Post – 2017-06-18

हर आदमी को मयस्सर तो हो इंसां होना

मुझे साम्यवाद का एक ही पक्ष सबसे आकर्षक लगता रहा और वह है उसका मानवतावाद । समस्त मानवता का यातना, अपमान और अभाव से मुक्ति और मानवीय गरिमा की सार्वभौम प्रतिष्ठा। मात्र रोजगार नहीं, यन्त्र के साथ काम करते करते आदमी का स्वयं उसके एक पुर्जे में बदल जाना, उसी काम को बिना किसी आनन्द के, बिना सर्जनात्मक उल्लास के करते जाना भी, उसका अमानवीकरण है।

अमानवीकरण की समस्त प्रक्रिया में कोई इंसान बन कर, अपने काम के साथ वह सर्जनात्मक उल्लास अनुभव करता प्राणी बन कर नहीं रह पाता। वह भी नहीं जिसने अपार जोड़ रखे हैं जिसका उसके जीवन में कोई उपयोग नहीं, जो मनोबाधा या फीटिश का रूप ले चुकी है, आनन्द का एक क्षण नहीं परन्तु उसके स्थानापन्न अभिमान की पूर्ति। भारतीय पूंजीपतियों में पिछली पीढ़ी के कुछ पूंजीपतियों में यह आनन्दानुभूति किसी सीमा तक बनी रही थी, जिनमें टाटा, बिरला, बजाज, साहूजैन आदि का नाम लिया जा सकता है। इसका कारण मेरी समझ से यह कि वे राष्ट्रवादी पूंजीपति थे जिनको भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन ने आगे बढ़ने न दिया और क्रमशः कोलैबेारेटर बना दिया। परन्तु नई पीढ़ी के अडानी, अंबानी, मित्तल जैसे पूंजीपति अन्तर्राष्ट्रवादी पूंजीपति हैं, पहले का अपना देश था, अपनी भाषा थी, अपनी संस्कृति थी और अपना इतिहास था जिसकी उसे चिन्ता पूंजी के समानान्तर बनी हुई थी, दूसरे के पास केवल पैसा है और उसे वह दुनिया के किसी देश में लगा कर वहां से अपना धन बढ़ा सकता है। उसके लिए उसका अपना देश भी मात्र बाजार है, जैसे किसी अन्य देश के पूंजीपति के लिए। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने इन्हीं के लिए रास्ता तैयार किया।
जो लोग मार्क्सवाद को निरे भौतिकवाद में उतर कर समझना चाहते हैं वे पूंजीवादी औजारों से मार्क्सवाद को समझना चाहते हैं जिसमें कला, साहित्य, चिंतन, उत्सर्ग और वलिदान सभी को उसके सृजनात्मक उल्लास, आत्मिक आनंद, और गौरव से शून्य करके चकित करने वाले करतब में reduce कर दिया जाताहै. मार्क्सवाद के साथ मनुष्य का आत्मिक उत्थान उसी तरह जुड़ा हुआ है जैसे उसकी पूर्व शर्त, भौतिक आवश्यकताओं की सम्मानजनक पूर्ति. कम से कम मैं मार्क्सवाद को इसी रूप में लेता रहा हूँ और इसी के कारण अपने को भारत के विरल मार्क्सवादियों में एक मानता आया हूँ. और कम्युनिस्ट पार्टियों को मार्क्सवाद के सारतत्व से अनभिज्ञ करार देता रहा हूँ. मास प्रोडक्शन, बड़े उद्योग में मनुष्य का अमानवीकरण अनिवार्य है. यह यंत्रसाधित गांधीवादी कुटीर उद्योग में ही संभव है, इसलिए मेरे लिए दोनों में विरोध है ही नहीं. वही बेरोजगारी की भी दवा है और परिवार नियोजन का भी. यह अकादमिक कसौटी पर गलत हो तो भी यह मेरी समझ है. मेरा मार्क्सवाद.
मोदी के आज के आर्थिक निर्णयों का इसी दृष्टि से मूल्यांकन होना चाहिए जिसकी योग्यता मुझमें नहीं है।

Post – 2017-06-17

मैं जिनकी आलोचना करता हूँ, जिनसे मेरी लड़ाई है, उन्हीं को प्यार भी करता हूँ. यह रिश्ता ‘तुम्हीं से मुहब्बत तुम्हीं से लड़ाई’ सुनने के बाद का नहीं, उससे पहले का है. मेरा नब्बे प्रतिशत लेखन राजनितिक है और दस प्रतिशत कलाभ्यास.
मेरी राजनीति अपने मोर्चे पर अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने की राजनीति है. अपने कार्यक्षेत्र की सही समझ और उसपर दृढ़ता, ईमानदारी और निर्भीकता से कार्यरत रहने की राजनीति है.
अपने काम को पूरी निष्ठा से करने वाले एक क्रन्तिकारी काम करते हैं- अपने दम पर जितना संभव है दुनिया को सही दिशा में बदलने का काम.
दुनिया के सभी अपराधी कामचोर होते हैं. और यदि किसी दर्शन के नाम पर गो स्लो, कामबंद, चक्काजाम को हथियार बनाया जाता है तो वह दल, वह संगठन, वह दर्शन प्रतिक्रान्तिकारी है, वह मार्क्सवाद के नाम पर ही क्यों न हो.
गाना फिर याद आ गया ‘मारे गए गुलफाम उर्फ़ तीसरी कसम.’ पर कुछ बदलाव के साथ- गुलफाम की जगह नकली जनवादी. और तीन की जगह तेरह तो रखना ही पड़ेगा, वैसे जिन्हे कर्दा और बेपर्दा गुनाहों की सजा तक न मिली उनके नाकर्दा गुनाह उनकी आड़ में वे कर रहे हैं जिनकी पूँछ पकड़ कर वे खड़े हैं.
सड़ांध का इलाज है मंथन या तीव्र प्रवाह, वैचारिक जड़ता का इलाज है सवाद. संवाद स्वतः एक क्रन्तिकारी काम है. यह ठहराव से गति की और, जड़ता से प्रबुद्धता की दिशा में ले जाता है.
मार्क्स सही हैं. उनसे अधिक सही की संभावना उनके बाद समाप्त नहीं हो जाती. यही मार्क्सवाद है. जो मार्क्स ने कहा उसका पालन धर्मश्रद्धा है जो मार्क्सवाद को दर्शन से धर्म बना देता है. धर्म और अन्धविश्वास के लिए मार्क्सवाद में जगह नहीं.

