Post – 2016-11-04

जो आसमान में है हमारी जहन में है।
जो जान सका हूं वही मेरे कथन मे है।
तुझको न समझ पाया मेरे पास है फिर भी
तेरे दुराव में भी है, मेरे वहम में है ।
क्‍यों ढूंढ़ते हो उसकाे मिला जो न किसी को
स‍बमें है सभी का है न आया जहन में है।
भगवान को चस्‍का लगा तुकबन्दियों का है
सोचो है वह बाहर या वह अपनी सहन में है

Post – 2016-11-04

गर ढूंढ रहे हो मेरी आंखों में अंधेरा
पुतली में है मैं जिससे तुम्‍हें देख रहा हूं
तुम सोचते थे तुम तो छिपे हो जहान से
तुम जिसको छिपाते हो उसे देख रहा हूं।
किस्‍मत ही मिली ऐसी कि बस देखना है काम
अंधेर के हमतर्जो के ढब देख रहा हूं।
कुछ लोग पूछतें है, ‘तुझे कुछ दीखता भी है ?’
जो सोच रहे हैं मैं उसे देख रहा हूं ।
तुम सोचते हो क्‍या मिला भगवान को इससे
भगवान तो हमजल्‍स है और देख रहा हूं ।।
4.11.16

Post – 2016-11-04

भारतीय मुसलमान और भारतीय बुद्धिजीवी – 4

”मैं तुम्‍हारे आत्‍मविश्‍वास को एक व्‍याधि मानूं और तुम्‍हें उस कोटि के सिरफिरे लोगों में गिनूं जो सपनों से बाहर निकल ही नहीं पाते तो कैसा रहे।”

”सपनाें में जीने वाले भी होते हैं और सपनों के सौदागर भी होते है और एक तीसरी कोटि भी होती है, सपनों को सच करने के लिए कुछ करने वालों की मैं उस तीसरी कोटि में आता हूं और इससे अगली कोटि सपनों से डरने और घबराकर भागने वालों की होती है, तुम अपने को इनमें गिनोगे या नहीं।”

वह हंसने लगा, ”जमीन पर उतर कर बात करो । मैं भी चाहता हूं कि हालात बदलें लेकिन मैं उन लोगों के अनुभव को भी नकार नहीं सकता जो डरे हुए हैं कि मुसलमानों को बदला नहीं जा सकता। देखो, हम भी उन जहालतों को तो समझते ही हैं जिनकी आलोचना की जानी चाहिए, मिसाल के लिए आधुनिक शिक्षा की जगह मदरसों की शिक्षा, हिजाबबन्‍दी, और दूसरी भी चीजें। हम उनको इसलिए नहीं छेड़ना चाहते कि ऐसा करते ही वे समझने और बदलने की जगह हमसे ही छिटक जाएंगे, इसलिए साथ रखने के लिए उन पर चुप साधे रहते हैं और उनसे छोटी बुराइयां भी यदि हिन्‍दू समाज में हों तो उनकी आलोचना करते हैं और उनको दूर करना चाहते हैं तो तुम्‍हें लगता है कि हम मुस्लिम लीग की नीति पर चलते हुए हिन्‍दू मूल्‍यों और मान्‍यताओं पर प्रहार कर रहे हैंं। हमारे और तुम्‍हारे बीच सिर्फ एक अन्‍तर है, तुम बुराइयों सहित हिन्‍दू मुल्‍यों को बचाना चाहते हो और दूसरे मूल्‍यो सं अधिक ध्‍यान उन बुराइयों पर देते हो जिन्‍हें दूर करना हमारे सामाजिक हित में है, और हम बुराइयों से मुक्‍त हिन्‍दू समाज की बात करते हैं वर्ना होने को तो मैं भी तुमसे कम हिन्‍दू नहीं हूं।”

”मैं यदि पूछूं, तुमने वह कौन सी पुस्‍तक लिखी है जिसमें हिन्‍दू मूल्‍यों, मानों, इसके इतिहास और उपलब्धियों का उपहास नहीं किया गया है तो तुम संकट में पड़ जाओगे। यह ठीक है कि तुम होने को हमसे कम हिन्‍दू नहीं हो, पर तुम उस कोटि के हिन्‍दू हो जो टुकड़ों पर पलते और टुकड़ों पर बिक जाते हैं, भौतिकवादी जो ठहरे। भूति ही तुम्‍हारी आत्‍मा है, वही धर्म है और उसके लिए तुमने कुछ भी करने से परहेज नहीं किया है।”

अपनी झुंझलाहट को छिपाने के लिए वह हंसने लगा, पर कभी कभी हंसी का भी एक स्‍याह रंग और सिकुड़ा हुआ आकार होता है, यह ठीक वही हंसी थी। कुछ देर चुप रहा फिर बोला, ”अच्‍छा यह बताओ, वह कौन सी बात तुम्‍हें दिखाई दी जिससे तुम्‍हें लगा कि अब मुसलमानों की मानसिकता में बदलाव लाया जा सकता है। मैं भी तो सुनूं।”

”पहली बात तो यह कि तुम लोग स्‍वयं इस बात के लिए तैयार होओ कि उनकी मानसिकता में बदलाव आए। मैंने कहा तुमलोग मुल्‍लों से भी अधिक कठमुल्‍ले हो और मुस्लिम समुदाय की जहालत की कीमत पर भी उसे अपनी गिरफ्त में रखे रहना चा‍हते हो, बल्कि यह कहूं कि उसकी जहालत को ही अपने लिए अवसर समझते हो, अपनी पूंजी तो गलत न होगा। तुम नये मुल्‍ले हो और पुराने मुल्‍लों से अधिक खतरनाक।”

उसकी आवाज में आत्‍मविश्‍वास लौट आया था, ”कोई प्रमाण ?”

”देखो, यदि किसी जाति या समुदाय से पहले कोई अन्‍याय हुआ हो तो हम उसके उत्‍तराधिकारियों से यह मांग करते हैं कि वह उस पर खेद प्रकट करे, इसी तर्क से हमने इंग्‍लैंड की महारानी से जालियांवाला बाग के विष्‍ाय में खेद प्रकट करने की मांग उठी थी, नहरू ने इसको नहीं माना था, फिर एडवर्ड अपनी पत्‍नी के साथ भारत की यात्रा पर आए तो उनसे यह मांग की गई। इसी तर्क से लोगों ने इंग्‍लैंड पहुंची कतिपय बहुमूल्‍य थातियों की बात की वापसी की बात की जाती रही है। सत्‍ता और दमन के प्र‍तीक रही अंग्रेजों की प्रतिमाओं को हटाया गया था। इसी तर्क से विश्‍व हिन्‍दू परिषद ने जो जब तक उपेक्षित पड़ा था जीवनदान पाने के लिए साधुओं, संतों को जुटा कर यह मांग करने लगी कि कम से कम तीन स्‍थलों की मस्जिदों को जिनकाे राम, क़ृष्‍ण औ शिव के मन्दि‍रों को तोड़ कर बनाया गया था, मुसलिम समुदाय को हिन्‍दुओं को सद्भावना पूर्वक हिन्‍दुओं को साैंप देना चाहिए।”

