Post – 2016-09-21

मैं कौन हूं, रहता कहां हूॅ, देश कहां है

पहले इस इलाके में खेती बहुत मुश्किल से होती थी। जमीन रेतीली है। जमुना के कछार की जब तब डूब जाने वाली। आगे पास ही चिल्‍ला स्‍पोर्ट्स काम्‍प्‍लेक्‍स है और पीछे नाले और नहर के पार चिल्‍ला गांव। चिल/सिल/जिल/ गिल, या चल/सल/जल/गल या इनके अन्‍त्‍य लकार के रकार बनने से बने चिर/सिर/जिर/गिर या चर/सर/जर/गर शब्‍दों का अर्थ होता है पानी। और आप फुर्सत में हो तो इकार की जगह उकार लगाकर जो शब्‍द बनाएंगे उसका भी एक अर्थ होता है पानी और उसके बाद तो उस ध्‍वनि या शब्‍द का किसी खाद्य, पेय, धन, आदि के लिए प्रयोग में आ सकता है, जैसे गर का गरल के लिए और गडुआ, गडुवी के लिए और गल का गलन, ग्‍लानि, गलका आदि के लिए। इसलिए यदि आप किसी गांव का नाम चिलवां सुनें तो समझ लें किसी धारा या तालाब के किनारे होगा। चिल्‍ला की भी स्थिति यही है । अनुमान लगाना चाहें तो यह समझ सकते हैं कि बहुत पुराने समय में यहां जो आदिम जन रहते या विचरते थे उनको तालब्‍य ध्‍वनियों से प्रेम था। जमुना उफान पर आती है तो समाचार आता है पानी चिल्‍ला तक पहुंच गया। गरज कि इसमें कास घास अधिक आसानी से उगती थी, खेती नाममात्र को होती थी।

इसी भूखंड का अधिग्रहण करके और विकसित करके भूमि ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों को आबंटित की गई थी जिस पर पूरे वसुन्‍धरा एन्‍क्‍लेव में बहुमंजिली इमारतों का निर्माण कुछ इस‍ तरह किया गया कि उनके बीच में एक छोटा सा टुकड़ा पार्कों के नाम पर छोड़ दिया गया और उसकी चारदीवारी से सटी इन सोसायटियों का प्‍लाट जिससे इन सभी की सीधी पहुंच उस खुली साझी जगह तक हो सकें जहां वे चहलकदमी कर और खुले में सांस ले सकें। दिल्‍ली में यह डीडीए का एक नया प्रयोग था।

जमीन जिन गूजरों की थी उनको इस इलाके के अधिग्रहण के एवज में जो धनराशि मिली उसके कारण अब वे पहले खेती, भैंस पालन और दूध का कारोबार जो कुछ भी करते थे उससे फुर्सत मिली तो वे निठल्‍लों की जमात में बदल गए। पैसा है, करने को कुछ नहीं। अधिकांश ने लालडोरा क्षेत्र में अपनी जमीन पर मजदूरों के लिए बहुमंजिले मकान बना लिए जिनके कमरे नोयडा के मजदूरों, घरों में मदद के लिए काम करने वाली महिलाओं और ड्राइवरों, चौकीदारों, बेलदारों आदि किराये पर लेकर गुजर इस गांव की आबादी को बहुगुना और बहुरूप बना दिया। किराये से होने वाली आमदनी के बाद अब न तो जीविका की चिन्‍ता रह गई न कोई योग्‍यता हासिल करने की लालसा। आश्‍चर्य कि इस इलाके में कोई पुराना स्‍कूल तक नहीं है। जो हैं वे डीडीए के अधिग्रहण के बाद के, फिर भी कुछ प्रतिशत नौजवान कुछ पढ़ लिख गए। शेष शिक्षा से विमुख परन्‍तु सोसायटियों में बसे शिक्षित मध्‍यवर्ग की जीवनशैली और अपनी पुरानी ऐंठ के बीच असमंजस में दिखाई देते हैं।

जिन्‍होंने उन पैसों को मौजमस्‍ती में उड़ा दिया वे आज भी भैंसों की सेवा करते पालते और दूध बेच कर काम चलाते हैं और उनकी कुछ महिलाएं पार्क की बढ़ी हुई घास को काट कर इसे फूस का जंगल बनने से बचाए रखने में मदद करती थी। माेअर का प्रबन्‍ध हो जाने के कारण, वे कुछ ही दिनों तक इसका लाभ उठा पाती हैं। महिलाएं घास काटने आएंगी और उसके दो तीन घंटे बाद उनके परिवार का कोई नौजवान सायकिल लिए आएगा और घास को उस पर लाद कर ले जाएगा। घास काटने का काम शायद स्त्रियों का काम माना जाता है। गूजर मूलत: मातृप्रधान रहे लगते हैं।

अशिक्षित, अल्‍पशिक्षित और सीमित आय वाले मजदूरों में अधिकांश अपना परिवार नहीं रख पाते। जो रखते हैं उनकी पत्नियॉं इन फ्लैटों में चौका बर्तन करके निर्वाह करती हैं। बच्‍चों के लिए माता पिता में किसी के पास समय नहीं होता, फिर भी प्रकृति के नियम से बच्‍चे होते हैं और वे इधर उधर भटकते हुए आपस में बहुत कुछ सीखते समझते बड़े होते हैं। इनमें कितने गायब कर दिए जाते होंगे और अंगप्रत्‍यारोपण व्‍यवसाय की जरूरतें पूरी करते होंगे इसका हिसाब किसी के पास न होगा।

