Post – 2017-04-22

देववाणी (ग्यारह)

जो आज गलत सिद्ध हों गया कल तक सही था वह गलत हों कर भी पूरी तरह व्यर्थ नहीं होता। न्यूटन का गुरुत्व सिद्धांत आइंस्टीन के साथ कालातीत हो गया पर ज्ञानातीत हुआ क्या? वस्तुजगत हो या विचार जगत मलबे में भी बहुत कुछ उपयोगी होता है जो रिसाइकल किया जाता है।

सच्ची निष्ठा और सत्यपरकता से किये गए काम जब गलत सिद्ध कर दिए जाते हैं तो भी सर्वथा व्यर्थ नहीं होते। उनकी सत्य की अपनी समझ और सीमाएं होती हैं। उस सीमा के भीतर वे अखोट होते हैं। उससे बाहर लुढ़क जाते हैं।

यह सीमा पाणिनि सहित हमारे सभी मूर्धन्य वैयाकरणों के साथ थी जो यह सोच ही नहीं सकते थे कि देववाणी और इसलिए संस्कृत के निर्माण में असुरों और राक्षसों की बोलियों की कोई भूमिका हो सकती थी। परन्तु इसके कारण यदि हम उन्हें त्याग दें तो हम विपन्न हो जायेंगे। हमारे पास कुछ बचेगा ही नहीं।

संस्कृत वैयाकरणों का पूर्वाग्रह एक ग्रंथि से परिचालित था तो पाश्चात्य वैयाकरणों का दूसरे से, पर दोनों में समानताएं भी हैं और दोनों हमारी नई समझ के लिए सबसे उपयोगी भी बन जाते हैं। उनके समर्थन के बिना हमारी आवाज तो कोई सुनेगा ही नहीं। मैं पाश्चात्य भाषा चिंतकों की आलोचना भी करता हूँ और उनको ही प्रमाण मान कर अपने प्रस्ताव को अकाट्य भी बनाता हूँ, उन्हीं के तर्क की परिणति सामने लाकर, उनकी मान्यताओं का खंडन भी करता हूं।

पाश्चात्य अध्येता पूरे विश्वास से यह मान कर अपनी व्याख्यायें कर रहे थे कि आदि भारोपीय उनके ही भूभाग में कहीं बोली जाती थी और उसकी तलाश में पूरी ईमानदारी से काम कर रहे थे, ठीक संस्ककृत वैयाकरणों की तरह। संस्कृत का सम्मान वे भी करते थे। यूरोप का कोई ऐसा भाषाशास्त्री न होगा जिसने संस्कृत का गहन अध्ययन न किया हो। अपनी तुलनाओं में वे बराबर संस्कृत प्रतिरूपों का हवाला देते हैं। वे सिर्फ वहीं पीछे हट जाते हैं जहां भारतीय प्रतिरूप अधिक गहराई में उतरने की मांग करते हैं या जहां यह लगता है कि इससे आदि भाषा का निर्माण क्षेत्र सरक कर भारत की ओर चला जाएगा। यह तो उनकी पतिज्ञा के विरुद्ध था इसलिए संभव हो ही नहीं सकता था।

यदि पिछले चालीस साल के अध्ययनों से पूरी तस्वीर ही बदल न गई होती तो यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि उनकी भाषा विषयक मान्यताओं पर कोई पुनर्विचार की मांग तक कर सकता है।

यह उन्हीं की खोज थी कि आदि भाषा में घोष महाप्राण ध्वनियां थी और इतनी प्रबल थीं कि इनका प्रयोग एक साथ हो सकता था। संस्कृत में गकोष महाप्राण ध्वनियाँ पाई जाती हैं पर संस्कृत में उनके साथ आने पर पहले वर्ण का अल्पप्राणीकरण हों जाता हैं, केवल सघोषता बची रहती हैं । यह इस बात का प्रमाण हैं कि संस्कृत आदि भारोपीय नहीं, उसकी संतान हैं।

इसके साथ उन्होंने इस प्रबल विश्वास के कारण कि आदि भारोपीय यूरोप में बोली जाती थी उन्होंने स्वर अ को ए से बदल दिया था क्योंकि यूरोपीय बोलियों में शुद्ध अ का उच्चारण नहीं हो पाता इसलिए स्वरों के मामले में यूरोप अधिक भरोसे का था । भूतकालिक क्रिया के लिए भूव+भूव से बने भेभूव को संस्कृत ने बदल कर बभूव कर दिया।

यह संभव नहीं कि उनमें से किसी ने ग्रियर्सन की पूर्वी हिन्दी विषयक टिप्पणी न पढ़ी हो और उसके मन में एक बार को भी यह विचार न आया हो कि ऐसी प्राचीन भाषा तो भारत में पाई जाती है। यहीं आकर वे साक्ष्यों की उपेक्षा करने को बाध्य हो जाते थे । कहें घोष महाप्राण के बाद घोष महाप्राण तो वैज्ञानिक और अखोट था क्योंकि यह प्रामाणिक था। इसके बाद पूर्ववर्ती का ब रह जाना भी प्रामाणिक था। अकार का एकार बनाना यूरोप की सीमा थी और यह अप्रमाणिक या आग्रह से प्रेरित था और इस सीमा तक अवैज्ञानिक था।

