Post – 2017-07-11

तुक-बेतुक

जवानी के दिन तो जवानी को दिन थे
न मेरे थे वे मन के मानी के दिन थे।
वे मस्ती के और फाकामस्ती के दिन थे
वे सपनों के दिन थे कहानी दिन थे।
वे घुटने तड़पने बहकने के दिन
बद हवासी के दिन बदगुमानी के दिन थे।
वे मरने के लाखों बहानों के दिन थे
रकीबों की भी मेह्रबानी के दिन थे।
कई राज थीं खोलतीं झुक के पलकें
तुम्हारे भी वे आनाकानी के दिन थे।
सरे राह कुछ गुल खिलाने के दिन थे
जवानी के दिन छेड़खानी के दिन थे।
वे दिन देखिए तो हवा हो गए हैं
मगर जब तलक थे जवानी के दिन थे ।

Post – 2017-07-10

संस्कृत वर्णमाला का विकास

किसी भी चीज को समझने के दो तरीके हैं। एक दैवी उत्पत्ति जो सभी क्षेत्रों में डार्विन से पहले दुनिया के सभी समाजों में अपने अपने ढंग से चलता था। इसे महत से तुच्छतर के क्रम में तुच्छतम तक के ह्रास और पतन का सिद्धान्त कह सकते हैं। दूसरा डार्विन के बाद से तुच्छतम से महत का क्रमिक उद्विकास ।

चार्ल्स डार्विन ने अपनी विकासवाद की पुस्तक १९५९ में प्रकाशित की। कुछ समय घबराहट में बीते और फिर धीरे धीरे इसे स्वीकृति मिली। डार्विन की मृत्यु १८८२ में हुई । हाल यह कि मैक्समूलर जैसा व्यक्ति डार्विन के पुत्र से विकासवाद के सिदधान्त के विरोध में बहस कर रहा था।

इसका फलितार्थ यह कि संस्कृत के आतंक, बाइबिल की सृष्टिकथा से तालमेल बैठाते हुए उन्नीसवीं शताब्दी के सास्युर -पूर्व का भाषाविज्ञान प्राकवैज्ञानिक युग का भाषाविज्ञान है जिसकी विश्वसनीयता सन्दिग्ध है। इसमें ही ध्वनि नियम और आद्य रूपों की पुनर्रचना और आद्य भारोपीय का पूरा ढांचा तैयार हो गया, इसलिए वह पूरा तामझाम ही उल्टा है । इसका सही पाठ इसका उल्टा पाठ है।

मार्क्स ने हीगेल को उल्टा भले खड़ा कर दिया हो उनका अधिकांश लेखन डार्विन पूर्व है, इसलिए विज्ञान की दुहाई देने के बाद भी अवैज्ञानिक या प्राग्वैज्ञानिक है।

मार्क्स की याद तो हीगेल को सिर के बल खड़ा करने के मुहावरे से आ गई। कहना यह था कि भाषाविज्ञान को सही करने के लिए पहले की अवधारणाओं को अमान्य करने की, परन्तु उनके द्वारा जुटाई गई सामग्री का आदर करते हुए, उसे नई व्यवस्था के अनुरूप उपयोग में लाने की एक नई चुनौती है। यह है महत या परिनिष्ठित भाषा के क्षरण और ह्रास से बोलियों और उपबोलियों का आविर्भाव की अवधारणा। इसे उलट कर इसका पाठ, अर्थात् तथाकथित उपबोलियों से, जो स्वत: बोलियां या उपबोलियां न थीं, अपितु भाषाएं थीं, क्रमिक उत्थान से मानक भाषाओं का जन्म नहीं, समायोजन और पुनर्गठन हुआ है ।

इस विषय में सास्युर की दृष्टि साफ न थी, ऐसा मुझे लगता है। पर उन्हे इसी दौर मे हुए रोमांस भाषाओं के अध्ययन से, जो संभव है डार्विन से प्रेरित रहा हो, अपनी दृष्टि मिली थी जिसमें यह तथ्य भी सामने आया था कि मानक भाषाएं बोलियों में से किसी के, किन्हीं कारणों से क्रमिक उत्थान से गठित हुई हैं ।
क्रमश:

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Post – 2017-07-10

कुछ नीतिकथाएं होती हैं जिन्हें हमें बचपन में ही सिखाया जाता है कि जिन्दगी में मार्गदर्शन करेंगी परन्तु बड़े हो कर हम जिन्हें भूल जाते हैं या याद भी रहीं तो यह मान लेते हैं कि बचपन में सिखाई बातें बच्चों के काम की ही होती हैं। ऐसी ही एक कथा भेड़िया आया भेड़िया आया की है। नसीहत के बाद भी जब भेड़िया नहीं आया था हमने चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘भेड़िया आया भेड़िया आया” और भेड़िये को लगा हमें कोई बुला रहा है सो चला आया। पर यह ऐसा भेड़िया था जो लोगों को आदमी जैसा दीख रहा था. जब चला आया तो चीखना शूरू कर दिया, ‘‘भेड़िया भेड़िया दीखता नहीं पर है भेड़िया ही, अब हमें खा जाएगा।’’ लोग प्रतीक्षा करते रहे अब खाएगा कि तब, परन्तु उसने शोर मचाने वालों को भी महज सूंघ कर छोड़ दिया। ”
अब ललकारने लगे, “तूने तो हमारी साख ही खत्म कर दी, आ जल्दी मुझे खा जिससे लोगों को विश्वास दिला सकूँ की तू सचमुच भेड़िया है.”
तीन साल से यही शोर. थमने का नाम ही नहीं ले रहा. भेड़िया बहरा तो नहीं!

