Post – 2016-08-21

निदान – 26

एक

”तुम भले कहो कि तुम विश्‍व सभ्‍यता को विश्‍वमानवता की साझी विरासत मानते हो, परन्‍तु एक तो यह बात कुछ अतिरंजित लगती है और दूसरे तुम्‍हारे अपने मित्र भी इसका सीमित अर्थ ही लेते हैं कि भारत सबसे अच्‍छा देश, हिन्‍दू सभ्‍यता सबसे उन्‍नत सभ्‍यता और ….”

”सभी मनुष्‍यों में वे सबसे अच्‍छे ।” मैंने हँसते हुए उसका वाक्‍य पूरा किया।

“हाँ, यह भी कह लो !”

“यह हमारा राष्ट्रीय चरित्र है. जब तुम अपने को सबसे अधिक धर्म निरपेक्ष सिद्ध करने के लिए वाहियात आरोप गढ़ते हुए अपने को सिर्फ इसी आधार पर दूसरों से अधिक अच्छा सिद्ध करना चाहते हो तब तुम भी यही कर रहे होते हो. यह हमारी सांस्‍कृतिक अन्तःसलिला का प्रवाह है जिसे हम जब लक्ष्य नहीं करते या दबाने का प्रयत्न करते हैं तब भी प्रवाहमान रहती है. यह तुम भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों में भी पाओगे. उनमें भी जो घोषित रूप में हिन्दुत्व का विरोध या इसकी निंदा करते हैं. सिर्फ शक्ल का अंतर नहीं, मिजाज का यह अंतर भी उन्हें दूसरे देशों के मुसलामानों और ईसाइयों से अलग करता है भले वे इस विषय में सचेत न हों. इसलिए वे यदि हिन्‍दुओं को विश्व सभ्यता का जनक मान बैठें तो उनके इस भरम का मैं बुरा नही मानूँगा. हाँ उनकी समझ पर भरोसा नहीं करूँगा.”

“सच तो यह है कि वे तुम्हारी समझ पर भरोसा नहीं करते. वे इसको कन्सीव ही नही कर पाते.”

“जब मेरे इतने निकट होकर तुम नहीं कर पाते हो तो उनसे शिकायत क्यों करूँ ? मैं इसका कारण जानता हूँ, तुम्हे शायद पता न हो. कन्सीव करने के लिए यूँ भी जैसे शारीरिक विकास का एक स्तर अपेक्षित होता है, उसी तरह वैचारिक विकास का एक स्तर अपेक्षित होता है. उसके अभाव में पूरी बात ग्रहण नहीं हो पाती. फिर जानकारी का एक दायरा जरूरी होता है. उसमे पहले से कुछ उहापोह की ज़रूरत होती है. परंतु सबसे अधिक ज़रूरी होता है उस मान्यता के निकट पड़ने वाली कुछ आधी अधूरी ही सही, बातों को किसी न किसी सन्दर्भ में पढ़ा या सुना होना. यदि बात इतनी नई हो और अतीत में इतने पीछे खींच ले जाती हो जहां तक पहले के धुरीण विद्वानों में भी कोई न पहुँचा हो तो वह कितनी भी प्रामाणिक क्यों न हो, हमें लाजवाब करने के बाद भी, बिलकुल सच प्रतीत होते हुए भी, अपेक्षा से बहुत आगे चले जाने के बाद जादू के खेल जैसा लगेगी जिसे हम प्रत्यक्ष देखते हुए भी विश्वास नहीं कर पाते. और ऊपर से यह प्रस्ताव यदि किसी ऐसे व्यक्ति की और से आ रहा हो जिसके विरुद्ध एक छिपा दबा अभियान लंबे समय से चलता आया हो तो उसके किसी विचित्र प्रस्ताव को तो यह कह कर ही ख़ारिज किया जा सकता है कि भी इनको तो चौंकाने वाली बातें करने की आदत है. अब तुम सुन भी रहे हो, बात समझ में भी आरही है, पर इस एक लटके के साथ तुम्हारी ही बुद्धि पर पत्थर पड़ जाएगा जैसे तुम्हारी बुद्धि पर पड़ा हुआ है.

परन्‍तु सभ्‍यता अपने सभी चरणों पर वैश्विक ही रही है, इसमें किसी का शोषण और उसकी संपदा की लूट का योगदान हो, दूसरे के लोभ का, तीसरे के कौशल का, चौथे के हाथ और पॉंचवे की पीठ का, एक के कारखाने और दूसरे के कच्‍चे माल और बाजार का । ये भूमिकाएं जीवट, पहल और जागृति के अनुसार बदलती रहती हैं। देखना यह होता है कि हम पिस रहे हैं या पीस रहे है और हमें अपने को बचाना या अपनी भूमिका बदल कर रंगमंच पर नये तेवर से उपस्थित होना है।

दो

यदि सभ्‍यता के निर्माण और विकास में समस्‍त मानवता का योगदान रहा है और आज के नितान्‍त पिछड़े समाजों ने भी किसी न किसी चरण पर अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया है तो वहीं कोई ऐसा चरण न रहा जब इसके शत्रु और विनाश के लिए तत्‍पर लोग न रहे हों। आत्‍मगौरव जरूरी है, परन्‍तु आत्‍मगौरव वश यह सोच लेना कि हम सबसे अग्रणी रहे हैं, इसलिए दूसरे हमसे ग्रहण करें, हम किसी से कुछ न लेंगे। पिछड़े समाजों के पिछड़ेपन का कारण उनका बुद्धि और कौशल के माने में दूसरों से कम रह जाना नहीं, अहंकार वश उस चरण के बाद भी दूसरों से सीखने में अपनी हेठी अनुभव करना रहा है। हमें पिर‍ामिडों के कौशल और वास्‍तुशिल्‍प पर उस काल की सीमा का ध्‍यान रखते हुए आश्‍चर्य होता है परन्‍तु उससे कम आश्‍चर्यजनक सन्‍तुलन का वह बोध नहीं है जिसे हम एक पर एक बिना किसी गारे मसाले के रखे अनगढ़ शिलाखंडों की चिति नहीं है जो आंधियों तूझानों को झेलती अपने सन्‍तुलन के बल पर टिकी रहती है। इन दोनों के बीच एक संबंध है और क्रूर सचाई भी है। संबंध यह कि नगर निर्माण, पुल निर्माण, पथ निर्माण, दिशा बोध, प्राथमिक खगोलविद्या सभी के सूत्र इन जनों से जुडे़ हुए हैं । अपनी कला और ज्ञान और इसमें असाधारण निपुणता के प्रति इनका समर्पण भाव इतना गहन था कि किसी तरह पेट भरने का प्रबन्‍ध हो जाय तो ये अपना सारा समय अपनी कला में ही लगा देंगे। इसके चलते इनका शोषण भी हुआ और यदा कदा दमन भी।

” इनकी छाप भारत के मेगालिथ, चीन के मेगालिथ, फ्रांस, स्‍काटलैंड, बुल्‍गारिया और मिश्र तक ही नहीं माया सम्‍यता में भी पाई जाती है और इनके योगदान की सही समझ न होेने के कारण विद्वानों ने भी मूर्खतापूर्ण अटकलें लगा रखी हैं। मूलत: जिस भी क्षेत्र में इस कला और वस्‍तुदृष्टि का विकास हुआ इनका बिखराव मेरी समझ से हिमयुगीन आपदा के कारण हुआ, दोनों गोलार्धों में।

”ये विज्ञान के जनक हैं परन्‍तु इसके बाद अपने अभिमान में ये अपने आत्‍मराग के कारण न समय के साथ चल सके, न अपनी पुरानी योग्‍यता की रक्षा कर सके और तक्षकों के रूप में इन्‍होंने कुशल श्रमिक बन कर वास्‍तुकला, मूर्तिकला, और सिविल इंजीनियरी आदि का विकास किया परन्‍तु धन के स्रोतो पर अधिकार करने वाले चतुर लोगों के सेवक बन कर रह गए। इनकी पाषाणी कला से अनाज नहीं पैदा होता था और अनाज पैदा करने वाले दूसरे कलाकारों को रोटी के मोल खरीदते और नचाते रहे। इसी तरह का पागलपन उन जनों में था तो प्रकृति की कृपा से कम समय में ही अपना पेट भरने का प्रबन्‍ध कर लेते थे, इसलिए खाली समय नाचने गाने में लगाते थे। इन्‍होंने क‍विता, नृत्‍य, अभिनय, संगीत में असाधारण प्रगति की परन्‍तु प्रकृति प्रदत्‍त आहार से उनकी अपनी आवश्‍यकताऍं पूरी हो जाती थीं इसलिए कृषिकर्म की ओर कृषिकर्मियों के उकसाने के बाद भी ध्‍यान न दे सके और बाद में जब रोटी की पोषकता और स्‍वाद का पता चला तो रोटी पैदा करने वालों के हाथ के खिलौना बन गए। जानते हो किन्‍नरों, यक्षों, गन्‍धर्वों का संबन्‍ध नृत्‍य, अभिनय और संगीत से तो है ही, इनका क्षेत्र पर्वतीय क्‍यों है ?”

वह चें बोल गया, ”मुझसे ऐसे सवाल क्‍यों करते हो ? मैं हिन्‍दी का अध्‍यापक रहा हूँ कल्‍चरल ऐंथ्रापोलोजी का नहीं ।”

”इसलिए कि पर्वतीय बनों को ठेकेदारों द्वारा नष्‍ट करने और निर्माण कार्यों के उपयुक्‍त पेड़ों को लगा कर जिस तरह के जंगल पहाड़ों पर अब बचे रह गए है, पहले वैसी स्थिति नहीं थी। अपार विविधता थी।

ऋग्‍वेद का एक पद है, गिरिर्न भुज्‍यु, उपमा में कहा गया है कि पर्वतीय क्षेत्रों की तरह भोज्‍य पदार्थों से भरपूर । वहीं ऐसी रंगबाजी संभव थी जिससे रंगमंच का जन्‍म हो सके, नाटक का विकास हो सके। देखो तो, इनमें से किसी का श्रेय खेती करने वालों को नहीं जाता, परन्‍तु उत्‍पादन के महत्‍व को समझने वालों ने संपत्ति के स्रोतों पर अधिकार करके दूसरों का नचाया कहते हुए झिझक होती है, क्‍योंकि वे तो दूसरों को भी कह रहे थे, आहार संग्रह छोड़ कर खेती पर आओ, इसमें अधिक लाभ है, यह अधिक पौष्टिक आहार सुलभ कराता है। उनको अपना जनबल बढ़ाने की इतनी चिन्‍ता थी कि अधिक से अधिक संतान पैदा करना एक पुण्‍य का काम था और कोई भी पुण्‍य का काम करना सन्‍तान प्राप्ति के समान था।”

”तुम कहना क्‍या चाहते हो?”

”कहना यह चाहता हूँ कि तुम मूर्ख हो पर कह नहीं सकता। पूरी बात सुनते तो। चलो, जब छेंड़ ही दिया तो कहूँ कि एक समय में हम भी माइनारिटी सिंड्रोम से ग्रस्‍त थे, परन्‍तु हमारी यह मनोग्रस्‍तता समाज को आगे ले जाने के अभियान से जुड़ी थी, आर्थिक उन्‍नयन से जुड़ी थी और जो जुड़ न पाए वे अपने असाधारण कौशल और संवेदना के बाद भी पिछड़ गए और उन्‍हें सामाजिक अधो‍गति का सामना करना पड़ा जब कि सभ्‍यता का सारा तामझाम उनकी योग्‍यता और अपनी विशेषज्ञता के प्रति समर्पण भाव का ऋ‍णी है।”

उसे एक शेर याद आ गया । याद आ ही गया तो शेर तो शेर है, छलांग लगाकर बाहर तो आएगा ही और आया, ”हमीं से रंगे गुलिस्‍तां हमीं से रंगे बहार । हमीं को नज्‍में गुलिस्‍तॉं पर अख्तियार नहीं।”

”कहो तो ताली बजा दूँ पर यह समझ लो शायरी से समस्‍यायें पैदा होती हैं सुलझती नहीं हैं और कई बार इनका अर्थ उल्‍टा होता है। मुसीबत यह कि मैं खुद सलीके से कोई बात कह पाता ही नहीं।”

”कल कागज पर लिख कर आना और सरकारी फरमान की तरह पढ़ना । हो सकता है, मैं भी मान लूँ।”

Post – 2016-08-20

निदान – 25

फूलहिं फलहिं न बेत

”घालमेल तो तुम भी कुछ कम नहीं करते हो भाई । जब मिल कहता है आल थ्योरीज फ्राम द वेस्ट तो वह तुम्हेंं शैतान नजर आता है। उसी इतिहास को भारत के अभिजात मुस्लिम विद्वानों ने सबसे अधिक महत्व दिया, और वे भी तुम्हें दुष्ट प्रतीत होते हैं। और तुम जब सिद्ध करते हो कि विश्व सभ्यता का जनक भारत है और विचार से ले कर भाषा और ज्ञान और संस्कृति का प्रवाह भारत से पश्चिम की ओर रहा है तब तुम इन्हीं आरोपों से मुक्त हो जाते हो। इसी आधार यदि मैं तुम्हेंं दुष्ट कहूँ तो अपना बचाव कर पाओगे ?

” तुम्हें याद है अंधेर नगरी के राजा का वह न्याय जिसमें वास्तविक अपराधी का पता न चल पाने पर उसने कहा कि फांसी का फन्दा जिसके गले में ठीक बैठेगा, उसे फांसी दी जाएगी और वह फन्दा जब किसी के गले में ठीक बैठा ही नहीं तो सभासदों ने कहा, राजा काे भी इसे पहन कर देखना चाहिए। वह उसे ठीक बैठा और उसे अपने ही न्या‍य के अनुसार फांसी दे दी गई। सच मानो तो ठीक यही हाल तुम्हारा भी होना है। और कोई मुझसे सलाह ले तो मैं कहूँगा गोलचक्कर पर फांसी दो जिससे दूसरों को भी नसीहत मिले।” अपने विचार को वजन देने के लिए वह उठ कर ताली भी बजाने लगा।

”तुम्हारे जैसे मूर्ख श्रोता रहें तो कुछ भी हो सकता है। आए दिन बवाल करने में तुम्हारा इतना समय निकल जाता है कि कोई पूछे कि कर क्या रहे हो, यह हो क्या रहा है ? तो जवाब तक न दे सको । सोचने समझने की फुर्सत तो दूर, धैर्य से सुनने तक की फुर्सत नहीं। कहूँ कुछ, पर उसका एक वाक्य कहीं से लेकर पतंगबाजी करने लगोगे।”

”मैं तो तुम्हारा ही दिव्य वचन दुहरा रहा था। कहने में कोई चूक हो गई क्या?”

