Post – 2016-11-27

विविधता की अन्‍तर्निर्भरता (2)

हम जब किसी ऐसे मजहब की बात सोचते हैं जो उस मजहब से भिन्‍न मत मानने वालों के संहार की बात करता है, तो यह भूल जाते हैं कि हमारे यहां असुरों का संहार करने के लिए ही भगवान को अवतार लेना पड़ता रहा है। बाद में उन्‍हीं असुरों का हमारे समाज में ऐसा समावेश हो गया कि ब्राह्मणवाद को पहले से अधिक दृढ़ता से उन्‍होंने पुराणों, महाकाव्‍यों और स्‍मृतियों के माध्‍यम से स्‍थापित किया। यह दूसरी बात है कि ब्राह्मणों ने इसके बाद भी उन्‍हें अपने समकक्ष न तो माना न अपने में मिलाया। वे स्‍वयं अपे ब्राह्मण होने का दावा करते रहे । चारणों और भाटों की गणना इन्‍हीं में आती है।

अपने विशेष पर्यावरणवादी दर्शन के कारण असुरों में पिछड़ापन था, उसी के अनुरूप कट्टरता थी, पर साथ ही शिल्‍प और कौशल में निपुणता भी थी, जिसके व्‍यौरे में यहां जाना ठीक नहीं। हां, यह याद दिलाना जरूरी है कि यदि ब्राह्मणत्‍व के लिए प्रयत्‍नशील असुरों ने रूढि़वादिता का इतने सशक्‍त रूप में पोषण न किया होता तो वर्णव्‍यवस्‍था श्रमविभाजन के रूप में तो रह सकती थी, जन्‍मना या जाति बन कर न रहती, जिस रूप में आज तक बनी रह गई है। गाथी या गाथाकार कुश्‍ािक के पु्त्र कौशिक या विश्‍वामित्र के ब्राह्मणत्‍व प्राप्ति के लिए घोर साधना की कहानियां भी इसी को प्रतीकबद्ध करती हैं।

यह इतिहास इस बात का प्रमाण है कि भारतीय ब्राह्मणवाद किसी को अपने में मिलाता नहीं, जब कि दूसरे मजहब, जिनमें भारत के जैन और बौद्ध मत भी आते हैं, वे दूसरोंं को अपने उदाहरणों और विचारों से प्रभावित करने के लिए प्रयत्‍नशील रहे हैं । इस्‍लाम, ईसाइयत के साथ इसके लिए शक्ति के प्रयोग को उचित माना जाता रहा, क्‍योंकि उन देशों में वैचारिक संघर्ष का इतिहास उतना पुराना नहीं आैर इस्‍लाम में तो लगता है वह कुछ समय के लिए पैदा हुआ और उसके बाद जीवित न रह सका ।

इस दृष्टि से देखें ताे इस्‍लाम सबसे बन्‍द दिमाग का मजहब है जो आज भी उस निर्णायक चरण पर न पहुंचा जिस पर यूरोप उसकी प्रेरणा से पन्‍द्रहवी-सोलहवीं शताब्‍दी में पहुंच गया था। बुद्धिजीवी समाज का सबसे बड़ा कवच कट्टरपन्थियों की ज्ञान के प्रति उदासीनता और ‘किताब’ के भीतर ही समस्‍त ज्ञान को समाहित मानने की प्रवृत्ति है । यूरोप ने इसके लिए संघर्ष छेड़ा। मार्टिन लूथर ने बाइबिल का विरोध नहींं किया, परन्‍तु यह दावा किया कि उसे मानने से पहले हमें स्‍वयं यह जानने का अधिकार है कि उसमें लिखा क्‍या है। कैथोलिकों के लिए यह भी उनकी सत्‍ता को चुनौती थी। अब उनके फरमान नहीं चल सकते थे, लोगों को स्‍वयं जानने और निर्णय करने का अधिकार मिल रहा था।

कोपरनिकस के 1514 में प्रकाशित कमेंटे‍रियस का तो ईसाई कट्टरपंथियों को पता ही नहीं चलने पाया, पर उनकी अगली पुस्‍तक दे रेवोल्‍युशनिबस ऑर्बियम कोएलेस्टियम के बार में उनकी मृत्‍यु के बाद अरस्‍तूवादियों के विरोध के कारण उनकी जानकारी में आया। इसमें उन्‍होंने उन्‍होंने कुछ विस्‍तार से यह प्रतिपादित किया था कि सूरज, तारे और ग्रह धरती की परिक्रमा नहीं करते हैं अपितु वास्‍तविकता इससे उलट है । पोप को इससे सबसे बड़ा खतरा यह मालूम हुआ कि इससे प्रोटेस्‍टैंटों को बल मिलेगा। कोपरनिकस की मृत्‍यु 1543 में हुई और तब तक उसकी पुस्‍तकें कुछ सजग पाठकों तक ही पहुंच पाई थीं।

गैलीलियो कोपरनिकस से प्रभावित था और जब उसे अपने निजी अनुसंधान से भी इसकी पुष्टि होते देखी तो उसने स्‍वयं अपने मत का प्रतिपादन लातिन की जगह इतालवी में किया जो तब विज्ञान की भाषा न थी और इसलिए उसके विचारों का जल्‍द ही विश्‍वविद्यालय से बाहर भी प्रचार होने लगा। इससे अरस्‍तूवादी दार्शनिकों को सबसे अधिक आपत्ति हुई और उन्‍होंने संगठित हो कर कोपर्निकस के विचारों को प्रतिबन्धित करने का प्रस्‍ताव रखा और कोपरनिकस की दूसरी पुस्‍तक पर प्रतिबन्‍ध लग गया। इसके बाद गैलीलियो पोप को यह समझाने पहुंचे कि बाइ‍बिल विज्ञान की पुस्‍तक नहीं है और जहां इसका वैज्ञानिक सचाई से विरोध दिखाई देता है वहां यह रूपकीय मात्र है। चर्च इससे सन्‍तुष्‍ट नहीं हुआ क्‍योंकि उसे विज्ञान से अधिक प्रोटेस्‍टैंटों को होने वाले लाभ का डर था। और इसने 1616 में कोप‍रनिकस की मान्‍यता को गलत और वर्जित करार दिया और गैलीलियो को चेतावनी दी कि वह न तो इसका कभी हवाला देगा, न ही इसे सही ठहराएगा। गैलीलियों ने उस समय इस शर्त को मान लिया। अागे उन्‍होंने फिर अपने एक मित्र के पोप बनने पर उसे अपनी बात समझाने का प्रयत्‍न किया तो उसने उनको कोप‍रनिकस की मान्‍यता का खंडन करने और बाइबिल को सही ठहराने वाली पुस्‍तक लिखने का जिम्‍मा सौंप दिया। गैलीलियो ने बड़ी चतुराई से इसमें पुन: कोपरनिकस के सिद्धान्‍त का प्रतिपादन करते हुए यह दिखाया कि यह बाइबिल से अनमेल नहीं है। इसका खुलासा होने पर उन्‍हें यातनावध का सामना तो नहीं करना पड़ा परन्‍तु आजीवन अपने घर में कैद रखा गया। यहां से आरंभ होता है यूरोप का वैज्ञानिक युग और उसकी महिमा का स्‍तूप है अब तक की उसकी उपलब्धियां जिसका अंशग्राही आज का समस्‍त विश्‍व है।

इस्‍लाम में आज ऐसे वैज्ञानिक हैं जो विज्ञान की अद्यतन ऊंचाइयों पर पहुंचने का दावा कर सकें, परन्‍तु उन्‍होंने मुल्‍लावाद और कुरआन के अन्‍तर्विरोधों की आलोचना करने तक का साहस नहीं जुटाया। उसके बुद्धिजीवियों ने कभी अपने समाज को दरबाबन्‍द दिमाग से बाहर निकालने का प्रयत्‍न नहीं किया। वे अपनी मौन सहमति या सहनशीलता से मुल्‍लावाद की जड़ें मजबूत करते रहे। अपने को सेक्‍युलर बताने वाले बुद्धिजीवियों ने, जैसा हम कहते आए हैं, लीग की भूमिका निभाते हुए लगातार हिन्‍दू समाज की कमियों का आविष्‍कार करने तक का कष्‍ठ उठा कर इसकी भर्त्‍सना की, परन्‍तु इस्‍लाम की जड़ता और मध्‍यकालीनता पर कभी कोई टिप्‍पणी नहीं की। यदि किसी ने ऐसा दुस्‍साहस किया तो उसकी दशा तसलीमा नसरीन जैसी हो गई जिसके कद सेे इस्‍लामी देश ही नहीं सहमते, अमेरिका और नोबेल का चुनाव करने वाले भी सहमते हैं अन्‍यथा यदि किसी मुस्लिम लेखक को नोबेल मिलना था तो वह मलाला को नहीं तसलीमा नसरीन को मिलना था। पुरस्‍कार के बिना भी वह न्‍याय, मानवतावाद और सत्‍यनिष्‍ठा के लिए बड़ी से बड़ी असुविधा का सामना करने को अडिग भाव से तत्‍पर रहने के कारण दूसरों से अलग और ऊपर दिखाई देती है।

