टुकड़े टुकड़े कर फरमाने लगे
जुड़ न सकता हो तो कीमा ही बना.
Post – 2018-07-16
#आइए_शब्दों_से_खेलें(22)
जब हम ‘उदर’ पर विचार कर रहे थे तो क्या आपका ध्यान ‘उदार’ की ओर गया था? यदि हां, तो क्या यह सोचा कि इसका प्राथमिक अर्थ फूला हुआ, फैला हुआ, भरा-पूरा रहा हो सकता है? जैसे सिकुड़ा हुआ, दबा हुआ का लाक्षणिक भाव साधनहीन, कृपण आदि होता है उसी तरह फूले और फैले या उदार के साथ दानशील, सहायक आदि का भाव आ जुड़ता है। धनात् धर्म:|
हम उदर के नीचे ‘कटि’ पर आएं। ‘गट्टा’ की तरह ‘कटि’ का अर्थ जोड़ होता है, यह हम कह आए हैं। भोजपुरी में कटि को कर्रहिआँव कहते हैं। इसमें ‘कर्रहि’ का अर्थ वही है जो कलाई के ‘कल्ल’ और कटि के ‘कट्ट’ का है। समस्या बोलियों के अनुसार ध्वनि परिवर्तन का है। यह कर्र ही ‘करधनी’ या ‘करधन’ – कटिबन्ध में ‘कर’ रह गया है और ‘धन’ या ‘धनी’ बन्ध या रज्जु का द्योतक है।
‘अंग’ को ‘लंग’ कहा जाता तो कोई हरज होता? अर्थ तब भी वही रहता जो लंग की ओर से असावधान लोग, इसके संस्कृतीकरण के बाद, ‘लग्न’ कहने पर समझ पाते है, अर्थात् लगा या जुड़ा हुआ हिस्सा। मेरे घर में दो परिवार रहते थे, आधे आधे बँटे हुए? यदि उधर कोई चीज पड़ी होती तो कहते, ‘चाचा के अलंगे’, अपने हिस्से के लिए ‘हमरे अलंगे’। जुड़े हुए, निकले हुए, लगे हुए हिस्से के लिए ही अंग और लंग का प्रयोग होता है। दोनों के मूल में प्रकट होने, दिखाई देने, अलग होने का भाव प्रबल है।
हमारे दोनों पांव धड़ से जुड़े होने के करण लंग कहे गए, जैसे अभी हम जिस कटि की बात कर रहे थे, उसे ‘लंक’ कहा जाता है। ‘लंक’, ‘लंग’, ‘अंग’ सबका अर्थ जोड़ है। लेकिन लंक पर एक जिम्मेदारी लचकने की डाल दी गई, और जिम्मेदारी डाली भी गई युवतियों की कमर पर जिनसे चलने के साथ अपेक्षा की जाती थी कि वे इठलाती हुई, बल खाती हुई, नागिन की तरह लहराती हुई चलेंगी और इस अपेक्षा की पूर्ति वे जिन्दगी में न सही, विज्ञापनों में कर भी लेती हैं। लचकने के लिए कमर पतली होनी चाहिए इसलिए यदि लंक में जुड़ने का भाव है तो उस तराश का, क्षीणता का भाव भी है जिसके कारण कुछ लोग ‘रंक’ कहलाते हैं। ‘रंक’ और ‘लंक’ में फर्क ही कहां है। यहां तक कि यह अंग्रेजी के लैंक और लैंकी (lank, lanky) और ब्लैंक (blank) छरहरेपन और खालीपन तक पहुंची लगती है और जो अंग वाला सादृश्य है वह एंकल (ankle) में दिखाई देगा।
कहें, यह शब्द-प्रतिशब्द (cognates) का मामला नहीं, शब्द-शृंखला और आर्थी प्रतिवेश (semantic domain)के निर्गमन और स्वायत्तीकरण का मामला है। यूरोप में कमर के लचकने का सवाल ही न था क्योंकि उनके नृत्य तक में इसकी गुंजायश नहीं जब कि भारतीय नृत्य और लास्य में भंगिमा और लोच (उंगलियों, पैरों, हाथों, कमर, ग्रीवा, होंठ, आँखों,भवों, नासिका, माथे की रेखाओं सभी में) सर्वव्यापी हैऔर नृत्य की अंतरात्मा है। कलात्मक सौन्दर्यबोध का यही तत्व स्त्री में, जिसकी शक्ति का स्रोत सौन्दर्य है, नैसर्गिक मान कर उस पर लाद दिया जाता रहा है।
‘टाँग’ में टँगे होने का भाव अधिक स्पष्ट है। टाँग का दुर्भाग्य कि इसे सं. में स्थान न मिला। एक मछली का नाम ‘टेंगरा’ है जिससे इस बात की संभावना पैदा होती है कि इसके पीछे जल की टगर-मगर ध्वनि का हाथ है। भो. में टाँग को टङरी कहते हैं। बांग्ला में इसे टेंग कहते है। पहली नजर में यह टङरी की अपेक्षा अधिक सही लगता है क्योंकि बूढ़े आदमी के झुकी कमर के साथ धीरे धीरे चलने को ठेघना कहा जाता है, और टेंगरी मछली के एकार से भी इसकी पुष्टि होती है, परन्तु टांग का टग ही डग, डगर, डिगना, डिगाना, डग्गा (लोहे की सरिया का बना गोल पहिया जिससे हम डगराते हुए दौड़ते थे) और ढंग – चलन, तरीका , बना इसलिए टँग, टाँग रूप अधिक सही लगता है। इसी से ठेघना से भिन्न टघरना > टहलना, टहल- सेवा, टहलुआ-सेवक की व्युत्पत्ति हुई लगती है।