उसने बात पूरी न करने दी, बीच ही में कूद पड़ा, ”तुम भी ऐसी मांग का समर्थन करते हो।”

”मेरी बात बीच में मत लाओ, मैं तो उनमें से हूं जो कहते हैं कि तुम इन मस्जिदों को सौंपने की बात सोचो तो भी मैं एेसा नहीं करूंगा और कहूंगा कि तुम्‍हे इस शर्म के साथ जीना पड़ेगा कि तुम्हारे बुजुर्गों ने हमारे ऊपर ऐसा जुल्‍म किया था। इतिहास के पन्‍नों से तो तुमने इसे हटा दिया, पुरातत्‍व के इन साक्ष्‍यों को मिटाने नहीं दूंगा। मैं तो यह कह रहा हूं कि उस समय जैसी कि सुगबुगाहट सामने आई थी, राम जन्‍मभूमि के विषय में मुल्‍ला इसे जायज प्रस्‍ताव समझ कर इस पर विचार कर रहे थे। इसका एक कारण यह भी था कि जब राजीव ने वोट के चक्‍कर में इसका ताला खुलवाया था तो उसमें सीता की रसोई कायम कर दी गई थी और मुसलमानों ने नमाज पढ़ना छोड़ दिया था। अब उनके लिए यह पुराना ढांचा था और पुरातत्‍व विभाग के लिए एक अनमोल संपदा जिसकी रक्षा यदि करनी थी तो उसे करनी थी। मैं इसे पुरातत्‍व की संपदा के रूप में बचाने के पक्ष में था इसका प्रमाण दे चुका हूं और इसे सरकार की जिम्‍मेदारी मानता था। इसी बीच एक अनपढ़ से आदमी ने ले कर इसके बचाव के लिए मुकदमा दायर कर दिया और तुरत बाबरी ऐक्‍शन कमेटी बन गई और इस कमेटी के सदस्‍यों में सबसे आगे मुल्‍ला नहीं थे, तुम्‍हारे वे इतिहासकार थे जिन्‍होंने प्राचीन भारत के इतिहास का सत्‍यानाश किया था। मैं केवल यह याद दिला रहा था कि मुल्‍ले महज मुल्‍ले हैं, उनको समझाना आसान हो जाय, यदि तुम कठमुल्‍लों का दखल न हो तो क्‍योंकि मुसलमानों के पिछड़ेपन में तुम्‍हारा निहित स्‍वार्थ है। भारतीय मुसलमानों की कट्टरता के लिए मुल्‍ला कम जिम्‍मेदार हैं तुम अधिक। तुम वह छतरी हो जिसके नीचे वे काम करते हैं, मुल्‍ले, सउदी अरब से इमदाद और अमेरिका से समर्थन पाने वाले तबलीगी। अमेरिका सऊदी अरब को और उसके माध्‍यम से मुस्लिम जगत को पिछड़ा रखना चाहता है और तुम इसलिए कि तुम्‍हारे पास दूसरा कोई आधार ही नहीं। तसलीमा नसरीन को आश्रय देने से तुम्‍हारी सरकार ने इन्‍कार किया था और जहां तक याद है! यही काम तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने किया था। 2014 में भारत में निवास का परमिट समाप्‍त होने जिस सरकार ने उसके भारत निवास को संभव बनाया उसका पता लगाना। और जानते हो यूनाइटेड नेशनल प्राग्रेसिव एलाएंस ने उस‍‍‍के बारे में क्‍या विचार व्‍यक्‍त किये थे । इसे इस रपट में पढ़ो इससे अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता की समझ भी दुरुस्‍त हो जाएगी:
The United National Progressive Alliance on Saturday came out strongly against controversial Bangladeshi writer Taslima Nasreen, telling her not to misuse her political asylum in India to hurt the sentiments of a particular community or to cause communal tension in the country. The UNPA also asked the author to apologise for her controversial writings.

At a media briefing after the conclave of UNPA leaders hosted by the Telugu Desam Party in Vijayawada, National Conference leader and former Jammu & Kashmir chief minister Dr Farooq Abdullah articulated the views of the UNPA about the burgeoning controversy.
“Salman Rushdie wrote Satanic Verses and the reaction in the world was so severe that he continues to live in hiding today. We have a similar problem in India. We have a Bangladeshi national Taslima Nasreen. She also writes and reviles Islam and the Prophet of Islam. This is not acceptable to Muslims, not only in India but across the world,” he said.

“Nobody has a right to criticise religion. I am a Muslim but I have no right to criticize Hindus or Hindu Gods or Sikhs or Christians. In the Holy Quran, there is a verse which says you respect your religion and you respect other religions also. Now, when she has done this (blasphemous writing), she has been turned out of her country. India has given her asylum. If she wants to stay in peace and if she wants India to be in peace, she must not continue with that sort of dialogue,” Dr Abdullah added.

“She must say that she is sorry for what she has done. Unless she does that, she is not only going to pay the price but every one of us will have to pay it. This committee feels that she must not violate the asylum granted to her,” the NC leader said.

Asked if the UNPA wanted Taslima Nasreen to be deported, he quipped, “The decision about her staying or leaving has to be made by the government.”
When newsmen pointed out that he was endorsing the stand taken by Islamic fundamentalists, he shot back: “I am not a Maulvi, but I am a Musalman. That is why I say this. I don’t want hatred to be created because there are forces that emerge to take advantage of it.”
UNPA convenor and Telugu Desam Party chief N Chandrababu Naidu intervened to say “It is a sensitive issue. All of us have to live peacefully. That’s why we are saying that this type of writings are not good for the nation and not good for world peace also.”

Post – 2016-11-03

यह दिल वहां नहीं है जहां देख रहे हो।
मुश्किल वहां नहीं है जहां देख रहे हो ।
जो दिल पर आ पड़ी है गुजरती ही नहीं है
जैसे गुजर रही है वही देख रहे हो ।
सोचा था कि देखोगे हर एक चीज गौर से
तुम हर तरफ से सिर्फ मुझे देख रहे हो।
इस सादा दिली का कोई होगा जवाब क्‍या
तुम आंख बंद करके जहां देख रहे हो ।

Post – 2016-11-03

भारतीय मुसलमान और भारतीय बुद्धिजीवी – 3

”तुम तो बुरे फंसे यार, घेर लिया भाइयों ने अब जवाब देते नहीं बन रहा है।”

”तुम कबसे उनके साथ हो लिए ? तुम्‍हारी तो पार्टी लाइन ही हाइपर मुल्‍ला है।”

”मुसलमानों के खिलाफ तो आज भी नहीं हूं, पर मोदी के खिलाफ तो हूं न! वह मुसलमानों को पटाएगा तो उसका विरोध तो करूंगा ही । मुझे तो इस बात में मजा आ रहा था कि भाइयों ने तुम्हारे इतिहास-ज्ञान को फीते से नाप दिया। तुम्‍हारी खाल उधेड़ी जाय तो मैं तो उधेड़ने वाले से कहूं जरा संभाल के उतारना और एक टुकड़ा मुझे दे देना, उसकी खजड़ी बनाऊंगा। बुरा मत मानना, खजड़ी से जो आवाज निकलेगी वह भी तो तुम्‍हारी ही होगी न !”