Post – 2017-07-09

बुद्धि के आढ़ती

इस बार मैने ही उसे घेरा, ‘‘अजीब बात है यार, ललकारते हो, इस बार नहीं छोड़ूगा, अब बचकर जाने न दूंगा, और जब समझाता हूं तो तुम्हारा सिर फटने लगता है। यदि मेरी बात सही लगती है, उसका जवाब नहीं सूझता तो उसे मान लेना चाहिए या जीतने हारने की उठापटक में अपना सिर फोड़ लेना चाहिए?’’

उसने कोई जवाब न दिया तो सहम गया, ‘‘क्या सरदर्द अभी तक जारी है।’’

‘‘सिर दर्द अगर एक हो तो उसके उपाय हैं, वह होता भी अस्थायी है, पर जिस सिरदर्द के साथ बैठा हूं उससे निजात पाने के लिए तो कोई दवा बनी नहीं है।’’

मेरी जान में जान आई, अब उसका लिहाज करने की जरूरत नहीं थी, ‘‘जो लोग तुमसे भिन्न राय रखते रहे हैं उनकों तुम उपेक्षा और लानतों से ही अन्धलोक में पहुंचा देते रहे हो, उस खतरे को जानते हुए भी मैं तुमसे लगातार उलझता रहा हूं पर मेरे पास खोने को कुछ न था, इसलिए पाना ही पाना था और तुम्हें गणित के नियम से खोना ही खोना था। तुम मुझसे सहमत हो कर खोने और शिफर होने की दुर्गति से तो बच सकते थे!’’

वह चुप रहा, ‘‘देखो सामना होने पर जीत का एक ही रास्ता खुला रहता है, सत्य को नतशिर हो कर स्वीकार करना। तुम जिस विचारधारा से जुड़े हो, वह विचारधारा होती तो वह भी यही करती। वह विश्वासधाराा है यह मैं लगातार याद दिलाता आ रहा हूं। विचारधारा हो तो उसमें विचार की छूट रहेगी। विश्वास है तो असहमत लोगों से परहेज और घृणा से काम लिया जाएगा। तुम किसी सिरे से जांचो, नतीजा उत्साहवर्धक नहीं मिलेगा। इसलिए कई बार मुझे आश्चर्य इस बात पर होता है कि इतने सारे प्रखर मेधा और प्रतिभा संपन्न लोग सदाशयताा के दबाव में इतने लंबे समय तक मूर्ख बनाए जाते रहे और भेड़ बकरियों की तरह इस्तेमाल किए जाते रहे। सामी मजहबों ने एक बहुत सुन्दर उपमा दी है, धर्मपराणय लोग, अपने विश्वास के कारण भेड़ बकरियों जैसे बना दिए जाते हैं और उनका देष्टा चरवाहा बन जाता है। यही कम्युनिज्म के साथ भी हुआ।“

‘‘तुम बकते रहो, मैं किसी बात की नोटिस ही नहीं लेता।’’

‘‘तुम्हारे ध्यान न देने से बात दब तो नहीं जाती। यह तो शुतुरमुर्ग जैसा बचाव हुआ। इसका सहारा तुमने हमेशा लिया है और इसके अनुपात में ही लोग यह मान कर कि तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं है, उनकी बात सुनने और मानने लगे जिनकी तुम नोटिस नहीं लेते। क्या इतनी समझ भी न रह गई है तुम लोगों में?’’

‘‘क्या कहूं, मुझे जो कहना है वह तो तुम खुद कह दे रहे हो। तुम मान चुके हो कि सारे प्रखर मेधा और प्रतिभा के लोग जिस विचार से जुड़े हैं वह मेरा विचार है। निष्कर्ष यह कि तुम मूर्खो के साथ हो। क्या हम मूर्खों को सिर चढ़ाते फिरेंगे?’’

“ऐसा भूलकर भी न करना। तुम्हारी रीढ़ इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह तुम्हारे सिर का बोझ भी नहीं उठा सकती। कोई और बोध या जिम्मेदारी तो उठा ही नहीं सकती। यह तो वे लोग हैं जिन्हें तुम औसत दिमाग का कह कर हंसते हो, जड़ पदार्थों का भी बोझ संभाल कर चलते हैं और उनके इस चलने से ही दुनिया चलती है। तुम तो दुनिया को गर्क करने वालों में हो, तुम्हें यह रास न आएगा।’’

वह झुंझला गया, ‘‘अपने दिल पर हाथ रख कर कहो, क्या वाम से जुड़े सभी लोग दुनिया को बिगाड़ना चाहते हैं? और दक्षिण जो पूरी दुनिया में विचार की संकीर्णता के लिए जाना जाता रहा है, वह दुनिया को बनाना चाहता है?’’

