Post – 2016-12-26

इतिहास के पीछे इतिहास

”हम दुनिया के सबसे भले लोग हैं। भला कहाने का उससे अधिक चाव है । इसे आप हमारा भोलापन भी समझ सकते हैं। भोला का कुछ संबंध भूलने से भी है। जिन्‍हे देश दुनिया का पता न हो, अपने वर्तमान और इतिहास का पता न हो, जिममें किसी तरह की चालाकी न हो, उन अबोध शिशुओं और बच्‍चों के लिए हम भोला का प्रयोग करते हैं और करते हैं भोलानाथ के लिए जिनको भी इस नासमझी के लिए ही जाना जाता है। भोला व्‍यक्ति दूसरों की नजर में भला बने रहने के लिए उसकी इच्‍छा की पूर्ति करता हुआ गौरव अनुभव करता है। वह अपनी समस्‍याओं का सामना नहीं करना चाहता, या अपनी समस्‍या को अपनी भलमनसाहत की रक्षा की समस्‍या के रूप में देखता है । यह दासता का ऐसा रूप है जिसमें जातीय अपमान को सहन करते हुए, अल्‍पतम संरक्षण को अपने सम्‍मान की बात समझा जाता है और अपमानित होने के बाद भी स्‍वामी के हित की चिन्‍ता से न डिगने को अपने गौरव की कसौटी माना जाता है। परंपरागत रूप में इसे स्‍वामिभक्ति कहा जाता रहा है जिसमें अपना मान सम्‍मान अपमान और उत्‍पीड़न कोई अर्थ नहीं रखता, सम्‍मान की कसौटी है स्‍वामी के अोदश, हित या नियोजित कार्य की सिद्धि
– मोहि न कछु बांधे कर लाजा । करन चहहुं निज प्रभु कर काजा । व्‍यक्ति इसमें निमित्‍त बन कर रह जाता है, या उसकी हैसियत औजार, या हथियार की हो जाती है। इसे अमानवीकरण की प्रक्रिया से जोड़ कर देखें तो चौंक उठेंगे यह सोच कर कि प्रबुद्ध से प्रबुद्ध व्‍यक्ति ही नहीं, पूरा समुदाय डिह्यूमनाइजेशन का शिकार होने के बाद भी अपने को दूसरों से अधिक उदार और समावेशी मानते हुए इस पर गर्व करता है। ज्ञान उसके पास होता है, परन्‍तु न वह आत्‍मज्ञान होता है, न ही इतिहासबोध, न वस्‍तुबोध। वह बौद्धिक रूप में अपने स्‍वामी या स्‍वामिवर्ग के समक्ष समर्पण कर देता है और अपनी जानकारी को उसकी अपेक्षाओं की पूर्ति काे उचित सिद्ध करने पर लगाता है।”

शास्‍त्री जी हाथ जोड़ कर खड़े हो गए, ”डाक्‍साब आज आप यह समझाने वाले थे कि यह हिन्‍दू द्रोह हिन्‍दुअों के भीतर कैसे पैदा हुआ और आप भले बुरे की मीमांसा आरंभ कर दी ।”

यह दासता का ऐसा रूप है जिसमें भला सिद्ध होने की उत्‍कंठा

”जब हम सभ्‍य हुए दुनिया बर्बरता की अवस्‍था में थी। जिन पुरानी सभ्‍यताओं को

इससे एक लालसा पैदा हुई कि हमें सभी बहुत अच्‍छा समझें और पैदा हुआ वह विश्‍ववाद या कहिए धरती का जितना भूगोल हमें पता था उसके प्रति एक मैत्री भाव, उसके कल्‍याण की चिन्‍ता, उसके साथ अपना और उन सबका भला सोचने और करने की एक लालसा। यह लालसा व्‍यक्तिनामों में विश्‍वामित्र, विश्‍वबन्‍धु, सु्न्‍धु, जैसे नामों में भी व्‍यक्‍त है और उन दिवस्‍पुत्रा अंगिरसा भवेम, कामनाओं में भी कि सभी कृषि, पशुपालन, बागबानी सीख कर सभ्‍य जीवन अपनाएं या आर्यव्रत धारण करें इसकी चिन्‍ता थी और उन मूल्‍यों के प्रसार का आवेश था जिसमें उनको लगता थ कि वे समस्‍त जगत में आर्यव्रत का प्रसार कर देंगे। आर्याव्रता विसृजन्‍त: अधिक्षमि । या कृण्‍वामो विश्‍वमार्यं का व्रत । परन्‍तु इससे एक ग्रन्थि भी पैदा हुई इसे यदि हिन्‍दी में कहें तो ‘मो सम और न कोय’ ग्रन्थि कहा जा सकता है जो अग्रणी समाजों में अपने अग्रता के दिनों में पाई जाती है। परन्‍तु हम अपने ह्रास के दिनों में दूसरी सभ्‍यताओं के कुछ आगे सथे

ास्‍त्री जी, इतिहास की विडंबना यह है कि इसे हमेशा बीच से आरंभ करना हाेेता है क्‍योंकि कोई घटना या क्रिया जहां हमेंं दिखाई देती है उसके पीछे ज्ञात और अज्ञात कार्यों और कारणों की एक लंबी शृखला होती है जिस पर ध्‍यान दें तो लगेगा दुनिया में कुछ भी ऐसा है ही नहीं जा नया हो । शेक्‍सपियर का वह वाक्‍य याद है न ‘दुनिया में कुछ भी नया नहीं है। नथिंग इज न्‍यू अंडर दि सन।

”मुझे अंडर दि सन का एक दूसरा मतलब समझ में आता है, जो दुनिया में नहीं, बल्कि ‘हमारी जानकारी में’ । जो भी हो , इससे फर्क नहीं पड़ता । यह एक पुरानी, बहुत पुरानी सूझ है जो वटबीज में वटवृक्ष की उपस्थिति से या पुरुष सूक्‍त की उस व्‍याख्‍या से जुडी है जिसमें सृष्टि के आदि में ही एक साथ सब कुछ के घटित हो जाने परन्‍तु हमारी दृष्टि में यथाक्रम आने के रूप में कल्पित है ।”
मैं हैरान हो कर शास्‍त्री जी को देखने लगा । इतनी पैनी दृष्टि की तो मैंने उनमें कल्‍पना ही न की थी।

Post – 2016-12-25

देवता आंसू नहीं बहाते

आज शास्त्री जी कल की अपेक्षा संयत थे। चेहरे पर एक झिझक भरा खिंचाव संभवतः कल की दुर्बलता के कारण था। वह कुछ कहते उससे पहले मैंने ही छेड़ा, ”कल आप कुछ अधिक विगलित हो गए थे ।

शास्त्री जी ने हंसते हुए झेंप छिपानी चाही तो झेंप अधिक उजागर हो गई, ‘‘मैं अपने लिए विगलित नहीं हो गया था! यह सोच कर विचलित था कि साहित्‍य, कला, दर्शन, शालीनता सभी दृृष्टियों से बंगाल अग्रणी रहा है। इसमें मुसलमानों की भी भागीदारी रही हैै फिर भी क्‍या कारण है वही बंगाल नोआखाली से कलकत्‍ता तक के सबसे जघन्‍य और अकारण उकसाए गए दंगो का शिकार रहा और आज भी उससे उबर नहीं पाया है। सीपीएम के शासन में भी यदि दंगे हुए तो किदिरपुर में और बहुमत के बाद भी पूरा कलकत्‍ता कई दिन तक अपने बचाव के लिए चिन्तित रहा। अब त्रिणमूल के शासन में उपद्रवकारी घटनाओं और तैयारियों की बाढ़़ आ रही है जैसे सरकार स्‍वयं इसे बढ़ावा दे रही हैै। अनुपात में तनिक भी अन्‍तर आते ही उन्‍ही बंगालियों से जो मुसलमान बनी आबादी में कहां से वह हिंसात्मकता फूट पड़ती है कि हिन्‍दुओं का सम्‍मान से जीना मुश्किल हो जाता है और हिन्दुओं में इन उकसावों के बाद भी ऐसा कार्पण्य बना रहता है कि वे उनका प्रतिरोध तक नहीं कर पाते! ऐसी सभ्यता किस काम की जो आपको बलिपशु बना दे। बंगाली नक्सल आन्दोलन कर सकते हैं, माओवादी हो सकते है, अपनी सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं क्योंकि जानते हैं कि सरकार नागरिकों से उसी तरह पेश नहीं आ सकती जिस तरह वे सरकार और नागरिकों से पेश आते हैं, पर जहां सचमुच अपना साहस दिखानेे और आत्मसम्मान बचाने की चुनौती हो वे अपना बचाव करने की चिन्‍ता तक नहीं करते । क्‍या सभ्‍यता का नियम असभ्‍य लोगों के साथ निभाया जा सकता है। चिन्‍ता का विषय तो यह आपको भी लगता होगा, आप ने भी कभी इस पर तो लिखा नहीं । शिकायत तो मुझे आपसेे भी थी। ऐसी घटनाओं पर आप भी चुप रह जाते हैं या इनसे ध्‍यान हटाने के लिए वह तूूमार बांधते हैं जिसमें आए दिन हमें इनके उपद्रव झेलने पड़ते हैं और आप अमेरिका और गोरेे देशों का खतरा दिखाते हुए इनके साथ सहयाेग करने को कहते हैं । आप भी इतिहास से लेकर समाजशास्‍त्र तक का इकहरा पाठ करते हैं जिसमें हिन्‍दू की पीड़ा आपको भी पीड़ा से कुछ कम नजर आती है और उनकी पीड़ा पर आप धर्मोपदेश देने लगते हैं ।”

”शास्‍त्री जी, पहली बात तो यह कि यदि आप सोचते हैं कि इतनी जटिल समस्‍या का समाधान मेरे पास है तो मेरी समझ पर आप पर कुछ अधिक भरोसा है । सभ्‍यता का निर्वाह करते हुए हम पशुता का सामना नहीं कर सकते, असभ्‍य लोगों के साथ सभ्‍यता के नियम नहीं चल सकते, इसलिए हमे पशुओं के साथ पशु बन जाना चाहिए और असभ्‍योंं का प्रतिवाद करने के लिए हमें असभ्‍य हो जाना चाहिए और फिर जब उनसे निबट लें तो फिर सभ्‍य बनेें, यह मेरी समझ में नहीं आता । फिर भी मैं संतप्‍त लोगों को यह नहीं समझा सकता कि सभ्‍यता कादरता का पर्याय है। सदसि वाक्‍पटुता युधि विक्रम:, ऐसा ही कुछ है न भर्तृहरि के एक श्‍लोक में, आप को तो याद होगा।

”मनुष्‍य ने सभी दृष्टियों से अशक्‍त होते हुए भी पशुओं पर और असभ्‍य जनों पर विजय पाई है तो सभ्‍यता के बल पर ही। सभ्‍यता को दुर्बलता न समझें, यह मनुष्‍य को मनुष्‍य बनाती है और इसके बल पर ही मनुष्‍य ने समस्‍त प्राणियों पर और पिछड़े और बर्बर समाजों पर विजय पाई है ।”

”आप कहना चाहते हैं कि जिन्‍होंने विजय पाई है वे उन लोगों से अधिक सभ्‍य रहे हैं जिन पर उन्‍होंने विजय पाई । और इसलिए वे नृशंस जन जिन्‍होंने सभ्‍यताओं को नष्‍ट किया, सभ्‍य जनों को अपना दास बनाया वे उन सभ्‍य लोगों से अधिक सभ्‍य थे। इसके लिए तो हमे सभ्‍यता की एक विचित्र परिभाषा गढ़नी होगी, जो विेजेता है वह अधिक सभ्‍य है। जो उच्‍च जीवनमूल्‍यों के कारण पाशविकता पर न उतर पाया वह असभ्‍य था।” शास्‍त्री जो ने मुझे घेर लिया । इसका सबसे बड़ा लाभ यह था कि उनका अनुताप कम हो गया था और स्‍वर में आत्‍मविश्‍वास लौट आया था। अब उनसे तार्किक विचार विमर्श संभव था।

मैंने हंसते हुए उनके तर्क कौशल का सम्‍मान किया और फिर कहा, ”सभ्‍यता शक्ति प्रयोग का बहिष्‍कार नहीं है, युक्ति से शक्ति को गुणित करते हुए उसका उपयोग करते हुए पशुबल को तुच्‍छ बनाते हुए उस पर विजय पाने और उनकी पशुता को कम करने की कला है ।

”आपको अपनी ही परंपरा के कुछ विक्षोभकारी प्रसंगों की याद दिलाएं जिसे देवासुर संग्राम या असभ्‍य जनों के सभ्‍य जनों से लंबे समय तक चलने वाले कलह की घटनाओं को प्रतीकात्‍मक शैली में अंकित किया गया है। इनमें देवों को असुरों के अत्‍याचार और उत्‍पीड़न का बार बार शिकार होना पड़ता है परन्‍तु वेे असुर या राक्षसी जीवन पद्धति काेे नहीं अपनाते । बार बार घबरा कर अपने देवों से सहायता मागते हैं और उनकी सलाह पर या तो कोई नई युक्ति निकालते हैं या रक्षक देव स्‍वयं उनकी रक्षा के लिए अवतार लेते और उनकाेे दंडित करते हुए उनके उपद्रव को कम करते हैं परन्‍तु कभी अपने जीवनमूल्‍यों के साथ समझौता नहीं करते ।

”उनको आसुरी शक्तियों पर विजय हिंसा के बल पर नहीं मिलती, उनमें चेतना का प्रसार करने, उनके जीवनमूल्‍यों में परवर्तन लाने और अपरिहार्य स्थितियों में शक्ति के प्रयोग से मिलती है। विजय अपने उन्‍नत विकास के बल पर, उसे दूसरों के लिए अनुकरणीय बनाने के द्वारा मिलती है और मिलती है अपने धैर्य और आर्थिक शक्ति के बल पर। आप तो संस्‍कृत साहित्‍य की मुझसे अधिक जानकारी रखते हैं, ”आपको वह सूत्र तो याद ही होगा, न वै देवा अश्रुुं कुर्वन्ति । देव रोते नही हैं ।