”मैं जानता था, तुम यही कर सकते हो। संगत ही ऐसों की चुनी है। पर मेरे साथ उठते बैठते हो तो इतना तो जान लो कि जो लोग इतिहास को वर्तमान पर रख कर उसे समझने की कोशिश करते हैं वे वर्तमान को देख नहीं पाते, इतिहास को देख नहीं सकते। वे अपने खयालों की ही पूजा करते हैं। यह मूर्तिपूजा का ही आभ्‍यन्‍तरीकरण है। हम इतिहास के केवल उस अंश को जानते हैं जिसके विषय में कुछ सूचनाएं कुछ माध्‍यमों से हमारे पास पहुंची हैं और जिनके आधार पर हमने उसकी एक काल्‍पनिक तस्‍वीर तैयार की है। उसको तस्‍वीर की बारीकियों को जानना तो जरूरी है, परन्‍तु वर्तमान पर लादना गलत। इससे वर्तमान ओझल हो जाता है। भविष्‍य की परिकल्‍पना तो की ही नहीं जा सकती। अन्‍त हमेशा निराशा में होता है। बहुत कुछ कर लिया, इतनी बार, कुछ नहीं हुआ, अब एक ही काम बचा रहता है, अपना सर पीटना। यह भूल जाते हैं कि जिस समय के विषय में आप कह रहे हैं कि बहुत कुछ किया, इतनी बार किया, उस समय भी आप कुछ करने से अधिक अपना सर ही पीट रहे थे।

”इतिहास से हम इतना ही जान लें कि मनुष्‍य और मानव समाज में, रोकने वालोंं की कोशिशोंं के बाद भी, बदलाव हुए हैं, तो हमन्रे उससे आधी शिक्षा ग्रहण कर ली। यदियह भी जान लिया कि किन परिस्थितियों और दबावों में क्‍या बदलाव हुए तो अापने इतिहास से जो कुछ जानने योग्‍य था, सब कुछ जान लिया। अब आप अपने मन में यह आशा पाल सकते हैं कि नए और इच्छित दिशा में कुछ बदलाव लाए जा सकते हैं। यदि परिस्थितियां उन परिस्थितियों से भिन्‍न हों जिनमें ये बदलाव प्रयत्‍न करने के बाद भी नही लाए जा सके, तो निश्‍चय ही यह आशा की जा सकती है कि इस बार के प्रयत्‍नों का परिणाम पहले जैसा नहीं होगा। भौतिक विज्ञान में और इसके प्रयोगों में हम उन कारणों को समझने के बाद उन गलतियों से बचने के साधन जुटा लेते है, तरीका बदल देते है, सामाजिक क्षेत्र में हम जुटाने के नाम पर यदि कोई संगठन बना या आन्‍दोलन खड़ा कर लेते हैं तो बड़ा दीखने के बाद भी वह संपूर्ण सामाजिक जटिलताओं और उनकी व्‍याप्ति की तुलता में इतना तुच्‍छ होता है कि इससे अपघात तो किया जा सकता है, बदलाव नहीं लाया जा सकता। इसलिए हमें भौतिक विज्ञानियों से भी अधिक सतर्कता से सही समय और सही तरकीब का आविष्‍कार करना चाहिए जो इतनी बड़ी चुनौती है कि इसकी समकक्षता में कोई आ ही न सका। फिर भी यदि हम ऐतिहासिक शक्तियों की सही पहचान कर सकें तो उनके भरोसे अधिक फलदायक प्रयोग या पहल कर सकते हैं।”

”यहां तक तो तुम्‍हारी बात सही है, मुस्लिम समुदाय भीतर से आज बेचैन सा है। हमारी ही सोसायटी में एक रिटायर्ड इंजीनियर हैं। सुनते कम हैं। कुछ पुस्तिकाएं हिन्‍दी में छपवा कर लोगों में बांटते फिरते हैं कि कुरान एक अच्‍छी पुस्‍तक है और इसमें अच्‍छी बातें लिखी हुई हैं। इसमें से एक किसी शंराचार्य के नाम पर भी है।”

”होगी। न हो तो भी, मान लें कि हिंदू पोंगापंथियों और मुस्लिम कठमुल्‍लों में एक बेचैनी है कि उन्‍हें बंद दिमाग का न समझा जाए।”

”तुम कुछ घबराए हुए से लगते हो वर्ना हिंदुओं में भी पाेंगापन्‍थी है यह नाम न लेते। कम से कम तुम जैसे आधी खोपड़ी के आदमी के लिए यह शोभा नहीं देता। बताओगे उन्‍हें तुम भी पाेंगापन्‍थी मानने और मुस्लिम कठमुल्‍लों के समानान्‍तर रखने पर किस कारण तैयार हो गए।”

”पहली बात तो यह कि मैं उन्‍हें मुस्लिम मुल्‍लों के साथ रखने को तैयार नहीं। कारण, मुस्लिम मुल्‍ले इस्‍लामी प्रशासन को नियन्त्रित करते रहे हैं। इस हद तक नियन्त्रित कि अकबर के बादशाह बन जाने के बाद भी एक मुल्‍ला ने उन पर छड़ी चला दी थी और अकबर कुछ न कर सके थे। यही गुस्‍सा था कि अकबर ने मुल्‍लावाद को खत्‍म करने के लिए दीने इलाही की योजना अबुल फजल और फैजी के पिता के सहयोग से बनाई और अपने को इमाम घोषित करते हुए इस्‍लामी आक्रोश से बचते हुए एक नया धर्म चलाया, मजहब नहीं, धर्म, जिसमें सभी धर्मों के अनुकरणीय आदर्शों को जगह दी गई, पर मुल्‍ला तंत्र इतना प्रबल रहा है कि दीने इलाही अकबर के साथ ही खत्‍म हो गया और उनका बेटा तक उसमें दीक्षित न हो सका।

कहें, राजनीति पर मुल्‍लाें का कुरानशरीफ और हदीस की अपनी व्‍यख्‍याऔ और फतवा जारी करने के अधिकार से पूरा नियंत्रण रहा है, जब कि साधु और शंकराचार्य राजनीति से बाहर थे और अब मुल्‍लों जिउतना न भी मिले तो भी राजनीति में दखल चाहते हैं इसलिए यह दिखाना चाहते हैं कि वे उतने बन्‍द दिमाग के नहीं है कि उन्‍हें केवल धर्मक्षेत्र में ही सीमित करके उसे ही उनका कुरुक्षेत्र बना दिया जाय। पर इस दिखावे के बाद भी वे वर्णव्‍यवस्‍था को हिन्‍दू समाज का अनिवार्य लक्षण मानते हैं और वहां उनके दिमाग का खुलापन गायब हो जाता है।

