Post – 2018-05-15

द#संस्कृत_की_निरमाण_प्रक्रिया
दीवार से परिवार तक

एक बार यह तय हो जाने के बाद कि ’वरिव’, जिसका प्रयोग धन के लिए किया गया है, का आधार जलवाचक ‘वर’ है, हमें आगे बढ़ जाना चाहिए था, क्योंकि जल के पर्यायों से निकले धन संपदा सूचक बहुत से शब्द विचार के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। परंतु हम ’वर’ की विविध गतियों से निकली शब्दावली पर विचार करने के अपने प्रलोभन को रोक नहीं पा रहे हैं।

पिछली पोस्ट में हमने इसका कुछ संकेत भी कर दिया था। ’वर’ वैदिक समाज का अंग बने भिन्न भाषाई समुदायों की अपनी सीमा के कारण ’वर्’ , ’व्र’, ’वृ’, का रूप लेते हुए इतने अधिक शब्दों की सृष्टि करता है की सामान्यतः यह स्वीकार करने में भी घबराहट अनुभव करेंगे ये सभी शब्द उसी मूल से निकले हैं। इसका एक कारण यह है कि इनकी व्युत्पत्ति के लिए हम धातुओं का सहारा लेते रहे हैं और यह शब्दावली किन्हीं इक्की दुक्की धातुओं में सिमट नहीं पाती, इसलिए हमें यह विश्वास नहीं होता दूसरा कोई ऐसा स्रोत हो सकता है जिसमें सभी की व्याख्या किसी एक ध्वनि से की जा सके। यह भाषा पर अधिकार से जुड़ा प्रश्न नहीं है अपितु भाषा की प्रकृति को समझने की समस्या से जुड़ा हुआ प्रश्न है। हमें इसका दूसरा कोई समाधान दिखाई नहीं देता और धातु का सहारा लेने पर इन सभी का अर्थ बाहर से लगे ठप्पे जैसा प्रतीत होता है।

’वर्’ तो अपने अधिकार क्षेत्र में दूसरों के प्रवेश को रोकने अर्थात ’वारण’ के लिए सीमांकन चिन्ह या रेखा ’वार/ बार’ बनकर उसे चिन्हित करने वाली निर्मिति का बोधक बनता है, जिससे हमारी दीवार को नाम मिला है। हम इस ब्योरे में नहीं जाएंगे। संक्षेप में यह बता दें की वार के पहले जो दी लगा है वह उसी बिरादरी का है ने जिसको हम दिवस में पाते हैं। अर्थात चिन्ह, द्योतक। अंग्रेजी वाल में यह लुप्त है। प्रसंगवश यह भी बता दें सीमांकन की यह प्रवृत्ति जानवरों तक में पाई जाती है। गैडा अपने अधिकार क्षेत्र को जगह जगह लीद करके उसे पांवों से फैलाकर चिन्हित करता है। जब हम सप्ताह के दिनों के लिए ग्रहों के साथ ’वार लगाते हैं तो हमारा आशय दिवस या वासर से होता।

यह घेरा आच्छादन का अर्थ ग्रहण करता है और फिर बाल के लिए प्रयोग में आता है। ऊन के लिए प्रयुक्त ऊर्ण की व्याख्या ’ऊर्णु आच्छादने’ कह कर की जाती है, इसे आप जानते हैं, परंतु वार या बाल का भी अर्थ ’आच्छादित करने वाला’ है, इसकी ओर न तो आपका ध्यान गया होगा न ही यह किसी को कोश में मिलेगा यद्यपि वारण वाला आशय मिल जाएगा।

’आ-’ उपसर्ग के साथ ’आवर’ और आवरण का भाव स्पष्ट हो जाता है। नासदीय सूक्त में ’किं आवरीवः’ मैं यही आवर है। ’आवर्त’ बन कर यह लपेटने या लौटने अथवा चक्कर खाने का भाव ग्रहण करता है और फिर बार बार दोहराने या आवर्तन,आवर्तक, आवर्ती, आदि का जनन करता है। परंतु आवारगी के बारे में आप क्या कहेंगे? इसमें गति का भाव प्रधान है या गति के साथ निरर्थक चक्कर लगाने का भाव भी जुड़ा हुआ है, यह तो आप स्वयं तय कर सकते हैं ,परंतु मेरा ख्याल है कि इससे पहले इसका अर्थ इतने मूर्त रूप में आपके समक्ष उपस्थित नहीं हुुआ होगा।

जैसे प्रत्येक निजी क्षेत्र में अवांछित के वारण और निवारण के साथ, प्रिय के स्वागत का भी भाव रहता है वर का अर्थविकास वरण या चुनाव की दिशा में भी हुआ है, इससे वर अर्थात पति े होने की दृष्टि से सबसे अधिक उपयुक्त, वरेण्य, वरणीय, वरुण आदि का विकास हुआ है. यहां वरुण का प्रयोग हम जल के देवता के आशय में नहीं कर रहे हैं जिनका भी उद्भव वर अर्थात् जल से ही हुआ है, अपितु उन वन्य अनाजों के लिए कर रहे हैं जिन्हें वरुण प्रघास की संज्ञा दी गई थी।

दूसरे उपसर्गों के साथ यह प्रवर, संवर(ण), विवर, विवर(ण), निवार(ण), का निर्माण भी इसी से हुआ है, इसे आसानी से समझा जा सकता है। परंतु इनमें सबसे रोचक है परिवार, जिसमें ’परि’ परिधि का द्योतक है और वार जो भी परिधि या सीमा का द्योतक था अब उस परिधि में आने वाले जनों का बोधक हो जाता है।
(इस चर्चा को कल भी जारी रखेंगे।)

Post – 2018-05-13

#विषयान्तर
एक स्पष्टीकरण

श्री सिंहल ने पिछली पोस्ट पर कुछ आशंकाए कीं। उसका जो उत्तर मुझे सूझा संभव है उसमें दूसरों की भी रुचि हो, अतः

गांधी को मनोयोग पूर्वक पढ़ें। एक दिन में एक या दो पन्ने से अधिक नहीं। एक साल तक। सोचते हुए। सभी सवालों का जवाब मिल जाएगा।