दुर्भाग्‍य से हमारा पार्क दल्‍लूपुरा से अधिक निकट पड़ता यद्यपि दूरी आधे किलोमीटर की तो हो ही जाती है और बहुमिश्र आबादी का दबाव इस ऊजड़ क्षेत्र के पार्क में बदलते जाने के क्रम में हमारे पार्क पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ा। बच्‍चे इसी से हो कर स्‍कूल जाते हैं और मजदूर इसी का एक बाजू पकड़े अपने काम की जगहों को इसलिए दूसरे पार्कों के विपरीत हमारे पार्क और इससे आगे के पार्क की निजता भंग हो जाती है और ये दोनों सार्वजनिक पार्कों में बदल जाते हैं। लड़कियों की क्‍लास उसी इमारत में पूर्वान्‍ह में लगती है और लड़कों की अपरान्‍ह में इसलिए दोपहर काे इनके आने जाने के क्रम में कुछ दूसरे तरह की समस्‍यायें पैदा होती हैं जिसमें हमारे हस्‍तक्षेप की अावश्‍यकता नहीं परन्‍तु इनकी क्रीड़ा और विनोद में छोटे पौधों और फूल की क्‍यारियों की ही दुर्गत नहीं होती, कई बार इनके किल्‍लाल में पेड़ों की डालियां टूट कर गिरी मिलती हैं।

इन सोसायटियों का चरित्र उन क्षेत्रों और दूसरी सोसायटियों से अलग है जिनका मुझे अब तक अनुभव है। इनकी प्र‍कृति सार्वदेशिक है। मेरी अपनी सोसायटी में हिन्‍दू, मुसलिम, ईसाई, कश्‍मीरी, उत्‍तरांचली, बंगाली, असमी, ओडि़या, मद्रासी, मलयाली, मराठी, पंजाबी, हरयाणवी, पश्चिमी और पूर्वी उत्‍तरप्रदेशी, बिहारी पृष्‍ठभूमि के लोग रहते हैं। घरेलू सेवा में लगी महिलाओं में पहले कुछ बांग्‍लादेशी भी हुआ करती थीं।

मैं भारत में नहीं रहता हूं। इतने बड़े क्षेत्र में रह भी नहीं सकता। वह संकल्‍पना के रूप में मेरा देश है, पर मैं भारत के उस छोटे से हिस्‍से में रहता हूँ जिसकी सामाजिक संरचना यह है और ठीक यही स्थिति आप सभी की होगी। पुराने जमाने में देश का एक अर्थ अपना विशिष्‍ट क्षेत्र हुआ करता था और उसकी कुछ उदार परिभाषा करें तो मेरी सोसायटी में दर्जनों देशों के लोग बसे हुए हैं। इनसे ही बने अपने छोटे से सामाजिक परिवेश में या नवनिर्मित देश में मैं रहता हूं और आसन्‍न रूप में इसकी स्थिति से चिन्तित रहता हूँ।

हमारे बच्‍चों को कैसे रहना है कि वे सुरक्षित रहें, बिगड़ने न पाएं, उनको कोई क्‍लेश न हो यह मुझे तय करना होगा, उन चैनेलों को नहीं जो विज्ञापनजगत के पैसे पर पलते और उनके सिखाए हुए मुहावरे बोलते और शोर मचाते हुए जिसके जी में जो आए वह करे वाली आजादी का प्रचार करते हैं और इनकी इस मनमानी के कारण उनके सामने आने वाली आपदाओं के लिए पुलिस को उत्‍तरदायी मानते हैं। यदि पुलिस इस मनमानी को सामाजिक हित में न पाकर उसे नियंत्रित करती है तो इसे मारल पोलिसिंग कह कर उसका विरोध ही नहीं करते हैं अपितु इतनी हुड़दंग मचाते हैं कि सुधारात्‍मक कदम उठाने वाले अधिकारी या कर्मचारी को दंडित होना पड़े। मनमानी करने को सभी स्‍वतंत्र हैं परन्‍तु उनके परिणामों के लिए पुलिस उत्‍तरदायी है जिसे उस मनमानी को नियन्त्रित करने का अधिकार नहीं। माता पिता को स्‍वयं अपने बच्‍चों की मनमानी को रोकने का अधिकार नहीं। ये निर्वात में कल्पित समाज की समस्‍याओं के निर्वात में तैयार किए हुए समाधान हैं जिनको यथार्थ सापेक्ष्‍य बनाया जाना चाहिए। जो भी हो, हमारे लिए ही बना यह भीतरी पार्क है, पर जब तक दललूपुरा के खिलाडि़यों का हुड़दंग था, तब तक इसको घेर कर बनी सोसायटियों में से किसी के बच्‍चे या महिलाएं पार्क में नहीं आती थीं। आते थे कुछ बुढ़भस रिटायर्ड लोग जिनकी जमात का मैं भी था। जब हुड़दंग थमी तो एक एक कर सभी के कुछ बच्‍चे, महिलाएं, यहां तक कि हिजाबबन्‍द महिलाएं भी, टहलने घूमने के लिए आने लगीं और फिर जिस तरह का मोड़ आया था उसमें उनको कुछ परेशानी अनुभव होने लगी इसकी चर्चा हम प्रयोग – 11 में करेंगे जिसकी यह पृष्‍ठभूमि है।

हमारे समाचार और विचार माध्‍यम,यदि कोई संस्‍था वेश और व्‍यवहार की कोई मर्यादा तय करे तो उसे तालिबानी बताते हैं, परन्‍तु यही बातें यदि हिन्‍दू से इतर कोई संस्‍था या संगठन करे तो उस पर चुप लगा जाते हैं। एेसा कहने वाले हिन्‍दू हित का दावा करने वाले संगठनों में भी मिल जाएंगे कि यह देश विभाजित होने के बाद हिन्‍दू देश उसी न्‍याय से बन गया जिसमें मुसलमानों ने इस आधार पर कि वे हिन्‍दुओं के साथ शान्ति से नहीं रह सकते हैं इसका विभाजन किया, भले वे उस देश में गए या नहीं। मैं ऐसा दावा करने वालों के तर्क को तो मानता हूं पर जो कुछ भी तार्किक है वह सदा न्‍याय्य भी होता है, इससे सहमत नहीं हो पाता। हम सभी गलतियां करते हैं, और बहकावों के शिकार होते हैं और लगभग सभी ने बहुत अक्षम्‍य गलतियां कीं इसे समझने के बाद मैं मानता हूं जो भी जिस देश में रहता है वही उसका देश है।

