Post – 2020-04-06

#शब्द-वेध(2)
बोली वचनं प्रमाणम्

मुझे पता है मैं जिस विषय पर लिख रहा हूं उसकी जानकारी रखने वाले जिन पुस्तकों को पढ़कर ज्ञानी बनते हैं, उन पर मैं भरोसा नहीं करता, परंतु उनकी सहायता लेता हूं। मैं भाषा की जिन समस्याओं को हल करना चाहता हूं, उनके विषय में जो जानकारी किताबों में उपलब्ध है वह सतही है। वह ज्ञान आरंभ से गलत इरादों से, गलत मान्यताओं से, अलग तरीके अपनाकर, उन तरीकों को वैध बनाने के लिए ज्ञान, भाषा विज्ञान और कोश-निर्माण के जो भी काम हुए, वे उल्टे हुए, यह बात उन विद्वानों को भी पता थी, जो उन गलतियों पर पर्दा डालने के लिए, विज्ञान के नाम पर, सिद्धांत गढ़ रहे थे और रही सही कमी संस्कृत-धातुओं से प्रेरित हो कर भारोपीय आद्य-रूपों की कल्पना करते हुए कोश निर्माण कर रहे थे और उनको प्रमाण मानकर नई बेवकूफियां कर रहे थे। इसलिए विद्वानों से मेरा विरोध मुझे आश्वस्त करता है कि जिसे वे गलत मानते थे परंतु गलत सिद्ध करने का साहस नहीं जुटा पाते थे, उसे गलत सिद्ध करने का तरीका क्या हो सकता है इसकी ओर हमने ध्यान दिया है। हमारे लिए विद्वानों और कोशग्रंथों का कार्यसाधक उपयोग तो है पर निर्णायक महत्त्व नहीं है। उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि जिन आँकड़ों का संकलन हमारे बस की बात नहीं, वे, वहां, उनके अथक श्रम के कारण, हमें एकत्र मिल जाते हैं।

सोचने का उनका तरीका वैज्ञानिक नहीं था, इसे गलत सिरे से तुलनात्मक भाषाविज्ञान का अध्ययन करने वालों ने आरंभ से अंत तक स्वीकार किया। विलियम जोंस ने इस तर्क का सहारा लेते हुए कि संस्कृत भारत के किसी क्षेत्र की भाषा नहीं है, इसे केवल ब्राह्मण बोलते हैं, इसलिए ब्राह्मण अपनी भाषा लिए दिए किसी ऐसे क्षेत्र से आए हो सकते हैं जहाँ यह भाषा बोली जाती थी। इस क्षेत्र का निर्धारण उन्होंने बोली के आधार पर नहीं केन्द्रीयता के आधार पर किया। वहाँ वह बोली तो मिली नहीं, जो भाषा मिली उसका संस्कृत से वही संबंध था जो भारत की प्राकृतों का। सार रूप में वह मानते रहे कि इतनी उन्नत भाषा का आरंभ किसी बोली से होना चाहिए, उसी का क्रमिक विकास एक शिष्ट (शिक्षितों की) भाषा में हो सकता है और अपनी इस तलाश में वह नोआ की संतानों की भाषा पर पहुँच कर हाथ खड़े कर दिए कि यहाँ वह बोली मिल ही न सकी।

कुछ दूसरे उस बोली की तलाश यूरोप में करने के लिए प्रयत्नशील भी रहे, इलीरियन (पश्चिमी फ्रीजियन) से इतालवी की कुछ समानताएँ भी लक्ष्य कीं, इसे चलाने का प्रयत्न भी किया पर यह लंगड़ा सिद्ध हुआ और वे इस नतीजे पर पहुँचे कि रोामन्स भाषाओं की जननी तो वह निश्चित रूप से है पर भारोपीय की जननी इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता, इसलिए अपनी पुरानी जिद पर कायम रहते हुए मूल बोली के क्षेत्र को अज्ञात मान कर लघु एशिया से हित्ती के(हत्तूसा, बोगाजकुई से प्राप्त) पुरातात्विक अभिलेखों में वैदिक समाज, भाषा और विश्वास की निकटता को लक्ष्य करके इसे वैदिक से भी पुरानी सिद्ध करने को तत्पर रहे। हमें उनके नस्लवादी पाठ पर बहस नहीं करनी, याद इस बात की दिलानी है कि वहाँ भी वैदिक साहित्य वैदिक भाषा से पीछे नहीं जा सके, बोली तक नहीं पहुंच सके, क्योंकि वह बोली भारत से बाहर कहीं थी नहीं और भारत में उसकी खोज करने के लिए तैयार नहीं थे।

इसलिए जहाँ हमें पंडितों द्वारा तैयार किए गए सिद्धांत, विज्ञान, और कोश ग्रंथों पर पूरा भरोसा नहीं है, वहीं जो व्याख्यायें हम देते हैं, वे तर्कसंगति और हेतुवाद पर आधारित है, पर अनेक स्थितियों में एक ही नाद कई स्रोतों से उत्पन्न हो सकता है और उसका अनुनाद उन उन स्रोतों, क्रियाओं, गुणों और उस नाद की आवृत्ति (क्रिया विशेषण) के लिए हो सकती है। ऐसी स्थिति में विचार प्रवाह में इनमें विभेद करने में अपनी सतर्कता के बाद भी हमसे चूक हो सकती है, परन्तु अब समस्या शास्त्रीय न रह कर मोटी समझ की, बोलचाल के प्रयोगों की हो जाती है, इसलिए इसमें अधिकारी बदल जाते हैं। भाषा वैज्ञानिक अवैज्ञानिक सिद्ध होते हैं, तो कम पढ़े-लिखे लोग, अशिक्षित लोग और उनमें भी महिलाएं अधिक भरोसे के हो जाते हैं। कहें, अल्पशिक्षित या अशिक्षित व्यक्ति सिखाए हुए ज्ञान के तुलनात्मक अभाव में बोली के अविकृत रूप और व्यंजना से अधिक परिचित होता है। कुछ प्राचीन प्रयोग जो उसी समाज के उसी स्तर के पुरुषों की बोली से उठ चुके हैं वे महिलाओं की बोली में, लोकगीतों और संस्कार गीतों में, मुहावरों/लोकोक्तियों में, लोरियों और क्रीड़ा में बने रहते हैं। इसलिए किताबी भाषाविज्ञानी जहाँ इस संवाद में कोई योगदान नहीं कर सकते, वहाँ बोलियों की समझ रखने वाले अधिक उपयोगी हो जाते हैं। वे ऐसे समीकरणों पर जिनका अधिक स्वाभाविक वैकल्पिक रूप उनकी जानकारी में हो, सुझाव दे कर या यह जता कर ही कि यहाँ अधिक खींचतान से काम लिया गया है, या यह गले नहीं उतरता, उस पर पुनर्विचार में सहायक हो सकते हैं। परन्तु संस्कृत के आचार्यों द्वारा तैयार किए गए धातुपाठ की याद दिलाना हमारे काम का नहीं, यद्यपि पहुँचते हम भी धातुरूपों – वे मूल नाद जिनमें भाषा के विविध पदों का बीजरूप उपलब्ध हो- पर ही हैं।

संस्कृत से बचते हुए चलना इसलिए भी जरूरी है कि पाश्चात्य भटकाव संस्कृत को ही प्रमाण मानने के कारण आरंभ हुए, जिनसे बाहर निकलने का रास्ता भाषाशास्त्री आज तक नहीं तलाश सके। वह बोली जिसका क्रमिक विकास संस्कृत में हुआ, वह अन्यत्र न पाई जा सकती है न खींचतान कर गढ़ी जा सकती है। जो दबंगई संस्कृत भाषा के विषय में दिखाते हुए यूरोपीय वर्चस्व की स्थापना की गई वह उस बोली के साथ, उसे बोलने वालों के साथ नहीं की जा सकती थी।

Post – 2020-04-05

केरल सरकार के लिए सचमुच गर्व की बात है कि कोरोना से सबसे पहले संक्रमित होने, आबादी के अनुपात में संक्रमण के सबसे अधिक मामले होने पर भी मृत्यु दर सबसे कम है। दूसरों को, विशेषतः दिल्ली को जिसमें हर बात उल्टी है मानवीय सरोकार का पाठ उससे सीखना चाहिए।