पर यदि आप संघी हैं या कम्युनिस्ट हैं तो आप पढ़ेंगे भी तो समझने के लिए नहीं, कमी तलाशने के लिए । दोनों का दिमांग छोटा होता है। एक के लिए मानवता मानवता ऋण हिन्दू है. दूसरे का मानवता ऋण मुसलमान है। एक के लिए गांधी से अधिक सार्थकता जिन्ना की है जिनकी समझ यह कि हिन्दू और मुसलमान एक साथ शान्ति से नहीं रह सकते। दूसरे के लिए गांधी से अधिक सार्थकता गोलवल्कर की जिनके अनुसार भी हिन्दू और मुसलमान एक साथ शान्ति से नहीं रह सकते। इसलिए आज के एक विवाद में भी कम्युनिस्ट जिन्ना के साथ हैं, प्लेबीसाइट के समय भी थे और अखाड़ा तब भी अमुवि ही बना था। मामूली कर्मकांड को छोड़कर 1947 के बाद कम्युनिस्ट पार्टी मुस्लिम लीग का नया नाम हो गयो, इसलिए हिन्दू की पीड़ा से कम्युनिस्टों को गुदगुदी होती है, वे केवल मुस्लिम खरोंच पर आर्तनाद करते हैं तो मुझे आश्चर्य नहीं होता। किसी भी त्रासदी का जब तक कम्युनल पहलू नहीं उभरता तब तक वे उस पर ध्यान नहीं देते, इस पर भी मुझे आश्चर्य नहीं होता। संघ की (कोश और थानवी जी के हस्तक्षेप के बावजूद ‘की’ ही) सोच में मुसलमान का नुकसान बराबर हिन्दू का हित भी मुझे चकित हुीं करता। गांधी चेतना के इस विखंडन को ब्रिटिश कूटनीति की सफलता मानते हुए इसके विरुद्ध भी लड़ते हैं और मानते हैं कि अशान्ति चाहने वाला जहां भी रहे, अपनों के बीच भी अपने दुश्मन पैदा कर लेगा, इसलिए वह व्यक्तियों से नहीं प्रवृत्तियों से मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुैं और इसके लिए संघर्ष करते हुए मर जाने को हार मान कर जीने से अच्छा मानते हैे और ऐसी ही मौत का वरण कर मर कर भी जीत जाते हैं ओर गोडसे मार कर भी हार जाते हैं।

मेरे लिए मानवता का अर्थ है मानवद्रोही ऋण मानवता है परन्तु गांधी के लिए मानवता का अर्थ था मानवद्रोह मुक्त मानवता, जिसमें मानवद्रोही तक के लिए (अपने हत्यारे तक के लिए) जगह है, उसके प्रति घृणा की जगह करुणा है, क्योंकि गांधी की नजर में वह बीमार और दयनीय है और एक बीमार समाज की उपज है। गांधी सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे, समाज को व्याधिमुक्त करने का, एक, दूसरों के लिए कल्गनातीत लडाई, लड़ रहे थे। उन्हें केवल मार्क्स समझ सकते थे। उन्हें गांधी के बाद आना चाहिए था । दोनों में इकहरापन है फिर भी दोनों में कोई अप्रासंगिक नहीं हो सकता। मानवता का भविष्य दोनों के सिंथीसिस में है। थीसिस-ेंऐंटीथीसिस-सिंथीसिस। नए प्रयोग अकर्मण्यता और ठहराव के विरुद्ध उसके बाद।

Post – 2018-05-13

गांधी का रास्ता

आज के बौखलाहट भरे माहौल में जिसमें दिशाएं तक खो गई हैं, जिसमें जो गलत नहीं लगते वे भी सही नहीं लगते, जो बुरे नहीं लगते मैं भी भले नहीं लगते, जहां अंधेरा नहीं है वहां भी कुछ दिखाई नहीं देता, खुली हवा में भी घुटन महसूस होती है, वहां गांधी अकेले ऐसे दीपस्तंभ दिखाई देते हैं जिससे हम अपने भटकाव मैं भी सही कार्यदिशा तय कर सकें। गांधी मेरे लिए आदर्श नहीं है । उनका जीवन मैं जीना नहीं चाहूंगा। उनको कई तरह की बीमारियां थीं मैं उनसे उनकी बीमारियां नहीं लेना चाहूंगा हम गांधी से सीख सकते हैं, गांधी बनकर जी नहीं सकते।

हमारे देश की सामाजिक अधोगति का प्रधान कारण यह है कि इसका बौद्धिक नेतृत्व मार्क्सवादियों के हाथ में रहा है जिनकी जड़ें इस देश और समाज में न थीं। उनके द्वारा किए गए सत्यानाश का कारण यह है कि वे गांधी को समझने से इनकार करते रहे, जब कि भारतीय परिवेश में गांधी मार्क्स के आधुनिक संस्करण हैं। उन्हें सत्ता की चिन्ता थी, देश हित की नहीं। उनके बौद्धिक कविता में नाले (आर्तनाद) भरते थे और ऐयाशों की जिन्दगी जीते थे। उनके बच्चे हिन्दुस्तानियों अंग्रेज बनाने वाली अंग्रेजी सिखाने और दिमागी तौर पर देश की हर चीज से नफरत की आदत डालने वाले, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का रास्ता दिखाने वाले स्कूलों में तैयार होते रहे और वे देश को जादूगरों की तरह क्रान्ति के सपने द्िखाते रहे। वे वाचाल थे, पर विश्वसनीय नहीं। कभी उन्होंने जितनी धूर्तता से मजदूरों का उपयोग करते हुए कल कारखाने ही बंद करा दिए उसी तरह आज छात्रों का उपयोग करते हुए शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने पर उतारू हैं । विश्वविद्यालयों को विष-विद्यालय बनाया जा चुका है इसलिए छात्रों के विषय में गांधी की सलाह को कुछ सूत्रों में रखना चाहेंगेः

1. विद्यार्थियों को दलबंदी वाली राजनीति में कभी शामिल नहीं होना चाहिए। विद्यार्थी विद्या के खोजी और ज्ञान की शोध करने वाले हैं, राजनीति के खिलाड़ी नहीं।

2. उन्हें राजनीतिक हड़तालें नहीं करनी चाहिए। विद्यार्थी वीरों की पूजा चाहे करें, उन्हें करनी चाहिए; लेकिन जब इनके वीर जेलों में जाएं, या मर जाएं, या यूं कहिए कि उन्हें फांसी पर लटकाया जाए, तो उनके प्रति भक्ति प्रकट करने के लिए उनको उन वीरों के उत्तम गुणों का अनुकरण करना चाहिए, हड़ताल नहीं।

3. पश्चिम की भद्दी नकल और शुद्ध तथा परिष्कृत अंग्रेजी बोलने व लिखने की योग्यता से स्वतंत्रता देवी के मंदिर मैं एक भी ईंट नहीं जुड़ेगी।