हिन्दी और उसकी बोलियां संस्कृत के विघटन से पैदा हुई हैं यह अर्ध प्रामाणिक था क्योंकि भारतीय वैयाकरण भी ऐसा मानते थे और यह उनके विश्वास के अनुरूप था। ऐसा तभी हो सकता था जब यह भाषा कहीं अन्यत्र अपने आदिम चरण से विकसित हो क्र परिपक्वता के बाद भारत में पहुंची हो। यह स्वतः इस बात का प्रमाण था की आदि भाषा यूरोप में कहीं बोली जाती थी। पर प्रामाणिक होते हुए भी यह वैज्ञानिक नहीं थी क्योंकि इसका समर्थन आप्त वाक्य या अधिकारी विद्वानों के विश्वास पर आधारित था और उस विश्वास के अनुसार संस्कृत का अस्तित्व सृष्टि से पहले से था जो उन्हीं विद्वानों की आप्तता का खंडन करता था। यदि यह निष्कर्ष तथ्यों पर आधारित होता तो यह वैज्ञानिक भी होता और प्रामाणिक भी होता।

पर उनके लिए यह तथ्यों पर भी आधारित था। यदि आप पिशेल के प्राकृत भाषाओँ का व्याकरण देखें तो साफ पता चलेगा कि संस्कृत के तद्भव रूप ही प्राकृतों में पाए जाते हैं और उनसे मिलते जुलते रूप बोलियों में।

हमारा काम यहीं आरम्भ होता हैं जिसकी पहली जरूरत ज्ञान नहीं सतर्कता हैं। इसके अभाव में अर्जित ज्ञान ज्ञानभास हैं जो अज्ञान से भी खतरनाक होता हैं। इस पर हम कुछ रुक कर बात करेंगे। यहां इतना ही कि भाषाविज्ञान में अग्रणी पश्चिमी अध्येताओं ने भारतीय सन्दर्भ में आंकड़ों को जुटाया, उनकी गहराई से पड़ताल नहीं की क्योंकि इससे उनका काम आसान हो जाता था।
परन्तु यह बनी हुई धारणा उन कारणों में से एक हैं जिससे भोजपुरी की इस विशेषता की उपेक्षा हो सकती थी। यदि किसी बोली में यदि घोष महाप्राण के साथ घोष महाप्राण पाया जाता है तो या तो यह अपवाद हुआ या इसकी कोई अन्य व्याख्या होनी चाहिए। उनकी बुनियादी स्थापना कि मूल भूमि यूरोप या इससे सटे पड़ोस में होनी ही चाहिए गलत नहीं हो सकती। जो भी तथ्य इससे अनमेल या इसके विरोध में हों विशेषतः ऐसा प्रमाण जो भारत के पक्ष में ho तो वह प्रमाण भी अप्रामाणिक माना जाएगा। उनकी दादागिरी और सर्वसहमति के आगे कोई भारतीय भाषाशास्त्री टिक कर अपनी साख गंवाने को तैयार न था। सुनीति बाबू की विवशता यही थी। विदवान की ख्याति भी उसकी आंख पर पट्टी का काम करती है। ख्याति और अपनी समझ के बीच वह ख्याति को चुनता है। भारत के प्रख्यात भाषाशास्त्रियों और भाषाविज्ञानियों ने, सिवाय उनके जो इस यश और पदीय प्रलोभन से मुक्त थे, भाषाविज्ञान के क्षेत्र में कोई नया योगदान नहीं किया। उन्होंने पाश्चात्य स्थपनाओं को अपनी और से प्रामाणिक बनाने के लिए अपने अध्ययनों में उसी पर अमल किया। यदि कोई नया योगदान हैं तो वह उनका जो पद, प्रलोभन और ख्याति से दूर थे जैसे काशीनाथ विश्वनाथ रजवाड़े, किशोरीदास वाजपेयी, रामविलास शर्मा जिन्हे खोना कुछ न था इसलिए जो तथ्य था उसकी अपनी समझ के अनुसार व्याख्या करने का प्रयास किया। पूरी तरह सही ये भी नहीं हैं।

अब इस स्थिति में जब सही कोई नहीं हैं, फिर भी अपनी समझ और बोधवृत्त में सभी ने बहुत निष्ठा से काम किया हैं, हम किसी पर न तो निर्भर कर सकते हैं न ही किसी की उपेक्षा कर सकते हैं। हमारे लिए ये सभी वहीं पर और वहीं तक स्वीकार्य हैं जहा तक ये अपनी ही प्रतिज्ञाओं पर सही उतरते और तथ्यों के अनुरूप मिलते हैं।

Post – 2017-04-21

मैं जब काम करते थक जाता हूँ पर फिर भी कुछ आग बची रहती है तो बहुत हल्की तुकबंदियाँ अपने मनोरंजन के लिए करता हूँ, इनसे बचें

हम उसे जानते नहीं फिर भी
उसके होने से न इन्कार ही है
अपना दुश्मन न हो सके है कभी
फिर भी देखो न अपना यार ही है

Post – 2017-04-21

यह दिल अपना नहीं था जब जवां था
जमाना उसके आगे तब कहां था।
हुआ जब से करीब अपने न पूछो
बंधा था जिन्दगी से, पर कहां था!

Post – 2017-04-21

देववाणी (दस)

मेरे इस विवेचन में अनेक नई बातें पढ़ने को मिलेंगी जो प्रचलित तुलनात्मक भाषा विज्ञान के पंडितों को इतनी आघात पहुंचानेवाली लगेंगी की वे इसे बकवास कह कर आगे कुछ सुनने तक को तैयार न हों, या शिष्टाचार के नाते चुप चाप सुनते रहें तो भी इतने अन्यमनस्क रहें की उनका ध्यान कहीं और चला जाये और कुछ सुन तक न पाएं. इसके मेरे पास कई अनुभव हैं, पर फिर जब सवालों के घेरे में आते हैं तो उनकी हालत देखते बनती हैं।