Post – 2017-06-17

सफाई दर सफाई

पहाड़ पर बैठ कर जितनी उूंची बात की जा सकती है उतनी उूंची बात मैंदान में सोची तक नहीं जा सकती। इसे मानने वाले सरेराह मिल जाएंगे। सभी को पता है कि ऊंचे विचारों की खोज में हमारे साधु-सन्त पहाड़ों पर चले जाते थे और किसी गुफा में तब तक पड़े रहते थे, जब तक ऊंचा विचार मिल न जाए और जब मिल जाता था तो लौटने से डरते थे कि मैदानी उचक्के उसे उनसे लूट न लें। परन्तु इस बात की ओर कम लोगों ने ध्यान दिया होगा कि पहाड़ से जिधर भी देखो, तरह तरह की गहराइयां ही दिखाई देती हैं, इसलिए पहाड़ पर बैठ कर जितनी गहरी बात सोची जा सकती है वह भी मैदान में कुएं में झांक कर भी संभव नहीं। कूपमंडूक बन कर तो कदापि संभव नहीं जो संस्कृत में पारंगत जगत के लिए दिवंगत होने पर होता है जिसमें ‘यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्’ का दर्दुर जाप आरंभ होता है। इसका व्यक्तिगत अनुभव न होता तो मैं इसे आपके साथ साझा भी न करता।
हुआ यह कि विचार संसद में जिसका नाम ‘सांस’ इसलिए रखा गया था कि पहाड़ पर दमे और टीबी के मरीज सांस की तलाश में ही आते हैं। आ नेवाले मित्र िवचार लादे चढ़ाइयां चढेंगे तो उनकी सबसे पहली जरूरत दम मारने की होगी। सांस बची तो आस बची, और यदि निराशा ही हाथ आई तो उससे बाहर आ ने का रास्ता निकालने का विषय तो मिल ही जाएगा। मैं सदा से वर्मा जी की दूरदर्शिता का कायल रहा हूं इस बार सीढिया चढ़ते चढ़ते हो गया क्योंकि सीढ़ियां मैं बाद में चढ़ा सांस पहले चढ़ गई।

लोगों के पास बहस करने के लिए ढेर सारी जानकारियां और ढेर सारे मुददे थे। मेरे पास पिछले एक दो साल से मोदी के सिवाय कोई मुद्दा ही नहीं। गलत कह गया। क्षमा करें।

मैं तो तरह तरह के विषयों पर इतनी लंबी पोस्ट लिखता हूं कि उन्हें पढ़ने वाले बेहोश हो जाते हैं। समझदार लोग बेहोशी से बचने के लिए मेरे लिखने से पहले ही लाइक करने के लिए तैयार रहते हैं। उनको अस्पताल का खर्चा नहीं उठाना पड़ता।

कभी कभी मैं मोदी पर भी उतने ही उदार भाव से उतनी ही लंबी पोस्ट डाल देता हूं। पर जब सोचने के लिए मशहूर लोगों की वाल पर यह जानने के लिए जाता हूं कि वे आजकल क्या सोच रहे हैं तो यह देख कर हैरानी होती है कि वे मोदी छुट किसी दीगर मुद्दे की पुट तक नहीं आने देते और दिन में मोदी पर दसियों बार बोलने के बाद भी कहते कुछ नहीं हैं।

वे जो कुछ लिखते हैं वह उन्हीं की परिभाषा से मसखरी, छेड़छाड़, फिकरेवाजी आदि का वह रूप होता है जिसके लिए आज कल मेरी जानकारी में एक नया शब्द आया है जिसे ट्रालिंग कहते हैं और जिसे असभ्य आचारण माना जाता है। निराशा का यह आलम कि एक झटके में जो सभ्यता के मानदंड तय करते थे वे उन्हीं मानदंडों पर कसे जाने पर अराजक और असभ्य सिद्ध होरहे हैं ।