(जारी)
Post – 2018-07-15
#आइए_शब्दों_से_खेलें (21)
पेट
पेट के बारे में क्या कभी आपने सोचा है यह इसका मतलब क्या होता है। ठीक कहा आपने, पेट भरने के लिए होता है अर्थ लगाने के लिए नहीं। यह काम सिर के हि स्से में आता है। मैंने सुना है किसी चीज का अर्थ पता चल जाए तो पेट में इससे मरोड़ नहीं पैदा होती। यूं तो कहते हैं पेट में भी एक छोटा दिमाग होता है और वह अपने फैसले स्वयं करता है।
जो भी हो, पेट के बारे में जो सबसे दुखद बात है वह यह कि यह आपका पालन करता है और इसके बदले मे लोग इसे अक्सर पापी कहते रहते हैं। पापी पेट के लिए। हमने अपना उपकार करने वालों के साथ हमेशा कृतघ्नता ही प्रकट की है। तिरस्कार के बाद भी यह अपना काम करता रहता है।
पेट के बारे में एक सचाई यह है कि इसमें दो रोटी पड़ी रहे तो ही दिमाग भी काम करता है, अन्यथा वह भी काम करना बंद कर देता है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है और खाली पेट शैतान के काम आता है।
पेट का भरा होना और पेट का खाली होना कुछ इस तरह कहा जाता हैं मानो पेट न हुआ माल गोदाम हुआ। लेकिन अगर कहा जाता है उसके पीछे सचाई भी होगी। पेट का नाम आते ही आपके सामने माल गोदाम न सही पिटारी का या पेटी का चित्र आ ही गया होगा।
वक्ष के विषय में हमने पीछे कहा है कि यह एक बाक्स है परंतु यदि आप गौर करें तो पाएंगे पेट की माल गोदाम से उपमा वक्ष की अपेक्षा अधिक सही है।
कुछ लोग ‘पेट’ को ‘पोट’ बोलते हैं और लीजिए हमें पोटली -सामान सहेजने की मोटरी – की याद आ गई । हमारे पेट का जो निचला हिस्सा है उसे पेड़ू कहते हैं। इसका मतलब हुआ छोटी पिटारी। संस्कृत में पेट शब्द को जगह नहीं मिली और मिली तो पेटिका बन कर। पेट की तुलना में तो पीठ तक को अघदिक सम्मान मिला लगता है
संस्कृत में सामान्यतः पेट के लिए उदर का प्रयोग देखने में आता है। उदर का अर्थ हमारे मित्रों में शायद ही किसी को पता हो। परंतु कुछ को यह पता होगा की उदर के साथ भी भरने का मुहावरा चलता है उदरंभर, भर्तृहरि का तो कहना था कि पेट एक ऐसी चीज है जिस् भरते रहे फिर भी भर नहीं पाता। वह पापी पेट को बहुत मुश्किल से भरने वाला मानते थे — दुष्पूरोदरपूरणाय रात दिन पिसते रहो। आज जिसे तुंद होने के कारण तोंद कहा जाता है ऐसे लोगों काे पहले खासा रोबदाब था। उन्हे वृकोदर कहा जाता था। यहां वृक का अर्थ भेड़िया नहीं बृहद है।तोंद का पूर्वरूप जो देववाणी में चलता था, धोंध था जो गुड़ की चाशनी में लाई के बड़े आकार के लड्ड, (धोंधा) और चावल के आंटे के बने लड्डू (ढोंढ़ी) में बचा रह गया है। अर्थात गोललाकार।
वास्तव में उदर अनाज रखने की डेहरी या अन्नागार को कहते थे। ऋग्वेद में अन्नागार के लिए ऊर्दर का प्रयोग देखने में आता है- तमूर्दरं न पृणता यवेन – जहां प्रयोग राजकोष के लिए है इसलिए यदि इस शब्द के साथ मोंएं जोदड़ो केअन्नागार की याद आ जाए तो अपराध क्षम्य है।
उदर देव भाषा का शब्द होना चाहिए।परन्तु हमें ऐसा लगता है कि देवसमाज में पेट के लिए ढींढ़ा का प्रयोग किया जाता था जिसका अर्थ संकोच होने के कारण आज भोजपुरी में इसका प्रयोग गर्भ के कारण फूले हुए पेट के लिए होता है और जो स्त्रियों की व्यंग्य भाषा तक सीमित रह गया है। हम जानते हैं , सारस्वत बोली में घोष महाप्राण ध्वनियों का अभाव था। इनका उच्चारण वे बहुत कष्ट से कर पाते थे। यदि दो घोषमहाप्राण ध्वनियां पास पास आ जाती थीं तो पहले का महाप्राणन हट जाता था। हम आदि इकार के साथभी उनकी समस्या से परिचित हैं, जिसमें इकार ऋकार में बदल जाता था। इन्हीं के कारण ढीढ़ा दृढ़ बन गया। अर्थात् ढीढ़ा दृढ़ का अपभ्रंश नहीं, दृढ़ ढींढ़ा का संस्कृतीभवन है और इसका मूल अर्थ मजवूत नहीं, बृहदाकार रहा है।
