Post – 2017-07-15

समाज और साहित्य

अभिव्यक्ति की प्रक्रिया, जहां वह कलात्मक रूप नहीं लेती है वहां भी कुछ जटिल होती है जिसमें हम ऐसे अनेक पूर्वापेक्षाओं से अनुकूलित रहते हैं जिसका प्रभाव हमारे शब्दचयन, वाक्यविन्यास, आवाज के चढ़ाव उतार और मुद्रा पर पड़ता है जिनको हम लगभग पूरा कर पाते हैं परन्तु पूरी तरह संन्तुष्ट नहीं हो पाते। अक्सर बाद में सोचते हैं कि यदि इस तरह अपनी बात रखता या इतने संयत होकर या आवेश से अमुक बातों को कहता तो अधिक अच्छा रहा होता। किसी परिचित से, आत्मीय मित्र से, अपने से छोटे बच्चों से, पत्नी से, प्रेमिका से, दुश्मन से आपने सामने, या बहुतों से एक साथ मंच से, गोष्ठी में, क्लास में समझाने या प्रभाव जमाने के लिए अपने को व्यक्त करते हैं तो इनके अनुसार सभी का अनुकूलन हो जाता है।

कहें सामान्य संचार में भी कलात्मकता का पुट होता है। जहां सचेत रूप में कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रश्न आता है, आवेग का पक्ष अधिक प्रबल और विचारपक्ष कुछ दब सा जाता है वहां पूर्वानुमेयता उसी अनुपात में घट जाती है और रहस्यमयता अधिक प्रधान हो जाती है। परन्तु सभी अवस्थाओं में अभिव्यक्ति का सामाजिक चरित्र होता है और हमारे भाव, विचार, भाषा सभी को दूसरा, वह उपस्थित हो या अनुपस्थित, बड़े सूक्ष्म रूप में प्रभावित करता है।

सर्वोत्तम स्थिति वह होती है जिसमें मन मिलता है, भिन्नता विचारों या संवेदनाओं तक सीमित रहती है। भाषा का संकट उपस्थित नहीं होता, जिसके होने पर संचार अन्य के भाषाज्ञान के स्तर से प्रभावित होता है। यह संकट भाषा से आरंभ होता है, पर भाषा तक सीमित नहीं रहता, रुचि और संवेदन के चरित्र को भी प्रभावित करता है, और ऐसी स्थिति में रचनात्मक चुनौतियां बढ़ जाती हैं।

समस्या यह पैदा होती है कि हम कैसे भिन्न संस्कृति के उत्तम को आत्मसात करें और अपने समाज के लिए ग्राह्य बनाएं। यह अकेले रचनाकार की समस्या नहीं है । यह उस बोध से जुड़ी समस्या भी है जो हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारे समाज की अपनी सौन्दर्याभिरुचि क्या है और उसके मर्म की रक्षा करते हुए, जो नया है, उसको पुनराविष्कृत किया जाय कि उसका अजनबीपन कम हो सके। यदि किन्हीं कारणों से समाज में कलाविमुखता पैदा हो चुकी है तो उस तक कैसे पहुंचा जा सके । यह इस समझ पर निर्भर करता है कि वह साहित्य से क्या अपेक्षा रखता है। यह उनकी भी समस्या है, जो कलामान तय करते हैं और रचनाकार और भावक के बीच सेतु का काम करते हैं। इस समस्या को एक उदाहरण से मूर्त किया जा सकता है।

भारत से पश्चिम का सांस्कृतिक टकराव हुआ तो दोनों एक दूसरे की विशेषताओं से अभिभूत हुए और उसे ग्रहण करने की आतुरता दिखाई। हम कह आए है कि हमारे विचार और साहित्यिक कृतियों ने पश्चिम को इतनी गहराई से झकझोरा जो जर्मन दार्शनिकों और कवियों से आरंभ हो कर क्रमशः पूरे येरोप में फैल गया और उससे नई साहित्यिक चेतना और कई आन्दोलनों का जन्म हुआ। परन्तु पश्चिम ने इसे इस तरह आत्मसात किया कि वह यूरोपीय समाज में सहज रूप में, वायु की नई तरंगों की तरह पुलक और उत्फुल्लता पैदा करता हुआ अपनी परंपरा का ही विकास बन कर उपस्थित हुआ और पाठकों को पराएपन का भान तक नहीं हुआ। ।

हमने भी उनसे ग्रहण किया और इससे लाभान्वित हुए। सबसे बड़ा लाभ तो गद्यविधा की शक्ति और गद्यसाहित्य का महत्व समझ में आया । हमने गाने की जगह खुल कर बोलना सीखा और इसका सबसे अघिक लाभ विचार और संचार के साधनों को मिला। फिर भी कहीं कोई चूक हुई कि हमारा पहले का साहित्य जिस स्तर तक पहुंच पाता था उस स्तर तक हमारी पैठ न हो पाई। मैं यहां किसी को दोष देने के लिए यह विचार नहीं रख रहा हूं। केवल इस समस्या को याद दिलाना चाहते हैं कि कि जिस समाज को सुरुचि और संस्कार के सबसे प्रभावशाली साधन सााहित्य से विमुख कर दिया जाता है वह संस्कारहीन, उद्दंडों, अहंकारियों और अपराधियों का समाज बनता चला जाता है और उसका साहित्य यदि अपने समाज के निम्नतम स्तर तक अपनी विश्वसनीयता नहीं पैदा कर पाता है तो साहित्यकार राजनीतिज्ञों का अजागलस्तन बन कर रह जाता है।

