Post – 2020-03-12

नयाअंधायुग
तीन

अन्धयुग इतिहास में बार बार आते रहे है। इनके रूप भिन्न-भिन्न रहे हैं, परंतु एक लक्षण समान रहा है और वह है बौद्धिक वर्ग का सभ्यताद्रोही और ध्वंसकारी शक्तियों के सामने निरुपाय हो जाना या स्वयं उनका सहयोगी बन जाना। प्रकारान्तर से कहें तो इसमें बुद्धिजीवियो की सक्रिय या निष्क्रिय भागीदारी रही है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दौर वे रहे हैं जिसमें आतताइयों का सहयोगी बनने वाले, सृजन, चिंतन और न्याय को बाधित करने वाले स्वयं को इनकी रक्षा के लिए संघर्ष करने वाला सिद्ध करते और सचमुच ऐसा मानते हों कि वे सत्य और न्याय की रक्षा के लिए आतताइयों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में क्या कोई ऐसा निकष हो सकता है जिससे यह तय करने में मदद मिले कि सत्य और न्याय का पक्ष कौन सा है? अर्थात् क्या वे लोग जो बिना किसी भय या प्रलोभन के, अपने सर्वोत्तम विवेक से सत्य और न्याय के लिए संघर्षरत हैं, वे किन्हीं सिद्धांतों या मानकों के आधार पर आत्मनिरीक्षण करते हुए अपने को आश्वस्त कर सकते हैं कि वे किसी भ्रम के शिकार नहीं हैं, और यदि हैं तो वर्तमान स्थिति में उनका दायित्व क्या है?
इस मामले में झूठ के खिलाफ लड़ाई की जिन अपेक्षाओं का उल्लेख ब्रेख्त ने किया है उस पर दुबारा नजर डाली जा सकती है। “1. सच को कहने का साहस, 2. सच को पहचानने की क्षमता, 3. सच को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का कौशल, 4. उन लोगों की पहचान करना जिनके हाथ में सच का यह हथियार कारगर हो सकता है, और 5. व्यापक जनसमुदाय के बीच सच को फैलाने का हुनर।” हम आज की अपनी स्थिति में सच को पहचानने की क्षमता को सबसे ऊपर रखना चाहेंगे। ब्रेख्त किसी संगठन, दल, या विचारदृष्टि से जुड़ने या किन्हीं मान्यताओं को स्वीकारने की बात नहीं करते हैं, इसे एक चिंतक के रूप में स्वयं पहचानने की क्षमता की बात करते हैं। यदि आप ने इस अपेक्षा की पूर्ति नहीं की है, किसी विचारधारा, दल या संगठन की मान्यताओं को ‘सही’ मान कर अपना लिया है तो आप उस दल की अपनी जरूरत पूरी कर सकते हैं, पूरी ईमानदारी से यह विश्वास कर सकते हैं कि आप सत्य और न्याय के लिए, अपने निजी हितों का बलिदान करते हुए, संघर्ष कर रहे हैं, क्योंंकि उस दल या संगठन का जन्म ही इस ‘महान’ उद्देश्य के लिए हुआ था, जब कि सचाई यह है कि उस संगठन या दल द्वारा आपका, आपकी सहमति से, उपयोग किया जा रहा है। जिसे आप प्रतिबद्धता कहते हैं, वह अपनी वैचारिक स्वतंत्रता त्यागने, अपना बुद्धि-विवेक खोने का पर्याय है। जो स्वयं एक फरेब का शिकार है, वह झूठ के खिलाफ खड़ा ही नहीं हो सकता। उसमें झूठ और सच में फर्क करने की क्षमता ही नहीं; वह झूठ के साथ है और इस सचाई से अवगत नहीं।
जॉर्ज ऑरवेल के शब्दों को कुछ बदल कर रखें तो “यू आर पार्ट ऐंड प्रोमोटर ऑफ ए यूनिवर्सल डीसीट ऐंड ए मिनेस टु दि रिवॉल्यूशनरी ऐक्ट आफ टेलिंग द ट्रुथ।” ऑरवेल के 1984 का पहला खंड मोटे, काले अक्षरों में छपे निम्न वाक्यों से समाप्त होता है:
WAR IS PEACE
FREEDOM IS SLAVERY
IGNOREANCE IS STRENGTH
परन्तु मैं स्वयं ऑरवेल की अदायगी का कायल होते हुए भी उसकी उक्तियों को इस सावधानी के साथ ही ग्रहण कर पाता हूँ कि शीतयुद्ध मुहावरे का जनक यह कलाकार भी जिस पक्ष को सत्य और न्याय का पक्ष मान कर उसके समर्थन में खड़ा था वह पक्ष स्वयं भी इन्हीं फिकरों का मुहताज है। इतिहास के विशेष चरणों और समाज की अपनी आंतरिक प्रतिस्पर्धा और उपलब्ध विकल्पों के संदर्भ में सच और झूठ की पहचान स्वयं करनी होती है और इसकी क्षमता बहुत कम लोंगों में होती है।
और इस पहचान के बाद भी सच को कहने का साहस और भी कम लोगों में होता है। यह साहस केवल बाहरी भय और प्रलोभन से मुक्ति की ही माँग नहीं करता, अपने राग-द्वेष से मुक्त होने की भी माँग करता है, उन आवेगों से मुक्त होने की भी माँग करता है जो हमारे विवेक को कुंठित करते हैं। सही, संतुलित भाषा की भी माँग करता है क्योंकि इसका सीधा संबंध आप की विश्वसनीयता से है जिसके खत्म हो जाने के बाद आप लिख और बोल कर, संचार के साधनों पर जिस सीमा तक अधिकार है, प्रचारित और प्रसारित हो कर भी अनसुना और अनदेखा रह जाते हैं और इसी के विपरीत अनुपात में उन मान्यताओं, विश्वासों और विचारों की स्वीकार्यता बढ़ जाती है जिनका आप विरोध करते हैं।