परन्‍तु जब हमारे समाचार और विचार माध्‍यम, हमारे मुखर बुद्धिजीवी केवल हिन्‍दू समाज, हिन्‍दू संगठनों, हिन्‍दू मान्‍यताओं, हिन्‍दू ग्रंथों, हिन्‍दू रीतियों के प्रति ही चिन्‍ता प्रकट करते हैं और यह अपेक्षा करते हैं कि हिन्‍दू यदि ऐसा करता है तो उसे दंडित किया जाना चाहिए और शेष पर चुप रहते हैं तो क्‍या वे स्‍वयं चीख चीख कर यह नहीं कहते कि यह हिन्‍दू देश है। वे क्‍या उन पिछड़ी या अवरुद्ध चेतना के लोगों का समर्थन नहीं करते जिनका विरोध करने के नाम पर उनका कारोबार चलता है ।

क्‍या वे व्‍यंजना में यह नहीं कहते कि दूसरे समुदाय भाड़ में जायं, हम हिन्‍दुओं को मानवीय आदर्शों के अनुसार बचाने की चिन्‍ता करेंगे। नहीं, वे कुछ नहीं कहते, क्‍योंकि वे जानते ही नहीं कि वे किसके पढाए सिखाए के अनुसार कुछ बकते रहते हैं परन्‍तु पूरे समाज पर उसका क्‍या असर होगा इसकी ओर उन्‍होंने कभी ध्‍यान ही न दिया।

Post – 2016-09-20

वह दिल अपना नहीं था फिर भी था तो
किसी का हो गया था फिर भी था तो।
किसी ने पोस दी तो उसको लपका
जमीर अपनी गंवां कर फिर भी था तो ।

Post – 2016-09-20

यदि तुम्‍हें लगे कि ‘भविष्‍य का रास्‍ता इतिहास से हो कर गुजरता है’ एक वाग्‍वृत्ति है तो देखो, आधुनिक विज्ञान की नवीनतम खोजों का आलोक उस विश्‍वब्रह्मांड के आदि और विकास की पहेली को समझने के प्रयत्‍नों से मिल रहा है और इस ऊहापोह से हमारे चिन्‍तक ऋग्‍वेद के समय में गुजर रहे थे – नासदीय सूक्‍त। यह नहीं कहूंगा कि उनकी सोच आज की खोज के कितना निकट है, परन्‍तु मैं अपनी कृतियों में कई बार कई तरह से यह प्रमाणित कर चुका हूं कि ऋग्‍वेद के ओजस्‍वी दौर में भारत जिस ऊंचाई पर पहुंच चुका था उस तक फिर कभी नहीं पहुंचा और इसका कारण हमारा वर्णविभाजन और योग्‍यताओं और अभिरुचियों का सीमांकन और उससे बाहर की प्रतिभाओं के योगदान का निषेध था। इसलिए यदि भारत को पुन: अपने उत्‍कर्ष पर पहुंचना है तो सभी को इस दिशा में प्राणपण से अवर्ण समाज के निर्माण के लिए प्रयत्‍न करना चाहिए और जो ऐसा किसी कारण से न कर सके उसे राष्‍ट्रनिष्‍ठा से शून्‍य और आज का अन्‍त्‍यज मानना चाहिए। इसमें ऐसे दलित भी आ सकते हैं जो तात्‍कालिक और तुच्‍छ लाभ के लिए वर्णवाद को जारी रखना चाहते हैं और अपने ही समाज के वंचितों और पिछड़ों से विश्‍वासघात करते हैं साथ ही पुरातनपंन्‍थी ब्राह्मण भी जो अपने खोखले और स्‍वपोषित दंभ के कारण इसके महत्‍व को समझ नहीं पाते। दलित, अस्‍पृश्‍य और ब्राह्मण कभी एक दूसरे के इतने हमराज, हमदम और हमसुखन कभी न रहे होंगे जितने आज हैं। जो इसे नहीं समझता वह भारतीय यथार्थ और यथार्थवाद को नहीं समझ सकता पर बुद्धिजीवी का हंटर फिर भी पकड़े रहेगा।

Post – 2016-09-20

जो इतिहास भूल जाते हैं वे बदहवास हो जाते हैं। जो इतिहास गढ़ते हैं वे समाज को नशेड़ी बनाते हैं। जो सही इतिहास लिखते हैं वे वर्तमान की नीव रखते हैं। जो इतिहास की खोज करते हैं वे भविष्‍य का निर्माण करते हैं। भविष्‍य का रास्‍ता इतिहास से हो कर गुजरता है।

Post – 2016-09-20

प्रयोग 10
समस्‍या और समाधान का सहअस्तित्‍व

हम पहले की बता चुके हैं कि पार्क का आकार इतना छोटा कि किसी के जी में आये तो उठा कर अपनी जेब में रख ले और फिर भी यह एक छोटामोटा जंगल है। अभी अपने पूरे उरूज पर नहीं आया है। जब आएगा तो अन्‍धेरगर्दी किसे कहते हैं, इसे समझने के लिए लोग यहॉं आया करेंगे।