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टिप्पणीः सरिता शर्मा ने बताया कि पंजाबी में पेट के लिए ढिढ का ही प्रयोग होता है। जिन शब्दों को हम नितान्त स्थानीय मानकर उन्हें तुच्छ समझते हैे उनकी महिमा और व्याप्ति का हमें बोध नहीं होता।
Post – 2018-07-15
खुदा बनाया भी तो इतना तंग दिल क्यों कर
औरतें होती हैं उनका खुदा नहीं होता।
अभी अभी पर्सनल ला पर एक बहस सुन कर। कहते हैं खुदा ने आदमी की मौज-मस्ता के सारे सामान बनाने के बाद उसकी पसली से औरत को बनाया कि वह आनन्द लेने के लिए जो भी चाहे करे, अर्थात वह इन्सान नहीं, उपभोक्ता वस्तु है। संविधान और पर्सनल ला के बीच टकराव का यही मुद्दा है। इस पर सभी मानवतावादी बवाली – हिन्दू हों या मुसलमान चुप्पी साध कर घरेलू अत्याचार का समर्थन करते हैं। संविधान जिसने लिंग और धर्म निरपेक्ष रूप में सबको समान नागरिक अधिकार और सुरक्षा प्रदान कर रखा है यदि धर्म सापेक्ष बना कर इसे केवल हिन्दुओ तक सीमित रखता है तो भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का कौन प्रयत्न कर रहा है?
Post – 2018-07-14
#आइए_शब्दों_से_खेलें (20)
हमारी चर्चा के तीन पक्ष हैं : एक, देववाणी से संस्कृत की दिशा में यात्रा और उस के दौरान घटित परिवर्तनों को प्रस्तुत करना। दूसरा, देववाणी और संस्कृत दोनो के निर्माण में अन्य भारतीय भाषाओं की भूमिका। तीसरा, यह समझने का प्रयत्न कि जो संज्ञा किसी वस्तु को मिली है, उसका स्रोत क्या है।
‘हाथ’ पर विचार करते समय हमने पाया कि ‘हस्त’, वैदिक और संस्कृत में देववाणी से आया हुआ शब्द है, परन्तु अपने मूल रूप में हस्त नहीं रहा हो सकता। अधिक संभावना है, यह हत्थ रहा हो, क्योंकि प्राकृत में भी यही रूप मिलता है। क्या यह ‘हत्त’ या ‘हत्ता’ का सजात(cognate) है, जिससे हत्या व्युत्पन्न है? हम निश्चय के साथ यह नहीं कह सकते कि, शिकार करने में जरूरी होने के कारण, इसे यह संज्ञा मिली लगती है। परन्तु अं. के आर्म arm पर ध्यान देने पर इसकी संभावना प्रबल तो होती ही है। ऐसी स्थिति में इसका अनुनादी स्रोत हुआ आघात करते समय हाथ या हथियार के वेग से चलने के साथ वायु के घर्षण से उत्पन्न ध्वनि, जिसका अनुकरण ‘भस्स’, ‘घस्स’ या ‘हस्स’। ऋग्वेद में भर> सं. हर, घन> सं. हन में बदलता दिखाई देता है। इससे उल्टी गति दिखाई नहीं देती। आगे की यात्रा ह-कार के अ-कार में बदलने या लोप या मूक हो जाने की है जो आद्य ह-कार के मामले में ग्रीक मे नियमित और अंग्रेजी में वैकल्पिक (honour, hour परन्तु साथ ही hot, hit, hat) में पाई जाती है, और मध्यस्थ या अन्त्य होने पर घोषमहाप्राण ध्वनि लिखत में दिखाई देती है, पर मध्य में उच्चारण में मूक हो जाती है (might, drought) अथवा अन्त्य होने पर उच्चारण विकृत कर देती है (rough, laugh)।
ऐसी स्थिति में हम प्रहार की मूल अनुकृति ‘हस्स’ नहीं मान सकते। बचे दो विकल्प। ऋग्वेद में हम हाथ के लिए ‘गभस्ति’ का प्रयोग देख आए हैं, जिसमें ‘गभ’ ‘घस्स’ का और ‘भस’ ‘भस्स’ का अवशेष है। यह इस बात का संकेत है कि प्रहार की ध्वनि को दो रूपों मे अनुनादित किया गया – ‘घस्स’ और ‘भस्स’ और हाथ और आघात दो’नों के लिए ‘घस्त’/’घत्त’, ‘भस्स’/भस्त’ का चलन रहा और जिनसे ‘हत्त’/’हत्थ’, ‘भस्त’/’हस्त’ रूप सामने आए पर कभी कभी दोनों के युग्म से हाथ का पर्याय ‘घभस्त’ हो जाया करता था, जैसे तण् =पानी, नीर=पानी, तण्+नीर= तन्नी=पानी। इस युग्म ‘घभस्त’ का ही गभस्ति रूप हम ऋग्वेद में पाते हैं और साथ ही भस्त का हस्त रूप भी जारी रहा।
