Post – 2016-04-14

पतन ही उत्‍थान का मूल मन्‍त्र है

‘तुम्हेंं पता है रोहित के भाई और उसकी मां ने धर्मान्तारण का निर्णय लिया है।’

‘देखो किसी को अगर कोई धर्म पसन्द नहीं है तो उसे उसको छोड़ देना चाहिए। यदि धर्म सचमुच इतना जरूरी है कि इसके बिना जीवन चल ही नहीं सकता तो जो धर्म सही लगे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। पहले इस देश में यह बहुत साधारण सी घटना हुआ करती थी। लोग किसी भी धर्म के किसी पक्ष से आकृष्ट हो कर अपना धर्म बदल लिया करते थे। धर्म की राजनीति करने वाले, उनके मठाधीशों के लिए यह अपने साम्राज्य की समस्या हुआ करती थी। जैसे राजा का राज्य विस्तार होता है तो उसी के अनुसार उसका राजस्व बढ़ता है और इसके लिए राजा खून खराबा करते रहे हैं और सौ तरह के उपद्रव करते रहे हैं, विशाल सेनाएं रखते रहे हैं, यह जानते हो। उसी तरह धर्मसत्ता की आय और प्रभाव पर उसमें सम्मिलित होने या उससे अलग होने वालों के कारण प्रभाव पड़ता रहा है। अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए, या धर्म सत्ता का विस्तार करने के लिए ये महन्त और मठाधीश भी झगड़े झमेले करते रहे हैं। धर्मानुयायी का ध्यान उसके आत्मिक और आध्यात्मिक पक्ष की ओर होता है, इसलिए दूसरा धर्म मानने वालों से उसकाे कोई फर्क नहीं पड़ता था। एक ही परिवार में एक व्यक्ति शिव का उपासक तो दूसरा शक्ति का, तीसरा विष्णु का और चौथा किसी को न मानने वाला । कभी कभी एक ही परिवार में एक सनातनी और दूसरा जैन। ऐसा पति पत्‍नी तक के बीच होता था।
‘मेरे बाबा नित्य आमिष भोजी और उनकी कामना यह कि उनके बाद कोई मांसाहार न करे इसलिए पिता जी को विष्णु का गुरुमन्त्र दिलवाया और अपने ही घर में खान पान के मामले में अछूत बन गए। वे बर्तन जिनमें वह मांस-मछली पकाते थे उनको धोने के बाद भी इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता था कि दूसरे किसी बर्तन से उसका स्पर्श न हो। थाली कटोरी का काम पत्‍तल और दोने से। तो यह चुनाव धार्मिक लोगों के लिए पारस्परिक सद्भाव में कभी बाधक नहीं था, जब कि महन्तों और मठाधीशों में, पंडों और अखाड़ेबाजों में मार पीट होती रहती थी, वे इसके लिए अपने अखाडि़या साधु रखते थे जिनका सैनिकों के रूप में प्रयोग किया जाता था। इन महन्तों , मठाधीशों, मन्दिरों के पुजारियों का अपना चरित्र उस मत में सच्ची निष्ठा रखने वाले अनुयायियों या भक्तों की तुलना में बहुत हेय होता था। सत्ता से जुड़ी सभी विकृतियां उनमें सामान्य होती थीं और उनके अखाडि़ए तो गुंडागर्दी के बिना जीवित रह ही नहीं सकते थे। धर्मसत्ता पर अधिकार जमाए लोगों के लिए धर्म एक जायदाद था और इसका सीधा संबंध राजसत्ता की तरह राजकोष की संपन्नता से था और इसीलिए मठों, मन्दिरों के पास अकूत धन होता था। सामान्य जन उन देवालयों और प्रतिमाओं में प्रतिष्ठित देवों के प्रति भक्ति रखते थे परन्तु उन्हीं के पुजारियों की छीना झपट को समझने के कारण उनके प्रति कोई आदर नहीं था। फिर भी आरती वही कराते, चढ़ावे उन्हें ही मिलते और विशेष अवसरों और समारोहों पर प्रधान भूमिका उनकी ही होती थी। वे पैसे के लोभ में कासी-करवट तक करा सकते थे।‘

‘कासी करवट करा सकते थे, मतलब।‘

‘मतलब अभी नहीं बताउूंगा, कभी प्रसंग आ गया तो बाद में। अभी तो यह समझो कि यह धर्म बदलने का मामला नहीं है। होता तो इसकी ओर ध्यांन देने की जरूरत न थी। यह धर्मपरिवर्तन की राजनीति का मामला है और उसके माध्यम से कुछ हासिल करने की कोशिश का मामला है, उनके लिए भी और तुम्हारे लिए भी। उन्होंने कुछ हासिल करने की कोशिश भी की, परन्तु शायद वह इस घटना की पब्लिसिटी के अनुपात में कुछ कम लगा हो, इसलिए उससे सन्तुष्ट नहीं लगते। परन्तु तुम्हारी और इस खबर को महत्व देने वाले माध्यमों की दशा अधिक चिन्तानजनक है। दोनो सनसनी और टीआरपी या पता नहीं क्या कहा जाता है उसे, जिससे विज्ञापन का दर बढ़ता है, उसके पीछे पागल हैं। इनकी भूमिका सत्ता पर कब्जा जमाए या जमाने के लिए प्रयत्नशील लोगों के सन्दैर्भ में मठों और पंडों के अखाडि़या पहलवानों जैसी है। ऐसे लोगों का न अपना चरित्र होता है न दिमाग।‘

’तुम ऐसा अपने बारे में तो कह सकते हो, दूसरों के बारे में इतने विश्वास से कोई दावा कैसे कर सकते हो। अपने को कहते मार्क्ससवादी हो और सेवा उनकी कर रहे हो जिन्हें सारी दुनिया हिटलरवादी मानती है।‘

’देखो, मार्क्सवादी मैं इसलिए हूं कि सत्ता के इन दोनों रूपों के चरित्र का, उनके पीछे के आर्थिक आधार का और लाभ के वितरण का तन्त्र मुझे दिखाई देता जिसे रस्मी मार्क्सिवादी देख नहीं पाते या देखने से बचते हैं और दिखाया जाय तो तिलमिला उठते हैं। सत्ता से जुड़ने के बाद मार्क्सावाद अपना सत्व खो देता है।

‘यह रहस्‍य केवल मेरी समझ में आता है और इसलिए मैं उस कोटि की पवित्रता और निस्पृहता का निर्वाह करना चाहता हूं जो धार्मिक और समाजसेवी व्यक्तियों में होती है।

‘मैं कोई नयी बात कहता भी नहीं। केवल उन बातों की ओर ध्यामन दिलाता चलता हूं जिन्हें हम सभी जानते हैं परन्तु बहुत से लोग अपनी हितबद्धताके कारण उन्हेंं प्रयत्नपूर्वक भूलने या झुठलाने का या घालमेल करने का प्रयत्न करते हैं। तुम उसी कोटि में आते हो, राजनीतिक दलों से जुड़े लोग तो सत्ता हथियाने के लिए या किसी दूसरे को सत्ता से हटाने के लिए किसी तरह का अपराध कर और करा सकते हैं और करते आए हैं। उन पर भरोसा करके स्वयं उनको नहीं समझा जा सकता, किसी समस्या या अन्य व्यक्ति की तो बात ही अलग है।

‘तुमने अच्छा किया कि रोहित बेमुला का प्रसंग आरंभ कर दिया। दलित समस्या पर चर्चा के लिए ऐसे व्यक्ति से उपयुक्त कोई हो नहीं सकता जो दलित होने का दावा करता है परन्तु इसको प्रमाणित करने की स्थिति में नहीं है।
‘मैंने उसकी आत्महत्या से पहले लिखे गए पत्र को कई बार पढ़ा है और मैं आज तक उस कारण को नहीं समझ पाया तुम उस पत्र के कुछ वाक्यों पर गौर करो:
1. I feel a growing gap between my soul and my body. And I have become a monster.
2. I loved Science, Stars, Nature, but then I loved people without knowing that people have long since divorced from nature. Our feelings are second handed. Our love is constructed. Our beliefs colored.
3. The value of a man was reduced to his immediate identity and nearest possibility. To a vote. To a number. To a thing. Never was a man treated as a mind. As a glorious thing made up of star dust. In every field, in studies, in streets, in politics, and in dying and living.
4. In understanding love, pain, life, death. There was no urgency. But I always was rushing. Desperate to start a life.
5. All the while, some people, for them, life itself is curse. My birth is my fatal accident. I can never recover from my childhood loneliness. The unappreciated child from my past.
6. I am not sad. I am just empty. Unconcerned about myself. That’s pathetic. And that’s why I am doing this.
7. Know that I am happy dead than being alive.
8. No one is responsible for my this act of killing myself.
9. No one has instigated me, whether by their acts or by their words to this act.
10. This is my decision and I am the only one responsible for this.
11. Do not trouble my friends and enemies on this after I am gone.