पाठक या भावक की अपेक्षा के सन्दर्भ में तुलसी और कबीर का ध्यान इसलिए जरूरी लगा कि दोनों की पहुंच एक ही समाज के भिन्न भिन्न तबकों तक रही है। तुलसी भक्ति के कारण नहीं, उस ज्ञान कोश के रूप में उस सवर्ण समाज के भीतर स्वीकृत रहे जिसको इसकी जरूरत थी। दलित समाज को ज्ञान की नहीं उस आत्मोत्थान से वंचित किए जाने की सबसे गहरी पीड़ा थी इसलिए उसमें कबीर के वे व्यंग्य भरे प्रहार जिन पर वर्णसमाज मुग्ध होता है, वे दोहे और साखिया उतनी लोकप्रिय नहीं हुई जितनी अन्तःसाधना के पद और रहस्य कथन जिसमें वे पंडितों के किताबी ज्ञान के समक्ष अपने सूक्ष्मवेद के ज्ञान का विश्वास पालते हुए पंडितों को भी अनाड़ी समझा करते थे। ये मात्र दो उदाहरण पूरी सचाई बयान नहीं करते।

जनता को अपनी थकान और खीझ भरी जिन्दगी से अलग आह्लाद और तन्मयता के एक संसार में ले जाने वाला साहित्य चाहिए इसलिए प्रगतिशीलता के नाम पर लिखी जोशीली कविताएं और कहानियां मजदूरों के काम की नहीं होती, वे अपने आल्हा, बिरहा, फाग और भजन से अधिक आनन्द मग्न होते हैं।

हम पश्चिमी प्रभाव में रची रचनाओं को पढ़ कर वाह वाह करते रहें, पर जीवन में दरबारी कहे जाने वाले साहित्य और सूक्तियों से ही काम लेते हैं और इस मामले में भाषा की दीवारे काफी हद तक टूट जाती हैं क्योंकि मिजाज के स्तर पर इनमें अंतर नहीं है, शब्दावली की रुकावाट अवश्य कुछ समस्या पैदा करती है। हम अपनी कलाकारिता को जनता से तभी जोड़ सकते हैं जब वह जन समाज की अपेक्षाओं की पूर्ति करे और अजनबीपन से मुक्ति देते हुए करे। यह एक मोटी सी समझ है जिस पर अधिक जानकार लोग अपनी प्रतिक्रिया से हमें भी समृद्ध कर सकते हैं।

मैं जो बीच बीच में कुछ तुकबन्दियां जो स्वतः उभर आती हैं पेश करता रहता हूं वह इस प्रयत्न में कि संभव है यह उस अवरोध को तोड़ कर अधिक जनों तक ग्राह्य हो सके। होता यह शब्दों का खेल ही है जैसे कल मृत्यु सुन्दरी पर ये पंक्तियांः
दिल भी अपना था और जां भी थी
तुम्हारे पास थी यहां भी थी
बच सका कौन तुझसे दुनिया में
लोग मरते रहेजहां भी थी ।

Post – 2017-07-14

क्या क्या गंवा दिया ये मुझे याद तक नहीं
तू हो तो बहुत कुछ है, सुना तू भी नहीं है ।

Post – 2017-07-12

कवि तो हूं नहीं, कभी सोचता था हूं और कविता भी करता था। कविता छोड़ने का कारण यह प्रश्न था कि कवियों के बीच का एक कवि बन कर रह जाने का क्या मतलब? यदि कोई मतलब नहीं तो कविता लिखने का क्या मतलब?

बुरी आदतें आसानी से नहीं जातीं । उनका हैंगओवर भी होता है और छोड़ दो तो कुछ समय बाद निश्चिंतता जन्य असावधानी के क्षणों में हमला भी होता है जिसके लिए अंग्रेजी में विड्राअल सिम्प्टन का प्रयोग होता है पर वह उस आक्रामकता का सही चित्र पेश नहीं कर पाता।

मैंने उसे हावी न होने दिया। हमला होता और मैं उसे कुचल देता। इबारतें बनी बनाई उभरतीं फिर भी पहले दर्ज नहीं करता था। फिर दर्ज यह सोच कर करने लगा कि इसमें उूची कविता करने या सुकवि बनने की झंझट से छुट्टी है और इसके बाद भी मेरे उस सरोकार से गहरा नाता है जिसमें मैं कविता को अपनी निजी नहीं, अपने समाज की जरूरत मानता हूँ।

वह जिस भी स्तर की हो, जो प़ढ सकते हैं और पढ़ने का समय निकाल सकें उनके लिए बोधगम्य और ग्राह्य भी हो और कविमनस्क मित्रो को भी कुछ दूर तक कविता ही लगे। मेरे इन प्रयोगों में मेरी अपनी आपबीती से अधिक अपने समाज की जरुरत को कसौटी बना कर समझें और इनकी कमियां उस आधार पर जांचें।

