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देववाणी
देववाणी को सामान्यतः संस्कृत का पर्याय मान लिया जाता है और इसकी मनोरंजक व्याख्याएं की जाती हैं। इनमें से एक यह कि संस्कृत भाषा में स्तुतियाँ हैं इसलिए इसका यह नाम पड़ा। एक कल्पना यह भी हो सकती है कि यह सृष्टि के पहले से विद्यमान है, परम पुरुष ने वेदों के ज्ञान के बल पर ही सृष्टि की अतः इसका यह नाम पड़ा। इस के आधार पर भाषाविज्ञानी एमेनो (म्उमदमंन) ने आर्यों के भारत पर आक्रमण का साबुत भी तैयार कर लिया। इसे उनके ही शब्दों में पढ़ेंः
There seems to be no reason to distrust the arguments for it, in spite of the traditional Hindu ignorance of any such invasion, their doctrine that Sanskrit is the language of gods, and the somewhat chauvinistic clinging to the old tradition even to day by some Indian scholars. Sanskrit, “the language of the gods,” I shall therefore assume to have been a language brought from the Near East or the western world by the nomadic bands.
इस तरह के अर्थ करने वाले सभी लोग प्राचीन साहित्य के पंडित रहे हैं। उन्होंने उन कृतियों को भी पढ़ा होगा जिनमे इन बातों का बहुत निर्णायक स्वर में उल्लेख है किः
1. कृषि का आरम्भ देवों ने किया (अन्नं वै कृषिः, एतद्वै देवाः संस्करिष्यन्तः, षतपथ ब्रा.7.2.2.7 )।
2. (इन्द्रः आसीत् सीरपतिः षतक्रतु, कीनाषः आसन् मरुतः सुदादव, तंः आसन् मरुतः सुदादव, तैैैत्तिरीय, 2.4.8.7) असुर उनके उपजाए धान्यों को नोचते, चुराते रहे(ये वनेषु मलिम्लवरू स्तेनास्तस्करा वनेः …()
2. देव और असुर इसी लोक में थे (देवा वा असुर अस्मिन्नेव लोकेषु आसन्)
3. देव संख्या में कम थे असुर बहुत अधिक थे (कनियसा इव हि देवा ज्यायसो असुराः, षतपथ ब्रा. 14.4.1.1)
4. ये दोनों एक ही प्रजापति की संतानें थे, (देवाश्च असुराश्च उभये प्रजापत्याः, षतपथ ब्रा. 1.2.4.8; 1.2.5.1 )।
5. दोनों के बीच घोर प्रतिस्पर्धा थी, वह स्पर्धा इसी धरती पर चलती रही (देवाश्च असुराश्च अस्मिन् लोके आसन्, काठक सं., 11.4.9; देवासुरा वा एषु लोकेषु समयतन्त, ऐतरेय, 22.6 )।
6. देव पहले आदमी थे (मत्र्या ह वा अग्रे देवा आसुः, षतपथ ब्रा. 11.2.3.6)।
7. देवों ने असुरों को पराजित कर दिया। उन्हें यह विजय शस्त्र के बल पर नहीं मिली , अपितु शाकमेध (कृषिकर्म) से मिली ।
8. बहुत पहले देव और मनुष्य साथ साथ रहते थे (उभये ह वा इदमग्रे सहासुर्देवाष्च मनुष्याष्च, षतपथ ब्रा. 6.8.1.4)।
9. जो पहले पैदा हुए वे देव थे; जो बाद में पैदा हुए वे मनुष्य कहे गए (प्राचीनजनना वै देवाः प्रतीचीन जनना मनुष्याः, षतपथ ब्रा. 7.4.2.40)।
8. बाद में देव कृषि उत्पाद पर अपना अधिकार कायम रखते हुए कृषि के श्रमभार से मुक्त हो गए। कारण यह लगता है की असुरों में से कुछ ने किन्ही विवशताओं में स्वयम भी खेती में काम करने का चुनाव किया। जिस क्षुधा निवारण के लिए देवोँ ने खेती आरम्भ की थी वह असुरों में प्रविष्ट हो गई (क्षुधं प्राहिण्वन् तां देवाः प्रतिश्रुत्यैः ओदनमपचन त्सा देवेषु लोकमवित्ता पुनरसुरान् प्राविशत, ततो देवाभवन…)
9. पहले जो काम वे करते थे अब मनुष्य करते हैं। (यथा देवानां चरणं तद्वा अनु मनुष्याणाम्, 1.3.1.1)उन्होंने जो जो जिस तरह किया था उसी तरह मनुष्य करने लगे। (देव विषाम वै कल्पमानाम मनुष्य विशाम अनुकल्पते) ।
10. इसमें बहुत लंबा समय लगा। युगों का अंतर है । देवयुग के बाद मनुष्य का युग आया। मनुष्य युग देवयुग से अधिक प्रबुद्ध था (विप्रासो मानुषा युगा ),
11. जिन्होंने पहल की अर्थात जो पहले पैदा हुए वे देव थे और जिन्होंने उनके अनुकरण में कृषि को अपनाया, अर्थात जो जो बाद में आये वे मनुष्य हैं।(देवाश्च वा असुराश्च समवदेव यज्ञ अकुर्वत यदेव देवा अकुर्वत तदेव असुर अकुर्वत)।
12. देव युग में बकरा और गधा ही पालतू बनाये जा सके थे, मानव युग में गोपालन आरम्भ हुआ इसलिए देव जिस घृत का सेवन करते थे वह अजा से प्राप्त होता था और आज्य था मानव गव्य का प्रयोग करते हैं /आज्यं देवानां सुरभिः, ऐतरेय ब्रा. 1.3/; एतद्वै जुष्टं देवानां यदाज्यम्, षतपथ ब्रा. 1.7.2.10।
13. परन्तु वास्तविक स्वामी देव हैं इसलिए देवों का हिस्सा उनके पास पहुंचा देने के बाद ही मनुष्य कृषि उत्पाद का सेवन कर सकता है।
14. देवयुग सतयुग अर्थात आहार अन्वेषण और आखेट की अवस्था से आगे था परंतु मानुष युग से पीछे था। इसका भूमि को जोतने या खंरोच लगाने का औजार अर या अल जिससे आर्य और आरी और अरि तीनो शब्द निकले है एक नुकीला डण्डा था। फिर यह तलवार नुमा डण्डे में बदला जिसे स्फ्य की संज्ञा दी गई और लगता है उनकी अंतिम पहुँच सींग तक हो पाई थी (विषाणया भूमिं उपहन्ति उपकृषे )।
हम यह निवेदन करना चाहते हैं की अपने विकास के स्तर के अनुरूप ही रानटी या जंगली तो नहीं परन्तु उससे कुछ ही आगे बढ़ी देववाणी थी जिसका विकास कई चरणों के बाद संस्कृत में हुआ। भाषा और समाज का परस्पर और अपने इतिहास से क्या रिश्ता है इसे समझने में इससे कुछ मदद मिल सके तो मेरा लिखना सार्थक है।
देववाणी के लक्षणों को भोजपुरी में लक्ष्य किया जा सकता है और इस थाती को संजोने का एक परिणाम भौजपुरी का अन्य जनभाषाओं की तुलना में पिछड़ापन भी हो सकता है परंतु इस कारण ही इसकी रक्षा किसी अन्य भाषा कई तुलना में अधिक जरूरी है। संस्कृत से नहीं भोजपुरी से समझा जा सकता है देववाणी का चरित्र।
Month: March 2017
Post – 2017-03-23
देववाणी
देववाणी को सामान्यतः संस्कृत का पर्याय मान लिया जाता है और इसकी मनोरंजक व्याख्याएं की जाती हैं. इनमें से एक यह कि संस्कृत भाषा में स्तुतियाँ हैं इसलिए इसका यह नाम पड़ा. एक कल्पना यह भी हो सकती है कि यह सृष्टि के पहले से विद्यमान है, परम पुरुष ने वेदों के ज्ञान के बल पर ही सृष्टि की अतः इसका यह नाम पड़ा. इस के आधार पर भाषाविज्ञानी एमेनो (Emeneau) ने आर्यों के भारत पर आक्रमण का साबुत भी तैयार कर लिया। इसे उनके ही शब्दों में पढ़ें :
There seems to be no reason to distrust the arguments for it, in spite of the traditional Hindu ignorance of any such invasion, their doctrine that Sanskrit is the language of gods,’ and the somewhat schauvinistic clinging to the old tradition even to day by some Indian scholars. Sanskrit, “the language of the gods,” I shall therefore assume to have been a language brought from the Near East or the western world by the nomadic bands.
