Post – 2017-09-22

Those who find recent utterances of Raga in America ridiculous, may be oblivious of the fact that he is only maintaining` thentradition. Recall a more ridiculous exercise by entire opposition from both the houses approaching the then president of America ( letter dated November. 2012 made public on 20th July 3013). an extract from the report published in Hindu:

Sixty-four members of Indian Parliament (25 from the Lok Sabha and 39 from the Rajya Sabha) petitioned U.S. President Barack Obama to advise the State Department not to reconsider its 2005 decision to deny Gujarat Chief Minister Narendra Modi an entry visa because of his association with the 2002 riots, in which more than a thousand people, many Muslim, were killed.

Be sure, such desperate exercises serve Modi better and add to their own disaster.

Post – 2017-09-21

कुहासे की चमक से भी नई तस्वीर बनती है

कुहासा घना हो तो सूरज दिखाई नहीं देता, पर कुहासे में एक सुनहली चमक आ जाती है। यह चमक दृश्य को धुंधली रंगीनी से भर देती है, पर यदि हवा का कोई झोंका आए और कुहासे की घनी पर्त उड़ जाय, सामने न होने जैसी पतली झिल्ली रह जाए तो दृश्य एकाएक इतना स्पष्ट हो जाता है कि लगता है आप उसका स्पर्श भी कर सकते हैं और फिर गहराते कुहासे में संशय उत्पन्न हो सकता है कि जो दीखा था उसके मानसबिंब का कितना अंश सच है और कितना काल्पनिक!

मेरे मुंडन का पूरा दृश्य चल चित्र की सी स्पष्टता से आंखों के सामने कई बार उपस्थित हुआ होगा, जांच कभी न की। ननिहाल से लौटने और तीसरा साल पूरा होने से पहले, गर्मियों की कोई सुबह थी। घर से निकलने से मुंडन के समय तक के दृश्य चित्र इतने स्पष्ट कि लगे कुछ भिऩ्न हो ही नहीं सकता और लिखते समय लगे सच तो कुछ और था।

मुंडन समै माई के थान पर होना था, जो घर से दो मिलोमीटर की दूरी पर था। वहां तक जाने के लिए बैलगाड़ी का रास्ता चार किलोमीटर का हो जाता था। यह पहले गांव के फाटक से आगे सड़क से जुड़ता था और फिर मंगल की बाज़ार और इतवार की बाज़ार से होते हुए गजपुर जाने वाले रास्ते पर चल कर समै माई के थान पहुंचता था जहा नीम के एक पेड़ के नीचे एक बड़ी बेदी थी, जिस पर, मिटटी के हाथी घोड़े देवी की सवारी के लिए थे, पर देवी की कोई प्रतिमा न थी। सम्मै माई के नाम ने मुझे बाद में खासी उलझन में रखा, कि ‘समय’ तो पुल्लिंग है, यह माई कैसे हो सकता है, पर ये बहुत बाद की बाते हैं।

माँ यूँ भी पैदल अधिक दूर तक चलने की स्थिति में न थी, परन्तु घर की दीवारों में बंद रहने के कारण हमारे घरों की महिलाओं के पाँव बंध जाते थे। यह पाँव बंधना उस समय की चीनी महिलाओं के पाँव बंधने जैसा तो नही था और घर के भीतर इधर से उधर उन्हें चलना भी काफी होता था, पर बाहर खूली राह पर डग भरते हुए लगता उनके पांव आपस में टकरा जायेंगे. झाड़ू-बर्तन से लेकर चूल्हे चौके, कूटने, पीसने, दलने, तक वे बहुत काम करती थी, जिसमे झपट कर कहीं पहुंचना भी शामिल था, पर सधी चाल से जैसे खेती बारी में हिस्सा लेने वाली ओरतें और पुरुष चलते उस तरह चलना अटपटा लगता था। वैसे बाहर निकलते ही हैसियत का भी ख्याल रहता था, इसलिए उन्हें कहीं जाना होता तो ओहार लगी बैलगाड़ी सजाई जाती जो ठीक निकास के सामने खडी होती और वे उसमे दाखिल हो जातीं।

घर में मोटी साड़ी भले पहनें, पर घर से बहार निकलते समय शादी के समय चढ़ावे में मिली बूटेदार सिल्क की साडी और सलूका, ऊपर से मलमल की झालरदार चादर में लंबा घूँघट निकाले दरवाजे बाहर आतीं और गाड़ी के भीतर घुस जातीं। ये कपड़े उसके बाद फिनायल की गोलियों के साथ संदूक के हवाले कर दिए जाते और मघा नक्षत्र की धूप दिखाने के लिए बाहर निकलते और फिर सहेज कर रख दिए जाते।

