Post – 2018-06-18

#आइए_शब्दों_से_खेलें (1)

जरूरी नहीं है आप भाषाविज्ञानी हों। भाषा का प्रयोग हम सभी करते हैं। सभी लोगों की भाषा में रुचि एक जैसी नहीं होती। एक वकील की भाषा में रुचि कवि की रुचि से भिन्न होती है। कवि और विचारक की रुचि में, यहां तक कि विचारक और पत्रकार की रुचि में अन्तर होता है। एक शल्यचिकित्सक, मनोचिकित्सक, भौतिकविज्ञानी, कंप्यूटर विज्ञानी का भाषाविज्ञान एक जैसा नहीं होता। भाषाविज्ञानी अपना ज्ञान बघारने के चक्कर में जितनी मूर्खताएं कर बैठते हैं और हमारा जितना नुकसान कर डालते हैं उसका शतांश भी कोई अनाड़ी नहीं कर सकता। आखिर हम पूरी दुनिया के महान कहे जाने वाले भाषाविज्ञानियों के प्रचंड ज्ञान से उत्पन्न नासमझी का ही फल तो इतने लंबे समय से भुगतते रहे हैं जो हमारे अपने समाज, इतिहास, और मनोबल को तहस नहस करता रहा।

यह काम इतना रूखा भी नहीं कि इसे करते हुए आप ऊब जाएं। सच तो यह है कि कई बार बच्चे तक भाषा में इतना रस लेने लगते हैं कि खेल खेल में आपसी संचार की एक कूट भाषा तैयार कर लेते हैं। हम आपको भाषा के ऐसे खेल में शामिल करने जा रहे हैं जिसमें भाग लेने वालों की कोई सीमा नहीं, परन्तु यदि कोई शामिल न हो तो मैं अकेला भी खेलता रह सकता हूं। हमारे सामने दो सवाल हैं। एक यह कि नई कृषि भूमि की तलाश में देवों के किसी जत्थे के अपनी पैतृक भूमि से आगे बढ़ने के समय तक देववाणी का विकास किस स्तर तक हुआ था, और संस्कृत को उससे क्या मिला था? दूसरा यह कि सारस्वत क्षेत्र की भाषा के अतिरिक्त दूसरी भाषाओं से संस्कृत को क्या मिला? सन्देह इस बात पर हो सकता है कि दस हजार साल के लंबे अंतराल और इस बीच हुए कई तरह के घालमेल के बाद इसे क्या जाना जा सकता है?

हम अपने कुछ अंगों के नामकरण से आरंभ करें। जरूरी नहीं कि हम जिस नतीजे पर पहुंचें और जिसे सही मानें वह सही ही हो। हमारे लिए वह तब तक सही है जब तक हम स्वयं किसी छूटे हुए पहलू के ध्यान में आने पर उसे गलत न पाएं या कोई दूसरा उसे गलत सिद्ध न कर दे।

सिर के लिए संस्कृत में शीश, शिर, मौलि, मूर्धा, मस्तक का प्रयोग होता है। ऋग्वेद में शीश का प्रयोग नहीं मिलता। शेष में से किस शब्द का प्रयोग देवदाणी में होता रहा होगा?

भोजपुरी में ‘श’ का उच्चारण आज भी नहीं होता। इसके स्थान पर ‘स’ का प्रयोग होता है। अब दो संभावनाएं हैं। या तो वैदिक ने सिर के दन्त्य ऊष्म (स) का तालव्यीकरण करके ‘श’ बना लिया, जिस दशा देववाणी का रूप तत्सम हुआ और वैदिक/संस्कृत प्रतिरूप तद्भव, अथवा इसके उलट हुआ, जिसमें सिर शिर का तद्भव हआ। अब देखना होगा कि क्या ऐसा परिवर्तन होने का कोई अन्य उदाहरण है।

ऊष्म ध्वनियों के मामले में हम पाते हैं कि अर्धमागधी और बांग्ला आदि में सभी ऊष्म ध्वनियों का उच्चारण तालव्य (श) होता है, पूर्वी हिन्दी और अवधी में दन्त्य (स) होता है, इस तर्क से हम मान लेते हैं कि सारस्वत में मूर्धन्य (ष) होता रहा होगा। अतः यदि यह मूलतः सारस्वत रहा होता तो इसका रूप षिर होना चाहिए था।

वैदिक में हम दन्त्य ‘स’ को कुछ मामलों में ‘ष’ में बदलते पाते भी हैः स्मा>ष्मा , सुसोमा >सुषोमा, सोम>षोम, स्तोम>ष्टोम, स्तुवे>ष्टुवे, नकिस्तदा>नकिष्टदा, विस्तप>विष्टप, स्तवाम>ष्टवाम, दुस्तर>दुष्टर जिससे हमारे उक्त अनुमान को बल मिलता है। एक भी मामले में हम स>श में बदलते नहीं पाते हैं। इसलिए इस बात की कुछ संभावना पैदा होती है कि देववाणी में सिर शब्द न रहा हो, भोजपुरी ने इसे संस्कृत से लिया हो, या उसका रूप कुछ भिन्न रहा हो जिसका वैदिक में तालव्यीकरण होता रहा हो।

भोजपुरी में ‘कपार’ का प्रयोग सिर की तुलना में अधिक किया जाता है। कपाल ऋग्वेद में नहीं मिलता। संस्कृत में मिलता तो है पर प्रयोग खप्पर या मिट्टी की कड़ाही, या खोपड़ी (सिर की अर्धगोलाकार अस्थि) के लिए होता है। कपाल का कुछ बदला रूप कपोल गाल के लिए प्रयोग में आता है। भांडपूर्व कपालास्थि का किसी तरह का तरल पदार्थ रखने के लिए प्रयोग होता था। इसलिए यह नाम मृदभांड का आविष्कार होने से पहले प्रयोग में आता रहा होगा और मृद्भांड विशेष का नामकरण बनावट और उपयोग की समानता के कारण पड़ा हो सकता है।