”मैं कभी किसी व्य‍क्ति या समुदाय को दुष्ट नहीं कहता, न ऐसा मानता हूँ। यदि मान लूँ तब न तो उसके सुधार की चिन्ता होगी, न उपचार का ध्या्न न रोगनिदान का झमेला। यूँ भी इतिहास में नैतिकता का पहलू वहॉं भी नहीं आता जहाँ किसी काम का परिणाम अनिष्टकर हो रहा हो या हुआ हो। मैं प्रयत्न यह करता हूँ कि उन कारणों, परिस्थितियों और अवरोधों को उजागर कर सकूँ जिनके परिणाम स्वरूप उससे ऐसा हो रहा है या हुआ था। मैं पहले भी इस बात को रेखांकित करता आया हूँ कि इतिहास के समक्ष हम जहाँ अपने को कर्ता समझते हैं वहॉं भी निमित्त बन कर रह जाते हैं। कोई निमित्त अपराधी नहीं हो सकता, न कालदेव को जिनके भीतर क्रियाशील सहकारी और प्रतिरोधी शक्तियों का खेल चल रहा है दोष दिया जा सकता है। इसलिए हम उन शक्तियों या कारकों को समझते हुए उनसे सावधान रह सकें अौर वर्तमान में उनके निवारण या संवर्धन की दिशा में अपने दायित्व का निर्धारण कर सकें, इतना ही हमारे वश का है।

”यदि मिल कहता कि आज की तिथि में यूरोप अग्रणी है और नए सिद्धा्त, विचार और आविष्कार यहॉं पैदा हो रहे हैं और यहाँ से शेष जगत में फैल रहे हैं तो मुझे इस कथन पर आपत्ति न होती। यह बात तो विलियम जाेन्स ने भी कही थी अपने पहले ही व्या्ख्यान में, परन्तु वह यह भी मानते थे कि पूर्व सभ्यता की नर्सरी है, यह भी मानते थे कि हमने सभ्य ता के तत्व एशिया से पाए हैं, यह बात तो हीगेल भी मानता था। परन्तु वैज्ञानिक विवेचन यह भी न होता।

”मिल मानता था जिस देश के पास इतिहास नहीं वह सभ्य नहीं है और भारत के पास इतिहास और इतिहासबोध दोनों नहीे था, यह पहली बार मुस्लिम काल के साथ आया। यदि वह यह भी बताता कि सचेत रूप में इतिहास को अपव्याख्या से नष्ट करने वालों के पास और अपना ही इतिहास नष्ट करने वालों के पास इतिहास बोध होता है, तो सभ्यता के चरित्र को समझने में उससे भी चूक न होती और हम भी समझ पाते कि इतिहासबोध का वह कौन सा रूप था जिसमें भारत ने पुरा पाषाण काल से ले कर बाद के कालों के उन रेशों तक को अपने सास्कृसतिक प्रतीकों, रीतियों, व्यवहारो, भाषा और साहित्य में बचा रखा और यह आश्चर्य इतिहासबोध के बिना ही हो गया।”

”जब इतिहास ही नहीं है, आगे पीछे का तारतम्य तक नहीं मालूम, तो इतिहासबोध कैसे हो सकता है, यार । तुम भी कमाल करते हो।”

”टी.एस. ईलियट का वह प्रसिद्ध लेख ट्रैडिशन ऐंड इंडिविजुअल टैलेंट ‘ पढ़ा है ? पढ़ा तो होगा, तुम लोग तो उनके कचरे की टोकरी में से भी टुकड़े बटोर कर झालर की तरह टाँगे रहते हो। उसमें वह जो ग्रीक काल से अद्यतन के समकाल समुपस्थित होने की बात करता है वह इसलिए कि उसे भारतीय दार्शनिक चिन्तन का स्पर्श मिला था और इसे वह स्वीकार भी करता था। इतिहास के तथ्य और इतिहास के गढ़े हए सबूत इतिहासबोध में सहायक नहीं होते, यह वह तथ्यातीत बोध है जिससे एक बच्चाे जो बोलना तक नहीं जानता यह समझ लेता है कि कौन उसे प्यार करता है, कौन नहीं। इसे तुम नहीं समझ पाओगे, क्योंकि तुम स्वयं इतिहास ध्वंस के उस जघन्य कृत्य में सबसे आगे रहे, अपने को सेक्युलर सिद्ध करने की परीक्षा से गुजरने के कारण। तुम बस इतना जानो कि मिल उस मूल्यांकन से बौखलाया हुआ और इसलिए मानसिक रूप से विक्षुब्ध नस्ल वादी और रंगभेदी बहुज्ञ था जिसे विद्वान कहने में मुझे संकोच है परन्तु उसकी प्रतिभा की प्रखरता को स्वीकार करने में संकोच नहीं है। उस पर तरस आता है, इस टुच्चेपन से बच पाता तो वह अपने बेटे का बाप या बेंथम का मित्र होने के नाते याद नहीं किया जाता, वह एक महान विभूति हो सकता था। यही सीमा उसके गुरु डूग्लस स्टीवर्ट की थी जिसने वैसी ही बौखलाहट में घोषित किया था कि अलेक्जेंडर के हमले के बाद ग्रीक भाषा के संपर्क में आने के बाद भारत के फरेबी ब्राहूमणों ने संस्कृत नाम की एक जाली भाषा तैयार कर दी, अन्यथा उसका भी मैं बहुत आदर करता हूँ । जानते हो, इन्हें क्या समझता हूॅे?”

वह चुप रहा । ऐसे प्रश्न प्रश्न होते भी नहीं ।

”मैं इन्हें बौद्धिक मृगी का, इंटेलेक्चुअल एपिलेप्सी का मरीज मानता हूँ जो अपने देश, धर्म, भूभाग के प्रति अन्ध आसक्ति के कारण उसकाे किसी अन्य की तुलना में किसी भी काल और किसी भी क्षेत्र में पिछड़ा होने की कल्पना तक नहीं कर पाते और इसका साक्षात्कार होने पर उनकी अपनी बुद्धि का उपयोग उसके निषेध और विनाश के लिए करने को बाध्य हो जाते हैं जिस पर उनका स्वयं का नियन्त्रण नहीे रहता।”

”मैंने जब कहा था कि सभ्यता का आविर्भाव, खेती का आविष्का्र भारत में हुआ था तो यह भी बताया था क्यों ? बताया था कि किन परिस्थ्तियों में कितनी संस्कृतियों के लोग भारत में शरण लेने को बाध्य हुए थे और उनके बीच मारकाट से ले कर मिल कर बॉंटने खाने, शादी व्याह करने तक के बहुत तरह के संबंध थे और इनकी तकनीकी का आदान-प्रदान भी किन्हीं अंशों में हुआ था। फिर हिमयुगीन दुर्दिनों के बीतने पर, ऊष्म काल आने पर, थोड़ी निश्चिन्त‍ता हुई तो उन कौशलों का कमाल कई रूपों में सामने आया। आहारसंग्रह के चरण के सीधे आग पर भून कर जौ की बालियाँ खाने से लेकर उन्नत चरण का पूरा इतिहास हमारे रीतिविधानों से ले कर भाषा में और जहां तहॉं पुरातत्व में और हमारे नृतत्व में सुरक्षित है। इसकी ओर हमारे समाजशास्त्रियों, नृतत्वविदों और इतिहासकारों का ध्यान ही नहीं जाता क्योंकि उनका इतिहास आर्यों के आक्रमण से आरंभ होता है। इसे बोध कहोगे, या कुबोध या बुद्धिनाश ?

”मैं उन परिस्थितियों, कौशलों, प्रमाणों को सामने रख कर तथ्य निरूपण कर रहा था जिसमें भले यह कमाल भारतीय भूभाग में हुआ हो, इसमें विश्वमानवता का योगदान था, यह भी याद दिलाया। जैसे अपने दबाव की सांकेतिक भाषा में प्रकृति ने आदेश दिया हो, सभी आकर मिलो और अपनी अगली मंजिलों की दिशा और रूप निर्मित करो – उच्छ्र्वस्व महते सौभगाय । दिमाग तुम्हारा इतना कच्चा है कि यह पूरा खाका उसमें अट नहीं पाता इसलिए एक तिनका चोंच में दबा कर उड़ चलते हो।

”मिल नस्ल की बात कर रहा था, बिना किसी तर्क के दिशा की बात कर रहा था, इतनी प्रखर प्रतिभा का होते हुए भी वह जिद्दी जाहिलों जैसी बातें कर रहा था। मैं दिशा की नहीं न किसी नस्ल की बात कर रहा था, हमारी चेतना में नस्ल है ही नहीं। हो ही नहीं सकती। यहां तो एक ही पिता की दो पत्नियों की सन्तानों की समस्या है जिनकी जीवनदृष्टि भिन्नं है, एक दूसरे के प्रतिकूल तक है, परन्तु यह रक्त के कारण, या जगह के कारण नहीं, उसी यथार्थ के विषय में दो तरह की दृष्टियों के कारण है।

”और वह जो तुम लोग वैज्ञानिकता की बात करते हो, उसको तो पश्चिमी नजरिया अपना लेने के बाद समझा ही नहीं जा सकता जिसमें एक के होते दूसरा नहीं रह सकता या उसको मिटा कर ही रह सकता है। ज्ञान और विज्ञान है तो विश्वास के लिए जगह नहीं रह जाएगी। यह वैज्ञानिक दृष्टि है ही नहीं।”

”फिर वैज्ञानिक दृष्टि क्या है, मैं भी तो जानूँ ।”

”एक किस्सा तुम्हें सुनाऊँ। अभी, इसी समय याद आ गया। कहीं पढ़ा था। एक बार चन्द्र शेखर वेंकट रामन् किसी विदेशी सज्जन के अतिथि थे, उनके परिवार में किसी को तेज बुखार था, उन्होंने उसे पास बुलाया और एक तार उसके हाथ में बॉध दिया। बुखार उतर गया। आतिथेयी ने समझा यह भी इनका कोई आविष्कार होगा। जिज्ञासा की ताे उन्हों ने बताया, बचपन में मॉं ऐसे ही बॉंध देती थी, मैंने भी बस वही किया। तुम समझे मैं क्या कहना चाहता हूँ। छोड़ो नहीं समझोगे तुम। फूलहिं फलहिं न बेत जदपि सुधा बरसहिं जलद । अगली अर्धाली किसी से पूछ लेना। पर यार जिस बात को कहने की भूमिका कल बनाई थी, कल भी नहीं कह पाया और आज भी वह कहने से रह गई।”

”किसी बात को कहने के लिए दिमाग पर नियन्‍त्रण होना चाहिए । वही नहीं है तो पूरी होगी कैसे । तुम अधूरे वाक्‍यों के बादशाह हो।”

”शायद तुम ठीक कहते हो। बादशाहत भी‍ मिली तो भाषा के चिथड़ों की ।”

Post – 2016-08-20

an extract from my post dt. 19.8.16

इस मुखौटे के कारण, उनका इतिहासध्‍वंस भी एक विशाल पाठक वर्ग के लिए जिसमें सभी विचारधाराओं के उदार, मानवतावादी और ‘वैज्ञानिक’ सोच के भूखे बुद्धिजीवियों की नजर में तथ्‍यपरक, वैज्ञानिक और ‘मार्क्‍सवादी’ इतिहास होने का भ्रम पैदा करने में सफल होता है। इनकी व्‍याख्‍या में किस तरह की घालमेल की जाती है, इसका एक नमूना मैं ए.के. रामानुजन के रैबार के उसी अंक में प्रकाशित लेख के एक अंश से पेश करना चाहूँगा जिससे एक उद्धरण कल उपयोग में लाया था। इस लेख का शीर्षक है, Is there an Indian way of Thinking? इस लेख की रणनीति और तरकीब, यदि आप तनिक भी शिथिल हों तो, आप को इस बात का कायल बना सकती है कि गुलाम मानसिकता वस्‍तुपरक और वैज्ञानिक मानसिकता है।
वह अपने पिता के ज्ञान, विषय पर अधिकार और उनके जीवनमूल्‍यों का उल्‍लेख करते हैं जिसे वह अपनी ‘आधुनिक शिक्षा और आधुनिक सोच’ के चलते अलग हट आए थे और अच्‍छी बात है कि वह इसे कनवर्सन की संज्ञा देते हैं:
I had just converted by Russel l to the scienific attitude’. I (and my generation ) was troubled by his holding together in one brain both astronomy and astrology; I looked for consistency in him he didn’t seem to care about, or even think about. When Iasked him what the discovery of Pluto and Neptune did to his archaic nine-planet astrology, he said, ‘You make necessary corrections, that is all.’ Or, in answer to how he could read Gita religiously having bathed and painted on his forehead the red and white feet of Vishnu, and later talk appreciatively about Bertrend Russell and even Ingersoll, he said, ‘The Gita is one’s hygene. Besides don’t you know, the brain has two lobes.
मुझे यह लगता है कि उनके पिता जी पांडित्‍य में उनसे कुछ बीस पड़ते थे क्‍योंकि उन्‍होंने अपनी किसी ग्रन्थि के कारण आधुनिक दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और विज्ञान के आविष्‍कारों और अनुसंधानों के प्रति उपेक्षा न दिखाई थी। उन्‍हें यह बाेध था कि विज्ञान में शाश्‍वत सत्‍य नहीं होता, नये तथ्‍यों के आने के बाद उन्‍हें उनके अनुसार समायोजित करना होता है जो वह कर रहे थे, वह रसेल को और इंगरसोल को पढ़ चुके थे और उनके विचारों का सम्‍मान करते थे और अपने पुत्र को उसकी आपत्तियों का निराकरण करते हुए अपना पक्ष रखते थे, जब कि अपने कनवर्सन के बाद संभवत: रामानुजन वह छूट अपने पुत्र को नहीं दे सकते और उसे जाहिल और नासमझ कह कर प्रतिवाद करने तक से रोक सकते हैं।
उन्‍हें पता था मस्तिष्‍क में दो कोटर हैं और दोनों सजीव और अपने विरोधों के साथ जीवित और सक्रिय रहें तभी हम सही सोच रख सकते हैं। जो कुछ अभी आज की पहुंच में अप्रिय लग रहा है , जब तक वह बाधक नहीं बनता है, उसका निर्वाह करना चाहिए, पता नहीं उनमें क्‍या सत्‍य छिपा हो जो आज हमारी समझ में नहीं आ रहा है, कल समझ में आए। मैंने अक्षत और चावल के संबंध की चर्चा करते हुए इसकी ओर संकेत किया था। कनवर्सन के बाद जैसे व्‍यक्ति अपने ही अतीत से अपना संबंध काट लेता है, अपने इतिहास से मुँह मोड़ लेता है और इसी को अपनी वैज्ञानिक समझ समझने लगता है जिसको प्रमाणित करने के लिए वह आत्‍मतिरस्‍कार के लिए तर्क और प्रमाण तलाशने लगता है, वैसा ही रामानुजन के साथ घटित हुआ लगता है।
अब रामानुनन द्वारा अपनी वैज्ञानिक समझ को स्‍थापित करने के लिए जिस रूप में भारतीय मान्‍यताओं को निकृष्‍ट सिद्ध करने के दृष्‍टान्‍त और प्रमाण दिए गए हैं और पाश्‍चात्‍य विचारों को बिना पकाए सिझाए निगल जाने का प्रमाण मिलता है, उसका नमूना यह है:
Another trait of ‘inconsistency’ is the apparent inability to distinguish self and non-self. One has only to read Manu after a bit of Kant to be struck by the former’s extraordinary lack of universality. He seems to have no clear notion of a uniersal human nature from which one can deduce ethical decrees like ‘Man shall not kill’ or ‘Man shall not tell an untruth’.
Manu VIII.267 (quoted by Muller 1883) has the following. A Kshatriya, having defamed a Brahmana, shall be fined one hundred (panas) ; a Vaishya one hundred and fifty to two hundred (panas); a Sudra shall have corporal punishment.
Even truth telling is not an ubconditional imperative, as Miller’s correspondents discovered:
An untruth spoken by people under the influence of anger, excessive joy, fear, pain, or grief, by infnats, by very old men, by persons labouring under delusion, being under theinfluence of drink, or by mad men, does not cause the speaker to fall, or as we would say, a venial not a mortal sin [Gautam paraphrased by Muller (1883, 70).
गनीमत है कि लंबी बहस के बाद वह आधा तेरा आधा मेरा वाले, लुटे हुए माल का आधा लुटेरे का और आधा लुटने वाले का वाली ‘समझदारी’ पर पहुँचता है। हम उसी के विवेचन से जिस सचाई का सामना करते हैं वह यह कि :
1. यह व्‍यक्ति जिसे अपने परिवार और परिवेश से यह अवसर मिला था कि वह मूल स्रोतों का अ‍ाधिकारिक ज्ञान रखने के बाद अपना मत बनाता वह अंग्रेजी शिक्षा के कारण, रसेल के मैं ईसाई क्‍यों नहीं हूँ की नकल करते हुए बिना उन कारणों पर ध्‍यान दिए, मैं हिन्‍दू क्‍यों नहीं हूँ सिद्ध करने के अभियान पर जुट गया और इस उत्‍साह में जो सुलभ ज्ञान था उससे वंचित हो गया।
2. उसे संस्‍कृत भाषा और साहित्‍य का ज्ञान पाश्‍चात्‍य विद्वानों के माध्‍यम से है ओर वह उन्‍हें जाँचने परखने की योग्‍यता नहीं रखता।
3. वह विधि विधान को दार्शनिक स्‍थापना मान लेता है और दर्शन जिनमें वैश्विक और सार्विक का चिन्‍तन किया जाता है, उनमें से किसी का उसे ज्ञान नहीं और यह ज्ञान तक नहीं कि विधिविधान में बहुत सारे अपवाद और उपविधान होते हैं और इसके बिना वे लट्ठविधान बन जाएँगे। आज भी न्‍याय विचार में उन परिस्थितियों का ध्‍यान रखा जाता है जिनमें वह अपराध हुआ है और इसका इस हद तक पालन किया जाता है कि इसके बल पर अपराध के वकीलों की इमारते न्‍याय से भी ऊपर चली जाती हैं।
4. यह मैक्‍समूलर को उद्धृत तो करता है परन्‍तु इन्‍हीं के माध्‍यम से मैक्‍समूलर भारतीय सभ्‍यता का जो मूल्‍यांकन करते हैं उससे बचने या उसे छिपाने का प्रयत्‍न करता है।
5. इसे अपनी तुलना में कालरेखा का ध्‍यान नहीं, दो हजार साल पहले के भारतीय विधान को आज के दार्शनिक आख्‍यान से जोड़ते हुए देखता है, दर्शन का विधिव्‍यवस्‍था से घालमेल और कालक्रम का घालमेल।
इसी के बल पर यह अतिपठित पर दिमागी तौर पर दिवालिया विद्वान हमारे मार्क्‍सवादी व्‍याख्‍याकारों को तिनके का सहारा ही नहीं देता वे उस तिनके को पहाड़ बना कर पेश करते हैं , पर सचाई तो यही है कि ये सोचने ही नहीं पढ़ने तक में हमारी पैस्सिविटी के कारण हमारे बौद्धिक कायाकल्‍प के लिए प्रयत्‍नशील हैं।