मेरी बातें विषय से अनभिज्ञ व्यक्ति को अधिक आसानी से समझ में आ जाती हैं क्योंकि उसके पास मान्यताओं का वह दबाव नहीं होता, परन्तु उसे स्वयं अपनी समझ पर भरोसा न होने के कारण यह संदेह बना रहता कि यदि यह सही है, तो फिर इस विषय के अधिकारी लोग इसे क्यों नहीं स्वीकार करते।

ले दे कर बात उसी पाले में पहुँचती है जहाँ पुरानी जानकारी का भूसा इस हद तक भरा है कि मेरी आवाज उसके दिमाग कि ध्वनिग्राही कोने तक पहुँच ही नहीं पाती।

मेरी व्याख्या भले न पहुंचे प्रश्न पहुंचता है और जब उसका जवाब उससे देते नहीं बनता हो तो उसका जो जवाब मैं देता हूँ उसको वह ध्यान से सुनता है। प्रलोभन होता है १९६९ से एशियाटिक सोसाइटी के सभागार में एक व्याख्यान, कोलकता विवि. में भाषाविज्ञान में रीडर दयानन्द श्रीवास्तव, सुनीति बाबू, भारतीय पुरातत्व के एक के बाद एक पांच महानिदेशकों, गोरखपुर के इतिहास विभाग दे विभागाध्यक्षों और भारतीय नृतत्व के निदेशक और people ऑफ़ इंडिया के विश्वकोशीय खण्डों के संपादक कुवंर के एस सिंह से अपने अनुभवों को आप से साझा करूं, पर समय का अपव्यय होगा। इसे कहीं अन्यत्र कुछ प्रसंगो में दर्ज भी कर चुका हूँ, इसलिए यहां इतना ही की हर बार वही नजारा सामने आया।

हम उस प्रश्न से आरम्भ करें जिसका जवाब वे नहीं दे सकते, देंगे तो पकड़ में आ जाएंगे और जिससे उन लोगों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा जो मनस्वी होते हुए भी भाषाविज्ञान से सीधा परिचय नहीं रखते:
तुलनात्मक भाषाविज्ञान का लक्ष्य क्या था?
इसका लक्ष्य था यह पता लगाना कि भारत से लेकर यूरोप तक की भाषाओं में समानताएं कैसे पैदा हुईं? संस्कृत इन सभी में सभी दृष्टियों से समृद्ध, सबसे पुरानी, सबसे नियमित, और सभी की ऐसी उलझनों को सुलझाने में समर्थ थी, जिन्हें कोई दूसरी भाषा, यहां तक कि उनके सटे पड़ोस की भाषा सुलझा नहीं सकती थी।

इसका इतिहास उनके आकलन के अनुसार भी बहुत पीछे जाता था जब कि उनका लिखित इतिहास केवल ग्रीक और लातिन के मामले में इसवी सन से कुछ सौ पीछे जाता था और शेष का उससे कई सौ साल बाद आरंभ होता था।

यह विश्वास सर्वमान्य था कि संस्कृत का ही प्रसार पूरे भारोपीय क्षेत्र में हुआ है, परन्तु यह संभव कैसे हुआ यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। इस विश्वास ने यूरोप में उस खास चरण पर जब वह विश्व में अन्य सभी से अपने को, दूसरी संस्कृतियों से अपनी संस्कृति को, दूसरे धर्मों से अपने धर्म को, दूसरों की रंगत से अपनी चमड़ी के रंग को श्रेष्ठ को मानता ही था और संस्कृत का देश उसके अधीन भी था, कितना मर्माहत करने वाला था कि इसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते ।

अतः तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाओं को समझने के लिए नहीं, इस ग्लानि से बचने का कोई ऐसा तर्क तलाशने के अभिप्राय से आरंभ हुआ जिससे वे स्वयं अपने आप को यह विश्वास दिला सकें कि ऐसा नहीं हुआ, ऐसा हो ही नहीं सकता था।

इसके बाद का सारा अध्यवसाय अकादमिक शोध कम और वकालत अधिक था। बहाने खीच तान कर तलाशे गए और संस्कृतभाषी आर्यों के नैन नक्श से ले कर सांस्कृतिक उजड्डपन के तरह तरह के नक्शे बनाए, आजमाए और फिर टिकाऊ न पाकर खुद ही खारिज करके नई कहानियां गढ़ी जाती रहीं । इनकी ही अन्तिम कड़ी था भारत पर आर्यों का आक्रमण, और दूसरी कहानियां।

परन्तु अब जब उन कहानियों का इस हद तक खंडन हो चुका है कि कोई बददिमाग ही उनको, अपनी अकादमिक साख खतरे में डालते हुए, दुहरा सकता है और यह भी सिद्ध हो गया कि सुदूर अतीत में भारत सभ्यता में उसी ऊंचाई पर पहुंचा हुआ था जिसकी पुष्टि आर्य शब्द से, ऋग्वेद में वर्णित सभ्यता से होती है और दोनों की अभिन्नता को पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर स्थापित किया जा सका है, दूसरे शब्दों में जब यह खुली किताब की तरह पढ़ा जा सकता है कि हड़प्पा के विदेशों में स्थापित अड्डों के माध्यम से इस भाषा का प्रसार यूरोप के सीमांत तक हुआ, तब उन भाषावैज्ञानिक अध्ययनों का क्या महत्त्व रह जाता है जिन पर इतना श्रम यह सिद्ध करने के लिए किया गया था की आदि भारोपीय यूरोप में कहीं बोली जाती थी, कि उस भाषा की दो शाखायें हुई जिनका नामकरण सौ के लिए आदि भारोपीय में प्रयुक्त शब्द के उच्चारण के आधार पर केंतुम और सतेम में किया गया, केंतुम को सतेम शाखा से पुरानी सिद्ध किया गया और इसी आधार पर आदि भाषा की धातुओं या आदिम घटकों का निर्णय और समानता रखने वाले या सगोत्र शब्दों के आद्य रूपों के कोश तैयार किए जाते रहे।

अब हम लौट कर उस समस्या पर आएं जिससे हमने आरम्भ किया था और कुछ नए सवालों का सामना करें:
1. जिसे हम इतिहास और तुलनात्मक भाषा विज्ञान का अधिकारी व्यक्ति मानते हैं उसने अपना समस्त ज्ञान उन्ही प्रकांड पंडितों की पुस्तकों और मान्यताओं को कंठस्थ करके या उसी दायरे में अपने भी कुछ तीर तुक्के भिड़ाते हुए अपना शोध कार्य सम्पन्न किया है। वह स्वयं अवसन्न सा है: जिस मान्यता का आधार ही ध्वस्त हो गया वह टिकी कैसे रह सकती है ?

