दिल सिकुड़ता है तो होकर भी नही होता है
फैलता है तो बज़ाहिर है क़यामत समझो
नार्मल हो गया तो पाँव संभलकर रखना
आने वाली है फ़क़त आपकी शामत समझो
बचना है तो इसे बस उनके हवाले कर दो.
कहो तुम अबसे इसे मेरी अमानत समझो
वह रखना चाहें तो बस चल न सकेगा लेकिन
किया वापस तो इसे उनकी दयानत समझो.
मैंने भगवान को देखा है तंज़ करते हुए
बुरा न मानो पुरानी है यह आदत समझो.
10/14/2015 10:49:46 PM
Month: October 2015
Post – 2015-10-14
मैं जानता हूँ तू भी इधर आता है अक्सर.
आईना देखता है तो डर जाता है अक्सर.
पहचान भी पायेगा जिसे ढूँढ रहा है
जो खुद करारो कौल पर मिट जाता है अक्सर.
इस राख में भी ताब है इतना बचा हुआ
जो हाथ लगाता है झुलस जाता है अक्सर.
रोता नहीं है चौंक के हट जाता है पीछे
फिर सोचता है और सहम जाता है अक्सर.
जख्मों पर कई बार लगा देता हूँ मरहम
इस दर्दमन्दगी से भी घबराता है अक्सर.
पुचकारता है आ मेरे सीने से तो लग जा
लगते हैं तो वह बर्फ भी बन जाता है अक्सर.
खुद को तलाशने के रास्ते अनेक तो हैं
जिस पर भी चला देखो भटक जाता है अक्सर.
भगवान भी भटकेगा तो बन्दों की खैर हो
वह सोचता है और सिहर जाता अक्सर .
10/14/2015 9:12:56 PM
Post – 2015-10-14
ऋग्वेद के एक अर्धर्च पर रचा एक शेर.
पद आया है अवसाना अनग्ना अर्थात ‘वस्त्र भी नही पहने है और नंगी भी नहीं है.’ एक दूसरा पद है ज्योतिर्वासाना अर्थात ‘प्रकाश का वस्त्र पहने हुए’.
मेरा शेर है
हुस्न ऐसा कि नूर बन गया है पैराहन
न तन ढका है न तो आप बेलिबास ही हैं
यह कलात्मक सौष्ठव किस सांस्कृतिक स्तर को व्यक्त करता है?
Post – 2015-10-13
आज वह लड़ने की तैयारी के साथ आया था. “यह बताओ, तुम्हे किसी ने चोट पहुंचाई थी? किसी बात का मलाल है?”
“मैं समझा नही.”
“तुमने सारे लेखकों को मात्र इसलिए कि वे एक खतरनाक प्रवृत्ति के विरोध में अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं, फासिस्ट, तिकड़मी, जाने क्या क्या कह दिया. तुम्हे कभी कभी झेलना मुश्किल हो जाता है. फासिस्ट का मतलब जानते हो.”
“अरे भाई एक ज़माने में यह एक विवादास्पद फलसफा था. नाज़ियों के पतन के बाद एक गाली बन गया – एक ऎसी गाली जिसमे नफ़रत और दहशत फैलाने की क्षमता हो. जिससे सख्त चिढ हो उसे फासिस्ट कह कर छुट्टी कर दी. आपसी विरोध के दिनों में रूस और चीन एक दूसरे को फासिस्ट कहते थे. कम्युनिस्टों को संसदवादी लाल फासिस्ट कहते थे. मैं तार्किक विरोध की जगह इस गाली का इस्तेमाल करने वालों को फासिस्ट कहता हूँ. शब्दों का अर्थ इतिहास में जाकर नहीं समझा जा सकता, उनका जिस तरह इस्तेमाल हो रहा है उससे समझना होगा.”
वह कुछ सोच में पड़ गया. “परन्तु फासिस्ट प्रवृत्ति का विरोध करने वाले, बिना कुछ कहे, जो मिला था उसे लौटाने वाले, तो किसी को गाली दे भी नही रहे थे. उलटे तुम उनको गाली दे रहे थे. तुम्हे क्या कहा जाय?”