मुल्‍लों को बादशाहत या तानाशाही से टकराने में डर नहीं लगता था, पर लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में जनता के मन पर पड़ने वाली छाप या सही गलत की चिन्‍ता चुनौती बन कर आती दिख रही है। यहां फतवे बेकार हो जाते हैं। धर्मग्रंथ अपनेे आप सन्‍देह के दायरे में न सही, समीक्षा के दायरे में आ जाते हैं इसलिए उन्‍हें उचित और व्‍यावहारिक सिद्ध करने की चिन्‍ता पैदा होती है। उनकी आन्‍तरिक बेचैनी का एक सबसे बड़ा कारण यह है।

दूसरे भी कारण है, आज आतंकवादी गतिविधियों के कारण मुसलमानों के बारे मे बनती समझ और वह भी खास कर इसलिए कि इसे इस्‍लाम की तालीम पाने का दावा करने वालों या तालिबान के नाम पर चलाया और पहचाना जाने लगा है। बेचैनी यह कि उनको देख कर यदि यह समझों कि कुरआन या इस्‍लाम उन गतिविधियों का समर्थन करता है तो यह सही नहीं है। दुर्भाग्‍य से उनका विरोध गलत और तालिबानी तरीका इस्‍लामी लगता है जिससे वे लाेकता‍ंत्रिक व्‍यवस्‍था में स्‍वयं भी डूबेंगे और दूसरों को भी डुबाएंगे।”

”वह तो छोड़ो, तुम जानते हो कहा जाता है कि मोहम्‍मद साहब के नया मजहब चलाने तक दुनिया जाहिलिया के दौर से गुजर रही थी जब कि मुल्‍लों ने कुरान शरीफ की आड़ में मुस्लिम समुदाय को जाहिलिया के दौर में पहुंंचा दिया क्‍योंकि वे किसी ऐसी चीज को जानने और मानने को तैयार ही न थे जो कुरान में लिखी किसी बात से अनमेल पड़े । जिनके पास ज्ञान के नाम पर एक ही किताब रह जाए, दूसरा सारा ज्ञान उनके लिए शैतानी खुराफात लगे वे जाहिल तो रहेंगे ही।”

”यह हाल तो तुम्‍ही कहते हो कि पोपतंत्री ईसाइयत में भी रहा है और आज भी है।”

”ठीक कहता हूं । वही झाड़ फूंक, वही अन्‍धविश्‍वास, वही धूर्तता, वही चमत्‍कार, जिस धर्म से किसी व्‍यक्ति या समुदाय को विचलित करना है उसके बारे में उसी तरह की घृणित बाते ईसाई प्रचारक आज भी करते हैं। जानते हो स्‍टेंस के साथ जो लिंचिंग का कांड हुआ था उसका कारण क्‍या था? उसके भारत में रहने का बहाना था कोढि़यों की सेवा। सेवा करने वाला अस्‍पताल में रहेगा, घर घर घूम कर, वह भी रात में यह काम न करेगा। कारण था उसका घूम घूम कर ईसाइयत का प्रचार और इस प्रचार के क्रम में हिन्‍दू देवी देवताओं के बारे में गर्हित बातें करना। उस रात भी वह उस आदिवासी परिवार में इसी आशय से गया था। उसका एक फुटेज पहले आया भी था फिर भी ईसाइयों के दबाव में उसे हटा लिया गया था। और वह दारा सिंह तो उससे पहले कांग्रेस का आदमी था, नन्दिनी सत्‍पथी के आश्रय में गया था, पर मीडिया किसी भी चीज को कोई रंग दे लेती है। उनके धर्मान्‍तरण का विरोध मुख्‍यत: संघ वाले करते रहे हैं इसलिए उन्‍हें किसी से भी नुकसान हो, वे असली दोषी को छोड़ कर संघ पर आरोप लगाएंग। रेप के कुकृत्‍य होते रहते हैं पर यदि वह किसी नन के साथ हो गया या दलित के साथ हो गया तो तुरत इसका राजनीतिक पहलू उभार कर अपराधी को बचाने और इस मौके का फायदा उठाते हुए अपने प्रसार में बाधक बनने वालों को देश-देशान्‍तर में बदनाम करने का प्रयत्‍न किया जाता है। पुलिस जब यही काम करती है तो हम उसकी निन्‍दा करते हैं जो करना भी चाहिए, परन्‍तु राजनीतिक दल और मीडिया के सहयोग से जब भारत में ऐ भिन्‍न सांस्‍कृतिक और धार्मिक उपनिवेश कायम करने वाले आए दिन यही करते रहते हैं तो हम क्षमा करते रहते हैं।”

Post – 2016-11-02

जानता हूं कि कई लोग खफा हैं मुझसे
किसी ने मुझको किसी पर खफा होते देखा ?
बहुत बारीक सतर है समझ-नफरत के बीच
मेरे कलाम में उसको सफा होते देखा ?
देखने वाले भी साेते हैं खुली आंखों से ।
क्‍या कहीं तुमने भी ऐसा कभी होते देखा?
मैंने देखा है मगर तुम न समझ पाओगे
कत्‍ल करते हुए इन्‍सान को मरते देखा।
बहुत गरूर था अपने पर सोचते थे हम
‘किसी को जो न दिखाई दिया हमने देखा।’
फिर भी भगवान ने मुझसे कहा नादान है तू
गर कभी मुझमें सभी को नही पहले देखा।

Post – 2016-11-02

भारतीय मुसलमान और भारतीय बुद्धिजीवी -2

(हमारा यह लेख अनुभववादी है वस्‍तुपरक नहीं। इसमें ग‍‍लतियां गिनाई जाएंगी और वे ठीक लगेंगी तो उनके अनुसार इस कच्‍चे लेख को सुधार लूंगा और गलतियां सुझाने वाले का आभार भी स्‍वीकार करूंगा। हमारा आशय आधिकारिक ज्ञान तक प्रतीक्षा न करते हुए छत्‍तीस के संबंध को तिरसठ में बदलने का, अबोलेपन को दूर करने का और उस बहस को आरंभ करने का है जिसमें संजीदा प्रत्‍यालोचना से हम सबकी समझ बढ़ सके। )