इस तरह के अर्थ करने वाले सभी लोग प्राचीन साहित्य के पंडित रहे हैं. उन्होंने उन कृतियों को भी पढ़ा होगा जिनमे इन बातों का बहुत निर्णायक स्वर में उल्लेख है कि :
1. कृषि का आरम्भ देवों ने किया. असुर उनके उपजाए धान्यों को नोचते, चुराते रहे (ये वनेषु मलिम्लव: स्तेनासतस्करा वने:…)
2. देव और असुर इसी लोक में थे (देवा वा असुर अस्मिन्नेव लोकेषु आसन.)
3. देव संख्या में कम थे असुर बहुत अधिक थे (कनियस्विन इव तर्हि देवा आसन भूयस्विनो असुरा:)
4. ये दोनों एक ही प्रजापति की संतानें थे, (देवाश्च असुराश्च उभये प्रजापत्या: ).
5. दोनों के बीच घोर प्रतिस्पर्धा थी, वह स्पर्धा इसी धरती पर चलती रही (देवाश्च असुराश्च एषु लोकेषु समयतान्त).
6. देव पहले आदमी थे (मर्त्या ह वा अग्रे देवा आसु;).
7. देवों ने असुरों को पराजित कर दिया। उन्हें यह विजय शस्त्र के बल पर नहीं मिली , अपितु शाकमेध (कृषिकर्म) से मिली ।
8. बाद में देव कृषि उत्पाद पर अपना अधिकार कायम रखते हुए कृषि के श्रमभार से मुक्त हो गए. कारण यह लगता है की असुरों में से कुछ ने किन्ही विवशताओं में स्वयम भी खेती में काम करने का चुनाव किया. जिस क्षुधा निवारण के लिए देवोँ ने खेती आरम्भ की थी वह असुरों में प्रविष्ट हो गई (क्षुधं प्राहिण्वन् तां देवाः प्रतिश्रुत्यैः ओदनमपचन त्सा देवेषु लोकमवित्ता पुनरसुरान् प्राविशत, ततो देवाभवन…)
9. पहले जो काम वे करते थे अब मनुष्य करते हैं. उन्होंने जो जो जिस तरह किया था उसी तरह मनुष्य करने लगे. (देव विषाम वै कल्पमानाम मनुष्य विशाम अनुकल्पते) .
10 . इसमें बहुत लंबा समय लगा. युगों का अंतर है । देवयुग के बाद मनुष्य का युग आया. मनुष्य युग देवयुग से अधिक प्रबुद्ध था (विप्रासो मानुषा युगा ),
11. जिन्होंने पहल की अर्थात जो पहले पैदा हुए वे देव थे और जिन्होंने उनके अनुकरण में कृषि को अपनाया, अर्थात जो जो बाद में आये वे मनुष्य हैं.(देवाश्च वा असुराश्च समवदेव यज्ञ अकुर्वत यदेव देवा अकुर्वत तदेव असुर अकुर्वत).
12. देव युग में बकरा और गधा ही पालतू बनाये जा सके थे, मानव युग में गोपालन आरम्भ हुआ इसलिए देव जिस घृत का सेवन करते थे वह अजा से प्राप्त होता था और आज्य था मानव गव्य का प्रोग करते हैं.
13. परन्तु वास्तविक स्वामी देव हैं इसलिए देवों का हिस्सा उनके पास पहुंचा देने के बाद ही मनुष्य कृषि उत्पाद का सेवन कर सकता है.
14. .देवयुग सतयुग अर्थात आहार अन्वेषण और आखेट की अवस्था से आगे था परंतु मानुष युग से पीछे था. इसका भूमि को जोतने या खंरोच लगाने का औजार अर या अल जिससे आर्य और आरी और अरि तीनो शब्द निकले है एक नुकीला डण्डा था. फिर यह तलवार नुमा डण्डे में बदला जिसे स्फ्य की संज्ञा दी गई और लगता है उनकी अंतिम पहुँच सींग तक हो पाई थी (विषाणया भूमिं उपहन्ति उपकृषे )
हम यह निवेदन करना चाहते हैं की अपने विकास के स्तर के अनुरूप ही रानटी या जंगली तो नहीं परन्तु उससे कुछ ही आगे बढ़ी देववाणी थी जिसका विकास कई चरणों के बाद संस्कृत में हुआ. भाषा और समाज का परस्पर और अपने इतिहास से क्या रिश्ता है इसे समझने में इससे कुछ मदद मिल सके तो मेरा लिखना सार्थक है.
देववाणी के लक्षणों को भोजपुरी में लक्ष्य किया जा सकता है और इस थाती को संजोने का एक परिणाम भौजपुरी का अन्य जनभाषाओं की तुलना में पिछड़ापन भी हो सकता है परंतु इस कारण ही इसकी रक्षा किसी अन्य भाषा कई तुलना में अधिक जरूरी है. संस्कृत से नहीं भोजपुरी से समझा जा सकता है देववाणी का चरित्र.
Post – 2017-03-22
जन भाषाएं और मानक भाषाएं
हिन्दी प्रदेश भाषाई प्रदेश नहीं है, सांस्कृतिक प्रदेश है। इसमें न जाने कब से ऐसा गहन जुड़ाव है कि कुछ समय के लिए किसी विशेषता के कारणइसकी कोई] एक बोली सभी को इतनी स्वीकार्य हो जाती है मानो वह उसकी अपनी भाषा हो।
डिंगल के साथ] ब्रज के साथ] अवधी के साथ] मैथिली के साथ ऐस हमारी जानकारी में हो चुका है इसे लोग समझ लेते हैं, कई बार कंठस्थ कविताओं के माध्यम से सीखी हुई भाषा में स्वयं रचना भी करने लगते हैं और उन रचनाओं को उस क्षेत्र के लोग सराहनते भी हैं परन्तु उन बोलियों या भाषाओं का अपना रंग बना रहता है। इस क्रम में उस सर्वस्वीकृत भाषा के कुछ शब्द उन बोलियों में उनके अपने शब्दों के समानान्तर जगह बना लेते हैं और पद्य रचना में मात्रा या तुक की सुविधा से प्रयोग भी कर लिये जाते हैं। परन्तु इससे न तो उनके अपने मानक प्रयोग बाहर चले जाते हैं] न भाषा के चरित्र और व्याकरण पर प्रभाव पड़ता है।
तात्कालिक जरूरतों से जो विकल्प सुविधाजनक लगता है वह सबसे वांछनीय नहीं होता, कई बार घोर अनिष्टकर होता है। आप जानते हैं हड़प्पा की पुरा संपदा को बहुत कुछ आसपास के लोगों द्वारा उसकी ईटें चुराने और फिर एक इंजीनियर को रेल लाइन के लिए बैलेस्ट के पत्थर की जगह इन ईंटों को बिछाने की चालाकी के कारण खोद कर नष्ट कर दिया गया था।
