Post – 2016-03-23

मेरे टाइम लाइन पर किसी भी व्‍यक्ति, दल, विचारधारा के विषय में अशिष्‍ट या अशालीन भाषा में कोई टिप्‍प्‍ाणी न करे। ऐसा करके आप मुझे अपमानित करते हैं उन्‍हें नहीं।

Post – 2016-03-22

. हिन्दी का भविष्य (१४)

“देखो, तुम स्वप्नजीवी हो। जागते हुए भी सपने देखते रहते हो। यह नहीं समझ पाते कि गणित के िनयम समाजशास्त्र में फेल कर जाते हैं।”

“सूत्र साहित्य का अध्ययन कर रहे हो शायद । अपने कथन का भाष्य करो तो कुछ पल्ले भी पड़े।”

“तुम यह नहीं देख पाते कि दुनिया को ईश्वर नहीं चलाता, उँगलियों पर गिने जाने वाले कुछ लोग चलाते हैं, जिन्होंने किसी न किसी फितरत से संपत्ति के साधनों पर कब्जा कर रखा है और वे तुम जैसे बुद्धिजीवियों को खरीदने के तरीके जानते हैं।”

“जो बिकना ही न चाहे उसे कौन खरीद सकता है, यार! जिसे धन, पद, प्रतिष्ठा किसी का लोभ न हो उसे खरीदने वाला तो अभी न पैदा हुआ, न आगे होगा।”

उसने जोर का ठहाका लगाया, “जो बिकने को तैयार रहते हैं, यहाँ तक कि जो गले में ‘फार सेल’ की तख्ती लटकाए घूमते हैं, उनको गाहक भी आसानी से नहीं मिलते यह तो बेकारों की कतार की लंबाई से ही समझ सकते हो। जो बिकना नहीं चाहता उस पर खरीदने वालों की खास नजर रहती है। वह जो दुर्लभ है वह उनके पास होना चाहिए। वह तो अमोलक हीरा है। जो दाम से नहीं खरीदा जा सकता उसे दान से खरीद लेंगे, संदान से खरीद लेंगे।‘’

‘’कम्युमनिस्टा हो, श्रमदान को संदान बोल रहे हो शायद।‘’

‘’श्रमदान नही संदान ही बोल रहा हूँ। संदान का मतलब कहीं मुक्तहस्त
दान न समझ लेना, इसका मतलब जानवर को कब्जे में करने की वह रसरी है जिससे वह छूटना चाहे तो तड़प उठे। इसे हिन्दी में नकेल कहते हैं और जानते हो गले की रस्सी से. पॉंव छानने के फन्दे और मुँह बॉंधने की जाबी और पूँछ के नीचे की रस्सी इन सभी का इन्तजाम उनके लिए है जो दाम से काबू में नहीं आते। समझ में आया, जिन्हें दाम की तलाश होती है वे इंसान होते हैं, और जो दाम की ताकत को नहीं जानते वे इन्सानों से उूपर उठने की कोशिश में इंसान नहीं रह जाते, कुछ और हो जाते है और उन्हें दान के संदान से काबू किया जाता है।
“जानते हो, अपने को अनमोल और सभी तरह की बोलियों से उूपर समझने वालों को पैसे वाले सचमुच बिना मोल खरीद लेते हैं। उसके अहं की तुष्टि करके, उसके आगे माथा रगड़ कर। आप महान हो जी, कहते हुए वे सोचते हैं पर बोलते नहीं, उल्लू अलग से क्योंकि सब को कुछ न कुछ चाहिए, आप सेतमेत बिकने को तैयार, पर बाजार से दूर अकड़े बैठे हो।‘’

मैं चाकचिक्य भाव से उसे निहार रहा था। इसकी जिह्वा पर क्याे सचमुच सरस्व ती विराजमान हो गई हैं। वह अपनी रौ में था। मेरी ओर उसका ध्याान ही नहीं था। वह इस समय पूरे जमाने से बातें कर रहा था।

‘’वे कुछ नहीं करेंगे। तुम्हारे सामने सिर रगड़ कर चले जाएंगे। तुम समझोगे तुम्हारा कुछ बना बिगड़ा ही नहीं और पूरी दुनिया को पता हो जाएगा कि तुम्हारा उपयोग कर लिया गया। और सुनो, जिस समय वह तुम्हारे सामने माथा रगड़ रहा था उस समय यदि तुमने उसे इससे विरत करने के लिए उसके सिर पर पॉंवों से ठोकर भी मार देते तो भी अपने को बिकने से बचा नहीं सकते थे। वह तुम्हारी इस चोट पर मुस्कदराता हुआ, भगवन आपके पॉवों को चोट तो न आई, कहता हुआ तुम्हारा दासानुदासवत उपयोग करने में सक्षम हो जाता। बुद्धिजीवियों के साथ सदा से यही हुआ है। खरीदने वालों के सामने दुनिया का बड़ा से बड़ा बुद्धिजीवी दिमाग से कोरा साबित होता है। ”

मुझे हैरानी हो रही थी कि नारे लगाने वाला यह आदमी सोचने कब से लगा। भीतर से खुश था कि मेरी संगत का इतना असर तो हुआ। पूछा, “तुमने एक झटके में इतनी लम्बी छलांग लगाई है कि मैं तो सोच कर हैरान हूँ कि तुम्हारा दिमाग सही हुआ कैसे? पार्टी से नाता तोड़ लिया क्या?”

“पार्टी से नाता क्यों तोड़ूँगा। तुम्हारी तरह ढुलमुल हूँ ? कल एक शास्त्री जी मिल गए थे। बड़े गुस्से में थे। तुम लोगों को बहुत गालियाँ दे रहे थे।”

“तुम लोगों का मतलब ?”

“क्षत्रियों को । और तुमको तो खास तौर से। तुम्हीं ने ‘अपने अपने राम ‘ लिखा है न। उसे पढ़ कर इतने उत्तेजित थे कि कभी चेहरा लाल होता, कभी सॉंवला पड़ जाता और सच मानो, कभी इतना काला कि लगता वह जल कर कोयले में बदल गए हैं। कह रहे थे हमारी कमाई हुई जमीन पर बाहुबल से कब्‍जा करके इन्होंने हजारों साल से हमें लगातार बेवकूफ बनाया, दर दर का भिखारी बना कर छोड़ दिया और ताली बजाते रहे, क्या त्याग, क्या तपस्या।, ‘चरणों की धूल मिल जाय वही माथे लगा लें’, और हमारे पुरखे अपने ही मुख से ‘बाभन को धन केवल भिक्षा’ और ‘ न वै ब्राह्मणाय श्री रमते’ गाते हुए झूमते दर दर की ठोकरें खाते रहे। हम अपने को ज्ञानी मान कर खुश थे जब कि हमारा उपयोग वे कर रहे थे जिन्होंने लाठी के बल पर जमीन पर कब्जा् कर लिया था। सोचते हम थे, काम उनके आता था।

‘’उन्हीं का कहना था कि सोचने वाला सबसे बड़ा बेवकूफ होता है। वह चाहे आइंस्टााइन ही क्यों न हो। बम का फार्मूला उसका सोचा हुआ, इस्तेमाल करने वाले उसका और उसके फार्मूले का इस्तेमाल कर ले गए और वह चीखता ही रह गया, मैंने इसके लिए तो नहीं दिया था यह मन्त्र । अब तुम बताओ, जो इस्तेमाल कर लिया जाता है वह ज्यादे समझदार हुआ या वह जो उसका इस्तेमाल कर लेता है। इसलिए वह कह रहे थे विचार से काम मत लो, हथियार उठाओ।‘’

‘’और फिर भी तुम इतने मूर्ख निकले कि हथियार लिए बिना ही चले आए। हथियार उठाने वालों को हमारे यहॉं क्या कहा जाता रहा है जानते हो। उद्दंड। शास्त्री जी का विचार तुम्हें इसलिए पसन्द आ गया कि तुम लोग भी उद्दंड हो। पर पूरी दुनिया में फेल इसलिए भी हो गए कि डंडा हवा और पानी को तोड़ नहीं सकता और वे इसे भी तोड़ने चल पड़े थे।

”जिसे तुम क्रान्ति कहते हो उसे हमारे यहॉं उपद्रव कहा जाता रहा है और कारण मैंने बहुत पहले बता दिया था कि यदि एक साथ किसी भी प्रकार की अपार उूर्जा का उृत्सर्जन हो जिसे नियन्त्रित करने की युक्ति का विकास नहीं किया गया है तो वह विनाशकारी होगी, वह उपद्रव का ही एक रूप होगी। जिसे तुम एक झटके में उूपर उठना या भाग्य परिवर्तन कहते हो, उसे हमारे यहॉं उद्वेग कहा जाता रहा है। इसके लिए जो क्रिया की जाती थी उसे उत्पापत कहा जाता था। तुम मुझे किसी सपने से जगाना चाहते थे या जागना, सोचना विचारना व्यर्थ है, यह समझा कर सो जाने और बिना कुछ किए सपनों में खोने की लोरी सुना रहे थे ?’’

आज वह जोश से भरा था। हार मानने की तो उसकी आदत ही न थी। बोला, ‘’देखो, तुम जो यह सोचते हो कि किसी दिन तुम्हारी योजना किसी व्यक्ति या दल की समझ में आ जाएगी और वह इसको एक बड़ा मुद्दा मान कर आन्दोलन छेड़ देगी और तुम्हारा सपना सचाई में बदल जाएगा, तो यह समझो कि सताए हुए लोगों के संख्याबल से इतिहास बदल सकता तो कम से कम सभी लोकतांत्रिक देशों में समाजवाद तो आ ही गया होता। आया कहीं ?’’