Post – 2020-04-04

शब्द-वेध

मेरे सामने भाषा पर विचार की दो चुनौतियाँ हैं। एक भाषा की मूल बोली के संस्कृत (भारोपीय) तक की विकास रेखा की पड़ताल है और दूसरी जो इस पर प्रकाश डालने में भी सहायक है, भाषा की, या कम से कम उस भाषा की उत्पत्ति की समस्या, जिससे तथाकथित भारोपीय के बहुनिष्ठ या सर्वनिष्ठ शब्दों की उत्पत्ति का भौगोलिक और भाषाई परिवेश समझ में आता है। पिछले 50 वर्षों के ऊहापोह के बाद दोनों के विषय में मेरे स्पष्ट विचार हैं। भाषा की उत्पत्ति नैसर्गिक ध्वनियों की नकल से हुई, और वह बोली जिसका विकास भारोपीय भाषाओं में हुआ उसका आदिम रूप भोजपुरी क्षेत्र में प्रचलित था। प्रश्न समस्या को सुलझाने का नहीं है। यह काम मैं पहले इसी पन्ने पर कर चुका हूं। चुनौती साक्ष्यों की यथेष्टता का और उनके औचित्य का है ।

[शब्द]
सबसे पहले हम शब्द को ही लें। यदि यह शब्द आद्य भोजपुरी (आद्य भारोपीय) में विद्यमान था तो उसमें दंत्य ध्वनि तो थी, तालव्य का विकास कुछ बाद में हुआ, यह यूरोपीय नजर से समस्या को देखने वालों का विचार है। इसमें आधी सचाई है और आधा फरेब। सचाई यह कि मूल बोली में तालव्य ध्वनि नहीं थी, फरेब यह कि उच्चारण स्थान बदलने से दन्त्य का विकास तालव्य में हुआ।

यह गलती भाषा विज्ञान में नस्लवादी सोच के प्रभाव का परिणाम है जिसमें नस्ल की शुद्धता के लिए किसी दूसरे समुदाय से मेलजोल की संभावना न थी। नस्लवादी सोच हमारे देश में भी रही है, अन्यथा वर्णसंकरता की भर्त्सना न की जाती। पर हमारा सामाजिक यथार्थ इसका खंडन करता है। उसमें अपने गोत्र में विवाह संबंध को वर्जित माना जाता है, यहां तक कि अनुलोम विवाह की अनुमति रही है।

वर्णसंकरता की अवधारणा मातृप्रधान समाज के पुरुषप्रधान समाज में बदलने का परिणाम है और यही विलोम विवाह के निषेध का भी कारण है। हम इसके इतिहास में नहीं जाएगे। यह उल्लेख केवल यह बताने के लिए कि हमारी भाषा से लेकर समाज रचना तक से सामाजिक अंतर्मिलन की पुष्टि होती है और इसलिए हम इस विषय में अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपना सकते हैं कि जिस समुदाय ने आद्य भारोपीय बोली जाती थी उसमें तालव्य ‘श’ नहीं था, केवल दंत्य ‘स’ था। ऐसी दशा में मूल शब्द में ‘श’ नहीं ‘स’ रहा होगा।

भोजपुरी की एक अन्य विशेषता स्वर प्रधानता की है इसलिए इसमें एक ही ध्वनि का द्वित्त तो हो सकता है, परंतु असवर्ण-संयोग इसकी प्रकृति के अनुरूप नहीं है। इस सीमा के कारण मूल उच्चारण सबद रहा होगा ऐसा लग सकता है परन्तु हमें सही मूल उच्चारण के लिए उस मूल ध्वनि को समझना होगा जिससे इसका जन्म हुआ।

यह ध्वनि पैदा कैसे हुई? वह आशय इससे कैसे जुड़ा जिसमें इसका प्रयोग होता है? ‘शब्द’ का अर्थ क्या है? जिस मूल ध्वनि से यह शब्द बना उसका क्या दूसरे किसी आशय में भी प्रयोग हुआ हो सकता है? उनकी व्याप्ति कहां तक है? ऐसे अनेक प्रश्न है जिनका उत्तर दिए बिना हम अपनी मूल स्थापना का औचित्य सिद्ध नहीं कर सकते।

मूल ध्वनि होठों के झटके के साथ अलग होने से अर्थात होठ चलाने से उत्पन्न ध्वनि ‘सप्’ है। इसका प्रयोग उन सभी क्रियाओं और कार्यों और विशेषताओं के लिए हो सकता था, जिनमें ओठ का चलना अनिवार्य है। यहां हम पाते हैं कि मूल रूप सपद होना चाहिए, जिसमें ‘द’ प्रत्य’य है।

इस प्रत्यय के निकटवर्ती ध्वनि के प्रभाव से ‘त’, ‘द’ और ‘थ’ तीन रूप हो जाते हैं। इस नियम से सपद का भी पूर्वरूप ‘सपत’ होना चाहिए। यह तकार सप् के शप् हो जाने के बाद ही बना रहा, और इसे हम शप् और शाप (शपति/ शपते) में पाते हैं।

इससे रोचक है अघोष ध्वनियों का सानिध्य, जो शप-थ में देखने में आता है। जिसे संस्कृत के विद्वान वर्ण-साम्य (सावर्ण्य) कहते हैं, वह अघोष का अघोष और सघोष का सघोष से साम्य हुआ। सप के शप बनने तक कोई समस्या नहीं, पर प के घोष ‘ब’ होने पर ‘त’ भी वर्णसाम्य के नियम के घोष ‘ब’ हो जाता है। बाँगड़ू प्रभाव से ‘ब’ का स्वर लोप हो जाता है और इस तरह मूल ‘सपत’ संस्कृत का शब्द बनता है।

हम जिस नतीजे पर पहुँचते हैं वह यह कि (1) सबद शब्द का अपभंश नहीं, शब्द सपत का संस्करण है।
2. सबद संस्कृत शब्द के प्रभाव में सपत का नवीकरण हो सकता है, परंतु अर्थभेद के लिए आदिम बोली में सबद रूप अस्तित्व में आ चुका था।
3. सामान्य कथन के अतिरिक्त क्रोध या भर्त्सना और निश्चयात्मक कथन सपत/साप > शपते/शाप और ‘शपथ’ की व्युत्पत्ति भी इसी मूल से है।

परंतु ओठ की सक्रियता केवल बोलने के ही जुड़ी नहीं है। खाते पीते समय भी होठ से ध्वनि निकलती है और भो- सपोड़ना, त. साप्पाडु, अं. सपर/ सूप, और सं. सूप और सूपकार का मूल (धातु रूप) सप् ही हुआ।

Post – 2020-04-03

परिशिष्ट
आप किसके साथ खड़े हैं

इसका उत्तर कई तरह से मिल सकता है। यदि राजनीतिक लगाव रखते हैं तो आप किसी दल का नाम ले सकते हैं। यदि सामाजिक चिंता अधिक गहरी है तो आप कह सकते हैं हम सामाजिक अन्याय का उन्मूलन करने वालों के साथ हैं। आर्थिक विपन्नता से ग्रस्त हैं और सामाजिक स्थिति ऐसी है जिसमें आपको सामाजिक ‘विषमता के निवारण’ के नाम पर जो रियायतें मिलती हैं ,उनमें से भी कोई नहीं मिलतींं, तो आप संपन्न या इस व्यवस्था का का लाभ उठाकर मालामाल हो चुके लोगों की दी जाने वाली रियायतों की ओर उँगली उठाते हुए इसे ही अन्याय और अवसर की असमानता सिद्ध करते हुए इसके विरोध में खड़े हो सकते हैं। कुछ ऐसे लोग जो रोशनी में आपके विरोध में खड़े दिखाई दे सकते हैं धुँधलके में आपके साथ खड़े हो सकते हैं। कई बार तो आप अपने विरुद्ध, अपनी आदत और बीमारी के साथ, अपने देश और समाज के विरुद्ध और उन विदेशी ताकतों के साथ खड़े हो सकते हैं जो समाजवाद की घुट्टी पिला कर आपको अपने ही देश के खिलाफ अपने साम्राज्यवादी योजनाओं के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। आप किसी ऐसे चारे के रूप में पेश किए गए लुभावने खयाल के साथ खड़े दिखाई दे सकते हैं, जैसे आपको हैवान बना कर इनाम में झूठे स्वर्ग का भरोसा देने वाले पुराने मजहब, या धरती पर स्वर्ग उतारने का सपना दिखाने वाले और अपने व्यवहार में पूरी तरह विफल यहां तक कि त्रासदी के नए रूप सिद्ध होने वाले नए मजहब जो कहने को मजहब का विरोध करते हैं पर मजहबियों द्वारा भी इस्तेमाल कर लिए जाते हैं, जैसे भारतीय कम्युनिज्म या सेकुलरिज्म।

