जिसे हम इश्क कहते हैं पुराना रोग है शायद
जिसे हम हुस्न कहते हैं वो पहचाना नहीं जाता।
यह दुनिया जो बनाई हमने दोजख से ही बेहतर है
यह सच है, पर इसे भी देख लो माना नहीं जाता।
मुसीबत है कि अब भी हम तुम्हीं को प्यार करते है
गनीमत है तुम्हारा बाप अब थाना नहीं जाता।
यह अपनी जिंदगी होती, महज अपनी, तो मर जाते
यह मुश्तर्का है कितनों की, यही जाना नहीं जाता।
मुझे भगवान कह कर, कर दिया बदनाम लोगों ने
वगर्ना भीड़ में मुझको भी पहचाना नहीं जाता ।
Post – 2018-11-14
मैने यह लिंक मीटू के हंगामे के समय जो सन्देह प्रकट किया था उसकी पुष्टि के लिए साझा किया है। मैंने पदीय अधिकार का दुरुपयोग करते हुए महिलाओं का शीलभंग करने वालों की भर्त्सना के बावजूद यह आशंका दुहराई थी कि यह केरल की ननों के साथ पालरियों के घृणित व्यवहार और हत्या से ध्यान हटाने के लिए चलाया गया है और इसमें आपका इस्तेमाल किया जा रहा है। इन अन्यायों के प्रति सर्वाच्च न्यायालय के ईसाई न्यायाधीश तक नरम हैं और ठीक इस समय अपना दुखड़ा गा कर उन हत्यारों के साथ खड़े हो रहे हैं। आंदोलनबाजों के पास अक्ल नहीं होती।
Post – 2018-11-13
तुम मेटना चाहो तो मिटे से पड़े हैं लो
यह सोच जानकर ही थे निकले इधर को हम।
Post – 2018-11-13
बाजार खुला है खुले हैं रास्ते हजार
पर यह पता नहीं है कि जाएं किधर को हम।।
Post – 2018-11-13
इतना खुला दिमाग कि दुनिया भी कम पड़ी
रहजन से पूछते हैं पता अपने घर का हम।।
Post – 2018-11-12
#भारतीय_मुसलमान: न वे सुनेंगे न समझेंगे गुफ्तगू मेरी
हम अपनों के बीच नहीं रहते। जिस दुनिया में हम रहते हैं उसमें तरह-तरह के लोग रहते हैं जिनमें से कुछ ही लोग अपने संपर्क में होते हैं। संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के बीच कुछ लोग हमारे परिचित होते हैं। उन परचितों में कुछ लोगों को हम अपना या भरोसे का समझते हैं। भरोसे के लोगों में कुछ हमारे मित्र या प्रायः मिलने-जुलने वाले होते हैं। इन मित्रों के बीच सभी से हम अपने मन की बात खुलकर नहीं करते, ऐसे कुछ लोग ही होते हैं जिनसे अपना दुख-सुख बाँटा जा सकता है, जिन्हें हम अंतरंग मित्र कह सकते हैं। ये भी समय के साथ किसी मोह-भंग के शिकार हो सकते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जिनके परिचितों का दायरा बहुत बड़ा हो, पर एक भी अंतरंग मित्र न हो, क्योंकि वे अपने सुख में भले सभी को साझेदार बना लें, अपने दुख को किसी के साथ नहीं बांटते, भले दूसरों के दुख में सहायता के लिए तैयार हो जाते हों। दुख के गरल को अकेले पी जाने वाले ये लोग सहिष्णु होने के साथ ही, ऊपर से नम्र दीखते हुए भी, भीतर से अहंकारी और इस अहंकार के अनुरूप ही अपनों की भीड़ में निपट अकेले होते हैं।
जो हमारे परिचय परिधि में नहीं होते हैं, प्रायः संज्ञान परिधि से बाहर होते हैं, होते हुए भी हमारे लिए वे नहीं होते। इस तरह विराट मानव जगत में हम सभी बहुत छोटे से संसार में रहते हैं, परंतु जीवन में ऐसे निर्णायक क्षण आते हैं जब हम बहुत बड़े समुदाय से, पूरी मानवता से, यहां तक कि मानवेतर प्राणियों और जीवेतर सत्ताओं और परिघटनाओं से भी जुड़ जाते हैं अथवा उनके प्रभाव- में आ जाते हैं। इनके दायरे कभी कतिपय संस्थाओं – परिवार, परिवेश, समाज, शिक्षा-केन्द्र, कार्यक्षेत्र या पेशा, धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय, संगठन और समान भौतिक या नैतिक सरोकार – से जुड़े होते हैं। इनके आंतरिक तनाव भी हो सकते जिनके समाहार के प्रयत्न हमेशा आसान नहीं होते क्योंकि इनके अपने चरित्र, अनुभव या इतिहास होते हैं जो समस्या को हल करने मे ही नहीं, समझने तक में बाधक होते हैं।
इस तरह सतह पर आसान दीखता हुआ भी सामाजिक संबंध जटिलताओं और समस्याओं से भरे होते हैं।
हम इस चर्चा में भारतीय मुसलमानों को समझने का प्रयत्न करते रहे हैं। इसका कारण यह रहा है कि लगभग नव सौ साल से एक ही परिवेश में रहते हुए भी दुराव के सचेत प्रयत्नों के कारण हम मुस्लिम समाज की सामुदायिक चेतना से पूरी तरह अनभिज्ञ रहे हैं। जिस समुदाय के साथ रहना अपरिहार्य हो उसके विषय में नासमझी आत्मघाती है।
इसके साथ हिन्दू समाज की अपनी सामूहिक चेतना का प्रश्न भी आता है, जिसे उन्हीं संदर्भों में तुलना के लिए रखे बिना हम पूरा न्याय नहीं कर सकते। पर इससे बचने के दो कारण थे। एक तो तुलना के साथ आंतरिक बुनावट को समझा ही नहीं जा सकता था, जो हर मामले मे इतर से समानांतर नहीं होती, अपितु विशिष्ट होती है। उस प्रयत्न से विवेचन में सतहीपन अवश्य आ जाता। दूसरे भारतीय नृतात्विक अध्ययनों में लगातार हिंदू समाज की बनावट और आंतरिक विसंगतियों और टकराव के रूपों का अध्ययन इतनी निर्ममता से किया जाता रहा है कि इसकी आड़ में टकराव के नए मुद्दे तक ईजाद किए जाते रहे हैं।
हिंदू समाज में न जाने कब से आत्मज्ञान पर बल – आत्मानं विद्धि – दिए जाने के कारण आत्मालोचन की एक स्वस्थ परंपरा रही है। इसमें निजी और सामूहिक सीमाओं पर खुल कर चर्चा होती रही है, इसके बावजूद सांस्कृतिक उजड्डपन के शिकार अधपढ़ लोग भी इससे ही आत्मालोचन की मांग करते थकते नहीं रहे हैं और वह इसका बुरा मानने के लिए इसके लिए अपराधी भाव से तैयार हो जाता रहा है।
इसके बाद भी समाज की आधारभूत रचना के विषय में विशेषज्ञों द्वारा भी इतनी नासमझी की व्याख्यायें की जाती रही हैं कि उनसे समस्या का समाधान निकलने के स्थान पर समस्यायें अधिक असाध्य होती जाती हैं जिनका राजनीतिक या प्रसारवादी उपयोग करके सामाजिक ताने बाने को छिन्न-भिन्न किया जाता रहा है। वह विषय बिल्कुल अलग है और उस पर हमने अलग से लिखा भी है, इसलिए उसे समानांतर उठाते रहने का औचित्य न था।