मैं इस आशा में गया था कि कम से कम इस मौके पर यह जान पाऊंगा कि यदि मोदी गलत हैं तो क्यों और कितने, इसका पता तो चल ही जाएगा। बात के केन्द्र में तो सांस थी पर सुबह शाम, जब सांस लेना कम और चाय की चुस्की लेना अधिक रास आता था, जंभाई लेते, जो बेबात का दौर होता था उसमें मोदी भी आ ही जाते। पर कटाक्ष ट्रालिंग के दायरे में ही, व्यक्तिगत आचार और व्यवहार को ले कर, भाई के साथ, पत्नी के साथ, कोट और पैंट के साथ वह आदमी किस तरह की तुच्छता के नमूने पेश करता है।

प्रधान के पद पर बैठे किसी व्यक्ति का ऐसा निजी आचार सामाजिक विमर्श का विषय नहीं होना चाहिए, कम से कम मनस्वी लोगों के बीच चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए, जिसका असर सार्वजनिक जीवन पर न पड़ता हो या नगण्य पड़ता हो,। उदाहरण के लिए नेहरू जी के जीवन व्यवहार से यह तो पता चलता है कि उन्होंने अपनी जैव आवश्यकताओं का जिम्मा किसे सौंप दिया था और उसकी जैव आवश्यकताओं की पूर्ति का क्या प्रबन्ध किया था इसे आलोचना का विषय जघन्यतम और क्षुद्रतम सिद्ध किए जाने वाले जनसंघ और उसके जनक संघ ने भी न बनाया जब कि उच्च आदर्शों पर पले दल और बुद्धिजीवी मोदी पर केवल ओछे आरोप लगाते रहे हैं।

उनके वे ही निर्णय कार्य, विचार और संबंध जिनका देश और समाज के हितों पर प्रभाव पड़ता है, आलोचना का विषय होना चाहिए। यह प्रधान को होश में लाने के लिए, उसे नियन्त्रित करने और सही राह पर लाने के लिए और यदि वह न सुधरे तो उसके विरोध में जनचेतना उभारने में काम में लाया जाना चाहिए। पर ऐसा करने के स्थान पर समझदार और जिम्मेदार लोग तक ट्रालिंग में पूरा का पूरा दिन लगा दे रहे हैं, यह सोच कर चिन्ता होती है।

मोदी की वकालत के बाद भी दर्जनों बातों को लेकर मेरे मन में सन्देह है। मैं इन क्षेत्रों का अधिकारी व्यक्ति न होने के कारण इस आशा में रहता हूं कि इनका सही सही और गंभीर विवेचन कोई अन्य करेगा। जब किसी ने ट्रालिंग का दायरा पार न किया तो केवल एक सवाल मेरे मन मे उभरा और वह था स्वच्छता अभियान का। इसका आरंभ मेरी समझ से गलत हुआ है। दूसरे भी सवाल हैं। उन्हें उठाएंगे तो रास्ते से भटक जाएंगे।

मोदी की नीयत पर मुझे आज भी भरोसा है, उनकी सूझ पर भी, उनके संकल्प पर भी, परन्तु उनकी जल्दबाजी से मुझे डर लगता है। अच्छे इरादे से, पूरी निष्ठा से, आरंभ किए गए कामों में यदि अधिक उतावलापन दिखाया जाय तो उसके परिणाम उल्टे ही नहीं होते, उसकी भावी संभावनाओं को भी समाप्त कर देते हैं। इसका एक उदाहरण है आपातकाल में जारी परिवार नियोजन है। यह आज भी भारत की सबसे बड़ी समस्या है परन्तु जल्दबाजी के कारण संजय ने इसे डरावना बना दिया।

क्या पूरी सावधनी से उच्चतम मानकों का निर्वाह करते हुए शौचालय न बनाए गए तो वे भूजल को उसी तरह विषाक्त नहीं कर सकते हैं जैसे झटपट में, मलशोधन का प्रबन्ध किए बिना बड़ी नदियों में गन्दे और विषाक्त जल के मिलने से पैदा हुआ जिस पर अरबों खर्च करने के बाद भी कोई गोचर परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा।

मैं केवल यह सुझा रहा था कि इनी ज्वलंत और ऐसी दूसरी ज्वलंत समस्याओं पर यदि आपकी नजर नहीं जा रही, दिन रात मारण मन्त्र का पाठ कर रहे हैं तो आप कैसे माक्सवादी हैं? हमारे बीच एक अधिवक्ता भी थे जिन्होंने अनगिनत नहीं तो भी बहुत सारे पीआईएल डाले हैं और सबमें जीत पाई है। मैं समचुच चिन्तित था इसलिए कहा, इस पर भी एक पीआइएल डाल दें कि सही मानकों के निर्वाह की क्या व्यवस्था की गई है। जब तक सरकार इसे सुनिश्चित न करे तब तक उसे धीरे चलना चाहिए। सावधानी के साथ। उन्होंने कहा, करूंगा पर आपको पक्षकार बनना होगा। मैं तैयार हो गया। उसका मजमून भी मुझे ही बनाना होगा। कर सकता हूं पर क्या यह पोस्ट उसका आधार नहीं बन सकती। मैं सचमुच उस स्थिति की कल्पना से सिहर उठता हूं जब पेय जल आहार सेअधिक मंहगा हो जाएगा। लोग भूखों नहीं प्यासों मरेंगे। पानी की बोतलबन्दी का कारोबार अपने चरम पर होगा परन्तु ऐसा जल नदियों के उूपरी स्रोतों में ही सुलभ होगा इसलिए इतनी बड़ी मात्रा में बोतलबन्दी से जलधाराएं तब सूखने लगेंगी। कुछ लोग जो आरोपों का आविष्कार करने में ही सारा दिन लगा देते हैं उनमें से किसी को यह नहीं सूझा कि यह आरोप लगाए कि मोदी यह जल्दबाजी पानी की बोतलबन्दी करने वाली कंपनियों के दबाव में कर रहे हैं। रही पी आइ एल डालने की बात तो जो कुछ मैं ज्ञानचक्षु से देख पाया उसे मंजूर कराने के लिए रजिस्ट्रार को लिफाफा पहुंचाने की नौबत आ सकती है जो मेरे लिए संभव नहीं, इसलिए मैं इसका निर्णय अपने विद्वान अधिवक्ता के स्वविवेक पर छोड़ता हूं।