पिलखल अर्थात् पकड़ी के तेरह पेड
कदंब का एक
बरगद के दस बारह
सप्‍तपर्णी के पांच
अर्जुन के छह पेड़,
शीशम के दो
सहजन का एक
नीम का एक
अमलतास के सात आठ
कीकर का एक वृहदाकार पेड़ सबसे ऊंचा
पीपल के पांच
गुलमुहर के पांच
जामुन का एक
इसके अलावा पन्‍द्रह बीस पेड़ एक ऐसे जिनके फल तो छोटे आकार के रुद्राक्ष जैसे और जिसके पुष्‍पगुच्‍छ स्‍तवक की कुछ इंच से लेकर एक फुट सवा फुट तक लंबे नुकीले, जिसका पौधा मझोले कद का होता है पर दुर्भाग्‍य कि उसका ही नाम याद नहीं, संख्‍या तेरह चौदह पन्‍द्रह
मौलिश्री सहित फाइकस के तीस पौधे
फुटपाथ किनारे पेंडुलस के बीसेक पौधे
मैं यह गिनती यादों के सहारे दे रहा हूं इसलिए कुछ छूट गया भी हो सकता है पर इसमें कुछ घट नहीं सकता।
इतने सारे पौधों के होने से चार समस्‍यायें एक साथ पैदा होती हैं। पर हम केवल पहली की बात यहां करेंगे, शेष का आगे।
पतझड़ के कारण गिरी हुई पत्तियों का जमाव होता वह पानी की फुहार और बच्‍चों की उछल कूद से दब तो जाता, फिर भी टीला बन जाता। कई बार हटा भी लिया जाता। विनोद कुमार के काउंसलर रहते और इसकी उपयो‍गिता समझते उसे हटाने की ओर ध्‍यान भी दिया जाता। इसके लिए उन्‍होंने कहने पर अपने कांउसलर निधि से बुग्गियों का प्रबन्‍ध किया था।
फिर भी इतना बचा रह जाता कि साल में एक दाे बार आग पकड़ ही लेती और वह जलती तो दावाग्नि का खतरा पैदा हो जाता। कुशल यह कि दो तीन पेड़ों का एक हिस्‍सा जला पर शेष बचा रहा। कारण ऊपरी पर्त जलने के बाद लपट कम हो कर धुँए में बदल जाती और हफ्ते दस दिन तक सुलगती रहती। इसे मूसलाधार बरसात भी शान्‍त न कर पाती। प्रयोग – 10
आग लगती है तो बढ़ने दो बुझाते क्‍यों हो
जलने का एेसा

हम पहले की बता चुके हैं कि पार्क का आकार इतना छोटा कि किसी के जी में आये तो उठा कर अपनी जेब में रख ले और फिर भी यह एक छोटामोटा जंगल है। अभी अपने पूरे उरूज पर नहीं आया है। जब आएगा तो अन्‍धेरगर्दी किसे कहते हैं, इसे समझने के लिए लोग यहॉं आया करेंगे।

पिलखल अर्थात् पकड़ी के तेरह पेड
कदंब का एक
बरगद के दस बारह
सप्‍तपर्णी के पांच
अर्जुन के छह पेड़,
शीशम के दो
सहजन का एक
नीम का एक
अमलतास के सात आठ
कीकर का एक वृहदाकार पेड़ सबसे ऊंचा
पीपल के पांच
गुलमुहर के पांच
जामुन का एक
इसके अलावा पन्‍द्रह बीस पेड़ एक ऐसे जिनके फल तो छोटे आकार के रुद्राक्ष जैसे और जिसके पुष्‍पगुच्‍छ स्‍तवक की कुछ इंच से लेकर एक फुट सवा फुट तक लंबे नुकीले, जिसका पौधा मझोले कद का होता है पर दुर्भाग्‍य कि उसका ही नाम याद नहीं, संख्‍या तेरह चौदह पन्‍द्रह
मौलिश्री सहित फाइकस के तीस पौधे
फुटपाथ किनारे पेंडुलस के बीसेक पौधे
मैं यह गिनती यादों के सहारे दे रहा हूं इसलिए कुछ छूट गया भी हो सकता है पर इसमें कुछ घट नहीं सकता।
इतने सारे पौधों के होने से चार समस्‍यायें एक साथ पैदा होती हैं। पर हम केवल पहली की बात यहां करेंगे, शेष का आगे।
पतझड़ के कारण गिरी हुई पत्तियों का जमाव होता वह पानी की फुहार और बच्‍चों की उछल कूद से दब तो जाता, फिर भी टीला बन जाता। कई बार हटा भी लिया जाता। विनोद कुमार के काउंसलर रहते और इसकी उपयो‍गिता समझते उसे हटाने की ओर ध्‍यान भी दिया जाता। इसके लिए उन्‍होंने कहने पर अपने कांउसलर निधि से बुग्गियों का प्रबन्‍ध किया था।
फिर भी इतना बचा रह जाता कि साल में एक दाे बार आग पकड़ ही लेती और वह जलती तो दावाग्नि का खतरा पैदा हो जाता। कुशल यह कि दो तीन पेड़ों का एक हिस्‍सा जला पर शेष बचा रहा। कारण ऊपरी पर्त जलने के बाद लपट कम हो कर धुँए में बदल जाती और हफ्ते दस दिन तक सुलगती रहती। इसे मूसलाधार बरसात भी शान्‍त न कर पाती।
आक्‍सीजन की तलब, इस छोटे से कोने को पार्क से जंगल बनाने की जिद कि इससे दावाग्नि की नौबत आ जाय, और कुछ दिनों के लिए यह कार्बन आक्‍साइड का स्रोत बन जाय!
मैं यदि अपने तई संतुष्‍ट होता कि इसमें अपराध किसका है, पेड़ों का, या पत्तियों का, या मौसम का या माली का या जगह की कमी का तो उसके विरुद्ध कुछ करता
या कुछ न होता तो ग्रीन ट्रिब्युनल को ही शिकायत करता । दोष व्‍यवस्‍था था जिसके पास पार्क की सफाई और उसके निपटान का कोई इन्‍तजाम न था। मैंने उससे अनुरोध किया कि कंपोस्‍ट तैयार करने के लिए एक गड्ढा ऐसी खुली जगह में बनाया जाय जो ट्रैक से दूर हो और जिसके ऊपर पेड़ न लटके हो। खुली जगह में यह देखने में भदद्यदा लगेगा इस‍े सुंदर बनाने के लिए इसके चारों ओर तीन फुट ऊंचा घेरा बनाया जाय जिससे भूल चूक से भी कोई बच्‍चा उसमें गिर न जाय। उस चारदीवार के साथ एेसे पौधों की फेंस लगाई जाए कि उनकी हरियाली भीतर की कुरूपता को ढक दे।
प्रस्‍ताव पसन्‍द किया गया पर हुआ यह कि जहॉं पहले अग्निकांड होते थे वहीं, एक गड्ढा खोद दिया गया और समस्‍या अपनी जगह बनी रह गई।