कोहनी पर बात करते हुए हम यह तो सुझा सके कि यह ‘कुभ’ पूर्वरूप से निकला है, परंतु यह व्याख्या अधिक से अधिक धातु और उसके लिए कल्पित अर्थ के समान है, जिसमें यह पता नहीं चलता कि उसे वह अर्थ मिला या वे अर्थ मिले कैसे। हमारी सैद्धांतिकी के अनुसार कुभ के पीछे जल की किसी ध्वनि का हाथ होना चाहिए। हम पाते हैं कि कुभ में वही कु है जो ‘कुंभ’, ‘कूप’, ‘कुआँ’, ‘कुमुद’, ‘कुंड’ आदि में है। जल के वर्तुल उछाल के कारण वलयाकार वस्तुओं के नाम में इसकी भूमिका निर्णायक रही लगती है। ‘कुंडल’, ‘कुड्म’, ‘कुंचन’, ‘कुब्ज’, आदि इसी से जुड़े हैं। ”गुजहा’ भी इसी शृंखला में आता है।
कोहनी के ”नी” बारे में हम पहले देख आए हैं कि यह हीनार्थक है। यही बात अंगुल या उँगली (अंगुली) के विषय में कही जा सकती है। अंगुल में अंग लालित्य के तकाजे से अंगु हो गया है और -ल या -र परसर्ग ”का” या ”वाला” का द्योतक (अपत्यार्थक)है। अंगुल का अर्थ अंग का या अंग से उत्पन्न या उपांग है, जिसका प्रयोग अंगोपांग में होता है।
हाथ के लिए दो अन्य शब्दों का प्रयोग होता है पाणि और कर। कर का क्रिया के रूप में तो ऋग्वेद में प्रयोग हुआ है (करतां न सुराधसः, सुपथा करत् , सूनृतावतः कर, रथं न दस्रा करणा समिन्वथः, तथा राजाना करथो यदीमह, , सर्वाभ्यो अभयं करत्, यथा विद्वाँ अरं करद्, उरुं हि राजावरुणश्चकार ) और एक दो स्थलों पर कारनामे या कृत्य के लिए करणानि (सत्या सत्यस्य करणानि वोचम् प्र ते पूर्वाणि करणानि वोचं) या कर्त्व (बहूनि मे अकृता कर्त्वानि) के रूप में।
चारण के लिए कारु और चारणगान के लिए कारा का प्रयोग मिलता है पर हाथ या किरण के लिए इसका एक बार भी प्रयोग देखने में नहीं आता। हाथी के लिए भी ऋग्वेद में करी नहीं मिलता। भो. में भी इसका इन आशयों में प्रयोग नहीं होता। हम मान सकते हैं कि हाथ और किरण के आशय में कर का अर्थविस्तार सं. के विद्वानों के शब्दकौतुक की देन है।
अपने क्रिया रूप में इसके दो स्रोत हैं। एक जल से व्युत्पन्न जो चर / कर / सर / छर और इनके लकारान्त भेदों के साथ विविध बोलियों में अपनाया गया, जल की ध्वनियों में से एक और इस कर का अर्थ हुआः 1. जल, 2. जल से किसी रूप में संबंधित (करमा, करमुआ) 3.सिंचित करना (करमोवल), 4. आवाज देना (कर्र्हावल – भैंस को पास बुलाने की आवाज) > कारा (कीर्ति गान) > कारु – चारण।
चक्र के विषय में कुछ विद्वानों की राय है कि यह ‘चर’ धातु से निष्पन्न है (मो.वि.), दूसरे इसे ‘कृ’ धातु से उत्पन्न मानते हैं। हम इसे द्विधातुक ‘चर्कर’ से व्युत्पन्न मानते हैं।
इसका दूसरा स्रोत है पत्थर पर नुकीले पत्थर के खरोंचने (किरोने) की ध्वनि जिसे कर्र /किर्र/ कुर्र के रूप में अनुकृत किया गया और जिससे हिंसा आदि से संबंधित शब्दावली का विकास हुआ। इसके स्वरभेद वाले शब्दों को एकमूलीय सिद्ध करने के लिए ‘कृ’ धातु की उद्भावना की गई। आगे के ब्यौरों में जाने की जरूरत नहीं। इन दोनों स्रोतों से निकली शब्दावली ऋग्वेद और भोजपुरी में मिलती है और इस आधार पर हम मान सकते हैं कि इनमें से वे शब्द जो सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से देवसमाज के स्तर के हों वे देववाणी से आए हैं।
पाणि
पाणि/पानि/पनि भो- में नहीं हैं. बानी/बानि/ बनिज/ बनिया मिलते हैं परन्तु ये अपने संस्कृत प्रतिरूपों के तद्भव हैं। विकास की दृष्टि से भी ये देव समाज की अपेक्षाओं से मेल नहीं खाते, इसलिए यह विनिमय और वाणिज्य के विकास के बाद की उपज है। ऋग्वेद में विभाजन, वितरण, और दानशीलता के अतिरिक्त तोड़ने, आघात करने के सन्दर्भों में इसका प्रयोग हुआ है (हिरण्य पाणि, वीळुपाणि, पृथिव्याः सानौ जङ्घनन्त पाणिभिः, सविता सुपाणिः, आदि)। इसकी उत्पत्ति भांड निर्माण के बाद की लगती है और इसका स्रोत किसी बर्तन के फूटने की ध्वनि के अनुनादों (पण् , भण्) में से एक है। सामान्य बोलचाल में यह विवाह के भड़कीले कार्डों पर छपने वाले पाणिग्रहण की कृपा से भोजपुरी में प्रवेश पा सका।