इस दिशा में अनेक समर्थ कवियों ने प्रयोग किये। इनमे पंत, अपनी बाद की कविताओं के निराला, दिनकर. बच्चन, नागार्जुन, त्रिलोचन, और उनके भी बाद रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर और वे कवि भी जो इस समय मुझे याद नहीं आ रहे हैं, मसलन नीरज और मंचों के हास्य कवि। इन्होंने दायरे का विस्तार किया पर कोई ऐसी चूक थी कि वे तुलसी और कबीर के स्तर तक नहीं पहुँच सकें और न यह समझ सके कि दोनों किन स्तरों तक और क्यों पहुँचते हैं। इसी में छिपी है भारतीय काव्यशास्त्र की आधुनिक समस्या, जिसे किसी आलोचक या रचनाकार ने समझा नहीं या समझने की कोशिश तक न की। इसका जवाब मैं कल दूँगा। उसी में मैं क्या तुक भिड़ाता हूँ इसका भी जवाब हो सकता है ।

Post – 2017-07-12

संस्कृत वर्णमाला

तुच्छतम से महत्तम की विकासयात्रा में हम पाते हैं कि आदिम अवस्था में मनुष्य भी अन्य जानवरों की तरह छोटे छोटे यूथों या दलों में रहता था। आकार बड़ा हुआ तो आहार की आपूर्ति की समस्या पैदा होती और वह बंट जाता । अलग हुआ जत्था किसी दूर के क्षेत्र में पहुंचता जहां उसके पड़ोसी अंचल में बसने वाले जत्थे भिन्न भाषाभाषी हो सकते थे । इसके विपरीत किन्हीं कारणों से यूथ की संख्या घट कर इतनी कम हो सकती थी जिसमें वह सुरक्षित नहीं रह सकता था। ऐसी स्थिति में वह किसी दूसरे यूथ की शरण ले सकता था जो भिन्न भाषाभाषी हो सकता था। इसके अतिरिक्त अपहरण आदि के चलते भी, भिन्न भाषाभाषी तत्वों के प्रवेश की संभावना बनी रहती थी । इन सभी परिस्थितियों में दुर्बल या अल्पसंख्य को प्रबल या बहुसंख्य की भाषा से ले कर रीति नीति अपनानी होती थी इसलिए उस पर गोचर प्रभाव नगण्य पड़ता था इसके बाद भी सभी भाषाएं, या आज की समझ से बोलियां – उपबोलियां आदिम आहार संचय और आखेट के चरण से ही बहुत सूक्ष्म रूप में इतरेतर भाषाओं से प्रभावित हो रही थी।

आदिम अवस्था में मनुष्य का जीवन अधिक सरल था। उसका बौद्धिक, संवेदनात्मक और कल्पना जगत बहुत छोटा था । उसका काम बहुत थोड़े से शबदों से चल जाता था। दक्षिणी अमेरिका में आज भी एक जन है जिसकी भाषा में दो से अधिक की संख्या के लिए शब्द नहीं हैं। तीन उसके लिए असंख्य या समस्त है क्योंकि वह दो से भी बड़ा इसलिए गणनातीत है। कभी हमारी भाषा का भी यही हाल था, इसलिए द्विवचन से आगे बहुवचन यह उल्लेख हम पहले कर आए हैं।

उन नितान्त सीमित शब्दों के लिए बहुत अधिक ध्वनियों की आवश्यकता न थी । उनका काम कुछ ध्वनियों और उनसे जुड़े संकेतों से ही चल जाता था । हमारी सहायता के लिए हमारी एक भाषा तमिल ने उस अवस्था का कुछ अवशेष बचा रखा है। उसमें घोष और महाप्राण ध्वनियों के लिए स्थान न था। इससे हम यह समझ सकते हैं कि उस आदिम अवस्था में भी कोई बोली तक दूसरी बोलियों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नही रह सकती थी. स्थाई आवास और खेती तथा कौशलों के विकासक्रम में यह संपर्क और साझेदारी अपनी निजता बचाए रखने के बाद भी बढ़ी और बड़ी सामाजिक इकाइयां बनने के साथ अनेक का अपने परिवेश की प्रधान भाषा में विलय हो गया. इससे क्षेत्रीय बोलियों का चरित्र उभरा जिनकी तलहटी में कई बोलियों के तत्व लक्ष्य किये जा सकते हैं. तमिल जिसकी पुरातनता की बात हमने की है उसमें अनेक बोलियों की मिलावट के बाद यह रूप बना है जिस पर संस्कृत के तत्वों का समावेश बाद में हुआ, परन्तु स्वयं संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया में सम्मिलित कतिपय बोलियों का प्रभाव तमिल की भी निर्माण प्रक्रिया पर पड़ा था.
आज की तिथि में हम यह तय नहीं कर सकते की उन विलीन होने वाली बोलियों की ध्वनिमाला क्या थी. परन्तु ऐसा लगता है कि बोलियों का आंचलिक स्वरूप निर्धारित हो जाने के बाद भी पारस्परिक सम्पर्क में आने वाली बोलियों में से कुछ में केवल घोष महाप्राण, कुछ में केवल घोष अल्पप्राण ध्वनियाँ थीं और किसी में पाँचों वर्गीय ध्वनियाँ न थीं. एक में तालव्य ध्वनियों का जोर था तो दूसरी में मूर्धन्य ध्वनियों का. सभी स्वर किसी में न थे. यहाँ तक कि अ और आ जैसी ध्वनिया तक कुछ में नहीं थीं, और कुछ में ह्रस्व और दीर्घ स्वरों का अर्थभेदक प्रयोग नहीं होता है. परन्तु ऋग्वेद की भाषा के अस्तित्व में आने से पहले संस्कृत की उस वर्ण माला की सभी ध्वनिया जिनका उल्लेख पाणिनि ने माहेश्वर सूत्र में किया है मानक भाषा में समाहित हो चुकी थीं. इनमे से कुछ ध्वनियाँ, जैसे ऋ और लृ वैयाकरणिक कंस्ट्रक्ट हैं, जिनका व्यवहार किसी बोली में नहीं होता था. पर वैदिक में इनका भी प्रयोग हो रहा था. यह वह मोटा दायरा है जिसमें हम इस लेनदेन को समझ सकते है.