‘‘सदाशयता को उनकी सबसे बड़ी आकांक्षा तो मैं पहले ही कह आया हूं यार! यह कैसे कह सकता हूं कि वे दुनिया का अहित करना चाहते हैं। मैं तो यह कह रहा था कि उनके पास सब कुछ है, प्रतिभा, बौद्धिक प्रखरता, सदाशयता फिर भी वे इनमें से किसी का उपयोग नहीं करते, या जिस रूप में करते हैं उसका नतीजा यह कि दुनिया का जितना अहित इनके हाथों हुआ है, उतना उन कमअक्लों से भी नहीं हुआ है जिनको इनकी सूझ और समझ की जरूरत है, परन्तु सबसे पहले तो यह उनकी जरूरत है कि उनके पास जो कुछ है उसके महत्व को जानें और उसका स्वतन्त्र रूप में उपयोग करें।

“वाम पंथ एक भावधारा है और दक्षिण पंथ एक भिन्न भावधारा है। विचार दोनों में नदारद है। जरूरत संवाद के द्वारा उसे ही जाग्रत करने की है। यही मैं लगातार कहता आया हूं। किसी के कहने पर मत चलो। अपने दिमाग से काम लो। विडंबना ही है जिके पास बहुत अधिक दिमाग है वे उसे तिजौरी में बन्द करके बुद्धि के आढ़ती होने का दावा कर रहे हैं।’’

Post – 2017-07-08

अपराधी कौन ?(2)

“हाँ अब बताओ! भागने न दूँगा अबकी बार।”
“मैं स्वयं चाहता हूँ तुम इसे समझो। इससे जुड़े तीन पहलू हैं। पहला भावना और विवेक से जुड़ा. दूसरा इसके क्रिया-कलाप से जुड़ा, और तीसरा इसके इतिहास से जुड़ा।

एक कागज़ है, हमने फाड् कर फ़ेंक दिया। उसे कुचल दिया। उसपर थूक दिया. रोज करते हैं। कोई ध्यान तक नहीं देता है। एक दूसरा कागज है जिसके फटने की अफवाह पर दंगे हो जाते हैं क्योंकि प्रचारित किया जाता है कि वह कुरान का पन्ना था। उत्तेजना में कोई यह पता लगाने की कोशिश नहीं करता कि सचमुच ऐसा हुआ भी या नहीं। कोई तर्क नहीं करता कि कुरान शरीफ की आयते मुस्लमान के लिए मान्य है., किताब की वह पूजा नहीं करता, वरना मूर्तिपूजा हो जाएगी। कोई यह समझा नही सकता कि जिसने फाड़ा है उससे एक की जगह सौ पोथियों की मांग करें। प्रश्न किताब का रह ही नहीं गया। यह किसी मुस्लमान द्वारा हुआ हो तो ध्यान भी न दिया जाय। परन्तु यदि किसी गैरमुस्लिम ने ऐसा किया है तो उसका इरादा मुसलमानों की भावनाओं को आहत करने का है, यह जातीय अपमान है और इसको सहन नहीं किया जा सकता।

कोई मुझसे पूछे तो मैं कहूंगा यह व्याख्या सही है। इस पर क्या किया जाना चाहिए इस पर मेरी राय दंगा करने वालों से थोड़ी अलग होगी। पहली यह कि पता लगाओ ऐसा सचमुच हुआ है या नहीं। यदि हाँ तो उस व्यक्ति को पकड़ो और उसे इसकी सजा दो/ दिलवाओ। यदि पकड़ नहीं सकते तो सरकार से मांग करो कि वह उसे पकड़े और दण्डित करे और यदि पता चले कि सरकार कुछ नहीं कर रही तो उस सरकार के विरुद्ध आंदोलन करो। परन्तु इस आदर्श आचार का पालन किसी समाज में होते देखा नहीं गया।

“गाय और गोजाति से जुड़े सवाल को उसके भौतिक पक्ष में वहाँ नहीं समेटा जा सकता जहाँ इसे सचेत रूप में या हेकड़ी में हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने के लिए, योजनाबद्ध रूप में किया गया हो। यह, तुमने ठीक कहा, “आ बैल नहीं, आ सांड मुझे मार” की दावत देना है और ऐसी हालत में सांड अगर मारने लगे तो दोष सांड को नहीं उसे दावत देने वाले को देना होगा।”

“यह सब कुछ भाजपा के सत्ता में आने के बाद ही होना था।”

“यह सवाल तुम मुझसे मत करो। . अपने आप से करो कि यह काम तुम कबसे करते आये हो, इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी , और उससे तुमने क्या सीखा ? यदि नही सीख पाते तो तुम्हारी बुद्धि कहाँ रहती है? किसके काम आती है? जिसके काम आती है उसे देश और समाज की चिंता है या दोनों को बर्वाद करने की कीमत पर केवल अपनी गद्दी और लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदलने की आतुरता है? दोषी कौन है और तुम दोष किसे दे रहे हो?”

“तुम्हारा दिमाग क्या है यार। यह सब हम करा रहे है?”