4. विद्यार्थियों को अपनी सारी छुट्टियां ग्राम सेवा में लगानी चाहिए। इसके लिए उन्हें मामूली रास्तों पर घूमने जाने की बजाए उन गांव में जाना चाहिए जो उनकी संस्थाओं के पास हों। वहां जाकर उन्हें गांव के लोगों की हालत का अध्ययन करना चाहिए और उनसे दोस्ती करनी चाहिए। इस आदत से वे देहात वालों के संपर्क में आएंगे और जब विद्यार्थी सचमुच में जाकर उनके बीच रहेंगे तब पहले के कभी-कभी के संपर्क के कारण गांव वाले उन्हें अपना हितेषी समझकर उनका स्वागत करेंगे न कि अजनबी मान कर उन पर संदेह करेंगे।

5. विद्यार्थियों को अपनी राय रखने और उसे प्रकट करने की पूरी आजादी होनी चाहिए। उन्हें जो भी राजनीतिक दल अच्छा लगता हो, उसके साथ खुले तौर पर सहानुभूति रख सकते हैं। लेकिन मेरी राय में जब तक वे अध्ययन कर रहे हैं, तब तक उन्हें कार्य की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। कोई विद्यार्थी अपना अध्ययन भी करता रहे और साथ ही सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता भी हो यह शक्य नहीं।

हमने ऊपर की पंक्तियां उनके विचारों के संग्रह ‘मेरे सपनों का भारत’ से ली है जो उनके अन्यत्र प्रकाशित विचारों का सार संग्रह है। हम जानते हैं गांधी जी के इन विचारों का समर्थन करने वाला कोई शिक्षा शास्त्री या कुलपति आज के विषाक्त पर्यावरण में शैतान जैसा प्रतीत होगा और इसी से हम समझ सकते हैं कि जिनके हाथ में देश का बौद्धिक नेतृत्व था वे देश और समाज को किस दिशा में ले जाने का प्रयत्न करते रहे हैं और इसके बावजूद आज की अधोगति के लिए वे अपनी जिम्मेदारी तक स्वीकार नहीं करेंगे। यदि मार्क्सवादियों ने गांधी से केवल इतनी ही सीख ली होती तो क्या मार्क्सवाद भारत में अप्रासंगिक हो पाता?

Post – 2018-05-12

बढ़के आ जाम उठा छक के ले पी तो सही
लहू मीने में है, पहले से था पैमाने में।
रंगे हुए हैं तेरे हाथ छिपाता क्यों है
दाग दामन पर है फिर सामने आता क्यों है
और कुछ याद न हो यह भी तुझे भूल गया
माथे पर भी पड़े छींटे थे सितम ढाने में।।
हम पर जो बीतती आई है आके बीतेगी
तेरी आदत है कि करनी से मुकर जाता है
मुझे मालूम हैं हमदर्दिया तेरी मुझसे
आह भी दर्ज न होगी तेरे अफसाने में।।
फिर भी कुछ था तो सही, फिर भी कुछ है तो सही
देखकर मुझको जो घबरा सा उठे है अक्सर
खाक से भी उठा करती है इरादों की लपट
वक्त लेता है सही हर्फ समझ आने में।।

Post – 2018-05-12

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वरिव

हमारे सामने एक बड़ी विचित्र परिस्थिति है। यह तय करना कठिन हो रहा है कि अपनी बात कहां से शुरू करूं। ऋग्वेद में धन संपदा के लिए यो शब्द प्रयोग में आए हैं उनमें से एक है ’वरिव’ वास्तव में हमारी समझ से इसका का अर्थ धन नहीं है, अपितु प्रचुरता है, व्यापकता है और, जैसा कि हम जानते हैं, अधिकता स्वतः समृद्धि का रुप ले लेती है। संभवतः इसीलिए ’वरिव’ का प्रयोग संपन्नता के लिए हुआ हो।

अब हम उन शब्दों को ध्यान दे सकते हैं जिन के संदर्भ में धन का आशय लिया गया है। ऋ. 3.34.7; 6.18.14; 44.18; 6.50.3; 7.47.4) में सायण ने वरिवः का अर्थ ‘धनं’ किया है, परंतु Griffith ने इनके संदर्भ को देखते हुए ‘वरिवः’ का अर्थ freedom; room and freedom; ample room and freedom किया है । ऐसा नहीं है कि वह यह मानते हों कि वरिव का अर्थ धन नहीं है। ऋ. 8.48.1 में ’वरिवोवित्तरस्य’ का अर्थ सायण ’अतिशयेन पूजां लभमानस्य’, करते हैं, पर ग्रिफिथ best to find out treasure करते हैं, जो ’वरिव-विद-उत्तरस्य’ के अधिक अनुरूप है और जिसमें इसका अर्थ धन या संपदा के निकट है। समस्या शब्द के मूल अर्थ और विशेष संदर्भ में उसके प्रयोग से निकलने वाले आशय की है। अतः वरिवोधाम – वरिवः इति धननाम, धनस्य दातारं, bestowing ample room, 1.119.1; वरिवस्यन्तु – प्रभूतमन्नं प्रदातुमिच्छन्तः, vouchsafe to us this favour, 1.122.3; वरिवःविदं – अन्नस्य लम्भकं, wealth that shall bring us room, 2.41.9; धनं, comfort, 4.55.1; वरिवस्यन् – धनमिच्छन्, 6.20.11, अस्मभ्यं धनमिच्छन्तु, honour us, 5.42.11; प्रयच्छन्तु, May kindly give us, 6.52.15; वरिवस्कृत् – धनस्य कर्ता, he who giveth ease, 8.16.6; वरिवोविदः – वरणीयस्य धनस्य लम्भयितारः, providing ample room, 8.27.14 ।

यहां हम यह निर्णय नहीं करने जा रहे हैं कि कहां, किसके द्वारा लिया गया, कौन सा अर्थ अधिक समीचीन है, अपितु यह समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं कि प्रचुरता का भाव संपदा में भी रूपांतरित हो जाता है। बहुत दिया देने वाले ने मुझको मैं ’बहुत’ स्वतः धन का अर्थ ग्रहण कर लेता है। वही यहां भी हुआ है। या कह सकते हैं जिस स्रोत से बहु और संपन्न का संबंध है, उसमें जल अर्थात धन का आशय निहित है। खासतौर से इसलिए इसमें है विशालता, महिमा, श्रद्धा और सेवा का भाव भी जुड़ा हुआ हैः वरिवस्यन्तः (हिरण्यकर्णं मणिग्रीवमर्णस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवाः, 1.122.14; 7.56.17) स्वमहिम्ना पूरयन्तः, bringing free room; .वरिवस्य ( उभे यथा नः अहनी सचाभुवा सदःसदः (सर्वेषु यागगृहेषु) वरिवस्यात् (परिचरतः) उद्भिदा, 10.76.8.46.10) परिचर, आगच्छ, be gracious; वरिवस्या (1.181.9) वरिवस्यया परिचर्यया, singing with devotion.

