जिसको दिल में छिपा के रक्खा था
अब उसे ढूंढ रहे हैं देखो.
Post – 2017-05-14
देववाणी (बत्तीस)
चन्द्रमा का बीच का शब्द द्र है । यह भी कौरवी प्रभाव है। मूल’तर’ था जो घोषप्रियता में ‘दर’ हुआ और कौरवी प्रभाव में त्र, तृ,’द्र’ ‘दृ’ , ‘द्रु’
हो गया।
अब निम्न रूपों पर ध्यान दें:
तर – पानी, तैरना, तरना, तर्पण – देवों, पितरों की प्यास बुझाना, तारना – जल धारा से पार कराना, पितरो को प्रेतयोनि से मुक्ति दिलाना, तरी/ तरणी, – नौका, तरणि – सूर्य, तारा – आंख की पुतली, तारक / तारा, तारिका . तालिका – सूची, तीर्थ – तटीय या संगम का जनसंगम क्षेत्र जहां आदिम अवस्था में खाद्यान्न की प्रचुरता के दिनों में मुक्त जनसमागम होता था और जिसे बाद में पवित्र माना जाने लगा और उन विशेष दिनों में यज्ञ और स्नानादि को महत्व दिया जाने लगा, तरसना – पानी की लालसा, किसी भी अभाव की पूर्ति की उत्कट कामना, तिरसा – प्यास – कौरवी प्रभाव में तृषा/ तृष्णा – किसी अभाव की उग्र चेतना, त्रास – पिपासा जन्य व्यग्रता, उत्कट पीड़ा से गुजरना, त्रस्त – पिपासा ग्रस्त, ऐसी पीडा भोगता व्यक्ति , संत्रास / संत्रस्त, त्राहि – प्यासा मर रहा हूं कोई कोई पानी पिला कर मेरी प्राण रक्षा करे, मरणासन्न हूं, प्राण रक्षा करो, त्राण – पानी पिला कर प्राण बचाना, किसी भी संकट से मुक्ति दिलाना, किसी अन्य प्रकार से रक्षा करना,
अब हम कुछ और शब्दों को देखें:
1. द्रव, द्रवित, दारु, दारू, दरिद (दरिद्र, दारिद्र्य), दारा -( देखें कान्ता, भामा), द्रप्स, द्राक्षा, दर्प, दर्प, दर्पण, दृप्त।
2. दृक – दिक, दिश, दृग, दृश, दृष्टि, दर्श, प्रतिदर्श, आदर्श, दर्शन,वै. दृशीक, सुदृशीक, दृशेय (पितरं च दृशेयं मातरं च ), दर्शन (शास्त्र) ।
3. द्रु, द्रुण – लकड़ी का बना हुआ अर्थात् (1) डोंगी-(द्रुणा न पारमीरयते नदीनाम् ), (2) कठौत (द्रुणा सधस्थमासदत् ) और (3) दर्शन, उसी तरह लकड़ी के बने वर्तन डोंगा, डोंगी, जो उपादान बदल जाने के बाद कांच का, धातु का या चीनी मिट्टी के हों तो भी आप डोंगा, डोंगी शब्दों का प्रयोग आज भी करते हैं। ( ३), द्रुघण (द्रु =दारुमय+घन), द्रुण – लकड़ी का बना कोई हथियार या औजार जैसे मुग्दर (प्रति द्रुणा गभस्त्योर्गवां वृत्रघ्न एषते ), द्रोण – काठ का आधान जो सोलह मानी या सोलह सेर का सोलहगुना होता था, और (4) द्रोणाचार्य का अर्थ होगा मुग्दर विद्या में पारंगत। वे ऐतिहासिक थे या पौराणिक परन्तु शब्द से वह धनुर्विद्या के आचार्य नहीं गदायुद्ध में पारंगत लगते हैं। वै. द्रोघवाच – चोट पहुंचाने वाली बात करने वाला, द्रोह (विद्रोह), द्रुह्यु, द्रुहो निदो … अवद्यात् , सिंहमिव द्रुहस्पदे
४- द्रव – गतिशील, वे. द्रवतपाणि – फुर्तीली भुजाओं वाला, द्रुत – तेज गतिवाला, द्रुति- तेजी, द्रुपद – तेज भागने वाला या फुर्ती से पैतरे बदलने वाला.