सबसे जरूरी है इस अतिविश्वास से बचना जिसके शिकार हमारे रचनाकार और पत्रकार रहे हैं, कि उनके पास सूचना का भंडार है, अपने कथ्य को प्रभावशाली और मार्मिक ढंग से पेश करने का शिल्प है, और वे इसके बल पर जिस भी चीज को जो भी सिद्ध करना चाहें सिद्ध कर और अपने पाठकों के मन में उतार सकते हैं। इसके साथ जुड़ा है जनसाधारण की मूढ़ता में अकथित विश्वास। विद्वान और अनाड़ी बुद्धि के मामले में समान होते है, अंतर विद्या और कौशल के मामले में होता है जो कुछ को उपलब्ध होता है, शेष इनसे वंचित रह जाते हैं। इसलिए उन्हें कुछ समय में ही यह पता चल जाता है कि उन्हें मूर्ख बनाया जा रहा है, और इस बोध के साथ आपके ज्ञान और कौशल का जादू टूटना आरंभ हो जाता है। नासमझी आपकी और दोष आप जनता को देते हैं कि एकाएक वह सांप्रदायिक हो गई है। अंध राष्ट्रवादी हो गई है। फासिज्म के खिलाफ आप की लड़ाई में आप का साथ नहीं दे रही है। वास्तविकता यह है कि वह इस जंग में उतर चुकी होती है और वह आपको इनका मूर्तरूप मान कर आप से लड़ रही होती है।

Post – 2020-03-10

नया अंधायुग
दो
आनंद स्वरूप वर्मा ने अपनी पुस्तक के पहले अध्याय ‘आजादी और जवाबदेही’ मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में आई गिरावट के विविध रूपों रूपों और कारकों का निरूपण किया है जिनका दायरा इतना फैला हुआ है कि इन सभी को एकत्र समेटने पर समस्या सुलझने की जगह अधिक उलझ जाती है। परंतु एक लेखनजीवी पत्रकार पर पड़ने वाले दबाव (बौद्धिक दायित्व और आर्थिक स्वावलंबन) के चलते उन्होंने वदन्त-लेखन का जो तरीका अपनाया उसमें इस तरह की बारीकियों का ध्यान रख पाना संभव नहीं। जिस संकट से वह अपनी बात शुरू करते हैं वह यह कि “प्रिंट मीडिया अथवा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों ने देश की जनता को एक खास ढंग की राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने की जिम्मेदारी संभाल ली है और इस प्रक्रिया में उसके लिए हर व्यक्ति या संगठन देश का दुश्मन है जो सांप्रदायिक अंधराष्ट्रवाद, असहिष्णुता और राजनेताओं की गुंडागर्दी का प्रतिरोध करता है, जो अन्याय का विरोधी है और जो तर्कशीलता में यकीन करता है।” आगे बढ़ते ही यह हिंदुत्ववादी संकट का रूप ले लेता है जिसमें मुझे स्वयं भी उन लोगों के साथ खड़ा पाया जा सकता है जिनकी ऊपर भर्त्सना की गई है।