Post – 2017-07-11

तुक-बेतुक

जवानी के दिन तो जवानी को दिन थे
न मेरे थे वे मन के मानी के दिन थे।
वे मस्ती के और फाकामस्ती के दिन थे
वे सपनों के दिन थे कहानी दिन थे।
वे घुटने तड़पने बहकने के दिन
बद हवासी के दिन बदगुमानी के दिन थे।
वे मरने के लाखों बहानों के दिन थे
रकीबों की भी मेह्रबानी के दिन थे।
कई राज थीं खोलतीं झुक के पलकें
तुम्हारे भी वे आनाकानी के दिन थे।
सरे राह कुछ गुल खिलाने के दिन थे
जवानी के दिन छेड़खानी के दिन थे।
वे दिन देखिए तो हवा हो गए हैं
मगर जब तलक थे जवानी के दिन थे ।

Post – 2017-07-10

संस्कृत वर्णमाला का विकास

किसी भी चीज को समझने के दो तरीके हैं। एक दैवी उत्पत्ति जो सभी क्षेत्रों में डार्विन से पहले दुनिया के सभी समाजों में अपने अपने ढंग से चलता था। इसे महत से तुच्छतर के क्रम में तुच्छतम तक के ह्रास और पतन का सिद्धान्त कह सकते हैं। दूसरा डार्विन के बाद से तुच्छतम से महत का क्रमिक उद्विकास ।

चार्ल्स डार्विन ने अपनी विकासवाद की पुस्तक १९५९ में प्रकाशित की। कुछ समय घबराहट में बीते और फिर धीरे धीरे इसे स्वीकृति मिली। डार्विन की मृत्यु १८८२ में हुई । हाल यह कि मैक्समूलर जैसा व्यक्ति डार्विन के पुत्र से विकासवाद के सिदधान्त के विरोध में बहस कर रहा था।

इसका फलितार्थ यह कि संस्कृत के आतंक, बाइबिल की सृष्टिकथा से तालमेल बैठाते हुए उन्नीसवीं शताब्दी के सास्युर -पूर्व का भाषाविज्ञान प्राकवैज्ञानिक युग का भाषाविज्ञान है जिसकी विश्वसनीयता सन्दिग्ध है। इसमें ही ध्वनि नियम और आद्य रूपों की पुनर्रचना और आद्य भारोपीय का पूरा ढांचा तैयार हो गया, इसलिए वह पूरा तामझाम ही उल्टा है । इसका सही पाठ इसका उल्टा पाठ है।

मार्क्स ने हीगेल को उल्टा भले खड़ा कर दिया हो उनका अधिकांश लेखन डार्विन पूर्व है, इसलिए विज्ञान की दुहाई देने के बाद भी अवैज्ञानिक या प्राग्वैज्ञानिक है।

मार्क्स की याद तो हीगेल को सिर के बल खड़ा करने के मुहावरे से आ गई। कहना यह था कि भाषाविज्ञान को सही करने के लिए पहले की अवधारणाओं को अमान्य करने की, परन्तु उनके द्वारा जुटाई गई सामग्री का आदर करते हुए, उसे नई व्यवस्था के अनुरूप उपयोग में लाने की एक नई चुनौती है। यह है महत या परिनिष्ठित भाषा के क्षरण और ह्रास से बोलियों और उपबोलियों का आविर्भाव की अवधारणा। इसे उलट कर इसका पाठ, अर्थात् तथाकथित उपबोलियों से, जो स्वत: बोलियां या उपबोलियां न थीं, अपितु भाषाएं थीं, क्रमिक उत्थान से मानक भाषाओं का जन्म नहीं, समायोजन और पुनर्गठन हुआ है ।

इस विषय में सास्युर की दृष्टि साफ न थी, ऐसा मुझे लगता है। पर उन्हे इसी दौर मे हुए रोमांस भाषाओं के अध्ययन से, जो संभव है डार्विन से प्रेरित रहा हो, अपनी दृष्टि मिली थी जिसमें यह तथ्य भी सामने आया था कि मानक भाषाएं बोलियों में से किसी के, किन्हीं कारणों से क्रमिक उत्थान से गठित हुई हैं ।
क्रमश:

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Post – 2017-07-10

कुछ नीतिकथाएं होती हैं जिन्हें हमें बचपन में ही सिखाया जाता है कि जिन्दगी में मार्गदर्शन करेंगी परन्तु बड़े हो कर हम जिन्हें भूल जाते हैं या याद भी रहीं तो यह मान लेते हैं कि बचपन में सिखाई बातें बच्चों के काम की ही होती हैं। ऐसी ही एक कथा भेड़िया आया भेड़िया आया की है। नसीहत के बाद भी जब भेड़िया नहीं आया था हमने चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘भेड़िया आया भेड़िया आया” और भेड़िये को लगा हमें कोई बुला रहा है सो चला आया। पर यह ऐसा भेड़िया था जो लोगों को आदमी जैसा दीख रहा था. जब चला आया तो चीखना शूरू कर दिया, ‘‘भेड़िया भेड़िया दीखता नहीं पर है भेड़िया ही, अब हमें खा जाएगा।’’ लोग प्रतीक्षा करते रहे अब खाएगा कि तब, परन्तु उसने शोर मचाने वालों को भी महज सूंघ कर छोड़ दिया। ”
अब ललकारने लगे, “तूने तो हमारी साख ही खत्म कर दी, आ जल्दी मुझे खा जिससे लोगों को विश्वास दिला सकूँ की तू सचमुच भेड़िया है.”
तीन साल से यही शोर. थमने का नाम ही नहीं ले रहा. भेड़िया बहरा तो नहीं!

Post – 2017-07-09

बुद्धि के आढ़ती

इस बार मैने ही उसे घेरा, ‘‘अजीब बात है यार, ललकारते हो, इस बार नहीं छोड़ूगा, अब बचकर जाने न दूंगा, और जब समझाता हूं तो तुम्हारा सिर फटने लगता है। यदि मेरी बात सही लगती है, उसका जवाब नहीं सूझता तो उसे मान लेना चाहिए या जीतने हारने की उठापटक में अपना सिर फोड़ लेना चाहिए?’’

उसने कोई जवाब न दिया तो सहम गया, ‘‘क्या सरदर्द अभी तक जारी है।’’

‘‘सिर दर्द अगर एक हो तो उसके उपाय हैं, वह होता भी अस्थायी है, पर जिस सिरदर्द के साथ बैठा हूं उससे निजात पाने के लिए तो कोई दवा बनी नहीं है।’’

मेरी जान में जान आई, अब उसका लिहाज करने की जरूरत नहीं थी, ‘‘जो लोग तुमसे भिन्न राय रखते रहे हैं उनकों तुम उपेक्षा और लानतों से ही अन्धलोक में पहुंचा देते रहे हो, उस खतरे को जानते हुए भी मैं तुमसे लगातार उलझता रहा हूं पर मेरे पास खोने को कुछ न था, इसलिए पाना ही पाना था और तुम्हें गणित के नियम से खोना ही खोना था। तुम मुझसे सहमत हो कर खोने और शिफर होने की दुर्गति से तो बच सकते थे!’’

वह चुप रहा, ‘‘देखो सामना होने पर जीत का एक ही रास्ता खुला रहता है, सत्य को नतशिर हो कर स्वीकार करना। तुम जिस विचारधारा से जुड़े हो, वह विचारधारा होती तो वह भी यही करती। वह विश्वासधाराा है यह मैं लगातार याद दिलाता आ रहा हूं। विचारधारा हो तो उसमें विचार की छूट रहेगी। विश्वास है तो असहमत लोगों से परहेज और घृणा से काम लिया जाएगा। तुम किसी सिरे से जांचो, नतीजा उत्साहवर्धक नहीं मिलेगा। इसलिए कई बार मुझे आश्चर्य इस बात पर होता है कि इतने सारे प्रखर मेधा और प्रतिभा संपन्न लोग सदाशयताा के दबाव में इतने लंबे समय तक मूर्ख बनाए जाते रहे और भेड़ बकरियों की तरह इस्तेमाल किए जाते रहे। सामी मजहबों ने एक बहुत सुन्दर उपमा दी है, धर्मपराणय लोग, अपने विश्वास के कारण भेड़ बकरियों जैसे बना दिए जाते हैं और उनका देष्टा चरवाहा बन जाता है। यही कम्युनिज्म के साथ भी हुआ।“

‘‘तुम बकते रहो, मैं किसी बात की नोटिस ही नहीं लेता।’’

‘‘तुम्हारे ध्यान न देने से बात दब तो नहीं जाती। यह तो शुतुरमुर्ग जैसा बचाव हुआ। इसका सहारा तुमने हमेशा लिया है और इसके अनुपात में ही लोग यह मान कर कि तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं है, उनकी बात सुनने और मानने लगे जिनकी तुम नोटिस नहीं लेते। क्या इतनी समझ भी न रह गई है तुम लोगों में?’’

‘‘क्या कहूं, मुझे जो कहना है वह तो तुम खुद कह दे रहे हो। तुम मान चुके हो कि सारे प्रखर मेधा और प्रतिभा के लोग जिस विचार से जुड़े हैं वह मेरा विचार है। निष्कर्ष यह कि तुम मूर्खो के साथ हो। क्या हम मूर्खों को सिर चढ़ाते फिरेंगे?’’

“ऐसा भूलकर भी न करना। तुम्हारी रीढ़ इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह तुम्हारे सिर का बोझ भी नहीं उठा सकती। कोई और बोध या जिम्मेदारी तो उठा ही नहीं सकती। यह तो वे लोग हैं जिन्हें तुम औसत दिमाग का कह कर हंसते हो, जड़ पदार्थों का भी बोझ संभाल कर चलते हैं और उनके इस चलने से ही दुनिया चलती है। तुम तो दुनिया को गर्क करने वालों में हो, तुम्हें यह रास न आएगा।’’

वह झुंझला गया, ‘‘अपने दिल पर हाथ रख कर कहो, क्या वाम से जुड़े सभी लोग दुनिया को बिगाड़ना चाहते हैं? और दक्षिण जो पूरी दुनिया में विचार की संकीर्णता के लिए जाना जाता रहा है, वह दुनिया को बनाना चाहता है?’’