“तुम नही करा रहे थे। तुम्हारा भाजपा द्रोह करा रहा था। तुम्हारी घबराहट करा रही थी। कराने वालों की दुर्गति, और उससे उबरने के लिए लगाया जाने वाला दांव जुगत और पैसा करा रहा था। जो हो रहा था तुम्हारी शह और सलाह और सहयोग से हो रहा था पर तुम उनके साथ थे क्योंकि गोमांस को लेकर हिन्दू समाज को आहात और अतिसंवेदी बनाने का काम तुमने आरम्भ किया था।”

“अरे भाई अब तो ऑंखें खोलो । अब तो छत्तीसगढ़ में भाजपा का बन्दा पकड़ा भी जा चुका है।”

“भाजपा के कड़े सन्देश के बाद भी ऐसा करने वाला भाजपा में घुस कर तुम्हारा काम करने वाला बन्दा हुआ, यह क्यों नहीं समझते? फिफ्थ कॉलमिस्ट, पांचमार्गी, भितरघाती ये सारे तुम्हारे मुहावरे और तुम्हारी रणनीती में आते हैं। उस व्यक्ति को कुछ करते नही पाया गया, वह वहां देखा गया था और पहचान लिया गया था और उसे भाजपा ने भी पहचान लिया था और जेल में डाल दिया। और अब तुमने जान लिया कि लुटेरों और तस्करों की जिस जमात को भड़का कर तुम यह उपद्रव करा रहे थे वह आगे कारगर न होगा। इसीलिए कह रहा था अब आगे ऐसा नहीं होगा, इसलिए इस मसले को भूल जाओ। अब जो करना होगा गुंडे नहीं करेंगे, कानून करेगा इस लिए वे पार्टिया भी न होंगी जिनसे तुम लोगों ने यह अभियान शुरू किया था।“

“समझ में नहीं आता कि मैं अपना सर फोड़ लूँ या तुम्हारा फोड़ दूँ!”

“ऐसी नौबत आ ही जाय तो मेरा सर ही फोड़ना । इसमें से कुछ निकलेगा तो सही। अपना फोड़ोगे तो खप्पर ही अलग होगा और राजनीति के नाम पर शवसाधना करने वालों के ही काम आएगा । लेकिन अभी धीरज से सुनो। तीसरा पहलू तो अभी चर्चा में आया नहीं।”

उसने अपने सर पर थप्पड़ मारा और मुंह लटका कर बैठ गया। पता नहीं मेरी बात सुनने की स्थिति में था भी या नहीं। वह सुने या न सुने, मुझे तो अपनी बात पूरी करनी ही थी,
“देखो कुछ बातें होती हैं जो मजहबी न होकर सांस्कृतिक होती हैं, परन्तु समुदाय विशेष या सम्प्रदाय विशेष के उससे जुड़ाव के कारण ऐसा भरम पैदा करती हैं!”

लगभग आठ सौ साल तक इस देश में मुसलमानों का प्रभुत्व रहा है. ब्रितानी शासन से कई गुना। राजा का वेश, रूचि, जीवनशैली, भाषा सबकुछ इतर जनों के लिए अनुकरणीय होता है और इस तरह सांस्कृतिक श्रेष्ठता और कनिष्ठता का एक अलिखित क्रम बनता है. १- राजा और राज परिवार, २. अमला वर्ग, ३. राजा के धर्मबंधु ४. इनके अनुसार अनुकूलित होने वाले इतर जान; ५. इतर जनों में किसी भी कारण से अपनी श्रेष्ठता का दावा करने वाले लोग, ६. इन सभी से वंचित जनसमाज। इन वंचितों को ऊपर की श्रेणियों में आने वाले सभी लोग तुच्छ समझते हैं और यदि इनका बाहुल्य सम्प्रदाय विशेष से हो तो पहली तीन कोटियों के लोग उस समाज को ही तुच्छ मानने तो तत्पर होते हैं। हिन्दू समाज के प्रति मुसलामानों का एक प्रकट-गोपन परन्तु स्थाई भाव यही रहा है। और इस मामले में हिंदू होते हुए भी कायस्थों का आकलन मुस्लिम आकलन के अधिक निकट पडेगा, इसलिए हमारा सुझाव है कि इस मजहबी नहीं सांस्कृतिक नजरिये से देखना अधिक सही होगा।

इससे अहंता के दो प्रतिस्पर्धी शिविर बनते हैं जो अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानते और दूसरे से मनवाना चाहते हैं और वैसा न होने पर उसे नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं।
ब्राह्मणों और उनकी जीवनशैली और मूल्य प्रणाली से मुस्लिम संभ्रांत वर्ग की नफरत मध्य काल से चली आई है और आधुनिक काल में यह ईरानी अरबी संस्कृति और भारतीय संस्कृति और कुछ और बढ़ कर पश्चिमी और पूर्वी सभ्यता के टकराव का रूप ले लेती है जिससे असहमत होने वाला व्यक्ति मुस्लिम समुदाय में अभी तक नही तलाश पाया, इस पर पर्दा डालने वाले अवश्य मिल जाएंगे। इतिहासकार का काम परदों का मूल्याङ्कन करना नहीं होता। अब इसके सामाजिक…”

मैं अपना वाक्य पूरा करता इससे पहले ही उठ खड़ा हुआ।

“क्यों क्या हुआ?”

“माईग्रेन का दौरा ।” उसने अपना सर एक ओर को झुंका रखा था और हाथ की मुट्ठी से उसे दबाने की कोशिश कर रहा था। सर फटने के मुहावरे को सचमुच चरितार्थ कर देगा यह तो पहले सोचा ही न था.

Post – 2017-07-07

अपराधी कौन ?