‘’नहीं आया, न जैसा मैंने कहा, अपने चरण से पहले आ सकता है। आएगा, जब पूँजीवाद अपनी सर्जनात्मकता खो देगा, भीतर से खोखला हो जाएगा, वह केवल उत्पीड़न का साधन बन जाएगा। उसके बाद भी जिनके हाथ में हथियार हैं जो हथियार के ही कारोबार को सबसे अच्छा व्यापार समझते हैं, वे हथियार के बल पर दूसरों का विनाश करते हुए पूँजीवाद को बचाना चाहेंगे, पर सब कुछ बेकार जाएगा। जब संस्था या व्यवस्था भीतर से निसत्व हो जाती है तो हथियार बनाने वाले हाथ बेजान हो जाते हैं, हथियार उठाने वाला हाथ और दिमाग सुन्न हो जाता है।

‘’जहॉं तक भाषा का प्रश्न है, अंग्रेजी की सर्जनात्मकता चुक गई है, इसने ऐसा एक भी दिमाग नहीं पैदा किया जो अपनी मात़ृषाओं के माध्यम से शिक्षित होते हुए पुरानी शिक्षा प्रणाली के हमारे चिन्तकों की समकक्षता में आ सकें। हमें ज्ञान, विज्ञान, समाजदर्शन, साहित्य सभी क्षेत्रों में दृष्टान्त के लिए उस जमाने के लोगों को याद करना होता है। क्यों ? क्योंकि अंग्रेजी के वर्चस्व् वाली इस शिक्षाप्रणाली ने हमें भीतर से नि:सत्व कर दिया है। अब यदि तुम्हेंं नोबेल मिलता है तो यह प्रमाणित करने के लिए कि भारत एक पिछड़ा देश है जिसमें बाल मजदूरों से काम लिया जाता है इसलिए वहॉं का माल आयात करना बालकों के प्रति क्रूरता को बढ़ावा देना है। पाकिस्तान को इसलिए कि यह दिखाया जा सके कि वहॉं लड़कियों को शिक्षा से वंचित करने के लिए किस सीमा तक क्रूरता बरती जाती है, किसी महान आविष्कार या चिन्तन या अनुपम उपलब्धि के लिए नहीं।”

‘’बड़े गावदी हो यार। क्या तुम इस सचाई से भी इन्का्र करते हो कि भारत में आज तक बाल श्रम जारी है और पाकिस्ता्न में स्त्रियों की शिक्षा को हतोत्साहित किया जाता है?‘’

‘’इन्कार नहीं करता, बल्कि यह बताता हूँ कि यह भी अंग्रेजी में शिक्षा का ही परिणाम है। यह शिक्षा उन कोनों, दरबों, स्तरों तक पहुँच नहीं सकती जिनमें सड़ने वाले लोग अपने बच्चों को पढ़ाऍं तो भी पढ़ा नहीं सकते इसलिए मैदान में उतरते ही जंग हार जाते हैं। वे जानते हैं कि इस देश में जहॉं अंग्रेजी का वर्चस्व है, वे लाख जतन करे, शिक्षा में आगे नहीं बढ़ सकते। अन्त में जिन्दा रहने के लिए वही काम करना पड़ेगा जो अब तक करते आए हैं। पाकिस्तान की बात अलग है और पूरे पाकिस्तान में यह स्थिति नहीं है। मैं उसके बारे में इतना कम जानता हूँ कि कुछ कहना नासमझी होगी, फिर भी इस सन्देश को पढ़ना कठिन नहीं है कि इन दोनों का साहस और त्यााग से, दृढ़ संकल्पन से जितना भी संबंध हो, असाधारण बौद्धिक उत्कर्ष से कदापि नहीं। उल्टे यह बौद्धिक खालीपन का दस्तावेज है और इसके पीछे है अंग्रेजी की वरीयता जिसने हमें बड़े सपने देखने तक से वंचित कर रखा है।

‘’तुम अपनी जिस महरी की बात कर रहे थे, उसकी तड़प को देखो। वह बिना कुछ बोले चीख रही थी कि हमें अपनी संतानों को अपनी दशा में नहीं रखना है। इसके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। और फिर इस माध्य म के कारण उसकी थकान और पराजय की कल्पना करो। अंग्रेजी के साथ वह ऐतिहासिक चरण आ गया है जहॉं इसने उपनिवेशों या कहो उन देशों के लिए अपनी नि:सारता प्रमाणित कर दी है कि इससे देश का वर्तमान बदहाली की दिशा में बढता आया है और भविष्य में यह इस शिक्षा और ज्ञान व्यवस्थाा के बल पर चल नहीं सकता । वह निर्वात उसने अपने आप तैयार किया है और आवश्यकता इसे भरने वाली एक पहल की है। 22.3.2016

Post – 2016-03-19

हिन्दी का भविष्य (१३)

“तुम भाषा पर बात करते हुए सभ्यता पर पहुँच जाते हो, सभ्यता से उछल कर धर्म चर्चा करने लगते हो, तुमसे किसी बात पर चर्चा की जा सकती है?”

“बातचीत भी अगर क्लास लेक्चर की तरह होने लगे तब तो परीक्षा प्रणाली पर भी विचार करना होगा । तुम्हें तो यह भी भूल गया कि इस भटकाव की जिम्मेदारी भी तुम्हीं पर आती है। तुमने अंग्रेजी के विस्तारवाद की हिमायत करते हुए स्वयं मेरे किसी अन्य सन्दर्भ में ट्वायन्बी के जुमले जड़ दिए और वह भी यह भूलते हुए कि वहीं पणिक्कर के हवाले से मैंने इस सर्वग्रासी विस्तार की निस्सारता को भी रेखांकित किया था।
मुझे बीच बीच में तुम्हें यह याद दिलाना भी जरूरी लगता है कि विदेशी भाषा तो हमारे काम की है ही नहीं, उसमें उपलब्ध ज्ञान-भंडार भी हमारे काम का नहीं होता। यह भी याद दिलाना चाहता था कि जो समाज अपनी भाषा में काम नहीं करता, वह अपने ज्ञान का उत्पादन भी नहीं कर सकता। वह याचक बना रहेगा और इसी पर गर्व करेगा। साथ ही यह भी कि परायी भाषा में तुम्हारे द्वारा उत्पादित ज्ञान भी घटिया स्तर का होता है, क्योंकि परायी भाषा को साधने में ही तुम्हारी अपार बौद्धिक ऊर्जा बर्वाद हो जाती है और तुम यह आतंक पैदा करने में भले सफल हो जाओ कि ज्ञान का अकूत भंडार जिस भाषा में भरा पड़ा है उस तक सीधी पहुँच के कारण तुम्हारी जानकारी भी उनसे अच्छी होगी जो उस भाषा को धड़ल्ले से बोल और लिख नहीं पाते, परन्तु तुम्हारी दुर्गति का हाल होगा कि तुम यह तक नहीं जान पाओगे कि तुम्हारी मातृभाषा में क्या लिखा जा रहा है या दूसरी भारतीय भाषाओं में क्या लिखा जा रहा है। उसे जानने के लिए तुम उसके अंग्रेजी में अनूदित होने की घड़ी तक प्रतीक्षा करोगे। तुम्हारी यह जानने में कोई रुचि शायद ही रह जाय कि तुम्हारे देशज ज्ञानमंडार में पहले से क्या सुलभ है, या तुम्हारे आसपास के लोग कैसे रहते हैं, क्या सोचते हैं, किन समस्याओं का सामना कर रहे हैं । और अंग्रेजी में जो कुछ तुमने पढ़ा है और जिसके गरूर में तुम्हारी गर्दन की अकड़ से सर्वाइकल स्पांडेलाइसिस का भरम होने लगता है वह उस साहित्य और ज्ञानसंपदा का अहोअहोवादी पाठ होगा जो दिमाग को काठगोदाग बना देता है पर मन्थन का कठाला नहीं।
यह उन कारणों में से एक है कि पाश्चात्य मान्यताओं को बदलने या समृद्ध करने में हमारा कोई योगदान नहीं है। अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखक या बिलायती काट की रचना अपनी भाषा में करने वाले लेखक भारत में अंग्रेजी के बाजार भाव के कारण कीमती ही नहीं, कभी कभी दुर्लभ होने तक का भरम भले पैदा कर लें, पर जिस भाषा में वे लिखते हैं उन देशों में उनको अपने काम का समझ कर रियायत दी जाती है, महत्व नहीं।
पुरस्कारों पर मत जाना, ये उपयोगी मान कर दिए गए चारे हैं, जो पालतू बनाए रखने के लिए बहुत सूझ-बूझ से दिए जाते हैं और इनके पीछे कई तरह के सन्देश होते हैं और उन संदेशों की कई तरह की अन्तसर्ध्वंनियॉं होती हैं जिनका विविध स्तरों पर कूटनीतिक से लेकर हाय बेचारे ऐसे हैं, इतने जाहिल, इतने पिछड़े इतने भ्रष्ट और इनका एक उपयोग मिशनरी फंडिंग के लिए भी होता है। इन बेचारों के उद्धार के लिए कुछ करना जरूरी है और जो उद्धार में जुटे हुए हैं उनकी मॉंगे पूरी करना ईसाइयत के लिए न सही मानवीयता के लिए जरूरी है।
वे केवल सामाजिक नृतत्व के उन पहलुओं को उभारते हुए लिखी गई साहित्‍य सर्जना या पत्रकारिता होती है जिसे पिछड़ेपन और गिरावट से अलग कुछ दिखाई नहीं देता। यदि अधिक उत्तेजक वर्तमान में नहीं मिलता तो अतीत से निकाल कर बताओ कि कभी ये इतने गर्हित थे और इसे समय काटने के लिए शिथिल क्षणों में पढ़ने वाले मान लेंगे कि ये आज भी ऐसे हैं। इससे यूरोपीय श्रेष्‍ठताबोध को खूराक मिलती है और आप को अकूत सराहना जो एक कृति के रूप में उसे नहीं मिल सकती।
सती प्रथा कब की खत्म हो गई और उसके प्रति श्रद्धा निवेदन तक को अपराध बना दिया गया, पर फायर बननी चाहिए, इसलिए भारतीय भाषा में नहीं अंग्रेजी में बननी चाहिए। देवदासी प्रथा उसी का पाठान्तर था और ये दोनों उस बंगाल से जुड़ी थीं जो कई मामलों में आत्मनिरीक्षण करने से कतराता रहा है, पर वाटर बननी चाहिए, क्योंकि पश्चिम में इसका बाजार है, सत्कांर है और भारत में भी अंग्रेजी दिमाग वालों को इस पर आपत्ति करने वाले जाहिल लगने लगते हैं।

आज जब सभी मतों, संप्रदायों, वर्णों और जातियों के विपन्न और तिरस्कृत लोगों को यह चेतने का समय है कि जहॉं प्राणरक्षा तक समस्या है वहॉं अंग्रेजी सीखना उनके लिए असंभव है और इसलिए उनको उस भाषा की अस्मिता के लिए लड़ना है, उसके सशक्तीवकरण के लिए एकजुट होना है जिसके बिना उनके आगे के रास्ते टुकड़े बीनने और गिनने से आगे नहीं जा सकते। चालाक लोग जघन्य तरीकों से इतिहास में से कहानियों के एकलब्य और शंबूक और संविधान के आने के साथ ही अभिलेखागार की वस्तु बना दिए गए ग्रन्थों को उन तबकों के मेधावी तरुणों को ऑंखों के सामने आग के अक्षरों में पेश करते हुए उनकी उूर्जा को नष्टं करने और पूरे समाज को पीछे ले जाने वाले उपद्रवों का हिस्साे बनाने में सफल होते हैं और हमारे बुद्धिजीवियों के बौद्धिक बधियाकरण का यह हाल कि वे इन्हें क्रान्तिकारी कदम बताने के तरीके और तर्कजाल तैयार करने लगते है – मंच से ले कर मचिया तक इस्तेिमाल किए जा रहे जज्बातती छोकरों को अपराधी सिद्ध करने या बचाने के पक्ष विपक्ष में बहस करते दिखाई देते हैं। बौद्धिक बधियाकरण के ऐसे आश्चर्यजनक नमूने हमारे समाज में इसलिए उजागर हो रहे हैं क्योंकि इसका सोचने का नाटक करने वाला और विचारों का प्रचार करने वाला तन्त्र अंग्ररेजी जानता है पर अपने देश को नहीं जानता, अपने आप को नहीं जानता, उन खतरों को नहीं जानता जिनसे खेलने के लिए भी उनकी पहचान जरूरी है। यह इस बात का भी मानदंड हो सकता है कि अंगरेजी हमें समझदार बनाती है या हितबद्ध
और दुर्भाग्य से शिक्षा और ज्ञान की भाषा अंग्रेजी बना दी जाने के कारण, इन स्रोतों पर पलने और इनसे ही अभिज्ञ होने वाले अपनी शिथिलता में मान लेते हैं कि जब इतने समझदार लोग ऐसा कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। इस दबाव में अनपढ़ नहीं आता और इसलिए परीक्षा की घडि़यों में वह इन बधिया विचारकों को चकित करते हुए अपने निर्णय देता है और तब इनकी समझ में आता है कि वे गलत थे, अनपढ़ भारत सही था।