Post – 2016-09-20

प्रयोग 10
समस्‍या और समाधान का सहअस्तित्‍व

हम पहले की बता चुके हैं कि पार्क का आकार इतना छोटा कि किसी के जी में आये तो उठा कर अपनी जेब में रख ले और फिर भी यह एक छोटामोटा जंगल है। अभी अपने पूरे उरूज पर नहीं आया है। जब आएगा तो अन्‍धेरगर्दी किसे कहते हैं, इसे समझने के लिए लोग यहॉं आया करेंगे।

पिलखल अर्थात् पकड़ी के तेरह पेड
कदंब का एक
बरगद के दस बारह
सप्‍तपर्णी के पांच
अर्जुन के छह पेड़,
शीशम के दो
सहजन का एक
नीम का एक
अमलतास के सात आठ
कीकर का एक वृहदाकार पेड़ सबसे ऊंचा
पीपल के पांच
गुलमुहर के पांच
जामुन का एक
इसके अलावा पन्‍द्रह बीस पेड़ एक ऐसे जिनके फल तो छोटे आकार के रुद्राक्ष जैसे और जिसके पुष्‍पगुच्‍छ स्‍तवक की कुछ इंच से लेकर एक फुट सवा फुट तक लंबे नुकीले, जिसका पौधा मझोले कद का होता है पर दुर्भाग्‍य कि उसका ही नाम याद नहीं, संख्‍या तेरह चौदह पन्‍द्रह
मौलिश्री सहित फाइकस के तीस पौधे
फुटपाथ किनारे पेंडुलस के बीसेक पौधे
मैं यह गिनती यादों के सहारे दे रहा हूं इसलिए कुछ छूट गया भी हो सकता है पर इसमें कुछ घट नहीं सकता।
इतने सारे पौधों के होने से चार समस्‍यायें एक साथ पैदा होती हैं। पर हम केवल पहली की बात यहां करेंगे, शेष का आगे।
पतझड़ के कारण गिरी हुई पत्तियों का जमाव होता वह पानी की फुहार और बच्‍चों की उछल कूद से दब तो जाता, फिर भी टीला बन जाता। कई बार हटा भी लिया जाता। विनोद कुमार के काउंसलर रहते और इसकी उपयो‍गिता समझते उसे हटाने की ओर ध्‍यान भी दिया जाता। इसके लिए उन्‍होंने कहने पर अपने कांउसलर निधि से बुग्गियों का प्रबन्‍ध किया था।
फिर भी इतना बचा रह जाता कि साल में एक दाे बार आग पकड़ ही लेती और वह जलती तो दावाग्नि का खतरा पैदा हो जाता। कुशल यह कि दो तीन पेड़ों का एक हिस्‍सा जला पर शेष बचा रहा। कारण ऊपरी पर्त जलने के बाद लपट कम हो कर धुँए में बदल जाती और हफ्ते दस दिन तक सुलगती रहती। इसे मूसलाधार बरसात भी शान्‍त न कर पाती।

आक्‍सीजन की तलब, इस छोटे से कोने को पार्क से जंगल बनाने की जिद कि इससे दावाग्नि की नौबत आ जाय, और कुछ दिनों के लिए यह कार्बन आक्‍साइड का स्रोत बन जाय!

मैं यदि अपने तई संतुष्‍ट होता कि इसमें अपराध किसका है, पेड़ों का, या पत्तियों का, या मौसम का या माली का या जगह की कमी का तो उसके विरुद्ध कुछ करता
या कुछ न होता तो ग्रीन ट्रिब्युनल को ही शिकायत करता । दोष व्‍यवस्‍था था जिसके पास पार्क की सफाई और उसके निपटान का कोई इन्‍तजाम न था। मैंने उससे अनुरोध किया कि कंपोस्‍ट तैयार करने के लिए एक गड्ढा ऐसी खुली जगह में बनाया जाय जो ट्रैक से दूर हो और जिसके ऊपर पेड़ न लटके हो। खुली जगह में यह देखने में भदद्यदा लगेगा इस‍े सुंदर बनाने के लिए इसके चारों ओर तीन फुट ऊंचा घेरा बनाया जाय जिससे भूल चूक से भी कोई बच्‍चा उसमें गिर न जाय। उस चारदीवार के साथ एेसे पौधों की फेंस लगाई जाए कि उनकी हरियाली भीतर की कुरूपता को ढक दे।

प्रस्‍ताव पसन्‍द किया गया पर हुआ यह कि जहॉं पहले अग्निकांड होते थे वहीं, एक गड्ढा खोद दिया गया और समस्‍या अपनी जगह बनी रह गई।

Post – 2016-09-19

इस शोर के बाहर हो और भीतर भी तुम्‍हीं हो
हर ओर हो हर जिन्‍स के भीतर भी तुम्‍हीें हो
फितरत है तुम्‍हारी इसे सब जान चुके है
खोदी थी कब्र, कब्र के भीतर भी तुम्‍हीं हो।
जो गर्द है ऊपर उसे झाड़ो तो उठोगे
उस गर्द के बाहर भी और भीतर भी तुम्‍हीं हो।
मरने का पता है नहीं पर फैलने की चाह
हर इस सड़ांध गन्‍ध के भीतर भी तुम्‍ही हो।
##
भगवान तुझे क्‍या हुआ तू खुद ही रो पड़ा
मैंने तो जमाने की शिकायत भी न की थी।
21.9.16 : 15:47gा

Post – 2016-09-19

To,
Director Horticulture
NDMC, East, Kadkad Duma
Delhi- 10032

Sub: Irresponsibility and mischief of the gardeners and sorry state of the park behind City Apartments, Vasundhara Enclave, Delhi.