उस दिन मां की नारंगी रंग की चमकदार झालर लगी चादर का ध्यान है, चेहरे का नहीं। मैं अपने लंबे बालों को पसंद करता था और यह जानकर कि वे कट जायेंगे घबराया हुआ था। बाबा ने फुसलाने के लिए मंगल की बाज़ार में हलवाई की दूकान से एक बड़ा गट्टा लेकर मुझे थमा दिया होगा पर जो चित्र बनता है वह इतवार की बाज़ार से सटी सड़क पर ओंकार की दूकान का है। चित्र इस जानकारी के बाद भी बदल नहीं पाता कि गजपुर का रास्ता तो उससे पहले ही डुमरी से कुछ आगे सड़क से अलग हो जाता था इसलिए उधर बढ़ने का सवाल ही नही।

ननकिसोर (नन्द किशोर) नाई बूढ़ हो चले थे। उनका छुरा भी बच्चों के सिर को लहूलुहान करने के लिए ही तैयार किया गया था। मेरी लटों को तो तेल और कंघे से साफ कर लिया जाता रहा होगा, परंतु चुपड़े जानेवाले तेल और धूल मिट्टी मे खेलते समय उड़ कर सिर में जमने वाली धूल से बनी पर्त छुरे की धार से ही उतरनी थी। उस्तरे की धार के खुरदरेपन के कारण सर में खरोंचें पड़ने के साथ तिलमिला कर मैं सिर झटकने की कोशिश करता जिससे गर्दन तो न कटती पर खून खराबा तो हो ही सकता था। इसका पूर्वानुमान करके एक ओर तो भुलावे में रखने के लिए मुझे एक बड़ा सा गट्टा पकड़ा दिया गया था और दूसरी ओर मेरे पीछे की ओर से किसी ने मेरा सिर पकड़ रखा था। पकड़ खास ऐसे समय सख्त हो जाती जब मैं सिर झटकने के लिए गर्दन तानने चलता। ननकिशोर का हाथ छुरा लिए अलग हो जाता। ननकिसोर बालों को मुलायम करने के लिए बार-बार पानी से भिगोते। बाल कटने के साथ उसके भीगे हुए लच्छे नीचे गिरते। एक दो गट्टे से चिपक भी जाते। मैं रोता हुआ गट्टे को चाटता जाता। अब याद आया। मैं जमीन पर नहीं बैठा था। मुझे किसी ने गोद में संभाल रखा था। कौन था वह, याद नहीं आता। एक भी बाल जमीन पर न गिरे, इसलिए मां ने अपना आंचल फैला रखा था। आंचल, आंचल में गिरते बालों के लच्छों की पक्की याद है, पर मां के चेहरे का नहीं।

और अंत में आया होगा सबसे तकलीफ देनेवाला क्षण, ऐंटीसेप्टिक लेप, खली, सरसो के तेल और पानी का घोल, जिसकी छरछराहट के बाद के अनुभवों के आधार पर जानकारी तो है, पर इस चित्ररेखा में वह गायब है, हां लपसी बनने की याद है, पूड़ी छनने की नहीं, खाने की बिल्कुल नहीं।

इसमें हुई घाल (वस्तु या सचाई को घटाना) और मेल (जो था ही नहीं उसे मिलाकर पूरा करने या नए रूप में ढालने का प्रयत्न) के विषय में पहले सचेत न था। लिखते समय हम अपने को अधिक अच्छी तरह जान पाते हैं, कयोंकि लिखते समय हम अपने आप से बाहर आकर अपने को एक वस्तु के रूप में देखते हैं। यही हमें लेखक बनाता है। जो ऐसा नहीं कर सकते वे कलमकार हैं, लेखक हो ही नहीं सकते।

विश्वासों से जुड़े लोग, विचारधाराओं से जुड़े लोग, संगठनों से जुड़े लोग, आंदोलनों से जुड़े लोग कलमकार बन कर रह जाते हैं, लेखक बन ही नहीं पाते। लेखन के साथ वही जिम्मेदारी होती है जो न्यायविचार के साथ। कलमकार स्क्रिप्ट राइटर होता है, गलत को भी सही बना कर इतने प्रभावशाली ढंग से पेश कर सकता है और समझा सकता है कि रूसी से बालों को बचाना, फांसी से गर्दन बचाने से अधिक जरूरी है।

इस चित्ररेखा में गट्टे की एक याद का कुछ समय तक बना रहना, तब तक सही लगना और फिर बदल जाना कुछ वैसा ही है जैसे स्वप्न बिंबों में आए बदलाव– जब तकदूसरा स्थान नहीं लेता तब तक सही।