तसलीमा ने स्त्रियों के प्रति अन्‍याय, अल्‍पसंख्‍यकों के प्रति अन्‍याय को बहुत संयत भाषा में मुखर किया था चाहे वह अन्‍याय बांग्‍लादेश में अल्‍पमत के विरोध में हो या भारत में । आश्‍चर्य है कि तसली‍मा के लिए भाजपा के पास सहानुभूति है परन्‍तु कम्‍युनिस्‍टों आदि के पास नहीं । वे उसका नाम तक लेने से परहेज करते हैं । इसका कारण क्‍या यह है कि वे न केवल इस्‍लामी बन्‍दमानसिकता, दारुलहर्ब को चुपचाप दारुल इस्‍लाम बनाने की उसकी योजना के मौन समर्थक बने रहते हैं।

भारत हिन्‍दू देश है इसे नेहरू और सेक्‍युलरिस्‍ट जितने निर्णायक स्‍वर में घोषित करते रहे हैं, उतना हिन्‍दू संगठनों ने भी नहीं किया। कामन सिविल कोड के प्रश्‍न पर बाबा साहेब के आग्रह को देखते हुए नेहरू ने कहते हैं उनकी सार्वजनिक भर्त्‍सना की थी जिससे आहत हो कर उन्‍होंने मंत्रिपद से त्‍यागपत्र दे दिया था। प्रश्‍न सीधा था कि केवल हिन्‍दुओं के लिए कानून बनाने का अधिकार तुम्‍हें किसने दे दिया, यदि पूरे देश के लिए वही कानून नहीं बना सकते तो। सेक्‍युलरिस्‍ट केवल हिन्‍दू समाज में व्‍याप्‍त कुरीतियों के चरित्र और इतिहास को समझे बिना अपमानजनक भाषा में और बिना किसी सन्‍दर्भ के प्रहार करते रहे। प्रकारान्‍तर से हिन्‍दू ही उनके लिए पूरा भारत था। हिन्‍दुत्‍व के राजनीतिक उत्थान में अपने इस योगदान को वे स्‍वयं भूल कर अतीत से ले कर वर्तमान तक के हिन्‍दू समाज को कोसते और अपमानित करते रहे।

जहां सेक्‍युलरिज्‍म के नाम पर ही योजनाबद्ध रूप में समाज के दो प्रधान और मुखर त‍बकों को अलग करने के प्रयत्‍न लगातार होते रहे हों, वहां हम किस एकता की बात कर सकते हैं। अत: जो है, जिन भी कारणों से, जिनके भी समर्थन से जो रूप वह लेता जा रहा है उसे समझना और उससे होने वाली हानि से अपने को बचाने की युक्ति निकालना सहअस्तित्‍व की पहली शर्त बन जाती है। समझदारी न कि एकता की भावना हमें टकराव से बचा सकती है। एक ऐसा समाज जो किसी भी गैर मुस्लिम को अपने समान मानने को तैयार ही न हो, पूरा इंसान तक मानने को तैयार न हो, जो सहयोग तक से डरता हो कि इसके चलते उसका विरोध कम न हो जाय और उसका पृथक अस्तित्‍व खतरे में न पड़ जाय, उससे सावधान रहते हुए कार्यसाधक संबंधों के माध्‍यम से समरसता को बनाए रखना एकमात्र सही उपाय हो सकता है। ऐसी स्थिति तब तक बनी रहनी है जब तक उस समाज में बुद्धिजीवी वर्ग का उदय नहीं हो जाता जो आत्‍मनिरीक्षण करने में समर्थ हो और वे खतरे उठा सके जिसे तसलीमा नसरीन ने उठाए हैं। पुरुषों से इसकी अपेक्षा नहीं है, महिलाओं के अधिकाधिक आधुनिक शिक्षा संपन्‍न होने के क्रम में यह शक्ति मुस्लिम समाज के भीतर पैदा हो सके तो हो। आज तो बच के रहना रे बाबा, बच के रहना रे ।

Post – 2016-11-26

विविधता की अन्‍तर्निर्भरता (1)

स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन को सशक्‍त बनाए रखने के लिए भारत के लिए सभी समुदायों को इससे जोड़ने की जरूरत अनुभव हुई और विविधता में एकता का मुहावरा बहुत आकर्षक लगा। यह मुहावरा भ्रामक है । इससे भारतीय समुदायों के चरित्र का सही परिचय नहीं मिलता। मुहावरा हमने नहीं संभवत: रिजली ने पहली बार हमारे समाज के लिए प्रयोग किया था। अवधारणा पुरानी बताई जाती है । इसकी एक परिभाषा के अनुसार :
Unity in diversity is a concept of “unity without uniformity and diversity without fragmentation” that shifts focus from unity based on a mere tolerance of physical, cultural, linguistic, social, religious, political, ideological and/or psychological differences towards a more complex unity based on an understanding.

जब आप नेशनल इंटीग्रेशन की बात करते हैं तो प्रकारान्‍तर से यूनीफार्मिटी या एकरूपता की बात करते हैं जिसमें भिन्‍न और विरोधाभासी के लिए जगह नहीं रह जाती । बहुलता का निषेध किया जाता है। कुछ विचित्र लगा कि बहुलता में एकता के सन्‍दर्भ में विकीपीडिया में जिन देशोंं को याद किया गया है उनमे कनाडा, इंडोनेशिया आदि जैसे देश तो आते हैं, भारत नहीं आता। क्‍या इसकेे पीछे एक कारण यह हो सकता है कि हम उस एकता का निर्णायक अवसरों पर निर्वाह नहीं कर सके और एकता से अधिक fragmentation या टुकड़े करने पर अधिक ध्‍यान दिया । क्या इसका कारण यह नहीं है कि हमने सभी बहानों से – भौतिक, सांस्‍कृतिक, भाषार्ई, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, विचारधारात्‍मक, और मनोवैज्ञानिक तरीकों तकाजों से ऐसा जब भी अवसर मिला करने का प्रयत्‍न किया और कई बार परीक्षा की घडि़यों से गुजरते हुए किया । ये सभी प्रवृत्तियां नई हैं, फिर वह कौन सी चीज है जो इसके बावजूद इसमें एकात्‍म्‍य का भाव इतनी प्रबल बनाए रखती है कि विघटन के ये सारे प्रयत्‍न चेतना को प्रभावित नहीं करते शैक्ष स्‍तर पर ही टिके रह जाते हैं । परन्‍तु हाल के दिनों में आत्‍मघात के जो प्रयत्‍न हुए हैं, जाहिर है वे सेक्‍युलरिज्‍म के नाम पर हुए हैं, उनसे जितनी क्षति सुशिक्षित और शिक्षित वर्ग को हुआ है वह इतिहास में अपूर्व है ।

भारतीय सन्‍दर्भ में एकता किंचित् भ्रामक शब्‍द है । यह बहुलता का सहअस्तित्‍व है जो हमारा आदर्श किसी श्रेष्‍ठतम फूल तक सं‍कुचित नहीं कर देता, अपितु असंख्‍य रंगों, गंधों, निर्गन्‍धों को भी पुष्‍पोद्यान का हिस्‍सा बना देता है और हमारी चेतना के केन्‍द्र में कोई एक पौधा या वृक्ष नहीं रह जाता अपितु समग्र उद्यान आ जाता है।

भारत की बहुलता और बहुतों के भीतर अनेक समानताओं की रहस्‍यमय उपस्थिति इसे अधिक रोचक और रहस्‍यमय बनाती है । समानताओं का यह हाल है कि जिसने भी किसी क्षेत्र का गहराई से अध्‍ययन किया उसे ऐसा लगा कि जो प्रथम दृष्टि में आंचलिक प्रतीत होता है वह सार्वदेशिक है अौर यह सार्वदेशिकता भारतीय उपमहाद्वीव में ही सिमट कर रह जाती है। उदाहरण के लिए भाषा का अध्‍ययन करते हुए इमेनो को भारत एक भाषावैज्ञानिक क्षेत्र मानना पड़ा। इमेनो से भी पीछे जा कर मुझे उस स्‍तर की उपस्थिति दिखाई दी जिसमें सब कुछ सबका बन जाता है। इसकी जड़ें सुदूर इतिहास में जाती हैं परन्‍तु इतिहास को इतना पंगु बना कर रखने और समझने का प्रयत्‍न किया जाता रहा और साथ ही साथ प्राचीनता का उपहास किया जाता रहा कि इन पंक्तियों के लेखक को छोड़ कर किसी को यह गुमान तक नहीं हुआ कि यह गहराई पन्‍द्रह बीस हजार साल पीछे तक जाती हैै और इसको तकनीकी के विकास और भाषा के माध्‍यम से प्रमाणित किया जा सकता है। परिदृश्‍य के इस अभाव के कारण, मेरी जानकारी में ऐसा कोई देसी या विदेशी अध्‍येता नहीं दिखाई देता जो यह समझ सका हो कि शान्ति की कामना जो भारतीय चेतना में निर्णायक महत्‍व रखती है वह कितने रक्‍तपातों और अन्‍तर्घातों का परिणाम है।

Post – 2016-11-26

वह पूछते हैं तुमने मुहब्‍बत में क्‍या किए ।
हम जिनकी राह में खड़े रुस्‍वा हुआ किए ।।

Post – 2016-11-26

यदि जनता ने अपना समर्थन ऐसे संगठन को दिया तो वे शत्रुदेशों से और उनके आतंकवादियों तक से हाथ मिला लेते हैं। इस देश को लूटने, बर्वाद करने वालों का साथ देते हैं, इस लूट और बर्वादी को रोकने का संकल्‍प लेने वाले दल का नंगा नाच करते हुए विरोध करते हैं। वे उस शिक्षाप्रणाली तक की आलोचना नहीं करते जिसमें आदमी को तंगनजर बनाया जाता है और आतंकवादी गतिविधियों की नींव की आलोचना तक सहन नहीं कर पाते ।