चर्चा में हमने मुस्लिम समाज का एक मोटा विभाजन स्थानीय और विदेशी अस्मिताओं के रूप में किया है, जिसमें स्थानीय कोटि में उनको रखा है जो धर्म परिवर्तन के लिए विवश हुए। इनके धर्मांतरण की प्रक्रिया को गलत ढंग से पेश किया जाता रहा है, इसके बाद भी सही रूप ठीक क्या था इसका अनुमान हम भी नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए सल्तनत काल से ही कुछ बादशाह ऐसे रहे हैं जो अकाल के समय में मुफ्त खाने का प्रबंध किया करते थे। जाहिर है उसमें ऐसा आहार भी होता था जो धार्मिक दृष्टि से वर्जित था। दुर्भिक्ष में जब विश्वामित्र और वामदेव जैसे ऋषि तक जीवन रक्षा के लिए वर्जित भोजन करने को बाध्य हो जाते हैं, तो फिर साधारण भूखे लोगों को यह अवसर जीवित रहने का एकमात्र साधन था इससे इनकार नहीं किया जा सकता। मजारों पर खैरात बांटने वालों की भूमिका भी समझी जा सकती है।मुस्लिम समाज के आर्थिक दृष्टि से सबसे विपन्न तबका धर्मांतरित हिंदुओं का ही है। यह मात्र एक उदाहरण है।
इसी तरह संपन्न ब्राह्मणों और क्षत्रियों का धर्मांतरण जिन्होंने अपनी सामाजिक हैसियत को मुसलमान होने के बाद भी बचाने की कोशिश की, दंड-स्वरूप, बल प्रयोग से हुआ था। इनका अपने ही बंधुओं से जो ऐसे दंड से बच गए थे, शादी-ब्याह में उचित परहेज के साथ खान पान चलता रहता था, परंतु यह अपने को मुस्लिम समाज के अभिजात वर्ग में गिना करते थे और गिने जाते हैं। यह ब्राहमणों की अज्ञता या जड़ता थी कि उन्होंने आपद्धर्म का विधान होते हुए भी अपने समाज को बचाने का यत्न न किया, और इन्हीं जड़चेत ब्राह्मणों की औलादें आज भी हिन्दुत्व की रक्षा का दम भरती और आत्मघाती तरीके अपनाती हैं।
कुछ पेशे ऐसे थे जो पूरे के पूरे धर्मांतरित होने को विवश हुए परंतु अपनी आध्यात्मिक भूख योग और वेदांत से मिटाते रहे। स्थानीय से लेकर देशव्यापी स्तर पर तलवार के बल पर कितनों को धर्मांतरित किया गया, इसका कोई हिसाब किसी के पास नहीं है। जो है, उसे किसी न किसी बहाने, सद्भावना की रक्षा के लिए, छिपाने की तैयारी करते हुए पेश किया जाता रहा है।
हम इन जटिलताओं का उल्लेख इसलिए कर रहे हैं कि सभी धर्मांतरित मुसलमानों का इस्लाम से लगाव एक जैसा नहीं हो सकता था। मेवाती जो कुछ समय पहले तक हिंदू और परंपराओं का निर्वाह करते थे आज योजनाबद्ध रूप में कट्टर बनाए जा चुके हैं। यही हाल दूसरे समूहों का भी है जो विभाजन से पहले और कुछ बाद तक भी नाम मात्र को मुसलमान हुआ करते थे।
जहां योजनाबद्ध रूप में अलगाव पैदा करने की प्रवृत्तियां प्रबल हों, अमेरिकी कूटनीति के तहत मुस्लिम कट्टरता को अरब देशों के माध्यम से बढ़ाते हुए मुस्लिम समुदाय को मध्यकालीन सीमाओं से बाहर निकलने न दिया जा रहा हो, इससे हिंदुओं में भी प्रतिस्पर्धी प्रवृत्तियां पैदा करके उनकी जड़ता को भी बढ़ाने का परोक्ष प्रयत्न किया जा रहा हो, सामाजिक मेलजोल की बात करना एक उपद्रवकारी कार्य माना जा सकता है। ऐसे ही में हमारे इस विवेचन का ठीक वही लाभ नहीं हो सकता जिसकी हम आशा करते हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि जिनको इससे लाभान्वित होना है वे इसे पढ़ेंगे नहीं या पढ़ा तो इसे दोष-दर्शन मानकर इस पर ध्यान नहीं देंगे। इसके विपरीत झूठे बहाने तैयार करके यथास्थिति को बनाए रखने का प्रयत्न उनके द्वारा भी हो सकता है जो प्रगतिशीलता और वैज्ञानिकता का प्रयोग तकिया कलाम की तरह करते हैं।
इसके बावजूद हमारा यह प्रयत्न इसलिए जरूरी था कि जिनके साथ हमें रहना है उनकी मनोरचना को समझना अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जरूरी है। सामाजिक आत्मीयता और पराएपन की जटिलता को इसीलिए आरंभ में रखते हुए, इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि मित्रता, आत्मीयता एक दुर्लभ स्थिति है, समाज में यह सुलभ हो यह केवल हमारे बस में नहीं होता। अनेक घटक इसका निर्धारण करते हैं। हमारे अधिकांश संबंध कार्य साधक होते हैं और अपनी सीमा में वे अधिक खरे और टिकाऊ होते हैं। रावण के पुतले मुसलमान बनाता है दशहरा हिंदुओं का होता है। दशहरा न हो तो उसकी जीविका पर असर पड़ता है। यही हाल आतिशबाजी का है।
इसलिए मित्रता नहीं, जो अक्सर खतरनाक भी हो सकती है, अपितु आपसी समझदारी जरूरी है। हम उन जीव जंतुओं तक के स्वभाव और काम को जाने बिना सुरक्षित नहीं रह सकते, जिनमें से अधिकांश को हम खतरनाक मानते आए हैं, और खतरनाक होने के बाद भी जिनके बचे रहने में हमारा अपना बचाव भी है।
जिस बात पर हमने बल दिया है वह है विदेशी मूल और विदेशी पहचान। अपनी रियासत और रईसी का अधिक ध्यान रखने वाले ही हैं जो न अपने समाज से जुड़ पाते हैं, न जमीन से जुड़ पाते हैं, न परंपरा से जुड़ पाते हैं, न संस्कृति से जुड़ पाते हैं और आज तक जमीन जायदाद के मालिक बने रहकर भी खानाबदोसों की मानसिकता से ग्रस्त हैं। इनको ही इनका इतिहास और आपनी करनी हांट करती है और इसके बाद भी उसी को दुहराने की धमकियां भी देते हैं। इस दुहराव के कारण वे भग्नमनस्कता से ग्रस्त रहे हैं और भारतीय समाज में लगातार नई नई व्याधियाँ पैदा करते, समस्याएं खड़ी करते रहे हैं। इनको उनकी भूमिका से अवगत कराना भी जरूरी है, इस प्रवृत्ति का विरोध करना भी जरूरी है, और मुस्लिम समाज में यह चेतना पैदा करना भी जरूरी है यह तुम्हारे सगे नहीं हैं और और जिन को अपना सगा मानते हैं वे इन्हें अपना सगा मानने को तैयार न होंगे। हिंदुओं के हित के लिए नहीं अपने हित के लिए , भारतीय मूल के मुसलमानों को सच का सामना करना पड़ेगा, अन्यथा संख्या बढ़ाकर भी वे बीमारों की संख्या बढ़ाएंगे और अपने समाज को ही व्याधिग्रस्त करेंगे। घर वापसी के नाम पर शुद्धि कराने वाले भी यही करेंगे। आर्यसमाजियों का शुद्धि आंदोलन और तबलीग का कठमुल्लापन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