लेख के अंत में बर्टोल्ट ब्रेख्त द्वारा सुझाए गए झूठ के खिलाफ लड़ाई लड़ने के कुछ तरीकों का उल्लेख किया गया है “उनका कहना था पांच बातों को ध्यान में रखना चाहिए- 1. सच को कहने का साहस, 2. सच को पहचानने की क्षमता, 3. सच को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का कौशल, 4. उन लोगों की पहचान करना जिनके हाथ में सच का यह हथियार कारगर हो सकता है, और 5. व्यापक जनसमुदाय के बीच सच को फैलाने का हुनर।” इसी क्रम में कुछ आगे बढ़कर जॉर्ज ऑरवेल के इस कथन को उद्धृत करते हैं “इन ए टाइम ऑफ यूनिवर्सल डीसीट टेलिंग द ट्रुथ इज ए रिवॉल्यूशनरी ऐक्ट।”

हमारी सहमति इन सिद्धांतों तक ही सीमित है- इससे आगे बढ़ने पर समझ के रूप और लेखकीय कार्यभार सभी को लेकर अंतर इतना बढ़ जाता है कि यदि उनकी नजर में लगे कि मैं प्रतिक्रियावादी शक्तियों के साथ हूँ तो इस समझ से असहमति रखते हुए मैं उनको ऐसी राय बनाने के लिए दोष नहीं दे सकता। ठीक इसी तरह यदि मुझे लगे कि जिसे वह एक लेखक और विचारक का कार्यभार मानते हैं उसकी अपेक्षाएं क्या है इसकी समझ ही धुँधली है, जो उन्हें सत्य का पक्ष प्रतीत होता है उसकी बुनियाद ही झूठ और फरेब पर रखी गई है तो इसे समझने में उन्हें कठिनाई ही नहीं होगी, यह आरोप इतना अनर्गल प्रतीत होगा कि वह यह समझने तक के लिए तैयार नहीं होंगे कि इस मान्यता का आधार क्या है।

संकल्प एक है, उसके लिए समर्पण भाव भी एक है, और सच्चाई क्या है इसकी समझ इतनी अलग है कि सत्य के दोनों अनुसंधाता एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हो सकते हैं और वस्तुतः खड़े हैं।

यहां हम एक नई समस्या के सामने उपस्थित होते हैं। जिनको हम बौद्धिक मानते हैं वे सचमुच बौद्धिक हैं भी या नहीं। वे स्वयं सोचते हैं या किन्हीं ऐसे दावों को सुविधाजनक या प्रथम दृष्टि में सही समझ कर अपना लिया है, जो पड़ताल के बाद गलत सिद्ध हो सकते हैं। फिर इतिहास जो मानविकी की प्रयोगशाला है उसने उन्हें क्या सिद्ध किया है। जो लोग अपने को धर्मनिरपेक्ष मानते हैं वे धर्मनिरपेक्ष हैं या सांप्रदायिकता को दूर करने के बहाने उसका विस्तार कर रहे हैं?

Post – 2020-03-09

नया अंधकारयुग

हम एक खतरनाक युग में जीवित हैं। इसमें प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण करने वाले विज्ञान का उपयोग उन महान संभावनाओं के विपरीत करते हुए विज्ञान को ही उन परिणतियों के लिए अपराधी सिद्ध कर सकते हैं जैसे आगजनी करने वाले आगजनी के लिए आग के आविष्कार को दोषी सिद्ध करने लगें। आज सूचना और संचार के ऐसे पैने और छद्म साधनों का विकास हो चुका है जिसमें हम किसी व्यक्ति के इरादों, विचारों, और योजनाओं के बारे में इस सूचना तंत्र का आविष्कार, संचालन और नियंत्रण करने वाले, या इसकी गहरी समझ रखने वाले जान सकते हैं जिनमें से कुछ को हम स्वयं नहीं जानते या उतनी अच्छी तरह नहीं जानते और जो इनका प्रयोग उन व्यक्तियों के विरुद्ध कर सकते हैं।

हम इस तंत्र पर इसकी इस सीमा तक निर्भर कर चुके हैं कि यह जानते हुए भी कि इसका दुरुपयोग हमारे विरुद्ध किया जा सकता है हम इस पर अपनी निर्भरता को कम नहीं कर पाते, क्योंकि कम करने का अर्थ है पिछड़ जाना, व्यर्थ हो जाना। हम सब कुछ जानते हैं, परन्तु सूचना और संचार के स्रोताें पर नियंत्रण करने वालों की जरूरत के अनुसार पहले से ही रँगे और बदले जा चुके रूप में जानते और उसे ही सब कुछ मान बैठते हैं, जिनकी नीयत पर भरोसा नहीं किया जा सकता और जिनकी जरूरतें हमारी जरूरत के विपरीत हो सकती हैं, इसलिए उनके माध्यम से मिली जानकारी विषाक्त हो सकती है।