”और याद यह भी होगा और न याद हो , आप ने जैसा कहते हैं, मुझे अच्‍छी तरह पढ़ा है तो उसमें भी इसका संकेत मैने किया है कि देेवों काेे असुरों पर शस्‍त्र के बल पर विजय नहीं प्राप्‍त हुई, वह तो तात्‍कालिक उपचार था, विजय मिली आर्थिक प्रगति सेे । देेव रोते नहीं हैं, अध्‍यवसाय करते है, प्रयत्‍न में लगे रहते हैंं। वे जागरूक रहते हैं, जाग्रत‍ि देवा :। इसी का भाष्‍य है उत्तिष्‍ठ जाग्रत प्राप्‍य परान्निबोधत। देवो ने असुरों को शस्‍त्र से पराजित नहीं किया ‘ न वै देवा दंडै- धनुर्र्भि: वा असुरान् व्‍यजयन्‍त, उन्‍होंने यह चमत्‍कार शाकमेध से या आर्थिक प्रगति से की । ज्ञान साधना से की और वे ही असुर जो उनके साथ सहयोगी की भूमिका में नहीं आ सके विवश हो कर उनकी सेवा में आने को बाध्‍य हुए । शूद्राेें का इतिहास यही है। आज अपनी विफलता को भी एक उपलब्धि बना कर उसका लाभ उठाने के प्रयत्‍न में पुन: निष्क्रियता और परनिर्भरता को बढ़ाया जा रहा है यह आज की विडंबना है ।”

शास्‍त्री जी ने हाथ जोड़ लिए, ”डाक्‍साब, आप विषय को इस तरह फैला देते हैं कि विषय ही गायब हो जाता हैै। बच रहता है एक आभामंडल जो चकित तो करता है परन्‍तु समस्‍या का समाधान नहीं हो पाता ।”

”कुछ देर के लिए मैं भी विस्मित रह गया कि मुझसे चूक कहां हुई है। मुझे लग रहा था मैं अपने विषय पर ही बाेेल रहा हूं । खुलासा शास्‍त्री जी ने ही किया, ”धृष्‍टता के लिए क्ष्‍ामा करेे, पर मैं चााहता था कि आप इस बात का जवाब दें कि उसी समाज से ये दो तरह की प्रवृत्तियां कैसे पैदा हो गईं । यह जानना चाहता था कि इनके प्रति हमाारे बुद्धिजीवी उदासीन क्‍यों रहते हैं । जानना चाहता कि इसका तात्‍कालिक समाधान क्‍या हैै । जानना चाहता था कि आप स्‍वयं इन सवालों पर चुप क्‍यों रहते हैं और आप फिर वही पुुरानी हवा बांधने लगेे जो सुनने में तो अच्‍छा लग रहा है पर संकट से बाहर निकलनेका रास्‍ता नही दिखाई नहीं देता ।”

”शास्‍त्री जी आप विषय का इतना विस्‍तार कर देते हैं कि मुझे यह समझने में कठिनाई होती है कि आप का केन्‍द्रीय प्रश्‍न क्‍या है। सभ्‍यता का प्रश्‍न आप ने ही उठाया था। उसे ही समझाने का प्रयत्‍न कर रहा था। विषयविस्‍तार हुआ हो सकता है। अभी आपनेे जो प्रश्‍न उठाए उनमें भी कुछ बहुत उलझे हुए हैं । यह कि हिन्‍दू पीड़ा के प्रति संवेदनशून्‍यता का कारण क्‍या है। इस पर तो मैं विस्‍तार से कल की कुछ कह सकता हूं । रही बात कि मैं ऐसे विषयों पर क्‍यों नहीं लिखता तो मेरा सुझाव है कि इस पर अपने विचार और निर्णय देते हुए बुद्धिजीवियों को बचना चाहिए परन्‍तु सियासत का हिस्‍सा और उसी भाषा में सोचने और विचार करने के कारण संचारमाध्‍यम और बुद्धिजीवी दोनों अपनी ओर से फैसले देने के लिए उतावाले हो जाते हैं। यह राज्‍य की कानून और व्‍यवस्‍था की समस्‍या है और इसके असंख्‍य रूप हैै, गुुडागर्दी, चोरी, डाका, फिरौती, रेप,मिलावट ये अपराध जगत से जुड़ी समस्‍यायें हैंं जिन पर सरकार को काम करना चाहिए और उसकी विफलता या पक्षधरता सामने आने पर समाचार और मतनिर्माण के पेशों से जुडे बुद्धिजीवियों को उसकी आलोचना करना चाहिए । मैं इस विषय पर नहीं लिखता क्‍योंकि यह मेरे कार्यक्षेत्र में नहीं आता। मैं सक्रिय राजनीति का हिस्‍सा नहीं बनना चाहता। परन्‍तु यह याद दिला दूं कि जिन्‍हें नीेद में तानाशाही के बढ़ते हुए कदम दिखाई देते हैं उन्‍हें उन कदमोंं को रोकने के लिए इसकी कटु आलोचना अवश्‍य करनी चाहिए क्‍योंकि कानून और व्‍यवस्‍था की विफललताएं ही तानाशाही का रास्‍ता तैयार करती हैं और तब पूरा जनमततानाशाही के पक्ष में इस तरह हो चुका रहता है। आपका चीत्‍कार ‘तानाशाही आ रही है, आ गई है’ सुन कर लोग असंख्‍य कंठों से दुहराते हैं, अब इसी की जरूरत है, आने दो । बचाव का कोई अन्‍य उपाय नहीं ।

”हां, वे ऐसा करेंगे नहींं। यह उनके एजेंडे पर नहीं है। उनकी मानसिकता पर तो आज चर्चा होने से रही । इसेे कल के लिए रखिए।”

Post – 2016-12-24

सभ्‍यता का दंड (असंपादित )

मैंने सोचा था शास्‍त्री जी आते ही अपने सवालों का जवाब मांगेंगे। पर अपेक्षा के विपरीत वह उदास से बैठ गए और मेरी बैठक की बदहाली की पड़ताल करने लगे। निगाहों से, बिना कुछ बोले। वह गहरे आवेश में थे पर वह उन्‍हें भीतर से इतना पीस रहा था कि वह कुछ बोलने से बच रहे थे। चाय आई तो एक चुस्‍की अनमने भाव से ली और फिर उसे किनारे रख दिया और भूल गए। बिस्‍किट को हाथ ही नहीं लगाया। कुछ देर इस नि:शब्‍दता का सहन करने के बाद मैंने ही छेड़ा, ”आप किसी बात से परेशान लग रहे हैं। उत्‍तर में उन्‍होंने मेरी ओर देखा और फिर निगाह फेर ली। पर चेहरे पर आमर्षजनित रक्‍त प्रवाह लहरा ऐसा कि लगा वह दृष्टि न फेरते तो रो देते। छेड़ना बेकार था। एक तरह का निजता भंग, अश्‍लील । मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इस अबोलेपन काेे सहन कैसे किया जाय।
शायद ऐसी स्थिति से आपका कभी पाला न पड़ा हो! घर मेरा था, मैं किसी आगन्तुक के रहते भाग कर बाहर भी नहीं जा सकता था! देखा चाय ठंढी हो गई है तो कुछ न सूझा तो प्‍याली उठाया और वाशबेसिन में डाल आया! दुबारा चाय की प्लेट उठा कर रसोई में रख आया! और जब कुछ करने को न रह गया तो उस दमघोटू माहौल को झेलने के लिए अपनी उंगलियां चटकाने लगा!
इस बीच शास्त्री जी ने अपने को संयत कर लिया था षायद! वह स्वयं मेरी ओर मुड़े, ‘‘डाक्साब, क्या सभ्य होना अपराध है ?’’
उनके कल के प्रश्‍नों के बारे में तो कुछ तीर तुक्के बैठाए भी थे, और वह उन पर आते तो जैसा भी बन पड़ता जवाब देता, परन्तु इस प्रष्न के लिए तो मैं तैयार ही नहीं था ! बचाव का रास्ता निकाला, ‘‘आप ने तो कल कुछ प्रश्‍न किए थे जिनका उत्तर मैं दे नहीं पाया था। आज आपने यह दार्शनिक प्रश्‍न क्यों उठा दिया ?’’
अब शास्त्री जी पूरी तरह संयत हो चुके थे । उनके स्वर में स्थिरता थी, चेहरा निरुद्वेग था, और अपनी बात आवेग मुक्त स्वर मे रख रहे थे, ‘‘चला तो कल के प्रष्नों का उत्तर पाने के लिए ही था, परन्तु चंचलं हि मनः कृष्‍ण प्रमाथी वलवद् दृढं । उस पर तो वश है नहीं, रास्ते में एकाएक उन घटनाओं की ओर ध्यान चला गया जो एक समाचार चैनल में आई भी तो इतने दिन बाद और इस शब्दावली में कि ईदुन्नबी के दिन से ही एक समुदाय के द्वारा दूसरे समुदाय के द्वारा दूसरे समुदाय के घरों को उजाड़ा, दूकानों को लूटा, लोगों को मारा जा रहा है और यह समुदाय ऐसा है जिसके कुकृत्यों पर मौन या उसके समर्थन का दूसरा नाम सेक्युलरिज्म है और जिस पर तनिक भी आंच आ जाय तो उसकी वास्तविकता को जाने बिना भी हाहाकार मचाने का भी नाम सेक्युलरिज्म है और यह सेक्युलरिज्म ऐसे अवसरों पर हिन्दूू मूल्यों की रक्षा की दुहाई देते हुए हिन्दुओं पर, केवल उस घटना से जुड़े व्यक्तियों को ही नहीं, पूरे हिन्दू समाज को रौंदने, बदनाम करने के लिए चीत्कार करने लगते हैं और जब पूरी सचाई सामने आती है और भुक्तभोगी माना गया व्यक्ति अपराधी सिद्ध होता है तो चुप लगा जाते हैं मानो कुछ किया ही न हो। इसमें हमारा समस्त बुद्धिजीवी वर्ग जो लिखने, बोलने, प्रचारित प्रसारित करने के धन्धों से जुड़ा है, वह सहभागी कैसे हो जाता है। इस चिन्ता में मैं खोया हुआ ही आप की घंटी बजाई और दरवाजा खुला तो आकर बैठ गया पर उस आवेष से मुक्त नहीं हो पाया!
बैठा तो फिर आपका ही कभी का लिखा हुआ वह पोस्ट याद आने लगा जिसमें गोरे सोचते थे कि गुलामों के आत्मा नहीं होती है! वे उन्हें चैटल या ढोर या चल संपत्ति समझते थे इसलिए मानते थे कि इनके साथ कुछ भी करो, इन्हें पीड़ा नहीं होती और वे उनको यातनाएं देते हुए किसी तरह की ग्लानि अनुभव नहीं करते थे और उनके यातनावध का तमाशा देखने वालों की भीड़ जुट जाती थी जो किलकारियां भरती, फब्तियां कसती, आह्लाद से भर जाती थी और तभी मुझे लगा कि हमारी स्थिति हमारे ही लोगों ने क्या वैसी ही नहीं कर दी है । अपने को संभालना मुष्किल हो गया। फिर भी प्रश्‍न का चरित्र तो बदल ही गया, कि हमारी ही सभ्यता के जिन मूल्यों की आड़ में हमारे ही ऊपर जिस तरह के प्रहार उन जमातों के समर्थन में किए जा रहे हैं जिनके आचार, संस्कार और मूल्य परंपरा में इनके लिए स्थान ही नहीं, तो मुझे लगा कि क्या हमें इतना मूल्य अपने अधिक सभ्य होने के कारण चुुकाते आए हैं और अपने ही सिरफिरों की उस समझ के कारण चुका रहे हैं जिसमें पीड़ा के कई रूप होते हैं। हिन्दू की पीड़ा पीड़ा नहीं होती, यदि वह किसी को पीड़ा जैसी लगती है तो वह संकीर्ण सोच वाला हिन्दुत्ववादी होगा और उसको इस संवेदनषीलता के कारण ही जघन्य सिद्ध किया जा सकता है और किया जा रहा है। हम उन उच्च आदर्षों का पालन करते रहे जिन तक आज भी संयुक्त राष्‍ट्र अपनी आकांक्षा के बाद भी नहीं पहुंच पाया है जिन्हें सभ्यता का उच्चतम मूल्यमान माना जा सकता है और फिर भी उनका निर्वाह करने के कारण हमें लगातार अपमान सहना, प्राणदान करना और गुलाम रहना पड़ा है उनका जो पाषविक मूल्यों को श्रेष्‍ठमूल्य समझते थे और आज भी स्थिति में बदलाव नहीं आया है, या आया है तो यह कि हमारे अपने ही लोग दरिंदगी के समर्थन में हमारे मूल्यों का नाम लेकर हमारे ऊपर ही आक्रमण कर रहे हैं, हमारी उपेक्षा कर रहे हैं, हमारे ही समाज में आत्मविमुखता पैदा कर रहे हैं और इसके बाद भी उनकी साख बनी हुई है और हमारी आवाज कोई सुनने को तैयार नहीं ।
आप इस रिपोर्टिंग का तरीका तो देखिए । यदि कोई मुसलमान हो, ईसाई हो, यहां तक कि दलित हो, कहें उनमें से कोई हो जिनका
”हथियार के रूप में हमारी साख और मान मर्दन के लिए काम में लाया जा रहा है तो उनका नाम सबसे पहले आएगा और उसका निहितार्थ होगा उन पर सारे अत्‍याचार हिन्‍दू समाज कर रहा है, और जब हिन्‍दू समाज के साथ जघन्‍यतम कृत्‍य बड़े से बड़ेे पैमाने पर हो रहा हो तो वह अपराधियों को बचाने के लिए दो समुदायों के बीच टकराव का रूप ले लेगा कि तड़पते और मरते हुए लोगों की आह तक किसी को न सुनाई दे।”
इसलिए यह प्रश्‍न इतना वेधक हो कर सामने आया कि क्‍या सभ्‍य होना अपराध है । हमारी सभ्‍यता की कौन सी परिभाषा है कि हम दरिन्‍दगी के पक्ष में खड़े हो कर सभ्‍यता की परिभाषा बदल रहे हैं । हमारे बुद्धिजीवी जो वैज्ञानिकता की दुहाई देते अघाते नहीं, वे अपनी सोच, समझ और प्रस्‍तुति में वस्‍तुपरक क्‍यों नहीं रह पाते और अपनी अल्‍पतम बुद्धि का उपयोग क्‍यों नहीं कर पाते हैं। उनकेे इस दिवालियापन के बाद भी हमारे समाज के पढ़े लिखे लोगों का उनसे मोहभंग क्‍यों नहीं हाेे पाता कि वे समाज काेे सही दिशा दे सकें ।”
मेरे पास शास्‍त्री जी के किसी प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं था या था तो वह मैं बहुत पहले कई बार कई बहानों से तर्क और प्रमाण देते हुए दे चुका था कि सेक्‍युलरिज्‍म मुस्लिम लीग का बदला हुआ नाम है आैैर इसलिए अपने को सेक्‍युलर कहने वाले हिन्‍दुओं और कट्टर मुसलमानों के बीच की खाई मिट चुकी है क्‍योंकि नव धर्मान्‍तरित अपने को सच्‍चा सिद्ध करने के लिए अधिक कट्टरताा से काम लेते हैं। परन्‍तु यह उत्‍तर तो शास्‍त्री जी को पता था, इससे उनका क्षोभ दूर नहीं हो सकता था। मैंने स्थिति को संभालते हुए कहा, ”अब कल के प्रश्‍नों पर आज चर्चा तो हो नहीं सकती। क्‍या कल भी आप हमारे ही इलाके में हैं ।”
शास्‍त्री जी मुझसे सहमत हो गए, ”आप ठीक कहते हैं । आज तो किसी विषय पर बात करने का मन ही नहीं है।” इसके साथ ही वह उठ कर खड़े भी हो गए । ”कल की कौन कह सकता है।”

