Post – 2016-12-05

हंसी आती है अपने रोने पर

उसने मिसरा पूरा किया, ” और रोना है जग हंसाई का । भई तुमने कल देश का जो बौद्धिक खाका खींचा उसमें तो लगता है हम बुद्धिविहीन वर्तमान में जी रहे हैं । फिर यह देश चल कैसे रहा है ?”

”चलने के लिए तो पहले अपने पांवों पर खड़ा होना पड़ता है । यह तो अपने पांवों पर खड़ा तक नहीं हो सका। अपनी जरूरत का आधा माल बाहर से खरीदता है और उस पर गर्व करता है । अपने देसी उत्‍पाद पर लज्जित अनुभव करता है । चल रहा होता तो वह एशिया के दूसरे देशों की तुलना में, जो उस चरण पर जब हमें स्‍वतन्त्रता मिली, हमसे हर माने में पीछे थे, आज भी अपनी अग्रता बनाए रखता। उनसे पिछड़ता गया है और आज उनसे अनुरोध कर रहा है कि आओ, जो माल वहां बना कर हमें बेचते हो, यहां बनाओ और सारी दुनिया को बेचो। दूसरे जहां चलते रहे, वहां हम घिसटते रहे । घिसटने वाला भी अपने पिछले मुकाम से कुछ आगे सरकता तो है ही।

”प्रश्‍न तुलनात्‍मक प्रगति का है। हमारी नगण्‍य प्रगति में प्रौद्याे‍गिकी की भी एक भूमिका है जो सभी देशों को बाजार के नियम से पहुंची है। जिन गांवों और कस्‍बों में टेलीफोन तक नहीं था, वहां हर तीसरे आदमी के पास मोबाइल है और उससे जुड़ी सुविधाएं हैं। इस‍लिए प्रश्‍न मैने जो खाका खींचा है उससे घबराने का नहीं अपितु यह विचार करने का है कि किन प्रवृत्तियों को प्रोत्‍साहित करने के कारण हम अपने पांवों पर खड़े तक न हो सके। अपनी समस्‍याओं पर स्‍वयं गंभीरता से विचार करने से कतराते रहे और उनके विषय में विदेशियों के लेखन और विवेचन से कुछ तिनके उठा कर काम चलाते रहे और इन तिनकों की ढेर के अनुपात में ही अपने को विद्वान समझते रहे। किसी न किसी हाल में जीवित रहना, या पहले से कुछ अधिक सुविधाओं से लाभान्वित होना तो औपनिवेशिक अवस्‍था में भी संभव होता है । हम सचमुच स्‍वतन्‍त्र हुए या मात्र सत्‍ता का हस्‍तान्‍तरण हुआ और शेष पूर्ववत चलने दिया ? हमारी स्‍वतंत्रता तो मात्र शोर बन कर रह गई, जीवन में उतर ही न पाई।”

वह कुुछ देर उधेड़-बुन में पड़ा रहा, फिर बोला, ”देखो, हमें औपनिवेशिक विरासत नहीं मिली थी, जिस महारथ पर उपनिवेशवादी सवार थे, उसे जाते-जाते, खीझ में योजनाबद्ध रूप में उन्‍होंने तोड़ और अपनी ओर से बर्वाद कर दिया । समस्‍या थी इसे जिस रूप में यह हमें हासिल हुआ था उसमें इसको और बिखराव से रोकते हुए एक नये समाज की रचना का । उसमें ही हमारी सारी श‍क्ति लग गई ।”

”अौर यह रचना तुम उन्‍हीं तत्‍वों की मदद से करते रहे जिनको हथियार बना कर उस महारथ के धुरे और पहियों को तोड़ा गया था।”

”तुम कहना क्‍या चाहते हो ?”

”कहना यह चाहता हूं कि हमारे पास जो आर्थिक और प्रौद्योगिक आधार था, उसे उपनिवेशवादियों ने अपनी जरूरत से तैयार किया था । उसका संचालन उनके हाथ में था। हमारा उपयोग वे अपने पुर्जो के रूप में करते थे । हमने उस आधार से अपना आत्‍मीय संबंध कभी बनाया नहीं, बना भी नहीं सकते थे, क्‍योंकि इसका रास्‍ता रोक कर वे खड़े थे । वे हमारा उपयोग कर रहे थे, हमें प्रबुद्ध होने देना नहीं चाहते थे । निर्माण का कार्य, नई पहल का काम, अनुसंधान का काम, उसके लिए अपेक्षित अनुशासन यह रेल लाइन, यातायात के साधन और प्रशिक्षित सेना मिलने से नहीं आरंभ हो जाता । चेतना के रूप को बदलने से होता है । चेतना का यह रूप भाषा और सोच से जुड़ा होता है । इस दिशा में उपनिवेशी दासता में पले देशों ने ध्‍यान नहीं दिया, और वे आभ्‍यन्‍तरित दासता पर गर्व करते हुए उसे बनाए रखने ही नहीं अपितु बढ़ाने पर लगे रहे । सामाजिक सामरस्‍य के लिए हमें एक नई शुरुआत की जरूरत थी । उसके लिए एक देसी सोच और समझ वाले नेतृत्‍व की जरूरत थी, अंग्रेजों को अपना आदर्श मानने वाले, किताबों के माध्‍यम से देश से जुड़ने का प्रयत्‍न करने वाले और दासता के मूल्‍यों का विस्‍तार करने वाले नेतृत्‍व का नहीं । बांटो और राज करो वाली नीति पर चलने वाले नेतृत्‍व की तो कदापि नहीं । कम से कम विभाजित हिन्‍दुस्‍तान में इसके सभी टुकड़ों को ऐसा ही नेतृत्‍व मिला इसलिए हमारी दशा औपनिवेशिक दौर से भी अधिक खराब, अधिक अरक्षणीय और अधिक पराश्रयी होती चली गई ।

”एशिया के वे देश जो बहुत पीछे थे, उनकी चेतना इस तरह अवरुद्ध नहीं थी । विकास के लिए यंत्र की विरासत नहीं, चेतना के रूप की आवश्‍यकता होती है, इसलिए नई चुनौतियों का उन्‍होंने हमसे अधिक दक्षता से सामना किया । अंग्रेजी न जानते हुए भी उन्‍होंने पश्चिमी देशों से हमारी तुलना में अधिक सीखा और उस सीखे का नये रूप में समंजन किया कि वे अपना माल उन देशों को भी बेचने में समर्थ हुए जिनसे यह गुर सीखा था ।

”हम अंग्रेजी जानते हुए, इसे विश्‍वज्ञान की कुंजी मानते हुए, अधिक से अधिक दास भाव से ब्रितानी उच्‍चारण को अपना मानक बनाने पर अधिक ध्‍यान देते रहे, सीखा कुछ नहीं। स्‍वतन्‍त्रता में भी दासता के नए संस्‍करणों का आविष्‍कार करते हुए मानसिक रूप में औपनिवेशिक दौर से भी अधिक पराश्रयी बनते चले गए। इसका ध्‍यान कम से कम उनको तो होना चाहिए जो अपने को भारतीय समाज का बुद्धिनिधान मानते हैं, पर है क्‍या? जिस संघ की सीमा को हम बयान कर रहे थे, उसे तो हो ही नहीं सकती।

”अपने अज्ञान को समझने के लिए भी ज्ञान की जरूरत होती है। हम जितना कम जानते हैं, अज्ञात का दायरा उसे ही घेर कर बहुत छोटा होता है । ज्ञान के विस्‍तार के साथ ही अज्ञान का परिसर भी विस्‍तार पाता है । यदि संघ से जुड़े लोग अपने वर्तमान की सफलताओं से संतुष्‍ट हैं तो उसका कारण समझा जा सकता है, परन्‍तु दूसरों की चूक से आकाशपतित अवसर को संभालने का भी यदि शऊर नहीं पैदा हुआ तो आप देश का क्‍या भला करेंगे? आए हुए अवसर को भी गंवा देंगे ।

”परन्‍तु जो अपनी बहुज्ञता के अहंकार में यह तक नहीं समझ पाए कि उनका देश क्‍या है, समाज क्‍या है, उनकी जो गति हो रही है वह क्‍यों हो रही है, उनकी अपनी जो गति हो रही है वह क्‍यों हो रही है, जो उन्‍हीं मूर्खताओं को बच्‍चों जैसी जिद से दुहराते चले जाते हैं, उनके लिए तो किसी ऐसे शब्‍द का आविष्‍कार करना होगा जो मूर्खता के सभी अकीर्तिमानों को पार कर जाय ।”

”तुम फिर उसी बिन्‍दु पर पहुंच गए जहां कल तुमने अपनी बात का अन्‍त किया था । यह तो विचार विमर्श न हो कर सांप और सीढ़ी का खेल हो गया। हमें करना क्‍या है यह तो बताते ।”

”यदि इतनी अक्‍ल होती तो मैं उतनी गलतियां नहीं करता जितनी मुझसे होती रहती हैं । फिर भी यह जान कर मेरा मनोबल कुछ उठता तो है ही कि जिन्‍हें समझदार समझता था वे तो मुझसे भी अधिक नासमझ हैं । इतने लंबे समय तक लगातार समझाते रहने के बाद भी यह मोटी सी बात मित्रों और अमित्रों को नहीं समझा सका कि भाषा जिसके माध्‍यम से ही विचार संभव है, उसकी महिमा को नष्‍ट तो मत करो । कम से कम गालियों और फिकरों और फब्तियों की भाषा से तो बचो, वे तो अधिक गिरे हुए के पास कुछ अधिक मात्रा में हुआ करती हैं और उनके प्रयोग से तुम अपने को गिरे हुओं की जमात में शामिल कर लेते हो, तुम्‍हारा ज्ञान और करतब कुछ भी क्‍यों न हो ।

”जिसके पास तर्क, प्रमाण और औचित्‍य नहीं होता है उसके पास गालियों का भंडार होता है और अपने को गलत सिद्ध करने का सबसे सीधा उपाय है सटीक व्‍याख्‍या से बचना और फब्तियों, फिकरों, गालियों का इस्‍तेमाल करना । इतनी सी बात अपने सुपठित बुद्धिनिधानों को नहीं समझा सका । विचार विमर्श का स्‍तर इतना गिरा हुआ कभी था, यह मुझे याद नहीं । इसका बोध सभी को है, यह भी एक सचाई है, पर इससे उबरने की आकांक्षा तक का अभाव देख कर विदांवरों की बुद्धि पर तरस आता है ।

Post – 2016-12-04

सचाई का सामना

”तुम अपने किस अनुभव की बात कर रहे थे । जरा सुनू तो ।”

”देखो, मेरे लिए सत्‍य की खोज और उसकी प्रतिष्‍ठा से ऊंचा कोई दूसरा लक्ष्‍य नहीं लगता और इसके लिए किए जाने वाले श्रम से अधिक सार्थक कोई दूसरा मनोरंजन नहीं लगता। इसके कारण अपने श्रद्धेय जनों का भी विरोध करते संकोच नहीं होता। इसका नुकसान यह होता है कि उनमें मेरे प्रति खिन्‍नता पैदा हो जाताी है । यदि लगे जिसे सर्वमान्‍य सत्‍य के रूप में स्‍वीकार किया जाता है उसमें खोट है, तो दूसरे सारे काम छोड़ कर उसके पीछे लग जाता हूं।