Post – 2017-09-19

कैसे तिनकों का आशियाना था

कितने टूटे अधूरे टुकड़ों को जोड़कर बनाने की कोशिश करता रहा एक कोलाज। इसे तो यादों का मलबा तक नहीं कहा जा सकता। मलबे में तो खंडित अवस्था में इतने टुकड़े वहीं मिल जाते हैं कि उन्हें जोड़ कर मूल का प्रतिरूप तक बनाया जा सकता है। पुरातत्व से जुड़े लोग ऐसा कर भी लेते हैं। परन्तु यहाँ तो आंधी में उधियाए हुए रेशों को पहचानने, पकड़ने और उन्हें मिला और ऐंठ कर, ऐसा तार बनाने की समस्या थी, जिससे यह उम्मीद जगे कभी कहीं पिरोया और जोड़ा बुना जा सकेगा। एक रेशा दृश्य, दूसरा श्रव्य और तीसरा अनुमेय और वे भी अन्तरालों के बाद उपस्थित।

उन दिनों माँ से बच्चों को केवल अपने सम्बन्ध का पता होता था। वे मां का नाम नहीं जानते थे। उन दिनों मर्यादा की एक खास समझ के तहत पत्नी न तो पति का नाम ले सकती थी, न पति पत्नी का। विवाह से पहले जो पूर्ण इकाइयां थीं, वे विवाह के साथ अपनी पूर्णता खोकर अपनी ही तरह अपनी पूर्णता खोकर आधी रह जाने वाली अपूर्णता के साथ मिल कर, एक पूर्णता स्थापित करती थी। विवाह, संवाह या सहजीवन नहीं है, निर्वाह (किसी तरह सम्बन्ध निभाना) नहीं है, परस्पर मिल कर पूर्णता की सिद्धि है, जिसमें पति अर्धांग बना रहता है, और पत्नी अर्धांगिनी। दंपति अर्धनारीश्वर हो जाता है ।

मैं नहीं जानता कि अर्धांगिनी की संकल्पना के पीछे मेरी जल्पनाएं सही हैं या गलत, परन्तु इसमें कोई संदेह नही कि मेरे पिता ने कभी मेरी माँ का नाम न लिया और मां को अपना नाम बताने की जरूरत ही न थी। हम बाद की पीढ़ियों जैसे भाग्यशाली न थे। माता पिता अर्धनारीश्वर हो कर भी एक दूसरे से इतने दूर रहते थे कि भरे परिवार में पति अपनी पत्नी को कई बच्चों की मां बन जाने के बाद भी पहचान नही सकता था। दूसरों के सामने अपनी पत्नी से बात नहीं कर सकता था। दूसरों के बच्चों को भले प्यार कर ले, वह अपने बच्चों को प्यार तक नहीं कर सकता था, कोई चूक होने पर दंड अवश्य दे सकता था।

मैं माँ को जानता था, उसका नाम नहीं जानता था। पिता का नाम जानता था, पर उनसे किसी तरह का लगाव न था और बाद में कभी यह किसी से पूछने का न कोई अवसर आया न साहस हुआ कि पूछूं कि मेरी माँ का नाम क्या था। अवसर आया भी तो तब जब सत्तर साल की उम्र में पहचान के सन्दर्भ में कभी पूछा गया, माँ का नाम? मैं उलझन में पड़ गया। नाम तो मुझे पता नहीं था।

उलझन की उस घड़ी में शैशव से आती एक प्रतिध्वनि सी सुनाई दी रमदुलरिआ। आवाज नाना जी की थी। उस आवाज की खरखराहट भी याद आती है और ममता का स्पर्श थी। किस तर्क से, यह बता नहीं सकता, मुझे स्वयं पता नहीं। इससे पहले कभी यह सवाल क्यों न पैदा हुआ, मैं नही जानता। इतने अरसे वह किस कोने में आवाज़ की खराश और आत्मीयता की मिठास के साथ,बचा रहा, मैं नहीं जानता। मैं इनके विषय में किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता, परन्तु एक प्रश्न अवश्य कर सकता हूं। क्या हमारे गहन रागात्मकता के स्मृतिबिंब किसी विशेष योजना के अनुसार व्यवस्थित होते हें जो ध्यान की किसी विशेष अवस्था में, जैसे सम्मोहन की अवस्था में जाग्रत हो जाते हैं।