परन्तु ‘सिर’ और ‘शिर’ का स्रोत क्या हो सकता है? हमें इसका एक समाधान यह दिखाई देता है कि यह कृषिकर्म को अपनाने वाले और लगभग आरंभिक चरण पर ही देवसमाज का अंग बनने समुदाय का शब्द रहा हो सकता है जिसमें कोई ऊष्म ध्वनि रही ही न हो और वह तमिल की तरह ‘च’ का उच्चारण ‘स’ के रूप में भी करता रहा हो। आपने तमिळ भाषियों द्वारा स्वामी की जगह चामी लिखते और बोलते देखा होगा। कहें, सिर का पूर्वरूप चिर था।

इकार और उकार के संभ्रम की स्थिति यहां भी देखने में आती है। इस चिर से ही हमारी चिरुकी का संबंध है जिसका वैकल्पिक उच्चारण चुरकी या चुरुकी भी है। बांग्ला में कंघा के लिए चिरुनी और शिर के बालों के लिए चूल का संबंध इस चिर से ही है। विद्यापति के चिकुर गरइ जलधारा के चिकुर को भी चिर से ही व्युत्पन्न मानना होगा, परन्तु सबसे रोचक है चिरं या सदा जो पूर्णायु का अर्थोत्कर्ष है। यही चिर भोजपुरी में सिर बन कर आया है और इसी से तालव्य उच्चारण वाले शिर का संबंध है।

Post – 2018-06-18

#तुकबन्दियाँ

अभी तक वहीं रह गया है जमाना
मैं हर बार क्यों लौट कर देखता हूँ।

Post – 2018-06-17

#विषयान्तर
जरूरत समझ दुरुस्त करने की है

अपने स्वभाव और शिष्टाचार की सीमाओं को लांघते हुए पहली बार मैंने अपनी पोस्ट पर स्वयं लिखा ‘इसे अवश्य पढ़ें, कई बार पढ़ें,’ और फिर आगे यह भी जोड़ने में संकोच नहीं किया कि ‘यह एक युगांतरकारी पोस्ट है।’ इतना जोर इसलिए देना पड़ा कि मुझे डर था कि सामान्यतः मनस्वी पाठक भी इसकी स्थापनाओं पर ध्यान न दे पाएंगे और समस्या की गंभीरता बहुत कम लोगों की समझ में आएगी। इस पर मिली टिप्पणियां उत्साहवर्धक कही जा सकती हैं, पर वे भी मेरी आशंका को सही भी ठहराती हैं। इसलिए दोबारा मैं यह समझाने का प्रयत्न कर रहा हूं कि इसकी स्थापनाएं क्या हैंः

1. इसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि #तुलनात्मक भाषाविज्ञान की अब तक की सभी मान्यताएं गलत हैं# , सिवाय इसके कि एक ही भाषा का प्रसार भारत से लेकर यूरोप तक हुआ था।

2. जिस भाषा का विकास कई हजार साल बाद वैदिक में हुआ था, उसको बार बार #देववाणी# कहा गया है न कि #प्राकृत# (यहां यह भी जोड़ते चलें कि जिस अर्धमागधी को नमिसाध ने आर्ष प्राकृत कह कर उसे संस्कृत और वैदिक की जननी बताया था, उसके पीछे भाषा ज्ञान से अधिक उनका यह विश्वास काम कर रहा था कि महावीर ने उसी भाषा में अपनी शिक्षाएं दी थी। यह वैसा ही विश्वास था जैसा पश्चिम में लंबे समय तक प्रचलित यह धारणा कि आदम की भाषा हिब्रू रही होगी और उसी से दुनिया की सभी भाषाएं पैदा हुई हैं।

3. पहले की पोस्टों में #वैदिक भाषा की परिपक्वता# को देखते हुए, यह संकेत दिया गया है कि इसके पीछे साहित्यिक भाषा के कई चरण रहे होंगे, तभी बाद की भाषा और साहित्य इस ऊंचाई पर पहुंचे होंगे। तुलना बहुत सटीक तो नहीं होगी, पर हम इसे आधुनिक अंग्रेजी, मध्यकालीन अंग्रेजी, और प्राचीन अंग्रेजी के साम्य से कुछ दूर तक समझ सकते हैं।

4. अब तक के जिन विद्वानों ने यह सुझाया था कि संस्कृत से प्राचीन प्राकृत है, उन्होंने भी, यह नहीं बताया कि उसका रूप क्या था और वह कहां बोली जाती थी (यदि बोली थी तो उसका कोई सीमित क्षेत्र रहा होगा)। यह भी नहीं बताया कि किन कारणों से उसे इतनी व्यापक स्वीकृति मिली।

5. प्राकृत कहने वाले वास्तव में उसी पाले में अपना खेल खेलते रहे हैं, जिसमें काम करने वालों द्वारा संस्कृत के विकास में, आज के शब्दों में कहें तो, आर्येतर भाषाओं की कोई भूमिका नहीं मानी जाती रही है। यहां पहली बार तीन चीजों को नकारा जा रहा है। पहली है आर्य और अनार्य भाषा-परिवारों की अवधारणा, दूसरी इनकी पारस्परिक असंपृक्तता, और तीसरी पाश्चात्य अध्येताओं द्वारा सुझाया गया आक्रांताओं और आक्रांतों की भाषाओं के बीच आदान प्रदान। इसमें, कुछ स्थापनाएं रामविलास जी की हैं, जिनको पहले स्वीकार किया गया है।