किसी साधारण मनस्वी व्यक्ति से उसकी क्या भिन्नता है? यही न की उसके पास वह सारी जानकारी है जो गलत सिद्ध होने के बाद भी उस जगह को घेरे हुए है जिससे वंचित रहने के कारण अन्य सुधी जनों का दिमाग खुला हुआ है? इसीलिए मैंने कहा था की विषय पर अधिकार के अभाव में भी वे इस नई सोच को अधिक आसानी से ग्रहण कर सकते है।

२- यदि हम अधिकारी व्यक्ति को अपना दृष्टिकोण समझाने चलें तो वह सुनने को तैयार भले न हो परन्तु यदि उससे प्रश्न करें कि यदि पुरानी कहानी ही उलट गई तो अब इस समस्या का उसके पास क्या समाधान है और वह इधर उधर की बातें करे तो कुछ और शंकाएं सामने रखें और जब वह निरुत्तर हो जाय तो नम्रता से यह बताएं की हुआ यह लगता है और इसके ये प्रमाण थे जिनकी अनदेखी की गई तो वह करबद्ध न भी खड़ा हो, निरुत्तर होकर चुप रह जाये तो भी आपको उसकी चुप्पी अपनी पराजय के स्वीकार जैसी लगेगी। अब तक हर बार ऐसा ही हुआ है।

३- परन्तु एक प्रश्न अपने आप से भी पूछना रह जाता है. क्या उन प्रकांड विद्वानों को हम धूर्त करार दे सकते हैं और उनके जीवन भर के इतने श्रम से किए गए काम को क्या हंस कर उड़ाया जा सकता है जिनमे बौना लगने वाला विद्वान भी मुझ से इतना क़द्दावर लगेगा की उससे नजर मिलाने के लिए गर्दन टेढ़ी करनी पड़ जाय? इस अंतिम सवाल से अपनी बात हम कल आरम्भ करेंगे.

Post – 2017-04-21

देववाणी (दस)
मेरे इस विवेचन में अनेक इतनी नई बातें पढ़ने को मिलेंगी जो प्रचलित तुलनात्मक भाषा विज्ञान के पंडितों को इतनी आघात पहुंचानेवाली लगेंगी की वे इसे बकवास कह कर आगे कुछ सुनने तक को तैयार न हों, या शिष्टाचार के नाते चुप चाप सुनते रहें तो भी इतने अन्यमनस्क रहें की उनका ध्यान कहीं और चला जाये और कुछ सुन तक न पाएं. इसके मेरे पास कई अनुभव हैं, पर फिर जब सवालों के घेरे में आते हैं तो उनकी हालत देखते बनती हैं. मेरी बातें विषय से अनभिज्ञ व्यक्ति को अधिक आसानी से समझ में आ जाती हैं क्योंकि उसके पास मान्यताओं का वह दबाव नहीं होता, परन्तु उसे स्वयं अपनी समझ पर भरोसा न होने के कारण यह संदेह बना रहता कि यदि यह सही है तो फिर इस विषय के अधिकारी लोग इसे क्यों नहीं स्वीकार करते. ले दे कर बात उसी पाले में पहुँचती है जहाँ पुराणी जानकारी का भूसा इस हद तक भरा है कि मेरी आवाज उसके दिमाग कि ध्वनिग्राही कोने तक पहुँच ही नहीं पाती. मेरी व्याख्या भले न पहुंचे प्रश्न पहुंचता है और जब उसका जवाब उससे देते नहीं बनता हो तो उसका जो जवाब मैं देता हूँ उसको वह ध्यान से सुनता है. प्रलोभन होता है १९६९ से एशियाटिक सोसाइटी के सभागार में एक व्याख्यान, कोलकता विवि. में भाषाविज्ञान में रीडर दयानन्द श्रीवास्तव, सुनीति बाबू, भारतीय पुरातत्व के एक के बाद एक पांच महानिदेशकों, गोरखपुर के इतिहास विभाग दे विभागाध्यक्षों और भारतीय नृतत्व के निदेशक और people ऑफ़ इंडिया के विश्वकोशीय खण्डों के संपादक कुवंर के एस सिंह से अपने अनुभवों को आप से साझा करूं, पर समय का अपव्यय होगा. इसे कहीं अन्यत्र कुछ प्रसंगो में दर्ज भी कर चुका हूँ इसलिए यहां इतना ही की हर बार वही नजारा सामने आया.
हम उस प्रश्न से आरम्भ करें जिसका जवाब वे नहीं दे सकते, देंगे तो पकड़ में आ जाएंगे और जिससे उन लोगों का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा जो मनस्वी होते हुए भी भाषाविज्ञान से सीधा परिचय नहीं रखते.

Post – 2017-04-20

‘हिरना समुझि समुझि बन चरना!’