इन पंक्तियों को ध्याrन से पढ़ो, लुकाठे की तरह नहीं। समझने की कोशिश करो कि इतने सुलझे और संवेदनशील तरुण में जिसकी महत्वाकांक्षाएं ही उसे किसी प्रकार के आत्मघाती कदम से रोकने के लिए पर्याप्त हैं। वह कौन सा तत्व हो सकता है, कौन सी स्थिति जिसमें ये सभी घटक चेतना को इस हद तक झकझोर दें कि वह भीतर से खाली अनुभव करे। ‘

‘तुम सौ बार पढ़ो तो भी तुम्हारी समझ में वह बात नहीं आएगी जो सभी की जहन और जबान पर स्वत: आ जाती है।‘

मैंने हंसना चाहा पर हंस न सका। बेचारगी में पूछा, ‘यह बताओ, जवानी में तुमने कभी किसी लड़की से इस हद तक प्यार किया है कि वह अवस्था आ जाय जिसमें वह अनुभव करता है कि उसके बिना जी नहीं सकता, मेरी जान फिकरा नहीं रह जाता, अन्तरात्मा की आवाज बन जाता है। हां, किया तो था एक बार, पागल भी हो चले थे, पर वह सफल हो गया एक दूसरे पागलपन के मोल पर परन्तु यदि विफल हो जाता तो। फिर से पढ़ो इन पंकि्तयों को, इस पत्र में आए लव शब्द के विविध आशयों को, अपनी प्रतिभा के बल पर कायम इस विश्वास को कि जाति पांत का अवरोध पार करने के लिए यही काफी है और कल्पना करो वर्ण की दीवार टूटती नहीं, उसका किसी अन्य से विवाह हा जाता है या इसे केवल इस कारण ही ठुकरा दिया जाता है। इसके बाद भी वह चाहता है कि उसकी बदनामी न होने पाए। जेसा माहौल है उसमें उसे डर भी है कि इसका राजनीतीकरण किया जा सकता है और वह बड़े जोरदार ढंग से ऐसा न करने की अपील भी करता है परन्तु सक्रिय राजनीति में तो लोग मुरदों के सीने पर कदम रखते हुए अपनी कुर्सी तक पहुंच जाते है और इसमें उन्हें मजा भी अधिक आता है।

Post – 2016-04-13

ज्ञान और समझ

‘’क्याे तुमने कभी इस बात पर गौर किया कि तुम्हारे भीतर एक दुचित्तापन है, जिसे तुम्हारे शब्दों में कहूँ तो तुम भग्नमनस्कता के रोगी हो और इसलिए तुम्हें अंतर्विरोधी बातें करने की आदत है । पहले बड़े प्रयत्न से आशावादी जमीन तैयार करते हो, और फिर जब जमीन तैयार हो जाती है तो निराशावादी तेवर अपना लेते हो । कहते हो इतिहास की मांग है इसलिए अमुक घटना या परिणति को रोका नहीं जा सकता और फिर कहते हो लेकिन टाला जा सकता है। उसे सफल करने के लिए जिस उपक्रम की आवश्यकता है, जिस तेजस्विता की जरूरत है, हमारे समाज में उसका अभाव है। अस्पृश्यता पर हो, भाषा पर हो सभी विषयों पर तुम्हारा यही तेवर रहा है और अब दलित समस्या पर तुम वही लाइन लेने जा रहे हो।‘’

‘’यदि तुम्हें ऐसा लगता है तो मेरे कथन में जरूर कहीं कसर रह गई है। या संभव है तुम्हारी समझ में अधकचरापन बना रह गया हो। जिसे तुम द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया कहते हो, उसे तुम्हारी इस समझ से भग्नमनस्कता का प्रमाण माना जा सकता है। तर्क के बाद उसकी वितर्क से जॉंच को भी इसी कोटि में गिना जा सकता है। तुमको अन्तर्विरोध और विरोधाभास का फर्क भी नहीं मालूम। विज्ञान और जादू टोने का अन्तर भी नहीं मालूम और सच मानें तो तुम ही नहीं, भारतीय कम्युमनिस्टों की पूरी जमात विज्ञान पर कम और जादू-टोने पर अधिक विश्वस करती है।

‘ ’तुम्हें यह क्यों भूल जाता है कि धुंधकारी विचारों, पुराणों और कथाओं को इतिहास बना कर पेश करने वालों के विरोध में यदि आज भी कोई खड़ा होता है या हो सकता है तो भारतीय कम्युनिस्ट। तुम मुझे विज्ञान और जादू टोने का फर्क समझाओगे? है इतनी योग्यता ?

मैं हैरान। बात विनोद चर्चा से विषाद गाथा की ओर बढ़ रही थी, वह अपने स्वभाव के विपरीत तैश में आने लगा था।

मैंने मुस्कराते हुए कहा, ‘मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ। मैं तुम्हेंं कुछ नहीं समझा सकता। जो ज्ञान की पूर्णारावस्था में पहुँच चुके होते हैं जहॉं उनके लिए अज्ञेय कुछ रह ही नहीं जाता उनके लिए मुहावरा चलता है कि उन्हेंं ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते। मैं केवल उन्हें समझा सकता हूँ जो समझना चाहते और गलत होने की दशा में अपनी गलतियॉं स्वीकार करना और भविष्य में उनसे बचना चाहते हैं। इनमें से किसी का कोई लक्षण मैंने भारतीय कम्युानिस्ट पार्टियों में देखा नहीं, फिर अपनी नादानी को तो स्वीोकार करना ही होगा कि समझाने चला भी तो यह समझे बिना कि अगले में समझ बची भी है या नहीं। तुम और कुछ जानते हो या नहीं, पर इतना अवश्यक जानते हो कि तुम भारतीय समाज के सबसे भले लोगों में गिने जाते हो और बाकी का रहस्य ‘जिनहिं न ब्यापै जगत गति’ से पूरी हो जाती है।‘

इस तमाचे के बाद उसका तेवर बदल गया। वह सम पर आ गया । बोला, ‘देखो बहस का तो कोई अन्त नहीं पर क्या तुम भी मानते हो कि हमारी सोच वैज्ञानिक नहीं है और वे जो धुंधकारी समाजशास्त्र और ज्ञानशास्त्र भारतीय समाज पर लाद रहे हैं वे वैज्ञानिक हैं?’

‘क्या तुम मुझ पर यह आदेश लादना चाहते हो कि दो मूर्खों में अधिक समझदार कौन है यह तय करूँ और उनमें से ही किसी एक का अनुसरण करूँ या सही समझ क्या होती है इसका भी विकल्प खुला रखना चाहते हो? यदि नहीं तो मैं तुमसे बात करूँ भी तो व्यर्थ होगा। यदि हॉं, तो पहले यह समझ लो कि विश्‍वास, ज्ञान और विज्ञान में क्या अन्तर है?’

‘यह अन्तर भी अब तुम्हीं बताओ।‘

‘बताता हूँ। पहले किसी नाले को देख कर आओ और फिर इस पर विचार करने के बाद मेरे पास आओ कि पवित्रता में मलिनता का प्रवेश कैसे होता है और फिर किसी विशेषज्ञ से परामर्श करके आओ कि मलिनता का निवारण करने की युक्तियॉ अपना कर हम क्या उसी तर्क से गटर को गंगा नहीं बना सकते जिससे गंगा को गन्दा नाला बनाया था।’

‘मान गया यार, अब आगे भी तो कुछ बोल।‘

बोलता हूँ । बोलो, फॅस जाओगे तो बीच से मैं उठने न दूंगा।‘

‘विचार न हुआ जुए का खेल हो गया। चलो उसका भी एक नियम है। किसी ने कहा है बदहवासी के भी अपने तौर तरीके होते है। पहले यह समझो कि विज्ञान में सभी संबंधित पक्षों को ध्‍यान में रख कर कोई नतीजा निकाला जाता है और उसके बाद भी कहीं कोई चूक हो सकती है, यह भी स्‍वीकार किया जाता है इसलिए वैज्ञानिक चिन्‍तन में आंकड़ों और घटकों की परिशुद्धता का ध्‍यान रखा जाता कि किसी में किसी तरह की घालमेल हुई तो परिणाम गलत होंगे। इसे मैं पहले भी समझा चुका हूँ। जादू टोना करने वाले अचूक होने का दावा करते हैं जब कि उनका आरंभ से अंत तक सबकुछ गड़बड़ होता है। जब मैं तुम लोगो को अवैज्ञानिक कहता हूँ तो इसका यह मतलब नहीं कि जिन्‍हें तुम अवैज्ञानिक कहते हो उन्‍हें वैज्ञानिक सोच का मान लेता हूू, बल्कि यह कि उनकी सोच और कार्यविधि में कुछ प्रतिशत का फर्क हो सकता है परन्‍तु तात्विक भेद नहीं है। घपला तुम उनसे अधिक करते हो। इस पर हम आगे उदाहरण देते हुए बात करेंगे। अभी तो इतना ही समझ लो कि यदि मेरे निष्‍कर्ष में आकाशपतित वाली निश्चितता नहीं है तो यह भी मेरी सोच के वैज्ञानिक होने का प्रमाण है।’

Post – 2016-04-12

12/4/16
दलित भारत और भारत की दलित चेतना

‘’तुम्हें रबि बाबू की वह पंक्ति याद है… ‘

मैं हँसने लगा, ‘रबि बाबू की ही नहीं, किसी की भी वह पंक्ति मुझे याद नहीं जिसके सिर पैर से ले कर पूँछ तब का पता न हो।‘