इस बीच बहुत कुछ हो रहा है जो इस देश की मानसिकता को बदलने, मध्‍यकालीन मानसिकता से बाहर लाने का प्रयत्‍न माना जा सकता है और हमारा बुद्धिजीवीवर्ग इसको रोकने, उसी मानसिकता में वापस लौटने के लिए छटपटा रहा है। बौद्धिक गतिविधियों से जुड़े समस्‍त पदों को छेक लेने के कारण क्‍या इसे हम अपनी सोच में आधुनिक, वैज्ञानिक और देशहित और विश्‍वहित के लिए समर्पित मान सकते हैं। यदि नहीं तो पहली जरूरत है, उसके कोरस का खटराग मानते हुए इसको अनसुना करना । एक बहुत साहसिक संग्राम चल रहा है। उसकी कुछ क

हमारे साथ संघर्ष वैचारिक संघर्ष के रूप में भी लगातार चलता रहा इसलिए इतने सारे टकरावों और घोर विरोध से ऊपर उठ कर शान्ति के महत्‍व को समझा गया और कलह में बर्वाद होने वाली ऊर्जा का सर्जनात्‍मक उपयोग संभव हुआ, जिसे भारत की असाधारण समृद्धि का श्रेय दिया जा सकता है।

Post – 2016-11-24

धार्मिक मनोबन्‍ध

हम एक हिन्दू के रूप में इस्लाम पर बात नहीं कर सकते । पक्षधर होने के बाद पक्षपात से नहीं बच सकते। पक्षपाती न्यायाधीश नहीं हो सकता और उसके तर्क में जितना भी पैनापन हो, वह गहरे उतर नहीं सकता। दूसरे पक्ष्‍ा के लिए यह मात्र शाेर है जिसे वह अनसुनी कर सकता है, उससे खिन्न अनुभव कर सकता है, पर उसका कायल नहीं हो सकता ।

जब मैं मुसलमानों के बारे में बात करता हूं तो यह मान कर नहीं कि वे अच्छे या बुरे हैं कि नहीं । हम इस बात को बार बार दुहराते आए हैं कि परिस्थितियों के समक्ष हमारी हैसियत निमित्त मात्र की रह जाती है । निमित्त कर्ता नहीं होता, कारिन्दा अवश्यक होता है। उत्तरदायित्व उन शक्तियों, विचारों, मान्यताओं, विश्वासों, दबावों और बाध्यताओं का होता है जिनसे हम ऊपर नहीं उठ सके । मैं जानता हूं, इस तरह के विचार, ठंडे लगने वाले विचार, ऐसे लोगों को कायरता प्रतीत हो सकते हैं जो कठोर उपायों के हामी हैं । जिनको शठे शाठ्यं समाचरेत, या टिट फार टैट जैसे मुहावरोंं से सभी अनर्गल आचरणों का हल मिल जाता है । यह उचित तो है, परन्‍तु यह रक्षा और व्‍यवस्‍था संभालने वालों का काम है कि वे अपराधी को दंडित करें। हम इसे अपने हाथ में लें तो ठीक वही काम करेंगे जिसके कारण उनसे हमारी चिढ़ है। उन्‍हें दंडित भले न कर पाएं परन्‍तु चेतना के स्‍तर पर उन जैसे बन अवश्‍य जाएंगे, भले कर कुछ न पाएं।

हमारा काम विवेचन करना है। हमारे लिए वह अच्‍छा या बुरा जैसा भी है, एक परिघटना है जिसकी अपनी समस्‍यायें है जिन्‍होंने उसे वैसा बनाया है। मुस्लिम समुदाय तब तक कुपढ़ और दरबाबन्‍द जहनियत का शिकार बने रहने को बाध्‍य है जब तक वह किताब में विश्‍वास करता है। कारण सारा ज्ञान और सामाजिक इथास उस किताब की किसी भी इबारत से टकराने के बाद व्‍यर्थ का हस्‍तक्षेप बन जाता है और इसलिए उसे त्‍याग देना पड़ता है। जब तक मुस्लिम बुद्धिजीवी किसी गलत कार्य या आचरण की आलोचना इस आधार पर करता है कि कुरान शरीफ में ऐसा नहीं ऐसा लिखा है, तब तक वह उसे अल किताब से बाहर निकालने का साहस नहीं कर पाता और हमारी समझ से लगभग सभी ‘उदार’ और ‘समझदार’ बुद्धिजीवी यही करते रहे हैं। अलबरूनी से ले कर असगर अली इंजीनियर सभी के साथ यह मनोबन्‍ध काम करता दिखाई देता है।
जिन्‍हें हम बहुत प्रगतिशील समझते हैं, उनमें भी कहीं न कहीं इसका दबाव देखा जा सकता है। मेरा अनुभव अधिक नहीं है, केवल एक बार ईगतपुर में एक संगोष्‍ठी के क्रम में दो दिन का साहचर्य अली सरदार जाफरी का मिला था। सान्‍ध्‍य पेय के क्रम में चर्चा कैसे आरंभ हुई यह तो याद नहीं, पर सरदार का यह कथन मुझे सत्‍य होते हुए भी विचित्र लगा था कि तुम्‍हारे पास कोई किताब नहीं है, उनके पास किताब है। जो अर्थ मैैैैंने ग्रहण किया वह यह कि यदि वे उस किताब के अनुसार आचरण करते हैं तो उन जैसों को उसे अनुचित ठहराने का कोई कारण नहीं रह जाता।

सामी मतों की एक साझी किताब है जिसमें उन्‍होंने अपने अनुसार कुछ जोड़ा और बदला है, जैसे ईसाइयत ने न्‍यू टेस्‍टामेंट और इस्‍लाम ने वे विचार जिनका उन्‍हें इलहाम हुआ था या जिन्‍हें अल्‍लाह ने एक फरिश्‍ते के माध्‍यम से उन तक पहुंचाया था।

पहली बात यह कि यह धारणा कि हिन्‍दुओं के पास किताब न थी और न ही है गलत है। वेद को ऐसा ही एक अनुंघनीय ग्रन्‍थ बनाया गया था। उसकेे सूक्‍तों को भी ऋषियों ने रचा नहींं था, साक्षात्‍कार किया था – साक्षात्‍कृत धर्माण: ऋषय: बभूवु: । या ऋषियों को द्रष्‍टा होने के कारण ऋषि कहा जाता है – ऋषि दर्शनात्। जैसे सृष्टि और स्रष्‍टा के विषय में कुरान और बाइबिल ने अपनी पुराकथाएं पुराने टेस्‍टामेंट से लीं, और इस पर कोई विवाद नहीं है, वैसे ही पुराने टेस्‍टामेंट के अनेक अंश ऋग्‍वेद से मेल खाते हैं, यद्यपि मनोबन्‍ध के कारण पहले किसी का ध्‍यान इस ओर नहीं गया।

मैं इसके तीन साम्‍यों की ओर ध्‍यान दिलाना चाहता हूूं। पहला यह कि भारत में सृष्टि और स्रष्‍टा को लेकर कई तरह के विचार प्रचलित थे, उनमें से एक था विकासवादी, दूसरा था यान्त्रिक, तीसरा था याजिकीय, चौथा कास्‍मोलोजिकल, और इन्‍हीं में एक था चामत्‍कारिक ।

सकृद्ध द्यौरजायत सकृद् भूमिरजायत ।
पृश्‍न्‍यादुग्धं सकृत्पयस्तदन्यो नानु जायते ।। 6.48.22
यह है एक झटके में, एक साथ धरती आकाश ही नहीं, सृष्टि के समस्‍त पदार्थों का, यहां तक कि गाय के थन में दूध का पैदा हो जाना और उसके बाद कुछ और न पैदा होना जो उसने कहा, प्रकाश हो और प्रकाश हो गया आदि का प्रेरक प्रतीत होता है।

एक दूसरी कथा जो इब्राहिम के द्वारा अपनी सन्‍तान की बलि की कथा के रूप में आई है ऋग्‍वेद में हरिश्‍चन्‍द्र द्वारा अपनी सन्‍तान, रोहिताश्‍व को वरुण देव को बलि देने की कथा के रूप में आई है, यद्यपि इसकी कथा कुछ लंबी और चालाकी भरी है जिसे शुन:शेप की कथा के रूप में पेश किया गया है, अर्थात् पुत्र की बलि देने के लिए प्रतिश्रुत हरिश्‍चन्‍द्र बहाने बनाते हुए बलि से बचते रहते हैं और अन्‍त में उसे वनवास के लिए भेज देते है। वरुण के प्रकोप से हरिश्‍चन्‍द्र को बेरी बेरी की बीमारी हो जाती है । इस सूचना के बाद रोहिताश्‍व लौटता है और अपनी जान बचाने के एक अकिंचन ब्राह्मण से बलिपशु बनने के लिए खरीद लेते है। बलिपशु के रूप में उसका वध होने की तैयारी पूरी होने पर वह सभी देवताओं से अपने प्राणरक्षा की याचना करता है और अन्‍तत: विश्‍वामित्र न केवल उसके प्राण की रक्षा कर लेते हैं, अपितु उसे अपना पुत्र भी बना लेते हैं।
इसी हरिश्‍चन्‍द्र की पौराणिक कथा हम सत्‍य हरिश्‍चन्‍द्र के रूप में एक भिन्‍न रूप में पाते हैं, परन्‍तु इसमें भी अन्‍त में विश्‍वामित्र उपस्थित हो कर परीक्षा में खरा उतरने के कारण मृत पुत्र को जीवित, डोम की दासता से मुक्‍त और पुराने राजपाट का स्‍वामी बना देते हैं जिसे उन्‍होंने दान स्‍वरूप ले लिया था।