Dear sir,
Ours is a very small park approximating 2 acres surrounded/approached by some eleven densely populated high-rise column societies, visited in addition by workforce and settlers of Dallupura and strangers with an element of nuisance. Earlier there was one gardener namely Balkishan who was handicapped by necessary tools and equippments, but yet the maintenance was not as hopeless as now as a result of posting of notorious hands as gardeners who either do not work or work contrary to the interests of the park.
There have been frequent burning of leaves piled under trees that scorched four trees in a go. We had requested for a compost pit to be dug at safe distance from the trees to check the frequency of such occurrence, which was heeded to, but the pit was dug at the same location. Any way the pit cannot collect the leaves if the same is thrown recklessly around the pit resulting into conflagration as witnessed recently, due to reckless passing smokers.
… We do not want any recurrence of the pile burning. We request that timely irrigation, weeding out, sweeping and cleaning, pruning and mowing be ensured. If things are not in your control there is yet time for you to reconsider the request for adoption of the park by elected body of the citizens as proposed initially by Dy. Commissioner, in his absolute wisdom after he was apprised of the specific nature of the problems with regard to this park, at the time of his personal visit some five years back, which was flouted by those who have other interests than proper maintenance of the parks. We want action.
Thanking you,
Representatives of the beneficiaries of the park

Copy to the Dy Commissioner, MCD, East, Delhi- 110032
15-9-2015

Post – 2016-09-19

दिल तो छोटा था, न इतना कि मुहल्‍ला न बसे
मारने वालों, जिलाने की फिकर वालों का
खोटी किस्मत थी, न इतनी कि तुम्‍हें पा न सकूं
दिल जले, जलता रहे, तुम पर मरने वालों का।
उम्र थोड़ी थी, न इतनी कि गिला कर न सकूं
जख्‍म गहरा था, अधिक कुछ है देने वालों का।
ऐ मेरे दोस्‍त तुम्‍हें पा के भी अपना न सका
था करिश्‍मा हमें बर्वाद करने वालों का ।
तुमने पूछा कि तुम्‍हें प्‍यार किया था कि नहीं
जवाब था न मेरे पास इन सवालों का।
चलो भगवान से लें राय, सही था क्‍या जवाब
‘जिन्‍दगी पर तो है अधिकार मरने वालों का।’

Post – 2016-09-18

कुछ और प्रयोग

समस्‍यायें होती नहीं हैं, पैदा होती रहती हैं

समस्‍यायें कभी पूरी तरह नहीं सुलझतीं। एक को सुलझाओ तो उसी से दूसरी प्रकट हो जाती है,या पैदा हो जाती हैं इसलिए कोई ऐसा सुखद दिन न आएगा जब हम उनसे मुक्‍त हो जायँ। प्रलय से पहले आदमी समस्‍या से निजात नहीं पा सकता । सो राेइये जार जार क्‍या कीजिए हाय हाय क्‍यों । वे भौतिक हों या सामाजिक, उनको सुलझाने में जुटे हुए लोगों को हाय हाय करने की न जरूरत होती है न फुरसत। उनके फैसलों में अपने हाय तौबा से बाधा पहुँचाने से अधिक सही है उनकी देशनिष्‍ठा, कार्यनिष्‍ठा और निर्णयशक्ति पर हमें भरोसा है। यह बात उन पर लागू नहीं होती जिनके लिए कभी प्रदीप ने कहा था, ‘संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से’ जिनकी राष्‍ट्रनिष्‍ठा सदा से सन्दिग्‍ध रही है, और इसे वे फासिज्‍म का पर्याय बता कर दूसरों के सद्विश्‍वास को भी कम करते रहे हैं। वे आज भी वही कर रहे हैं। कई बार समस्‍याओं का चरित्र दुहरा होता, आफत लगने वाली स्थिति भी प्रगति या नयी संभावना का संकेत बन कर आती है । आप जो काम सबसे अच्‍छी तरह कर सकते हैं वह ईमानदारी से करें, और दूसरों के एेसे काम का समर्थन करे, इसी का नाम राष्‍ट्रभक्ति है। अत:

प्रयोग-7
वे तोड़ते कुछ नहीं, बस टूट जाता है

राह चलने के शऊर की दूसरी परख भी किसी पार्क में ही हो सकती है, खास कर हमारे पार्क में जहां वाकवे से सटे फूलों के पौदे लगे हुए थे। लोग, खास करके नौजवान, चले आ रहे हैं, आपस में बात करते या अकेले दुकेले। उनका हाथ अपने आप बढ़ जाता है, वह एक दो पत्तियां तोड़ लेता है कुछ देर मसलता रहता फिर हाथ उुगलियॉं अलग हो जाती हैं, वह नीचे गिर जाता है और अगले पौधे के निकट पहुंचने तक खाली रहता है और फिर वही क्रिया। आप पूछें यह क्‍या करते हैं आप ? वह चौंक कर आपको देखने लगेगा, ”मैने क्‍या किया? मैंने तो कुछ किया ही नहीं ।”

वह सचमुच नहीं जानता कि उसने कुछ किया है, इस ओर उसका ध्‍यान ही नहीं था। आदत। रिफलेक्‍स ऐक्‍शन। अब उसे पीछे टूट कर गिरी हुई पत्‍ती को दिखाइये तो घबरा कर अपना सर पीट लेगा, ”अरे।” शर्म से कहेगा, ”अब आगे से ऐसा नहीं करूँगा। ” यह चलती राह कुछ न कुछ तोड़ते छेड़ते, इस विषय में सचेत हुए बिना कि वे किसी चीज को बर्वाद कर रहे हैं, बर्वाद करते हुए, चलने वालों की यह मात्र एक कोटि है जिसके कारण फूलों के फूलों और कलियों की जो गत होती थी वह तो आप देख ही चुके हैं परन्‍तु उनकी पत्तियों का जो हाल होता है वह उससे भी दर्दनाक होता उनके डंठल दीखते, पत्तियॉं आधी फटी या टूटी नहीं तो टहनी पर अपने होने का निशान छोड़ कर गायब । टहनियॉं टूटी हुई, लटकी हुई, सूखती हुई।

एक अलग कोटि उनकी जिनको पत्‍ते तोड़ना आकर्षक लगता था। इसका पता कुछ देर से चला। यह बच्‍चों के मामले मे होता, वे अड़हुल की पत्‍ती तोड़ कर हथेली पर रखते और दूसरे हाथ से उस पर मारते तो पटाखे जैसी आवाज होती ।