अब हम जल की उस मूल संकल्पना को ले सकते हैं, जिसके साथ आज दूसरे अनेक भाव जुड़े मिलते हैं परंतु जल का आशय शब्दकोशों में भी ढूंढने पर नहीं मिलेगा। यह है ’वर’, जिसे ’वारि’ और वार्ण – बंगला बान, ज्वार में लक्ष्य कर सकते हैं, और सायण की मानें तो, वराहं – मेघं, the wild boar, 1.61.7; – वराहारं यद्वा, the wild boar, 1.114.5 ; वराहुं, वराहारं, the boar, 1.121.11 पर संभव है इसमें कुछ खींचतान की गई हो, इसलिए यह पूरे भरोसे का न हो।

प्रसंगवश कह दें कि मनुष्य असाधारण गुणों के लिए पशुओं पक्षियों – वृषभ, गयन्द, महिष, शूकर, सिंह, गजराज, शुक, मृग, मीन – से अपनी तुलना करके गर्व अनुभव करता रहा है, यद्यपि दुर्गुणों के लिए भी उन्हीं को याद किया जाता रहा है। बनैला सूअर पर उसके चर्बी के कवच के कारण तलवार के वार को भी बेकार कर देता है, पीछे मुड़ता नहीं, इसलिए शौर्य का प्रतिमान रहा है। इसलिए सायण को (1.88.5) में ‘वराहून् ’ की व्याख्या करते हुए धर्मसंट अनुभव करते हुए ‘वरस्य उत्कृष्टस्य शत्रोर्हन्ता’ वाराहवत कहना चाहिए था जैसा कि ग्रिफिथ ने wild boars किया भी है।

जो भी हो, कोशों वर से कई दृष्टियों से निकटता रखने वाले ’पर’ का भी अर्थ ’जल’ नहीं मिलेंगा। दोनों के साथ ऊंचाई, व्यापकता, श्रेष्ठता, आदि का भाव है, परंतु दोनों में केवल परम् ही उपसर्ग – परम् (परमात्मा, परंपरा), प्र, प्रा, परि, परः/पर (परोपकार/ परधर्म) बनता है और वरं किसी उपसर्ग की मदद से ही – अवर, प्रवर, संवर (संवर्धन, आवरण) यह भूमिका निभा पाता या इसका आभास कराता है।

वर में जल की उछाल, लहरों का आवर्तन, प्रसार, प्रवाह या अग्रगति, परावर्तन या परवर्तिता, शांत जल में होली पत्थर पढ़ने पर वृत्ताकार लहरों के फैलने, घेरा या सीमा बनाने, आदि गुणों के कारण इन सभी के आशय पाए जाते हैं। वरते – वारयति, impedeth, 4.42.6; वरथः – निवारयथः, chased, 5.31.9; वरन्त – विवृण्वन्ति, unclose, 2.24.5; वारयन्ति, restrain; check, 3.32.9; 16; वारयन्तु, keep you back, 5.55.7; वरं – श्रेष्ठं धनपुत्रादिकं, better, 1.4.4; वरसत् – वरणीये मंडले स्थितः आदित्यः, 4.40.5; वरा – कन्यका, suitors, 1.83.2; विवाहयोग्या युवानः, young suitors, 5.60.4; वराय – निवारणाय, to please (6.44.21) श्रेष्ठाय, for thine election; वरांसि – वरणीयानि वृष्ट्यादि, the expanses, 1.190.2; – द्वाराणि, spaces, 4.21.8; रूपस्यावरकाणि, तेजांसि वा, regions, 6.62.1. – तमोनिवारकाणि, many wide spaces, 6.62.2; वरिमता – वरिम्णा – उरुत्वेन आत्मीयेन गौरवेन, compass, 1.108.2; वरिमन् – विस्तीर्णे प्रदेशे, on the broad surface, 3.59.3; – विस्तृते, in freedom, 6.63.11; वरिमाणं – उरुत्वं विस्तृतत्वं, wide expanses, 6.47.4 परिमाणं, the breadth, 8.42.1; वरिष्ठः – उरुतमः, Supreme, 6.37.4; वरिष्ठं – उरुतरं, broadest, 5.48.3; वरीमभिः – स्वकीयैः संवरणैः यद्वा उरुत्वैः, on all sides, 1.55.2; वरणीयेभिः,with wide-extending tracts, 1.131.1; वरिष्ठैः रक्षणविशेषैः, for their brood all round wide, 1.159.2; वरीयः – उरुस्तमम्, wide, 2.12.2; वरीयसी – उरुतरा, more widely laid, 1.136.2; वरीवृजत् – शत्रून् भृशं हिंसन्, o’ercoming, 7.24.2.
परन्तु इसका सबसे रोचक विकास वर्तन चलना. व्र्त्मयवहार करना, बांटना, वर्त्म – रास्ता, वर्तनी – रास्ता, वरण, वारण, आदि

Post – 2018-05-12

मार्क्स भी जा चुके, गांधी तो कभी थे ही नहीं।
सिर्फ जिन्ना ही बचेगा तेरे मैखाने में।।
सिर भी है मांग रहा, जान तो पहले ले ली।
मजा इतना कभी आया न था मिट जाने में।।
बढ़के आ जाम उठा छक के ले पी तो सही
लहू मीने में है, पहले से था पैमाने में।
रंगे हुए हैं तेरे हाथ छिपाता क्यों है
दाग दामन पर है फिर सामने आता क्यों है
और कुछ याद न हो यह भी तुझे भूल गया
माथे पर भी पड़े छींटे थे सितम ढाने में।।
हम पर जो बीतती आई है आके बीतेगी
तेरी आदत है कि तू कर के मुकर जाता है
मुझे मालूम हैं हमदर्दिया तेरी मुझसे
आह भी मेरी न होगी तेरे अफसाने में।।
फिर भी कुछ था तो सही, फिर भी कुछ है तो सही
देखकर मुझको जो घबरा सा उठे है अक्सर
खाक से भी उठा करती है इरादों की लपट
वक्त लगता है सही हर्फ समझ आने में।।