कुछ विषयान्‍तर हो गया, परन्‍तु वेद को आप्‍त अौर अकाट्य और अनुभूत सत्‍य के वेद से अनमेल पड़ने पर वेद को मान्‍य बनाने के प्रयत्‍न किए गए परन्‍तु हमारे यहां तार्किक परंपरा आरंभ से ही इतनी प्रबल रही है कि कौत्‍स ने वेद की इतनी तीखी आलोचना की कि बाद के लिए कुत्‍सा शब्‍द का अर्थ ही बदल दिया गया और इसी से उन्‍हें जोड़ दिया गया। पहले चित् कित्, चेत , केत और कुत का अर्थ ज्ञानपरक था और कुत्‍सा का अर्थ भी ज्ञान हुआ करता था। हिन्‍दी और भोजपुरी में कूतना – आकलन आदि करना उसी पुराने अर्थ से जुड़े हैं, और इसीलिए मैं कहता हूं कि हमारी बोलियां संस्‍कृत की कमियों को भी सुधारने में सहायक हो सकती हैं।
वेद की आप्‍तता अब पहले जैसी अनुलंघनीय नहीं रह गई। गीता जिसका महत्व धर्मग्रन्‍थ जैसा है, वह भी वेद की अकाट्यता और असाधारण महत्‍व को नासमझों का आग्रह मानती है – ये इदं पुुष्पितं वाचं प्रवदन्ति अविपश्चित: । वेदवादरता पार्थ आन्‍यदस्‍तीति वादिन: । परन्‍तु दूसरी ओर जो वेद की आप्‍तता को स्‍थापित करने के लिए चिन्तित रहे है वे अपने क्षेत्र के प्रकांड विद्वान होते हुए भी, अन्‍यथा तर्कशील होते हुए भी अपने क्षेत्र में गलतियां करने को बाध्‍य हुए। इनमें यास्‍क, पाणिनि जैसी मेधा के व्‍यक्ति भी आते हैं और स्‍वामी दयानन्‍द जैसे तर्कशील और सन्‍देहवादी भी । इसलिए हमें समझना यह होगा कि कौन सी शक्तियां है जो अपने ही समाज को किसी ग्रन्‍थ में कैद करके रखना चाहती हैं और उनसे वह समाज कैसे मुक्ति पा सकता है।

जाहिर है हमारी इस मीमांसा का कोई लाभ मुस्लिम समुदाय को नहीं होगा। अधिक संभावना यह है कि वे इसे पढ़ने और समझने से इन्‍कार कर दें। परन्‍तु हमारे लिए उन मनोबन्‍धों की पड़ताल स्‍वयं अपने हित के लिए जरूरी है क्‍योंकि इसके बाद ही हम उस रणनीति का विकास कर सकते हैं जिसमें हम अविरोध की संभावनाओं को तलाश कर सकें।

Post – 2016-11-23

संचार की भाषा

हम जो कुछ जिस आशय से कहते हैं, वह श्रोता के द्वारा ठीक उसी आशय में ग्रहण नहीं होता । हम जिस विफलता की बात कर रहे हैं वह अभिमुखता, उदासीनता, या संशय, अहम्‍मन्‍यता, पूर्वाग्रह के कारण उत्‍पन्‍न होती है और इन सबसे अधिक उत्‍पन्‍न होती है साहस की कमी से जिसमें समस्‍या की पेचीदगियां तक सामने नहीं आ पाती। हम मारे डर या लिहाज के कुछ बातें कहने का साहस नहीं जुटा पाते, इसलिए या तो उन पर चुप रह जाते हैं या उसको ग्राह्य बनाने की चिन्‍ता में पड़ जाते हैं, इसलिए अभिव्‍यक्ति के स्‍तर पर ही संचार पंगु हो जाता है। अप्रियस्‍य च सत्‍यस्‍य वक्‍ता श्रोता च दुर्लभ:। यहां हम केवल इसके एक पक्ष को लेंगे ।

कल्‍पना कीजिए किन्‍हीं कारणों से ‘क’ ‘ख’ से बात करना चाहता है परन्‍तु ‘ख’ को बात करने की जरूरत नहीं है । ‘ख’ ‘क’ को अपनी समकक्षता का नहीं मानता । अब जिन भी परिस्थितियों में ‘क’ ‘ख’ से कुछ कहना चाहता है, वह अनुरोध या याचना तो बन सकता है, संवाद का रूप नहीं ले सकता। ‘ख’ इसे इस रूप में प्रकट नहीं करेगा, परन्‍तु उसके भावों पर ध्‍यान दें तो पता चल जायेगा कि वह आपकी बात सुन कर भी आप पर अहसान कर रहा है और जरूरी नहीं कि वह आपका ‘अनुरोध’ मान ले, या जिस रूप में माने वह आपकी आकांक्षा के अनुरूप हो ।

अब इतिहास पर लौट कर नजर डालें, क्‍या कोई चरण ऐसा दिखाई देता है जब मुसलिम समुदाय के उस वर्ग ने जो उसका बौद्धिक नेतृत्‍व करता है अपनी ओर से संवाद की आवश्‍यकता अनुभव की । अन्‍तर्मन से हिन्‍दू समाज को अपने समकक्ष मानते हुए अपने किसी कथन को सम्‍मान से सुनने का प्रयत्‍न किया ।

मुझे यह भ्रम है कि इसकी पहल यदि कभी किया गया तो हिन्‍दुअों की ओर से किया गया जिसका एक कथित अकथित उत्‍तर यह मिलता रहा कि उसकी शर्तों पर संवाद संभव है।

इससे सद्भावना के नाम पर हिन्‍दू समाज सदा गंवाता रहा है, और मुस्लिम समुदाय उसे झुकाने का प्रयत्‍न करता रहा पर अपने को तनिक भी बदलने को तैयार नहीं रहा है।

यह एक बहुत अहम प्रश्‍न है इसलिए इस पर स्‍वच्‍छता से, यदि प्रमाण हों तो उन्‍हें देते हुए मुझे गलत सिद्ध करने का प्रयत्‍न करें क्‍योंकि यह ‘मेरा मनवा तेरा मनवा कैसे एक होय रे’ की समस्‍या से जुड़ी समस्‍या है।

Post – 2016-11-22

हिटलर की वापसी (2)

हिटलर सबसे बुरा आदमी नहीं था, वह बहुत सारे बुरे लोगों में से एक था, परन्‍तु उन्‍हें बचाने के लिए संचारमाध्‍यमों और प्रचारमाध्‍यमों का उपयाेग करके सारी घृणा हिटलर पर केन्द्रित कर दी गई । हत्‍याओं, विनाशलीलाओं की तालिका तैयार करें और तब तय करें कि हिटलर, ट्रूमैन, आइजन आवर, केनेडी, निक्‍सन, जानसन, लेनिन, स्‍तालिन आदि की निष्‍ठुर परपीड़कों की जघन्‍य गोष्‍ठी में उसकी जगह कहां हो सकती है।

वियतनाम युद्ध 1955-75 में किस तरह की नृशंसता बरती गई, इसकी कहानियों को कभी उस तरह प्रचारित ही नहीं किया गया जिस तरह हिटलर के द्वारा यहूदियों के उत्‍पीड़न की कहानियाें को या कुछ दूर तक साेवियत यातनाशिविरों की कहानियों को। युद्ध अपराधियों और मानवद्रोहियों की तालिका और भी लंबी है। ईराक की त्रासदी की ओर तो ध्‍यान कुछ इ‍सलिए जा भी सका कि उसे अमेरिका जो अमानवीय कृत्‍य करता उसका पूर्वाभास वह स्‍वयं यह कह कर दे देता था कि कल सद्दाम वऐसा करेगा। मगर अमेरिकी साजिश के कारण अफ्रीका के कुछ देशों की यातना की ओर तो हमारा ध्‍यान ही नहीं जाता। हम गोएबेल्‍स को उसकी झूठ की फिलासफी के लिए कोसते हैं परन्‍तु प्रचारमाध्‍यमों और मानवाधिकार के नाम पर फैलाए गए अमेरिकी जाल के द्वारा आज तक लगातार सचाई को दबाया, कहानियों को सचाई बना कर पेश किया जाता रहा है और उसी की सफलता है कि सारी घृणा अकेले हिटलर पर थोप कर दूसरों को बचा ही नहीं लिया जाता, अपितु उनको इतना भोला बना दिया जाता है मानो वे मानवीय संवेदना से ओतप्रोत थे। सभी से हमारे राजनयिक संबंध बहुत सुथरे रहे हैं, और जब तक हिटलर ब्रिटेन और सोवियत संघ के लिए खतरा नहीं बन गया, तब तक उसके साथ इनके भी संबंध बुरे नहीं थे । लाओस जैसे छोटे से देश के साथ अमेरिका ने क्‍या किया इसकी भयावहता को निम्‍न तथ्‍यों से समझा जा सकता है। ध्‍यान रहे कि इस बीच अमेरिका मे तीन राष्‍ट्रपतियों का शासन रहा। सभी एक जैसे क्रूर।