अब इस पूरी समस्या पर एक दुसरे कोण से विचार करें:
क. तर्पण, त्रास, त्राण, त्राहि माम की अवधारणाएं किस जलवायु या कटिबंध में पैदा हो सकती है. यह भाषा किस भौगोलिक परिवेश में पैदा हुई. सचाई का प्रत्येक अणु उसकी असलियत बताता है. गढ कर खड़े किए गए फर्जी गवाह अपनी कसमों और रते हुए जुमलों के बावजूद अपनी असलियत बयान कर देते हैं. दुखद है कि भौतिक गुलामी मानसिक रूप में हमें इतना परजीवी बना देती है कि हम लंगड़ी दलीलों का लंग्दापन भी उजागर करने में विफल रहे. ये भरी भरकम नामों और कामों वाले विद्वान कितने धुप्पलबाज थे इसका एक नमूना ब्लूमफील्ड हैं जिन्होंने अथर्ववेद के उन सूक्तों का अनुवाद किया जिनका तंत्र मन्त्र और जादू टोन से सम्बन्ध है, इसी इरादे से उभोने वैदिक कंकार्डेंस का संपादन भी किया . उनका तर्क था कि स्नो शब्द से पता चलता है कि भारोपीय बोलनेवाले शीतप्रधान जलवायु के निवासी थे. उनकी नज़र उसी स्न से निकले स्नेक, स्नेल और सं. के स्नान आदि की और नहीं गया. यही हल सबका रहा है.
ख. इस विपुल शब्दाव्ली का एक क्षुद्र अंश ही यूरोपीय भाषाओँ में – ड्राप, ड्रिप, ड्राई, drought , थर्स्ट आदि के रूप में पहुंचा है. जब विलियम जोंस संस्कृत की समृद्धि (कोपिअसनेस ) की बात कर रहे थे तो उन्हें इसकी कल्पना भी न रही होगी कि इसका अनुपात क्या हो सकता है.
Post – 2017-05-13
टिप्पणी तीन
चन / सन से सम्बंधित शब्दावली का हवाला देकर हम आपको थकाना नहीं चाहते, पर नाद के विलोम सन्नाटा (सन्नाटा नीरवता नहीं, इसे सांय सांय करते सन्नाटे से समझा जा सकता । इसमें हवा की सनसनाहट का भाव है) और संवेगात्मक क्रिया सनसनी या सनसनाहट (जो वास्तव में तपी हुई मिटटी पर पानी पड़ने से उत्पन्न ध्वनि का अनुकार है), की ओर और काल के लिए ‘समय’, और ‘सन’ पर ध्यान देना जरूरी है. सन को सम्वत के कारण और फ़ारसी में हिज़री सन् और ईस्वी सन् जैसे प्रयोग देखकर हम भूल सकते हैं की यह बहुत पुराना, सम्भवतः देववाणी का शब्द है। सम्वत का सम् और समय का सम और सनत, सनातन, सनन्दन की कहानी का सन काल सूचक है । ये इस बात की भूली हुई याद ताज़ी कराते हैं की चवर्ग प्रेमी समाज से परिचय और हेलमेल से पहले सूर्य या चाँद के लिए देववाणी में भी सन का प्रयोग होता था और चान और चाननी की तरह यह सूरज, धूप, और समय या बेला के लिए प्रयोग में आता था और बाद में कालदेव के चिर बाल और फिर भी चिरंतन रूपों (भूत, वर्तमान और भविष्य ) का मूर्तन इसी के आधार पर हुआ। अब यदि आप इस नंग धरंग, चिर शिशु त्रिमूर्ति की उपनिषद कथा फिर पढ़ें तो इनसे सभी देव क्यों कांपते हैं, इसे समझने में कुछ मदद मिल सकती है।
Post – 2017-05-13
टिप्पणी दो