इनके अपने हितों और जरूरतों की प्रतिस्पर्धा के अनुसार विषाक्तता के विविध रूप हो सकते हैं जिनके बीच हमें किसी एक या किन्हीं को कम विषाक्त मान कर उनके माध्यम से जिन प्रतीतियों या सत्याभासों तक पहुँच सकते हैं और अपनी विवशता में उसे या उन्हें ही कम विषाक्त मान कर भिन्न दृष्टि या राय रखने वालों को गलत मान सकते हैं या इस भ्रामकता को समझते हुए इनके पीछे की सचाइयों को उजागर करते हुए स्वयं इनसे उबरने और दूसरों को भी इससे बाहर निकलने में सहायक हो सकते हैं। यही वह स्थिति है जिसमें बुद्धिजीवी की भूमिका की सही पहचान हो सकती है।

इस चर्चा को हम आनंद स्वरूप वर्मा की पुस्तक पत्रकारिता का अंधायुग में प्रकाशित तथ्यों से आरंभ करना चाहेंगे जिसकी कतिपय सीमाओं का बोध वर्मा जी को भी होगा, परंतु इसकी सार्थकता यह है कि भले इसमें हमारी आज की विभीषिका और इसकी उग्रता के सम्मुख हमारी सापेक्ष्य निरुपायता का चित्र स्पष्ट हो सके या नहीं, इसके इतिहास को तलाशने का प्रयत्न किया गया है। इसे हम कल के लिए स्थगित रखना चाहेंगे।

Post – 2020-03-06

सोलह
(जारी)

हमने यहूदी विरोध की जिस विस्तृत सर्वे रपट का हवाला दिया है उसके केवल एक पक्ष पर ध्यान केन्द्रित करना चाहूँगा। भारतीय चिंतन, और उसमें भी विशेषतः हिंदी क्षेत्र का चिंतन, इतना सतही हो चुका है, इसमें किसी समस्या को गहराई में समझने की आकांक्षा तक का अभाव दिखाई देता है और इसकी क्षतिपूर्ति, पक्षधरता की आड़ में, अपने पूर्वाग्रहों पर डटे रहने का खेल बन चुका है।

यदि किन्हीं भी परिघटनाओं की बारीकी से जांच नहीं की गई, समय रहते उनका उपचार नहीं किया गया, तो बहस में आप जीत सकते हैं, परंतु आपकी जीत आप का सर्वनाश भी कर सकती है। हमारी सामाजिक विसंगतियां पहले ही जटिल थीं। सुनने में महामानव-समुद्र, अच्छा लगता है, परंतु यह जिस डरावने यथार्थ की ओर इंगित करता है उसके प्रति असावधानी अपने विनाश को आमंत्रित करने जैसा है। पहले की जटिल समस्याएं हमारी लापरवाही के कारण अधिक जटिल होती गईं, आज व्याधि का रूप ले चुकी हैं, और विनाशकारी होती जा रही हैं।

यह हमारे अस्तित्व और हमारे भविष्य की समस्या है जिसके परिणाम सभी को भुगतने होंगे। किसी अन्य धर्म-समुदाय या धर्मेतर समुदाय से, वह जो कुछ मानता है, उसे लेकर मुझे कोई शिकायत नहीं है।

हमने जिस सर्वेक्षण की बात की है उसमें हेलेन फीन की निम्न पंक्तियों को मैं मूल में प्रस्तुत करना चाहता हूं:
Reports on antisemitism uses the definition of Helen Fein according to which antisemitism is “a persisting latent structure of hostile beliefs towards Jews as a collectivity manifested in individuals as attitudes, and in culture as myth, ideology, folklore and imagery, and in actions – social or legal discrimination, political mobilisation against the Jews, and collective or state violence – which results in and/or is designed to distance, displace, or destroy Jews as Jews.”(464).

जिस तथ्य की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं, वह यह है स्वतंत्र भारत में या कहें प्रेमचंद्र के बाद के हिंदी साहित्य में जहां भी गुंजाइश रही है, कविता, कहानी, रंगमंच, सिनेमा, विचार-विमर्श, समाचारकथा और टिप्पणियों में, आपसी व्यंग्य विनोद और तंज में हिंदू-मुस्लिम समस्या को खींचतान कर लाया जाता रहा है और बड़ी ‘सदाशयता’ से हिंदू को अपराधी सिद्ध करने का ही प्रयत्न नहीं किया जाता रहा है, अपितु एक गुंडे खान भाई (मुसलमान का इस भूमिका में नाम नहीं रह जाता खान भाई बन कर सांप्रदायिक प्रतिनिधि बन जाता है) हिंदू की उपेक्षा और अविश्वास के बाद भी उसका अनन्य हितैषी, उसकी आबरू का एकमात्र रक्षक बना रहता है और उसके उपकारों के नीचे दबा हिंदू इसके बाद भी उसके प्रति असहिष्णु बना रहता है। (फिल्मों का नाम याद नहीं पर प्राण और नाना पाटेकर की भूमिकाएं या’द आ रही हैंं)।