आप जहां भी खड़े हैं या खड़े होने की आदत डाल चुके हैं वह आपकी नजर में पूरी धरती पर सबसे सही मुकाम है और आप सबसे सही आदमी। पर आप अपनी समझ से सत्य के साथ खड़े हो सकते हैं और असत्य और पाखंड का समर्थन कर सकते हैं, और इस कड़वी सचाई से अनजान भी रह सकते हैं।

जिस मान्यता से आप वर्षों से जुड़े रहे हैं, या कहें जिसमें आपने अपने जीवन के इतने वर्षों की लागत लगाई हो, उसके विरुद्ध यदि ऐसे तर्क और प्रमाण मिलें, जो उसे गलत सिद्ध कर सकें, या जिन से उसके गलत सिद्ध होने का अंदेशा हो, तो उसे जानना ही नहीं चाहेंगे; जान गये तो मानने को तैयार नहीं होंगे।

जो भी हो, जब भी आप किसी के साथ खड़े होते हैं तो किसी के विरोध में खड़े होते हैं, विरोध में खड़े होते हैं तो जाने अनजाने किसी के साथ खड़े होते हैं। जब आप हिंदुत्व के विरुद्ध खड़े होते हैं तो आप मानवता के उन शत्रुओं के साथ खड़े होते हैं जिनमें से एक का सही खाका रसेल ने प्रस्तुत किया था। दूसरे का सही रूप उससे भी अधिक बीभत्स है इसे अब तक न जानते रहे हो तो मरकज और तबलीग की योजनाओं और कारनामों से जान चुके होंगे। इसके बाद भी, आदतन, हिंदुओं में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं मिलेगी जो आज भी बिना यह जाने कि हिंदुत्व क्या है, हिंदुत्व को कोसने और उनका बचाव करने के लिए खड़े हो जाएंगे। मुसलमानों में तो इसलिए भी खड़े हो जाएंगे कि उनकी असुरक्षा की भावना इन कारनामों के सामने आने से बढ़ जाएगी और वे इशारों में बताएंगे कि हिंदुत्ववादी उनका सामुदायिक चरित्र हनन कर रहे हैं। परन्तु यह नहीं बताएँगे कि इन गतिविधियों की जानकारी उन्हें पहले से थी, और इस पर चुप्पी लगाए रहे- कभी लिख कर या बोल कर या किसी कला-माध्यम से विरोध करने की जगह, उस समय भी चुप रहे जब बात बेबात काल्पनिक स्थितियाँ पैदा करके हिंदुत्व पर हल्ला बोल प्रदर्शन करते रहे। यदि उन्हें तबलीग का मौन समर्थक कहने वाले पैदा हो जाएँ तो उन्हें गलत सिद्ध करने का सही तर्क मेरे तलाशे भी न मिलेगा।

हिंदुत्व का नाम आते ही सारा ज्ञान, सारा पांडित्य, सारा तर्क कौशल हवा हो जाता है। पिछले 70 सालों में लगातार एक ही झूठ को बार-बार दोहराते हुए सामुदायिक सौहार्द के नाम पर इस घृणा का पोषण नाजी प्रचार तंत्र का इस्तेमाल करते हुए किया गया, और इसे फोबिया मिश्रित आतंक और घृणा का ऐसा जमा पहनाया गया कि अपने को उदार और मानवीय सिद्ध करने की कोशिश में हमारे समाज के महत्वाकांक्षी बुद्धिजीवी मानव द्रोही मजहबों के सेवादार बन कर इसे मिटाने के लिए प्रयत्न करते रहे।

मैंने अपना समापन लेख समग्र साक्ष्यों के साथ बहुत स्पष्ट रूप में यह बताते हुए कि हम हिंदुत्व का प्रयोग सनातन धर्म के लिए कर रहे हैं और सनातन धर्म मानवीय मूल्यों, बल्कि सत्ता के अविभाज्य नियमों का संकलन है, और मनुष्यता को यदि जीवित रहना है तो इसका पालन भी करना होगा। हिंदू समाज में हिंदुत्व विमुख लोग हैं, हिंदुत्व वंचित लोग भी हो सकते हैं, परंतु वह नहीं हैं, जो किसी भी जाति के हों, अपितु केवल वे जिनका व्यवहार मानवता की अपेक्षाओं के अनुरूप न हो । वे ब्राह्मण भी हो सकते हैं, और नहीं भी। दूसरे देश और काल के ऐसे लोग भी हिंदू की परिभाषा में आते हैं जो मानवीय मूल्यों का सम्मान करते हैं उनसे विचलित होने पर ग्लानि अनुभव करते रहे, और आज भी जिन्होंने दूसरों की अपेक्षा इन मूल्यों को बचा कर रखा है। मैंने यह कहीं दावा नहीं किया कि हिंदू समाज निर्दोष है, या हिंदू समाज का आचरण हिंदुत्व को परिभाषित करता है।

स्वयं हिंदू को और अपने को मानवीय सरोकारों से जुड़ा अनुभव करने वालों को हिंदुत्व के अनुरूप अपने को ढालना होगा। ऐसे कुछ लोगों की समझ में जिनकी बुद्धि पर मुझ को संदेह नहीं है, यह बात समझ में नहीं आई, परंतु उनका आभार है कि उन्होंने अपना पक्ष स्पष्ट रूप में रखा और मुझे यह समझने का अवसर मिला कुछ लोग दूसरे सरोकारों से जुड़े होने के कारण हिंदुत्व को उसका विरोधी मान बैठे हैं, और हिंदुत्व को ब्राह्मणवाद का पर्याय मानते हैं क्योंकि इसे इसी रूप में प्रचारित किया गया है। हिंदुत्व की भर्त्सना करने वाले दूसरे लोगों ने उस लेख को पढ़ा नहीं होगा, या पढ़ते हुए घबराकर छोड़ दिया होगा, परंतु उनकी धारणा में कोई परिवर्तन हुआ होगा इसकी आशा मैं नहीं करता।

फोबिया से ग्रस्त व्यक्ति का दिमाग काम नहीं करता, सिर्फ डर काम करता है, और उसके दबाव में आने के बाद उन्हें स्वयं इसका बोध होता है जिसके लिए उन्हें बहाने तलाशने पड़ते हैं। कहने को वे कहेंगे वे दक्षिणपंथी राजनीति के विरुद्ध है, हिंदू समाज के नहीं। हम यह पहले बताए हैं कि वे सबसे पहले हिंदू समाज से नफरत करते हैं और तब से नफरत करते हैं जब हिंदू संगठनों का कोई नाम तक नहीं जानता था, और आज तक हैं परंतु इससे अनजान हैं। इसे बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं हिंदू समाज के संकट पर हमेशा उन्होंने नकारात्मक रुख अपनाया है और आज भी अपना रहे हैं।

आतताइयों की रक्षा के लिए उन्होंने आतंकवादी गतिविधियों में शरीक, पुलिस की पकड़ में आ चुके अपराधियों को क्षमा दान देते हुए उनका अपराध धार्मिक झुकाव रखने वाले हिंदुओं पर लादते हुए, मीडिया का इस्तेमाल करते हुए, फाइलों को दबाते और नष्ट करते हुए, अदालतों में अपने दिए बयानों को उलटते हुए एक काल्पनिक हिंदू आतंकवाद की सृष्टि करने का प्रयत्न किया और यदि आर वी एस मणि की पुस्तक दि मिथ ऑफ हिंदू टेरर से, जिसमें उनको भी धार्मिक रुझान रखने के कारण गृह मंत्रालय में एक जिम्मेदार पद पर होते हुए अपहरण करने और फँसाने का प्रयत्न किया गया जो उनके सौभाग्य से विफल रहा और उन्होंने तत्काल इसकी रपट थाने में लिखवा दी और इसके बाद उनको इसलिए प्रताड़ित किया जाता रहा किसी तरह वह अपना बयान बदल दें, इसमें विफल होने वाले इंस्पेक्टरों की उन्नति रुक गई, कुछ को विफलता के लिए सजा मिली क्योंकि तत्कालीन गृहमंत्री पसीने छूट रहे थे।