Post – 2017-06-16

कुछ पोस्ट और टिप्पणियां पढ़ कर जिनको मैंने बहुतपसन्द किया और कुछ अच्छी टिप्पणयों की तलाश में भटकने के बाद हुई निराशा से स्वतः पद्यबद्ध हुआ विचारः
जिनसे थी अक्ल की नहीं उम्मीद देखिए आज लिख रहे क्या हैं।
आढ़ती ज्ञान, पारखी सच के, कल थे जो, आज दिख रहे क्या हैं।
कर रहे क्या हैं इस पर गौ़र करें, डर रहे क्यों हैं इस पर गौर करें।
डरने पर कितने निडर है देखें, सोचते क्या हैं, लिख रहे क्या हैं।

Post – 2017-06-16

जो सच नहीं है वह भी सच है, क्योंकि है तो सही। जो गलत है वह हो सकता है गलत न हो. आप जिस कोण से उसे देख रहे हैं वह गलत हो।

Post – 2017-06-15

सफाई को ही स्वछता कहते हैं

पर जो बात सफाई में है उसे स्वछता छू भी नहीं सकती. इसलिए नही की सफाई धूल मिटटी से सीधा सम्बन्ध रखती है, इसलिए दोनों ने हाथ मिलाया तो सफाई का हाथ कुछ साफ़ हो जाएगा और स्वछता का पहले से कुछ मैला; कारण यह भी है कि हाथ की सफाई और हाथ की स्वछता मैं भी लोग फ़र्क़ करने लगे हैं. वह भी तरह तरह से. बांटनेवाले शब्दों को भी बाँट लेते हैं, अर्थ को भी बाँट लेते हैं, समाज को भी बाँट देते हैं, यहां तक कि दिलों को भी बाँट देते हैंऔर हद यह है कि यदि कोई कहे कि मैं बटे हुओं को जोड़ूंगा, सबको साथ लेकर सबका विकास करूंगा तो लोग उसकी नीयत की सफाई पर संदेह करने लगते हैं और जवाब देते हैं कि हम बंट कर रह सकते हैं पर जोड़ने वालों के झांसे में आकर जुड़ नहीं सकते क्योंकि हम मानते हैं कि वह तोड़ने और फोड़ने को और अपने में मिलाने को ही सबका साथ सबका विकास मानता है.सबको जोड़ने का अर्थ है सबका सफाया, विश्वास न हो तो उसके जोड़ने के प्रोग्राम के बाद से भारतीय राजनीति में दूसरे दलों का हाल देख लो. अब आप सबका सफाया की जगह सबकी स्वछता का प्रयोग तो कर नही सकते. आप समझाना चाहें कि भाई उसकी बात मानने वाले जुड़ जाते हैं, न माननेवाले टूटते नहीं हैं, चूर चूर हो जाते हैं तो जवाब मिलेगा हम चूर तो पहले से हैं, जोड़े हुए के नशे में. हमें कौन चूर चूर कर सकता है
.
और अंतिम फ़र्क़ यह कि स्वछता पहाड़ चढ़ सकती है, पहाड़ चढ़ कर इतने रूपों में दीख सकती है कि उसपर बहस तक की जा सके पर बहस के लिए थोड़ी तैयारी तो आप को भी करनी होगी इसलिए इसे कल के लिए स्थगित रखते हैं.

Post – 2017-06-15

दुर्भाग्य का जश्न

कल मैं अपनी पुस्तक की प्रेसकापी तैयार कर रहा था। पाठ में विगत वर्ष नवम्बर की पोस्ट में यह अंश थाः
‘‘क्या आपने नोट किया कि आज कल सारे समाचार दूसरे अपराधों से भरे रहते हैं, आत्महत्या तक के मामले प्रेमी के दगा, कैरियर में बाधा, प्रेमिका के छल और धन दौलत के दूसरे फसादों से जुड़े पढ़ने को मिलते हैं, किसानों की आत्महत्या के नहीं मिलते हैं।
‘‘क्या आपको पता है, सच तो यह है कि मुझे भी पता नहीं है, मैं भी आपके ज्ञान भरोसे बैठा हूं कि क्या यह समाचार माध्यमों की फितरत है और वे आत्महत्या की खबरों को दबा कर मोदी के इस दावे को सच कर रहे हैं कि अच्छे दिन आ गए, और संतुलन बनाए रखने के लिए पहले पन्ने से ले कर खेल के पन्ने तक उन्हें गाली दे रहे हैं, या सचमुच ऐसा हुआ है।’’

आज कल चल रहे किसान आन्दोलन और उनकी बदहाली से होने वाली आत्महत्याओं के आंकड़े देख कर चक्कर खा गया। मैंने उक्त पोस्ट लिखते समय जांच पड़ताल क्यों न की? घबराकर इंटरनेट छानने लगा। पता चला सारे लेख, वक्तव्य जो किसानों के प्रति सहानुभूति दिखा कर आगजनी, तोड़ फोड़ को किसानों का वाजिब गुस्सा और अपनी बदहवासी में प्रशाशन द्वारा उठाए गए कदमों के बाद के हैं। 2016 में जैसे न कोई आत्महत्या कर रहा था न मर रहा था, या मर रहा था तो केवल नोटबंदी की लाइन में खड़ा होने के कारण। सारा आक्रमण नोटेबंदी पर. अन्य विषय ग़ायब.