“भई, मान गया तुम्हारा लोहा।” उसने दूर से ही मुझे देख कर दोनों हाथ जोड़ लिए थे, “इतनी बार इतने कोनों से घेरना चाहा, और तुम हर बार बच कर निकल गए।”

मैं सचमुच समझ नहीं पाया कि उसका इशारा किस बात की और था, पूछा किस घेरेबंदी की बात कर रहे हो मैं तो किसी भी समस्या से बचने की जगह उलटे उसकी चीर-फाड़ करते हुए इतना बढ़ा देता हूँ कि कई बार यह समझ में नहीं आता कि इससे बाहर निकलूं भी तो कैसे और तुम बच कर निकलने की बात कर रहे हो। यह कला तो मुझे तुम लोगों से सीखनी है।”

“हम तो अब एक ही कला में पारंगत रह गए हैं। इसे ‘आ बैल मुझे मार कला’ कह सकते हो।

“तुम कहते हो तो ठीक ही कहते होंगे, पर मैं किस मुद्दे से कब बच कर निकला?”

“वही जो गोरक्षकों की गुंडागर्दी का मामला था।”

“हमारी दोस्ती के पचास साल तो हो ही गए होंगे।”

“पचपन, बासठ से सत्रह तक, पचपन “।

“चलो, तुमने उसमे पांच साल का और इजाफा कर दिया। इतनी पुरानी दोस्ती को मैं तोड़ना नहीं चाहता। अकेला मैं हूँ जो यह जानता है कि इसे कौन करवा रहा था। ऎसी बातें समझ ली जाती हैं पर कही नहीं जातीं। मुहाविरे में तो सिर्फ दीवारों के कान होते हैं, पर सचाई यह है कि हवा के भी कान होते हैं। एक बार तुम्हारा नाम जबान पर आ गया तो पुरे ज़माने में शोर मच जाएगा। तुम आबरू गँवाओगे और मैं एक इतना पुराना दोस्त,जिसके लब इतने शीरीं हैं कि गालिया देता है तो भी बदमजा नहीं होता।”

वह भड़क उठा, आवाज तो ऊँची होनी ही थी, “मैं कराता रहा हूँ यह सब? दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?”

“ऐसी बातें ऊँची आवाज में नहीं की जातीं. लोग मानने लगे हैं की पेड़ पौदों के भी कान होते हैं।
ऊँचा बोलो तो वे सुन भी लेते हैं और तनिक भी हवा चली तो फुसफुसाते भी हैं। मैं जो कहता हूँ उसे ध्यान से सुनो। उसके बाद तुम जो भी कहोगे मैं चुपचाप सुन लूँगा।”

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इसका क्या जवाब दे ।

“तुम मेरे साथ टहलते हो, मुझसे बातचीत करते हो तो देखने वालों को यह भरम होगा की तुम्हारी जानकारी अच्छी तो होगी ही। ऊँचा बोलोगे तो वे समझ जायेगे कि तुम्हारा इतिहास ज्ञान गुजरात तक पहुंचता है, उसके अलावा तुम्हे ठीक उससे पहले के गोधरा तक का ज्ञान नहीं, और वर्तमान ज्ञान केवल गोरक्षकों की गुंडा गर्दी तक सिमट कर रह जाता है और किसी चीज का ज्ञान ही नहीं। तुम्हारी बौद्धिक मृत्यु तो इसके साथ ही हो जायेगी, जिसे मैं सहन न कर पाऊँगा। मैं तो जानता हूँ, तुम परले दर्जे के बेवकूफ नहीं हो, दुनिया में तुमसे भी बड़े बेकूफ खोजने पर जरूर मिल जायेंगे, पर दूसरों को कैसे समझाऊंगा, जब वे कहेंगे उन्होंने अपने कानों जो सुना है उसके आधार पर अपनी राय बनाई है।”

वह कुछ बोलने को हुआ तो मैंने बरज दिया, “अब राहत की बात यह है कि आगे से यह गुंडागर्दी बंद हो जाएगी, इसलिए इसको लेकर अधिक चिंतित होने की भी ज़रूरत नहीं।”

उस बदहवासी में भी वह जोर से हंसा, “अब समझ में आया। अब तक जो होता आ रहा था उसमें तुम्हारी भी मिली भगत थी। “

“मैं तुम्हारे मज़ाक को झेल जाऊँगा, पर जब यह उजागर होगा कि गाय के प्रति हिन्दू संवेदनशीलता का दुरूपयोग करते हुए जो कुछ गुंडागर्दी के स्तर पर हो रहा था उसे तुम लोग करा रहे थे तो कहीं मुंह दिखाने लायक रहोगे? खैर, जब मुंह मुहाना बन गया हो तो मुंह दिखने या दिखाने का प्रश्न ही अतिप्रश्न है।”

उसकी समझ में न आया कि मैं कह क्या रहा हूँ । मैंने भी उसे सस्पेंस में रखते हुए कहा, “यह तुम्हे कल समझाऊँगा ।”

Post – 2017-07-07

“भई, मान गया तुम्हारा लोहा।” उसने दूर से ही मुझे देख कर दोनों हाथ जोड़ लिए थे, “इतनी बार इतने कोनों से घेरना चाहा, और तुम हर बार बच कर निकल गए।”

मैं सचमुच समझ नहीं पाया कि उसका इशारा किस बात की और था, पूछा किस घेरेबंदी की बात कर रहे हो मैं तो किसी भी समस्या से बचने की जगह उलटे उसकी चीर-फाड़ करते हुए इतना बढ़ा देता हूँ कि कई बार यह समझ में नहीं आता कि इससे बाहर निकलूं भी तो कैसे और तुम बच कर निकलने की बात कर रहे हो। यह कला तो मुझे तुम लोगों से सीखनी है।”

“हम तो अब एक ही कला में पारंगत रह गए हैं। इसे ‘आ बैल मुझे मार कला’ कह सकते हो।

“तुम कहते हो तो ठीक ही कहते होंगे, पर मैं किस मुद्दे से कब बच कर निकला?”