यहां दो बातें को रेखंकित करना जरूरी है। एक तो यह कि जिन रचनाओं के प्रभाव से एक भाषा इस पूरे सांस्कृति एकबद्धता वाले बहु भाषाई क्षेत्र में लोकप्रिय हुईं और और उनके माध्यम से एक सीखी हुई भाषा में अन्यत्र भी रचनाएं होने लगीं] उनमें उनका शतांश भी नहीं आ पाया था और इसलिए साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से सीखी हुई भाषा के माध्यम से हम किसी भाषा की ऊपरी पपड़ी तक ही पहुंच पाते हैं, उस भाषा के वैभव को नहीं समझ पाते और अपना भी बहुत कुछ उस पर अतिरिक्त निर्भरता के कारण खो बैठते हैं। भाषा की गहरी समझ अपनी भाषा की गहरी समझ से अनिवार्य रूप से जुड़ी है और उसके ज्ञान के कारण ही हमें इस क्षेत्र की किसी भाषा में कुछ तुक ताल मिलाते हुए भी वह अकिंचनता नहीं अनुभव होती जो अपनी भाषा या बोली से पूरी तरह कट जाने पर होती । भाषा के वाचिक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहती] यह एक गहन संस्कार है जिसके अनेक पहलू हमारी पकड़ में नहीं आते हैं।
हिन्दी का इतिहास बहुत छोटा है। अधिक से अधिक दो तीन सौ साल का। जिस बोली को इसने आधार बनाया उसका और इस परिवेश में आने वाली अन्य भाषाओं का इतिहास कितना लंबा है इसका सही अनुमान हम नहीं लगा सकते। मेरे अपने आकलन में कम से कम दस हजार साल पर अधिक से अधिक का कोई अनुमान मेरे पास भी नहीं है।
हिन्दी ही की भांति पालि, प्राकृत, अपभ्रंश भी किसी बोली के एकाएक महत्व में आ जाने के कारण रूपान्तरित हो कर एक मानक भाषा बन कर सर्वत्र फैल जाने वाली कुछ शताब्दियों तक जिन्दा रहने वाली भाषाएं थीं जिनसे न तो उस बोली के वास्तविक चरित्र का पता चलता है जिसको इनका आधार बनाया गया था न ही उन क्षेत्रों की बोलियों का पता चलता है जिनमें इनको लोकप्रियता मिली और फिर काव्य रचनाएं होने लगीं या नाटकों आदि में कुछ स्थान मिलने लगा। सभी को एक ही रास्ता अपनाना पड़ा। संस्कृत से शब्दसंपदा उधार लेते लेते संस्कृत की छाया बन बर अनुर्वर भाषाओं में बदल जाना। संस्कृत स्वयं भी बहुत उर्वर भाषा नहीं है। मेरा तात्पर्य है, उसमें वह लोच, वह छूट, वह मिठास नहीं है जो बोलियों या जनभाषाओं में अभी तक सुरक्षित है। अब हम कह सकते है कि मानक भाषाएं माननीय या पढ़े लिखों की भाषाएं है और जनभाषाएं अनपढ़ जनता की भाषाएं है. एक आकाशवेली है तो दूसरी अपनी जड़ों से जुडी और उसी से पोषण ग्रहण करने वाली. एक स्वल्पजीवी है तो दूसरी कालातीत .
अपनी ही बोलियों की प्रतिस्पर्धा में हिंदी अकिंचन है, यह बात बहुतों को खलेगी, क्योंकि वे समृद्धि को केवल अकड़ तक सीमित मानते हैं। फिर भी संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसने भाषा की इंजीनियरी को उप पूर्णता तक पहुंचाया कि हम दार्शनिक और तकनीकी जरूरतों के अनुसार उसकी शब्द संपदा को सीधे अपना सकते हैं, नए शब्द गढ़ सकते हैं और यह काम विविधि अनुपात में बोलियों ने भी किया है जिससे लोग अक्सर भ्रम में पड़ जाते हैं कि हो सकता है बोलियां संस्कृत से ही निकली हों। यह उतना ही गलत है जितना हिन्दी में फारसी अरबी या अंग्रेजी के शब्दों के प्रचुर व्यवहार केा कुछ समय तक चलने दिया जाय तो कोई ज्ञानी यह सुझा दे कि बोलियां फारसी, अरबी या अंग्रेजी से निकली हैं।
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हमारी समस्त भाषाओँ में कुछ साझेदारियां हैं जो अखिल भारतीय हैं और मान्य भाषापरिवारों की भी सीमाएं लाँघ जाती है, इनके दायरे छोटे होते जाते है और सघनता बढ़ती जाती है. यह इस कारण है की सभी में सभी के तत्व पाए जाते है. यहां तक की बोलियों उपबोलियों तक में इतनी मिलावट दिखाई देती है कि एक बार को लगे कि ये कई के मिलने से बनी है. सभी में कुछ ही तत्व है जो उनको एक पृथक भाषा सिद्ध करते है. इनमें मुख्य है इनका व्याकरण और आजतक बची रह गई शब्द सम्पदा. व्याकरण के विषय में विवाद नहीं हो सकता. बचा रहता है उनका संगीत या उच्चारण की रीति और शब्द सम्पदा.
यहां हम भोजपुरी में प्रयुक्त कुछ शब्दों की और संकेत करूंगा जो हिंदी से भिन्न है ये नमूने मात्र सांकेतिक है. जो जहन में उत्तर आये उन्हें लिख दिया . इस बात की भी जाँच न की कि इनमें कितने ऐसे है जिनकी कोई अन्य व्याख्या हो सकती है. मैं इस भ्रम के विरुद्ध खड़ा हूँ कि कोई सर्वज्ञ है. कि जो सरे शास्त्रों का ज्ञान न पा सके वे सुनते रहें, बोलने का अधिकार शास्त्र रट कर मनुष्य से स्टोरेज चैम्बर में बदल चुके लोगों का है. मैं subaltern history की जगह सबाल्टर्न आइडियाज के चुनाव का प्रस्ताव रखता हूँ. अंतर किस मामले में है? अभीतक वे प्रमाण या स्थापनायें रख कर उनपर सही होने की चुनोती देते थे आज हम उनके शास्त्र को ठुकराते हुए उनसे अपने सवालों का जवाब मांगते हुए उनको अपने निष्कर्षों पर सही उतरने की चुनौती देते है और इसमें उनके विफल होने पर अपने निष्कर्ष को तब तक के लिए अकाट्य मानते है जब तक उनका खंडन न हो जाए :
मटर – केराव, गुड़ – भेली,चना – रहिला, गेहूं – गोहूँ (संस्कृत गोधूम, तमिल कोदुमई),. ततैया – हाडा, बर्र – हांडी, घोंसला – खतोना, लाल चींटा – माटा, झोंझ – माटे का छत्ता, गलकंठ – घेंघा, . सीप- सितुही, कीचड़- चह्टा, . उलटी- ओक्काई, दीमक – देवंक, कंकड़- अंकटा कंकड़ी- अंकटी, खटमल – ऊंडूस, कंकड़ – अंकटा कंकड़ी- अंकटी, शक्तिशाली/ बलवान -बजिगर/ बरियार , दूध उबालना- औँटल, खलना- अखरल, कुआं – इनार, सिसकना – अहकल, उलझना – अझुराइल, उलीचना – उदहल, उबटन- बुकवा, झूमते हुए चलना- मेल्हल, उबालना- उसिनल, आवारा-लखेरा, भीगा हुआ – ओद, एक ओर को झुक हुआ – ओरमल, निकालना- काढल, खुरदरा- खदबिद्दर, अच्छा – मजिगर, छींका – सिकहर, सारा – सज्जी, देर- अबेर, कहाँ- कत्तें, गोस्त- कलिआ, लालायित – छुछुआइल, ठंडा पड़ना – कठुआइल, झेलना- सेहल, कंगन- गुजहा, लेटना- ओठंघल, पेट में ऐंठन होना- अवड़ेरल, भोजन- खैका, चमड़ी -खलरी,
अब हम शांति से सो सकते है.