इसमें यह सिद्ध करने के लिए कि 26/11 के मुंबई कांड में भी अपराधियों को बचाते हुए, पाकिस्तानी सरकार की पाकिस्तानी मिली भगत पर पर्दा डालते हुए, हिंदू आतंकवाद सिद्ध करने के लगातार प्रयत्न किए जाते रहे, कसाब तक को हिंदू पहचान देने के प्रयत्न किए जाते रहे, तिथि, फाइल, नोट, बदले हुए नोट, अदालती साक्ष्यों और बयानों, पार्लमेंट की बहसों, और दूसरे दस्तावेजों के इतने पुष्ट प्रमाण हैं कि उनसे गुजरने के बाद स्वयं मैं आश्वस्त हो पाया कि सोनिया समर्थित कांग्रेस और अन्तरात्मा का सौदा करके पद और लूट के लिए दूसरे महत्वाकांक्षी कहाँ तक गिर सकते हैं। हिन्दुत्व द्रोहियों का लक्ष्य हिंदुत्व को समझना नहीं इस पर प्रहार करना होता है। समझने और सराहने की दृष्टि मूर्तिकार और वास्तुकार की होती है, जो यदि मूर्तिभंजक और ध्वंसकारी में पैदा हो जाए तो उसके हाथों में आया हुआ हथौड़ा और मारतौल उसके ही शरीर में आए कंपन और प्रस्वेदन से छूट कर गिर जाएगा और वह जानुपात की मुद्रा में आ जाएगा। इस आशंका से ही दूसरा कारण जुड़ा है। अपने कारनामे को अंजाम देने के लिए वह नजर तो डालता है पर गौर से देखने का साहस नहीं जुटा पाता। वह जहाँ समझने का अभिनय करता है, वहाँ भी समझने से कतराता है, वह गहन विवेचन के नाम पर कुतर्क द्वारा अध्याय (जिसका अध्ययन करना है) उसे दूषित और नष्ट करता है।

Post – 2020-03-31

समापन

हिन्दुत्व पर इस शृंखला का समापन करते हुए कुछ बातों को संक्षेप में कहना और कुछ बातों को दुहराना जरूरी है:

मैं जन्मना हिदू हूँ। यह एक तथ्य है, इसका चुनाव मेरा न था, इसलिए यह मेरे लिए न गर्व का विषय है, न गलानि का।

विचार करते समय ‘शुद्ध बुद्धि की मीमांसा’ का कायल हूँ। इसके अभाव में विचार विचार रह ही नहीं जाता, विश्वास का तार्किक पक्षपोषण बन जाता है जो विश्वास बन्धुओं के बीच ही प्रिय हो सकता है।

हिंदुत्व पर विचार करने का खयाल इसके विषय में कई दिशाओं से किए जाने वाले दुष्प्रचार से खिन्न होकर दो-तीन साल पहले पैदा हुआ था और फिर मैंने इसके भौतिक, नैतिक, मनावैज्ञानिक, सामाजिक और ऐतिहासिक पक्षों की पड़ताल आरंभ की थी और इस नतीजे पर पहुंचा था कि यह नई चीज नहीं है। इसकी जड़ें 10-12 साल हजार साल पीछे तक जाती है और इसका मुख्य कारण हिंदुत्व की तुलनात्मक श्रेष्ठता और विकास प्रक्रिया से जुड़ी कतिपय सामाजिक आर्थिक व्यवस्थाएँ रही है जो आगे चल कर अपनी जीवन्तता खो कर अनुपयोगी होने के बाद भी समाज में बनी रहीं क्योंकि उनकी जड़ों को न समझा गया और इसलिए उनका निवारण न किया जा सका अपितु वे समाज के सभी स्तरों पर जड़ीभूत हैं।

हिंदुत्व धर्म चेतना है, न कि मजहब। मजहब का प्रयोग केवल सामी विश्वासधाराओं के लिए किया जा सकता है, जिन की प्रकृति दूसरे सभी पूर्ववर्ती और समकालीन मतों और मान्यताओं से इतना भिन्न है की एक ही संज्ञा सभी को समेट नहीं सकती और यदि किसी विवशता में इनमें विभेद नहीे किया जाता तो विवेचन और समझ में भी गड़बडी बनी रहेगी।

धर्म एक अतिव्यापी संज्ञा है जिसका शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ है वह गुण या कार्य जिसके अभाव में किसी प्राकृतिक सत्ता, मानव निर्मित वस्तु, संस्था या पद की सत्ता ही समाप्त हो जाती है और इसलिए मानवता के आशय में धर्म का अर्थ है उन मूल्यों-मानों, कर्तव्यों का बोध और निर्वाह जिनके अभाव में मनुष्य मनुष्य रह ही नहीं जाता। एक शब्द में इन्हें मानवादर्शों का पुंज और उनका निर्वाह कहा जा सकता है। हम संक्षेप में कह सकते हैं कि जो मनुष्य इन आदर्शों का सम्मान करता है वह हिन्दू है और इसे यदि कुछ और सूक्ष्मता में जा कर समझें तो जो व्यक्ति धर्म का पालन करता है या पालन में चूक होने ग्लानि अनुभव करता है केवल वही हिन्दू है। भारतीय होते हुए भी जो इसे नहीं मानता वह हिंदू नहीं। हिंदू होना मानवीय होने का पर्याय है और इसलिए भारतीय न होते हुए भी जो धर्म की समझ रखता या सम्मान करता है, वह हिंदू है।

इसके लिए पुराना प्रयोग – सनातन धर्म – हमारे ऊपर के आशय को स्पष्ट करने में अधिक सहायक है। सनातन का अर्थ है देशकालीतीत या सार्वभभौम और सार्वकालिक। सनातन अधिक सटीक और निरापद है पर शब्द संस्कृत का है, पुराना है इसलिए यह सुनने पर झटका सा देता है इसलिए अपेक्षाकृत नया होते हुए और अर्थ में कुछ भ्रामक होते हुए भी सर्वाधिक प्रचलित होने के कारण हमने इसी का प्रयोग दिक और काल की सीमाओं को जानते हुए उसी तरह स्वीकार किया है जैसे आज हम दूसरे अनेक गढ़े हुए शब्दों का व्यवहार करते हैं।

यहाँ यह स्पष्ट कर दें कि धर्म रिलिजन निरपेक्ष या सेकुलर संकल्पना है और इस दृष्टि से हिन्दू या हिंदू धर्म सेकुलर अवधारणा है। भारत में न कोई मजहब है न मजहबी किताब (भ्रम गुरुग्रन्थ साहब को लेकर हो सकता है परंतु वह कवियों की वाणी में समाहित मानवीय जीवनादर्शों का संग्रह या धर्मग्रंथ है, न कि मजहबी किताब), न आप्त पुरुष जब कि जीवनादर्श सभी महान और निष्कलुष पुरुषों के अनुकरणीय हैं – धर्मविचार में यदि उलझन हो तो उस दशा में – 1. महाजनो येन गतः स पंथा; । 2. यदि ते कर्म विचिकित्सा (दुविधा) वा वृत्ति विचिकित्सा वा स्यात। युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः ॥ -( तैत्तिरीयोपनिषत् १-११), इसी का प्रभाव है कि वेद और स्मृति को क्रमिक प्रमाण मानने वालों को स्वविवेक को अंतिम कसौटी मानना पड़ा – वेदः स्मृतिः सदाचार स्वस्य च प्रियमात्मनः | एतच्चतुर्विधं माहुः साक्षातद्धर्मस्य लक्षणम् || (मनु – 2/12 )