मैं किसान परिवार का हूं। शिक्षा के बाद भी किसानी करना चाहता था पर इसकी अनुमति नहीं मिली। किसानों की पीड़ा को अच्छी तरह समझता हूं।
किसानों की दशा ब्रिटिश काल से ही, सच कहें तो मध्यकाल से ही इतनी दुखद रही है कि उनसे बुरी दशा भूमिहीन कृषिमजदूरों की ही कही जा सकती है। अतः मेरे मन में उनके प्रति गहरी सहानुभूति है। परन्तु कुछ तथ्य चैंकाने वाले मिले जिनको सामने रखते हुए आप सभी को इन पर विचार करने को आमंत्रित करता हूंः
1. 2015-16 के विषय में जो अखबारी सूचना थी वह कांग्रेस के एक राजनेता का बयान था जिसे पीटीआई ने जारी किया था और डीएनए तथा इंडिया टुडे ने बिना छानबीन के छाप दिया थाः % “The NDA government has become a curse of death for the farmers. Thirty-five farmers are being driven to suicide everyday in the country. Altogether 12,602 peasants committed suicide in 2015,” AICC spokesperson Dr Ajoy Kumar told reporters here…The party said of the 12,602 peasants who committed suicide, 8,007 were farmers while the rest were agriculture labourers. DNA (This article has not been edited by DNA’s editorial team and is auto-generated from an agency feed.)The party said of the 12,602 peasants who committed suicide, 8,007 were farmers while the rest were agriculture labourers. DNA (This article has not been edited by DNA’s editorial team and is auto-generated from an agency feed.)

2. विकीपीडिया में प्रकाशित आलेख से जानकारी मिली :The National Crime Records Bureau of India reported in its 2012 annual report, that 135,445 people committed suicide in India, of which 13,755 were farmers (11.2%).[64] Of these, 5 out of 29 states accounted for 10,486 farmers suicides (76%) – Maharashtra, Andhra Pradesh, Karnataka, Madhya Pradesh and Kerala. In 2011, a total of 135,585 people committed suicide, of which 14,207 were farmers. In 2010, 15,963 farmers in India committed suicide, while total suicides were 134,599. जब की 2004 जिसमें यह आंकड़ा 18000 से भी उूपर चला गया था, को वर्षा के औसत में कमी के कारण मानें तो उसे छोड़ सकते हैं, पर 2005से 2013 तक का काल इन्द्रदेव की कृपा का काल माना जाता रहा है उसमें भी किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा 2014 जिसमें फिर वर्षा में कमी के कारण हालात 2004 जैसे ही थे, और उसके बाद भी भाजपा के वर्तमान दौर में वैसी त्रासदी से न गुजरना पड़ा और आत्महत्याओं की दर कम रही, न कि बढ़ी। नोटबंदी के बाद अंतर आया पर तब भी पहले सके अधिक बढ़ी नहीं।

3. मैंने पीछे गोप्रबंधन पर एक पोस्ट लिखी थी जिसमें यूं ही अंदाज लगाया था कि उर्वरक औ कीटनाशक किसानों की दुर्दशा का एक कारण हैं। इस खोज में वह सचमुच सही साबित हुआ। पीछे के अध्ययनों1- में कहा गया थाः – Ganapathi and Venkoba Rao analyzed suicides in parts of Tamil Nadu in 1966. They recommended that the distribution of agricultural organo-phosphorus compounds be restricted. Similarly, Nandi et al. in 1979 noted the role of freely available agricultural insecticides in suicides in rural West Bengal and suggested that their availability be regulated

4. देश के उन्तीस राज्यों में से केवल पांच में जिनको आर्थिक दृष्टि से अधिक समृद्ध माना जाता है आत्महत्या करने वाले किसानों का 76 प्रतिशत आता है जब कि शेष 24 में चैबीस प्रतिशत: 5 out of 29 states accounted for 10,486 farmers suicides (76%) – Maharashtra, Andhra Pradesh, Karnataka, Madhya Pradesh and Kerala.

5. उत्तर प्रदेश और बिहार जो आकार में बड़े, आबादी में उससे भी बड़े, औद्यागिक विकास में पिछड़े और इसलिए पूरी तरह खेती पर निर्भर हैं, उनमें किसानों की आत्महत्या का दर न के बराबर है, Farmer suicides rates in Bihar and Uttar Pradesh – two large states of India by size and population – have been about 10 times lower than Maharashtra, Kerala and Pondicherry.[69][70] In 2012, there were 745 farmer suicides in Uttar Pradesh, a state with an estimated population of 205.43 million.[71] In 2014, there were eight farmer suicides in Uttar Pradesh.