“ज़रूरी नही कि मेरे सभी विचार दुरुस्त ही हों. परन्तु मैं कुछ कहूँ नहीं सिर्फ तुम्हारी ओर मुंह करके थूक दूँ या थूकूँ भी नहीं सिर्फ थूः कह दूँ तो क्या यह कम घृणित काम होगा? वह भी तब जब गलती किसी और की हो और कार्रवाई किसी दूसरे को करनी हो और वह कर भी रहा हो.”
वह फिर पशोपेश में पड़ गया, “पर जिस तरह तुमने उनकी मलामत की वह तो उनके नहीं तुम्हारे किसी फ्रस्ट्रेशन का नतीजा लगता था. कही तुम इस बात पर तो नहीं कुढ़े थे कि तुम्हारे पास तो लौटने को कुछ है ही नही तुम कैसे साबित करोगे कि इन दुर्घटनाओं पर तुम्हे किसी से काम मलाल नही है.”
“अरे तुमने तो सवाल के साथ एक जवाब भी तलाश लिया. यह केवल पुरस्कार प्राप्त लेखकों की चिंता का प्रश्न नही है सभी लेखकों, चिंतकों, पत्रकारों की चिंता का प्रश्न है. उदयप्रकाश ने जब पुरस्कार लौटाते हुए अपना प्रतिरोध प्रकट किया था तो मैंने यही सुझाया था कि पत्र पत्रिकाओं में जो लेखक आये दिन की घटनाओं पर लिखते रहते हैं उसे इसे पूरे आक्रोश के साथ उठाना और क्षोभ प्रकट करना चाहिए. फेस बुक पर दर्ज़ मिटता नहीं है. तलाशो तो मिल जाएगा. कई स्थानों पर सभाओं आदि से यह काम हुआ भी पर यह सम्मान वापसी तो भड़ैती बन कर रह गई जो स्वयं अकादमी को और लेखको को शर्मशार करती है. ” सच कहो तो आवेश सबसे अधिक अशोक वाजपेयी पर था. वह अकेले हैं जो नष्ट या पंगु हो चुकी संस्थाओं को लेकर इतने चिंतित रहते है . वह भी इस तमाशे में शामिल हो जाएँ. एक ने पत्थर उठाया फ़ेंक दिया, फिर दूसरे को यह चिंता की हम पीछे क्यों रहें. फिर एक के बाद एक. संगसार और क्या होता है? तरीका तो वही है? गुस्सा अकादमी पर उतारना क्या विवेक सम्मत है? इसके परिणाम का ध्यान है किसी को?’
“परन्तु..”
“अब किन्तु परन्तु नहीं. मुझे जल्दी लौटना है. यह परन्तु कल के लिए.”
Post – 2015-10-12
अपनी प्रशस्ति किसे प्यारी नहीं होती. चन्द सर हिलाने वालों के बीच जो चुप रहते हैं वे भी कुछ कहते हैं. वे कहते हैं मैं सहमत नहीं हूँ या मैं अभिभूत हूँ. कौन निर्णय करेगा आप असहमत हैं या अभिभूत .सहमत नहीं हो तो आपत्ति तो दर्ज़ करो, प्रश्न तो करो. न किया तो चुप्पी का लाभ उसे मिलेगा जो अपनी बात रख चुका है और जिसका जवाब किसी के पास नहीं है. अपने को बचाने के लिए मेरे विचारों पर हमला करो. न किया तो तुम्हारी चुप्पी का अर्थ होगा मेरा समर्थन. इतनी समझ तो हो की विजय लड़कर ही पाई जाती है, पीछे हटकर नहीं.
10/12/2015 9:24:23 PM
Post – 2015-10-12
तुम्हारे साथ एक गड़बड़ी है. तुम एक अवसर पर जिस बात को ग़लत कहते हो, दूसरे पर उसी का इस्तेमाल कर के सही को गलत साबित कर देते हो.”
मैं सचमुच हैरान हो गया, “मैं समझा नहीं, तुम क्या कहना चाहते हो. ज़रा खुल कर बताओ.”