आप्त प्रमाण, वह ग्रंथ का हो या श्रद्धेय पुरुष का, न होने के कारण विभिन्न लौकिक परिस्थितियों में धर्माधर्म अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्य का संशय उपस्थित होता रहा है और इसका अंतिम निर्णय मनुष्य को स्वविवेक के आधार पर करना पड़ता रहा है- अंतिम कसौटी यह कि मुझसे कोई अशुभ कार्य न हो जाए –
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥
कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌ ॥ गीता, 4.16-१८)

आप ईश्वर को मानते हैं या नहीं मानते हैं, वेद, उप वेद, शास्त्र, स्मृति, यज्ञ, पूजा, व्रत – उपवास, पर्व, देवी-देवता, वर्ण-व्यवस्था, भाग्य, पुनर्जन्म और अनंत जीवकोटियों के जीवनचक्र, स्वर्ग-नरक, अवतार को मानते हैं या नहीं मानते हैं, उनका सम्मान करते हैं या उपहास करते हैं इससे आपका हिन्दुत्व प्रभावित नहीं होता, परंतु यदि आप उन आदर्शों का पालन नहीं करते हैं जिन्हें धर्म का लक्षण माना गया है तो आप हिंदू नहीं रह जाते। उन आदर्शों में भी आंतरिक विरोध होने पर, दुविधा पैदा होने पर, अंतिम कसौटी आप का स्वविवेक है।

अब हम मजहब और धर्म के अन्तर को रेखांकित करने के लिए बर्ट्रेंड रसल के विख्यात व्याख्यान को याद करें जिसे निबंध के रूप में हम ‘मैं ईसाई क्यों नहीं हूँ’ (Why I Am Not a Christian) के रूप में पढ़ते हैं, उसके कुछ अंशों पर ध्यान दें जिससे प्रभावित होकर हमारे कुछ लेखकों ने, ‘मैं हिंदू क्यों नहीं हूँ लिखकर अपने को धन्य माना था, क्योंकि उन्होंने हिंदुत्व को समझा न था न उन्हें इस बात का बोध था कि वे कह क्या कर रहे हैं। इसी से यह भी पता चल जाएगा मैं हिंदू होने के नाते हिंदुत्व के विषय में इतना चिंतित नहीं रहता हूं जितना मनुष्यता और वैज्ञानिक युग में मनुष्य की चेतना नष्ट करने वाली ताकतों से बचाने के लिए चिंतित रहता हूं।

रसेल ईसा की ऐतिहासिकता को संदिग्ध बताने, कल्पित रूप में भी सदाशयी, परम बूद्धिमान, या महामानव की अपेक्षाओं से नीचे, कतिपय ऐतिहासिक चरित्रों से भी कमतर सिद्ध करने के बाद उन्हें अनुकरणीय नहीं मानते।(Historically it is quite doubtful whether Christ ever existed at all, and if He did we do not know anything about Him, so that I am not concerned with the historical question, which is a very dfficult one. I am concerned with Christ as He appears in the Gospels, taking the Gospel narrative as it stands, and there one does and some things that do not seem to be very wise. …He believed in hell. I do not myself feel that any person who is really profoundly humane can believe in everlasting punishment….I cannot myself feel that either in the matter of wisdom or in the matter of virtue Christ stands quite as high as some other people known to history. I think I should put Buddha and Socrates above Him in those respects.
और उनकी इस कसौटी को हम अवतारों पर लागू करें तो उसी नतीजे पर पहुँचेंगे। अंतर यह है कि उक्त मामलों में ईसा में विश्वास न करने पर आप ईसाई नहीं रह सकते और आप अवतारों को माने या न मानें हिंदू बने रहते हैं.

मजहब में तर्क के लिए स्थान नहीं, यह भावना पर आधारित है (I do not think that the real reason why people accept religion has anything to do with argumentation. They accept religion on emotional grounds.) जैसा हमने देखा, धर्म और इस दृष्टि से हिंदुत्व प्रत्येक परिस्थिति में तर्क और औचित्य को लेकर चिंतित रहता है।

वह मानते हैं मजहबी भावना का आधार भय रहा है और इसे भय उत्पन्न करके ही बचाने का प्रयत्न किया जाता रहा है और भय क्रूरता का जनक है और हैरानी की बात नहीं कि मजहब और क्रूरता का चोली-दामन का साथ है:
Religion is based, I think, primarily and mainly upon fear. It is partly the terror of the unknown, and partly, as I have said, the wish to feel that you have a kind of elder brother who will stand by you in all your troubles and disputes. Fear is the basis of the
whole thing—fear of the mysterious, fear of defeat, fear of death. Fear is the parent of cruelty, and therefore it is no wonder if cruelty and religion has gone hand-in-hand.

विज्ञान के बल पर हमने चीजों को धीरे धीरे समझना शुरू किया है और इसी के भरोसे हम अपने डर पर कायम काबू पा सकते हैं:
Science can help us to get over this craven fear in which mankind has lived for so many generations. Science can teach us, and I think our own hearts can teach us, no
longer to look round for imaginary supports, no longer to invent allies in the sky, but rather to look to our own efforts here below to make this world a fit place to live in, instead of the sort of place that the churches in all these centuries have made it.

ईसाइयत के विषय में उनकी सबसे बड़ी शिकायत है यह प्रगति विरोधी रहा है मानवता विरोधी रहा है अन्याय का समर्थक रहा है और इसके कारण दुनिया में सबसे अधिक खुराफात हुए हैं और मजहबी संस्थान ही मनुष्य की नैतिक प्रगति में बाधक हैं:
You find as you look around the world that every single bit of progress in humane feeling, every improvement in the criminal law, every step towards the diminution of war, every step
towards better treatment of the coloured races, or every mitigation of slavery, every moral progress that there has been in the world, has been consistently opposed by the organised Churches of the world. I say quite deliberately that the Christian religion, as organised in its Churches, has been and still is the principal enemy of moral progress in the world.
कहने की आवश्यकता नहीं धर्म के साथ, हिंदुत्व के साथ स्थिति ठीक इससे उल्टी मिलती है।

मजहबी संकीर्णता, आतंक, भय, अन्याय, प्रतिगामिता की ऐसी स्थिति में हमारे पास विकल्प क्या रह जाता है? अपने नैतिक विवेक का भरोसा, इसे कुछ विस्तार से उन्होंने निम्न शब्दों में रखा है:

WHAT WE MUST DO
We want to stand upon our own feet and look fair and square at the world—its good facts, its bad facts, its beauties, and its ugliness; see the world as it is, and be not afraid of it. Conquer
the world by intelligence, and not merely by being slavishly subdued by the terror that comes from it. …. It is a conception quite unworthy of free men. When you hear people in church debasing themselves and saying that they are miserable sinners, and all the rest of it, it seems contemptible and not worthy of self-respecting human beings. We ought to stand up and look the world frankly in the face. We ought to make the best we can of the world, and if it is not so good as wewish, after all it will still be better than what these others have made of it in all these ages. A good world needs knowledge, kindliness, and courage; it does not need a regretful hankering after the past, or a fettering of the free intelligence by the words
uttered long ago by ignorant men. It needs a fearless outlook and a free intelligence. It needs hope for the future, not looking back all the time towards a past that is dead, which we trust will be far surpassed by the future that our intelligence can create.
यह कहने की जरूरत नहीं कि ठीक इन्हीं आदर्शों पर धर्म और हिंदुत्व टिका हुआ है जिसके विषय में ईसाइयों द्वारा किए गए दुष्प्रचार के कारण रसेल को बहुत कम और भोड़ी जानकारी थी जिसका परिचय भी उन्होंने इसी व्याख्यान में दे दिया था जिसमें उन्होंने कछुए के ऊपर हाथी और हाथी के ऊपर धरती को टिका बताया था। इसकी विस्तृत चर्चा संभव नहीं। हम केवल यह दावा कर सकते हैं कि यदि उन्हें हिंदुत्व की गहरी समझ होती तो उन्होंने घोषित रूप में कहा होता कि वैज्ञानिक समझ, मानवीय न्याय और आधुनिक विश्व को मजहब की नहीं धर्म की जरूरत है और वह हिंदुत्व है।

Post – 2020-03-30

Physician Heal Thyself (2)
एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो!!