ध्वनिबिम्ब का एक दूसरा नमूना। माँ के साथ ननिहाल जाते हुए मैं पहली बार ट्रेन में बैठा था। ट्रेन का, डिब्बे की भीड़ का, इंजिन की बनावट का कोई दृश्य स्मृति में अंकित नहीं। मात्र यह याद है कि गर्मी के मौसम में, आगन में, शाम के धुंधलके में, मै लुढ़का पड़ा था और कोई मुझसे पूछ रहा था, ‘ए बाबू रेलिया कै इंजनवा कैसे बोलेला?’ और मै इंजन के भोंपू की नकल उतारते हुए ‘भौओ’ की आवाज कर रहा था।

मैं मां के साथ ननिहाल गया था और वह मायके। गन्तव्य एक ही, पहचान अलग-अलग। वह अपने तीन जीवित और संभव है एक दो मृत संतानों के बाद, पेट में एक बच्चा और गोद में मुझे लिए पहली बार, जो अन्तिम भी सिद्ध हुआ, अपने स्वजनों से मिलने गई थी। कोई नहीं जान सकता कि इस समय मैं लिख नहीं रहा हूं, बिलख रहा हूं। अंकपटल को दबाती उंगलियों से भी, आंखों से भी, और रोना इस बात पर कि यातना तो है, पर यातना सहने वाली को यह यातना प्रतीत ही नहीं होती या प्रतीत होती भी रही हो तो वह पुत्रवती भव के आशीर्वाद का अपमान नहीं कर सकती थी। मुझे जो यातना लग रही है, उसे उसपर गर्व रहा हो। दोष व्यवस्था का थाः

1. जिसमें दोषपूर्ण व्यवस्था के प्रति सम्मान आत्मसम्मान का हिस्सा बन जाता था और यातना के विविध रूप गर्व के विविध रूप प्रतीत होते थे।

2. इसमें पति पत्नी को नहीं जानता, वह अपनी मनुष्यता खो कर एक वस्तु में बदल जाती है, उससे प्रजावृद्धि हो सकती है, संवाद नहीं।

3. शिशु मां को जानता है, पिता को जानता है, समझ नहीं पाता। मां का संतति-स्नेह संभाल में बदल जाता है और सभी को संभाल नहीं सकती इसलिए किसी एक पर केंद्रित हो जाती है जो उसकी हुर्दशा से उसे उबार सके और यह उसका पहला पुत्र ही हो सकता था जो उसकी पहली पुत्रबधू लाकर उसके श्रम भार को हल्का कर सके।

कमियों की तालिका बनाई जा सकती है। अपने को जानने के लिए हम परंपरा की पूजा न करें. उसकी समीक्षा करें।

Post – 2017-09-18

Those who shower abuses on Modi,serve him better by publicly advertising that they are a dirty lot, raising him in public estimation on the one hand and countering their own hype that they have no freedom of expression. But they can not restrain themselves as they have lost their wits in desperation. This is a sad development as it further erodes the possibility of a sustainable opposition. Our democracy is getting uni polar which frustrates the very essence of democracy.

Post – 2017-09-18

कॆांग्रेस पार्टी नीचे से ऊपर तक ऐसे लोगों से भर गई है जो खुद अपना परिचय देते रहते हैं। उसके समर्थक बुद्धजीवियों का क्या होगा?

Post – 2017-09-16

हम यह नही कहते कि कायनात है हमसे
क्या हमने बचाया है ज़माना इसे समझे .

[मै आत्मकथा को सामाजिक विमर्श में बदलने का प्रयोग कर रहा हूँ। शायद यह बात मेरे मित्रों में कुछ की समझ में आये। मेरे अपने जीवन में तो कुछ है ही नहींृ जिसके लिए अपने पाठकों का कीमती समय बर्वाद करूं.]

जब माता या पिता के साथ संतानों के गहन लगाव की बात आती है तो हम प्रायः ईडिपस कंप्लेक्स या फिक्सेशन की बात करने लगते हैं, और विकृति के कुछ मामलों में इसे सही भी पाया जा सकता है, परन्तु दो भिन्न संस्कृतियों की मनोरचना को उनमें से किसी एक को प्रमाण मानकर नहीं समझा जा सकता। उदाहरण के लिए पश्चिमी समाजों में प्राकृतिक कारणों से हिंसा की प्रवृत्ति इतनी प्रबल रही है कि वे क्रूरता को वीरता से अभिन्न मानते रहे और अहिंसा को कायरता बताते रहे। इतिहास गवाह है कि भारतीय योद्धाओं को आमने सामने की ल़ड़ाई में शायद ही कभी हार का मुंह देखना पड़ा हो। हमें एक पाशविक समाज में, समय से पहले सभ्य होने के कारण उनसे पराजित होना पड़ा जो प्रेम और युद्ध में किसी तरह के आचरण को उचित मानते थे। आज हम युद्ध में भौतिक लाभ को भी जोड़ लें। वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से अकल्पनीय प्रगति के बाद भी यदि विश्व मानवता विनाश के कंगार पर खड़ी है तो इसलिए कि युद्ध, लाभ और प्रेम में कुछ किया जा सकता है वाली मूल्य प्रणाली सार्वभौम हो गई है जिसमे जो काम्य है उसकी किसी भी तरह प्राप्ति, श्रेयस्कर हो जाती है।

