Post – 2016-05-08

8-5-16
– तुमने उस ‘बड़ी खबर’ को देखा था जिसमें छोटा भाई सत्तर साल के बड़े भाई को पीट रहा था और बाद में उसका लड़का आया तो उसने भी एक लात लगाया। बताया जा रहा था कि यह चित्र वायरल हो गया है, गरज कि इसका मजा वायरस की तरह चारों ओर फैलता जा रहा है और लोग खुशी खुशी इसकी चपेट में आते जा रहे हैं।
– बड़ी खबरें तुम्हें ही मुबारक। मैं तो उन छोटी खबरों की तलाश में रहता हूं जो सूचना और विचार के नाम पर, खोजी पत्रकारिता के नाम पर चल रहे मनोरंजन के फूहड़ उद्योग के सुनामी में लुप्त होती जा रही हैं और हम पत्रकारिता की उस आदिम अवस्था की ओर लौट चलें हैं जिसमें समय काटने के लिए कहीं बैठे बूढ़े गली मुहल्ले के लोग, प्रतिष्ठित परिवारों के अंतरंग किस्सों और अफवाहों का बाजार गर्म रखते थे और फिर किसी को सूझा कि इसे जुटा कर, छाप कर एक धन्धा क्यों न बना लिया जाय. उस आदिम जिज्ञासा से आगे बढ़ते हुए यह उस महिमा तक पहुंचा था, जिसमें यह लोकतंत्र का चौथा पाया बन गया था. बड़ी खबरें जो अपराध की दुनिया का पड़ताल करके कहानियां गढ़ती हैं, जो अंडरवर्ल्ड को सबसे महत्वपूर्ण वर्ल्ड बनाने का काम कर रही है और धनकुबेर बनने की होड़ में अंडरवर्ल्ड के नुस्खोंं पर काम कर रही हैं, उन छोटी खबरों को हजम कर गई हैं जो सभ्य समाज की चिन्ताओं और सरोकारों का संसार से जुड़ी थीं । मुझे यह जान कर पीड़ा हुई कि मेरा दोस्त ‘बड़ी’ खबरों की तलाश में रहता है।
– तुम यह क्यों भूल जाते हो कि इन ‘बड़ी’ खबरों को लोकप्रिय बनाने में तुम लोगों की भूमिका सबसे अधिक है और वह भी इसलिए कि ‘छोटी’ खबरों को जिनमें आम जनों की समस्याओं और विचारों का पता चलता है, तुम स्वयं देखना नहीं चाहते. उनका सामना नहीं करना चाहते. जो उनसे रू-ब-रू होना चाहते हैं, संतुलन की अपेक्षा करते हैं उनका उपहास करते हो. कारण यह कि तुम यथास्थितिवादी बन गए हो और उस दुनिया में कोई फेर बदल करने का न तो तुम्हारे पास कोई कार्यक्रम है, न इरादा, न उसकी तुम्हें जरूरत है। तुम लोग स्वयं अंडरवर्ल्डत के हथकंडे अपना कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए अपराधों और भटकावों का नया दर्शन गढ़ रहे जो जो तुमसे पैदा हो कर मीडिया तक खत्म हो जाता है, जो बड़ी खबरों का सबसे मजबूत पाया बन चुकी है और इसके कारण ही वह पाया जो कभी सत्ता को उन सूचनाओं और विचारों और भावी योजनाओं और उनकी कमियों को प्रकाश में लाते हुए, सच कहो तो एक जरूरी और अधिक लोकतांत्रिक तीसरे सदन की भूमिका निभाता था, आज वह इन बड़ी खबरों, उत्तेजक विचारों, खबरों को जुए के पासों की तरह घुमा कर फेंकने के कारनामों के कारण उस क्षरण पर, इतनी जल्दी, पहुंच गया कि लगता है, यह पाया हो कर भी है नहीं। यह अपना औचित्य खो चुका है, भुरभुरा हो चुका है और इसमें तुम्हारी सक्रिय भूमिका रही है। तुम तेवर शहीदों का अपनाते हो और हाथ कमीनों से मिलाते हो और रोब उन पर गांठते हो जो इस नाटकीयता को सभ्य जीवन के लिए जरूरी नहीं मानते, गो गलतियां वे भी करते हैं। यह समाचार तो तुम्हारे लिए खास था, क्योंकि इसके वायरल होने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण था वह यह कि अपने ही बड़े और बुजुर्ग भाई को पीटने वाला यह व्यक्ति भाजपा का नेता है। कम से कम भाजपा में उसकी गहरी पैठ है। यह वह दल है जो पारिवारिक और पारम्परिक नैतिक मूल्यों की दुहाई देता रहता है। यह बताता फिरता है कि हमारे पारंपरिक मूल्यों के ह्रास के कारण ही वर्तमान समाज की विकृतियां पैदा हुई हैं। तुमको ऐसी खबरों की कितनी तलाश रहती है और मैं तुम्हारी कितनी चिन्ता करता हूं यह तो इस बात से ही प्रकट है कि मैं चाहता था कि तुम इसे देखो, और हो सके तो भाजपा के खिलाफ इसका इस्तेमाल भी करो।

– मैं तो ऐसा कर लूंगा, पर तुम क्याा करोगे। उनके वकील बन कर उनके विरोध में काम कर रहे हो, पेशे की नैतिकता को भी भूल गए।

– मैं बताउूंगा कि देखो, ये इतने गिरे हुए लोग हैं कि खुद ही जिस प्रवृत्ति और पर्यावरण के जनक हैं उसका उत्तरदायित्व तक नहीं ले सकते, परन्तु यदि कोई दूसरा सुझा दे तो उसको लुटेरों की तरह अपनी झोली में भर कर बांटते हुए अपने कुकर्म को छिपाएंगे। अरे भई, मैंने कल की उस समस्या को केन्द्र में लाने के लिए इसे दृष्टांत के रूप में पेश किया था और तुमको इस बहाने भी अपनी राजनीति की याद आ गई। उूंचे तेवर और घटिया गंठजोड! दुर्भाग्य तुम्हारा यह कि पब्लिक है सब जानती है के सूत्र के आगे तुम्हारी कलई खुल जाती है। समझ लो, मैं फीस लेने वाले वकीलों में नहीं हूं जो जजों को घूस देने की योग्याता रखते हैं और अपने पेशे की नैतिकता को नीलाम करते हुए इतने धनी और ताकतवर और अदालतों से अपने रसूख के कारण इतने अपराजेय हो जाते हैं कि उनके झूठ को झूठ, उनके कमीनेपन को कमीनापन कहना परिभाषाओं के जंगल में खो जाता है।

– इस घटना का उस मनोवृत्ति से क्या संबंध जिसका विस्तार हो रहा है और जिसको लेकर मैं चिन्तित था। क्या तुमको नहीं लगता कि यह उपभोक्तावाद का, जो पूंजीवाद का घृणित औजार है, परिणाम है।

– तुम गलत कभी होते नहीं, सिर्फ अधूरे रह जाते हो। समग्र को जानना और देखना तो तत्वादर्शी के लिए भी असंभव है, परन्तु संभव पहलुओं को जानना, उनका ध्यान रखना और इसके बाद किसी निर्णय पर पहुंचना हमारे लिए अधिक जरूरी है। कल की समस्यां को यदि तुम चाहो तो इस सिरे से भी समझने का प्रयत्न कर सकते हैं, और उस सिरे से भी जहां मैंने कहा था कि अपनी त्रासदी के लिए मेरे मित्र भी जिम्मेदार थे, परन्तु यदि वह चाहते भी तो होना वही था जो हुआ जो कि नियतिवाद का रूप ले लेता है। तुम बताओ तुम उस समस्या को समझना चाहते हो या राजनीति करना चाहते हो। यदि चाहते हो तो भाई को पीटने वाले भाजपाई के सिरे से समझना चाहते हो या अपनी ही लाड़ली संतान के द्वारा अपने ही घर से निकाले गए पिता के सिरे से, या साम्यावाद की विफलता और पूंजीवादी उपभोक्ताावादी नैतिकता के सिरे से। मैं सभी के लिए तैयार हूं, पर इस शर्त के साथ‍ कि तुम उसकी पूरी पड़ताल करने के बाद अपना फैसला करो।
– मजा आ गया, यार। मैंने अपने गांव जवार के पहलवानों को लंगोटा पहने, अपना जांघिया फहराते, पूरे उपस्थित दर्शक समुदाय को प्रतीकात्मक रूप में ललकारते कि है कोई माई का लाल जो मेरा मुकाबला कर सके, देखा तो था, पर इसे जहालत से जोड़ता था। आज देखा कि जाहिलों के बीच भी बौद्धिक स्तरभेद है और तुम पढ़े लिखे जाहिलों के शिरमौर दिखाई देते हो। (आगे जारी)

Post – 2016-05-07

ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः (edited)

– तुमने मुझे कल सचमुच डरा दिया! हम किस तरह का संसार रच रहे हैं! क्या होगा इस समाज का!
– डरने के लिए किसी चीज का होना जरूरी नहीं, लोग भूत-प्रेत से डरते रहते हैं, वे वहम पाल लेते हैं और अपने उन खयालों से डरते हैं जिनका उनसे बाहर कहीं कोई आधार नहीं होता ! ऐेसे विचार और विश्वास दूसरों के द्वारा भी भरे जा सकते है, परंपरा, संस्कार और व्यवहार में रीति-रिवाज में अज्ञात युगों और हमारे ही समाज में मिल कर अदृश्य हो जाने वाले समुदायों के अवशेष हो सकते हैं जिनको हमने सांस्कृतिक दाय के रूप में ग्रहण कर रखा हो! हमारी शिक्षा प्रणाली को विकृत करके उसे जुगुप्सु या डरावना बनाया जा सकता है।

– बात भूत-प्रेत की नहीं है, न वहम की है। यह तो हमारी आज की वास्तविकता का हिस्सा है! आज से छह सात दशक पहले संयुक्त परिवार के टूटने, एकल परिवारों के अस्तित्व में आने की आशंका जताई गई थी! कहा गया कि यह शहरीकरण के विस्तार के कारण हो रहा है! अब देखो तो इस एकल परिवार में भी भावनात्मक लोप आरंभ हो गया है। तुमने जो कहानी सुनाई उससे लगा कि उपभोक्तावाद हमें मनुष्यों से भोगलिप्सु पशुओं में बदलता जा रहा है। इसकी ओर तो मेरा ध्यान इस रूप् में गया ही न था। इसने तो मेरी आंखें खोल दीं!

– सचाई को देख कर घबराहट में लोग आंखें बन्द कर लेते हैं! पूरा देखने या जानने का साहस नहीं जुटा पाते और इसलिए उस खास नुक्ते को नहीं समझ पाते जिसके कारण वह विकृति पैदा हुई है। मुहावरा है अनाड़ी कारीगर औजार को कोसता है!

– उसे बुरा लगा! लगना भी चाहिए था! और ऐसे लोगों को खास बुरा लगेगा जो एक खराबी देख कर किसी प्रजाति, जाति, समाज या देश को गर्हित सिद्ध करने लगते हैं और मजे की बात यह कि उसी गर्हित समाज के मूल्यों की दुहाई देते हुए उसे कोसते हैं! वे अपने ही समाज के दूसरे लोगों को गर्हित सिद्ध करके अपने को साफ-पाक सिद्ध करना चाहते हैं। हिन्दू समाज की छोटी से छोटी विकृति को बिभ्राट रूप दे कर हिन्दू समाज को सबसे गर्हित समाज बताने वाले, उसके हिन्दू काल को…

वह कूद कर सामने आ गया, ‘तुम हिन्दूकाल, मुस्लिमकाल, ईसाईकाल में बांट कर इतिहास को समझने चलोगे तो इतिहास को क्या खाक समझोगे। हमें तुम लोगों से इसीलिए चिढ़ है कि तुम्हारी सोच ही सड़ी हुई है!