जहाँ तक भारतीय बोलियों में अंग्रेजी के शब्दों के प्रवेश की बात है, वह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यदि अंग्रेजी शिक्षा को भारतीय भाषाओं से अधिक महत्व दिया जाएगा, लोग शैशव से ही अपनी संतान को शिक्षित करने के नाम पर उसके शब्द, अंक आदि सिखाने और एक खास अर्थ में उन्हें उत्पीड़ित करने लगेंगे और उनकी प्रतिभा का विकास करने की जगह उनको रट्टू तोता बनाना आरम्भ करेंगे। शिशु को सबसे पहले नाते रिश्ते के लोगों से पाला पड़ता है अतः ऐसे परिवारों में और उनके माध्यम से दूसरों के बीच भी इनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी। यही क्रम संख्या और दिनों, महीनों के नाम के मामले में बना रहेगा। ज्ञान या शिक्षा की भाषा बदलते ही स्थिति उलट जाएगी। कहो, यह अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण नहीं है, अपितु हमारे द्वारा स्वयं अपनी भाषाओं की उपेक्षा के कारण है।

पहली बात यह समझो कि अंग्रेजी से मुझे कोई दुराव नहीं है, प्रश्न है कि क्या हम उसे पूरे देश की बोलचाल की, सामान्य व्‍यवहार की भाषा बना सकते हैं। नहीं। भाषा का निर्णय समाज का विपन्न वर्ग करता है। बाजार की भाषा न कि पंडितों की भाषा को किसी क्षेत्र की भाषा माना जाता है। यदि किसी चमत्कार वश समस्त भारतीयों का आर्थिक स्तर ऐसा होता कि वे सभी उन कारोबारी शिक्षा संस्थानों में समान स्तर पर भरती हो कर अंग्रेजी सीख पाते और आर्थिक स्तरों के अनुसार अंग्रेजियॉं न होतीं, बिकाउू माल की सड़ी गली से लेकर ताजी और बासी और खरी और खोटी के अनगिनत स्टाल न लगे होते, तो अंग्रेजी से अभिभूत यह देश कभी का समग्रत: अंग्रेजी भाषी बन चुका होता । भारतीय भाषाओं को विपन्नों ने बचा रखा है, संपन्न लोग तो उसे कभी के छोड़ चुके हैं।
रहीम का वह दोहा याद है
सर सूखे पंछी उड़ें औरे सरहिं समाहिं।
दीन मीन बिनु पंख के कहु रहीम कित जाहिं।
पंख वाले उड़ कर अंग्रेजी के सरोवर में बहुत पहले से बिहार करने पहुँचने लगे थे। याद है बिग बी अर्थात् तेल बेचने वाले बच्चन के पिता छोटे बी अर्थात् हरिवंशराय ने जो हर हिन्‍दी भाषी की जबान पर चढ़ना चाहते थे, अपनी संतानों को अंगेजी के हवाले कर दिया और इतने बड़े कवि के इस चुनाव ने पैदा किया तेलमालिश करने वाला पैसे का भूखा कलाबिक्रयी, जो काम हिन्दीे के कवि छोटे बी अर्थात् हरिवंशराय बच्चेन कभी नहीं कर सकते थे। हिन्दी ने हमें एक स्वा्भिमानी कवि दिया था और अंग्रेजी ने उसकी संतान को कलाकार तो बनाया पर तेलमालिश करने की गिरावट तक पहुँचा दिया।

हमें अपना सम्मान तो चाहिए ही, यह समझ भी होनी चाहिए कि भाषा को एक अर्थशास्त्रीय मिट्टी, खाद और पानी ही नहीं पर्यावरण भी अपेक्षित होता है। नागरिकों की सभी विशिष्टाताओं से निरपेक्ष समानता का गीत गाने और अवसर की समानता का दम भरने के लिए सभी को एक भाषा सुलभ कराओ, वह अंग्रेजी ही क्यों न हो, मुझे आपत्ति नहीं। इसके लिए आर्थिक समीकरण या अभावग्रस्त,, स्वा्वलम्बी और सुविधासम्पनन्न के आर्थिक भेद को मिटाना होगा। वह तुम कर नहीं सकते इसलिए अल्पतम समाधान यह है कि हमारी भाषाओं की खोई हुई गरिमा को बहाल करो, इनके ज्ञान और अवसर की पराकाष्ठाओ तक पहुँचने का रास्ता खोलो, जो अंग्रेजी के वर्चस्ब के रहते संभव नहीं और यह अंग्रेजीप्रेस और उससे हितबद्ध लोग है जो हमारे ओजस्वी तरुणों को वर्तमान से उठा कर इतिहास में फेक दे रहे हैं और वे इस साजिश को समझ तक नहीं पा रहे है। लम्बी है भ्रम की रात मगर रात ही तो है।

Post – 2016-03-16

हिन्दी का भविष्य (१२)

“तुम केवल उतनी बात समझते और याद रखते हो जिससे तुम अपनी मान्यता पर अड़े रह सको। मैंने जब ट्वाएन्बी की बात की थी तो यह भी कहा था कि वह ईसाइयत से आसक्त थे और इसके कारण उनका सभ्यता-विमर्श गड़बड़ हो गया, यह आलोचना उनके महाग्रन्थ के प्रकाशन के बाद ही आने लगी थी। उनकी पहली नासमझी तो यह थी कि वह धर्म को सभ्यता मान बैठे और उन धर्मों की जीवन्तता की बात करने लगे जो अपने विस्तार के लिए हिंसा का सहारा लेते रहे हैं और जिनका कोई दार्शनिक आधार नहीं ह़ै इसलिए जो विश्वास या फेथ पर आधारित हैं। हिंसा और अतर्क्यता दोनों सभ्यता द्रोही हैं और इसलिए हिन्दू धर्म में आत्मनिरीक्षण, समायोजन, परिवर्तन और पुनराविष्कार की इतनी क्षमता है कि आए दिन नई व्‍याख्‍यायें और आन्‍दोलन जगह पाते रहते हैं। बिना किसी के साथ छेड़छाड़ किए भी यह इतना शक्तिशाली लगता है कि इसके संपर्क में आने वाले सामी विश्वास के लोगों को घबराहट होती है कि यह हमारी मूल्य व्यवस्था को बदल कर पूरा का पूरा हजम कर जाएगा। यह दहशत ही इस बात का प्रमाण है कि मूल्यव्यवस्था के मामले में ये सभी हिन्दुत्व के सामने अपने को लचर पाते रहे हैं और इसलिए उन्होंने आत्मरक्षा के लिए प्रतिलोम मूल्यों का सहारा लिया है। हिन्दू गाता है ईश्वर अल्ला‍ तेरे नाम सबको सम्मति दे भगवान। वह अपने सर्वोपरि को दूसरे मत के सर्वोपरि देव के समकक्ष मान कर उसका भी सम्मान करता है, और यह दूसरे के मन मे बेचैनी पैदा करता है, क्योंकि यह उसके कट्टर विश्‍वास ‘ला इलाह इल अल्लाह’ या अल्लाह के अतिरिक्त कोई सर्वोच्च सत्ता है ही नहीं। फिर अल्लाह से इतर ईश्वर कैसे हो सकता है। अल्लाह, या गॉड या याह़ू अपने कबीलों के सरदार के रूप में कल्पित किए गए, क्योंकि वे उस विश्वास से जुड़े कबीलों के परमेश्वर हैं जिनके अमल में दूसरे मानव समुदाय नहीं आते, जिनकी अंतिम कसौटी अन्धविश्वास है, न कि नैतिक आधार, जिस दशा में किसी भी धर्म या विश्वास का असाधारण प्रतिभाशाली या सदाचारी या लोकोपकारी व्‍यक्ति सम्मान का अधिकारी हो पाता। इसी तर्क से ‘ला इलाह इल अल्लाह’ में अंधविश्वास रखने वाले मुहम्मद अली ने अल्ला ईश्वर तेरे नाम का पाठ पढ़ाने वाले गॉंधी को गिरे से गिरे हुए मुस्लिम से हेय बताया था और इस पर आपत्ति करने वालों को गांधी जी ने रोक दिया था। वह जानते थे कि एक सच्चा मुसलमान होने के नाते वह इसके अतिरिक्त कुछ कह ही नहीं सकते थे। मुसलमान मुसलमान होने के कारण अपनी सारी बुराइयों के बाद भी अल्लाह का बन्दा है, जो उस अल्लाह में यकीन नहीं करते और इसलिए इस कबीलाई सल्तनत से बाहर हैं और इसलिए शैतान के असर में हैं, और अपनी समस्त अच्छाइयों के बाद भी गांधी शैतान के असर में होने के कारण अल्लाह के गुनहगार बन्दे की बराबरी पर कैसे आ सकते थे।

” यहाँ यह याद दिला दें कि मुहम्मद अली और शौकत अली अनपढ़ धर्मान्ध नहीं थे। नेहरू, गॉंधी आदि की तरह उन्होंने भी विलायत में शिक्षा प्राप्त की थी और प्रभावशाली इतने थे कि कहते हैं उनके कहने पर ही मुहम्मंद हबीब ने इतिहास की ओर रुख किया था क्योंकि इसी के माध्यम से कौमों के दिमाग को काबू में रखा जा सकता और इच्छित दिशा में चलाया जा सकता है और केवल परिस्थिति जन्य प्रमाण के आधार पर हम इस नतीजे पर पहुँच सके कि उन्‍होंने ही बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से निष्कासित और तुनुक मिजाज कोसंबी को गणित के क्षेत्र से इतिहास की ओर मोड़ने और ब्राह्मणवाद के विरोध की आड़ में ब्राह्मणों पर, प्राचीन भारत के इतिहास पर, जड़ें खोदने वाली लगन से, काम करने को प्रेरित किया था।

यहॉं मैं जिस बात को रेखांकित करना चाहता हूँ, वह यह कि इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि असाधारण पांडित्य भी धार्मिक या मतवादी पूर्वाग्रहों से हमारे विश्‍लेषण को मुक्त नहीं कर पाता और जिस दहशत में उन्नीेसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में मिशनरियों ने हंगामा मचाया था कि कंपनी के अधिकारी हिन्दू होते जो रहे हैं और जिसके कारण कुछ, मिसाल के लिए ऋग्वेद के अनुवादक एच.एच. विल्सन, के प्रति संदेह इतना गहरा था कि यह प्रचारित किया जाता था कि वह कहने को ईसाई है परन्तु हिन्दू हो चुका है और छिपा कर जनेउू पहनता है।