इसमें शौर्य अर्थात् जो रक्षणीय है उसकी प्राणपण से अर्थात् प्राण की बाजी लगा कर भी रक्षा करने का संकल्प अपनी जान बचाते हुए, धोखे से, चोरी से, विश्वासघात करते हुए, जो दुर्बल हैं, निहत्थे है उन पर प्रहार करके जीतना शौर्य की कसौटी बना दिया गया. कमीनेपन और कायरता का पर्याय है मिलिट्री साइंस।और इसे हमें भी अपनाना पडा। जानवरों से लड़ते हुए आप उन्हें दर्शन बघार कर नियंत्रित नही कर सकते। आपके पास सींग नहीं है तो डंडा हाथ में लेना पड़ता है।

पर किसी भी कीमत पर सफलता सभ्याचार नहीं हैं, पाशविक व्यवहार है इसे समझने के लिए आखेट करने वाले पशुओं के व्यवहार पर ध्यान देना होगा। जिन्हे हम शौर्य का प्रतीक मानते है उन जानवरों में भी क्या इतना दम होता है कि जिस पर वह आक्रमण कर रहा है उसको चुनौती दे सके कि मैं तुमसे सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ हूँ।. वह इसका निर्वाह नहीं करता। चोरी से, छिपकर पास पहुंचता है और एकाएक जब आक्रमण करता है तो उसके हाथ उस दल का कोई बीमार, पहले से घायल या नवजात ही पकड़ में आता है. यह प्राकृतिक बाध्यता है और इसलिए विचारातीत। परन्तु यदि विज्ञान प्रकृति पर विजय है तो यह प्रयोग यहाँ हुआ था और उस समय हुआ था जब विज्ञान और तकनीक अल्प विकसित थे। आज जब विज्ञान और तकनीक ने प्राकृतिक बाध्यताओं पर विजय पाकर उन क्षेत्रो को जिनमें लोग किसी तरह जीवन यापन करते थे, आबादी के अल्पतम दबाव के कारण अधिक आकर्षक बना दिया, यह उनका कर्तव्य था कि वे उन मानवीय मूल्यों की रक्षा करते हुए शौर्य के नए कीर्तिमान रखते जिनमें कुछ नायकों ने हमें निराश नहीं किया है। वे उन्नति के बाद भी अधोगति के मूल्यों को सार्वभौम बनाने पर कटिबद्ध है
जिसमें लाभ लोभ में बदल जाता है । इससे उत्पन्न दुष्परिणामों की तालिका पेश करना हमारा उद्देश्य नही।

इसमें प्रेम बलात्कार का पर्याय बन जाता है, बहुपत्नीत्व या हरम का समर्थन करता है!

मैं नही कहता कि हमारी मूल्य व्यवस्था श्रेयस्कर है। कहता हूँ , यह भिन्न है और मानवजाति का भविष्य इसके निर्वाह पर निर्भर है।

मनोरचना से जुड़े दूसरे सवालों पर भी पश्चिम आगे है इसलिए अनुकरणीय है इससे बचते हुए यह समझना होगा कि हमारी मूल्य व्यवस्था भिन्न है, और एक उन्नत अवस्था की उपज है। इसको समझते हुए हमें अपनी कमियों को भी समझना है और रक्षणीय तत्वों बचाना है। आज की दुनिया को वैज्ञानिक मानवमूल्य प्रदान करने में हम एक सीमा तक सहायक हो सकते हैं। अपने जीवन मूल्यों को समर्पित करने के बाद हम कचरे में बदल जायेंगे और हमारे साथ वही व्यवहार किया जाएगा जो कचरे के साथ किया जाता है.