Post – 2018-11-11
#भारतीय_मुसलमान: फैज की सांप्रदायिकता
फैज अहमद फैज (अर्थात् फै़ज़) उर्दू के प्रगतिशील कवि थे। कम्युनिस्ट थे। पाकिस्तान सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र के लिए उन्हें जेल की सजा भी हुई थी। भारत में उनके मुरीदों की संख्या पाकिस्तान से अधिक होगी और उनमें हिंदुओं की संख्या तय करना तो कठिन है, परन्तु नागरी में छपी उनकी कविताओं के पाठकों की संख्या अरबी लिपि में पढ़ने वालों की तुलना में कहीं अधिक है। प्रगतिशील होने से पहले वह मुसलमान थे। इसलिए फिलिस्तीन में मारे जा रहे मुसलमान बच्चों की मौत पर तो रोए थे परंतु पाकिस्तान में हिंदुओं की दशा पर उस तरह विगलित नहीं हुए थे जैसे तसलीमा नसरीन बांग्लादेश में उनकी दशा पर विगलित हुईं। पाकिस्तान के निवासी थे, इसलिए पाकिस्तान की ओर से कश्मीर के मोर्चे पर युद्ध में सक्रिय भाग लेने को तैयार थे। पूर्वी पाकिस्तान के अलग होने का उन्हें मलाल था और एक बार यह कोशिश भी की थी कि वह फिर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाय पर कोशिश बेकार गईः
हम केः ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद
खून के धब्बे मिटेंगे कितनी बरसातों के बाद।…
उनसे जो कहने गए थे फ़ैज़ जां सदका किए
अनकही ही रह गई वोः बात सब बातों के बाद।
इनमें कहीं कुछ भी छिपाने की नहीं और इन सबके बाद भी वह एक बड़े शायर हैं। मैं उनका सम्मान करता हूँ। भले मानवतावाद के मामले में वह तसलीमा नसरीन से छोटे पड़ें, शायर के रूप में उनका कद बहुत बड़ा है।*
यदि हिंदी हिंदू भाषा है, उर्दू सेकुलर भाषा है सब की साझी विरासत, और हिंदुस्तान हिंदुओं का देश है, तो भी उसके मकबूल शायर फैज हुआ करते थे, जिनकी उर्दू कुछ यूं हुआ करती थीः
जश्न है मातम-ए-उम्मीद का आओ लोगो
मर्ग-ए-अंबोह का त्यौहार मनाओ लोगो।
000
गुम हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई रात
धुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए-महताब से रात।
000
दिल के ऐवां में लिए गुलशुदा शम्ओं की क़तार
नूरे खुर्शीद से सहमे हुए उकताए हुए
हुस्न-ए-महबूब के सय्याल तसव्वुर की तरह
अपनी तारीकी को भींचे हुए, लिपटाए हुए
बाद में वह या तो हिंदू हो गए थे, या हिंदू संप्रदायवादियों द्वारा इस्तेमाल कर लिए गए थे क्योंकि वह लिखने लगे थेः
पंखी राजा रे पंखी राजा मीठा बोल
जोत जगी हर मन में
भँवरा गूँजा, डाली झूमे
बस्ती, वाड़ी, वन में
जोत जगी हर मन में
नदिया रानी रे
नदिया रानी मीठा बोल
घाट लगी हर नाव
रात गई सुख जागा
पायल बांधो, नाचो गाओ
घाट लगी हर नाव
नदिया रानी मीठा बोल
वह एक रोबीली और कम लोगों की बिसात वाली जबान को छोड़ कर सबकी समझ में आने वाली मीठी भाषा में लिखने लगे थे। और फिर याद आया कि वह अभी तक एक परंपरालब्ध खयाली भाषा में कविता करते रहे जो किसी क्षेत्र में न तो बोली जाती है न समझी। जिसमे न मिठास है न संचार क्षमता। मिठास तो प्रकृति और परिवेश के सान्निध्य में होता है- जैसा कि संस्कृत के कवियों ने अनुभव किया था – संस्कृत खारा कूप जल भासा बहता नीर, या भासा भणिति भूति भल सोई सुरसरि सम सब कर हित होई। वह सहज प्रवाह वाली जन भाषा की ओर मुड़े थे। और फिर यह बोध कि सरल भले हो, उन्होंने अपनी भाषा में तो लिखा ही नहीं सो जैसे हमने कहा था, वह पंजाबी की ओर मुड़े थे। यह है साधना से सिद्धावस्था की ओर की ओर उनकी काव्य यात्राः
लम्मी रात भी दर्द फिराक वाली
तेरे कौल ते असां वसाह करके
कौड़ा कुट कीती मिठड़े यार मेरे
मिठड़े यार मेरे, जानी यार मेरे
000
किधरे न पैंदियां दस्साँ
वे परदेसिया तेरियाँ
काग उड़ावा शगन मनावाँ
वगदी वा दे तरले पावाँ
तेरी याद आवे ते रोवाँ
तेरा जिक्र करें ता हस्साँ
वे परदेसिया तेरियाँ
जिस बात को समझने में विद्वानों को युग लग जाते हैं उसे आम लोग अपनी सहज बुद्धि से समझ लेते हैं। पाकिस्तान की विभिन्न भाषाओं ने, न केवल उर्दू की जगह अपनी बोलियों को अपनाया, उन्होंने नई तकनीकी जरूरतों के लिए भी उर्दू अर्थात् अरबी-फारसी के, यहां तक कि उर्दू में स्वीकृत अंग्रेजी के तकनीकी प्रयोगों को दरकिनार करते हुए अपने स्रोत से तकनीकी शब्द गढ़े। इनकी जो बानगी तीरिक़ रहमान ने दी है वह निम्न प्रकार है।
बलोची मेंः
किताब – वानगी
रेडेयो – वातगुस
दीन, मज़हब – नेहराह
खत या कागज़ – निमदी
ड्रामा – कसमंक
अदब (लिटरेचर) – लब्जंक
(वही, 282)
सिराइकी
इल्म (knowledge) – भूम
आलिम (intelectual) – भूमवाल
लिसानियात (linguistics) – बोली भूम
इन्तिखाब (election) – चुनार (चुनाव ?)
कु़तब शुमाली ( North pole) – उभीचर
क़ुतब जनूबी (South pole) – लीमूचर
रसम-उल खत (script) – लिखत रीत
टीवी – मूरत वाजा
रेडयो – सुर वाजा
ग्रामर- आखर मूल
दस्तखत – आखर हाथ
(वही, 278)
पंजाबी
लफ्ज – आखर
सैलाब – हर्ह
अकवामे मुत्तहिदा (United Nations) – इक मुठ कौमां
सालाना (yearly) – वर्हे वर
खुसूसी (special) -अच्छा
तकरीब – इकठ
भेजना – घलना
(वही, 276)
तारिक़ रहमान भी मुसलमान हैं। वह पाकिस्तान के निवासी हैं। अंतर केवल इतना है कि वह भाषाविज्ञानी हैं, भाषाविज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं और उनके काम को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। पाकिस्तान की भाषा समस्या पर उनको याद किया जाता है और उनकी पुस्तकें आक्सफर्ड यू. प्रेस से प्रकाशित हैं। राजनीति करने वालों की तरह वह भाषा समस्या को धर्म या राजनीति से घालमेल करके नहीं देखते। मेरे पास उनकी एक ही पुस्तक के नोट हैं और इसलिए मैंने उसी की सूचनाओं का उपयोग किया है। वह उर्उदू को आर्नयभाषा मानते हैं और साथ ही यह भी कि अरबी लिपि आर्यभाषा के लिए उपयुक्त नही है। ठीक इसी नतीजे पर डा. ताराचंद भी पहुंचे थे जिनको सेकुलरिस्ट सोच का दावा करने वाले भी सम्मान देते हैं। जब इस समस्या पर बहुत गर्म बहस चल रही थी उन्होंने सुझाया था (The Problem of Hindustani (1944) by Tara Chand) कि हिंदुस्तानी को अरबी-फारसी और संस्कृत प्रेमियों से बचाया जाना चाहिए और इसे नागरी लिपि में लिखा जाना चाहिए, जो इसके सर्वाधिक उपयुक्त है और इसी से इसकी उन्नति संभव है। पर यह बात आज भी बहुतों को समझाई नही जा सकती।