– तुमने पहली बार एक सही बात कही है कि इस तरह का बंटवारा सड़े दिमाग वालों का ही हो सकता है। इस तरह के बंटवारे से इतिहास को ही नहीं वर्तमान को भी नहीं समझा जा सकता। और यह काम तुम लोगों ने किया है और तुम ही कर सकते थे। तुम्हारे लिए ही मिल भारतीय इतिहास का जनक भी है और सबसे बड़ा इतिहासकार भी। और जानते हो क्यों, क्योंकि उसने इतिहास को हिन्दू, मुस्लिम और ब्रिटिश कालों में ही नहीं बांटा था, यह भी सिद्ध किया था कि यूरोप और इसलिए वहां की जातियां गोरी होने के प्रताप से सदा से दूसरो से श्रेष्ठ रही हैं और सभ्यता का जन्म उनके द्वारा ही हुआ और उसी का प्रसार एशिया की ओर हुआ इसलिए जो उनके निकट थे, जैसे कि अरब वे उनसे घट कर तो थे, पर अपने से पूरब वालों से अधिक सभ्य थे। उसी तर्क से मुसलमान हिन्दुओं से अधिक सभ्य थे और मुस्लिम काल हिन्दूकाल से अधिक उन्नत था! अब देखो तो यह तुम्हारे विकासवादी सिद्धान्त से भी सही ठहराया जा सकता है! विकास में अगली अवस्थाएं अपनी पिछली अवस्थाओं से उन्नत होती ही हैं। ‘हिन्दूकाल’ बहुत प्राचीन है इसमें सन्देह नहीं, इसलिए उसे मुस्लिम काल से पिछड़ा होना ही था जो हिन्दू काल के लगभग अवसान के साथ जन्म लेता है और यूरोप उसमें भी ब्रिटेन, उसमें भी इंग्लैंड और इसलिए अंग्रेज तो सबसे उन्नत हुए ही। हिन्दू और मुस्लिम काल के रूप में इतिहास के बटवारे पर सबसे पहले आपत्ति मजूमदार और मुंशी के तत्वावधान में प्रकाशित इतिहास में की गई थे जिनको तुमने संप्रदायवादी और राष्ट्रमवादी कह कर खारिज ही नहीं कर दिया और इसकी मखौल भी उड़ाने से बाज न आए। मिल को महान इतिहासकार मानने वाले कोसंबी का भारतीय इतिहास में यह भी एक योगदान है कि प्राचीनकाल को उन्हों ने हिन्दू काल और ब्राह्मण काल के रूप में देखने और दिखाने का कुटिल प्रयास किया! तुमसे एक बार कहा था न कि नाम का अर्थ व्यवहार और गुण से तय होता है उसके लिए प्रयुक्त अक्षरों से नहीं और यदि तुम्हारी सोच वही है तो उस शब्द के लिए कोई दूसरा उपनाम लगा कर वही व्याख्या जारी रख सकते हो। अब इस सिरे से देखो और बताओ सड़ी सोच और सड़ा दिमाग किसका है और साक्ष्यों के आधार पर जिनको तुम विकृतचित्त मानते हो उन्हें तुम्हें कुत्सितचित्त मानने का अधिकार है या नहीं!

– तुम कहां की बात कहां खीच ले गए।

– हम विषय पर ही हैं। मनुष्य के व्यववहार में आए अन्तर को झपटमारों की तरह नहीं समझा जा सकता कि किसी एक व्याक्ति के व्यंवहार में कोई विकृति या भटकाव दिखाई दिया कि पूरी पीढ़ी, पूरे दौर, एक पूरी व्यवस्था से विरक्त हो उठे। मैं तुम्हें कल बताउूंगा कि यदि मेरे मित्र को एक त्रासदी से गुजरना पड़ा तो उसके लिए मेरे मित्र भी कुछ हद तक जिम्मेदार थे और हम सभी अपनी पूरी समझदारी का, हर समय, प्रत्येेक निर्णय करते समय, लाभ उठाना चाहें तो उठा नहीं सकते। सोचते रह जाएंगे। कुछ करने का अवसर ही न आएगा।

Post – 2016-05-05

जब होश में आए तो जहां से गुजर गए

– तुम कितने प्रतिशत होश में रहते हो, बता सकते हो ?
– मैंने न कोई खरी-खोटी बात की, न कोई उल्टा-सीधा काम किया। स्वागत इनते मधुर वाक्य से कर रहे हो जो कोई सिरफिरा भी न करेगा। यह सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए कि तुम कभी होश में रहते भी हो या नहीं।
– देखो, तुम मेरे कहे का बुरा मान गये परन्तु तुमने जो कहा उसका मैंने बुरा नहीं माना। जानते हो क्यों? क्योंकि यह सवाल मैंने तुमसे पूछा ही नहीं था। तुम्हारी आड़ लेकर अपने आप से पूछा था। या कहो, अपने को भी दांव पर लगा पर अपने पूरे समाज से पूछा था। जानते हो क्यों पूछा था? मुझे अपने युग का ही नहीं मानव त्रासदी का एक करुण अध्याय एक सदुपदेश के रूप में सुनने को मिला था और इसने मनुष्य की बौद्धिकता का वह पहलू उजागर किया कि मैं स्वयं हैरान रह गया।
– बूझे और जाने प्रश्नों को भी अनबूझ पहेली में बदलने की तुममे अद्भुत क्षमता है।
– मेरे एक मित्र और हितैषी से मुझे यह सलाह मिली कि मुझे अब अपनी एक एक पाई सिर्फ अपने पर और वह भी बहुत सोच विचार कर खर्च करनी चाहिए।
मैने पूछा एकाएक यह सत्परामर्श देने का विचार कैसे आया, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने बच्‍चों की फर्माइशों को दरकिनार करते हुए उन्हें समझा दिया कि जब तक मैं जीवित हूं तब तक मेरे फंड और जमा में से एक दमड़ी न मिलेगी। अपनी चाहतें अपनी कमाई से पूरी करो। यह मेरा पैसा है और इसे कहां और कैसे खर्च करना है यह मैं तय करूंगा। मेरे मरने के बाद इसे तुम लोगों के बीच बांटने का हिसाब पढ़ने को मिल जाएगा। बच्चे सेवा सत्कार में लगे रहते हैं कि मेरे इच्छापत्र में उनका नाम जरूर आए। इस दूरदर्शिता के अभाव का उदाहरण पेश करते हुए वह हम दोनों के छात्रजीवन के एक परम प्रिय मित्र की करुण कथा सुनाने लगे।
– उसने जितनी तरक्की की उसके सामने तो तुम उससे तेज तर्रार होते हुए भी पत्‍थर कूटते रह गए। पर जानते हो उसके साथ क्या हुआ। सेवा निवृत्ति के साथ जो धन एकमुश्तत मिला तो उसके बेटे और बहू उसके साथ इतनी श्रद्धा से पेश आने लगे कि उसका उनके पहले के व्यवहार से कोई मेल नहीं बैठता था। पर सोचा बुढ़ापे में थकान, उदासी, एकाकीपन और व्याधियों के बदले में एक ही इनाम तो मिलता है बच्चों से सम्मान ।अभिभूत को गए। पैसा था ही, पेंशन मिलनी ही थी, निश्चिन्त थे, खुद सरकारी कार में ही चलते रहे, गाड़ी रखी ही नहीं, न गाड़ी चलाना सीखा। अब बच्चे का एक बड़ी गाड़ी चाहिए थी तो ले लें। पैसा आएगा किस काम। शान तो अब बच्चे की हैसियत से ही बनी रहनी है। जमा पैसे उनकी चाहतें पूरी करने में खत्‍म हो गए तो भी चिन्ता की बात नहीं। बहू जानती थी बाबू जी जितनी सही खरीदारी करते हैं वह न उससे हो सकता है, न उसके पति से। इसलिए बाबू जी सब्जी , दूध, राशन-पानी का वह काम संभालतें हुए भी प्रसन्न जो उनके सेवा काल में उनके मातहत किया करते थे। जितनी समझदारी से बाबू जी खरीदारी करते उतनी ही सधे हाथों माता जी खाना बना लेतीं। पहले वह बहू को हिदायत ही दिया करती थी, फिर हाथ भी बंटाने लगी फिर उनका हाथ का कमाल इतना पसन्‍द किया जाने लगा कि किसी दूसरे के हाथ का खाना खाने को मन ही न करता। बैठे बैठे जंग खाने से यह भी अच्छा ही था। पोता तो उनसे इतना हिला मिला कि उनके सिर नोचता तो भी उनहें रोमांच हो आता, उसे धुमाना, टहलाना, उसका हाथी घोड़ा बनना सब उत्फुल्ल कर जाता और कुछ बड़ा हुआ, तो उसे स्कूल बस तक छोड़ने और वापस लाने का काम उनका। आनन्द के भी कितने रूप होते हैं। इस आनन्द को पहला आघात पत्नी को सर्वाइकल की शिकायत के साथ नेपथ्य भाषित के रूप में मिला , ‘अरे यह सब बहानेबाजी है, काम से बचने के लिए।‘
– भाई की आंखों के आगे अंधेरा छ गया। पहली बार पता चला कि वह जो अपनी संतान के स्ने ह में करते चले जा रहे थे, वह उनसे कराया जा रहा था। और फिर स्नेह की मरीचिका समय पर चाय न मिलने, खाने की थाल के रखने के साथ पैदा होने वाली आवाज, दूध में पानी की मात्रा बढ़ते चले जाने आदि के साथ छंटती उस निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई कि कहा-सुनी में ‍मायावरण के पूरी तरह हट जाने के बाद उन्हें पता चला कि वह अपनी पेंसन की पूरी रकम अपने घर-संसार पर खर्च करने के बाद भी वह अपने बच्चों पर बोझ बन चुके थे। इस निर्णायक क्षण में उन्होंने अपने घर से उन्हें निकल जाने का फर्मान जारी किया तो उनकी हद उनके कमरे तक बांध दी गई और उनके हिस्से में अपमान और अन्न एक में मिल कर पहुंचने लगे। अपने ही लड़के को – कितनी मनौतियों और आकांक्षाओं के बीच वह पैदा हुआ था पांच बहनों के बाद, सबसे छोटा पुत्र – घर से बेदखल करने का मुकदमा करने की नौबत तो आई ही, उनका सामान उनके कमरे से निकाल कर बाहर कर देने की नौबत आ गई। अब वह किराए के मकान में रहते हुए अपने ही मकान को पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और पुत्र सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहा है कि उसने अन्त र्जातीय विवाह किया था जिसे उसके वर्णवादी पिता सहन नहीं कर सके और तभी से लगातार उन्हें सताने के हथकंडे अपनाते रहे हैं और अब यह आखिरी हथकंडा स्वयं किराए का मकान ले कर उन्हें अपने घर से बेघर करना चाहते हैं।
– न्यायालय बहुत गंभीरता से विचार कर रहा है। एक ओर समस्या एक वरिष्ठ नागरिक के सताए जाने और उसे उसकी ही संपत्ति से वंचित किए जाने की है और दूसरी ओर सामाजिक भेदभाव और वर्णवाद की है। ऐसी समस्या को बहुत गंभीर चिन्तन और न्याायदर्शन की जरूरत होती है इसलिए समय तो लगना ही है। यदि फैसला उनके जीवन काल में हो गया तो उन्हें मकान तो नहीं मिलेगा, मकान पाने के लिए बेलिफ, पुलिस को नए सिरे से कायल करना होगा कि मकान उनका ही है और नाजायज कब्जा जमाने वाले को सामान सहित बाहर फेंकने का अधिकार उन्हें है पर इसके लिए अपनी गांठ भी ढीली करनी होगी और जीवन भर का सिद्धान्त भी ढीला करना होगा फिर भी जो हाथ आएगा वह उनका मकान नहीं मकबरा होगा और यदि समस्या की गंभीरता ने इतना समय ले लिया कि फैसले से पहले वह स्वयं गुजर गए तो अपना घर परिवार रहते हुए भी वह यतीम की तरह मरेंगे और यदि उनकी पत्नी उसके बाद बची रही तो अन्तिम क्षणों में वेदना के कई आघातों के रूप में यमदूत उन तक पहुंचेंगे।

