Post – 2016-09-10

[मैंने कल की पोस्‍ट में जिस बचपन की वापसी का जिक्र किया उसका अर्थ यह कि इस तिथि से आगे मैं अपनी पोस्‍ट छोटी टिप्‍पणियों के साथ उन विषयों को अलग रखते हुए करूँगा, जो एक दूसरे से जुड़े होने के कारण जरूरी भी लगते हैं, फेसबुक की सीमाओं में कुछ थकान भी पैदा करते हैं। सभी टिप्‍पणियों के शीर्षक ऊपर होंगे, जिसे जिसमें अधिक रुचि हो उसे पढ़ सकता है और बाकी से बच सकता है। मेरे दो आत्‍मीय मित्र कमलेश और रामसेवक इस वर्ष चले गए। कमलेश के विषय में इतना भी नहीं लिख सका। शैली में यह परिवर्तन उनके प्रति मेरी श्रद्धांजलि बने । हॉं मैं अपना दैनिक कोटा पूरा करूँगा, इसलिए टिप्‍पणियॉं पहले अलग अलग आऍेगी, एकाधिक होंगी, पर जरूरी नहीं कि आप सभी को पढ़े । अगले दिन ये उस तिथि के खाते में एक साथ संकलित हाेंगी। कोशिश करूँगा भाषा सरल हो सके। सबसे पहले यही समस्‍या:]

विचार और भाषा

विचार की स्‍पष्‍टता, भाषा की सरलता में व्‍यक्‍त होती है। बोझिल और उलझे हुए प्रयोग नहीं आते। वाक्‍य सरल होते हैं। वाक्‍यरचना संयुक्‍त वाक्‍यों का रूप ले भी ले, जटिल या गु‍ंफित वाक्‍यों से बचा जाता है। परन्‍तु यह विचार और भाषा की सिद्धावस्‍था है और इस सरल को भी सभी ग्रहण नहीं कर सकते। यदि आप के मन में किसी व्‍यक्ति या विषय के प्रति पहले से अरुचि बनी हुई है तो आप के सामने बैठा वह बोल रहा हो तो भी आप उसे सुन तक नहीं पाते। उसके कथन और उपस्थिति के बीच ही एक शून्‍य पैदा हो जाता है जिसमें आप गुम हो जाते हैं । इसलिए विचार को ग्रहण करने में भाषा से अधिक बड़ी भूमिका उन्‍मुखता या विमुखता की, राग या विराग की होती है।

दूसरे सिद्ध से सिद्ध व्‍यक्ति भाषा को इतनी सरल नहीं बना सकता कि वह सभी श्रोताओं या पाठकों की समझ में आ जाए। ऐसा केवल नितांत प्राथमिक विचारों के साथ ही संभव है, पर वह भी उस भाषा के जानने वालों की सीमा में ही संभव हो सकता है। अत: किसी विचार को ग्रहण करने के लिए एक अल्‍पतम तैयारी या उस विषय या वस्‍तु की जानकारी जरूरी है। नये विचार के लिए वह खेत का काम करता है जिसमें ही नये विचार को बिखेरा और अंकुरित और विकसित किया जा सकता है।

और अन्‍तत: भाषा के ज्ञान का स्‍तर या शब्‍दभंडार और कथनभंगी की सरलता या दूरूरहता का प्रश्‍न आता है।

परन्‍तु ये सभी बातें स्थिर विचारों के मामले में ही सही हैं। विकासशील विचार जो चिन्‍तन प्रक्रिया से जुडा है जिसका अगला चरण वक्‍ता या लेखक तक को पता नहीं, उसमें यह स्थिरता नहीं हो सकती। बोलते या लिखते समय हमारा कहा वाक्‍य हमें निर्देशित करता हुआ, जो कुछ तय करके बोलने या लिखने चले थे उससे कहीं और, कई बार तों ठीक उल्‍टे निष्‍कर्ष पर पहुँचा देता है। हम स्‍वयं ही नहीं सोचते, हमारा सोचा हुआ अपनी तर्कशृंखला से हमसे अलग भी सोचता है। हम उसे जितना नियन्त्रित करते हैं उससे अधिक वह हमें नियन्त्रित करता है इसलिए सफल और धाराप्रवाह बोलने वाले जो अपने पूर्व‍निश्चित विचार को निर्द्वन्‍द्व भाव से व्‍यक्‍त कर लेते हैं वे अपने विचारों को इतना अधिक नियन्त्रित कर लेते हैं कि उनमें जान नहीं रह जाती और आप उन्‍हें सुनते हुए उनके वक्‍तव्‍य कौशल पर मुग्‍ध भले हो जायं, उसके बाद जब यह हिसाब लगाते हैं कि उससे आपको क्‍या मिला तो पाते हैं कि आपका जाना हुआ या माना हुआ ही लौट कर आपके पास आया। एक नये तेवर के साथ। आशुवक्‍ता आशुजीवी होता है।

पल्‍लवित विचार तेजी से बढ़ती और अपने लिए रास्‍ता बनाती, सहारा तलाशती लता जैसा होता है जिसमें ताड़वृक्ष जैसा सीधापन संभव ही नहीं इसलिए जो हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप या हमारी तैयारी की सीमा में नहीं आता, उसे ग्रहण करने के लिए पाठक या श्रोता को स्‍वयं भी संघर्ष करना होता है।

यदि लेखक अौर वक्‍ता लेखन की आदर्श अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं कर पाता तो पाठक या श्रोता ग्रहणशीलता की अपेक्षाओं की भी पूर्ति शायद ही कभी कर पाता हो। इस लिए कोई कथन, विचार, कृति या प्रस्‍तुति हमारे दत्‍तचित्‍त रहने के बाद भी पूरी तरह समझ में नहीं आती। सरल से सरल प्रतीत होने वाली अभिव्‍यक्ति की अपनी जटिलताऍं होती है और उसे आत्‍मसात् करने के लिए हमें यदि संभव हो तो कई बार सुनना, पढ़ना, देखना और गुनना होता है। तुम अपूर्ण हो, अपूर्ण से निकले हो, अपूर्ण ही रहने को अभिशप्‍त हो, यह पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमदुच्‍यते के पाठ से अधिक सही और हमारी प्राचीन परंपरा के भी अनुरूप है जिसमें कहा गया है कि वह परम सत्‍ता जो हो है वही नहीं है, जो होना है वह भी वही है- यद् भूतं यच्‍च भव्‍यं – इसलिए वह भी अपने विनाश से पहले तक अपूर्ण रहेगी, तुमको भी अपूर्ण ही रहना है। इसलिए अपनी अपूर्णता को जानते हुए पूर्णता का प्रयत्‍न ही पूर्णता का एकमात्र पर्याय है।

आदत ही ऐसी है क्‍या करूँ। इसमें तो स्‍वयं कई उपशीर्षकों की जरूरत पड़ गई। यह काम आप पूरा करेंगे। मुझे अपनी अपूर्णताओं के साथ जीने की आदत डालनी होगी।

Post – 2016-09-09

रामसेवक का जाना अपने बचपन का वापस आना है
अक्षरज्ञान से साहित्‍य साधना तक

आज मै रामसेवक श्रीवास्‍तव की अन्‍त्‍येष्टि करने के लिए उपस्थित रहा। अठहत्‍तर साल का परि‍चय और बहत्‍तर साल की मित्रता। कभी विरोध या तकरार हुआ ही नहीं। एक ही गांव के लोगों के साथ यह संभव है, परन्‍तु एक ही परिवार के लोगों के साथ तक यह संभव नहीं। बचपन से ही अपनी साहित्यिक रुचि के कारण हमने एक दूसरे को जाना था। वह उम्र में मुझसे एक साल बड़े थे। उनकी शिक्षा चार साल की उम्र में ही आरंभ हो गई थी, कायस्‍थ पिता के पुत्र जो हुए और मैं लट्ठमार विरासत के कारण सात साल की उम्र में अपर प्राइमरी स्‍कूल की बेसिक में दाखिल हुआ था। बेसिक का अर्थ वह क्‍लास जिसे नर्सरी कहने वाले भारी फीस जुटा रहे हैं, जिसमें बच्‍चों को खेल खेल में ही कुछ सिखाया जाता था/है, और पढ़ाया भी खेल की तरह ही जाता था/ है। यह ब्रितानी शासन काल था और जहां भी संभव था शिक्षा को अपने स्‍तर के अनुरूप बनाने का आग्रह नहीं तो दिखावा ही सही, था तो था। बेसिक अध्‍यापक फागू मिसिर अपनी नकसुरी आवाज में गाते हुए हमें गाने को कहते और चित्र या ध्‍वनिरेख बनाते जिसे हम अक्षर या वर्ण कहते हैं।

रुकिए। अक्षर, वर्ण, स्‍वर और व्‍यंजन का अर्थ आप जानते हैं यह आपका विश्‍वास हो सकता है, पर जरूरी नहीं कि आप इनका अर्थ जानते हों।कोशोंं में और व्‍याकरण के ग्रंथों में भी जो अर्थ मिलेगा, उससे अाप यह समझ सकते हैं कि इसका हम किस वस्‍तु या स्थिति या गुण के लिए प्रयोग कर सकते हैं, परन्‍तु यह नहीं जान सकते कि इसका अर्थ यही है। अक्षर का अर्थ आप जानते हैं, परन्‍तु इसको समझने के लिए जिस कल्‍पना की जरूरत है वह आपके पास नहीं है। अक्षर स्‍वर या नाद है जिसकी अनन्‍त भंगियां हो सकती हैं।अक्षर का अर्थ है लगातार उसका उच्‍चारण हो तो भी कोई बाधा नहीं, सिवाय आप के फेफडे की ताकत के। व्‍यंजन या वि अंजन या व्‍यक्‍त करने वाले स्‍वर के बिना बची हुई ध्‍वनि जो क्षणिक होती है और नश्‍वर भी। वर्ण यह व्‍यंजन ध्‍वनि जाे स्‍वर के साहचर्य से या उसकी रंगत से ही व्‍यक्‍त हो पाती है।

फागू बाबा या फागू मिसिर मेरे पहले अध्‍यापक थे और अठहत्‍तर साल के धुंधलके के बीच उनका नाम याद है और याद है वह नकसुरी आवाज कब्बिर कन्‍ने क, रेसाें कि, दीर्घों कई, एकमत के, डाेले कउ, मैं आज भी नहीं जानता इस संगीत से वर्णबोध कैसे जागा था। यह सचमुच इसी रूप में गाया जाता था या मैं स्‍वयं विस्‍मृति के कारण घालमेल कर रहा हूं।
कब्बिर कन्‍ने अर्थात् क की ध्‍वनि के साथ यदि अ की ध्‍वनि न हाे, रेसों कि अर्थात् य‍दि क के साथ ह्रस्‍व इकार लगा हो और इसी तरह आगे।

परन्‍तु रामसेवक श्रीवास्‍तव, मुझसे एक साल बड़े और प्रभाव में चार या पांच साल बड़े, मुझसे पहले मर कर भी मेरा मुकाबला नहीे कर सकते, क्‍योंकि उन्‍होंने बचपन में उर्दू माध्‍यम चुना था, और कब्बिर कन्‍ने का अर्थात् क यदि एकान्‍त हो, उससे मात्र अ जुड़ा हो तो उसका उच्‍चारण क होता है इसका ज्ञान उन्‍हें न प्राइमरी स्‍कूल में हुआ न अपने शिक्षा काल में। बस एक आतंक था। मैं बेसिक या पहली में था तो दो छोटे बच्‍चों काे चौथी में पढ़ते देख कर लोगों के साथ हम भी आश्‍चर्य करते थे कि वे असाधारण प्रतिभा के बच्‍चे होंगे, बाद में पता चला कि रामअधार पटवारी बन कर रह गया और रामसेवक के साथ कब मैं हो लिया इसका बोध ही न हुआ। कुछ मित्रों का जाना अपने बचपन का वापस आना होता है क्‍या। तलाश किया तो मेरे इंटरनेट पर उनका कोई चित्र तक नहीं, जब कि कंप्‍यूटर के भरोसे अलबम फेंक बैठे।