”लाओस में वर्ष 1964 से लेकर 1973 तक पूरे नौ साल अमेरिकी वायुसेना ने हर आठ मिनट में बम गिराए। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नौ सालों में अमेरिका ने लगभग 260 मिलयन क्लस्टर बम वियतनाम पर दागे हैं जो कि इराक के ऊपर दागे गए कुल बमों से 210 मिलियन अधिक हैं। लाओस में अमेरिका ने इतने क्लस्टर बम दागे थे कि दुनिया भर में इन बमों से शिकार हुए कुल लोगों में से आधे लोग लाओस के ही हैं।”

सुभाष चन्‍द्र बोस हिटलर से मिलने गए थे और उनको यह खुशफहमी थी कि वह अंग्रेजी शासन से मुक्ति दिलाने में मददगार हो सकता है । होता तो उतना बुरा नहीं रह जाता, यद्यपि जर्मन यातनाशिविरों की कहानियां जर्मनी के पतने के बाद ही प्रकाश में आ सकीं। भारत में अशिक्षित और अल्‍पचेत लोगों को हिटलर की बढ़त अग्रेंजों की पराजय और अपनी मुक्ति का उपाय प्रतीत हो रहा था और यह भावना खासी व्‍यापक थी। मेरे गांव का इक्‍केवाला, विलायत, इक्‍के को तेज भगाने के आवेश में ‘चल बेटा हिटलर की चाल’ कहता जा रहा था। पुलिस वाले ने रोक लिया, माफी मांग कर किसी तरह बचा ।

हम यहां दो बातों की ओर ध्‍यान दिलाना चाहते हैं जिनका विवेचन हम पहले कर आए हैं। पहला यह कि मनुष्‍य एक व्‍यक्ति के रूप में स्‍वतन्‍त्र होता नहीं, अपितु असंख्‍य बन्‍धनों या सीमाओं के साथ पैदा होता और बढ़ता है। उसे अपनी स्‍वतन्‍त्रता स्‍वयं उन सीमाओं से ऊपर उठते हुए हासिल करनी होती है। यह एक तरह का आत्‍मविजय है।

दूसरे मनुष्‍य में गर्हित से गर्हित आचरण करने की शिथिलता होती है और इसके विपरीत महान से महान बलिदान देने और अकल्‍पनीय ऊंचाइयों तक पहुंचने की क्षमता होती है, और परिस्थितियों के दबाव में वह एक अदृश्‍य योजना का निमित्‍त मात्र बन कर रह जाता है। इसका विवेचन करते हुए तोल्‍स्‍तोय ने युद्ध और शान्ति में नैपोलियन को काल के हाथ ही एक कठपुतली मात्र सिद्ध किया था और ऐसी ही कठपुतलियां वे सभी नाम हैं जिन्हें हमने ऊपर गिनाया है जिनमें से हिटलर एक है, एकमात्र नहीं।

ऐतिहासिक परिस्थितियां उस व्‍यक्ति को अपने दबाव से पैदा करती हैं और इस्‍तेमाल करती हैं, और फिर किनारे फेंक देती हैं। मुख्‍य प्रश्‍न परिस्थितियों का है। क्‍या वे ऐसी हैं जिनमें कोई खलनायक पुन: पैदा हो जाय, जिनमें हिटलर पैदा हुआ था ? उत्‍तर नहीं में मिलेगा, कारण कोई दो परिस्थितियां समान नहीं होतीं। भारतीय संविधान ने तीनों अंगों की सीमा आैर सेनाध्‍यक्ष का अधिकार कार्यकारी शक्ति से युक्‍त प्रधानमंत्री की जगह सर्वाधिकार मुक्‍त राष्‍ट्रपति को सौंप कर तानाशाही का रास्‍ता बन्‍द कर रखा है, फिर भी आपात काल लगा, इसलिए सतर्क रहने की आवश्‍यकता बनी रहती है।

वह जातीय अपमान बोध जो जर्मनी में पहले महायुद्ध के बाद पैदा हुआ था, जिसमें अन्याय का गहरा पुट था, उसने एक मामूली हैसियत के परन्‍तु दूसरों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील और इसलिए तिलमिलाहट से भरे और कृतसंकल्‍प ठिगने से आदमी को केन्‍द्र में ला दिया। उसने लीग आफ नेशन में अपना जूता मेज पर रख कर बता दिया था कि उसके निर्णय पक्षपात पूर्ण हैं और वह उन्‍हें नहीं मानता। हिटलर इतिहास का चुना, भवितव्‍य का निमित्‍त था, जिसके साथ उसकी मूर्खताओं के योग ने उसे उस स्थिति में पहुंचा दिया । परन्‍तु मान लें, जैसा कि अन्‍देशा था, उसने एटम बम बना लिया होता और उसका प्रयोग अमेरिका को उसके गुर मिलने से पहले कर बैठा होता तो ? मान लें वह विजयी हो चुका होता तो? तो उन कुकृत्‍यों का पता तक नहीं चलता, चलता भी तो उन्‍हें मामूली दंड मान लिया जाता और हिटलर का मूल्‍यांकन बदल जाता । तब वह डरावना नहीं रह जाता।

कहते हैं जब जर्मनी ने समर्पण कर दिया था, सभी जनरल सम्‍मानजनक मौत मरने के लिए आत्‍मघात कर रहे थे, तब एक जनरल ने कहा था, ‘अलविदा। फिर मिलेंगे ‘। अर्थात् हिटलर भले न पैदा हो, वे नाजी प्रवृत्तियां पैदा हो सकती हैं।

जर्मनी में शरण लेने वाले मुसलमानों की करतूतों, और खास तौर से इस्‍लाम में धर्मान्‍तरित हाेने वाले जर्मनों ने जैसे कारनामे किए उससे जर्मनी में हिटलर की लोकप्रियता बढी है। यह बढ़त मामूली है, फिर भी हिटलर का मजाक उड़ाते हुए
एक हास्‍य कथा रची गई जिसका नाम था ‘वह फिर आ गया’ आगे का परिचय विकीपीडिया की निम्‍न पंक्तियों से प्राप्‍त करें:

Look Who’s Back (German: Er ist wieder da, pronounced ; translation: “He is there again”) is a bestselling German satirical novel about Adolf Hitler by Timur Vermes, published in 2012 by Eichborn Verlag.
In The Jewish Daily Forward, Gavriel Rosenfeld described the novel as “slapstick”, but with a “moral message.” However, while acknowledging that Vermes’s portrayal of Hitler as human rather than monster is intended to better explain Germany’s embrace of Nazism, Rosenfeld also states that the novel risks “glamorizing what it means to condemn”: readers can “laugh not merely at Hitler, but also with him.”
In The Sydney Morning Herald, reviewer Jason Steger, “Most people wouldn’t think it possible that if they would have lived back then they would have thought he was in some way attractive too”, he said.

There is a really weird group in Germany called Pegida. They are against muslims and islamisation of Germany and other countries.
One of the major reasons for that paradoxically are not immigrants. But a group of German extremist salafists, who were founded and consist mainly of German converts to Islam. So it’s not the immigrants, but the Germans themselves. Their leader is Pierre Vogelwikipedia.org. A German national, who says he is against Germany. Many other European countries have put him on a travel ban as a danger. But since he is German, the Germans have to keep him…

Herbert W. Armstrong was among the select few who escaped this deception. As early as spring 1945, he began warning that although Nazism had been disfigured and dismembered, its heart was still beating—slowly, quietly, undetected—in dark crevices across the planet.

क्‍या आपको धर्मान्‍तरित पियरे के कथन कि वह जर्मनी विराेधी है और जेएनयू में ऐसे ही एक तत्‍व द्वारा भारत की बर्वादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी में कोई समानता दिखाई देती है ? ऐसे ही जुमले, जिनका समर्थन तुम भी करते हो और जो जेएनयू की परिभाषा में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता है, हिटलर बनने का रास्‍ता तैयार करते हैं । यह अपने को सेक्‍युलर कहने वालों की जिम्‍मेदारी है कि वे ऐसी परिस्थितियां न पैदा होने दें जो खाक से भी हिटलर गढ़ कर तैयार कर देती हैं। मोदी लोकतन्‍त्रवादी है और उसे यह बोध है कि उसे अपनी ऊंचाई तक लोकतन्‍त्र ने पहुंचाया है और इन्दिरा जी की तानाशाही ने उनको उस अधोगति में पहुंचाया था और उसी ने मोदी को अपना कद हासिल करने का अवसर दिया था।
वह सच्‍चे मन से सबका साथ सबका विकास का आदर्श ले कर चला था। सभी पड़ोसी देशों और विशेषत: पाकिस्‍तान के दरवाजे तक जा कर दस्‍तक देने से परहेज नहीं किया। उसके आलोचक उस नरमी का मजाक उड़ाते रहे। मोदी का प्रयास विफल हुआ, अपितु नरमी का उत्‍तर उद्दंडता से दिया जाता रहा जिसके परिणाम हमारे सामने हैं।