डांटने, समझाने, लज्जित करने और हल्‍के दंडित करने के कई तरीके अपनाने पड़े। एक सज्‍जन ने अपने घर में मेरा जिक्र किया तो उनकी पुत्रबधू ने जानना चाहा क्‍या वही जो किसी को पत्‍ती तक तोड़ने नहीं देते हैं। शायद यह कुछ के लिए यह मेरी पहचान बन गया था। दंड की बात यह कि पत्‍ती तोडने के बाद कोई लड़का सामने पड़ जाता या दीख जाता तो बुला लेता और कहता, जाओ, दो पत्तियो हमारे लिए भी तोड़ कर लाओ, मैं भी इसी तरह फेंकूंगा।

कई बार वे लौट भी पड़ते फिर समझ में बात आती तो हाथ जोड़ लेते, ‘आगे से नहीं करूंगा।’ उनमें कितनो को यह प्रतिज्ञा याद रहती यह तो नहीं कह सकता, परन्‍तु अब आपको उन पर पत्तियां साबित दिखाई देंगी। चोरी से एक पत्‍ती तोड़ कर पटाखा बजाने वाले इक्‍के दुक्‍के फिर भी मिल जाएंगे।

प्रयोग – 8
गालियॉं आत्‍मीयता प्रकट करती हैं

यदि कोई युवा बंगाली है और ”शाला” अर्थात् साला का प्रयोग विरामचिन्‍हों के रूप में नहीं करता तो उसको दूसरा कोई बंगाली मान भी ले पर बंगाली उसे बंगाली मानने को तैयार ही नहीं होते। जिसे वह इस संबंधसूचक से संबोधित करता है वह भी यदि इसका प्रयोग न हो तो उसकी आत्‍मीयता पर शक करने लगता है।

यह जो बहन की गाली है इसका तो इतिहास भी बहुत पुराना है, पूषा की तो ऋग्‍वेद में बहन का यार कह कर कई बार खिल्‍ली उड़ाई गई है – स्वसुर्याे जार उच्यते ; स्वसुर्जारः षृणोतु नः। प्रकृति का वर्णन करते हुए कवि क्रीड़ाभाव से कई बार ऐसी चुहल करते हैं। दिन के पीछे रात पड़ी है, दोनों एक ही कालदेव की सन्‍तानें यम और यमी हैं । रात दिन के साथ होने की बेताबी में लगातार उसका पीछा कर रही है, और यम कहता है, यह उचित नहीं है, पर आने वाले युगों में इसका भी लिहाज न रह जायेगा – आ घा ते गच्‍छन् उत्‍तरा युगानि यत्र जामय कृण्‍वन्‍नजामि ।

जहॉं इनसेस्‍ट की अवधारणाएं काम करती हैं वहां वर्जित संबंधों को ले कर संवेदनाएं अधिक प्रखर होती हैं। ऐसी गालियों का मनोविज्ञान यही है । किसी का भी इनसे मर्माहत होना स्‍वाभाविक है, परन्‍तु कुछ जनों या सभ्‍यता और शिक्षा से बंचित स्‍तरों पर इनका खुल कर प्रयोग होता है। गालियां देने वालों के बारे में हमारे मन में तिरस्‍कार भाव पैदा होता है इसलिए गालियां देने वाला अपनी आदत के कारण अनिवार्य रूप में अपमानित हाेता है, गाली जिसे दी जाती है उसे अक्‍सर पता भी नहीं चलता और उस पर असर भी नहीं पड़ता।

परन्‍तु अपने कथन को अधिक मार्मिक, अधिक वेधक बनाने के लिए भी
गालियों का प्रयोग किया जाता है, और शौर्य या समझ की कमी के लिए भी ऐसे पूर्वपद लगाए जाते हैं अश्‍लील होते हैं।

परन्‍तु कुछ समाजों या स्‍तरों पर भाषा इन गुप्‍त अंगों और क्रियाओं का प्रयोग विरामचिन्‍हों के रूप में अपना जीवट दिखाने के लिए धड़ल्‍ले के साथ किया जाता है। किसानी पृष्‍ठभूमि से आए गूजरों के साथ यही है। उनके ही बच्‍चे पार्क के एक ट्रैक से हो कर अपने स्‍कूल के लिए आते जाते थे और ऊंची आवाज में बातें करते और विरामचिन्‍हों का प्रयोग करते गुजरते । उनका जत्‍था होता। जिस लड़के के मुंह तेरी मां बहन वाली उक्ति निकली उसे एक दो सेकंड के बाद मैंने पास बुलाया। पूछा ‘क्‍या तुम लोग अपनी मां बहन के साथ यही करते हो जो अभी कह रहे थे। बारी बारी से तुम लोग आपस में यही करते हो और किसी को बुरा तक नहीं ?’

उसने कान पकड़ा, ‘आगे से नहीं।’

वह लौटा तो उसके साथियों ने पूछा क्‍या बात हुई तो सुन कर सभी सकपका गए । पर मुझसे दूर, गेट के पास पहुंच कर ऊंची आवाज में मुझे सुनाते हुए एक दूसरे को वही गालियॉं देने लगे। मैं निराश नहीं था। जानता था बात सही निशाने पर पहुंची है। यह अहंकार कि किसी के समझाने से हम मानने वाले नहीं, उन्‍हें यह दिखाने को प्रेरित कर रहा है, कि हम तो नहीं छोड़ते अपनी आदत। क्‍या कर लोगे।’ पर अगले दिन से गालियों में कमी आने लगी । मुझे देखते, मुंह में आई गाली झटके से रोक लेते। धीरे धीर उनकी यह आदत छूट गई। दुबारा याद भी दिलाना नहीं पड़ा।