Post – 2016-09-09

निदान – 45
धर्म और मजहब

”सॉंप को दूध पिलाइए तो वह भी जहर हो जाता है। इतने दिनों का, इतने लोगों का अनुभव है, और आप हमारे सेक्‍युलरिस्‍ट भाइयों की तरह प्रेम राग गाने का सुझाव रखते है, यह आपको अच्‍छा व्‍यक्ति तो सिद्ध कर सकता है उनको अच्‍छा नहीं बना सकता। गांधी जी की भी यही सीमा थी और आपकी भी। गांधी के प्रति आपके अनुराग का भी यही कारण लगता है।”

”गांधी जी को छोडि़ए वह आप लोगों जितने बड़े नहीं थे, जो जिनसे न बने उन्‍हें सांप समझ लें और यह तक न जानते हों कि यह वह देश है जिसमें सांप को भी पालतू बना लिया जाता है। आज से चार दिन पहले किसी चैनल

Post – 2016-09-08

निदान – 44
व्‍यामिश्रैव वाक्‍योस्ति परं सत्‍यं जनार्दन

”तुम कहो चाहे कुछ भी, गांधी जी का अनशन का तरीका सही नहीं था। यह भी हिंसा का ही रूप था।”

”दिक्‍कत तुम लोगों के साथ यही है कि न तो किसी चीज को ढंग से समझते हो, न ही सही शब्‍दों का इस्‍तेमाल कर पाते हो। पहली बात यह याद करो कि हम यह कह चुके हैं कि अनशन पुराना हथियार था जिसका प्रयोग ब्राह्मणों ने मध्‍यकाल में भी कुछ हद तक सफलता पूर्वक किया था, ”हम प्राण दे देंगे, पर जजिया नहीं देंगे।’ मध्‍यकालीन निरंकुशता के विरुद्ध यह हथियार काम कर गया था। गांधी ने इसका पुनराविष्‍कार किया था या परंपरा से लिया था यह तय करना आसान नहीं।

” किसी अन्‍य के प्राण लेना हत्‍या होती है, स्‍वयं अपने प्राण देना बलिदान । एक अपराध है दूसरे को बलिदान कहते हैं। दोनों के लिए एक ही शब्‍द का प्रयोग नहीं किया जा सकता । ये अलग भूमिकाऍं हैं। गांधी के अनशन को हिंसा कहना, ऐसा कहने वाले की विवेकबुद्धि की दुर्बलता को प्रकट करता है। जो सही शब्‍दों का प्रयोग तक नहीं जानता वह दार्शनिक लच्‍छेबाजी कर सकता है, चिन्‍तक हो नहीं सकता।

”यही बात दूसरों को उत्‍पीडित करने और स्‍वत: कष्‍ट सहने के विषय में कह सकते हो । रजनीश का व्‍यक्तित्‍व बहुत आकर्षक था, मैंने उनकाे 1968 में देखा था। चर्चा में तब भी थे, पर अधिक ध्‍यानाकर्षण के लिए तब तक मेरी शरण में नहीं आए थे, भगवान रजनीश नहीं कहते थे ऐसा याद आता है। स्‍थान डॉ. शर्राफ का आवास था और उन पर मुग्‍ध विवाहित डाक्‍टर के साथ सहजी‍वन के लिए कटिबद्ध उनकी प्रेमिका थी जिसने साहस से अपने रखैलपन की त्रासदी और अपनी अनन्‍य निष्‍ठा को काला-सफेद करते हुए स्‍वीकार किया और जिनकी प्रतिभा और गरिमा का मैं आदर करता हूँ। परन्‍तु उस समय तो उसे एक ऐसे दर्शन की जरूरत थी जिससे उसके जीवन और आचरण को नैतिक आधार मिल सके।

”एक राज की बात बताऊँ । उस गोष्‍ठी में जो अविस्‍मरणीय दीखा और आज तक याद है, उस युवती की सुडौल सांवली काया के साथ वे चकमती ऑंखें जो मणिधर में ही होती हैं और जिनको देख कर आप को नशा हो जाये। और रजनीश की तन्द्रिल, कहीं दूर और कहीं बहुत भीतर एक साथ देखती हुई ऑंखे जाे विषदंश के बाद देखने में आती हैं, मादक मदहिं पिये। पर जो सबसे व्‍यर्थ लगा था वह था हिप्पियों को बुद्ध का उत्‍तराधिकारी सिद्ध करने और देश विदेश के हमारे जाने हुए दार्शनिकों के फिकरों और विचारों को अद्भुत वाक्‍कौशल से आकर्षक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्‍तुत करने का तरीका जिसमें अद्भुत का प्रभाव अप्रत्‍याशित की उपस्थिति से पड़ता है। चर्चा भारतीय अध्‍यात्‍म की हो रही है, सामान्‍यत: ऐसे व्‍यक्ति को पोंगा समझ लिया जाता है, परन्‍तु यदि इसके साथ कोई विश्‍वफलक से परिचित होने का आभास देते हुए अपनी बात कहे तो वह क्रान्तिकारी विचारक लगता है। भारतीय दर्शन के साथ संयम और मर्यादा स्‍वयं आ जुड़ती है, यदि ऐसे मे कोई जो जी आए सो करो हम हैं तुम्‍हरे साथ वाला दर्शन ले कर आता है तो वह कुछ अधिक क्रान्तिकारी लगता है

”इसलिए मेरे लिए किसी घटना का अच्‍छा या बुरा होना महत्‍व नहीं रखता, महत्‍व रखता है यह तथ्‍य कि क्‍या उस क्रिया के लिए परिस्थितयों का दबाव इतना प्रबल था कि उनका निवारण नहीं हो सकता था। यदि नहीं तो इसे नैतिकताबाह्य माना जा सकता है अर्थात् इसके आधार पर किसी को दोष नहीं दिया जा सकता परन्‍तु ऐसा करने का समर्थन करते हुए इसके लिए वातावरण नहीं तैयार किया जा सकता।

” हम सच बाेल नहीं पाते, सच बोलना तक सीख जायँ तो हमारी आधी समस्‍यायें हल हो जायें और बाकी आधी पैदा ही न होने पाऍं। गांधी अकेला एेसा व्‍यक्ति है जिसके पास सच के सिवाय कोई हथियार न था और जिससे ही वे सभी मूल्‍य जुड़ जाते हैं जिनका वह उन्‍नायक था। सत्‍य की रक्षा, असत्‍य और अन्‍याय का विरोध, हिंसा का विरोध और जहॉं कोई शस्‍त्र न काम करे और समस्‍त प्रयत्‍न विफल होने जा रहे हैं, वहां हम बचे रह भी गए तो क्‍या होगा। मरण का यह वरण, आमरण अनशन में प्रकट होता है, जिसे वे नहीं समझ सकते जिन्‍हें एक दिन भी भूखे पेट सोना नहीं पड़ा है, इसमें अंबेडकर भी आते हैं। इसे वे नहीं समझ सकते जो अपने लिए कुछ पाना चाहते हैं। भारतीय राजनीति में गांधी अकेला ऐसा व्‍यक्ति है जो निष्काम कर्मयोग का अर्थ जानता था, और इसलिए गीता के संदेश को समझता तो था परन्‍तु उससे भी बँध कर रहना नहीं चाहता था। न किसी को बॉंध कर रखना चाहता था।”

”यार, तुम क्‍यों नहीं मान लेते कि गांधी से भी गलतियॉं हुई हैं और उन्‍हें परम पुरुष पुरुषोत्‍तम सिद्ध करने की क्‍यों ठान लेते हो।’

”देखो जब तक किसी व्‍यक्ति को मेरी बात समझ में नहीं आती, तब तक मैं उसके साथ हूँ, जहॉं से समझ में आने के बाद भी वह अहंकारवश या लोभवश अपनी बात मनवाना चाहता है, फिकरों और फब्तियों और जड़सूत्रता का सहारा ले कर अपने को सही सिद्ध करना चाहता है, वहॉं वह विचार नहीं, उस विचार के संवाहक के रूप में खतरनाक हो जाता है, जैसे वे जीव जन्‍तु जो डेंगू, डेंगी और चिकेनगुनिया के ग्रस्‍त और स्‍वयं भी भुक्‍तभोगी प्राणी हैं, चाहे वे चूहे हों, या सूअर, या पक्षी। उन पर प्रहार किया जा सकता है, उनका सफाया किया जा सकता है, परन्‍तु अपने तई वे स्‍वयं भी किसी दूसरे की चूक के भुक्‍तभोगी हैं।”

”क्‍या तुम यह नहीं मानते कि गांधी ने उसी आर्यसमाज की जड़ें निर्मूल कर दीं जिसने उनके लिए मानसिक पर्यावरण तैयार किया था।”

”इस जिद पर सही होने के लिए तुम्‍हें मानना होगा कि आर्यसमाज के विचारक मूर्ख थे और उन्‍होंने सबसे आगे बढ़ कर गांधीवाद को अपनाया। उनमें कुछ ऐसे तत्‍व भी थे जो व्‍यावहारिक न थे। उन पर चर्चा करना समय की बर्वादी हाेगी। अभी तो हम शास्‍त्री जी की प्रश्‍नावली के एक प्रश्‍न से ही उलझ कर इतने दिन गँवा चुके हैं कि कुछ समझदार लोग बेहोशी से बचने का इलाज पता लगा रहे होंगे।

”देखो, बात का अन्‍त हो सकता है, बतंगड़ का नहीं । किसी समस्‍या से उठे सार्थक प्रश्‍नों का उत्‍तर ही दिया जा सकता है। हम पहले दो बातों को समझ लें। गांधी मनुष्‍य थे और देहधरे की कतिपय व्‍याधियों से मुक्‍त नहीं हो सकते थे और उनको व्‍याधि के रूप में परिभाषित करने पर भी मतभेद हो सकता है।

दूसरा, यह कि व्‍यक्तित्‍व का मूल्‍यांकन करने के लिए कुछ कसौटियां होती हैं जैसे खरे सोने या चांदी को परखने के लिए हुआ करती थीं। वे ही उनके मूल्‍यांकन के केन्‍द्र में होती हैं, उनसे अनमेल आरोपित हो सकता है। लिंकन को मैं उनके उस आचरण से समझता हूँ जिसमें वह एक सूअर को मरने से बचाने के लिए, समय की स्‍वल्‍पता को देखते हुए, अपने सूट के साथ पेट के बल फैल कर, अपनी जान का भी जोखिम उठाते हुए उसे बचाने का प्रयत्‍न करते हैं और जब उनके मित्र क्‍लब में उनकी मूर्खता की याद दिलाते हुए बताते हैं कि तुमने एक सूअर के लिए इतना बड़ा खतरा मोल लिया तो वह कहते हैं, सूअर के लिए नहीं, अपनी आत्‍मा के लिए। यदि उसे उस अवस्‍था में छोड़ कर चला आया होता तो मैं जीवन भर चैन से न रह पाता। जानते हो इस वाक्‍य को पढ़ कर कितनी बार कितना विगलित हुआ हूँ और आगे भी होता रहूँगा। महान व्‍यक्तियों की परख की कसौटियॉं उनके जीवन से ही निकलती हैं, वे किसी अन्‍य के पास होती ही नहीं।