6. उनसे अलग हटकर, एक बात कही गई है कि स्वयं #आर्यभाषा दो विपरीत प्रकृति की भाषाओं के मिश्रण का परिणाम# है, जिसमें जैसा कि रामविलास जी ने भी कहा है, अन्य कई भाषाओं के तत्व शामिल है।

जब तक इस पूरे चित्र को सामने रखते हुए गुण-दोष पर विचार न किया जाए तब तक न तो अनुमोदन का विशेष महत्व है, न ही असहमति का। मुझे उसकी जरूरत नहीं है। मेरा आग्रह मात्र यह है कि अपनी भाषा और इतिहास के विषय में, अपनी समाज रचना के विषय में, हमारी समझ दुरुस्त हो।

Post – 2018-06-16

#संस्कृत_की_निर्माण_प्रक्रिया(13)
(यह लेख अवश्य पढ़े, कई बार, यह युगान्तरकारी है )

हम जानते हैं विशाल वृक्ष जमीन पर पड़े बीज से पैदा होते हैं और अदृश्य जड़ों से अपना पोषण ग्रहण करते और संतुलन बनाए रखते हैं, उनकी पत्तियों में पके भोजन का कुछ अंश लौट कर जड़ों में भी पहुंचता है। कि प्रकृति में कोई भी चीज न तो शुद्ध होती है और न ही परिपक्व। यह दोनों काम मनुष्य स्वयं करता है, जिसे हम संस्करण और प्रसंस्करण कहते हैं। संस्कृत, जैसा कि इसका नाम ही है, इसी तरह की एक साधारण सी, परंतु अपनी जमीन से जुड़ी हुई, भाषा के क्रमिक रूपान्तर का परिणाम है जो समाज से इतना कट जाती है कि विद्वान अपने विचार को कम से कम लोगों के लिए बोधगम्य बनाने पर गर्व करते रहे हैं।

भारत में दुनिया के महानतम भाषा चिंतक पैदा हुए परंतु किसी तरह का पूर्वाग्रह महान से महान प्रतिभा के सोच को उलट देता है, यह इस बात से समझा जा सकता है कि उनका विचार था कि बोलियां संस्कृत के तद्भवीकरण या अपभ्रंशीकरण से पैदा हुई हैं। अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ है नीचे गिरना। प्राकृत शब्द में यह निहित था कि यह प्रकृतिप्रदत्त भाषा है। कुछ विद्वान बहुत दृढ़ता से मानते थे कि संस्कृत प्राकृत से पैदा हुई है। परंतु हमें जो प्राकृत साहित्य उपलब्ध है, वह संस्कृत का लौकिक ध्वनि प्रवृत्तियों के अनुसार रूपांतरण है, जिसमें मामूली अपवादों को छोड़कर संस्कृत के व्याकरण का भी अनुगमन किया गया है। इसलिए, मुख्यधारा में यह विश्वास बना रहा कि संस्कृत ही प्रकृति है और इसी से दूसरी बोलियों का जन्म हुआ है।

यह सच है कि संस्कृत के उत्थान के बाद दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य सभी क्षेत्रों में साहित्य संस्कृत में ही रचा गया और संस्कृत की प्रतिस्पर्धा में खड़ी होने वाली बोलियों ने भी अपने दार्शनिक विवेचन के लिए संस्कृत से ही तकनीकी शब्दावली ग्रहण की, या अपनी अपनी ध्वनि प्रवृत्ति के अनुसार ग्रहण की, जिससे भी इस भ्रम को समर्थन मिलता रहा कि बोलियां संस्कृत के अपभ्रंशीकरण से ही पैदा हुई हैं।

इन विचारों को बार बार पढ़ते-सुनते, इन्हीं के अनुसार शोध कार्य करते हुए मनस्वी विद्वान और पाठक भी इसके इतने आदी हो चुके हैं कि बार-बार यह समझाने के बाद भी कि मानक भाषाएं प्रकृति प्रदत्त नहीं है, संस्कृत है, बुद्धि से मान भी लेते हैं, पर हृदय से स्वीकार नहीं कर पाते। हमने ’बर’/’बार’ की शृंखला के ’वर’ /’वार’ शृंखला में रूपांतरण के उदाहरण देते हुए इस बात को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया परंतु वह पर्याप्त नहीं है। हम कुछ और उदाहरणों से उस प्रक्रिया को स्पष्ट करने की कोशिश करेंगे जिससे देववाणी संस्कृत में बदली थी।

जैसे ’बर’ को ’वर ’ और फिर ’वृ ’ बनाया गया पर इस पूरे क्रम को उलट कर ’वर ’ को ’वृ ’ का संप्रसारित रूप माना जाता रहा, उसी तरह ’कर ’ और ’चर ’ को ’कृ ’ का संप्रसारित रूप सिद्ध किया जाता रहा। पर ‘ऋ’ की ध्वनि देववाणी में थी ही नहीं। ’कर ’ बोलियों से लेकर संस्कृत तक में मिलता है इसलिए संस्कार होने के क्रम में ही ऋ की ध्वनि आई थी, जिसका सहज, शुद्ध उच्चारण कहीं होता ही नहीं, जब कि किसी भी बोली की नैसर्गिक ध्वनि का उच्चारण दूसरे क्षेत्रों के लोगों के लिए यदि कष्टसाध्य हो तो भी उस भाषाक्षेत्र में उसका उच्चारण सुकर होता है, जैसा हम ङ और ञ के मामले में देख आए हैं।