Post – 2017-03-21
बौद्धिक दिव्यांगता
सरकार आज कल काला मोतिया के प्रति जागरूकता बढ़ाने और समय रहते इसका उपचार कराने के लिए लगातार विज्ञापन दे रही है। कायिक अंधेपन को आसानी से पहचान लिया जाता है इसलिए इसके प्रति लोग सचेत भी हो जाते हैं और दूर भी करना चाहते हैं, परन्तु मानसिक अन्धेपन की स्थिति उल्टी है। लोग प्यार में अन्धा होने का जतन खुद करते हैं, कवि लोग इसकी महिमा में कविताएं और कहानीकार कहानियां लिखते है, गरज की हमारे बौद्धिक स्वयं अपनी ओर से इसे बढ़ावा देने को पागल रहते हैं।
क्रोध में अंधा होने भी मुहावरा चलता है परन्तु यह क्षणिक अन्धापन है, इसमें जितना भी उल्टा सीधा कोई आदमी कर बैठता है उस पर बाद में पछताता भी है, परन्तु नफरत में अंधा होने पर न तो कोई मुहावरा बना है, न यह क्षणिक होता है। यह प्यार के अन्धेपन से भी अधिक गहन होता है। इसको प्रचार से पैदा किया जा सकता है।
मजहबों का जितना रिश्ता धर्मग्रन्थों में विश्वास से है उससे अधिक रिश्ता उस विश्वास से बाहर पड़ने वालों से हुआ करता है। नकचढ़ी शिक्षा प्रणाली में अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए इसे शिक्षा का अंग बना दिया जाता है और जहां यह नहीं बनाया जाता वहां भी मूल्य प्रणाली के प्रति विरक्ति इस हद तक पैदा कर दी जाती है कि आप कुछ शब्दों विचारों, मान्यताओं से इतनी घृणा करने लगते हैं कि उसका धनात्मक पक्ष आपको दिखाई ही नहीं देता। अंग्रेजी शिक्षा और द्रवीकृत क्रिस्तानी मूल्य प्रणाली ने अपने से भिन्न शिक्षा माध्यमों और मूल्य प्रणालियों के विषय में यही किया है।
घृणाजनित अन्धता इतनी संक्रामक होती है कि पूरी की पूरी पीढ़ी ग्रस्त हो जाती है,यही सोच कर मैंने वह लेखमाला आरंभ की थी कि मैं अपने सुशिक्षित समाज को यह समझा सकूंगा कि वे कुशिक्षित हैं, व्याधिग्रस्त है, अपनी व्याधि से इस हद तक प्यार करने लगे हैं कि उससे छुटकारे तक से घृणा करने लगे हैं, क्योंकि छुटकारा पाने का मतलब है, जिससे घृणा करते हैं, उस जैसा हो जाना, या उसको सहन करने की आदत डालना।
पीड़ा होती है इस स्थिति पर। पूरी की पूरी एक पीढ़ी का दिव्यदर्शी हो जाना अपने को भी उन्हीं कुपरिणामों का पात्र बनाने जैसा है जिनके भुक्तभोगी वे बने रहे हैं, क्योंकि कार्यक्षेत्र की समानता होने पर लोग भेद नहीं कर पाते।
मोटे तौर पर यदि हम समझाना चाहें कि वे क्या नहीं देख सके जिससे असंख्य लोगों को असंख्य रूपों में लगा कि समचमुच अच्छे दिन आ गए हैं और अपनी कुशिक्षा के पर गर्व करने वाले बुद्धिजीवी व्यंग्य करते रहे कि अच्छे दिन कब आएंगे।
अच्छे दिन बुद्धिजीवियों के भी आ सकते थे, यदि वे बुरे और बदनाम लोगों के साथ, देश का अहित करने वालों के साथ, शत्रुदेशों के साथ इतने संसक्त न हो जाते कि अपने ही देश, समाज और इतिहास से इस हद तक विरक्त हो जाते कि उनका हित उनका अपना हित लगने लगता और देश का हित उन्हें अपने दुख के दिनों का आरंभ प्रतीत होने लगता।
मैं उस सूची को नहीं गिनाऊंगा जो कुशिक्षा से वंचितों को दिखाई दी और कुशिक्षितों को नहीं दिखाई दी। यह तथ्य तक कि शिक्षा के नाम पर उन्होंने वही सीखा और शिरोधार्य और आत्मसात किया है जो इस देश के मनोबल को तोड़ने, गुलाम बनाए रखने, कलह में आनन्द लेने के लिए उपनिवेशवादियों ने योजनाबद्ध रूप् में तैयार किए थे और जिसके निजी लाभों को पिजड़े के आराम के आदी हो जाने वाले तोते भूल कर मालिक के मुहावरे उनका अर्थ जाने बिना दुहराते रहते हैं।
नहीं देख सके और पिजड़े का रोना रोने के स्वाद से आगे उससे मुक्त होने का उन्हें न तो खयाल आया न ही इसका साहस कर सकते थे क्योंकि वे जानते हैं कि अंग्रेजी के वर्चस्व के समाप्त होने पर, अपनी भाषाओं को प्रधानता मिलने के बाद अंग्रेजी जबान नहीं अक्ल की परीक्षा आरंभ होगी और उसमें उन दलितों, उपेक्षितों, अकिंचनों, पिछड़ों की भारी भीड़ के बीच से उभरने वाली ओजस्वी मेधा के सामने वे कागजी फूलों में बदल जाएंगे। इसे वे नहीं देख सके, क्योंकि देखने का साहस न हुआ।
मैं एक दूसरा उदाहरण लूं। नोटबन्दी एक प्रयोग था, बहुत साहसिक प्रयोग था। अपना सब कुछ दांव पर लगा देने का एक प्रयोग था। वह अच्छा था या बुरा उस समय बहुतों की समझ में नहीं आया। केवल भारत के आम जन ने समझा कि ऐसा बहुत पहले हो जाना चाहिए था। हुआ क्यों नहीं। वह कष्ट सह कर भी उनको लगा यह जरूरी कदम है। मानसिक अन्धता के शिकार लोगों को लगा यह कष्ट देख कर जनता घबरा जाएगी, विद्रोह कर देगी। विद्रोह भड़के, अशान्ति पैदा हो इसके लिए अपनी व्याख्यायें दे कर समझाते रहे अमुक देश में ऐसा हुआ तो उसकी सरकार गिर गयी, अमुक देश में ऐसा हुआ तो सिर्फ इस सीमा में हुआ फिर भी उसके परिणाम यह रहे।
इस व्याख्या तक तो गनीमत है, बुद्धिजीवी वर्ग होता ही आलोचना के लिए है। परन्तु यह देख कर कि इसका असर नहीं पड़ रहा है संचार माध्यमों का उपयोग करके लोगों के बीच स्वयं जा कर उपद्रव करने के लिए उकसाते रहे। जो जितनी ही मासूमियत से उपद्रव फैलाने के तरीक ईजाद कर सकता था उसे उतना ही विलक्षण प्रतिभा संपन्न ऐंकर मानते रहे और उसका मनोबल बढ़ाने के लिए उसके कसीदे पढ़ते रहे।
पर क्या वे यह देख सके कि वे दंगा भड़काने में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। यह समझ सके कि इस देश की जनता, कम से कम हिन्दू जनता, जिन संस्कारों में ढली है उसमें वह दंगों से नफरत करती है, दंगे भड़काने वालों से नफरत करती है और इसलिए आप सरकार गिराने के लिए दंगे नहीं भड़का सके पर हिन्दू समाज के एक तबके में अपने प्रति नफरत अवश्य भड़का सके।
यह तो अवश्यभावी था, दयनीय यह है कि आप अपनी कुशिक्षाजनित समझदारी के चलते इसे न देख सके न समझ सके न अपने को अपराधी मान सके।
अन्धेपन का इससे बड़ा एक और सबूत है, जिसे पेश करने के बाद मैं इस पोस्ट को सुरसा के मुख की तरह फैलने से बचाना चाहूंगा।