Post – 2016-12-23

दुश्‍चक्र

शास्‍त्री जी किसी दूसरे काम से हमारी ओर आए थे और सोचा जब आए हैं तो मुझसे भी मिलते चलें, पर जरूरी नहीं कि वह किसी और से मिलने आए हों, क्‍योंकि औपचाारिकता के बाद वह जिस तरह अपने विषय पर आ गए और आक्रामक ही नहीं हो गए, अपितु अपनी बात अपने मोबाइल पर सुरक्षित किए गए दृश्‍याेें और कतरनों से रखने लगे उससे इतना तो साफ था कि वह पूरी तैयारी से और मुझसे ही दो दो हाथ करने आए थे।
उन्‍हें शिकायत मेरे दो दिन पहले की पोस्‍ट से थी जिसमें मैंनेे पश्चिम और शेष जगत के बीच खुले युद्ध के प्रमाण देते हुए शेष जगत के सभी लोगों के बीच इसकी समझ पैदा करने और आपसी कलह से बचने की, यहां तक कि पश्चिमी देशों और विशेषत: उनके सरगना अमेरिका के द्वारा हमें अपास में लड़ाने के लिए तैयार किए जाने वाले हथियारों का खरीदार बनने से बचने की और अापसी झगड़े कम करने की सलाह दी थी ।

उन्‍होंने पहला ही सवाल दागा, ”डाक्‍साब, एक बड़े युद्ध की आड़ में क्‍या आप अपने ऊपर होने वाले हमलों में हमलावर से मेल मुहब्‍बत की बात करके सुरक्षित रह सकते हैं, विशेषत: तब ज‍ब आप का ऐसा प्रस्‍ताव उनके दुस्‍साहस को और आपकेे संकट को बढ़ा रहा हो। आप अपने धन, मान, और प्राण की रक्षा के लिए प्रत्‍याक्रमण नहींं करेंंगे ।”

मुझे कुछ अनुमान तो हुआ कि उनका संकेत किधर है परन्‍तु मैं उनसे ही सुनना चाहता था कि उनको शिकायत किस बात से हैै। मैंने अबोध बन कर कहा, ”प्रत्‍याक्रमण या प्रतिरक्षा ताेे करना ही होगा, परन्‍तु आप को यह कैसे लगा कि मैं आततायियों को गले लगाने का पक्षपाती हूं । कोई कारण तो होगा आपके ऐसा सोचने का।”

”आप सलाह देते हैं कि इस समय सबसे खतरे में मुस्लिम समुदाय है। उनमें उत्‍तेजना पैदा करके, उसे बदनाम करके अरक्षणीय बनाते हुए उनके देश के देश अमेरिका और पश्चिम के दूसरे देशों द्वारा तबाह किए जा रहे हैं आैैर उनके बाद हमारी बारी भी आ सकती है क्‍यों‍कि गोरों को पूरी दुनिया अपने लिए चाहिए और जिस तरह उन्‍होंने अमेरिका के मूल निवासियों का सफाया किया वे एक एक करके दूसरों का भी सफाया करते जाएंगेे इसलिए हमें मुसलमानों के साथ सहानुभूति और सहयोग से काम लेना चाहिए, परन्‍तु हम तो इस बीच ही उन लोगों के द्वारा मिटा दिए जाएंगे जिनको आप संकटग्रस्‍त मानते हैं।”

शास्‍त्री जी ने अपना मोबाइल खोला और उन दुर्घटनाओं की फुटेज दिखाने लगे जिनमें भारत में राज्‍य सरकारों कि शिथिलता या वोट बैंक को भुनाने की दुर्बलता के कारण मुसलमानों द्वारा हिन्‍दुओं की संपत्ति लूटी, बर्वाद की जा रही है, और उनके सम्‍मान को ठेस पहुंचाई जा रही है, खुलेेआम हत्‍या की जा रही है, वे अपने ही घर से पलायन कर रहे हैं और आप उनके साथ सहानुभूति और सहयोग की हिमायत करते हुए हमारी प्रतिरोध क्षमता पर बड़े भोलेपन से कुठाराघात कर रहे हैं, हमें आसन्‍न खतरों से असावधान कर रहे हैं और इस तरह हमारे संकट को बढ़ा रहे हैं केवल इस लालसा से कि आपको अधिक संंतुलित और दूरदर्शी मान लिया जाय । आपकी सोच और आपके ही शब्‍दों में सेकुलरिस्‍ट नाम से लीग की सियासत करते हुए हिन्‍दुओं की दुर्गति को बढ़ाने वालों में कोई अन्‍तर है ।”

कुछ देर के लिए मैं स्‍तब्‍ध रह गया । मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इसका क्‍या उत्‍तर दूं ।

उत्‍तर स्‍वयं शास्‍त्री जी देने लगे, ”आप का कहना सही है कि गोरे देशों का, रंगीन देशों काेे कई बहानों से आपस में लड़ते झगडते हुए अपनी बर्वादी स्‍वयं करने को संचार से ले कर हथियार के माध्‍यम से भड़काया जा रहा है, परन्‍तु दुनिया आज एक तरह के खतरे से नहीं जूझ रही है। दूसरे बहुत से संकट हैं। पर्यावरण के सत्‍यानाश का संकट है जिसमें अधिकांश लोगों के लिए वे गोरे हों या काले सबका जीना कठिन हो जाएगा और कुछ असाधारण संपन्‍न लोगों के पास ही अपने परिवेश में स्‍वच्‍छ वायु और स्‍वच्‍छ जल और पर्यावरण की गिरावट से बचाव के साधन बचे रहेंगे और तब दुनिया गोरों द्वारा कालों के निर्मूल किए जाने की न रहेगी अपितु असाधारण संपन्‍नों या अमीरों और शेष जगत की सुुरक्षा की बन जाएगाी और जैसे कि लक्षण है यह दूसरा संकट वेस्‍ट ऐंड द रेस्‍ट से भी पहले उपस्थित हो सकता है ।

”हमारी समस्‍या दूसरी है, हम आसन्‍न संकटों से निपटने की जगह आसन्‍न संकट पैदा करने वालों से सहयोग नहीं कर सकते, उनके साथ सहयोग करने की पहली शर्त है उनमें भी उस संकट का बोध हो और आपकी परिभाषा के अनुसार सबसे अधिक सकटग्रस्‍त वे हैं जो हमारे लिए खतरा बनते जा रहे हैं, इसलिए नम्रता और सहयोग की मांग और उसके लिए उचित मनोवैज्ञानिक पर्यावरण तैयार करने की जिम्‍मेदारी उनकी होनी चाहिए न कि हमारी । कितना हास्‍यास्‍पद है यह प्रस्‍ताव कि भाई तुम लोग सबसे अधिक संकटग्रस्‍त हो। हम तुम्‍हें बचाना चाहते हैं, तुम हमारी मदद ले लो और वह इस उदारता काेे आपकी असमर्थता मान कर आप के साथ अधिक अमानवीय व्‍यवहार करता चला जाए। आपकी सद्भावना उसकी दुर्भावना के लिए प्रेरक का काम करे, आप अपने ही विचारों से अपने विनाश केे आयोजन में सहायक हों, यह बात मेरी समझ में नहीं आती ।”

एक तो मुझे शास्‍त्री जी का उत्‍तर नहीं सूूझ रहा था, दूसरे यह भी देख रहा था कि कोई समीचीन उत्‍तर हो तो भी वह उनकी समझ में इस समय नहीं उतर सकता । मैं चुप रहा, चिन्तित और सोचता हुआ।

”मेरी चुप्‍पी नेे शास्‍त्री जी को प्रोत्‍साहित ही किया, ”वे आज भी उसी सिद्धान्‍त पर काम कर रहे हैं। मुसलमान हिन्‍दू के साथ शान्ति से नहीं रह सकता इसलिए दोनों का देश बांट देा और आबादी को अपने अपने देश में बसाओ जिससे वे शान्ति से रह सकें। जब तब आबादी का पुनर्वास नहीं हो जाता है तब तक दोनों देश अपने अपने अल्‍पमतों की सुरक्षा करें। यही तो था जिन्‍ना का प्रस्‍ताव । हमारे नेताओं ने अपने को दूसरों से अधिक उदार दिखाने के लिए जो मूर्खता की उसकी सबसे अधिक हानि केवल हिन्‍दुओं को उठानी पड़ी है, इसे चाहे आप तीनों देशों की आबादी के रैखिक अंकन से समझेंं, या उनकी सुरक्षा और संपन्‍नता से।
राजनीति सद्भावना का तमाशा नहीं है, जीवन की कठिन समस्‍याओं के सर्वोत्‍तम समाधान का दूसरा नाम हैै । हमने राजनीतिक परिपक्‍वता का परिचय नहीं दिया, चापलूसी से दूसरों का दिल जीतने का प्रयोग किया, जिसका परिणाम उल्‍टा रहा । जितनी ही उदारता दिखाई उतनी की हठधर्मिता का विस्‍तार हुआ । कश्‍मीर में हिन्‍दू मुसलमान सभी रहते थे, वह एक प्रयोगशाला थी आपसी सद्भाव की, परन्‍तु परिणाम । जिन राज्‍यों में सेकुलरिज्‍म के दिखावे की ओट में मुस्लिम वोट बैंक के लिए उनकेे साथ सदाशयता बरती गई उनमें राष्‍ट्रद्रोही गतिविधियों का विस्‍तार हुआ और किसी छोटी सी बस्‍ती या नगर में जनसंख्‍या का अनुपात बदलते ही वहां किसी हिन्‍दू का सम्‍मान से रहना असंभव हो जाता है। आतंकवा‍दियों की गतिविधियां बढ़ जाती हैं । बम बनाने के कारखाने खुल जाते हैं। वेस्‍ट ऐंड द रेस्‍ट का संकट तो दूर है, हमारे लिए तो रेस्‍ट और अनरेस्‍ट की समस्‍या सबसे उग्र है और इसे आप जैसों की समझ ने अधिक उग्र बनाया है। ”

मुझसे तत्‍काल कोई ऐसा उत्‍तर देते नहीं बन पा रहा था जिससे शास्‍त्री जी को शान्‍त कर सकूं । कहा, यदि जिस काम से इधर आए थे यदि उसके कारण आपको इधर ही रुकना हो तो कल हम इस पर बात करेंगे । आज तो मुझेे स्‍वयं भी इसका उत्‍तर नहीं सूझ रहा है । हो सकता है मेरी स्थिति को देख कर कोई दूसरा मेर सहायता को आ जाए ।”

क्‍या आपके पास कोई सही समाधान है । शास्‍त्री जी तो कल फिर आने को कह कर चले गए।

Post – 2016-12-22

ये काम किसने किया था ये काम किसका था

मैं दैनन्दिन की घटनाओं पर लिखने से बचता हूं । कारण दो हैं, एक तो समझ की कमी, दूसरे जितनी जल्‍दी लोग अपनी प्रतिक्रियाएं झोंकना आरंभ कर देते हैं, सचाई के दूसरे पहलूू सामने आने पर उसका चरित्र ही बदल जाता है। इसके आने में समय लगता है और तक तक वह विषय बासी हो चुका रहता है । इसलिए मेरे लिए आकड़ों से अधिक प्रवृत्ति या दिशा अधिक सार्थकता रखती है। कुशीनगर में प्रधानमन्‍त्री के व्‍याख्‍यान के समय ही उनकी कायिक भाषा से मुझेे लगा था कि अपने संकल्‍प और सदिच्‍छा के बाद भी वह ऐसी उलझन के शिकार हो चुके हैं जिससे बाहर निकलने का रास्‍ता सूझ नहीं रहा है और जिसकी प्रकृति ऐसी है कि उसका खुलासा सार्वजनिक रूप से नहीं किया जा सकता, क्‍योंकि उससे समस्‍या अधिक असाध्‍य होती चली जाएगी। मैंने आगे चलकर जनसाधारण को होने वाली कठिनाइयों के दौर के कुछ अधिक खिचने और इस बीच जनता के धैर्य के चुकने की आशंका को देखते हुए केवल यह कामना की थी कि इसके परिणाम शुभ हों अत: बीच की परेशानियों पर किसी टिप्‍पणी की आवश्‍यकता न थी। यह चुटकी लेने और चुटकी बजाने वालों की शगल का हिस्‍सा था जिसकी बानगियांं देखने को मिलती रहीं।

मेरे लिए निराशा का बहुत बड़ा कारण 5000 से अधिक की राशि जमा करने के साथ इस बात का स्‍पष्‍टीकरण देने का फर्मान था कि उन्‍होंने अब तक यह राशि क्‍यों जमा नहीं की । यह मोहभंग का और एक बहुत बड़े संकट का संकेत था, क्‍यों‍कि कोई भी व्‍यक्ति अपने ही आश्‍वासन को बदल नहीं सकता । सरकार तो कदापि नहीं । इससे केवल आर्थिक असुविधा नहीं पैदा होती, सरकार की साख समाप्‍त हो जाती है और इतना बड़ा खतरा मोल लेने वालों की दुर्गति का तो इससे पता चलता था, परन्‍तु इतना अक्षम्‍य कदम उठाने काेे मैं अपने तई सरकार की सबसे बड़ी हार मानता था। यह उस विकल्‍प से अधिक खतरनाक था जिसमें प्रधानमन्‍त्री ने कहा था कि मेरा क्‍या, मैं तो झोला उठाऊंगा चल दूंगा । यह विकल्‍प अपने आश्‍वासन से पहलटने से अधिक खतरनाक था। भीड से बचने के लिए यह सरकार का ही सुझाव था कि कोई जल्‍दी नहीं है, अपने पैसे आप 31 दिसंबर तक जमा करा सकते हैं और उनसे इसके बाद किसी तरह की सफाई की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। यह वादा खिलाफी थी और ऐसे में यदि सरकार किसी आर्थिक संकट में बांड आदि निकालने का प्रस्‍ताव रखती है तो उसकी विश्‍वसनीयता तक समाप्‍त हो जाती है ।