ऋग्वेद के समय तक देव समाज में पानी, चमक तथा चाँद को मन कहने वाला समाज इतने पहले मिल चुका था कि इस समाज को यह भूल चुका था कि प्रकाश, और जल और चाँद के लिए स्वतंत्र रूप में मन का प्रयोग होता था. मन तो गुजरात के खदिर की दो जल धाराओं मनहर और मनसर और मानसरोवर को छोड़कर जलार्थकता की याद दिलाने को कहीं बचा ही नहीं। ऋग्वेद में एक स्थल पर – चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि । में पानी के भीतर इसके निवास और उसी के आकाश में गतिमान होने का हवाला अवश्य है, पर इस पुरे सन्दर्भ पर ध्यान दिए बिना अर्थ करते हुए सर घूम जाए। ज्ञान और प्रकाश की याद तो मन, मति, मणि, मनका में फिर भी बचा है। अंग्रेजी मून, और मंथ का तो तब पता न था।
Post – 2017-05-13
जो बात कल किसी वायरल हमले से उलट पलट गई उसे पूरक टिप्पणियों में रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ;
टिपण्णी एक
१- हम चानी कहते है तो देववाणी के उस चरण की भाषा में चांदी कहते हैं, जब तालव्य प्रेमी समाज देवसमाज का अंग बन चुका था . यह सम्भव है की इससे पहले देवसमाज को इस धातु का पता ही न रहा हो. जब चन्द्रम कहते है तो उस चरण की भाषा में चांदी कहते है जब पानी के लिए सन और चन प्रयोग करने वाले देव समाज में इसके लिए तर का प्रयोग करने वाला समाज भी आ मिला था और इस पर कौरवी प्रभाव के कारण देववाणी संस्कृत बनने की और अग्रसर थी. समाज चांदी सोने का भरपूर उपयोग कर रहा था. चंद्र पानी, प्रकाश, चन्द्रमा, शोभा, और आनंद आदि के आशय में भी प्रयोग में आरहा था. और जब चांदी कहते हैं तो देवभाषा के प्रभाव में संस्कृत चन्द्रम को अपने ध्वनिविन्यास में ढाल कर ग्रहण किया जा रहा था, इसलिए इसे तद्भव न कह कर अनुकूलन कहना अधिक न्यायसंगत होगा.
Post – 2017-05-12
देववाणी (इकतीस)
कसौटी (१)
(आज अनेक बुरे अनुभव हुए. जो लिखा वह उड़, गया. बच रहा उसे अधुरा समझ कर पढ़ें)
यदि हम जलपरक ध्वनियों को लेकर यह देखना चाहें कि इनसे उन कोटियों के कौन से शब्द बनते हैं, बनते भी हैं या नहीं, अथवा उन श्रेणियों में आने वाले किसी शब्द को ले कर यह जांचना चाहें कि यह किसी जलवाची शब्द से जुड़ता है या नहीं तो परिणाम एक जैसा ही होगा। हम विचार के लिए पहले चन्द्रमा में सम्मिलित चारों शब्दों को लेंगे और फिर अकारादिक्रम से जितने शब्दों पर संभव होगा विचार करते हुए एक शब्दभंडार तैयार करेंगे। संभव है तब तक हमारे मित्रों को यह समझ में आ जाय और यदि मुझसे यह पूरा न हो सके तो इस अधूरे काम को वे पूरा कर सकें।
चं./ चन / चम का पानी आशय वाला शब्द याद नहीं आ रहा । इसका एक कारन यह है अन्न की तरह चन का भी अर्थ अन्न विशेष अर्थात चना हो गया था । आज यदि किसी से कहें की अन्न का अर्थ जल था तो उसे हैरानी होगी। ऋग्वेद के समय तक पुराना अर्थ बचा हुआ था। चन और चना का भी पुराना अर्थ बचा हुआ था। इसे समझने के लिए हम कुछ वैदिक प्रयोगों पर ध्यान दें :
चनः (1.3.6) हविर्लक्षणमन्नं; (1.107.3; 2.31.6) अन्नं,
चनस्यतं (1.3.1) इच्छतं, चनशब्दो अन्नवाची, भुंजाथां
चनिष्टं (7.70.4) कामयेथां,
चनिष्ठं (5.77.4) बहुअन्नं कर्म,
चनोहितः (3.2.2) चनोऽन्नं हितं यजमाने, (3.11.2)अन्नं हविर्लक्षणं हितमस्येति,
चन्द्रअग्राः (5.41.14) आह्लादनं हिरण्यं वा अग्रे,
चन्द्रं (3.31.15) हिरण्यं,
चन्द्रं (4.2.13) आह्लादकारी
चन्द्ररथाः (6.65.2) कान्तिरथाः,
चन्द्रा (4.23.9) चन्द्राणि आह्लादकानि,