जितना भाषाविज्ञान एम ए में पढ़ा था उसके अनुसार आर्य भाषा लिए आर्यजन बाहर से आए थे, उन्‍होंने उत्‍तर भारत पर अधिकार कर लिया था और यहां बसे दूसरे जनों को भगा दिया था और अपनी भाषा और संस्‍कृति लाद दी थी। द्रविड़ भाषाएं एक अलग आद्यद्रविड़ से उसी तरह पैदा हुई थी जिस तरह संस्‍कृत के ह्रास से उत्‍तर भारत की भाषाएं।

दक्षिण भारत की भाषाएं सीखने के क्रम में पता चला कि इस मान्‍यता की प्रत्‍येक कड़ी गलत है। इसे सिद्ध करने के लिए उन पहलुओं की जांच करते हुए अपनी मान्‍यता का प्रतिपादन किया जो आर्य-द्रविड भाषाओं की मूलभूत एकता शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इसमें जो स्‍थापनाएं थी उन्‍हें समझने की क्षमता हिन्‍दी विद्वानों में न थी, यह कहना तो अशोभन होगा, परन्‍तु एक ऐसा व्‍यक्ति जो पेशेवर भाषाविज्ञानी न हो, ‘विश्‍वविख्‍यात’ भाषाविज्ञानियों द्वारा इतने श्रम और अधिकार से तैयार की गई मान्‍यता का खंडन करे तो उसके तर्क और प्रमाण जितने भी प्रबल हों, उन्‍हें स्‍वीकार करने का साहस उनमें नहीं हो सकता था। इसलिए पुस्‍तक की तारीफ तो सुनने को मिली, प्रतियां चार साल में बिक गई, पूने विश्‍वविद्यालय में इसे भाषाविज्ञान के सन्‍दर्भ ग्रन्‍थों में भी स्‍थान मिला, अनेक प्रशंसात्‍मक लेख भी प्रकाशित हुए, पर उसकी आधिकारिक समीक्षा देखने में नहीं आई ।

इस पुस्‍तक की एक प्रति मैंने आपात काल के दिनों में मेरे पड़ोसी के साथ गुप्‍त वास करने वाले स्‍वराज्‍यप्रकाश गुप्‍त को दी थी। यह पता तो परिचय के समय ही चल गया था कि वह संघ की विचारधारा से संबन्‍ध रखते हैं, पर आपात काल की समाप्ति के बाद वह गणवेश में शाखा में जाते मिले तो मुझे हैरानी हुई। जो भी हो, परिचय के बाद मैं उन्‍हें उसी तरह छेड़ने के लिए ऐसी बाते कर बैठता था, जो आज भी हिन्‍दू सोच के लोगों को क्षुब्‍ध करने के लिए वामपंथियों द्वारा की जाती है। कम्‍युनिस्‍ट पार्टी से कभी लगाव न हुआ, पर अपने को मार्क्‍सवादी तो मानता ही था। एक दिन रामायण की चर्चा चलने पर मैंने कहा रामायण की जो कथा हम आज पढ़ते हैं, वह बाद में, मूल कथा को बदलते हुए लिखी गई है। मैंने अपने तर्क तो यह सोच कर दिए थे कि इससे उन्‍हें खिन्‍नता होगी, परन्‍तु अब वह इस बात के पीछे पड़ गए कि चंडीगढ़ में पुरातत्‍वविदों, नृतत्‍वविदों का सम्‍मेलन आयोजित है, उसमें एक पेपर पढि़ए । अंग्रेजी में इससे पहले लिखा नहीं था, थोड़ी चिन्‍ता थी, फिर भी पेपर तैयार किया ‘दि ओरिजिनल रामायण: ह्वाट इट रीयली वाज’ । इस संगोष्‍ठी में डा सांकलिया, ए घोष, बी बी लाल, बी के थापर, केनेथ केनेडी आदि विद्वान उपस्थित थे। पर्चे पर चर्चा किसी अन्‍य की तुलना में अधिक गर्म रही और अगले दिन दिल्‍ली के अंग्रेजी के अनेक समाचारपत्रों ने लेख की पूरी समरी जो मैंने बनाई थी, उसे ज्‍यों का त्‍याें छाप दिया। 1975 में अायोजित यह दो दिव‍सीय संगोष्‍ठी मेरे अभिरुचि के क्षेत्र में नया मोड़ था और इसके बाद मेरे व्‍यक्तित्‍व के निर्माण में एस पी गुप्‍त द्वारा पेश गई चुनौतियों या अपेक्षाओं की भूमिका प्रधान थी । अपने अपने राम लिखने की प्रेरणा भी इसी से मिली और इसे लिखने में कई साल लगे।

गुप्‍त जी ने एक बार प्रस्‍ताव रखा कि मुझे ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ का अंग्रेजी में अनूवाद करना चाहिए । एक काम जो पूरा हो चुका है उसे दुबारा करने का मन नहीं होता। अपनी अंग्रेजी पर भरोसे की कमी एक अतिरिक्‍त कारण थी। मैंने कहा, आप उस ओर क्‍यों जाते है, मैं ऋग्‍वेद में ट्रेड ऐंड कामर्स पर एक लेख अंग्रेजी में लिखता हूं । यह लेख स्मिथसोनियन इंस्‍टीट्यूट, बेंगलूरु में आयोजित एक दो दिवसीय संगोष्‍ठी में पढ़ने का अवसर आया। स्मिथसोनियन इंस्‍टीट्यूट का नाम संदर्भ ग्रन्‍थों में पढ़ता आया था, परन्‍तु वहां पहुंचने पर पता चला इसके आयोजन के पीछे भी संघ का हाथ था। यह मेरे लिए कुछ खिन्‍न करने वाली बात थी, क्‍योंकि मैं ऐसे खुले मंच का पक्षधर हूं जिसमें विभिन्‍न विचारधाराओं के लोग सम्मिलित हों जो एक दूसरे की काट भी कर सकें। इस निबन्‍ध में जो बीस पन्‍नों का था, मैंने पहली बार जिन प्रश्‍नों को खड़ा किया वे निम्‍न थे:
1. ऋग्‍वेद में नदियों को वारिपथ या यातायात के मार्ग (प्र ते अरदत वरुण यातवे पथ:) के रूप में क्‍यों दिखाया गया है ?
2. नदियों की महिमा उनके समुद्र पर्यन्‍त प्रवाह के लिए क्‍यों गाई गई है ?
3. घाट की नौका से ले कर समुद्रगामी नौकाओं या जहाजो का इतनी प्रचुरता से उल्‍लेख क्‍यों किया गया है ? इसका पशुचारी समाज को क्‍या जरूरत हो सकती ?
4. ऋग्‍वेद में परिवहन के उन सभी साधनों का हवाला क्‍यों और कैसे आता है जिनसे हम परिचित रहे हैं।

और फिर हमारे मूर्धन्‍य विद्वानों के मन में घर कर चुकी उस चरवाही या अविकसित ग्राम्‍य अर्थव्‍यवस्‍था के विपरीत विविध पक्षों की पड़ताल करते हुए स्‍थापित किया गया था कि ऋग्‍वेद वैदिक व्‍यापारियों का साहित्‍य है। इसमें उनकी ही चिन्‍ताओं, सरोकारों और आकांक्षाओं को प्रधानता दी गई है और इसीलिए वैश्‍य वर्ण को ऋग्‍वेद से उत्‍पन्‍न माना जाता है ।

मैंने यह खाका स्‍मृति के आधार पर प्रस्‍तुत किया है जिसमें कुछ विचलन भी हो सकती है, परन्‍तु जैसा अपेक्षित था, इसने जिस तरह की सरगर्मी पैदा की वह मेरी अपेक्षा से अधिक थी। अनेक विद्वानों के लिए मैं वेद का अधिकारी विद्वान बन बैठा, जिसका दावा आज तक करने का साहस नहीं है । यह एक तरह से हड़प्‍पा सभ्‍यता और वैदिक साहित्‍य के लेखन का प्रेरक चरण था ।

यह स्‍मरण दिला दें कि एस पी गुप्‍त के लिए मैं मार्क्‍सवादी था, और मेरा यह परिचय मुझे रास आता था, क्‍योंकि यह मुझे उस जमात से अलग करता था जिसके अध्‍ययन, ज्ञान और विचारधारा से मुझको गंभीर आपत्तियां थीं। यदि मेरे मार्क्‍सवादी मित्र यांत्रिक मार्क्‍सवाद से मेरी असहमति और इतिहास व भाषा विषयक मेरे अध्‍ययनों के कारण कुछ स्‍मेरमुखी बने रहते तो यह भी मुझे रास आता और इसका भी विरोध नहीं करता। सोचने वाला अकेला और अरक्षणीय होता है, मानने वालों की लश्‍कर और जमात होती है, सभी किसी के लिए भी जीने मरने को तैयार ।

अध्‍ययन और ज्ञान के मामले में मुझे अपने मार्क्‍सवादी मित्रों पर पहले बहुत अधिक भरोसा था, क्‍योंकि अध्‍ययनशील लोगों के लिए दूसरे रास्‍ते इन्‍होंने अपनी प्रचारशक्ति के बल पर बन्‍द कर दिए थे। धीरे धीरे पता चला इसमें विचारधारा की आड़ में एक खास तरह के अज्ञान को श्‍लाघ्‍य माना जाता है और यह है अपने साहित्‍य, इतिहास, उसकी भाषा, यहां तक कि अपनी चालू भाषा के प्रति अज्ञान और अवज्ञा । इसकी मीमांसा में जाने पर पता चला कि इसके पीछे ज्ञान और सत्‍यान्‍वेषण के लिए अपेक्षित श्रम और साधना से बचने का और थोड़े से बहुत कुछ हासिल करने का आलसी और ऐयाश रवैया है।

फिर यह समझ में आया कि इस अज्ञान से बाहर पड़ने वाला जो सूचनाओं का भंडार है, जिसे अपनी पूंजी बना कर ये अपने अधिक ज्ञानी होने का भ्रम बनाने में सफल होते हैं, उसकी समझ की योग्‍यता ही नहीं है, इसलिए इनकी अपनी समझ बन ही नहीं पाई है । एक ओर ये लीगी सोच के शिकार हैं तो दूसरी ओर औपनिवेशिक स्‍थापनाओं को अन्तिम सत्‍य या उसके निकट मानते हैं । सबसे दुखद था यह बोध कि ये आसानी से बिक सकते हैं और अपने श्रद्धेय पूर्वजों का भी अपमान करते हुए पैसा कमाने के छोटे रास्‍ते निकाल सकते हैं ।

अब यहां पर आकर एक विचित्र धर्म संकट पैदा होता है । हम आत्‍मविक्रयी बहुज्ञों को जो जिसके अधिकारी विद्वान माने जाते हैं, उसे भी नहीं समझते, अधिक भरोसे का समझें या उन अल्‍पज्ञ, डंडाधारी संगठनों से निकले लोगों को जिनके पास समाज और देश के प्रति निष्‍ठा तो है, परन्‍तु जिनको बाहुबल पर अधिक और बुद्धिबल पर कम भरोसा है। जो जहां बाहुबल की सचमुच आवश्‍यकता होती है वहां उससे काम नहीं लेते, और बुद्धिबल के अभाव में अरक्षणीय बने रहते हैं ।

यदि कला की गहरी समझ रखने वाले फिल्‍मों के ऐसे अंशों को कतरने से बचाने के लिए रिश्‍वत लेते रहे हों, तो उनकी तुलना में कला की उतनी गहरी समझ न रखते हुए भी सामाजिक मर्यादा पर किसी तरह का समझौता करने से इन्‍कार करने वाला अधिक वांछनीय है या नहीं ?