मेरी भाषा संबंधी टिप्पणियों को भी समझते हुए पढ़ने की जरूरत है। मुझसे पहले इस तरह किसी ने सोचा नहीं। न तो अकेला चना भाड़ फोड़ता है न किसी क्षेत्र में नई लीक बनाने वाला गलतियों से बच पाता है और अकेले कोई पुरानी मान्यताओं को पूरी तरह ध्वस्त कर पाता है। अनेक लोग काफी समय लगा कर सामग्री जुटाते और उस सामग्री को व्यवस्थित करने के लिए सोच विचार करते हुए,अपना समाधान देते हुए लेखन करते हैं तो पहले की कमियां दूर होती हैं और हम सचाई के अधिकाधिक निकट पहुँचते जाते हैं। अच्छा हो मेरी पोस्ट को पढ़ने वाले, इसे पढ़ कर आगे न बढ़ जायँ अपितु प्रत्येक प्रस्ताव पर गौर करें। आप की जो भी मातृभाषा (बोली) हो उसके ऐसे शब्दों, लोकोक्तियों, मुहावरों, को अपनी किसी नोटबुक में टांकना और उन पर सोच विचार करने की आदत डालें। ऐसे चार पांच पाठक मेरे लिए पांच हजार के बराबर हैं जो ध्यान से पढ़ें और मेरी चूक पर ऊँगली रखें।

हम जो सोचते हैं वह दो चीजों से निर्देशित होता है। एक हमारे तथ्य और दूसरा उस विषय में बने हुए विचार। यदि तथ्यों के चयन और संयोजन में कोई आग्रह भी काम कर रहा हो तो आरम्भ ही गलत हो गया। वस्तुपरक चिंतन और विश्लेषण में भी हम दूसरे बिंदु से बच नहीं पाते और इसलिए कुछ तथ्यों की और हमारा ध्यान नहीं जा पाता और हम गलत नतीजा निकाल लेते हैं। मैं इसे एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहता हूँ।
हमने देववाणी (छह) में अन्य बातों के अतिरिक्त देववाणी के स्वरप्रेम के प्रसंग में निम्न टिप्पणी की थी:
भाषा के सन्दर्भ में भोजपुरी या उससे भी पहले की देवभाषा में स्वर और संगीतात्मकता को भी इस विशद परिप्रेक्ष्य में देखना उचित होगा। इसमें बात स्वर प्रधानता पर ही समाप्त नहीं होती, अपितु स्वरों में भी अ और आ दूसरे स्वरों पर भारी पड़ते हैं जिसे भाई – भइया, माई – मइया, आजी – अजिया, बहिन – बहिनी, बहिनी, बहिनिया में देखा जा सकता हैं। पर इससे भी रोचक हैं देस- देसवा, परदेशी – परदेसिआ, करमवा जैसे प्रयोग। जहाँ पश्चिम की बोलियों में स्वरों को क्षिप्रता के तकाजे से खा जाने की बेताबी हैं वहाँ पूर्व में उतने से ही संतुष्ट न होकर अतिरिक्त स्वर जोड़ने पर ही अनुराग और आत्मीयता पैदा होती हैं।
इसका एक कारन क्या यह हो सकता हैं की आदिम कृषि के चरण पर जंगली जानवरों या लुंचन कारियों के संकट के समय लम्बी गुहार लगा कर सहायता के लिए दूसरों को बुलाने के क्रम में यह प्रवृत्ति पैदा हुई हो? कारण और पूर्व में बढ़ने पर अकार का ओकर भले हो जाय, ये प्रवृत्तियां नहीं पाई जातीं।
समस्या भाषा की थी और पहुँच गई दिशा और जलवायु पर। चेतना में गहरे कहीं बंगाल की उमस भरी गर्मी से बेचैन मैकाले जैसे गोरों की खीझ भरी उक्तियाँ थीं। वास्तविकता यह है की पूरे भारत में आहार संचय के चरण पर ही विभिन्न समुदायों के किसी न किसी अनुपात में सर्वत्र बिखरे होने के कारण कुछ साझेदारियां कायम हो चुकी थीं जिसे भारत को एकभाषी क्षेत्र (इंडिया ऐज ए लिंगविस्टिक एरिया) कहने वाले एमेनो भी समझ नहीं पाए थे।

इसका शब्दभंडार से अधिक प्रभाव व्याकरण पर पड़ा था। अखिल भारतीय वाक्यविन्यास की समानताएं – कर्ता कर्म क्रिया और उनके विशेषण उनसे पहले भाषा परिवारों की सीमाओं के पार, जब कि यह समानता भारोपीय परिवार की भाषाओं तक में नहीं है। इम इसके विस्तार में न जाएंगे। इन समानताओं के बीच आंचलिक विशिष्टताएं बची रही थीं, इसका संकेत हम पहले कर आए हैं।

यह कौरवी (कुरु अंचल की भाषा) की विशेषता थी कि वह इतनी व्यंजनप्रधान थी कि स्वर उसके समुदाय को सुनाई तक नहीं देता था। आज भी हरयाणवी और कुछ दूर तक पंजाबी में स्वरलोप या स्वरविपर्यय की प्रवृत्ति बनी रह गई है जब कि पांच हजार साल से यह संस्कृत का केन्द्र रही है। एक सरदार जी ने कृप्या पधारिए जैसा कुछ अपनी दूकान के आगे लगा रखा था। मैंने समझाया कि इसे कृपया लिखवा दीजिए। वह बार बार मुझे समझाते रहे कि उन्होंने कृप्या ही लिखा है और मैं उन्हें एक एक अक्षर का अलग उच्चारण करते हुए समझाता रहा कि कृ-प-या, पर समझा न सका। इसी से यह निष्कर्ष निकाला कि वे स्वरों को ठीक सुन तक नहीं पाते थे और यह क्षिप्रता उस अकेली भाषा के कारण थी। न कि जलवायु या पूरब पश्चिम के कारण।