उसके उपदेश से अधिक वेधक था अपने उस मित्र के जीवन के अन्त की कल्पंना और उसकी व्यथा का अनुमान इसलिए उपदेश का सारसत्य मेरे सिर के उूपर से गुजरने वाला ही था कि उसने मुझे टोक दिया – इसीलिए कह रहा हूं, पचास से छत्ती स पर आ चुके हो। अब भी समय है। पुत्रेष्टि के बलिपशु मत बनो। बचा कर रखो। तुम्हारे अधिकार की संपत्ति उसके प्रत्याशियों से मिलते रहने वाले सम्मान का रूप लिए रहती है और उसमें कमी आने के साथ तुम्हारा सामाजिक और पारिवारिक मूल्य घटने लगता है और उसके खत्म होते ही तुम जीते हुए भी कई तरह की मौतों के शिकार हो जाते हो।‘

उसके इस सदुपदेश के साथ ही मुझे याद आया कि क्या हम जब जागते और सोचते विचारते रहते हैं, अपने अहम फैसले करते रहते है, तब भी क्या पूरे होश में रहते हैं। नहीं, यह भी याद आया कि हम अपनी समग्र मेधा के संभवत: दो तीन प्रतिशत और असाधारण विचक्षण लोगा पांच सात प्रतिशत का उपयोग कर पाते हैं, परन्तु क्या इस दो तीन या पांच प्रतिशत के भी दो तीन या पांच प्रतिशत का ही उपयोग ही हम अपने निर्णयों में नहीं करते हैं? तमी यह बेचैनी एक प्रश्न के रूप में उभरी कि क्या हम कभी अपने पूरे होश में रहते हैं, रहना चाहें तो रह सकते हैं, उनसे उत्पन्न चेतना तरंगों को झेल सकते हैं जिनकी संकुलता हमारी दशा तड़पते हुए घायल मृग जैसी हो जाती है और इसलिए लोक व्येवहार में इसे अपस्मार या हिस्टीरिया भी कहते हैं। हिस्टीरिया का अर्थ तुम्हारी समझ में आता होगा, मेरी समझ में नहीं आता, पर सोचता हूं हो सकता है इसका संबंध हिस्ट्री से, अर्थात् अतीत की स्मृ‍तियों में विक्षोभ से हो, पर अपस्मार का अर्थ सोचने पर लगभग वही ठहरता है, स्मृ‍ति विचलन। और तक मुझे याद आया कि जितना क्षुद्र अंश हमें मेधा और स्मृति के रूप में मिला है क्‍या उसे संभालने की क्षमता हमारे भीतर है। हम दैनन्दिन व्यरवहार में किन किन की योजना, नीयत, खुराफात और बदकारी को समझ सकते हैं और हमारे संस्कार इसकी अनुमति भी देंगे क्या कि हम कांटे की तौल पर व्यवहार करते रह सकें। लगा बदहवाशी इन्सान को इन्सा‍न बनाए रखने की, अपने को सन्तुलित बनाए रखने की पहली शर्त है। पूरे होश हवास के लिए एक ही कोना बचा रह गया है जिसे पागलखाना कहते हैं जहां कोई पागल नहीं रहता, सभी दूसरों को पागल समझते हैं और उस पागलखाने से मुक्ति के संघर्ष में इतनी अकल्पनीय चेष्टारएं करते हैं जिनका उदाहरण दे कर उन्हें होश में आने से रोका और कैद में बन्द रखा जाता है।

Post – 2016-05-01

आईने के सामने

– आदमी और रोबो में फर्क जानते हो ?

उसे मेरा वह फिकरा याद आ गया जिसमें मैंने उसके दिमाग को निकाल कर एक यंत्र भरने की बात कही थी इसलिए झट बोल पड़ा -आदमी का कोई भरोसा नहीं, वह कुछ भी कर सकता है, पर रोबो पर भरोसा किया जा सकता है। वह वही काम करेगा जिसके लिए उसे तैयार किया गया है।

– अन्तर कुछ और मामलों में भी है। रोबो में सूचनाएं भर दो तो भी वह सोच नहीं सकता, आदमी भुलक्कड़ होने और बहुत कम सूचनाएं होने के बाद भी सोचे बिना रह नहीं सकता । रोबो के पास न दिल होता है न दिमाग, इसलिए वह यह भी नहीं समझ सकता कि किन सूचनाओं का, किन मनुष्यों पर, कब, क्या प्रभाव पड़ता है।

वह मुस्कराने लगा।

मैंने लताड़ जारी रखी – तुम न अपने को जानते हो न दूसरों को फिर भी तुम्हा‍रे सामने एक सांचा है उसी में इन्सानों को पीस कर अपने अनुसार सही बनाना चाहते हो। पहले अपने काे जानो। जिन लोगों ने आत्मांनं विद्धि की चुनौती पेश की उनको भी इसके सभी पक्षों और उनकी व्याप्ति का पता नहीं रहा होगा। वे भी शायद यह न जानते रहे हों कि कुछ बातें इतनी आघात पहुंचाने वाली होती हैं कि उनको जानने और मानने से हम डरते हैं। कोई उनकी संभावना जताए तो लगता है वह हमारा अनिष्ट चाहता है। मेरे एक मित्र हैं जिनको अपने ज्योततिष ज्ञान पर बहुत भरोसा है और उनका अनुभव यह रहा है कि जब कुछ लोगों के अच्छे दिनों में उन्होंने कुछ अप्रिय घटनाओं की भविष्यवाणी की तो उन्होंने ज्योतिष शास्त्र की खिल्ली ही नहीं उड़ाई, उन्हें भी भला बुरा कहा। परन्तु आगे चल कर वे घटनाएं जब ठीक उसी रूप में घटित हुई तो भागे उनके पास आए और श्रद्धाभिभूत हो कर जिज्ञासाएं करने लगे।
– तुम ज्योतिष पर विश्वास करते हो?

– मैं अपनी बात नहीं कर रहा, उनकी बात कर रहा हूं।

– हमारा समाज दुनिया का सबसे सभ्य समाज रहा है और यह बात मैं भौतिक समृद्धि के कारण नहीं, मूल्यव्यवस्था के कारण कह रहा हूँ । इसे दसियों हजार साल से बहुत विकट आन्तरिक द्वन्द्वों और बाहरी दबावों से गुजरना पड़ा है जिसका तुम अनुमान तक नहीं कर सकते। और उसी प्रक्रिया में वह मूल्य व्यवस्था विकसित हुई थी जिसे तुमलोग नष्ट करने पर तुले रहे हो। ।

अभी तक वह चुपचाप हामी में सिर हिलाते हुए मेरी बात सुन रहा था, परन्तु इस वाक्य के साथ उसने व्यंग्य किया, ‘तुम ठीक कहते हो, आंख बंद कर लेने के बाद पूरी दुनिया ओझल हो जाती है, बचे रहते हैं हम, और हम भी अपनी आंखें मूंदे रहने के कारण अपने तक को देख नहीं पाते, सिर्फ मान लेते हैं कि हमी हम है, दूसरा कोई नहीं।‘

मैं हंसने लगा तो वह चिढ़ गया, ‘अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने का मुहावरा सुना है।‘

– सुना है, पर तुम तो मिया मिट्ठू का मतलब तक नहीं जानते होगे। जानते होते तो यह भी जानते होते कि कड़वी सचाइयों को मीठा बना कर कैसे पेश किया जाना चाहिए जिससे सांप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे, सचाई प्रकट भी हा जाय और किसी को क्लेश भी न हो।‘

-हमें खरी खरी कहने की आदत है। मिलावट पसन्द नहीं। तुम इतनी बड़ी बड़ी बातें क्यों कर बैठते हो मानो दुनिया का भूगोल ही पता न हो। किस आधार पर कह दिया कि हमारा समाज सबसे सभ्य रहा है। कोई कसौटी है परखने की।

– सभ्यता की कसौटी यह है कि कोई समाज कड़वी से कड़वी सचाई को जानने और सहने की कितनी शक्ति रखता है। यह ज्ञान ही उसके शाक एब्जार्वर का काम करता है। यही उसकी प्रतिरोधक्षमता को बढ़ाता है। और यही परदुखकातरता में भी परिणत होता है।

– इसी का तो हम अभाव देख रहे हैं। इसी को तो पैदा करना चाहते हैं पर कहते हैं न अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ।

– दुर्लभ लोगों द्वारा कहे और दुर्लभ जनों द्वारा सुने जाने वाले सत्य को सार्वजनिक करोगे तो उसके खतरे भी उठाने पड़ेंगे। इसलिए चिकित्सक कड़वी दवा को मधु के साथ सेवन की सलाह देते हैं कि कहीं कड़वाहट के कारण व्यक्ति ओषधि का वमन न कर दे। अंग्रेजी में भी शक्कर चढ़ी कड़वी दवा का मुहावरा चलता है। साहित्य और कला इसी सच को प्रेयस या सह्य बना कर पेश करते हैं, यदि ऐसा न कर पाएं तो उनको घटिया कलाकार मानना होगा। और यदि आहत करने के लिए ही सत्य को विषाक्त बना कर पेश किया जाय तो यह स्वत: अपराध है। तुम जिसे खरा कहते हो वह खरा नहीं, खुराफात है और उसने हमारी प्रतिरोध क्षमता को नष्ट किया है।

– मैने तो केवल यह जानना चाहा था कि तुम्हारा जिओ और जीने दो दूसरो को अपने ढंग से जीने और खाने पीने की छूट देता है या नहीं।

– छान्दोग्य उपनिषद में इन्द्रियों के बीच अपनी श्रेष्ठता को लेकर एक शक्तिपरीक्षण की कहानी आती है। वाणी, श्रुति, दृष्टि, मन, बुद्धि कोई किसी से कम तो है नहीं। सभी अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने पर तुले हुए थे। निर्णय इस बात पर था कि क्या उनके बिना शरीर यात्रा संभव हो सकती है। वे एक एक कर शरीर से अपनी शक्ति वापस लेने लगे और पाया कि उनके बिना जीवन चल सकता है। अंधे, गूंगे, बहरे, नासमझ, विक्षिप्त सभी तो जीवित रहते हैं। एक एक कर अपना जोर आजमा कर वे शरीर में पुन: वापस आते गए। सबसे अन्त में प्राण की बारी आई, वह विदा होने लगा तो सभी ने हाथ खड़े कर दिए कि आप चले गए तो हम सभी मिट जाएंगे। प्राण ने कहा, चलो, यदि तुम मुझे सबसे श्रेष्ठ मानते हो तो मैं तुम सब को छोड़ कर नहीं जाता, परन्तु तुम सबके तो अपने आहार हैं, किसी का नाद तो किसी के शब्द, किसी के विचार, मेरा भी आहार तो निश्चित करो। सभी इन्द्रियों ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘कुत्ते से ले कर गिद्ध तक के जो आहार हैं वे सभी प्राण के अन्न है यह तो प्रकट ही है। जो इसे जान लेता है उसके लिए कुछ भी अखाद्य नहीं रह जाता ।

स होवाच किं मे अन्नं भविष्यति इति ? यत् किंचित् इदं आ श्वभ्य आ शकुनिभ्य‍ इति होचुस्तदा । एतद्य अनस्य अन्नं अनो ह वै नाम प्रत्यंक्षं न ह वा एवं विदि किंचित् अनन्नं भवतीति।

‘तुम कहना क्या चाहते हो, सड़ा गला, बासी, उच्छिष्ट सभी खाद्य हैं।‘

अनुभव तो यही बताता है कि प्राणरक्षा के लिए लोग कुछ भी खाने पर उतारू हो सकते हैं। प्राणिजगत में विविध जीव हमारे लिए अभक्ष्‍य का भी भोजन करते हैं ओर विवशता में भी में क्‍या खा सकते हैं इसकी कल्‍पना भी नहीं की जा सकती। अभी कुछ दिन पहले सुरंग के भीतर दबे फंसे कुछ मजदूरों ने एक दिन मिट्टी खा कर गुजर किया। उसके दो दिन बाद निकाले गए । मलिन, गलित का परहेज पेट में कुछ हो तभी संभव है। यह विचार तक कि मैं मर जाउूंगा परन्तु अमुक आहार ग्रहण न करूंगा उन्हीं के मन में पैदा हो सकता है जो जानते हैं कि वे चाहें तो उन्‍हें भोजन मिल सकता है। मर जाउूंगा पर अंग्रेजी दवा नहीं खाउंगा, मर जाउंगा पर मांसाहार न करूंगा, जैसे विचार भी भरे पेट के ही विचार है। लंबी क्षुधार्तता में मनुष्य क्या कर सकता है इसके अविश्वसनीय उदाहरण अकालों के विवरणों में मिल सकते हैं।‘

‘यह तो ठीक है पर तुम कहना क्या चाहते हो?’