”गांधी कब अपना मल स्‍वयं ढोकर नदी में विसर्र्जित करते थे। उस समय तक कोई ऐसा आन्‍दोलन था। अांबेडकर तब तक इस समस्‍या को भी समझने की योग्‍यता रखते थे। गांधी अपने मुवक्किलों में से उनके मूत्र को भी यदि वे पहले से उनके घरेलू अनुशासन के अभ्‍यस्‍त होते, बिना शिकायत स्‍वयं उसका निस्‍तारण करते और बा के रहते वह ऐसा करें इस बात को ले कर झगड़ा हो जाता। तुम जानते हो मुझे यह याद करने के बाद कैसा लगता है। इस तप:पूत व्‍यक्ति को लोग उसकी ऊँचाई से नीचे लाने का प्रयास करते हैं तो लगता है जैसे कोई किसी गहरी खाई में धॅसा व्‍यक्ति अपेक्षा कर रहा हो कि कैलाश को नीचे उतारो कि वह उसे देख और समझ सके। समझने वाले कैलाश को नीचे नहीं उतारते, अपनी कल्‍पना से कैलाश की ऊॅचाई पर पहुँच कर उसका दर्शन करते हैं।”

”तुम्‍हें यह क्‍यों भूल जाता है कि गांधी ने अंबेडकर को अपना आन्‍दोलन वापस लेने के लिए आमरण अनशन कर दिया था जिसमें विकल्‍प था ही नहीं। मेरी मानो या मेरी हत्‍या के अपराधी बनो।”

”सिरा बदल कर देखो। बाबा साहब ब्रितानी हाथों में खेलते हुए उससे भी अनर्गल प्रस्‍ताव रख्‍ा रहे थे कि पाकिस्‍तान की तरह दलितस्‍तान भी बनाओ। गांधी भी उस भविष्‍य को नहीं देख सकते थे जो अपनी सत्‍ता बचाने के लिए अंग्रेज हमें सौंपना चाहते थे, परन्‍तु जो व्‍यक्ति अस्‍पृश्‍यता, दलित और उसके दैन्‍य से इतना पीडि़त था कि उसने स्‍वराज्‍य का अर्थ अन्‍त्‍योदय कर रखा था, और जिसे उसके बाद किसी ने समझा नहीं, उसे समझ पाते तो सत्‍ता के मुहरे बन कर ऐसे हास्‍यास्‍पद प्रस्‍ताव अंबेडकर नहीं लाते। मैं इस सवाल पर बहस नहीं करना चाहता, जब तक कोई मुझसे किसी कारण से असहमत है, वह सही है, परन्‍तु मैं गलत नहीं हूँ। जिस दिन वह मुझे गलत सिद्ध कर देगा, मैं उसके मत को मान लूंगा। जो सही चीज को मान सकता है वह हारता नहीं, सच की रक्षा करता है।

”गांधी ने विभाजन के समय अनशन क्यों नहीं किया यह तो मुझे भी नहीं मालूम। गलतियां वह नहीं करते थे यह भी नहीं मानता, परन्‍तु गांधी रोबोट नहीं थे। इस खास क्षण में इतिहास ने ऐसा मोड़ लिया था कि देश ही नहीं दिल भी फट रहे थे, उन्‍हें बचाने का दायित्‍व किसी अन्‍य निर्णय से अधिक जरूरी था। यह मेरी समझ है, जरूरी नहीं कि तुम इससे सहमत होओ, न ही असहमत होने के कारण तुम्‍हें गलत कहूँगा। ”

Post – 2016-09-08

निदान – 43
एकान्‍तवादी सोच की सीमा

”तुम नाहक अपना भी समय बर्वाद करते हो और हमें भी बोर करते हो। तुम्‍हारी बात कोई नहीं मानने वाला । सबके अपने अपने विचार हैं और उन्‍हें उसी से काम लेना है। तुम एक दिन में उनकी मान्‍यताओं को नहीं बदल सकते । देखा नहीं, एक आदमी गोडसे को हत्‍यारा कह रहा है, और वह अकेला नहीं है, वह देश के नब्‍बे प्रतिशत का प्रवक्‍ता है, और दूसरा गांधी को काइयॉं बनिया, और उनका जो सबसे कारगर हथियार, अनशन का था उसे हिंसा। मजा तो तब आया जब एक ने तुम्‍हें गांधी का चेला भी बना दिया। ” मेरे मित्र को लंबे समय बाद फेस बुक से अपना मौन तोड़ने का मसाला मिला था।

”मैं भी यही चाहता हूँ कि कोई मेरी बात न माने, सही प्रतीत होने वाले की भी बौद्धिक गुलामी, गुलामी ही हुआ करती है। जब हम उस सही को समुचित ऊहापोह से अपना सत्‍य बना लेते हैं, तब वही बात किसी दूसरे की नहीं रह जाती, अपनी खोज बन जाती है। यह बात मैं पहले भी दुहराता रहा हूँ कि आपके पास देखने को अपनी ही ऑंखें हैं, सोचने के लिए अपना ही दिमाग है। वह प्रखर या मन्‍द जैसा भी है, काम आप को उसी से लेना है। न लिया तो ऑंख रहते अन्‍धे और दिमाग रहते भी मूर्ख बने रहेंगे। काम लेने से उनमें प्रखरता भी आएगी। परन्‍तु ज्ञान के अहंकार में लोग दूसरो की नजर और दूसरों केे दिमाग से काम लेने के अादी हो जाते हैं और उनके ही काम आते हैं।

”तुमने देखा तो असहमत होने वालों में किसी के पास अपना दिमाग था ही नहीं, न अपनी आंख थी। वे किसी न किसी के कहे को दुहरा रहे थे और यह भी नहीं देख रहे थे कि उसका आधार क्‍या था।

”अपने को अपने ही मुंह से भगवान कहने वाला, अपने को बुद्ध का अवतार कहने वाला, ओसो कहने वाला वाक्‍चतुर मनमौजी जिसकी समझ ऐसी कि हिप्पियों को सच्‍चा बौद्ध बता कर अरबों की संपदा और अन्‍धभक्‍तों का काफिला तैयार करले, बौद्ध चिन्‍तन को पंचमकार पर उतार दे जो वह अपनी दुर्गति के दिनों में हुआ था, परन्‍तु करनी ऐसी कि जिस अमेरिका में लंपटता के दर्शन से इतना वैभव अर्जित किया उसमें प्रवेश तक पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया गया, वह गांधी के अनशन पर फैसला देने का अधिकारी हो गया और आपने अपनी बुद्धि उसके हवाले कर दी।

”यदि आपको स्‍वयं अपने विवेक से ऐसा लगता है कि कोई व्‍यक्ति या विचार गलत है उसे बिना किसी की बैसाखी के प्रस्‍तुत करें । फतवा न दें, उसका तर्क दें और उस तर्क से लगे कि आप ने इस पर सोचविचार किया है तो उसका महत्‍व है। जब तुम कहो, नब्‍बे प्रतिशत लोग किसी को ऐसा मानते हैं इसलिए तुम भी मानते हो, तो तुमने अपनी अक्‍ल से काम ही नहीं लिया, संख्‍या के दबाव में आ गए। और संख्‍या जितनी ही बढ़ती जाती है विचार पक्ष उतना ही घटता जाता है, यह हम पहले समझा चुके हैं।

”देखो, तुम्‍हें एक बार फिर याद दिला दूँ कि मैं यदि इस बात में सफल हो जाऊँ कि सभी लोग मेरी बात मान लें, तो यह मेरे लिए दुर्भाग्‍य की बात होगी। अमुक ने कहा इसलिए मैं भी मानता हूॅे मार्का लोग सुपठित और वाचाल मूर्ख होते हैं जिन्‍हें अपना दिमाग और आंख होते हुए भी उससे काम लेने तक का शऊर नहीं होता और सारी दुनिया को अपने अनुसार चलाने की ठाने रहते हैं। और तुम उन मूर्खों के शिरोमणि तो नहीं कहूँगा, पर उसी माला में पिरोए हुए मनके हो जो अपने धागे से बाहर नहीं जा सकते।”

”मैं चाहता हूँ लोग मानना छोड़ें, देखना और सोचना आरंभ करें और उसके बाद किसी बात से तब तक के लिए सहमत हों जब तक कि किसी अन्‍य कसौटी पर वह गलत नहीं सिद्ध हो जाती। विज्ञान में यही होता है, इसलिए विज्ञान समाज को आगे ले जाता है। विश्‍वास में यह नहीं होता, इसलिए विश्‍वास, समाज को पीछे ले जाता है। विश्‍वासों के टकराव से कलह पैदा होता है, हिंसा होती है, भाषा, आचार, व्‍यवहार, आपसी लगाव सभी में गिरावट आती है। आदमी तर्क को भी गुर्राहट में बदल कर अपरिभाषित और बोझिल शब्‍दों में बात करने लगता है और यह जानता नहीं कि उसने जो कहा उसका अर्थ क्‍या है ।

”मुझे यदि यह सौभाग्‍य प्राप्‍त होता कि मैं गांधी या मार्क्‍स का शिष्‍य बन जाता तो अपने को सौभाग्‍यशाली समझता । पर विचारक चेले नहीं बनाते, उनके अनुयायी होते हैं। जिस आदमी का भी यह कथन है उसके पास दिमाग नहीं है, जहॉं विचार होना चाहिए वहॉं घ़ृणा भरी है और यह स्‍थानान्‍तरित घृणा है। वह मुसलमानों से घृणा करता है और उन मुसलमानों केे साथ खड़ा होता है जो इसी तरह हिन्‍दुओं से घृणा करते हैं । यदि गांधी मुसलमानों से, कम से कम नोआखाली की यात्रा के बाद ही घृणा करते तो उसे उनमें शायद कोई कमी नहीं दिखाई देती, नहीं करते इसलिए मुसलमानों के लिए घृणा गांधी के प्रति घृणा में बदल गई । गोडसे को एक बार ध्‍यान से पढ़ो, वह लगातार इस बात की शिकायत करता है कि गांधी मुसलमानों से प्रेम करते थे, पूरा इतिहास इसी बात को सिद्ध करने के लिए, और इसीलिए मैं कह रहा था कि जिस व्‍यक्ति के मन में विचार का स्‍थान घृणा ले लेगी, वह मानसिक रूप में सन्‍तुलित नहीं रह जाएगा ।”

शास्‍त्री का धैर्य जवाब दे गया, ”डाक्‍साब, आप विज्ञान का इतना नाम लेते हैं, विज्ञान में जो प्रयोग विफल हो जाते हैं उन्‍हें दुबारा दुहराया जाता है। गांधी जी जैसा आदमी जिस प्रयत्‍न में विफल हो गया, उसी को आप जारी रखना चाहते हैं?”

मैंने उत्‍तर में कुछ कहना चाहा कि शास्‍त्री जी ने राेक दिया, ”एक बात और, यदि प्रेम एक आवेग है तो घृणा भी एक आवेग ही तो है। प्रेम के पीछे पागल होने वाले घृणा से विक्षुब्‍ध होने वालों को गलत कैसे कह सकते हैं ? आप गांधी जी के मुस्लिम प्रेम को भी विक्षिप्‍तता क्‍यों नहीं कहते ?”