Post – 2018-07-14
कैसे दिन आ गए हैं सोचो तो
कोई तुमको बुरा नहीं कहता।
Post – 2018-07-13
समाज को कौन बाँट रहा है, क्यों बाँट रहा है, उसकी कोशिशों के बाद भी समाज को जोड़ने के लिए कौन प्रयत्न कर रहा है, ये प्रश्न बेकार हैं, क्योंकि इनका उत्तर लोग जानते है।
Post – 2018-07-12
#आइए_शब्दों_से_खेलें (19)
मनुष्य की सबसे बड़ी आकांक्षा पक्षी बनकर उड़ने की रही है। सपनों में मैं स्वयं भी कई बार कई फर्लांग तक उड़ान भरता रहा हूं। जब हम कल उस अस्थि रचना की बात कर रहे थे जिसे भोजपुरी मैं हँसुली, और अंग्रेजी में कॉलर बोन कहा जाता है, तो मुझे एकाएक इस बात का ध्यान आया की ग्रीवा के साथ क्या हंस की कल्पना नहीं की गई थी। जो समाज अपने भीतर की आत्मा को हमेशा से किसी पक्षी के रूप में कल्पित करता आया है, वह चाहे तोता हो या हंस, उसके विषय में मुझे यह दूर की कौड़ी नहीं प्रतीत हुआ।
भुजा के ऊपरी जोड़ को भोजपुरी में पँखुरा, या पाँखा/ पंखा ( पंख) कहते हैं। जानवरों के अगले पांव को भुजा या बाहु माना जाता था। ऋग्वेद मे अश्व के अगले पांवों की तुलना श्येन (बाज) के पंखों से की गई है – श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहू उपस्तुत्यं महि जातं ते अर्वन् ।। 1.163.1। इस तर्क को समझ न पाने के कारण भारतीय पुरातत्व में काम कर चुके मेरे एक मित्र इसे पूरी तरह काल्पनिक मानते हे क्योंकि रही सही कमी उसके बिखरे शृंगों (लुटुकी) से पूरी हो जाती है।
‘भुजा’ के लिए भोजपुरी में ‘बाँहि’ प्रचलित है, न की भुजा। इसका अर्थ क्या है ? वहन करने वाला? असंभव नहीं है। भार ढोने के लिए बांस के लंबे फट्ठे को बहंगा कहा जाता है। आधी बाँह के पहनावे के लिए, अधबहिंआ, बँहकट्टी, और पूरी बाँह के अगले हिस्से के लिए बँहौरी और भुजबल के लिए बाहुबल चलता है। भोजपुरी में भुजा का एक ही रूप है भूजा (भुना हुआ) जिसके लिए पश्चिमी हिन्दी में चबेना (चबाने की चीज) देखने में आता है। ऋग्वेद में भी बाहु के लिए ‘भुजा’ का प्रयोग नहीं हुआ है, केवल भोग्य पदार्थ के लिए इसका प्रयोग देखने में आता है।
हाथ के लिए ‘बाहु’ का ही प्रयोग दिखाई देता है- सुबाहु, अधिबाहुषु, बाहुभ्यां , विश्वतोबाहुः आदि । बाहु कंधे से लेकर उंगली तक के भाग के लिए प्रयोग में आता है, जबकि हाथ कोहनी से आगे के हिस्से के लिए प्रयुक्त होता है। जब बाहु के लिए हाथ का प्रयोग होता है तब उसे ‘प्रहस्त’ कहते हैं।
बाहु के लिए भुजा का देववाणी मैं प्रयोग में नहीं होता था, भोग – खाना, झेलना, कामतुष्टि, और कभी कदा भोग्य वस्तु के लिए प्रयोग होता था। संस्कृत में हाथ के लिए इसका प्रयोंग आर्थी विचलन है।
देववाणी में हाथ शब्द बाहु की तुलना में अधिक प्रचलित था, हथेली, हाथी, हथोड़ा, हाथा-, हथियार, हाथ लगा, निहत्था, हथियाना, आदि शब्द तथा हाथ आना, हाथ उठाना, हाथ हटाना, हाथ खींचना, हाथ मारना, हाथ जोड़ना, हाथ मरोड़ना,हथ लपाक, आदि मुहावरे इसके व्यापक चलन के प्रमाण हैं।
ऋग्वेद में हाथ का प्रयोग करतल (पाम) और हाथ दोनों के लिए देखने में आता है। पूषा त्वेतो नयतु हस्तगृह्य, पूषा तुम्हें यहों से हाथ पकड़ कर ले चलें, … भगः शशमानः पुरा निदः। अद्वेषो हस्तयोर्दधे। भग मैत्री के इच्छुक पुराने निंदकों को भी बिना किसी द्वेषभाव के बाहों में भर लेते हैं। ….पिता पुत्रं न हस्तयोः, जैसे पिता अपने पुत्र को दोनों हाथों में उठा लेता है, हरिवान् दधे हस्तयोर्वज्रमायसम्, घोड़े पर सवार इन्द्र ने अपने हाथों में आयसी वज्र को धारण कर रखा है, निक्तहस्तस्तरणिर्विचक्षणः (निक्त= धुला हुआ) निष्कलुष हाथों से हमें पार उतारने वाला वह विचक्षण।