6. आत्महत्यायें इस बात का प्रमाण नहीं हैं कि अन्य राज्यों या क्षेत्रों की तुलना में आत्महत्या करने वाले राज्यों में किसान अधिक बदहाल हैं, अपितु इसके पीछे लोभ को उभार कर, संचार माध्यमों का प्रयोग करते हुए, राजनीतिक हथकंडा बना लिया गया है और यह हथकंडा वहीं और तभी काम में लाया जाता है जब कांग्रेस वहां सत्ता से बाहर होती है और आगजनी, तोडफोड को उभार कर एक दुर्भाग्य को अपने सौभाग्य में बदलना चाहती है।

7. आत्महत्याओं का एक अन्य कारण व्यापारियों और कारोबारियों के द्वारा जल्दी अमीर बनने की आकांक्षा में अधिक के अधिक धन बटोरने की होड़ में कपास आदि की खेती, उर्वरक, जल, कीटनाशक आदि के सबसे अधिक प्रयोग होते हैं।

8. कर्जमाफी इसका इलाज नहीं है और यह प्रयोग उत्तर प्रदेश में भी नहीं होना चाहिए। इसका आरंभ मनमोहन सिंह ने 2004 में किया था और तब से इसने समस्याएं अधिक पैदा की हैं। सबसे बड़ी बात आत्महत्या करने वाले किसानों से मिलता जुलता अनुपात उन राज्यों में कृषि मजदूरों का है जिन्हें कर्ज मिल ही नहीं सकता था। कर्जमाफी से उनकी आत्महत्या पर कोई प्रभाव पड़ने तो जा नहीं रहा।

9. आत्महत्या गरीबी और बदहाली का सूचक नहीं है, तंगहाली में जीने का संघर्श कठिन हो जाता है और इसी के अनुपात में जीने का मनोबल। इसे समझ न पाएं तो अमरकांत की जिन्दगी और जोंक पढ़ें।

10. कर्जमाफी आत्मघाती है, बुरी लत डालने जैसी है, इसमें अधिक से अधिक व्याजमाफी का सहारा लिया जाना चाहिए। अन्यथा कर्ज का रास्ता ही आगे के लिए बंद करना एकमात्र उपाय रह जाएगा। दूसरा उपाय भुगतान की मियाद को कुछ बढ़ाना हो सकता है।

11. सुना मध्यप्रदेश ने किसानों को सबसे अधिक राहत दी – बिना व्याज के कर्ज जिसके कारण वहां के मुख्यमंत्री किसानों के मामा जी कहे जाने लगे। मामा जी भूल गए कि कांग्रेस इतनी गिरी हुई राजनीति करती है कि वह भानजों को ही मामा की जान लेने को भड़का सकती है।

१२. औद्योगिक विकास वाले राज्यों में किसानो का आत्मसम्मान घटा है जो खेदजनक तो है पर सामंती जकड़ भी संभव है कम हुई हो।

१३. भाजपा सरकार ने किसानों के लिए जितना काम किया है और जिस दूरदर्शिता से किया है वह अब तक किसी अन्य ने नहीं किया. फसल का बीमा, आपदा में राहत और आकस्मिक मृत्यु में अल्पतम भागीदारी पर २ लाख तो मुझ जैसे अल्पज्ञ की भी जानकारी में है. वह अपना काम कर रही है पर गौर करें हमारे बुद्धिजीवी क्या कर रहे हैं।

Post – 2017-06-14

पहाड़ पर जमीन की बात 2
धोखा पहाड़ पर भी

मैं मोदी का पक्षधर हूं, प्रशंसक नहीं। मेरी समझ में यह नहीं आता कि जिस व्यक्ति ने, एकमात्र चूक को बाद के ग्यारह साल के शासन में दुहराया नहीं
रा नहीं, मोदी का विरोध हिन्दू समाज के प्रति, हिन्दू बुद्धिजीवियों द्वारा गोएब्बेल्स की तर्ज पर लगातार वितृष्णा पैदा की गई जब कि उसकी कमियों की आलोचना करनी चाहिए थी। आलोचना ओषधि का काम करती है, वितृष्णा और घृणा विष का। एक में कारण और निदान होता है, तर्क और प्रमाण होता है, दूसरे में किसी भी परिघटना का ऐसा विदू्रप जिसमें बुद्धि स्वतऩ्त्र नहीं रह पाती और अपनी वितृष्णा के लिए बहाने जुटाती है।

यदि हिन्दू समाज में विकृतियां आई हैं तो उनमें से कितनी कब से किन कारणों से आई हैं इसका विवेचन होता तो उन विकृतियों में कमी आई होती, यदि वे बढ़ी हैं तो बुद्धिजीवियों ने अपने कर्तव्य की गुरुता को नहीं समझा, या समझते हुए भी किसी पक्ष के अंषभागी हो कर अपने को अपने ही समाज के दूसरों से उूपर, विशिष्ट मानते रहे और इस स्थिति में प्रसन्न और तृप्त थे। यह बात पत्रकारों, अध्यापकों, लेखकों, सभी पर एक समाज लागू नहीं हो सकती परन्तु अपने तबके के वाचाल जनों के आतंक में जो अंशभागिता से प्रसन्न थे वे भी अनुकूलित होने को बाध्य थे अन्यथा उनको बुद्धिजीविता की सनद न मिल पाती। यह छोटा प्रलोभन भी बुद्धि को तिलांजलि देने के लिए पर्याप्त होता है।