Post – 2017-09-15

उजाले के तो कई रंग हैं देखा होगा
अंधेरै के भी कई रंग हैं देखा कि नहीं।।

मैं पहले आंखो के प्रति इस खिंचाव का कारण नहीं समझ पाता था। बहुत सारे रहस्य लिखने के क्रम में सुलझते हैं। लिखते समय मैं अपना जाना हुआ दूसरों को बताता नहीं हूं, जो चरित्र, वस्तु, क्रिया सामने आती है उसे समझने की कोशिश करता हूं। यह कोशिश शब्दबद्ध होती है और वह लिपिबद्ध होता चलता है। यही मेरा लेखन है। ज्ञान नहीं, जिज्ञासा मेरी शक्ति है। दृश्यमान के सौंदर्य, क्रीड़ा, यातना, विषाद से गुजरना और उनके अनुरूप अभिव्यक्ति की तलाश जो कभी तो इतनी निरायास होती है जैसे लिख न रहे हों, तरंगाघात के साथ उछलते बहते चले जा रहे हों, और कभी इतना उलझा जैसे जमकातर में फंस गए हों, बाहर निकलने का कोई उपाय नहीं। हंसना, रोना और कभी गर्वानुभूति और कृतार्थता का ऐसा क्षण कि इस बोध से ही अपना विन्यास लिए दर्पोक्ति बाहर आती है और लिखना स्थगित। दर्पोक्तियां मैने बहुत लिखी हैं। दर्पोक्ति इस बोध की उपज है कि मैं दूसरों से इतना विशिष्ट, इतना ऊपर या अपने समय से इतना आगे हूं कि लोगों में मुझे समझने की अल्पतम योग्यता का भी अभाव है, इसलिए खेद इस बात का नहीं होता कि मेरी उपेक्षा हो रही है, गर्वमिश्रित असंतोष ‘उत्पस्यते हि नः कोपि समानधर्मा, कालोह्ययं निरवधिर्विपुलाश्च पृथिवी’ जैसी उक्तियों का रूप ले लेता है। इसलिए प्रशंसा की लालसा नहीं पैदा होती, आलोचना की अपेक्षा अवश्य रहती है। ऐसे ही किन्हीे पलों में उभरी थीं ऐसी पंक्तियाः

कौन समझेगा तुझे ऐ भगवान
किसने पाई है ऐसी दानाई
वे सितारों की बात करते हैं
तू सितारों से बात करता है।

या

आसमानों पर कदम रखते हुए चलता है
तुमने भगवान को देखा कभी आते जाते ।

दर्पोक्तियों के विषय में एक राज की बात यह है कि अन्यत्र कहीं भी कोई अतिरंजना करे, दर्पोक्तियों में अतिरंजना नहीं होती। इनमें शुद्ध आत्मविश्वास होता है – खुद को ही गढ़ना और खुद को ही सजदा करना । दुनिया को खोजना और अपने को पाना और अपने में डूबना और दुनिया को एक नए विस्मयकारी रूप में पाना और आह्लादित होकर अपनी खोज पर जानते हुए भी विश्वास न कर पाना कि यह मुझसे ही संभव हुआ है। गर्वोक्तियां ऐसे ही क्षणों में प्रकट होती हैं, जैसे अपना अवचेतन मुग्ध होकर प्रशस्तिपत्र पेश कर रहा हो। कथनभंगी प्रशस्तिपत्र वाली ही होती है।

यह सब कुछ चेतना में पहले से था पर आज से पहले, ठीक इस क्षण से पहले चाहता तो भी नहीं लिख सकता था। कोई मेरी रचना प्रक्रिया पर लिखने को कहता तो भी नहीं। लिखना हमारे वश में नहीं। हमारे आवेग, तर्कशृंखला, औचित्य और अभिव्यक्ति का तोष लेखन की दिशा और विस्तार को इस तरह प्रभावित करते हैं कि उनके दबाव में जो कहने चले थे वह अनकहा रह जाता है या अधकहा रह जाता है। मैं कहने चला था कि लेखन के क्षण में विषय ही नहीं, महान चिंतकों के उससे संबंधित विवेचन और सूत्रबद्ध विचार भी लेखन को प्रभावित करते हैं।

यदि आप ज्ञानार्जन के क्रम में उन तक पहुंचे हों तो आपको वे विचार अकाट्य प्रतीत होंगे, आपकी विचार प्रक्रिया को नियंत्रित करेंगे, आप को बौद्धिक करतब दिखाने छूट देंगे, पर सही सिद्ध होने के लिए उन्हीं निष्कर्षों पर पहुंचना होगा। आप इस भ्रम के शिकार होंगे कि आप सोच रहे हैं और आप वैचारिक गुलामी का निर्वाह कर रहे होंगे। विचार करेंगे. विचारमंथन करेंगे, पर विचार उसी बिंदु पर ठहरा रहेगा, आगे नहीं बढ़ेगा।

जब आप अनुभव प्रक्रिया से गुजरने के बाद उन्ही विचारों तक पहुंचते हैं तो उन विचारों और मान्यताओं की परीक्षा होती और उनका बहुत कुछ वागाडंबर सिद्ध होता है।