मैंने इसे एक बहुत बड़े संकट के रूप में तो देखा ही पहली बार इसके प्रस्‍तावकों की समझ और नीयत तक पर सन्‍देह पैदा हुआ । अच्‍छा है, दबाव में ही सही इस आदेेश निरस्‍त कर दिया गया। कालाबाजारी और जमाखाोरी समप्‍त करने के इस अभियान के पीछे जनसाधारण का भी उतना ही प्रबल समर्थन न होता तो विविध माध्‍यमों से जिस तरह के उकसावे दिए जा रहे थे उसमें जाने क्‍या हो सकता था। कहें यह नरेन्‍द्र मोदी का अपना निर्णय नहीं अपितु जनता की चिरप्रतीक्षित आकांक्षा का क्रियान्‍वयन था जिसने इतनी असुविधाओं के बीच भी उसके आत्‍मविश्‍वास को डिगने नहीं दिया। उसके लिए इतना आश्‍वासन ही पर्याप्‍त था कि उसकी परेशानी को कम करने के लिए सरकार अनवरत प्रयत्‍न कर रही है और उसकी असुविधा उन भ्रष्‍टों और जमाखोरों की शरारत से पैदा हुई है जिसका पूर्वाभास यदि सरकार को था भी तो उसका सही आकलन करने में उससे चूक तो हुई परन्‍तु वे बच कर निकल नहीं पाएंगे ।

जनता के इस अभूतपूर्व समर्थन और दृढ़ता के भरोसेे प्रधानमंत्री का आत्‍मविश्‍वास भी लाैैटा है और स्‍वर और कायिक भाषा में भी परिवर्तन आया है। परन्तु परेशानी बहुत जल्‍द दूर नहीं होने वाली है इसका आभास भी बना रहा है।
मैं आज इस विषय को अपने विषय से हट कर क्‍यों ले बैठा इसका एक कारण है। आज एक मित्र की टाइम लाइन पर 2000 के नये नोटों के इतने भोंड़े और शरारतपूर्ण नकल वाले तीन नोट देखने को मिले जिन्‍हें मैं साझा करना चाहूंगा कि उसे देख कर ही इसका सही चरित्र समझा जा सकता है। इनको पेश करते हुए नीचे रिजर्वबैंक के गवर्नर से इसका स्‍पष्‍टीकरण तो मांगा ही गया है, एटीएम का उपयोग करने वालों को इस विषय में कुछ नेक सलाह भी दी गई है जो उनके लिए उपयोगी हो सकती है।

परन्‍तु इस सलाह से यह भी ध्‍वनित होता है कि इनको एक ही क्रम में रखा गया था जिसके पीछे एक गहरा षड्यन्‍त्र हो सकता है, इसलिए जवाबदेही रिजर्व बैंक के गवर्नर की जितनी है उससे अधिक हमारी और उनकी भी है जिन्‍होंने यह जवाब रिजर्व बैंक के गवर्नर से मांगा। मेरी शिकायत यह है कि वे पढ़ेे लिखे, कई बार तो खासे पढ़े, खासे लिखे और खासे अनुभवी होते हुए भी उस तरह की नासमझी क्‍यों करते हैं जिसे अनपढ़ गंवार भी न करना चाहेगा । इसका कारण उनका ज्ञान या अज्ञान नहीं है, अपितु उनकी विवेकहीनता और विमुखता है जिसमें गंवारों को भी जो दीख जाता है वह उन्‍हें दीखता ही नहीं, इसलिए वे कमियों का आविष्‍कार करते हैं और प्रयत्‍न करते हैं कि उनकी बात लोग अब तो मान लें, पर उसे उनकी जमात से बाहर कोई मान नहीं पाता और यह जमात सुशिक्षित होतेे हुए भी रहस्‍यमय कारणों के इतनी अशिष्‍ट है कि यह असहमति को सहन नहीं कर सकती, अपने पक्ष में सही तर्क नहीं दे सकती और उनका कायल न होने वालों से गालियों की भाषा में बात कर सकती है और स्‍वयं अभिव्‍यक्ति के संकट का रोना रो सकती है। सुपठित हो कर ये पढ़ना तक नहीं जानते और अपने गलत पाठ पर विश्‍वास करने का दबाव डालते हैं।

पाणिनीय शिक्षा में कुपाठियों का लक्षण इन शब्‍दों में बयान किया गया है : गीती, शीघ्री, शिर:कंपी यथालिखित पाठक: । यह है तो उच्‍चारण के सन्‍दर्भ में पर इसे विचार पर भी लागू किया जा सकता है । बार बार एक ही राग अलापना, कोई पैशुनी सूचना मिलते ही झटपट उसे मान लेना, आपस में एक दूसरे का अनुमोदन करना आैैर जो लिखा है उसका मर्म समझे बिना उसका शब्‍दश: अर्थग्रहण ये सभी लक्षण या कुलक्षण इन सुपठित माने जाने वालों में मिल जाएंगे।

यदि यह सोचा जाय कि नोटबन्‍दी के माध्‍यम से जमाखोरी और कालाबाजारी का निर्णय बिना तैयारी के लिया गया तो इसका जवाब इसकी असुविधा भोगने वाली वह जनता देती है कि इसे और पहले लिया जाना चाहिए था। फिर भी पहले या बाद के साथ समुचित तैयारी का प्रश्‍न तो बना ही रह जाता है। उसके बिना कोई लाभ किसी को नहीं मिल सकता और यह सच है कि यह कठोर निर्णय लेने वालों को इस बात का ज्ञान तो था कि भ्रष्‍टाचार और जमाखोरी बहुत बड़े पैमाने पर है, उस पैमाने का सही ज्ञान नहीं था, न हो सकता था।

इसका आयाम इतना विस्‍तृत है कि छोटा दूकानदार, यहां तक कि पटरी पर रेढ़ी लगाने वाला तक इसमें शामिल है, निन्‍यानबे प्रतिशत नागरिक इसमें शामिल हैं जो बिना पर्चे के सामान इसलिए खरीदते हैं कि दूकानदार धमका देता है कि परचा लेने पर टैक्‍स की रकम भी देनी पड़ेगी और यह समझ नहीं पाता कि इस धमकी की आड़ में उसने उचित मूल्‍य से कितना अधिक वसूल कर लिया या नकली माल थमा दिया। मेरे पुराने आवास के सामने साग सब्‍जी की रेढ़ी लगाने वाला एक दिन मौज में बता रहा था कि उसने गांव पर कितनी जायदाद बनाई है और कितने खोले दल्‍लूपुरा में खरीद लिए हैं, यद्यपि वह सदा इस बात के लिए तत्‍पर रहता था कि आप सब्‍जी ढो कर क्‍यों ले जाएंगे, मेरा लड़का अर्थात् सहायक पहुंचा देगा। फल की रेढ़ी लगाने वाले की स्थिति वही थी। पुराना मकान बेचने और नया खरीदनेे वाले सभी एक अनिवार्य कालेधन की कवायद से गुजरते हैं और इस अदृश्‍य स्‍तर से ऊपर आता है रिश्‍वतखोरों, जमाखोरों, घूसखोरों, मिलावट करने वालों, अपराध करने वालों और राजनीति का कारोबार करने वालों केे व स्‍तर जिसकी ओर ही हमारा ध्‍यान जा पाता है ।

अब यदि शहरी जमात का नब्‍बे प्रतिशत और गांवों देहतोंं का दस पांच प्रतिशत भ्रष्‍टाचार से जुड़ा है तो सरकार के इस अभियान को इतना बड़ा समर्थन कहां से मिल रहा है कि असुविधा का रोना रोने वाले भी इसे सही कदम मानते हैं और इनकी संख्‍या शहरों में भी कम प्रभावशाली नहीं है । इसका एक कारण यह कि गांव देहात का नब्‍बे प्रतिशत आदमी भ्रष्‍टाचार का इतने स्‍तरों पर और इतने रूपाें में सामना करता है कि वह उस पीड़ा के सामने अपने इन कुछ महीनों के दुख को सहने के लिए तैयार है । परन्‍तु शहरों में किसी न किसी तरह अपने को दागी होने से बचा न पाने वाले भी जानते हैं कि इससे मुक्ति पाए बिना देश का कल्‍याण नहीं इसलिए नगरों से ले कर देहातों तक असुविधाओं को झेलते और त्रासदियों की कतिपय मार्मिक कहानियां सुनते हुए भी वे उससे अधिक दृढ़ता से इसका समर्थन करते दिखाई देते हैं कि इसकी पहल करने वाले प्रधानमन्‍त्री के डगमगाते आत्‍मविश्‍वास को भी सहारा दे सकें ।

अब हम उस विडंबना को समझना चाहेंगे, जिसकेे कारण एक सुचिन्तित योजना के क्रियान्‍वयन में जो बाधाएं आई उनका पूर्वानुमान इसका निर्णय लेने वाले भी न कर सके और यह योजना भितरघात का शिकार हो गई । उसे मैं निम्‍न रूप में समझ पाया हूं, पर अर्थशास्‍त्र की सीमित जानकारी के कारण मैं यदि गलत मिलूं तो आप मेरी गलतियों को सुधार सकते हैं:
1. मैं यह मानता रहा हूं कि बैंक प्रणाली में व्‍यापक भ्रष्‍टाचार है और इस भ्रष्‍टाचार को बढ़ाने में पिछली सरकार की सदिच्‍छा पूर्वक, बेरोजगारी और साधनों की कमी को दूूर करने के लिए उदार किश्‍तों पर उधार देने की योजना रही जिसका पूर्वानुमान वह भी नहीं लगा सकी। इन कर्जो या उधार धन के लिए जो औपचिारिकताएं हैं उनको पूरा करने के क्रम में बैंक अधिकारियों/ कर्मचारियों और दलालों का ऐसा भ्रष्‍ट तन्‍त्र पैदा हुआ जिसका सबसे दारुण पक्ष किसानों के ट्रैक्‍टर अादि के नाम पर उदार लोन के दो तिहाई जुटाने और अदायगी के समय पूरी रकम पर व्‍याज सहित अदा करने की किश्‍तों के इस आशा में जुटते जाने से कि संभव है सरकार की चुनाव आदि के समय माफी की घोषणा से इससे राहत मिल जाय और अन्‍तत: अपने आत्‍मसम्‍मान पर बन आने के कारण उस व्‍यक्ति के मोहभंगजनित आत्‍महत्‍याओं के रूप में सामने आया। यह आर्थिक दुर्गति का परिणाम न था, जिस रूप में प्रेस और विशेषज्ञ इसे पेश करते रहे, क्‍योंकि उस परिवार के शेष लोग उन्‍हीं स्थितियों में जीवित रहे ।

मैं किसानों की आत्‍महत्‍याओं और बैंक के भीतर व्‍याप्‍त भ्रष्‍टता की ओर आप का ध्‍यान दिलाना चाहता था और इन्‍हीं बैंको और बैंक अधिकारियों के माध्‍यम से सरकार को अपनी योजना को कार्यान्वित करना था। इन्‍होंने सरकार की ओर से सुलभ धनराशि को जमाखोरों और कालाबाजारियों से मिल कर किस तरह का कृत्रिम अभाव पैदा किया उसकी कहानियां छन कर आ रही हैं।
उनके विरुद्ध कार्रवाइ्र होगी, यही जनता के लिए बहुत बड़ा आश्‍वासन है।

2. जिन भ्रष्‍ट दलों ने ज्ञात और अज्ञात कारणों से इस अभियान के विरुद्ध मोर्चा खोल लिया उनसे जुड़ी़ यूनियनें भी थीं और मेरी जानकारी में बैंकों और जीवन बीमा निगम की यूनियनें बहुत प्रभावशाली रही हैं और इनकी पहुंच सभी बैंकों, यहां तक कि रिजर्व बैंक तक रही है। केवल कुछ भ्रष्‍ट अधिकारियों के कारण इतने बड़े पैमाने पर घोटाला नहीं हो सकता था जब तक अकथित रूप में इसके पीछे उन यूनियनों का हाथ न हो जो उन दलों के प्रभाव में रही हैं जो नोटबन्‍दी का नंगई के स्‍तर पर उतर कर भी विरोध कर रहे थे।

3. आश्‍चर्यजन यह है कि इसके पीछे रिजर्वबैंक की भी संलिप्‍तता पाई गई और उनके विरुद्ध कार्रवाई आरंभ की गई ।

4. मेरे लिए अज्ञात कारणों से पिछले दौर में एक ही अंक के अनेक नोट छाप कर निकाले गए थे, परन्‍तु उनमें नकल इतनी भोंडी नहीं थी कि जिसके हाथ में कोई नोट आए वह उसी समय यह तय कर ले कि यह नकली या डुप्लिकेट हो सकता है।

5. नए नोटों में एक ही नोट में एक जगह एक नंबर दूसरी जगह दूसरा नंबर, और एक के बाद एक कई नोटों में क्रम और संख्‍या की वे गड़बडि़यां जो एक साथ बैंक या एटीएम से जारी हों और तत्‍काल नोटिस में आ जाएं, यह क्‍या सरकार के निर्देश या गवर्नर की सहमति से किया जा रहा था।

6. यदि नहीं तो असंतुष्‍ट और इस अभियान का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों की यूनियनों की इसमें भागीदारी असंदिग्‍ध है जो उसेे विफल करने के लिए कृत संकल्‍प हैं।

7. यूनियनों के समर्थन की आशंका मेरे मन में पैदा न होती यदि बैंक कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन न किया होता। अपराधी के पकड़े जाने पर दूसरा कोई उसका साथ नहीं देता। यदि उसके साथ दूसरे भी खड़े होते हैं तो मुझे यह सोचने का पर्याप्‍त कारण मिलता है कि यह उन दलों से जुड़ी यूनियनों की मिली भगत और भ्रष्‍ट कर्मचारियों अधिकारियों और देश के कालाबाजारियों के मिले जुले तन्‍त्र का परिणाम है।

इन विषम परिस्थितियों में इतनी विकट समस्‍या का अन्तिम समाधान निकालने के लिए कृत संकल्‍प सरकार की मैं भूरि भूरि प्रशंसा करता हूूूं और घबराहट में अपनी साख दांव पर लगाते हुए अपने ही आश्‍वासन से पीछे हटने के लिए उसकी भर्त्‍सना करता हूं और आशा करता हूं कि अपनी सरकार गिरने की स्थिति में भी वह सरकार की विश्‍वसनीयता को दाव पर न लगाएगी।

Post – 2016-12-21

शान्ति के लिए युद्ध

शान्ति की कामना और इसके लिए प्रयत्‍न सभ्‍यता की कसौटी है तो युद्ध जघन्‍यतम अपराध का महिमामंडन है। विश्‍व के ज्ञात इतिहास में इसकी कामना और इसके लिए प्रयत्‍न भारत में आज से पांच हजार साल से और संभव है उससे भी कुछ पहले से मिलती है, परन्‍तु हमने इसे उन भयानक संघर्षो के अनुभवों से प्राप्‍त किया था जिनके कई तरह के आख्‍यान हमारे प्राचीन साहित्‍य में मिलते हैं। यह हिंसक उपायों की व्‍यर्थता के बोध का परिणाम था, परन्‍तु इसके बाद भी ऐसा कोई समय भारतीय इतिहास में भी नहीं आया जब इसका अविकल निर्वाह संभव हुआ हो। इसका प्रधान कारण रहा है शान्ति की आड़ में दूसरों का शोषण अर्थात् जिन्‍होंने अपने श्रम से अपने जीवन यापन के उपादानों का उत्‍पादन नहीं किया, उनके द्वारा किसी भी युक्ति से दूसरों के द्वारा उत्‍पादित उपादानाें का अपहरण अथवा प्रकृति की निष्‍ठुरता के कारण श्रम के बाद भी अपने निर्वाह के लिए उन सुविधाओं को न प्राप्‍त कर पाना जो प्रकृति की उदारता के कारण दूसरे क्षेत्रों में बसने वालों द्वारा अल्‍प श्रम से ही प्रचुर मात्रा में प्राप्‍त हो जाते रहे हैं ।