‘अरे वह यार, हे मोर दुर्भागा देश जादेर करेछो अपनाम, अबसाने होते होबे ताइदेर लोकेर समान। एक तो मेरी याददाश्त और दूसरी ओर अधूरा बांग्ला ज्ञान । समझ में नहीं आता, ताईदेर है या ताहॉदेर है। खैर हो जो भी, कई बार सोचता हूँ, क्या उनको भविष्य का पूर्वाभास था। सुनते हैं किसी दौर में प्लांचेट वगैरह करते थे। मैं गलत कह रहा हूँ तो मेरा मजाक न उड़ाना, यह तुम लोगों का क्षेत्र है, मेरा मतलब उस विद्या से है जिसमें मृत व्यक्तियों की आत्माओं को बुलाया जाता है और वे सीधे प्रश्नों का उत्तर देती है।‘

‘दोनों में कोई संबंध है? कहां वह पंक्ति और कहां प्रेतविद्या। कहां भविष्य। का साक्षात्कार और कहां अतीत जड़ता!‘

‘’है न तभी तो यह सवाल उठाया। रबीन्द्र की जिज्ञासा अछोर थी और यदि किसी चरण पर इस तरह की साधना करके उसके सत्यासत्य को जानने का उन्होंने प्रयत्न किया हो तो इसे उनकी वैज्ञानिक सोच का ही हिस्सा मानता हूं, वैसे यह मैंने स्वयं पढ़ा नहीं था, अब हमारे बीच से अनुपस्थित पंकज सिंह से सुना था जो स्‍वयं अपने को मार्क्सवादी मानते थे, कुछ कुछ नक्सल तेवर रखते थे, और रवीन्द्र के विषय में यह जान कर स्वयं भी इसकी परीक्षा करते रहे थे। और जानते हो, एक समय में मैं उसी संघ से जुड़ा था जिसको गाली देने के लिए आज डिक्शनरी ले कर बैठ जाता हूं कि कुछ ऐसा मिले जो नया हो, चकित करने वाला हो और छपने को दिया जाय तो फांट का सीसा पिघल कर खेल न बिगाड़ दे। और लो, उस दौर में मैंने एक बार दुर्गासप्तशती का नियमित पाठ करते हुए देवी में ध्यान लगाने की साधना भी की। जानते हो क्या होता था ध्यान लगाने के क्रम में?

मैं चुप रहा।

‘दुनिया की सारी बुराइयॉं जिनसे मैं अपने को विरत करना चाहता था और सामान्य जीवन में जिनसे विरत रहता था, ध्यान और साधना के उन क्षणों में मेरी चेतना के केन्द्र में आ जाते थे। मैं इन अनुभवों की व्यर्थता को समझने के बाद ही मार्क्सवादी बना था। और फिर यह समझने में अधिक समय नहीं लगा था कि मार्क्सवाद विचारों की जुगाली नहीं है, परिवर्तन की आकांक्षा है और उस आकांक्षा को पूरा करने की दिशा में सक्रियता है और तब मैं कम्युंनिस्ट् पार्टी में भर्ती हुआ था जिसका तुम मजाक उड़ाते रहते हो जब कि तुम स्वयं एक सड़ी गली विचारधारा की लादी आेढ़े न घर के न घाट के प्राणी की तरह दिखाई देते हो।‘

उसने सोचा था उसके व्याख्यान का मुझ पर हृदयविदारक प्रभाव पड़ेगा, परंतु जब मैंने कहा, ‘तुम कभी गलत न हुए हो न गलत हो सकते हो, फिर भी यह तो बताओ, रवीन्द्र नाथ की उस पंक्ति की याद तुम्हें कैसे हो आई और कैसे तुमने इस सवाल को अपनी ही नासमझी से इतना उलझा दिया कि इसका आदि अंत पकड़ में ही नहीं आ रहा है।‘

वह नरम पड़ गया, बोला, ‘कई बार इस पंक्ति को पढ़ते हुए यह भ्रम हुआ कि कहीं रवीन्द्र को इसका पूर्वाभास तो नहीं हो गया था कि आगे चल कर संरक्षण आदि के कारण दलितों की दशा इतनी सुधर जाएगी कि उनकी सामाजिक हैसियत आज के उन ब्राह्मणों जैसी हो जाएगी जो आज के शूद्रों का अपमान करते हैं और इसी तरह इसके विपरीत शूद्रों को इतनी अग्रता मिल जाएगी कि वे नवब्राह्मणों में बदल जाएंगे और सामाजिक भेदभाव उलटे सिरे से कायम रहेगा। अवसाने होते होबे तॉहादेर या ताईदेर जो भी हो, लोकेर समान। अन्तितोगत्वा तुम्हें उन्हीं जैसी स्थिति में पहुंचना होगा। इसका और कोई दूसरा अर्थ तो हो ही नहीं सकता।‘

‘दोष तुम्हारा नहीं है। तुम्हारे नाम की पूंछ का है जिसे हिलाओ तो शर्मा सुनाई देता है। मेरे साथ भी एक सींग जुड़ा है अौर कई बार जांचना पड़ता है कि मैं बोल रहा हूँ या मेरा सींग बोल रहा है। तुम कम्युनिस्ट तो बने पर शर्मा भी बने रहे, नकार का नकार धन में बदल जाता है, पर नकार के कारोबार का फल शून्य होता है। शून्य धन शून्य भी शून्य , शून्य ऋण शून्य भी शून्य और शून्य गुणा शून्य, भी शून्य।‘

उसे आश्च‍र्य हो रहा था कि पहली बार तो वह अपने ढंग से सोचे गए, मेरे विचारों के करीब आ कर दोस्ती पक्की करने चला था और मैं ही, उसकी भाषा में, उसे दुलत्ती लगा रहा था।

‘देखो, असंभव नहीं है कि रवीन्द्र ने अध्यात्म और कर्मकांड के कुछ प्रयोगों से स्वयं को गुजारते हुए उनके सत्य‍ को जानने का प्रयत्न किया हो, पर उनकी रचनाओं और विचारों में कहीं इस तरह की बदहवासी नहीं है। जहां तक मैं समझता हूँ, इसका अर्थ है, ऐ भारतवासियो, यह मत भूलो कि तुम विश्वसमाज का अंग हो। यदि तुम्हारे अपने समाज में कुछ लोगों का सामाजिक अपमान किया जा रहा है तो अंततोगत्‍वा विश्व समाज इस व्यवस्था को कायम रखने के कारण तुम्हें उसी तिरस्का्र से देखेगा जैसे तुम अपने ही समाज के एक हिस्से को या कुछ हिस्सों को देखते हो।‘

‘मतलब ?’

मतलब यह कि वर्ण व्यवस्था को निर्मूल करना केवल परिगणित समाज की समस्या नहीं है। यह पूरे भारतीय समाज की समस्या है। यह राष्ट्रीय सम्मान से जुड़ी समस्या है, भारत के वर्तमान से अधिक इसके भविष्य से जुड़ी समस्या है और सच मानो तो आत्माेत्थान से जुड़ी समस्या है। परन्तु यह एक जटिल समस्या है अन्यथा कविगुरु केवल एक कविता से संतोष नहीं कर लेते। इसके निवारण की रणनीति उनकी भी समझ में नहीं आई इसलिए केवल भर्त्सना किया पर जिस समय किया उसमें यह संभव था, आज यह असंभव होता जा रहा है।

Post – 2016-04-12

12.4.16

आम का मतलब खास होता है

कोश में आपको आम मतलब एक फल मिलेगा जो उस आम से अलग, यद्यपि ध्वानि में सर्वसदृश है जिसका अर्थ साधारण मिलेगा। एक दलित और उपेक्षित व्यक्ति की गणना आम लोगों में नहीं की जा सकती, और जब कोई इस नाम का एक दल बन जाने के बाद अपने को आम आदमी कहता है जो वह अपने को एक खास दल से जुड़ाव रखने वाला होने का दावा करता है। जिस झाडू को आम ने अपना चिन्हे बनाया उसे अपने जीवन में उठाने वाला आम आदमी नहीं है, वह आम लोगों से कुछ नीचे पड़ता है। मोटे तौर पर आम जन का अर्थ मध्यवित्त जन है और अब तो आम से जुड़ने वाले सम्पंन्न जनों की कोटि में आ चुके हैं।

अभी हाल में एक महामारी चली है जिसमें बात बे बात आदमी वन्दे़ मातरम् या भारत माता की जय बोलने लगता है या मर जाऍंगे पर ऐसा बालूँगा नहीं की घोषणा करने लगता है। मुझ याद नहीं मैंने आज से कितने साल पहले वन्दे मातरम् या भारत माता की जय बोला हो। जिसकी स्पुष्ट याद है वह उस समय की है जब मैं छह साल का रहा होउूँगा। 1937 के चुनाव के पहले का जिसमें प्रभात फेरी करते हुए गॉंव के नौजवान भारत माता की जय बोल रहे थे और उससे उस शैशव में ही मन पर उस आवेश का और उसकी ध्वनि का असर हुआ था जो आज भी मन में सनसनी पैदा कर देता है, परन्तु न तो मेरी आयु उस जुलूस के साथ चलने की थी न ही मैंने भारत माता की जय बोला होगा। आप याद करें, सच्चेे मन से आपने वन्दे मातरम् कब बोला था, किस सन्दर्भ में या भारत माता की जय कब बोला था। मेरा आशय वन्दे मातरम् गान से नहीं है जिसे लता की आवाज ने आत्मा‍ से उठती आवाज बना दिया है। उसे सुनते हुए मैं विभोर हो जाता हूँ। आवाज उतनी मधुर नहीं है इसलिए गाता नहीं, केवल सुनता हूँ और झूम उठता हूँ। यह तय करना कठिन है कि शब्दों के जादू पर या स्वर और संगीत के जादू पर या दोनों पर।