‘कोहनी’ उसी श्रृंखला का शब्द है जिसका कोहान या ककुद। कुभ > कुब का अर्थ है झुकना, टेढ़ा होना (कुब्ज, कुबजा, कूबड़, कुबरी)। अंग्रेजी में घुटने के लिए ‘नी’ का प्रयोग देखकर यह भ्रम हो सकता है कि यहाँ एक ही आशय के दो शब्दों का प्रयोग है और यह मुड़ने के कारण नी कहां जाता है परंतु यह ‘नी’ लघुता के लिए प्रयुक्त हुआ है, न कि मोड़ के लिए। फिर भी यदि नी की चर्चा आ ही गई तो यह समझना होगा कि क्न/कन/ग्न/गन के अनेक अर्थों में से एक अर्थ गांठ होता है। गन्ने का नामकरण इसी आधार पर पड़ा है यद्यपि वहां दूसरा अर्थ भी लागू होता है और वह है आँख के गड्ढे का। अंग्रेजी का नी हम जानते हैं क्नी (knee) है जैसे अंग्रेजी नाे know जिसका संबंध ग्न gn या गनोस gnos से तथा उससे भी पीछे की भारतीय क्न, ग्न, ज्न और ज्ञ से है।
हाथ के कलाई से आगे के भाग के लिए देववाणी में गभ का व्यवहार होता था। ऋ. ग्राभ, भो. गहुआ जिसका अर्थसंकोच होने के बाद इसका प्रयोग उंगलियों के बीच की जगह के लिए किया जाने लगा, इसी से निकले हैं। ऋ. में यह गभस्ति के रूप में ‘कर’ की तरह किरण और हाथ दोनो के लिए प्रयुक्त हुआ है (गभस्तिपूतं भरत श्रुतायेन्द्राय सोमं यज्यवो जुहोत ।।2.14.8, । एक स्थल पर इसका प्रयोग पाणि केसाथ हुआ है – प्रथमभाजं यशसं वयोधां सुपाणिं देवं सुगभस्तिमृभ्वम् ।, इमा गिरः सवितारं सुजिह्वं पूर्णगभस्तिमीळते सुपाणिम् ।
संस्कृतीकरण के चलते गह में र-कार का प्रवेश हो गया और फिर ऋकार दूर कैसे रहता। इस तरह ग्रह, गृह, ग्राह, आदि के सैकड़ों शब्द बने जिससे आप परिचित हैं। अन्नग्रहण के सादृश्य से ग्रहण ने ग्रास का रूप लिया और फिर ग्रास, घास, आदि की एक नई शब्दशाखा फूट पड़ी।
करतल को हाथ से जोड़ने वाले स्थल को ‘कलाई़’, ‘कल्ला’, ‘गट्टा’, ‘पहुंचा’ आदि नामों से जाना जाता है। संस्कृत में इसके लिए एक अन्य शब्द है मणि, परंतु उसका हिंदी में प्रयोग नहीं होता। जो शब्द सर्वविदित हैं उनके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, परंतु यह बताना जरूरी है कि पहुंचा में बाहु के सघोष वर्ण का अघोषीकरण हुआ है।
रोचक बात है अधिकांश अलंकार जोड़ों पर ही पहने जाते हैं चाहे वह गला हो या कलाई, कटि हो या पांव का टखना। क्या इसका एक कारण यह हो सकता है कि अलंकरण का प्रधान लक्ष्य सुरक्षा था और पुरुषों द्वारा भी आभूषण पहने जाने का कारण यही था। ऋग्वेद में हाथ और पांव दोनों में पहने जाने वाले वलय का नाम ‘खादि’ था। इस खादि को हड़प्पा की नर्तकी के हाथों और पांवों में देखा जा सकता है। गुजरात और राजस्थान में आज भी महिलाएं उस तरह की कड़ा और गोड़हरा पहने दिखाई पड़ सकती है।
हाथ का एक आभूषण ‘कंगन’ था जिसके लिए ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ अर्थात जो सामने है उसे देखने के लिए शीशे का सहारा लेने की क्या जरूरत, का मुहावरा प्रचलित है। इसी पर आधारित है विरोधों की निकटता दिखाने वाला कर-कंकण न्याय । बच्चों के हाथ में पहनाए जाने वाले कंगन को आधारित है ‘गुजहा’ कहा जाता है। ‘गुजहा’ का अर्थ है गोलाकार।
एक दूसरा शब्द हाथ के उस हिस्से के लिए, जिसे अंग्रेजी में पाम कहा जाता है, गदोरी है, जिसका अर्थ मांसल है । माप के लिए हाथ से काम लेते थे, इसके कारण हाथ का एक नाम मान था (सद्येव प्राचो विमिमाय मानैर्वज्रेण खान्यतृणन्नदीनाम् )। यही अंग्रेजी और लातिन आदि में मैनम, मैनस, मैनिपुलेट आदि का जनक बना। अं. हेंड हस्त से व्युत्पन्न है, यह आप को पता है। From Proto-Indo-European *meh₂- (“timely, opportune”); hence also immanis (“vast, monstrous”).विक्शनरी आर्ग.