’कहना केवल यह चाहता हूं कि कोई दूसरा अभाव और वर्जना की अपनी सीमाओं में क्या खायेगा, कैसे रहेगा इसका निर्णय हम नहीं कर सकते, यह निर्णय हम केवल अपने बारे में कर सकते हैं। हम आपत्ति तभी कर सकते हैं जब खुले आम या किसी छलावे से वह हमें वह भोजन करने को बाध्य करे जिसे हम अपने लिए वर्ज्य मानते हैं। जब इसकी राजनीति करने के लिए तुम बार बार इस तरह के सवालों को हिन्दू समाज को उद्विग्न करने के लिए उठाते हो तो इतने बड़े समाज में कुछ बावले तो हो ही सकते हैं जो इसे वह रंग दे दें जो दिलवाने के लिए तुम उन्हें उकसाते हो। यह तुम्हारी योजना है या उस सिपहसालार की योजना है कि हिन्दू समाज को उन संवेदनशील मुद्दों पर इस हद तक क्षुब्ध करते रहो कि यह सिद्ध किया जा सके कि हिन्दू मुसलिम समुदाय से कम असहिष्णु नहीं हैं। यह उस सोच का परिणाम है जिसमें आइ एस की तुलना वैदिक समाज से की जाती है और इस नासमझी से विश्व सभ्यता को संकट में डालने का प्रयत्न किया जाता है। तुम बताओ जब इस तरह के बयान आए थे तो तुमने उसकी आलोचना की? वह जिसे ऋग्वेद का नाम पता है और उससे आगे यह पता है कि उसे किसी भी कीमत पर गर्हित सिद्ध करना है, उसकी ऐसी बातों पर तुम्हारे किसी भी विद्वान ने उसकी भर्त्सना की। कुछ मुद्दों पर बढ़ रही असहिष्णुता के जनक तुम हो और वे तुम्हारे उकसावे में आ कर अपने ही परंपरागत मूल्यों को भूल कर वह कर बैठते हैं जो कराने की योजना तुमने रची है।

Post – 2016-04-29

जियो और जीने दो (2)

‘तुम कल उत्साह में थे। मैं उसे कम नहीं करना चाहता था, और सच यह भी है कि जब तुम ऐसी उक्तियों को भी देशद्रोह मान कर मुझसे मेरी राय मांग रहे थे, तब मैं स्वयं भी दुचित्तेनपन का शिकार हो गया था, जिसमें लगता है ‘ऐसा होना तो नहीं चाहिए, लेकिन गलत तो नहीं लगता।‘ कुछ देर बाद समझ में आया कि तुम मेरी बात को या तो जानबूझ कर तोड़मरोड़ रहे थे या तुम्हें उसका वही आशय समझ में आया जो तुम्हारे मन्तव्य़ के अनुकूल था। देशद्रोह को परिभाषित करते हुए मैंने यह कहा था कि यदि व्यक्ति जानता है कि यह देश के अहित में है और इसके बाद भी उसे करता है तो वह देशद्रोह हुआ। तुम्हें याद है यह।

वह सहमत हो गया।

‘जो व्यक्ति या संस्था ’जियो और जीने दो’ को अपना सिद्धान्तसूत्र माने, सबके लिए एक आचरणीय आदर्श माने, उसी को तुमने अपने कुतर्क से गर्हित सिद्ध कर दिया। ऐसे विचारो और आदर्शो को एक संस्कार के रूप में अपनी चेतना का अंग बनाना होता है, इसके लिए अवसर की प्रतीक्षा नहीं की जाती और जिस तरह के अवसर की बात तुम कर रहे थे उसमें तो यह सचमुच आग में घी का काम करेगा। तुम तो परंपरागत भारतीय शिक्षाप्रणाली के व्यांपक फलक तक को भी नहीं समझ सके। यह पिता और परिवार से आरंभ हो कर पाठशालाओ, उपदेशकथाओं, समय समय पर ग्रन्थों के पारायण और संत्संगगोष्ठियों के रूप में एक महाशाख वृक्ष की तरह फैली थी जिससे अक्षर ज्ञान न रखनेवाले भी वंचित नहीं थे । इसे तो अंग्रेजी शिक्षाप्रणाली ने काट-पीट कर स्कूल तक सीमित करके एक ठूंठ में बदल दिया। जो उनकी शिक्षा प्रणाली थी उसको शिक्षा से अधिक अपना राजनीतिक अखाड़ा बना कर तुमने उसे भी नष्ट कर दिया इसलिए तुम कुतर्क को तर्क और अपने क्षेत्र के प्रति निष्ठा रखने को यथार्थ से पलायन कहो तो आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य तो मुझे इस बात पर है कि तुम्हारे मिजाज को जानते हुए मैं कैसे बहाव में आ गया था। और यदि मैं बहाव में आ सकता हूं तो उन भोले भाले लोगों को कैसे दोष दे सकता हूं जिन्हें तुम इसी तरह बहकाने में सफल हो जाते हो और वे अपने ही लक्ष्य के विपरीत काम ही नहीं करने लगते हैं, उस पर गर्व भी करने लगते हैं।

‘मुझे सोचना चाहिए था कि तुम लोग जो हिन्दू मूल्यों, मानों, संस्थाओं, इतिहास, वर्तमान और हितों के पीछे बहेलिये की तरह तीर ताने लगे रहते हो, तुम्हारे निशाने पर खुद को भी लाने के खतरे को भांप कर तुम्हारी साथ साथ आलोचना करता जाता तो बातचीत में भी ताज़गी रहती और घपला पैदा न होता, पर वह न कर सका। अब समझ में आया कि वे सभी लेखक, पत्रकार और संचार माध्यमों से जुड़े लोग जो अपनी उदारता या उजलत में तुम्हारी मूर्खतापूर्ण व्याख्याओं पर मुकर्रर इर्शाद चीखते फिरते हैं, जिससे भ्रम पैदा होता है कि वे भी तुम्हारे ही गिरोह के अंग हैं, वे भी मुझ जैसे ही लोग हो सकते हैं. उन्हें तुम्हारी अटपटी व्यंख्यायें इतनी मौलिक लगती हैं कि उनमें कविता का सा आनन्द आने लगता है। वे बोल कर, लिख कर, और दिखा कर अपनी नासमझी में केवल तालियां बजा रहे होते हैं, बिना यह समझे कि विचार कविता नहीं होता और कविता जैसा आनन्दे देने लगे तो विचार विचार नहीं रह गया है। इससे बचो.

‘जो सज्जन योगाभ्यास कर और करा रहे थे उनकी योजना केवल यह थी कि जब तक मन में द्वेष और कलुष है योगाभ्यास का लाभ नहीं मिल सकता। वे कायिक, मानसिक और वाचिक शुद्धि का पाठ पढ़ाते हैं और पढ़ने वाला तुम जैसा मिल जाय तो उसी पाठ से क्या पढ़ेगा इसका उदाहरण तुमने पेश कर दिया। तुमने सत्य, आत्माबोध और आरोग्य के एक आदर्श प्रयोग को हिन्दू बना दिया और फिर उसके शिकार के कोने तलाशने लगे और मेरे पास चले आए। इसके लाभ से शेष मानवता को वंचित रखने का इससे घटिया कोई प्रयत्न हो सकता है?

‘देखो, जिस स्कूल में मैंने शिशु कक्षा से ले कर चौथी तक की पढ़ाई की उसकी दीवारों पर कुछ सूत्र वाक्य लिखे थे जो आज तक मुझे याद हैं और प्रेरणा भी देते हैं। वे थे:
झूठ बोलना पाप है।
नर हो न निराश करो मन को।
सत्यमेव जयते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
वही मनुष्यर है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

‘तुम्हारी समस्या यह नहीं है कि तुम बुरे लोग हो। समस्या यह है कि तुम समझने के लिए, सुधारने और बदलने के लिए कुछ नहीं करते, जो कुछ करते हो जीतने के लिए करते हो और इसलिए समस्याओं का समाधान नहीं करते। समस्यायें पैदा करते हो। कुछ समय के लिए जीतने का भ्रम पाल भी लो तो तुम अपने जीतने के क्षणों मे भी हार रहे होते हो।‘

अब वह अपने तेवर में आया, ’मैं कल भी सोच रह था कि तुम इतने खुले मन से मेरी बात मानते क्यों चले जा रहे हो। अब समझ में आया कि तुम चाहते क्या थे?‘

‘क्या चाहता था? क्या समझ में आया ?

’वह, क्या ‘तीर चलाया है! क्या निशाना है!’ कहते हुए एक ओर तो तुम मेरे निशाने से बचते रहे और अपनी इस धोखेबाजी से इस प्रतीक्षा में लगे रहे कि जब मेरा तरकश खाली हो जाय तो डंडा ले कर मुझ पर टूट पड़ो और .. यह ले, वह ले, नहले, दहले करते हुए मुझी से पूछो मजा आया।‘

‘सच मानो, मैंने किसी इरादे से कुछ छिपा कर तुम्हारी बातों को सच नहीं माना था। सहज मन से माना था। परन्तु मुझमें और तुममें एक अन्तर है। तुम लोग झटपट समझ कर आगे बढ़ जाते हो, जो करना है कर गुजरते हो, भले उससे तुम्हारा ही सत्यानाश हो। इस बीच जो सत्यानाश कर चुके हो उसकी जिम्‍मेदारी से बचने या उसे उचित या अपरिहार्य सिद्ध करने में ही सारी ऊर्जा चली जाती है. मैं पहले से कहता आया हूं कि जिरह करते हुए पढ़ो। अक्षरपाठी मत बनो सारग्राही बनो। यह काम कुछ समय मांगता है। इसके लिए तर्क-वितर्क की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके लिए अपने दरबे से बाहर आकर सोचना होता है। अपनी उजलत और गफलत के कारण तुम लोग तो उन शब्दों का अर्थ तक नहीं समझ पाते जिनका प्रयोग करते हो। हद है! राजद्रोह और देशद्रोह तक में फर्क नहीं कर पाते।‘

‘सुनूँ तो, यह फर्क क्या होता है भाई।‘

‘वही बता रहा हूं। जिस धारा पर हफतों चारों ओर बहस होती रही और अन्तत: कुछ फैसलों के हवाले से कहा गया कि यह सेडीशन का मामला नहीं है, और यह बताया जाता रहा कि वह धारा अंग्रेजों ने लगाई थी। मांग की जाती रही कि उसे हटा दिया जाना चाहिए, उसमें सचाई और नासमझी का तुल्य योग था। उस पूरी बहस में देशद्रोह और राजद्रोह में अन्तर करने वाला कोई लेख या बहस या व्याख्यान मेरी नजर में नहीं आया।

‘अंग्रेजों का अधिकार हमारे देश पर धौंस के बल पर बना रहा था। उन्हें, हमारे ऊपर राज करने का नैतिक अधिकार नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने राज को सुरक्षित रखने के लिए सेडीशन या राजद्रोह को अपराध बनाया था। जो उनके राज का विरोध करते थे वे देशप्रेम के चलते विरोध करते थे और ऐसे किसी काम, विचार या प्रस्ताव की आलोचना करते थे जो देश और समाज के लिए अनिष्टकर प्रतीत होता था।