“वही जो गोरक्षकों की गुंडागर्दी का मामला था।

“हमारी दोस्ती के पचास साल तो हो ही गए होंगे।”

“पचपन, बासठ से सत्रह तक पचपन “।

“चलो, तुमने उसमे पांच साल का और इजाफा कर दिया। इतनी पुरानी दोस्ती को मैं तोड़ना नहीं चाहता। अकेला मैं हूँ जो यह जानता है कि इसे कौन करवा रहा था। ऎसी बातें समझ ली जाती हैं पर कही नहीं जातीं। मुहाविरे में तो सिर्फ दीवारों के कान होते हैं, पर सचाई यह है कि हवा के भी कान होते हैं। एक बार तुम्हारा नाम जबान पर आ गया तो पुरे ज़माने में शोर मच जाएगा। तुम आबरू गँवाओगे और मैं एक इतना पुराना दोस्त,जिसके लब इतने शीरीं हैं कि गालिया देता है तो भी बदमजा नहीं होता।”

वह भड़क उठा, आवाज तो ऊँची होनी ही थी, “मैं कराता रहा हूँ यह सब? दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?”

“ऐसी बातें ऊँची आवाज में नहीं की जातीं. लोग मानने लगे हैं की पेड़ पौदों के भी कान होते हैं।
ऊँचा बोलो तो वे सुन भी लेते हैं और तनिक भी हवा चली तो फुसफुसाते भी हैं। मैं जो कहता हूँ उसे ध्यान से सुनो। उसके बाद तुम जो भी कहोगे मैं चुपचाप सुन लूँगा।”

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इसका क्या जवाब दे ।

“तुम मेरे साथ टहलते हो, मुझसे बातचीत करते हो तो देखने वालों को यह भरम होगा की तुम्हारी जानकारी अच्छी तो होगी ही। ऊँचा बोलोगे तो वे समझ जायेगे कि तुम्हारा इतिहास ज्ञान गुजरात तक पहुंचता है, उसके अलावा तुम्हे ठीक उससे पहले के गोधरा तक का ज्ञान नहीं, और वर्तमान ज्ञान केवल गोरक्षकों की गुंडा गर्दी तक सिमट कर रह जाता है और किसी चीज का ज्ञान ही नहीं। तुम्हारी बौद्धिक मृत्यु तो इसके साथ ही हो जायेगी, जिसे मैं सहन न कर पाऊँगा। मैं तो जानता हूँ, तुम परले दर्जे के बेवकूफ नहीं हो, दुनिया में तुमसे भी बड़े बेकूफ खोजने पर जरूर मिल जायेंगे, पर दूसरों को कैसे समझाऊंगा, जब वे कहेंगे उन्होंने अपने कानों जो सुना है उसके आधार पर अपनी राय बनाई है।”

वह कुछ बोलने को हुआ तो मैंने बरज दिया, “अब राहत की बात यह है कि आगे से यह गुंडागर्दी बंद हो जाएगी, इसलिए इसको लेकर अधिक चिंतित होने की भी ज़रूरत नहीं।”

उस बदहवासी में भी वह जोर से हंसा, “अब समझ में आया। अब तक जो होता आ रहा था उसमें तुम्हारी भी मिली भगत थी। “

“मैं तुम्हारे मज़ाक को झेल जाऊँगा, पर जब यह उजागर होगा कि गाय के प्रति हिन्दू संवेदनशीलता का दुरूपयोग करते हुए जो कुछ गुंडागर्दी के स्तर पर हो रहा था उसे तुम लोग करा रहे थे तो कहीं मुंह दिखाने लायक रहोगे? खैर, जब मुंह मुहाना बन गया हो तो मुंह दिखने या दिखाने का प्रश्न ही अतिप्रश्न है।”

उसकी समझ में न आया कि मैं कह क्या रहा हूँ । मैंने भी उसे सस्पेंस में रखते हुए कहा, “यह तुम्हे कल समझाऊँगा ।”

Post – 2017-07-07

This sudden discovery of a vast literature , which had remained unknown for so many centuries to the western world, was the most important event of its kind since the rediscovery of the treasures of classical Greek literature at the renaissance., and luckily it coincided with the GermanRomantic revival. The Upanishads came to Schaupenhaur as a new gnosis of revelation.

Through Schopenhaur and von Hartsmann, Sanskrit philosophy profoundly affected the German transcendentalism. Kants’s great central doctrine, that things of experience are only the phenomena of the thing-in-itself, essentially that of Upanishads. … Kant was indeed, deeply concerned with Indian culture, and lectured on Indian on the basis of the knowledge available at that period. … The poem in honour of Luke Howard, the English meteorologist, written by Goethe in 1821 is, on the other hand, full of conscious allusions to the Meghadut.