Post – 2016-08-19

निदान -24
बौद्धिक लकड़बग्‍घे

हम दो अतियों के शिकार हैं । एक है जिनजबद्धता, जिसमें हम दु‍निया को न केवल अपनी नजर से देखते हैं अपितु अपने अनुसार ढालना चाहते है। इसमें अपनी बुराइयों की ओर हम नहीं देख पाते या उनको भी उचित ठहराते हैं, परन्‍तु दूसरों की केवल बुराइयॉं दिखाई देती हैं। उनका कोई कारण हमें नहीं दिखाई देता, वे उसमें निसर्गजात मान ली जाती हैं। उसकी अच्‍छाई को हम नहीं देख पाते, या उनमें कोई ऐसा कोण तलाश लेते हैं जिसमें उसका अवमूल्‍यन किया जा सके, नकारा जा सके, या हास्‍यास्‍पद बनाया जा सके। मिल का इतिहासलेखन इसी सोच पर आधारित था।

इसे ही ईरानी सभ्‍यता को भारतीय सभ्‍यता से श्रेष्‍ठ सिद्ध करने के लिए भारत के ईरानी मूल से, फिर किसी भी पश्चिमी देश से, जुड़े हाेने पर गर्व करने वाले अभिजात मुसलमानों ने अपनाया और यह दुहराते रहे कि भारतीयों को न जीने का शऊर था, न कपड़े लत्‍ते का, न सलीके से बोलने चालने और व्‍यवहार करने का । वे उजड्ड रहे हैं और हमने उन्‍हें सभ्‍य बनाया है और उसी में जुड़ कर वह चक्र पूरा होता है कि पुरानी ईरानी या अवेस्‍ता की भाषा में वैदिक भाषा से समानता है तो इन दोनों में अवेस्‍ता की भाषा अधिक पुरानी है और फिर आर्यों की बर्बरता आदि की कहानियॉं गढ़ कर इस चक्र को पूरा किया जाता है।

इस तरह के आत्‍मवादी इतिहास से अपनी शाश्‍वत श्रेष्‍ठता का विश्‍वास अपनों में और सनातन बर्बरता का विश्‍वास दूसरों में उतारा जाता है। इससे अपने भीतर स्‍वामित्‍व का बोध प्रबल किया जाता है और इतरों में गुलामी के मूल्‍यों को उनकी चेतना का अंग बनाया जाता है जिसके लिए उन्‍हें धन मान भी दिया जाता है। यह मूल्‍य जब हमारी बौद्धिकता का अंग बन जाता है और हम इस पर गर्व करने लगते हैं तो यह स्‍मरण दिलाने पर भी घबराहट होती है कि किसी अवस्‍था में स्थिति ठीक इससे उल्‍टी रही है। चन्‍द्रशेखर जी जब प्रधानमन्‍त्री थे उन दिनाें धर्मपाल ने उनके साथ एक बात चीत का हवाला दिया है। उन्‍होंने जब बताया हमारी स्थिति वह नहीं थी जो बताई जाती है, बल्कि यह थी। चन्‍द्रशेखर ने हँस कर कहा, ”जब थी तब थी उसे जान कर क्‍या करेंगे, आज तो यह है।”

ऐसा ही उत्‍तर ऋग्‍वेद के प्रसंग में लोहिया जी के किसी कटाक्ष का सुना था जिसका ठीक सन्‍दर्भ और उनका वाक्‍य याद नहीं आता ।

ये दोनों लोग भारतविमुख नहीं थे जो कम्‍युनिस्‍टों को अन्‍तर्राष्‍ट्रीयता के नाम पर बना दिया गया था। इन सबमें सामान्‍य बात यह थी कि अपनी गर्दन झटकारने के बाद भी इन्‍होंने उस इतिहास का आत्‍मसात्‍करण कर लिया था जो धाक जमाने वाली सभ्‍यताओं द्वारा वशवर्ती समाजों को चिरन्‍तन वशवर्ती बनाए रखने के लिए तैयार किया जाता है।

वे इस मोटे सच से परिचित नहीं थे कि इतिहास की समझ हमारी चेतना के रूप का या कहें हमारी मानसिकता का निर्माण करती है और वर्तमान में सर झटकते रहने से उन बन्‍धनों से मुक्ति नहीं मिल सकती, न उस गति से आगे बढ़ा जा सकता है जैसे सामान्‍य स्थिति में होना चाहिए। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि इन व्‍याख्‍याओं द्वारा हमें कब किस तरह बॉधा गया और इनको अपनी शक्ति और स्थिति का सही परिचय प्राप्‍त करके ही गुलामी की मानसिकता से बाहर किया और फिर पूरे मनोबल से आगे बढ़ा जा सकता है।

इस बात को मैं कई बार दुहरा चुका हूँ अौर आगे भी दुहराता रहूूँगा कि वर्तमान अतीत से अलग नहीं है, उसी का शिखर बिन्‍दु है जो नये शिखरों की ओर बढ़ने के साथ अतीत बनता चला जाएगा। उससे कट जाने पर या तो हम धँस जाऍंगे या उधिया जाऍंगे, अपने पॉंवों पर खड़े नहीं रह सकते।

दूसरी अति इसी का दूसरा सिरा है, अपनी दृष्टि पर विश्‍वास न कर पाना और अपने को और दूसरी चीजों को दूसरों की दृष्टि से देखना। यह उन मूल्‍यों के आभ्‍यन्‍तरीकरण से पैदा होता है जो दूसरो को गुलाम बनाए रखने के लिए तैयार किए गए थे और इनको आत्‍मसात् करने के बाद आप को उनका पालतू बन कर रहना आजाद रहने की अपेक्षा अधिक आरामदेह प्रतीत होता है। इसके प्रमाण स्‍वरूप मैं एक बार उन कीमती कुत्‍तों की याद दिला चुके हैं जिन्‍हें सब कुछ हासिल होता है जो उनके स्‍वामी को हासिल है, बस एक अन्‍तर के साथ जो उस जंजीर से पैदा होती है जिसका एक सिरा आपकी गर्दन में बँधा रहता है और दूसरा उसके हाथ में होता है। आप उन सुखों और सुविधाओं के अभ्‍यस्‍त हो जाने के बाद उसके इशारे पर ही अपनी गर्दन उस पट्टे और जंजीर को बॉंधने के लिए पेश कर देते हैं। न केवल गुलामी से आप समझौता कर लेते हैं, बल्कि उसे अपने स्‍वभाव का अंग बना लेते हैं। इसे ही हिन्‍दू समाज में पैदा करने के प्रयत्‍न में वह आयोजन किया गया जिसे मैं मध्‍यकालीन देवस्‍थलों, मठों और मूर्तियों को नष्‍ट और अपवित्र करने जैसा ही गर्हित मानता हूँ, परन्‍तु इसके जनक सुशिक्षित लोग थे, इसलिए इसे उससे भी अधिक गर्हित मानता हूँ।

”हम पहले भी यह कह आए हैं कि हमारे शिक्षा विभाग को निरापद मान कर नेहरू जी के समय से ही विरल अपवादों को छोड़ कर उन्‍हीं मुस्लिम नेताओं के हाथ में रखा गया जो अमीर परिवारों से आए, आधुनिक शिक्षा प्राप्‍त परन्‍तु मुस्लिम लीेगी मानसिकता के शिकार थे और इस इतिहास का अकाट्य और अपरिवर्तनीय पाठ बनाने का प्रयत्‍न करते हुए इतिहास और साहित्‍य की पुस्‍तकों का एकाधिकार एनसीइआरटी को सौंप दिया और इसके अकूल मानदेय का प्रलोभन दे कर इसे योजनाबद्ध रूप में इतिहास का पेशा करने वाले हिन्‍दुओं से लिखवाया गया जो ऊपर दिए गए दृष्‍टान्‍त के जानवर की तरह पद, प्रतिष्‍ठा और धन से आकृष्‍ट थे यह कहना भी उनके साथ अन्‍याय होगा, क्‍योंकि वे उस विचारधारा से बँधे थे जिसमें उसी अभिजात वर्ग और उनके सरोकारों और आशंकाओं से ग्रस्‍त मुस्लिम साथियों के दबाव में मुस्लिम लीग की कार्ययोजना को अपनी कार्ययोजना में शामिल कर लिया गया था, इसलिए दूसरे तथ्‍य जो अधिक दबाव पैदा करते थे, उस मुखौटे के पीछे चले जाते हैं, और इनकी गुर्राहट भरी व्‍याख्‍याओं के पीछे उनकी जंजीर अपने हाथ में रखने वालों की फितरत का पता नहीं चल पाता। लगता है यह विशुद्ध विचारधारात्‍मक सरोकार से किया जा रहा है।

इस मुखौटे के कारण, उनका इतिहासध्‍वंस भी एक विशाल पाठक वर्ग के लिए जिसमें सभी विचारधाराओं के उदार, मानवतावादी और ‘वैज्ञानिक’ सोच के भूखे बुद्धिजीवियों की नजर में तथ्‍यपरक, वैज्ञानिक और ‘मार्क्‍सवादी’ इतिहास होने का भ्रम पैदा करने में सफल होता है। इनकी व्‍याख्‍या में किस तरह की घालमेल की जाती है, इसका एक नमूना मैं ए.के. रामानुजन के रैबार के उसी अंक में प्रकाशित लेख के एक अंश से पेश करना चाहूँगा जिससे एक उद्धरण कल उपयोग में लाया था। इस लेख का शीर्षक है, Is there an Indian way of Thinking? इस लेख की रणनीति और तरकीब यदि आप तनिक भी शिथिल हों तो इस बात का कायल बना सकती है कि गुलाम मानसिकता वस्‍तुपरक और वैज्ञानिक मानसिकता है।

वह अपने पिता के ज्ञान, विषय पर अधिकार और उनके जीवनमूल्‍यों का उल्‍लेख करते हैं जिसे वह अपनी ‘आधुनिक शिक्षा और आधुनिक सोच’ के चलते अलग हट आए थे और अच्‍छी बात है कि वह इसे कनवर्सन की संज्ञा देते हैं:

I had just converted by Russel l to the scienific attitude’. I (and my generation ) was troubled by his holding together in one brain both astronomy and astrology; I looked for consistency in him he didn’t seem to care about, or even think about. When Iasked him what the discovery of Pluto and Neptune did to his archaic nine-planet astrology, he said, ‘You make necessary corrections, that is all.’ Or, in answer to how he could read Gita religiously having bathed and painted on his forehead the red and white feet of Vishnu, and later talk appreciatively about Bertrend Russell and even Ingersoll, he said, ‘The Gita is one’s hygene. Besides don’t you know, the brain has two lobes.

मुझे यह लगता है कि उनके पिता जी पांडित्‍य में उनसे कुछ उन्‍नीस पड़ते थे क्‍योंकि उन्‍होंने अपनी किसी ग्रन्थि के कारण आधुनिक दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और विज्ञान के आविष्‍कारों और अनुसंधानों के प्रति उपेक्षा न दिखाई थी। उन्‍हें यह बाेध था कि विज्ञान में शाश्‍वत सत्‍य नहीं होता, नये तथ्‍यों के आने के बाद उन्‍हें उनके अनुसार समायोजित करना होता है जो वह कर रहे थे, वह रसेल को और इंगरसोल को पढ़ चुके थे और उनके विचारों का सम्‍मान करते थे और अपने पुत्र को उसकी आपत्तियों का निराकरण करते हुए अपना पक्ष रखते थे, जब कि अपने कनवर्सन के बाद वह छूट अपने पुत्र को नहीं दे सकते और उसे जाहिल और नासमझ कह कर प्रतिवाद करने तक से रोक सकते हैं।

उन्‍हें पता था मस्तिष्‍क में दो कोटर हैं और दोनों सजीव और अपने विरोधों के साथ जीवित और सक्रिय रहें तभी हम सही सोच रख सकते हैं, जो अभी आज की पहुंच में अप्रिय लग रहा है उसे, जब तक वह बाधक नहीं बनता है, उसका निर्वाह करना चाहिए, पता नहीं उनमें क्‍या सत्‍य छिपा हो जो आज हमारी समझ में नहीं आ रहा है, कल समझ में आए। मैंने अक्षत और चावल के संबंध की चर्चा करते हुए इसकी ओर संकेत किया था। कनवर्सन के बाद जैसे व्‍यक्ति अपने अतीत से संबंध काट लेता है, अपने इतिहास से मुँह मोड़ लेता है और इसी को अपनी वैज्ञानिक समझ समझने लगता है जिसको प्रमाणित करने के लिए वह आत्‍मतिरस्‍कार के लिए तर्क और प्रमाण तलाशने लगता है वैसा ही रामानुजन के साथ घटित हुआ लगता है।

अब रामानुनन द्वारा अपनी वैज्ञानिक समझ को स्‍थापित करने के लिए जिस रूप में भारतीय मान्‍यताओं को निकृष्‍ट सिद्ध करने के दृष्‍टान्‍त और प्रमाण दिए गए हैं और पाश्‍चात्‍य विचारों को बिना पकाए सिझाए निगल जाने का प्रमाण मिलता है, उसका नमूना यह है:
Another trait of ‘inconsistency’ is the apparent inability to distinguish self and non-self. One has only to read Manu after a bit of Kant to be struck by the former’s extraordinary lack of universality. He seems to have no clear notion of a uniersal human nature from which one can deduce ethical decrees like ‘Man shall not kill’ or ‘Man shall not tell an untruth’.