हंगामे में कौन क्या कह रहा है इसका मतलब नहीं होता। मतलब होता है किसकी आवाज कितनों पर भारी पड़ रही है और दूसरों से अलग और ऊपर सुनाई पड़ती है। उस कथन का कोई अर्थ हो या वह व्यर्थ हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

परंतु यदि किसी देश का बौद्धिक पर्यावरण ऐसा हो जाए जो हंगामे का रूप ले ले तो हमें रुक कर सोचना पड़ेगा कि अपने को सही सिद्ध करने वालों की भीड़ में क्या कोई सही विचार भी है जो दबा रह गया है या यदि नहीं हैं तो पैदा हो सकता है? दूसरों को, किसी भी जुगत से, मात देने की बौद्धिक स्पर्धा में क्या यह समझ पैदा की जा सकती है कि बुद्धि को ताक पर रख कर मैदान जीतने की इस दुयूतक्रीड़ा में जीतना भी हार है और हार तो बर्बादी है ही।

पिछले 50 साल से भारत का बौद्धिक नेतृत्व वामपंथ करता आया है। जिस बौद्धिक पर्यावरण की बात हम ऊपर कर आए हैं क्या वह उसकी विवेकहीनता का परिणाम नहीं है। और इसी विवेकहीनता का एक रूप है कि वह सेकुलर होने का दम भरते हुए निरंतर हिंदुत्व द्वेषी होता चला गया है और आज यह व्याधि इस सीमा तक पहुंच चुकी है कि यदि उत्पीड़न पलायन, निर्वासन, आगजनी, हिंसा का शिकार कोई हिंदू कहीं भी हो तो तड़प तो दूर वामपंथी की आह तक नहीं सुनाई देती। यदि नही होती तो उसे असावधानी कह कर क्षमा किया जा सकता था, पर वह उन अत्याचारों का तार्किक औचित्य पेश करके प्रकारांतर से उन कुकृत्यों को सही ठहराने लगता है और इस तरह अन्यायियों की जमात का हिस्सा बन जाता है। सूची बनाने चलें तो कई पन्ने लग जाएँगे।

अब तक का पूरा इतिहास यही है। वह दक्षिण पंथ के संभावित आतंक से डरा हुआ नहीं था, क्योंकि जितने लंबे दौर में यह अभ्यास चलता रहा, उसमें न तो दक्षिण पंथ की कोई राजनीतिक उपस्थिति थी, न साख थी, न उभार की कोई संभावना थी, इसलिए किसी खतरे का सवाल न था। यदि यह हिंदुओं को अपमानित करने और मिटाने के उस लंबे आयोजन का हिस्सा न था, जो कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास के सबसे निर्णायक क्षणों में बुर्का पहनने के साथ आरंभ हुआ था, तो किसी वामपंथी को इस बात का जवाब देना चाहिए कि इस पूरे दौर में हिंदू समाज पर योजनाबद्ध प्रहारो में वह मौन सहमति, या मुखर वकालत के साथ शामिल था, या नहीं।

और यदि भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की वामपंथी भूमिका यही है कि वह इस देश के बहुजन को ही उसके हिस्से में आए भूभाग से भी मिटा देना चाहता है, तो भारतीय संदर्भ में वामपंथ की भूमिका विश्वविदित दक्षिण पंथ की और जिसे वह दक्षिण पंथ कहता है उसकी भूमिका उसी तर्क से उदार सर्वसमावेशी की है या नहीं?

नामों का यह अदल-बदल जिसमें दूसरे को संप्रदायवादी, फासिस्ट, संकीर्णतावादी कह कर भर्त्सना करने वाला जघन्य सांप्रदायवादी, फासिस्ट और मानवताद्रोही , संकीर्णतावादी सिद्ध होता है और ऐसी ताकतों का मौन या मुखर समर्थन करता है, और जिस पर वह ये अभियोग लगाता है वह आपदा में फंसे भारतीयों को बचाते या संपदा के वितरण में धर्म, संप्रदाय, जाति का भेद किए बिना निरपेक्ष और निष्पक्ष सर्वलोकहितकारी भाव से आचरण करता पाया जाता है, तो यह भारतीय इतिहास की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण परिघटना है जिसमें हिन्दू हो कर ही सेकुलर हुआ जा सकता है और हिंदुत्व के कमजोर पड़ते ही व्यक्ति इंसानियत तक खो बैठता है और हैवानियत के साथ हाथ मिला कर खड़ा हो जाता हैं।

आज सैकड़ों की संख्या में देश-देशान्तर से तबलीगी योजनाओं पर काम करने वाले और कोरोना की चपेट में आने के बाद निजामद्दीन से प्रकाश में आने वाले और देश के सुदूर कोनों में फैले जहाँ तहाँ से मसजिदों से पहचान में आने वाले और अपने को सेकुलर बताने वाले भारतीय बुद्धिजीवी एक ही इरादे से दो मुखौटों के साथ काम कर रहे हैं ।

Post – 2020-03-29

Physician Heal Thyself

हमारी धारणाएँ परिवार, परिवेश. शिक्षा, अध्ययन, पारस्परिक संवाद, धार्मिक और राजनीतिक लगाव या सक्रियता के साथ ही अपने निजी अनुभव और चिन्तन से इतने लंबे समय में स्थिर होती हैं कि किसी को आसानी से भिन्न दृष्टिकोण का कायल नहीं किया जा सकता। दलों और संगठनों से जुड़े दृढ़मति लोगों के लिए यह अपना बना बनाया घर उजाड़ने जैसा कठिन होता है। वे किसी विचार को तभी तक सही मानते हैं जब वह उनके दृढ़ विश्वास के अनुरूप होता है। अपने को सही मानने वाले एक ही विषय पर एक दूसरे से असहमत लोग अपने दायरे के भीतर के लोगों की नजर में सही, बाहर के सभी लोगों के लिए गलत या संदिग्ध होते है।

चिंतन की प्रकृति निजी और विश्वास की प्रकृति सामूहिक है। संगठनों और दलों से जुड़े लोगों के पास विचार नहीं होता किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए संकल्प होता है और पारस्परिक विश्वास या एकजुटता होती है जिसका अपना महत्व उसकी सामाजिकता के अनुपात में होता है। इसकी अपनी समस्याएँ हैं। परंतु सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि जिस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उनकी स्थापना होती है उसके विपरीत काम करने लगते हैं या जब वे उस कार्यभार का निर्वाह नहीं कर पाते हैं – जीवित पुरावस्तु बन जाते हैं – तब भी संगठन को जिलाए रखने और उस भ्रम को बनाए रखने का प्रयत्न किया जाता है और पहले जो पारस्परिक विश्वास था वह पाखंड का रूप ले लेता है- संगठन संगठन के लिए। ऐसे दल या संगठन आत्मनिरीक्षण तक से कतराते और आलोचना से बौखला जाते हैं।

इसके दो एक दूसरे के विरोधी नमूने देखे जा सकते हैं जो अपने काडर की अनुशासनप्रियता पर गर्व करते रहे हैं। अनुशासन अपनी प्रकृति से चिंतन विरोधी है। संगठन के मामले में इसे गुण ही कहेंगे। पर हम विस्तार से देख आए हैं कि कैसे अपने शैशव में ही सामाजिक-आर्थिक शोषण और उत्पीड़न के कार्यभार से विचलित हो कर कम्युनिस्टों ने मुस्लिम लीग का कार्यभार अपना लिया और हिन्दूद्रोही चरित्र पर मार्क्सवादी परदा डाले रहे। परिणाम यह कि अपनी करनी से सोए हुए हिंदुत्व को उन्होंने स्वयं जगाया और आज उनके पास दिखावे को भी अपना कोई कार्यक्रम नहीं , केवल छिद्रान्वेषी भूमिका रह गई है।

दूसरा उदाहरण संघ का है। इसकी स्थापना खलीफत आंदोलन के बाद 1921 में मलाबार मोपला दंगों के दुखद अनुभवों के बाद (यह 5,000+ वर्गमील क्षेत्र में फैल गया था और इसमें 10,000 हिंदू मारे गए थे) की असुरक्षा से कातर हो कर मुसलिम गुंडों से अपनी रक्षा के लिए हुई थी और एक सीमा तक यह अपने प्रयोजन में सफल भी रहा। बाद के दंगों के इतिहास से यह सिद्ध नहीं होता कि इसकी भूमिका बहुत कारगर रही। एक अर्धससैन्य संगठन के रूप में इसने काम कम किया है, अपयश अधिक कमाया है, क्योंकि किसी समाज में ऐसे संकीर्ण संगठनों का होना सदा से निंदनीय माना जाता रहा है। उस दशा में यह दूसरों के लिए ही निंदनीय नहीं अपने लिए भी शर्मनाक भी हो जाता है यदि बेगुनाह हो कर भी अपयश का भागी बना रहे। इसे हाल के दिल्ली के दंगों के संदर्भ में देखने पर इस संगठन के मूल उद्देश्यों के अनुरूप नहीं पाया जा सकता, जब कि इसकी सदस्यता अपने चरम पर होगी।

मुसलमानों में वह कौन सा संगठन है जिसने इसका आयोजन किया। हिंदुओं में इसी प्रयोजन के लिए एक संगठन के होते हुए भी वह अपना प्रभावशाली बचाव क्यों न कर सका?