{nb. *यूं भी कम्युनिस्ट मानवतावादी नहीं होते। वे नरपिशाचों को लज्जित करने वाली क्रूरता कर सकते हैं। उनका मानवतावाद भविष्य में कभी साम्यवाद की स्थापना के बाद संभव हो सकता है, नरद्रोही प्रकृति से वह प्रस्फुटित हो पाएगा, इसे अभी तो देखा नहीं जा सकता। मार्क्सवादी हिंसा की अवधारणा यह है कि जब तक राज्यसंस्था है तब तक हिंसा है, इसके समाप्त होने के बाद शान्ति छा जाएगी। हमारा पौराणिक इतिहास कहता है, राज्यसंस्था की स्थापना अराजकता को, अशान्ति और कलह (मत्स्यन्याय) को दूर करने अर्थात् शांति और व्यवस्था कायम करने के लिए हुई। नृतत्वविद पिछली शताब्दी तक सभ्य जगत से कटे हुए भूभाग में अराजक कबीलों के परस्पर चलते रहने वाले संघर्षों के जो हवाले देते रहे हैं, वे भी इसकी पुष्टि करते हैं और हमारे ही देश के पूर्वोत्तर के जनों के हिंसा प्रतिहिंसा के कारण यह क्षेत्र उपद्रवग्रस्त क्षेत्र के रूप मे लगातार सेना के नियंत्रण में ही रहा है। अफ्रीकी सरदारों की निरंतर चलने वाली लड़ाइयों का लाभ उठाकर गुलामों का व्यापार किस तेजी से और कितने बड़े पैमाने पर चलता रहा हम जानते हैं। चरवाही पर पलने वाले कबीले भारत और चीन दोनों की शान्ति के लिए संकट पैदा करते रहे यह हमारे कई हजार साल का अनुभव है। इन विविध दृष्टांतोे में कुछ इकहरापन हो सकता है फिर भी इनका समग्र पाठ उस सुदूर और संदिग्ध अवस्था के प्रति आश्वस्त नहीं कर पाता। }
Post – 2018-11-10
#भारतीय_मुसलमान: वतनपरस्ती
मुझे कुछ बातों को समझने में कठिनाई हुई है। विभाजन के18साल बाद भी सियालदह स्टेशन के पास पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की आबादी बहुत दयनीय दशा में थी। विभाजन से पहले नोआखाली में भयंकर और लंबे समय तक चलने वाला सांप्रदायिक उपद्रव हुआ था। कोलकाता में सीधी कार्रवाई का प्रयोग हुआ था। पश्चिमी हिंदुस्तान में पहले वैसा कुछ नहीं हुआ था। जो भी हुआ विभाजन के अंतिम दिनों पर हुआ। परंतु बंगाल में सांप्रदायिक भावना पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों में भी न थी, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान से दिल्ली आकर रच बस चुके शरणार्थियों में यह भावना बनी हुई थी। पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं का क्या अनुभव था कि उनके मन में सामाजिक सौहार्द कम नहीं हुआ था?
जिन मुसलमानों ने नोआखाली के दंगे किए थे और जिस का व्यापक प्रभाव पड़ा था, उन्होंने बांग्ला भाषा और साहित्य को इस तरह अपनाए रखा मानो बीच में कुछ हुआ ही न हो। भाषा प्रेम के कारण उन्होंने पाकिस्तान से विद्रोह कर दिया। जब नया देश बनाया तो उस नए देश का राष्ट्रगान रवींद्रनाथ की कविता को बनाया।
उत्तर प्रदेश का मुसलमान अपने को अपनी जमीन से नहीं जोड़ पाता है। इस्लाम के आने से पहले के इतिहास से अपने को जोड़ नहीं पाता है। धर्मांतरित होने से पहले के अपने पुरखों से अपने को आधे अधूरे रूप में जोड़ता है, क्योंकि विरल अपवादों को छोड़कर उपाधियां पुरानी हैं, परंतु इतिहास सचेत रूप में भुला दिया गया है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी इसी क्षेत्र के मुसलमानों के प्रभाव में रही और उन्हीं का काम करती रही है। भारत के प्राचीन इतिहास को नष्ट करने की योजना पर मार्क्सवादी मुखौटा लगाए भाववादी इतिहास लिखने वाले काम करते रहे हैं। उनके प्रभाव के कारण हिंदी प्रदेश का भद्र मुसलमान अपनी जमीन, अपने देश, इसके सम्मान के प्रति उदासीन रहा है। यूपी के मुसलमान और कम्युनिस्ट राष्ट्रगान से बिदकते पर इंटरनेशनल गाते रहे हैं। वे, नेशन को, देश को, देश की संस्कृति को, इसकी भाषा को संकीर्णता का प्रमाण मानते रहे हैं। उनका बस चले तो इसे सचमुच टुकड़े-टुकड़े करके रख दें, इसकी घोषणा वे खुलेआम करते रहे हैं।
इसके विपरीत 2000 में बांग्लादेश के दो मुस्लिम कम्युनिस्ट मुझसे मिलने आए। इनका नाम था समसुज्जोहा मानिक और समसुल आलम चंचल। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी The Aryans and the Indus Civilization जो 1995 मैं, अर्थात् उसी वर्ष इस वर्ष मेरी पुस्तक The Vedic Harappans प्रकाशित हुई थी। उन्होंने मोहम्मद रफीक मुगल के छोलिस्तान रेगिस्तान के पुरातात्विक काम का भी हवाला देते हुए अपनी बात की पुष्टि ही नहीं की थी, अपितु रफीक मुगल को पुस्तक की एक प्रति भी भेजी थी, जो उनकी समझ में नहीं आई थी, क्योंकि उन्हें अपनी खोज के सही संदर्भ का स्वयं ही पता नहीं था। मैं इन लेखकों के विचारों से कुछ असहमति रखता था, परंतु मोटे तौर पर उनकी स्थापना सही थी और उनकी समझ से यह एक क्रांतिकारी काम था, क्योंकि तब तक वे मेरे काम से परिचित नहीं थे। उनकी पुस्तक की समीक्षा मैंने हिस्ट्री टुडे अंक एक 2000 में की थी।
मैंने पूछा मुस्लिम होते हुए आप लोगों ने वैदिक परंपरा से अपने को कैसे जोड़ा ? उनका उत्तर था, हमने मजहब बदला है, पूर्वज नहीं बदले हैं। हमारा इतिहास यही है और इस पर हमें गर्व है। मैंने कहा, भारतीय कम्युनिस्ट तो प्राचीन इतिहास के प्रति नकारात्मक रुख रखते हैं। उनका उत्तर था, यदि हम अपने इतिहास से नहीं जुड़ सकते तो अपने समाज से कैसे जुड़ सकेंगे ?