मैंने कई बहानों से यह पीड़ा व्यक्त की कि कई तरह की कमियां वर्तमान व्यवस्था में हैं, कई आगे पैदा होंगी, इसलिए आलोचना के अधिकार की रक्षा के लिए निन्दा अभियान से बच कर, अपने विवेक को जिन्दा रखने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। मैंने अनवरत निन्दा को लत या नशे का रूप कहा और उससे बचने के प्रयत्न को अपनी लत से बाहर आने का संकल्प और इसे इस तथ्य को रेखांकित करते हुए किया कि निन्दा भी अपनी मर्यादा का अतिक्रमण करने के बाद स्तुति में बदल जाती है, निन्दास्तुति अलंकार की तरह। इससे तुम जिसका विरोध करते हो उसका समर्थन या उसके पक्ष में तुम्हारे ही कथन का उपयोग होता है।
कहा, सुनने वाला वही अर्थ नहीं ग्रहण करता जो तुम उस तक पहुंचाना चाहते हो, वह कथित, कथ्य, सन्दर्भ, तथ्य सभी पर ध्यान देते हुए अपना अर्थ करता है। इस अन्धता में हमारे मित्रों को यह भी नहीं दिखाई दिया कि वे उल्टा जाप करते हुए वही काम अधिक प्रखरता से कर रहे हैं जो सीधा पाठ करने वाला करता है।
पर मेरी दुर्गति तो देखिए, जो आगाह करता है कि ऐसा मत करो, यह आत्मघाती है, अपने औजारों को बचा कर रखो, सही समय पर इस्तमाल करना। अभी अपनी विष्वसनीयता बचा कर रखों।
पर क्या किसी ने मेरे कथन पर ध्यान दिया, उन संभावनाओं को देखा जिनकी ओर उनका ध्यान दिला रहा था। दुर्भाग्य के कितने रूप होते हैं। आप अपना ही घर बर्वाद होते देखते हैं, चीखते हैं कि इसे बचाओ, घर के नाम पर हमारे पास यही घर है, और कोई सुनता ही नहीं।
मुलायम सिंह का उदाहरण न दूंगा जो अपने घर को स्वयं दीमकों से भर चुके थे जो फूंक मारने से गिर सकता था। उसे बचाने की उस कोशिश को भी उदाहृत न करूंगा जो उनके बेटे ने पिता की अवज्ञा करते हुए की, क्योंकि वह दामन के दाग लिए अपने को जो होना चाहता था वह होने की योग्यता नहीं पैदा कर सका।
मैं अपने मित्रों को भी दोष न दूंगा जिन्हें कभी बुराइयां दीखनी बन्द हो जाती हैं कभी अच्छाइयां या तो दीखती नहीं या इतनी डरावनी लगती हैं कि वे आंखें मूंद लेते हैं। क्या मुझसे असहमत होने वाले मित्र मुझे यह समझने का मौका देंगे कि वस्तविश्लेषण में मुझसे क्या चूक हुई है। वे मेरी आलोचना से कोई शिक्षा लें या न लें, मैं उनकी आलोचना का लाभ उठाना चाहता हूं।
Post – 2017-03-21
भाषा और इतिहास -३
(भोजपुरी की प्राचीनता )
भोजपुरी क्षेत्र की एक विशेषता और शौरसेनी क्षेत्र की उससे जुड़ी विशेषता का उल्लेख सुनीति बाबू ने किया है। यह है पालि और प्राकृत के सन्दर्भ में। मुझे ठीक स्मरण नहीं कि इसका उल्लेख उन्होंने हिन्दी के महत्व को रेखांकित करने के संदर्भ में किया था या कहीं अन्यत्र। वह कहते हैं कि पूरे देश में फैलने वाली भाषाएं जन्म यहां लेती हैं परन्तु जब वे शौरसेनी क्षेत्र में पहुंचती हैं तो उनका मानक रूप तैयार होता है जहां से यह अखिल भारतीय प्रसार पाता है और लौट कर भोजपुरी क्षेत्र में भी आता है। वालि और प्राकृत, बुद्ध और महावीर के विचरण क्षेत्र यही थे, और। हिन्दी के साथ भी यही हुआ, इसको सबसे पहले भांजपुरी क्षेत्र ने उत्साह से आगे बढ़ाया परन्तु इसका मानक रूप पश्चिम में पहुंच कर तैयार हुआ और यह अखिल भारतीय लोकप्रियता का एक कारण है। चूंकि यहां मुझे स्वयं कुछ अनिश्चय है इसलिए हिन्दी वाले प्रसंग को दुबारा जांचना उचित होगा।
जो भी हो, मैं इससे बहुत पीछी लगभग आठ हस हजार साल पीछे के इतिहास की बात करूूं तो जिस आदि भारोपीय या प्राथमिक देववाणी की बात हम कर रहे हैं उसका भी जन्म या स्थिर रूप इसी क्षेत्र के एक बहुत छोटे से हिस्से में पहाडी क्षेत्र में तैयार हुआ लगता है।
हम पीछे ऐशानी दिशा के जिस कोने में कृषि के निर्बाध चल पाने और उससे अर्जित संगठित बल के बाद उसके कुछ आगे बढ़ने की बात कर रहे थे वह नारायणी के किनारे का वह क्षेत्र प्रतीत होता है जिसका संबंध बाल्मीकि से भी जोड़ा जाता है। मेरे पास एंसा सोचने का दो आधार है। एक तो यह कि और शालिग्राम की बटिया जो शिव और विष्णु दोनों की प्रतीक मानी जाती है, वह दक्षिण भारत तक इसी क्षेत्र की होती है।
धान की भूसी अलग करने का तरीका यह था कि छिल्के को नाखून से (नखैर्निर्भिद्य) अलगकिया जाता था और बाद में किसी शिला पर नही की धारा में घिस कर सुडौल हुए पत्थर से हल्के दबाव के साथ अलग किया जाता था और नीले पत्थर की बटिया इस दृष्टि से अधिक उपयोगी मानी जानी रही लगती है। पुराने उपयोगी साधनों को बाद में पूजा जाने लगा । यही शालिग्राम की पूजा का तार्किक आधार लगता है। बटिकाश्म होने के कारण इसका शिव के रूप में और नारायणी की धारा से उपलब्ध होने के कारण नारायण के रूप में इसकी पूजा होने लगी होगी । भुने हुए धान को दल कर उसका खीला अलग करके उस चूर्ण को ही पहले सत्तू के रूप में खाया जाता था जिससे सत्तू की पुरानी संज्ञा शालिचूर्ण का संबन्ध है।
यदि हमारा अनुमान सही है तो हम समझ सकते हैं कि कभी कभी सांस्कृतिक प्रतीकों का इतिहास भी बहुत दीर्घ होता है और भाषा को समझने में इनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
दूसरा कारण राजवाडे के आदि आर्यभाषा संबंधी विचार हैं जिनका प्रतिपादन उनहोंने पाणिनीय व्यसाकरण के गहन विवेचन के आधार पर किया था। इस भाषा को उन्होंने अत्यन्त अविकसित और संस्कृत के परवर्ती गुणों से शून्य परन्तु अधिक बोधगम्य पाया था। इसका क्षेत्र उन्होंने मगध के उत्तर के पहाड़ी क्षेत्र में माना था यद्यपि उनकी मान्यता थी कि उससे भी पहले यह बोली हिमालय के उत्तर में बोली जाती रही होगी। हम नहीं जानते कि अपने इस विचार में वह मैक्समुलर से किसी रूप में प्रभावित हुए थे या नहीं। उन्होंने इस भाषा को रानटी या जंगली, या भदेस भाषा की संज्ञा दी।
इस भाषा की जिन विशेषताओं का उन्होंने उल्लेख किया है उनमें से अनेक की झलक भोजपुरी में इतने बदलाव आने के बाद भी बनी रह गई है या इसके नमूने यदा कदा सुनने को मिल सकते हैं।
Post – 2017-03-20
तुम हो मेरे तो ज़माना भी मेरे साथ ही है
तुमसे बढ़कर कोई अपना न पराया न मिला.