“तुमने एक दिन कहा था किसी भिन्न देश या काल के निष्कर्षों के सहारे न तो हम अपनी समस्याओं को समझ सकते हैं, न ही उन्हें सुलझा सकते हैं. हमारी समस्या यहां और अब हैं और प्रत्येक समस्या का चरित्र अलग होता हैं. कल तुमने एक आदिम जाति में दो सौ साल पुरानी एक प्रथा के दृष्टान्त देकर और सौ हाल पुराने यूरोप के एक चिंतक के कथन की आड़ में हमारे समाज के सर्वोत्तम मेधा के लोग, बिलकुल आज के और अभी की सूचनाओं से लैस लोग, जो कर रहे हैं उसे किनारे लगा दिया. अपराधियों को बचाने के लिए तुमने उन्हें ही अपराधी बना दिया. तुमने गलत लाइन चुनी. तुम्हे तो क्रिमिनल लायर होना चाहिए था. धूम मच जाती तुम्हारी और पैसे यूं बरसते कि…”
मैं हंसने लगा, “इसका मतलब तुम्हे रात भर नींद नहीं आई और करवटें बदलते हुए मेरे कहे का जवाब ढूंढते रहे, पर जो कहा उसे समझने की कोशिश नहीं की.”
“समझता क्या खाक. उसमें समझने की बात थी कहाँ. वह तो कोरी वकालत थी और वह भी बचाव पक्ष से.”
मैं यह सुनकर ज़ोर से हंसा तो वह तिलमिला गया, “बड़े बेहया आदमी हो यार. मैं तुम्हे फटकार रहा हूँ और तुम हँसे जा रहे हो. इसमे हँसने की कौन सी बात है?”
तुमने हमारे समाज की सर्वोत्तम मेधा का पता कब लगा लिया? कोई सर्वे हुआ था? ”
“सर्वे की ज़रूरत तुम जैसों को अपना केस तैयार करने के लिए पड़ती है. ये जो साहित्य अकादमी से सम्मान प्राप्त साहित्यकार हैं इन्हे तुम क्या कहोगे?”
“पुरस्कार जुटाने की दिशा में प्रयत्नरत और अपने प्रयत्न में सफल लोग. इसमें सर्वोत्तम मेधा का सवाल कहाँ से आगया?”
“यह तुम नहीं तुम्हारी हीनता-ग्रंथि बोल रही है.”
“हो सकता है. अभिव्यक्ति का मौक़ा तो उसे भी मिलना चाहिए. पर उन्होंने ऐसा किया क्या जिससे तुम इतने प्रफुल्लिता हो.”
“वे अकादमी का दिया अपना सम्मान लौटा रहे हैं.”
“सम्मान उन्हें अकादमी से मिला था? उसके पहले सम्मान नही था? तब तो बेचारों को आजीवन तिरस्कार के साथ जीना पडेगा.”
“तिरस्कार के साथ क्यों जीना पडेगा. सारी दुनिया उन्हें सर आँखों चढ़ा लेगी, तुम देखना.”
“तुम्हारा कहना है वे सम्मान लौटा नही रहे हैं. वह जितना सम्मान अकादमी ने दिया था कम पड़ रहा था इसलिए उसे दूना करने के लिए बिना कुछ खोये अकादमी के मुंह पर मार कर वहाँ से लौटती उछाल को लपकना चाहते हैं. बड़े धूर्त लोग हैं तब तो. इन्हे ही तुमने सर्वोत्तम मेधा मान लिया. बड़े गावदी हो यार.”
वह खीझ रहा था. मेरे उत्तर से संतुष्ट नहीं था पर उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. सोचा उसकी मदद करनी चाहिए. मैं गम्भीर हो गया. “मैं तुम्हारी पीड़ा समझता हूँ. तुम्हारे एक एक प्रश्न का उत्तर दूंगा. तुम्हें बीच में टोकना नहीं होगा. तैयार? ”
“ठीक है.”
पहली दृष्टान्त की. उसका काम समाधान देना नहीं. प्रकाश देना है जिससे तुम जैसे कमज़ोर नज़र के लोग भी साफ़ देख सकें.”
वह तिलमिलाया पर कुछ बोला नही. “रही यूरोप के एक दार्शनिक के विचार की बात. तो तुम जिन्हे बता रहे थे उन्हें अपनी नज़र और अक़्ल पर भरोसा ही नहीं. वे तभी समझते हैं जब पश्चिम का कोई विद्वान या अनति-विद्वान बताये कि तुम जिसे देख रहे हो वह वह नही है जो तुम समझ रहे हो. वह वह है जो मैं देख रहा हूँ.”