भारतीय मुसलमान नब्‍बे फीसदी भारतीय है और दस प्रतिशत विदेशी। जो विदेशी होने का दावा करते हैं वे भी पचास प्रतिशत भारतीय है, पचास प्रतिशत विदेशी। भारतीय मुसलमान नब्‍बे प्रतिशत धर्मान्‍ध है और दस प्रतिशत सन्‍देहवादी । जिसने भारतीय स्ंस्‍कृति को गंगाजमुनी बनाया था उसे सच्‍चा मुसलमान बनाने के काेड़े मार मार कर कट्टर मुसलमान बनाया गया और उस संस्‍कृति को नष्‍ट किया गया जिसका रोना रोया जाता है। जाली टोपी पहनने वाले निन्‍नानबे प्रतिशत भारतीय मूल के मुसलमान मिलेंगे और एक प्रतिशत विदेशी मूल पर गर्व करने वाले। भारतीय मुसलमानों को अपने को सच्‍चा मुसलमान सिद्ध करने का दबाव और इसे साबित करने के लिए कुछ भी करने की तत्‍परता, विदेशी मूल का दावा करने वालों की तुलना में अधिक रहती है, जब कि सामान्‍य स्थिति में होना इससे उल्‍टा चाहिए। विदेशी मूल के दावेदार प्राय: जमींदार थे, शिक्षा और उच्‍च जीवन स्‍तर की सुविधाएं थीं जिनका उन्‍होंने लाभ भी उठाया इसलिए सामान्‍यत: उनकी जीवनशैली दूसरे संभ्रान्‍त भारतीयों से अलग नहीं दिखाई देती। सामाजिक मर्यादा में भी। उग्रवादी से लेकर आपराधिक गतिविधियों में संलिप्‍तता भी भारतीय मूल के मुसलमानों में ही अधिक पाई जाती है जिसका एक कारण आर्थिक और दूसरा अपनी हैसियत से अधिक कुछ कर गुजरने की इच्‍छा भी रहती है। अत: बड़े डान हाजी मस्‍तान, दाऊद और शकील का एक समानान्‍तर अंडरवर्ल्‍ड है जिसमें से ही कुछ हिन्‍दू भी निकले हैं। परन्‍तु विदेशी मूल के मुसलमानों में सांस्‍कृतिक श्रेष्‍ठतावाद बहुत प्रबल रहा है जिसने भारतीय सांप्रदायिकता का एक प्रधान कारण माना जा सकता है।

भारतीय मूल के मुसलमान पहले मूर्तिपूजक थे इसलिए उन्‍होंने इस्‍लाम में भी बुतपरस्‍ती का, कीर्तन, भजन, अगियारी या धूमगन्‍ध का रास्‍ता निकाल लिया । शुरुआत दरगाहाें से हुई और फिर ताे चार चिराग जलाने तक आ गई। कुरान की प्रतियों, मस्जिदों का दैवीकरण आरंभ हो गया। मैं नहीं जानता कि यह बुतशिकनों की हार थी या बुतपरस्‍तों की विजय, क्‍योंकि जीतने वाले बहुत कुछ हार चुके थे, और जिसे बचाना चाहते थे, उसे बचा नहीं पाए । ऊपर से जिस मजहब को मान चुके थे उसके भीतर अपने को समायोजित करने में कठिनाई के कारण वे अपने आप से ही खीझने आैर सचाई को छिपाने लगें। जो लोग मन्दिरों और मठों से मूर्तिपूजा या देववाद को जोड़ने की आदत बना चुके हैं, उन्‍हें देववाद या प्रतीकपूजा के विस्‍तार का पता ही नहीं।

हम यहां इस्‍लाम के धार्मिक विश्‍वास की जांच नहीं कर रहे, न करना चाहते हैं, परन्‍तु उसे जानना जरूरी हो सकता है और हो सकता है कभी उस पर भी, अच्‍छा या बुरा तय करने के लिए नहीं अपितु यह जानने के लिए चर्चा करें कि उन विचारों और विधानोंं का हमारी जानकारी के अनुसार स्रोत क्‍या है और जब तक वे किसी भावधारा में स्‍वीकृत हैं उनका समाज पर क्‍या प्रभाव पड़ता है और उस समाज काे दूसरे समाजों के साथ तालमेल बैठाने में क्‍या समस्‍यायें आती हैं। जब हम इस्‍लाम को विचारधारा न कह कर भावधारा कहते हैं तो इसका कारण यह कि इसमें सोच विचार की गुंजायश नहीं रखी गई है, केवल विश्‍वास करने का, उसमें बह जाने का ही रास्‍ता है। इस्लाम भक्तिमार्गी मजहब है और सच्चे भक्त के पास िदमाग होता है पर जहां उसका टकराव भावना से होता है वहां उसेस्थगित कर दिया जाता है ।

भारत में दो तरह के मत रहे हैं, एक को हम मजहब कह सकते हैं और दूसरे का धर्मदृष्टि । मजहब में विश्‍वास या आस्‍थाभाव इतना प्रबल रहा है कि बुद्धि या किसी तर्कवितर्क की संभावना नहीं रहती, और भक्ति भी अपने इष्‍टदेव तक सीमित रहती है, धर्मदृष्टि में किसी मान्‍यता का आधार उसका औचित्‍य होता है और दूसरे मतो के प्रति द्वेषभाव नहीं होता । मजहब के अस्तित्‍व के लिए यह विश्‍वास जगाना जरूरी होता है कि दूसरे सभी धर्म गलत है, उनमें बुराइयां हैं इसलिए समाज को उन बुराइयों से मुक्‍त करने के लिए इस धर्म का उदय हुआ। इसे अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए इसे ईश्‍वर प्रदत्त या ईश्‍वरीय इच्‍छा का अन्‍तर्ज्ञान किन्‍हीं महापुरषों याइसी प्रयोजन से भेजे गए पैगंबरो की कल्‍पना करनी होती है या स्‍वयं को ही ऐसा पैगंबर बताना होता है। दूसरे विकृत मजहबों से समाज को मुक्‍त करना भी इसका एक लक्ष्‍य बन जाता है जिसमें निन्‍दा से ले कर हिंसा तक का सहारा लिया जा सकता है। इस दृष्टि से आर्यसमाज एक मजहब है और ब्रह्मसमाज एक धर्मदृष्टि । भक्ति आंदोलन मजहब था तो संत आंदोलन धर्मदृष्टि । इस्‍लाम, ईसाइयत, यहूदी मत मजहब हैं और सनातन धर्म एक धर्मदृष्टि ।

भले सभी मजहबों में एक और एकमात्र सर्वोपरि शक्ति की किसी भी नाम से कल्‍पना की जाय, संसार की बनावट, प्रकृति की लीला और मनुष्‍य की अपनी कमजोरियाें के कारण वह सर्वोपरि रह नहीं जाता क्‍योंकि प्राक रतिक उपद्रवों, व्याधियों और मानवीय बुराइयों के लिए एक उतनी ही शक्तिशाली दुष्‍ट सत्‍ता की कल्‍पना करनी होती है जो सच कहें तो इस यह्व, गॉड, अल्‍लाह, से अधिक ताकतवर सिद्ध होता है और उसके सिर उन बुराइयों को डालना जरूरी होता है और कई बार उस सत्ता में विश्वास पैदा करने के लिए अनिष्टकारी घटनाओं या आपदाओं को उसी का प्रकोप बता कर उसका आतंक पैदा किया जाता है ।

इसी तरह उसकी सत्‍ता के लिए उसके अधीन कुछ ऐसी शक्तियों की भी कल्‍पना जरूरी होती है जिनके माध्‍यम से वह अपने आदेश जारी कर सके या अपने शासितों से संपर्क कायम रख सके। ऐंजिल्‍स या फरिश्‍तों की कल्‍पना उसी बहुदेववाद के समान तो नहीं फिर भी उसके निकट पड़ती है, सन्‍तों की कल्‍पना देवप्रतिम व्‍यक्तियों के निकट पड़ती ही है, उनके चमत्‍कार में विश्‍वास को भी जादुई शक्ति से अलग नहीं माना जा सकता। यही हाल प्रतीकविधान या किसी ऐसे पदार्थ में दैवशक्ति की प्रतिष्‍ठा में भी होता जिसे गढ़ें तो किसी जीव-जन्‍तु का आकार बन जाय, नन गढ़े तो पत्‍थर बना रहे। क्रास और इसे श्रद्धापूर्वक छूते हुए भक्‍त, मरियम के चित्र या प्रतिमा के साथ तो कम से कम यह है ही कभी कभी टोपी में भी इसे कल्पित किया जा सकता है जो पोप के सिर से फैल कर भारतीय मुसलमानों में हाल में बहुत तेजी से फैली है। मनुष्‍य की भावना का चरित्र ही ऐसा है कि जिन चीजों से तुष्टि मिलती है उनके एक रूप का विरोध करता है तो भी उसे दूसरे बहाने से जुटा लेता है। अरूप या समस्‍त गुणों से मुक्‍त ब्रह्म का ध्‍यान कठिन पड़ता है।