जब हिन्‍दी के प्रचार और प्रसार में फिल्‍मों के योगदान का प्रसंग आता है तो हम झूम उठते हैं, परन्‍तु जब समाज में अपराध, अश्‍लीलता, उदंडता, बात बात पर उत्‍तेजित होने की मनोवृत्ति के प्रसार में अपराध जगत के पैसे पर पलने वाले और समाज का अपराधीकरण करने वाले फिल्‍म उद्योग की भूमिका की जिम्‍मेदारी आती है तो हम उस दुश्‍चक्र के शिकार हो जाते हैं जिसमें एक दावा करता है कि समाज में जो है उसे हम दिखाते हैं, और अनगिनत अपराधी यह स्‍वीकार करते हैं कि अमुक अपराध की प्रेरणा उन्‍हें अमुक फिल्‍म से मिली थी।

इससे मिलती जुलती स्थिति दूसरे संस्‍थानों में भी है। जिन्‍हें हम ज्ञानी मान बैठे हैं, वे चालाक तो हैं परन्‍तु अपने विषय के अधिकारी नहीं। जो समय विषय पर अधिकार करने पर लगाया जाता है उसमें वे राजनीति करते हैं, क्‍योंकि यह पता है कि योग्‍यता के अभाव में भी राजनीति से बहुत अधिक लाभ पाया जा सकता है।

हाल के दिनों में संघ ने भी अपनी बौद्धिक उदासीनता को कम करने और कम से कम इतिहास में कुछ रुचि दिखाई है जिसका नमूना इतिहास संकलन से जुड़ा कारोबार है, परन्‍तु एक तो इसमें कुछ पूर्वाग्रहों के अनुरूप सामग्री जुटाने पर बल अधिक है और दूसरी ओर उन स्रोतो पर अधिकार करने की लालसा का अभाव है जिनसे इतिहास की पुरानी शरारतों और चूकों को सुधारा जा सकता है ।

एक तरह से कहें तो मेरी रुचि और दिशा को बदलने में मेरे मित्र एस पी गुप्‍त की भूमिका निर्णायक थी, वहीं मुझे यह जान कर निराशा होती थी कि वैदिक साहित्‍य्‍ा में उनकी रुचि केवल इस तथ्‍य तक सीमित थी कि वैदिक साहित्‍य के निर्माता भारत के मूल निवासी थे, वे कहीं बाहर से नहीं आए थे। हड़प्‍पा सभ्‍यता और वैदिक साहित्‍य में भारत पर कोई आक्रमण नहीं हुआ था, वह मात्र एक अध्‍याय है । उससे आगे उसकी समाजव्‍यवस्‍था, शिक्षा और साक्षरता, अर्थतन्‍त्र, विदेशव्‍यापार, कृषि के आरंभ और देवासुर संग्राम की महागाथा, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास और नगर सभ्‍यता का उदय तथा भाषा और संस्‍कृति के प्रसार के चरण और तन्‍त्र को ले कर बहुत कुछ है जो हमें अपनी सभ्‍यता के मूलाधार को समझने के लिए उपयोगी है, परन्‍तु इसमें न तो मेरे मित्र एस पी गुप्‍त की कोई रुचि थी, न ही किसी अन्‍य संघी की । आरंभ में दिल्‍ली, उज्‍जैन आदि अनेक स्‍थलों पर वैदिक सभ्‍यता पर संगा‍ेष्ठियां आयोजित हुईं, मैं उनमें भाग लेने के बाद यह भी पाता रहा कि इनके पीछे संघ का हाथ है। यह संकीर्णता मेेरे लिए दुखद थी। आर्यो के आक्रमण के निषेध में जो सेमिनार आयोजित हुए उनमें मैंने भाग लेना बन्‍द कर दिया, क्‍योंकि इनके पीछे इतिहास की समझ से अधिक राजनीतिक खेल था कि हम यहां के ही निवासी है इसलिए हमारा इस पर अधिकार है, दूसरे आक्रमणकारी के रूप में आए हैं उनका कोई अधिकार नहीं ।

हमारे पुराने विधानों में कहीं ऐसा होगा जिसका अध्‍ययन नहीं कर पाया कि कितनी अवधि के बाद कोई भी व्‍यक्ति किसी भूभाग का अधिकारी माना जा सकता है क्‍योंकि इसका उल्‍लेख पंचतन्‍त्र की एक कहानी में आया है । प्रश्न देशी विदेशी का भेद करके अपने ही घर में अशान्ति भड़काने का नहीं है अपितु उस तन्त्र के विकास का है जिसमें सभी को अनुशासित और अपनी सीमा में रखा जा सके । गुप्‍ता जी और सीताराम गोयल से यहीं पर मेरा बुनियादी अन्‍तर था जिसके कारण हमारे संबन्‍ध लगाव और टकराव के बने रहे ।

अब हम अपने ही माध्‍यम से देखना चाहें तो हमारे वामपंथी मित्रों ने मेरी खोज को पहले दबाने की कोशिश की, फिर लोगों को बरगलाने की कोशिश करते रहे और जब इसके पहले खंड का नये कलेवर में प्रकाशन ‘दि वेदिक हड़प्‍पन्‍स’ के नाम से 1995 में हुआ और इसे अन्‍तराष्‍ट्रीय मंच पर भी महत्‍व मिला तो पश्चिमी विद्वानों ने केवल उतने अंश को उभारना पसन्‍द किया जिसकी जरूरत संघ को थी, अर्थात् आर्य आक्रमण के सिद्धान्‍त का निषेध । इससे पहले से जैरिज, शैफर आदि सात हजार साल ईसा पूर्व से भारतीय परंपरा की प्रवहमान धारा की चर्चा करते रहे हैं जिनका उपयोग मैंने किया भी था।

इतिहास के पीछे राजनीति का हाथ और इस राजनीति के पीछे इतिहास की आड़ में वर्तमान समाज पर अपनी धौस जमाने की आकांक्षा बहुत प्रबल रही है जो देशी विदेशी सभी लेखकों में पाई जाती है । जो भी हो, इसके बाद ही हमारे मार्क्‍सवादी इतिहासकारों की समझ में आया कि अब आर्यों के आक्रमण की बात करना और उनके पशुचारी होने की बात करना अपनी साख गंवाने जैसा है । पर आज भी प्रो. इर्फान हबीब को वैदिक आर्यो को आज के आइ एस की छवि में देखने से कोई रोक नहीं सकता, अपितु इसके बावजूद उनको मूर्धन्‍य इतिहासकार मानने वाले मिल जाएंगे।

जहालत के इन दो रूपों के सर्वनाशी बहुज्ञता की तुलना में किं कर्मं किं अकर्मेति की दुविधा में पड़े अल्‍पज्ञों में चुनाव करना हो तो मैं दूसरे का चुनाव करूंगा। इसे समझाया और सही राह पर लाया जा सकता है, उनको अपराधियों की श्रेणी में रखने का अधिकार मुझे नहीं है, परन्‍तु संगठित हो कर, योजनाबद्ध अपराध उन्‍होंने किया है यह दावा करने में मुझे संकोच नहीं है ।

Post – 2016-12-03

मूर्खता के कीर्तिमान

”तुम्‍हारी कुछ बातें मुझे भी चिन्तित करती है, परन्‍तु यदि तुम आज के संघ को उस हिन्‍दू समाज का प्रतिनिधि मानते हो जिसमें बहुलता के प्रति सम्‍मान था, समावेशिता थी तो गलती करते हो । इसका गठन भले आत्‍मरक्षा के लिए हुआ हो, परन्‍तु इसकी आत्‍मा सामी है। उसी की नकल पर इसे गठित किया गया और समझदारी से काम नहींं लिया गया। यह जितना काम नहीं करता उससे अधिक दिखावा और शोर करता है और यदि यह डरावना न भी हो तो अपने इस दिखावे और शोर के कारण ही दूसरों को इतना खतरनाक लगता है कि लोग इससे किनारा कस लेते हैं। मैं अपनी और अपने जैसों की बात नहीं कर रहा, उनकी बात कर रहा हूं जो हिन्‍दू रीति-नीति और संस्‍कारों को अपने जीवन का अंग समझते हैं।”
”यह बात मैं बहुत पहले लिख चुका हूं । तुमने पढ़ा नहींं होगा। मैं जब भाजपा की बात करता हूंं, या संघ की बात करता हूं तो इन्‍हें अपनी पसन्‍द के रूप में नहीं, अपितु दो या अनेक संभव बुराइयों में सबसे कम बुरे के चुनाव के रूप में। तुमने मेरे मन की बात कह दी कि ये अपने को जिस रूप में दिखाते है, जैसा शोर मचाते हैं, उसके कारण, या कहाे अपनी नासमझी के कारण खतरनाक न होते हुए भी खतरनाक दीखते हैं । इनके आत्‍मरक्षात्‍मक उपाय भी अाक्रामक प्रतीत होते हैं या आक्रामक सिद्ध किए जा सकते हैं। शिक्षा, गहन अध्‍ययन और विचार-विमर्श के प्रति इनकी उदासीनता के कारण जब सत्‍ता इनके हाथ में होती है तब भी उसे संभालने के लिए ऐसे लोग नहीं मिलते जिनके ज्ञान और अनुभव के प्रति आश्‍वस्‍त हुआ जा सके, या मिलते हैं तो गिने चुने ही । कला, शिक्षा और अनुसंधान से जुड़ी संस्‍थाओं का भार वहन करने के लिए कामचलाऊपन का सहारा लिया जाता है । वे न तो अपने क्षेत्र में सार्थक बदलाव ला पाते हैं, न ही उनकी गंभीरता को समझ पाते हैं । अपनी अज्ञता को ढकने के लिए वे ऐसी ऐसी अजीब बातें करते हैं जिनसे अच्‍छा हास्‍य तक पैदा नहीं होता। हंसते हुए रोना पड़ता है । ये सभी बातें हैं। कम से कम साहित्‍य, इतिहास और संस्‍कृति के क्षेत्र में काम करने वाला कोई व्‍यक्ति ऐसी स्थिति में सुकून अनुभव नहीं कर सकता ।
इस उदासीनता के परिणाम स्‍वरूप, इन अवरोधों के बाद भी, इन्‍हीं के बीच जो प्रतिभाशाली लोग निकलते हैं, उनके प्रति सम्‍मानभाव भी गायब मिलता है । इन‍के राजनीतिज्ञ उनको किसी काम पर नियोजित करते हैं तो भी पूरी छूट नहीं देते, उन्‍हें अपनी हठधर्मिता के अनुरूप बना कर रखना चाहते हैं, जिससे वे कट कर अलग हो जाते हैं। इसका एक बहुत अच्‍छा उदाहरण सीताराम गोयल ने अपनी छोटी सी पुस्तिका ‘हाउ आइ बिकेम ए हिन्‍दू’ में दिया है । पहला बुद्धिजीवियों के प्रति उनकी अरुचि को प्रकट करता है:
I also felt annoyed when I heard speaker after speaker in RSS gatherings pouring contempt on “intellectuals” who had read books but who knew nothing of the “practical problems”. One of their pet stories was about a Pandit who frowned upon a boatman for not knowing Panini, but for whom the boatman pitied for not knowing swimming when the boat was in trouble. p. 80