Post – 2017-03-20
भाषा और इतिहास – 2
वे कौन सी परिस्थितियां हो सकती हैं, जिनमें अनेक प्रतिस्पर्धी बोलियों के बीच किसी एक ने, दूसरी बोलियों से अधिक लोकप्रियता प्राप्त कर ली, और इसलिए पहले वह जिनकी बोली नहीं थी, वे भी उसे समझने और सीखने का प्रयत्न करने लगे। आर्थिक और सामाजिक विकास, धर्मसंस्थाओं और प्रशासकीय संस्थाओं के विकास के बाद इसके कारण आसानी से चिन्हित किए जा सकते हैं। परन्तु आदिम चरण पर जहां सभी बराबरी पर रही होंगी, किसी एक बोली की प्रधानता का कारण उस समुदाय के किसी मामले में दूसरों से आगे बढ़ जाने के कारण हुआ और इसे एक भाषाविज्ञानी (कोलिन रेन्फ्रू) ने कृषि विद्या में अग्रता माना है और जैसा एक बार पहले कह आए है, कृषि के मामले में सबसे पहले जिन स्थलों को सबसे पुराना पाया गया था वे सभी पश्चिम एशिया के उस क्षेत्र में पाए जाते हैं जिसे मोटे तौर पर उर्वर अर्धचन्द्र की संज्ञा दी गई। बाद की खोजों से जिन स्थलों का पता चला उनमें भारत के कतिपय स्थल सामने आए और इसके कारण एक दूसरे पुरातत्ववेत्ता (जैरिज) का दावा है कि पहला किसान भारतीय था और खेती धान की खेती से आरंभ हुई थी।
धान की खेती में अपनी अग्रता का दावा चीन भी करता रहा है, परन्तु हम उस झगड़े में न पड़ेंगे। हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि यदि कृषि में अग्रता के कारण उसकी विद्या के साथ भाषा का प्रसार हुआ तो भारोपीय अन्तर्क्रिया के क्षेत्र में यह अग्रता अब भारत के पक्ष में जाती है।
इसके पक्ष में कुछ और बातें हैं जिनको जातीय स्मृति पर आधारित माना जा सकता है। इन्हें हम निम्न रूप में पाते हैंः
1. भारत का यह दावा है कि खेती का आरंभ इसी ने किया, किसी अन्य से ग्रहण नहीं किया, पर साथ ही यह भी स्वीकार किया गया है कि गन्धर्व या गंधार क्षेत्र यव की खेती में अधिक समृद्ध है। आज गंधार कंधार की याद से जुड़ा है परन्तु पहले यह पश्चिमी पंजाब और उससे आगे का क्षेत्र माना जाता था।
2. कृषिकर्म को याजिकीय शब्दावली में यज्ञ के माना गया है। यज्ञ का अर्थ उत्पादन होता है और इसके अर्थ की व्याप्ति बहुत अधिक है। इसमे प्रजावृद्धि से लेकर सभी प्रकार के उत्पाादन आ जाते हैं । परन्तु जिस यज्ञ सेे असुरों का विरोध था वह कृषिकर्म ही माना जा सकता है ।यज्ञ को स्थापित (संस्थित) करने, और फिर यज्ञ को कुछ और आगे बढ़ाने या (तन्वन), और फिर इसके विस्तार (विष्टार) का आशय हम क्रमश: स्थायी कृषि, फिर उस क्षेत्र से आगे बढ़ कर नई भूमि को अधिकार में लेना और इसके बाद दूसरों को भी कृषिकर्म में प्रवृत्त होने को प्रेरित करना मानते हैं।
3. यज्ञ को संस्थित करने की समस्या का बहुत विस्तार से और अनेक स्रोतों में अनेक रूपों में जिक्र किया गया है। इसमें असुरों का आहार संचयी या नोट खसोट कर खाने वाला (स्व स्व आस्ये जुह्वतश्चेरु:) और निकम्मा (अकर्मा दस्यु अभि नो ) बताया गया है और सुरों को उत्पादक, दृढ़निश्चयी और उद्यमी। कृषिकर्म को देवों ने आरंभ किया, उन्होंने धरती परन्तु अपनी से बाज न आए। कृषिकर्म के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण सूचना यह है कि जो वन्य (प्रघास) रूप में उपलब्ध अन्न थे उन्हीं के उत्पादन से खेती का आरंभ हुआ। ये विवरण कृषि के आदिम प्रयोगों के पाच सात हजार साल बाद के हैं इसलिए इनमें व्रीहि और यव को वरुण प्राघास कहा गया है। वरुण का इस सन्दर्भ में आशय यह लगता है कि पहले इन घासों को तैयार होने से पहले नोचने चोथने पर रोक लगी, इसका वारण किया गया, और फिर बाद में स्वयं इनका उत्पादन आरंभ हुआ। जिनको इसका लाभ मिला, उन्होंने पाया कि इससे शरीर अधिक पुष्ट और नीरोग होता है – वरुण प्रघास से अनमीव और अकिल्बिष सन्ताने पैदा होने लगी।
5. इस अनमीव या नीरोग और अकिल्बिष या निष्पाप उत्पादन पद्धति के कारर्ण इसके प्रसार के अभियान को आर्यव्रत कहा गया जिसके विश्व में प्रचारित करने की कथा भाषा के प्रचार से जुड़ी है । यह ज्ञान इस सदाशयता से इसलिए प्रसारित किया जा रहा था कि यदि हैवानियत में पड़े जनों ने उत्पादन आरंभ कर दिया तो लूट पाट बन्द हो जाएगी और उनका अपना संकट समाप्त हो जाएगा।
6. जिन लोगों ने खेती आरंभ की उनको देव या बरम कहा गया, और वह आदिम भाषा इन देवों के बीच ही प्रचलित थी, इसी क्रम में विकसित हुई और संभवतः दूसरों ने इसे देववाणी नाम दिया। देववाणी इस तर्क से संस्कृत और वैदिक की पूर्ववर्ती भले हो, इन दोनों से अलग थी और इसके भी विकास के कई चरण थे जिसके बाद यह संस्कृत बनी।
7. हमारी जातीय परंपरा में यह सूचना मिलती है कि देवों को अपने नये उपक्रम के कारण विवशता में इधर उधर भागना पड़ा और पश्चिमी परंपरा में जो भी जातीय स्मृति के आधार पर बहुत बाद में लिखी गई, कहा गया है कि पहले आदम देवों के लोक में रहते थे जो फलदार वृक्षों और वनस्पतियों से भरपूर था, जलधाराओं से भरापूरा था और वह वहां से निकाले जाने पर धरती पर उतरे। इसमें अरबों में सुरक्षित परंपरा में आदम गन्दुम खाने के अपराध में वहां से निकाले गए थे, या कहें खेती उनके निष्कासन का कारण बनी थी। पश्चिमी परंपरा में ईदन गार्डन या उल्लास और समृद्धि का उद्यान पूर्व में कहीं था। दोनों परंपराओं में यह अप्रत्याशित साम्य निर्णायक प्रमाण बन जाता है।
8. खेती देवों ने आरंभ की, कृषिकर्म में उनकी भूमिका प्रधान थी इसकी पुष्टि करने वाला एक उल्लेख यह भी है कि इन्द्र पहले जोत के मालिक थे और मरुद्गण कीनाश थे – इन्द्रः आसीत् सीरपतिः शतक्रतु कीनाश: आसन् मरुतः सुदानव । इसमें यह इंगित है कि बहुत प्राचीन अवस्था में भूमि पर अधिकार करने वाला एक स्वामिवर्ग अस्तित्व में आ गया था और उसने कृषिश्रम दूसरों पर लाद दिया था।
अब इन सूचनाओं के आधार पर हम तय कर सकते हैं कि वह आदि क्षेत्र कौन सा था जिसे भारोपीय की आदिम जननी का क्षेत्र माना जा सकता है।