भारतीय समाज में ऐसी प्रत्‍येक वस्‍तु पवित्र है जिसका हमारे जीवन में उपयोग है। वह अनाज भी हो सकता है, कागज का ऐसा पन्‍ना भी हो सकता है जिसमें ज्ञान की बात लिखी हो या जिस में धर्म और नीति की बात लिखी हो। उसके लिए दावात और कलम और पटरी या अक्षर अभ्‍यास की पटिया पूज्‍य है। परंपरावादी हिन्‍दू किसान अनाज पर पांव नहीं रखता, रास्‍ते में दाना गिरा दिखाई दे तो उसे उठा कर माथे लगा लेगा। वह शस्‍त्र की भी पूजा करता है, तराजू और बाट की भी। वादक वाद्ययन्‍त्र की पूजा करता या पूजा जैसी संभाल रखता है। उस्‍ताद या गुरु को देवता बनाने का आग्रह भी संभवत: भारतीय संगीतकारों में ही पाई जाय वे हिन्‍दू हों या मुसलमान। ऋग्‍वेद में देवता का अर्थ वर्ण्‍यविषय होता है और ऋषि वह पात्र जिससे कोई बात कहलाई गई हो। इसलिए युद्ध पर केन्द्रित एकमात्र सूक्‍त में बाण/ इषु, दुन्‍दुभी, धनु, प्रत्‍यंचा, कवच सभी को देवता बताया गया है, परन्‍तु इसके साथ यह भाव भी जुड़ा हो सकता है कि जो हमारे उपादेय आयुध और उपकरण हैं वे असाधारण देख-संभाल और सुरक्षा के पात्र है। इसी से हिन्‍दू समाज में वह देव भाव आया जिसे फीटिशिज्‍म कह सकते हैं।

भारतीय मुसलमानों ने कुरान, मस्जिद, टोपी, पोशाक सभी को बुतों में बदल दिया। आप को याद है या नहीं मोदी की ‘सभी का साथ’ की परख के लिए एक मौलवी ने उन्‍हें जाली टोपी पहनने को दी तो मोदी ने उसे वापस कर दिया। शाल दी तो सम्‍मान के साथ स्‍वीकार कर लिया। कई स्थितियां ऐसी होती हैं जिसमें टोपी जूता बन जाती है और जूता ताज। जब आप कुछ पाने के लिए किसी की ऐसी शर्त मानने को तैयार हों जो आपके सामान्‍य व्‍यवहार और आत्‍मसम्‍मान से मेल न खाता हो तो टोपी भी जूता बन जाती है। जब अाप आत्मिक कृतज्ञता से किसी अनासक्‍त सेवा भाव से किसी के जूते उतारते, उसे माथे से स्‍पर्श करते है तो वह जूता नहीं रह जाता, ताज में बदल जाता है।

मोदी में यह आत्‍मसम्‍मान है कि वह नाजुक क्षणों में भी सही निर्णय लेता है और उसके विरोधी को भी उस पर कम से कम इतना विश्‍वास तो हो जाता होगा कि यह व्‍यक्ति पाखंडी नहीं है। मोदी ने कितने अंचलों में जा कर सम्‍मान भाव से पेश किए गए कितने टोप और पहनावे बदले हैं, परन्‍तु यह वह अवसर न था।

ठीक यही काम नीतीश, अरविंद और शिवराज सिंह नहीं कर सके। आप स्‍वयं तय करें कि उनके सिर पर टोपी पड़ी या कुछ और । कुछ पाने के लिए किसी ऐसी शर्त को मानना आ‍दमी की नैतिक गिरावट का प्रमाण बन जाता है।

मुस्लिम समुदाय का प्रगतिशील कहा जान वाला तबका भी हिन्‍दू बुद्धिजीवियों के असर में मुस्लिम लीग के आदर्शों से प्रेरित रहा है । जो बात मुल्‍लाें की समझ में आ सकती है वह भी उसकी समझ में नहीं आती, इसलिए अपने समाज को कट्टर बनाने में सबसे अधिक भूमिका हाल के वर्षों में उसकी रही है जिसे हम सेक्‍युलर सांप्रदायवाद कह सकते हैं और जिसकी लड़ाई केवल हिन्‍दू संगठनों से ही नहीं, पूरे हिन्‍दू समाज, इसकी सांस्‍कृतिक अभिव्‍यक्तियों से है, इसलिए मुसलमानों को अपने बन्‍द दिमाग से बाहर लाने में तो इसकी भूमिका रही ही नहीं, उसे अधिक बन्‍द दिमाग बनाने में इसकी प्रच्‍छन्‍न भूमिका रही है । हिन्‍दू मु‍सलिस संबंधों में बिगाड़ लाने में भी सबसे अधिक भूमिका इसी की रही है और सबसे अधिक नुकसान इसी को उठाना पड़ा है। अल्‍पज्ञ मूर्ख अपने अनुभवों से सीख जाता है, बहुपठित मूर्ख उसका भी लाभ नहीं उठा पाता ।

Post – 2016-11-01

भारतीय मुसलमान और भारतीय बुद्धिजीवी

”मुझे पता है कि अभी सुंदरता की कद्र नहीं है। चेहरे की सुंदरता, विचारों और आरजूओं की सुंदरता, सुंदर लिखावट, आंखों और नजरिए की सुंदरता और यहां तक कि मीठी आवाज की सुंदरता। – रेहाना जब्बारी

अपने साथ जबरदस्ती सेक्स करने की कोशिश करनेवाले शख्स को जान से मार देने के आरोप में करीब 7 साल से जेल की सजा काट रही रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई।

जब्‍बारी की सांकेतिक भाषा में आंखों की सुंदरता, चित्र, अभिनय और मूर्तिकला, नजरिए की सुंदरता में उत्‍कृष्‍ट दर्शनों, आदर्शों की सुन्‍दरता और मीठी आवाज की सुंदरता संभवत: संगीत और गायन के लिए आया है । इस कातर स्‍वर के पीछे इसकी अपनी सुरुचि संपन्‍नता तो आती ही है इसका उत्‍कृष्‍टतम रूप उस वसीयत में है जिसमें उसने कामना की थी कि उसके मानवीय उपयोग में आ सकने वाले अंगों को जमीन में गाड़कर सड़ाने से अच्‍छा है फांसी के तुरत बाद आंखे, हृदय, गुर्दा, किडनी, फेफड़ा और हड्डी तक निकाल कर इनको जरूरतमन्‍द रोगियों या अंगविकल व्‍यक्तियों काे लगा दिया जाय।