ऐसे जड़ से जुड़े और जड़ बन कर प्रसन्‍न रहने वाले समूह में किसी बुद्धिजीवी की क्‍या दुर्गति हो सकती है, उसे कितना महत्व दिया जाता है, क्‍यों बुद्धिजीवी इस तरह के संगठनों से बिदकते रहे, यह समझना मुश्किल नहीं । इसमें बुद्धिहीनों द्वारा बुद्धिजीवियों का उस सीमा तक उपयोग तो किया जा सकता है जितना उनकी समझ में अपने काम का लगे, परन्‍तु सम्‍मान नहीं किया जा सकता । आज भी वह दिन नहीं आया है । हिन्‍दू या प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्‍कृति के विषय में इनकी नासमझी ऐसी है कि यह उससे लगाव की चाह रखता है, परन्‍तु उस‍की समझ नहीं। इ‍सलिए इसकी आस्‍था हिन्‍दुत्‍व की तुलना में अपने संगठन के प्रति रही है ।
What was most revealing to me about the RSS people was that, by and large, they did not react to expression of any opinion about any subject except that about their organization (RSS) or about their leaders (adhikaris). One could say anything one chose about Hinduism, or Hindu culture, or Hindu society or Hindu history, without drawing any reaction from an average RSS man…. I wondered what sort of Hindu organization it was….80

अपने बौद्धिक खोखलेपन के विषय में इनके मन में कोई भ्रम भी नहीं है, और इस बात की चिन्‍ता अधिक है कि विदेशों में इनके बारे में लोगों की समझ अच्‍छी बन सके । सीताराम जी उसी पन्‍ने पर लिखते हैं:
One day a BJS leader asked me to write a book presenting the BJS to the West. I said that I knew very little about the BJS, and that it would be better if the job was undertaken by one of their own scholars. He said that the problem was that they had no scholar in their organization.

वह पुस्‍तक लिखने को तो तैयार हो गए परन्‍तु जब कहा कि इस बात का ध्‍यान रखें कि उस पुस्‍तक में मैं आपकी नीतियों की आलोचना भी करूंगा तो वह नेता हैरान रह गया,
He showed surprise. He told me in a tone full of pity for me that I was a talented man, and could move up high in their organization provided I wrote the book and remove from his peoples mind the lingering suspicion about me. I asked him, “what suspicion?” He smiled and said, you ought to know that most of our people think that you are a… He did not complete the sentence. I complete it for him, “… am American agent.” I had to control myself…

अपनी घोषित अल्‍पज्ञता के बाद भी यह अपने से बुद्धिमान लोगों का उपयोग करने की कामना करता है और तब अधिक दयनीय और हास्‍यास्‍पद लगता है। मैं अपना अनुभव तुम्‍हें बाद में कभी बताऊंगा, परन्‍तु यह एक कारण है कि बुद्धिजीवियों को न तो यह समझ सकता है न बुद्धिजीवियों के लिए इसका कोई उपयोग है । जब मैं दो या अनेक बुराइयों में अल्‍पतम बुराई के चयन की बात करता हूं तो मेरा तात्‍पर्य यही है, इसके बाद भी मैं जानता हूं कि इनके द्वारा देश का उससे कम अनर्थ हुआ है जितना तुम लोगों के द्वारा और मूर्खता की प्रतिस्‍पर्धा में भी तुम उनसे कुछ आगे निकल जाते हो, क्‍योंकि उन्‍हें इतना तो दिखाई देता है कि उन्‍हें किसका लाभ मिल रहा है, तुम्‍हें उसका भी पता नहीं । तुमने जो कीर्तिमान बनाए हैं उसे ये छूने का सपना तक नहीं देख सकते ।

Post – 2016-12-02

”यार तुम तो कह रहे थे हिन्‍दुओं में मेरे जितने मित्र हैं उससे कम मुसलमानों में नहीं हैं । पर जब तुम ‘बच के रहना रे बाबा, बच के रहना रे’ पर उतर आए तब समझ में आया तुम कितने पाखंडी हो । तुम्‍हें अपना कहा याद है या नहीं ।”

”याद क्‍यों न रहेगा, मैं तो सहस्राब्दियों पीछे की काम की बातें तक याद रहता हूं।यह बताओ तुम मेरे मित्र हो या नहीं । और मैं तुम्‍हारे विचारों और मान्‍यताओं से बच कर अपने मत पर कायम रहता हूं या नहीं । सावधानी और जहां बराव जरूरी हो वहां बराव, बुनियादी ईमानदारी से जुड़े प्रश्‍न है। पाखंड से तुम अपने को धोखे में रख सकते हो, दूसरे का मनोरंजन कर सकते हो, परन्‍तु उसका विश्‍वास नहीं जीत सकते। जब तुम अपने कथन और व्‍यवहार से यह सिद्ध करते हो कि तुम ईमानदार हो तभी अगले का विश्‍वास तुम पर जम पाता है जो मित्रता की पहली शर्त है ।”

वह फंस गया था ।

”मैं तुमसे एक सीधा सवाल करता हूं । तुम सांप्रदायिकता को अच्‍छी चीज मानते हो या बुरी ?”

”सांप्रदायिकता को कौन अच्‍छी चीज मानेगा यार ?”

”मान लो मैं । संप्रदाय और सांप्रदायिकता तो हमारे देश में लंबे समय से रहे हैं । उनकाेे अनेकों रूपों में देखा जा सकता है। एक रूप तो किसी सरोकार से जुड़ी बन्‍धुता से है । नाथ संप्रदाय
, वैष्‍णव संप्रदाय। तुम अंग्रेजी शब्‍दों को हिन्‍दी में अनूदित करके थोपते समय भी इस बात का ध्‍यान नहीं रख पाते कि अंग्रेजी में भी कम्‍युनैलिटी बुरी चीज नहीं है, कम्‍युनलिज्‍म बुरा हो सकता है, यूं तो कम्‍युनिज्‍म में जो कम्‍यून है उसमें भी कम्‍यून कम्‍युनिटी का ही द्योतक है । फिर भी कम्‍युनलिज्‍म या संप्रदायवाद बनने के साथ इसका अर्थ उलट जाता है और यह अपने संमुदाय की बन्‍धुता से आगे बढ़ कर इतर समुदायों या संप्रदायों के प्रति द्वेष बन जाता है। तुम अालसी स्‍वभाव के कारण दोनों में फर्क करने की भी जरूरत नहीं समझते । कला और कलावाद में जो अन्‍तर है वही सांप्रदायिकता और संप्रदायवाद में है, परन्‍तु हमारे यहांं ब्रितानी कूटनीति के तहत संप्रदायवाद और सांप्रदायिकता को समानान्‍तर विषबेलि की तरह उगाया और फैलाया गया । पहले अभिज्ञान के नाम पर हिन्‍दुओं की प्रत्‍येक जाति को दूसरी जातियों से, फिर एक ही जाति के बीच कुल गोत्र के अनुसार अपनी पृथक पहचान और उसकी उपाधि या उपनाम को जोड़ने को अदालतों के माध्‍यम से बढ़ावा दिया गया जिससे उनकी दबी सामूहिकता को उभार कर दूसरों से पृथकता पैदा की जा सके और दूसरी ओर जो संप्रदाय शाखाओं तक सीमित था उसे धार्मिक सामूहिकता के रूप में पेश करते हुए उन्‍हें अलग किया जा सके । यहीं से हिन्‍दूू मुस्लिम भेद को हिन्‍दू मुस्लिम प्रतिस्‍पर्धा और फिर एक दूसरे के अहित से जोड़ने का प्रयत्‍न किया गया। कहें सांप्रदायिकता को संप्रदायवाद, जातिभेद को जातिवाद के रूप में उभारने की योजना काम में लाई गई ।

Post – 2016-12-01

अन्तकाल निज रूप देखावा

”एक लेखक के रूप में मेरा अस्तित्‍व, और कुछ दूर तक तक सम्‍मान भी, तुमसे दूसरे लेखकों और बुद्धिजीवियों से नाभिनाल की तरह जुड़ा है जिनकी मैं आलोचना करता हूं । यदि लेखकों और बुद्धिजीवियों पर से जनसाधारण का विश्‍वास उठ जाय, यदि पढ़ने में उनकी रुचि ही न रह जाय, यदि वे पढ़ने से पहले ही हमारे विचारों और निष्‍कर्षों का पूर्वानुमान करके सामने पड़ी सामग्री को पढ़ने की जरूरत ही न समझें तो इसके प्रभाव से वे लेखक भी नहीं बच सकते जो पूर्वानुमेय या प्रिडिक्‍टेबल नहीं हैं। मेरा विरोध उनके उनके विचारों से नहीं है, अपितु उस बदहवासी से है जिसमें वे नहीं जानते कि उनके विचार क्‍या हैं और उनको किस तरह व्‍यक्‍त किया जाय कि वह उस जत्‍थे से बाहर भी उत्‍सुकता पैदा कर सकें जिसके भीतर उनके अहो रूपं अहो ध्‍वनि: की गूंज उन्‍हें आत्‍ममुग्‍ध रखती है।”

”तुम आरोप लगाते हो कि हमने लीग की कार्ययोजना को अपनी कार्ययोजना बना रखा है परन्‍तु यह नहीं देख पाते कि तुम उतने ही गर्हित और संकीर्ण संघ और उसकी सन्‍तान भाजपा का समर्थन करते हो । क्‍या तुम्‍हें स्‍वयं पता है कि तुम क्‍या कर रहे हो?”