”शास्‍त्री की बात में दम है भाई।” मित्र के मुँह से भी शास्‍त्री जी का समर्थन आज कल कुछ अधिक ही देखने में आने लगा है। ”और तुम तो स्‍वयं कभी अपनी अक्‍ल से काम नहीं लेते यार। जो पसन्‍द आ गया उसके अवगुण भी तुम्‍हें गुण दिखाई देने लगते हैं।”

मेरे सामने दो विरोधी थे, दोनों की ओर मुड़ना संभन नहीं था इसलिए शास्‍त्री जी की ओर मुड़ा, ”शास्‍त्री जी, जिसमें आदमी पागल होता है उसे प्रेम नहीं आसक्ति कहते हैं, लव नहीं, इनफैचुएशन। यह मनोविकृति है और इसलिए यही घृणा में परिवर्तित होता है। आवेग मात्र बुरे नहीं होते, प्रेम, करुणा, दया, श्रद्धा को उन शत्रुओं में नहीं गिना गया है जिन पर विजय पा कर मनुष्‍य पशु से आदमी बनता है। बल्कि इन्‍हीं के बल पर वह उन संहारकारी आवेगों पर विजय पाता है। रही बात विज्ञान की, विज्ञान में प्रयोग के विफल होने के बाद प्रयत्‍न नहीं छोड़ दिया जाता। बार बार विफल होने के बाद भी अपनी पद्धति में परिष्‍कार करके, पुरानी गलतियों से बचते हुए प्रयत्‍न जारी रहता है। जब तक समस्‍या है, उसका समाधान नहीं मिलता तब तक प्रयत्‍न जारी रहेगा, अन्‍यथा समस्‍या हमारी निष्क्रियता के कारण अधिक उग्र होती चली जाएगी। सच्‍चे प्रेम में समझदारी होती है, सन्‍तुलन होता है, उसका चरित्र व्‍यक्तियों और संबंधों के अनुसार बदलता रहता है, वह अन्‍धा नहीं होता। इतनी विफलताओं के बाद भी, गांधी जी तक की विफलता के बाद भी, यदि मैं सोचता हूँ कि निराश होने से काम नहीं चलेगा तो कारण यह है कि, हमने इस समस्‍या को सही सन्‍दर्भ में रखा ही नहीं। समस्‍या के समाधान के लिए पहली जरूरत है उसके चरित्र को समझना। हमारी जो भी शिकायतें हैं उनके कारण को समझना।

” हम बहुत पहले की अपनी ही बात तो दुहरायें तो मनुष्‍य में गर्हित से देवोपम आचरण की अनन्‍त संभावनाऍं हैं और वह परिस्थितियों के दबाव में इनमें से कुछ भी हो सकता है। व्‍यक्ति ही नहीं पूरा का पूरा समाज। यदि उसका वैसा बना रहना हमारे लिए समस्‍या पैदा करता है तो हमे उसे उससे बाहर लाने या दूरी बना कर रहने का प्रयत्‍न करना होगा। मिटाने का तरीका आप अपना नहीं सकते। यह आपका तरीका भी नहीं है। आप के अनुसार यह उनका तरीका है और इसलिए ही आप उनसे घृणा करते हैं, परन्‍तु यह नहीं समझ पाते कि आपकी घृणा उनकी व्‍याधि को बढ़ा तो सकती है, घटा नहीं सकती। जहॉं साथ रहना एक विवशता हो वहॉं प्रेम नहीं, समझदारी की जरूरत होती है, जैसा आप यात्रा में करते हैं, एक ही प्रकार के संकट में घिर जाने पर करते हैं।

”विज्ञान की दुहाई देने वाला और कुछ न सीखने वाला मूर्ख तो हमारे पास बैठा हुआ है जो आज जब सूचना का तन्‍त्र इतना प्रबल है कि उसके सामने पड़ने पर तोपों का रुख मुड़ जाता है विचार की स्‍वतन्‍त्रता की लड़ाई में भी शामिल हो जाता है और किसी को असहमति का मौका भी नहीं देता। असहमत होने वालों पर गुर्राने लगता है। और इसके छोटे भाई आज भी नहीं समझ पाते कि यदि आपका ध्‍येय स्‍पष्‍ट और योजना व्‍याव‍हारिक हो तो सूचना तन्‍त्र से परिवर्तन लाया जा सकता है। वे आज भी गोली चला कर दुनियाा बदलने का काम कर रहे हैं और जहां तक उनकी पहुंच है वहां तक की जिन्‍दगी को नरक बना चुके हैं और नरक बनाए रखना चाहते हैं।

”हमें गुर्राना छोड़ कर समझने और समझाने का तरीका अपनाना होगा जिसका यह सोच कर कि मुसलमानों की भावनाऍं विचारों से आहत हो जाती हैं, कभी प्रयत्‍न किया ही नहीं गया। प्रयत्‍न केवल अपने को सही और दूसरे को गलत, अपने को ऊँचा और दूसरे को गया बीता सिद्ध करने का किया जाता रहा जिससे दूरियॉं बढ़ती हैं, समस्‍यायें जटिल होती है, खुले रास्‍ते भी बन्‍द होते हैं। हमें अपने एकान्‍तवादी सोच के दायरे से बाहर आने की चुनौती का सामना करना होगा।”

Post – 2016-09-07

मैंने आज की जो पोस्‍ट लिखी थी वह दो बार ध्‍वस्‍त हो गई। इसे कल पूरा करूँगा। तब तक के लिए एक बहुत पुरानी तुकबन्‍दी :

जिन दिनों उड़ते थे परबत बेघड़क, अफवाह से।
सीख बैठे पैंतरे कुछ हम भी थे अल्लाह से।
लम्बी चौड़ी कन्दराएँ पर्वतों में थीं जनाब
हम सफर करते थे उनमें बैठ शाहंशाह से।
अल्ला तब सुनते भी थे अपनी भी थे कुछ मानते
तब कभी लगते नहीं थे हमको तानाशाह से।
हँस भी पड़ते थे अगर करते थे हम उनसे मज़ाक़
हम भी तब डरते न थे, रहते थे बेपरवाह से।
थे हमारे ही पड़ोसी दोस्त भी, हमराज भी
सामना होता कभी तो कहते थे अल्लाह से।
क्यों अकेले सड़ रहे हो, कुछ करो ऐसा जनाब
हुस्न बरसे, इश्‍क हो, हम भी मिलें हमराह से
फिर तुम्हारी याद आई दिल धड़कने सा लगा
वह घड़ी और यह कभी फुर्सत न पाई चाह से।
प्यार केवल प्यार केवल प्यार ही करते रहे
भर गई दुनिया मगर फिर भी थे लापरवाह से
होश में आए तो नफरत आग में, पानी में भी
सोचते हैं माँग क्या बैठे थे हम अल्लाह से।
23.11.2008

Post – 2016-09-07

निदान – 43
एकान्‍तवादी सोच की सीमा
”तुम नाहक अपना भी समय बर्वाद करते हो और हमें भी बोर करते हो। तुम्‍हारी बात कोई नहीं मानने वाला । सबके अपने अपने विचार हैं और उन्‍हें उसी से काम लेना है। तुम एक दिन में उनकी मान्‍यताओं को नहीं बदल सकते । देखा नहीं, एक आदमी गोडसे को हत्‍यारा कह रहा है, और वह अकेला नहीं है, वह देश के नब्‍बे प्रतिशत का प्रवक्‍ता है, और दूसरा गांधी को काइयॉं बनिया, और उनका जो सबसे कारगर हथियार, अनशन का था उसे हिंसा। मजा तो तब आया जब एक ने तुम्‍हें गांधी का चेला भी बना दिया। ” मेरे मित्र को लंबे समय बाद फेस बुक से अपना मौन तोड़ने का मसाला मिला था।

”मैं भी यही चाहता हूँ कि कोई मेरी बात न माने, सही प्रतीत होने वाले की भी बौद्धिक गुलामी, गुलामी ही हुआ करती है। जब हम उस सही को समुचित ऊहापोह से अपना सत्‍य बना लेते हैं, तक वही बात किसी दूसरे की नहीं रह जाती, अपनी खोज बन जाती है। यह बात मैं पहले भी दुहराता रहा हूँ कि आपके पास देखने को अपनी ही ऑंखें हैं, सोचने के लिए अपना ही दिमाग है। वह प्रखर या मन्‍द जैसा भी है, काम आप को उसी से लेना है। न लिया तो ऑंख रहते अन्‍धे और दिमाग रहते भी मूर्ख बने रहेंगे। काम लेने से उनमें प्रखरता भी आएगी। परन्‍तु ज्ञान के अहंकार में वे दूसरो की नजर और दूसरों केे दिमाग से काम लेते हैं और उनके ही काम आते हैं। तुमने देखा तो असहमत होने वालों में किसी के पास अपना दिमाग था ही नहीं, न अपनी आंख थी। वे किसी न किसी के कहे को दुहरा रहे थे और यह भी नहीं देख रहे थे कि उसका आधार क्‍या था। अपने को अपने ही मुंह से भगवान कहने वाला, अपने को बुद्ध का अवतार कहने वाला, ओसो कहने वाला वाक्‍चतुर मनमौजी जो जिसकी समझ ऐसी कि हिप्पियों को सच्‍चा बौद्ध बता कर अरबों की संपदा और अन्‍धभक्‍तों का काफिला तैयार करले, बौद्ध चिन्‍तन को पंचमकार पर उतार दे जो वह अपनी दुर्गति के दिनों में हुआ था परन्‍तु करनी ऐसी कि जिस अमेरिका में लंपटता के दर्शन से इतना वैभव अर्जित किया उसमें प्रवेश तक पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया गया, वह गांधी के अनशन पर फैसला देने का अधिकारी हो गया और आपने अपनी बुद्धि उसके हवाले कर दी। यदि आपको स्‍वयं अपने विवेक से ऐसा लगता है कि कोई व्‍यक्ति या विचार गलत है उसे बिना किसी की बैसाखी के प्रस्‍तुत करें । फतवा न दें, उसका तर्क दें और उस तर्क से लगे कि आप ने इस पर सोचविचार किया है तो उसका महत्‍व है। जब तुम कहो, नब्‍बे प्रतिशत लोग किसी को ऐसा मानते हैं इसलिए तुम भी मानते हो, तो तुमने अपनी अक्‍ल से काम ही नहीं लिया, संख्‍या के दबाव में आ गए। और संख्‍या जितनी ही बढ़ती जाती है विचार पक्ष उतना ही घटता जाता है, यह हम पहले समझा चुके हैं।
”देखो, तुम्‍हें एक बार फिर याद दिला दूँ कि मैं यदि इस बात में सफल हो जाऊँ कि सभी लोग मेरी बात मान लें, तो यह मेरे लिए दुर्भाग्‍य की बात होगी।
अमुक ने कहा इसलिए मैं भी मानता हूॅे मार्का लोग सुपठित और वाचाल मूर्ख होते हैं जिन्‍हें अपना दिमाग और आंख होते हुए भी उससे काम लेने तक का शऊर नहीं होता और सारी दुनिया को अपने अनुसार चलाने की ठाने रहते हैं। और तुम उन मूर्खों के शिरोमणि तो नहीं कहूँगा, पर उसी माला में पिरोए हुए मनके हो जो अपने धागे से बाहर नहीं जा सकते।”

मैं चाहता हूँ लोग मानना छोड़ें, देखना और सोचना आरंभ करें और उसके बाद किसी बात से तब तक के लिए सहमत हों जब तक कि किसी अन्‍य कसौटी पर वह गलत नहीं सिद्ध हो जाती। विज्ञान में यही होता है, इसलिए विज्ञान समाज को आगे ले जाता है। विश्‍वास में यह नहीं होता, इसलिए विश्‍वास, समाज को पीछे ले जाता है। विश्‍वासों के टकराव से कलह पैदा होता है, हिंसा होती है, भाषा, आचार, व्‍यवहार, आपसी लगाव सभी में गिरावट आती है। आदमी तर्क को भी गुर्राहट में बदल कर अपरिभाषित और बोझिल शब्‍दों में बात करने लगता है और यह जानता नहीं कि उसने जो कहा उसका अर्थ क्‍या है । मुझे यदि यह सौभाग्‍य प्राप्‍त होता कि मैं गांधी या मार्क्‍स का शिष्‍य बन जाता तो अपने को सौभाग्‍यशाली समझता । पर विचारक चेले नहीं बनाते, उनके अनुयायी होते हैं। जिस आदमी का भी यह कथन है उसके पास दिमाग नहीं है, जहॉं विचार होना चाहिए वहॉं घ़ृणा भरी है और यह स्‍थानान्‍तरित घृणा है। वह मुसलमानों से घृणा करता है और उन मुसलमानों केे साथ खड़ा होता है जो इसी तरह हिन्‍दुओं से घृणा करते हैं । यदि गांधी मुसलमानों से, कम से कम नोआखाली की यात्रा के बाद ही घृणा करते तो उसे उनमें शायद कोई कमी नहीं दिखाई देती, नहीं करते इसलिए मुसलमानों के लिए घृणा गांधी के प्रति घृणा में बदल गई । गोडसे को एक बार ध्‍यान से पढ़ो, वह लगातार इस बात की शिकायत करता है कि गांधी मुसलमानों से प्रेम करते थे, पूरा इतिहास इसी बात को सिद्ध करने के लिए, और इसीलिए मैं कह रहा था कि जिस व्‍यक्ति के मन में विचार का स्‍थान घृणा ले लेगी, वह मानसिक रूप में सन्‍तुलित नहीं रह जाएगा ।”

शास्‍त्री का धैर्य जवाब दे गया, ”डाक्‍साब, आप विज्ञान का इतना नाम लेते हैं, विज्ञान में जो प्रयोग विफल हो जाते हैं उन्‍हें दुबारा दुहराया जाता है। गांधी जी जैसा आदमी जिस प्रयत्‍न में विफल हो गया, उसी को आप जारी रखना चाहते हैं?”