मैं यह बताना चाहता हूं यह हमारी वस्तुदृष्टि है जो उस कट्टर इस्लामी वस्तुदृष्टि का आभ्यन्तरीकरण है जिसका इजहार करते हुए मोहम्मद अली ने खिलाफत में गांधी का उपयोग करने के बाद कांग्रेस के मंच से कहा था, ‘गिरा से गिरा हुआ मुसलमान गांधी से अच्छा होता है। यह उनकी कृतघ्नता नहीं थी, यह वही इस्लामी सच था जिसके चलते मुहम्मद साहब के पितृतुल्य चचा अबूतालिब को मुसलमान न होने के चलते दोजख की आग में जलना ही था। यह कट्टर मुसलमानों (यद्यपि लिबरल कब तक लिबरल रहता है और कहाँ से कट्टरता हावी हो जाती है यह तय करना आसान नहीं होता), की धारणा हो तो हैरानी की बात नहीं है। इसे उदारचेता हिंदू सेकुलर समाज इतने सहज भाव से अपनी अंतश्चेतना, विचारदृष्टि और कलादृष्टि का अंग बनाकर काल्पनिक ‘यथार्थ’ को वास्तविक यथार्थ पर आरोपित करके ‘यथार्थवादी’ साहित्य रचता रहा और आशा करता रहा कि समाज उसके यथार्थवाद को स्वीकार कर लेगा। उसके सुझाए आदर्श के अनुसार अपने को बदल लेगा।

यह उसकी बौद्धिक पराकाष्ठा का सूचक है। हिंदी लेखन में ही यह इतना स्वीकार्य रहा, यह अलग विचार का विषय है।

हिंदी का पाठक साहित्यविमुख नहीं हुआ, हिंदी के तथामन्य सेकुलर साहित्यकारों और पत्रकारों ने इसे साहित्यविमुख होने को बाध्य कर दिया। हिन्दी प्रदेश के वैचारिक खोखलेपन की, इसे काउबेल्ट बनाने की जिम्मेदारी इन्हीं बुद्धिविक्रयी जनों की है जो इसे काउबेल्ट कहने में भी सबसे आगे रहते हैं।

Post – 2020-03-04

सोलह
(अधूरा)

समय के सामने मनुष्य का, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, इतना भी महत्व नहीं होता जितना किसी बच्चे के हाथ में आए खिलौने का। इस तथ्य का तोल्स्तोय ने युद्ध और शांति में जितनी मार्मिकता से प्रस्तुत किया है उसे सही सही रेखांकित करना भी हमसे संभव नहीं। उसके बाद इस पर बहस की गुंजाइश नहीं रह जाती। व्यक्तियों का उल्लेख इसलिए करना होता है कि किसी युग की प्रवृत्तियां कुछ व्यक्तियों में अधिक प्रखरता से व्यक्त होती हैं, पर यह भी संभव है कि वे उसमें नितांत एकांगी या विकृत रूप में व्यक्त हों, और इतर पक्षों का प्रतिनिधित्व करने वाली किसी संस्था के अभाव में हम उसे ही उसका समग्र समझ लें।

हम समझना चाहते हैं हिंदू (समाज) और हिंदुत्व (सांस्कृतिक प्रतीकों और मूल्यों) के प्रति नफरत की ऐसी भावना कैसे पैदा हो गई जो ईसाई जगत में व्याप्त यहूदीद्रोह से भी आगे बढ़ कर, हिंदू समाज को उनकी अपेक्षा अधिक संकटग्रस्त सिद्ध करती है। यहूदीद्रोह की भावना को इसकी तार्किक परिणति पर नाजियों ने पहुंचाया हो, परंतु यह भावना एक मिथ्या दुष्प्रार के कारण पूरे ईसाई जगत में व्याप्त थी जो हिटलर के महासंहार में घनीभूत हो गई। हिटलर को बदनाम करने वाले उसके बाद उस पुरानी मनोबद्धता से मुक्त हो सके होते तो हम यह मान सकते थे कि मनुष्य का विवेक उसके पूर्वाग्रहों पर भारी पड़ता है। परंतु हाल (2002-2003)[1] के अध्ययनों में पाया गया कि आज भी पूरे यूरोप में यहूदी विरोध जटिल रूप में विद्यमान है जो बातचीत में फिकरों, लेखों, टिप्पणियों और कलात्मक विधाओं में प्रकट होता रहता है।