मैंने कहा था संस्कृतीकरण की प्रक्रिया में तीन घटकों का योगदान था- स्थानीय भाषा की ध्वनि व्यवस्था, उसकी व्यंजन प्रधानता, और देव समाज की तरह कौशल और अनुभव के द्वारा विकास प्रक्रिया में योगदान करने के लिए आए हुए अन्य भाषाओं के प्रतिभाशाली जन। ये सभी अपनी ओर से बोलते तो देववाणी ही थे परंतु उनकी श्रुति और उच्चारण सीमाओं के कारण वह संस्कृत हो जाती थी, अर्थात् वे देववाणी का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे। दोषपूर्ण उच्चारण के कारण बिगड़ा रूप बनता जिसे हम तत्सम कहने के आदी हैं। यहां हम एक बहुत रोचक निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं। जिसे हम संस्कृत कहते हैं वह स्वयं अपभ्रंश है, और जिसे अपभ्रंश कह रहे हैं वह तत्सम है अर्थात् देववाणी के अनुरूप है । कहें संस्कृत देववाणी का तद्भव रूप है।

अब हम उदाहरणों से इस प्रस्ताव की पुष्टि करना चाहेंगे। हम अपनी बात जुबान से ही करें। देववाणी में जीभ के लिए संभवत: ’जीभि’ का का वैकल्पिक उच्चारण ’जिब्भ’ करते थे, इसमें अंत्य ’अ’ का उच्चारण डेढ़ मात्रा का होता है । कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए, वह ऐसे प्रयोग करते थे जिसके कारण भोजपुरी में कला का हीनार्थक रूप कल्ला, लाभ का ’लब्भा’, लता का लत्ता, आदि हो जाता है ।

ऊंचे स्वर में बोलने के लिए आज केवल गीदड़ की आवाज के लिए ’हुँआइल’, तूफान की आवाज के लिए ’हुहुआइल’, चुनौती भरी अस्पष्ट ध्वनि के लिए हुंकार, किसी चीज को पाने के लिए बहुतों की आतुरता के लिए ’हउहार’, ’हां’ के लिए ’हूं’, और अनुमोदन के लिए हुंकारी भरना/पारना का प्रयोग चलता है। तूफानी गति से किसी के आगे बढ़ने के लिए ’हहास’, प्रखर प्रवाह के लिए ’हर हराकर’ बहना, और किसी पेड़ के कट कर धराशायी होने को ’हहरा कर गिरना’, अकस्मात उठी मानसिक या शारीरिक पीड़ा के लिए ’हूक उठना’ प्रयोग चलता है। किसी दूरस्थ व्यक्ति को संबोधित करने के लिए जो वाक्य बोला जाता है उसका अंत सामान्यतः स्वरित ’होss’ से होता है। तीव्रता, आकस्मिकता, पुकार आदि से ’ह’ की ध्वनि का देववाणी में सहज संबंध था। परंतु भोजपुरी में ’व’ के लिए स्थान नहीं था। उसमें इस ध्वनि को सारस्वत क्षेत्र में अपनाया गया। हम पहले यह बात कह आए हैं कि नई ध्वनियों से उसकी प्रकृति प्रभावित नहीं होती थी, इसलिए ’हो’ / ’हउ’ के ’हव’ में बदल जाने को संभवतः लक्ष्य ही नहीं किया गयाः
अस्माकं शृणुधी हवम्,
इत्था विप्रं हवमानं गृणन्तम् ,
हवन्ते वाजसातये,
कामो राये हवते मा,
कदा गोमघा हवनानि गच्छाः,
रुद्रस्य सूनुं हवसा विवासे,
त्वे अग्न आहवनानि भूरि,
न द्रुह्वाणो जनानाम्,

ये लगभग उसके अपने प्रयोग थे। उसकी समस्या स्वर् के लोप और व्यंजन संयोग से पैदा होती थी, जबकि कि स्थानीय समाज की समस्या स्वरों के कारण उसकी गति में बाधा पड़ने के कारण हितप्रयसो वृषभं ह्वयन्ते
वरुणाय जुह्वत्
आजुह्वानो न ईड्यो
गृभाय जिह्वया मधु
जना इमे विह्वयन्तः तना गिरा
नि ह्वयामहे
आह्वयमानान्
रोदसी अह्वयेताम्
इसी तरह देववाणी का जीभि सारस्वत प्रदेश में घोषमहाप्राण तथा ईकारांत होने के कारण स्वीकार्य नहीं था। अकारांत लिखने के लिए स्वीकार किया जा सकता था, जो उच्चारण में हलंत ’जीभ्’ हो जाता है। यही स्थिति दूसरे शब्दों की है।

परंतु यह तो हिंदी की बात हुई। पुराने सारस्वत निवासी ’जीभि’ के उच्चारण में जबान को दांत से काटने के लिए तैयार हो जाते थे, पर सही उच्चारण हो नहीं पाता था। इसका जिह्वा, जुह्वा दो रूपों में उच्चारण करते थे। यह हमारे लिए इस दृष्टि से काफी रोचक है कि इससे यह सिद्ध होता है कि इकार के उच्चारण में स्थानीय लोगों को कठिनाई आती थी और इसका इकार और उकार दोनों में उच्चारण करते थे। इन्हीं दोहरे उच्चारण के मूल के लिए ऋ ध्वनि की कल्पना की गई थीः
कृष्णा कृणोति जिह्वया
पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम्
मन्द्रो होता स जुह्वा यजिष्ठ
अभि प्रमुरा जुह्वा स्वध्वर
जिह्वाया वि वृहामि ते
इसी को हम संस्कृतीकरण की प्रक्रिया कहते हैं, जो सचेत रूप में किया गया परिवर्तन नहीं था, अपितु तत्सम उच्चारण न सुन पाने और कर पाने की विवशता से पैदा हुई थी। इसलिए हम अब तक के प्रचलित मुहावरे को संस्कृत ही प्रकृति है उलट करें यह कहना चाहते हैं की बोलियां ही प्रकृति
है और संस्कृत उनका अपभ्रंश।,