प्राय: इन दोनों के मिले जुले रूप सभी सभ्‍यताओं में और यहां तक कि सभ्‍यता से पहले की अवस्‍थाओं में भी पाए जाते रहे हैं। हम यदि इसे अधिक गहराई से समझना चाहें तो समस्‍या अधिक जटिल होती जाएगी क्‍योंकि इसके सभी सूत्रों को तलाश पाना भी अनेक पड़तालों के बाद ही संभव है।

मोटे तौर पर युद्ध और शौर्य के गौरव का आधार रहा है, अन्‍याय का उन्‍मूलन और अन्‍यायियों से अपनी रक्षा के लिए सामरिक तैयारी और यह इस तैयारी में शिथिलता न आने पाए इसलिए अपनी ओर से भी आक्रामण और शक्ति विस्‍तार का प्रयत्‍न जो क्षेत्रविस्‍तार और बड़े साम्राज्यों की स्‍थापना का कारण बना ।

स्‍थायी शान्ति के लिए अन्‍यायियों का उन्‍मूलन और इसलिए बिना उनकी ओर से किसी उकसावे के उन पर आक्रमण और संहार मूल्‍य प्रणाली की भिन्‍नता के कारण भी रहा है परन्‍तु इनके बीच सनातन वैर के मूल में यह तथ्‍य रहा है कि एक मूल्‍य प्रणाली दूसरी के अस्तित्‍व में बाधक रही है।

यह मामूली भिन्‍नता हत्‍या, चोरी, लूट, ठगी या धोखाधड़ी के उन सभी अपराधों का समाहार होने के बाद भी युद्ध को गौरवान्वित कर देती हैं क्‍यों कि छोटे पैमाने पर किए जान वाले अपराध व्‍यक्तिगत लाभ्‍ा के लिए किए जाते हैं, जब कि युद्ध में वही काम अपने प्राणों को उत्‍सर्ग करने के लिए तैयार हो कर पूरे समाज, समुदाय या देश्‍ा के व्‍यापक हित के लिए किया जाता है।

कहें शान्ति और युद्ध के अपने दर्शन तैयार किए जा सकते हैं, परन्‍तु समस्‍त मानवता का ध्‍यान रखते हुए यह मोटी समझ बनती है कि यदि हम मानव ऊर्जा को हिंसा, अपराध और युद्ध पर न बर्वाद करें तो मानवता अपनी समग्र ऊर्जा के धनात्‍मक और सहयोगी उपयोग से उन ऊंचाइयों को हासिल कर सकती है जिसकी आज हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते। इसलिए विश्‍वशान्ति की वह कामना जो भारतीय मनीषा में हजारों साल से रही है फलीभूत नहीं हो पाई उसकी कामना पश्चिम में, मेरी समझ से जो गलत भी हो सकती है, भारतीय मनीषा से परिचय के बाद, पैदा हुई जिसका एक संक्षिप्‍त इतिहास हिंदी विकीपीडिया में सुलभ हुआ जिससे मैं इस रूप में अवगत भी नहीं था न ही संभव है, आप ने भी ध्‍यान दिया होे। उसे मैं यथातथ्‍य उद्द्धृत करना चाहूंगा:

”राष्ट्रों के एक शांतिपूर्ण समुदाय की अवधारणा की रूपरेखा तो बहुत पहले 1795 में बह गई थी, जब इम्मानुअल कैण्ट की परपेचुअल पीसः ए फिलोसोफिकल स्केच[5] में एक राष्ट्रों के संघ के विचार की रूपरेखा रखी थी, जो राष्ट्रों के बीच संघर्षों को नियंत्रित करे और शांति को प्रोत्साहित करे. वहीं कैंट ने एक शांतिप्रिय विश्व समुदाय की स्थापना के लिए तर्क दिया कि यह इस अर्थ में नहीं होगा कि कोई वैश्विक सरकार बने, बल्कि इस आशा के साथ कि प्रत्येक राष्ट्र खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करेगा, जो अपने नागरिकों का सम्मान करे और विदेशी पर्यटकों का एक तर्कसंगत साथी प्राणी के रूप में स्वागत करे. यह इस युक्तिकरण में है कि स्वतंत्र राष्ट्रों का एक संघ होगा जो वैश्विक रूप से एक शांतिपूर्ण समाज को प्रोत्साहित करेगा, इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय समुदायों के बीच एक अनवरत शांति कायम हो सकेगी.
”सामूहिक सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए यूरोप समारोह में उत्पन्न अंतर्राष्ट्रीय सहयोग नेपोलियन युद्धों के बाद उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोपीय राष्ट्रों के बीच यथास्थिति को बनाए रखने और युद्ध को टालने के लिए विकसित हुआ। इस अवधि में पहले जिनेवा सम्मेलन में भी युद्ध के दौरान मानवीय सहायता के लिए कानून स्थापित होने तथा 1899 और 1907 के अंतर्राष्ट्रीय हेग सम्मेलन में युद्ध के बारे में तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण हल के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का विकास हुआ।
”शांति कार्यकर्ताओं विलियम हैंडल क्रीमर और फ्रेड्रिक पासी ने 1889 में राष्ट्र संघ के पूर्ववर्ती अंतर्संसदीय संघ (आईपीयू (IPU)) का गठन किया था। यह संगठन विस्तार में अंतर्राष्ट्रीय था जिसमें 24 देशों की संसदों के एक तिहाई सदस्य शामिल थे, जो 1914 तक आईपीयू (IPU) के सदस्यों के रूप में कार्यरत थे। इसका उद्देश्य सरकारों को अंतरराष्ट्रीय विवादों को शांतिपूर्ण तरीकों और मध्यस्थता के माध्यम से हल करने के लिए प्रोत्साहित करना था और सरकारों द्वारा अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया को निखारने के लिए वार्षिक सम्मेलन आयोजित किए गए। आईपीयू (IPU) की संरचना में एक अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक परिषद शामिल थी जो बाद में राष्ट्रसंघ की संरचना में भी परिलक्षित हुई.
”बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में यूरोप की महाशक्तियों के बीच गठबंधन के माध्यम से दो शक्ति केंद्र उभरे थे। 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के आरंभ होने के समय ये गठबंधन प्रभावी हुए थे, जिसके कारण यूरोप की सभी बड़ी शक्तियां इस युद्ध में शामिल हो गई थी। औद्योगिक राष्ट्रों के बीच यूरोप में यह पहला बड़ा युद्ध था और यह पहला मौका था कि पश्चिमी यूरोप में औद्योगीकरण के् परिणामों (उदाहरण के लिए व्यापक स्तर पर उत्पादन) को युद्ध को समर्पित किया गया था। इस औद्योगिक युद्ध के परिणामस्वरूप हताहतों की संख्या अभूतपूर्व थी, जहं 85 लाख सशस्त्र सेनाओं के सलस्य मारे गए थे और अनुमानतः 2 करोड़ 10 लाख लोग घायल हुए थे तथा करीब एक करोड़ नागिरक मारे गए थे।
”1918 में जब तक युदध समाप्त हुआ युद्ध ने बहुत गहरे प्रभाव छोड़े थे, पूरे यूरोप में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तंत्रों को प्रभावित किया था तथा उप महाद्वीप को मनोवैज्ञानिक और शारीरिक क्षति पहुंचाई थी। दुनिया भर में युद्ध विरोधी भावना उभरी, प्रथम विश्व युद्ध को “सभी युद्धों का अंत करने वाला युद्ध” बताया गया था। पहचाने गए कारणों में हथियारों की दौड़, गठबंधन, गुप्त कूटनीति और संप्रभु राष्ट्र की स्वतंत्रता शामिल थे जिनकी वजह से वे अपने हित में युद्ध में गए थे। इनके उपचारों के रूप में एक ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन की रचना को देखा गया जिसका उद्देश्य निरस्त्रीकरण, खुली कूटनीति, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, युद्ध छेड़ने के अधिकार पर रोक तथा ऐसे दंड जो युद्ध को राष्ट्रों के लिए अनाकर्षक बना दे, था।
”जबकि प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था फिर भी, बहुत सी सरकारों और समूहों ने पहले से ही युद्ध की पुनरावृत्ति को रोकने की दृष्टि से, जिस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय संबंध चल रहे थे, उनको बदलने की योजनाएं बनाना शुरू कर दिया था। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति वूड्रो विल्सन और उनके सलाहकार कर्नल एडवर्ड एम हाउस ने उत्साह से प्रथम विश्व युद्ध में देखे गए रक्तपात की पुनरावृत्ति को रोकने के एक माध्यम के रूप में संघ के विचार को प्रोत्साहित किया और संघ बनाना विल्सन के चौदह सूत्री शांति कार्यक्रम का केंद्र था।[19] विशेष रूप से अंतिम बिंदु में प्रावधान थाः “बड़े और छोटे राष्ट्रों के लिए समान रूप से राजनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की परस्पर गारंटी देने के उद्देश्य से विशिष्ट कानूनों के अंतर्गत राष्ट्रों का एक महासंघ बनाया जाना चाहिए.”[20]
”अपने शांति सौदे की विशेष शर्तों का मसौदा तैयार करने से पूर्व विल्सन ने यूरोप की भू-राजनैतिक स्थिति का आकलन करने के लिए जो भी जानकारी आवश्यक हो उसे संकलित करने के लिए कर्नल हाउस के नेतृत्व में एक दल का गठन किया। जनवरी 1918 के आरंभ में विल्सन ने हाउस को वॉशिंगटन बुलाया और दोनों पूर्ण गोपनीयता के साथ गहन मंत्रणा में लग गए, 8 जनवरी 1918 को राष्ट्रपति द्वारा अनजान कांग्रेस को राष्ट्र संघ पर पहला भाषण दिया गया।
”विल्सन की संघ के लिए अंतिम योजनाएं दक्षिण अफ्रीकी प्रधानमंत्री यैन क्रिस्टियन स्मट्स से अत्यधिक प्रभावित थी। 1918 में स्मट्स ने राष्ट्र संघः एक व्यावहारिक सुझाव शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया था। एप एस क्राफोर्ड द्वारा लिखी स्मट्स की आत्मकथा के अनुसार विल्सन ने स्मट्स के “विचार और शैली दोनों” को अपनाया था।
”8 जुलाई 1919 को, वुडरो विल्सन संयुक्त राज्य अमेरिका लौटे और उनके देश के संघ में प्रवेश के लिए अमेरिकी लोगों का समर्थन सुनिश्चित करने के लिए एक देशव्यापी अभियान में लग गए। 10 जुलाई 10 को, विल्सन ने सीनेट को संबोधित करते हुए घोषणा की कि “एक नई भूमिका और एक नई जिम्मेदारी इस महान राष्ट्र के सामने आई है, जिसको हम आशा करते हैं कि हम सेवा और उपलब्धि के और उच्च स्तर तक ले जाएंगे.” सकारात्मक स्वागत, खास कर रिपब्लिकनों की तरफ से, अति दुर्लभ.”

राष्‍टसंघ के विफल होने के जो कारण थे उन्‍हें दूर करते हुए संंयुुक्‍त राष्‍ट्रसंघ की स्‍थापना हुई दूसरे महायुद्ध के बाद । परन्‍तु क्‍या दुनिया में शान्ति है ? यदि नहीं तो क्‍यों नहीं । प्रथम महायुद्ध की विभीषिका केे अनुभ्‍ाव ने यह बोध जगाया कि अब आगे से सारे झकड़े आपसी पंचायत से निपटा लिए जाएं और जो भी इसकी अवमानना करे उसके विरुद्ध संयुक्‍त राष्‍टसंघ की शान्ति सेना कार्रवाई करेगी, परन्‍तु यह कहीं न कहा जा सकता था, न कहा गया कि इसका नियन्‍त्रण उसके हाथ में रहेगा जो इस संस्‍था का खर्च उठा सकेगा और यह उसके अन्‍याय को सही ठहराने और उसकी मनमानी को बढ़ावा देने वाली संस्‍था बन कर रह जायेगी।

युद्ध को रोकनेे के प्रयत्‍नों के बाद भी युद्ध जारी है। इसकी प्रकृृति में इतना अन्‍तर आया है कि पहले के दोनों महायुद्ध युराेेप के राष्‍ट्राेें के बीच लड़े गए थे और उसकी सबसे अधिक क्षति गोरों को उठाना पड़ा था यद्यपि अमेरिका को कोई क्षति नही हुई और उसे चौधराहट का मौका मिला, वहीं दूसरे महायुद्ध के बाद (1) सारे युद्ध अमेरिका की पहल से किए गए हैं, (2) इस बात का ध्‍यान रखा गया है कि गोरी नस्‍लों पर आच न आने पाए, (3) पहले गोरे राष्‍ट्र शेष जगत जिसे रंगीन त्‍वचा के लोगों का संसार कहा जा सकता है, उसको अपना उपनिवेश बनाने और उन उपननिवेशों के माध्‍यम सेे उनकी नैसर्गिक संपदा के दोहन और उनको अपना बाजार बनाने के लिए करते थे, वहां अकेले अमेरिका ने दूसरे महायुद्ध के बाद के सारे युद्ध स्‍वयं छेडें हैं और दोनों महायुद्धाेें में जितना विनाश हुआ था उससे अधिक विनाश इन युद्धाेें में हुआ है और वह भी अन्‍य देशों अर्थात रंगीन जगत की समस्‍त नैसर्गिक संपदा के दोहन और उसके अपने हथियारों का बाजार बनाने के प्रयोजन से उनमें कलह पैदा करने के लिए ।

यदि पश्चिम से इतर देश इस विराट योजना को समझ सकें तो उन्‍हें अापसी समझदारी से अपने विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाते हुए अमेरिका और यूरोप के दूसरे देशों के आयुध का बाजार बनने से बचना चाहिए और इस संकट को देखते हुए अपनी एक जुटता बढ़ानी चाहिए और ईसाइयत की आड़ में अपनी दखलअन्‍दाजी के क्षेत्र विस्‍तार के प्रति भी सजग होना चाहिए, परन्‍तु क्‍या यह संभव है । क्‍या यह समझ पैदा हो सकती है । क्‍या इसके विरुद्ध फैलाए जाने वाले अमेरिकी जाल से हम अवगत हो और उनसे बचने का प्रयास कर सकते हैं । भरोसा नहीं होता । दूसरों की समझ पर भी और अभी हमने जो विवेचन किया है उस पर भी नहीं, क्‍यों‍कि इतनी जटिल समस्‍याओं को समझने की अपनी योग्‍यता पर भी भरोसा नहीं है ।
फिर भी यह न भूलें कि कि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ अमेरिका के हाथों का खिलौना है, उसके कुकृत्‍यों पर चुप्‍पी साधने और उसे रास न आने वाले मुद्दों पर बहाने तलाश कर सभी तरह के प्रतिबन्‍ध लगाने का माध्‍यम है, और इसने उसकी पहल से अफ्रीका के एक देश में विषाणुओं का प्रयोग करके उसमें महामारी फैलाने का अभियोग स्‍वयं स्‍वीकर किया था। अमेरिका अपनी दरिंदगी से भी सैन्‍य बल का प्रयोग कर सकता है और शान्ति के नाम पर संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की शान्तिसेना का भी सामरिक उपयोग कर सकता है।

Post – 2016-12-20

मो सम कौन दलित दुखियारा

“तुम कल जो कुछ कह रहे थे वह इतना तर्क संगत था कि उसका प्रतिवाद नहीं किया जा सकता था, इसलिए मैं चुप रहा, पर फिर भी ऊब इसलिए रहा था कि तुमको सारी कमियां मुसलमानों में ही क्‍यों दिखाई देती है?”