”मैं जानता था तुम यह प्रश्‍न उठाओगे । परन्‍तु तुमने इस बात पर ध्‍यान नहीं दिया कि मैं जानता हूं कि मैं किसकी हिमायत कर रहा हूं, इसे किसी से छिपाया भी नहीं और आज तक अपनी बात तर्क, औचित्‍य, प्रमाण और विश्‍लेषण के आधार पर रखता आया हूं। तुम मायाचारी हो, अपनी सचाई को स्‍वीकार नहीं कर पाते, जो कर चुके हो उसके परिणामों की जिम्‍मेदारी लेने को तैयार नहीं होते । तुम अपने को भी धोखा देते हो और दूसरों को भी धोखा देते हो और यह तुम्‍हारी आदत में शामिल हो गया है। तुम्‍हारे पास अपने कार्यों और विचारों का औचित्‍य नहीं इसलिए तुम्‍हें तर्क की जगह गालियों का प्रयोग करना होता है, फासिस्‍ट, भक्‍त, शाविनिस्‍ट । गालियां देने वाला, कोसने वाला स्‍वयं यह स्‍वीकार करता है कि उसके पास तर्क और औचित्‍य नहीं है। यदि मैं बताऊं कि तर्क का अभाव क्‍यों है और उसे कैसे दूर करके बुद्धिजीवी की भूमिका में आ सकते हो तो वह भी तुम्‍हारी समझ में नहीं आएगा।”

”हम क्‍या चाहते हैं यह तुम क्‍या समझोगे, पहले यह बताओ कि तुम क्‍या चाहते हो।”

”यह मैं कई बहानों से बताता आया हूं, तुम समझ नहीं पाए। अब भी समझोगे, यह विश्‍वास नहीं, फिर भी यह कह दूं कि मैं वही चाहता हूूं जिसकी अपने काे उदार दिखाने के लिए तुम दुहाई देते हो और फिर पलट कर उसी का सत्‍यानाश करने लगते हो । मैं उस बहुलता को बचाना चाहता हूं जिसे दूसरे मिटाना चाहते हैं । तुम बहुलता की, समावेशिता की बात भी करते हो और साथ उनका देते हो जिनको यह सहन नहीं, इसलिए दूसरी सांस में एकजुटता या इंटीग्रेशन की बात करने लगते हो, जो दूसरे सभी का मिट कर किसी एक आदर्श के अनुरूप बन जाने का, अपनी निजता को मिटा देने का पर्याय है और उन मजहबों का आदर्श है जो अपने मजहब से बाहर के लोगों को पूरा इंसान तक नहीं मानते और उनके साथ उनका समायोजन तब तक पूरा नहीं होता जब तक दूसरा धीरे-धीर उनके जैसा नहीं बन जाता। एकता नहीं अविरोध और सहयोग बहुलता का लक्ष्‍य हो सकता है, जिसे समझ न पाने के कारण दोनों जहां की नेमतें बटोरने के चक्‍कर में तुम दोनों की गलाजतें बटोरने लगते हो और जिसे मिटाना चाहते हो उस पर उन्‍हें आरोपित कर देते हो ।”

वह कुछ सोचता सा लगा, या संभव है मेरी बात अधूरे मन से सुनते हुए उसे यह समझ में ही न आया हो कि अभी अभी मैने क्‍या कहा है और उसे अपनी कल्‍पना में उन टुकड़ों के आधार पर गढ़ने में लगा हो। बोला तो उसके स्‍वर में आत्‍मविश्‍वास था, ”बात कहीं से शुरू हो, तुम घूम फिर कर मजहब पर क्‍यों आ जाते हो ?”

”यह याद दिलाने के लिए कि तुमने एक मजहब की सोच और कार्ययोजना को कम्‍युनिज्‍म और सेक्‍युलरिज्‍म नाम दे रखा है जिसके कारनामों का खुला समर्थन करने का साहस तुममें नहींं है। यहीं से वह ग्रन्थि पैदा होती है जिसमें तुम अपने ही कार्यो और विचारों के बीच अन्‍तर्विरोध को न समझ पाते हो न समझना चाहते होे, यही वह कारण है जिससे तुम अपना सामना स्‍वयं नहीं कर पाते। इस ग्रन्थि का विश्‍लेषण तुम्‍हारे भले के लिए मैं कर सकता हूं।”

वह हंसने लगा । यह झेंप और प्रतिवाद की मिलीजुली हंसी थी। मैंने हंसी पर ध्‍यान ही न दिया, ” तुम चाहो तो इसे समझ भी सकते हो, और इसकी दबोच को कम भी कर सकते हो, पर इससे मुक्‍त होना आसान नहीं है, यह तुम्‍हारे बजूद का हिस्‍सा बन गया है । जानना, चाहना सदिच्‍छा पर निर्भर करता है, परन्‍तु अपने को बदल पाना पूरी तरह हमारे वश में नहीं है ।”

अब उसके लिए अपने को संभाल पाना कठिन हो गया, ”क्‍या समझाना चाहते हो तुम, पहले अपने आप काे तो समझो ।”

”वह भी करूंगा। यदि तुम्‍हारी मदद की जरूरत हुई या तुम्‍हें लगा कि तुम मेरी मदद कर सकते हो तो मदद भी लूंगा, परन्‍तु अभी तो मैं तुम्‍हारी उस अन्‍तर्ग्रन्थि को खोलना चाहता हूं । तुम्‍हें केवल सीधे हां या ना में उत्‍तर देना होगा ।”
वह कुछ बोला नहीं, मुझे प्रश्‍नातुर दृष्टि से देखता रहा ।

वह कुछ बोला नहीं, मुझे प्रश्‍नातुर दृष्टि से देखता रहा ।

”आज की ही बात लो तो, तुम्‍हारी समस्‍या यह नहीं है कि आज के विमुद्रीकरण से लोगों को अहसनीय कष्‍ट हो रहा है और उन्‍हें इससे मुक्ति मिलनी चाहिए, बल्कि हर छोटी बड़ी परिघटना पर तुम्हारे मन में मोदी पर हमला करने, उसको सत्‍ता से हटाने की लालसा उग्र हो उठती है और आज यह उग्रतम हो गई है। सीधे जवाब देना, हां या नहीं ।”

”हां ।”

”मोदी में वह साहस और निर्णय क्षमता है जिसके कारण वह तुम्‍हें डरावना लगता है ?”

वह एक क्षण के लिए रुका और फिर कहा, ”हां।”

मोदी न भी होता, कोई तीसरा ही होता, फर्ज करो, आडवाणी तो भी तुम उसे सत्‍ता से हटाने के लिए कुछ बाकी नहीं रखते ।”

”इसमें पूछने की क्‍या बात है, तुम स्‍वयं लीगी शासन नहीं चाहोगे, मैं भी नहीं चाहूंगा, पर इसी तरह हम संघ का या किसी हिन्‍दू संगठन का शासन भी नहीं चाहेंगे ।”

”यह आदर्श स्थिति है, और यहां तक मैं भी तुम्‍हारे साथ हूं । समाज की खंडित दृष्टि रखने वाला पूरे समाज के साथ न्‍याय नहीं कर सकता । यदि केवल इसका निर्वाह करते तो तुमसे मुझे कोई शिकायत न होती। परन्‍तु इसमें हिन्‍दू मूल्‍यों, परंपराओं, महागाथाओं, ग्रंथों और इतिहास का उपहास और योजनाबद्ध ध्‍वंस भी शामिल हो जाय तब सोचना पड़ेगा कि इसका कर्ता कौन है? यह किसकी कामना रही है ? उसे पूरा करने वाला किसका कार्यभार संभाले हुए है ? यहीं आकर तुम अपने बचाव के लिए नाम भले लीग की संकीर्णता का लो, तुम उसके वारिस बन जाते हो और यह भूल जाते हो कि उसके द्वारा किए जाने वाले उपद्रवों से बचाव के लिए संघ की स्‍थापना और इसका अर्धसैन्‍य संगठन जरूरी हुआ था, न कि किसी पर आक्रमण करने या उपद्रव करने के लिए । दोनों में साम्‍य देखना गलत है ।

”तुमने लीग की विरासत संभाल रखी है, इससे अवगत भी नहीं हो, गो उस इतिहास से अनजान भी नहीं हो जिसमें यह विरासत अपनाई गई थी, इसलिए तुम्‍हारे विरोध में मुझको भाजपा का पक्षधर बन कर यह बताने की जरूरत पड़ी कि तुमने इस देश का उससे अधिक अहित किया है जितना भाजपा कर सकती थी।

”संघ को जिलाए रखने और ताकतवर बनाने के लिए भी तुम जिम्‍मेदार हो । तुम्‍हारे साथ जो लेखकों की पूरी अक्षौहिणी है उनमें से लगभग हर एक सुबह से शाम तक इस एक वाक्‍य को पचासों बार पचासों तरह से दुहराता है कि मोदी अब मरा कि तब और लगातार मरा मरा करते रहने के कारण वह तुम्‍हारेे ही राम राम सत्‍य है में बदलता चला जाता है । तुमने पूरे देश को एक व्‍यक्ति बना दिया है, मोदी के समर्थकों में भी कोई एक बार से अधिक उसके पक्ष में कुछ नहीं कहता और वह भी रोज ब रोज नहीं ।

”तुम जानते हो कि तुम जो चाहते हो वह होने वाला नहीं, इसलिए हताशा में गालियों पर उतर आते हो । मैंने इन गलियों में भटकते हुए प्रधानमंत्री के लिए भी गालियों का प्रयोग होते देखा है, यह वही प्रधानमंत्री है जिसकी तानाशाही प्रवृत्ति के कारण तुम्‍हें लगता है अभिव्‍यक्ति का संकट पैदा हो गया है ।

”भारत को हिन्‍दू राष्‍ट्र बनाते जाने के अपराधी तुम हो ।

“तुम्हे पता है इस देश का एक नाम हिन्दुस्तान हुआ करता था, और यह भी भूला न होगा कि इसे तीन टुकड़ों मे बांटने की योजना को संभव बनाने में तुम्हारी निर्णायक भूमिका थी । उन दो टुकड़ों में हिन्दू सम्मान और सुरक्षा के साथ नहीं रह सकता। वह इन दोनों में विलुप्तप्राय प्राणी के रूप मेंं अपने दिन गिन रहा है और इस बात को लेकर तुम्हारे मन में कभी पीड़ा नहीं हुई । अकेला टुकड़ा जो उसके हिस्से में आया था, जहां वह दूसरों के साथ निर्वैर भाव से सम्मान के साथ रह सकता था, वह उसके प्रति निष्‍ठा की बात करता है तो तुम्‍हें घबराहट होती है । जब इसके विषय में भी हिन्दूद्रोही योजनाएं अमल में आने लगीं और यह लगने लगा कि काग्रेस के क्रिस्तानी चोला धारण करने के बाद अपने देश के अपने हिस्‍से में आए टुकड़े में भी हिन्दू का सम्मान से रह पाना संभव नहीं है, तब तुम चुप रहे । जब दो टूक शब्दों में मनमोहन सिह ने कहा, इस देश के संसाधनों पर पहला हक माइनारिटीज का है, तब तुम तुम चुप रहे । अब तुम हिन्दू राष्ट्रवाद का हौवा दिखा कर जनता को बर्गलाना चाहते हो तो जनता चुप रहती है । जब तुम देशद्रोहियों के साथ खड़े हो जाते हो और इस बचे हुए टुकड़े को तोड़ने की बात करते हो तो उसका यह विश्वास दृढ़ होता है कि इस देश को बचाने की चिन्ता अकेले भाजपा को है । दूसरे सभी सत्ता के भूखे भेड़िए हैं और इनके हाथ में देश सुरक्षित नहीं । मौका मिले तो ये देश को ही खा जाएंगे । यह देश हिन्दुओं का है और हिन्दू ही इसे बचा सकता है । दूसरे केवल इसमें हिस्‍सा मांगेंगे और सकारात्‍मक योगदान की जगह नकारात्‍मक भूमिका पेश करेंगे।