अब इन परिस्थितियों में बांग्लादेश का आज जो हाल है, जिस बांग्लादेश की तस्वीर तस्लीमा नसरीन की आप बीती से सामने आती है, और उग्रवादियों द्वारा हिंदुओं की जिस तरह की हत्याओं के समाचार सुनने को मिलते हैं, ये सभी मिलकर एक ऐसी भूल भुलैया की सृष्टि करते हैं जिसमें मनोवृत्ति, धर्म, शिक्षा, जाति अभिमान और गुमराह करने वाली शक्तियों के बीच के कारनामों को समझे बिना किसी को अच्छा या बुरा कह देना, दूसरों के लिए जितना आसान है, मेरे लिए नहीं।
धर्म के मामले में वे लेखक कुछ दूर तक किताब और रवायत की पाबंदी से मुक्त कहे जा सकते हैं, परंतु उन पाबंदियों से मुक्त भारतीय कम्युनिस्ट मुसलमान संस्कृति की आड़ में उतनी ही कट्टरता और नकारात्मकता से काम लेते हैं जितनी मुल्ला-मौलवी। मुल्लों और मौलवियों का भी सबसे अधिक प्रभाव उत्तर प्रदेश में है। देवबंद और बरेली दोनों इसी के भीतर। उत्तर प्रदेश का मुसलमान दुनिया के कट्टर मुस्लिम देशों की तुलना में भी सुधार के मामलों में अधिक कट्टरता से काम लेता है और बाहर उसी कट्टरता और संकीर्णता का विस्तार करने के लिए आत्मघाती कदम उठाने को तैयार हो जाता है। इन पहेलियों को समझने के लिए हमें कोई भी सरलीकरण काम का नहीं दिखाई देता। सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक शक्तियों के बीच खींचतान की प्रवृत्ति को समझने के लिए इन सवालों का कोई समाधान होना चाहिए।
कुरान मेरा अध्ययन बहुत गहन नहीं है। केवल एक बार आदि से अंत तक पढ़ा है और बीच बीच में जहां तहां से उलटता पलटता रहा हूं, इसलिए अपेक्षित झिझक के साथ ही दावा कर सकता हूं कि मेरी नजर में ऐसी कोई आयत नहीं मिली जिसमें कृतघ्नता की हिमायत की गई हो, चाहे वह व्यक्ति के प्रति हो या समाज या देश के प्रति। कृतज्ञता से शून्य वही व्यक्ति हो सकता है जिसकी अंतरात्मा मर गई हो, जो किसी कीमत पर केवल अपना हित साधने वालों में पाई जाती है।*
{NB * स्पैनियर्ड्स ने अमेरिकी आदिवासियों के साथ यही किया था। अलाउद्दीन से लेकर मीर जाफर तक अनेक सुल्तानों और नवाबों ने यही किया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसका भी सहारा लिया। परंतु सामाजिक व्यवहार के मामले में ऐसा आचरण कुछ अपराधी माने जाने वाली जातियों में, ठगों और उठाईगीरों में ही पाए जाते हैं। मुस्लिम समाज को इनमें नहीं रखा जा सकता है, न ही उसके धर्म ग्रंथों में मुझे इस तरह का कोई संकेत कहीं दिखाई पड़ा। खुदा की बंदगी अपनी जगह है, उसकी तुलना में रखकर किसी दूसरे की वंदना नहीं की जा सकती, इसके बाद भी सलाम बंदगी तो चलता ही है ।}
जो देश हमें आहार से लेकर आवास और सुरक्षा तक सब कुछ प्रदान करता है उसके प्रति कृतघ्नता का प्रकाशन धर्म प्रेरित तो नहीं पर हीनता ग्रंथि से प्रेरित अवश्य माना जा सकता है। ऐसी ही हीनता ग्रंथि का प्रचार मध्य देश के मुसलमानों ने अन्यत्र भी अपनी धौंस कायम करने के लिए किया। ‘हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्ताँ हमारा’ को पाकिस्तान में पहुंचकर ‘मुस्लिम है हम, वतन है सारा जहां हमारा’ करने वाले वे ही थे। उनका तेवर था कि पाकिस्तान उन्होंने बनाया है इसलिए पाकिस्तान पर उनका राज रहेगा, उनकी भाषा राज करेगी (Urdu had been a symbol of Muslim identity during the Hindu-Urdu controversy, .. Muslim league leaders who formed the government still associated it with Islamic and Pakistani identity. T. Rahman) उन्होंने पाकिस्तान बनाया नहीं, हिंदुस्तान को तोड़ा और पाकिस्तान को तोड़ते रहे, क्योंकि उन्हीं की सूझ थी कि मुसलमान का कोई देश नहीं होता, पूरी दुनिया होती है। दूसरे सभी मानते रहे कि मुसलमान का अपना देश और अपना इतिहास ही अपना होता है। बांग्लादेश इसी का उदाहरण था। सिंध देश का नारा लगाने वाले मुसलमान तो हैं पर अपने देश की जमीन और अपने इतिहास से जुड़े हुए हैेः
The conditions of East Pakistan parallel those of Sindh. Like Seikh Mujibur Rahman, the nationalist leader Bangladesh, G.M. Syed, the nationalist leader of Sindh, also advocated the creation of the independent state of Sindhu Desh (Amin 1988:147, cited by Rahman).
सिंधियों की तरह ही पख्तूनों के राष्ट्रीय स्वाभिमान से हम परिचित हैं After the 1930s, the ruling elite promoted Pashto as a means of creating nationalism and unity among tribes which were divisive and understood only the extended kinship system and tribal loyalty. उनके साथ मुहाजिरों के द्वारा की जाने वाली दमन और उत्पीड़न की दर्दनाक कहानियां संचार माध्यमों से सुनने मे आती रहती हैं।
पख्तूनों की तरह ही बलूचियों ने अपनी राष्ट्रीय अस्मिता की घोषणा बहुत पहले कर दी थीः
There is, however, a Balochi language movement since 1951 which aims at preserving the Baloch cultural identity. Baloch identity is expressed by coining words of Baloch origin (Jahani,1989: 233 ) and, indeed, by writing in a language which has little official patronage.
सिराइकी का आंदोलन अपनी उपेक्षा का परिणाम हैः
The southern part of the Punjab is under developed and the leaders of this area blame the Punjabi ruling elite for this underdevelopment. From the nineteen sixties they call their language Siraiki and have standardized it for purpose of writing. The Choice of the term Siraiki from the 1960s meant that the people of southern Punjab could identify with one identity instead of calling their language by local names such as Multani, Derewali, Riasati, and so on. After the famous conference in Multan in 1975 (Kamal 1975: 19-20) a number of institutions – like the Siraiki Lok Sanjh (लोक संझ)– have been promoting the language ..(वही, 230).
और तो और पंजाबी ने भी अपनी गर्दन तान ली और जिंदगी भर अरबी-फारसी गर्भित उर्दू में लिखने वाले फैज को जिन्दगी के आखिरी मोड़ पर यह अहसास हुआ कि उनकी अपनी जबान तो पंजाबी है और वह खामखा उर्दू में लिखते रहे। भूल सुधारते हुए उन्होंने उसके बाद पंजाबी मे ही लिखा।