”मेरी समस्‍या यह है कि तुमसेे बात करते हुए अक्‍सर लगता है कि मैं दीवार से बात कर रहा हूं क्‍योंकि मेरी बात सुनते हुए तुम बेचैनी में सुन्‍न हो जाते हो। सुनने के लिए प्रयत्‍न करते हुए भी नहीं सुन पाते। यदि ध्‍यान से सुन रहे होते तो मैं जैसे हिन्‍दू समाज के विषय में यह याद दिलाता हूं कि हम कौन थे, क्‍या हो सकते थे, क्‍या हो कर रह गए हैं और आगे यदि यही गति रही तो किस अवस्‍था को पहुंचेंगे तो मैं अपनी कमियां नहीं गिनाता, उसके पीछे एक वेदना होती है। हिन्‍दू समाज के बारे में यह बात हो सकता है तुम्‍हारी समझ में भी आ जाती हो, परन्‍तु मुस्लिम समाज के बारे में जब उसी पीड़ा को व्‍यक्‍त करता हूं तो तुम्‍हारी समझ में नहीं आती । तुम्‍हें छिद्रान्‍वेषण प्रतीत होता है । तुमको उनकी कमियां गिना कर अपने को श्रेष्‍ठतर सिद्ध करने का प्रयास प्रतीत होता होगा । जो दूसरों की कमियों के बल पर बड़ा बनना चाहते हैं वे छोटे होते हैं और छाटेपन बोध से पीडि़त होते हैं। मुझे शक है कि ऐसा तुम्‍हेें ही नहीं, मेरे मुस्लिम मित्रों को भी लग सकता है जिनके साथ सख्‍य स्‍थापित करने के प्रयत्‍न में तुमने उनकेे पिछड़ेपन का महिमामंडन किया है । उनकेे भय की खेती की है और उनके दुस्‍साहस को खूराक दी है । येे दोनों काम आज की दुनिया में परदों के पीछे से अमेरिका कर रहा है और उसके साथ छिपा हाथ मिलाए तुम कर रहे हो और भोले इतने हो कि तुुम्‍हें इसका पता तक नहीं ।

” तुम्‍हें उस वेस्‍ट ऐड द रेस्‍ट के हितों के टकराव का भी अनुमान नहीं जिसे मुस्लिम्स ऐंड द रेस्‍ट के रूप में क्‍लैश आफ सिविलाइजेशन्‍स के रूप में हंटिंगटन ने पेश किया था। पहले सबसे बड़े और सबसे साधनसंपन्‍न शत्रु को नकेल डालो या बदनाम करके उसे मिटाने की भूमिका तैयार करो, उसे दुनिया के लिए खतरा बताते हुए दुनिया को बचाने के लिए उसे मिटाना एक जरूरी कार्यभार बना दो और फिर उसके साथ अपनी कूटनीति और शक्ति का प्रयोग करते हुए उसे मिटा दो फिर वेस्‍ट ऐंड रेस्‍ट माइनस इस्‍लाम की जंग आसान हो जाएगी । मुझे इस बात की पीड़ा है कि न तो हिन्‍दुओं के हित संघ और भाजपा के साथ सुरक्षित हैंं न मुसलमानों के हित अपने को सेक्‍युलर अर्थात् सेक्‍युलरिस्‍ट कहने वालों के साथ सुरक्षित हैं क्‍योंकि इन दोनों का लक्ष्‍य दोनाेें समाजों में पिछड़ापन लाते, मध्‍ययुगीन प्रवृत्तियाें को उभारते हुए अपनी रोटी सेंकने की है। वहीं इनके वास्‍तविक हितों की चिन्‍ता करने वाली संस्‍थाओं या संगठनों का एेेसा अभाव है कि इनके हित रक्षक के रूप में ये ही बच रहते हैंं। दोनों का विश्‍वबोध इतना पंगु है कि वे यह नहीं समझ सकते कि वे वेस्‍ट की कारसाजी के शिकार हो रहे हैं । हमें सबसेे बड़ा खतरा उससे है जो हमें रेस्‍ट मानते हुए विश्‍व फलक से उसी तरह मिटाना चाहता है जैसे उसने अमेरिका और आस्‍ट्रेेलिया और कुछ दूर तक अफ्रीका के निवासियों को मिटाया था। उसकी योजना लंबी है, उसे किसी चीज की जल्‍दी नहीं है। बिल्‍ली चूेहे को दबोच लेने के बाद उसे कुछ कमजोर करने के बाद भागने के लिए छोड़ देती है, वह भागनेे की कोशिश करता है तो पंजों से दबोच कर फिर छोड़ देती है, क्‍योंकि वह जानती है कि अब यह मुझसे बच कर जा नहीं सकता। यही खेल वेस्‍ट का रेस्‍ट के साथ चल रहा है और इसका होश न हिन्‍दू संगठनों को है न मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्‍व करने वालेे सेेक्‍युलरिस्‍टों में न इनकी छत्रछाया में सुरिक्षित और निश्चिन्‍त अनुभव करने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवियों में और हम एक ऐसे घपले के शिकार हैं जिसकी सही संज्ञा तलाशनी होगी।

”एक हिन्‍दू हित के नाम पर कहता है हम मन्दिर यहीं बनाएंगे और दूसरा कहता है हम बनने न देंगे, जो उसकी योजना का अंग है जो रेस्‍ट को चूहे की जिन्‍दगी दे कर अपना खेल खेल रहा है इस आत्‍मविश्‍वास से कि यह बच कर जाएगा कहां। आपदा में एक ही आपदा के शिकार दुश्‍मन भी दोस्‍त हो जाते हैं परन्‍तु यह समझ दुश्‍मन तो पैदा होने देना चाहेगा ही नहीं, जिनके सामने आपदा है वे भी पैदा होने नहीं देना चाहते। एक ऐसा नेता हमारे बीच है जो देश को इस संकट से बाहर ले जाना चाहता है पर उसका जनाधार जिस संगठन पर टिका हुआ है उसकी सोच वही पुरानी है। ”

”याद आता है, यह भी तुम्हारेे रागभैरवी का हिस्‍सा है । तुमने एक बार यही आशंका भारत में ईसाइयत के प्रसार के विषय में भी उठाई थी। साल पूरे हो रहे होंगे।”

”तुम्‍हारी याददाश्‍त बहुत अच्‍छी है यह चेतावनी पूरी छानबीन के बाद 15 जनवरी 2016 को दी थी कि ईसाइयों ने कतिपय अज्ञात कुलशील और अनाथ बालकों काेे यातना दे कर अधोगति में रखते हुए अपने समुदाय में दलित वर्ग का दावा करने की तैयारी कर रखी है इसकी विश्‍वसनीय जानकारी मिली थी पर तक भरोसा नही हो रहा था, अब इ जिसकी झलक चार दिन पहले उस खुलासे मेंं हुई कि ईसाइयों में अस्‍सी प्रतिशत के साथ भेदभाव किया जाता है और उन्‍हें आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिलता। इसका भाष्‍य आना बाकी है जिसमें यह मांग की जाएगी कि दलित ईसाइयों के लिए भी आरक्षण की व्‍यवस्‍था होनी चाहिए और फिर इसके माध्‍यम से संस्‍थाओं और राजकीय सेवाओं में अपना प्रभाव विस्‍तार करने का अवसर मिलेगा। यदि तुम चाहोगे तो मैं उस पोस्‍ट को दुबारा तुम्‍हारी याद ताजा करने के लिए पेश कर दूंगा जिसमें इसकी भविष्‍यवाण्‍ाी की गई है परन्‍तु यह एक खतरनाक खेल है।”

”खतरनाक कैसे जब इसके पीछे इतनी लंगी सोच है तो ।”

”चालाक लोग भोले भाले लोगों से अधिक बड़ी गलतियां करते हैं।

”भारत में ईसाइयत के हित अमेरिका की उस योजना की याद दिलाते हैं जिसमें इन्दिरा जी के कडे़ रूख के बाद किलपैट्रिक ने भारत केे बाल्‍कनाइजेशन अर्थात इसके टुकड़े टुकड़े करने की धमकी दी थी। अमेरिका केे किसी नीतिज्ञ द्वारा किए जाने वाले दावे न तो उसके अपने व्‍यक्तिगत होते हैं न ही उसके पद से हट जाने के बाद उस योजना का काम बन्‍द कर दिया जाता है। उसे किसी बात की जल्‍दी भी नहीं रहती । हमने सीआइए की उस योजना की परिणिति देखी जिसमें 1949 में यह प्रस्‍ताव आया था कि यदि एक बिलियन डाालर मिल जायं तो वह सोवियत संघ की सेना तक में घुस पैठ बना कर उसके लिए ऐसी समस्‍या खड़ी कर सकता है कि उसे अपनी घरेलू समस्‍यायाअें से निबटने में ही सारी ताकत लगा देनी पडे । उसके बाद से सीआईए की वह योजना लगातार चलती रही। केजीबी उसके मुकाबले अपना काम करती रही पर पैसे का वह समर्थन जो सीआई ए के पास था वह केजीबी के पास न था और उसके भीतर भी अपनी पैठ बनाते हुए उसने वह स्थिति पैदा कर दी कि अमेरिका उनके सपनों का देश बन गया। उसके काउब्‍वाय जीन की ललक में सोवियत युकक और युवतियां पागल रहने लगे और अपने देश से ही विमुख होते चले गए और नौबत वह आ गई कि सोवियत संघ टूट बिखर कर अपनी रक्षा केे लिए चिन्तित देश बन कर रह गया जिसे वह जरूरत पड़ने पर पाल भी सकता है।

” मुझे अपनी सीमित जानकारी के कारण अन्‍देशा यही लगता है कि मिशनरियों ने माआेेवादियाों, वामपन्थियों को रेशमी धागों से बांधते हुुए वह स्थिति पैदा कर ली जिसमें किलपैट्रिक योजना का मुखर नाद जेएनयू के मंच से सुनाई पड़ा और वामपंथी उसके साथ खड़ेे दिखाई दिये। अपनी सीमति समझ के कारण मैं अपने निष्‍कर्षो के प्रति कभी पूरी तरह आश्‍वस्‍त नहीं हो पाता, परन्‍तु अपनी आशंकाओं से पूरी तरह मुक्‍त नहीं हो पाता।

‘ये किसी सीमा तक जा सकते हैं, अविश्‍वसनीय काम कर सकतेे हैं। जिस सचाई ने मुझे एक साल पहले विचलित किया था वह था खरीद कर या अपने संरक्षण में लिए गए बच्‍चों को योजनाबद्ध रूप में गन्‍दी और यातनापूर्ण स्थितियों में रख कर उनको दलित बनाने का अभियान जो छिपे रूप में चलता रहा और जिसमें मदर टेरेसा तक की भागीदारी थी जिनकी साख की चिन्‍ता में देखेे और जाने को भी बिसारने का प्रयत्‍न होता रहा। इस तथ्‍य को भुलाते हुए कि क्रूरता और उत्‍पीड़न के लिए बदनाम पोपों को भोलेराम या इन्‍नोसेंट और स्‍वर्गद्वार या थियोडोर जैसे मोहक नामों से पुकारा और उनके वास्‍तविक कारनामों पर परदा डाला जाता रहा।”

तुम बात कर रहे थे उनकी किसी बड़ी भूल की और ले कर एक दूसरा राग बैठ गए।

”गलती भारतीय सन्‍दर्भ में यह है कि अभी तक मिशनरियों द्वारा दलितों और जनजातियों को भारतीय या कहें हिन्‍दू समाज से बिलग करने के लिए दलितों के प्रति सवर्णों के अन्‍याय की कहानियां हमारे ‘सेक्‍युलर’ बुद्धिजीवियों से लिखवा कर प्रचारित किया जा रहा था कि वे ईसाइयत को इन बुराइयों से त्राण दिलाने वाला मान सकें, परन्‍तु अब उसी की इस स्‍वीकारेाक्ति के बाद कि दलित तबके के ईसाइयों के द्वारा भेद भाव किया जा रहा है उनके उस प्रचार की धार कुन्‍द हो जाएगी। ”

”तुम मूर्ख हो, सभी समस्‍याओं का तार्किक समाधान ही नहीं होता । वे जानते हैं कि पैसा समझदारों को भी बहरा और अंधा बना देता है, दलितों में तो यूं भी पढ़े लिखों की संख्‍या दयनीय है और उसके पढ़े लिखों के मन में हिन्‍दू समाज को सवर्ण समाज और सवर्णसमाज को उनका शत्रु दिखाते हुए इतना विमुख किया जा चुका है कि इस तरह की स्‍वीकारोक्तियों का कोई असर नहीं होने वाला।

”तुम लाोग छाेटी छोटी बातों पर उत्‍तेजित हो जाते हो। केरल के प्राइमरी स्‍कूल की मिशनरियों की पोथियों में ऐसी कहानियां पढ़ाई जा रही हैं कि एक गरीब आदमी हिन्‍दू देवता पास गया कि वह उसकी गरीबी दूर कर दें। वह दूर नहीं कर पाए। फिर वह ईसा की शरण आया और कहा उसकी गरीबी दूर कर दें और उसके बाद वह मालामाल हो गया। यह उसी सचाई का पाठ है जिसमें ईसाई बनने वालों को दो लाख दिया जा रहा है और उनकी गरीबी दूर की जा रही है । पैसे की ताकत को तुम समझ नहीं पाते और भावुकता में लाल पीले होने लगते हो। मुझे एक बिलियन डालर दो और मैं सोवियत संघ की सेना तक में खरमंडल पैदा कर दूंगा का ही दूसरा पाठ है मुझे इतना धन दो मैं पूरे भारत को ईसाई बना कर भारतविमुख कर दूंगा और वह ईसाई साम्राज्‍य का हिस्‍सा बन जाएगा। इसे क्‍या मुझे समझाना पडेगा। ”

Post – 2016-12-19

सेक्‍युलरिज्‍म का सही नाम हिन्‍दुत्‍व है

तुम्हारे साथ समस्या यह है, और यह समस्या केवल तुम्हारे साथ नहीं है, हिन्दू काठी के सभी लोगों की यह समस्या है कि तुम लोग गिरगिट की तरह रंग बदल कर अपने को बचाने और सही ठहराने का प्रयत्न करते हो, पर सही हो नहीं पाते! जब सही होते हो तो सबसे अधिक गलत होते हो और जब गलत होते हो तो दयनीय लगते हो !”