मैं जानता हूं इससे तिलमिलाकर तुम अपने बचाव के लिए नई गालिया गढोगे । अब वही तुम्हारे पास बच रही हैं, पर समझोगे नहीं । पर अब वे गालियां भी बे असर हो रही हैं । तुम बौखला कर अधिक से अधिक गर्हित उपमाएं तलाशते हो, आपस में शेयर भी करते हो, पर उनकी पहुंंच तुम्‍हारे गिरोह से बाहर नहीं रह गई है । और एक बात बता दूं, मैंने उसी दिन यह निर्णय लिया था जिस दिन मनमोहन सिंह ने वह ऐतिहासिक फेसला किया था कि इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार माइनारिटीज का है, और फिर जब उस बिल की रूपरेखा सामने आई थी जिसके अनुसार किसी सांप्रदायिक फसाद में यदि कोई हिन्‍दू भी शामिल पाया जाता है तो हिन्‍दू को ही अभियुक्‍त मान कर जांच की जाएगी, मैंने अपना स्थिर मत बना लिया था कि पूरे देश को सम्‍मान से जीने का अवसर केवल हिन्‍दू संगठन ही दे सकता है। चुनाव की घोषणा बाद में हुई। मोदी बाद में मंच पर आए । मैं मोदी के साथ नहीं अपने साथ था और आज भी हूं । मध्‍यकाल में भी केवल हिन्‍दू शासकों ने दूसरे समुदायों को सम्‍मान से जीने का अधिकार दिया था और भाजपा के शासन ने उसे झुठलाया नहीं, यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है ।”

Post – 2016-12-01

है दिल अपना, दिमाग अपना नहीं है ।
पता मैंने किया, पाया सही है ।

बहुत प्‍यारा, सलोना था यह कोना
जब अपनी आंख थी अपनी नजर थी
मगर चश्‍मा चढ़ा ब्लिंकर सजा तब
यह कहता, देखता उनकी कही है ।

गया था मीर बनने मुफलिसी में
जुटाया और भरा जो हाथ आया
है यह रंगीन भूसों का भुसौला
हमारे काम का कुछ भी नहीं है ।

चलो फिर से पढ़ें अपना ककहरा
बनायें खुद ही अपने ईंट गारे
सजोयें अपने बिखरे सोच सपने
सिवा इसके कोई चारा नहीं है ।।

Post – 2016-11-30

नजर अपनी अपनी

”तुम्‍हें वे बातें क्‍यों नहींं दिखाई देतीं जो हम सब को दिखाई देती हैं ।”

”यही सवाल मैं तुमसे करना चाहता हूं, तुम्‍हें वे बातें क्‍यों नहीं दिखाई देती हैं जो पूरे देश की जनता को दिखाई देती हैं, देश देशान्‍तर में दिखाई देती है, यहां तक दुश्‍मनों तक को दिखाई देती हैं।

“पहली बात यह कि जनता अज्ञानी और भावुक होती है । अज्ञान के कारण उसे किसी परिघटना के दूरगामी परिणामों का आभास नहीं होता। भावुक होने के कारण उसे सब्ज बाग दिखाकर बेवकूफ बनाया जा सकता है और हिटलर ने तो बनाया ही था ।”

“तुम्हें जर्मनी का इतिहास तो पता है, पर क्या उस देश का इतिहास भी मालूम है जिस देश की यह जनता है ?”

वह कुुछ सोच में पड़ गया, फिर संभला तो बोला, ”इसमें इतिहास जानने की क्‍या बात है। जनता को तो देख ही रहे है, वह शराब की एक थैली पर बिक जाती है।”

”इतिहास में जाने पर ही यह भी समझ पाओगे कि उसने एक थैली शराब पर बिकना कैसे और किससे सीखा। उसी से समझ पाओगे कि उसकी एक सोच थी जो युगों के ज्ञान और अनुभव से अर्जित थी। उसका जलप्रबन्‍धन तुम्‍हारे जलप्रबन्‍धन से अधिक अच्‍छा था। तुम्‍हारे विशेषज्ञों ने हड़बड़ी में पहले नलकूपों और फिर बोरवेलों से उसके उपस्‍तर का दोहन करके सुखा दिया और और फिर आपाधापी में बनाए गए तुम्‍हारे शौचालयों का गन्‍दा पानी उस सूखे को भरने के लिए नीचे उतरा ताे उपतल का जल ही विषाक्‍त हो गया। उसे विशेषज्ञाें की मदद की जरूरत थी पर ऐसे विशेषज्ञों की नहीं जो किताब से निकले और उन्‍हें गंवार समझ कर उनकी पुरानी तकनीकों में सुधार करने की जगह उन्‍हें विस्‍थापित करके घर बैठे उजाड़ कर रख दें । और राजनीति करने वाले विशेषज्ञों की तो उन्‍हें जरूरत हो ही नहीं सकती। राजनीति करने वाला विशेषज्ञ नोबेल लारिएट हो तो भी अपनी विशेषज्ञता को अपनी राजनीति को सही ठहराने के काम ही लाएगा। उसका मोटा ज्ञान कुछ मानी में तुम्‍हारे विशेषज्ञों से अधिक उपादेय है। उसने आपस में मिल जुल कर रहने का एक सलीका विकसित किया था, जिसे तुम्‍हारे अलीगढ़ के विद्वानों ने उसके ही सपूतों का मन फेर कर अपने घर से उजाड़ दिया। तुम्‍हारे राजनीति करने वालों ने सीधी कार्रवाई के प्रयोगों से उसमें नफरत भरी और उन्‍होंंने ही इस देश को तोड़ा जब कि उसे पता था कि देश बट भी गया तो भी हमें तो यहीं रहना है। सही कौन था ? वह या तुम ? उन्‍हीं विशेषज्ञों से घृणा की लीगी विरोसत को अपनी विरासत बना कर पूरे हिन्‍दू समाज, संस्‍कृति इतिहास से घृणा करने की ऐसी मानसिकता पैदा की कि तुम नफरत फैला कर समाज को बांटते हो और उस आदमी से डरते हो जो कहता है, हम लड़ते रहेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे। तुम्‍हारे विशेषज्ञ इसे धोखाधड़ी बता कर उस सामुदायिक नफरत को अधिक तीखा बनाने की चिन्‍ता में रहते हैं, क्‍योंकि जैसा मैंं पहले भी कह आया हूं, तुम्‍हारे पास कभी कोई ठोस, सकारात्‍मक योजना रही ही नहीं, आज तो नया इंसान बनाएंगे के नाम पर नई नफरत फैलाएंगे ही बच रहा है।”

वह बहादुरी से सुनता रहा, और अकड़ा बैठा रहा, फिर कड़कते स्‍वर में बोला, ”तूम्‍हें पता है कितनी नफरत भरी है उन लोगों में जिनका तुम पक्ष ले रहे हो। नफरत से नफरत पैदा होती है । हम उसी नफरत से नफरत करते हैं ।”

”और उसे किसी भी कीमत पर जिन्‍दा रखना चाहते हो। जिनसे तुम्‍हें शिकायत है उनकी शिक्षा और समझ पर मुझे कभी भरोसा नहीं रहा । परन्‍तु उनकी एक पीड़ा भी रही है, वे यदि अपना दुख नहीं कह पाते तो वे जो सारे जमाने के दुख दर्द को बयान करने के लिए दुख का आविष्‍कार कर सकते हैं, उन्‍हें तो कभी उसके दुख को समझने और बयान करने का सोचना चाहिए था । उन्‍हें लगातार आहत किया गया है, वे अपनी प्रतिक्रिया विचार और विश्‍लेषण के माध्‍यम से नहींं प्रकट कर सकते, करें भी तो अभिव्‍यक्ति और संचार के सभी माध्‍यमों पर तुम्‍हारा अधिकार रहा है जिसमें तुमसे मेल खाने वाले विचाराें को छोड़ कर किसी अन्‍य विचार के लिए जगह ही न थी। जिसे अपनी शिकायत करने का भी अवसर न मिले उसकी प्रतिक्रिया तो घृणा और उद्वेग का रूप ले सकती है, परन्‍तु यही बात तुम पर तो लागू नहीं होती । क्‍या तुमने इस समस्‍या की जड़ों को समझने का कोई प्रयत्‍न आज तक किया है? नहीं । तुम इसकी राजनीति करते रहे हो, इसकी खेती करते रहे हो और आज भी वही कर रहे हो। जनता तुम्‍हारे ही लेखों और बयानों को सुन कर तुमसे उचाट खाती जा रही है और तुम जो कहते हो ठीक उसका उल्‍टा अर्थ लगाने की आदत डालने लगी है।”

”हवा में बात मत करो । उदाहरण या प्रमाण देते हुए बात करो।”

”उदाहरण एक हो तब तो गिनाऊं । उनकी तो एक शृंखला है और उनके अलावा तुम्‍हारे पास कुछ है ही नहीं । पर अभी एक ताजा उदाहरण दूं। एक चैनल है जो तुम्‍हारे प्रिय और तुम्‍हारी नजर में बहुत साहसिक और सत्‍यव्रत है। कल संयाेग वश उसे खोला तो वह एक विशेषज्ञ के माध्‍यम से यह समझाने की कोशिश कर रहा था कि यह जो बढ़े कर भार पर काला धन बैंक में जमा करके उसे सफेद करने का मौका दिया गया है वह तो कानूनी तौर पर ही गलत है। यदि अमुक तिथि से उसके लेन-देन काे बन्‍द को बन्‍द कर दिया गया तो फिर वह बैंक में जमा कैसे हो सकता है। उस पर ऐसे ही विशेषज्ञ बुलाए जाते हैं और उसी मक्‍कारी और भोलेपन से झूठ को सच बना कर पेश किया जाता है।”

”इसमें मुझे तो गलत कुछ नहीं लगता । तुम क्‍यों उद्विग्‍न हो गए ?”