Post – 2018-06-16

#तुकबन्दियाँ

हम शताधिक आठ थे पर एक धागे से जुड़े
तुमने हमको यूँ सँभाला, हम बिखर कर रह गए।

Post – 2018-06-16

हम जानते हैं आकाश छूने वाले वृक्ष जमीन से पैदा होते हैं और असंख्य जड़ों से अपना पोषण ग्रहण करते हैं, और संतुलन बनाए रखते हैं. मनुष्य की अपनी निर्मितियों की नींव जमीन में होती है भले ही आकाश छूने की कोशिश करें। प्रकृति में कोई भी चीज ना तो शुद्ध होती है और ना ही परिपक्व। यह दोनों काम मनुष्य स्वयं करता है जिसे हम संस्करण और प्रसंस्करण कहते हैं। संस्कृत, जैसा कि इसका नाम ही है, इसी तरह की एक साधारण सी परंतु अपनी जमीन से जुड़ी हुई भाषा के क्रमिक परिष्कार का अंतिम रूप है जो समाज से इतना कट जाती है विद्वान अपने को कम से कम लोगों के लिए बोधगम्य बनाने पर गर्व करते हैं। भारत में दुनिया के महानतम भाषा चिंतक पैदा किए परंतु किसी तरह का पूर्वाग्रह महान से महान प्रतिभा के मार्ग में कितनी बाधक होती है यह इस बात से समझा जा सकता है उनका विचार था बोलचाल की भाषाएं संस्कृत तद्भवीकरण या अपभ्रंशीकरण से पैदा हुई है। अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ है नीचे गिरना। प्राकृत शब्द में यह नीहित था कि यह प्रकृतिप्रदत्त भाषा है, और कुछ विद्वान बहुत दृढ़ता से यह मानते थे कि संस्कृत पैदा हुई है। परंतु हमें जो प्राकृत साहित्य उपलब्ध है, वह संस्कृत कतिपय लौकिक ध्वनि प्रवृतियों के अनुसार रूपांतरण है जिसमें मामूली अपवादों को छोड़कर संस्कृत के व्याकरण का भी अनुगमन किया गया है इसलिए, मुख्यधारा में यह विश्वास बना रहा संस्कृत ही प्रकृति है और इसी से दूसरी बोलियों का जन्म हुआ है। यह एक सत्य है संस्कृत के उत्थान के बाद अमूर्त भावों, विचारों और संकल्पनाओं के लिए बोलियों में भी ISI की तकनीकी शब्दावली का अपनी अपनी ध्वनि प्रवृत्ति के अनुसार ग्रहण किया जाता रहा है जिससे भी इस भ्रम को समर्थन मिलता है कि बोलियां संस्कृत के अपभ्रशीकरण से ही पैदा हुई हैं।
इन विचारों को बार बार पढ़ते-सुनते, इन्हीं के अनुसार शोध कार्य करते हुए मनस्वी विद्वान और पाठक भी यह बार-बार समझाने के बाद भी की मानक भाषाएं प्रकृति प्रदत्त नहीं है, संस्कृत है, बुद्धि से मान भी लेते हैं पर हृदय से स्वीकार नहीं कर पाते। हमने बर/बार से वर/वार मैं रूपांतरण के कारण और उदाहरण देते हुए इस बात को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया परंतु संस्कृत संस्कारों में पले हुए विद्वानों को उसके विरोध में कुछ न सूझने की स्थिति में भी इसे सत्य मान पाना कठिन होता है। अपनी मान्यता के बचाव में वे यह दलील तैयार कर लेते हैं एक शब्द से क्या होता है या उचित शब्दों से क्या होता है। ऐसी ही दलील मुझे आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता पर राम शरण शर्मा से सुनने को मिली थी। संस्कृत मित्रों की चुप्पी से भी ऐसा ही प्रतीत होता है। अतः हम प्रक्रिया को स्पष्ट करने की कोशिश करेंगे जिससे देववाणी संस्कृत में बदली थी।

Post – 2018-06-15

#तुकबन्दियाँ

महजबीं को देखिए, महताब को फिर देखिए
अपनी आंखों पर भरोसा आप का उठ जाएगा.

Post – 2018-06-15

#विषयान्तर

अमेरिका ने भारत को हाल ही में चेताया था अमेरिका या रूस, दोनों में से एक को चुन लो। भारत ने अपनी पुरानी नीति दुहराई, हम किसी एक से बँधकर नहीं रह सकते। अब अमेरिकी हथकंडे शुरूः 1. भारतीय सेना कश्मीर में अत्याचार कर रही है, 2. कश्मीर के भाग्य का निर्णय प्लेबीसाइट से होना चाहिए, 3. संघ और सेना आतंकवादी संगठन हैं। वे क्या हैं आप जानें पर अमेरिका के सुर पर कुर्बान जाने से बचें।