मैंने उत्‍तर में कुछ कहना चाहा कि शास्‍त्री जी ने राेक दिया, ”एक बात और, यदिप्रेम एक आवेग है तो घृणा भी एक आवेग ही तो है। प्रेम के पीछे पागल होने वाले घृणा से विक्षुब्‍ध होने वालों को गलत कैसे कह सकते हैं ? आप गांधी जी के मुस्लिम प्रेम को भी विक्षिप्‍तता क्‍यों नहीं कहते ?”

”शास्‍त्री की बात में दम है भाई।” मित्र के मुँह से भी शास्‍त्री जी का समर्थन आज कल कुछ अधिक ही देखने में आने लगा है।
”और तुम तो स्‍वयं कभी अपनी अक्‍ल से काम नहीं लेते यार। जो पसन्‍द आ गया उसके अवगुण भी तुम्‍हें गुण दिखाई देने लगते हैं।”

मेरे सामने दो विरोधी थे, ”शास्‍त्री जी, जिसमें आदमी पागल होता है उसे प्रेम नहीं आसक्ति कहते हैं, लव नहीं, इनफैचुएशन। आवेग मात्र बुरे नहीं होते, प्रेम को उन शत्रुओं में नहीं गिना गया है जिन पर विजय पा कर मनुष्‍य पशु से आदमी बनता है। रही बात विज्ञान की, विज्ञान में प्रयोग के विफल होने के बाद प्रयत्‍न नहीं छोड़ दिया जाता। बार बार विफल होने के बाद भी अपनी पद्धति में परिष्‍कार करके, पुरानी गलतियों से बचते हुए प्रयत्‍न जारी रहता है। जब तक समस्‍या है, उसका समाधान नहीं मिलता तब तक प्रयत्‍न जारी रहेगा अन्‍यथा समस्‍या हमारी निष्क्रियता के कारण अधिक उग्र होती चली जाएगी। सच्‍चे प्रेम में समझदारी होती है, सन्‍तुलन होता है, उसका चरित्र व्‍यक्तियों और संबंधों के अनुसार बदलता रहता है, वह अन्‍धा नहीं होता। इतनी विफलताओं के बाद भी, गांधी जी की विफलता के बाद भी यदि मैं सोचता हूँ कि निराश होने से काम नहीं चलेगा तो कारण तीन हैं:

पहला, हमने इस समस्‍या को सही सन्‍दर्भ में रखा ही नहीं। समस्‍या के समाधान के लिए पहली जरूरत है उसके चरित्र को समझना। हमारी जो भी शिकायतें हैं उनके कारण को समझना। हम बहुत पहले की अपनी ही बात तो दुहरायें तो मनुष्‍य में गर्हित से देवोपम आचरण की अनन्‍त संभावनाऍं हैं और वह परिस्थितियों के दबाव में इनमें से कुछ भी हो सकता है। व्‍यक्ति ही नहीं पूरा का पूरा समाज। यदि उसका वैसा बना रहना हमारे लिए समस्‍या पैदा करता है तो हमे उसे उससे बाहर लाने या दूरी बना कर रहने का प्रयत्‍न करना होगा। मिटाने का तरीका आप अपना नहीं सकते। यह आपका तरीका भी नहीं है। आप के अनुसार यह उनका तरीका है और इसलिए ही आप उनसे घृणा करते हैं, परन्‍तु यह नहीं समझ पाते कि आपकी घृणा उनकी व्‍याधि को बढ़ा तो सकता है, घटा नहीं सकता। जहॉं साथ रहना एक विवशता हो वहॉं प्रेम नहीं, समझदारी की जरूरत होती है, जैसा आप यात्रा में करते हैं, एक ही प्रकार के संकट में घिर जाने पर करते हैं।

”विज्ञान की दुहाई देने वाला और कुछ न सीखने वाला मूर्ख तो हमारे पास बैठा हुआ है जो आज जब सूचना का तन्‍त्र इतना प्रबल है कि उसके सामने पड़ने पर तोपों का रुख मुड़ जाता है विचार की स्‍वतन्‍त्रता की लड़ाई में भी शामिल हो जाता है और किसी को असहमति का मौका भी नहीं देता। असहमत होने वालों पर गुर्राने लगता है। और इसके छोटे भाई आज भी नहीं समझ पाते कि यदि आपका ध्‍येय स्‍पष्‍ट और योजना व्‍याव‍हारिक हो तो सूचना तन्‍त्र से परिवर्तन लाया जा सकता है। वे आज भी गोली चला कर दुनियाा बदलने का काम कर रहे हैं और जहां तक उनकी पहुंच है वहां तक की जिन्‍दगी को नरक बना चुके हैं और नरक बनाए रखना चाहते हैं।

”हमें गुर्राना छोड़ कर समझने और समझाने का तरीका अपनाना होगा जिसका यह सोच कर कि मुसलमानों की भावनाऍं विचारों से आहत हो जाती हैं, कभी प्रयत्‍न किया ही नहीं गया। प्रयत्‍न केवल अपने को सही और दूसरे को गलत, अपने को ऊँचा और दूसरे को गया बीता सिद्ध करने का किया जाता रहा जिससे दूरियॉं बढ़ती हैं, समस्‍यायें जटिल होती है, खुले रास्‍ते भी बन्‍द होते हैं। हमें अपने एकान्‍तवादी सोच के दायरे से बाहर आने की चुनौती का सामना करना होगा।”