ऐसे अंग्रेज उस समय थे जो हिन्दू मूल्यों और शास्त्रों से परिचित होने के बाद ईसाई प्रचारकों को गाली देते हुए कहते थे कि यह समाज हम से अधिक सुसंस्कृत रहा है और यह अपने मूल्यों के मामले में आज भी हमसे आगे है और इसे ईसाइयत की जरूरत नहीं। मैक्नााटेन ने इन प्रचारकों के लिए these ignorant and bigoted missionaries के विशेषण का प्रयोग किया था। आत्मरक्षा की चिन्ता और अपनी श्रेष्ठता को कायम रखने की जिद से इन मिशनरियों की रपटों को ही आधार बना कर और देश देशान्तर से नमूने जुटा कर उस अग्रता को नकारने के दृढ़ संकल्प के साथ जेम्स मिल ने अपना इतिहास लिखा था और ट्वाएन्बी भले उनसे ढाई सौ साल बाद के इतिहासकार हों, दोनों का मिजाज एक है और ट्वाएन्बी अपने बृहदाकार ग्रन्थ के बाद भी भारतीय इतिहास के मामले में जेम्स, मिल के सामने छोटे दिखाई देते हैं और इसलिए मिल से कुछ कम विक्षिप्त, परन्तु अपने निष्कर्षो में निहायत सतही।‘’

‘’तुम्हें सुनते हुए मैं सोच रहा था कि जैसे मुहम्मद अली पर इस्लाम, मिल और ट्वाएन्बी पर ईसाई पूर्वाग्रह उनके निर्णयों को प्रभावित कर रहे थे, उसी तरह हिन्दुत्व के प्रति तुम्हारी आसक्ति क्या तुम्हारे तर्कों, प्रमाणों और निष्कर्षों को प्रभावित न कर रही होगी।‘’

‘’तुमने तो अपने बारे में मेरी समझ ही बदल दी। पहले तुम्हें कमाल की चीज़ समझता था, तुम तो कमाल के आदमी निकले। फिर भी आधे अधूरे ही, क्योंकि तुमने मेरी इस आशंका को इतने बाद मुखर किया पर अहसमति का कारण और प्रमाण नहीं दिया। मैं इतने लंबे समय से यह संकेत देता आ रहा हूँ कि मेरी बात सुनने वाले अनुमोदन में सिर हिलाऍं तो मेरा विश्वास बढ़ता है, वे मेरी तारीफ करें तो अच्छा तो वह भी लगता है, पर उससे अधिक तारीफ तो मैं अपने लिखने के साथ या उस क्षण में ही कर लेता हूँ, इसलिए उससे केवल प्रसन्नता बढ़ती है मिलता कुछ नहीं है। केवल आलोचना, वह निन्दा के स्तर तक पहुँच जाए तो भी, हमें सजग बनाती है। मैं कितनी बार कह आया कि हमारे इस संवाद का आशय अपने को सही साबित करना नहीं अपितु तर्क और प्रमाण के साथ अपना पक्ष रखने की आदत डालने और अपने पाशविक आवेग को नियन्त्रित करने का है जिससे हम अपने को नियन्त्रित करते हुए स्वयं को और समाज को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकें। परन्तु जो मैं कहना चाहता था कि ‘हम दबोच में आ गए हैं और अगला हमें खा जाएगा’ वह गलत है, और उस पर तो बात हो ही नहीं पाई।‘’

‘’तुम जैसा आधे दिमाग का आदमी न कभी अपनी बात पूरी कर सकता है न ही दूसरे की बात पूरी तरह समझ सकता है। चलूँ?”

उसने मेरे उत्तर की प्रतीक्षा भी नहीं की और उठ खड़ा हुआ।

Post – 2016-03-15

हिन्दी का भविषय ११

“तुम हर चीज को ऐसा मजाक बना देते हो कि न हँसते बनता है न रोते बनता है।”

“क्यों, क्या हो गया कि हँसने और रोने के अलावा कोई तीसरी गति दिखाई नहीं दे रही?”

“तुम जब हिन्दी के रथ पर सवार होकर दिग्विजय पर निकले थे तो मैं सोच रहा अब बेचारी अंग्रेजी का क्या होगा? पर घर लौटा तो पाया मेरी महरी पत्नी से दो सौ ऐडवांस माँग रही है, उसे अपनी लड़की की अंग्रेजी स्कूल की फीस भरनी थी। समझ में आया अंग्रेजी का विजयरथ कहाँ तक पहुँच चुका है?”

“अंग्रेजी का तो जो होगा, होगा, पर तुम जैसों का क्या होगा उसके बिना, यह सोचता हूँ तो तकलीफ होती है। तुम्हें याद है हमारे एक बहुत प्यारे साहित्यकार थे, पिछले चुनाव से ठीक पहले उन्होंने घोषणा कर दी, ‘यदि अमुक प्रधानमंत्री बन गया तो वह इस देश में नहीं रहेंगे। सभी लोग जो उनसे प्यार करते थे घबरा गए कि अब उन जैसे ऊँचे दरजे के साहित्यकार को बचा कर रखा कैसे जाय, क्योंकि जीत तो वही व्यक्ति रहा था । दोनों में से किसी को टाला नहीं जा सकता था, न उनकी प्रतिज्ञा को, न इसकी जीत को। उन्हें किसी दूसरे देश से आमन्त्रहण नहीं मिला तो या शायद यह सोच कर कि जिस धरती पर ऐसा नालायक शासक बना बैठा हो उस धरती को ही छोड़ देना अपने चरित्र के अनुरूप है, उन्होंने धरती ही छोड़ दी। तुम भी इरादे के कम पक्के तो हो नहीं । कहीं यह घोषणा न कर देना कि अंग्रेजी न रही तो जान दे दोगे पर भारतीय भाषाओं की उन्नति नहीं झेल पाओगे । आखिर तुम्हारे हित भी तो अंग्रेजी और आन्तरिक उपिनवेशवाद से ही जुड़े हैं।”

“लगता है बहुत गहरी चोट लगी तुम्हें, मेरी सूचना से । इससे तुम इतने निष्ठुर हो गए कि एक मृत व्याक्ति का उपहास करने तक पर उतारू हो गए। पहले पता होता तो छिपा गया होता ।”

‘’देखो, जन्म और मृत्यु अटल है। मृत्यु पर मृत व्यक्ति के अभाव की पीड़ा और उसके साथ समवेदना हमारी मानवीयता को प्रकट करता है, परन्तु मर जाने के कारण समझदार या लगभग समझदार लोगों के वचन आप्त हो जाते हैं, या उनकी मूर्खताओं का भी महिमामंडन किया जाना चाहिए, यह मेरी समझ में नहीं आता। और यह तो बिल्कु ल समझ में नहीं आता कि कोई जीवित व्यक्ति अपने आचरण से उसी तरह की मूर्खता करता दिखाई दे और उसे बचाने का प्रयत्न न किया जाय, जो मैं तुम्हारे सन्दर्भ में कर रहा था।

“तुम्हें अपनी महरी की लड़की की फीस के पैसे दिखाई दिये पर वह कफन दिखाई नहीं दिया जिसकी बुनावट पूरी होने को आ गई है और उसका एक तार उसके फीस के पैसे का था?”

“मरने के दिन तो भारतीय भाषाओं के आ रहे हैं, भाई। तुम्हें पता है हमारी बोल-चाल की भाषा तक में अंग्रेजी के शब्द किस तरह भरते चले जा रहे हैं? लोग नाते रिश्ते के शब्दों तक में जिन्हें आधारभूत शब्दावली मे गिना जाता है अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने लगे है – आंटी, अंकल, डैड, पापा, हस्बैंड, ब्रदर, सिस्टर, कजिन, नेफ्यू, सन, ग्रैंडसन- अपने आत्मीय शब्दों का स्थान लेते जा रहे हैं। यह हाल कमोबेस सभी भारतीय भाषाओं का है। लोग संवत, महीनों और दिनों के नाम और पहचान भूलते जा रहे है। सावन का महीना, भादों की रात, चैत की चाँदनी, जेठ की धूप, पूस का जाड़ा, माघ की ठिठुरन मुहावरों में बचे रह गए हैं, और एक दिन ये मुहावरे भी व्यर्थ मान लिए जाऍंगे। लोग महीनों का नाम जानते है पर यह नहीं जानते कि कौन सा महीना कब शुरू हुआ और आज कल कौन सा महीना चल रहा है। तुम्हारे पढ़े लिखे समाज का आधा से अधिक हिस्सा मानसिक रूप ईसाई मूल्यों से अनुकूलित हो चुका है और हिन्दू शब्द तक से घबराहट अनुभव करता है जैसे यह दिमागी पिछड़ेपन का ही नहीं बर्बरता का सूचक हो और इसी मे यदि किसी ने हौसला बढ़ाने के लिए नारा लगा दिया कि ‘गर्व से कहो मैं हिन्दू हूँ’ तो उस आधे शिक्षित समाज को जो आधा हिन्दू रह गया है, परन्तु पूरे हिन्दुत्व की रक्षा का दम भरते हुए दूसरों को लताड़ता है, सुनाई देता है ‘गर्व से कहो मैं बर्बर हूँ’।

“भाषाएँ, सभ्यताएँ, समाज किस तरह दबाव मे आते हैं और किस तरह अपने बचाव के लिए छटपटाते हैं और किस तरह अशक्त होते हैं और फिर मरणासन्न होते हैं उसका यह जीता जागता नमूना है । तुम्हें याद है, तुम्हीं ने एक दिन सभ्यताओं के टकराव पर ट्वायनबी के ऐन आइडिया आफ हिस्ट्री के दो सूत्र समझाए थे जिनमें पहला था कि हिन्दू सभ्यता परिपक्व सभ्यता है जिसका अर्थ था इसकी जिजीविषा चुक गई है। इसके विस्तार और विकास की संभावना समाप्तप्राय हैं और उसका संकेत था कि यह मरणासन्न है या उसकी कगार पर है। दूसरा यह था कि जब किसी दबंग सभ्य ता का सामना किसी दब्बू सभ्यता से होता है तो वह अपनी रक्षा के लिए रूढिवादिता का सहारा लेती है; फिर भी अपने को सँभाल नहीं पाती तो दबंग सभ्यता के सबसे निरापद प्रतीत होने वाले किसी तत्व को अपनाती है। परन्तु किसी सभ्य ता की एक आवयविकता होती है, उसका कोई तत्व जब दूसरी में प्रवेश करता है तो उसमें अपने मूल्यों और जीवनशैली के लिए स्थाान बनाता है और इस तरह उसे भीतर से तब तक तोड़ता चला जाता है जब तक वह पूरी तरह समाप्त न हो जाए । इन दोनों तर्कों से जो परिणाम सामने आता है उसको समझो और इस आशावाद से बचो, नहीं तो ‘हिन्दीे आ रही है, भारतीय भाषाऍं अपनी अस्मिता पहचान रही है और वर्चस्व के लिए जंग लड़ रही हैं’ कहते हुए तुम पागल हो जाओगे और मैं तुम्हारी मदद नहीं कर पाउूँगा और इसका अफसोस मुझे जिन्दगी भर बना रहेगा।‘’