इस गान में ‘के बोले मा तूमि अबले’ का मतलब यह नहीं है कि वह अबला नहीं है, अपितु कहीं गहरे मन में यह ग्रथि बनी हुई है और इससे बाहर आने की विकलता है। जै बजरंग बली या अल्लाहो अकबर का मतलब बताने की जरूरत नहीं। इसमें न तो बजरंगबली के प्रति श्रद्धा का भाव है न अल्ला्ह की महानता का स्वीकार। हमला करने या मुकाबला करने का अवश्य है। युयुत्सा को विवेक पर हावी करने की योजना अवश्य है।

शब्दों का अर्थ उनके निरपेक्ष अर्थ से जो कोशों में मिलता है बहुत अलग होता है। यह भिन्न अर्थ उस काल, व्यक्ति, श्रोता, वक्तां, सन्द र्भ सभी की घुली रंगत से पैदा होता है। इसलिए वन्दे मातरम् का अर्थ मातृभूमि की वन्दना ही नहीं होता। कोई मुझसे कहे बोलो वन्दे मातरम् या भारत माता की जय तो मैं नहीं बोलूँगा। उसे अकारण या बिना किसी प्रसंग के बोलते सुनूंगा तो आश्चतर्य से उसे देखूँगा कि इसे हो क्या गया है। बिना औचित्य के कोई भी शब्द या कार्य मानसिक असन्तुलन का प्रमाण है।

किसी दूसरे के आदेश से कोई ऐसा काम करना जिसकी तलब अपने भीतर से न उठ रही हो, नैतिक और बौद्धिक पतन का प्रमाण है। मैत्री, प्रेम जैसे आह्लादकारी संबंध भी किसी दूसरे के आदेश पर नहीं स्थापित किये जा सकते। मुझे अपनी पत्नी या अपने बच्चों या दोस्तों से कभी यह नहीं कहना पड़ा कि मैं उन्हें प्यार करता हूँ। जहॉं आत्‍मीयता न हो वहॉं इसकी जरूरत पड़ सकती है। मुझे पिता जी को या मॉ को प्रणाम कहना नहीं पड़ा, चरणस्पतर्श करते हुए भी। जिनका आदर करता हूँ उनमें से किसी से नहीं कहा कि मैं उनका आदर करता हूँ। यह मेरी अपनी बात है, हो सकता है आप भी ऐसा ही करते हो, और यदि न करते हों तो सोचिए कि आप को कह कर अपना मनोभाव क्यों बताना पड़ता है।

सच तो यह है कि वे लोग जो औचित्य के बिना भारत माता की जय या वन्दे मातरम् स्वयं भी बोलते हैं उनमें देशप्रेम नहीं होता। देश से प्रेम करने वाला देश में शान्ति, सुख और समृद्धि की कामना करेगा, उस दिशा में प्रयत्नशील होगा और फिर उसका प्रयत्न ही एक शब्दातीत वज्रलेख बनता चला जाएगा उसके प्रयत्न की गहनता के अनुपात में। औचित्य् के बिना, किसी इतर इरादे से इनको नारों की तरह प्रयोग करने वाला अशान्ति पैदा करना चाहता है, सुख और समृद्धि के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों में बाधा पहुँचाना चाहता हॅ। वह अपने स्वार्थ के लिए देश का अहित करना चाहता है। यदि सचमुच किसी को देश छोड़ कर कहीं जाना पड़े तो सबसे पहले ऐसे लोगों को चले जाना चाहिए । ये समाज के उूपर भार तो पहले से रहे हैं क्यों कि बिना कोई उत्पाादक काम किए माल असबाब जोड़ते रहे है, अब समाजघातक भी बन चुके हैं।

Post – 2016-04-10

मातृभक्ति

‘’तुम ठीक कहते थे। यह हरामजादा तो निरा चुगद निकला।‘’ उसने बैठने के साथ कहा जिसमें तने होने से झुकने और बैठ जाने की सभी अवस्थाओं का सहयोग था।
उसकी भाषा हैरान करने वाली थी। उसने पहले इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया हो, यह याद नहीं आ रहा था। मैंने तंज कसा, ‘संस्कृत बोलना कब से शुरू कर दिया। यह तो तुम्हारी मातृभाषा नहीं है।‘

सोचा था वह झेंप जाएगा, पर हुआ उल्टा ही, ‘मैं तो संस्कृत ही बोल रहा हूँ, पढ़ोगे तो तुम तो वैदिक बोलने लगोगे। सुनते हैं उसमें मा बहन की गालियॉं भी चुन चुन कर दी गई हैं। उसने आज के जनसत्ता के तीसरे पन्ने की एक रपट सामने खोलकर रख दी और गुस्से को सँभाले, कि इस बीच कहीं यह ठंडा न पड़ जाय, कुछ ऐंठ के साथ, उस रपट को ही देखता रहा, जिसे मैं उसे पढ़ रहा था।

मैंने एक नजर उस रपट पर डाल कर उसकी ओर रुख किया, ‘तुम्हें इस पर आक्रोश ही आता है, तरस नहीं आता?’ इस वाक्य ने सुलग रही आग में घी का काम किया, ‘तुम आदमी हो या चुकन्दर।‘

आप गौर करें तो वह मुझे भी चुगद कहना चाहता था, पर इसका साहस नहीं था इसलिए उस कन्द का नाम ले लिया था जिसमें आदिवर्णसाम्य था। मैं इसे समझता हुआ मुस्कराता रहा और यह आशा लगाए रहा कि वह अब झेंपा कि तब, पर अब उसका आक्रेाश अपने नेताओं की ओर मुड़ गया। सच कहो तो चुगद तो वे है जो ऐसे मुहफट के समर्थन में बयान देने लगे और उसकी सभी बदकारियों के भागी बन गए । भारतीय जनमानस में मातृभाव के प्रति कितना आदर है और इस तरह के मुँहफटों के साथ सहानुभूति दिखा कर हमारे अपने नेताओं ने अपना ही बेड़ा कितना गर्क किया है, जिस पर दुर्भाग्य से मैं भी सवार हूं, यह मैं भी नहीं जानता। तुम्हें तो लड्डू बॉंटना चाहिए कि ऐसे चुगद पहले तुम्हारे बीच ही पैदा होते थे, अब हमारे बीच भी पैदा होने लगे और इसका राजनीतिक लाभ तुम लोगों को मिलेगा।‘

मैंने कहा, ‘हमें न बावलों की तरह बोलना चाहिए न बावलों की तरह काम करना चाहिए। यह जानना चाहिए कि हमारा क्षेत्र क्या है, उसकी मिट्टी कैसी है, उर्वरता कैसी है, और उसमें क्‍या और कब पैदा हो सकता है और उसके लिए क्‍या करना अपेक्षित है। हम यदि दलितों और उत्पीडि़तों के साथ सहानुभूति रखते हैं तो हमे क्याें , क्‍या और कैसे करना चाहिए और इसकी पूर्वपीठिका यह विचार है कि हमारे आयुध क्या हैं, उनसे हम किस दूरी तक मार कर सकते हैं। कबीर ने विचार की कार्यक्षमता को ध्यान में रखते हुए उस चोट की बात की थी जो चेतना के रूप को बदल देती है। भीतर से चकनाचूर कर देती है। जो पुरानी मान्यताएं और विश्वास हैं उनको ध्वस्त करके एक नई चेतना, नई सार्थकता और नयी आकांक्षा का सूत्रपात करती है। यह बहुत बड़ा काम है। इसे केवल हम कर सकते हैं। हम अपना काम नहीं कर रहे हैं और उसके ही ये अनिष्टकारी परिणाम हैं, अन्यथा इसके निवारण के लिए पुलिस बल की आवश्यकता नहीं होती। चेतना को बदलने वाला तलवार चलाने वाले से, आयुध का सहारा लेने वाले से, बाहरी निशान छोड़ जाने वाले से, बहुत अधिक बलवान होता है, पर हम इसे जानते ही नहीं और दूसरों का हथियार उधार मांग कर चलाने लगते हैं और इस मूढ़ता में स्वयं भी मारे जाते हैं और जानें कितनी हत्याओं के सहभागी होते हैं।‘

उस पर मेरे कथन का असर हुआ है, यह तो उसके चेहरे के तनाव में कमी आने से ही पता चल गया।

मैंने कहा, ‘हमारा हथियार बयानबाजी नहीं वस्तु-स्थिति का विश्लेषण है। यह विश्लेषण ही अन्तश्चेतना को बदलता है। इसी की चोट बाहर नहीं दीखती परन्तु भीतर से उसके पुराने मूल्य और विश्वास ध्वस्त होते हैं जिसे कबीर ने भीतर चकनाचूर कहा है।

अब वह मेरी बात ध्यान से सुन रहा था इसलिए मेरा अपना विश्वास भी बढ़ गया था। बोला, ‘क्या तुमने कभी यह सोचा कि कोई शब्द या कार्य, जो किसी सन्तुलित चित्त के व्यक्ति से कहा या किया नहीं जा सकता, उसे कहने या करने वाले कितनी आत्मग्लानि के शिकार होते हैं। हिजड़े जो बात बात पर अपने को नंगा करने को हथियार के रूप में काम में लाकर लोगों को अपनी शर्तें मानने को बाध्य कर देते हैं, वे जिसे उजागर करना चाहते हैं उसके साथ उनकी कितनी यातना जुड़ी हुई है। वे तुम्हारी सहानुभूति के पात्र हैं या घृणा के?’