Manu VIII.267 (quoted by Muller 1883) has the following. A Kshatriya, having defamed a Brahmana, shall be fined one hundred (panas) ; a Vaishya one hundred and fifty to two hundred (panas); a Sudra shall have corporal punishment.

Even truth telling is not an ubconditional imperative, as Miller’s correspondents discovered:
An untruth spoken by people under the influence of anger, excessive joy, fear, pain, or grief, by infnats, by very old men, by persons labouring under delusion, being under theinfluence of drink, or by mad men, does not cause the speaker to fall, or as we would say, a venial not a mortal sin [Gautam paraphrased by Muller (1883, 70).
गनीमत है कि लंबी बहस के बाद वह आधा तेरा आधा मेरा वाले, लुटे हुए माल का आधा लुटेरे का और आधा लुटने वाले का वाली ‘समझदारी’ पर पहुँचता है। हम उसी के विवेचन से जिस सचाई का सामना करते हैं वह यह कि :
1. यह व्‍यक्ति जिसे अपने परिवार और परिवेश से यह अवसर मिला था कि वह मूल स्रोतों का अ‍ाधिकारिक ज्ञान रखने के बाद अपना मत बनाता वह अंग्रेजी शिक्षा के कारण, रसेल के मैं ईसाई क्‍यों नहीं हूँ की नकल करते हुए बिना उन कारणों पर ध्‍यान दिए, मैं हिन्‍दू क्‍यों नहीं हूँ सिद्ध करने के अभियान पर जुट गया और इस उत्‍साह में जो सुलभ ज्ञान था उससे वंचित हो गया।

2. उसे संस्‍कृत भाषा और साहित्‍य का ज्ञान पाश्‍चात्‍य विद्वानों के माध्‍यम से है ओर वह उन्‍हें जाँचने परखने की योग्‍यता नहीं रखता।

3. वह विधि विधान को दार्शनिक स्‍थापना मान लेता है और दर्शन जिनमें वैश्विक और सार्विक का चिन्‍तन किया जाता है, उनमें से किसी का उसे ज्ञान नहीं और यह ज्ञान तक नहीं कि विधिविधान में बहुत सारे अपवाद और उपविधान होते हैं और इसके बिना वे लट्ठविधान बन जाएँगे। आज भी न्‍याय विचार में उन परिस्थितियों का ध्‍यान रखा जाता है जिनमें वह अपराध हुआ है और इसका इस हद तक पालन किया जाता है कि इसके बल पर अपराध के वकीलों की इमारते न्‍याय से भी ऊपर चली जाती हैं।

4. यह मैक्‍समूलर को उद्धृत तो करता है परन्‍तु इन्‍हीं के माध्‍यम से मैक्‍समूलर भारतीय सभ्‍यता का जो मूल्‍यांकन करते हैं उससे बचने या उसे छिपाने का प्रयत्‍न करता है।

5. इसे अपनी तुलना में कालरेखा का ध्‍यान नहीं, दो हजार साल पहले के भारतीय विधान को आज के दार्शनिक आख्‍यान से जोड़ते हुए देखता है, दर्शन का विधिव्‍यवस्‍था से घालमेल और कालक्रम का घालमेल।

इसी के बल पर यह अतिपठित पर दिमागी तौर पर दिवालिया विद्वान हमारे मार्क्‍सवादी व्‍याख्‍याकारों को तिनके का सहारा ही नहीं देता वे उस तिनके को पहाड़ बना कर पेश करते हैं जिसको गाली देने की प्रबल इच्‍छा के बाद भी ह से आगे बढ़ नहीं पाता, मानहानि के डर से, पर सचाई तो यही है कि ये सोचने ही नहीं पढ़ने तक में हमारी पैस्सिविटी के कारण हमारे बौद्धिक कायाकल्‍प के लिए प्रयत्‍नशील हैं।

Post – 2016-08-19

”हम दो अतियों के शिकार हैं । एक है जिनजबद्धता, जिसमें हम दु‍निया को न केवल अपनी नजर से देखते हैं अपितु अपने अनुसार ढालना चाहते है। इसमें अपनी बुराइयों की ओर हम नहीं देख पाते या उनको भी उचित ठहराते हैं, परन्‍तु दूसरों की केवल बुराइयॉं दिखाई देती हैं और उनका कोई कारण नहीं दिखाई देता, वे उसमें निसर्गजात मान ली जाती हैं। उसकी अच्‍छाई को हम नहीं देख पाते, या उनमें कोई ऐसा कोण तलाश लेते हैं जिसमें उसका अवमूल्‍यन किया जा सके, नकारा जा सके, या हास्‍यास्‍पद बनाया जा सके। मिल का इतिहासलेखन इसी सोच पर आधारित था। इसे ही ईरानी सभ्‍यता को भारतीय सभ्‍यता से श्रेष्‍ठ सिद्ध करने के लिए भारत के ईरानी मूल से फिर किसी भी पश्चिमी देश से जुड़े हाने पर गर्व करने वाले अभिजात मुसलमानों ने अपनाया और यह दुहराते रहे कि भारतीयों को न जीने का शऊर था, न कपड़े लत्‍ते का, न सलीके से बोलने चालने और व्‍यवहार करने का । वे उजड्ड रहे हैं और हमने उन्‍हें सभ्‍य बनाया है और उसी में जुड़ कर वह चक्र पूरा होता है कि पुरानी ईरानी या अवेस्‍ता की भाषा में वैदिक भाषा से समानता है तो इन दोनों अवेस्‍ता की भाषा अधिक पुरानी है और फिर आर्यों की बर्बरता आदि की कहानियॉं गढ़ कर इसे पूरा किया जाता है।

इस तरह के आत्‍मवादी इतिहास से अपनी शाश्‍वत श्रेष्‍ठता का विश्‍वास अपनों में और सनातन बर्बरता का विश्‍वास दूसरों में उतारा जाता है। इससे अपने भीतर स्‍वामित्‍व का बोध प्रबल किया जाता है और इतरों में गुलामी के मूल्‍यों को चेतना का अंग बनाया जाता है। यह मूल्‍य जब हमारी बौद्धिकता का अंग बन जाता है और हम इस पर गर्व करने लगते हैं तो यह स्‍मरण दिलाने पर भी घबराहट होती है कि किसी अवस्‍था में स्थिति ठीक इससे उल्‍टी रही है। चन्‍द्रशेखर जी जब प्रधानमन्‍त्री थे उन दिनाें धर्मपाल ने उनके साथ एक बात चीत का हवाला दिया है। उन्‍होंने जब बताया हमारी स्थिति वह नहीं थी जो बताई जाती है, बल्कि यह थी। चन्‍द्रशेखर ने हँस कर कहा, ”जब थी तब थी उसे जान कर क्‍या करेंगे, आज तो यह है।”

ऐसा ही उत्‍तर ऋग्‍वेद के प्रसंग में लोहिया जी के किसी कटाक्ष का सुना था जिसका ठीक सन्‍दर्भ और उनका वाक्‍य याद नहीं आता । ये दोनों लोग भारतविमुख नहीं थे जो कम्‍युनिस्‍टों को अन्‍तर्राष्‍ट्रीयता के नाम पर बना दिया गया। इन सबमें सामान्‍य बात यह थी कि अपनी गर्दन झटकारने के बाद भी इन्‍होंने उस इतिहास का आत्‍मसात्‍करण कर लिया था जो धाक जमाने वाली सभ्‍यताओं द्वारा वशवर्ती समाजों को चिरन्‍तन वशवर्ती बनाए रखने के लिए तैयार किया जाता है। वे इस मोटे सच से परिचित नहीं थे कि इतिहास की समझ हमारी चेतना के रूप का या कहें हमारी मानसिकता का निर्माण करती है और वर्तमान में सर झटकते रहने से उन बन्‍धनों से मुक्ति नहीं मिल सकती न उस गति से आगे बढ़ा जा सकता है जैसे सामान्‍य स्थिति में होना चाहिए। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि इन व्‍याख्‍याओं द्वारा हमें कब किस तरह बॉधा गया और इनको अपनी शक्ति और स्थिति का सही परिचय प्राप्‍त करके ही चेतना से बाहर किया और फिर पूरे मनोबल से आगे बढ़ा जा सकता है। इस बात को मैं कई बार दुहरा चुका हूँ अौर आगे भी दुहराता रहूूँगा कि वर्तमान अतीत से अलग नहीं है, उसी का शिखर बिन्‍दु है जो नये शिखरों की ओर बढ़ने के साथ अतीत बनता चला जाएगा। उससे कट जाने पर या तो हम धँस जाऍंगे या उधिया जाऍंगे, अपने पॉंवों पर खड़े नहीं रह सकते।

दूसरी अति इसी का दूसरा सिरा है, अपनी दृष्टि पर विश्‍वास न कर पाना और अपने को और दूसरी चीजों को दूसरों की दृष्टि से देखना। यह उन मूल्‍यों के आभ्‍यन्‍तरीकरण से पैदा होता है जो दूसरो को गुलाम बनाए रखने के लिए तैयार किए गए थे और इनको आत्‍मसात् करने के बाद आप को उनका पालतू बन कर रहना आजाद रहने की अपेक्षा अधिक आरामदेह प्रतीत होता है। इसके प्रमाण स्‍वरूप मैं एक बार उन कीमती कुत्‍तों की याद दिला चुके हैं जिन्‍हें सब कुछ हासिल होता है जो उनके स्‍वामी को हासिल है, बस एक अन्‍तर के साथ जो उस जंजीर से पैदा होती है जिसका एक सिरा आपकी गर्दन में बँधा रहता है और दूसरा उसके हाथ में होता है। आप उन सुखों और सुविधाओं के अभ्‍यस्‍त हो जाने के बाद उसके इशारे पर ही अपनी गर्दन उस पट्टे और जंजीर को बॉंधने के लिए पेश कर देते हैं। आप न केवल गुलामी से आप समझौता कर लेते हैं, बल्कि उसे अपने स्‍वभाव का अंग बना लेते हैं। इसे ही हिन्‍दू समाज में पैदा करने के प्रयत्‍न में वह आयोजन किया गया जिसे मैं मध्‍यकालीन देवस्‍थलो, मठो और मूर्तियों को नष्‍ट और अपवित्र करने जैसा ही गर्हित मानता हूँ, परन्‍तु इसके जनक सुशिक्षित लोग थे, इसलिए इसे उससे भी अधिक गर्हित मानता हूँ।

”हम पहले भी यह कह आए हैं कि हमारे शिक्षा विभाग को निरापद मान कर नेहरू जी के समय से ही विरल अपवादों को छोड़ कर उन्‍हीं मुस्लिम नेताओं के हाथ में रखा गया जिनकी सोच यही थी और इस इतिहास का अकाट्य और अपरिवर्तनीय पाठ बनाने का प्रयत्‍न करते हुए इतिहास और साहित्‍य की पुस्‍तकों का एकाधिकार एनसीइआरटी को सौंप दिया और इसके अकूल मानदेय का प्रलोभन दे कर इसे योजनाबद्ध रूप में इतिहास का पेशा करने वाले हिन्‍दुओं से लिखवाया गया जो ऊपर दिए गए दृष्‍टान्‍त के जानवर की तरह पद, प्रतिष्‍ठा और धन से आकृष्‍ट थे यह कहना भी उनके साथ अन्‍याय होगा, क्‍योंकि वे उस विचारधारा से बँधे थे जिसमें उसी अभिजात वर्ग और उनके सरोकारों और आशंकाओं से ग्रस्‍त मुस्लिम साथियों के दबाव में मुस्लिम लीग की कार्ययोजना को अपनी कार्ययोजना में शामिल कर चुके थे, इसलिए दूसरे तथ्‍य जो अधिक दबाव पैदा करते थे, उस मुखौटे के पीछे चले जाते हैं, और इनकी गुर्राहट भरी व्‍याख्‍याओं के पीछे उनकी जंजीर अपने हाथ में रखने वालों की फितरत का पता नहीं चल पाता। लगता है यह विशुद्ध विचारधारात्‍मक सरोकार से किया जा रहा है।

इस मुखौटे के कारण, उनका इतिहासध्‍वंस भी एक विशाल पाठक वर्ग के लिए जिसमें सभी विचारधाराओं के उदार, मानवतावादी और ‘वैज्ञानिक’ सोच के भूखे बुद्धिजीवियों की नजर में तथ्‍यपरक, वैज्ञानिक और ‘मार्क्‍सवादी’ इतिहास होने का भ्रम पैदा करने में सफल होता है। इनकी व्‍याख्‍या में किस तरह की घालमेल की जाती है, इसका एक नमूना मैं ए.के. रामानुजन के रैबार के उसी अंक में प्रकाशित लेख के एक अंश से पेश करना चाहूँगा जिससे एक उद्धरण कल उपयोग में लाया था। इस लेख का शीर्षक है, Is there an Indian way of Thinking? इस लेख की रणनीति और तरकीब यदि आप तनिक भी शिथिल हों तो आप को इस बात का कायल बना सकती है कि गुलाम मानसिकता वस्‍तुपरक और वैज्ञानिक मानसिकता है।

वह अपने पिता के ज्ञान, विषय पर अधिकार और उनके जीवनमूल्‍यों का उल्‍लेख करते हैं जिसे वह अपनी ‘आधुनिक शिक्षा और आधुनिक सोच’ के चलते अलग हट आए थे और अच्‍छी बात है कि वह इसे कनवर्सन की संज्ञा देते हैं:

I had just converted by Russel l to the scienific attitude’. I (and my generation ) was troubled by his holding together in one brain both astronomy and astrology; I looked for consistency in him he didn’t seem to care about, or even think about. When Iasked him what the discovery of Pluto and Neptune did to his archaic nine-planet astrology, he said, ‘You make necessary corrections, that is all.’ Or, in answer to how he could read Gita religiously having bathed and painted on his forehead the red and white feet of Vishnu, and later talk appreciatively about Bertrend Russell and even Ingersoll, he said, ‘The Gita is one’s hygene. Besides don’t you know, the brain has two lobes.