”इसलिए कि वह झूठ बोल रहा था। यह बार बार दुहराया जाता रहा कि इसके बाद केवल बैंक में ही उन्‍हें जमा किया जा सकता है। इसकी मियाद 31 दिसंबर रखी गई थी। हमें यह एसएमएस भेजा गया था कि जल्‍दबाजी की कोई बात नहीं, आप अपना पैसा 31 दिसंबर तक जमा करा सकते हैं। जो इसका लाभ नहीं उठाते या जिनके पास भारी मात्रा में कालाधन है उन पर छापे आदि पड़ेंगे। जेटली ने नोट जलाने की घटनाओं पर टिप्‍पणी की थी कि उन्‍हेंं जलाने की जगह अतिरिक्‍त कर भार झेल कर बैंक में जमा करना चाहिए । इसलिए जहां सार्वजनिक लेन-देन में यह मात्र कागज का टुकड़ा रह गया था, वहीं बैंक के दरवाजे बन्‍द न थे। वह विशेषज्ञ इस तथ्‍य पर परदा डाल रहा था और अपने चैनल के श्रोताओं को समझाने की जगह उनके कान भर रहा था।

”एक दूसरी चीज थी, काले धन वालों के सामने सरकार के झुकने और काले को सफेद करने में उनकी मदद करना। सरकार का लक्ष्‍य क्‍या था, क्‍यों था, और ये कदम क्‍यों उठाए गए इसकी एक भी तटस्‍थ व्‍याख्‍या तुम्‍हारे विशेषज्ञों ने नहीं की।”

”उन्‍होंने नहीं की तो तुम्‍हीं कर के दिखा देा ।”

”दिखाने का प्रयास तो कर सकता हूं पर यह विश्‍वास नहीं कि तुम देख कर भी उसे स्‍वीकार कर पाओगे। सरकार का सपना था देश का आर्थिक रूपान्‍तरण। भूमि सीमित है, उसे बढ़ाया नहीं जा सकता। उल्‍टे विविध कारणों से कृषिभूमि पहले से घटनी है और अब तक अपनाए गए तरीकों से किसानों की दशा और बुरी होती जानी है। आज तो विमुद्रीकरण के प्रयोग में पचास साठ दुखद मौतों को तुम दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी मान रहे हो पर तब किसान गलत नीतियों के कारण हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍या कर रहे थे। वे आत्‍महत्‍यायें रुकी हैं तो उसके पीछे कोई कारण भी होगा। खैर, उनको उबारने और देश को खाद्य आपूर्ति के मामले में आत्‍मनिर्भर बनाए रखने के लिए एक आवश्‍यकता थी, खेती को अधिक वैज्ञानिक बना कर प्रति एकड़ उपज को बढ़ाना, दूसरा था अनुपूरक आय से जो कौशल और औजारों के विकास और परिष्‍कार से उत्‍पादक श्रम और स्‍वामित्‍व को प्रोत्‍साहन दे कर ही संभव है । ये सपने जब तक सत्‍ता हासिल नहीं हुई थी तब तब उस विपुल संपत्ति की वापसी से पूरे होते दिखाई दे रहे थे, जो भ्रष्‍ट और लूटपाट में जुटी हुई सरकार की अनिच्‍छा के कारण वापस नहीं आ रहा था।”

”तो इन्‍होंने वादा करने के बाद भी उसकी वापसी क्‍यों नहीं की ?”

”सत्‍ता में आने के बाद पता चला कि इसके कुछ अवसर गंवाए जा चुके हैं और आज यह काम आनन फानन में नहीं हो सकता क्‍योंकि उसमें कानूनी और कूटनीतिक पहलू जुड़े हैं, जिस दिशा में सरकार संभवत: काम कर रही होगी।
विकास के वे सपने कैसे पूरे हों अब चिन्‍ता के केन्‍द्र में यह प्रश्‍न था। एक था मानीटरी फंड का ऋण, वह सरकार को स्‍वीकार न था। दूसरा था, उन देशों काे जिनसे हम आयात करते हैं भारत में ही अपना कारोबार खड़ा करके उत्‍पादन करने का निमंत्रण और इस तरह रोजगार और कौशल का विस्‍तार । भारतीय प्रशासनिक पर्यावरण आज भी न स्‍वच्‍छ हो पाया है, न आकर्षक । एक अन्तिम विकल्‍प जो विदेशों में पड़े काले धन की वापसी से जुड़ा हुआ था, वह था अपने ही देश में पड़े काले धन काे चलन में लाने की बाध्‍यता उत्‍पन्‍न करना और इस दिशा में सरकार पिछले साल से लगातार प्रोत्‍साहन देती रही । यह इतनी बड़ी राशि है कि विकास के लिए आर्थिक संसाधन इसके चलन में आने से ही पूरे हो जाते हैं। वित्‍तविभाग का काम आय पर कर वसूलना है, छिपे आय पर अधिक कर वसूलना है, इसके बाद उसने किस साधन से वह धन कमाया है, नैतिक है या अनैतिक इसकी खोज खबर विधि और व्‍यवस्‍था का है । यह समझाने की जगह तुम लोग जनता की तकलीफ को चुन चुन कर दिखाते और अपने माध्‍यमों का प्रयोग उसे भड़काने के लिए करते रहे । किसी भी तरह यह प्रयास विफल हाे जाय यह तुम्‍हारी योजना है क्‍योंकि इसकी सफलता के बाद तुम्‍हारा सफाया निश्चित है, यह तो अपने दुख और असुविधा के बीच जनता ने बता ही दिया है और इससे तुम्‍हें घबराहट होने लगी है। उस घबराहट में हिन्‍दुस्‍तान तो दिखाई नहीं देता, जर्मनी और हिटलर दिखाई देने लगते हैं।”

”भाषण पूरा हो गया ?”

”मैं भाषण नहीं दे रहा था, तुमको समझा रहा था कि तुम्‍हारा बचा रहना देश के हित में है, परन्‍तु तुम्‍हें बचाने का काम भी तुम्‍हारा है । पहले अपने प्रति ईमानदार बनो, फिर समाज और देश के प्रति ईमानदार और निष्‍ठावान । यह साख तुमने गंवा दी है । विकल्‍पहीनता की स्थिति तुम तैयार करते रहे हो । लाचारी में आत्‍महत्‍या करने वाले किसानों को तो नयी आश्‍वस्ति और उपचारों से मोदी ने बचा लिया, पर तुम्‍हें आत्‍महत्‍या से बचाने की वह कोशिश भी करे तो ऐसी नौबत न आने पाए इसलिए तुम उससे भी पहले आत्‍म‍हत्‍या कर लोगे।”

वह हंसने लगा, ”तुम्‍हें कहीं कुछ गलत नहीं दिखाई देता है ?”

”‍दिखाई देता है । उसकी मैं तालिका बना सकता हूं, इतनी गलतियां । मैं तो स्‍वयं अपने वाक्‍य तक में गलतियां कर बैठता हूं, दिन में इतनी गलतियां करता हूं कि गिनाऊं तो दो चार मिनट लग जाय । पर मैं गलतियां करने के बाद उनकी ओर ध्‍यान जाने पर उन्‍हें सुधारने का प्रयत्‍न करता हूं । तुमसे पूछा जाय तुमने सही क्‍या किया है तो घबरा जाओगे, गलतियों का इतिहास ऐसा कि सुधारने चलो तो मिट जाओगे, इसलिए तुम अपनी गलतियों को समझ नहीं पाते, दूसरों की गलतियों को भुनाने का प्रयास करते हो, सुधारने की फिक्र नहीं ।

Post – 2016-11-28

”यार तुम तो कह रहे थे हिन्‍दुओं में मेरे जितने मित्र हैं उससे कम मुसलमानों में नहीं हैं । पर जब तुम ‘बच के रहना रे बाबा, बच के रहना रे’ पर उतर आए तब समझ में आया तुम कितने पाखंडी हो । तुम्‍हें अपना कहा याद है या नहीं ।”

”याद क्‍यों न रहेगा, मैं तो सहस्राब्दियों पीछे की काम की बातें तक याद रहता हूं।यह बताओ तुम मेरे मित्र हो या नहीं । और मैं तुम्‍हारे विचारों और मान्‍यताओं से बच कर अपने मत पर कायम रहता हूं या नहीं । सावधानी और जहां बराव जरूरी हो वहां बराव, बुनियादी ईमानदारी से जुड़े प्रश्‍न है। पाखंड से तुम अपने को धोखे में रख सकते हो, दूसरे का मनोरंजन कर सकते हो, परन्‍तु उसका विश्‍वास नहीं जीत सकते। जब तुम अपने कथन और व्‍यवहार से यह सिद्ध करते हो कि तुम ईमानदार हो तभी अगले का विश्‍वास तुम पर जम पाता है जो मित्रता की पहली शर्त है ।”