‘‘सदाशयता को उनकी सबसे बड़ी आकांक्षा तो मैं पहले ही कह आया हूं यार! यह कैसे कह सकता हूं कि वे दुनिया का अहित करना चाहते हैं। मैं तो यह कह रहा था कि उनके पास सब कुछ है, प्रतिभा, बौद्धिक प्रखरता, सदाशयता फिर भी वे इनमें से किसी का उपयोग नहीं करते, या जिस रूप में करते हैं उसका नतीजा यह कि दुनिया का जितना अहित इनके हाथों हुआ है, उतना उन कमअक्लों से भी नहीं हुआ है जिनको इनकी सूझ और समझ की जरूरत है, परन्तु सबसे पहले तो यह उनकी जरूरत है कि उनके पास जो कुछ है उसके महत्व को जानें और उसका स्वतन्त्र रूप में उपयोग करें।

“वाम पंथ एक भावधारा है और दक्षिण पंथ एक भिन्न भावधारा है। विचार दोनों में नदारद है। जरूरत संवाद के द्वारा उसे ही जाग्रत करने की है। यही मैं लगातार कहता आया हूं। किसी के कहने पर मत चलो। अपने दिमाग से काम लो। विडंबना ही है जिके पास बहुत अधिक दिमाग है वे उसे तिजौरी में बन्द करके बुद्धि के आढ़ती होने का दावा कर रहे हैं।’’

Post – 2017-07-08

अपराधी कौन ?(2)

“हाँ अब बताओ! भागने न दूँगा अबकी बार।”
“मैं स्वयं चाहता हूँ तुम इसे समझो। इससे जुड़े तीन पहलू हैं। पहला भावना और विवेक से जुड़ा. दूसरा इसके क्रिया-कलाप से जुड़ा, और तीसरा इसके इतिहास से जुड़ा।

एक कागज़ है, हमने फाड् कर फ़ेंक दिया। उसे कुचल दिया। उसपर थूक दिया. रोज करते हैं। कोई ध्यान तक नहीं देता है। एक दूसरा कागज है जिसके फटने की अफवाह पर दंगे हो जाते हैं क्योंकि प्रचारित किया जाता है कि वह कुरान का पन्ना था। उत्तेजना में कोई यह पता लगाने की कोशिश नहीं करता कि सचमुच ऐसा हुआ भी या नहीं। कोई तर्क नहीं करता कि कुरान शरीफ की आयते मुस्लमान के लिए मान्य है., किताब की वह पूजा नहीं करता, वरना मूर्तिपूजा हो जाएगी। कोई यह समझा नही सकता कि जिसने फाड़ा है उससे एक की जगह सौ पोथियों की मांग करें। प्रश्न किताब का रह ही नहीं गया। यह किसी मुस्लमान द्वारा हुआ हो तो ध्यान भी न दिया जाय। परन्तु यदि किसी गैरमुस्लिम ने ऐसा किया है तो उसका इरादा मुसलमानों की भावनाओं को आहत करने का है, यह जातीय अपमान है और इसको सहन नहीं किया जा सकता।

कोई मुझसे पूछे तो मैं कहूंगा यह व्याख्या सही है। इस पर क्या किया जाना चाहिए इस पर मेरी राय दंगा करने वालों से थोड़ी अलग होगी। पहली यह कि पता लगाओ ऐसा सचमुच हुआ है या नहीं। यदि हाँ तो उस व्यक्ति को पकड़ो और उसे इसकी सजा दो/ दिलवाओ। यदि पकड़ नहीं सकते तो सरकार से मांग करो कि वह उसे पकड़े और दण्डित करे और यदि पता चले कि सरकार कुछ नहीं कर रही तो उस सरकार के विरुद्ध आंदोलन करो। परन्तु इस आदर्श आचार का पालन किसी समाज में होते देखा नहीं गया।

“गाय और गोजाति से जुड़े सवाल को उसके भौतिक पक्ष में वहाँ नहीं समेटा जा सकता जहाँ इसे सचेत रूप में या हेकड़ी में हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने के लिए, योजनाबद्ध रूप में किया गया हो। यह, तुमने ठीक कहा, “आ बैल नहीं, आ सांड मुझे मार” की दावत देना है और ऐसी हालत में सांड अगर मारने लगे तो दोष सांड को नहीं उसे दावत देने वाले को देना होगा।”

“यह सब कुछ भाजपा के सत्ता में आने के बाद ही होना था।”

“यह सवाल तुम मुझसे मत करो। . अपने आप से करो कि यह काम तुम कबसे करते आये हो, इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी , और उससे तुमने क्या सीखा ? यदि नही सीख पाते तो तुम्हारी बुद्धि कहाँ रहती है? किसके काम आती है? जिसके काम आती है उसे देश और समाज की चिंता है या दोनों को बर्वाद करने की कीमत पर केवल अपनी गद्दी और लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदलने की आतुरता है? दोषी कौन है और तुम दोष किसे दे रहे हो?”

“तुम्हारा दिमाग क्या है यार। यह सब हम करा रहे है?”