मुझे यह लगता है कि उनके पिता जी पांडित्‍य में उनसे कुछ उन्‍नीस पड़ते थे क्‍योंकि उन्‍होंने अपनी किसी ग्रन्थि के कारण आधुनिक दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और विज्ञान के आविष्‍कारों और अनुसंधानों के प्रति उपेक्षा न दिखाई थी। उन्‍हें यह बाेध था कि विज्ञान में शाश्‍वत सत्‍य नहीं होता, नये तथ्‍यों के आने के बाद उन्‍हें उनके अनुसार समायोजित करना होता है जो वह कर रहे थे, वह रसेल को और इंगरसोल को पढ़ चुके थे और उनके विचारों का सम्‍मान करते थे और अपने पुत्र को उसकी आपत्तियों का निराकरण करते हुए अपना पक्ष रखते थे, जब कि अपने कनवर्सन के बाद वह छूट अपने पुत्र को नहीं दे सकते और उसे जाहिल और नासमझ कह कर प्रतिवाद करने तक से रोक सकते हैं। उन्‍हें पता था मस्तिष्‍क में दो कोटर हैं और दोनों सजीव और अपने विरोधों के साथ जीवित और सक्रिय रहें तभी हम सही सोच रख सकते हैं, जो अभी आज की पहुंच में अप्रिय लग रहा है उसे, जब तक वह बाधक नहीं बनता है, उसका निर्वाह करना चाहिए, पता नहीं उनमें क्‍या सत्‍य छिपा हो जो आज हमारी समझ में नहीं आ रहा है, कल समझ में आए। मैंने अक्षत और चावल के संबंध की चर्चा करते हुए इसकी ओर संकेत किया था। कनवर्सन के बाद जैसे व्‍यक्ति अपने अतीत से संबंध काट लेता है, अपने इतिहास से मुँह मोड़ लेता है और इसी को अपनी वैज्ञानिक समझ समझने लगता है जिसको प्रमाणित करने के लिए वह आत्‍मतिरस्‍कार के लिए तर्क और प्रमाण तलाशने लगता है।
अब रामानुनन द्वारा अपनी वैज्ञानिक समझ को स्‍थापित करने के लिए जिस रूप में भारतीय मान्‍यताओं को निकृष्‍ट सिद्ध करने के दृष्‍टान्‍त और प्रमाण दिए गए हैं और पाश्‍चात्‍य विचारों को बिना पकाए सिझाए निगल जाने का प्रमाण मिलता है, उसका नमूना यह है:
Another trait of ‘inconsistency’ is the apparent inability to distinguish self and non-self. One has only to read Manu after a bit of Kant to be struck by the former’s extraordinary lack of universality. He seems to have no clear notion of a uniersal human nature from which one can deduce ethical decrees like ‘Man shall not kill’ or ‘Man shall not tell an untruth’.

Manu VIII.267 (quoted by Muller 1883) has the following. A Kshatriya, having defamed a Brahmana, shall be fined one hundred (panas) ; a Vaishya one hundred and fifty to two hundred (panas); a Sudra shall have corporal punishment.

Even truth telling is not an ubconditional imperative, as Miller’s correspondents discovered:
An untruth spoken by people under the influence of anger, excessive joy, fear, pain, or grief, by infnats, by very old men, by persons labouring under delusion, being under theinfluence of drink, or by mad men, does not cause the speaker to fall, or as we would say, a venial not a mortal sin [Gautam paraphrased by Muller (1883, 70).
गनीमत है कि लंबी बहस के बाद वह आधा तेरा आधा मेरा वाले, लुटे हुए माल का आधा लुटेरे का और आधा लुटने वाले वाली समझदारी पर पहुँचता है। हम उसी के विवेचन से जिस सचाई का सामना करते हैं वह यह कि :
1. यह व्‍यक्ति जिसे अपने परिवार और परिवेश से यह अवसर मिला था कि वह मूल स्रोतों का अ‍ाधिकारिक ज्ञान रखने के बाद अपना मत बनाता वह अंग्रेजी शिक्षा के कारण, रसेल के मैं ईसाई क्‍यों नहीं हूँ की नकल करते हुए बिना उन कारणों पर ध्‍यान दिए, मैं हिन्‍दू क्‍यों नहीं हूँ सिद्ध करने के अभियान पर जुट गया और इस उत्‍साह में जो सुलभ ज्ञान था उससे वंचित हो गया।
2. उसे संस्‍कृत भाषा और साहित्‍य का ज्ञान पाश्‍चात्‍य विद्वानों के माध्‍यम से है ओर वह उन्‍हें जाँचने परखने की योग्‍यता नहीं रखता।
3. वह विधि विधान को दार्शनिक स्‍थापना मान लेता है और दर्शन जिनमें वैश्विक और सार्विक का चिन्‍तन किया जाता है, उनमें से किसी का उसे ज्ञान नहीं और यह ज्ञान तक नहीं कि विधिविधान में बहुत सारे अपवाद और उपविधान होते हैं और इसके बिना वे लट्ठविधान बन जाएँगे। आज भी न्‍याय विचार में उन परिस्थितियों का ध्‍यान रखा जाता है जिनमें वह अपराध हुआ है और इसका इस हद तक पालन किया जाता है कि इसके बल पर अपराध के वकीलों की इमारते न्‍याय से भी ऊपर चली जाती हैं।
4. यह मैक्‍समूलर को उद्धृत तो करता है परन्‍तु इन्‍हीं के माध्‍यम से मैक्‍समूलर भारतीय सभ्‍यता का जो मूल्‍यांकन करते हैं उससे बचने या उसे छिपाने का प्रयत्‍न करता है।
5. इसे अपनी तुलना में कालरेखा का ध्‍यान नहीं, दो हजार साल पहले के भारतीय विधान को आज के दार्शनिक आख्‍यान से जोड़ते हुए देखता है, दर्शन का विधिव्‍यवस्‍था से घालमेल और कालक्रम का घालमेल।
इसी के बल पर यह अतिपठित पर दिमागी तौर पर दिवालिया विद्वान हमारे मार्क्‍सवादी व्‍याख्‍याकारों को तिनके का सहारा ही नहीं देता वे उस तिनके को पहाड़ बना कर पेश करते हैं जिसको गाली देने की प्रबल इच्‍छा के बाद भी ह से आगे बढ़ नहीं पाता, मानहानि के डर से, पर सचाई तो यही है कि ये
सोचने ही नहीं पढ़ने तक में हमारी पैस्सिविटी के कारण हमारे बौद्धिक कायाकल्‍प के लिए प्रयत्‍नशील हैं।

Post – 2016-08-18

सबकी जबाँ पर रहता था गुमनाम हो गया
भगवान कल था आज वह बदनाम हो गया
विज्ञान का भी इसमे मिलाया था मसाला
मेरी जरूरतों से ही यह काम हो गया ।।
तुम ढूंढते रहे कि अभी था कहां गया
मैं सोचता रहा कि लो आराम हो गया ।।
मैं जानता हूँ वह नहीं है फिर भी कही है
तुम जानते हो वह नहीं तो ज्ञान हो गया ।
हो सकता है, विज्ञान की सीमाऍं बहुत हैं
विज्ञान से आगे का भी विज्ञान हो गया ।

Post – 2016-08-18

निदान – 23
अधोगति का दिग्‍दर्शन
”तुम अपनों को जोड़ नहीं पाते, दूसरों को भी तोड़ने बॉंटने का खेल खेलना चाहते हो, देशी मूल और विदेशी मूल का फर्क करके ? तुमने उनको इतना नादान समझ रखा है कि वे तुम्‍हारे कहने में आ जाऍंगे ?”
”मैं केवल जोड़ने का काम करता हूॅे । फोड़ने और बॉंटने का काम तुम लोग करते आए हो। अंग्रेजों ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पहली बार भेदनीति का सहारा लिया। इसका सहारा सदा शत्रु देश के प्रति लिया जाता है, क्‍योंकि यह सबसे अधिक गहरी चोट करता है जिसे भरने में हथियार की चोट से भी अधिक समय लगता है। उन्‍होंने पहले मुस्लिम रईसों को यह समझाया कि तुमने इनको गुलाम बनाया, इन पर राज किया, अब यदि जिस तेजी से हिन्‍दू आगे बढ़ रहे हैं उस गति से आगे बढ़ते रहे तो तुम्‍हारे ऊपर इनका राज होगा और यदि किसी स्थिति में हमें यहां से जाना पड़ गया तो तुम्‍हें इनका गुलाम बन कर रहना होगा और ये तुम्‍हारे साथ वही करेंगे जो तुमने इनके साथ किया था। हम तुम्‍हारा खोया हुआ सम्‍मान वापस चाहते हैं, लेकिन तुम्‍हारे ऊपर हमें पूरा भरोसा नहीं है इसलिए हम स्‍वयं भी तुमको सरकारी काम काज से दूर रखते हैं, और चाहते हैं कि हमारी यह आशंका निर्मूल हो जाय इसलिए तुम पूरी तरह हमारे साथ आ जाओ, इसका प्रमाण पेश करो। हम तुम्‍हे शिक्षा में अपनी सकमक्षता में ला देंगे, तुम इनसे बहुत आगे निकल जाओगे, हम तुम्‍हें इनसे अधिक योग्‍य बनाऍंग। इस मन्‍त्र के जोर से ही उन्‍होंने सैयद अहमद को मुग्‍ध कर दिया था और भारतीय समाज में पहले से चले आरहे अलगाव को पारस्‍परिक शत्रुता में बदल दिया था जो अमीरों और तात्‍तुकेदारों के भीतर एक जहर से रूप में उतर गया था जो आज तक उनके भीतर काम करता दिखाई देता है, परन्‍तु वे अपने तई नगण्‍य थे इसलिए वे उसी विष को दूसरे मुसलमानों में उतारने के लिए प्रयत्‍नशील रहे। इस पक्ष को मैं सैयद अहमद के सन्‍दर्भ में अपनी समझ के अनुसार रख चुका हूँ। दूसरे देश में, जिसे अंग्रेजों को कभी भी छोड़ना पड़ सकता था और छोड़ना पड़ा उनके द्वारा इस नीति का सहारा लेना गलत नहीं था। उन्‍होंने अलगाव के कुछ और बीज बोये जो पूरी तरह नष्‍ट नहीं हुए पर उनको वे उचित खाद पानी नहीं दे सके। इसलिए उन्‍होंने इस एक राष्‍ट्र को दो राष्‍ट्रीयताओं का देश बनाने में सफलता पाई। मनोवैज्ञानिक स्‍तर पर वे यह काम उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में ही कर चुके थे। परन्‍तु जिस दिन से कम्‍युनिस्‍ट पार्टी में मुस्लिम लीग की आत्‍मा ने प्रवेश हुआ उसके बाद ही वह अकल्‍पनीय बटवारा जो इसकी माँग करने वालों के लिए भी असंभव प्रतीत हो रहा है, संभव बना मान लिया गया और उसने यह कर भी दिखाया। कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने यदि क्रान्ति का सपना दिखाया था तो उसे उसने इस रूप में पूरा करके भी दिखा दिया। समझ उल्‍टी भले हो, वह जो कहती है वह करती है। और करती इस तरह है क्रान्ति उसको देख डरती है।
”अब तुम अपने देश को फिर दो राष्‍ट्रीयताओं वाला देश बनाए रखने के लिए प्रयत्‍नशील थे जिसका मूल्‍यांकन हम नहीं करना चाहते, दिल बँट जाने के बाद भी साथ रहने की विवशता थी। साथ रहें और सम्‍मान से रहें यह जरूरी था । परन्‍तु इसके बाद अपने ही देश को नये सिरे से बॉंटो और राज करो की नीति कोई देशद्रोही ही अपना सकता था, क्‍योंकि पहले भी और किसी भी देश में अपनों को बॉंटने की राजनीति नहीं की जाती। सत्‍ता के लिए तुम अपने ही देश के शत्रु बन गए और इसे न जाने कितनी राष्‍ट्रीयताओं का देश बनाने के कार्यक्रम पर जुट गए और इसे जातियों, उपजातियों के बीच अधिकारों की समानता के अभियान का रूप न देकर, आपसी तकरार का रूप दे दिया। तुम्‍हारा पुराना नाम भी किसी काम का न रहा तो नाम बदल कर अपने को सेक्‍युलरिस्‍ट कहने लगे, पर कार्यक्रम वही पुराना, हिन्‍दू का अपमान, उसके मूल्‍यों का तिरस्‍कार, उसके अंगों का विच्‍छेदन, उसके इतिहास और संस्‍कृति का उपहास और विघटन, बिना प्रमाण और बिना औचित्‍य के।
”जैसे मूर्तियॉं तोड़ने वालों को कला की समझ नहीं होती, पुस्‍तकालयों को जलाने वालों में विद्यानुराग नहीं होता, होता तो वे यह काम कर नहीं सकते थे। अलबरूनी नालन्‍दा में आग नहीं लगा सकता था। यह काम बख्तियार खिलजी का जत्‍था ही कर सकता था जिसे कुरान के अलावा किसी दूसरे ग्रन्‍थ का ज्ञान नहीं था और हो सकता है कुरआन का भी ज्ञान न रहा हो, उसी तरह प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्‍कृति के विनाश के लिए तुम्‍हारे मूर्ख इतिहासकार ही तैनात किए जा सकते थे जिन्‍हें उन भाषाओं का ही ज्ञान नहीं था जिसमें हमारी सभ्‍यता, इतिहास के सूत्र, सांस्‍कृतिक संपदा सुरक्षित है और उन्‍हें न उन स्रोतों की चिन्‍ता थी न उन तक पहुंचने के रास्‍ते मालूम थे जो उन भाषाओं के ज्ञान और उनमें जलाए, मिटाए जाने के बाद भी बचाया जा सका है इसका पता ही न था और इस अज्ञान पर वे गर्व भी करते थे।
”ऐसे जाहिलों ने हिन्‍दू समाज को तोड़ कर, मिटा कर इसे सुधारने का जिम्‍मा अपने कन्‍धों पर ले लिया। हमारे मनोबल को तोड़ने, अयुत कोटि वर्षों तक अपना गुलाम बना कर रखने के इरादे से उन विदेशियों की लिखी पुस्‍तकों को ही अपने ज्ञान का एकमात्र स्रोत बना कर अक्षरगोपाल बने इन विद्वानों की समझ और ज्ञान के उथलेपन पर तरस आता है परन्‍तु गलानि इस विवशता पर भी होती है कि विदेशी सत्‍ता के हटने के साथ सत्‍ता इनके हाथ में चली आई और ये नाना वेश बना कर उसी पुराने कार्यक्रम पर जुटे हुए हैं। मूर्खो को इतनी महिमा कभी नहीं मिली होगी जिनी वामपंथी चादर ओढ़ने वाले इन अक्षरगोपालों को।
”तुम एक दिन पानी की एक बोतल ले आओ, मुहावरे को चरितार्थ करते हुए पानी पी पी कर गालियॉं दो, मैं कुछ बोलूँगा नहीं, पूरा सुन लूँगा। तुम्‍हारा भी जी भर जाएगा। लेकिन यह जब देखो तक कोसने लगते हो, और इतना वक्‍त इसी पर बर्वाद कर देते हो यह नहीं होना चा‍हिए। जरा सा छेड़ा कि शूरू हो जाते हो…”
”पुर हूँ मैं शिकवे से यूँ राग से जैसे बाजा, इक जरा छेडि़ए फिर देखिए क्‍या होता है। गुस्‍सा लगता है यार, क्‍योंकि इन्‍होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अधपढ़े अक्षरगोपालों की जमातें पैदा कीं, जिनके प्रताप और तेवर से ही डर लगने लगता है। खैर, तुम जो छेड़ बैठते हो, वह तुम्‍हारा सवाल नहीं होता है तुम्हारी घबराहट होती है और उस घबराहट को दूर करने के लिए मुझे यह भी बताना होता है कि यह पैदा कैसे हुई। तुम लोगों की विवशता यह नहीं है कि तुम जो जानते हो, वह डस्‍टबिन से उठाया हुआ ज्ञान है, विवशता यह है कि तुम उसके इतने आतंक में रहे हो कि कोई उससे बाहर लाना चाहे तो तुम उसे समझ नहीं पाते। जब बात समझ में आने लगती है तो घबरा जाते हो। पीछे हट जाते हो क्‍योंकि उसके बाद तुम्‍हारा आकलन जीरो पर नहीं आ जाएगा, माइनस जीरो की ओर झुक जाएगा, निगेटिव की ओर। इसलिए तुम उस ज्ञान को प्रसारित होने में बाधा डालते हो, दुष्‍प्रचार करते हो, और नजरअन्‍दाज करते हो और इसके बाद भी यदि किसी ने प्रकाशकों की कृपा से पढ़ कर उसकी चर्चा कर दी तो उसको हिन्‍दुत्‍ववादी कह कर परेशान करने लगते हो । अंधेरे का साम्राज्‍य माचिस की तीली तक से डरता है । मेरी बात तुम्हारी समझ में न आए शायद इसलिए ‘हिमालय रैबार’ के अंक अप्रैल-जून 2016 में Claude Alvores के निबन्‍ध Resisting the West’s Intelletual Discourse का एक छोटा सा अंश तुम्‍हें दिखाना चाहता हूँ:
Much of the knowledge in circulation in the Western World about the rest of the world was the direct result of political overloading. It was not only distorted but acutely contaminated by the ethnic concerns, goals, theories, obsessions, anxieties, and peculiar assumptions and above all political goal of western scholars and universities.
जिसे तुम गाली समझ बैठे और घबरा गए, वह असलियत का खाका था, उस ऐक्‍यूटली कंटैमिनेटड ज्ञान का अर्थ तो तुम्‍हारी समझ में आएगा ही नहीं। कभी होटलों के कूडे को उलटते पलटते कुत्‍तों और उनके साथ ही किसी क्षुधाकातर व्‍यक्ति को उस से पेट भरते देखा है । अपना ज्ञान उत्‍पादित न कर पाने, अपने पुराने ज्ञान से भी वंचित हम सबकी यही दशा रही है और दुर्भाग्‍य की पराकाष्‍ठा यह कि जिन्‍होंने इस अधोगति को समझा, इससे बाहर लाने का कोई प्रयत्‍न किया, उनसे घबरा कर उनको बदनाम करने या गुमनाम रखने में तुम सक्रिय रहे। है न लानत की बात । पर जानते हो इसका रहस्‍य । अपने विदेशी मूल पर गर्व करने वाले मुस्लिम समुदाय का वही तबका है जो न अपने इतिहास का सामना कर पाता है न वर्तमान का । दोनों पर दो तरह के पर्दे डाल कर अक्षरगाेपाल बड़बोलों की अक्षौहिणी तैयार करता है जिसकी दुष्‍प्रचार शक्ति के सामने हम मूक रह जाते हैं। वह इससे बाहर आना नहीं चाहता, क्‍योंकि इसी से उसे डूबने से बचने के लिए वह तिनका अपनी पहुँच में दिखाई देता है। वह तिनका जेम्‍स मिल ने दिया था कि पश्चिम सभी माममों में शेष जगत से श्रेष्‍ठ है और जो किसी देश के जितना ही पश्चिम है वह उससे उतना ही श्रेष्‍ठ है । और इस कल्पित श्रेष्‍ठता के तिनके इतने कमजोर हैं कि फूँक मारते ही उधिया जायँ फिर भी इन्‍हें ही तुम लौह प्राचीर मान बैठे थे और अपनी बौद्धिक बलि दे कर बचाने में लगे रहे हो, क्‍योंकि हमारे बीच जो स्‍थापित हैं वे इसी के बल पर स्‍थापित हैं और इसका रहस्‍य उजागर होते ही विस्‍थापित हो जाते हैं ।”
”तुम्‍हारी भँड़ास निकल गई ? कुछ बच रहा हो तो उसे भी सुनने को तैयार हूँ। पर मेरे सिवाय कोई दूसरा इसे सुनने और मानने को तैयार होगा? खैर, मानने को तो मैं भी तैयार नहीं हूँ फिर भी कुछ बकने को रह गया हो तो वह भी बक लो।”
”यहीं तो तुम जीत जाते हो यार । इस डेडलाक को मैं कभी तोड़ नहीे पाता हूँ। डेडलाक का मतलब जानते हो ? नहीं जानते होगे । तुम तो मुर्दा ताला कह कर छुट्टी पा जाओगे पर यह न समझोगे कि ताला मरता कैसे है? डेड लाक का मतलब है जंग लगा वह ताला जो चाभी को तोड़ दे पर खुलने का नाम न ले। तुम वही हो, और मैं वह चाभी जो अभी तक हारती ही आई है ।