उस पर मेरे कथन का असर न हुआ, उल्टे हिकारत से मुझे देखते हुए बोला, ‘क्या बकते हो यार!’

मैंने पूछा, तुम्हे ईडिपस (Oedipus) कांप्लेक्स के बारे में कुछ पता है?’ उसे पता नहीं था, क्योंकि वह फालतू चीजों को ले कर मगजमारी नहीं करता। उसने मार्क्‍स को पढ़ा था या नहीं, यह पता नहीं, पर जितना पढ़ा उसमें इस नतीजे पर पहुंच गया कि फ्रायड को पढ़ना मार्क्सवादविरोधी है?

उसे एक ही बचाव मिला, ‘किस आदमी की बात करते हो। वह तो कुछ दिन फैशन में रहने के बाद अपने शिष्यों के द्वारा ही नकार दिया गया और फिर समाज ने उन शिष्यों को भी नकार दिया, मनोविश्‍लेषण का बाजार भाव तो जमीन पर आ चुका है।

मैंने कहा, ‘यही हाल मार्क्सवाद का भी है, परन्तु ये उन्नीवीं शताब्दी की ऐसी उपलब्धियां है जिनको झुठलाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता है, क्योंकि इन्होंने हमारी समाज-व्यवस्था और चेतना को इत तरह झकझोरा कि हम तब तक एक आदर्श समाज की कल्प‍ना तक नहीं कर सकते जब तक दोनों के सिद्धान्तों का समायोजन न हो?’

उसने खीझ कर कहा, ‘तुम तो निहायत सिड़ी निकले (पता कीजिए तो सिड़ी का मतलब सड़ा हुआ निकलेगा), ‘बोलो क्या कहना है।

’पहले इडिपस ग्रंथि के बारे में समझ लो। प्रकृति ने विपरीत लिंग के प्रति नैसर्गिक आकर्षण पैदा किया है जिसे सभ्यता के विकास में सामाजिक मर्यादाओं ने वर्ज्य बना दिया जब कि पशुजगत में वे वर्ज्य नहीं होते। इस वर्जना के कारण प्राकृत आवेगों के अवरुद्ध हो जाने के कारण ग्रन्थियाँ और आचार गत विकृतियॉं पैदा होती हैं। परन्तु कुछ मामलों में सभ्यंता के प्रतिबन्ध हार जाते हैं, प्रकृति विजयिनी होती है, मां का अपनी सन्तान से रति संबंध वर्ज्‍य होते हुए भी किन्हीं बाध्यताओं में व्यवहार्य हो जाता है।

‘इसके समाचार बीच बीच में आते रहते हैं, जो मानव विधान के अनुसार अपराध और प्राकृत विधान के अनुसार स्वाभाविक होते हैं। आज कल की खोजों से पाया गया कि सबसे अधिक सेक्स उत्पीउ़न आत्मीयों के द्वारा होते हैं जिन्हे मर्यादा के कारण छिपा लिया जाता है, वह भी इसी को प्रमाणित करता है। माता के पुत्र के साथ यौन संबंध के बिना मुहावरे में भी इस तरह की उक्ति किसी सभ्य व्यक्ति की जबान पर नहीं आएगी, कि वह अपनी होने वाली पत्नी और उससे होने वाली संतान से वही संबध रखेगा जो वह अपनी मां से रखता आया है और जिसके साथ सामाजिक मर्यादाओं का बंधन भी समाप्त हो जाता है।‘

वह खीझ गया, ‘तुम आदमी हो या…’ मैंने उसका वाक्य, पूरा किया, ‘चुकन्दर। सुनो जिस भाषा को मैं अपनी भाषा मानता हूं उसमें चुकन्दर और सिड़ी जैसे शब्दों से भी बचा जाना चाहिए, पर सत्य की खोज में अप्रिय से अप्रिय पहलू की पड़ताल अवश्य की जानी चाहिए।‘

’कहना क्या‍ चाहते हो तुम?’

‘गाली देने की जगह तुम्हें इस मीमांसा में जाना चाहिए था कि किन परिस्थितियों और अनुभवों के बाद किसी व्यक्ति की जबान पर वर्जनाएं सहजता से आ सकती हैं जैसा मैंने हिजड़ों की विवशता के उदाहरण से समझाया।‘

’तुम कहना क्या चाहते हो यार?’ उसने वही वाक्‍य फिर दुहराया।

‘कह यह रहा हूं कि सुना उसका पिता अक्षम है, उसकी मां में प्राकृतिक दबाव उन सुरक्षित कृत्योंन्तु जो न होना है वह किसी न किसी चरण पर हो भी जाता है और उसकी आदत भी पड़ जाती है और फिर परिभाषाएं बदल जाती हैं और वह न केवल अपनी पत्नी को अपनी मा का स्थानापन्न मानने लगता है अपितु अपनी पुत्री के साथ भी उसी आचरण की कल्पना करने लगता है जो उसकी मां ने उसके साथ किया। देखो, मैं यह नहीं कहता कि जो मैं कह रहा हूं वह सच है, कह यह रहा हूं कि गाली देने से अच्छाा है अप्रिय घटना या कथन का विश्लेपषण जिससे हम संतप्त व्यक्ति को उसके संताप से बाहर लाने में मदद कर सकते हैं और उसका सुधार हमारे समाज को अधिक संयत और व्यवस्थित बनाने में मदद कर सकता है।

Post – 2016-04-09

‘’पिकासो के बारे में एक बात जानते हो? ‘’ मैं उसकी ओर ध्यान से देखने लगा कि वह पिकासो की किस बात की जानकारी मुझसे बांटना चाहता है। पूछ बैठा, ‘पिकासो की याद कैसे हो आई?’

’’बताता हूं। चित्रकार वह जितना बड़ा था उससे बड़ा सौदेबाज था। चित्र की मुँहमांगी कीमत वसूलता था। बस एक आर्टडीलर था जो उस पर भारी पड़ता था। जानते हो कैसे ? नहीं जानते होगे, वह भी बताता हूँ। वह आकर उसकी जिस कृति को खरीदना होता उसे छोड़ कर किसी दूसरी की तारीफ करने लगता। फिर कला पर बात करके उसे इतना बोर कर देता कि उससे पिंड छुड़ाने के लिए पिकासो उसकी पसंदीदा कृति‍ को उसके लगाए मोल पर बेचने को तैयार हो जाता।‘’

मैं कुछ बोला नहीं, प्रतीक्षा करता रहा कि यह कलाप्रसंग कहां से आ गया।

‘यार तुमने मुझे इस हिन्दी और भारतीय भाषाओं वाले सवाल पर इतना बोर किया कि मुझे भी सब्जा बाग दीखने लगा है। जो लोग तुम्हें फेसबुक पर पढ़ते हैं उनमें से भी कुछ को सब्ज बाग बहुत पहले से दीख रहा है। तुम जिस तरह अपना तर्क रखते हो, जिस तरह पैंतरे बदलते हो, उसमें लगता है है यह सपना नहीं, कल का सच है, और वे सपने में भी सत्यमेव जयते अभुआने लगते हैं। परन्तु उनसे पूछो, सीने पर हाथ रख कर कहो, ‘क्या, तुम्हेंं यह संभव लगता है’ तो वे बगलें झॉंकने लगेंगे। कहेंगे, हम एक नामुराद के बहकावे में आ गए थे।‘’

बात बहुत गलत भी नहीं थी। जिसे वह सपना और सब्जबाग कह रहा था, वह कल का सच था पर एक ऐसा सच जिसे संभव मानने और उसके लिए प्रयत्न की अपेक्षा थी। जो भविष्य का सपना देखता है उसे क्रान्तदर्शी कहा जा सकता है, जो आज है नहीं, संभव है, पर अनिवार्य नहीं, प्रयत्नसाध्य है और इसलिए उस दिशा में प्रयत्न होना चाहिए, इसे जानने और समझने वाला, अवरोधों के पार देखने वाला, क्रान्त दर्शी। पर इस पर आप हंस सकते हैं।

” स्वतंत्रता हमारा जन्मय सिद्ध अधिकार है कहने वाला, क्रान्तदर्शी था। भारतीय भाषाओं की प्रतिष्‍ठा के बिना भारत का भविष्‍य नहीं, यह सोचने और मानने वाला भी क्रान्‍तदर्शी हो सकता है। पर मैं स्वयं तो उस कोटि में आता नहीं। मुझे तो बस यह समझाना था कि जो कुछ मैने कहा वह सावन के अंधे का देखा हुआ अन्तिम नजारा नहीं है, भविष्य में झिलमिलाती वास्तकविकता का पूर्वाभास है।

मैंने कहा, ‘देखो, मैं भी जानता हूँ कि मेरे श्रोता या पाठक मेरे विचारों को अपनी आकांक्षा के अनुरूप पाते हैं इसलिए वे इन पर अपनी प्रसन्नता सहमति और प्रशंसा के रूप में उड़ेलते हैं। यह हो कर रहेगा, या हो भी सकता है, इसका उन्हें भी पूरा विश्वास नहीं। वे सोचते हैं, काश, ऐसा हो जाता। उचित तो है पर संभव कैसे होगा।‘