समस्या संगठन की नहीं है, समस्या मिजाज की है, दंगो के चरित्र को समझने की है। इनको धार्मिक कारणों से नहीं, राजनीतिक दुरभिसंधि के चलते उकसाया जाता है। धर्म समुदाय को अतिसंदेदनशील बनाने में मुल्लों, मकतबों, मस्जिदों की भूमिका भले मानी जाए, जिसका पर्यावरण इस्लाम में संभव है, पर हर तरह की उत्तेजना के नियंत्रण और शमन-दमन को वरीयता देने वाले हिंदू समाज में नहीं।

हाल के दंगों में जिम्मेदारी ‘आप’ के दो मुस्लिम विधायकों की लंबी तैयारी, साधनों के संकलन और आपूर्ति की अचूक व्यवस्था, सही समय के चुनाव, समय-समय पर बयान, हमले से पहले इसके पूर्वाभ्यास और राजनीतिक चोरदरवाजों पर भरोसा करने वाले दल के सहयोग और दूसरे गैरजिम्मेदार दलों द्वारा तैयार किए गए पर्यावरण की थी, न कि मुल्लों, मौलवियों की थी।

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी सांप्रदायिकता की नहीं, बौद्धिक ह्रास, आलस्य या अल्प से बहु की प्राप्ति की लालसा की, या कहें पराधीनता की समाप्ति के बाद औपनिवेशिक मनोवृत्ति के अधिक प्रबल होते जाने की है। दूसरी विकृतियाँ इसी का परिणाम हैं, और उनके अनंत रूप हैं जो खाद्य पदार्थों से लेकर दवाओं तक में मिलावट, जमाखोरी, मुनाफाखोरी, उत्पादों और निर्माण-कार्यों की निकृष्टता, शिक्षा प्रणाली के पक्षाघात (प्राथमिक स्तर से लेकर उच्चतम अध्ययन और अनुसंधान केन्द्रों में योग्य और अपने कर्तव्य के प्रति सचेत शिक्षकों के अभाव और सुलभ अध्यापकों की कर्तव्य विमुखता), लेखकों और पत्रकारों में उस भाषा तक के प्रति सम्मान का़ अभाव जिसमें वे काम करते हैं, विवेचन स्तर में कामचलाऊपन के अनुपात में ही ध्यानाकर्षण के लिए, देश और समाज के अनिष्ट की चिंता से बेपरवाह हो कर आतंक से ले कर सनसनी तक पैदा करने की व्यग्रता, राजनीतिक दलों में सैद्धान्तिक सरोकारों का लोप और किसी भी जुगत से चुनावी सफलता को पात्रता का एकमात्र मानदंड बनते जाने और राजनीति की इस गिरावट के अनुरूप ही बौद्धिक उचक्कापन आदि इतने असंख्य रूपों में व्यक्त हुआ है कि जिसके सभी प्रमुख पहलुओं की गणना तक नही कराई जा सकती। मुख्य बात यह है कि ये परस्पर अलग और असंबद्ध लक्षण नहीं हैं, एक दूसरे से जुड़ी और एक दूसरे को प्रबल करने वाली प्रवृत्तियां हैं। उदाहरण के लिए नैतिक सरोकारों में गिरावट और सर्वमुखी अपराधीकरण की वृद्धि जिसमें अपराधी तो अलग न्याय विचार करने वाली संस्थाओं का अपराधीकरण तक शामिल है, एक दूसरे से अलग करके देखे नहीं जा सकते।

सांप्रदायिक उन्माद भी इसी से जुड़ा हुआ है इसलिए मैं इन सभी विकृतियों के लिए बुद्धिजीवी वर्ग की विफलता को एकमात्र कारण मानता हूं, जिसने अपने मौज और स्वार्थ-वश औपनिवेशिक मनोवृत्ति का उच्छेदन करने की जगह उसे मजबूत बनाया।

एक ऐसे समय में जब इस्लाम और ईसाइयत के साथ भारत के सिद्धांतहीन दलों के मुस्लिम वोट बैंक पर कब्जा करने की आपाधापी के संयुक्त प्रयास और उसमें बुद्धिजीवियों के योगदान के कारण हिंदुत्व को सबसे निकृष्ट सिद्ध करने का अभियान चल रहा हो चे गुआरा के शब्दों में कृष्ण को और उनके (भारतीय) समाज को लोकोत्तर (far above our world of today) बताने पर आपको पहले हँसी न आई हो तो अब हँस सकते हैं। लोकोत्तर में इसकी अच्छाइयां भी हैं और इसकी बुराइयां भी हैं।

प्रश्न विकृतियों की प्रकृति और उनके निवारण की तत्परता में है। एक ‘भूमि परत भा ढाबर पानी’ की मलिनता है जो थिराने के बाद फरिया जाता या निर्मल हो जाता है और फिर भी उबालने, मथने, छानने (अपनी रही सही अशुद्धता भी दूर करने के किसी उपाय के लिए प्रस्तुत रहता है; दूसरा ‘एसिड परत भा माहुर पानी’ की विषाक्तता है, जिसकी मलिनता कई बार नजर तक नहीं आती, और यदि मलिनता को मलिनता स्वीकार भी न किया जाय कृमिनाशक के रूप में पेय में मिला कर मीठे जहर के सेवन का रूप दे दिया जाय (मूल्य-व्यवस्था का अंग बना लिया जाय) तब तो वहाँ अशुद्ध कुछ रह ही न जाएगा।

हिंसा को सर्वोपरि शक्ति मानने वाले समाजों में विचारों का प्रसार तक दहशत पैदा करने की क्षमता पर निर्भर रहा है और आज भी अधिक जटिल रूप में जारी है। ज्ञान शक्ति है (knowledge is power) बुद्धिर्यस्य बलं तस्य का अनुवाद ही नहीं है, प्रचारतंत्र की महिमा का ज्ञान भी पश्चिम के धन, शस्त्रबल और अर्थोपार्जक कौशल के अभाव में भी सामाजिक स्तरभेद में ब्राह्मणों के वर्चस्व पर कुछ समय तक विस्मित होते रहने और उस विस्मय के तत्वबोध में बदलने का परिणाम है। परंतु पश्चिम जो नीम और हल्दी तक काे अपनी खोज बना कर एकाधिकार पाने के प्रयत्न कर सकता है वह इस सचाई को स्वीकार नहीं कर सकता। स्वीकार मेरे कहने से आपको भी नहीं करना चाहिए, परन्तु इस तथ्य पर विचार अवश्य करना चाहिए कि सोलहवीं शताब्दी तक ईसाई धर्मप्रचार के लिए भी रक्तपात और उत्पीड़न का सहारा लेते रहे हैं।
हिन्दुत्व यही है, आत्मबल और बुद्धिबल, वैचारिक प्रसार तंत्र का विकास और विचार अभिव्यक्ति की वह स्वतंत्रता और निर्णायक शक्ति।