Post – 2016-08-17

निदान – 22

तुम अंधेरे में देख लेते हाे
हम अंधेरों को देख लेते हैं

”तुम जिस तरह की निर्ममता से अपने तर्क रखते हो, एक पूरी की पूरी कौम को सन्‍देह के दायरे में खड़ा कर देते हो, तुम्‍हें कभी यह याद आता है कि इसे ही यहूदियों के सन्‍दर्भ में ऐंटी सेमिटिज्‍म कहते हैं, और कौम बदलने के साथ नाम न भी बदलो तो भी कभी सोचते हो कि उसी प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हो तुम। ”

”तुम भी इस तरह सोच सकते हो यह तो मैंने सोचा भी नहीं था, क्‍योंकि यही तो तुम लगातार करते रहे हो, ऐंटी हिन्‍दुइज्‍म और उसमें भी ऐंटी ब्राह्मनिज्‍म के अपने उस अभियान को भूल गये जिससे बेचैनी अनुभव करते हुए मैंने इस प्रवृत्ति की जड़ों को कई कोणों से तलाशना अारंभ किया तो पाया यह तुम्‍हारी चेतना में मुस्लिम लीगी कार्ययोजना के घर कर जाने के कारण है । सेक्‍युल‍रिज्‍म भारतीय सन्‍दर्भ में मुस्लिम लीग का दूसरा नाम है, जिसका अर्थ मुझसे पहले कोई जानता ही न था।”

”आधुनिक इतिहास में यह तुम्‍हारा इतना बड़ा योगदान लगता है कि तुम नोबेल प्राइज के निर्णायकों को भी अर्जी भेज चुके होगे।”

”पुरस्‍कार अर्जी देकर पाए जाते हैं, यह भी विश्‍व सभ्‍यता को तुम्‍हारा ही योगदान है। पुरस्‍कार पाने के लिए अपने समस्‍त साधनों के साथ लोग बिछ जाते हैं, इस तर्क के दबाव में, कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। और वे अपना आपा तक खो बैठते हैं।

”मुझे कुछ नहीं पाना है इसलिए खोना भी कुछ नहीं है। मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्‍कार यह होगा कि यह बात तुम्‍हारी समझ में आ जाए कि इतिहास लेखन निठल्‍ले छोकरों की मसखरी नहीं है जी बहलाने के लिए कुछ भी ऊटपटांग कह दिया, कुछ भी कर दिया करते हैं, इस खयाल से कि अगले को दुख होगा और वे उसका मजा लेंगे। बेकारीजन्‍य बोरडम से जूझने वाले उन छोकरों के मामले तो यह फिर भी क्षम्‍य है, पर तुम इतने साधन संपन्‍न हो कर भी यही काम करो और यह भी न ध्‍यान रखो कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है, नतीजा ऑंखों के सामने आने पर भी, यह सोच कर हैरानी होती है।

”ऐसे इतिहासकारों को इतिहास का निर्माता, विश्‍वविख्‍यात इतिहासकार, पेशेवर इतिहासकार कह कर इतना फुला देते हो कि वे भीतर के दबाव से फट जाते हैं और तुम बाहर के दबाव से सिकुड़ जाते हो। न फटने का बोध न सिकड़ने का अहसास, तुम स्‍वप्‍नजाग में चले गए हो यार । सोमनैम्‍बुलिज्‍म के शिकार हो। इतने सारे लोग, जिन्हें हमने अपने समाज की बौद्धिक जिम्‍मेदारियॉं सौंप रखी हैं, या जिन्‍होंने अपनी संगठित शक्ति से सोचने का अधिकार हमसे छीन रखा है, यदि इस अवस्‍था को पहुँच जाऍं तो उस समाज का वर्तमान और भविष्‍य क्‍या होगा। वर्तमान तो सामने है जो उनका ही रचा है और जिसकी जिम्‍मेदारी भी वे नहीं लेते, भविष्‍य तो हम भी नहीं जानते, क्‍योंकि इस बीच कुछ बदला भी है।

”स्‍वप्‍नजाग व्‍याधि के बारे में तुम्‍हें कुछ पता है या नहीं। तुम तो पावलोवियन रालप्रवाही रिफ्लेक्‍स ऐक्‍सन से आगे मनोविज्ञान में कोई रुचि रखते ही नहीं। मैं एक वास्‍तविक घटना के हवाले से तुम्‍हें बताता हूँ:
” एक आदमी था, वह सोता तो अगली सुबह पाता उसके सारे कपड़े गीले हैं। कुछ पता नहीं कि यह कैसे हा जाता है। बिस्‍तर का तो हाल न पूछो। यह किसी की समझ में नहीं आता था। उसका एक दोस्‍त या भाई जो भी समझो, एक रात जाग कर यह देखने लगा कि मामला क्‍या है। गहरी नींद में वह उठा, दरवाजा खोला, नदी की ओर चल पड़ा, पानी में उतर गया और तैरने लगा। मजे की बात यह कि तैरना उसे आता नहीं था। जी भर कर तैर कर बाहर निकला घर पहुँच गया, सो गया। दोस्‍त ने रहस्‍य तो जान लिया पर बताया नहीं। अगली रात फिर वहीं क्रिया, वह तैर रहा था तभी उसने उसका नाम ले कर पुकारा। उसकी नींद टूट गई और उसके बाद वह अपने को बचाने की कोशिशों के बाद भी बचा न सका। डूब गया। तुम लोगों से मैं इतना प्‍यार करता हूँ, कि चेतावनी देते और दिमाग सही करने की सलाह देते हुए भी डरता हूँ कि कहीं तुम्‍हारा वही हाल न हो। तुम्‍हारा नुकसान अकेले तुम्‍हारा नहीं है। तुम खुद भी डूबाेगे और समाज और देश को भी ले डूबोगे। नहीं, गलत कह दिया। वह नासमझी तो मोदी ने सबका साथ सबका विकास का नारा दे कर कर दी और उसके बाद ही तुम्‍हारे डूबने के आसार, तुम्‍हारी मृत्‍यु की चीत्‍कार आरंभ हो गई और तुम मंच पर हाजिर हो कर यह बयान भी दर्ज कर आए कि हॉं, यह मेरी ही आवाज है, यह मेरी ही चीत्‍कार है। यह… मैं .. ही …अपनी … तार्किक … परिणति … को …पहुँच … रा..रह… अ
आ …हूँऊँऊँऊँऊँऊँ।

”यार मैं भ्‍ाी हॉंकूँ जितना भी इतिहास के इस दबाव को समझ नहीं पाया। मैंने अपनी सीमा में काम करते हुए मुस्लिम लीगी मानसिकता को समझते हुए पाया कि यह अपने विदेशी मूल पर गर्व करने वाले और अपने ही धर्म समुदाय को तिरस्‍कार से देखने वाले उन रईसो की टोली की मानसिकता है जो अपने को श्रेष्‍ठ दिखाने के लिए हिन्‍दुओं और हिन्‍दुस्‍तानी मुसलमानों के इतिहास, मूल्‍यव्‍यवस्‍था, आचरण सबसे नफरत करता रहा है। और इनको अपना वफादार सिद्ध होने के लिए परीक्षाओं से गुजारता रहा है। धर्मान्‍तरित मेवाती राजपूतों का अनुभव याद करो तो समझ में आ जाएगा। जितना समझ में आया मैंने यह समझाने का प्रयत्‍न किया कि अपने क्षेत्र में कुछ कर न पाने के कारण तुमने भी पाश्‍चात्‍य शिक्षाप्राप्‍त बौद्धिक वर्ग में और उसके संचार माध्‍यमों से भारतीय समाज से ही घृणा के प्रसार में सहयाेग करना आरंभ कर दिया। देखो, मैं यहां समुदाय की नहीं, समाज की बात कर रहा हूँ। इसे धर्म रेखा में बॉंट कर मत देखाे, विेदेशी मूल पर गर्व करने वालों और देसी मूल के लोगों में बॉंट कर समझने में अधिक आसानी होगी। जिनकी जड़े तथाकथित दक्षिण एशियाई भूभाग में नहीं हैं और इसलिए जो हमारी जड़ों को नहीं जानते, अपनी जड़ों को मिटा कर आए थे, फिर भी उससे एक काल्‍पनिक मोह बना हुआ है, इसलिए वे उससे जुड़ने के लिए पान इस्‍लामिज्‍म की बात करते हैं और अपने ही देश के लोगों को, जो हिन्‍दू हों या मुसलमान, अपनी जमीन से उच्‍छेदित करने के लिए प्रयत्‍नशील होते हैं, वे उन विदेशियों के एजेंटों जैसे हैं, जिनको बाहर से कुछ मिलता है, कुछ नहीं तो भावनात्‍मक सन्‍तोष। वे इस जमीन के न थे, न इससे जुड़ पाए, यह उनकी समस्‍या थी, परन्‍तु यह किन्‍हीं भी परिस्थितियों में इस्‍लाम कबूल करने को बाध्‍य हुए लोगों पर अपना विदेश तो नहीं थोप सकते, जिनका जन्‍म यहीं हुआ, जिनको जुड़ने के लिए केवल अपना देश है, अन्‍यत्र वे हिन्‍दी ही कहे जाते हैं।”

”तुम हिन्‍दूवाद की जगह हिन्‍दीवाद चलाना चाहते हो ।”

”यदि चल जाय तो । जब मैं तुम लोगों को मुस्लिम समुदाय के उस रईस तबके के करीब पाता हूँ जो अपने ही समाज के बाकी हिस्‍सों को ओछी नजर से देखते थे और अपने प्रति स्‍वामिभक्ति की कष्‍टसाध्‍य शर्ते रखते हुए उनमें उत्‍तीर्ण होने की चुनौती देते थे, तो यह मेरा आविष्‍कार नहीं था। मात्र अवलोकन था। आम जनों की भाषा, उनके विश्‍वास, उनके जीवनमूल्‍य, उनके उल्‍लास और विषाद सभी से दूर और ऊपर, रईसों वाले उसी दायरे का निर्माण तुमने अपने बौद्धिक अाभिजात्‍य के नशे में किया जिससे वह आन्‍तरिक उपनिवेशवाद स्‍थापित हुआ जो भारत और भारतीयता से परहेज करता है और विचार से लेकर कलामूल्‍य और जीवनमूल्‍य और मूल्‍यवान वस्‍तुएं तक विदेशों से मंगा कर गौरव अनुभव करता है।

”अब मैं तुहारे उस आरोप को लूँ जिसमें अात्‍मप्रक्षेपण के दबाव में तुम मुझ पर ऐंटी सेमिटिज्‍म या ऐंटी इस्‍लामिज्‍म का आरोप लगा रहे थे तो यह समझ लो कि एंटी- विसर्ग वाले शब्‍द अारोप, अभियाेग या गालियॉं हुअा करते हैं। उनमें विश्‍लेषण विवेचन नहीं होता। घृणा का प्रसार होता है, जिसकी उत्‍कटता विवेचन से कम हो जाती है। इन शब्‍दों का प्रयोग करने वाले के पास तर्क नहीं होते, इसलिए वह केवल आरोप लगाता और गालियों की भाषा में बात करता है और गालियों तक को संस्‍कृति और स‍ाहित्‍य में रूपान्‍तरित कर देता है। नहीं, साहित्‍य और संस्‍कृति को भी गालियों के स्‍तर पर उतार देता है। तुमने यही किया और यह जान तक न सके कि क्‍या कर रहे हो। मुझे किसी पर कोई आरोप लगाते या किसी के लिए अयुक्‍त लांछन लगाते समय तो पीड़ा होती ही है, जहाँ इसके पर्याप्‍त कारण होते हैं, वहॉं भी लांछन लगाने की जगह कारण की तलाश करता हूँ, जिससे अपनी व्‍याधि को समझने और उससे उबरने में उसे भी मदद मिले और जब तक वह व्‍याधि बनी रहती है तब तक परहेज या बचाव की चिन्‍ता हम भी करें, अन्‍यथा उसी व्‍याधि से हम भी ग्रस्‍त हो जाएँगे।’

Post – 2016-08-16

निदान -21

और भी तीर हों तरकश में तो आने दो उन्‍हें

”तुम सच सच बताना, तुम भी जानते हो, जब से भाजपा का शासन आया है तब से हिन्‍दुत्‍ववादी शक्तियों का मनोबल बढ़ा है और कई अनपेक्षित घटनाऍं घटित हुई है। इसी अनुपात में दूसरों की आशंकाऍं भी प्रबल हुई हैं । ऐसे में तुम ईसाइयों और मुसलमानों की इतनी तीखी आलोचना करते हुए और हिन्‍दू मूल्‍यों और इतिहास का जयकारा लगाते हुए उन शक्तियों को प्रबल बनाने और समाज की अस्थिरता बढ़ाने का काम नहीं कर रहे हो ? यही तुम्‍हारा देश प्रेम है ?