चन्द्रवत् (5.57.7) हिरण्योपेतं,
चन्द्राग्रा (6.49.8) हिरण्यप्रमुखा,
चन्द्रास: (3.40.4) आह्लादयितार:
चन्द्रेण (1.48.9) सर्वेषां आह्लादकत्वेन,
चन्द्रेण (1.135.4) आह्लादकेन हिरण्येन,
चन अन्न, कामना, कान्ति, आह्लाद, चांदी / सोना, के आशयों में ऋग्वेद में प्रयोग हुआ है । संस्कृत पर अधिक भरोसा करने के कारण यह सुझाव देने वाले मिल जायेंगे की चना संस्कृत चणक का अपभ्रंश है, पर ऋग्वेद से इस भ्रम का निवारण हो जायेगा और तब पता चलेगा की चणक स्वयं चना का तद्भव है.
स. आ-चमन में, और फिर तरल पदार्थ को उठाने के लिए – चमस, चमू, चम्वी, हिं. चम्मच और रसदार मिठाई चमचम में इसे पाया जा सकता है। नदी नामों में चंबल और चनाब / चिनाब में भी लक्ष्य किया जा सकता है कि इसका मूल अर्थ जल था । यह आशय अं. चैनेल / कैनाल और इसके सगोत यूरोपीय शब्दो में भी देखा जा सकता है।
पानी का एक गुण है शीतलता, इससे चैन, चन्नन (चन्दन और च / स के कारण सन्दल)। यह हिम और तुषार से लेकर तृप्तिदायक पेयतक पहुंच सकता है
यह एक ओर तो पानी के जमे !अधजमे विरोध आग से तो है ही चमक के कारण भी यह आग के लिए संज्ञा हाजिर क्र सकता है इसलिए चिनार, चिनगारी, में इसे लक्ष्य किया जा सकता है । चिनार की पत्तियां जब पतझड़ से पहले लाल होती हैं तो लगता है आग लगी हुई है । इस कारण इसका नाम ही अग्निवृक्ष है। जब आप चमड़ी में चिनचिनाहट की बात करते हैं तो जलन होने की शिकायत करते हैं। यहाँ मुझसे कुछ शिथिलता हो रही है. चिन और चिल का भी अर्थ पानी है और जैसा हमने देखा ये आग के लिए प्रयोग में आ सकते हैं। चिलम का अर्थ अबतक पता न रहा हो तो अब पता भी चल गया होगा पर इससे इस कर्म में बचना उचित था। हाँ यदि चण्ड, चण्डाल को इस कतार में खड़ा करते तो कोई हानि न थी.
जल प्राकृतिक दर्पण है इसलिए इस पर सभी रंगों का बिंब पड़ता है। अतः प्रकाश से लेकर अन्धकार तक के समस्त रंगों के लिए जल के किसी न किसी पर्याय का प्रयोग हुआ है । अतः चमक, चमकीला, चान (चांद), चाननी (चांदनी), चमकने वाली धातु- चानी (चांदी, वै. चन्द्रम्, चन्द्राणि) त. चन्दिल -शनि, आदि इसके सहजात हैं तो दूसरी ओर फा. शान, और अं. सन- सूरज, सन-धूप, शाइन, सीन , सी , साइट विचारणीय हो जाते है।
कल सम्भव हुआ तो पूरा करेंगे,
Post – 2017-05-12
“It is an old and established maxim that obsolete social forces, nominally still in possession of all the attributes of power and continuing to vegetate long after the basis of their existence has rotted away, in as much as the heirs are quarreling among them over inheritance even before the obituary notice has been printed ant the testament read – that these forces summon all their all their strength before the agony of the of death, pass from the defensive to the offensive, challenge instead of giving way and seek to draw most extreme conclusions from the premises which have not only been put in question but already condemned.”