Post – 2018-07-12
#आइए_शब्दों_से_खेलें (19)
मनुष्य की सबसे बड़ी आकांक्षा पक्षी बनकर उड़ने की रही है। सपनों में मैं स्वयं भी कई बार कई फर्लांग तक उड़ान भरता रहा हूं। जब हम कल उस अस्थि रचना की बात कर रहे थे जिसे भोजपुरी मैं हँसुली, और अंग्रेजी में कॉलर बोन कहा जाता है, तो मुझे एकाएक इस बात का ध्यान आया की ग्रीवा के साथ क्या हंस की कल्पना नहीं की गई थी। जो समाज अपने भीतर ही आत्मा को तो हमेशा से किसी पक्षी के रूप में कल्पित करता आया है चाहे तोता हो या हंस, उसके मामले में मुझे यह दूर की कौड़ी नहीं प्रतीत हुआ। भुजा के ऊपरी जोड़ को भोजपुरी में पँखुरा, या पंखा कहते हैं। आश्चर्य इस बात पर है कि जानवरों के अगले पांव को भुजा या बाहु माना जाता था। अश्व के अगले पांवों की तुलना श्येन (बाज) के पंखों से की गई है – श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहू उपस्तुत्यं महि जातं ते अर्वन् ।। 1.163.1। इस तर्क को समझ न पाने के कारण भारतीय पुरातत्व में काम कर चुके मेरे एक मित्र इसे पूरी तरह काल्पनिक मानते हे क्योंकि रही सही कमी उसके बिखरे शृंगों (लुटुकी) से पूरीहो जाती है।
भुजा के लिए भोजपुरी में ‘बाँहि’ प्रचलित है, न की भुजा। इसका अर्थ क्या है ? वहन करने वाला? असंभव नहीं है। भार ढोने के लिए बांस के लंबे पट्ठे को बहंगा कहा जाता है। आधी बाँह के पहनावे के लिए, अधबहिंआ, बँहकट्टी, और पूरी बाँह के अगले हिस्से के लिए बँहोरी और भुजबल के लिए बाहुबल चलता है। भोजपुरी में भुजा का एक ही रूप है भूजा (भुना हुआ) जिसके लिए पश्चिमी हिन्दी में चबेना (चबाने की चीज) चाहे वह लाक्षणिक ही क्यों न हो (भुजि डरलऽ) । ऋग्वेद मैं भी ‘भुजा’ का बाहु के लिए प्रयोग नहीं हुआ है, केवल भोग्य पदार्थ के लिए पुरुभुजा आदि का का प्रयोग देखने में आता है।
हाथ के लिए बाहु का ही प्रयोग दिखाई देता है- सुबाहु, अधिबाहुषु, बाहुभ्यां , विश्वतोबाहुः आदि । बाहु कंधे से लेकर उंगली तक के लिए प्रयोग में आता है, जबकि हाथ कोहनी से आगे के हिस्से के लिए प्रयुक्त होता है। जब बाहु के लिए हाथ का प्रयोग होता है तब उसे प्रहस्त कहते हैं।
बाहु के लिए भुजा का देववाणी मैं प्रयोग में नहीं होता था, भोग – खाना, झेलना, कामतुष्टि, और कभी कदा भोग्य वस्तु के लिए प्रयोग में आता था। संस्कृत में हाथ के लिए इसका प्रयोंग आर्थी विचलन है।
हाथ शब्द बाहु से भी अधिक प्रचलित था, हथेली, हाथी, हथोड़ा, हाथा-(पानी उदहने का कृषि उपकरण), हथियार, हाथ लगा, हथियाना, आदि शब्द तथा हाथ आना, हाथ उठाना, हाथ हटाना, हाथ खींचना, हाथ मारना, हाथ जोड़ना, हथ लपाक, आदि मुहावरे इसके व्यापक चलन के प्रमाण हैं।
ऋग्वेद में हाथ का प्रयोग करतल (पाम) और हाथ दोनों रूपों में देखने में आता है। पूषा त्वेतो नयतु हस्तगृह्य, पूषा तुम्हें यहों से हाथ पकड़ कर ले चलें, … भगः शशमानः पुरा निदः। अद्वेषो हस्तयोर्दधे। भग मैत्री के इच्छुक पुराने निंदकों को भी बिना किसी द्वेषभाव के बाहों में भर लेते हैं। ….पिता पुत्रं न हस्तयोः, जैसे पिता अपने पुत्र को दोनों हाथों में उठा लेता है, हरिवान् दधे हस्तयोर्वज्रमायसम्, घोड़े पर सवार इन्द्र ने अपने हाथों में आयसी वज्र को धारण कर रखा है, निक्तहस्तस्तरणिर्विचक्षणः निष्कलुष (निक्त =धुला हुआ) हाथों से हमें पार उतारने वाला वह विचक्षण।