”तुम भ्‍ाी मानोगे कि यह न समाज के लिए सही है न देश के लिए और यदि ऐसा है तो फिर अपनी ही नजर में एक गलत काम करके तुम इस उम्र में क्‍या हासिल करना चाहते हो। तुम अपनी इच्‍छा बता दो, मैं चन्‍दा करके तुम्‍हारी वह इच्‍छा पूरी करने का इन्‍तजाम करूँगा । अपनी मूर्ति बनवाने को कहोगे तो वह भी बनवा दूँगा यार, भले वह तुम्‍हारी औकात को देखते हुए अँगूठे बराबर ही बन पाए ।”

”तुम सचमुच मेरी इच्‍छा पूरी करना चाहते हो ? वचन दो तो बता देता हूँ और इसे पूरा करने के लिए तुम्‍हें किसी के सामने हाथ पसारने की भी जरूरत न होगी।”

”पहले बताओ तो सही। उसके बाद पूरी न कर पाऊँ तो कहना।”

”इस उम्र में भी मेरी एक ही इच्‍छा है और मुझे डर है कि मेरे मरने के दम तक वह अधूरी ही रह जाएगी। मेरी इच्‍छा यह है कि तुम अपनी ऑंखों से देखना और दिमाग से सोचना आरंभ करो । आदमी बन कर रहो, खिलौना बन कर नहीं। यदि अपनी ऑख और दिमाग का इस्‍तेमाल करने लगे तो तुम्‍हें स्‍वयं दिखाई देगा कि उत्‍तेजना पैदा करने वाली बाते, शान्ति भंग करने वाले काम कौन कर रहा है और क्‍यों कर रहा है? तब तुम्‍हें दिखाई देगा आज तक जिस भाषा में कुछ कहना तक तुम्‍हें अभद्रता प्रतीत होता था, हवास खो कर वह भाषा तुम क्‍यों बोलने लगे? तुम्‍हारे प्रतिवाद में भी जिन तत्‍वों की चर्चा मैंने की थी उनकी बदजबानी को छोड़ कर न किसी ने किसी तरह की उत्‍तेजना पैदा करने वाली बात की न ही ऐसा कोई काम किया। तुमको पता है आज ही एक सज्‍जन ने एक ऑंख खोलने वाली बात की। कश्‍मीर से इतने लाख हिन्‍दू निकाले गए या पलायन करने को विवश हुए, उनमें से एक भी उपद्रवकारी नहीं हुआ, और … छोड़ो, मैं जो कहना चाहता था उसका संदेश तुम तक पहुँच गया होगा। अकारण और विकास के कामों को आरंभ करने के साथ यह सब कहॉं से , किसकी योजना से आरंभ हो गया। उत्‍तर तुम्‍हें देना है कि तुम उन योजनाकारों के साथ हो या देश के विकास और सबके हित के साथ। जवाब तुमको देना है कि तुमको सब कुछ उल्‍टा उल्‍टा दिखाई क्‍यों देता है ?

”तुम कहते हो मैं मुसलमानों की तीखी आलोचना करता हूँ । मामला बीमारी का होता या गैंगरीन का होता तो तुमको शिकायत होती तुमने इतनी तीखी चीरफाड क्‍यों कर दी। मैं केवल यही कहता कि इसके बिना बीमारी से मुक्ति नहीं पाई जा सकती थी। मैं अपने मरीज को संकट से उबारना चाहता था। हॉं मिशनरी ईसाइयत के बारे में, उन मानवाधिकार संगठनों के बारे में और ऐसे गैरसरकारी संगठनों के प्रति जो विदेशों से पैसा पाते हैं मैं बहुत शंकालु हूँ। उनका मुसलमान या ईसाई होना भी जरूरी नहीं है, हिन्‍दुओं में उनकी संख्‍या कहीं ज्‍यादा है। यदि ऐसे संगठन मुसलमानों में भी हैं तो उनके प्रति भी उतना ही शंकालु और उनके उच्‍छेदन तक का समर्थक हूॅ, क्‍योंकि पैसा देने वाला अपने किसी काम के लिए पैसा देता है और पैसा पाने वाले उस काम को अंजाम तक पहुँचाने में अपनी जान लड़ाकर अधिक से अधिक पाने की कोशिश करते हैं। अभी कल ही पन्‍द्रह अगस्‍त था, जानते हो पन्‍द्रह अगस्‍त का ऐसा कौन सा हीरो है जिसका नाम और शब्‍द चारों ओर गूँजते रहते हैं ?”

”एक नहीं तीन की बात करो, गांधी, नेहरू और भगत सिंह।”

”मैं जानता था, दिमाग जिनके पास नहीं होता वे भी तोतों की तरह रटे हुए जुमले बोल लेते हैं और दिमाग से काम न लेने वाले भी ऐसा ही करते हैं। जिस व्‍यक्ति का नाम और जिसके शब्‍द पूरे वातावरण में छाए रहते हैं उसका नाम है प्रदीप। स्‍वतन्‍त्रता दिवस का महानतम कवि और बाद में दिनों में भुला दिया जाने वाला। केवल मुझ जैसों को वह पूरे साल याद रहता है । अभी जिन लोगों का मैंने नाम लिया उनकी याद आते ही उसकी वह पंक्ति, ‘सँभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से।’ याद आ जाती है। विदेशी पैसे पर पलने और शहीदाना तेवर अपनाने वाले ये लोग देश के साथ केवल अपघात कर सकते हैं और करते आए हैं, परन्‍तु मुद्दा ऐसा अपनाऍंगे कि ऑंख में ऑंसू छलछला आए, किसी गरीब और काम काज में फँसी माँ से उसका बच्‍चा किराए पर लेकर और उसे भूख से अर्धमूर्छित रख कर, कन्‍धे से चिपकाये चौराहों पर भीख माँगती औरतों की तरह । तुम जानते हो, शक भी करते हो और फिर भी तुम्‍हारा जी पिघल जाता है, और हाथ जेब की ओर चला ही जाता है। ताे उनके बारे में तो मैं आक्रामकता ही हद तक मैं अनुदार हूँ । एकता की किसी भी अवधारणा में अपराधियों और देशघातियों के साथ एकता की हिमायत नहीं की जा सकती।

”परन्‍तु सामान्‍य ईसाइयों और आम मुसलमानों में मेरे उतने ही मित्र और हितैषी हैं जितने हिन्‍दुओं में और सबसे अधिक तो उन सेक्‍युलरिस्टों में जिनकी खिंचाई न करूँ तो खाना हजम न हो, क्‍योंकि उनकी नेकनीयती पर मुझे पूरा भरोसा है और समझ पर बहुत कम। इसलिए बहस के लिए उन कमियों को उजागर करते हुए यह भी आशा करता हूँ कि वे जहॉं मुझसे चूक हो रही हो वहॉं उतनी ही निर्ममता से मेरी खिंचाई करेंगे, परन्‍तु कार्यकारण समझाते हुए । यह हमारे हित में है । यदि हमें प्रेम से साथ रहना है तो झूठे बहानों और शातिर इरादों से बचते हुए ही समझदारी और प्रेम पैदा किया जा सकता है। पर्दे उतार कर पर बेपर्दा हो कर नहीं।

”तुमको यह तो समझना था कि यह सब अकारण नहीं होने लगा है। तुम तो पहले दिन से जो मोदी की पूँछ पकड़ कर लटके तो उसके साथ घिसटते ही चले जा रहे हो। घिसटते हुए आदमी को कहाँ क्‍या हो रहा है दीख नहीं सकता, क्‍यों हो रहा है समझ में आ नहीं सकता और तुम मुझे ही ऑंखे खोलने और दिमाग से काम लेने की सलाह दे रहे हो।”

”और तुमने पहले ही दिन से हंगामा मचाना शुरू किया तो रुकने का नाम ही नहीं लिया आैर सारी दुनिया को यह भी बता रहे हो कि देखो हंगामा हो रहा है। हंगामा करने वाले भी तुम, उससे डरने वाले भी तुम और दुनिया को बताने वाले भी तुम कि लोग हंगामे से डर कर भागना चाहते हैं पर दहशत ऐसी है कि भाग भी नहीं पाते। मजेदार है यार!

”आओ जरा पहले दिन पर लौटें जिस दिन, तुम ठीक ही कह रहे थे, कि मैं मोदी के साथ खड़ा हो गया था और तब से अब तक मुस्‍तैदी से साथ खड़ा हूँ और तुम्‍हारे निमन्‍त्रण और धौंस के बावजूद कि अपना भला चाहता है तो तूू भी हमारे साथ हो कर हंगामा मचा, मैं तुम्‍हारे इरादों, मजबूरियों और बेवकूफियों को उजागर करता रहा । मेरा पहला प्रश्‍न, ”तुम क्‍या उन हालात से खुश थे जिनमें पूरे देश का कांग्रेस से मोहभंग हो गया था ?”

”जब कोई खुश नहीं था तो मैं क्‍यों खुश हो लेता।”

”फिर उपलब्‍ध विकल्‍पों में से देश ने एक के पक्ष में भारी समर्थन प्रकट किया था, उस समय कोई दूसरा विकल्‍प उपलब्‍ध था ?”

वह कुछ सोच में पड़ गया, कुछ देर डूबते उतराते रहने के बाद बोला, ”विकल्‍प उपलब्‍ध नहीं था, इसलिए क्‍या सत्‍ता को फासिस्‍ट ताकतों के हाथ में सौंप कर निश्चिन्‍त हो जाता ?”

”तुम्‍हारी यह आशंका उस व्‍यक्ति के किसी कथन या कार्य से सच साबित हुई?”

”तुम नहीं समझोगे ये बातें, ये मासूम चेहरा बनाए भीतर अपने घिनौंने इरादों को छिपाये रखते हैं और फिर जब एक्‍शन में आते हैं तो हम सिर पीटते रह जाते हैं कि हम समय रहते सचेत नहीं हुए।”

”और तुम्‍हारी सचेतता का प्रमाण है कि तुम ऐसे समय में जब विकल्‍प बिल्‍कुल गायब है, अराजकता पैदा करने के लिए हंगामा कर रहे थे और आज तक कर रहे हो और उसके किसी काम से नहीं अपनी हंगामे से ही असुरक्षित अनुभव कर रहे हो कि तुमने अब तक जो अनाप शनाप बका है उसका बदला वह ले सकता है। अर्थात् अपने ही कु‍कर्म के कल्पित दुष्‍परिणाम से डरे हुए हो, न कि उसके किसी काम से। वह जुड़ने और साथ आगे बढ़ने की बात करता है तो तुम कहते हो हमें पीछे रहना पसन्‍द, पर तुम्‍हारे साथ जुड़ कर आगे नहीं बढ़ सकते। उल्‍टे तुम्‍हारे जोड़ने और मिलाने की योजनाओं को ध्‍वस्‍त करने की हर संभव कोशिश करेंगे। गलत कहा ?”

वह कुछ बोला नहीं।

”यह बताओ किसी मौलबी मुल्‍ला ने यह कहा कि वह असुरक्षित अनुभव कर रहा है, या यह कि यह फासिस्‍ट शासन है या इसका अन्‍त फासिज्‍म में होगा ?”

”कहेंगे कैसे अपनी जान जोखिम में डालनी है।”

”तुम्‍हारी जान को कोई खतरा नहीं है यह जान कर तुम उनसे आगे बढ़ कर फासिज्‍म फासिज्‍म चिल्‍लाते हो कि तुम्‍हारे समर्थन से वे भी ऐसा करने लगें ?”

वह फिर सोच में पड़ गया ।

”मुझे सलमान रश्‍दी का लेखन टुकड़ों में पसन्‍द है और सैटेनिक वर्सेज तो कतई नहीं, फिर भी यह बताओ, उस किताब को बैन करने का सुझाव किसी मुल्‍ला का था या तुम लोगों का ?”

”इससे क्‍या फर्क पड़ता है । मुल्‍ला मौलवी उपन्‍यास पढ़ते हैं क्‍या ?”

”गरज कि पहले मुल्‍ला मौलवी मुस्लिम समुदाय का नेतृत्‍व करते थे, अब तुम लोग करने लगे हो। तुम इतना आगे बढ़ चुके हो कि खुमैनी को भी रास्‍ता दिखा सकते हो ।”

”बाबरी मस्जिद के सवाल पर कोई मुल्‍ला पहले आया था या तुमने बाबरी ऐक्‍शन कमेटी बनाई थी और उसमें कुछ मुल्‍लों को शामिल होना पड़ा ?”

”क्‍या तुम उसे गिराने का समर्थन करते हो, उचित ठहराते हो ?”

”यह सवाल है ही नहीं, इसका जवाब मैंने उसके गिराए जाने से पहले दे दिया था और यह भी बताया था कि तुम्‍हारी नादानी के कारण यह गिर कर रहेगी, क्‍योंकि तुम जो तथ्‍य है उसे नकार रहे हो, जब कि तुम्‍हें सरकार को पुरातत्‍व के स्‍थलों की सुरक्षा की जिम्‍मेदारी दे कर उसे संभावित परिणामों के लिए उत्‍तरदायी बनाना था। परन्‍तु इस समय मैं नेतृत्‍व की बात कर रहा हूँ । तुम्हारे ऊपर यह अभियोग लगा रहा हूँ कि मुस्लिम कठमुल्‍लावाद का बौद्धिक नेतृत्‍व आज मुल्‍ले नहीं कर रहे हैं, सेक्‍युलरिस्‍ट कर रहे है और विश्‍वास न हो तो अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय में कुछ महीनों पहले इरफान हबीब का वह भाषण पढ़ लेना जिसमे उन्‍होंने आइएस की तुलना वैदिक आर्यों से की थी और जिसकी हरबंस मुखिया ने भी ताईद किया था ऐसा कुछ याद आ रहा है और जिस पर मैंने उन दिनों व्‍यंग्‍य करते हुए एक गजल भी लिखी थी। जिस बात को सुन कर कानों पर हाथ लगा कर भागने की बात कर रहा था वह यह सचाई है । संक्‍युलरिज्‍म का आइ एस से बनता हुआ चोली दामन का संबन्‍ध और तुम्हारी सारी हुड़दंग को मैं इसी शरारत का हिस्‍सा मानता हूँ।”

उसका चेहरा लाल हो गया और वह उठ कर बिना कुछ बोले चल दिया ।ह

Post – 2016-08-15

निदान – 20
सितम को यदि रहम कहना पड़े तो उनको क्‍या कहिए

”व्‍यंग्‍य विनोद में लोग संतुलन का ध्‍यान नहीं रख पाते, कई बार शालीन लोगों के मुँह से भी विनोदवश अभद्र टिप्‍पणियॉं सुनने को मिल जाती हैं, फिर इनका चलन सा हो जाता है। बोलने से पहले लोग अधिक सोच-विचार नहीं करते। इतने ही से तुम इतने खिन्‍न हो गए कि यह सोच लिया कि इन्‍हें गिनाओगे तो मैं दोनों कानों पर हथेली लगा कर भाग खड़ा होऊँगा?”