Karl Marx, to Angels dt. London June 25, 1855
Post – 2017-05-11
देववाणी (तीस)
कुछ कह सके हैं कुछको जानते भी नहीं हैं
अब हम एक एक शब्द पर यह देखने के लिए विचार करेंगे कि क्या उनमें उन नियमों का निर्वाह होता है जिन्हें हमने भाषा की उत्पत्ति का सिद्धान्त माना है। हमने इनमें से कुछ का उल्लेख किन्हीं प्रसंगों में किया है। यहां उनकाे एक साथ उल्लेख जरूरी है। परन्तु उससे भी अधिक जरुरी है यह समझना की अनेक के मूल में उनमें से कोई एक हो सकता है और ध्यान देने पर यह तय किया जा सकता है की वह कौन हैा समझना यह भी जरूरी है की पहले की प्रेरणा से ही सही, एक बार भाषा में अपना स्थान बना लेने के बाद कुछ क्षेत्रों से ग्राहक भाषा का शब्द दाता को अपदस्थ भी कर सकता है और इनमें से कोई यादृच्छिक रूप में आचरण नहीं करता। उसका अपना एक तर्क होता है।
हम जो सुनते हैं उसे बोलने का प्रयत्न करते हैं । परन्तु यह इतना आसान काम नहीं है। एक शिशु अपने परिवेश की ध्वनियों को सुनने की और उसका उच्चारण करने का लंबे समय तक अभ्यास करता है जिसे हम शिशु के संगीत में पाते हैं । इसके बाद वह जो पहली ध्वनि निकालता है वह बोधगम्य तो होता है, पर अपेक्षा से कुछ घट कर होता है। आगे भी कुछ समय तक यह अटपटापन बना रहता है । हम इसे तोतली जबान कहते है (तोतली का मतलब क्या तोते की तरह सुने वाक्य को इस तरह दुहराने की क्रिया के लिए प्रयुक्त हुआ होगा जिसमे वाक्य समझ में आ जाता है यद्यपि उच्चारण सही नहीं होता ?)। सही सही सुनने या बोलने के लिए हमें लंबा अभ्यास करना होता है।
अतः जितना सच यह है कि चन, सन, द्र, मन, मस अनेक भाषाई समुदायों के आपस में मिलने और एक बृहत्तर सामाजिक संरचना के अंगभूत होने का प्रमाण हैं, उतना ही सच यह नहीं है कि परस्पर मिलने से पहले उन सभी में ये शब्द रहे हों और उन्ही अरथों में प्रयोग में आते रहे हों। यह संभव है कि जल के लिये जिस समुदाय में सं, सन् का चलन रहा हो उससे मिलने से पहले चं, चन् बोलने वाले की बोली में चं, चन् रहा ही न हो। उसने यह शब्द सं, सन् बोलने वालों से लिया। लिया कहना भी सही नहीं है वह सं और सन को, चन् के रूप में सुनता और बोलता रहा हो। इसे उलट कर भी रखा जा सकता है । कालान्तर में दोनों समुदाय अपनी पृथक पहचान भूल गए। दोनो वध्वनियां साझी ध्वनिमाला का हिस्सा बन गईं और दोनों शब्द उनके शब्दभंडार का अंग ही नहीं बन गए अपितु उनका विशेष सन्दर्भों में दूसरे की अपेक्षा अधिक प्रयोग होने लगा।
उदाहरण के लिए वजन का प्रचलन होने के बाद हम बाजार की भाषा में पूछते हैं इसका वजन कितना है? वजन अधिक हुआ तो कहते हैं भारी है। भार कितना है? तौल क्या है? या बहुत वजनी है, कहने वाले भी मिल जाएंगे, पर औसत से बहुत कम और सुनने वाले को कुछ अटपटे भी लगेंगे ।
हम दन्त्य प्रेमी देववाणी की बात कर रहे हैं तो इस समाज में चकार प्रेमी समुदाय कुछ बाद में मिला, अत: पानी का इसका शब्द ‘सम / ‘सन’ होना चाहिए। कारण देववाणी स्वरांत या अजंत बोली थी जिसमे असवर्ण संयोग नहीं होता था। भोज. में यह समसना, सानना, आदि में बचा है। कौरवी प्रभाव में यह ‘स्न, स्नेह, स्नान, बना और अंग्रेजी में स्नो, स्लो, स्नेक, स्नीक, स्नेल में दिखाई देगा परन्तु जिस चरण पर हम पहुंचे हैं उस पर इसे समझने में कठिनाई होगी। इसलिए यह याद दिलाना जरूरी है कि:
१. विविध भावों, अवस्थाओं, गुणों, अनुभवों और मनोरागो को अपनी संज्ञा किसी न किसी जलवाची शब्द से मिली है क्योंकि इनसे कोई ध्वनि नहीं पैदा होती जो इनकी संज्ञा बन सके.