“तुम नही करा रहे थे। तुम्हारा भाजपा द्रोह करा रहा था। तुम्हारी घबराहट करा रही थी। कराने वालों की दुर्गति, और उससे उबरने के लिए लगाया जाने वाला दांव जुगत और पैसा करा रहा था। जो हो रहा था तुम्हारी शह और सलाह और सहयोग से हो रहा था पर तुम उनके साथ थे क्योंकि गोमांस को लेकर हिन्दू समाज को आहात और अतिसंवेदी बनाने का काम तुमने आरम्भ किया था।”

“अरे भाई अब तो ऑंखें खोलो । अब तो छत्तीसगढ़ में भाजपा का बन्दा पकड़ा भी जा चुका है।”

“भाजपा के कड़े सन्देश के बाद भी ऐसा करने वाला भाजपा में घुस कर तुम्हारा काम करने वाला बन्दा हुआ, यह क्यों नहीं समझते? फिफ्थ कॉलमिस्ट, पांचमार्गी, भितरघाती ये सारे तुम्हारे मुहावरे और तुम्हारी रणनीती में आते हैं। उस व्यक्ति को कुछ करते नही पाया गया, वह वहां देखा गया था और पहचान लिया गया था और उसे भाजपा ने भी पहचान लिया था और जेल में डाल दिया। और अब तुमने जान लिया कि लुटेरों और तस्करों की जिस जमात को भड़का कर तुम यह उपद्रव करा रहे थे वह आगे कारगर न होगा। इसीलिए कह रहा था अब आगे ऐसा नहीं होगा, इसलिए इस मसले को भूल जाओ। अब जो करना होगा गुंडे नहीं करेंगे, कानून करेगा इस लिए वे पार्टिया भी न होंगी जिनसे तुम लोगों ने यह अभियान शुरू किया था।“

“समझ में नहीं आता कि मैं अपना सर फोड़ लूँ या तुम्हारा फोड़ दूँ!”

“ऐसी नौबत आ ही जाय तो मेरा सर ही फोड़ना । इसमें से कुछ निकलेगा तो सही। अपना फोड़ोगे तो खप्पर ही अलग होगा और राजनीति के नाम पर शवसाधना करने वालों के ही काम आएगा । लेकिन अभी धीरज से सुनो। तीसरा पहलू तो अभी चर्चा में आया नहीं।”

उसने अपने सर पर थप्पड़ मारा और मुंह लटका कर बैठ गया। पता नहीं मेरी बात सुनने की स्थिति में था भी या नहीं। वह सुने या न सुने, मुझे तो अपनी बात पूरी करनी ही थी,
“देखो कुछ बातें होती हैं जो मजहबी न होकर सांस्कृतिक होती हैं, परन्तु समुदाय विशेष या सम्प्रदाय विशेष के उससे जुड़ाव के कारण ऐसा भरम पैदा करती हैं!”

लगभग आठ सौ साल तक इस देश में मुसलमानों का प्रभुत्व रहा है. ब्रितानी शासन से कई गुना। राजा का वेश, रूचि, जीवनशैली, भाषा सबकुछ इतर जनों के लिए अनुकरणीय होता है और इस तरह सांस्कृतिक श्रेष्ठता और कनिष्ठता का एक अलिखित क्रम बनता है. १- राजा और राज परिवार, २. अमला वर्ग, ३. राजा के धर्मबंधु ४. इनके अनुसार अनुकूलित होने वाले इतर जान; ५. इतर जनों में किसी भी कारण से अपनी श्रेष्ठता का दावा करने वाले लोग, ६. इन सभी से वंचित जनसमाज। इन वंचितों को ऊपर की श्रेणियों में आने वाले सभी लोग तुच्छ समझते हैं और यदि इनका बाहुल्य सम्प्रदाय विशेष से हो तो पहली तीन कोटियों के लोग उस समाज को ही तुच्छ मानने तो तत्पर होते हैं। हिन्दू समाज के प्रति मुसलामानों का एक प्रकट-गोपन परन्तु स्थाई भाव यही रहा है। और इस मामले में हिंदू होते हुए भी कायस्थों का आकलन मुस्लिम आकलन के अधिक निकट पडेगा, इसलिए हमारा सुझाव है कि इस मजहबी नहीं सांस्कृतिक नजरिये से देखना अधिक सही होगा।

इससे अहंता के दो प्रतिस्पर्धी शिविर बनते हैं जो अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानते और दूसरे से मनवाना चाहते हैं और वैसा न होने पर उसे नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं।
ब्राह्मणों और उनकी जीवनशैली और मूल्य प्रणाली से मुस्लिम संभ्रांत वर्ग की नफरत मध्य काल से चली आई है और आधुनिक काल में यह ईरानी अरबी संस्कृति और भारतीय संस्कृति और कुछ और बढ़ कर पश्चिमी और पूर्वी सभ्यता के टकराव का रूप ले लेती है जिससे असहमत होने वाला व्यक्ति मुस्लिम समुदाय में अभी तक नही तलाश पाया, इस पर पर्दा डालने वाले अवश्य मिल जाएंगे। इतिहासकार का काम परदों का मूल्याङ्कन करना नहीं होता। अब इसके सामाजिक…”

मैं अपना वाक्य पूरा करता इससे पहले ही उठ खड़ा हुआ।

“क्यों क्या हुआ?”

