर्सनल ला और सिविल ला के बीच की समीक्षा का पर्यावरण तैयार हुआ है और इसका निहितार्थ है हमारा पर्सनल ला दुरुस्त है उसमें छेड छाड़ नहीं होनी चाहिए और आप गंभीरता से इसका साथ भी दे रहे हैं।
5. यह पीड़ा मुस्लिम महिलाओं की है, उन्होंने इसे उठाया है, इस्लामी कठमुल्लेपन के प्रत्येक विरोध को संघ की कारस्तानी बता कर कठमुल्ले तो बचते ही रहे हैं जो उनके साथ हो जाते रहे हैं वे स्वयं कठमुल्ले सिद्ध होते हैं इसलिए अरविन्द जी जैसे सुलझे व्यक्ति को गंभीरता और जिम्मेदारी से नहीं, विनोद के लिए छेड़े एक नए शगूफे के रूप में उठाना चाहिए था। अब भी वह अपना शीर्षक बदल सकते हैं।

Post – 2017-04-22

जमीं पर जब सितारे कुछ परेशां थे तो हम भी थे
सितारों की परेशानी के कुछ हकदार हम भी थे।
जमी पर आ गए कैसे हैं अपना आसमां खोकर
यह तेवर देख कुर्बानी की कुछ कुर्बान हम भी थे।
सितारों फूल बरसाओ अगर हो फूल हासिल तो
जमीं पर आ भी जाओ कह के खुद हैरान हम भी थे।
समझने में लगी गुद्दत सितारे कागजी हैं ये
सरे बाजार बिकते, उनके पर दिलदार हम भी थे।

Post – 2017-04-22

आइए जिन्दगी की बात करें
सबकी राजी खुशी की बात करें
खुश रहें सब तो आप नाखुश हैं
फिर तो हम आपही की बात करें ।