तथ्य यह है कि जैसे हमारी कला में अलंकरणप्रियता कुछ अधिक है जो सादगी और भव्यता में बाधक बनती है, उसी तरह हमारी सभी भाषाओं में शब्द के अन्त में कुछ आलंकारिक ध्वनियां लगाने की प्रवृत्ति रही है और यह तथाकथित आर्य द्रविड और मुंडा सभी समूहों में देखने में आती है और संस्कृत पर भी इसका प्रभाव पड़ा हो सकता है। उक्त टिप्पणी लिखते समय भोजपुरी के भइया के साथ यदि भाउू, भावे, भवनानी आदि की ओर ध्यान गया होता तो परिणाम भिन्न होता।

हम हार्नले और ग्रियस्रन की नासमझी या भ्रान्ति का हवाला पहले दे आए हैं। संस्कृत और पश्चिमी हिन्दी के चरित्र को अपने परिवेशीय भाषाओं से भिन्न पाकर उन्होंने आर्यों के दो आक्रमणों की कल्पना कर डाली थी। उनका मानना था कि उत्तर भारत की बोलियों में पाई जाने वाली समानताएं पहली जमात के आयों के आक्रमण का नतीजा है और फिर उन पर आयों का दूसरा आक्रमण हुआ। जिनके कारण वे चारों ओर बिखर गए और केन्द्र में वह भाषा स्थापित हुई जो ऋग्वेद में मिलती है। उनके पास सुनीति बाबू के इस प्रश्न का कोई उत्तर न था कि यदि वे पश्चिम से आए तो पश्चिम की भाषाओं में वे समानताएं कैसे बनी रह गईं। वे आर्यों से भरे किसी तालाब में उल्कापात की तरह तो गिरे न होंगे कि बीच में वे रह गए और दूसरे चारों ओर बिखर गए।

इसकी ओर ध्यान उस किश्त को लिखने के साथ ही चला गया था परन्तु प्रवाह में भंग के डर से उसे उस समय नहीं उठाया। फिर इस बात की प्रतीक्षा में भी रहा कि आप लोगों में से कुछ का ध्यान तो इस बात की ओर जाएगा ही। किसी का ध्यान इसलिए नहीं गया कि हममे से अधिकांश लोग पैसिव रीडिंग करते हैं। यदि कोई बात बहुत अटपटी नहीं लगी तो तर्कप्रवाह में बह जाते हैं। जरूरत सविमर्श पाठ की, मीन मेख परक पाठ की है। जिन्हें हम बहुत प्रखर मेधा का मानते हैं वे भी सविमर्श पाठ नहीं कर पाते। ऐसा न होता तो कोसंबी जैसा व्यक्ति, भगवतशरण उपाध्याय जैसा व्यक्ति दो तीन चार पता नहीं कितने आर्य आक्रमणों की कहानियां उसी हार्नले और ग्रियर्सन से न निकालता।
यदि दूसरों का नहीं तो मेरे लिखे का पाठ जांच पड़ताल के साथ करने वाले दो चार लोग भी निकल आएं तो उनका उपकार मानूंगा।

Post – 2017-04-19

मैं खुद वही कहता रहा जो तुमने कहा है
तूमने मुझे सुना न तुझे मैने सुना है ।
हम थे तो रूबरू मगर रू थे जुदा जुदा
गैरों ने कहा कान में बस उतना सुना है।

Post – 2017-04-19

आत्मसाक्षात्कार

नीचे लिखी पंक्तियां मैंने दलित समस्या पर 1.7.2016 को लिखी अपनी पोस्ट में लिखी थीं। आज अचानक इसकी याद दूसरे सिरे से आ गई। क्या आप सोचते हैं कि हिन्दू समाज कुछ सवालों और घटनाओं को लेकर बौखलाया हुआ है? यदि हां, तो उसे उपचार की जरूरत है। यह मैं नहीं कह रहा हूं, मेरी समाज और इतिहास की समझ कह रही है।

इस बौखलाहट और उत्तेजना से क्षणिक रूप में दूसरे समुदायों का भी नुकसान हो सकता है, परन्तु हिन्दू समाज को जो नुकसान होगा उसकी तुलना में वह बहुत कम होगा। यही सवाल मैं मुसलमानों से भी करना चाहता हूं जिनके अपने कारनामे और हिन्दुओं की जज्बाती बातों और कार्यो से कम बौखलाहट नहीं दीखती। अच्छे भले भी बह जा रहे हैं। यदि इसका वही पाठ वे भी कर सकें तो उनको भी इसके परिणामों का पता चल जाएगा, यद्यपि वे किसी हिन्दू के सुझाव को सुनने से भी परहेज करें तो इसका बुरा न मानूंगा।

इस समय आप अपनी परंपरा और संस्कृति का सम्मान नहीं कर रहे हैं, उनके हाथों में खेल रहे हैं जिनका चेहरा सामने नहीं आता और जिनके कारिन्दों को जो आप के लाडले बन कर, आपकी संस्कृति के नाम पर आप को उत्तेजित और अर्ध विक्षिप्त बनाते है उन्हें आप गले लगा लेते हैं।