‘मैंने इसीलिए यह स्पष्ट किया था कि सत्ता में रहते हुए यदि कोई देश के अहित का काम करे, ऐसी योजनाओं को जो देशहित में हैं, जिन पर बड़ी रकम खर्च हो चुकी है, बन्द कर दे, तो वह राजसत्ता पर अधिकार जमाने के बावजूद, देशद्रोही और राष्ट्र्द्रोही है। इस अपकार्य में उसके सहायक, इसको जानते हुए इस पर चुप रह जाने वाले सभी राजभक्त है पर साथ ही देशद्रोही है, राजद्रोही नहीं। उसका समर्थन करने वाले, उससे लाभान्वित होने वाले राजभक्त थे, देशभक्त नहीं।

‘तुमको जब मैं देशद्रोही कहता हूं तो राजद्रोही नहीं कहता क्योंकि सत्‍ता से नूरा कुश्ती लड़ते हुए भी तुम लोग सदा सत्ता के साथ रहे हो।

‘ऐसी स्थिति भी आ सकती है जब कोई सरकार देशहित पर ध्या‍न दे रही हो और तुम उसका इस कारण विरोध करो कि उसके इन हितकर कार्यों को सफल होने दिया गया तो देश उसे पसन्द करने लगेगा और इस तरह के कामों का सिलसिला बना रहा हो सत्ता में तुम्हारी वापसी का रास्ता बन्द हो जाएगा और इसलिए तुम उसे उखाड़ने के लिए अवांछित और उपद्रवी कारनामे करो तो तुम एक साथ देशद्रोही भी हो सकते हो और राजद्रोही भी।‘

वह कुछ अनमना तो लगा परन्तु उसके पास इसका प्रतिवाद करने को कुछ था नहीं। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने कहा, ‘यह तो आधी बात हुई। उसी ‘जियो और जीने दो’ का मैंने वह पक्ष उजागर किया था जो खानपान की स्वतंत्रता से जुड़ा है। उस पर तुम्हारी क्या राय है?’

’इस पर कल बात करेंगे, क्योंकि यह बहुत पेचीदा सवाल है।‘

’तुम भाग कर बचना चाहते हो।‘

’कल तक यही मान कर खुश रहो।‘

Post – 2016-04-28

जियो और जीने दो

‘यार, जियो और जीने दो’ के इस सूत्र को मैंने सुना तो कई बार है, पर इसका मतलब समझ में नहीं आया। तुम जानते हो?’

’वाक्य तो बहुत सीधा है, इसके एक एक शब्द का अर्थ दूध पीते बच्चे को भी मालूम होगा। तुम क्यों परेशान हो गए।‘

’तुम्हारी वजह से। तुमने जिस दिन याद दिलाया कि शब्दों का मतलब ठीक वही नहीं होता जो कोश में लिखा मिलता है तभी से अब जिस भी वाक्य को सुनता हूं उसका एक नया अर्थ निकलने लगता है।‘

‘मतलब तुम निकाल ही चुके हो। मुझसे क्यों पूछ रहे थे, तुम्हें तो मुझे बताना चाहिए। ’

‘उधर देखो, एक सज्जन योग का प्रशिक्षण दे रहे हैं और दो डंडों के सहारे एक इश्ताहार लगा रखा है ‘जियो और जीने दो।‘ मैंने पढ़ा तो सोचने लगा हमसे कई गुना लंबी सांसे लेते हुए जिधर जी आया अंग प्रत्यंग घुमाते हुए आसन कर रहे हैं। कोई रोकने वाला नहीं। कभी रोका भी नहीं। फिर यह विज्ञापन क्यों ? इसका अर्थ क्या है? तभी मुझे इसका यह अर्थ समझ में आया कि ‘कुछ लोग हैं वे न शान्ति से रहते हैं, न दूसरों को शान्ति से जीने देते हैं।‘ और तब यही वाक्य एक ललकार में बदल गया ‘तुम लोग हमें शान्ति से नही जीने देते इसलिए हम अपने को जिन्‍दा रखने के लिए तुम्हें रास्ते से हटाने को बाध्य हैं। और अब शान्ति, ध्यान और समरसता का यह आयोजन मानसिक रूप से अशान्ति का सन्दे्श देने वाले एक आयोजन में बदला दिखाई देने लगा। इसीलिए तुमसे पूछा कि जो मैंने सोचा वह तुम्हें भी ठीक लगता है या नहीं।‘

यह पहला मौका था जब मैं उसकी सूझ और सोच पर हैरान हो कर उसे इतने सम्मान से देख रहा था। कुछ कहते न बन रहा था, क्योंकि आदत उसकी खिंचाई करने की है और उसका कोई कोण नजर नहीं आ रहा था। कुछ संभला तो तारीफ न करते हुए भी समर्थन तो करना ही था। मैंने पूछा, गणित जानते हो?’

वह मुस्कराने लगा। कुछ बोला नहीं।

बोलना मुझे ही पड़ा, ‘जब तुम सवाल हल कर लेते हो तो तुम्हें पूरा विश्वास होता है कि सवाल हल हो गया। किसी के समर्थन की जरूरत नहीं होती। तुम्हें मेरे समर्थन की जरूरत नहीं है।‘

उसे मुझसे इस उत्तर की आशा नहीं थी। वह सोच बैठा था कि किसी न किसी कोने से टांग अड़ाउूंगा अवश्य। यह सुन कर वह गदगद हो गया और पहले से कुछ अधिक उत्साह में आ गया।

‘फिर मुझे मूल सूत्र का सरल और शिरोधार्य अर्थ समझ में आया, ‘जियो, जिन परिस्थितियों में हो उनमें जीने के लिए जो भी आवश्यक और सुलभ है उसे खा सकते हो तो खा कर जिन्दा रहो और हमे जो रुचता पचता है, हमारी पहुंच में है हमें खा पी कर जीने दो। तुमको यह किसी सिरे से गलत लगता है?’

मैंने पूछा, यह बताओ, तुम सरस्वती की पूजा कब और कैसे करते हो?’

वह समझ नहीं पाया। पूजा करता हो तब तो। मैंने कहा, ‘कभी कभी सरस्वती देवी पूजा पाठ न कर पाने वाले गधों की जबान पर भी आ बैठती हैं और वे उपदेश करने लगते हैं। दध्यंग अथर्वा की जबान पर इसी तरह विराजमान हुई होंगी।‘

वह बैठे बिठाए ही उछल पड़ा और मैंने संभाला न होता तो सीधे नाक के बल गिरता। पर तभी उसे शक हो गया कि मैं उसे चंग पर चढ़ा कर नीचे तो नहीं गिराना चाहता हूं। वह चौकन्ना होता सा लगा । यह शब्द मेरे ध्यान में आया और उसे नीचा दिखाने का कोई मौका मिल नहीं रहा था इसलिए पूछ बैठा, ‘चौकन्ना का मतलब जानते हो?’

ऐसे सवाल की कोई तुक न थी फिर भी कहीं वह निरुत्तर न रह जाय इसलिए उसने कहा, ‘चार कान वाला, अर्थात अपनी श्रवण क्षमता से दूना, अर्थात् अत्यधिक सावधान।‘

इतनी लंबी प्रतीक्षा के बाद मुझे अपनी हीनताग्रन्थि से बाहर निकल कर यह बताने का मौका मिला कि मैं भी कुछ हूं। मैंने कहा, ‘किसी खतरे का क्षीण अन्देेशा होने पर जानवर चौंक कर अपने कान खड़े कर लेते हैं और सारा ध्यान उसे भांपने पर लगा देते हैं। चौंक कर कान खड़ा करने की इस क्रिया से निकला है यह चौकन्ना शब्द, दूसरों का कान काट कर अपने कान में जोड़ने की शल्‍य क्रिया से नहीं।‘

वह मित्र होते हुए भी करबद्ध हो गया, ‘यह तो मेरे ध्याेन में आ ही नहीं सकता था।‘

मेरे अहं की तुष्टि हुई कि मैंने यह भी मान लिया कि कम्युानिस्ट उतने सिरफिरे नहीं होते हैं जो मैं अपनी गणित से उन्हें मान चुका था।

लगता है वह आज पूरी तैयारी करके, किसी से सलाह करके आया था इसलिए उसका एक-एक कदम बहुत नपे तुले ढंग से पड़ रहा था। उसने पूछा, ‘यह बताओ, खानपान के सवाल पर जो विवाद छिंडा, उसमें असाधारण संयम का परिचय देते हुए मोदी स्वयं चुप रहे। न बोलने वालों को रोक सके न झेले जाने वालों को दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक सके । इसका रहस्य तुम्हें पता है?’

यह भी पहला ही मौका था जब मुझे स्वीकार करना पड़ रहा था कि कुछ बातें मुझे भी नहीं मालूम।‘ उसने कहा मालूम तो तुम्हें है पर कहने का साहस नहीं है। बुरा मत मानो तुम जिनके साथ हो वे सेवर दिमाग के लोग हैं और उनकी संगत में तुम्हारा दिमाग भी सेवर हो चुका है। सेवर का मतलब जानते हो? नहीं जानते तो कोई क्षति नहीं। मैं बताता हूं। अंग्रेजी में इसे हाफ बेक्ड कहते हैं।‘

उसे दबोचने का एक नया मौका मिल गया, ‘हाफ बेक्ड् नहीं, अंडर फायर्ड। यह जानो कि अधपके के लिए वस्तु भेद से अलग अलग विशेषणों का प्रयोग होता है।‘
वह इतनी विनम्रता से मेरी बात से सहमत हो गया कि मुझे आश्चर्य हुआ। परन्तु उसे तो अपने विचार के लिए मेरे मन को पिघलाना था। वह अपनी योजना पर अचूक काम कर रहा था। उसने मुझे घेरा तब मुझे उसकी व्यूह रचना का आभास हुआ। उसने कहा, जानते हो मोदी की चुप्पी के पीछे का सच?’

मैं चुप उसे निहारता रहा।

वह बोला, ‘इसलिए कि मोदी गुजरात के दस साल तक मुख्य मंत्री रहे। अपनी राज्य सीमा से बाहर गुजरात अपने पशुधन की श्रेष्ठता के कारण जाना जाता रहा है। गुजराती गाय, गुजराती भैंस, गुजराती सांड, गुजराती बकरी ।‘

मुझे टोकने का छोटा सा अवसरफिर मिला, ‘भैंस हरयाणवी और बकरी राजस्थानी अर्थात् उसके बांगर क्षेत्र की बागड़ा छेर।‘

वह मेरे इस विचार से भी पूरी तरह सहमत हो गया, पर बोला, ‘तुमको पता है मोदी ने निर्वाचन अभियान के दौर में एक झूठ बोला था, श्वेत क्रान्ति के स्थान पर कांग्रेस राज में लालक्रान्ति को बढ़ावा मिला है। मैं याददाश्त से बोल रहा हूं शब्दों में कुछ हेर फेर हो तो बताना। पर वह जानते थे कि उसी गुजरात में जिसे श्वेत क्रान्ति या अधिकतम दूध उत्पा‍दन का श्रेय है उसी में अंतरराष्ट्रीय स्तर को छूने वाले बूचड़खाने भी बने हैं, और उसी से सबसे अधिक गाेमांस का निर्यात होता रहा है और आज भी हो रहा है।’

मैं पुन्‍: चौंक कर देखने लगा तो बोला, ‘मोदी की अन्तरात्मा का आदर करता हूं। इस एक कथन के अतिरिक्त उस आदमी ने कोई दूसरी चूक नहीं की। पर इस मामले में उसके अपनों के बीच उसके विरोधी ही भरे थे। ‘

उसकी भूमिका का लक्ष्य मेरी समझ में नहीं आया तो कहा, ‘दुर्बोध बातों के लिए तुम मुझे दोष देते रहे हो, अब तुम स्वयं उनका सहारा ले रहे हो।‘