Post – 2018-05-10

फिर उसी लीक पर

यश
शब्दकोश में यश का अर्थ केवल कीर्ति या ख्याति ही मिलेगा, जिसके लिए अंग्रेजी में फेम ग्लोरी आदि का प्रयोग होता है। ऋग्वेद में भी सामान्यतः यही अर्थ लिया गया है । केवल कुछ स्थानों पर सायणाचार्य ने इसका अर्थ अन्न लिया हैः यशस्वतीः – अन्नवती, 1.79.1. उन्होंने भी इसका अर्थ जल नहीं किया है। यह प्रयोग भी उषा के संदर्भ में आया है। हमें ऐसा लगता है कि ‘यश’ ‘इष’ का ही उच्चार-भेद है, जिसमें इ-कार उस प्रवृत्ति के कारण य-कार में बदल गया है जिसे पाणिनि ने इकोयणचि मैं सूत्रबद्ध किया है। हमारी विवशता यह है कि यश कांति शौर्य आदि के लिए जल के अतिरिक्त केवल एक ही सोत बच रहता है और वह है वाणी द्वारा प्रसार जो यहां लागू नहीं होता। ‘इष’ के विषय में हम पहले चर्चा कर आए हैं और देख आए हैं इच्छा, ईश्वरत्व, ऐश, जैसी संकल्पनाएं इसी से संबंध रखती हैं। यश में प्रकाश यह गौरव का जो भाव है वह जल की चमक से ही पैदा हो सकता है और जल के प्रसार से ही यश का ही नहीं किस्सी भी चीज का विस्तार जुड़ा हो सकता है।

वय
वय का अर्थ है १. पक्षी, जो उड़ता है, ‘ न हि ते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आपुः’, .1.24.6 (आकाश में उड़ने वाले ये पक्षी तक तुम्हारे प्रताप तुम्हारी शक्ति या तुम्हारी मनस्विता का स्पर्श नहीं कर सकते।); २. आयु जो बीतती है, ‘त्वमग्ने प्रमतिस्त्वं पितासि नस् त्वं वयस्कृत् तव जामयो वयम्’, 1.31.10 ( अग्नि तुम हमारे बुद्धिदाता हो, पालक हो, जीवन (आयु) दाता हो, तुम्हीं हमारे अपने सगे बंधु हो।) और ३. जैसा कि ‘आदंगिराः प्रथमं दधिरे वय,’ ऋ.1.83.4 में सायणाचार्य ने बताया है ‘अन्न’, उनके कर्मकांडीय विवेचन में ‘हविर्लक्षणमन्नं’,। अन्न के आशय में इसका प्रयोग अनेक बार हुआ है, जैसे, ‘क्षुध्यद्भ्यो वय आसुतिं दाः’- अन्नं 1.104.7; वयः – ‘शोभनलक्षणमन्नं’, 2.20.1; वयसा – अन्नेन, 2.33.6; हविर्लक्षणेन, 6.36.5; वयसः – अन्नस्य, 8.48.1; वयोधाः – अन्नस्यदातार, 6.75.9. हम जैसा कि विदित है अन्न के पीछे जल की संकल्पना तलाशने प्रयास कर रहे हैं ।

जल के लिए ‘वय’ का प्रयोग यदि कभी होता भी था तो आगे चलकर बंद हो गया, अत: हमें इसके पीछे के चरण पर जलार्थक मूल की तलाश करनी होगी। पक्षियों के लिए इसका प्रयोग दो रूपों में क्रमशः ‘वया’ और ‘वायस’ (कौआ) के लिए रूढ़ हो गया। जरूरी नहीं है बया के घोसले को देखकर मनुष्य ने बुनने की कला सीखी हो, परंतु यह असंभव भी नहीं है। जो भी हो, बुनाई के लिए संस्कृत में वयन का प्रयोग देखने में आता है जो वाया पक्षी से ही प्रेरित है और बुनकर के लिए ‘वाय’ या ‘वासोवाय’ शब्द प्रचलित रहा है (वासोवायोऽवीनां वासांसि मर्मृजत्,10.26.6) ।

‘वय’ ‘वी’ का संप्रसारित रूप है। शब्दकोश में दिया गया ‘वी’ का अर्थ है चलाना, हिलाना, पहुंचना, व्याप्त होना, लाना, ले जाना, फेंकना, खाना, उपभोग करना, प्राप्त करना, धारण करना और चमकना सुंदर बनाना। यदि इन सभी आशयों को कोई पदार्थ समाहित कर सकता है तो वह है जल और वही अर्थ कोश मैं गायब है। यद्यपि जल तरंग के लिए वीचि उपलब्ध है।
‘वी’ का अर्थ पक्षी भी है ,(वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्, 1.25.7) आकाश (विहंगम – आकाशचारी; ‘पश्योदग्र प्लुतत्वात् वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति’,कालिदास )

जलार्थक वी सेः वीतं – भक्षयतं 1.93.7; 7.68.1; होमाय आनीतं,, 1.162.15; कान्तं, 4.7.6; वीतपृष्ठः – सुष्ठु पोषणेन प्राप्तपष्चाद्भागः कान्तपृष्ठो वा, 1.162.7; 1.181.2; वीतपृष्ठा – चौड़ी पीठ से युक्त, 3.35.5; 8.6.42); वीतये भक्षणार्थं; देवेभ्यो भक्षणाय, वित 1.5.5; 6.16.10 ; वीतवारास -क्रान्तबलाः, 8.46.23; वीतिहोत्रः ) प्रीतिविषयं होत्रं, 3.24.2; वीती – वीत्या कान्तेन यज्ञेन आदि का संबंध आसानी से समझा जा सकता है।

परंतु हम यहां एक अधिक उलझाने वाले विकास की तरफ ध्यान देना चाहेंगे जिसमें ‘वी’ स्वयं भी ‘ई’ का संप्रसारित रूप लगता है । ‘ई’ की चर्चा हम पहले कर आए हैं इसलिए उसके विस्तार में यहां नहीं जाएंगे । जो बात हमें चकित करती है वह है ‘वय’ का ‘वयम्’ रूप जो ‘ई’ का विस्तार, अर्थात बहुवचन के लिए उपयुक्त स्रोत प्रतीत होता है। ‘ई’ अंग्रेजी के ‘आइ’ – मैं में लक्ष्य किया जा सकता है और ‘वी’ उसके बहुवचन में उपस्थित है। संस्कृत में अहम् का द्विवचन ‘आवाम्’ है। सामान्यतः बहुवचन में व्यक्तिवाचक वचनों को छोड़कर रूपावली नियमित चलती है केवल व्यक्तिवाचक सर्वनामों में अराजकता पाई जाती है। इसका कारण मेरी समझ में नहीं आता रहा है। इस समस्या को मैंने आज से 10 से 12 साल पहले उठाया था और यह सुझाया था कि अहम का प्राचीन रूप ‘इअम्’ हो सकता है, अत्र का प्राचीन रूप इतर रहा हो सकता है। द्रविड़ भाषा- समुदाय में गिनी जाने वाली एक बोली कुरुख मैं यह और वह के लिए इतरं -अतरं आज भी चलता है । यह बहुत प्राचीन अवस्था का अवशेष लगता है जो संस्कृत में ही नहीं दूसरी द्रविड़ भाषाओं में भी सुरक्षित नहीं रह सका। इससे पहले इस समस्या को लेकर मैं उलझन में रहा हूं। परंतु आज मुझे इस विचार क्रम में ऐसा लगा कि दूसरे सभी सर्वनामों के नामकरण में जल के पर्यायों का हाथ रहा है इसलिए प्रथम पुरुष सर्वनाम का स्रोत जल का यह एकाक्षरी नाम ‘ई’ रहा है।

समस्या फिर भी बनी रह जाएगी, क्योंकि आगे ही दूसरी बोलियों वाले समुदायों के सर्वनाम का गहरा प्रभाव दिखाई देता है जो मकार और नकार का प्रयोग करता/करते था/थे और जिनके मिलने से वह सामाजिक पहचान बनी थी जिसे हम वैदिक समाज कहते हैं. परन्तु इस समय हमारे सामने उसके सूत्र स्पष्ट नहीं हैं.