‘’यार मुझे तो सूरदास की इस पंक्ति का अर्थ ही समझ में नहीं आता था, ‘दादुर बसत निकट कमलन के तनक न रस पहचानें’। आज पता चला कि इतने लंबे समय तक मेरे साथ रहते हुए भी तुम मूर्ख के मूर्ख कैसे रह गए। पहले अपने पर अफसोस होता था कि मैं अपनी बात ठीक से समझा नहीं पाता, अब उस विचारधारा पर होता है जिसने तुम्हें आदमी से दादुर बना दिया। टर्राने की आदत डाल दी पर समझने का कोना खाली कर दिया।‘’

‘’चकमा मत दो, तर्क और प्रमाण देते हुए बात किया करो। यह शर्त तुमने ही रखी थी, याद है।‘’

‘’तुम इतने विलम्बसे मेरी यह बात समझ सके कि पराभव के बोध के बाद ही अभ्युदय का संकल्प पैदा होता है। तुम तो गुप्त जी की उन पंक्तियों तक को भूल चुके हो, ‘हम कौन थे/ क्या हो गये हैं/ और क्या होंगे अभी। आओ विचारें/ आज मिल कर/ ये समस्यायें सभी।‘ तुम इतने गोबर-धन निकले कि अपनी उस पैरोडी तक को भूल गए जिससे आत्मबलिदािनयों की पीढियाँ पैदा हुई थीं।

सुनो, आस पास के लोग शिकायत करते हैं कि ये दोनों बूढ़े थकते भी नहीं है, बकवास इस अन्दाज से जारी रखते हैं मानो दर्शन बघार रहे हैं इसलिए आज की बात बन्द पर कल फैज की कुत्ते शीर्षक कविता कहीं मिले तो पढ़ना, खास कर उनकी ये पंक्तियॉं ‘कोई इनको अहसासे जिल्लत दिला दे/ कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे। बाकी की पंक्तियॉं वाहियात है और भावोच्छ्वास हैं इसलिए उनमें सकारात्मक कुछ न मिलेगा। परन्तु आशा की किरण इस अहसासे जिल्लत से ही फूटती है। अन्यायी व्युवस्था के कफन के धागे यहीं तैयार होते हैं जिसे मैं देख रहा हूँ तुम नहीं देख पाते।‘’

Post – 2016-03-13

हिन्दी का भविष्य – १०

“अंग्रेजी को तुम गाली देने की भाषा मानते हो । इस महान भाषा को, जिसका लोहा इसके दुश्मन तक मानते हैं। कल तक हम इस बात का रोना रोते थे हमे औपनिवेशिक दासता से गुजरना पड़ा, आज भी तुम जैसे शाविनिष्ट जार-जार रोते हैं कि मैकाले ने अंग्रेजी लाद कर हमें मानसिक रूप से गुलाम बना दिया। वे यह नहीं जानते कि एशि‍या के आगे बढ़ने वाले देश भारतीयों से इस लिए खम खाते हैं कि भारतीयों को औपनिवेशिक दाय के रूप में अंग्रेजी मिली और वे इतनी आसानी से अंग्रेजी बोल लेते हैं जब कि वे सिर धुन कर सीखने के बाद भी सही अंग्रेजी नहीं बोल पाते । तुम वि‍श्वास नहीं करोगे मैंने न्यूयार्क के चाइना टाउन में एक दो दिन बिताए हैं और उनके साथ घूमा फिरा हूँ। पचास साठ साल से वहीं बसे हुए हैं। उनकी दूसरी तीसरी पीढियों को जो कालेजों में पढ़ रही है ऐसी अंग्रेजी बोलते सुना है और वह भी धड़ल्ले के साथ कि अपना सिर फोड़नेको जी करे।”

मैं उसकी बात सुनता रहा और जब वह चुप हुआ तो पिलखल के पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, “इन किशलयों की क्षटा तो देखो, माघ की पंक्ति है या पता नहीं किसी और की – नव पलाश पलाशगतं पुरः नव परग परागत पंकजम् – ”

वह खीझ उठा, ” अब बोलती बन्द हो गई तो संस्कृत की याद आने लगी ?”

“जब तुम अपना ज्ञान बघार रहे थे, तब मेरा मन इतना कलुषित हो गया कि सोचने लगा कि यदि तुमने अपना सिर फोड़ लिया होता तो रक्त में सना हुआ वह लाल फूल की तरह कितना प्यारा लगता। तभी इन किशलयों की ओर ध्यान चला गया और सोचने लगा ये अधिक मनोरम हैं या तुम्हातरा अंग्रेजी की चिन्ता् में फटा हुआ सिर जो मेरी कल्पना में था। मन की शुद्धि के लिए प्रकृति के अवलोकन से अच्छा कोई उपचार नहीं।‘’

‘’मैंने जो कहा है वह तथ्य और अनुभव पर आधारित है। तुम्हारी तरह की तीरन्दा्जी नहीं।‘’

‘’तुम गलत कहते ही नहीं, जस का तस रख देते हो, कंकड़ स्था ने कंकड़: । दुर्भाग्य हमारा कि हमें तुम्हारी कोई बात सही लगती नहीं । तुम्हें भी ईश्वर ने मेरी तरह दिमाग तो दिया पर तुम उसका इस्तेमाल माल गोदाम की तरह करते हो, मन्थन के कठाले की तरह नहीं । तुम खुद मानते हो कि एशिया के केवल वे ही देश प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़े हैं जिनको औपनिवेशिक दासता से गुजरने और मानसिक रूप से पराश्रयी नहीं होना पड़ा । जिनको अपनी भाषा की अवज्ञा करने और मालिकों की जबान सीख कर गुलामों के सुर में उनके शब्द दुहराते हुए गर्व करने की आदत नहीं डाली गई । तुम स्वयं कहते हो कि जिनसे तुम्हारा पाला न्यूयार्कके चाइना टाउन में पड़ा उनकी कई पीढ़ियाँ वहीं पलने बढ़ने के बाद भी अपनी भाषा और संस्कृति पर इतना गर्व करती और उससे इतना लगाव रखती हैं कि परिस्थितियों के दबाव के कारण अंग्रेजी का मात्र कामचलाऊ या अर्थग्राही ज्ञान ही रखती हैं। उसके आधिकारिक ज्ञान के माया जाल में नहीं पड़तीं, क्यों कि जानते हैं दूसरे की भाषा अपनाने का मतलब है उसकी मेधा को अपनी मेधा पर हावी होने का अवसर देना। तुम्हारा पाला उनकी एक टुकड़ी से नयूयार्क में पड़ा था, और फिर भी वे जो टूटी फूटी स्थानीय भाषा बोलते हैं उसका सही नाम तक तुम्हें पता नहीं । उसे अंग्रेजी नहीं अमेरिकन कहते हैं और अंग्रेज भी जब अमेरिका पहुँचते हैं तो उन्हें अमेरिकन समझने और बोलने में कठनाई होती है। तुम्हें यह पता तो होगा, पर ठीक उस मौके पर जब दिमाग से काम लेना होता है तब, याद नहीं आएगा कि अमेरिकन का विकास तो वहाँ शरण लेने वाली यूरोपीय बहुजातीयता के घोल से हुआ था और बोलते वे अमेरिकन थे, पर अंग्रेजी उपनिवेश होने के कारण लिखते अंग्रेजी थे। औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए उन्हें संग्राम करना पड़ा और उन्हें ही विजय नहीं मिली, उन्होंने औपनिवेशिक देशों में भी यह मन्त्र फूँका कि ठान लो तो औपनिवेशिक दासता से मुक्ति पाई जा सकती है। कि अपनी मुक्ति के बाद उन्होंन दो काम किए । पहला था ‘मेक इन अमेरिका’ अर्थात् जो माल तुम इंगलैंड से मँगाते हो उसे अमेरिका में बनाओ। यदि यह सूत्र समझ में आ जाए तो तुम्हें मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ समझ में आ जाएगा और इसकी खिल्ली् उड़ाना छोड़ दोगे। इसके साथ ही उन्होंने स्वदेशी प्रेम का मन्त्र भी फँूका। वह कौन था, जेफर्सन या कोई और जिसने कहा था, जब तुम बाहर से लोहे की एक बीम खरीदते हो तो तुम्हारा पैसा बाहर चला जाता है और उसके बदले बीम मिलता है, परन्तु जब तुम अमेरिका में बना बीम खरीदते हो तो तुम्हें बीम भी मिलता है और तुम्हारा पैसा भी तुम्हारे पास रह जाता है।

‘’और जो दूसरा काम उन्होंेने किया वह था अंग्रेजी से मुक्ति पाने के लिए अपनी वर्तनी में सुधार। वेब्स्टर का नाम जानते हो न, उसकी भूमिका भी जानते होगे। अब सारी दुनिया अमेरिकन सीखती है, इसलिए नहीं कि यह ज्ञान की भाषा है, बल्कि इसलिए कि यह कारोबार की भाषा है, माल पर लगे ठप्पे की वह भाषा है जिसे सबसे अधिक लोग समझते हैं। केवल उपनिवेशों के गुलाम है जो आज भी इं‍ग्लिश वर्तनी का अनुगमन करते हैं। ज्ञान की भाषा उन देशों की अपनी भाषा है और उनकी आधारभूत तैयारी हमारे स्वनतन्त्र होने के समय बहुत पिछड़ी थी, जापान अवश्य इसका अपवाद था, परन्तु आज वे अपनी इस भाषा के कारण और दुनिया का ज्ञान अपनी भाषा में ढालने के कारण इतने आगे बढ़ गए हैं। इतने पिछड़ गए हैं हम कि मेक इन इंडिया के लिए भी हमें उनकी मदद और तकनीक की जरूरत पड़ रही है।‘’

‘’यार मोदी का जादू बोल रहा है या तुम खुद बोल रहे हो। सॉंस लेने के लिए तो बीच बीच में रुक जाते।‘’

‘’मैंने अपनी कविता सुनाई थी न तुम्हें ‘मैं फिर तोड़ता हूँ उस तिलस्म को जिसमें मैं कैद था।‘ याद है या भूल गए। मुझ पर किसी का जादू नहीं चल सकता और तुम उस तिलस्म से इतने अभिभूत हो कि उससे बाहर निकलना तक नहीं चाहते जिसमें तुम कैद हो। मैं मोदी को बता सकता हूँ कि तुम्हारा मेक इन इंडिया अधूरी समझ पर निर्भर है। इसके लिए थिंक इंडिया जरूरी है और थिंक इंडिया के लिए भारतीय भाषाओं का वर्चस्व जरूरी है। पर मुझे पहली बार यह विश्वास पैदा हुआ है कि यदि मोदी को मेरी बात समझ में आ गई तो वह इस दिशा में प्रयत्न करेंगे और तुम उस प्रयत्न को विफल करने का प्रयत्न करोगे पर यह पहला अवसर है जब जनता अपने भाग्योदय के लिए संघर्ष करना सीख रही है और अब तक जो प्रच्छन्न गान गाया जाता था, सिंहासन ऊँचा करो कि नेता आता है, का स्थान दिनकर की वह पंक्ति लेगी, ‘सिंहासन खाली करो की जनता आती है।‘’
13.3.16