उसने कहा, ‘मैं तो तुम्हारी सीख ही तुम पर आजमा रहा हूं। तुमने कहा भावना का भी एक अर्थशास्त्र होता है और इसे हम कम्युनिस्टों ने नहीं समझा तो मैं तुमसे सहमत हो गया था। इसका पालन जिन्हें हम भाववादी कहते आए थे उन्होंने हमसे अधिक दृढ़ता से किया है इसे भी मान लिया। इस अर्थशास्त्रीय नैतिकता को भी समझ गया जिसका कांटा लाभ के अनुपात के साथ बदलता रहता है। सच यह है कि आज का अर्थशास्त्र उन्हीं शाश्वत नियमों पर चल रहा है जिसका हवाला शतपथ ब्राह्मण को याद करते हुए तुमने दिया है।

‘मोदी को मैं इस बात का श्रेय देता हूं कि उस एक विचलन के अतिरिक्त मुझे अपने प्रयत्न के बाद भी कोई दूसरा नमूना न मिला कि उसे गलत मान लूं। वह अपने वायदे निभाने के लिए देश की नींद जागता और देश की नीद सोता है और देश के उज्‍वल भविष्य के सपने देखता है।‘’

मैं उसके मा‍नसिक परिवर्तन पर स्वयं इतना चकित था कि उसे अपने विचारों में बदलाव लाने के लिए धन्यवाद तक न दे सका कि वह बोल पड़ा, मोदी को मालूम है कि श्वेत क्रान्ति रक्त क्रान्ति से जुड़ी हुई हैा अर्थशास्त्र पूछता है गाय से बछड़ा पैदा न होने का कोई तरीका हो तो उसे देश को बताओं। बछड़ों का कोई भी उपयोग उस व्यवस्था में रह गया हो तो बताओ जिसमें खेती हल आधरित न रह कर ट्रैक्‍टर आधारित हो गई है। जिस गुजरात से दूध दूसरे राज्यों को निर्यात होता है, उसमें बछडों का क्या होता है, यह तो पता लगाओ। इन बछड़़ों को बचाने का आर्त नाद शतपथ में मिलता है, उस समय की अर्थव्‍यवस्‍था के कारण। आज तुम मुझसे पूछो कि इन बछड़ों को किसने मारा तो उत्तर होगा हल आधारित खेती से ट्रैक्टैर आधारित खेती में बदलाव ने। इस प्रक्रिया को उलट सको तो हम तुम्हारे साथ है, इस विवशता को स्वीकार कर सको तो भी हम तुम्हारे साथ है?

वह उत्‍साह में अस्थिर हो गया। संभला तो दो प्रश्न कर बैठा:
1. तुमने ही कहा था कि जो लोग सुनियोजित रूप में कोई ऐसा काम करते हैं जिससे राष्ट्रीय जन-धन की हानि हो वे राष्ट्रद्रोही हैं। अब तुम बताओं, अकारण, हमारी चेतना को प्रभावित करने वाले, शान्ति और व्यव्था ही के लिए संकट पैदा करने वाले उन लोगों को राष्ट्रद्रोही कहना ठीक होगा या नहीं जो करते सब कुछ निरामिष लगने वाला ही है पर उसके परिणाम विषप्रचार में सहायक होते हैं और उनके अलक्ष्‍य ताप का जब भी उन्मोचन होता है, वह अनिष्टकारी ही होता है।‘
यह भी पहला ही अवसर था जब मैंने नरम पड़ते हुए उससे कहा, ‘सभी प्रश्नों का उत्तर क्या इतना रटा-रटाया होता है कि अगले ने प्रश्न किया और आप ने गोली मारने वाली तेजी से जवाब दे दिया।‘

‘कल बात करेंगे। उसने बड़े आत्मविश्वास से कहा और उठ कर चला तो रोज की ही तरह पर मुझे लगा आज वह कुछ अकड़ता हुआ चल रहा है।

Post – 2016-04-27

अधूरापन अधूरा ही नहीं है

‘यह बताओ, तुम भाषा के पीछे हाथ धो कर क्यों पड़ गए हो?’

‘भाषा के पीछे तो मूर्ख पड़ते हैं और उसका सत्यानाश करके रख देते हैं, मैं तो उसके सम्‍मुख नतमस्तक होने वालों में हूं वह भी इस स्तुति के साथ कि तेरा ध्यान करने के बाद पता चलता है तू कितनी गहन और अपरिसीम है। ज्ञात होने का भ्रम पैदा करते हुए अपने उस सत्य को छिपाए रखती है कि तू अज्ञेय है। यदि पीछे पड़ने का मुहावरा तुम्हें बहुत पसन्द है तो मैं कहूंगा मैं उन अनाड़िुयों के पीछे हाथ धो कर नहीं, चाबुक ले कर पड़ना चाहता हूं जो अपने अहंकार में समझते हैं वे शब्दों को जब चाहेंगे, जैसे चाहेंगे, मोड़ देंगे और जो अर्थ निकालना चाहेंगे, निकाल लेंगे।‘

’मान गए भाई, तुम देववादी परंपरा के शिलीभूत नमूने हो जिसमें किसी भी चीज को देवता बनाए बिना अपने उपयोग का समझा ही नहीं जाता इसलिए … ‘ वह कुछ सोच में पड गया। वाक्य का अन्त कैसे करे यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

मैंने उसे दबिश में ले लिया, ‘जानते हो तुम्हारा वाक्य क्यों पूरा नहीं हो रहा है। इसलिए कि तुम्हारी मति मारी गई है। मार्क्सवादी बनते हो और आस्था और भक्ति का अर्थशास्त्र तक का पता नहीं, जब कि मार्क्स के पैदा होने से पांच हजार साल पहले से भारत को यह पता था। वह अपने उपयोग की चीजों का इतना ध्यान रखता था, उनका इतना जतन करता था, इस तरह संभाल कर रखता था, इतना सम्मांन करता था कि देखने वाले को उनमें देवत्व का भ्रम हो। तुम्हें पता है ऋग्‍वेद में धनुष, बाण, दुन्दुभी जैसी चीजों को भी देवता बताया गया है। उस परंपरा का विस्तार उस आचरण में होता रहा है जिसमें आज भी बनिया अपनी खाता बही की, बटखरों की, क्षत्रिय अपने हथियार की, लेखनजीवी अपने कलम और दावात की पूजा करता रहा है। और मा, धरती, नदी, पर्वत, वृक्ष सभी की पूजा करते हुए उनसे मिले अपने लाभ और सुरक्षा को गीत बना कर दुहराता है जिसे स्तुतिगान कहते है। और यदि तुम जानना चाहो कि अपने दूध से हमारा भरण पोषण करने वाले जानवरों में अकेले गाय की पूजा क्यों की जाती रही है तो तुम्हे शतपथ ब्राह्मण की वह इबारत दुबारा ध्यान से पढ़नी पडेगी जिसमें कहा गया है कि इसके ही बच्चों को बैल बना कर जोता जाता है जिससे अनाज उत्पन्न होता है और जिससे हमारा भरण पोषण होता है, इसलिए जो इनके मांस भक्षण की बात करता है वह अपनी भावी पीढि़यों के लिए अन्न संकट पैदा करते हुए ऐसा जघन्य काम करता है मानो वह अपनी ही अजन्मी पीढ़ियों को खा रहा हो।

‘कितने हजार साल पीछे चले गए हो, इसका पता है।‘

’जिन्हे जगत गति व्यापती ही नहीं वे न अतीत को समझ सकते हैं न वर्तमान को न आगत को, वर्ना तुम अपने झंडे, अपने राष्ट्र गान, अपने संविधान के प्रति सम्मान की भावना के पीछे काम करने वाले तर्क को समझ पाते। तुम्हें केवल यह पता चला कि मैं बीते हुए युगों के साथ हूं पर यह पता नहीं चला कि उसी के कारण मैं वर्तमान के साथ भी हूं। तुम न अतीत का सम्‍मान कर सके, न उसे समझ सके, न यह देख सके कि वर्तमान की वर्तमानता में भी अतीत विद्यमान है और जिस दिन वह न रहा पूरा मानव समाज उस इमारत की तरह बैठ जाएगा जिसकी नींव धंस गई हो या अपनी सही जगह से हट गई हो।‘

’तुम नहीं मानते कि बातें कुछ वायवीय हो रही हैं। क्या इस पर हम कल बात न करें।‘

मैंने तो पहले दिन से ही यह मान लिया था कि तुमको जमीनी सचाई वायवीय लगती है और वायवीय या कल्पनाप्रसूत तुम्‍हारे लिए यथार्थ बन जाता है। फिर भी कल तक का समय चाहिए तो उसे कौन रोक सकता है। रोकूं तो भी उठ कर चल दोगे।‘

Post – 2016-04-26

भाषा का संकट: विचार का संकट

‘ऐसा विचित्र दौर आ गया है कि लोग अपने संगठन के नाम में भारत, राष्ट्र जोड़ लेते हैं और दुनिया को बताते फिरते हैं कि देश और समाज की चिन्ता उन्हें ही है और जो उनसे असहमत हैं वे सभी राष्ट्राद्रोही हैं।‘

कल की लताड़ का जवाब तैयार करके आया था, ‘अधिनायकवाद यहीं से आरंभ होता है। खतरे यहीं से पैदा होते हैं जब एक छोटी सी जमात, मेरा मतलब पूरे देश को देखते एक छोटी सी जमात, सत्ता में आ कर ऐसे काम करने लगती है, जिसमें उससे असहमत होना तक कठिन हो जाता है। तुमने कभी यह भी सोचा है।‘ वह सचमुच गंभीर था।

‘यदि में कहूं कि यह तुम्हारा भ्रम है, इसका कोई आधार नहीं, तो तुम ऐसे टु‍कड़े जोड़ कर एक कोलाज तैयार करोगे जिसमें वह देश, समाज और पूरी मानवता के लिए खतरा दिखाई देने लगेगा। ठीक इसके विपरीत ऐसे ही टुकड़े जोड़ कर एक दूसरा कोलाज कोई दूसरा तैयार करे जिसमें वह अनन्य और अप्रतिम लगे तो वह भी कम विश्वासनीय न होगा। इन व्‍यक्तियों और संगठनों से सहानुभूति रखने वालों की संख्या करोड़ों में है और इसलिए दोनों कोलाजों के प्रशंसक और कुछ कतरनें अपनी ओर से जोड़ने वाले लाखों आसानी से मिल जाएंगे। ऐसी स्थिति में निर्णय दो चतुर कलाकारों की कारसाजी की तो की जा सकती है परन्तु दोनों के कोलाज देखने वाले निष्पक्ष लोग भी भ्रमित हो जाएंगे, पर भरोसा किसी पर नहीं कर सकेंगे। विश्‍वास का संकट अवश्‍य पेदा हो जाएगा। इससे विचारेतर तरकीबों और तिकड़मों के लिए गुंजाइश पैदा होगी। पक्षधरता के ये दोनों रूप नासमझी का ही विस्तार करेंगे। गुण-दोष का सही मूल्यांकन करने के लिए हमें ठोस, तटस्थ और वैज्ञानिक मूल्यांकन चाहिए। इसका कोई उपाय हो, और उसका कभी सहारा लिया हो तो वह बताओ।‘

वह कुछ सोच में पड़ गया, फिर बोला, ‘समस्याओं का सर्वमान्‍य हल नहीं हुआ करता। तुम लाख कोशिश करो दोनों को अच्छा और बुरा कहने वाले तो मिल ही जाएंगे। सर्वस्वीकार्य सच और फैसले तो तानाशाहों के ही होते हैं।‘

’ठीक ऐसी ही बहस तानाशाही पर हो, असंख्य लोग उसी व्यक्ति को आदर्श लोकवादी मानें और दूसरे उसे ही तानाशाह तो यहां भी वही स्थिति पैदा हो जाएगी।‘