जज्बाती होना किसी समाज के हित में नहीं होता पर उसके दुश्मनों के काम का होता है। हिन्दू समाज अगर जज्बाती होकर मुसलमानों के प्रति घृणा का विस्तार कर रहा तो वह उस देश के हाथों में खेल रहा है जो उसे घृणा करने वाला और इसलिए स्वयं भी घृणित सिद्ध करना चाहता है। ठीक यही बात यदि मुसलमान समझ सकें तो ठीक अन्यथा उन दुश्मनों का और उनके मुल्लाओं का भला होगा, मुसलमानों का इतना नुकसान होगा जिसकी वे कल्पना नहीं कर सकते। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि उनके मुल्लाओं के हाथ उनके दुश्मनों से मिले हुए हैं और वह दुश्मन हिन्दू नहीं जो खुद उसी मर्ज का शिकार हैं अपितु वह दुश्मन हैं जिसे आप देखते हुए भी नहीं देख पाते हैं और जिसके कारण में आस्तीन में छुरा रखने वालों को आप दिल से लगा लेते हैं ।

यदि हम अपने इतिहास से इतना भी न सीख सके तो इतिहास की पढ़ाई तो पहले से बन्द है, इतिहास की इस समझ को भी पुरावस्तु मान कर किसी उपयुक्त संग्रहालय में रखेंः
*****
‘तुम्हारी बात अपनी जगह, पर यह जो दलित समाज है, उसे जो पीड़ा
और अपमान भोगना पड़ा है, उससे उसे राहत देने वाले एक मात्रा नेता के बारे
में आलोचना सुनने पर आघात लगता है। वह बौखला उठता है।’

‘जब तक बौखलाता रहेगा तब तक डरावना भी लगेगा, पर अपने दिमाग
से काम नहीं ले सकेगा और अपनी किसी समस्या का समाधान नहीं कर
पाएगा। दलित की वेदना को समझा जा सकता है, पर दलित इसे अपनी ओर
से और गहन बनाते हुए अपनी सोच को भी दलित बनाए रखे, यह दुर्भाग्यपूर्ण
है। उसे आवेग विह्वल प्रतिक्रिया से जिसे वह अपनी सोच मान लेता है और
अपनी इस सोच को अनन्य मान लेता है, बाहर लाना होगा। उसकी इस ग्रंथि
से टकराते, उसके तार-तार अलग करते हुए, एक सामाजिक मनोविश्लेषण
की भूमिका निभाते हुए उसे भावुकता और विडंबनापूर्ण आत्ममुग्धता से बाहर
लाना होगा। यह उन लोगों का काम है जो शांत चित्त होकर सोच सकते हैं
और दलित समाज को अमानवीय स्थितियों से बाहर लाना चाहते हैं।’

‘तुम सोचोगे उनके लिए? तुम जिसने वह पीड़ा नहीं झेली, वे अभाव
नहीं देखे, जो आज तक उनकी पहचान को भी गाली बना देते थे?’

‘किसी की पीड़ा को कोई दूसरा नहीं झेल सकता। एक दलित भी दूसरे
की पीड़ा को नहीं झेल सकता। हम पीड़ा के दूसरे क्षण में या उससे बाहर
आने के बाद उस पीड़ा को झेल नहीं सकते। एक मां तक अपने बच्चे की
पीड़ा को चाहकर भी झेल नहीं सकती। उसे पीड़ित देखकर बेचैन अवश्य हो
सकती है। हम दूसरे की पीड़ा को समझ सकते हैं और समझ भी इसलिए
सकते हैं कि पीड़ा का कोई एक रूप नहीं है। उसके अनन्त रूपों में से
किसी न किसी रूप को सभी को झेलना पड़ता है और उसी के सहारे, अपनी
सर्जनात्मक कल्पना से, उसके अनुपात, संदर्भ और आयाम का विस्तार करके
हम दूसरों की पीड़ा को समझते हैं। यही बात अभाव की भी है। यही तो बु(
का बोध था कि दुःख से मुक्त कोई नहीं है और यही नानक दुखिया सब
संसार में भी प्रकट है। बौ( मत को अपनी मुक्ति का धर्म और दर्शन मानने
वाले भी इसे भूल जाएं तो हम उसका क्या कर सकते हैं।

Post – 2017-04-19

देववाणी (नव)

काकल्य (लैरिंजियल) ध्वनियों के सन्दर्भ में का.वि. राजवाडे की एक व्याख्या की याद आना स्वाभाविक है। पाणिनीय सूत्र ‘ससजुषीरुः’ की व्याख्या करते हुए उनका यह दावा कि कभी प्राचीनतम अवस्था में स का उच्चारण कंठ में बहुत पीछे होता था जिसके कारण उच्चरित ध्वनि स ह और र के रूप में सुनी जा सकती थी। इसका उन्होंने बड़े तर्कपूर्ण ढंग से विवेचन किया है और सुझाया है कि इसके अतिरिक्त किसी अन्य स्थिति में यह संभव न था कि वही विसर्ग ध्वनि कहीं स् में बदले, कहीं ह में बदले और कहीं र में बदल जाय । इस समय उनकी पुस्तक (संस्कृत भाषेचा उलगडा) नहीं है, जिसमें उन्होने उन रूपों और प्रयोगो को उदाहृत किया है। परन्तु यह याद दिलाना उचित होगा कि वही विसर्ग ओ (रामः अयम् = रामो अयं), आ (अन्तः राष्ट्रिय – अन्ताराष्ट्रिय) में भी बदल सकती है। अर्थात एक काकल्य ध्वनि है जिसके प्रभाव से आ, ओ, स, र, ह ध्वनियां पैदा हो सकती हैं। भाषाविज्ञान में मेरी रुचि उन चकित करने वाले आंकड़ों के कारण पैदा हुई जिनकी ओर दुनिया के किसी भाषाविज्ञानी ने ध्यान नहीं दिया और जो इन तुलनात्मक अध्ययनों से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। उसकी चर्चा हम आगे करेंगे। इसकी चर्चा हम इस लाक्षागृह से बाहर निकलने के बाद विस्तार से करेंगे। शास्त्रीय पक्ष का मेरा ज्ञान कार्यसाधक ही है अतः इन प्रत्यक्ष दृष्टान्तों के होते हुए भी मैं इसकी प्रक्रिया को पूरी तरह आत्मसात् नहीं कर पाता हूं और यदि इनकी कोई अपनी व्यख्या प्रस्तुत करने चलूं तो शास्त्रीय अध्ययन और प्रशिक्षण से गुजरे लोगों का ज्ञानवर्धन होने की जगह मनोरंजन अधिक होगा। इसलिए इसे भी एक विचारणीय पक्ष के रूप में लिपिबद्ध करके मुक्त होना चाहता हूं कि सस्युर के अनुमान, राजवाडे की इस व्याख्या और भोजपुरी में हकार की भूमिका के तार मुझे परस्पर जुड़े दिखाई देते हैं।