Post – 2018-06-14

#संस्कृत_की_निर्माण_प्रक्रिया

शीर्षक के दोनों शब्द कुछ भ्रामक है। देववाणी, देव समाज द्वारा बोली जाने वाली एक अविकसित भाषा की और इसका व्यवहार उस समाज में सभी के द्वारा होता था और उसके बाहर के लोगों के लिए वह बोली या समझी नहीं जाती थी। जिसे हम जनवाणीकरण कह रहे हैं, वह एक विकसित भाषा में रूपान्तरण है, जिसका मूल आधार देववाणी भले रही हो, परंतु कई बोलियों के सोपर्क से अपना रूप बदलते हुए सारस्वत क्षेत्र में पहुंची थी और केवल उस वर्ग द्वारा बोली जाती थी जिसका उत्पादन के साधनों पर अधिकार था और दूसरे कई भाषाई पृष्ठभूमियों के जो लोग उनकी सेवा में लगे थे, वे अपने दायरे में अपनी बोली बोलते थे और दूसरों से संपर्क के लिए उस भाषा का व्यवहार करते थे जिसे उन्हीं की तरह अनेक भाषाई समूह व्यापक संपर्क के लिए अपना चुके थे। जिसे हमने कामचलाऊ रूप में जनवाणी की संज्ञा दी है वह इसी अर्थ में ग्राह्य है कि एक बहुत बड़े दायरे में यह लोक व्यवहार की भाषा थी जब कि उस पूरे क्षेत्र में अनेक प्रकार की बोलियां लोग अपने आपसी कामकाज में बोलते थे।

कहें, हम साहित्य की ओर यह स्पष्ट करने के लिए मुड़े थे कि यह भाषा कई चरणों पर विकसित होते हुए आदि देववाणी से क्रमशः आगे बढ़ते हुए उस ऊंचाई तक पहुंची थी जिसमें रची हुई रचनाओं को ऋग्वेद में पाते हैं परंतु साहित्य रचना की एक लंबी परंपरा रही होगी जो इस अवस्था से पहले के चरणों पर साहित्य का माध्यम बनी होगी, भले वह साहित्य हमारे लिए दुष्प्राप्य हो। साहित्य के अनुपलब्ध होने के बाद भी हम मान सकते हैं की अनेक मिथक और प्रतीक जो उस काल में रचे गए होंगे वे बाद में भी प्रयोग में आते रहे होंगे और ऋग्वेद की रचनाओं में भी इनका प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद का कवि जब कहता है, कि मैं इंद्र के उसे पराक्रम की बात कर रहा हूं जो उसने बहुत पहले (प्रथमानि- पहले पहल) किए थे। उस पराक्रम में वह यह बताता है कि उसने जल को चुरा कर भागने वाले बादलों को मार कर जल की वर्षा कराई और नदियों के द्वारा पर्वतों को विदीर्ण कर दिया। निश्चय ही वैदिक कवि युगों युगों से चली आई रूपकथा का अपनी रचना उपयोग कर रहा था। यह दूसरी बात है कि इतने बड़े और जटिल भूभौतिक कार्य व्यापार का सजीव चित्रण वह दो पंक्तियों में उपस्थित करने की क्षमता अपनी भाषा और काव्य संस्कार में पैदा कर चुका थाः
इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री ।
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत् पर्वतानाम् ।। 1.32.1

इस परिघटना को अनेक तरह से बार बार दोहराया गया है,
त्वं तमिन्द्र पर्वतं महामुरुं वज्रेण वज्रिन् पर्वशश्चकर्तिथ ।
अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः ।। 1.57.6.58
इन्द्रो स्य दोधतः सानुं वज्रेण हीळतः ।
अभिक्रम्याव जिघ्नतेऽपः सर्माय चोदयन्नर्चन्ननु स्वराज्यम् ।। 1.80.5
स धारयत् पृथिवीं पप्रथच्च वज्रेण हत्वा निरपः ससर्ज ।
अहन्नहिमभिनद्रौहिणं व्यहन् व्यंसं मघवा शचीभिः ।। 1.103.2
सद्येव प्राचो विमिमाय मानैर्वज्रेण खान्यतृणन्नदीनाम् ।
वृथासृजत् पथिभिर्दीर्घयाथैः सोमस्य ता मद इन्द्रश्चकार ।। 2.15.3
भिनद् गिरिं शवसा वज्रमिष्णन्नाविष्कृण्वानः सहसान ओजः ।
वधीद् वृत्रं वज्रेण मन्दसानः सरन्नापो जवसा हतवृष्णीः ।। 4.17.3
त्वमध प्रथमं जायमानोऽमे विश्वा अधिथा इन्द्र कृष्टीः ।
त्वं प्रति प्रवत आशयानमहिं वज्रेण मघवन्वि वृश्चः ।। 4.17.7
मैं इस परिघटना का उल्लेख दो कारणों से कर रहा हूं एक तो यह इसी के आधार पर आर्यों के आक्रमण का और अनार्यों के नगरों के ध्वंस का इतिहास खड़ा किया जाता रहा। इतने बड़े पंडितों का इतनी नासमझी भरी व्याख्या का प्रतिवाद करने के लिए ऋग्वेद में प्रचुर सामग्री थी, इसके बाद भी जिन विद्वानों के संस्कृत ज्ञान पर हमें भरोसा है वे इसका प्रभावशाली प्रतिवाद नहीं कर सके या उनकी बात उसी तरह नहीं सुनी गई जिस तरह मेरी अपनी, जिसने 1973 में प्रतिपादित किया था कि भारतीय भाषा और संस्कृति का निर्माण आदिम अवस्था से आगे बढ़ते हुए कई भाषाओं और नस्लों के सहयोग से हुआ है और नागर अवस्था के बाद तथा व्यापारिक प्रसार के क्रम में इसका विस्तार समूचे भारोपीय जगत में हुआ था।