Post – 2016-03-11

हिन्दी का भविष्य (9)

‘’आज राजनीतिक दलों के सामने कोई ऐसा बड़ा मुद्दा नहीं है जिससे व्यापक जनसमाज को जोड़ा जा सके और एक बड़ा जन-आन्दोलन खड़ा किया जा सके और राष्ट्रीय ऊर्जा को एकिदश करके उस आत्मबोध और आत्समविश्वास को जगाया जा सके जिसके अभाव में व्यक्ति, संगठन, संस्थाएँ और राजनीतिक दल सभी गिरावट और गलाजत के शिकार हो चुके हैं और अपने को चर्चा में बनाए रखने के लिए नितान्त घटिया, आत्मघाती और देशघाती बयान देने और काम करने के लिए तैयार ही नहीं हो जाते अपितु इस पर गर्व भी करते हैं। बदहवासी का आलम यह कि जिन्हें हम समझदार समझते चले आए थे वे भी ऐसी गतिविधियों का समर्थन करते हुए ताली बजाने उऔर झूमने लगते हैं जिनके लिए सान्निपातिक प्रलाप से अलग कोई शब्द मुझे उपयुक्त नहीं लगता। सर्वव्यापी गिरावट के इस दौर में बुद्धिनाश की पराकाष्ठा यह कि सुनना और देखना तक बाहरी संकेत से नहीं संबन्धित पक्षों की आकांक्षा के अनुसार सुनाई पड़ता और दिखाई देता है। वस्तुसत्य का ऐसा लोप मनोविच्छिन्नता में ही संभव है और सामाजिक मनोविच्छिन्नता यदि उस चरम पर पहुँच जाए जहॉं लोगों को पता हो कि उन्हें किस रंग का, किस काट का, कितना सस्ता या मँहगा, कितना टिकाउू और जड़ाउू सत्य चाहिए तो पक्ष समझ में आ सकते हैं, सत्य समझ में नहीं आ सकता।‘’

‘’तुम रोज रोज कोई न कोई रोना लेकर क्यों बैठ जाते हो यार, थकते नहीं हो? उूबते भी नहीं ? जो है सो है, रोने से कम हो जाएगा या बदल जाएगा ?’’

‘’तुम चिन्ता को रोना मान लोगे तो इस अधोगति से उबरने का उपाय तलाशने की जगह जो-होगा-देखा-जाएगा-वाद के अनुयायी हो जाओगे। मार्क्सवाद अपनी हताशा में यहीं पहुँच गया है। इसने इस देश और समाज को समझे बिना ही अपने पवित्र आवेश में जितने भी प्रयोग किए सभी हल्की सी सुगबुगाहट पैदा करने के बाद ठंडे पड़ गए और आज वह जुआड़ियों की तरह ब्लाइंड खेल रहा है। यह उस भाग्यवाद की पराकाष्ठा है जिसका उपहास करना तुम्हारे मनोविनोद का हिस्सा रहा है। अपनी नासमझी के कारण आजकल दूसरों के मनोविनोद का सामान बन चुके हो।‘’

‘’तो आओ हम उधर जो लोग बैठे हैं और जो घूम टहल रहे हैं सबको इकट्ठा कर लें और एक सुर से भारत-दुर्दशा नाटक का वह कोरस गाऍं, ‘आओ और सब मिलि रोओ भारत भाई । हाहा भारत दुर्दशा न देखी जाई!’ कुछ ऐसा ही है न ?

‘’तुम यह भी नहीं कर सकते । अपने को बदलने का संकल्प अपनी अधोगित के बोध से ही आरंभ होता है । दुनिया बदलने वाले आसमान से टपकते नहीं हैं हमारे बीच से ही पैदा होते हैं । उन्हें तलाशना नहीं है वे हैं और सही नेतृत्व और दिशाबोध के अभाव यथास्थिति से अपने क्षोभ और कुछ न कर पाने की आकुलता के कारण परिणाम की चिन्ता किए बिना कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं ।‘’

’’ तुम्हें उनके ऐसे कार्यों और उद्गारों पर क्रोध आता है, तिलमिला उठते हो और हम कहते हैं मौत के सन्नाटे से तूफान भरी जिन्दगी ही सही। कुछ हो तो रहा है।”

‘’क्योंकि तुम हुड़दंग और काम का अन्तर नहीं जानते। हुड़दंग न हो तो सोचते हो मौत का सन्नानटा छा गया है। यह मेरी समस्या नहीं है, तुम्हारी और तुम्हारे चिकित्सक की समस्या है। तुमने पहला पाठ ही गलत पढ़ा और जो भी तुम्हारे संपर्क में आया उसे वही पाठ पढ़ा कर अर्धविक्षिप्त बना कर छोड़ दिया।‘’

वह हँसने लगा, ‘’क्या था मेरा पहला पाठ ?’’

‘’यह कि शोषण, उत्पीाड़न, विषमता भी युगों से चली आ रही हिंसा के रूप हैं और इनको समाप्त करने के लिए हिंसा जरूरी भी है और न्याँयोचित भी।‘’

‘’तुम शोषण, उत्पीड़न, विषमता को हिंसा नहीं मानते ? इनसे घृणा नहीं करते?’’

‘’घ़ृणा नहीं करता, इनको निर्मूल करना चाहता हूँ। तुम इन्हेंं निर्मूल नहीं करना चाहते, बनाए रखना चाहते हो और इसकी कमाई खाना चाहते हो।‘’

वह इस तरह उछला मानो बिच्छू ने डंक मार दिया हो, ‘’मैं बनाए रखना चाहता हूँ और तुम उन्हें मिटाना चाहते हो। तुम, तुम…’’ उसके चेहरे के तनाव और खिंचाव से ही प्रकट था कि वह अपनी उत्तेाजना में कोई ऐसी गाली तलाश करना चाहता था जो मर्मान्तक भी हो पर इतनी अपमानजनक न हो कि संबन्ध ही टूट जायँ।
हिन्दी में उस पाये की गाली नहीं मिली और वह कुछ निराश होने लगा कि तभी चेहरे पर चमक आ गई और बोला, ‘’यू रैस्क‍ल।‘’

वह कुछ आगे कहने जा रहा था, कि मैं हॅस पड़ा तो वह नर्वस हो गया। भौचक सा मेरी ओर देखने लगा कि मैं हॅस किस बात पर रहा हूँ।

मैंने कहा, ‘’यार, मैं तो यह कहना चाहता था कि यदि सामाजिक न्या य को दूसरी स्वतन्त्रता का मुद्दा बनाया जाये, गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के गरीबी रेखा से उूपर की श्रेणी की समकक्षता में लाने के संघर्ष में बदला जाय जिसका विरोध एपीएल या एबव पावर्टी लाइन नहीं कर सकेंगे और यह इस नारे के साथ आरंभ हो कि हमें मुफ्त एलपीजी सिलेंडर देने की जगह मेरी जबान दो, मेरी जबान को उसका सम्मान दो, इसे ही शि‍क्षा और उच्चतम पदों की एकमात्र जबान बनाओ जिससे अक्षर ज्ञान के बाद हमारे ज्ञान के दरवाजे और अवसर की समानता के रास्ते खुल जायँ तो हमें एक बड़ा मुद्दा मिल जाएगा और जो भी इस दिशा में पहल करेगा वह वर्ण, धर्म, संप्रदाय, जाति और क्षेत्र की संकीर्णताओं को तोड़ कर कम से कम न्यांय, सम्मान और उन्‍नयन का एक मार्ग तो खोलेगा। पहले सोचा था तुम्हें मेरा प्रस्ताव सही लगेगा पर तुम्हारी गाली सुनने के बाद लगा, जब अंग्रेजी को हटा कर भारतीय भाषाओं को उनका स्थान दिलाने का निर्णायक क्षण आएगा तो तुम कहोगे, ‘’हमने तो कभी नहीं कहा कि अंग्रेजी ज्ञान की भाषा है। ज्ञान तो चुगद भी जानते हैं कि अपनी ही जबान में प्राप्त हेा सकता है, पर अगर अंग्रेजी चली गई तो हम गालियॉं किसमें देंगे। ज्ञान के लिए न सही, गालियॉं देने के लिए तो हमें अंग्रेजी को यथावत बनाए रखना ही होगा।”

Post – 2016-03-10

विषयान्त र
जामिया में नौ साल पहले छात्रसंघ भंग कर दिया गया था । अब वहाँ इसे बहाल करने की माँग की जा रही है, जब कि विचार इस पर होना चाहिये कि क्या छात्रसंघ छात्रों के हित के किसी सवाल को उठाते हैं और क्या जेएनयू छात्रसंघ को भी भंग करके यह देखा जाना चाहिए कि इससे इसका शिक्षा और शोध कार्य का स्तर सुधरता है या नहीं ।

दूसरे देशों के अध्येता हमारी समस्याओं का अध्ययन करते हैं। हम इस मामले में कोरे हैं । एक अध्ययन इस बात को लेकर होना चाहिए कि यूनियनबाजी में – तैयारी, प्रचार, आन्दोलन में कितने शिक्षा दिवस व्यर्थ चले जाते हैं और इनकी उपलब्धि क्या आती है?

एक तुलनात्मक अध्ययन इस बात का भी होना चाहिए कि पिछड़े देशों में छात्रों की राजनीतिक सक्रियता का अनुपात आगे बढ़े हुए देशों की तुलना में क्या है और उनके ही शीर्ष संस्थानों में राजनीतिक सक्रियता का अनुपात अन्य संस्थाओं की तुलना में क्या है और देश हित में उन्हें मि कर किसी निर्णय पर पहुँचना चाहिए ।

मैं जानता हूँ यह सुझाव किसी के गले नहीं उतरेगा क्योंकि किसी दल के पास कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं है जिसे लेकर वह जनता के पास जाए और इस क्रम में उसका व्यापक जनाधार तैयार हो इसलिए शिक्षा केन्दों को वे अपने काडर की प्रयोगशाला बनाने में समान रुचि रखते हैं शिक्षा का सत्यानाश होता है तो हो। यह व्यवस्था अध्यापकों को भी रास आती है । उन्हें अपने विषय की तैयारी नहीं करनी पड़ती और क्लास लेने की झंझट से भी मुक्ति मिल जाती है।

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा की समस्या अभिव्यक्ति की निष्कलुषता से जुड़ी हुई है। कलुषित अभिव्यक्ति – गाली, अपमान, दुष्प्रचार, मानहानि आदि – आपराधिक परिधि में आती है। यह प्रभावित व्यक्ति की निजता और सम्मान की रक्षा से जुड़ी है, जिसे सुनिश्चत करना राज्य का दायित्व है। यह कानून और व्यवस्था का प्रश्न है जिसे बनाए रखने में असमर्थ शासक को सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं ।