ऐसा क्‍यों है कि इस्‍लाम में सुन्‍दरता के लिए जगह नहीं है और क्रूरता के लिए इतनी जगह कि गलती किसी की हो और किसी का खून बहा कर संतोष किया जाय। गलती न हो तो भी खून करने में आनन्‍द लिया जाय। जिस जानवर को एक झटके में काट कर उसकी यातना को कम किया जा सकता हो उसे रेत कर मारा जाए। विचार और पुनर्विचार के लिए इतनी कम जगह क्‍यों है कि जहां अक्‍ल से काम लिया जाना चाहिए वहां भी उत्‍तेजना से काम लिया जाय और आवेग को इतना प्रखर कर दिया जाय कि तार्किक सोच विचार की संभावना कम हो जाय। क्‍यों उन औरतों को भी इतनी दहशत में रहना पड़ता है जो जानती है कि इस्‍लामी कानून इतने स्‍त्रीविरोधी हैं कि उन्‍हें अपना पक्ष तक रखते हुए डर लगे कि इसका अंजाम बुरा हो सकता है फिर भी वे कहें कि इस्‍लाम में औरत को बहुत सम्‍मान की जगह दी गई ? बहुविवाह सम्‍मान है? हिजाब सम्‍मान है ? तीन तलाक सम्‍मान है ? हलाला सम्‍मान है ? अपने ऊपर हुए बलात्‍कार को सिद्ध करने के लिए इतने चश्‍मदीदों को पेश करना सम्‍मान है जितने हों और अपराध में शामिल न हों तो (उसी दशा में वे गवाह बन सकते है) अपराध हो ही न सके और ऐसा न कर पाने पर स्‍वयं मृत्‍युदंड पाना सम्‍मान है ? सुनते हैं और भी बहुत कुछ है जो इसी कड़ी में आता है, जिसे अपमान के सबसे गहित उदाहरण के अतिरिक्‍त कुछ नहीं कहा जा सकता, इससे परिचित होते हुए भी वह ऐसा कह सकती हैं और इसकी हिमायत कर सकती हैं, आश्‍चर्य इस पर होता है। क्‍या बहुत सारी मुस्लिम महिलाओं के पास बुद्धि होती ही नहीं ? नहीं, उन्‍हें इस हद तक कुचल दिया जाता है कि वे सोच नहीं सकतीं या आज्ञापालन के तरीके सोचने के अतिरिक्‍त सोच नहीं सकतीं। इस पर भी कि मुस्लिम पुरुषों में जिन्‍हें हम बुद्धिजीवी मानते हैं वे भी इन सवालों पर इनके विरोध में खड़ी होने वाली महिलाओं का साथ नहीं देते।

हिन्‍दू बुद्धिजीवी इससे बचते हैं यह बात समझ में आती है। वे संघ और भाजपा से अधिक कट्टरता से यह मानते हैं कि भारत हिन्‍दुओं का देश है और उनकी मुखरता हिन्‍दुओं तक सीमित रहनी चाहिए। मानवाधिकार के सवाल हिन्‍दुओं तक सीमित रहने चाहिए और पुरुषों तक तभी जाने चाहिए जब उसका कारण कोई हिन्‍दू हो। हिन्‍दू हो कर वह भला ऐसा कैसे कर सकता था, मुस्लिम भले करते रहे। वे तो होते ही ऐसे हैं कि उन पर किसी बात का असर नहीं पड़ सकता।

मुसलमान किसी के साथ क्‍या करते हैं यह उनके विचार क्षेत्र में नहीं आता क्‍योंकि जहनी स्‍तर पर वे यहां के निवासी नहीं, मेहमान हैं। वे आपस में, अपनी महिलाओं के साथ या हिन्‍दुओं के साथ किस तरह का व्‍यवहार करते हैं यह मानवाधिकार की परिधि में नहीं आता।

यदि हिन्‍दुओं के प्रति उनकी इतनी इकहरी सोच न होती तो संघ और भाजपा तो गांधी जी की हत्‍या के बाद हाशिए पर आ ही गए थे, हाशिए पर रहते। इस सोच ने जिसे मैं कई बार दुहरा चुका हूं कि यह मुस्लिम लीग की सोच है, और यह भी समझा चुका हूं कि यह क्‍यों सेकुलरिस्‍टों में ही पाई जाती है (और बुद्धिजीवी तो होता ही सेक्‍युलर है इसलिए सारे बुद्धिजीवियों में पाई जाती है, जिसमें न मिले वह बुद्धिजीवी नहीं हो सकता), इसलिए लीग अर्थात् सेक्‍युलरिज्‍म ने इस एक तरफा हमले, आक्षेप, योजनाबद्ध अपमान और सांस्‍कृतिक प्रदूषण के द्वारा भाजपा और संघ को स्‍वत:सिद्ध रूप में उदार, सर्वहितचिन्‍तक, सर्वधर्म समदर्शी, देशप्रेमी और प्रगतिशीलों से भी अधिक प्रगतिशील होने का दावा करने का और समाज के मूल्‍यांकन में पहले के किसी भी चरण से अधिक सम्‍मान पाने और इन दावों पर खरा उतरने का अधिकार दिया जब कि हिन्‍दू संस्‍कृति और सम्‍यताविमर्श के मामले में वह उत्‍पाती भले न हों नासमझी में अपना कीर्तिमान रखते हैं ।

मेहमानी का भाव मुसलमानों में भी इतना गहरा है कि वे उस तरह के सुधार, उस तरह की वस्‍तुपरकता तक नहीं अपना पाते जिन्‍हें दूसरे, कई मामलों अधिक पिछड़े मुसलिम देश अपना चुके हैं। उदाहरण के लिए बुतपरस्‍ती से परहेज के चलते वे मस्जिद, कुरान की पोथी, या किसी की समााधि या मजार के प्रति पूजा या भावनात्‍मक लगाव नहीं रखते जब कि सेक्‍युलर भारत में यह उल्‍टा है। थोड़ी सी भी असुविधा या खरोंच पर उनका आवेश ऐसी बेचारगी का रूप ले लेती है जिसका मतलब होता है, उनके साथ अकारण जुल्‍म और जुल्‍म भी ऐसा जो इतिहास के सबसे क्रूर चरणों पर हुआ है हो रहा है और यह जिस तरह की उत्‍तेजना का प्रसार करता है वह किसी के लिए हितकर नहीं मानी जा सकती।