“बहुत जुमलेबाजी करते हो. सीधे नही बोल सकते?”
“देखो उन्नीसवीं शताब्दी में ही भारतेंदु और सैय्यद अहमद खान ने कहा था जब तक अंग्रेज़ी रहेगी तबतक देश की उन्नति नहीं हो सकती..”
“सैयद अहमद ने तो मुसलमानों को अपनी ज़बान के दायरे से बाहर आकर अंग्रेज़ी सीखने पर ज़ोर दिया था.”
“वह तो यह सोचकर कि सरकारी नौकरियों में पिछड़ न जाएँ. लन्दन यात्रा के दिनों में अंग्रेज़ों की तरक़्क़ी से प्रभावित होकर वह जिस नतीजे पर पहुंचे थे वह उनके विचार के अंग्रेजी उलथे में यह है. The cause of England’s civilisation is that all the arts and sciences are in the
language of the country …I should like to have this written in gigantic letters on the Himalayas, for the remembrance of future generations.
पर इससे तुम कहना क्या चाहते हो. साहित्य अकादमी तो भारतीय भाषाओँ की रचनाओं पर ही सम्मान देती है.”
“कहना यह चाहता हूँ कि हमारे सबसे मेधावी पुरस्कार विजेताओं की समझ में यह मोटी सी बात ओक्टोविओ पाज़ के मुंह से सुनने पर आज से चालीस साल पहले आई और इसे उन्होंने हमें बताने में इतना समय लगा दिया.”
अब रही सम्मान की बात. अकादमी देना भी चाहे तो किसी को सम्मान नहीं दे सकती. इसकी खेती वहाँ नहीं होती न आढ़त लगाई जाती है. सम्मान लेखक को अपने पाठकों से मिलता है. जिसे मिलता है वह जिस चीज़ से जुड़ता है, उसके सम्मान का एक छोटा सा अंश उसे भी मिलता है. यदि अकादमी अपना काम सही सही करे तो इन सम्मानित लेखकों के सम्मान का वह अंश उसे भी मिलेगा. वह स्वयं सम्मानित लेखकों के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करके सम्मानित होगी. अकादमी अपनी और से पुरष्कार देती है और उसके साथ तमगा बिल्ला भी लगा देती है. पुरस्कार देने की व्यवस्था है पर वापसी का नही, इसलिए तमगा बिल्ला वापस भी हो जाय पर जो धन दिया जा चुका है, अकादमी की और से जो प्रचार किया जा चुका है वह वापस नहीं हो सकता है. इसलिए यह राजनीतिक नाटक का साहित्यिक मंचन है.
“परन्तु यह बहुत गैरजिम्मेदाराना तरीका है. कुछ दूर तक फासिस्ट.”
“हद करते हो, इसमें फासिज़्म कहाँ से घुसा दिया?
“जिस अकादमी से मिले हुए पुरस्कार को लोग लौटा रहे हों उससे पुरस्कार लेना गर्हित बना दिया जाएगा या नहीं. पुरस्कार अकादमी देती है और आपका गुस्सा मोदी से है. जब तक मोदी सरकार है तब तक पुरस्कार लेना कलंकित होने का पर्याय बनेगा या नही? यह एक महान संस्था को नष्ट करना हुआ या नहीं. फासिस्ट तरीका हुआ या नहीं? ”
“बात तो तुम्हारी कुछ ठीक लगा रही है.”
“और ऐसे ही नासमझ, कुटिल, लोगों को तुम सर्वोत्तम मेधा कह रहे थे जिन्हे यह भी पता नहीं कि वे जो कर रहे हैं उसका नतीजा क्या होगा.?”
वह झेंप सा रहा था. मैंने कहा, और देखो, अकादमी ने इन्हे पुरस्कृत भी नही किया था, इसका जिस सत्ता में पैठ बना कर इन्होने जुगाड़ कर लिया था उसको उखाड़ने वाले को ये पहले दिन से ही कोसते आये हैं इसके लिए मैं इनका सम्मान भी करता हूँ. नमक का मोल तो चुका ही रहे हैं.