While the Siraiki movement is clearly a response to perceived Punjabi domination and internal colonialism, the Punjabi language movement is hard to understand. The Punjabis occupy most of the powerful positions in the apparatus of the state: the federal government, legislature, and specially army and bureaucracy and oppose the use of Punjabi even in primary schools… The Activists of the movement claim that the price of Punjabi domination over Pakistan is the denial of the Punjabi ethnic identity. In fact by teaching only English and Urdu to the Punjabi elite, Punjabi language and culture have been suppressed (Qaiser & Pal 1988; Kammi 1988: 15-44). This cultural shame, they feel, should go; Punjabis should learn to be proud of their Punjabi identity. This is only possible if the state uses Punjabi in the Domains of power. (वही, 230-31)।
हम केवल इतना ही याद दिलाना चाहते हैं कि देश और समाज से बिलगाव उन रईसी दिमागों की उपज था जो मुगल सल्तनत के बर्वाद हो जाने के कारण भी थे, उसी खुमार में दूसरों से अलग और ऊपर रहना चाहते थे, और इसलिए किसी की बराबरी पर रहने को तैयार न थे। उन्हें लोकतंत्र स्वीकार न था, वे किसी के प्रति, यहां तक कि स्वयं अपने प्रति भी ईमानदार नहीं रह सकते थे।मुसलमानों को इस आत्मवंचना से बाहर निकलना होगा। तभी वे समाज के सार्थक और उपयोगी अंग बन कर सम्मान और विश्वास दोनों हासिल करके कलाम की तरह जी सकेंगे और दूसरे भी प्रगति के मार्ग पर अधिक आत्मविश्वास से बढ़ सकेंगे।
Post – 2018-11-09
#भारतीय_मुसलमान: काऊ बेल्ट
बात आज से बीसेक साल पहले की होगी । मैं सप्ताह में एक दिन काफी हाउस चला जाया करता था। पहली बार इस शब्द का प्रयोग अपने एक मुस्लिम मित्र के मुंह से सुना।
संदर्भ बनारस में हुए एक संप्रदायिक फसाद का था। सिल्क के बुनकरों का मालिकों से झगड़ा हो गया था जिसमें उन्होंने तीन दूकानदारों की हत्या कर दी थी। इस बवाल पर काबू पाने के लिए पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई में दस बारह बुनकर पुलिस की गोली से मारे गए थे। मित्र को मलाल था कि सिर्फ तीन मारे गए थे पुलिस ने बारह को मार दिया। तर्कशृंखला इस समय याद नहीं परंतु मित्र काे शिकायत थी कि पुलिस को बदले की कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी। वस्तुपरक ढंग से सोचें तो चाहिए और न चाहिए की कई कड़ियां तैयार होती है।
1. व्यापारियों को कारीगरों को भुगतान करने में इतनी हेरा फेरी या बेईमानी से काम नहीं लेना चाहिए था कि वे आजिज आकर हिंसा पर उतारू हो जायं।
2. यदि व्यापारी बेईमानी कर रहे थे तो भी कारीगरों को कानून अपने हाथ में लेकर सीधी कार्रवाई पर उतारू नहीं होना चाहिए था।
3. यदि हत्या हो गई तो इसे दंगे का रूप नहीं लेना चाहिए था। इसकी रपट थाने में दर्ज कराई जानी चाहिए थी।
4. पुलिस को दंगे में दूसरे तरीके आने चाहिए थे गोली नहीं चलानी चाहिए थी।
5. और हमें इसका निष्पक्ष भाव से मूल्यांकन करते हुए इस समस्या पर विचार करना चाहिए था न कि हिन्दू या मुसलमान के रूप में।
आदर्श वस्तुपरक चिंतन के लिए आदमी को वस्तु बन जाना पड़ेगा। आदमी रहते हुए, प्रयत्न करने के बाद भी, वह प्रकट या गुप्त पूर्वाग्रह का शिकार हुए बिना नहीं रह सकता। इसलिए वस्तुपरकता एक भुलावा है। हम प्रामाणिक होने का प्रयत्न करें और उनसे जो नतीजा निकलता है उस पर भरोसा करें यही हमारे लिए पर्याप्त है।
यह वह दौर था जब कांग्रेस खालिस्तानी कार्ड पर मात खाने के बाद हिंदू कार्ड आजमाते हुए भाजपा को विफल करने का प्रयत्न कर रही थी और जिस दौर में भागलपुर से लेकर मेरठ और मलियाना तक कई उपद्रव हुए थे जिनमें मुसलमानों को पुलिस की भागीदारी के कारण बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी और इसलिए कोई भी घटना जिसमें पुलिस द्वारा मुसलमानों को निशाना बनाया गया हो किसी भी सोचने विचारने वाले व्यक्ति के लिए चिंता की बात थी।
एक दूसरी प्रवृत्ति जो दिखाई पड़ रही थी वह यह कि हर मामले में हिंसात्मक कार्यवाई मुसलमानों की ओर से हुई थी और पुलिस ने बदले की कार्रवाई करते हुए उन्हें भारी क्षति पहुंचाई थी। मेरा सुझाव यह था कि जो स्थिति बन चुकी है उसमें किसी को हिंसा की कार्यवाही करते हुए किसी शिकायत को दूर करने का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए, पुलिस में इसकी रपट करनी चाहिए। मैं ऐसा कहते हुए भी पूरे विश्वास से अपनी बात नहीं कर पा रहा था क्योंकि मुझे लगता था मुसलमानों का पुलिस से भरोसा उठ गया है। पुलिस की भ्रष्टता, पक्षधरता को देखते हुए यदि कोई मान बैठे कि उसे न्याय नहीं मिलेगा साथ ही वह अन्याय सहने को तैयार न हो तो, जो समझे कर बैठने का विकल्प बहुत स्वाभाविक प्रतीत होता है।
यदि अपनी अल्पसंख्यकता के कारण उत्पन्न असुरक्षा की भावना के चलते उसने चुपके से असला जमा कर रखा हो, तो संभवना और भी बढ़ जाती है। यह ऐसा दुष्चक्र है जिसके लिए हम प्रशासनिक विफलता और प्रशासन के इरादे को अधिक दोषी मान सकते हैं बनिस्बत व्यक्तियों के।
यदि लोग घरों में निषिद्ध हथियार इकट्ठा करते हैं तो उसे भी रोक न पाना उसकी अक्षमता में ही गिना जाएगा ।
इसमें संदेह नहीं कि पुलिस का संप्रदायीकरण हुआ है। यह संप्रदायीकारण भी नया नहीं है। यदि नया कुछ है तो सिक्के का उलट जाना। औपनिवेशिक काल में पुलिस की मदद से दंगों को फैलने और भड़कने दिया जाता था। इसी प्रयोजन से पुलिस बल में मुसलमानों की संख्या अनुपात से बहुत अधिक हुआ करती थी।
स्वतंत्र भारत में पुलिस में मुस्लिम अनुपात घटा और हिंदू अनुपात बढ़ा है। पुलिस प्रशासन को बदलने का कोई सार्थक प्रयत्न नहीं किया गया। विभाजन ने सांप्रदायिक चेतना को और विस्तार दिया। पुलिस के क्रमिक सांप्रदायिक करण के पीछे एक बहुत बड़ा कारण यह है छोटी से छोटी तकरार या अफवाह पर मुसलमान सीधी कार्रवाई पर उतर आते हैं और इसका परिणाम होता है हिंदुओं का मारा जाना। हिंदू सामान्यतः हिंसक कार्रवाई में पहल नहीं करते। मुसलमानों की सीधी कार्रवाई के पीछे उनके मन में बैठा यह विश्वास भी एक बड़ा कारण है कि पुलिस उनसे सहानुभूति नहीं रखती और उल्टे उन्हें ही दोषी सिद्ध करने को तैयार रहती है। अल्पसंख्यकता जन्य असुरक्षा के कारण हथियार जुटाने की प्रवृत्ति पनपी, और हथियार हैं तो आवेश में आने पर उन पर हाथ जाना मोटर ऐक्शन जैसा है। इस तरह एक दुश्चक्र बनता है जिसमें अपराधी को चिन्हित कर पाना आसान नहीं होता।
कॉफी हाउस की बहसें कॉफी हाउस की ही बहसें हो सकती है जो कुछ समय तक साथ बैठने का बहाना होती हैं, किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए नहीं की जातीं। परंतु इस प्रसंग में उस मित्र द्वारा हिंदी प्रदेश के लिए काउबेल्ट का प्रयोग मुझे इसलिए बहुत विचित्र लगा कि वह स्वयं हिंदी का समादृत लेखक था।