जब हम हिन्दू समाज और हिंदुत्व को संकटग्रस्त कहते हैं ताे इसलिए कि आज की दुनिया में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार जाे दूसरे समुदाय हैं – यहूदी, यजीदी, कुर्द, अहमदिया, एक-दूसरे के लिए सुन्नी-शिया – इनमें कोई ऐसा नहीं दिखाई देता जिसका एक भी सदस्य ऐसा हो जो अपने ही समुदाय की मान्यताओं के विरोध में खड़ा दिखाई दे। ऐसे नमूने केवल हिंदू समाज में देखने को मिलते हैं। ऐसे सुपठित लोगों की संख्या काफी बड़ी है जो अपने को हिंदू माता पिता की संतान होने और खान-पान व्यवहार की सीमा तक हिंदू, अपनी धर्म दृष्टि में सेकुलर, विचार-दृष्टि में वामपंथी मानते हैं, परंतु जुमलों का कमाल यह है कि हिन्दू न रह जाने के बाद भी हिंदू मूल्याें – उतारता, समावेशिता, विविधताओं के सह अस्तित्व की परंपरागत भारतीय विशेषताओं की रक्षा की चिंता भी सबसे अधिक इन्हें ही है। वे मानते हैं कि इस महान मूल्य प्रणाली को सबसे अधिक खतरा हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर उभरने वाले इन हिंदू संगठनों से है। यदि इनकी चले तो ये भारत को पाकिस्तान बना कर रख देंगे। भारत नाम को भारत पर व्यवहारतः पाकिस्तान हो जाएगा।

बुद्धि की कमी के कारण एक ही नतीजे पर ले जाने वाले मुहावरों को इतने हुमच-हुमच कर बोलने वाले इतने सारे लोग को लगातार सुनते रहने से ऐसी आजिजी पैदा होती है कि सोचता हूँ उनकी बात मान ही लूँ कि तभी देखता हूँ जहाँ भी भारत और पाक के बीच चुनाव अपरिहार्य हो जाता है, वे पाक के साथ खड़े हो जाते हैं और मैं फिर उसी अनिश्चय में पहुँच जाता हूँ जहाँ से मेरी जिज्ञासा आरंभ हुई थी।

पिछले सात सालों से शिकायत का एक नया स्वर मुस्लिम समाज के सबसे प्रबुद्ध तबके – कलाकार, न्यायविद, उच्च पदों पर भारत का पूरी याेग्यता से प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकारी – सभी को जो पहले पूरी तरह सुरक्षित अनुभव करते आ रहे थे और अधिकाधिक सुरक्षित होते जा रहे थे, उभर कर सामने आने लगा। वे बिना किसी ठोस कारण या असुविधा के बैठे-ठाले असुरक्षित ही अनुभव नहीं करने लगे, अपितु इसका खुला इजहार करने लगे। वह अंतर क्या था। नजर तंग है, दूर तक जा नहीं पाती। जहाँ तक जाती है उसमें जो कुछ दिखाई देता है वह यह कि इससे पहले यह घोषित करने की नौबत आ गई थी कि इस देश की परिसंपत्तियों पर अल्पमत का अधिकार है। संभवतः यह उनकी सुरक्षा की गारंटी थी। बदलाव यह आया कि सबका सबकुछ है। सबका साथ सबका विकास। असुरक्षित क्या वे हैं जो दूसरों के विकास को अपने विकास में बाधक मानते हैं?
[1] Manifestations of Antisemitism in the EU 2002 – 2003 Based on information by the National Focal Points of the RAXEN Information Network, (Robert Purkiss Beate Winkler (Chair of the EUMC Management Board) (Director EUMC)

Post – 2020-03-03

मैं चाहता हूँ अनावश्यक हस्तक्षेप या टिप्पणियाँ न करें। यदि कोई त्रुटि दिखाई दे तो अवश्य इंगित करें। फिर भी संवाद करना जरूरी लगे तो गरिमा का ध्यान रखते मर्यादित भाषा नें संक्षिप्त टिप्पणी करें। मतभेद को नीयत से जोड़ना स्वयं अपने गिरे होने का इजहार है। पता लगाना चाहिए कि सच क्या है। संजय को अनुशासनहीनता के कारण दून स्कूल से निकाल दिया गया था इसलिए आगे पढ़ाई न चली। इसके बाद कार की यांत्रिकी सीखने गए। मुझे भी यह तलाश कर पता चला-। छोटी कार उस समय चर्चा में थी जिसे बनाने की अनुमति नहीं दी जा रही थी, इसी को लेकर लोहिया का तंज था। कयासबाजी से बचते हुए तमीज से अपना पक्ष रखा करें। जो व्यक्ति स्रोत भाषा और साहित्य से परिचित नहीं वह कोई नई खोज नहीं कर सकता। नेहरू ने किताबों के माध्यम से भारत के विषय में जाना और गुटनिपेक्ष जगत का नायक – नए युग का अशोक प्रियदर्शी – बनने के चक्कर में सामरिक तैयारी की उपेक्षा करके अपनी हवाबाजी का फल पाया।