10/12/2015 1:56:26 PM
Post – 2015-10-11
edited version:
“फासिज़्म क्या है, इसे क्या मैं उससे सीखूंगा जो फासिस्टों के साथ खड़ा है/” उसने सामना होते ही ललकारा.
मैंने हँसते हुए कहा, “तुम्हारा माथा गरम है. पहले कुछ देर छाया में बैठें फिर समझना चाहोगे तो उस के चरित्र को भी समझ लिया जाएगा.” ज़ाहिर है हमारा मिलना पार्क में चहलकदमी करते हुए ही होता है इसलिए आमना-सामना हो ही जाता है. मेरे प्रस्ताव पर वह बैठने को राज़ी हो गया, पर यह मानने को नही कि उसका माथा गरम है और उसे ठंढा करने की ज़रूरत है. बैठने के बाद स्वर अवश्य बदल लिया. मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “तुम जिस राह पर जा रहे हो, अकेले पड़ जाओगे. ये इतने सारे लेखक, पत्रकार, अध्यापक क्या मूर्ख हैं जो…”
मैंने कहा, “इतने सारे लोग एक जैसा सोचते हैं तो वे मुर्ख कैसे हो सकते हैं? मूर्खों की जमात अवश्य हो सकते हैं. क्योंकि जब सभी एक जैसा सोचते हैं तो सोचता तो कोई एक ही होगा न, दूसरे तो इसलिए मान लेते हैं कि जब सभी ऐसा सोचते हैं तो उनसे अलग राय रखना मूर्खता होगी. वे मूर्ख माने जाने के डर से सहमत हो जाते हैं . इसे भेंड धसान कहते हैं. सोचने वाला भीड़ के साथ नहीं होता है. अकेला होता है. वह संगसार करने वालों में से एक नहीं होता, वह अलग खड़ा चीखता है कि यह हो क्या रहा है? ”
“और आज जब सभी चीख रहे हैं कि यह हो क्या रहा तब?”
“वे चीख नहीं रहे हैं. हल्ला बोल रहे हैं. एक तरफ के हल्ले के बाद दूसरी तरफ का हल्ला. उत्पीड़ित उसी को कर रेक हैं जिसे पहले हमलावरों ने किया था. बुद्धिजीवी की चीख वस्तुस्थिति के विश्लेषण के रूप में आती है. वह तो कहीं दिखायी ही नही देती. एक दारुण त्रासदी में से अपनी अपनी …
“तुम नहीं समझोगे इसे, इसलिए एक दृष्टान्त से समझाता हूँ. दो सौ साल पहले तक सबरों में मरियाप्रथा का चलन था. वे दूसरे समुदाय के किसी नन्हे बच्चे को चुरा लाते थे और उसको पालते थे. कहानी का अंत यह कि जिस दिन उसकी बलि दी जाती थी उसे गाजेबाजे के साथ ले जाते थे. एक गड्ढा खोद कर उसमे पहले एक सूअर की बलि दी जाती थी. सूअर के रक्त वाले गड्ढे में नशे में धुत्त इस बालक का सर इस तरह दबा देते थे कि दम घुट कर उसकी मौत हो जाए. उसकेद उसकी एक एक बोटी काट कर अपनी अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए ले कर भागते हैं.
तो मुझे लगता है राजसत्ता की राजनीति करने वालों से लेकर साहित्य और विचारसत्ता की राजनीति करने वाले तक अपनी अपनी बोटियाँ काटने पर जुटे हैं. उनका लेखन एक बहुरंगी शोर का हिस्सा है जिसमें बाजे-गाजे का शोर भी शामिल है.