ठीक यही वाक्‍य घरेलू स्‍तर पर भी है, परन्‍तु सेक्‍युलरिस्ट समझदारी के तहत बिलगाव और छिटकाव, बिखराव और उत्‍तेजना की अनर्गल गतिविधियां जारी हैं और इन्‍होंने मुस्लिम समुदाय को इस अवसर का महत्‍व समझने में बाधा डाली है। आज तक मुझे ऐसा कोई मुस्लिम मित्र या तथाकथित सेक्‍युलरिस्‍ट नहीं मिला जो मोदी का आंख मूंद कर विरोध नहीं करता। जो लोग चाहते हैं, और यह देख रहे हैं कि उनके विचारों, फिकरेबाजियों, कारगुजारियों के कारण जनता में उनका भाव गिरता चला गया है और मोदी की लोकप्रियता उसकी कार्यनिष्‍ठा, सत्‍यनिष्‍ठा और लोकनिष्‍ठा के कारण बढ़ती चली गई है, यह उनकी जिम्‍मेदारी है कि वे अात्‍मनिरीक्षण करें और गुणदोषपरक आलोचना करें। मोदी को आलोचकों की जरूरत है, परन्‍तु निन्‍दापाठ की नहीं। हिटलर की वापसी हिटलर की इच्‍छा पर नहीं, उन परिस्थितियों के दबाव पर निर्भर करती है जिसमें किसी को हिटलर बनने को बाध्‍य किया जा सकता है।

परन्‍तु हिटलर, फासिज्‍म, तानाशाही आदि की अास जो लोग इस बिना पर बनाए हुए हैं कि उसके अंत के साथ उस पूरी सोच का अन्‍त हो जाता है इसलिए स्‍वयं अपनी ओर से प्रयास कर रहे हैं कि मोदी की लोकप्रियता नाजिज्‍म का रूप ले और उससे उसका खात्‍मा और उनका अपना भाग्‍योदय हो, वे अनर्थ कर रहे हैं, और अपने प्रयास में व्‍यर्थ भी होंगे, क्‍योंकि उनका पाला एक ऐसे व्‍यक्ति से पड़ा है जो उनके सभी आकलनों को गलत हो जाने देता है, गलत सिद्ध करने का प्रयत्‍न तक नहीं करता ।

Post – 2016-11-21

हिटलर की वापसी (1)

”तुम्‍हारी सारी बातें सही हैं । इस आदमी की बढ़ती लाे‍कप्रियता डरावनी है। कतारों में लगे जिन लोगों का दुख दिखा कर हम मोदी को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं, वे हमारे क्‍या, सीजेअाई के भड़काने पर भी सीजेआई की ओर कुछ इस नजर से देखते हैं कि ‘सर आप भी वही निकले !’ और उत्‍तेजित होने की जगह मुस्‍कराने लगते हैं । न्‍याय क्‍यों इतना मंहगा हो गया है कि गरीब आदमी को मिल ही नहीं सकता, यह अब तक राज़ था, अब फाश कर दिया आपने।’

मैं हैरान ! इसमें इतनी जल्‍द इतना हृदय परिवर्तन कैसे घटित हो गया । तभी उसने अपना तेवर बदला, ”पर यह तो मानोगे कि यह देश के हित में नहीं है।”

कुछ देर तक मैं कुछ समझ नहीं पाया, सहमते हुए कहा, ”हां, सीजेआई काे राजनीतिक बयान देने से पहले सोचना चाहिए था कि इसका लोग क्‍या आशय निकालेंगे और…”

उसने बीच ही में टोक दिया, ”मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूं । उस लोकप्रियता की बात कर रहा हूं जो मोदी को मिल रही है। यह ठीक उसी पैटर्न पर है जिससे हिटलर को लोकप्रियता मिली थी। हम पहले कहते थे कि फासिज्‍म आ रहा है, भाजपा का राष्‍ट्रवाद जर्मनों के राष्‍ट्रवाद की ही नकल है तब तुम्‍हारी समझ में नहीं आ रहा था। अब वह सामने खड़ा है और एक बार आ गया तो …।” उसने अपना वाक्‍य अधूरा छोड़ दिया, फिर कुछ सूझा तो मैं कुछ कहूं इससे पहले ही बोल पड़ा, ”तुमने तो सारे बुद्धिजीवियों को पता नहीं किसके साथ खड़ा कर दिया, वे उस खतरे को बहुत पहले से देख रहे हैं और इसलिए विरोध करते आ रहे हैं। सिर्फ तुम इतने मूर्ख हो जो इस बात को आज तक समझ नहीं पाए ।”

मैंने चुटकी ली, ”तुम लोग इतना बोलते हो फिर भी बाेलना क्‍यों नहीं आता । तुम लोगों को डराने के लिए कहते हो, भाजपा का राष्‍ट्रवाद जर्मनों के राष्‍ट्रवाद की ही नकल है।’ लोग सोचते हैं जब नकल है तो उससे क्‍या डरना। असल होता तो फिक्र की बात भी थी। असल सिद्ध करने के लिए तुम्‍हें उन कार्यों और परिणामों का विवेचन करते हुए उसे देश और समाज के लिए खतरनाक सिद्ध कर देने से ही काम चल जाता। जर्मनों और उनके राष्‍ट्रवाद का नाम लेने की जरूरत न पड़ती। नब्‍बे प्रतिशत लोग तो मात्र साक्षर या निरक्षर हैं, उनको जब यह सुनने को मिलता है कि यह खरोखर इंपोर्टेड चीज है तो उनकी नजर में उसके प्रति आकर्षण बढ़ जाता है। तुम देश और समाज को जानने के औजारों तक से दूर रहे, इसलिए यह भी नहीं समझ पाते कि तुम्‍हारे किए के परिणाम उल्‍टे जा रहे हैं।”

”मैं कहूं कि तुमने कमाल का तर्क दिया तो खुश हो जाओगे ? पर तुम नहीं मानते कि लोकतन्‍त्र का खत्‍म हो जाना, किसी एक व्‍यक्ति का अपने दल से, दूसरे सभी दलों से, इतना बड़ा हो जाना कि विकल्‍प की संभावना ही न रह जाय, चिन्‍ता की बात नहीं ?”

बात चिन्‍ता की तो थी । किसी एक व्‍यक्ति की ऐसी लोकप्रियता कि विकल्‍प समाप्‍त होते चले जाएं, चिन्‍ता की बात तो थी ही। परन्‍तु जितनी चिन्‍ता जताई जा रही थी उतनी चिन्‍ता की नहीं। सच कहें तो विकल्‍पों को समाप्‍त कर देने का प्रयोग तो कांग्रेस ने नेहरू काल से ही आरंभ कर दिया था। केवल केन्‍द्र में ही नहीं, राज्‍यों तक में कांग्रेस छोड़ अन्‍य किसी का शासन रहने ही न पाए। और कांग्रेस का मतलब नेहरू के शासन काल में नेहरू था और इन्दिरा जी और उनके वंश के शासन में इन्दिरा जी और उनका वंश । इसके लिए गर्हित से गर्हित तरीका, अमानवीय से अमानवीय तरीका अपनाने में उन्‍हें संकोच न था। गुलजारी लाल नन्‍दा को जल्‍द से जल्‍द ठिकाने लगाने के लिए गोरक्षा आन्‍दोलन की भीड़ का सीधे गोलियों से भूनते हुए उन्‍हें अक्षम सिद्ध करके सत्‍ता हाथ में लेने की जल्‍दी हो, या बंगाल की 1967 में अजय बाबू की गैर कांग्रेस सरकार को गिराने के लिए बीएसएफ की टुकड़ी लगाकर बालीगंज का नृशंस कांड जो उस उत्‍सव में ऐसी हुड़दंग कि न जाने कितने लोग मारे गए, महिलाओं का बलात्‍कार हुआ, और इस आधार पर सरकार गिराकर नये चुनाव की तैयारी। परिणाम उल्‍टे हुए, पहली बार ज्‍योति बाबू के नेतृत्‍व में पूर्ण बहुमत से ऐसी सीपीएम सरकार बनी जो ज्‍योतिबाबू के हटने के बाद तक चलती रही । मैं उन सभी बदकारियों और उनसे पैदा हुई विकृतियों को यहां दुहराना नहीं चाहूंगा, तुम उन्‍हें स्‍वयं याद कर सकते हो। न ही मैं यह तर्क दूंगा कि कांग्रेस ने लगातार यही किया, फिर भी कभी तुमने उसकी ऐसी आलोचना नहीं की कि वह अभियान का रूप ले सके।

”मैं तुम्‍हें अपने एक शेर की याद दिलाना चाहूंगा जो मैंने बेहिश नामक एक पात्र के लिए लिखा था :

तेरी आंखों में ही कुछ बल है आ गया बेहिश ।
आईने टूटते जाते हैं जिधर देखता है ।

मोदी के साथ स्थिति बिल्‍कुल उलट है । वैकल्पिक दल भीतर से इतने सड़ चुके हैं कि इस व्‍यक्ति को किसी को गिराने का खयाल तक नहीं आया। वे पार्टियां गिर नहीं रही है, सड़ाध से धसक रही है और धसक इसलिए रही हैं कि जब लोग, जितने भी लोग, मोदी को सन्‍दर्भबिन्‍दु मान कर दूसरों का आकलन करते हैं तो वे नि:सत्‍व ही नहीं हीनचेत भी प्रतीत होते हैं। समर्थन का सहज प्रवाह भाजपा की ओर होने लगता है। यही निर्णायक बिन्‍दु पर पहुंच कर पूर्ण बहुमत में बदल जाता है। इसमें जीत हार का प्रश्‍न ही नहीं है, प्रश्‍न समर्थन के प्रवाह की दिशा का है, परिणाम आज नहीं तो कल सही। इसीलिए बिहार चुनाव के बाद मैंने कहा था, नैतिक विजय भाजपा की हुई है जिसने हारने का रास्‍ता चुना पर गलत प्रलोभन या सिद्धान्‍तहीन जोड़-तोड़ का सहारा नहीं लिया। हार नीतीश की हुई क्‍योंकि उन्‍हें नाक रगड़ने वाले गलत समझौते करने पड़े फिर भी र्वाधिक वोट न मिले और विजय लालू की हुई जो वास्‍तविक शासक बने रहेंगे और उस व्‍यक्ति को अपने गलत निर्णयों को लागू करने काे बाध्‍य करते रहेंगे जो अपने को लोकतांत्रिक आदर्शों का मूर्त रूप मानता था।