’होगी, लेकिन…’ वह कुछ कहना चाह रहा था पर अपने को उसने रोक लिया।

’ऐसी स्थिति में हमें किसी की आलोचना करने का अधिकार नहीं रह जाता। कोई चीज न तो सही रह जाती है, न गलत। तुम्हारा अपना विश्वास ही निर्णायक बना रहता है और विश्वास विचार में बाधक होता है, कई बार विचारद्रोही होता है, यह तुम जानते हो। इसलिए हमें किसी विषय पर राय देने से बचते हुए जो कार्यक्षेत्र अपने लिए चुना है उसी की सीमाओं में रह कर निष्ठा और समर्पण भाव से काम करना चाहिए और दूसरों को बुलावा नहीं भेजना चाहिए कि अपना काम छोड़ कर आओ और हमारे काम में हाथ बटाओ, अपितु यदि वे ऐसा करने को विचलित अनुभव करें तो उन्हें समझाना चाहिए कि अपने क्षेत्र का काम पूरे समर्पणभाव से करो जिससे उसकी संभव उूंचाइयों को छू सको। इससे कम से कम उस क्षेत्र का तो भला होगा और सभी ऐसा करने लगें तो सभी क्षेत्रों का उत्थान होगा और इस‍ तरह पूरे देश और समाज का उत्थान होगा।

‘ तमिल की एक सूक्ति है, यदि पूरा देश समृद्ध हो तो किसी को कोई कमी न रह जाय – नाडेंगम् वाझ़गा केडोन्रुममिल्लै। हम अन्यान्य क्षेत्रों में अपनी उूर्जा बर्वाद करके समूचे देश की उूर्जा की तबाही करते हैं और तब पूरा देश तबाह होता है।

‘उसी सूक्ति का उल्टा पाठ बनता है कि यदि पूरा देश ही बर्वाद हो रहा हो तो कोई सुख और शान्ति से नहीं रह पाता। तब बहुसंख्यक जन अपनी रोटी तक कमा नहीं पाते, उनकी ओर रोटी हिकारत से फेंकी जाती है और गर्व से बताया जाता है कि देखो हमने तुम्हारी ओर इतनी रोटियां फेंकी। मुझ जैसा पहले कोई हुआ था। मजा तब कि वह रोटी भी उसके बिचौलिये छीन कर उन्हेंं दूसरों को बेचने लगें। ऐसे मे यदि कोई आए और कहे रोटी कमाने की संभावनाएं पैदा करो ताकि फेंकी हुई रोटी खानी न पड़े, परन्तु जब तक ऐसी नौबत नहीं आ जाती मैं ऐसी व्यवस्थाक करता हूं कि रोटी तुम तक पहुंचे अवश्य , बिचौलियों की झोली में न चली जाय, तो भी दोनों के साथ बहुत सारे लोग खड़े हो सकते हैं पर क्या सही और गलत का निर्णय भी आधा आधा रह जाएगा। ऐसी स्थितियां होती हैं जिसमें सही और गलत का निर्णय बहुत साफ होता है और यह तय करना भी आसान होता है कि जो गलत के साथ है, बीच की रोटी अपने झोले में डालने वालों की जमात में हैं वे सही हैं या वे जो सही के साथ खड़े होने की कोशिश में गलत लोगों के धक्के झेलते हुए अपने पांवों को टिकाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।‘

’तुमने भाषा और विचार के सवाल को रोटी पर पहुंचा दिया।‘

‘तुम भी नहीं मानोगे कि विचार और रोटी में बहुत गहरा संबंध है। तुम तो मार्क्सुवादी हो यार, हमारे यहां के तो भाववादी तक मानते रहे हैं कि जैसा अन्न वैसा मन और यह भी कि भूखे भजन न होंहि गोपाला।‘

’तुम पक्के घालमेलाचार्य हो। अपने क्षेत्र के काम वाले प्रस्ताव पर आओ। पहले तो क्षेत्रों का इतना तराशा हुआ बटवारा नहीं होता जितना तुम छुरे की धार से कर लेते हो । एक प्रमुख क्षेत्र से जुडे़ अनेक अनुसंगी क्षेत्र होते हैं। फिर सोचने विचारने का काम भी तो सभी को करना पड़ता है और जिनका क्षेत्र ही सूचना, ज्ञान और विचार है वे अपना काम कैसे छोड़ देंगे। और उन्हें जो चीज गलत लगती है उसे गलत तो कहेंगे ही।‘

’यही तो कह रहा हूँ कि वे जो अनेक काम दूसरे कारणों से करते हैं उनको अपने प्रधान काम की कीमत पर नहीं करना चाहिए। उसी से उनका अपना कार्यक्षेत्र निर्धारित होता है। इस क्षेत्र को उन्होंने स्वयं चुना है और इसलिए ही इसे समर्पित भाव से, निष्ठापूर्वक करना चाहिए, जो वे नहीं कर रहे हैं। वे सोचने की जगह नारेबाजी कर रहे है, दंगे को विचार की स्वतन्त्रता बता रहे हैं। वे जिसे तानाशाह बता रहे हैं या जिससे तानाशाही का खतरा दिखा रहे हैं उसको निहत्थे हो कर भी ललकार रहे हैं, और वह कुछ नहीं करता और उन्हें और अपने को कानून के हवाले कर देता है। वे उस कानून को भी नहीं मानते। तानाशाह तानाशाह भले न हो तानाशाही का हौवा पैदा करके गुंडागर्दी करने वाले और गुंडागर्दी को क्रान्तिकारी पहल बताने वाले तो है।‘

’बहस तो फिर इस पर भी होगी कि जिसे तुम गुंडागर्दी कह रहे हो वह गुंडागर्दी है या नहीं।‘

’बहस करने पर तो फिर वही विभाजन हो जाएगा कि इतने लोगों के लिए यह गुंडागर्दी है इतनों के लिए क्रान्तिकारी उन्मेष। इसलिए गुंडागर्दी को परिभाषित करना होगा। यदि तुम कहते हो जिनका काम सोचना है, विचार करना है, किसी निर्णय पर पहुंचना है वे जिस कृत्य का समर्थन कर रहे हैं उसको परिभाषित करने तक की योग्यता उनमें नहीं है तो मैं कहूंगा इसका कारण यह है कि वे अपने क्षेत्र का काम सच्चे मन से नहीं करते रहे। अपने को धोखे में रखते रहे है।

‘उसे परिभाषित करने के स्थान पर तुम जो काम बहुत सारे लोगों को गुंडागर्दी लगती है उसका समर्थन करते हुए बताते हो गुंडागर्दी आजादी से जुड़ी हुई समस्या है इसलिए उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता।

‘मैं कहता हूं सोचने, विचारने, शिक्षित करने वाले लोगों के बिना कोई समाज सनक जाएगा, वे ही हमें राह दिखाते है, पर तभी जब वे अपना काम करना जानते हों। जो इसे जानते हैं वे कितने भी बुद्धिमान हों, उनको जो सही या गलत लगा, उसे सही या गलत मान कर ऐक्शन में नहीं आ जाते हैं। विचार की एक प्रक्रिया होती है जिससे गुजर कर, उसके पक्ष-विपक्ष को जानने के बाद वे किन्हीं ऐसे औजारों का प्रयोग करते हैं जिससे सही निर्णय पर पहुंचा जा सके। जब तुम कह रहे थे कि किसी भी प्रश्न पर दो तरह के विचार तो होगे ही, केवल तानाशाह ही अपने विचार और आदेश को सही मानता है, तब तुम एक बदहवास की तरह बात कर रहे थे। तानाशाह न तो सही होता है न हो सकता है, क्योंकि वह विचार और विचारकों से डरता है। विचारों का हनन करता और अपनी आलोचना करने वालों को रास्ते से हटा देता है।‘

’ठीक कहते हो, जैसा अब होने लगा है। देखा नहीं, विश्वव हिन्दी सम्मेलन के बारे में इस सरकार के एक मंत्री ने क्या कहा था। आज विचारकों और साहित्यकारों की कितनी बेकद्री है।‘

’मैं चाहता था तुम समस्या पर बात करते, पर लगता है तुम उन चिन्दियों को जुटाने लगे जिनसे अपना कोलाज बनाते हो और झूम उठते हो, जब कि एक तटस्थ व्यक्ति को यह दिखाई देता है कि बोलने, अपशब्द बोलने तक की आजादी, सीधे बिना कोई कारण बताए अपने कल्पित तानाशाह को मिटाने के नारे लगाने वालों तक को बोलने की जितनी आजादी इस समय है वैसी इतिहास में कभी थी ही नहीं। आजादी सोचने की भी है, पर उस ओर तुम्हारा ध्यान नहीं जाता, इसलिए वह बदहवासी है जिसमें तुम्हारा सच तुम्हें सत्य् की पराकाष्ठा प्रतीत होता है और उससे असहमति जघन्य प्रतीत होती और ऐसों को तुम मिटा देना चाहते हो, जो तुमसे भिन्न विचार रखते हैं। इसे छिपाते भी नहीं, खुल कर कहते हो, इसका इन्तजाम भी करते हो। अब तानाशाह और लोकवादी का फैसला करो। तानाशाह तुम सिद्ध होते हो अपनी ही परिभाषा से,, अपने ही किए और कहे से और इस तानाशाही का चश्का तुम्हें पड़ गया है या नहीं। वह अकेला आदमी जो इस तानाशाही को खत्म करना चाहता है पर लोकवादी औजारों से ही, सबको साथ लेकर, सबके विकास का सपना देखता है, उसे तुमने तानाशाह बना रखा है। समझ और नीयत की ऐसी खोट कहीं मिलेगी।‘

कुछ न सूझा तो वह अपना सिर खुजलाने लगा। यह उसकी आदत है, यह मैं बता आया हूं।

मैंने कहा, ‘देखो भाषा का संकट विचार के संकट से पैदा होता है, और विचार का संकट तब पैदा होता है जब तुम अपने विश्वास को ही विचार मानने लगते हो और उसके लिए घास तिनके जोड़ने लगते हो। ऐसे लोग केवल वैचारिक और वाचिक संकट ही नहीं पैदा करते, स्वयं अपने देश और समाज के लिए संकट बन जाते हैं।‘

अब कहीं उसकी जान में जान आई, ‘संकट मान ही चुके हो, मिटा दो। छुट्टी मिल जाएगी।‘

’जो खुद अपने को मिटाने का पक्का इन्तजाम करता जा रहा हो उसे मिटाने का पाप कौन लेगा यार।‘

Post – 2016-04-26

मैंने अपनी कल की पोस्‍ट का संपादन अभी अभी किया है। जिन मित्रों ने पोस्‍ट पढ़ लिया है वे अन्तिम अंश को जो 000 के निशान के आगे जोड़ा गया है अवश्‍य पढ़ें।

Post – 2016-04-25

भाषा और परिभाषा

जानते हो, जो मुंह में आए उसे बोल जाने वाले को क्या कहते हैं? बकवास करने वाला!

‘तुम नहीं जानते कि मामूली से अर्थभेद से बात कहां से कहां पहुंच जाती है। जो मुंह में आया बोल जाने वाले को बकवास करने वाला नहीं कहते, मुंहफट कहते हैं। बकवास करने वाता उसे कहते हैं जो निराधार या तर्कहीन बातें करता है। अभी हमारी एक मित्र मणिका मोहिनी ने ज्‍वालामुखी का प्रयोग किया था। इसका मै दो ही अर्थ जानता हूं, एक में मुंहजला कहा जाता है और दूसरे में बीड़ी-सिगरेट पीने वाला। सोच समझ कर बोला करो। अभी हमारे एक मित्र शब्दकोश पढ़ने की आदत के बारे में बात कर रहे थे। अच्छी आदत है, मैं इस माने में डी एच लारेंस को अपना गुरु मानता हूं । आल्डस हक्सले ने उसके पत्रों का एक संकलन प्रकाशित किया था जिसमें अपने एक पत्र में उसने अपने प्रकाशन एजेंट से पूछा था कि मैंने अमुक स्‍थल पर अमुक शब्द‍ का अमुक आशय से प्रयोग किया है बताना ठीक तो है।

‘शायद अपने उसी पत्र में उसने लिखा था कि यदि मुझे इस बात का पूरा ज्ञान होता कि कौन सा अक्षर किसके बाद आता है तो डिक्शनरी देखने में जितना समय लगाया है उसमें कुछ सालों की बचत हो गई होती।‘इसका मतलब जानते हो तुम?’