“अब तक ऐसा एक भी विश्लेषण नही कि किन प्रवृत्तियों के बढ़ने से एक ऎसी संस्था जो आपकी नज़र में फासिस्ट है, लोकप्रियता पाते हुए सबसे प्रभावशाली हो गयी? आप जो क्रांति न सही, पूरे तंत्र को बदलना चाहते थे, और पूरे ज़माने की आवाज़ पर आप का नियंत्रण था, आपने कभी सोचा, किन कारणों से आप की अपनी आवाज़ तक अलग सुनाई नहीं देती, ले-दे-कर धर्मनिरपेक्षता के तंग और दागी मैदान की धूल ही हाथ रह गई, जहाँ दागदार लोगों के पाँव पहले से जमे हुए हैं? आपकी आवाज दंतहीन बूढ़े के मुंह से बोलने की चेष्टा में निकली फुस्स बन कर क्यों रह गयी? कहीं है ऐसा कोई विश्लेषण? यदि है तो उसे ध्यान से पढ़ा तक है आपने? क्या आपको पता है कि आप उसी लेखक से बात कर रहे हैं जिसने आज से पचीस छब्बीस साल पहले, बाबरी मस्जिद के गिरने से पहले ऐसा विश्लेषण किया था और आगाह किया था कि इसका परिणाम यह होगा. उसके बाद उसके पीठ पीछे षड़यंत्र शुरू हो गया, पर नतीजे तो वे ही सामने आये.
Everet Knight का एक वाक्य मेरे प्रेरक वाक्यों में रहा है. उसे तुम भी सुन लो. The ills of society are the ills of those whose business it is to do its thinking. Our intellectuals not only have ceased to think, they consider it their duty not to think – their function being to to compile facts out of which will emerge the Truth by immaculate conception. …By thinking abstractedly, or by refusing to think at all, the intellectuals have ceased to count. (The Objective Society, 1959, p. 11
पर फसिस्म पर तो बात रह ही गयी. कल सही.
10/11/2015 1:15:59 PM
Post – 2015-10-11
“फासिज़्म क्या है, इसे क्या मैं उससे सीखूंगा जो फासिस्टों के साथ खड़ा है/” उसने सामना होते ही ललकारा.
मैंने हँसते हुए कहा, “तुम्हारा माथा गरम है. पहले कुछ देर छाया में बैठें फिर समझना चाहोगे तो उस के चरित्र को भी समझ लिया जाएगा.” ज़ाहिर है हमारा मिलना पार्क में चहलकदमी करते हुए ही होता है इसलिए आमना-सामना हो ही जाता है. मेरे प्रस्ताव पर वह बैठने को राज़ी हो गया, पर यह मानने को नही कि उसका माथा गरम है और उसे ठंढा करने की ज़रूरत है. बैठने के बाद स्वर अवश्य बदल लिया. मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “तुम जिस राह पर जा रहे हो, अकेले पड़ जाओगे. ये इतने सारे लेखक, पत्रकार, अध्यापक क्या मूर्ख हैं जो…”
मैंने कहा, “इतने सारे लोग एक जैसा सोचते हैं तो वे मुर्ख कैसे हो सकते हैं? मूर्खों की जमात अवश्य हो सकते हैं. क्योंकि जब सभी एक जैसा सोचते हैं तो सोचता तो कोई एक ही होगा न, दूसरे तो इसलिए मान लेते हैं कि जब सभी ऐसा सोचते हैं तो उनसे अलग राय रखना मूर्खता होगी. वे मूर्ख माने जाने के डर से सहमत हो जाते हैं . इसे भेंड धसान कहते हैं. सोचने वाला भीड़ के साथ नहीं होता है. अकेला होता है. वह संगसार करने वालों में से एक नहीं होता, वह अलग खड़ा चीखता है कि यह हो क्या रहा है? ”
“और आज जब सभी चीख रहे हैं कि यह हो क्या रहा तब?”
“वे चीख नहीं रहे हैं. हल्ला बोल रहे हैं. एक तरफ के हल्ले के बाद दूसरी तरफ का हल्ला. उत्पीड़ित उसी को कर रेक हैं जिसे पहले हमलावरों ने किया था. बुद्धिजीवी की चीख वस्तुस्थिति के विश्लेषण के रूप में आती है. वह तो कहीं दिखायी ही नही देती. एक दारुण त्रासदी में से अपनी अपनी …
“तुम नहीं समझोगे इसे, इसलिए एक दृष्टान्त से समझाता हूँ. दो सौ साल पहले तक सबरों में मरियाप्रथा का चलन था. वे दूसरे समुदाय के किसी नन्हे बच्चे को चुरा लाते थे और उसको पालते थे. कहानी का अंत यह कि जिस दिन उसकी बलि दी जाती थी उसे गाजेबाजे के साथ ले जाते थे. एक गड्ढा खोद कर उसमे पहले एक सूअर की बलि दी जाती थी. सूअर के रक्त वाले गड्ढे में नशे में धुत्त इस बालक का सर इस तरह दबा देते थे कि दम घुट कर उसकी मौत हो जाए. उसके बाद उसकी एक एक बोटी काट कर अपनी अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए ले कर भागते हैं.