उपेक्षा यदि तार्किक या प्रामाणिक आधार पर की गई होती तो और बात है, परन्तु इसे मानने से इन्कार इसलिए किया जाता रहा कि हमने ज्ञान और विज्ञान तक का सांप्रदायीकरण कर रखा था। ऐसा सांप्रदायीकरण हिंदुत्ववादियों के बस का नहीं था। ऐसा कारनामा हमारे मार्क्सवादी बुद्धिजीवी ही कर सकते हैं और करते रहे। इसीलिए मेरा यह आरोप है कि भारत में सांप्रदायिकता की खेती करने वाले वे रहे हैं जो अपने को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं और इसका दोष सबका साथ सबका सम्मान करने वालों, सभी मतों और विश्वासों को पूरी छूट देने वालों के सिर मढ़ते रहे हैं। 1987 और 1995 में भाषा, साहित्य, पुरातत्व, नृतत्व, देवशास्त्र, जीनविज्ञान सभी के निर्णायक प्रमाण प्रस्तुत करते हुए जब मैंने सभी को निरुत्तर कर दिया उसके बाद भी पिछले दरवाजे से उसी इतिहास को बचाने का प्रयत्न करते रहे। जिन्हें निरुत्तर करने के बाद भी मैं यह नहीं समझा सका कि आर्यों का आक्रमण एक फरेब था, उन्हें यह समझा पाना तो संभव ही नहीं कि पहली बार राष्ट्र निर्माण के संकल्प, और दूर दृष्टि को लेकर इतने क्षेत्रों में कितने तरह के काम और प्रयोग हो रहे हैं जिनके सामने उनकी आंखे चौंधिया जाती है, इसलिए उन्हे दिखाई कुछ नहीं देता, आंखों में चुभन अवस्य पैदा होती है, पर यह चौंध और चुभन उस चश्में के कारण है जिसे वे उतार दें तो अपनी ही नजर से उतर जाएंगे।

राजनीतिप्रेरित दबाव से प्रेरित विषयांतर के लिए क्षमा याचना सहित यह याद दिलाना चाहूंगा ऋग्वैदिक साहित्य हजारों वर्षों की साहित्यिक गतिविधियों का उत्कर्ष है तो उसकी भाषा में भी दसियों हजार पीछे के अनेक भाषाओं से लिए गए तत्व मौजूद हैं। इसी परिपेक्ष्य में हम देववाणी के वैदिक भाषा में रूपांतरण का आभासिक चित्र प्रस्तुत कर सकते हैं।

यह निवेदन किया था देववाणी में अंतस्थ ध्वनियों में केवल संघर्षी ऱ था, ल के विषय में हम पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सकते। ऋ, लृ, ए, ऐ. औ, ण, य, व, श, ष दुनिया निश्चित रूप से नहीं थी। ऐसी स्थिति में जिस वर शब्द पर हम विचार कर रहे थे वह तो उसमें हो ही नहीं सकता था। इसका देववीणी का रूप बऱ था। यह घर्षी ऱ ही ळ, ड़, का जनक था। अब हम दो समानांतर रूपों को रखते हुए इस अंतर को या विकास को समझने का प्रयत्न करेंगे।
बर>वर, बड़ > वरं, बार/बाल > वार, बराअल/बरावल > वारण, बाड़-वार/वाल. बाड़ा >वर्त, बाट> वर्त्म/ वर्ति/ वृत, बर/बिर/बारि/बरि >बर/वृ/विर/वारि, बरस>वृष > बरखा>वृष्टि आदि। ये मेरे अनुमान है जिनमें से कुछ दूसरे विद्वानों के सुझाव के बाद बदले भी जा सकते हैं परंतु इतना स्पष्ट है शब्दसंपदा में वृद्धि एक तो ध्वनि परिवर्तन के कारण समानांतर हुआ, कुछ पुराने शब्दों में, जैसे बल, बलि, बली, बिल को रहने दिया गया। यद्यपि बाद में बिल को भी विवर बना दिया गया परंतु ऋग्वेद में बिल बचा हुआ है और उसी का दूसरा रूप वल पैदा हो चुका है।
कल की कल।

Post – 2018-06-13

#विषयान्तर
किसानों की कर्ज_माफी

किसानों की कर्ज माफी के तीन पक्ष हैं- राजनीतिक, अार्थिक और मनोवैज्ञानिक। पहले से चुनाव जीतने की उम्मीद की जाती है, दूसरे से विकास की दूसरे मदों के लिए अपेक्षित धन राशि का अपयोजन होता है, और तीसरे से किसानों को आत्महत्या का रास्ता अपनाना पड़ता है।
कर्ज की राशि किसी न किसी अनुपात में जरूरतमंद किसानों को भी मिलती ही होगी परंतु अधिकांशतः चालाक, पहुंच वाले और हेराफेरी करने में कुशल लोगों को ही मिल पाती है। बात आज से 20 साल पहले की होगी जब मैं अपने गांव गया था। मेरे समवयस्क एक व्यक्ति के यहां कर्ज की राशि चुकाने का परवाना लेकर कोई कारिंदा मेरे सामने ही पहुंचा था, और उसे उन्होंने अपने तरीके से निपटा लिया था। मैंने पूछा, तुम्हारी आर्थिक हालत अच्छी है, विदेश से पैसा भी आता है, तुमने कर्जा क्यों ले रखा है और पीछे का कर्जा चुकाए बिना तुम्हें नया कर्ज मिल कैसे गया था। मेरी बात सुनकर वह हंसने लगा। कहा आप नहीं समझेंगे इस बात को। कर्ज लेने के तरीके हैं। इलेक्शन आ रहा है। माफ हो जाएगा।

कर्ज देते समय बैंक कर्मचारी और बिचौलिए इस बात का ध्यान रखते हैं कि उस आदमी की भुगतान की हैसियत है या नहीं। इसलिए यह अक्सर औसत से अच्छी आर्थिक दशा वाले लोगों को ही मिल पाता है। यह एक सच्चाई है।