वह फंस गया था ।

Post – 2016-11-28

मनुष्‍य के पास कितना दिमाग होता है । यह बात मैं शिक्षा और ज्ञान में अग्रणी लोगों को ध्‍यान में रख कर कह रहा हूं कि निन्‍यानबे प्रतिशत लोग बौद्धिक आलस्‍य के कारण या साहस के अभाव के कारण या मन में घर कर गए राग या उचाट के कारण अपने दिमाग का इस्‍तेमाल नहीं कर पाते। वे केवल अपने खेमे के साथ होते हैं। ऐसा न होता तो बुद्धिजीवियों की सोच और भाषा राजनीति की भाषा के इतने करीब न पहुंच जाती जिसमें भाषा और विचार की शुचिता नष्‍ट हो जाती है। वे यह भी समझने का प्रयत्‍न करते कि वे जो कुछ कर या कह रहे हैं उसका लाभ किसे मिल रहा है। इसके लिए अपनी जमात से बाहर निकल कर देखने और समझने का प्रयत्‍न करते और तार्किक विश्‍लषण करते हुए किसी परिघटना के चरित्र को समझने में मदद करते ।
वर्तमान की सबसे ज्‍वलंत घटना को लें जिसके कुछ खेदजनक अनुभव लगभग सभी को हुए हैं। मैं स्‍वयं अस्‍पताल में भरती हुआ, अग्रिम राशि दस हजार की एटीएम से जमा हुआ। गनीमत रही कि दवा के काउंटर पर पुराने नोट लिये जाते रहे इसलिए उस पर असुविधा न हुई । चार पांच हजार का खर्च पुराने नोटों से चल गया। छुट्टी के समय अस्‍पताल पुराने नोट लेने को तैयार नहीं। बैंक मे चेक भेजा, जिस भी मुश्किल से वह व्‍यक्ति पहुंचा, बैंक को हस्‍ताक्षर में फर्क दिखा, वह वापस लौट आया। तेईस चौबीस हजार का भुगतान किसी के पेटीएम से किया तो बाहर निकले। जिस दिन केवल वरिष्‍ठ नागरिकों के लिए बैंक खुला तो बीमारी में ही किसी तरह पहुंचा पर लंबी लाइन जिसमें एक दो बूढ़ों को छोड़ कर सभी नौजवान अपने घर के वरिष्‍ठ नागरिकों के आधारकार्ड आदि के साथ लाइन में। मैंने लाख समझाने की कोशिश की कि मुझे जाने दो, ये वरिष्‍ठ नहीं हैं, यह व्‍यवस्‍था अशक्‍तता को ध्‍यान में रख कर की गई है, मैं बीमार भी हूं। दो तीन बार के प्रयास के बाद उसने मुझे घुसने दिया। सीधे बैंक मैनेजर के पास पहुंचा और कुछ पैसा निकालने का प्रस्‍ताव रखा तो उसने मेरे खाते में चार लाख जमा देख कर कहा, आप चौबीस हजार से अधिक नहीं निकाल सकते। मैं तो दस पन्‍द्रह की उम्‍मीद में गया था। लाटरी खुल गई। दस हजार के सौ के नोट और चौदह हजार के लिए सात नोट । मैं आदतन जेब में रखने लगा तो उसने जोर दिया, इन्‍हें गिन लीजिए। मैंने कहा आपने गिन लिए ठीक ही होगा। उसने फिर जोर दिया, नहीं गिनिए तब जाइये। गिना और बाहर निकल आया।
लाइन आज भी लग रही है। मैं चार लाख की सेविंग में पड़ी रकम की एफडी कराने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया। इससे पहले चार लाख्‍ा एफडी में डाला था, उसका सर्टिफिकेट लाने का साहस नहीं। यह दूसरे बैंक में मैच्‍योर एफडी का पैसा है जिस पर एक महीने का व्‍याज नहीं मिलेगा। असुविधा के अनेक रूप हैं। परन्‍तु इसकी जानकारी होते हुए भी मैं इसका समर्थक हूं और समर्थक है वह भुक्‍तभोगी समाज जो गांवों तक कई तरह के कष्‍ट भोग रहा है। पहली बात यह कि एक बार यह फैसला हो गया तो इसे अब वापस नहीं लिया जा सकता। परिणाम जो भी हो। जनता के मन में इतना ही आक्रोश काले धन के विरुद्ध था इसलिए उसका भी संकल्‍प है कि कष्‍ट जितना भी झेलना पड़े, इसके बिना देश को बचाया नहीं जा सकता था। इतने बड़े पैमाने पर लिया गया कोई कदम दोषों से पूर्णत: मुक्‍त नहीं हो सकता परन्‍तु यह जल्‍दबाजी में उठाया गया कदम नहीं है । इससे पहले कालाबाजारियों को खुला अवसर दिया गया था कि वे इतना अतिरिक्‍त कर देकर अपना काला धन सफेद कर सकते हैं। जो छोटी औकात के पर अधिक समझदार थे, उन्‍होंने उसका लाभ उठाया। यह चेतावनी दी गई कि समय इतना और बढ़ाया जा रहा है इसका लाभ उठाएं, अन्‍यथा हम अधिक कठोर कदम उठाएंगे। घाघ लोगों को इस बात का अनुमान तक न हुआ कि वह कठोर कदम हो क्‍या सकता है । और अन्‍त में यह कदम जिसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी, घोषित हो गया।

इसे जल्‍दबाजी में उठाया गया कदम नहीं कहा जा सकता। फिर भी अति उत्साह में उठाया गया बहुत बड़ा कदम तो माना ही जा सकता है जिसकी विराटता का पूर्वानुमान न हो सका और इसकी चिन्ता मोदी को भी अनुभव हो रही है । यह अभियान घर के भीतर छिपे हुए गद्दारों और जमाखोरेो और उनकी कृपापर पलने वालेबुद्धिजीवियों और समाचार चैनलों के विरुद्धहै इसलिए इसे समग्र राष्ट्र का सहयोग नहीं मिल सकता । जनता कष्ट झेल रही है, इसे झेलने की एक सीमा है । उपचार उस सीमा के भीतर हो जाए यह शुभ होगा। इसकी चिन्‍ता मोदी के कुशीनगर के मंच से उनकी बाडी लैंग्‍ेवज में भी दिखी और उस सुझाव में भी कि सभी लोग अपने मोबाइल से नेटबैंकिंग करने लगें ।

इसने सबसे बड़ा काम यह किया कि देख को दोफाड़ कर दिया। हैव्स और हैवनाट्स की इस लड़ाई में अपने क्रान्तिकारी तेवर दिखाने वालों के भी चेहरों की रंगत बदल गई और वे जमाखोरों, और कालाबाजारियों के साथ खड़े हो गए अौर उस जनता की असुविधाओं का बहाना लेकर आर्तनाद करने लगे जो कहती है हम पर जो भी बीते झेलेंगे पर यह रोग खत्‍म होना ही चाहिए। इसमें जनता की विजय हो यह हमारी आकांक्षा ही हो सकती है । काले धन की समाप्ति असंख्‍य व्‍याधियों की समाप्ति है है। एक नये भारत का जन्‍म जो अपने जन्‍म के सा‍थ ही कालाधन और कालाबाजारी के साथ आरंभ हुआ था। उसे मैंने देखा था इसे देखने की आकांक्षा है।

Post – 2016-11-28

मनुष्‍य के पास कितना दिमाग होता है । यह बात मैं शिक्षा और ज्ञान में अग्रणी लोगों को ध्‍यान में रख कर कह रहा हूं कि निन्‍यानबे प्रतिशत लोग बौद्धिक आलस्‍य के कारण या साहस के अभाव के कारण या मन में घर कर गए राग या उचाट के कारण अपने दिमाग का इस्‍तेमाल नहीं कर पाते। वे केवल अपने खेमे के साथ होते हैं। ऐसा न होता तो बुद्धिजीवियों की सोच और भाषा राजनीति की भाषा के इतने करीब न पहुंच जाती जिसमें भाषा और विचार की शुचिता नष्‍ट हो जाती है। वे यह भी समझने का प्रयत्‍न करते कि वे जो कुछ कर या कह रहे हैं उसका लाभ किसे मिल रहा है। इसके लिए अपनी जमात से बाहर निकल कर देखने और समझने का प्रयत्‍न करते और तार्किक विश्‍लषण करते हुए किसी परिघटना के चरित्र को समझने में मदद करते ।

वर्तमान की सबसे ज्‍वलंत घटना को लें जिसके कुछ खेदजनक अनुभव लगभग सभी को हुए हैं। मैं स्‍वयं अस्‍पताल में भरती हुआ, अग्रिम राशि दस हजार की एटीएम से जमा हुआ। गनीमत रही कि दवा के काउंटर पर पुराने नोट लिये जाते रहे इसलिए उस पर असुविधा न हुई । चार पांच हजार का खर्च पुराने नोटों से चल गया। छुट्टी के समय अस्‍पताल पुराने नोट लेने को तैयार नहीं। बैंक मे चेक भेजा, जिस भी मुश्किल से वह व्‍यक्ति पहुंचा, बैंक को हस्‍ताक्षर में फर्क दिखा, वह वापस लौट आया। तेईस चौबीस हजार का भुगतान किसी के पेटीएम से किया तो बाहर निकले। जिस दिन केवल वरिष्‍ठ नागरिकों के लिए बैंक खुला तो बीमारी में ही किसी तरह पहुंचा पर लंबी लाइन जिसमें एक दो बूढ़ों को छोड़ कर सभी नौजवान अपने घर के वरिष्‍ठ नागरिकों के आधारकार्ड आदि के साथ लाइन में। मैंने लाख समझाने की कोशिश की कि मुझे जाने दो, ये वरिष्‍ठ नहीं हैं, यह व्‍यवस्‍था अशक्‍तता को ध्‍यान में रख कर की गई है, मैं बीमार भी हूं। दो तीन बार के प्रयास के बाद उसने मुझे घुसने दिया। सीधे बैंक मैनेजर के पास पहुंचा और कुछ पैसा निकालने का प्रस्‍ताव रखा तो उसने मेरे खाते में चार लाख जमा देख कर कहा, आप चौबीस हजार से अधिक नहीं निकाल सकते। मैं तो दस पन्‍द्रह की उम्‍मीद में गया था। लाटरी खुल गई। दस हजार के सौ के नोट और चौदह हजार के लिए सात नोट । मैं आदतन जेब में रखने लगा तो उसने जोर दिया, इन्‍हें गिन लीजिए। मैंने कहा आपने गिन लिए ठीक ही होगा। उसने फिर जोर दिया, नहीं गिनिए तब जाइये। गिना और बाहर निकल आया।

लाइन आज भी लग रही है। मैं चार लाख की सेविंग में पड़ी रकम की एफडी कराने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया। इससे पहले चार लाख्‍ा एफडी में डाला था, उसका सर्टिफिकेट लाने का साहस नहीं। असुविधा के अनेक रूप हैं। परन्‍तु इसकी जानकारी होते हुए भी मैं इसका समर्थक हूं और समर्थक है वह भुक्‍तभोगी समाज जो गांवों तक कई तरह के कष्‍ट भोग रहा है। पहली बात यह कि एक बार यह फैसला हो गया तो इसे अब वापस नहीं लिया जा सकता। परिणाम जो भी हो। जनता के मन में इतना ही आक्रोश काले धन के विरुद्ध था इसलिए उसका भी संकल्‍प है कि कष्‍ट जितना भी झेलना पड़े, इसके बिना देश को बचाया नहीं जा सकता था। इतने बड़े पैमाने पर लिया गया कोई कदम दोषों से पूर्णत: मुक्‍त नहीं हो सकता परन्‍तु यह जल्‍दबाजी में उठाया गया कदम नहीं है । इससे पहले कालाबाजारियों को खुला अवसर दिया गया था कि वे इतना अतिरिक्‍त कर देकर अपना काला धन सफेद कर सकते हैं। जो छोटी औकात के पर अधिक समझदार थे, उन्‍होंने उसका लाभ उठाया। यह चेतावनी दी गई कि समय इतना और बढ़ाया जा रहा है इसका लाभ उठाएं, अन्‍यथा हम अधिक कठोर कदम उठाएंगे। घाघ लोगों को इस बात का अनुमान तक न हुआ कि वह कठोर कदम हो क्‍या सकता है । और अन्‍त में यह कदम जिसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी घोषित हो गया। इसे जल्‍दबाजी में उठाया गया कदम नहीं कहा जा सकता। फिर भी अति उत्साह में उठाया गया बहुत बड़ा कदम तो माना ही जा सकता है िजसकी िवराटता पूर्वानुमान न हो सका और इसकी चिन्ता मोदी को भी अनुभव हो रही है । यह अभियान घर के भीतर छिपे हुए गद्दारों और जमाखोरेो और उनकी कृपापर पलने वालेबुद्धिजीवियों और समाचार चैनलों के िवरुद्धहै इसलिए इसे समग्र राष्ट्र का सहयोग नहीं मिल सकता । जनता कष्ट झेल रही है और इसका उपचार जल्द होना चाहिए ।

इसने सबसे बड़ा काम यह किया कि देख को दोफाड़ कर दिया। हैव्स और हैवनाट्स की इस लड़ाई में अपने को उज्‍जवल चरित्र का दिखाने वालों के भी चेहरों की रंगत बदल गई और वे जमाखोरों, और कालाबाजारियों के साथ खड़े हो गए अौर उस जनता की असुविधाओं का बहाना लेकर आर्तनाद करने लगे जो कहती है हम पर जो भी बीते झेलेंगे पर यह रोग खत्‍म होना ही चाहिए।ह