तो मुझे लगता है राजसत्ता की राजनीति करने वालों से लेकर साहित्य और विचार सत्ता की राजनीति करने वाले अपनी अपनी बोटियाँ काटने पर जुटे हैं. उनका लेखन एक बहुरंगी शोर का हिस्सा है जिसमें बजे-गाजे का शोर भी शामिल है.
“ऐसा एक भी विश्लेषण नही कि जिन प्रवृत्तियों के बढ़ने से एक ऎसी संस्था जो आपकी नज़र में फासिस्ट है लोकप्रियता पाते हुए सबसे प्रभावशाली क्यों हो गयी? आप जो क्रांति न सही पूरे तंत्र को बदलना चाहते थे और पूरे ज़माने की आवाज़ पर आप का नियंत्रण था, किन गलतियों के कारण आप की अपनी आवाज़ तक अलग सुनाई नहीं देती, ले देकर धर्मनिरपेक्षता के तंग और दागी मैदान की धूल ही हाथ रह गई जहाँ दाग दार लोगों के पाँव पहले से जमे हुए हैं? आपकी आवाज दंतहीन बूढ़े के मुंह से बोलने की चेष्टा में निकली फुस्स बन कर क्यों रह गयी? कहीं है ऐसा कोई विश्लेषण? यदि है तो उसे ध्यान से पढ़ा तक है तुमने ? क्या तुम्हे पता है तुम उसी लेखक से बात कर रहे जिसने आज से पचीस छब्बीस साल पहले, बाबरी मस्जिद के गिरने से पहले ऐसा विश्लेषण किया था और आगाह किया था कि इसका परिणाम यह होगा. उसके बाद उसके पीठ पीछे षड़यंत्र शुरू हो गया.
Everet Knight का एक वाक्य मेरे प्रेरक वाक्यों में रहा है. उसे तुम भी सुनलो. The ills of society are the ills of those whose business it is to do its thinking. Our intellectuals not only have ceased to think, they consider it their duty not to think – their function being to to compile facts out of which will emerge the Truth by immaculate conception. …By thinking abstractedly, or by refusing to think at all, the intellectuals have ceased to count. (The Objective Society, 1959, p. 11
पर फसिस्म पर तो बात रह ही गयी. कल सही.
10/11/2015 1:15:59 PM
Post – 2015-10-10
वह अगले दिन मिला तो खासे उत्साह में था, “हाँ, बताओ पीटने वाले ग़लत थे तो उनका काम कैसे सही था?”
मैंने कहा, “उन्हें पीटना तुमको था और पीट बैठे उस बेचारे को जो तुम्हार बहकावे में आकर एक सुर्खियां बटोरना चाहता था.”
उसने कहा तुम फँस गए हो इसलिए कन्नी काट रहे हो. सच कहो तो तुम्हारी सोच आरएसएस की सोच है. तुम काइयाँ हो इसलिए घुमा फिरा कर बात करते हो कि पकड़ में न आओ.”
मैंने कहा, “यदि आरएसएस की सोच वही है तो मैं नाहक़ बेचारों के बारे में मुगालता पाले हुआ था. मुझे इसका ध्यान ही न रहा कि इस देश को आरएसएस ने ही संभाल रक्खा है नहीं तो तुमलोगों का वश चले तो देश में आग लगा दो और फायर ब्रिगेड के रस्ते में खड़े हो जाओ कि काम पूरा होने पर आना.”
“तुम्हे हो क्या गया है?” गाली भी बेअसर हो गयी तो वह परेशान हो गया. “यह जो होरहा है वह तुम्हे ठीक लगता है?”
“नहीं लग रहा है तभी तो कहा रहा हूँ कि तुम लोगों की अच्छी तरह धुनाई होनी चाहिए, तभी देश बचेगा.”
“तुम जानते हो तुम क्या कह रहे हो?”
“कह यह रहा हूँ कि वैदिक ऋषि गोमांस खाते थे इसे लगातार दुहराते हुए हिन्दुओं की भावना को भड़काते रहे और जब भड़क गई तो दोष उनको देते हो जिन्हे तुमने भड़काया.