बताया यह गया है कि चारों ओर से दुत्कारे भगाये जाने के बाद देव पूर्वोत्तर की दिशा में पहुंचे और वहां उनको असुरों के उपद्रव का सामना नहीं करना पड़ा इसलिए वहीं उन्होंने यज्ञ को संस्थित किया। इस कारण इस दिशा के दो नाम है। यहां पहुंचने पर असुर देवों को पराजित नहीं कर सके इसलिए इसका नाम अपराजिता दिशा है और इस दिशा में ही उन्हें ऐश्वर्य मिला, इसलिए इसका दूसरा नाम ईशानी है। परन्तु यह तय किये बिना कि इस बात का उल्लेख करने वाली कृतियां कहां रची गई हैं, उससे पूर्वोत्तर की दिशा और स्थान का निश्चय नहीं किया जा सकता।
यहां पहुंच कर भाषाविज्ञान की अपनी भूमिका आती है। सबसे पहले ग्रियर्सन ने इस बात को लक्ष्य किया था कि पूरबी हिन्दी में भारोपीय की प्राचीनतम ध्वनि घोष महाप्राण सर्वाधिक सुरक्षित हैं। सुनीति बाबू ने इसको दुहराते हुए इस पर आश्चर्य जताया था कि यह हुआ कैसे हो सकता है। कारण, वह स्वयं भी आर्यों के बाहर से आने के मत से सहमत थे। ऐसी स्थिति में पंजाब से होकर पूर्वोत्तर भारत आनेवालों की बोली की ध्वनिमाला में यह ध्वनि कहां से आ गई जब कि पंजाबी में यह पाई नहीं जाती। रामविलास जी ने आगरा इंस्टीट्यूट में उपलब्ध सामग्री के आधार पर इसका विशद तुलनात्मक अध्ययन सभी भारतीय भाषाओं को लेकर किया था और यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया था कि इस क्षेत्र से उत्तर दक्षिण, पूरब पश्चिम किसी भी दिशा में बढ़ें तो ये ध्व
पूरबी हिन्दी उसी क्षेत्र की भाषा को संज्ञा दी गई थी जिसे भोजपुरी कहते हैं। सुनीति बाबू ने बहुत पहले हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा होने का बहुत तर्कपूर्ण समर्थन किया था, परन्तु उनके इस सुझाव के कारण कि यदि इसकी लिपि रोमन कर दी जाय तो इसकी सर्वग्राह्यता बढ़ जाएगी और भोजपुरी को हिन्दी की बोली/भाषा कहने पर हिन्दी क्षेत्र के हिन्दी प्रेमियों ने उन्हें अपनी नजर से उतार दिया था। इससे उनका चित्त भी खिन्न हुआ था। आज फिर जब भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में जगह देने की मांग राजनीतिज्ञों द्वारा की जाने लगी है तो यह विवाद के केन्द्र में आ गई है।
हम क्षेत्र के महत्व और हमें ज्ञात या कल्पित इसकी प्राचीनतम अवस्थाओं का विवेचन आगे के लिए छोड़ सकते हैं। हमारा असंतोष सस्युर से केवल इतना ही रहा है कि उन्होंने मैले पानी के साथ बच्चे को भी फेंक दिया। सन्दिग्ध आकड़ों को अन्य सुलभ साधनों से परिष्कृत करते हुए विश्वसनीय बनाया जा सकता है, इसका ध्यान उन्हें न रहा।
Post – 2017-03-20
मैं उन आंकड़ों को किसी ज्ञात व्यवस्था में समाहित न कर पाने के कारण भाषा के विषय में जो मेरी अलग सोच बनी उसे लेकर अपना पक्ष और सिद्धान्त रखना चाहता हूं। मेरा ज्ञान बहुत कार्यसाधक है, आधिकारिक नहीं इसलिए दूसरे मित्रों से जिनके पास समय है, विषय पर अधिकार करने की इच्छा है उनको सौंप कर चाहता था कि वे इस काम को करें। इनमें डाक्टर दयानन्द श्री वास्तव, अजित वडनेरकर और राधावल्लभ जी का भी नाम था।
एक समय था जब तुलनात्मक भाषाविज्ञान ही भाषा का विज्ञान माना जाता था। यह राजनीति से प्रेरित था और इसमें आंखड़ों की तोड़मरोड़ करके समस्त ज्ञान विज्ञान का सदा सदा से यूरोप को ही स्रोत सिद्ध करने की जिद के कारण इसमें खीच तान अधिक की गई और इसलिए इसके आंकड़ों पर भरोसा किया जा सकता है, इसके निष्कर्षों को बहुत सावधानी से देखने की जरूरत है। वे अपने ही सिद्धान्त का पूरा निर्वाह नहीं कर पाते इसलिए उनके खंडन के लिए किसी प्रकांड विद्वान की जरूरत नहीं है।
मेरा लेखन उन कमियों को या उन अन्तर्वरिोधों को सामने लाने के लिए है अपने को शास्त्रज्ञ सिद्ध करने के लिए नहीं। शास्त्र बुद्धि को ज्ञानबोझ से पठार में बदल देता है। कविता करने के लिए किसी विषय का आचार्य होना जरूरी नहीं न नये आविष्कार के लिए आविष्काार विज्ञान जैसी कोई शाखा है। जब ऐसे आंकड़ों का सामना होता है जिनका समाधान अब तक की ज्ञानव्यवस्था में नहीं हो पाता तो पुराना ढाचा अपने महारथियों के साथ चरमरा जाता है और उस चरमराने के बाद उस मलबे में बहुत कुछ जुटाने और संभालने लायक भी होता है। इसलिए इस चर्चा में केवल व्यक्त विचार को तर्क के आधार पर सुधारने, खंडन करने का प्रयास किया जाय तो यह अधिक उपयोगी होगा। ज्ञानी लोग हमारी सोच को पीछे ले जाते हैं, सन्देह करने वाला आगे का रास्ता खोजने में सहायक होता है।
Post – 2017-03-19
भाषा और इतिहास – 1
पकवान पैदा नहीं होता, उसे बहुत सारी पैदा की गई वस्तुओं से बनाया जाता है। उन वस्तुओं को पैदा करने में जितना समय] श्रम और कौशल लगता है, उससे बहुत कम समय] श्रम और कौशल से पकवान बना लिया जाता है। कोई कहे कि पकवान के गलने बिखरने से गेहूं] खांड़, घी पैदा हुआ तो आप उस व्यक्ति को विक्षिप्त कह कर अलग हो जाएंगे, या उसे, उसके लिए बनी सही जगह में, पहुंचाने का प्रयास करेंगे। परन्तु यही काम हम भाषा के इतिहास के विषय में करने वालों को जो कहते रहे कि एक पकी पकाई भाषा से अधपकी प्राकृतें पैदा हुईं, उनके क्षरण से अपभ्रंश पैदा हुई और अपभ्रंश से हमारी बोलियां पैदा हुई तो हम उन्हें सिरफिरा कहने की जगह शिरोधार्य करते रहे, पागलखाने की जगह अपने दिमाग में जगह देते रहे।
हमें जब भी किसी के आदिम चरण की बात करनी हो, उसके नितान्त अविकसित और विपन्न रूप का अनुमान ही करना होगा जिसकी सही रूप् रेखा खयाली ढंग से बनाई नहीं जा सकती। इस विषय में कोई सन्देह नहीं कि भारोपीय अपने आदिम चरण पर एक अविकसित बोली थी। आहारसंग्रह और शिकार के चरण पर सभी बोलियां एक जैसी ही अनगढ़ और विपन्न थीं। सभी का विकास दूसरी भाषाओं के अर्थात उन्हें बोलने वाले समुदायों के साहचर्य के क्रम में होता आया है। इसलिए वनांचलों की भी किसी नितान्त पिछड़ी बोली के विषय में भी यह नहीं कहा जा सकता कि इसका चरित्र, शब्दभंडार आज से दस पन्द्रह हजार साल पहले का है।
यह बदलाव सभी स्तरों पर हुआ है। परन्तु वह बोली जिसका इतना उन्नत विकास हुआ कि दूर दूर तक उसका प्रसार हो गया, जिससे यह भ्रम पैदा हो जाय कि पहले यही एकमात्र भाषा थी जिससे दूसरी सभी भाषाएं पैदा हुई हैं, तो यह मानना होगा कि इसका विविध भाषाभाषी समाजों से उतना ही और गहन संपर्क हुआ होगा और इस पर उन सबका प्रभाव पड़ा होगा। यह प्रभाव सभी घटकों पर पड़ा होगा।