यह जानता था कि इसका प्रयोग अंग्रेजी के लोग हिंदी से अपनी खीझ मिटाने के लिए करते हैं। उसका कारण भी है। हिंदी अंग्रेजी के प्रभुत्व को चुनौती देती रहती है। सामान्य व्यवहार में अशिक्षित और अल्पशिक्षित भारतीयों के बीच संपर्क की भाषा हिंदी है, न कि अंग्रेजी। इसलिए उनकी मनोग्रंथि को समझते हुए लिए मैंने यह जानते हुए भी कि यह एक तरह की गाली है, इसको कभी महत्व नहीं दिया था। परंतु हिंदी का एक लेखक हिंदी भाषी क्षेत्र के लिए स्वयं इसका प्रयोग करे, यह एक अलग बात थी। इसके पीछे उसकी चेतना में हिंदी प्रदेश को हिंदू प्रदेश के रूप में देखने की विवशता थी।
इसमें संदेह नहीं कि कुछ अपवादों को छोड़कर औपनिवेशिक काल से आज तक हिंदी प्रदेश में सांप्रदायिक उपद्रव अधिक होते रहे हैं। पहली नजर में उसकी प्रतिक्रिया वहीं थी जिसमें हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान तीनों को सांप्रदायिक रंग में रंग कर देखा और दिखाया जाता रहा है।
गालियों का व्याकरण नहीं होता न उनका अर्थ विज्ञान होता है सभी का अर्थ केवल उस व्यक्ति का या संस्था का अपमान करना होता है जिसके लिए इसका प्रयोग किया जा रहा है। प्रयोग बदल सकते हैं प्रयोजन एक ही रहता है। फिर भी अर्थ तो होता ही है। काउबेल्ट का एक अर्थ है, पिछड़ी मानसिकता का प्रदेश। आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ प्रदेश। उद्योग धंधों से रहित प्रदेश। गोधन की रक्षा के लिए तत्पर प्रदेश। जड़ता का प्रदेश, सांप्रदायिक उपद्रवों का प्रदेश। कुछ और भी हो सकता है, पर होगा निंदापरक ही।
परंतु वह कौन सी विशेषताएं हैं जिन के कारण मध्य काल से पहले तक और उसके बाद भी कुछ समय तक ज्ञान और चिंतन का केंद्र माने जाने वाला क्षेत्र अज्ञान का क्षेत्र बन गया। शांति और सद्भावना का संदेश देने वाला क्षेत्र दंगों का क्षेत्र बना दिया गया। समृद्धि की दृष्टि से अपनी उर्वरता के कारण विश्व का सबसे उपजाऊ माना जाने वाला क्षेत्र निर्धनता के लिए जाना जाने लगा। इस बीच घटित क्या हुआ जिनका वह परिणाम दिखाई देता है जो इस गाली में ध्वनित है।
वह क्षेत्र जिसे पहले मध्यदेश कहा जाता था, और जिसे तुर्कों ने हिंदुस्तान की संज्ञा दी और जो बंगाल और पंजाब दोनों को हिंदुस्तान के रूप में दिखाई देता रहा है यही वह क्षेत्र है जो लगातार मुस्लिम शासन में बना रहा है। यही वह क्षेत्र है जहां कुछ भागों मे लगान के रूप में दो तिहाई तक की वसूली की जाती रही। यही क्षेत्र है जहां अपनी जमीदारियां मुसलमान सरदारों ने अधिक कायम कीं, इसी ने 1857 के विद्रोह में दूसरों से बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और इसलिए अंग्रेजों ने इसे सभी दृष्टियों से वंचित कर के रखने का निश्चय किया। यही वह क्षेत्र है जिसके कामकाज में फारसी का सबसे लंबे समय तक प्रयोग जारी रहा। यही वह क्षेत्र है जिसे अपनी लिपि के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी, और यही व क्षेत्र है जो स्वतंत्रता संग्राम की धुरी बना रहा। इसी में रईसों की पार्टी मुस्लिम लीग सबसे अधिक सक्रिय रही,और इस बात की धमकी देती रही कि हमारे अनुसार न चलोगे तो दंगे किए जाएंगे। दुर्भाग्य से वैचारिक जगत पर इस क्षेत्र में वामपंथी सोच सबसे प्रबल रही जब कि राजनीतिक गतिविधियों में वामपंथ इस क्षेत्र में लगभग गायब रहा। यही वह क्षेत्र है जिसमें इतने कटु अनुभवों के बाद भी कभी क्षेत्रीय संकीर्णता नहीं आई और दुर्भाग्य से यहीं के कम्युनिस्टों ने रईसों के मुस्लिमलीगी मंसूबों को पूरा करने के लिए लीग को जनान्दोलन का रूप देकर देश का विभाजन कराया। यदि इस क्षेत्र में सबसे कमजोर रहा तो वह है हिंदूवादी दक्षिणपंथ, फिर इसे वैभव क्षेत्र से काउबेल्ट मे बदलने के लिए जिम्मेदार कौन है?
Post – 2018-11-08
#भारतीय_मुसलमान : #माइनॉरिटी_सिंड्रोम (5)
दो
संख्यावृद्धि करते हुए अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक होने की कोई योजना विभाजन से पहले मुस्लिम लीग के पास भी नहीं थी। उस दौर में कई हिंदू महिलाओं ने मुसलमानों से विवाह किया था – कृष्णा हठी सिंह, लक्ष्मी सहगल, इंदिरा गांधी, अरुणा आसफ अली – परंतु उनमें ऐसा कुछ न था जिससे हिंदू भावना आहत होती। विभाजन के दौरान हुए उपद्रवों में हिन्दू स्त्रियों के साथ कई तरह की दरिंदगी के नमूने मिले, जिनमें एक अपहरण भी था। इसने हिंदुओं और विशेष कर इस अपमान को सहने वालों की संवेदनशीलता को बहुत गहरे प्रभावित किया। बहुत हो गया, अब नहीं सहन करेंगे। इसका एक नमूना था, दिल्ली में जहां कांग्रेस का एकक्षत्र राज था, एक हिंदू लड़की के मुस्लिम युवक (कम्युनिस्ट नेता के पुत्र) से विवाह के समाचार ने इतना विक्षोभ पैदा किया कि पासा पलट गया। पहली बार मदन लाल खुराना दिल्ली के प्रधान बने और तब से आज तक भाजपा दिल्ली में नं. 1 या 2 पर बनी रही है।
राष्ट्रवादी माने जाने वाले मुस्लिम नेताओं की सोच पहले भी संप्रदायवादी थी, परंतु उसकी सद्भावपूर्वक उपेक्षा की जाती रही। कम्युनिस्ट चोलाधारी मुसलमान मुख्यतः उन्हीं चिंताओं के कारण कम्युनिस्ट बने थे जिनसे ग्रस्त उनसे पिछली पीढ़ी के लोगों ने मुस्लिम लीग बनाई था, यह हम कह आए हैं। इन संगठनों से जुड़ने वाले मुस्लिम युवक हिंदू लड़कियों से मेलजोल बढ़ा कर निकाह करने को अपने सेकुलर होने के प्रमाण के रूप में दर्शाते रहे और हिंदू सेकुलर इसे इसी रूप में दरसते रहे जब कि हिन्दुत्व की रक्षा में कातर इसे भारत मे मुस्लिम इतिहास के आरंभ से ही हिंदुओं के अपमान की अटूट शृंखला से अलग देख नहीं पाते हैं और अपनी इस ‘संकीर्ण’ सोच के कारण अपने को खांटी सेकुलर सिद्ध करने को आतुर हिंदू सेकुलरिस्टों की भर्त्सना का शिकार होना पड़ता रहा है।*
{nb. * मेरा यह कथन कि सेकुलरिस्टों को सेकुलर सिद्ध करने की आतुरता पद-व्याघात प्रतीत हो सकता है, परन्तु हिन्दू सेकुलिरस्ट को अपने प्रत्येक कथन और कार्य से इसे उसी तरह प्रमाणित करते रहना होता है जैसे मिंट में काम करने वाले को रोज इस जांच से गुजरना होता है कि वह कुछ चुरा कर तो नहीं ले जा रहा है। ईमानदारी की एक परीक्षा काफी नहीं। मऩ वचन, कर्म से कहीं कोई चूक पाई जाने पर यह प्रमाणपत्र वापस ले लिया जाता है। इसका प्रभाव इतना आतंककारी है कि मैं जानता हूं मेरे अनेक सेकुलर मित्र जो मेरे विचारों से सहमत होते हैं, अपनी ‘हां’ – ‘ना’ की पसंद तक जाहिर नहीं कर पाते।