’इसमें मतलब जानने की कौन सी बात आ गई? हर चीज का तमाशा बनाते हो तुम?’

’तुम जिन पहलुओं को तमाशा मान कर छोड़ देते हो उनकी गहराई में जाओ तो लोक परलोक दोनों सुधर जाएंगे। इसका मतलब यह है कि लारेंस बहुत संवेदनशील और सतर्क लेखक था। स्कूल टीचर था, यह जानते ही होगे। इसका मतलब है वह अपनी रौ में अपनी रचना लिख जाता था और फिर उसकी बहुत बारीकी से जॉंच करता था कि जिन शब्दों का प्रयोग उसने किया है वे ठीक वही आशय देते हैं या नहीं । उस काल में अंग्रेजी में थिसेरस, जिसके लिए अरविन्द कुमार ने समान्तर कोश का प्रयोग किया, या तो नहीं था, या भरोसे का नहीं था। उसे एक ही शब्द के पर्यायों को कोश से देखना होता, उनकी जो परिभाषा या व्या ख्या उसमें दी गई है उसे समझना होता, और फिर उन पर्यायों में से एक एक को जांच कर देखना होता कि कोई शब्द उसके इच्छित आशय के अनुरूप है या नहीं।

‘अब समझ में आया, उसने अतिरंजित रूप में ही सही, कोश से सहायता लेने के लिए इतने लंबे समय का उल्लेख क्यों किया था और इतनी सावधानी स्वयं बरतने के बाद भी उसने अपने एजेंट से किसी विशेष प्रयोग के बारे में क्यों आस्‍वस्‍त होना चाहा था कि वह सर्वथा उपयुक्त है या नहीं।

‘इसे कहते हैं अपनी भाषा का सम्मान। इसे कहते हैं अपनी जनभावना का सम्माान। इसे कहते हैं अपने विचार का सम्मान और इसे कहते हैं अपने विचारदर्शन का सम्मान ।

‘तुम लोगों ने अपने अजदाद तक का सम्मान करना छोड़ दिया। क्योंकि वे हिन्दू थे और तुम्हा‍री तरह उससे आगे नहीं बढ़ सके थे जहां हिन्दुत्‍व को हिकारत में बदल दिया जाता है, इसलिए तुम न अपनी भाषा का सम्मान कर सकते थे न अपनी भावनाओं का जिनका तुम इजहार करके अपनी दूकानदारी चलाते हो। तुम उस दर्शन को भी न तो समझ पाए न ही उसका सम्मान कर सके, क्योंकि भारतीय कम्युनिज्म एक रोमानी अभियान था जिसमें नवाबों की जिन्दगी जीने वाले, अपनी कविता और वक्तंव्य में सर्वहारा की पीड़ा और गुस्से को छौंक के रूप में इस्तेमाल करते थे और महफिल लूट कर घर चले जाते थे और खुशी में एक और पेग चढ़ा कर क्रान्ति के सपनों में खो जाते थे। परन्तु यह एक ऐसी सुहानी क्रान्ति थी जिसके न आने का उन्हें पूरा विश्वास था।

‘जानते हो मुझे यह खयाल इतने ठोस रूप में क्यों आया? फैज की कुत्तेे कविता याद आ गई थी। पूरी कविता तो मुझे याद नहीं, पर उसमें आए कुछ शब्दबन्ध जहन में हांट करते हैं, ये छोटी सी घुड़की ये डर जाने वाले, ये फाकों से मर जाने वाले, कोई इनको अहसासे जिल्लत दिला दे। कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे । ये आकाओं की हड्डियां तक चबा लें। आदि।

तुम गौर करो, जिनकी हड्डियां उन्हें चबानी थी, उनमें तो अपनी नवाबी जीवन शैली वाले फैज भी थे, बन्ने भाई भी थे और दूसरे हजरात भी थे। फिर यदि वे क्रान्ति को एक संभावना मानते थे तो उन्हें अपनी जीवनशैली बदलने का खयाल क्यों न आया? वे जानते थे, क्रान्ति एक लफ्ज है संभावना नहीं, यह लफ्फाजी के लिए बना है और आकाओं की हड्डियां चबाने वालों की जुर्रत नहीं कि वे किसी के दुम हिलाने से भी हमारी हड्डियां चबा सकें।‘

वह कुछ कहने के लिए तिलमिलाया तो पर सही वाक्य की तलाश न कर सका इसलिए चुप रह गया।

मेरा इरादा उसे दुख पहुंचाने का न था। मैंने बात आगे बढ़ाई, ‘अच्छे लेखक के पास और कुछ हो या न हो, शब्दकोश जरूर होना चाहिए जिससे तनिक भी शक होने पर वह अपना संदेह दूर कर सके। और इतना सब जानने मानने के बाद भी कई बार आदतन कुछ गलत प्रयोग सभी से हो ही जाते है। कोशाधिकारी शलाका पुरुष मेरी जानकारी में एक ही हुए हैं: पंडित रामावतार शर्मा, जो कहते थे कोई भाषा सीखनी क्या मुश्किल है, उसका व्याकरण और कोश रट जाओ, भाषा पर अधिकार हो गया। वह नलिन विलोचन शर्मा के पिता थे।

‘पर भाषा पर भी इतना जोर मत दो कि भाषाज्ञान साधन से साध्य में बदल जाए। न जानें कितनी भाषाओं के अधिकारी होते हुए भी वह एक चमत्कार बन कर ही रह गए। उनका उतना भी योगदान नजर नहीं आता जितना नलिन जी का, जो इस माने में अपने पिता के चरण रज से बड़े नहीं हो सकते थे।

‘पर भाषा, वह कोई भी हो, खास कर जनभाषा, वह संगीत की अनन्य उूंचाई पर पहुंची होती है। कविता में वह संगीत नहीं होता जो गद्य में होता है इसलिए जो कलाकार दर्जनों भाषाओं में गाना गा लेते है, उनमें से किसी के गद्य का एक वाक्य भी सही नहीं बोल पाते।‘

’तुम कह रहे थे कि जो शब्दों का सूक्ष्म अर्थभेद नहीं जानते वे बात को कहां से कहां पहुंचा देते हैं और मैंने पाया लोग सूक्ष्म अर्थभेद जानने के कारण किसी बात को कहां से कहां पहुंचा कर ही संतुष्ट नहीं होते, इस ताक में भी रहते है कि उसे वहां से और कहां कहां पहुंचाया जा सकता है।‘

इतनी देर के बाद उसका वह वाक्य पूरा हो सका जिसके लिए वह तिलतिलाया तो था पर चुप रह गया था। हम दोनों का अट्टहास एक साथ फूटा । अट्टहास थमा तो मैंने हंसते हुए ही कहा, ‘मैं जानता था तुम मुझ पर हमला करने के लिए पैंतरा बदल रहे हो, इसलिए तुम्हारा वाक्य पूरा होते ही उल्टे तुम्हारे उूपर दबिश बना ली। अब बताओ तुम बकवास कह कर भूमिका किस बात की बना रहे थे।‘

‘तुमने अपनी रौ में यह घोषित कर दिया कि भाजपा छोड़ दूसरे सभी दल और नेता राष्ट्राद्रोही हैं और यह भी नहीं सोचा कि स्वयं अदालत ने यह मान लिया है कि अन्य जो भी अपराध हो अलगाववादी बातें करना या नारे लगाना, जुलूस निकालना राष्ट्रहद्रोह में नहीं आता। इसके बाद भी तुम वही बातें दुहरा कर अदालत की अवमानना नहीं कर रहे थे। मैं तुम्हारे भले के लिए समझा रहा था कि जो जी में आया वही बोल जाने के खतरे भी हैं।‘

’तुमने किसी फैसले को ध्यान से पढ़ा ही नहीं, इसे क्यों पढ़ते। अदालतों का फैसला पुलिस और राज्य के लिए मान्य होता है, लोक के लिए नहीं। अदालत के फैसले में यह ध्यान रखा जाता है कि अमुक धारा में जिसे अपराध माना गया है उसकी परिभाषा में अमुक कृत्य आता है या नहीं, आता भी है तो उसके लिए पुलिस को जो सबूत जुटाने थे वे जुटाए गए या नहीं, यदि वे जुटाए गए तो लचर है या निर्णायक, जो गवाह पेश होने थे उन्होंने अपना बयान बदल तो नहीं लिया, इसलिए हर फैसला बहुत सारे बन्धनों या विवशताओं में जकड़े हुए जज का होता है।

‘जो स्वतंन्त्र नहीं है, जिसके हाथ कानून की धारा और कानून की सहायता करने वाली पुलिस की साख से बंधे हैं जो इतनी गिरी हुई है कि बहुत सारे लोग खमियाजा भुगत लेते है, पर पुलिस के पास नहीं फटकते और उूपर से कानूनी फैसलों में व्यक्तिगत घटक भी काम करते हैं और उनकी मान्यता इस हद तक सन्दिग्ध हो सकती है कि कोई कानून जानने वाला ही यह कहे कि न्यायाधीशों में इतने प्रतिशत भ्रष्ट हैं, रिश्वत लेते हैं तो उसका खंडन करने वाले तक सामने नहीं आते। पुलिस कानून से बंधी है, जज कानून और पुलिस की साक्ष्य जुटाने की क्षमता और ईमानदारी से बंधा है, पर लोक वह है जिसके हित के लिए कानून बनाए और बदले जाते हैं। वह जहां गलत लगता है वहां भी सर्वोपरि है। कहें जज राज्य और पुलिस से उूपर होता है, लोक उनसे और न्यायपालिका से भी उूपर होता है। जहां वह जानता है अपराध किसने किया था, वहां उसके विश्वास में इस बात से अन्तंर नहीं पड़ता कि अदालत को संतुष्ट करने वाले पर्याप्त प्रमाण दिए गए या नहीं, और अपराधी को सिद्धदोष पाया गया या नहीं। हमारा विधानांग जनता को न्याय दिलाने के लिए नहीं, अन्‍यायियों को संरक्षण देने के लिए बनाया गया है। न्याय में विलंब के लिए बनाया गया है जिसमें न्‍याय आता भी है तो वह कार्यान्वित नहीं हो पाता।’

‘000
‘इसलिए राष्‍ट्रद्रोह की मेरी कसौटी है कोई काम राष्‍ट्र के हित में है या अहित में। अहित में है तो वह सोच विचार कर किया गया है या किसी चूक से हाे गया है। यदि सोच विचार कर राष्‍ट्र के अनिष्‍ट का काम किया गया है तो वह राष्‍ट्रद्रोह है। यदि किसी जनकल्‍याणकारी याेजना को जिस पर भारी धनराशि खर्च की जा चुकी है कोई राजनीतिक कारणों से रोक देता है तो भले वह सत्‍ता में हो उसका यह कार्य राष्‍ट्रद्रोह है। यदि कोई ऐसी संस्‍था को चलने नहीं देता जो देशहित के काम करती है तो वह राष्‍ट्रद्रोह है। यदि कोई किसी भी तरह का उपद्रव करता या कराता है जिससे देश के धन, जन और संसाधनों की हानि होती है तो वह देश द्रोह है।’

वह हंसने लगा, ‘तब तो कोई ऐसा व्‍यक्ति ही न बचेगा जो राष्‍ट्रद्रोही न हो।’

‘तभी तो कहा था, जिधर देखता हूं उधर तू ही तू है। देश को आत्‍मद्रोही बनाने की योजना पर ही तो तुम इतने लंबे समय से अपनी यूनियनबाजी के माध्‍यम से काम करते रहे हो ओर आज भी अपने हित के लिए संगठित होने के अधिकार और संगठित हो कर उपद्रव करने की छूट में फर्क नहीं कर पाते। अदालत को कोई कानून न मिलेगा जो यह फर्क बता सके पर लोगों को यह फर्क पता होता है और वे तुम्‍हारे ऐसे कारनामों को भी देश और समाज के लिलए अनिष्‍टकर पाते हैं अत: राष्‍ट्रद्रोह मानते हैं।”