Post – 2016-09-06

निदान – 42
गांधी का नाम आए तो खुद को संभालिए
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”शास्‍त्री जी आपने कल इतनी विचित्र बातें कीं, कि लगा आप जल्‍दबाजी में कोई लेख पढ़ कर आए हैं जिसे अच्‍छी तरह समझ भी नहीं पाए हैं। एक का दूजे से मेल न था।”
शास्‍त्री जी ने कुछ कहा नहीं, केवल उत्‍सुकता से मेरी ओर देखने लगे।
”आपने कहा, ‘धार्मिक व्‍यक्ति को राजनीति नहीं करनी चाहिए। धर्म के क्षेत्र में काम करना चाहिए। राजनीति अपने चरित्र से ही धर्मनिरपेक्ष होने को बाध्‍य है अन्‍यथा देश का प्रशासन चल ही नहीं सकता।’ यह आपका वाक्‍य नहीं हो सकता। दूसरे आपने धर्म को सांप्रदायिकता समझ लिया, जिससे अापकी समझ पर मेरा भरोसा कुछ कम हुआ। शायद गोडसे को विक्षिप्‍त कहे जाने से आप इतने उद्विग्‍न हो गए थे कि जहाँ तहॉं के विचारों को ईंट पत्‍थर की तरह फेंक रहे थे, न कि न्‍याय विचार कर रहे थे।”
शास्‍त्री जी कुछ अव्‍यवस्थित लगे और सोच-विचार में पड़ गए।
”गांधी जी धार्मिक थे, इसमें सन्‍देह नहीं। ईश्‍वर में और ईश्‍वरीय प्रेरणा में उनका गहन विश्‍वास था। न होता तो वह अहंकारी हो जाते। अपने निर्णयों के पीछे किसी अदृश्‍य शक्ति की प्रेरणा और विश्‍वास ही उन्‍हें अडिग और नम्र बनाए रखती थी। उन्‍होंने अपने जीवन को ही प्रयोगशाला बना दिया था। प्रयोग करने वाले गलतियॉं करते हैं, उन्‍होंने भी कई गलतियां कीं जिन्‍हें उन्‍होंने छिपाया नहीं, परा सबसे बड़ी गलती की अली बन्‍धुओं को धार्मिक मान कर । वे धार्मिक नहीं थे, वे उस अमीर वर्ग के वर्चस्‍व की राजनीति के लिए अपने सम्‍प्रदाय की भावनाओं का इस्‍तेमाल कर रहे थे। वे कुरान के पाबन्द रहे हो सकते हैं। धर्मग्रन्‍थों का अपने वर्चस्‍व के लिए इस्‍तेमाल करने वाले धार्मिक नहीं होते, वे सही अर्थ में सेक्‍युलर होते हैं और इसीलिए मन्दिरों, मठों, गिरजो, मकतबों के लोग, मुल्‍ला और मौलवी लोग विरल मामलों में ही धर्मनिष्‍ठा वाले लोग होते हैं। वे अपनी सत्‍ता और संपत्ति की राजनीति करते हैं। अली बन्‍धुओं को धार्मिक मानना गांधी जी की बहुत बड़ी चूक थी। इसी तरह खिलाफत का आन्‍दोलन पान इस्‍लामी राजनीति का आन्‍दोलन था, धार्मिक आन्‍दोलन नहीं। यदि आप कहते राष्‍ट्रीय मुक्ति का नेतृत्‍व करने वाले को सांप्रदायिक राजनीति का साथ नहीं देना चाहिए; इसके परिणाम अनिष्‍ठकर होने को बाध्‍य हैं, तो बात अधिक सही होती।
”गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ में ही अपने अहं पर विजय पा ली थी। उनके लिए हार और जीत दोनो फालतू के शब्‍द हैं। सिद्धि और सिद्धि में बाधक का कुछ अर्थ हो सकता था। इस सिद्धि में अपने लिए कुछ नहीं था, अपना जैसा कुछ नहीं था। वह हार नहीं सकते थे, हारे वे जो जीतना और पाना चाहते थे और अपनी जीत के क्षणों में ही हारे ।
”गांधी तब हारते जब इतनी उपेक्षाओं और दुर्घटनाओं के बाद भी ईश्‍वर में उनका विश्‍वास डिग जाता। या उनका यह निर्णय गलत सिद्ध होता कि धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक व्‍यक्ति सत्‍ता के लिए कुछ भी कर सकता है, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जिन्‍ना इसी सोच के थे और यही उन्‍होंने सिद्ध किया। नेहरू इस माने में उनसे अलग न थे। पटेल भी न रहे हों तो आश्‍चर्य नहीं। इन्‍हें विफल नहीं होना पड़ा पर हारे ये सभी अपनी विजय के क्षण में ही। गांधी विफल हुए और अपने अपरिपक्‍व सहयोगियों के कारण कई बार हुए, परन्‍तु मनुष्‍य के चित्‍त को बदला जा सकता है, इसके लिए प्रयत्‍न जारी रखना होगा, यदि उनका यह विश्‍वास डिग जाता, ईश्‍वर में उनका विश्‍वास डिग जाता तो अवश्‍य यह उनकी हार थी। मुसलमानो को, उन मुसलमानों को भी, जो हिंसा में लिप्‍त थे, शैतान मान लेते तो उनकी हार हो सकती थी। वे जहां विफल हैं वहॉं भी अपराजित हैं।
”आप ने कहा, उन्‍होंने तिलक के साथ विश्‍वासघात किया । जिन्‍ना जो उनके सचिव थे, जिन्‍होंने गांधी का दक्षिण अफ्रीका से आने पर भव्‍य स्‍वागत किया था, जो विचारों में सेक्‍युलर थे, उन्‍हें मुसलमानों का प्रतिनिधि न मान कर अली ब्रदर्स काे उनका प्रतिनिधि कैसे मान लिया । मेरे एक दूसरे मित्र, कमलेश जी, भी जाे गए साल हमारा साथ छोड़ गए, बहुत आवेश में यह कहा करते और गांधी को कुटिल बताया करते थे। गांधी का स्‍वागत गांधी के लिए माने नहीं रखता था। गांधी व्‍यक्ति नहीं ध्‍येय थे। तिलक का सचिव बनने के बल पर एक ऐसा मुसलमान जो इस्‍लाम का पाबन्‍द नहीं है, नाम का, दुर्घटनावश मुसलमान था, उसकी मुस्लिम समाज में पैठ नहीं थी। उसकी योजना में यह रहा हो सकता है और ऐसी दूर की योजनाऍं बनाने वाले क्‍या कर सकते हैं इसकी समझ गांधी को थी। अली बन्‍धुओं को महत्‍व देना बिल्‍कुल गलत नहीं था, खिलाफत आन्‍दोलन को कांगेस का आन्‍दोलन बना देना सरासर गलत था और इसी के लिए गांधी ने हिमालयन ब्‍लंडर शब्‍द गढ़ा था। यह उनका ही आत्‍मस्‍वीकार था। प्रसंग चाहे जो हो ।
”और जो तिलक के साथ विश्‍वासघात का प्रश्‍न है, या उनके उद्देश्‍य को आगे बढ़ाने का प्रश्‍न है, उनका उद्देश्‍य जिन्‍ना को मुसलमानों का प्रतिनिधि बनाना था या पूर्ण स्‍वराज्‍य ? उस दिशा में क्‍या गांधी ने कोई ढील दी ? नहीं, गांधी इतने सरल हैं कि उनको समझना उन लोगों को मुश्किल पड़ता है जो यह नहीं जानते कि नन्‍हा सा बच्‍चा कैसे समझ लेता है कि यह आदमी मुझे प्‍यार नहीं करता और उसके हाथ बढ़ाने पर भी वह उससे बचने का प्रयत्‍न करता है, जब कि दूसरे अपरिचित की गोद में हँसते हुए चला जाता है। गांधी किताबों को उलट पलट लेते थे, परन्‍तु उनके ज्ञान भंडार से बहुत कम काम लेते थे। जो भारत के प्राचीन ज्ञान का पारंगत है वह गॉंधी को नहीं समझ सकता । वह भारत नहीं हैं, न प्राचीन हैं। जो पश्चिम के ज्ञान का गधा है वह अपनी लादी तक नहीं सँभाल सकता क्‍योंकि भारतीय यथार्थ उसे इधर उधर फेंकता रहेगा, वह गांधी को समझ ही नहीं सकता और अपने को आधुनिक तो कह सकता है, आधुनिक बन नहीं सकता। अपने समय में ही नहीं, आज तक के आधुनिकतम व्‍यक्ति गॉंधी है और मानवता का भविष्‍य भीगांधीवाद है । जो सभी ज्ञानों अज्ञानों को आदर देते हुए भी अपने प्रयोग में उन्‍हें किनारे रख कर व्‍यर्थ कर देता और मानवता का मंत्र देता है वह गांधी है। मानवीय होना यदि गांधीवाद का पर्याय बन जाय तो गांधीवाद से मानवता कैसे बच सकती है। गांधी हमारा वर्तमान न बन पाया परन्‍तु विश्‍व का भविष्‍य गांधी है।
”अाप कह रहे थे जिन्‍ना सेक्‍युलर थे। आज कल अपने को सेक्‍युलर कहने वालों का सरकस गोष्‍ठी-दर- गाेष्‍ठी, अखबार-दर-अखबार, चैनल-दर-चैनल मिल जाएगा, पर क्‍या हम जानते हैं सेक्‍युलर हो कौन सकता है, सेक्‍युलरिज्‍म का अर्थ क्‍या है? सेक्‍यलरिज्‍म का अर्थ है राज्‍य अपनी सीमा में प्रचलित मतों, धर्मो और संप्रदायों के प्रति न आसक्ति रखेगा, न किसी का दमन करेगा, न किसी का पक्ष लेगा। व्‍यक्ति का धार्मिक होना, न होना, आस्तिक होना, न होना राज्‍य के लिए कोई अर्थ नहीं रखता, न ही इस आधार पर कोई भेदभाव किया जा सकता है। इसका विधान हमारे संविधान में थाफ
”अाप स्‍वयं देखिए, ये इतने गधे हैं, मेरा मतलब अपने को सेक्‍युलर कहने वालों से है। और यदि आपको लगता है कि मैं उन्‍हें गधा कह कर उनका अपमान कर रहा हूँ तो इस बात पर ध्‍यान दीजिए कि मैं उनके अपमान काे सह्य बना रहा हूँ, क्‍योंकि यदि गधा न कहता तो उनको कमीना कहना पड़ता जो उन्‍हें सचमुच बुरा लगता क्‍योंकि यही उनकी सचाई बयान करता है। सोचो, य‍दि सेक्युलर राज्‍य हो सकता है तो क्‍या अपने को सेक्‍युलर कहने वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपने गधेपन या कमीनेपन के कारण अपने को सत्‍ता नहीं मानने लगा है और उसके बात, व्‍यवहार, और लेखन से यह नहीं लग रहा है कि राज्‍य उसके निर्णय के अनुसार नहीं चल रहा है इसलिए वह कम्‍युनल है।
”और सोचिए इस सेक्‍युलर राज्‍य का जिसमें हज के लिए राज्‍य प्रोत्‍साहित करता है, इफ्तार पार्टियों की स्‍पर्धा खड़ी हो जाती है, जाली टोपी लगाने की होड़ लग जाती है, जब कि मुसलमान भी जानते हैं कि ये नाटक करने वाले कमीने लोग हैं और हमें आदमी से वोटबैंक बनाने काे सेक्‍युलरिज्‍म कह कर अपने को भी ठगते हैं और अपने देश और समाज को भी। ठगों को देश बना कर हम किसका भला करेंगे और कैसा भारत बनाएंगे । नहीं, गलत कह गया मैं, कहना था ‘ठगों को देश सौंप कर हमने किसका भला किया और कैसा भारत बनाया ?’ जिसमें समझदारी का दावा करने वाले बौद्धिक कारोबारी ही नहीं, गिरे हुए कारोबारी बन गए हैं और वे ही देश को दिशा दिखाना चाहते हैं।”
इतनी खिंचाई के बाद तो भींगी रस्‍सी भी सॉप की तरह तन जाती है, गो रहती रस्‍सी ही है। शास्‍त्री भी तन गए , ”क्षमा करें डाक्‍साब। आप हमारे सामने बोलते हैं तो विश्‍वविजेता की तरह बोलते हैं, और हम उसे सह भी लेते हैं, परन्‍तु आपको पता है आप हिन्‍दी संसार नहीं हैं, न हो सकते हैं। वह संसार आपको क्‍या समझता है, इसे आप जानते हैं, न जानते हों तो मैं बता दूँ।”
”य‍दि आत्‍मविक्रयी बुद्धिजीवियों को हिन्‍दी संसार मानते हैं तो मुझे आप पर तरह आता है, और तरस नहीं भी आता है जब सोचता हूँ आप ठहरे संस्‍कृत के आचार्य जो न अपने प्राचीन को जानते हैं न नवीन को, जानते केवल यह है कि कोई कथन व्‍याकरण की दृष्टि से शुद्ध है या अशुद्ध । यदि शुद्ध है तो सही है, नहीं है तो गलत है। खैर आप संचार माध्‍यमों पर अधिकार जमाए लोगों को हिन्‍दी संसार मानते हैं तो उसमें जो कुछ लिखा जा रहा है, जो बहसें चल रही हैं, उनका एक एक शब्‍द और उसकी पृष्‍ठभूमि जानने के कारण मैं उन्‍हेंं मैं कूड़ा समझता हूँ और जो मैं कहता या लिखता हूँ उसको समझने की योग्‍यता उनमें हैं नहीं, न इसका उन्‍होंने प्रयत्‍न किया, इसलिए वे मेरे लिखे को कूड़ा मानें तो मुझे लगेगा कि अब भी उनमें इतना आत्‍मसम्‍मान तो बाकी है कि उसे बचाने का तरीका न मालूम होने के बाद भी वे उसे बचाना चाहते हैं।”
”शास्‍त्री जी, आप और अापकी संस्‍था गांधी को नहीं समझ सकती। कांग्रेसी गांधी काे नहीं समझ सकते, कम्‍युनिस्‍ट गांधी को नहीं समझ सकते, जो गांधी के नाम पर चल रहे उद्योगों और प्रतिष्‍ठानों पर विराज रहे हैं वे गांधी को नहीं समझ सकते, परन्‍तु अपने इतने हत्‍यारों के बीच मानवता का भविष्‍य तो वही है। आश्‍चर्य मुझे यह है कि आप गोडसे तक को नहीं समझ पाए । वह विक्षिप्‍त था, जिसे वह सही समझता था उसके लिए बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के अपने प्राण और मरणोत्‍तर सम्‍मान तक दे सकता था और उन बलिदानियों की कोटि में कुछ आगे आता था जो जान देते हुए यह भरम पाले हुए थे कि ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही नामो निशां होगा’ यह तो उस मरणोत्‍तर यश की भी बलि चढ़ा रहा था। अपना उल्‍लू साधने और सत्‍ता पर अधिकार जमा कर अपना इतिहास लिखवाने वालों की तुलना में वह बहुत महान था पर गांधी का नाम आए तो खुद को संभालिए।’

Post – 2016-09-05

निदान – 41
शासकीय इतिहास का सत्‍य

”आप को किस बात पर आपत्ति थी शास्‍त्री जी”, मैंने स्‍वयं कुरेदा ।

”आपत्ति कहना भी ठीक न होगा, ”पहली बात तो यह कि मुझेे नहीं लगता कि नाथूराम गोडसे को विक्षिप्‍त कहा जा सकता है। उसके बयान को पढि़ए, उसने प्रत्‍येक घटना का बहुत बारीकी से अध्‍यन किया था और उसका दृष्टिकोण आस्‍थावादी न हो कर वस्‍तुपरक था। यह सुविचारित फैसला था।

”दूसरी बात मैं कहना यह चाहता था कि यदि पश्चिमी मतों की प्रेरणा का स्रोत भारत ही था तो उनकी प्रकृति इतनी हिंसावादी क्‍यों हो गई कि उनमें हिंसा धर्म बन जाती है और धर्म हिंसा का कवच।”

”और तीसरी बात मैं यह कहना चाहता था, कि गांधी के प्रति द्वेष भावना रखने वाले दो थे । एक तो हमारे संगठन में भी और हिन्‍दू महासभा में भी गांधी जी के अली भाइयों के हाथ का खिलौना बन जाने के बाद उनसे दूरी बनाने के बाद भी मुसलमानों को खुश करने के लिए जिस तरह उनकी बीन पर सॉंप की तरह नाचते रहे कि वे किसी तरह खुश हो जायँ और उनकी इन समझौतावादी नीतियों के बाद भी, या शायद इससे बिदक कर मुसलमान हिन्‍दुओं पर बहाने तलाश करके और बहाने गढ़ कर कत्‍ल करते रहे उसे देखते हुए लगता कि अपने हिन्‍दू होने का गांधी जी लाख दावा करें, उनकी दृष्टि में हिन्‍दू की पीड़ा पीड़ा थी ही नहीं, इसलिए उनके कारण हिन्‍दुओं को जितना अपमानित होना पड़ा, जितना उत्‍पीड़न सहना पड़ा उसे देखते गांधी के प्रति वितृष्‍णा पैदा होना स्‍वाभाविक था। यह हिन्‍दू संगठनों में ही हो सकता था, क्‍योंकि दूसरे सभी हिन्‍दू की भावनाओं और यातनाओं की कीमत पर अपनी राजनीति कर रहे थे, जब कि हिन्‍दू महासभा और संघ समर्पित भाव से अपने समुदाय की वेदना को अनुभव कर रहे थे। डाक्‍साब, आप कुछ भी कहें, गांधी अतिकर्षित, ओवररेटेड, नेता हैं और उन्‍होंने कांग्रेस, देश का, और समाज का अधिक अहित किया। आप कहते हैं नेहरू ने देश का अधिक अहित किया, मैं कहता हूँ गांधी उस अहित की जड़ हैं।” शास्‍त्री जी आज पूरी तैयारी से आए थे।

मैंने कहा, ”शास्‍त्री जी आप प्रश्‍न कब पूछेंगे ?”