Post – 2018-05-09

यशो वै सः

आप ठीक कहते है, सही पाठ ‘रसो वै सः ‘ ही है। पर एक स्थल पर मैंने पढ़ा, पहले उसके सिवा और कुछ था ही नहीं । बेचारा अकेला था। उसके जी में आया वह अपना जनन करे। इसके लिए उसने श्रम किया, तप किया और फिर जब थक कर निढाल होने के साथ पसीना पसीना हो गया अर्थात् उससे जल पैदा हुआ । ‘पजापतिर्वा इदं अग्र आसीत्। एक एव सो अकामयत स्वां प्रजाय इति सो अश्राम्यत् स तपो अतप्यत तस्मात् श्रान्तः तेपानात् आपो असृज्यन्त… ।’ शतपथ ब्रा. 6.1.3.1

मैं यह बात कई तरह से दोहराता रहता हूं कि मेरे पास प्रतिभा नहीं है, प्रतिभा उस ईश्वर में भी नही जिसे मैं सिरजनहार मानता हूँ । हाँ, श्रम करने का संकल्प और तत्परता अवश्य है । जिन लोगों से मेरा परिचय है वे सभी विचारधाराओं के लोग हैं। वे भले मेरे विचारों के कारण कोई भी राय रखें, इससे न तो खिन अनुभव करता हूं न उनसे मेरे विषय में उनके अपने विचार या अपनी विचारधारा बदलने का आग्रह करता हूं। वे मेरे लिए तब तक सम्मान के पात्र , जब तक यह विश्नवास बना रहता है कि वे प्रलोभनों और दबावों से मुक्त होकर अपने ध्येय के प्रति समर्पित हैं । विचार की भिन्नता न केवल मेरे लिए चिंता की बात नहीं है बल्कि उदार और स्वस्थ बौद्धिक पर्यावरण के लिए ज़रूरी है।

मैं केवल एक बात की शिकायत करता हूं, जिस भी विचार या मूल्य दृष्टि से वे जुड़े हों, उसकी गहराई में उतरने का, अपनी प्रतिभा के अनुसार प्रयास और क्षमता के अनुरूप परिश्रम क्यों नहीं करते। यह शिकायत इसलिए कि हमारा बौद्धिक स्तर नारेबाजी की निरंतर बढती उग्रता के अनुपात में ही उठला होता चला गया है और दुसरे देशो पर हमारी निर्भारात्ता बढ़ती चली गई है.

विषय कोई भी हो उसकी गहराई में उतरने के बाद मनुष्य उस टुच्चेपन से मुक्त हो जाता है, जिससे श्रम और कार्यनिष्ठा के अभाव में हो ही नहीं सकता । गहराई में वही उतर सकता है जो काम में ही रस लेने लगस, जिसकी सबसे बड़ी उपलब्धि अधिकाधिक गहराई उतरने की कोशिश बन जाए , बाहर से जीवन निर्वाह की अल्पतम सुवधा के अतिरिक्त कुछ लभ्य हो ही नहीं ।

इसके अभाव में वह चारों ओर उचक्कों की तरह देखता रहता है कि कहां से क्या हासिल किया जा सकता है और उसके जुगाड़ में चिंतक के रूप में ही नहीं व्यक्ति के रुप में भी टुच्चा होता चला जाता है । अल्प से बहु हासिल करने का प्रयत्न सभी अपराधों की जड़ है सभी बेचैनियों की जड़ भी। ऐसा व्यक्ति महान से महान विचारधारा से जुड़कर भी उसमें विकृत ही पैदा करेगा ।

इसलिए मेरी दृष्टि में कार्यनिष्ठा सभी तरह की क्षुद्रताओं से उबरने का एकमात्र उपाय है और इसीलिए मैं दूसरों को, यदि वे आयु में छोटे हुए तो टोकता हूं, बड़े हुए तो आग्रह करता हूं, वे अपनी परेशानी बताएं तो उपाय भी सुझाता हूं वे भले ही इसे मेरी धृष्टता समझें और बुरा मानें, कि वे अपनी संभावना की ऊंचाइयों लक पहुँचने का प्रयत्न करें । मैं कभी कभी मनस्वी समझे जाने वाले मित्रों को बिना नाम लिए झिड़कता भी हूं कि वे अपने बहुमूल्य समय का बहुत बड़ा हिस्सा मसखरेबाजी में बर्बाद कर रहे हैं बिना पूरी जानकारी के मैदान में उतर जा रहे हैं, विचारक की भूमिका से हटकर राजनीतिज्ञों के चाकरों का काम कर रहे हैं, विचार की भाषा छोड़कर आवेग और उद्वेग की भाषा मैं अपनी बात रख रहे हैं, जिसमें उनके पूर्वाग्रह तो पता चलते हैं परंतु उनका तार्किक आधार समझ में नहीं आता।

एक शिकायत यह भी रहती है कि संगठित होने के बाद अधिकांश लोग अपनी आंखों से देखना तक बंद कर देते हैं । सोचना तो बाद की बात है चिंतक समझे जाने वाले लोग तक पढ़ना नहीं जानते। सबसे अधिक शिकायत उनसे रहती है जो किसी व्यक्ति, समाज, सभ्यता या संस्कृति की भाव विभोर होकर सराहना करते हैं या भर्त्सना के लिए केवल विकृतियों की खोज या आविष्कार करते हैं और इसे इतने गर्हित रूप में पेश करते हैं मानो उससे गर्हित कुछ हो ही नहीं, और उन में आपस में इसकी ऐसी होड़ दिखाई देती है मानो किसी अन्य की विकृतियों की खोज उनकी अपनी महिमा का प्रमाण हो।

इसका केवल एक ही कारण दिखाई देता है कि गंदगी में पलने वाले कृमि और कीट अपने आनंद के लिए अपने अनुकूल पर्यावरण की तलाश में रहते हैं और वह मिल जाए तो उतने ही से संतुष्ट हो जाते हैं। नाइट्रोजन में पलने वाले कीड़े ऑक्सीजन से डरते हैं बुराइयों पर पलने वाले लोग अच्छाई से डरते हैं क्योंकि उसमें जीवित नहीं रह सकते । कम से कम मुझे ऐसे लोग जो विकृतियों के अतिरिक्त दूसरी सभी बातों की अनदेखी कर देते हैं गंदगी की तलाश करने वाले कृमियों और कीटों की तरह ही लगते हैं।