इसलिए मैं आज इस अंतिम बहस में तुम्हें कुछ बुनियादी बातें समझा दूँ जिनमें तुम्हारा और मेरे पाठकों और श्रोताओं का चित्तं विचलित हो सकता है। भई, सभी का भला और सताए हुओं का उत्थान तो हम भी चाहते हैं, तुम भी चाहते हो। इस तर्क से तुम भी मेरी ही टीम में हो।

‘पर सच मानो तो न तो अन्ततर्मन से उनमें से अधिकांश इसे चाहते हैं, न तुम इसे चाहते हो।‘’ वह मेरी ओर प्रश्नो भरी ऑंखों से देखने लगा।

‘’देखो, वाल्तेऑयर के प्रशंसकों में यदि जर्मनी का फ्रेड्रिक द ग्रेट था तो दूसरी ओर रूस की ज़ारा कैथरीन भी थी। उसने वाल्तेयर के प्रभाव में शिक्षा विभाग खोला। उसके शिक्षा निदेशक ने उससे निवेदन किया कि महिमामयी, हमने स्कूल तो खोल दिए, उसमें पढ़ने कोई आता नहीं हैं।‘

‘जानते हो कैथरीन ने क्या जवाब दिया था, ‘’मिस्टर डाइरेक्टर, हमने दुनिया को यह बताने के लिए स्कूल खोले हैं कि हम भी एक सभ्य राष्ट्र हैं, अपने समाज को शिक्षित करना चाहते है, परन्तुु जिस दिन उन स्कू लों में पढ़ने वाले मिलने लगेंगे उस दिन न मैं वहॉ रहूँगी जहॉं हूँ, न आप वहॉं रहेंगे जहॉं आप हैं।‘’

‘’जानते हो, यही स्थिति हमारे उन हिन्दी प्रेमियों की है, स्वभाषा प्रेमियों की है जो अपनी भाषाओं को प्रतिष्ठा देने के नाम पर गर्दन उूंची कर लेते है और जब पता चलता है कि इसके चलते प्रतिभा के उस अनखोजे परन्तु् विपुल भंडार के साथ प्रतिस्‍पर्धा करनी होगी और इस प्रतिस्‍पर्धा में वे पीछे जा सकते हैं तो उनका उत्‍साह ठंडा पड़ जाता है। तुम्हारा दल जिसका नेतृ वर्ग उसी सुविधाभोगी तबके में आता है, सोचता है, उसके हित उस तबके के साथ खड़े होने से सधते हैं जिसे वह दक्षिणपंथी कहता रहा है या मध्‍यमार्गी मानता रहा है। गरीबी, पिछड़ेपन और भेदभाव के विरुद्ध तुम खड़े भी दीखते हो और पड़े भी दीखते हो, और यार, तुक का दबाव ऐसा प्रबल है कि जी में आता है, कह दूँ सड़े भी दिखाई देते हो, पर तभी याद आया, यदि तुक तर्क पर हावी हो गई तो कहना होगा, बड़े भी दिखाई देते हो, जो मैं कहने चलूँ तो गला रुँध जायगा। पर कुछ बातें मैं समझा नहीं पाया उन्हें उनके खुरदरेपन के साथ समझो:

1. तुम्हारी आशंका का एक कारण यह है कि जो स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक बाद के निर्णायक क्षण में जब हिंदी को राजकीय कामकाज की भाषा बनाने का आवेश था नहीं हो सका वह क्या अब संभव है । तुम उसी क्षण में हमारे हिस्से में क्या आया है की कामना और उससे उत्पन्‍न गिरावट की कल्प ना भी नहीं कर पाते जो इसमें रुकावट बनी थीं।

2. जिस निर्णायक तिथि पर हिन्दी को राजभाषा बनना था उसी पर तमिल आवेश और उसके दबाव में यह समर्पण कि जब तक तमिलभाषी हिन्दी को स्वीककार नहीं करेंगे तब तक इसे राजभाषा नहीं बनाया जाएगा।

3. इसके बाद पहले का सारा जोश और तैयारियॉं ठंडे बस्तें में डाल दी गईं और वह मुहावरा हावी हो गया कि न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। हम सर्वथा परास्‍त और निष्क्रिय हो गए।

4. पर इस पचास साल के दौर में दक्षिण के वे राज्य जो हाशिये पर थे पर हिन्‍दी के प्रति जिन्‍होंने व्‍यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया उनका अभ्युदय हुआ और जो विरोध में थे, उनका ह्रास हुआ। केरल पहले तमिलनाडु की तुलना में इतना पिछड़ा था कि तमिल उसे अपना उपनिवेश समझते थे। हिन्दी के राजभाषा न हो पाने के निर्णय के बाद भी हिन्दी के प्रति अपने वस्तुपरक दृष्टिकोण के कारण वह तमिलनाडु को इतना पीछे छोड़ गया है कि दिल्ली में यदि घरेलू सहायकों की संख्या देखो तो वे अपने अनुपात से बहुत अधिक तमिलनाडु की मिलेंगी जब कि केरल की नर्सें मिलेंगी, दूसरे सम्मानित पेशों में काम करने वाले, यहॉं तक कि व्यवसाय करने वाले मिलेंगे, और अपनी संख्या को देखते वे तमिलनाडु से कई गुना आगे मिलेंगे। इसी तरह की गिरावट बंगाल में भी देखने को मिलेगी। रिक्शा चलाने वालों में बंगलाभाषियों की संख्या अपनी जनसंख्या के अनुपात में बहुत आगे है, और यह तय करने में कठिनाई होती है कि उनमें कितने बंगाली है, कितने बांग्लागदेशी। जिन्हें अपने साहित्य पर इतना नाज था कि वे अपनी भाषा का सम्मान तक नहीं कर सके, उसे अपने राज्य की भाषा बनाने से कतराते रहे वे आज गिरावट के दौर से अपनी उसी अभिजनवादी अकड़ के कारण गुजर रहे हैं और भीतर यह समझ चुके हैं कि हिन्दीे के बिना उनका हित भी बाधित होता है।

5. परन्तु मैं उस चरण की बात कर ही नहीं रहा हूँ। मेरे लिए राजभाषा समस्या केन्‍द्रीय नहीं है, शिक्षा की समानता जो अवसर की समानता से जुड़ी हुई है और जिसके लिए उन्हें अपनी भाषाओं के माध्यम से अपने समूचे समाज की सर्जजनात्मक उूर्जा का उपयोग करना है, अपनी खनिज, पर अब तक अनुपयोगी पड़ी संपदा के सार्थक उपयोग की तरह, जिससे उनका और विश्व समाज में पूरे देश का अभ्‍युदय जुड़ा है, उसकी बात कर रहा हूँ। इसे टाला जा सकता है रोका नहीं जा सकता। क्यों कि इस बीच यह अहसास तेज हुआ है कि समाज के पिछड़ेपन या किसी भी गिरावट, उपेक्षा या बेरोजगारी की जिम्मे दारी न अकेली उनकी है न उनके पिछले जन्म के कर्म की। इससे मुक्ति दिलाने में सरकार की भूमिका है और उसे इसकी व्यवस्था करनी ही होगी। आज यह विद्रोह कुछ दिनों का काम, कुछ रियायते दे कर पूरा कर लिया जाता है, कल जो हक है हमारा हम लेंगे, उससे न जरा भी कम लेंगे का नारा दबे, पिछड़े और आज दुत्कारे जाने वाले जनों का प्रधान नारा बनने जा रहा है।

6. जब मैंने कहा, उस स्तर पर जाति, धर्म और संप्रदाय की सीमाऍं ढह जाती हैं, तो यह इतनी सीधी बात है कि तुम जैसे मन्दबबुद्धि के दिमाग में भी आ सकती है, परन्तु् जो मैंने कहा, उन्हीं समुदायों के अधिक प्रातिभ सिद्ध होने वालों का उपयोग उनके सामाजिक स्तर के खिलाफ काम करने वाली ताकतें कर ले जाऍंगी और वे इतिहास की का‍ल्पनिक कथाओं में उलझा कर उनकों दूसरे प्रलोभन दे कर इस्तेरमाल करेंगी तो इसे समझने में तुम्हें और दूसरों को भी कठिनाई होगी जब कि इसके नमूने ऑंखों के सामने हैं। यह बात तो समझ में आएगी ही नहीं कि जो इतनी जघन्य अवस्था‍ में जी रहे हैं कि निर्वाचन का अर्थ उनके लिए पॉच साल में एक बार के लिए एक थैली शराब, या कुछ पैसे या कुछ कपड़े लत्ते होता है, उनकी सामूहिक चेतना के बीच से कोई नेतृत्व उभरेगा।

7. इसलिए उस दलित वर्ग का मीडियाकर वह आन्दोलन छेड़ने को बाध्य है। वही इसे फलोदय तक ले जा सकता है। वह न बिकाउू होता है न उसके गाहक होते हैं। उसे ही दो विकल्पों के बीच से एक का चुनाव करना है, आत्मघात या समानता का संघर्ष जिसका नैतिक आधार इतना प्रबल है कि जिनके हित इससे टकराते हैं वे भी खुल कर इसका विरोध नहीं कर सकते।