परीक्षा कितनी कठिन हो सकती है इसका एक व्यक्तिगत अनुभव यह कि मेरे अतिशय प्रिय और हितैषी मित्र एक मुस्लिम युवक के साथ मेरे घर पर आए। वह पूरे परिवार के आत्मीय थे और घर की सारी खबर रखते थे। मेरे मकान का पहली मंजिल का सूट खाली था। बताया कि उसे मुसलमान होने के कारण कोई किराये पर मकान नहीं दे रहा। यदि वह यह सोच कर आए थे कि किसी को मुस्लिम होने के कारण मैं इनकार न करूंगा, तो ठीक ही सोचा था। पर जब मैंने जानना चाहा कि जहां अभी रह रहे हैं वहां क्या परेशानी है तो पता चला उनका एक विवाहिता शिष्या से प्रेम हो गया है और उसके साथ रहना चाहते हैं। इस क्रम में यह भी पता चला कि ओडिशा में उनकी विवाहिता पत्नी हैं। मेरी मनस्थिति का अनुमान ही किया जा सकता है। मैने उन्हें किन शब्दों में विदा किया यह याद नहीं। मेरे मित्र कैंपस से दूर स्थित एक वोकेशनल कॉलेज में पढ़ाते थे, जब कि वह कैंपस के किसी कॉलेज में। संपर्क का कोई सूत्र नहीं। वह मुझे धोखे में नहीं रख सकते थे, उसके सामने ही स्थिति स्पष्ट कर दी। ऐसी दुस्साहसिकता की मुझसे अपेक्षा भी नहींं रखते रहे होंगे, फिर भी किसी के द्वारा सेकुलर सिद्ध होने की इस परीक्षा में डाल दिए गए थे। उनके सेकुलर पहचान पर तो असर न पड़ा होगा, मैं अवश्य इसमें फेल हो गया।
मैने सेकुलरिज्म की कसौटी पर सही सिद्ध होते रहने की यातना और इसी प्रयत्न में रोज कुछ विचित्र, पर सेकुलर दायरे में ’क्या खूब कही, क्या बात कही’ की हर्षध्वनि से स्वागत की जाने वाली फिकरेबाजियां करने वालों के विषय में अपनी धारणा एेसे कई अनुभवों के बाद बनाई है। यदि ऐसी घटनाएं इस पृष्ठभूमि से अलग सुनाई पड़तीं तो मैं इनकी नोटिस नहीं ले पाता।}
राष्ट्रीय स्तर पर पहले के अधिक प्रभावशाली दलों को हाशिए की ओर ठेलते हुए, नगण्य सी हैसियत वाली भाजपा के एक मात्र विकल्प बनते जाने के कारणों की गहराई से कभी पड़ताल नहीं की गई। अंधेरे में तीरंदाजी काफी आसान होती है। पर मुसलमानों की विविध सवालों पर प्रतिक्रियाएँ, सेकुलर मुखौटे वाली सांप्रदायिक सोच का उसके साथ जुड़ाव, हिंदुत्ववादी सोच के क्रमिक विस्तार लिए रास्ता तैयार करता रहा है, यह मानना गलत न होगा।
स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान, जिन्ना की रट के बाद भी भारतीय मुसलमानों की चेतना में दूर दूर तक अपनी असुरक्षा का भाव पैदा नहीं हुआ था? इसका एक कारण तो यह था कि भारतीय मूल के मुसलमान अपने काम-धन्धे में लगे हुए लोग थे। जब तक उनका काम-धंधा प्रभावित नहीं होता, तब तक उनको इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि राज किसका है। भारतीय ग्रामीण मानस का वही सामान्य भाव उनमें भी था जिसे तुलसीदास ने ‘कोउ नृप होय हमैं का हानी, चेरि छोड़ि नहि होउब रानी’ द्वारा व्यक्त किया है।
धर्म परिवर्तन जिन भी कारणों से हुआ हो कुछ पेशे जिनके बिना हिंदुओं का काम न चल सकता था, मुसलमानों के हाथ में थे और उनकी रोजी-रोटी हिंदू गाहकों से चलती थी। इस ताने बाने में आपसी निर्भरता के कारण ऐसा जुड़ाव था कि तनाव की बात सोची न जा सकती था। यह शहरी समस्या थी।
परंतु वे लोग जो अपनी सुरक्षा की चिंता से शहरों में बसे थे, जो किसी काम धंधे से नहीं जुड़े थे, कोर्ट-वकालत कर लेते थे, मनोरंजन के लिए शिकार कर लिया करते थे, पुरानी गौरव गाथा में तलवार के जोर की बात किया करते थे और इस प्रयत्न में रहते थे कि उनका संबंध ईरान से या अरब से से जुड़ सके, असुरक्षा की भावना और और हैसियत लेकर चिंता उनके मन में प्रबल थी। वे ही ब्रिटिश काल में सत्ता के समर्थन से उपद्रवों के माध्यम से हिंदुओं को आतंकित करते हुए निश्चिंत होना चाहते थे फिर भी हो नहीं पा रहे इसलिए साथ रहने को असंभव बनाते हुए एक अलग देश की मांग को जायज ठहरा रहे थे। सचाई यह है कि वे हिंदुओं से नहीं मध्यकाल के अपने ही कारनामों से और उसकी काल्पनिक परिणति से डरे हुए थे और इसके बाद भी उसी मध्यकाल को वापस लाना चाहते थे जिसके लिए उन्हें एक अलग देश की जरूरत थी। अली सरदार जाफ़री ने लिखा तो किसी काल्पनिक यथार्थ को लेकर है परंतु मध्यकाल का इससे सुंदर चित्रण नहीं हो सकताः
तेग़ मुन्सिफ़ हो जहाँ, दार-ओ-रसन हों शाहिद
बेगुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा।
पाकिस्तान इसी कल्पना की देन था, और इसी ने उसको वहां पहुंचाया है जहां वह आज है।
चिंता नहीं माइनारिटीज सिंड्रोम से उबरने के लिए भारत में जो मुहिम चलता रहा है उसकी सच्चाई यह है मुसलमान जब तक किसी क्षेत्र में अल्पमत में रहता है असुरक्षित अनुभव करता है, यदि बहुमत में हो गया तो दूसरों को मिटाने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है। उसकी क्रूरता तब तक बनी रहती है जब तक दूसरा पूरी तरह मिट नहीं जाता। वे अपनी सुरक्षा की चिंता करें यह भी उसे चुनौती जैसा प्रतीत होता है।
एक आलोचक ने कभी लिखा था इस्लाम रेगिस्तान का मजहब है और जहां भी पहुंचता है उसे रेगिस्तान में बदल देता है। पढ़ने पर लगा था टिप्पणी कठोर है और मुसलमानों के प्रति द्वेष से भरी हुई है, परंतु थोड़ा रुक कर सोचने पर लगता है कि सच्चे मुस्लिम का सबसे प्यारा पेड़ खजूर है, सबसे ठंडी छांव खजूर के नीचे मिलती है, सबसे सुंदर पंछी बुलबुल, क्योंकि शायद इसके सिवा वहां कोई दूसरा परदेसी पक्षी नहीं पहुंचता। जाहिर है, ऐसी अवस्था में सबसे प्यारा देश मरुस्थल ही होगा।
धर्म पर पर कुछ न कहेंगे। दुनिया के सभी धर्म ग्रंथ कुछ नैतिक और काफी सारे अनैतिक विधानों से भरे हुए हैं। दूसरे धर्मों की बुराइयां हमें सबसे पहले दीखती हैं। अपने धर्म या विश्वास की अच्छाइयों पर ही ध्यान जाता है। परंतु भौतिक जीवन के विषय में टिप्पणी अवश्य की जा सकती है। हिंदी में बहुत साहस करके फिल्म बनाई गई थी- बाजार। इसके माध्यम से अरब देशों के अधेड़ और बूढ़े सौदागरों के लिए कुछ समय के लिए निकाह करने, या लंबे समय के लिए जोरू बनाए जाने के पूरे संजाल का चित्र खींचा गया था, जिसमें दलाल से लेकर काजी तक का हाथ था। पाकिस्तान में ‘सरेआम’ नाम से एक तहलका मचाने वाले टीवी चैनल ने एक मोहल्ले का नक्शा पेश किया था जिसके विषय में उसका दावा था कि उस इलाके में जानकारी के लिए घुसने वाला व्यक्ति जिंदा वापस नहीं आ सकता, क्योंकि पुलिस भी उनसे मिली हुई है इस मोहल्ले में तस्करी करके लाई गई हर उम्र की लड़कियां व्यापार के लिए किसी भी देश को भेजने के लिए रखी घरों में कुछ संख्या में।
धर्म एक ही होते हुए, खरीदार और बिकने वालों की मानसिकता को आसानी से समझा जा सकता है। मजहब साथ नहीं देता। पैसा साथ देता है। अर्थव्यवस्था धर्म व्यवस्था से ऊपर है इस बात को समझने में मुसलमानों को कितने युग लगेंगे, वे ही समझ सकते हैं। अर्थव्यवस्था आदमी को दुनिया से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है, दूसरे धर्मों के लोगों से जोड़ती है क्योंकि काम स से जोड़ती है, जमीन से जोड़ती है, देश से जोड़ती है, और जब जमीन की धूल माथे पर लगती है तब वंदे मातरम् पर भड़कने की जरूरत नहीं होती।