”अब इसमें देखो, नीतीश के पास विकल्‍प था कि सबका साथ सबका विकास के नारे को सम्‍मान देते हुए उस भाजपा से सहयोग लेते जिसके समर्थन से उन्‍होंने
स्‍वच्‍छ शासन का इतिहास रचा था। नहीं, किया। एक व्‍यक्ति के रूप में एक समय जहां उन्‍हें भले मोदी के नीचे, पर लोकप्रियता और पात्रता में कुछ आसपास ही माना जाता था, वह केवल अपने निर्णयों और कार्यों से कितने नीचे चले गए हैं। मोदी को इस विकल्‍प को मिटाने के लिए कुछ नहीं करना पड़ा।

”हिटलर की वापसी पर तो आज बात हो नहीं सकती। कल करेंगे, परन्‍तु तुम इस बीच इस प्रश्‍न पर विचार करना कि एक ऐसे नेतृत्‍व के सत्‍ता पर कब्‍जा जमाने के बाद, जिसे तुम अपनी समझ से शुभ नहीं मानते रहे, अपने कार्यों, उक्तियों, हंगामों से ठीक वही काम नहीं करते रहे जिसके प्रमाण हमने कांग्रेस शासन से दिए और जिनके परिणाम कांग्रेस के लिए और उससे अधिक पूरे देश्‍ा के लिए घातक रहे। लोकतान्त्रिक निर्णय प्रक्रिया को हुड़दंग से उलट कर तुम किसका भला करते रहे। हिटलर की वापसी का रास्‍ता तैयार करते रहे या लोकतान्त्रिक विकल्‍पों की रक्षा का प्रयत्‍न।”

Post – 2016-11-20

नोट की चोट (असंपादित)

‘यार सुना पुराने नोट बन्‍द होने से तुम्‍हें इतना सदमा पहुंचा कि तुम बीमार पड़ गए और अस्‍पताल में भर्ती होना पड़ा ।’
‘पता तो चला कि तुम कल्‍पनाशील भी हो। पर यह तो बताओ तुम किसके साथ हो, जमाखोरों, कालाबाजारियों के या इसे खत्‍म करने वालों के । कोई भी बात, कोई भी तर्क, कोई भी आंकड़ेबाजी, यह फैसला हो जाने के बाद ही सार्थकता रखती है ।

वह हंसने लगा, ‘जानता था, तुमको वह तकलीफ दिखाई नहीं देगी जो दिन के दिन खड़े लोग लाइन में लगा रहे हैं। पचास लोग प्राण गंवा चुके हैं। समाचार चैनल उनकी पीड़ा की कहानियां दिखा रहे हैं। तुम्‍हें कुछ नहीं दीखता क्‍योंकि तुमने आंखों के ठीक आगे मोदी का चेहरा लगा रखा है।

‘तुमसे कुछ पूछा है । उसका सीधा, सटीक जवाब दो । किसके साथ हो ?’

‘प्रश्‍न साथ होने का नहीं है, उसकी सही तैयारी और सही तरीके का है । यदि कुछ और समय लगाया गया होता तो…’

‘युद्ध छिड़ने के बाद तैयारी वगैरह विचार-बाह्य हो जाते हैं। अब जो भी है, जैसा भी है, उसी से संघर्ष किया जाता है। तुमको चीन-भारत युद्ध का पता है ? हमारे सैनिकों के पास पहाड़ी सर्दी के बचाव के लिए कपड़े तक नहीं थे, बरफ पर चलने के लिए जूते तक नहीं थे। हरबा-हथियार पुराने थे। नेहरू और तत्‍कालीन रक्षामंत्री सैन्‍य आयुधागार में सोलर कुकर बनवा रहे थे । खुफिया तन्‍त्र इतना निकम्‍मा कि भारत के प्रधानमंत्री को भी चीनी अफीमची बुजदिल दिखाई दे रहे थे। सीमा रेखा पर जैसा आज भी होता है बीच बीच में चीनी दस्‍ते भीतर घुस आते हैं और उन पर दबाव डाल कर पीछे हटने पर विवश किया जाता है, ऐसा ही तब भी था। यह रगड़ा नेहरू की अदूरदर्शिता का परिणाम था। तिब्‍बत के बफर राज्‍य की रक्षा की जिम्‍मेदारी भारत की थी और तिब्‍बत पर चीनी आक्रमण के समय ही भारत को तिब्‍बत का साथ देते हुए वह जंग लड़ना जरूरी था, वह खतरा लेने का साहस नेहरू का नहीं हुआ। उल्‍टे दलाई लांबा को सलाह दी कि जितना सोना हीरा हो लाद कर आक्रमण से पहले ही भारत भाग आओ और यहां से अपने का तिब्‍बत का प्रधान बन कर कूटनीति करो। भारत में चीन की संवेदनशीलता के विरुद्ध भारतीय भूभाग में तिब्‍बत का निर्वासित प्रधान अपनी गतिविधि चला रहा था, यह चीन की खुन्‍दक थी। सीमारेखा के अति‍क्रमण का मामला इस कारण भी कूटनीतिक स्‍तर पर न चल कर सैन्‍य टुकडि़यों के भारत की सीमा में प्रवेश के रूप में सामने आता था। ऐसे ही एक कुयोग के उत्‍तर में नेहरू को जब सूचना मिली कि चीनी दस्‍तों ने भारतीय सीमा में प्रवेश कर लिया है, तो युद्ध का आरंभ नेहरू ने यह कहते हुए किया था कि मार कर भगा दो। भारत के जनरलों का हाल यह कि वे अग्रिम मोर्चे पर जा ही नहीं सकते थे क्‍योंकि उनको यूरोपियन कमोड की आदत पड़ चुकी थी। बी के कौल को नेहरू से पारिवारिक निकटता के कारण पूर्वी कमांड के जनरल का पद नियम का उल्‍लंघन करते हुए मिला था। वह मोर्चे के लिए तैयार नहीं थे और जान बचा कर भाग आए थे। इस पूरी परिघटना की प्रत्‍येक कड़ी त्रासद है, परन्‍तु एक बार युद्ध छिड़ जाने के बाद पूरे राष्‍ट्र ने, विरोधी दलों तक ने युद्धपर्यन्‍त एकजुट हो कर सरकार का समर्थन किया। हारना तो था ही, पर हारने के बाद नेहरू ने अपनी राष्‍ट्रनिष्‍ठा का जो नमूना पेश किया वह था उन पहाडि़यों के हाथ से चले जाने का क्‍या मलाल जिन पर धास की एक पत्‍ती तक नहीं उगती। यह सब मैं याद के बल पर ही कह रहा हूं, सूचनाएं तो इंटरनेट पर भी मिल सकती हैं।
तुम्‍हें पता है कितने हजार सैनिक सर्द रातों में उचित वस्‍त्र के अभाव में मारे गए थे, लश्‍कर का लश्‍कर साफ हो गया था। युद्ध जिन भी स्थितियों में एक बार छिड़ जाने के बाद पुनर्विचार करने वाले शत्रु को मदद पहुंचाते हैं।”

‘अजीब कूड़मग्‍ज हो यार, अरे वह दूसरे देश के साथ युद्ध था, पूरे देश को एकजुट होना ही था।’

‘यह देश के उन दुश्‍मनों के विरुद्ध युद्ध है जिनके कारण इस देश में निकम्‍मापन नीचे से ऊपर तक फैल चुका है। कुछ पाए बिना कोई कुछ काम नहीं करता। वह काम करता नहीं है, आपको यदि काम करवाना हो तो करवा लीजिए।

यह उन दुश्‍मनों के विरुद्ध संग्राम है जो अधिक से अधिक कमाने के लिए मिलावट करते हैं। उनके खिलाफ जो गुंडों का एक समानान्‍तर प्रशासन चला रहे हैं और हत्‍यायें, लूट और फिरौती जैसी व्‍याधिया देश व्‍यापी होती जा रही हैं। यह उनके खिलाफ युद्ध है जिनके कारण धनी अधिक धनी और गरीब अधिक गरीब होते चले गए हैं।

यह युद्ध उस कर्मनाशा के विरुद्ध है जिसमें आज भी जनकल्‍याण की निधि बिचौलियों द्वारा हज्‍म कर ली जाती है।

यह उस न्‍याय प्रबन्‍धन के विरुद्ध है जिसमें न्‍याय बिकता रहा है और और अन्‍यायी छूटते रहे हैं। उस माफियातन्‍त्र, आतंकवाद, नक्‍सलवाद के विरुद्ध है। अपहरण और भयदोहन के विरुद्ध है। यह भ्रष्‍ट राजनीति के विरुद्ध है, रुग्‍णतन्‍त्र के विरुद्ध है, असुरक्षा के विरुद्ध है। उस दिशाहारा स्थिति के विरुद्ध है जिसमें हजारों किसान कर्जमाफिया के शिकार हो कर आत्‍महत्‍या करने को विवश होते थे।