यदि हमारे पास उन अवस्थाओं की सभी भाषाओं की संपदा होती तो हम आसानी से बता सकते थे, कि विश्वंभरा संस्कृत ने अपने निर्माण क्रम में किन किन बोलियों से या भाषा बनने की दिशा में बढ़ रही विभाषाओं से क्या क्या कब कब ग्रहण किया, परन्तु वह उपलब्ध नहीं है। सस्युर नाम के महान भाषाविज्ञानी हुए हैं। उनकी महानता का पैमाना यह िक वह मुझसे भी महान थे। मैं जो जानता हूं उसे लिखने के लिए लोगों को तलाशता रहा हूं, फिर भी किसी के तैयार न होने पर मैंने अपनी किताबें लिखीं, सस्युर की महानता यह कि उन्होंने कोई किताब न लिखी, उनके शिष्यों ने उनकी क्लास नोट के आधार पर जो कुछ लिखा वही उनका ऐसा योगदान है कि उसके बाद से भाषाविज्ञान की सोच ही बदल गई ।
कहा, जो तुलनात्मक भाषाविज्ञान है उसमें द्विकालिक डाटा या आधार सामग्री मिलती है जिसकी तुलना हो ही नहीं सकती और जहां आधार सामग्री ही अविश्वसनीय है वहां विज्ञान तो हो नहीं सकता। इसलिए उन्होंने ऐतिहासिक और तुलनात्मक विज्ञान को विज्ञान न कह कर शास्त्र घोषित कर दिया। उससे पहले फिलालोजी उतनी ही वैज्ञानिक थी जितनी जिआलोजी, साइकालोजी थी और उतनी आप्तता उसकी आज भी बनी हुई है।
मैं अपने को जिस खुशफहमी में सस्युर से बड़ा भाषाविज्ञानी मानता हूं वह यह है कि सस्युर विज्ञान को प्रबन्धकीय कौशल मानते थे, जो सुनिश्चित है उसका प्रबन्धन करके एक नया शिगूफा खिलाना है, मैं विज्ञान को अज्ञात को जानने की, मैडनेस के भीतर मेथड की तलाश का अनुशासन मानता हूं और इसलिए विज्ञान में अनुसंधान और आविष्कार का विशेष महत्व है और तुलनात्मक विज्ञान इन चुनौतियों का सामना करता है इसलिए यह यह विशेष भाषाविज्ञान है ।
जैसे भाषाविज्ञान की दूसरी शाखाएं होती हैं। अपने विशेष क्षेत्र के अनुसार ढल कर उसमें अपनी विश्वसनीयता अर्जित करती है। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान सच कहें तो भाषा के इतिहास का विज्ञान है, किसी प्राचीन चरण पर किसी भाषा के प्रसार का अध्ययन करने का विज्ञान है। भाषा में समाज का समग्र यथार्थ प्रतिबिंबित होता है इसलिए हम भाषा के माध्यम से समाज की समझ पैदा कर सकते हैं और यह इतिहास के अध्ययन के अनेकानेक स्रोतों में से एक हो सकता है एकमात्र नहीं। इसे इतर स्रोतों के प्राप्त जानकारी के सन्दर्भ में अपनी संगति प्रमाण्ति करके ही अपनी आप्तता प्राप्त करनी है। पर इसकी वैज्ञानिकता को किसी दूसरे क्षेत्र में परखने के बाद इसे भरोसे का न पाकर इसे खारिज कर देना कुछ ऐसा है जिसे हम अपने विचार की मौज में उसकी वैध सीमा से बाहर जाने का मामला मान सकते हैं। इसलिए मैं ऐतिहासिक विज्ञान को जैसा मैंने कहा पुरातत्व के समान ही एक विज्ञान मानता हूं जिसके आंकड़े बोलते हैं पर दिखाई नहीं देते, जब कि पुरातत्व के घटक दिखाई देते हैं, पर बोल नहीं पाते ।
इसलिए इन दोनों का सहयोग आवश्यक है। यदि ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की विश्वसनीयता को यूरोप के सभी विद्वानों ने सन्देह से देखा तो इसका कारण यह है िक इस विज्ञान का जो उपयोग करके जो कुछ सिद्ध कर चुके थे वह मान्य बना रहे, आगे का अध्ययन रुका रहे, जिससे उससे गहन स्तर पर प्रकट होने वाली सचाई पर परदा पड़ा रहे और कूटनीतिक कारणों से उनकी गलत व्याख्यायें इतिहास का सच बनी रहें।
Post – 2017-03-19
भाषा और समाज 5
अब हम उस तीसरे भाषाई समूह को लें जिसका संस्कृत पर कम परन्तु बोलियों पर काफी प्रभाव पडा। यह वह समुदाय है जो दन्त्य ध्वनियों का मूर्धन्य उच्चारण करता था। उसने ठीक उन्हीं अर्थों में जिन शब्दों के तकार का टकारयुक्त उच्चारण किया वे तो बचे न रहे, क्योंकि प्रतिस्पर्धा में दो में से एक का ही ठहरना संभव था परन्तु जो नई व्यंजनाएं टकार के साथ आईं और जिनमें भी ताप, ज्ञान, प्रकाश आदि का भाव था उन पर दृष्टि डाली जा सकती है।
ये हैं टीक, टीका, टिकुली, टिकिया, टिकोरा, टिकठी, टीकुर – सूखी भूमि, जलमग्न क्षेत्र के आगे का भाग, टिकरी, टिमटिमाना, टिप्पणी, संभव है अंग्रेजी कम टिक के अनेक अर्थो में एक का स्रोत ठीक से हो, टिकरी – तवे की जगह सीधे आग पर सेंकी जाने वाली रोटी, भोज. टेम- दिए की लौ ।
इस तरह हम पाते हैं कि भारतीय भाषा परिधि में चार प्रभावशाली समुदाय बहुत प्राचीन काल से सक्रिय दिखाई देते हैं, एक जिसमें घोष महाप्राण का अभाव था, दूसरा, जिसमें इसके प्रति विशेष अनुराग था और तीसरा जिसके प्रभाव से मूर्धन्य ध्वनियों का प्रवेश हुआ और एक चैथा जो तालव्य ध्वनियों के प्रति विशेष रुझान रखता था। जिसके प्रभाव से चित, चित्र, चिता, चिति, चैत्य, चिंता, चिन, चिनचिनाना, चिनार, चिन्ह, आदि, का जनन हुआ।
ऐसा नहीं है कि ये किसी देश से आए अपितु मुख्यधारा में इनकी सक्रियता और महत्व कब और कैसे इतना प्रधान हो गया कि इनके उच्चारण, इनकी ध्वनि का उसमें समावेश हुा। यदि हमारा यह प्रस्ताव सही है तो यह अब तक भाषाविज्ञान की कई स्थापनाओं से तो टकराता ही है परंपरागत मान्यताओं से भी इसका टकराव होता है। भारोपीय पर काम करने वालों ने समूचे क्षेत्र की ध्वनियों को समेटते हुए इनके आद्य रूप कल्पित किए और एक विशाल वर्णमाला तैयार की जिसमें हमारे उच्चारणतन्त्र में आए परिवर्तनों के अनुसार ध्वनियों का स्थिरीकरण हुा। केवल मूर्धन्य ध्वनियां को उन्होंने भारतीय विशेषता माना जब कि यूरोप की बोलियों में ट और ड के उच्चारणों की एक भिन्न व्याख्या देते हैं। हमारी समझ से देशान्तर में फैलने से पहले मुख्य धरा के संपर्कसूत्र का काम करने वाली भाषा में उन सभी ध्वनियों का प्रवेश हो चुका था परन्तु इनका उच्चारण जिन बोलियों के क्षेत्र में सम्भव न था, जैसे घोष महाप्राण का या मूर्धन्य ध्वनियों का वहां वे नहीं चल पाईं . हम ऐसा सुझाते हुए दो बाते कहना चाहते हैं. पहला भारतीय भाषाओँ में उपस्तर की नहीं सांस्कृतिक प्रक्रिया में सहभागिता की समस्या प्रधान है, उपस्तर की भूमिका बाहर के प्रसार में ही तलाशा जाना चाहिए.