8. परन्तुि यहीं पर उस तबके की क्रान्तिकारी भूमिका का पता चलता है जिसे मीडियाकर या मझोली समझ वाला कहा जाता है। समूचे समाज में सबसे महत्वपूर्ण तबका यह मीडियाकर तबका ही है। और जानते हो, मैं इसी का एक सदस्य हूँ परन्तु उन निर्योग्यताओं से लैस जो ऐसा आन्दोलन खड़ा कर सके जब कि तुम इसके प्रातिभ तबके से आते हो जो अपनी प्रतिभा का टेस्टीमोनियल छाती से चिपकाए सही गाहक की तलाश में फेरी लगाते रहते हैं।
इति भाषा प्रसंग:।

Post – 2016-04-08

जबॉं कटती है कटने दो अँगूठे पर नजर रखो

आप अब तक यह तो समझ चुके होंगे कि हम दोनो, दोस्तों की तरह नहीं, वकीलों की तरह बात करते हैं। पक्ष हमने चुन लिए हैं। कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। बहस का अपना ही मजा है, उसके बाद फिर नए सींग उगाने, भिड़ने और अदालत के बाहर एक दूसरे का हाल पूछने में उम्र गुजरी है। उसने कहा तुम्हारी जड़ें उजागर कर दीं तो मै भला पीछे क्यों रहता।

“जड़ लोग भी जड़ों तक पहुंचने की कोशिश करते हैं यह जानकर पुलकित हूं, पर पहुंच नहीं पाते यह सोच कर व्यथित भी हूं। कभी यह तो समझने की कोशिश की होती कि मेरे कथन में और इतिहास की परिघटनाओं में कोई साम्‍य और अन्तर है भी या नहीं और फिर यह भी सोचा होता किैं मैं कई बार, कई रूपों में, यह कह आया हूं कि मौलिकता अपरिपक्व परन्तु अपने उत्कर्ष के लिए व्यग्र जनों की समस्या है । इससे ललित साहित्‍य और कलाओं का काम चल जाता है जिनमें भावुकता का अनुपात बौद्धिकता की तुलना में बहुत अधिक होता है, परन्तु, बौद्धिक को मौलिक नहीं प्रामाणिक होना चाहिए।

”जब तुम मौलिक होते हो तो, अकेले होते हो, अनन्य होते हो, दूसरों को चकित करते हो, जब प्रामाणिक होते हो तो बहुत के साथ, कई रूपों में परखे हुए व्यक्तियों और तथ्यों के साथ होते हो, इसलिए विश्वसनीय होते हो, सामाजिक होते हो और तुम्हारा लक्ष्य किसी को चकित करना या अपने को अनन्य सिद्ध करना नहीं, अपितु अपने पाठकों और श्रोताओं को बदलना होता है। परिवर्तन लाने के लिए, किसी आन्दोेलन को फलोदय तक पहुँचाने के लिए, एक ही बात को, एक ही विचार को, बार बार दुहराना होता है, कई बार तो उूब पैदा होने की हद तक जा कर।

”परन्तु प्रामाणिकता के साथ नवीनता उन्हीं तथ्यों और विचारों और क्रियाओं और अनुभवों के नए रूप में संयोजन से स्वत: पैदा होती है। उनकी व्याख्या से सचाई का एक नया आकार सामने आता है जो जब सपना बना रहता है तब भी विश्वसनीय बना रहता है। दुनिया के सारे आविष्कार, सभी क्रान्तिकारी विचार, सभी दर्शन और कुछ दूर तक धर्म भी इसी प्रक्रिया से पैदा होते हैं। पूर्वलब्ध तथ्यों के नये संपुंजन और उनके अन्तर्घात से फूटे नए आलोक से।‘’

’’अब मैं क्या करूँ। बैठा रहूँ या उठ कर चला जाउूँ और जब तक तुम्हारा आत्मालाप पूरा नहीं हो जाता तब तक टहलता रहूँ?’’

’’तुम कहीं मत जाओ, जहॉं भी जाओगे तुम्हारी बेवकूफी तुम्हारे साथ जाएगी। उससे छुटकारा नहीं। तुम यहॉं बैठे बैठे जो मैं कहता हूँ उसे सुनो और यह समझो कि केलेकर जी विद्वान आदमी हैं। उन्होंने भी तुम्हारी तरह ही बहुत कुछ पढ़ा है इसलिए समझते हैं व्यक्ति या कोई संगठन अगर कुछ करने पर आ जाए तो वह कोई भी अच्छा काम कर सकता है या युगान्तर ला सकता है। उनके जीवट को मैं भी नमन करता हूँ। यह भी दुहरा आया हूँ कि उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है। परन्तु यदि परिस्थितियॉं अनुकूल नहीं हैं, यदि प्रतिरोधी शक्तियॉं अधिक सशक्‍त और सक्रिय और अनुकूलन में समर्थ हैं तो इच्छित दिशा में हम कुछ कदम चल कर हार जाते हैं।

लोहिया जी नरशार्दूल न रहे हों, मात्र एक चिन्तक ही रहे हों, उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए जो प्रयत्न किए उनका इच्छित परिणाम नहीं आया। वह बेकार गया, यह भी नहीं कह सकते। यह लोहिया जी के आन्दोकलन का परिणाम था कि राज्यों के काम काज की भाषा वे भाषाऍं बनी जिनके आधार पर राज्यों का सीमांकन हुआ था। हिन्दीं प्रदेश इसका एक मात्र अपवाद था जिसमें एक ही भाषाक्षेत्र की अपनी विशालता के कारण इसे पहले से बँटे राज्यों में बँटा रहने दिया गया परन्तु इन राज्यों में भी हिन्दी् काे राज्यभाषा उस आन्दोलन के बाद ही बनाया गया।

” सच कहो तो कांग्रेस की पराजयके बाद क्योंकि कांग्रेस की पूरी ताकत अंग्रेजी के पक्ष में रही है और नेहरू भाषावार राज्यों के प्रबल विरोधी थे क्‍योंकि वह जानते थे कि यदि राजयों की शासकीय भाषा उनकी अपनी भाषा बन गई तो केन्‍द्र से अंग्रेी को हटाना आसान हो जाएगा। वह यह भी सोचते थे कि ज्ञान की गंगोत्री अंग्रेजी ही है। जब हिन्दीभाषी राज्यों में राजकाज हिन्दी में आरंभ हो गया उसके बाद भी बंगाल और तमिलनाडु तक जो अपनी भाषाओं को अपने साहित्यं के आधार पर हिन्दी से अधिक समर्थ भाषा मानते थे, अपनी भाषाओं को राजकाज की भाषा नहीं बना सके थे। आज क्‍या स्थिति क्‍या है, इसका मुझेज्ञान नहीं। फिर केन्द्र के लिए किसी भारतीय भाषा के लिए उनका समर्थन जुटा पाने का प्रश्न ही न था।

” पर लोहिया जी जहॉं सफल न हो सके वह था सभी स्कूलों को एक स्तर पर लाना जिससे राष्ट्ररपति से ले कर चपरासी तक के बच्चाे एक ही तरह की शिक्षा पा सकें और अपनी योग्यंता के आधार पर आगे बढ़ सके।

मैं सरकारी कामकाज की भाषा की लड़ाई की बात नहीं कर रहा हूँ। शिक्षा की भाषा की बात कर रहा हूँ । और इसमें सबसे प्रबल भूमिका किसी दल की नहीं उस पिस रहे तबके की है जिन्हें अपनी भाषा में शिक्षा चाहिए और छोटे से बड़े सभी लोगों के बच्चों को उसी में शिक्षा दी जानी चाहिए। यदि वे कोई अन्य भाषा सीखें तो उसका स्थान गौण होना चाहिए। वह संस्‍कृत की क्‍यों न हो। उसको योग्यता की कसौटी नहीं बनाया जाना चाहिए। उचित भाषाई परिवेश में सभी लोग बिना आयास के कोई भी भाषा सीख लेते हैं, और इतने अधिकार से सीख लेते हैं कि कोई उन्नीस-बीस नहीं पड़ता । इसलिए योग्यता का भाषा से कोई संबंध नहीं। अयोग्य होते हुए भी, संख्या में अल्प होते हुए भी, जो समाज को अपने नियन्त्रंण में रखना चाहते हैं वे सामान्य जनों द्वारा व्यवहार्य भाषा की अवहेलना करते हैं, उनमें शिक्षा को लगभग असंभव बना देते हैं, और यदि ऐसा न भी हो सके तो उसे कहानी, कविता, बुझौवल तक की भाषा बनाए रखने का प्रबन्धं करते हैं और उस भाषा को अपने नियन्त्र ण में रखते हैं जिस पर अधिकार को योग्यता का प्रमाण बना दिया जाता है। इसी से कई तरह के आन्तरिक उपनिवेश पैदा होते हैं। संस्कृत पर अनन्य अधिकार जमा कर ब्राह्मणों ने यही किया, अंग्रेजी पर अनन्य अधिकार जमा कर नवब्राह्मण यही कर रहे हैं और इससे जातियों के भीतर जातियॉं पैदा हो रही और मजबूत हो रही हैं। जातिवाद के विरुद्ध खड़ा होने वालों को इतिहास में दो हजार साल पीछे जा कर एक काल्पनिक कथा में अँगूठा काटे जाने के अन्याय से ध्यान हटा कर आज के दिन जबान काटे जाने के अन्या य के विरुद्ध एकजुट होना चाहिए। क्योंकि जिनकी जबान काट दी जाती है, उनके अंगूठे ही नहीं हाथ तक उन्हीं के द्वारा काट दिए जाते हैं, उन्हेे को काम मिलता ही नहीं, जलील होने की यातनाऍं और फेंकी हुई रोटियॉं मिलती है और फिर या तो अकाल और भुखमरी से उनकी गर्दन काट दी जाती है, या गर्दन काटने पर, आत्महत्या करने पर विवश किया जाता है। इस मामले में इस भ्रम से बचा जाय कि वर्णवाद के विरुद्ध केवल दलित हैं, गो इसके कारण सबसे अधिक उत्पीड़न उनको ही सहना पड़ा है। परन्तु, सहना और विरोध में खड़ा होना दो अलग बातें है। दलित अपने आक्रोश का भी सौदा कर सकता है और अदलित इस दुहरी पीड़ा से अर्धविक्षिप्त़ तक हो सकता है। फिर भी जबान की वापसी का अभियान दलित नेतृत्व में हो तो उसमें अधिक तेजस्विता रहेगी, एक बार इसके खड़ा होने के बाद पिछड़े देशों, समाजों और सामाजिक स्तरों का मेधावी बालक अपनी महत्वाेकांक्षा के कारण दुश्मदनों के हाथ का खिलौना बन जाता है, फिर भी आग तो वहीं बची है, उस पीड़ा में, अपने नरक से बाहर आने की आकांक्षा में या इस बोध से अवसन्न ता में। जैसे लकड़ी में आग। उसके लिए प्रातिभ नहीं मछोले कद के तेजस्वी नेतृत्व को आगे आना होगा, शिक्षा की बराबरी की माँग के साथ जिसे कई तरीकों से दबाया, भटकाया और मिटाया जा रहा है।