“यह तो ऐतिहासिक सच्चाई है. इसमें गलत क्या है?”
“ऐतिहासिक सचाई तो यह भी है कि क़ायदे आज़म भी कुछ खाते थे. प्रश्न यह है कि क़ायदे आज़म के सन्दर्भ में सबसे ज़रूरी सूचना यही है और इसे केन्द्रीय मुद्दा बनाने वाले ऐतिहासिक सचाई की खोज कहेंगे या मुस्लिम समुदाय को भड़काने का ? पढ़े लिखे मुसलमान इसे पढ़ कर किनारे डाल भी दें तो भी क्या खुराफात करने वालों को इसका इस्तेमाल करने से भी रोक लेंगे ? आग लगाने वाले हाथों से अधिक बड़ा अपराधी आगज़नी के लिए पेट्रोल और माचिस थम्हाने वाला हाथ और दिमाग होता है ?”
“लेकिन यह बात तो तुमने भी अपनी किताब में लिखी है. तुम ऐसा कैसे कहा सकते हो.”
“मुझसे पहले यह भवभूति भी लिख चुके हैं. काणे भी लिख चुके हैं. कौसम्बी भी लिख चुके हैं. पर उससे कोई क्षुब्ध हुआ?
“फिर हमने उसी बात को दुहरा दिया तो क्या आफत आगई? उन्होंने कहा तो सत्य कहा और हमने कहा तो फरेब?”
“प्रश्न सत्य या असत्य का नही होता. सही सन्दर्भ में एक कथन सूचना होता और हमारी समझ को विकसित करता है. वही बिना सन्दर्भ के गाली बन जाता है. उज्जवल पक्षों पर परदा डाल कर केवल आहत करने वाले पक्षों का चुनाव या आविष्कार करने वाले खुराफात की जड़ होते हैं. सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का काम वे करते हैं. जिन्हे तुम कोसते हो वे तो victim हैं. असली अपराधी तुम लोग हो. बात अकेले गोमांस की तो है नहीं. इसीलिए कह रहा था “पीटना तुम्हे था और पीट दिया मुखौटे को. वह बेचारा तो सिर्फ सुर्खियां बटोरने के चक्कर में फंस गया.”
उसने लटके हुए मुंह से कहा, “पिट तो रहे हैं. कहाँ थे और इन्हीं बेवकूफियों के कारण कहाँ पहुँच गए और पता नही कहाँ पहुंचेंगे. फिर भी तुमने फासिस्टों की वकालत बहुत अच्छी की.”
मैंने कहा, “फासिस्ट कौन हैं इसे समझने के लिए तुम्हें कल आना पडेगा.”
Post – 2015-10-09
आज वह बहुत खिन्न था. बोला, “देखा, कश्मीर विधान सभा में भाजपा के विधायकों ने एक इंजीनियर को इस लिए पीट दिया कि उसने गोमांस के प्रति दुराग्रह को चुनौती देने के लिए गोमांस की एक खुली दावत दी थी”.
मैंने पूछा, “इंजीनियर विधान सभा में पहुंचा कैसे?”
“वह विधायक था.”
“फिर वह इंजीनियर कैसे हुआ?”
“पहले वह इंजीनियर था.”
“जब वह पीटा गया तब, वह् क्या था. इंजीनियर या विधायक?”
अब उसकी आवाज़ नरम पड़ गयी थी, ‘था तो विधायक ही.”
“फिर तुम उसके इतिहास पर बात कर रहे थे या वर्तमान पर? तुम खुलकर बात करना चाहते थे या अपने को सही साबित करना चाहते थे?”
वह झुँझला गया, “मैं उस नतीजे की बात करना चाहता था जो इसके बाद आएगा.’
मैंने कहा, उसने जो प्रतिज्ञाएँ की थी उनका पालन किया था या नहीं ? यदि हाँ और उनमे किसी भारतीय की भावनाओं को आहत न करने की प्रतिज्ञा भी हो तो उसने उसका उल्लंघन किया था और इसलिए उसका पीटा जाना ज़रूरी था. पर पीटने वाले सही न थे इसे तुम कल समझना.