२. ऐसी भैतिक सत्ताओं के लिए जिनमें स्वतः कोई क्रिया नही होती उनको अपनी संज्ञा जल की किसी क्रिया से उत्पन्न ध्वनि से मिली है।ह
३.गति के विविध रूपों को अपनी संज्ञा जलपरक शब्द से मिली है।
४. समस्त खाद्य और पेय पदार्थों, अनाजों, ओषधियों को अपनी संज्ञा जल के किसी पर्याय से मिली है।
५. सभी रंगों, रूपों के लिए, अंधकार से लेकर प्रकाश तक को अपनी संज्ञा जल के किसी नाम से मिली है।
६. सभी नदियों और जलाशयों का नाम तो जल के किसी पर्याय से जुड़ा रहेगा ही, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
७. क्षुद्रता और महिमा, अणु और ब्रह्माण्ड, छोटी से छोटी संख्या और बड़ी से बड़ी सभी के मूल में कोई जलवाची शब्द मिलेगा. क्यों मिलेगा यह बताएं भी तो लाभकारी न होगा।
8. कर्म, सातत्य, अनंतता, काल के सभी अभिधेय जलपरक हैं।
और भी कोटियां हैं जिनको गिनाना सभव नहीं ।
Post – 2017-05-10
शब्दक्रीडा
यह तो होना था, हो गया भी लो
पर्दा उठना था उठ गया भी लो
हमको मरने का ढूँढना था सबब
तुम मिले और मिल गया भी लो
लोग सादे है और सीधे है
क्यों बुरा मानें बुरा होने का
जितना चाहो बुरा करो उनका
बाद में उनकी फिर दुआ भी लो
अच्छा क्या है कहो बुरा क्या है
जो हुआ बस उसी को होना था
समझ इतनी है तो जमी हाज़िर
और ऊपर से आसमां भी लो
तुम भी भगवान आदमी तो बनो
आसमां में जगह बची ही नहीं
उम्र के साथ अक्ल भी खो दी
मेरी मानो कोई दवा भी लो .
Post – 2017-05-10
देववाणी (उनतीस)
फिर वही बात चांद तारों की
अब हम नए सिरे से चन्द्रमा पर विचार करें । इससे कुछ रोचक प्रश्न खड़े होते हैं । पहला तो यही कि क्या यह सही है कि यह चार शब्दों के मेल से बना है और उनमें से हर एक का मतलब चांद था? क्या एक ही आशय के कई शब्द मिल कर एक साथ उसी या उससे मिलते जुलते आशय में प्रयोग में भी आसकते हैं ?
दूसरा, क्या ये सभी शब्द मूलत: जलवाची थे?
तीसरा, क्या जब हम चन्द्रमन् कहते हैं तो तीन बार चांद कहते है और मुख्यधारा का अंग बनने वाले एक समुदाय के चांद को छोड़ देते हैं और जब चन्द्रमस् कहते हैं तो भी तीन बार चांद कहते हैं और एक समुदाय के चांद को छोड़ देते हैं?
चौथा प्रश्न यह कि जिस चरण पर भारतीय संपर्क भाषा का तथाकथित भारोपीय क्षेत्र में प्रसार हुआ, उस चरण पर इन सभी समुदायों के शब्द प्रयोग में आते थे ? यदि हां तो क्या इन सभी के चन्द्रवाची शब्दों का देशान्तर में प्रसार हुआ?