Post – 2020-03-02

पन्द्रह (ग)

भारत की एक खोज गांधी ने भी की थी पर यह खोज न होकर भारत को अधिक गहराई से समझने का प्रयत्न था। इसके लिए उन्हें गोपालकृष्ण गोखले ने प्रेरित किया था। एक साल के इस भारत दर्शन ने, भारत की विपन्नता का जो साक्षात्कार कराया उसने उसने उनको किस तरह उद्वेलित किया था इसका अनुमान करना कठिन है, परन्तु बिहार के कुछ नेताओं ने आग्रह पर निलहे अंग्रेज जमींदारों के अत्याचार को अपनी आँखों देखने और कुछ करने का आग्रह किया तो चंपारन पहुँचने पर उनकी दृष्टि में जो परिवर्तन हुआ उसने उन्हें महात्मा बना दिया। मेरा काफी समय कल की पोस्ट पर प्रतिवाद में नष्ट हो गया इसलिए रुचिरा गुप्ता के कथन को जिसे मैं मोटे तौर पर सही पाता हूँ कट पेस्ट करके अपना काम आसान बनाना चाहूँगा, “गांधी जी जब चंपारण पहुंचे तब वो कठियावाड़ी पोशाक पहने हुए थे. इसमें ऊपर एक शर्ट, नीचे एक धोती, एक घड़ी, एक सफेद गमछा, चमड़े का जूता और एक टोपी थी …जब गांधी जी ने सुना कि नील फैक्ट्रियों के मालिक निम्न जाति के औरतों और मर्दों को जूते नहीं पहनने देते हैं तो उन्होंने तुरंत जूते पहनने बंद कर दिए…..8 नवंबर 1917 को गांधीजी ने सत्याग्रह का दूसरा चरण शुरू किया था. वो अपने साथ काम कर रहे कार्यकर्ताओं को लेकर चंपारण पहुंचें. इनमें से छह महिलाएं थीं. अवंतिका बाई, उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी, मनीबाई पारीख, आनंदीबाई, श्रीयुत दिवाकर (वीमेंस यूनिवर्सिटी ऑफ़ पूना की रजिस्ट्रार) का नाम इन महिलाओं में शामिल था. इन लोगों ने तीन स्कूल यहां शुरू किए. हिंदी और उर्दू में उन्हें लड़कियों और औरतों की पढ़ाई शुरू हुई. इसके साथ-साथ खेती और बुनाई का काम भी उन्हें सिखाया गया. लोगों को कुंओं और नालियों को साफ-सुथरा रखने के लिए प्रशिक्षित किया गया. गांव की सड़कों को भी सबने मिलकर साफ किया.”
हम उस इतिहास में न जाएँगे कि उनके इस प्रयोग का क्या हुआ, वे अपनी संस्थाओं को कितने समय तक चला सके। पर यह एक ऐसा मोड़ है जहाँ से अपने औसत हिस्से में आने वाले वस्त्र पर गुजर करने वाले, पाशविक अवस्था में पड़े भारतीय बनाना, उसमें शुचिता, आरोग्य, साक्षरता, आत्मावलंबन और मुक्ति गांधी का सपना था, सत्ता पर कब्जा करना दूसरों का। आजाद शब्द का प्रयोग गांधी ने शायद ही कभी किया हो, परंतु आजादी की कल्पना – दोहिक, दैविक और भौतिक दुखों, पारस्परिक कलह से मुक्त भारतीय समाज को शासनाधिकार मिले यही उनकी नजर मे भारत की स्वतंत्रता थी। यह अन्त्योदय से आरंभ होती थी। इसकी समझ किसी अन्य के पास न थीं। यही गाँधी, नेहरू तथा कम्युनिस्टों उनका अंतर था।

Post – 2020-03-01

पन्द्रह(क)

नेहरू जी जेल की बोरियत कम करने के लिए किताबों में भारत की खोज कर रहे थे। किताबों में देश और समाज नहीं मिलता, उनके विषय में कुछ सूचनाएँ मिलती हैं जो सही हों यह जरूरी नहीं। औपनिवेशिक जरूरतों के चलते भारत के इतिहास का जातक ही बिगाड़ दिया गया था और इतिहास के नाम पर किसी दूसरे स्रोत का उन्हें ज्ञान न था, यदि होता तो उस पर उन्हें भरोसा नहीं हो सकता था।