यह पोस्‍ट मैंने 29 को लिखी थी पर अधूरी रह गई थी। तब तक भोपाल जेल से पलायन करने वालों के एनकाउंटर का मामला न आया था। आज वह आ चुका है तो उससे बच नहीं सकता। मुझे भी इस बात का पूरा विश्‍वास है कि भगोड़े आरोपियों के पास कोई कट्टा या बारूदी हथियार नहीं था। वे पुलिस वालों को पत्‍थर ही मार रहे थे कि वे उन्‍हें पकड़ने को आगे न बढ़ सकें। वे घिर जाने के बाद भी समर्पण न करके ‘केवल’ पत्‍थर मार रहे थे इसलिए आदर्श स्थिति में उन पर जानलेवा गोली नहीं दागी जानी चाहिए थी। आदर्श स्थिति का अर्थ है जिसमें हम यांत्रिक वस्‍तुपरकता का निर्वाह कर सकें जिसके लिए बहुत कम देशों की पुलिस जानी जाती है और उनमें हमारा नाम नहीं आता।

परन्‍तु इसके अलावा दूसरी कहानियां मुझे उतनी ही जाली लगती हैं जितना जाली बहाना पुलिस अपने बचाव में तैयार करेगी। यह कि प्‍लेट को तोड़ कर उससे ऐसा हथियार नहीं बनाया जा सकता जिससे किसी की जान ली जा सके, अपराधियों की सर्जनात्‍मकता और कारनामों के इतिहास को जानबूझ कर झुठलाने जैसा है। यह तथ्‍य कि वे विचाराधीन थे, छूट भी सकते थे, उन्‍हें निरपराध नहीं सिद्ध करता कारण छूटने के कारण दूसरे होते हैं, जिनमें सर्वविदित अपराधी छूटते रहते हैं।

यदि वे निरपराध होते तो उन्‍हें फैसले का इन्‍तजार करना चाहिए था, भागने का प्रयत्‍न नहीं। उन्‍हें जानबूझ कर भगाया गया, यह कहानी अपनी तार्किक परिणति में कुछ लंबी हो जाती है । यह योजना इतनी बड़ी थी कि पहले उन्‍हें एक जेल से भगाया गया और फिर पकड़ा गया और ऐसी जेल में डाला गया जिसमें भागना कठिन था और इससे भगा कर सफाया किया गया। यह पल्‍ले नहीं पड़ता और यह तो पड़ता ही नहीं कि यह सरकारी योजना थी और जिनसे इसे कराया गया उनको ही सस्‍पेंड कर दिया गया और उनके विरुद्ध जांच बैठा दी गई।

परन्‍तु ये सन्‍देह मेरे हैं जिसने जान बूझ कर उसका पक्ष लेने का चुनाव किया जिस पर दूसरे सभी बुद्धि-जीवी पत्‍थर मारते है और वह भी इस दावे के साथ कि मैं अकेले उसे बचाने के लिए ही नहीं, पत्‍थर मारने वालों को पक्‍का अपराधी (हार्डेंड क्रिमिनल) सिद्ध करने जा रहा हूं और अपना बचाव कर सकते हो तो करो। अभी तक मेेरे बुनियादी आरोपों तक का भी जवाब किसी ने न दिया न आशा है कि इसका देगा। जो अपने ऊपर लगे आरोपों को नकार भी न सकें उन्‍हें दूसराें को परखने और निर्णय देने का अधिकार कैसे मिल गया।

पक्षधर होने के कारण मैं उन सारे आरोपों को जो लगाए गए विचारणीय और निष्‍पक्ष जांच के दायरे में मान लेता हूं, परन्‍तु यह मानता हूं कि अपने मित्र का ही नहीं, उस बल का किसके एक एक प्रतिनिधि के पीछे पूरे संगठन की शक्ति होती है, हत्‍या करने वालों का घिर जाने पर भी ऊंचाई का लाभ उठा कर उन तक पहुंचने वालों को रोकने के लिए पत्‍थर मारना या गिराना भी घैर्य चुकने और एनकाउंटर के लिए पर्याप्‍त कारण था। इसके बाद भी यदि कोई भारत में लंबे समय से होते आए एनकाउंटरों का इतिहास नहीं जानता है और यह भूल चुका है कि सिख उग्रवादियों का सफाया करने और पंजाब में स्‍थायी शान्ति लाने के लिए जो एनकाउंटर किये गये थे वे इसकी तुलना में सैकड़ो गुना थे और उन पर हमारे बुद्धिजीवी भी चुप थे क्‍योंकि यह मुसलमानों के विरुद्ध नहीं था इसलिए लीगी नजरिए से यह उपेक्षणीय था जब कि इस एनकांउटर के साथ हिटलर और उसके गैसचैंबर से नीचे की कोई मिसाल सामने आती ही नहीं

Post – 2016-11-01

मैं जिस मार्क्‍सवाद की बात करता हू्ं उसमें मार्क्‍स कम और ऐतिहासिक और द्वन्‍द्वात्‍मक भौतिकवाद अधिक मानी रखता हैै। पश्चिम में विचारों से क्रान्ति या बड़े परिवर्तन नहीं हुए । धर्म तक का प्रचार हिंसा के बल पर हुआ। अत: वह हिंसा या शक्ति के बिना किसी परिवर्तन की बात नहीं सोच सकते थे और इसके लिए संगठन की, उसकी भूमिका की आवश्‍यकता थी। हम चाहें या न चाहें, वर्तमान अर्धसामन्‍ती और अर्धपूंजीवादी व्‍यवस्‍था जो हमारी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के मूल में है, हमे अपनी अधोगति से उबार नहीं सकती। सामन्‍ती व्‍यवस्‍था खत्‍म हो गई है, या ख्‍ात्‍म हो चली है, पर सामन्‍ती संस्‍कार अधिक मजबूत है । जातिवाद की समस्‍या भी उसी से जुड़ी है। समाजवाद का रास्‍ता पूंजीवाद से हो कर गुजरता है। उसके अपने दोष हैं परन्‍तु वह सूचना, कौशल का विस्‍तार करता है और सामन्‍ती सामाजिक ढांचे को तोड़ता नहीं, व्‍यर्थ कर देता है। पूरी दुनिया को पूंजीवाद और उसका बड़े पैमाने का उत्‍पादन संभाल नहीं सकता। पूंजीवाद को ध्‍वंसकारी सर्जनात्‍मकता कहा जाता है, पर सार्वदेशिक और सार्विक होने के बाद यह व्‍यर्थकारी उत्‍पादन के कारण ध्‍वस्‍त होने को बाध्‍य है इसलिए इसके खात्‍मे के लिए किसी कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन और उस आन्‍दोलन के लिए किसी पार्टी के गठन की आवश्‍यकता न होगी। एक व्‍यापक योजना की जरूरत होगी जो रिक्‍तता में नयी व्‍यवस्‍था कायम कर सके। उसके लिए हल्‍ला, हिंसा, नियन्‍त्रण और तानाशाही की भी जरूरत न होगी न साम्‍यवाद से पहले तानाशाही की जरूरत होगी। साम्‍यवाद स्‍वत: आएगा और यदि उसमें किन्‍हीं का संहार होगा तो उनका जो अपने को किसी काम के लिए दक्ष न बना पाएंगे। यह मेरा सोचना है। हमारे चुनने का सवाल नहीं है, जैसे मौसम को हम चुनते नहीं हैं, वह अपने तई आता है, ठीक ऐसे ही इस व्‍यर्थता के कारण साम्‍यवाद को आना है पर पूंजीवादी व्‍यर्थता के बाद।