Post – 2017-09-14

कहीं का कंकड़ कहीं का रोड़ा

मां के मरने के बाद से माई के आने तक मैंने मां को याद तो अनेक बार किया होगा पर उसकी कोई याद नहीं। हमें रोटी-पानी उस बीच कौन देता, मेरी देखभाल कौन करता यह भी याद नहीं। बहुत बाद तक एक नाम याद आता तो झुरझुरी सी अनुभव होती- लालचुनी। उसकी कोई याद नहीं, बस इस नाम से सोचता वह लाल चुनरी पहनती रही होगी। वह पट्टीदारी में किसी के घर आई रिश्ते की एक बालविधवा थी। केवल कल्पना कर सकता हूं कि वह मुझे बहुत प्यार करती रही होगी, इस भाषातीत संवेदनात्मक स्मृति का कोई अन्य आधार नहीं हो सकता।

मां का कोई चित्र तो हो ही नहीं सकता था, जो दृश्यबिंब स्मृतिपटल पर अंकित हैं वे भी अधूरे और किंचित् अविश्वसनीय, फिर भी इतने ठोस और अकाट्य कि मैं बदलना चाहूं तो भी टस से मस न हों। कुछ कुछ स्वप्नजागृति जैसा।

स्वप्नजागृति में आप जो देखते उसे असंभव मानते हुए, तर्क करते हैं, ऐसा तो नहीं हो सकता। निद्रा में, जोर लगाकर पलकों को खोल कर ध्यान से देखते हैं और पाते हैं, है तो वही। हो तो वही रहा है। आप तर्क को स्थगित कर देते हैं। प्रतीति को प्रत्यक्ष मानकर और तर्कगम्य को भ्रम मान कर अपने को उस मरीचिका का सहभोक्ता और कर्ता मान लेते हैं।

आकांक्षाओं से जुड़े लोग, विचारधाराओं से जुड़े लोग, विश्वासधाराओं से जुड़े लोग, धर्मो-संप्रदायों, परंपराओं से जुड़े लोग, अपने अपने सपनों से जुड़े लोग, अपने सपने में व्यवधान डालने वाले किसी तर्क, विचार, प्रमाण को नहीं सहन कर सकते। वे अपने समस्त ज्ञान, अनुभव और कौशल का प्रयोग अपने सपने को सही और उससे अनमेल पड़नेवाले यथार्थ को भ्रम सिद्ध करने का प्रयत्न करेंगे।

मेरा इरादा, अपनी व्यथा में समकालीन विमर्श को लाने का न था। मैं कोई काम सलीके कर नहीं पाता सो यह तो होना ही था।

मां का जो समृतिबिंब सबसे ठोस है उसमें वह अरगनी पर ठोढ़ी टिकाए, एक पांव को दूसरे की फीली पर टिकाए, आंगन में खड़ी किसी महिला से परिहास कर रही थीं। उनकी आंखों में एक शरारत भरी चमक थी, जो युवतियों के आपसी विनोद में ही संभव है। आंगन में कौन था इसका कोई आभास नहीं। यह याद है कि मैं ओसारे में था। मां से पीछे की ओर। ऐसी दशा में, मुझे उसकी आंखें कैसे दीख सकती थीं। परंतु वे बड़े डोले, वे चमकती आंखें मेरा फिक्सेशन रही हैं, वे अनन्य हैं, पर उनसे मिलता जुलता कहीं कुछ दीख जाये, वह पशु में हों या पक्षी में, शिशु में हो या युवा या बृद्ध, रूप कुरूप के पार कहीं भी किसी में भी, मैं रीझ जाता हूं।
असमाप्त

Post – 2017-09-13

अपूर रिक्तता

अभाव के कुछ रूप होते हैं जो किसी दूसरी चीज से भरते नहीं खालीपन का विस्तार करते हैं। मां के प्यार का अभाव । इस खालीपन को भरने के हम जो उपाय करते हैं वह खालीपन को भी बढ़ाता है और खालीपन के अहसास को भी। जैसे दुख और अवसाद में हमें अकेला छोड़ दिया जाय तो हम उसके भोग से उसे कम कर लेंगे। जब दूसरे हमें बाहर लाने के लिए उसमें व्यवधान डालते हैं तो वह दौरे का रूप ले लेता है, व्याधि बन जाता है। अकेला छोड़ दो अवसादग्रस्त को, वह आप्तकाम होकर उससे बाहर आ जाएगा। एक नई गरिमा के साथ जो उससे गुजरे बिना संभव न था। आप्तकामता सुख की नहीं, काम्य की होती है और एेसे अनुभवों से गुजरना पड़ सकता है जिनमें अवसाद ही काम्य हो जाय। जैसे कच्चे फोड़े के साथ करते हो, दुख को पकने दो वह स्वयं अपने विष का निस्सारण कर लेगा। यही स्थिति मां के प्यार से वंचित रह जाने से उत्पन्न रिक्तता का है। उसे बने रहने दो । भरने के कृत्रिम उपायों से रिक्तता और बढ़ जाएगी।