कांग्रेस इस देश की अकेली पार्टी है जिसका चरित्र लोकतन्त्रविरोधी, भितरघाती और एकतान्त्रिक रहा है, और यह कमजोरी उसमें आरंभ से ही आ गई थी।

ऐसा न होता तो केरल की नम्बूदरी जनतांत्रिक सरकार को गिराने का षड्यन्त्र न रचा गया होता, वैकल्पिक नेतृत्व को उभरने से न रोका गया होता, काजराज प्लान आदि की जुगत से अपनी राय रखने वालों को अखाड़े से बाहर न किया गया होता, युवातुर्कों को हमलावर बना कर बाहर करके पुरानी कांग्रेस और युवती कांग्रेस का दो फा़ड़ बंटवारा न किया गया होता, उत्तरपूर्व से लेकर कष्मीर तक की समस्याओं का वह रूप होता कि जिसमे नागरिक अधिकारों और शान्ति और व्यवस्था की खाई इतनी गहरी है कि नया विकल्प तलाषना असंभव सा प्रतीत होने लगा है, जनता सरकार के चुने जाने के बाद उसे उसी धैर्य से काम करने दिया गया होता जिस धैर्य से दूसरे दलों ने कांग्रेस के बहुमत में आने पर उसे काम करने दिया और जो भी भूमिका निभाई वह संसद के भीतर आलोचनात्मक विपक्ष का, उसके नेताओं की लालसाओं को उकसाकर उनके साथ बारी बारी से विष्वासघात करके सरकारैं गिराई गई होतीं। कांग्रेस बिना सत्ता के रह नहीं सकती क्योंकि इसका काडर उस भ्रष्ट तन्त्र पर पलता रहा है जिसके विचित्र गणित के अनुसार राजीव गांधी के शब्दों में केन्द्र से चला रुपया अपने गन्तत्व तक पहुंचने पर 10 पैसा रह जाता है। अधिक समय तक प्रवाह बन्द होने पर वह काडर तक साथ छोड़ जाएगा क्योंकि वह सिद्धान्त पर नहीं परनाली पर पला है। मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में उनका मानमर्दन करते हुए जिस तरह की लूट आरंभ हुई वह जग जाहिर है। परन्तु जो ध्यान से ओझल रहा वह था उस कैथोलिक अभियान में आई तेजी जिसके लिए सोनिया जी ने भारतीय प्रधानमन्त्री के गृह योजनाबद्ध तरीके सें बधू रूप में प्रवेश किया था। घोटाले न होते तो कांग्रेस को अपदस्थ करना कठिन था। यह अभियान नियन्त्रण से बाहर हो जाता और अपने ही देश में देशविमुखता का ऐसा विस्तार हो जाता जिसे नाम तब भी सेक्युलरिज्म का दिया जाता, पर जो भारतीय समाज और उसके धर्मान्तरित ईसाइयों तक के दूरगामी हितो को देखते बहुत अनिष्टकर होता।

कांग्रेस लालित साहित्यकारों का मुखौटा वाम रहता है क्योंकि कांग्रेस का पहला और अन्तिम बौद्धिक चेहरा नेहरू थे, दूसरे बुद्धिजीवी उनके जीते जी साथ छोड़ गए थे या किनारे कर दिए गए। नेहरू स्वयं मान चुके थे (चाणक्य उपनाम से उनका लेख) कि उनमें तानाशाही मनोवृत्ति है और बाद में कहा था, क्योंकि उन्होंने स्वयं इसे भांप लिया था इसलिए इससे मुक्त हो गए है, पर दुर्भाग्य से मनोवृत्तियां भांपने से मुक्ति नहीं देतीं, अपने नए आवरण तैयार कर लेती हैं।

चलनी उनकी और केवल उनकी थी इसलिए उनके साथ कोई दूसरा बुद्धिजीवी चल नहीं सकता था। बुद्धिजीवियों ने समाजवाद और साम्यवाद का वादा करने वालों का चेहरा अपनाना पसन्द किया इसलिए नाम भले नेहरू से जुड़ा हो विश्वविद्यालय में वामपन्थी तेवर ही हावी रहा है और वह लफ्फाजी और भड़काउू नारेबाजी, नाटकबाजी से आगे कभी नहीं बढ़ा। वामाकार अवसरवादियों की इतनी सधी हुई जमातें किसी अन्य संस्था ने न पैदा की होंगी जितनी जेएनयू और उसी की तर्ज पर चलने और उसी की नकल करने वाले केन्द्रपोषित विष्वविद्यालयों ने।

कांग्रेस नेहरू और फिर नेहरू-गांधी और अन्ततः सोनिया गांधी की विरासत का दूसरा नाम रही है, यह आरंभ में खुले और चमकदार अक्षरों में लिखा जा चुका था परन्तु चमक के कारण वह पढ़ा नहीं जा रहा था, खुली लूट ने चमक को इतना कम और इबारत को इतना स्पष्ट और मुखर कर दिया कि अब वह अन्धों द्वारा भी पढ़ी और बहरों द्वारा भी सुनी जा सकती थी। मेरा पदीय काम चाकरी की शर्तो से जुड़ा रहा जिसका सम्मान करते हुए अपने उच्च अधिकारियों के प्रति विनम्रता के बाद भी उनकी मनमर्जी से बचता रहा परन्तु और कार्यभार से मुक्ति के बाद वहां के समय से लेकर अपने निजी समय के बौद्धिक को स्वयं एक राजनीतिक काम मान कर करता आया और उस राजनीति से मैं कभी पीछे नहीं हटा। वह किसी दल से जुड़ा नहीं, अन्तश्चेतना से जुड़ा है जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता परन्तु मेरे लेखन से समझा जा सकता है।