शास्‍त्री जी चकित, ”क्‍या मेरे प्रश्‍न आपको प्रश्‍न जैसे नहीं लगते ?” आज शास्‍त्री जी गोडसे की मुद्रा में आ गए थे। मेरे प्रति जो थोड़ा सा विनम्र भाव था, उस पर मान्‍यता की दृढ़ता हावी हो गई थी।

”प्रश्‍न होता तो जवाब देता । यह तो प्रश्‍नावली थी । और प्रश्‍नावली के अन्‍त में जो केन्‍द्रीय प्रश्‍न था उसका समाधान भी आपने पेश कर दिया था, इसलिए वह प्रश्‍न रह ही न गया था। अब आपको अपनी प्रश्‍नोत्‍तरी में से चुनाव करना है कि आपका पहला प्रश्‍न क्‍या है ?”

शास्‍त्री जी इसके लिए तैयार हो कर तो आए नहीं थे। हताशा में निकला ”डा..क्… स…आ…ब।” यह पूरा उत्‍तर था । निरुत्‍तर होने का । परन्‍तु इसी में से एक ऐसी लौ फूटी कि वह तन कर खड़े हो गए, ”यदि उत्‍तर है तो उत्‍तर से आरंभ करूँ । अनुमति है ?”

मैं खुश था कि अब मुझे उत्‍तर देने के लिए सोचना नहीं पड़ेगा, केवल सुनना पड़ेगा। मैंने हामी भर दी।

”पहली बात यह कि गांधी जी में आत्‍मबल बहुत था। जो ठान लिया उसे करके दिखाना है यह संकल्‍प अनन्‍य था। दक्षिण अफ्रीका में उनको जो सफलता मिली थी वह किसी अन्‍य के लिए दुर्लभ थी। विषम परिस्थितियों में उन्‍होंने अपने चित्‍त को जिस तरह अप्रभावित रखा उसका उदाहरण आधुनिक जीवन में मिलता नहीं और अतीत के बारे में हम इतना कम जानते हैं कि उसका दावा किसी के विषय में नहीं कर सकते। परन्‍तु इससे उनके मन में जो आत्‍मविश्‍वास पैदा हुआ था वह तानाशाही वाला था, यह कि वह दूसरे सभी लोगों के फैसलों के ऊपर अपने फैसले लाद सकते हैं और उससे पीछे हट नहीं सकते। उन्‍हें अपना निर्णय मानने को बाध्‍य कर सकते हैं । क्‍या मैं उनके प्रति अनुदार हो रहा हूँ ?”

”आप ठीक कह रहे हैें।” मैंने समर्थन किया ।

”गांधी जी राजनीतिज्ञ थे । राजनीतिज्ञ जब सत्‍य और न्‍याय काे अपना आयुध बनाता है तो भी उसका रणनीतिक महत्‍व अधिक होता है, तात्विक महत्‍व कम।
इसके अपवाद गांधी जी भी नहीं हो सकते थे और न थे। तिलक ने उन्‍हें कांग्रेस का भार सौंपा था और उन्‍होंने दावा किया था कि वह तिलक की विरासत को आगे बढ़ाएंगे। तिलक के सचिव मुहम्‍मद अली जिन्‍ना थे जिनका दृष्टिकोण राष्‍ट्रवादी था। यह वह व्‍यक्ति था जिसने गांधी के भारत आने पर महासभा का आयोजन किया था और गांधी ने उसे ही मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधि मानने की जगह मुहम्‍मद अली और शौकत अली को मान लिया। स्‍वतन्‍त्रता के धर्मनिरपेक्ष आन्‍दोलन को खिलाफत में साथ दे कर उसको पथभ्रष्‍ट कर दिया। जिस सांप्रदायिक विभाजन की तैयारी ब्रितानी राजविद उन्‍नीसवीं शताब्‍दी से करते आए थे और भारतीय सामाजिक ताने बाने के कारण सफल नहीं हुए थे, उसकी सफलता का रास्‍ता गांधी जी ने अपने अहंकार में खोल दिया और उससे आगे का इतिहास यह रहा कि उसी जिन्‍ना के सामने उन्‍हें वे दंड पेलने पड़े कि एक अवसर पर वह जिसे मक्‍खी की तरह निकाल बाहर कर चुके थे, उसे ही अविभाजित भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनाने को भी तैयार हो गए थे, परन्‍तु इस समय तक उनका उपयोग करने वाले उनका आदेश मानने को तैयार नहीं थे।” शास्‍त्री जी हमारी दत्‍तचित्‍तता से इतने मगन हो गए कि मेरी उपस्थिति को भूल कर मुझसे ही सवाल कर र‍हे थे, ”‍कि मैं झूठ बोल्‍या , कि मैं जहर घोल्‍या?”

जवाब में मुझे उन्‍हीं के सुर में सुर मिला कर कहना पड़ा, ”कोइ ना, भाइ कोइ ना।”

शास्‍त्री जी अपनी लय में थे, ”यदि आप गांधी की जिद से होने वाली राष्‍ट्रीय क्षति को देखें तो नेहरू से हाेने वाली क्षति नगण्‍य थी। वह धार्मिक थे, धर्म के क्षेत्र में क्रान्तिकारी थे, परन्‍तु उन्‍हें यह क्रान्ति धर्म के क्षेत्र में करनी चाहिए थी। राजनीति अपने चरित्र से ही धर्मनिरपेक्ष होने को बाध्‍य है अन्‍यथा देश का प्रशासन चल ही नहीं सकता। मुस्लिम समाज को अपना बनाने के प्रयत्‍न में उन्‍होंने अंग्रेजो को इसके बाद खुल कर मुस्लिम कार्ड खेलने और स्‍वतंत्रता आंदोलन से उनको अलग रखने के हथकंडे आजमाने का अवसर दे दिया। बाद की समस्‍त त्रासदियों के लिए मैं गांधी को ही जिम्‍मेदार मानता हूँ वह शब्‍दों से कुछ भी कहें। वह सत्‍यनिष्‍ठ होते तो सबसे पहले वह यह घोषित करते कि मैंने तिलक की गद्दी ली है परन्‍तु उसकी न‍ीतियों से प्रस्‍थान कर रहा हूँ । यह उन्‍होंने नहीं कहा। सत्‍य उनका रणनीतिक हथियार था, जिसका अवसर देख कर वह प्रयोग करते थे और जो सबसे निर्णायक बिन्‍दु थे, उन पर वह मौन साध लेते थे।”

”मतलब आप गोडसे को अपना नायक, अपनी विचारधारा का उन्‍नायक मानते हैं और यह स्‍वीकार करते हैं कि आप का नेतृत्‍व इसे मानता है पर स्‍वीकार करने का साहस नहीं कर पाता ?”

शास्‍त्री जी उठ खड़ हुए, ”डाक्‍साब, आप स्‍वयं कहते हैं, सभी प्रश्‍नों का उत्‍तर हॉं या नहीं में नहीं होता। कुछ के साथ कुछ उपवाक्‍य भी जुडते हैं। इसलिए यदि आप उपवाक्‍यों को समझ सकें तो मुझे न हॉं कहना होगा, न ना।”

आज पहली बार चलते हुए मेरे पांवों का स्‍पर्श किया। पता नहीं चला, श्रद्धा में या व्‍यंग्‍य में ।

Post – 2016-09-05

निदान – 41

”आप को किस बात पर आपत्ति थी शास्‍त्री जी”, मैंने स्‍वयं कुरेदा ।

”आपत्ति कहना भी ठीक न होगा, ”पहली बात तो यह कि मुझेे नहीं लगता कि नाथूराम गोडसे को विक्षिप्‍त कहा जा सकता है। उसके बयान को पढि़ए, उसने प्रत्‍येक घटना का बहुत बारीकी से अध्‍यन किया था और उसका दृष्टिकोण आस्‍थावादी न हो कर वस्‍तुपरक था। यह सुविचारित फैसला था।

”दूसरी बात मैं कहना यह चाहता था कि यदि पश्चिमी मतों की प्रेरणा का स्रोत भारत ही था तो उनकी प्रकृति इतनी हिंसावादी क्‍यों हो गई कि उनमें हिंसा धर्म बन जाती है और धर्म हिंसा का कवच।”

”और तीसरी बात मैं यह कहना चाहता था, कि गांधी के प्रति द्वेष भावना रखने वाले दो थे । एक तो हमारे संगठन में भी और हिन्‍दू महासभा में भी गांधी जी के अली भाइयों के हाथ का खिलौना बन जाने के बाद उनसे दूरी बनाने के बाद भी मुसलमानों को खुश करने के लिए जिस तरह उनकी बीन पर सॉंप की तरह नाचते रहे कि वे किसी तरह खुश हो जायँ और उनकी इन समझौतावादी नीतियों के बाद भी, या शायद इससे बिदक कर मुसलमान हिन्‍दुओं पर बहाने तलाश करके और बहाने गढ़ कर कत्‍ल करते रहे उसे देखते हुए लगता कि अपने हिन्‍दू होने का गांधी जी लाख दावा करें, उनकी दृष्टि में हिन्‍दू की पीड़ा पीड़ा थी ही नहीं, इसलिए उनके कारण हिन्‍दुओं को जितना अपमानित होना पड़ा, जितना उत्‍पीड़न सहना पड़ा उसे देखते गांधी के प्रति वितृष्‍णा पैदा होना स्‍वाभाविक था। यह हिन्‍दू संगठनों में ही हो सकता था, क्‍योंकि दूसरे सभी हिन्‍दू की भावनाओं और यातनाओं की कीमत पर अपनी राजनीति कर रहे थे, जब कि हिन्‍दू महासभा और संघ समर्पित भाव से अपने समुदाय की वेदना को अनुभव कर रहे थे। डाक्‍साब, आप कुछ भी कहें, गांधी अतिकर्षित नेता हैं और उन्‍होंने कांग्रेस, देश का, और समाज का अधिक अहित किया। आप कहते हैं नेहरू ने देश का अधिक अहित किया, मैं कहता हूँ गांधी उस अहित की जड़ हैं।” शास्‍त्री जी आज पूरी तैयारी से आए थे।

मैंने कहा, ”शास्‍त्री जी आप प्रश्‍न कब पूछेंगे ?”