सामान्यतः विस्फोटक भाषा से मैं बचने का प्रयत्न करता हूं परंतु कभी कभी वातावरण की शुद्धि के लिए कीटनाशकों का प्रयोग भी जरूरी हो जाता है। वैचारिक स्तर पर निर्भीक विचार और निष्पक्ष आलोचना से अधिक प्रभावकारी कोई दूसरा कृमिनाशक नहीं हो सकता।

परंतु यह अधिकार मैंने इस सोच से अर्जित किया है सभी लोग हमारे देश के नागरिक होने के नाते एक विशेष ढंग से इसके प्रतिनिधि भी हैं। उनकी शक्ल ऊर्जा राष्ट्र की सकल ऊर्जा का दूसरा नाम है और उसकी किसी भी तरह की बर्बादी राष्ट्रीय संपदा की बर्बादी का ही दूसरा नाम है अपने देश की चिंता सामाजिक व्याधि, विकृति, बर्बादी की चिंता काही एक रुप है। यदि आप को अपने ही समाज के किसी हिस्से से घृणा है तो आवयविक सम्बन्ध के कारण अपने आप से भी घिना है । से किसी से घृणा करते हैं तो उन प्रवृत्तियों को बढ़ाने का भी काम करते हैं जिनके कारण आप उनसे घृणा करते हैं।

केवल निंदा और भर्त्सना के लिए की जाने वाली कोई आलोचना आलोचना होती ही नहीं, वह स्वयं लेखक या वक्ता कि पैशुनीवृत्ति की अभिव्यक्ति होती है । आलोचना किसी आलोच्य के सकारात्मक पहलुओं को स्वीकार करते हुए उसकी सीमाओं का उद्घाटन ही हो सकती है इसकी अपेक्षा है आलोच्य के प्रति सहानुभूति और उसकी सीमाओं से ऊपर उठने में उसकी सहायता की चिंता । इसकी जरूरी शर्त है, सही समझ जो केवल तटस्थता की नहीं अपितु परिश्रम और धैर्य की अपेक्षा रखती है , जो काम चोरी करने वालों के वश की बात इसलिए नहीं होती कि ऐसे लोग बौद्धिक ऐयाश होते हैं। बस भर्त्सना की प्रतियोगिता में दूसरों से बाजी मारते हुए अधिक से अधिक प्रशंसा प्राप्त करना चाहते हैं ।

यदि रसो वै सः उनकी सोच है जो तल्लीनता से काम करते हैं और उसी ने उनको आनंद भी आता है बाहर से किसी चीज के लिए अपेक्षा नहीं रह जाती तो यश के पीछे भागते हुए लोगों को अपने काम में रस मिलता ही नही. रस और यश दोनों उन्हें बाहर से चाहिए । यश के पीछे भागने वाले यशो वै सः का भी अर्थ नहीं जानते, क्योंकि अपनी अंतिम परिणति में रसो वै सः यशो वै सः है रूपांतरित हो जाता है ।

इसका एक कारण यह है कि यश का अर्थ भी जल ही है। परंतु यशो वै सः से आरंभ करने वाले जुगाड़ में अपना अधिकतम समय बर्बाद कर देने के कारण अपनी क्षमता के अनुसार अपनी संभाव्यता तक नहीं पहुंच पाते इसलिए बाजे भले बजवा लें, बाजों के शोर के बीच भी वे भीतर से खोखले अनुभव करते हैं । इनके लिए किसी ने टिन ड्रम के मुहावरे का आविष्कार किया था।आवाज की कर्कशता खोखलेपन के अनुपात में होती है। नाल्पे सुखमस्ति । भूमैव सुखम्।

सर्जना का जो चित्र हमने ऊपर रखा है उसमें परमेश्वर भी श्रम से ही, पसीने के बल से ही, एक से बहू और बहुधा होता चला जाता है अपनी प्रतिभा या शक्ति के बल पर हमारा परमेश्वर भी सृजन नहीं करता । उसने आदेश दिया, रोशनी हो रोशनी हो गई यह ऐयाशों का बहुत ताकतवर पर उतना ही डरावना ईश्वर है, यह उस परंपरा की अधूरी समझ का परिणाम अन्यथा उस परंपरा में भी लगातार परिश्रम करता है और सातवें दिन थकने पर उसको भी आराम करने की जरूरत पड़ती है। नकल हुई पर अधूरी रह गई ।

जिन लोगों को भारतीय अतीत में कुछ नहीं मिलता वे उस विरासत से इतना भी ग्रहण कर सकें तो हमारे देश की अधिकांश समस्याएं हंगामे के बिना भी हल हो जाएं। यह याद दिला दें कि श्रम करने वाला व्यक्ति टुच्चा नहीं होता । संकीर्ण नहीं होता । किसी का बुरा नहीं चाहता । जो कुछ करता है वह किसी कमी को पूरा करने के लिए करता है कमी पैदा करने के लिए नहीं करता। उसका क्षेत्र भले कोई हो ।

Post – 2018-05-08

धन और संपत्ति और जल

यव (2)

विषयांतर को छोड़ कर हम मुख्य विषय पर आएं। ‘जौ’ अनाज है तो इसका नामकरण जल के किसी पर्याय पर होना चाहिए, परंतु ऋग्वेद में और बोलियों मैं भी कोई ऐसा प्रयोग देखने में नहीं आया, जिसका अर्थ पानी प्रकाश या गति हो। यदि ऐसा है तो हमारी प्रतिज्ञा ही गलत सिद्ध होती है कि सभी खाद्य पदार्थों के नाम जल के किसी पर्याय पर आधारित है। इसलिए हमारा प्रयास होगा कि हम ‘यव’ शब्द के अर्थ को समझें और फिर यह देखें कि इसका नामकरण जल के पर्याय से कितने कदम हटकर, परंतु उसी कड़ी में, है।

यव का प्रयोग दो रूपों में आया है – ‘यवस’ और ‘यव’। पहले का प्रयोग सामान्यतः घास या चरागाह के लिए हुआ हैः ‘गावो न यवसेषु आ’, 1.91.13 (जैसे चरागाह में गोरू); ‘मृगो न यवसे’, 1.38.5, (जैसे चरागाह में वन्य पशु); बिजली की तड़क से ‘यवसादो व्यस्थिरन्,’ 1.94.11 (चरते हुए जानवर घबरा जाते हैं); इत्यादि में, ऐसा प्रयोग देखने में आता है। कुछ संदर्भों से ऐसा लगता है कि यव और यवस दोनों का प्रयोग ‘जौ’ और ‘घास’ दोनों के लिए होता था। सायण स्वयं ‘यवसस्य’ का अर्थ दो तरह से करते हैं। 1. ऋ. 2.16.8 में ‘घासेन’, और 2. ऋ.7.93.2 में ‘अन्नस्य’।