परन्तु मुझ जैसे सक्रिय राजनीति से विमुख व्यक्ति को भी कांग्रेस के अन्तिम पांच वर्षों ने पक्षधर बना दिया। पक्ष बहुत साफ था। कांग्रेस छोड़ कोई भी। राजवंश मुक्त कांग्रेस भी। और चुनाव निकट आने पर जब यह साफ हो गया कि मोदी का रास्ता रोकने वाला कोई नहीं, और सभी बुद्धिजीवी मोदी के सत्यानाश की कामना करने लगे, मैं मोदी के साथ था। मोदी के साथ होना लोकतन्त्र के साथ होना था। उन आकांक्षाओं और विश्वासों के साथ होना था जिसके आधार पर भारतीय जन इस सभी संभव विकल्पों में से इस व्यक्ति क को चुन रहा था और यह चुनाव से पहले भारतीय क्षितिज पर इतना साफ उभर आयाा था कि इससे आतंकिंत हो कर मनौतियां माान और फब्तियां कस रहे थे।

यह ऐसा चुनाव था जिसके संकेत बस्तनवी के मूल्यांकन में मिल चुके थे जिसे मुसलमान पढ़ने में चूक गए। बस्तनवी राजनीति नहीं करते, राजनीति करने वाले वृत्रवध के लि, मुर्दो की हड्डियों से वज्र बनाने की कला जानते हैं, समाजनीति करने वाले जिन्दा लोगों के लिए नए रास्ते बनाने की सोच रखते हैं। यह छोटा सा फर्क है जो इरादे नेक होते हुए भी रास्ते अलग कर देता है।

कलम भांजने वालों में सभी स्वर एक, मोदी किसी कीमत पर नहीं, अकेला विसंवादी स्वर, कांग्रेस किसी कीमत पर नहीं । कुल मिला कर निर्णय नकारात्मक पक्षों को लेकर ही हुआ। मैं मोदी का वैदिक अर्थों में अधिवक्ता बन कर खड़ा हो गया।

मैंने सोचा था यह चर्चा के केन्द्र में होगा। यही सोच कर गया भी था। लिखित प्रतिवाद न सही, चर्चा में यह तो समझ आए कि कौन कितना गलत है, जब कि वर्मा जी की विचारयोजना में इसके लिए जगह ही नहीं थी । धोखा पहाड़ पर भी खाया जा सकता है।

Post – 2017-06-13

पहाड़ पर जमीन की बात

भूमिका

मुझे ऊंचाइयों से घबराहट होती है । हर तरह की ऊंचाई से। गो बचपन में आम के लोभ में पेड़ों पर खूब चढ़ता था। जवानी में एक बार जब इतनी भारी ओला वृष्टि हुई थी कि मसूरी की गनहिल पर एक हफ्ते तक चमकती रही थी, अकेले बिना किसी को बताए बिना किसी से सलाह लिए बर्फ पिघलने से पहले पीछे के रास्ते से बचते बचाते चढ़ गया था और एक बार मसूरी लाइब्रेरी से देहरादून तक अपने से उम्रदराज लाइब्रेरियन के साथ उतर कर उनके घर तक पैदल उतर कर आया । पैदल उतरने की खबर से उनके बच्चों ने उनको खूब झिड़का था। वापसी पर वे बस पर बैठा कर ही निश्चिन्त हुए थे, पर उनकी चिन्ता की चिन्ता न करते हुए उनके। ओझल होते ही बस से उतर लिए थे और अपने अपने काटेज जो लाइब्रेरी से नीचे था, पैदल ही वापस आए थे। बस, इससे बड़ा खतरा कभी मोल न लिया । पहाड़ पर पहुंच कर ही पता चलता है कि समतल का सुख क्या है। स्वभाव से मै यात्रा भीरु हूं और इस मामले में एक सीमा तक मेरे आदर्श कांट है। अन्तर यह कि उन्होंने ने किन्हीं कारणों से इसे सिद्धान्त का जामा महना कर अपने को एक अदृश्य कारा में बन्द कर लिया था और मैं इस ग्रन्थि से मुक्त रहा । समतल और सीधा रास्ता मुझे अधिक रास आते हैं। एक तुकबन्दी जो ऐसी ही किसी मनस्थिति में की थी उसकी दो पंक्तियां याद आ रह हैं और पहले की पंक्तियों को गढ़ कर जोड़ रहा हूं:
कभी धड़कन कभी थिरकन कभी सरगम बना रखना
कभी नारा कंभी पर्चा कभी परचम बना रखना
जहां ऊंचाइयां उंचाइयों को तोड़ जाती हैं
मेरे मालिक मुझे उन आसमानों से बचा रखना ।

Post – 2017-06-12

एक जर्रे की हैसियत है पर
आसमानों से बात करते है
तुम न मानोगे हम भी हैं हैरान
किन जमानों से बात करते है ।