शास्‍त्री जी चकित, ”क्‍या मेरे प्रश्‍न आपको प्रश्‍न जैसे नहीं लगते ?” आज शास्‍त्री जी गोडसे की मुद्रा में आ गए थे। मेरे प्रति जो थोड़ा सा विनम्र भाव था, उस पर मान्‍यता की दृढ़ता हावी हो गई थी।

”प्रश्‍न होता तो जवाब देता । यह तो प्रश्‍नावली थी । और प्रश्‍नावली के अन्‍त में जो केन्‍द्रीय प्रश्‍न था उसका समाधान भी आपने पेश कर दिया था, इसलिए वह प्रश्‍न रह ही न गया था। अब आपको अपनी प्रश्‍नोत्‍तरी में से चुनाव करना है कि आपका पहला प्रश्‍न क्‍या है ?”

शास्‍त्री जी इसके लिए तैयार हो कर तो आए नहीं थे। हताशा में निकला ”डा..क्… स…आ…ब।” यह पूरा उत्‍तर था । निरुत्‍तर होने का । परन्‍तु इसी में से एक ऐसी लौ फूटी कि वह तन कर खड़े हो गए, ”यदि उत्‍तर है तो उत्‍तर से आरंभ करूँ । अनुमति है ?”

मैं खुश था कि अब मुझे उत्‍तर देने के लिए सोचना नहीं पड़ेगा, केवल सुनना पड़ेगा। मैंने हामी भर दी।

”पहली बात यह कि गांधी जी में आत्‍मबल बहुत था। जो ठान लिया उसे करके दिखाना है यह संकल्‍प अनन्‍य था। दक्षिण अफ्रीका में उनको जो सफलता मिली थी वह किसी अन्‍य के लिए दुर्लभ थी। विषम परिस्थितियों में उन्‍होंने अपने चित्‍त को जिस तरह अप्रभावित रखा उसका उदाहरण आधुनिक जीवन में मिलता नहीं और अतीत के बारे में हम इतना कम जानते हैं कि उसका दावा किसी के विषय में नहीं कर सकते। परन्‍तु इससे उनके मन में जो आत्‍मविश्‍वास पैदा हुआ था वह तानाशाही वाला था, यह कि वह दूसरे सभी लोगों के फैसलों के ऊपर अपने फैसले लाद सकते हैं और उससे पीछे हट नहीं सकते। उन्‍हें अपना निर्णय मानने को बाध्‍य कर सकते हैं । क्‍या मैं उनके प्रति अनुदार हो रहा हूँ ?”

”मैंने कहा, आप ठीक कह रहे हैें।” मैंने समर्थन किया ।

”गांधी जी राजनीतिज्ञ थे । राजनीतिज्ञ जब सत्‍य और न्‍याय काे अपना आयुध बनाता है तो भी उसका रणनीतिक महत्‍व अधिक होता है, तात्विक महत्‍व कम।
इसके अपवाद गांधी जी भी नहीं हो सकते थे और न थे। तिलक ने उन्‍हें कांग्रेस का भार सौंपा था और उन्‍होंने दावा किया था कि वह तिलक की विरासत को आगे बढ़ाएंगे। तिलक के सचिव जैसे मुहम्‍मद अली जिन्‍ना थे जिनका दृष्टिकोण राष्‍ट्रवादी था, यह वह व्‍यक्ति था जिसने गांधी के भारत आने पर महासभा का आयोजन किया था और गांधी ने उसे ही मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधि मानने की जगह मुहम्‍मद अली और शौकत अली को मान लिया, स्‍वतन्‍त्रता के धर्मनिरपेक्ष आन्‍दोलन को खिलाफत में साथ दे कर उसको इतना पथभ्रष्‍ट कर दिया। जिस सांप्रदायिक विभाजन की तैयारी ब्रितानी राजविद उन्‍नीसवीं शताब्‍दी से करते आए थे और भारतीय सामाजिक ताने बाने के कारण सफल नहीं हुए थे, उसकी सफलता का रास्‍ता गांधी जी ने अपने अहंकार में खोल दिया और उससे आगे का इतिहास यह रहा कि उसी जिन्‍ना के सामने उन्‍हें वे दंड पेलने पड़े कि एक अवसर पर वह जिसे मक्‍खी की तरह निकाल बाहर कर चुके थे, उसे ही अविभाजित भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनाने को भी तैयार हो गए थे, परन्‍तु इस समय तक उनका उपयोग करने वाले उनका आदेश मानने को तैयार नहीं थे।”
शास्‍त्री जी हमारी दत्‍तचित्‍तता से इतने मगन हो गए कि मेरी उपस्थिति को भूल कर मुझसे ही सवाल कर र‍हे थे, ”‍
कि मैं झूठ बोल्‍या ?”

जवाब में मुझे उन्‍हीं के सुर में सुर मिला कर कहना पड़ा, ”कोइ ना, भाइ कोइ ना।”

आज विज्ञान की प्रेरणा का स्रोत पश्चिम बना हुआ है। बहुत सी बातें हमने उससे ली हैं। उस ज्ञान का उपयोग काफी दूर तक हमारी समस्‍याओं का समाधान करने के लिए किया जाता है और कुछ मामलों में हम उनसे भी आगे बढ़ जाने का या उनसे अलग कुछ नया करने का दावा भी करते हैं। परन्‍तु इस ज्ञान का उससे भी अधिक उपयोग मिलावट, हिंसा, व्‍यभिचार, अपदोहन, घटिया उत्‍पादन आदि में किया जा रहा है। इसके उदाहरण उन अग्रणी देशों में न मिलेंगे क्‍योंकि इस बीच उन्‍होंने सभी दृष्टियों से उन्‍नति की है और केवल ज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, मानवमूल्‍यों के स्‍तर पर वे बहुत आगे जा चुके हैं। अर्थव्‍यवस्‍था से नैतिकता का कितना गहरा संबन्‍ध है इसे समझने में शायद आपको इससे मदद मिले। ज्ञान और अनुसंधान के साथ भी अर्थव्‍यवस्‍था का बहुत गहरा संबन्‍ध है। हम एक राष्‍ट के रूप में अतीत में भी उतने सुसंस्‍कृत कभी नहीं रहे जितना आज पश्चिमी जगह हो चुका है ।”

मेरा मित्र इस बीच कुछ कहने के लिए दो बार होठों को जुंबिश दे चुका था, जिसकी ओर मेरा ध्‍यान गया तो था पर अपनी बात कहता गया था। अब उसकी ओर मुड़ा तो उसने हँसते हुए मेरे कन्‍धे पर थाप दी और बोला, ”तुम कुछ नहीं जानते। बहुत भोले हो। भोले भी और बदहवास भी । कभी कहोगे आज के समस्‍त अपराधों और खुराफातों की जड़ पश्चिम है और आज कह रहे हो कि…”

”देखो मैं समाज की बात कर रहा हूँ तुम व्‍यवस्‍था की बात कर रहे हो। वहाँ के पूँजीवादी तन्‍त्र का और पोपवादी तन्‍त्र का जिनका चेहरा इतना पैशाचिक है जितना इतिहास में पहले कोई हुआ नहीं। परन्‍तु विचित्र यह है कि साम्‍यवादी प्रसार के खतरे के कारण उसी व्‍यवरूथा ने अपने समाज केे विक्षोभ को कम करने के लिए जो रियायतें दीं उनके कारण वहा का पूरा समाज एक राष्‍ट्र बन चुका है, पश्चिमी अर्थ में नहीं और हमारे अति प्राचीन अर्थ में भी नहीं, एक सुगठित और व्‍यवस्थित समाज केे रूप में जिसकी परिकल्‍पना ले कर हमने अपने दलों के साथ राष्‍ट्र का प्रयोग किया था। इससे पहले उसका संभ्रान्‍त वर्ग जिसने लूट में साझेदारी की थी या जिसे औपनिवेशिक प्रसार से अवसर मिले थे, वह भी हमसे बहुत आगे था, परन्‍तु समाज के दबे कुचले जनों की‍ स्थिति उससे भी खराब थी जो हमारे यहॉं उन दौरों में परिगणित समुदायों की थी। उन्‍हें यह लाभ साम्वादी चुनौती के कारण मिला इसलिए नैतिक दृष्टि से उनके समाज का स्‍तर हमसे बहुत ऊॅॅचा है। अपराधी वहॉं भी मिलेंगे, मनोविकृत जन वहॉं भी मिलेंगे, बीमार और अपाहिज वहॉं भी मिलेंगे। उनकी तुलनात्‍मक संख्‍या कम मिलेगी।
उनकी तुलनात्‍मक संख्‍या कम मिलेगी। देखो, मैंने मात्र एक उदाहरण दिया था कि हमारी सोच, नैतिकता, आचरण, बोध सभी पर हमारेे अर्थतन्‍त्र का और उसमें अपनी आर्थिक हैसियत का प्रभाव पड़ता है इसलिए एक सांस्‍कृतिक सन्‍दर्भ से उठाए गए मूल्‍य, आदर्श और विचार दूसरी में उसके स्‍तर और गठन के अनुसार परिष्‍कृत या विकृत हो जाते हैं। हाल की सदियों में पश्चिम ने हमसे जितना ग्रहण किया उतना अपनी पूरी परंपरा से ग्रहण न किया होगा, परन्‍तु उन सभी का उसने ऐसा परिष्‍कार किया और इस तरह आत्‍मसात् कर लिया कि वे उसकी अपनी चीज लगते हैं। हमने कला, सौन्‍दर्यमान, कौशल और ज्ञान और आचार के क्षेत्र में उनसे जो पाया था उसका भी ह्रास या सत्‍यानाश कर दिया। औपनिवेशिक काल की संस्‍थाएंं, विभाग और हमारी अपनी पहल से स्‍थापित उनके प्रतिरूप आज की तुलना में अधिक लोकतान्त्रिक थे । हमने औपनिवेशिक काल के सीमित लोकतन्‍त्र को भी माफियातन्‍त्र में बदल दिया।

”ठीक ऐसा ही हुआ था, भारतीय दार्शनिक और धार्मिक विचारों के साथ । पश्चिम एशिया के उर्वर अर्धचन्‍द्र की महिमा जितनी भी गाई जाए, आहार उत्‍पादन के मामले में वह भारत के सिन्‍धु गंगा मैदान की तुलना में नहीं रखा जा सकता। अरब और मिश्र और सामी क्षेत्र मुख्‍यत: चारणजीवी रहा ह और इसलिए बाइबिल में भी शेफर्ड, हई, लैंब की उपमाऍं ही आती हैं। उनमें हिंसा और आपसी कलह सामान्‍य रहा है। बेबीलोन और मसोपोटामियाई क्षेत्र पर विजय करने वालों ने जिस तरह के नरसंहार किए थे उसकी कल्‍पना से ही रोमांच हो जाता है। एेसा एक बार नहीं हुआ कि पूरे नगर के नगर का कत्‍लेआम कर दिया गया हो और खून नालियों में बह रहा हो। आहार की समस्‍या मनुष्‍य को क्रूर और असहिष्‍णुुु बना देती है और यदि किसी अन्‍य सभ्‍यता से हिंसा, अस्‍तेय आदि काेे श्रेष्‍ठ मूल्‍य के रूप में स्‍वीकार कर ले तो भी उसका निर्वाह नहीं कर पाता । इसलिए किताबी स्‍तर पर समानताऍं अधिक मिलेंगी और आचरण के स्‍तर पर उनके ठीक विपरीत उदाहरण मिलेंगे। इस अन्‍तर को ध्‍यान में रखते हुए निम्‍न पंक्तियों की समानता या निकटता को समझनेे का प्रयत्‍न होना चाहिए।