आपात काल की छोटी सी अवधि को छोड़ कर किसी शासक ने अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन नहीं किया । इसका हनन केवल कम्युनिस्ट विचारधारा करती रही है जो अपनी मान्ताओं से असहमत व्यक्तियों को लांछित, अपमानित करती रही है और इस बात के लिए बाध्य करती रही है कि उससे भिन्न कोई विचार पनपने न पाए । इसके खेदजनक उदाहरण भी उसी जनेवि से आए जिसमें एबीवीपी के निर्वाचित पदाधिकारी को अपने संगठन से इस्तीफा देने को बाध्य होना पड़ा, क्योंकि उसकी मखौल उड़ाई जाने लगी। अंग्रेजी के एक अधयापक केे अपनी अलग राय रखने के कारण हूट कर दिया गया । एबीवीपी से जुड़े एक छात्र को यह सिद्ध करने के लिए कि वह मनुवादी नहीं है उस मनुस्मृति की प्रति, नारी दिवस पर, जलानी पड़ी, जिसमें यह कहा गया है कि जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है वहाँ देवता विराजमान रहते हैं और जहाँ उनकी उपेक्षा होती है वहाँ सभी क्रियायें निष्फल होती हैं । जिसमें कहा गया है कि यथा स्थिति पिता, पति, पुत्र को स्त्री की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए क्योंकि स्वतः वह असुरक्षित है । बिना पढ़े, जाने और समझे ही आग के हवाले कर दिया, यह प्रमाणित करने के लिए कि वह भी किसी से कम प्रगतिशील नहीं है। शिक्षाकेन्‍द्रों को हुड़दंग केन्द्र बनाने वाले अपनी समझ से देश और समाज का कल्याण कर रहे हैं । इन्हें और इनके पक्षधरों को जेल की नहीं चिकित्सकों की जरूरत है जो इनके धुले हुए दिमाग में पुरानी स्मृतियों और संस्कारों को जाग्रत कर सकें ।

जो छात्रसंघ अपने परिसर में रैगिंग तक नहीं रोक सकते वह देश की निर्वाचित सरकार को उखाड़ फेंकने का आन्दोलन चलाते और बदहवासों की भाषा में बात करते हैं? वे सभी चिकित्सा के पात्र हैं जो ऐसों के साथ हैं।

Post – 2016-03-09

हिन्दी का भविष्य (8)

‘’आज तो तुम्हें दम मारने की भी फुर्सत न होगी, सुना अपनी किताब की अनुक्रमणी तैयार कर रहे हो। बैठूँ या किसी दूसरी मंडली का सहारा लूँ।‘’

’’बैठो । जो काम करता है उसे समय का कभी अभाव नहीं होता। उस कसे हुए समय में से दूसरों के लिए भी समय निकाल लेता है! जो आलसी और ऐयाश होते हैं वे कुछ नहीं करते फिर भी उन्हें किसी न किसी तरह दम मारो दम से ही फुर्सत नहीं मिलती। जो लोग काम करना नहीं जानते वे भी अपना बहुत समय तरीके ढूढ़ने में बर्वाद कर देते हैं। तुम जानते हो जब दूसरे सभी नेताओं को सॉंस लेने की फुर्सत न होती थी, एक गांधी ऐसे थे जिनके पास समय ही समय था। इतने सारे लोगों और सरोकारों के लिए, यहॉं तक कि बकरी की महरहम पट्टी तक के लिए, कोढि़यों और अपाहिजो तक के लिए, बच्चों और अनपढ़ों को रहने का सलीका, स्‍वस्‍थ जीवन जीन का तरीका सिखाने के लिए, अपना सारा काम करने के बाद सूत कातने और भविष्‍य की योजनाऍं बनाने के लिए समय निकाल लिया करते थे और इन्हीं को करते हुए उन्हें उन सवालों के भी जवाब मिल जाया करते थे जिनको ले कर माथापच्चीं करने वाले दूसरे नेता सारे पसीने पसीने हो जाते थे पर खाली हाथ रह जाते थे।

”मेरे पास समय का कभी अभाव नहीं होता, पर तुम्हें ध्यान से सुनने तक की फुर्सत नहीं मिलती। आधे मन से सुनते हो और सुनने के साथ ही भूल जाते हो। समय बर्वाद होता है, कुछ हाथ नहीं आता।”

’’अरे यार, मैंने तो मजाक किया था, तुम इतने सीरियस हो गए और इसी बहाने अपने को गांधी जी के बराबर का दर्जा भी दे दिया। विनम्रता की हद है।‘’

’’ यह बताओ, तुम तो कम्युनिस्ट हो, तुमने अप्टन सिन्क्‍लेयर का उपन्यास ‘दि जंगल’ पढ़ा है ? जरूर पढ़ा होगा। उसका एक चरित्र है ग्रिगोरी। याद है ? याद न सही, पर यह जरूर पता होगा कि पेशीय बल का स्थान यन्त्रबल ने लिया तो मनुष्य की पीड़ा कम न हुई, अन्याय और सह्य उत्पीाड़न की मर्मान्तोक सचाइयॉं सामने आने लगीं। बच्चा सस्ते मोल मिल जाएगा, वटन ही तो दबाना है, इसके लिए युवाओं को लगाने की क्या आवश्यकता, और वे बालक जब तक जवान होते थे, उन्हें काम से निकाल दिया जाता था, और वे अपने ही बालकों के अवलंबी बने जीने को बाध्य होते थे। उनसे सोलह घंटे काम लिया जाता था। ग्रिगोरी को एक लड़की से प्यार हो जाता है। वे दोनों शादी करना चाहते हैं और इसके लिए कुछ दावत और मेहमानबाजी में खर्च की भी जरूरत होती है। पैसा है नहीं। ग्रिगरी सुझाता है, कर्ज ले लेंगे। प्रेमिका कहती है, कर्ज ले तो लेंगे, पर चुकाएंगे कैसे ? वह कहता है, ‘ओवरटाइम कर लेंगे।‘ तुम जानते हो, सोलह घंटे खटने के बाद भी अपने प्रेम के लिए ओवरटाइम करने वाला यह चरित्र आज से ठीक अड़तालीस वर्ष पहले जब मैंने यह उपन्याेस पढ़ा था, तब से मेरा ज्योतिस्तम्भ रहा है। गांधी की याद तो अभी अकस्मात आगई। उस उपन्यानस में मुझे इससे अलग कुछ दिखाई ही न दिया। अप्टन सिन्लेकसलेयर को आगे पढ़ने की जरूरत तक न हुई।

’यह बताओ, तुम्हें आजादी से इतना डर क्यों लगता है । तुम कल अनुपम का समर्थन कर रहे थे।‘’

’मैं आजादी का नहीं, मनचलेपन का विरोध कर रहा था। एक व्याधि का विरोध कर रहा था। आजादी व्याधि नहीं है पर नशे का कारोबार करने वाले इसको एक नशे में बदल सकते हैं और बदल रहे हैं। मैं उसका विरोध करता हूँ। तुम जानते हो इस शब्द का अर्थ क्या है!’’

’’हद करते हो यार! यह भी कोई सवाल हुआ। तुम नहीं जानते हो तो कोई कोश उठा कर देख लेना। मैं नहीं बताउूँगा।‘’

’’देखो, शब्दोंँ का अर्थ कोश में नहीं होता। शब्दों का काम चलाउू परिचय ही कोश से मिलता ह। हाल यह है कि वह अर्थ हर जगह लागू नहीं होता। जब एक लड़की लाड़ से इतराती हुई अपनी सहेली को खसमा खॉंणी कहती है तो इनमें से किसी शब्द का वह अर्थ नहीं होता जो तुम्हें किताब में मिलेगा। इसका अर्थ होता है अगाध आत्मीयता और प्यार और यह अर्थ तभी तक है जब तक दोनों कुँमारियॉं है। व्याह होने के बाद यदि यही वाक्य कहा गया तो वह पत्थ र से उसका सिर तोड़ देगी। व्याहता हो गई और सहेली कुमारी रह गई तो उसके मुँह से यह वाक्य निकलेगा ही नहीं। अब वह इसके जिस अर्थ से परिचित हो चुकी है वह इतना विषादयुक्त है कि उसकी कल्पना से भी सिहर जाएगी। और अब उस अनव्याही लड़की के लिए प्रकारान्त‍र से यह व्यंवग्य भी बन जाएगा, देख मेरा ब्याह हो गया तू अभी कुँवारी बैठी है। इस देश में शब्दों के अर्थ पर, भाषा पर जितना गहन चिन्तन हुआ है और इसकी चेतना अनपढ़ों तक मे इतनी समृद्ध है जिसकी तुम कल्प ना भी नहीं कर सकते। और इसके बाद भी पढ़े लिखों तक को बोलने की तमीज नहीं।

‘हमारे दार्शनिक कहते हैं, किसी शब्द का सन्द र्भ निरपेक्ष अर्थ व्यवहार में कोई अर्थ नहीं रखता। यह उस पूरे कथन और सन्दंर्भ में निहित होता है। ये सन्दर्भ है, किसने कहा, कब कहा, किससे कहा, कैसे कहा, क्यों कहा और किन शब्‍दों में कहा। अब तुम उसी आजादी का अर्थ पागलपन कर सकते हो, मनमौज कर सकते हो, उपद्रव कर सकते हो, और देशद्रोह भी कर सकते हो, यदि यह आवाज ऐसी पृष्ठ भूमि में लगाई गई तो । शब्द का एक इतिहास भी होता है और एक माहौल भी होता है जिससे उसका अर्थ निर्धारित होता है। आजादी शब्द का निकट इतिहास यह है कि यह नारे के रूप में कश्मीर में उन लोगों के द्वारा लगाया जाता रहा है जो अलगाववाद के लिए पाकिस्ताान से पैसा पाते रहे हैं। यह शब्द भारतीय कूटनीतिक अपरिपक्वता के कारण इसलिए भी बहुत लोकप्रिय रहा है कि एक उत्तरदायी व्यक्ति ने बताया था कि उन उपद्रवी तत्वों को चुप रहने के लिए भी रकम सेना द्वारा दिया जाता रहा है। अब रकम बढ़ानी होगी तो नारे लगेंगे ही। आजादी जो एक सार्थक शब्द था अब नारे के रूप में वहीं से फैल रहा है। ये इतने सारे लोग, एक साथ बिना किसी उत्ते जना के, स्वयं उदद्रवकारी आयोजन करके, आजादी की पुकार करने लगें तो इसका अर्थ मुझे बताने की जरूरत नहीं रह जाती।

यह हैरानी की बात है कि इतने सारे लोग एक साथ इनकी पैरवी में आ गए हैं जो यह जानते हुए भी कि जाट उपद्रव आन्दोलन नहीं था, इसी योजना का हिस्‍सा था क्‍याेंकि इसका कोई नेता नहीं था, मॉंग की कोई अपरिहार्यता न थी, इसे भड़काया गया था और भड़काने वाली कांग्रेस रही है जिसके सबूत उनके पास मिले, इतने जघन्य और अमानवीय घटना पर चुप है, क्‍योंकि ये नसी कांग्रेस से लाभान्वित रहे हैं ओर इसलिए उसके साथ रहे हैं। इतनी ताबड़तोड़ बहस या मीडिया में हंगामा एक मूर्ख को निर्दोष सिद्ध करने के लिए जो आवेश में नहीं जानता कि उसका और उस जैसों का शातिर लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा हैा इतने सारे आला दर्जे के लोग इसे निर्दोष सिद्ध करने की आड़ में उस भयंकर षड्यन्त्र को और उन नारों को उचित ठहराने के लिए बौद्धिक व्या्याम कर रहे हैं। ये कौन लोग है। क्या ये 14 के चुनाव के फैसले आने से पहले ही देश छोड़ने, मोदी को किसी कीमत पर सहन न करने की बात नहीं कर रहे थे। क्या उनकी असुरक्षा उसी अनुपात में बढ़ती नहीं गई है जिस अनुपात में अपनी कूटनीतिक परिपक्वता द्वारा इस व्यक्ति ने अपने घर के दुश्मनों से ले कर बाहर के दुश्मनों तक की उपेक्षा करते हुए लगातार और बिना किसी चूक के शब्दों और कार्यों द्वारा यह दिखाने और लोगों का विश्वाेस जीतने में सफलता पाई है कि वह सबको साथ ले कर विकास की दिशा में चलना चाहता है। ’’