“माईग्रेन का दौरा ।” उसने अपना सर एक ओर को झुंका रखा था और हाथ की मुट्ठी से उसे दबाने की कोशिश कर रहा था। सर फटने के मुहावरे को सचमुच चरितार्थ कर देगा यह तो पहले सोचा ही न था.

Post – 2017-07-07

अपराधी कौन ?

“भई, मान गया तुम्हारा लोहा।” उसने दूर से ही मुझे देख कर दोनों हाथ जोड़ लिए थे, “इतनी बार इतने कोनों से घेरना चाहा, और तुम हर बार बच कर निकल गए।”

मैं सचमुच समझ नहीं पाया कि उसका इशारा किस बात की और था, पूछा किस घेरेबंदी की बात कर रहे हो मैं तो किसी भी समस्या से बचने की जगह उलटे उसकी चीर-फाड़ करते हुए इतना बढ़ा देता हूँ कि कई बार यह समझ में नहीं आता कि इससे बाहर निकलूं भी तो कैसे और तुम बच कर निकलने की बात कर रहे हो। यह कला तो मुझे तुम लोगों से सीखनी है।”

“हम तो अब एक ही कला में पारंगत रह गए हैं। इसे ‘आ बैल मुझे मार कला’ कह सकते हो।

“तुम कहते हो तो ठीक ही कहते होंगे, पर मैं किस मुद्दे से कब बच कर निकला?”

“वही जो गोरक्षकों की गुंडागर्दी का मामला था।”

“हमारी दोस्ती के पचास साल तो हो ही गए होंगे।”

“पचपन, बासठ से सत्रह तक, पचपन “।

“चलो, तुमने उसमे पांच साल का और इजाफा कर दिया। इतनी पुरानी दोस्ती को मैं तोड़ना नहीं चाहता। अकेला मैं हूँ जो यह जानता है कि इसे कौन करवा रहा था। ऎसी बातें समझ ली जाती हैं पर कही नहीं जातीं। मुहाविरे में तो सिर्फ दीवारों के कान होते हैं, पर सचाई यह है कि हवा के भी कान होते हैं। एक बार तुम्हारा नाम जबान पर आ गया तो पुरे ज़माने में शोर मच जाएगा। तुम आबरू गँवाओगे और मैं एक इतना पुराना दोस्त,जिसके लब इतने शीरीं हैं कि गालिया देता है तो भी बदमजा नहीं होता।”

वह भड़क उठा, आवाज तो ऊँची होनी ही थी, “मैं कराता रहा हूँ यह सब? दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?”

“ऐसी बातें ऊँची आवाज में नहीं की जातीं. लोग मानने लगे हैं की पेड़ पौदों के भी कान होते हैं।
ऊँचा बोलो तो वे सुन भी लेते हैं और तनिक भी हवा चली तो फुसफुसाते भी हैं। मैं जो कहता हूँ उसे ध्यान से सुनो। उसके बाद तुम जो भी कहोगे मैं चुपचाप सुन लूँगा।”

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इसका क्या जवाब दे ।

“तुम मेरे साथ टहलते हो, मुझसे बातचीत करते हो तो देखने वालों को यह भरम होगा की तुम्हारी जानकारी अच्छी तो होगी ही। ऊँचा बोलोगे तो वे समझ जायेगे कि तुम्हारा इतिहास ज्ञान गुजरात तक पहुंचता है, उसके अलावा तुम्हे ठीक उससे पहले के गोधरा तक का ज्ञान नहीं, और वर्तमान ज्ञान केवल गोरक्षकों की गुंडा गर्दी तक सिमट कर रह जाता है और किसी चीज का ज्ञान ही नहीं। तुम्हारी बौद्धिक मृत्यु तो इसके साथ ही हो जायेगी, जिसे मैं सहन न कर पाऊँगा। मैं तो जानता हूँ, तुम परले दर्जे के बेवकूफ नहीं हो, दुनिया में तुमसे भी बड़े बेकूफ खोजने पर जरूर मिल जायेंगे, पर दूसरों को कैसे समझाऊंगा, जब वे कहेंगे उन्होंने अपने कानों जो सुना है उसके आधार पर अपनी राय बनाई है।”

वह कुछ बोलने को हुआ तो मैंने बरज दिया, “अब राहत की बात यह है कि आगे से यह गुंडागर्दी बंद हो जाएगी, इसलिए इसको लेकर अधिक चिंतित होने की भी ज़रूरत नहीं।”

उस बदहवासी में भी वह जोर से हंसा, “अब समझ में आया। अब तक जो होता आ रहा था उसमें तुम्हारी भी मिली भगत थी। “

“मैं तुम्हारे मज़ाक को झेल जाऊँगा, पर जब यह उजागर होगा कि गाय के प्रति हिन्दू संवेदनशीलता का दुरूपयोग करते हुए जो कुछ गुंडागर्दी के स्तर पर हो रहा था उसे तुम लोग करा रहे थे तो कहीं मुंह दिखाने लायक रहोगे? खैर, जब मुंह मुहाना बन गया हो तो मुंह दिखने या दिखाने का प्रश्न ही अतिप्रश्न है।”

उसकी समझ में न आया कि मैं कह क्या रहा हूँ । मैंने भी उसे सस्पेंस में रखते हुए कहा, “यह तुम्हे कल समझाऊँगा ।”