”अभी तो उस प्रकरण को मैने हाथ ही न लगाया। उसकी भूमिका बना रहा था। और जिसे तुम असावधानी से निकला कथन मान रहे हो वह होता तो है। यहॉं भी वही होता तो मैं उसकी नोटिस ही न लेता। इसके पीछे इतनी सोची समझी योजना है जिसे देख कर हैरानी होती है कि इसे कितने लोगों की सहमति से तैयार किया गया था, या किस आला दिमाग ने इसे तैयार किया था कि बाद के लोगों ने इस पर अमल शुरू कर दिया पर कुछ भी बदलने की जरूरत ही न समझी। जरा इन तथ्‍यों पर ध्‍यान दो:
1. पारसी मत जाे वास्‍तव में अहुर मज्‍दा या असुर महान का अग्निपूजक मत है, उससे इस्‍लाम की पुरानी दुश्‍मनी है। उसी के अत्‍याचारों से घबरा कर जो पारसी भाग कर भारत आ सके आ गए। भारत में उनकी असाधारण आर्थिक प्रगति और स्‍वीकार्यता के अब यदि तुम्‍हारे दृश्‍य माध्‍यम में किसी पारसी का चित्रण होता है तो वह एक मिमियाने वाला, निहायत कंजूूस और फितरती और भरोसे अे अयोग्‍य दिखाया जाता है।
2. ईसाइयों में स्त्रियों को अधिक छूट बहुत पहले से मिली हुई है । यह इस्‍लामी परदा प्रथा के सामने एक चुनौती है। कहॉं हिजाब कहॉं मिनी स्‍कर्ट पर नाज। हाल के दिनों में ईसाई देशों में स्त्रियों परदे और शर्म की बेडि़यॉं जिस तरह तोड़ी हैं, वह प्राचीन भारत में की मुक्‍त स्त्रियों को हासिल था। सबको नहीं। मुसलिम स्त्रियों में से अस्‍सी फीसद हिकारत के डर से इसे स्‍वीकार कर लेती हैं, फिर इस पर गर्व करने लगती हैं, और मुस्लिम पुरुषवर्ग की मूल्‍यचेतना आ आभ्‍यन्‍तरीकरण करके इसका ध्‍यान न रखने वालों की आलोचना करने लगती हैं। चलो यह उनकी बात हुई। पर इसके कारण ही ईसाई लड़कियों को तुम्‍हारे चित्रों में चालबाज, नशीले पदार्थों की तस्‍करी में लिप्‍त, फ्लर्ट और बेशर्म के रूप में चित्रित किया जाता रहा।
3. हिन्‍दी भाषी परिवार में भी विवाहादि के प्रसंग में पंडित को चंन्‍दन चर्चित दिखाने के साथ उसे दाक्षिणात्‍य इसलिए ही नहीं दिखाया जाता रहा कि उसका हिन्‍दी या संस्‍कृत का उच्‍चारण कुछ हास्‍यकर हो जाता है, इसका एक कारण यह था कि दक्षिणभारतीय ब्राह्मण उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त और उच्‍च पदों पर नियुक्‍त होते हुए भी अपने चंदन टीके का सम्‍मान करते थे और काम काज की जगहों पर भी उसी वेश भूषा में जाने में झिझक अनुभव नहीं करते थे। यह मेरा खयाल है, हो सकता है यह गलत हो।

अब तुमको लगेगा, जिस सशक्‍त संचार माध्‍यम में अपनी आला दर्जे की प्रतिभाओं को झोंक कर या उन्‍हें रहस्‍यमय संचार प्रणाली से आमन्त्रित करते हुए इसे उर्दू सिनेमा बनाने का प्रयोग किया गया, वह भाषा तक सीमित नहीं था, न कास्‍ट में पहले उर्दू और फिर अंग्रेजी के चलन तक, सीमित था। इसकी अन्‍तर्वस्‍तु को मुस्लिम लीगी मंसूबों के अनुरूप रखा गया।

” एक गुंडे को कृतघ्‍न हिन्‍दू से उसकी उपेक्षा और अपमान सहते हुए भी उसका परम हितैषी बनाना मात्र एक खयाल नहीं है, इसके पीछे तुम मुहम्‍मद अली के व्‍याख्‍यान की उस पंक्ति का मंचन देख सकते हो जिसमें उन्‍होंने कहा था कि एक पतित से पतित मुसलमान गांधी जैसे हिन्‍दू से भी अच्‍छा होता है और जिस तरह गांधी जी ने उसका बुरा नहीं माना था उसी तरह हिन्‍दू समाज ने, जिसे तुम आतताइयाें का समाज सिद्ध करने पर अपनी संगठित प्रतिभा लगा देते हो, उसने इसको कभी मुद्दा न बनाया न कोई उपद्रव इस चित्रण को ले कर हुआ। उसमें उसने प्राण या नाना पाटेकर की अदाकारी का ही आनन्‍द लेता रहा । इसमें दुहरी समझदारी थी। तुम्‍हारी योजना के अनुसार यदि वह उद्वेलित हो जाता तो समस्‍त संचार माध्‍यमों पर एकाधिकार रखने के कारण तुम इसका महीनों ढोल बजाते हुए कि इनको कला की समझ नहीं है, देखों, ऐसे अभिनेताओं को भी जो जन्‍म से हिन्‍दू और विश्‍वास से हिन्‍दू हैं, ये हिन्‍दुत्‍व का शत्रु बताते हुए कला पर ही बन्दिश लगाने का अभियान चला रहे हैं। इसी आधार पर हिन्‍दुओं को उपद्रवी सिद्ध करते रहते और पढ़े लिखों में बहुतों काे यह सही भी लगता, विदेशों में जहॉं हिन्‍दू विरोध ईसाइयत के प्रसार का हिस्‍सा है, वहॉं इसकी इतनी खपत होगी कि प्रचार करने वालों के गले तक चांदी भर दी जाएगी। इसलिए तुम्‍हारे इरादों को भॉपे बिना ही, अपने सहज बोध से उसने ऐसे उकसावों को लगातार विफल ही नहीं किया, अपितु कलात्‍मकता के प्रति अपने परंपरागत सम्‍मान की भी रक्षा की जिसमें यदि नग्‍न चित्रण, मैथुन की मूर्तियों को भी झेल गया जो उसक आदर्श इन्द्रिय निग्रह के अनुरूप नहीं थी। कलात्‍मक स्‍वतंन्‍त्रता के प्रति ऐसी सहिष्‍णुता, कामशास्‍त्र के रचनाकार के विशद ज्ञान, अनुभव और उसके प्रतिपादन पर उसे मुनि का सम्‍मान देने वाले समाज को तुमने समझा ही नहीं। उसे जानने का प्रयत्‍न तक नहीं किया और, बुरा तो न मानोगे, यदि मैं कहूँ कि भारतीय संस्‍कृति की जड़ों काे न जानने के कारण, तुम सांस्‍कृतिक गुंडों के रूप में अपनी दादा गिरी चलाते रहे और जो तुम सही मानते थे उससे तनिक भी विचलित हाेने को तैयार न थे।”

उसने मुझे कुठाॅव मारा, ”बौद्धि‍क बहस अब इसी भाषा में और इसी स्‍तर पर चलेगी? मेरी नीचे की साँस नीचे, ऊपर की ऊपर, कुछ कहते बने ही नहीं। मैंने अपनी गलती स्‍वीकारी। पर तभी यह याद आया कि यह गलती हुई क्‍यों। चेतना के उपस्‍तरों में बहुत कुछ ऐसा संचित होता है जो हमारे अनजाने ही हमारे कथन को किसी दिशा में मोड़ देता है। इसका ध्‍यान आने पर मैने कहा, ”यह उक्ति मुझे एम हुसेन के उच चित्रों के कारण मन में संचित आवेग के दबाव में निकल पड़ी जिसमें उन्‍होंने सरस्‍वती को गधे की पूँछ पर नंगी बैठी दिखाना आरंभ किया। मैंने इसका अध्‍ययन नहीं किया है, पर सन्‍देह है कि बाबरी मस्जिद के गिराए जाने की प्रतिक्रिया में आरंभ हुआ हो। यह एक टेढ़ा सवाल है और मेरे अज्ञान के कारण अधिक टेढ़ा फिर भी जो लोग कलात्‍मक स्‍वतन्‍त्रता को उस सीमा तक ले जाना चाहते थे कि एक बड़ा कलाकार अपनी अभिव्‍यक्ति के लिए कुछ भी करने को स्‍वतन्‍त्र है वे न कला की समझ रखते हैं न महानता की। मैं यह मानता आया हूँ कि बड़ा कलाकार समाज से बड़ा नहीं हो सकता और समाज की संवेदनात्‍मक तरंगों से यदि वह परिचित नहीं है तो बड़ा कलाकार हो ही नहीं सकता। खैर यह एक अलग विषय है हम नाहक इसमें उलझ गए।

”मैं कहना चाहता हूँ कि यह हिन्‍दू समाज इतना परिपक्‍व है और रहा है फिर भी यह कह कर कि यह अ‍सहिष्‍णु है, तुम लगातार सूइयॉं चुभाते रहे हो और इसके कारण उसके कुछ लाेग जिनकी पचहान भी उनकी पुरातनपंथिता से जुड़ी है, क्षुब्‍ध हो कर असंयत कथन अवश्‍य कर बैठते हैं, क्‍योंकि वे तुम्‍हारी तरह शातिर नहीं हैं। तुम्‍हारा ध्‍यान केवल उनके बयानों की ओर जाता है जब कि सामान्‍य हिन्‍दू समाज उनको महत्‍व नहीं देता और यह उपेक्षा उन्‍हें और क्षुब्‍ध करती है जिससे अपनी प्रासंगिकता की तलाश में वे अ‍ौर भी आक्रामक तेवर अपनाते हैं पर वह जबान से आगे नहीं बढ़ती।

”परन्‍तु इसे ही प्रमाण बना कर तुम हिन्‍दू समाज में असहिष्‍णुता बढ़ने का प्रचार आरंभ कर देते हो। हमारा एक प्रसिद्ध पटकथाकार कहता है हॉ आज असहिष्‍णुता जितनी बढ़ गई है उसमें वह शोले का वह डायलाग नहीं लिख सकता जिसमें धर्मेंन्‍द मन्दिर के पीछे से हेमा मालिनी को फॅसाने के संवाद बोलता है। यह काल्‍पनिक आरोप है और इसलिए एक तरह का पिनप्रिक भी, क्षोभ पैदा करने वाला भी।”

”तुम देखो तो किन परिस्थितियों में प्रकट की गई आशंका है यह । उसी से पहले वह दादरी कांड हुआ था।”

”मैं उस कांड पर न जाऊँगा अन्‍यथा भटक जाऊँगा, पर मुझे सन्‍देह है कि छोटे से छोटे विचलन को उसी की समकक्षता में रख कर असुरक्षा का वातावरण तैयार करने वाले असुरक्षा बढ़ाने के लिए अधिक सक्रियता से काम कर रहे हैं, क्‍योंकि वे इसे एक औजार के रूप में उस प्रशासन के विरोध में इस्‍तेमाल करना चाहते हैं जिससे उन्‍हें डर लगता है।

”उन्‍हें पता है और पहले से पता था कि हिन्‍दू समाज अपने देवताओं के प्रकोप से नहीं डरता। वह उनके साथ मित्र या पुत्र भाव से छेड़छाड़ भी कर लेता है और इसलिए इस तरह की चुहल का आनन्‍द लेता है। यदि आप यह सोचते हैं कि ऐसा चित्रण उसे आहत करता है परन्‍तु बहुत अधिक नहीं, इसलिए पहले इसे सहन कर लिया जाता था, और यह जानते हुए आप ऐसा करते रहे हैं तो यह विनोद भी अपराध था।”

”तुमसे तो भई परमात्‍मा ही बचाए। किसी चीज को अनुपातहीन ढंग से कहॉं तक बढ़ा सकते हो। इसी तरह की व्‍याख्‍याओं से तो समाज में विक्षोभ पैदा किया जाता है और शान्ति और व्‍यवस्‍था के लिए खतरा पैदा हो जाता है।”

”तुम्‍हारी अनुपात की बात से मैं भी सहमत हूँ बारीक मीमांसा में जब प्रथम दृष्‍ट्या निश्‍छल प्रतीत होने वाली किसी परिघटना में शरारत नजर आने लगे तो कुछ मामलों में यह विवेचन के दोष के कारण भी हो सकता है।

”परन्‍तु यह जो तुम्‍हारा प्रगतिशील लेखक संघ है, याने प्राग्रेसिव राइटर्स एसोशिएशन, उर्दू में भी इसका एक नाम है तरक्‍की पसन्‍द मजलिस या अजुमने तरक्‍की या जो भी हो, इसने मुस्लिम समाज में तरक्‍की का कौन सा मुहिम चलाया, तुम बता सकते हो ?”

”इसी तरह के सवाल रह गए हैं तुम्‍हारे पास ?”

”कमाल के आदमी हो, सवालों से भी डरने लगे। चलो छोड़ो, तुम्‍हारा यह जो प्रगतिशील संघ रहा है, इसने समाज में ब्रहम समाज, आर्य समाज की तुलना में सामाजिक चेतना के विकास में कितनी कम या अधिक भूमिका निभाई है ?”

”तुम बोर बहुत करते हो यार। उठा जाय ।”

”मैं बोर नहीं करना चाहता, मैं तुम्‍हें याद दिलाना चाहता हूँ कि ‘एक धनवान की बेटी ने निर्धन से नाता तोड़’ लिया जैसी छैलों वाली सोच से तुम चौकाने वाली हवाई बातें करते रहे और यह भी नहीं समझ सके कि इससे आर्थिक दीवारे समाप्‍त नहीं होती हैं और उसने ऐसा फैसला किया तो ठीक ही किया। प्रगति की बात आर्थिक सन्‍दर्भ में नहीं सामाजिक और सांस्‍कृतिक सन्‍दर्भ में ही सार्थकता रखती है और इस मामले में तुम्‍हारा योगदान नकारात्‍मक रहा। समाज को समझे बिना अपने हुक्‍म से परिवर्तन कराने चलते हो और इसके परिणामों से आहत होते हो तो क्रान्तिकारी तेवर अपना लेते हो।

”परन्‍तु मैं जिस बात पर तुमको कान पकड़ कर भागने की बात कर रहा था वह यह है कि तबलीगी प्रभाव में क्रमश: अधिक सेक्‍युलर या हिन्‍दूद्रोही सिद्ध होने के चक्‍कर में तुमने मुल्‍लाओं को पीछे छोड़ दिया और उनसे आगे बढ़ गए। अभी यहीं तक पहुँचे हो कल का भविष्‍य मैं आज बताने चलूँ तो गलती की कुछ गुंजायश फिर भी रहेगी इसलिए उससे बचना चाहूंगा। इस पर विचार करना और न समझ में आए तो बताना, मैं तुम्‍हें समझाऊँगा। गो जरूरी नहीं कि तुम समझ ही जाओ।”