Post – 2016-04-08

आज की पोस्ट लंबी हो गई । इसे दो किश्तों में दे रहा हूँ । दो शीर्षकों से । पहला अभी, दूसरा दो ढाई घंटे बाद।

विरोध का मनोविज्ञान

‘‘तुम जब कुछ भी कहते हो तो विश्वास नहीं होता! जानते हो इसका क्या कारण है? तुम जिस सोच का समर्थन करते हो उसकी मलिनता के कारण! कोई कहे, ‘सूखे के इस दौर में सूखा प्रभावित क्षेत्रों में , गटर का पानी किस अनुपात में वितरित किया जाय कि पेय जल की समस्या हल हो सके तो क्या इस पर बहस हो सकती है? तुम इसी तरह की बातें करते हो। मैं चुप लगा जाता हूं तो तुम समझते हो मंजिल मार ली। तुम्हारे सीधे सादे विचार जो पहली नज़र में ठीक लगते हैं उन पर भी सन्देह होता है! तुम्हारी अक्ल पर पड़े उनके पत्थर के कारण। ये खुशबू की बात करें तो उससे भी बदबू आती है! इसलिए भी तुम्हारी यह बात मुझे सही नहीं लगती थी कि अंग्रेजी हमारे बौद्धिक उत्कर्ष में बाधक है! सीधी सी बात कि हमारे पास आधुनिक ज्ञान का कोई दूसरा विश्वसनीय स्रोत नहीं है इसलिए लगता रहा है कि जिन भी परिस्थितियों में अंग्रेजी का माध्यम हमें सुलभ हुआ उसे आज त्यागना बौद्धिक आत्महत्या है और इसीलिए हम ऐसा विचार रखने वालों को संकीर्ण सोच का, राष्ट्रवादी व्याधियों से ग्रस्त मानते आए थे और अंग्रेजी के प्रति उदार स्वीकार भाव रखते आए हैं। पर उस दिन की तुम्हारी बात मुझे ठीक लगी!”

“पत्थ र पर दूब कैसे उग आई। मैं तो यह मान कर चलता हूँ कि यदि कोई बात तुम्हारी समझ में न आई तो वह सही है, समझ में आ गई तो जरूर कुछ गड़बड़ है। जिस आदमी को खुशबू की चर्चा से बदबू आती हो, उसे सोचना चाहिए कि लगातार दुष्प्रचार के कारण बदबू उसके भीतर तो नहीं भर गई है और वह भी इतनी गहरी कि जिसे खुशबू तक न मिटा सके।

”जानते हो अमेरिका के जंगलों में बेचारा सा एक जानवर होता है । उसे स्कंक कहते हैं! वह काटता नहीं है, अपने बचाव के लिए दुर्धन्ध भरी एक फुहार छोड़ता है । कितना भी नहाओ, शैंपू करो, बदबू जाती ही नही। उसका एक ही उपचार है, टमाटर के रस से शरीर को अच्छी तरह रगड़ कर नहाना। विचारधाराओं में कुछ ऐसी होती हैं जो नफरत के बल पर ही जीवित रहती हैं और इनके प्रभाव में आने वाले व्यक्ति उसी दशा में पहुँच जाते हैं जिसमें तुम पहुँच चुके हो। बौद्धिक स्कंक ।

”फिर भी यह चमत्कार हुआ कैसे कि मेरी कही कोई बात तुम्हें सही लगने लगी। और यदि तुम्हे सही लगने लगी तो अब अपने ही कहे वाक्यों पर मेरा विश्वास डगमगा रहा है! ‘’

’’भई, मैंने सोचा, अगर दस बार तोता भी भाग्य!फल निकाले तो दो चार बार सही तो वह भी होता है फिर तुम्हातरी भी कुछ बातें तो सही होंगी ही कि तभी कोंकड़ी के प्रख्या्त लेखक रवीन्द्र केलेकर का एक व्या्ख्यान जो उन्होंने कभी ज्ञानपीठ पुरस्कारर लेने के अवसर पर दिया था वह ‘अन्तिम जन’ के जुलाई 2015 अंक में सामने पड़ गया, जिसमें उन्होंने बड़े मार्मिक ढंग से इस पीड़ा को व्यक्त किया है कि अंग्रेजी ने हमारे बौद्धिक विकास को कुंठित किया है। अंक यह रहा। पढ़ कर समझ में आ जाएगा कि जो बात तुम आज कह रहे हो वह दूसरे समझदार लोग बहुत पहले से कहते आ रहे हैं।‘’ उसने पत्रिका को खोल कर मुझे थमा दिया। कुछ पंक्तियों को उसने रंग रखा था।

मैंने पत्रिका हाथ में लेते हुए जुमला कसा, ‘’समझदार लोग इतने पहले से यह कहते आ रहे हैं और मूर्खों को फिर भी समझदारी से इतनी चिढ़ है कि वे दाद तो दे लेते हैं, पर सुझाव मानते नहीं।‘’

केलेकर के इस व्याख्यान का शीर्षक था, ‘बोन्सााई संस्कृति’ और उसके द्वारा रंगीन पंक्तियॉं निम्न प्रकार थीं:

’जड़ें काट कर बड़े बड़े वृक्षों को बौना बनाने की एक कला जापानियों ने विकसित की है। नारियल का पेड़ जो गगन को छूने के लिए उूपर तक जाता है उसे सिर्फ पॉंच फुट उूँचा इस कला के द्वारा बनाया गया मैंने देखा है। बड़ा ही सुन्दर दिखाई देता है, मगर वह नारियल नहीं दे पाता। दीवानखाने की शोभा बढ़ाने के ही काम आता है। इस कला को बोन्साई कला कहते हैं। अंग्रेजी ने हमारे देश में कई बोन्साई विद्वान, बोन्साई बुद्धिजीवी, बोन्साई लेखक और अब तो बोन्साई पाठक भी निर्मित किये हैं जो परिसंवादों की शोभा बढ़ाने के काम आते हैं। ठोस कुछ भी नहीं दे सकते। क्या हम देश को बोन्साय लोगों का होने देंगे? नहीं न? तो फिर अंग्रेजी की जो प्रबलता है उसके खिलाफ विद्रोह करना निहायत जरूरी हो गया है। कौन करेगा यह विद्रोह? एक नरशार्दूल था जिसने यह विद्रोह शुरू किया था – डा. लोहिया। अचानक ही चल बसे । अब? मेरी दृष्टि देशी साहित्यकारों की ओर जाती है। विक्टयर ह्यूगो बड़े गर्व के साथ कहा करता था – इटली ने रिनेसां का आन्दोलन चलाया। जर्मनी ने रिफार्मेशन के साथ साथ आधा रिवोल्यूेशन चलाया और न सिर्फ फ्रांस की बल्कि पूरे यूरोप की शक्ल सूरत ही बदल डाली। ऐसा कोई एक वाल्तेयर देश की किसी एक भाषा में पैदा होगा, तभी आज की हालत जड़मूल से बदल पाएगी।‘

मैंने उन पंक्तियों को पढ़ कर एक लम्बी सांस ली तो लगा वह खुशी से बैठे बैठे ही बेंच से दो इंच उूपर उछल जाएगा, बोला , जो बात दूसरों ने दशकों पहले कही है उसी को दुहरा कर तुम मौलिक चिन्तक बनना चाहते हो और अनपढ़ो की जमात मिल गई है तो फूले भी नहीं समाते होगे, पर मैंने तुम्हारी जड़े, उखाड़ कर दुनिया के सामने उजागर कर दीं!”