हम अपनी विमाता को माई कहते । किसने यह सुझाया था, यह पता नहीं। रोटी पकाने के लिए एक पंडितानी कुछ समय आती रहीं और उनकी सहायता के लिए नोहर की मां। इन्हीं में से एक का सुझाव रहा होगा। यह एक तरह की हिंसा थी। यदि विश्वास न हो तो उन उम्रदराज महिलाओं की प्रतिक्रिया को याद करें जिन्हे किसी ने आदरवश ही माता जी कह दिया तो वे अपने को रोक नहीं पातीं और उलट कर पूछती हैं, ‘मैं तुमको माता जी लगती हूं?’

आपको ऐसी महिलाएं मुखर लगी हों तो मुझे ये नारीवादी नारों के बिना भी अपने सम्मान की लड़ाई लड़ने वाली नारियां लगती हैं। जिस मूल्यव्यवस्था में स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसका सौंदर्य और इसलिए उसका यौवन माना जाता हो (यद्यपि यह सही नहीं है। उसकी सबसे बड़ी
शक्ति उसका मातृत्व है) उसमें अपने ऊपर बुजुर्गी लादने वाले, कुरूपता का आभास देने वाले किस तरह का अत्याचार करते हैं, इसका न तो हमें बोध होता है न इन पर ध्यान देते हैं।

यदि उसे मासी, चाची, छोटी मा कहना पड़ता तो रिश्तों की दूरी या अलगाव के कारण वह अपने को अलग और सुरक्षित रख लेती। माई के संबोधन के साथ वे संभावनाएं नष्ट हो गईं।

परन्तु इससे दुखद यह कि पिता जी ने माई को पत्नी नहीं बनाया, विवाह के बाद सालियों सलहजों के बीच किसी प्रसंग में उन्होने कहा था, ‘मैने अपने बच्चों की देखरेख के लिए शादी की वर्ना करता ही नहीं।’

उन्होंने अपनी पत्नी को उसके पत्नीत्व से वचित करते हुए अपनी पूर्वपत्नी की सन्तानों की दाई बना दिया और अपने इस अन्याय का न तो उन्हें तब बोध हुआ होगा न बाद में पुनर्विचार की आवश्यकता हुई। गलत आदर्शों, गलत मूल्यव्यवस्थाओं का निर्वाह करते हुए हम कितने अत्याचार, कितनी हिंसा करते हैं इसका बोध क्या हमें होता है?

पता चला कि बारात कोटिया तक, जो हमारे घर से दो फर्लांग दूर थी, पहुंच गई है, हमें एक कमरे में बन्द कर दिया गया। यह जिसकी भी सूझ से आई परंपरा हो, थी वैज्ञानिक। यदि गृहप्रवेश करते समय बधू से उसकी सपत्नी की सन्तानें लिपट जायं तो जानें उसके मन पर क्या गुजरे ?

दीदी हममें सबसे बड़ी थीं। वह भैया को समझाती रहीं, यह हमारी मा नहीं है। मुझे अपनी मां चाहिए थी। उनकी बातें अच्छी नहीं लग रही थीं।

अन्तत: जब वह कोने के कमरे में स्थापित हो गईं तो एक एक को उसके पास परिचय के लिए भेजा गया। सबसे अन्त में मेरी बारी आई। प्रश्न मैंने ही पूछा, ‘तू हमसे रिसिया के क्यों चली गई थीं? मुझसे क्या भूल हुई थी?’ मुझे याद है, वह इस प्रश्न से विगिलत हो गई थी। कुछ बोली नहीं थी। मुझे स्पर्श किया था। यह याद नहीं कि सिर कर या गाल पर। उसमें व्यथा थी। आक्रोश नहीं। पर यही वह क्षण था जब उसका सबसे बड़ा शत्रु उसके सामने था जिसमें उसकी सौत सबसे अधिक जीवित थी।

Post – 2017-09-13

जिन्हें वर्तमान सरकार से हर दृष्टि से निराशा है उनके भाग्य जग गए. राहुल ने घोषित कर दिया वह प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं. अब ऐसे लोगों को चन्दा करके उनकी कुर्सी का आर्डर किसी बढ़ई को दे देना चाहिए.