Shakuntala was translated into German by Forster in 1791, and was welcomed by Herder and Goethe with the same enthusiasm that Schopenhauer had shown for Upanishads. Goethe’s epigram on the drama is well known….
Wouldst thau the young year’s blossoms and fruits of decline.
And all by which the soul is charmed, enraptured, feasted, fed
Wouldst thou the earth and Heaven itself in one sole name combine.
I name the, O Shakuntala! and all at once is said.
The prologue of Faust…is modelled on the prologue of the Sanskrit drama….Goethe had at one time formed a plan for adapting Shakuntala for German stage.

Post – 2017-07-06

मुझ पर विश्वास करेगा वह धोखा खाएगा.
नादानों में नादान वह पहचाना जाएगा

मतलब यह, जनाब, कि मेरी बात मत मानिये, उसे कई सुलभ विचारों में से एक विचार मानिये और उसके बाद अपनी अक्ल से काम लीजिये कि इनमें से कौन अधिक सही है और यदि कोई सही न लगे तो अपनी अक्ल पर भरोसा कीजिये और खुद समाधान निकालिये.
यह चेतावनी इस लिए देनी ज़रूरी हुई कि हम समझते हैं कि पश्चिम से परिचित होने के बाद भारत में नवजागरण आया, जो सच है पर संदिग्ध भी है.

मैं जो उलटी बात कर रहा हूँ वह यह कि यूरोप में तीन नवजागरण आये थे. पहला धर्मयुद्धों के दौरान अरबों का सामना करते हुए पूर्व की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक अग्रता से परिचित होने और उनसे सीखने के साथ अपने युन्नानी अतीत के पुनरुद्धार के साथ. दूसरी उससे अर्जित ऊर्जा से विचार की स्वात्तता के उन्मेष के साथ जो कोपरनिकस और गालीलिओ में व्यक्त हुआ था और तीसरा नवजागरण संस्कृत भाषा और साहित्य से परिचित होने के बाद आया था. यूरोप के सारे दार्शनिक, सारे बुद्धिजीवी, कवि भारतीय प्रभाव में उससे अधिक सराबोर मिलते हैं जितने प्रथम नवजागरण के उनके भारतीय प्रतिरूप.

आश्चर्य इस बात का है कि जिस भारत से परिचय के बाद आधुनिक पश्चिम का सांस्कृतिक नवोन्मेष हुआ और व्हिटमैन और इलियट तक और उसके बाद के भी अनेक चिंतक अभिभूत रहे उससे हमारे तथाकथित आधुनिकतावादियों की ऐसी क्या विरक्ति हुई कि वे जो पश्चिम और पूर्व का समन्वय करते हुए ऎसी नई दिशा खोल सकते थे जिससे उनकी वह पहचान भी बनती जिसे बनाने की आतुरता में वे अपना घर तक भूल गए, अपने पाठकों से कट कर गुलदस्ते के फूल बन गए, परन्तु सही दिशा में उल्लेखनीय प्रयोग न कर सके. यह बात अपने मित्र अरविन्द कुमार के फ़ाउस्ट प्रेम से याद आई. क्या आपको पता है कि यह रचना भी भारतीय प्रभाव में लिखी गई है. यदि नही तो कल मैं इसके प्रमाण स्वरूप स्वीकृतियां दूंगा.

Post – 2017-07-06

लाख समझाओ मगर

“तुम जिन का साथ दे रहे हो वे नहीं चाहते कि उनके काले कारनामों की और किसी की नज़र जाय, इस लिए तुम चाहते हो कि बुद्धिजीवी कूप मंडूक बना केवल अपने क्षेत्र तक सिमटा रहे और वे तब तक मनमानी करते रहें जब तक पूरा सत्यानाश न हो जाए. तुम अपने बौद्धिक वर्ग से भी विश्वासघात कर रहे हो और अपने देश के साथ भी छल कर रहे हो, इसका पता है तुम्हे?”

मैं चुप रहा, इससे उत्सहित होकर वह कुछ और आवेश में आ गया, “सत्ता का विरोध करने का अधिकार हमें संविधान ने यूँ ही नहीं दिया है, तुम उसे स्वतन्त्रता का दुरूपयोग कह कर दबाना चाहते हो, यही फासिजम है और हम इसका पुरे दमखम से विरोध करते हैं और आगे भी करेंगे.”

मैं मुस्कराने लगा तो वह चिढ गया, “तानाशाहों को फ़ौज से डर नहीं लगता, विचारों से और विचारकों से डर लगता है और इसीलिए वे सबसे पहले बुद्धिजीवियों का सफाया करते हैं, यह तुम्हें पता है या नहीं?”

मैंने मुस्कराते हुए ही पूछा, “तुम्हारी बात पूरी हो गई?”

“पूरी ही मान लो.”

“मैं तुमसे पूरी तरह सहमत हूँ.”

वह मेरी सहमति से भी घबरा गया, “देखो, तुम फिर कोई बदमाशी करने वाले हो लेकिन आज मैं तुम्हारी एक न चलने दूँगा.