एक दूसरे स्थान पर ‘यव’ का प्रयोग खड़ी फसल के लिए हुआ लगता हैः ‘गावो यवं प्रयुता अर्यो अक्षन् ताः अपश्यं सहगोपाश्चरन्तीः।’ 10.27.8 (छुट्टा गोरू किसान की फसल चर जाते हैं, इसलिए मैंने आज उन्हें चरवाहों के साथ जाते देखा) ।

दो स्थलों पर ‘सूयवसं’ का अर्थ ‘समस्त प्रकार की औषधियों अर्थात खाद्य पदार्थों से भरा पूरा प्रदेश का आशय लिया गया हैः ‘सुप्रैतुः सूयवसो न पन्था दुर्नियन्तुः परिप्रीतो न मित्रः।’ 1.190.6 (सूयवस – शोभन अन्न युक्त); ‘अभि सूयवसं नय न नवज्वारो ध्वने, पूषन्निह क्रतुं विदः ।’ 1.42.8 (पूषा देव, अपने कर्तव्य का ध्यान रखना, हमें सस्य संपन्न -सायण ने सर्वौषधिसंपन्न का प्रयोग किया है- देश की ओर ले कर चलना। रास्ते में कोई हारी-बीमारी न हो।)

वैसे ग्रास और घास में विशेष अंतर नहीं है। जिसे ग्रसा या खाया जा सके वह ग्रास और घास है। वन्य यव और धान को वरुण प्रघास कहा ही गया है। अंग्रेजी में ग्रास का अर्थ घास है और संस्कृत में निवाला या कौर (कवल)।

‘दुरो अश्वस्य दुर इन्द्र गोरसि दुरो यवस्य वसुन इनस्पतिः ।’ 1.52.2 (इन्द्र तुम अश्वधन, गोधन, अन्नधन, खनिज धन के स्रोत (द्वार – सायण ने यहां दुर का अर्थ दाता किया है) स्वामी और पालक हो) यहां यव का अर्थ समस्त धान्य किया गया है, न कि केवल यव।

‘यव’ का शाब्दिक अर्थ है अलग करनाः ‘यावया वृक्यंवृकं यवय स्तेनमूर्म्ये,’ 10.127.6 (खूंखार भेड़िये को, और रात के समय चोरों उचक्सेकों को हमसे दूर रखना। ‘यावयत्सखः’,10.26.5 अपने मित्रों को शत्रुओं से अलग करने (बचाने) वाला।
‘सस्थावाना यवयसि त्वमेक,’ 8.37.4 (तुमने सुस्थिर लोकों -धरती और आकाश – को अकेले दम पर अलग किया है।)

ऐसी स्थिति में इसका गतिशील या प्रवहमान अर्थ करना दूर की कौड़ी प्रतीत होगा, परंतु अलग करने का ‘यव’ से क्या संबंध हो सकता है?

इस दृष्टि से उषा सूक्त का एक अर्धर्च रोचक हैः ‘यावयत् द्वेषा ऋतपा ऋतेजाः सुम्नावरी सूनृता ईरयन्ती ।’ 1.113.12 (ऋत का निर्वाह करने वाली, ऋत से उत्पन्न, पशुओं-पक्षियों की प्रेरिका, सुखदायिनी उषा द्वेषियों को मुझसे दूर करे । यहां दो तरह की गतियों का हवाला है। एक दूर भगाने की, दूसरी उड़ने ओर चलने दौड़ने को प्रेरित करने की। वास्तव में ‘यवय’ और ‘ईरय’ एक ही मूल, ‘ई’ के रूप हैं, जिसका मूल अर्थ जल था, जो ‘यह’ का बोधक बना, संप्रसारित हो कर ‘य’ बना तब भी जल का अर्थ बना रहा। दोनों एक अन्य जलार्थक ‘त/तर/त्र’ – स्थान, के प्रत्यय के रूप में जुड़ने पर ‘इत’, ‘इत्र’ (जो बाद में ‘अत्र’ बना), ‘इतर’, ‘यत्र’, ‘इतस्’/ ‘इतः’. ‘इतम्/इदं’, ‘इन्द’/ ‘इन्दु’/ ‘इन्द्र -जल की बूंद, जल, चमकने वाला, जल देने वाला, ‘इन्द्रिय’ – प्रकाश करने वाली, ज्ञान कराने वाली,’ इनार’/ ‘इन्दारा’ – कुआं, ‘ई/ ईर/इरा’/ इळा’/इला, इय (इयर्ति),ए (एति) -गति, जल(इरावती), अन्न. धरती.आदि के लिए शब्दों का जनन करती है और इसका संप्रसारित रूप ‘य’ (ज) जिसका ‘यव’ और ‘जव/जौ’ – से संबंध भी अन्न, जल, गति. वेग, आदि के लिए प्रयोग में आता है। जल्रार्थक हीनार्थक का भी बोधक है इसलिए यह स्त्रीलिंग और लघुता सूचक प्रत्यय तो बनता ही है, गुण और स्वभाव आदि से जुड़ी विशेषता का भी प्रत्यय बनता है जिसके लिए सं. में -‘-इन्’ और हिंदी में ‘-ई’ प्रत्यय (विधर्मी, अधिकारी, कमी) का विधान है।

अब इस पृष्ठभूमि में हम केवल ‘य’ से निकली और ऋग्वेद में उपलब्ध शब्दावली पर दृष्टिपात कर सकते हैंः

ययिं – गतिमन्तं मेघं, 1.87.2
यय्यं – गन्तारं , 2.37.5
यवसं – तृणादिकं; 3.45.3), ओषध्यादिलक्षणमन्नं 7.102.1
यवसस्य – अन्नस्य, 7.93.2
यवसे – घासे विसृष्टः 6.2.9; घासे प्रक्षिप्ते सति, 7.87.2
यविष्ठ = युवतम, 1.26.2; 2.6.6
यव्यं – ब्रीहिजवादिकं, 1.140.13
जवनी सूनृतारुहत् , 1.51.2
जवनी- प्रेरयित्री 1.51.2
रथेन मनोजवसा – मनोवेग से चलने वाले 1.117.15
श्येनस्य जवसा1. 118.11
धीजवना नासत्या – बुद्धि को प्रेरित करनेवाले अश्विनीकुमार 8.5.35