‘‘तुम कोई नई बात नहीं कर रहे हो, आज तक यही करते आए हो । यह आत्‍मप्रक्षेण है। परन्‍तु यह बताओ कि जब तुम हिन्‍दू समाज को कोसते हो, या जिसे तुमने हिन्‍दू काठी कहा, उसे कोसते हो, तो तुम्‍हारी काठी क्‍या रहती है? हिन्‍दू या हिन्‍दू से इतर ? यदि इतर तो उसकी संज्ञा क्‍या है ?’’

वह हंसने लगा, ”तुम जानते हो, उसकी संज्ञा क्‍या है। फिर भी यदि तुम भूल गए हो तो बता दूं , उसे सेक्‍युलरिज्‍म कहते हैं।”

”तुम हिन्‍दू नहीं हो, सेक्‍युलर हो।”

”मैं हिन्‍दू हो कर भी सेक्‍युलर हूं और तुम हिन्‍दू हो कर केवल हिन्‍दू रह गए हो या रह जाना चाहते हे। इससे बड़ी कोई पहचान तुम्‍हारे लिए कोई मानी नहीं रखती ।”

”अपनेे मनोचिकित्‍सक से कितने दिन पहले मुलाकात की थी तुमने ? याद न हो तो उनका नाम बताओ मैं पता लगा लूंगा। यदि नहीं है तो उसका प्रबन्‍ध्‍ा भी कर दूंगा पर उस दशा में तुम्‍हारा उससे मिलना मेरे खर्च पर रहा ।”

एक मिनट के लिए वह भौचक रह गया, फिर संभला तो मुस्‍कराने लगा,। ”जब जवाब देते नहीं बनता है तो लटकेबाजी का सरहारा लेते हाेे। आत्‍मनिरीक्षण करो तुम इतने क्षुद्र बन कर क्‍यों रहना चाहते हो ?”

”मैं तुम्‍हारा उत्‍तर ही दे रहा था पर तुम्‍हारी भाषा मेें बात करते हुए यह नहीं कहूंगा कि तुम इतने कमीने बन कर क्‍यों रहना चाहते हो, कि लाभ या ख्‍याति के लिए तुम अपना तिरस्‍कार करने को तैयार रहते हो, क्यों‍कि मैं जानता हूं तुम बीमार हो और तुम्‍हें सहानुभूति और मदद की जरूरत है।

”तुम इतने प्रतिभाश्‍ााली हो फिर भी यह नहीं जानते हिन्‍दू होना सेक्‍युलर होना भी है, परन्‍तु तुम जिस सेक्‍युलरिज्‍म की बात करते हो वह सामी मजहब है और उसे अपनानेे के बाद तुम हिन्‍दू नहीं रह सकते । अपने को धोखा अवश्‍य दे सकते हो। और य‍दि तुम हिन्‍दू होते हुए सेक्‍युलर भी होने की बात करते हो, तो तुमने हिन्‍दू ही नहीं भारत से जुड़े श्‍लाघ्‍य दायों को समझा नहीं और उसके ऐसे पहलुओं की तलाश करते रहे जिससे तुम अपने आप से घृणा कर सको, उस श्‍लाघ्‍य दाय को कुत्सित बना कर प्रस्‍तुत करते रहे । यही तुम्हारा आज भी मंगलाचरण था।

”अब तुम्‍हेें याद होगा एक बार मैंने पहले भी तुम्‍हेें आत्‍मपीड़क या मैसोकिस्‍ट कहा था, पर तब यदि कोई दुविधा थी तो आज वह दूर हो गई । तुुम तो यह भी नहीं जानते कि सेक्‍युलर का अर्थ क्‍या है । कोई व्‍यक्ति सेक्‍युलर नहीं हो सकता, वह धर्मपरायण हो सकता है, धर्म विमुख हो सकता है, उदार हो सकता है, सहिष्‍णु या असहिष्‍णु हो सकता है। सेक्‍युलर तो केवल राज्‍य या उसकी व्‍यवस्‍था हो सकती है। यह धर्मतन्‍त्र के विरोध में विकसित संकल्‍पना है जिसमें इस बात का ध्‍यान रखा जाता है कि राज्‍य अपने कार्यव्‍यापार में किसी धर्म के अनुसार न चले, किसी तरह का धार्मिक पक्षपात न करे, किसी धार्मिक समुदाय के आंतरिक मामलों में हस्‍तक्षेप न करे, कहो यह राज्‍य और धर्म के बिलगाव का सिद्धान्‍त है फिर तुम एक व्‍यक्ति होते हुए सेक्‍युलर कैसे हो सकते हो । क्‍या तुम अपने को राज्‍य समझते हो ? असंभव नहीं है, खब्‍ती लोग तो अपने को ही देश समझने लगते हैं और तुम भी ऐसी ही जमात में शामिल हो ।”

”दलील अच्‍छी दे लेते हो, पर दिमाग से काम नहीं लेते । मैं सेक्‍यलरिज्‍म का समर्थक हूै। ”

”तो कहाेे मैं सेक्‍युलरिस्‍ट हूं, जैसे कोई अपनेे का एनार्किस्‍ट, सोसलिस्‍ट, डेमोक्रैट, कम्‍युनिस्‍ट आदि कहता है। तुम तो जिन शब्‍दों का जाप करते हो उनका अर्थ तक नहीं जानते ।

”धर्मतन्‍त्र के स्‍थान पर लोकतन्‍त्र के हिमायती कहते तो अधिक सही होता, गो पूरा सही वह भी नहीं होता। सेक्‍युलरिज्‍म बहुत संकीर्ण और कुपरिभाषित शब्‍द है। यह दार्शनिक मीमांसा का शब्‍द नहीं है, अपितु राननयिक हेराफेरी का शब्‍द है इसलिए इसका देश और धर्म और समय के साथ अर्थ भी बदल जाता है ।

”मान सको तो जिन थियोक्रैट्स की मूर्खताओं का साक्षात्‍कार होने पर इसका जन्‍म हुआ उनके समर्थक भी अपने को सेक्‍युलरिस्‍ट सिद्ध करने का प्रयत्‍न करते हैं और राजननीतिक जोड़तोड के चलते उनको भाव भी दिया जाता है। तुम्‍हें इस बात का दावा करने वाले तक मिल जाएंंगे कि इस्‍लाम तो अपनी प्रकृति से ही सेक्‍युलर है। हदीस की ऐसी नजीरें दी जा सकती हैं कि पता चलेगा मुहम्‍मद साहव ने स्‍वयं कहा था कि धार्मिक मामलों में मेरे कथन का पालन किया जाय, क्‍योंकि उनका इलहाम हुआ था, परन्‍तु दुनियावी मामलों में अपनी समझ से काम लिया जाय। अब कोई पूछे कि कुरान प्रामाणिक है या हदीस तो मुश्किल खड़ी हो जाएगी ? मुहम्‍मद साहब के नाम पर उनके जीवन के अनुभवों को किन्‍होंने और कब लिखा? मेरी समझ से यदि कुरान धर्म ग्रन्‍थ है तो हदीस उसका पुराण है । जिनको अपने कारनामों को सही सिद्ध करना होता है वे बार-बार कुरान का हवाला देते हैं, उसकी अपने ढंग से व्‍याख्‍या करते हैं, न कि हदीस का।

”इसका यह मतलब नहीं कि मुसलमान होने के नाते कोई अपने जीवन मूल्‍य में सेकुलरिस्‍ट नहीं हो सकता, सेक्‍युलैरिटी का पालन नहीं कर सकता, बल्कि यह कि वह इस्‍लामपरस्‍त मुसलमान हो कर सेक्‍युलरिस्‍ट नहीं हो सकता। और भारत में इस्‍लामपरस्‍ती को प्रोत्‍साहित किया गया है फिर भी हम सेक्‍युलर राज्‍य होने का भ्रम भी पालते हैं ।”

”तुम कहना चाहते हो कि ज हिन्‍दू है तो सेक्‍युलरिस्‍ट हो सकता है?”

”तुम समझ सको तो मैं यही कहना चाहता हूं कि हिन्‍दू होने के बाद अलग से सेक्‍युलरिस्‍ट होने की जरूरत नहीं रह जाती। यह भारतीय अवधारणा है और जिस श्‍लाघ्‍य आशय में इसका प्रयोग किया जाता है उसका दूसरा नाम भारतीयता है।”

वह इस तरह उछला जैसे बिच्‍छू ने डंक मारा हो, ”अजीब अहमक हो यार । इतने जाहिल, इतने बन्‍द दिमाग। यह तो मैंने सोचा ही नहीं था।”

”साेचते कब हो तुम । पढ़ते हो और मान लेते हो और उसे दुहराते हुए अपने को दूसरों से अलग समझते हो। पहले यह समझने का प्रयत्‍न करो कि यूरोप में नवजागरण की प्रेरणा एशिया से मिली और एशिया के जिस देश से मिली उसने भारतीय मनीषा को आत्‍मसात् करने का प्रयत्‍न किया था और इसीलिए दसवीं शताब्‍दी के बाद के एक छोटे से काल को अनेक विद्वान मुसलमानों के बीच भी सेक्‍युलरिज्‍म से प्रेम का काल मानते और अपने बचाव में इसका इस्‍तेमाल करते हैं। यह भारतीय प्रेरणा थी जिसने इस्‍लाम में भी आत्‍मालोचन की प्रवृत्ति पैदा की यद्यपि वह टिकाऊ नहीं सिद्ध हुई, पर उसके माध्‍यम से यूरोप में पहुंची इस सोच ने वहां नवजागरण का सूत्रपात किया और धर्मतन्‍त्र से दो दो हाथ करने की प्रेरणा मिली। सेक्‍युलरिज्‍म के समर्थक या प्रेरक जिन दार्शनिकों का नाम लिया जाता है, वे सभी भारतीय दर्शन से सीधे या आडे रूप में परिचित थे और पश्चिम के आधुनिक दर्शन के जनक देका (Descarte ) के नव्‍यन्‍याय से प्रभावित होने की बात तो तुम्‍हारी समझ में ही नहीं आएगी। यह दूसरी बात है कि भारतीय दर्शन की ओर इस अभिरुचि के पीछे दारा शिकोह के विद्यानुराग और उनकी पहल से उपनिषदों आदि के फारसी आदि में अनुवाद और प्रसार का भी हाथ था।”

”तुमसे बात करते हुए कई बार लगता है पत्‍थर से अपना सिर फोड़ लूं कि तुमसे बहस न करनी पड़े। तुमको यह तक नहीं मालूम कि यूरोपीय सेक्‍युलरिज्‍म को प्रेरणा यूनानी दार्शनिकों से मिली थी। ”

”जो जी में आये उसे पूरा कर लेना चाहिए । तुम्हारा सिर बना ही इसलिए है। पर यह मत भूलो कि यूनानी दर्शन और चिन्‍तन के पीछे भी कुछ है और उसका विकास यूनानी दर्शन की तरह एक झटके में चरम से चरम तक की सीमा में नहीं हुआ था अपितु उसने विकास की अनेकानेक मंजिलें पार की थीं और वे भारत में पहचानी जा सकती हैं। पर उस अतीत को तो तुमने समझने का प्रयत्‍न किया ही नहीं, मिटाने के लाख जतन किए।

”जैसे बच्‍चों का ककहरा पढ़ाया जाता है, उसी तरह तुमको सांस्‍कृतिक ककहरा पढ़ना होगा। तभी तुम उस पीले जादू से बाहर आकर अपनी आंखों देखना और समझना आरंभ करोगे। मैं तुम्‍हारी इसमें मदद कर सकता हूें। देखो, हमारे ज्ञान प्रसार में दो तरह के समाज मिलते हैं । एक विकसित, सार्वभौम और और समावेशी द़ष्टिकोण वाले तन्‍त्रों के चिन्‍तन से जुडे हुए जिनमे अपनी समावेशिता के कारण दूसरे समुदायों की मान्‍यताओं, उनके सांस्‍कृतिक प्रतीकों, उनके देवों और श्‍लाघ्‍य विचारों के लिए उदारता का भाव था। ये सभी समाज बहुदेववादी और मूर्तिपूजक रहे हैं, जिनकी पैगेनिज्‍म कह कर आज पश्चिमी समाज निन्‍दा करता है क्‍योंकि अपने दर्शन में भी वह ईसाइयत से प्रभावित रहा है। भारत, ग्रीस, रोम इसी तरह के बहुदेववादी और मूर्तिपूजक समाज रहे हैं जिनमें सभी तरह के विचारों और मान्‍यताओं के लिए छूट थी।

”इसकेे विपरीत थे अविकसित यायावर या पशुचारी कबीले जिनकी विश्‍वदृष्टि अपने कबीले तक सीमित थी इसलिए उन्होने अपने सरदार की महिमा की पराकाष्‍ठा के रूप में एक परमेश्‍वर की कल्‍पना की जिसकी महिमा तो ऐसी कि उसके सिवाय और उससे बड़ा कोई नहीं, परन्‍तु इसके बाद भी वह केवल अपने कबीले का और उस कबीले के पुरुषाें को सर्वोपरि और दूसरे सभी जीवों, पदार्थों, यहांं तक कि उसकी ही महिलाओं को उस कबीले के उपभोग के लिए ही नहीं बनाया अपितु उसे यह छूट भी दी कि वे उनके साथ किसी तरह का व्‍यवहार कर सकते हैं, क्‍योंकि वे बने ही उनके सुख के लिए हैं। उस ईश्‍वर की महिमा को जिन्‍होंने नहीं स्‍वीकार किया, उसकी मान्‍यताओं के जो कायल नहीं हुए, जिन्‍होंने तर्क से उसे समझने का प्रयत्‍न किया, वे सभी और इस ईश्‍वर का पैगाम ले कर उतरने वालेे पुरुष के आविर्भाव ही नहीं, उसके धर्मबोध से पहले के सभी पूर्वज भी नरक की आग में जलने के लिए हैं, उस ग्रन्‍थ के रचे जाने के बाद सभी ग्रन्‍थ शैतानी फरेबों से भरे इसलिए जलाए जाने के पात्र है।