प्रयोग – 9
समाधान समस्‍या का जनक है

अब तक हमारे यहां कुछ लोगों ने पार्क के रखरखाव के लिए एक कार्यकारिणी भी बना ली थी। उसके इतिहास में जाने का यह स्‍थान नहीं, परन्‍तु उनके सहयोग काउंसलर विनोद कुमार विनी की सक्रियता से ट्रैक पर टाइल लग गया था, बेचों के लिए चबूतरे बन गए थे और उनकी संख्‍या में भी वृद्धि हो गई थी।

इस बीच एक और विकास हो गया था। पार्क से दो सौ गज की दूरी पर अग्रसेन कालेज चालू हो गया था और उसके छात्रों छात्राओं में से कुछ को अपनी क्‍लास से अधिक आकर्षक यह पार्क लगने लगा था और उन्‍होंने इसमें अड्डा जमाना आरंभ कर दिया। उनके आगमन का समय टहलने वालों के बाद आरंभ होता और शाम की हवाखोरी से पहले समाप्‍त हो जाता इसलिए टहलने घूमने वालों को उनसे अधिक शिकायत नहीं थी। उनकी चंचलता भी सामान्‍य चंचलता के दायरे मे ही आती थी। उनमें दम लगाने वालों का भी एक दल था जो आ कर एक खास कोने में बैठते।

जाड़े के दिनों में मैं सामान्‍यत: स्‍माग से बचने के लिए नव बजे निकलता और यथानियम एक दो घंटे बिताता, इसलिए टहलते समय उस कोने पर पहुंच कर उनकी क्‍लास लेने खड़ा हो गया। हस्‍तक्षेप करते हुए मेरा हमेशा, अन्‍त:करण से यह भाव होता कि ये हमारे ही बच्‍चे हैं, या हम जैसे परिवारों के ही बच्‍चे हैं। मैंने बढ़ते हुए पोल्‍यूशन से भीतर पहुंचने वाली गैसों के कारण उत्‍पन्‍न परेशानियों के बीच ऊपर से इस लत से होने वाली समस्‍या, बाद में इस आदत को छोड़ना कितना कठिन हो सकता है यह अपने उदाहरण से समझाते हुए जिसका वे अभी अनुमान तक नहीं लगा सकते थे, दुखी मन से सिगरेट पीने से बरता और अनुरोध किया कि वे स्‍वयं भी इसे समझें, अपने दोस्‍तों में भी इस विषय में चेतना फैलाएँ अौर अन्‍त में यह याद दिलाया कि सार्वजनिक स्‍थान पर धूम्रपान तो दंडनीय अपराध भी है।

उनको सिगरेट बुझानी पड़ी, विश्‍वास दिलाना पड़ा कि आगे से ऐसा नहीं करेंगे । पर मैं जानता था आदतें न इतनी आसानी से जाती हैं, न नुकसान के डर से समझदार से समझदार आदमी ने कभी कोई शिक्षा ग्रहण की है। चर्चिल तो चेन स्‍मोकर था। एक बार किसी डाक्‍टर ने बताया कि एक सिगरेट या सिगार पीने के जिन्‍दगी कितने मिनट कम हो जाती है तो चर्चिल ने हिसाब लगा कर कहा, यदि ऐसा है तो मुझे पैदा होने से इतने दिन पहले ही मर जाना चाहिए था। आदत अक्‍ल पर भारी पड़ती है और कुलत तो उससे भी दूनी भारी पड़ती है।

परन्‍तु इस समझाने के बाद कहीं होई सिगरेट लिए घुसता दीखता या दूर से ही आभास हो जाता कि वहां बैठा काेई सिगरेट पी रहा था मैं उसे पार्क से बाहर निकल जाने को कहता। मेरा दोस्‍त साथ होता तो डर जाता । उतने मुस्‍तंड है, उनसे झगड़ा करोगे। मैं उत्तर न देता, जो करना होता वही करता। और एक बार भी न तो उन्‍होंने मुझे चुनौती दी कि वे तो पिएंगे, आप को जो करना हो कर लो, न निकाल जाने पर उलट कर जवाब दिया। केवल एक बार एक लड़का अड़ गया, वे दो तीन थे मैं अकेला, ‘मैं तो नहीं फेंकता।’

मेरा कठोर निर्णय था, ‘बाहर निकलो।’ उसने अकड़ में सिगरेट मुंह से लगाना चाहा। मैंने उसे उतने ही निर्णायक स्‍वर में डॉंटा, ‘ मेरी बात सुनो। यदि तुम नहीं निकलोगे तो मैं इस छड़ी से पहले तुम्‍हारा हाथ तोड़ दूंगा और उसके बाद छड़ी तुम्‍हें दे दूंगा, तुम मेरा सिर तोड़ देना, लेकिन सिगरेट लेकर भीतर तो नहीं घुस सकते।’ कुछ उसकी समझ में आया कुछ उसके दोस्‍तों के, वे उसे पकड़ कर बाहर निकल गये।

परन्‍तु उनकी आदत तो मैं नहीं ही छुड़वा सका। वे बैठते तो बातें तो राजनीति की या किसी दूसरे संगत विषय की करते रहते। मेरे पीठ पीछे होने चोरी से सिगरेट जला लेते और जहां देखते कि मैं उधर को आ रहा हूं वे सिगरे बुझा देते या छिपा देते । उधर से गुजरते हुए धुंए की गन्‍ध से पता चल जाता और फिर मुझे अपनी सांस की बीमारी के अनुभव के कारण आतर हो कर एक लेक्‍चर सुनाना पड़ता। ऐसा लगता है कि सिगरेट कंपनियां या तो जर्दे के साथ अफीम का या किसी दूसरे ड्रग का इतना हल्‍का पुट देने लगी हैं कि आसानी से पकड़ में न आएं और कोई कार्रवाई न हो, पर एक दो बार सिगरेट पीने के बाद अादत आसानी से नहीं छूटती। यह मैं इस आधार पर अनुमान से कह रहा हूं कि पिछले कुछ वर्षों में सिगरेट पीने वालों की संख्‍या में वृद्धि होने लगी है जब कि इस विषय में जागरूकता बढ़ने के साथ पिछले बीस तीस साल से इसमें गिरावट आ रही थी।