कोहनी उसी श्रृंखला का शब्द है जिसका कोहान या ककुद। कुभ > कुब का अर्थ है झुकना, टेढ़ा होना (कुब्ज, कुबजा, कूबड़, कुबरी)। अंग्रेजी में घुटने के लिए ‘नी’ का प्रयोग देखकर यह भ्रम हो सकता है यह मुड़ने के कारण नी knee कहा जाता है परंतु यहाँ ‘नि’ लघुता के लिए प्रयुक्त हुआ है न कि मोड़ के लिए। फिर भी यदि नी की चर्चा पाई गई तो यह समझना होगा की क्न/कन/ग्न/गन के अनेक अर्थों में से एक अर्थ गांठ होता है गन्ने का नामकरण इसी आधार पर पड़ा ह, यद्यपि वहां दूसरा अर्थ भी लागू होता है और वह है गड्ढे का। अंग्रेजी का नी हम जानते हैं क्नी (knee) है जैसे अंग्रेजी नाे know जिसका संबंध ग्न gn या गनोस gnos से तथा उससे भी पीछे की भारतीय क्न, ग्न, ज्न और ज्ञ से है।
हाथ के कलाई से आगे के भाग के लिए देववाणी में संभवतः गह या गभ का व्यवहार होता था। ऋ. ग्राभ, भो. गहुआ जिसका अर्थसंकोच होने के बाद इसका प्रयोग उंगलियों के बीच की जगह किया जाने लगा, इसी से निकले हैं। ऋ. में यह गभस्ति के रूप में कर की तरह किरण और हाथ दोनो के लिए हुआ है (गभस्तिपूतं भरत श्रुतायेन्द्राय सोमं यज्यवो जुहोत ।।2.14.8, । एक स्थल पर इसका प्रयोग पाणि केसाथ हुआ है – प्रथमभाजं यशसं वयोधां सुपाणिं देवं सुगभस्तिमृभ्वम् ।, इमा गिरः सवितारं सुजिह्वं पूर्णगभस्तिमीळते सुपाणिम् ।
संस्कृतीकरण के चचलते गह में र-कार का प्रवेश हौ गया और फिर ऋकार दूर कैसे रहता। इस तरह ग्रह, गृह, ग्राह, आदि के सैकड़ों शबह बने जिससे आप परिचित हैं। अन्न ग्रहण के सादृश्य से ग्रहण ने ग्रास का रूप लिया और फिर ग्रास, घास, आदि की एक नई शब्दशाखा फूट पड़ी।
करतल को हाथ से जोड़ने वाले स्थल को कलाई़, कल्ला, गट्टा, पहुंचा आदि नामों से जाना जाता है। संस्कृत में इसके लिए एक अन्य शब्द है मणि, परंतु उसका हिंदी में प्रयोग नहीं होता। जो शब्द सर्वविदित हैं उनके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है परंतु यह बताना जरूरी है कि पहुंचा में बाहु के सघोष वर्ण का अघोषीकरण हुआ है।
रोचक बात है अधिकांश अलंकार जोड़ों पर ही पहने जाते हैं चाहे वह गला हो या कलाई, कटि हो या पांव का टखना। ऋग्वेद में हाथ और पांव दोनों में पहने जाने वाले वलय का नाम खादि था। इस खादि को हड़प्पा की नर्तकी के हाथ और पांव में देखा जा सकता है गुजरात और राजस्थान में आज भी महिलाएं उस तरह की चूड़ियां पहले दिखाई पड़ सकती है।
हाथ का एक आभूषण कंगन था जिसके लिए हाथ कंगन को आरसी क्या अर्थात जो सामने है उसे देखने के लिए शीशे का सहारा लेने की क्या जरूरत का मुहावरा प्रचलित है। इसी पर विरोधों की निकटता दिखाने के लिए कर-कंकण न्याय आधारित है। बच्चों के हाथ में बनाए जाने वाले कंगन को गुजहा कहा जाता है। गुजहा का अर्थ है गोलाकार
एक दूसरा शब्द हाथ के उस हिस्से के लिए जिसे अंग्रेजी में पाम कहा जाता है गदोरी का अर्थ मांसल है ।
Post – 2018-07-12
रिन्दों को दोस दे न, नजाकत समझ वाइज
पत्थर जो न होते तो तू मारा नहीं जाता ।