हिन्दी और भोजपुरी में हम जहां हां हां कहते हैं, वहां तमिल जिसमें महाप्राण ध्वनियों का सर्वथा अभाव है, उसमें आम आम = आमाम कहा जाता है। ये दोनों एक ही शब्द हैं यह समझने में समय लगता है।

हमारे सामने समस्या यह है कि क्या एक बोली थी जिसमें ठीक उसी तरह सघोष और महाप्राण ध्वनियाँ ही थीं और इसने अघोष अल्पप्राण ध्वनियों काे तमिल जैसी किसी भाषा के सम्पर्क में आने के बाद ग्रहण किया, या जिन तीन वर्गों को उ सकी निजी ध्वनियां मानते हैं उनकी भी केवल कुछ ध्वनियाँ थीं.

यह उलझाने वाला सवाल है फिर भी इसका कामचलाऊ समाधान यह है कि जिन ध्वनियों का प्रयोग शब्द के आदि में न होता हो उन्हें किसी अन्य के प्रभाव से या अपने भाषाई समाज में ऐसे लोगों के मिलने का परिमाण मानें, जिनमें इनका आदिस्थानीय प्रयोग होता है. दूसरी कसौटी यह है कि अन्य ध्वनियों को वह किन ध्वनियों में बदलती है. पहली कसौटी पर ङ या कवर्ग का अनुनासिक रूप देववाणी में नहीं होना चाहिए. आज भोजपुरी में कोई शब्द ङ से आरम्भ नहीं होता. पर दूसरी कसौटी पर हम इसे एक स्वतंत्र ध्वनि पाते हैं. हिंदी गंगा – भो. गङा, हि. चंगा -भो. चङा, हि. चंगुल – भो. चङुल. पहले पंचमाक्षर का पालन करने वाले हिंदी में गङ्गा, चङ्गा, आदि लिखा करते थे। यह गलत था। हिन्दी में और इसी आधार पर संस्कृत में भी का उच्चारण नहीं होता, कहीं स्वतन्त्र प्रयोग नहीं होता इसलिए गङ्ग, चङ्ग में प्रथम वर्ग के अनुनासिक ङ का प्रयोग नहीं होता, अपितु ग और च के साथ अनुस्वार का प्रयोग होता है। कहें ङ देववाणी की ध्वनि थी पर संस्कृत और हिंदी की ध्वनि नहीं है. हिंदी में इसका अभाव संस्कृत के कारण नहीं है अपितु संस्कृत में ङ का अभाव उस बोली के कारण है जो उस क्षेत्र में बोली जाती थी.

जब तक देववाणी का प्रवेश कुरुक्षेत्र या सरस्वती, आपया और दृषद्वती के कछार में कृषिकर्मियों के मनचाहे क्षेत्र में (नि त्वा दधे वर आ पृथिव्यां इळायास्पदे सुदिनत्वे अह्नाम् । दृषद्वत्यां मानुष आपयायां सरस्वत्यां रेवदग्ने दिदीहि ।ऋ. 3.23.४) हुआ तब तक वे तालव्य व मूर्धन्य प्रेमी समुदायों के संपर्क में आ चुके थे. तालव्य प्रेमी समुदाय के गहन सम्पर्क में वे देववाणी के अपने क्षेत्र में ही आ चुके थे. इसलिए उसके पांचवां अक्षर ञ का भोज. में शब्द के आरम्भ में प्रयोग नहीं होता पर अंत में होता है – चीञा, टोइञा । हिंदी और संस्कृत में ञ का स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता. वर्ग के नियम से इसे कल्पित कर लिया जाता. परन्तु मूर्धन्य ध्वनियों के संपर्क में देववाणी का प्रयोग करने वाले इस नए क्षेत्र में आने के बाद आए, इसलिए ण का यद्यपि आद्यक्षर के रूप में जैन प्राकृत को छोड़कर कहीं प्रयोग नहीं मिलता, हिंदी में यह मध्य और अंत में स्वतंत्र अक्षर के रूप में प्रयोग होता है. भोज. में नहीं होता. अतः ण का पंचमाक्षर के रूप में भी हिंदी और संस्कृत में प्रयोग होता है जब कि भोजपुरी में नहीं. ऐ औ पश्चिमी बोलियों की जिनमें उनसे प्रभावित हिंदी संस्कृत, भी आती हैं, ध्वनियाँ हैं. देववाणी में वे नहीं थीं।

भोजपुरी और हिंदी या कहें देववाणी और संस्कृत की कुछ अन्य भिन्नताएं हैं जिन पर आगे चर्चा करेंगे.

Post – 2017-04-18

मैं नहीं कहता कि मैं खुश नहीं हूँ दुनिया से
पूछते लोग हैं क्यों इतने परेशान से हो
मैं नहीं कहता मुझे समझा किसी ने न कभी
लोग बतलाते हैं तुम लगते तो भगवान से हो !