“यह तो मैं जानता हूँ, न तो खुद चलोगे न किसी को चलने दोगे, और इस जड़ता प्रगतिशीलता की संज्ञा भी दोगे. बुद्धि का ऐसा दिवाला केवल भारतीय सेकुलरिस्टों में ही पाया जा सकता है जो लीग के अधूरे काम को पूरा करने की योजना पर काम करते आये हैं और अपना चहरा छिपाने के लिए सेकुलरिज्म का बुरका ओढ़ लेते है. नाम और काम में कोई संगति ही नहीं.”

“फिर जरा अपना चेहरा तो दिखाओ. अभी अभी तुम मुझसे सहमत किस बात पर थे?”

“बताता हूँ. बीच में बोलना नहीं. पहली बात यह कि बुद्धिजीवी विशेषज्ञता के नाम पर कूपमंडूक बन कर नहीं रह सकता. मेरा सारा लेखन, जिस भी विधा या क्षेत्र में हो, पूरा विरोध, प्रतिरोध और फरेब को उजागर करने का लेखन है.तुमसे मेरी यह बात चीत तक, व्यक्तिगत जीवन में भी मेरे लिए अन्याय का विरोध और अन्यायी को पराजित करना सोचने और लिखने जितना ही महत्वपूर्ण है. परन्तु ये बुर्कापोश बुद्धिजीवी अपने लाभ और हित को सर्वोपरि मानते रहे हैं, इसे उन्हें निकट से देखो तो पता चल जाएगा. मैं बार बार कहता हूँ कि जिन शब्दों का वे प्रयोग करते है, उनका पूरा अर्थ भी नहीं जानते.”

“यह तो तुम्हीं कह सकते हो और तुम्ही मान सकते हो. दूसरा कोई पागल तो मिलेगा नहीं.”

“मैं बताऊँगा तो समझ जाओगे, मानो भले नहीं. पहली बात बौधिक का विरोध हुड्गंद मचाने के रूप में प्रकट नहीं होता, तुम्ही कहते हो तानाशाह फ़ौज से नहीं विचारों से डरता है. हुडदंग विचार नहीं है यह मानोगे? हुडदंग को कुचला जा सकता है, वह बंदर घुड़की हो तो उसकी उपेक्षा कर के अपनी मौत मरने को छोड़ा जा सकता है परन्तु विचारों को शक्ति से न तो दबाया जा सकता है न उपेक्षा से काल कवलित किया जा सकता है. तुम कैसे बुद्धिजीवी हो जिसके पास विचार के नाम पर दंगा, फिकरेबाजी, चुगलखोरी के अलावा कुछ है ही नहीं. पहले दिन से लेकर आज तक किसी चूक या अनीति का मार्मिक विश्लेषण तक नही.

“अब दूसरी बात समझो. सता के अनेक रूप हैं और बुद्धिजीवी उन सभी का विरोध करता है इनमे राजसत्ता सबसे बाद में आती है परन्तु तुमको इस शब्द का अंतिम अर्थ ही पता है क्योंकि तुम सता के लिए प्रयत्नशील दलों के पालतू का काम उनके तंत्र का अंग बन कर और अपनी स्वतन्त्रता की कीमत पर कर रहे हो. यह सत्ता का विरोध नही हुआ सत्ता के द्वंद्व में एक सत्ता का सेवक बनाना हुआ. बुद्धिजीवी विचार सत्ता के बल, समाज को कायल बना कर सत्ता के गलत निर्णयों के विषय में जागरूकटा पैदा करके करता है. तुम्हारी बुद्धि का दिवाला यह कि तुम इतनी गलत बातें करते हो या इतने गलत तरीके अपनाते हो कि तुम्हारी नासमझी उस सत्ता को ही मजबूत करती है जिसको मिटाने का दम भरते हो फिर भी तुम न इसे समझ पाते हो न आदत से बाज आते हो. उलटे जिस समाज को आंदोलित करना है उसे नासमझ करार दे कर अपनी ग्लानि कम करते हो.

“तानाशाह बुद्धिजीवी से इसलिए घबराता है कि वह अपनी शक्ति के लिए सत्ता के दूसरे रूपों से समर्थन और औचित्य जुटाता है जो इतिहास और परंपरा की गलत समझ से जुडा हो सकता है, वर्तमान की गलत व्याख्या से पैदा हो सकता है, अपने राष्ट्रीय हितों के विपरीत काम करने वाले विश्वासों, योजनाओं या इतर देशों से जुडा हो सकता है. सबकी एक ही काट है उनकी सही व्याख्या, वस्तुपरक विवेचन यह तुम नही कर पाते हो.

“संविधान ने हमें जो भी अधिकार दिए हैं वे अमर्यादित नहीं हैं. सत्ता का विरोध करना हमारी स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है और यदि संविधान में इसका उल्लेख ना हो तो भी इसका हमें नैसर्गिक अधिकार है परन्तु इसकी समझ और उससे जुदा दायित्वबोध ही न हो तो उसी संविधान ने सत्ता को समाजहित में मनचलेपन को नियंत्रित करने के जिम्मेदारी और शक्ति भी दी है. उसे दमन कह कर अपना बचाव नहीं किया जा सकता.

“जो तुमने कहा उससे मेरी सैद्धांतिक सहमति है. जो तुम करते हो वह उन्हीं सिद्धांतो के विपरीत है इसलिए मै जत्थाबंद मुर्खता की आत्मविनाशी सट्टेबाजी का और बौद्धिकता को इस अधोगति में पहुंचाने का विरोध करता हूँ, “”