”तुम आवेश में आ गए हो। हो सकता है इस समय मोदीनामा का लेखक बोल रहा हो, पर इतना तुम जानते हो कि कोर्ट ने भी उसे देशद्रोह का दोषी नहीं पाया।‘’

’’मैं कोर्ट से भी आगे जा कर यह मानता हूँ कि वह देशद्रोहियों का शिकार है, उसके द्वारा उपयोग में लाया जा रहा है और अपने हितों के विरुद्ध इस्ते माल किया जा रहा है।‘’

”उसका अपना हित क्या है यह तो बताओ।”

” यदि उसे अपने हित का ध्यायन होता तो वह मात़ृभाषा में उच्चतम शिक्षा और चयन में मातृभाषा और केवल उसके बल पर चुने जाने, और आन्तरिक उपनिवेशवाद के विरुद्ध किसी अभियान का नायक बनता या उसका हिस्सा बनता। वह अपने बाद के बचाव वाली लफ्फाजी में जिन चीजों से आजादी की बात करता मिला उनसे आजादी दबे हुए पिछड़े हुए, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले समाज के अभ्युदय के बिना संभव नहीं और यह अभ्युदय मातृभाषा में शिक्षा के बिना असंभव है। यदि देशद्रोही तय करना हो तो सचमुच वे सभी लोग हैं जो अंग्रेजी के माध्यम से नव ब्राह्मणवाद का सृजन और विस्तार कर रहे है, देश द्रोहियों को बचाने के लिए बयान देते और बयान बदलते रहे हैं, और आज भी सत्ता से वंचित होने पर देश को, इसकी संस्थाओं को बर्वाद करने के आयोजन कर रहे हैं। इनमें वे बुद्धिजीवी भी शामिल हैं जो इन दुरभाग्यपूर्ण घटनाओं के समर्थन में दलीलें दे रहे थे और देंगे भड़काने वालों का साथ दे रहे थे। देश को इनसे मुक्ति की आजादी लड़नी है और सही नेतृत्व विकसित हुआ तो यह सही दिशा भी लेगी। यह मत भूलना कि नवब्राह्मणवाद में अपने को दलित कहने वाला एक तबका भी शामिल हो चुका है और उसके हित दबे और सताए लोगों से भिन्नस हैं।‘’

^’यह तो सही सवाल से भटकाने वाली बात हुई।‘’

’’यह एक अकेली बात है जो एक आजाद देश में आज भी आजादी और मानवीय गरिमा से वंचितों और अनगिनत खानों में बॉंट कर रखे गए और इस तरह एक जुट हो कर महाशक्ति बनने से रोके गए समाज की आन्तरिक आजादी की लड़ाई हो सकती है जो धर्म, संप्रदाय, जाति, क्षेत्र, गर्हित राजनीति सभी को तोड़ती हुई पूरे देश को एक स्वतन्‍त्र और स्वाभिमानी देश बना सकती है और इन दीवारों को मिटा नहीं तो इतना कमजोर अवश्य कर सकती है कि व्यक्ति का मूल्यां कन उसकी योग्योता और प्रतिभा के आधार पर हो सके।‘’

Post – 2016-03-07

विषयान्तर

‘’तुम लेखक हो, तुम भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रंता का विरोध करते हो?’’

’’यह भ्रम तुम्हें कैसे हो गया?’’

‘’कल तुमने फेस बुक पर अनुपम खेर के भावोद्गार का समर्थन किया था या नहीं?’’

’’अरे यार, छोड़ो उस बात को । हम हिन्दी के भविष्य पर बात करलें, उसके बाद मैं अपनी तारीफ भी सुन लूँगा। अभी उधर मुड़ेंगे तो विषयान्तर होगा। वैसे मैं अपने नाम के कारण अपनी महिमा का इस हद तक कायल हूँ कि कोई दूसरा तारीफ करे तो घबरा जाता हूँ। सोचता हूँ, इतना तो मैं खुद ही चढ़ा चुका था, इसने इतना बिना पूछे जॉंचे उड़ेल दिया। पॉंवों के लड़खड़ाने का इन्तजाम कर चुका था, दिमाग को डगमगाने का काम मेरे हितैषी कर रहे हैं।

’’अजीब घामड़ आदमी हो। मैं तुम्हारी तारीफ की बात नहीं कर रहा था। उस समर्थन की बात कर रहा था, जो तुमने अनुपम खेर को दिया।‘’

’सिर्फ इतनी बात तुम्हारी समझ में आई और यह समझ में नहीं आया कि अनुपम मेरे ही विचारों को दुहरा रहा था, और मैं अपने ही विचारों का समर्थन कर रहा था।‘’

वह अकबकाया हुआ मेरा मुँह देखने लगा। बोला भी, ‘’कह क्या रहे हो।‘’

’’तुमसे जो बातें करता हूँ उन्हें गटक तो जाते हो पर पचा नहीं पाते इसलिए फिराक साहब की शब्दावली में पश्चात्तााप करते हो पर समझ में कोई सुधार नहीं आता। अनुपम खेर मेरे बहुत पहले कहे वाक्यों को दुहरा रहा था और जरूरी नहीं कि मेरे विचारों को पढ़ कर ऐसा कर रहा था, पर उसने जिस निडरता से जिस आत्मविश्वांस से जस्टिस गांगुली को किनारे डालते हुए अपनी बात पूरी की वह तो मेरे वश का था ही नहीं, मैं उसका विरोध कैसे कर सकता था।

‘ऐक्ट र चिन्ततक नहीं होता,‍ फिर भी वह विचारों को अपने आवेग भरे शब्दों, आविष्ट तेवरों और अंगचेष्टा‍ओं और आलापों द्वारा मूर्त कर देता है। संचार के क्षेत्र में जहॉं विचार लुप्तं हो चुके हैं, विचारक भेड़ों और मुर्गो और सॉड़ों के दंगल के बीच अपने पक्ष के प्रति समर्मण से आगे की सारीमान्य ताऍं भूल चुके हैं, किसी संचार माध्य म पर पहुँचने से पहल आप को पता होता है इसे किसने खरीद रखा है, इसका मालिक किसका एहसान चुका रहा है और वह विचार के मंचन में किन को बुला कर क्या सिद्ध करके नमक अदा करेगा, वह किस घटना को कितनी बार किन कोणों से दिखाता रहेगा, और किनको गुल कर जाएगा, यहॉं तक कि कुछ लोगों को यह भी पता होता है कि कितना और खाने को मिलने पर किस बहाने वह कब पलटी मारेगा, वहॉं जब कोई व्यक्ति अपनी बात तर्क और प्रमाण और आवेश से कहे तो लगता है इस सच को इस तरह ही उजागर किया जा सकता था कि दबाने वालों के पैंतरे बेकार हो जायँ।”
”’तुम्हे यह नहीं मालूम कि उसकी पत्नी बीजेपी की सांसद है, और उसने खुद ही बताया कि उसे राजकीय सम्मान भी मिल चुका है?’’

’’मुझे पता है, पर तुम्हें पता नहीं है कि कितनी त्रासदी भोगने के बाद उसने अपना निर्णय किया होगा और कितने पापियों को वैतरणी पार कराने के प्रसास मे हमारे ज्ञानी-ध्यानी और मुकुटधारी विद्वान अपनी साख तक मिटा चुके हैं।

‘’राज सत्ता के सामने, उसे झुकाने वाली, एक विचार सत्ता होती है जिसके स्वामी बौद्धिक जन होते हैं। इस सत्ता का लंबा इतिहास है जिसमें अकेला एक तेजस्वी राजदरबार के कोप को चुनौती देता हुआ कह सकता था कि महाराज आप के राज में अन्याय हो रहा है। और महाराजों को उसके सामने झुकना पड़ता था। हमने वह विचार सत्ता खो दी है। अपमान सह कर भी अप्रिय सच को कहने का साहस खो दिया है।‘

‘’अरे यार यही काम तो वे लोग कर रहे हैं जो दमन के विरुद्ध अपने अधिकारों की मॉंग कर रहे हैं, तानाशाही के विरुद्ध छाती तान कर खड़े हो रहे हैं।‘’

’’जिस व्यवस्था में लोग छाती तान कर खड़े हो सकते है, वह तानाशाही नहीं हो सकती। तानाशाही में कानून नहीं तानाशाह की इच्छा का पालन होता है। छाती तान कर खड़े होने वाले तानाशाही में नहीं मिलते। वे दुबक जाते हैं और बुरे दिनों के बीतने की प्रतीक्षा करते हैं। उन्हें उनकी मॉदों तक से निकाल बाहर करके यातना गृहों में डाल दिया जाता है। अब तक का इतिहास यही रहा है।

इतिहास में बदलाव आया है और आज लोग छाती तान कर मूर्खतापूर्ण बातें भी कर सकते हैं। कानून तय करेगा वे सही हैं या गलत। परन्तु अपने नारों से जनता द्वारा चुनी गई सरकार को गिराने के नारे लगाने वालों को यदि भाजपा का वश चले तो भारतरत्न दे दे क्योंकि ऐसे लोग उस क्षति की पूर्ति तो कर ही रहे है जो जोगियो, साधुनियों, और साधुओं ने ही नहीं, सत्ता सुख से वंचित अवसरवादियों ने की है, उनके मुहावरे लाख बचाव के बाद भी जिस समाज में पहुँचते हैं वहॉं लोगों की सोच बदल जाती है।‘’

’’यदि मैं कहूँ यह सब यही सोच कर भाजपा द्वारा कराया जा रहा है तो?’’

‘’मैं कहूँगा तुम उन गधों को समझदार समझते हो और उनका साथ देते हो जो यह तक नहीं जानते कि उनके बड़बोले बच्चे जिन्हें उन्हों ने सिखा पढ़ा कर तैयार किया वे उनका बेड़ा गर्क करने का काम कर रहे है और मोदी की तरह चुप रह कर अपनी खीझ भी नहीं छिपाना जानते। सोचो ऐसे मनबढ़ों को देश को सौंप कर कोई निश्चिन्त हो सकता है । ये सभी मिल कर यह सिद्ध करने पर उतारू हैं कि इस देश की रक्षा और विकास की चिन्ता् केवल भाजपा को है, भले वह तुम्हारी मूर्खता के कारण ही हो।‘’