विलायती शिक्षा-प्राप्त व्यक्ति उस नकली इतिहास को सच मानता था जिसमें भारत का सब कुछ – लोग, भाषा, सभ्यता के औजार सभी पाँच हजार साल के भीतर ही बाहर से आया था। भारतीय समाज उतने ही नकली पुराण को अपना सच मानता था, जिसमें सृष्टि के आदि से भारतीय मनुष्य अपने समस्त सांस्कृतिक दाय के साथ इसी में बसा हुआ है और यहीं से पूरी दुनिया में फैला है।

भारत की खोज भारत का भौगोलिक सर्वेक्षण नहीं हो सकता था। यह भारतीय समाज के मानस की ही खोज हो सकती थी जिससे रागात्मक तादात्म्य स्थापित करने के बाद उसकी शक्तियों और सीमाओं की सही समझ रखते हुए उसकी ऊर्जा को एकदिश करते हुए किसी लक्ष्य की प्राप्ति में उसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जा सकता था।

उन्होंने जिस भारत को खोजा वह पश्चिमी जगत द्वारा खोजे और गढ़े हुए का परिचय मात्र था जिससे वह भारत को नहीं समझ सकते थे; भारत को विलायती भारतविद क्या समझता है, इसे अवश्य जान सकते थे और यही समझ पाए। वह न भारत को खोज सके, न भारत को पा सके और इसलिए इसके बाद के स्वतंत्रता आंदोलन में न तो इतिहास की उनकी समझ का उपयोग दिखाई देता है, भारतीयों के साथ बाद के उनके व्यवहार में इसी का आभास मिलता है। वह आजीवन भारतीयों के साथ अंग्रेज हाकिमों की तरह पेश आते रहे और जिस सतह पर थे उससे नीचे झाँकने की जगह ऊपर उड़ान भरने की सोचते रहे। इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है।

कांग्रेसियों के बीच उन्हें समाजवादी तो लगभग सभी मानते थे, परन्तु हैरानी की बात है कि बिहार में जमीदारी उन्मूलन का प्रस्ताव रखने पर उन्होंने झिड़कते हुए बेनीपुरी जी को चुप करा दिया था। चौधरी चरण सिंह की दृढ़ता थी जिससे उत्तर प्रदेश में जमींदारी ‘उन्मूलन’ संभव हुआ।

वर्णवाद को कमजोर करने के लिए चरण ने यह सुझाव रखा था कि यदि कोई सवर्ण अस्पृश्य वर्ण से विवाह संबंध बनाए तो उसे सरकारी नौकरियों में विशेष रियायत दी जानी चाहिए। चरण सिंह के लिए यह खोखला सुझाव न था, उन्होंने इस पर अमल किया था, परंतु नेहरूजी ने बिहार के जमींदारी उन्मूलन की तरह इसे भी झिड़क कर किनारे कर दिया था कि प्रेम और विवाह जैसे संवेदनशील संबंध को इतना यांत्रिक नहीं बनाया जा सकता। आदर्श सही है, यथार्थ इस पर भारी पड़ता था, क्योंकि विवाह संबंध में जाति, वर्ण, गोत्र के साथ दहेज अधिक निर्णायक हुआ करता था। भाषावार राज्यों का गठन हो गया, पर नेहरू जी के जीवन काल में किसी भी राज्य में उसकी भाषा में काम करने की छूट न दी गई कि इस दशा में केन्द्रीय भाषा के रूप में हिंदी को आने से नहीं रोका जा सकेगा।

वह अपने धेवते को वह उद्योगपति बनाना चाहते थे और छोटी कार के उत्पादन की योजना को उसके इंजीनियर बन कर लौटने तक लटकाते जा रहे थे जिसका लोहिया ने इशारा करते हुए उपहास भी किया था। लोहिया जी इस पर भी तंज कसने के बाज न आते थे, परंतु अपने लक्ष्य की ओर उनकी प्रत्येक चाल शतरंज की गोटों जैसी दूर की सोच से निर्देशित होती थी। वंशाधिकार में विजय लक्ष्मी सशक्त प्रतिस्पर्धी न बन सकें इसलिए उन्हे लगातार राजदूत बना कर रखा।

नेहरू के पूरे जीवन को देखें ता यह चित्रवत सामने आ जाएगा कि वह त्यागने और गँवाने की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे और इसका ध्यान रखते हुए ही हम इस नतीजे पर पहुँचे थे कि स्वतंत्रता आंदोलन में पूरे परिवार की प्रतीकात्मक भागीदारी शासनाधिकार की योजना के साथ किया गया ‘विनिवेश’ था जिसकी सचाई उसकी चकाचौंध में लक्ष्य नहीं की जा सकती थी। इतिहास का व्यंग्य कि उनकी योजना ठीक उनकी चाहत के अनुसार घटित नहीं हुई परन्तु यह बात किसी से छिपी न थी कि वह अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसे तैयार कर रहे थे।