यह सूचना और मतामत का वातावरण तैयार करने के पक्ष में जिसमें पैसे के लोभ में फर्जी विचारों और विकलांग सूचनाओं का कारोबार करने वाले मालामाल हो रहे थे और इसलिए इसे लांछित करने के लिए उन्‍होंने अपनी पूरी प्रचार शक्ति लगा दी है।

और एक लेखक के रूप में मेरे उन प्रकाशकों के भी विरुद्ध है जो बिक्री का सही हिसाब नहीं देते और लेखकों की रायल्‍टी के पैसे से बेनामी संपत्तियां खरीदते हैं।
बेनामी संपत्तियों की बारी आने दो, फर्क दिखाई देगा।

इसलिए तुम्‍हें तय करना है कि तुम किसके साथ हो। अब किसी को चोर कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इस मुश्किल सवाल का जवाब वह स्‍वयं अपनी पक्षधरता से देगा। हमें केवल उसकी पहचान करनी है।

आज की बौखलाहट मोदी की विफलता के कारण नहीं है, अपितु इस आशंका के कारण है कि इस व्‍यक्ति की लोकप्रियता रोड रोलर की तरह दूसरी सभी भ्रष्‍ट पार्टियों का सफाया न कर दे । इस भय की उपज कि यदि ऐसा हुआ तो पता नहीं क्‍या देखना पड़े।

वह चुपचाप सुनता रहा, उठते हुए बोला, इसका जवाब तुम्‍हें कल मिलेगा।

Post – 2016-11-20

‘यार सुना पुराने नोट बन्‍द होने से तुम्‍हें इतना सदमा पहुंचा कि तुम बीमार पड़ गए और अस्‍पताल में भर्ती होना पड़ा ।’
‘पता तो चला कि तुम कल्‍पनाशील भी हो। पर यह तो बताओ तुम किसके साथ हो, जमाखोरों, कालाबाजारियों के या इसे खत्‍म करने वालों के । कोई भी बात, कोई भी तर्क, कोई भी आंकड़ेबाजी, यह फैसला हो जाने के बाद ही सार्थकता रखती है ।

वह हंसने लगा, ‘जानता था, तुमको वह तकलीफ दिखाई नहीं देगी जो दिन के दिन खड़े लोग लाइन में लगा रहे हैं। पचास लोग प्राण गंवा चुके हैं। समाचार चैनल उनकी पीड़ा की कहानियां दिखा रहे हैं। तुम्‍हें कुछ नहीं दीखता क्‍योंकि तुमने आंखों के ठीक आगे मोदी का चेहरा लगा रखा है।

‘तुमसे कुछ पूछा है । उसका सीधा, सटीक जवाब दो । किसके साथ हो ?’

‘प्रश्‍न साथ होने का नहीं है, उसकी सही तैयारी और सही तरीके का है । यदि कुछ और समय लगाया गया होता तो…’

‘युद्ध छिड़ने के बाद तैयारी वगैरह विचार-बाह्य हो जाते हैं। अब जो भी है, जैसा भी है, उसी से संघर्ष किया जाता है। तुमको चीन-भारत युद्ध का पता है ? हमारे सैनिकों के पास पहाड़ी सर्दी के बचाव के लिए कपड़े तक नहीं थे, बरफ पर चलने के लिए जूते तक नहीं थे। हरबा-हथियार पुराने थे। नेहरू और तत्‍कालीन रक्षामंत्री सैन्‍य आयुधागार में सोलर कुकर बनवा रहे थे । खुफिया तन्‍त्र इतना निकम्‍मा कि भारत के प्रधानमंत्री को भी चीनी अफीमची बुजदिल दिखाई दे रहे थे। सीमा रेखा पर जैसा आज भी होता है बीच बीच में चीनी दस्‍ते भीतर घुस आते हैं और उन पर दबाव डाल कर पीछे हटने पर विवश किया जाता है, ऐसा ही तब भी था। यह रगड़ा नेहरू की अदूरदर्शिता का परिणाम था। तिब्‍बत के बफर राज्‍य की रक्षा की जिम्‍मेदारी भारत की थी और तिब्‍बत पर चीनी आक्रमण के समय ही भारत को तिब्‍बत का साथ देते हुए वह जंग लड़ना जरूरी था, वह खतरा लेने का साहस नेहरू का नहीं हुआ। उल्‍टे दलाई लांबा को सलाह दी कि जितना सोना हीरा हो लाद कर आक्रमण से पहले ही भारत भाग आओ और यहां से अपने का तिब्‍बत का प्रधान बन कर कूटनीति करो। भारत में चीन की संवेदनशीलता के विरुद्ध भारतीय भूभाग में तिब्‍बत का निर्वासित प्रधान अपनी गतिविधि चला रहा था, यह चीन की खुन्‍दक थी। सीमारेखा के अति‍क्रमण का मामला इस कारण भी कूटनीतिक स्‍तर पर न चल कर सैन्‍य टुकडि़यों के भारत की सीमा में प्रवेश के रूप में सामने आता था। ऐसे ही एक कुयोग के उत्‍तर में नेहरू को जब सूचना मिली कि चीनी दस्‍तों ने भारतीय सीमा में प्रवेश कर लिया है, तो युद्ध का आरंभ नेहरू ने यह कहते हुए किया था कि मार कर भगा दो। भारत के जनरलों का हाल यह कि वे अग्रिम मोर्चे पर जा ही नहीं सकते थे क्‍योंकि उनको यूरोपियन कमोड की आदत पड़ चुकी थी। बी के कौल को नेहरू से पारिवारिक निकटता के कारण पूर्वी कमांड के जनरल का पद नियम का उल्‍लंघन करते हुए मिला था। वह मोर्चे के लिए तैयार नहीं थे और जान बचा कर भाग आए थे। इस पूरी परिघटना की प्रत्‍येक कड़ी त्रासद है, परन्‍तु एक बार युद्ध छिड़ जाने के बाद पूरे राष्‍ट्र ने, विरोधी दलों तक ने युद्धपर्यन्‍त एकजुट हो कर सरकार का समर्थन किया। हारना तो था ही, पर हारने के बाद नेहरू ने अपनी राष्‍ट्रनिष्‍ठा का जो नमूना पेश किया वह था उन पहाडि़यों के हाथ से चले जाने का क्‍या मलाल जिन पर धास की एक पत्‍ती तक नहीं उगती। यह सब मैं याद के बल पर ही कह रहा हूं, सूचनाएं तो इंटरनेट पर भी मिल सकती हैं। तुम्‍हें पता है कितने हजार सैनिक सर्द रातों में उचित वस्‍त्र के अभाव में मारे गए थे, लश्‍कर का लश्‍कर साफ हो गया था। युद्ध जिन भी स्थितियों में एक बार छिड़ जाने के बाद पुनर्विचार करने वाले शत्रु को मदद पहुंचाते हैं।”

‘अजीब कूड़मग्‍ज हो यार, अरे वह दूसरे देश के साथ युद्ध था, पूरे देश को एकजुट होना ही था।’

‘यह देश के उन दुश्‍मनों के विरुद्ध युद्ध है जिनके कारण इस देश में निकम्‍मापन नीचे से ऊपर तक फैल चुका है। कुछ पाए बिना कोई कुछ काम नहीं करता। वह काम करता नहीं है, आपको यदि काम करवाना हो तो करवा लीजिए।

यह उन दुश्‍मनों के विरुद्ध संग्राम है जो अधिक से अधिक कमाने के लिए मिलावट करते हैं। उनके खिलाफ जो गुंडों का एक समानान्‍तर प्रशासन चला रहे हैं और हत्‍यायें, लूट और फिरौती जैसी व्‍याधिया देश व्‍यापी होती जा रही हैं। यह उनके खिलाफ युद्ध है जिनके कारण धनी अधिक धनी और गरीब अधिक गरीब होते चले गए हैं।

यह युद्ध उस कर्मनाशा के विरुद्ध है जिसमें आज भी जनकल्‍याण की निधि बिचौलियों द्वारा हज्‍म कर ली जाती है।

यह उस न्‍याय प्रबन्‍धन के विरुद्ध है जिसमें न्‍याय बिकता रहा है और और अन्‍यायी छूटते रहे हैं। उस माफियातन्‍त्र, आतंकवाद, नक्‍सलवाद के विरुद्ध है। अपहरण और भयदोहन के विरुद्ध है। यह भ्रष्‍ट राजनीति के विरुद्ध है, रुग्‍णतन्‍त्र के विरुद्ध है, असुरक्षा के विरुद्ध है। उस दिशाहारा स्थिति के विरुद्ध है जिसमें हजारों किसान कर्जमाफिया के शिकार हो कर आत्‍महत्‍या करने को विवश होते थे।

यह सूचना और मतामत का वातावरण तैयार करने के पक्ष में जिसमें पैसे के लोभ में फर्जी विचारों और विकलांग सूचनाओं का कारोबार करने वाले मालामाल हो रहे थे और इसलिए इसे लांछित करने के लिए उन्‍होंने अपनी पूरी प्रचार शक्ति लगा दी है।

और एक लेखक के रूप में मेरे उन प्रकाशकों के भी विरुद्ध है जो बिक्री का सही हिसाब नहीं देते और लेखकों की रायल्‍टी के पैसे से बेनामी संपत्तियां खरीदते हैं।
बेनामी संपत्तियों की बारी आने दो, फर्क दिखाई देगा।

इसलिए तुम्‍हें तय करना है कि तुम किसके साथ हो। अब किसी को चोर कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी, इस मुश्किल सवाल का जवाब वह स्‍वयं अपनी पक्षधरता से देगा।