पांचवा, ऊपर, प्रश्न दो का निहितार्थ क्या है ?
छठां, चौथे प्रश्न का फलितार्थ क्या है ?
हम पहले प्रश्न को लें। इससे पहले भाषा के समाजशास्त्रीय पक्ष के सन्दर्भ में किसी अन्य अध्येता ने इस प्रश्न को उठाया है या नहीं , यह अपने सीमित ज्ञान के कारण मुझे नहीं मालूम, परन्तु इसके अनगिनत उदाहरण मिलते हैं: तमिल तण् = पानी +नीर=पानी, > तन्नी=पानी, ठंढा पानी; जल+आब =जुलाब; तर/ तल =पानी+आब =तालाब; त. तण् +आग= तड़ाग, (अभी यह सवाल न दागें कि आग का अर्थ पानी कैसे हो सकता है, मुझ पर भरोसा रख कर मान लें कि होता है)।
दूसरे प्रश्न का उत्तर हां में ही देना होगा । पर इसके लिए इनमें से एक एक के विस्तृत विवेचन की अपेक्षा होगी। इसे हम कुछ रुक कर उठाएंगे।
तीसरे प्रश्न का उत्तर भी हां ही है परन्तु इस सुधार के साथ कि हम वास्तव। में चांद कहते हुए भी चमकने वाला कहते है, इसलिए उसी का प्रयोग किसी दूसरे चमकने वाले ग्रह या नक्षत्र के लिए कर सकते हैं। जब आप चांद सा चेहरा या माहजबीं कहते हैं तो भी चमकते हुए चेहरे की ही बात करते हैं।
चौथे का उत्तर देने से पहले यह याद दिलादें कि चकार प्रेमी समुदाय की भाषा में स ध्वनि नहीं थी। वह उसका उच्चारण च के रूप में करता था, तमिल में स्वामी को सामी अर्थात् चामी लिखा और बोला जाता है सं. प्रभाव में इसे सामी भी बोलते हैं इसलिए चान फारसी में शान बना (और सनक और सनकी भी चन्द्रमा के लिए चन/सन से संबन्ध रखता हो तो कुछ अचरज की बात नहीं ) और अंग्रेजी में sun बन गया, द्र (तर/ दर कौरवी प्रभाव में त्र/ तृ, द्र/दृ), drop और निषेधात्मक dry और drought में मिलेगा। प्रकाश वाला भाव भारत से ही वै. स्तृ = तारा बन कर निर्यात हुआ और अंग्रेजी star/ starry और stare में दिखाई देता है। PIE के चक्कर और मूल स्रोत से बचने कतराने के कारण इनकी जो व्युत्पत्तियां पश्चिमी व्युत्पत्तिकोशों में दी गई है इसकी जॉंच पड़ताल का काम उन मित्रों को संभालना चाहिए जिन्हें इसमें निपुणता प्राप्त है । मस् जैसा हम पहले देख आए हैं सं. मास में, फा. माह में तो है ही । यूरोप की किसी बोली में पहुंचा या नहीं, पता करना होगा। निष्कर्ष यह कि भारतीय आर्य भाषा या सेठों साहूकारों और अभिजात वर्ग की भाषा में जल और प्रकाश तथा प्रकाश पिंडों के लिए प्रयोग में आ रहे थे और हड़प्पा के संपर्क क्षेत्र में इन सभी का प्रसार हुआ ।
पांचवे और छठे प्रश्नों का उत्तर बहुत रोचक है। प्रकाश के लिए सभी में संकल्पनातमक समानता एक ही सामािजक गठन से पहले भी लंबे आदान प्रदान और सोच विचार में निकटता का ही परिणाम हो सकता है। कहें, अलगाव की अवस्था में भी सांस्कृतिक एकसूत्रता पैदा हो चुकी थी । ये सभी भाषाई समुदाय वर्षाबहुल प्रदेश के निवासी थे जिनका नैसर्गिक ध्वनि परिवेश जल की विविध गतियों, क्रियाओं और अवस्थाओं से निर्मित था ।