दूसरी सचाई यह है कि यह कांग्रेस का पुराना, आजमाया हुआ, हथकंडा है। कर्ज कांग्रेस प्रशासन से बिचौलियों को पार्टी के प्रति निष्ठावान बनाए रखने के लिए दिया और माफ किया जाता रहा है । बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद और इंदिरा जी के शासन से असंतोष पैदा होने के साथ इस हथकंडे को अपनाया गया। दूसरे दलों के काडर किन्ही सिद्धांतों में निष्ठा रखने के कारण तैयार किए जाते हैं कांग्रेस का काडर खाने पीने के सिद्धांत पर पलता और पनपता रहा है। यह सिलसिला किसी न किसी रूप में स्वतंत्रता के बाद ही आरंभ हो गया था, जब नेहरू जी को अपने परिवार और नातेदार लोगों को कुछ न कुछ देते देखकर दूसरों को अपने अपने हिस्से की याद आई थी और पहली बार दुर्भाग्य से मंदी के सहयोग से कालाबाजारी आरंभ हुई थी। इंदिरा जी ने उसे तार्किक परिणति पर पहुंचा दिया और जैसा कि राजीव जी ने भोलेपन से स्वीकार किया था विकास के लिए केंद्र से चला हुआ एक रुपया अंतिम मुकाम तक पहुंचने पर 25पैसा रह जाता है। इसलिए, जब पंजाब के मुख्यमंत्री ने कर्ज माफी की घोषणा की मैं हैरान नहीं हुआ था। राहुल जी ने जब कहा कि वह मध्य प्रदेश के किसानों का कर्जा माफ कर देंगे तुम मुझे अविश्वास नहीं हुआ । जब गायब होने वाले पैसों पर पलने वाले लोगों ने कांग्रेस शासन का अंत देखकर हल्ला मचाना शुरू किया था तब भी मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। कांग्रेस का काडर अदृश्य होता है, अपनी हितबद्धता के कारण इतनी मजबूती से उसके साथ खड़ा होता है कि उसके सत्ता से बाहर होने के साथ ही अर्ध विक्षिप्त हो जाता है।

तीसरी बात, कर्ज सभी किसानों को न तो मिल सकता है नहीं मिलता है, इसलिए जो लोग इस तरह का कर्जा लेते हैं और मौज मस्ती में उड़ा देते हैं उनसे दूसरे किसान जिनकी संख्या बहुत अधिक होती है, भीतर ही भीतर जलते हैं। इसके बावजूद अपनी वाचालता और हैसियत का लाभ उठाते हुए कुछ सीमा तक जनमत को मोड़ने में भी इनकी भूमिका होती है। परंतु अकेले कर्जमाफी के बल पर कोई इलेक्शन न तो जीता जा सकता है, न जीता गया है। पंजाब में इसके बावजूद यदि सफलता मिली तो वह कर्जमाफी के कारण नहीं, बल्कि इसलिए मिली अकाली दल से लोगों का वैसा ही मोहभंग हुआ था जैसे मनमोहन सिंह सरकार से। अकाली दल के कारनामों और नशे के बढ़ते कारोबार के कारण लोग किसी अन्य को चुनने के लिए तैयार थे। दिल्ली में बिजली पानी की रियायत या रिश्वत काम आई थी क्योंकि उससे अधिकांश लोग लाभांवित हो रहे थे। आर्थिक प्रलोभन देकर चुनाव जीतने वाला व्यक्ति लिखित रूप में यह स्वीकार करता है उसके पास सत्ता में आने या बने रहने का न तो नैतिक अधिकार है, न प्रशासनिक दक्षता, और न ही भविष्य कोई खाका।

आर्थिक पक्ष यह कि कर्ज की पूरी रकम का एक हिस्सा बैंक कर्मचारियों और बिचौलियों के पास चला जाता है यह जानते हुए भी कर्ज लेने वाला इसलिए निश्चिंत रहता है कि अगले चुनाव में कर्ज माफी होगी और जब नहीं होती है या बैंकों की खस्ता हालत के कारण वसूली पर जोर दिया जाता है तो मोहभंग की वह नौबत आती है जिसमें किसानों को आत्महत्या करनी पड़ती और संचार माध्यमों को हाय हाय करने का नया मसाला मिल जाता है। बैंकों में भ्रष्टाचार बढ़ता है और उस के अनुपात में बैंकों की हालत लड़खड़ाने लगती है। विकास की राशि बर्बाद होती है। निठल्ले बिचौलियों का एक तबका खतरनाक रूप से बढ़ता है।

मनोवैज्ञानिक पक्ष यह कि राष्ट्रीय स्तर पर मनोबल गिरता है, आत्मनिष्ठता के अनुपात में राष्ट्रनिष्ठा और समाज की चिन्ता का ह्रास होता है, आत्माभिमान घटता है, नैतिक का प्रतिरोध क्षीण होता है लालच बेशर्मी से बढ़ती चली जाती है
नैतिक ह्रास के विस्तार के चलते आपराधिक तरीकों से जल्दी से जल्दी धनी और उससे भी धनी बनने की लालसा का निर्लज्जतापूर्ण विस्तार होता है जिसमें मिलावट, कमीनापन और जघन्य अपराधों की बृद्धि में तेजी आती है, दहेज की मांग, रिश्वत की मांग ही नहीं बढ़ती है, हरामखोरी के साथ कामचोरी भी बढ़ती है। देश कुलांचे भरना तो दूर सीधी चाल से जलना तक भूल कर रेंगते हुए सरकता है। नैतिक मनोबल का हास नैतिकता से जुड़े सम्मान को भी खत्म कर देता है जो कि अनेक कष्टों को सहते हुए भी मनुष्य को नैतिक बने रहने का आत्मबल देता है। । किसी भी कीमत पर सफलता श्रेष्ठता का मानदंड बन जाती है।