”इस बुनियादी फर्क को समझ लो, समावेशिता, अपने से भिन्‍न को सहन करने और उसके साथ रहने के शऊर की और उनके निजी विश्‍वासों और मान्‍यताओं में हस्‍तक्षेप से परहेज करने के सेक्युलर सिद्धान्‍त को सम्‍मान दो तो इसके लिए एकेश्‍वरवाद में, सामी मतों में जगह न मिलेगी। यहां तक कि, उनके प्रभावक्षेत्र में आने वाले समाजों में भी सेक्‍युलरिज्‍म एक आरोपित अवधारणा है जिसका विज्ञान और नव चेतना ने सम्‍मान किया इसलिए पश्चिम दो तरह के समाजों में बंटा हुआ है। एक धर्मग्रस्‍त और पोपतान्त्रिक समाज जिसकी संख्‍या में ह्रास हुआ है इसलिए यह अपनी रक्षा के लिए एशिया और अफ्रीका के देशों में अपनी जड़ें जमाने के लिए प्रयत्‍नशील है और इस दृष्टि से ईसाइयत धर्मतान्त्रिक और पश्‍चगामी मत है जिसमें सेक्‍युलरिज्‍म के लिए स्‍थान नहीं, दूसरी ओर जैसा हमने कहा, भारतीय प्रभाव में आने वाले और तार्किक, वैज्ञानिक सोच रखने वाले सुशिक्षित जनों का समाज है जो समावेशी भी है, भिन्‍नताओं के प्रति सहिष्‍णु भी, और इसके बढ़ते हुए प्रभाव के कारण यूरोपीय देश धर्मतान्त्रिक जकड़बन्‍दी से बाहर आ कर सही माने में सेक्‍युलर बन सके हैं।

”इस्‍लाम के प्रभावक्षेत्र में, जिन देशों को पश्चिमी देशों में से किसी का उपनिवेश बन कर रहना पड़ा उनको धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का भी लाभ मिला और उन्‍हीं में उस प्रभाव के कारण एक बहुत छोटा सा तबका सेक्‍युलरिस्‍ट सोच का पैदा हुआ पर वह अपने मुल्‍लातन्‍त्र के सामने लगातार कमजोर सिद्ध हुआ है। इस पश्चिमी शिक्षा और सोच के कारण ही अता‍तुर्क कमाल पाशा ने खिलाफत को मध्‍यकालीन जकड़बन्‍दी और मुल्‍लावादी प्रभाव से बाहर निकालने का प्रयत्‍न किया पर विफल रहा। इसी पश्चिमी प्रभाव में ईरान के शाह ने सेक्‍युलर प्रशासन का प्रयत्‍न किया परन्‍तु अब्‍दुल्‍ला खुमैनी के एक नारे के सामने पूरा तन्‍त्र बिखर गया और धर्मतान्त्रिक शासन आरंभ हो गया। इस्‍लामपरस्‍ती से बाहर आना, मध्‍यकालीन सोच से बाहर आना, आधुनिक शिक्षा और आकांक्षाओंसे प्रेरित होना और दूसरे समुदायों के साथ मैत्री भाव से रहने का शऊर पैदा करना मु‍सलिम बुद्धिजीवियों के लिए एक चुनौती है । भारतीयता और सेक्‍युलरिज्‍म का वह आदर्श रूप जिसके कारण उदार सोच के लोग इस पर मुग्ध हो जाते हैं, एक दूसरे के पर्याय हैं । मैं इस सीमित अर्थ में ही अपनी बात कह रहा था।”

”और कह रहे थे उस सोच के बारे में जिसमें जातिगत भेदभाव हैं और राजा का एक कर्तव्‍य वर्णमर्यादा की रक्षा करना होता था।”

”तुम्‍हारी चिन्‍ता सही है । पर इससे लड़ने की ताकत और लड़ने वालों का सम्‍मान भी इसी समाज में रहा है। यह वर्णविभाजन आज गलत लगता है पर गलत तो आर्थिक विषमता भी है । यह समाज की अर्थव्‍यवस्‍था की पुरानी सोच से जुड़ी समस्‍या है जिसका समाधान करने की तत्‍परता भी है और इसकी व्‍यापकता के कारण इसका निदान और उपचार एक चुनौती भी है । परन्‍तु जब हम सेक्‍युलरिज्‍म के आदर्श रूप की बात करते हैं तो उसमें अर्थतन्‍त्र को शामिल नहीं करते । वह पूर्ण सामाजिक और आर्थिक न्‍याय की गारंटी नहीं देता, पर सामाजिक आर्थिक भेद भाव को मिटाना एक उदात्‍त लक्ष्‍य हो सकता है, इसका सेक्‍यलरिज्‍म से घालमेल करने पर हम किसी के साथ न्‍याय नहीं कर सकते ।”

”मैंं चलू?”

”मैं तुम्‍हेंं राकना चाहूं तो भी रोक तो पाऊंगा नहीं ।”

Post – 2016-12-19

अनुपम मिश्र का जाना एक अपूरणीय क्षति है, एक प्रेरणास्रोत के रूप में वह मेरे जीवन के अन्‍त तक मेरे साथ रहेंगे ।

Post – 2016-12-17

ईश्‍वर की तलाश

”तुम्‍हारी मुश्किल यह है कि बचपन से ही सनकी रहे हो । तुम दूसरों से अलग दीखना और अलग दीखने के लिए कुछ ऐसा करना चाहते हो, जिसे केवल सिरफिरे करना चाहते हैं या मूर्ख करते रहते हैं। दूसरों से अलग दीखना या अलग कुछ कर दिखाना आत्‍मविश्‍वास की कमी को प्रकट करता है। इसके पीछे एक टुच्‍चापन भी होता है जिसे तुम विचित्रता के आवरण से छिपा लेते हाे ।” उसके स्‍वर में ऐसा आत्‍मविश्‍वास था कि एक क्षण को मैं स्‍वयं संभ्रमित हो गया।

मुझे उलझन में देख कर वह अधिक उत्‍साह में आ गया, “जो बड़े लोग होते हैं वे विचित्र नहीं होते, न विचित्र दीखने का प्रयत्‍न करते हैं। वे साधारण जीवन जीते है, सामान्‍य बने रहना चाहते हैं, और इसके बाद भी दूसरों से कुछ ऊपर उठ जाते हैं। यह बोध ही उनकी अपनी निजता के सम्‍मुख एक चुनौती बन कर खड़ा हो जाता है और उससे टकराते हुए वे अपने लिए भी आश्‍चर्यजनक ऊंचाई या कहना चाहो तो महिमा प्राप्‍त कर लेते हैं। महानता और विलक्षणता में फर्क है ।”

”तुम्‍हारा तर्क तो बहुत सही लगता है यार, लेकिन मेरे बारे में यह धारणा तुमने बनाई कैसे।”

”मुझे धारणा बनाने की आवश्‍यकता ही न हुई । यह तो तुम स्‍वयं कहते हो कि मेरे भीतर बचपन से ही एक जिद रही है कि यदि किसी काम को अशक्‍य मान कर कोई दूसरा नहीं करता है ताे इसे मैं करूंगा। याद कराे कहा था या नहीं।

”बात तो सही है, और यह प्रवृत्ति मुझमें आज भी है, पर यह विचित्र दीखने के लिए तो नहीं है। इसका संबंध तो उस जीवट से है जिसके चलते किसी सत्‍य को जानने या किसी कृत्य को करने के लिए व्‍यक्ति खतरा उठाने, कष्‍ट सहने और विरोधों का सामना करने के लिए तैयार होता है । जहां दूसरे इसके डर से दुबक कर बैठ जाते है, पीछे हट आते हैं, वहां उस पूरी भीड़ में कोई एक होता है जिसे यह कायरता प्रतीत होती है । यह ओढ़ी हुई चीज नहीं होती, भीतर से पैदा हाेती है और इस पर हमारा पूरा नियन्‍त्रण नहीं होता।”

”तुम्‍हारा मतलब है यह ईश्‍वर प्रदत्‍त होता है।”

”तुम ईश्‍वर को जानते हो ।”

”मैं तो उसे मानता तक नहीं, जानने की आवश्‍यकता क्‍यों पड़ेगी। यह तुम्‍हारे लिए कह रहा था। तुम उसे जानते भी होगे और मानते भी होगे और जो कुछ हो रहा है उसे उसकी ही लीला भी मानते होगे।”

”कभी कभी मूर्खों के मुंह से भी समझदारी की बात निकल जाती है, तुम ठीक कहते हो। मैं उसे जानता भी हूं, मानता भी हूं और उसका सम्‍मान भी करता हूं। अक्‍ल होती तो तुम भी वैसा ही करते । नहीं है तो ठोकरें खाते हो ।”

उसने जोरदार ठहाका लगाया, ”मैं तो पहले से ही जानता था कि जब हम सभी साहित्‍यकार और बुद्धिजीवी संप्रदायवादियों का विरोध कर रहे हैं, उसे जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं तुम भाजपाइयों के साथ क्‍यों खड़े हो गए।”

”’और तुम्‍हारी बोलती बन्‍द कर दी’ उसमें यह भी तो जोड़ लो । तुम समुद्रफेन की तरह हो । कहने को महासागर से जुड़े और होने काे उसकी सतह से नीचे का पता ही नहीं। तुम जानते हो समुद्र फेन जब जम जाता है तो पत्‍थर का भ्रम पैदा करता है, परन्‍तु यह पानी पर तैर सकता है और इसी के आधार पर समुद्र पर तैरने वाले पत्‍थरों को फेंक कर रामसेतु बनाने की उद्भावना की गई थी जब कि यह एक भूसंरचना का चमत्‍कार था जिसे आज भी रामसेतु के रूप में पहचाना जा सकता है।”

”और वहां राममंदिर बनाया जा सकता है।”

”उसकी आवश्‍यकता नहीं । वहां पहले से रामेश्‍वरम् मन्दिर है, भले वह राम का न हो कर शिव का ही हो। तुम कभी उन चीजों की गहराई को आज की सूचनाओं और ज्ञान के आलोक में देखने का प्रयत्‍न करो तो तुम्‍हारी जड़ता कम हो जाएगी। पहले मैं ईश्‍वर को, उस ईश्‍वर को जिसे मैं मानता हूं और जिसके लिए पुरानी परिभाषाओं का लाभ उठाता हूं, यह समझे बिना कि जिन लोगों ने ईश्‍वर को इस रूप में परिभाषित किया था उनके मन में भी ठीक यही विचार रहे होंगे या नहीं।

”ईश्‍वर अज्ञेय है, और जहां हमारे ज्ञान की सीमा समाप्‍त होती है उससे आगे का समग्र क्षेत्र दो कारणों से अज्ञेय है । एक तो इसलिए कि वह इतना जटिल, इतना बहुलतापूर्ण, इतने असंख्‍य कारणों से प्रभावित होने के कारण अनुमान और ज्ञान दोनों की सीमाएं पार कर जाता है, कि उसका एक नाम ईश्‍वर है। यह एक कामचलाऊ प्रबन्‍ध है, कुछ उसी तरह का जैसे हम बीजगणित में अज्ञात संख्‍या को अ या क नाम दे लेते हैं। अ या क नहीं कहा ईश्‍वर कह दिया। यह भौतिक और ज्ञेय होते हुए भी अपनी जटिलता के कारण अज्ञेय जैसा प्रतीत होता है । और दूसरा है कि ज्ञेय परन्‍तु अज्ञात का इतना विराट परिमंडल हमारे ज्ञान सीमा के बाहर है जिसकी कल्‍पना तक नहीं की जा सकती और उसके एक क्षुद्र अंश का पता चलता है तो पहले की पूरी दुनिया बदल जाती है और जिज्ञासा के असंख्‍य कपाट खुल जाते हैं। उस अज्ञात को ईश्‍वर और उसके अंश ज्ञान को ईश्‍वर का साक्षात्‍कार कहो तो तुम्‍हारा सतीत्‍व भी बचा रहेगा और सत भी बचा रहेगा।

”जब प्रतिभा के सन्‍दर्भ में हम ईश्‍वरप्रदत्‍त का प्रयोग करें, तो इस अर्थ में कर सकते हैं कि असंख्‍य अज्ञात और अपने नियंत्रण से बाहर के किंचित ज्ञात परन्‍तु उससे अधिक अज्ञात दबावों, अभावों, सु‍विधाओं और स्थितियों के बीच हममें कुछ योग्‍यताएं, आन्‍तरिक श्‍‍ाक्तियां और निर्योग्‍यताएं पैदा होती हैं जिनका कुछ संबंध गुणसूत्रों से, कुछ माता पिता के स्‍वास्‍थ्‍य से, और कुछ भू्णकालीन अवस्‍था में मां के पोषण और अनुभवों से जुड़े होते हैं जिनका भौतिक आधार होते हुए भी अपनी जटिलता के कारण वह अज्ञेय लगता है और उससे बाद में हमारे जन्‍म के बाद की आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियां और निजी अनुभव होते हैं जिसमे हमारी चेतना, मेधा और प्रतिभा या किसी विशेष रुझान का जन्‍म होता है जिसका दबाव ऐसा होता है कि उसे तुष्‍ट करने के लिए हम दूसरे प्रलोभनों की चिन्‍ता ही नहीं करते अपितु कष्‍ट और यातना तक सहने के लिए तैयार हो जाते हैं।

”सच कहो, क्‍या तुमने किसी भी विषय को नारों से आगे बढ़ कर उसकी गहराई में समझने की कोशिश की है । ईश्‍वर को दूध की मक्‍खी की तरह फेंकने की जगह रहस्‍य की उन परतों को समझने की कोशिश की है जहां ईश्‍वर का निवास है। नहीं की है इसलिए तुमको उन नेताओं को तब तक ईश्‍वर मानना होता है, जब तक उनकी धाक बनी रहती है । वह लेनिन हों, स्‍तालिन हो, ली हो या माओ हों। जो ईवर को नहीं जानता उसे मनुष्‍यों का दैवीकरण करना होता है जिनकी सीमाएं उजागर होने के बाद वे ही लोग जो उनका कीर्तन करते थे, उनकी भर्त्‍सना करते पाए जाते हैं।

ईश्‍वर मनुष्‍य की जरूरत है इसलिए मिटाए भी नहीं मिटता क्‍योंकि हमारा अज्ञात और ज्ञेय अपार है और उसका रंचमात्र आलोक हमारा कायाकल्‍प कर देता है।”
वह हत्‍प्रभ नहीं हुआ, ”आज तो तुम बच गए, कल खबर लूंगा ।”