इसकी समझ न तो अपने को हिन्दुत्व का रक्षक बनने वाले संगठनों को है, न उनको जो इनका शोर मचाते और भोड़ा प्रयोग करते हैं जिसमें शोर विचार से अधिक मान पाता है। पिछले दिनों का ही उदाहरण लें, दंगे भड़काने का जिम्मेदार कौन ? वे नहीं जो वातावरण को अपने बयानों से निरंतर उत्तेजित करते रहे, पूर्वाभ्यास करते रहे, पेट्रोल बम, एसिड बम तैयार करते, जुटाते रहे, नुकीले पत्थरों के खेप जुटाते रहे, मकानों दूकानों को चिन्हित करते रहे, दूर तक मार करने वाली गुलेलें फिट करते रहे। वे तो बेचारे भोलेभाले हैं, भड़काने पर भड़क गये। दंगा भड़का कपिल मिश्र के एक बयान से जो उससे पहले से दिए जा रहे उत्तेजक बयानों की तुलना में सही फटकार की भी हैसियत नहीं रखता। एक वाक्य से यह सारा तूफान खड़ा, यहाँ तक कि न्यायाधीश को भी दूसरे अपराधियों से पहले कपिल मिश्रा को भी हाजिर कराना था, क्योंकि प्रचारतंत्र ने एक शब्द के पीछे इतने सारे भयंकर षड्यन्त्र को छुपाने का प्रयत्न किया। मारा हिंदू होने के नाते सूचना तंत्र का अधिकारी जा रहा है और बीबीसी तक प्रचार कर रहा है उसकी हत्या करने वाले जय श्रीराम के नारे लगा रहे थे।

जिस तंत्र की ताकत सबसे अधिक है उस तंत्र की सबसे कमजोर समझ लाठी भागने वालों की है। बुद्धिजीवियों का इतना बड़ा अकाल जो अपना साहित्य न लिख सकें, प्रतिवाद न कर सके, अपना विश्वसनीय इतिहास न लिख सकें, अपना बचाव न कर सकें और प्रतिहिंसा में जो कमी है उसे नफरत के प्रचार से पूरा करें । न तो यह हिंदुत्व है, न हो सकता है,। जो अपना बचाव नहीं कर सकते अपने समाज का और हिंदुत्व बचाव क्या करेंगे, जिसकी बुनियादी समझ तक नहीं। सही इतने कि पुनर्विचार तक नहीं कर सकते कि आज के संकट में हमारी अपरिहार्य आवश्यकता क्या है।

Post – 2020-03-26

अन्धायुग
नव (शेष)

समस्या केवल इस्लाम की नहीं, सभी सामी मजहबों की कबीलाई सोच की है। इन सभी की मूल प्रकृति प्राधिकारवादी रही है। इनमें सामान्य जन भेड़ बकरी जैसे प्रतीत होते रहे हैं और उन्हें हाँक कर ले जाने वाला एक चरवाहा जरूरी है। वह जिस भी तरीके से चाहे, जिस भी दिशा में ले जाना चाहे, पूरे कबीले को ले जा सकता है। अल्लामा इकबाल जब मुसलमानों की हर्ड इंस्टिंक्ट में आ रही गिरावट पर चिंता प्रकट करते हैं, तो वह इनकी गिरावट से अधिक इस मूल चरित्र पर प्रकाश डालते हैं। अलग अलग रूपों में यह सीमा सभी सामी मजहबों में पाई जाती है। इन सभी का संगठित धर्म होना, किसी एक धर्मपीठ से नियंत्रित होना, विश्वास प्रधान होना और इसलिए तर्क, प्रमाण और औचित्य से परे होना, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक होना, उन बुनियादी पृथकताओं में गिना जा सकता है जो इन्हें हिंदुत्व से अलग करता है। [आस्था और विश्वास के क्षेत्र में भी इस स्वतंत्रता के कारण असंख्य मानव समुदायों के देवी देवता विश्वास एक संकुल का निर्माण करते हैं जो बहुदेववाद के मूल में है। सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान के कारण ऐसा घालमेल पैदा हुआ कि सभी के प्रति सभी का सम्मान परंतु कुछ के प्रति विशेष सम्मान पूरी परंपरा में बना रहा है। यह सामी विश्वास परंपरा में संभव नहीं था। ]

सामी मतों में उनके परमात्मा ने सृष्टि बनाने के बाद मनुष्य को रचा और पूरी सृष्टि को कबीले की मर्जी पर छोड़ दिया, क्योंकि सृष्टि हुई ही उस कबीले के उपभोग के लिए थी। उसका एक ही ध्येय था – अपने कबीले का विस्तार और पूरी दुनिया पर हावी हो जाने का प्रयोग। यह भी उस परमेश्वर के आदेश से था, उसने कहा प्रॉलिफरेट एंड डॉमिनेट। कहें उसका सबसे ऊंचा आदर्श प्रभुत्व-कामना और शिश्नोदर परायणता।

इसमें अपने कबीले को छोड़कर शेष मानवता तक के लिए सम्मान नहीं था, दूसरे प्राणियों के प्रति किसी भी तरह का व्यवहार किया जाए नैतिकता की परिधि में नहीं आता,। इसका एक ऐसी विचार दृष्टि से कोई मेल नहीं था, जिसमें समग्र मानवता ही नहीं, समस्त प्राणियों के कल्याण की चिंता थी, और जो अन्य प्राणियों का ध्यान रखते हुए , त्याग पूर्वक भोग का आग्रह (त्यक्तेन भुंजीथा) करता था।

सामी मतों में यहूदी मत एक मानी में हिंदुत्व के निकट रहा है कि यह धर्मांतरण में नहीं, सह-अस्तित्व में विश्वास करता है और इसलिए शताब्दियों तक भारत में रहने के बावजूद, यहूदियों के कारण न तो हिंदुओं के लिए कोई समस्या पैदा हुई, न हिंदुओं के कारण यहूदियों के लिए । ईसाइयत और इस्लाम कहीं भी रहें धर्मान्तरण की अपनी योजना के कारण शांति से रह ही नहीं सकते। विस्तार के अपने अभियान में इन दोनों ने मनुष्यता का जितने बड़े पैमाने पर संहार किया है, वह दूसरे सभी युद्धों में हुए नरसंहार से अधिक पड़ेगा और दुर्भाग्य से हिंदुओं को एक साथ इन दोनों के दबाव के बीच अपने मूल्यों की रक्षा की करना पड़ा है।

ऊपर हम जो चित्र प्रस्तुत कर आए हैं, उसमें रोशनी और प्रकाश की तरह यह अंतर स्पष्ट है कि हिंदू किन्हीं मामलों में असहिष्णु या अनुदार तो हो सकता है, सांप्रदायिक नहीं हो सकता। इसकी सामाजिक संरचना ही ऐसी नहीं है जिसमें सांप्रदायिकता पनप सकें। सांप्रदायिकता की जननी है गिरोह बंदी या हर्ड इंस्टिंक्ट जो इस्लाम से भी पहले बद्दू कबीलों में विद्यमान थी और जिस का भरपूर उपयोग इस्लाम ने किया। आज भी एक आवाज पर देश के एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक किसी अफवाह के फैल जाने पर भी या अफवाह को ही सत्य बना देने के कारण, ध्वंस, रक्तपात, आगजनी शुरू हो जाती है और इसका धमकी के रूप में इस्तेमाल भी किया जाता है।

सांप्रदायिकता के मूल में है दूसरों पर हावी होने की कामना। जो दूसरों को निर्विघ्नं अपनी रीति और व्यवहार के अनुसार समानता के आधार पर सुख शांति से बने रहने का हिमायती हो उसे सांप्रदायिक कहना, शब्द की समझ के अभाव को तो प्रकट करता ही है, ऐसा करने वालों के इरादे को भी संदिग्ध बनाता है।

हम पहले इस पर विचार कर चुके हैं सांप्रदायिकता की प्रवृत्ति भारत के धर्मांतरित मुसलमानों में नहीं थी। यह उन रईसजादों के द्वारा पैदा की गई जो उनका इस्तेमाल करते रहे हैं और आज रईस और सईस का फर्क मिटने मिटने को है।

इस मानसिकता को समझने के लिए हमें सर सैयद अहमद के इस कथन को याद करना होगा :
We are those who ruled India for six or seven hundred years. From our hands the country was taken by Govemment into its own. Is it not natural then for Government to entertain such thoughts? Is Government so foolish as to suppose that in seventy years we have forgotten all our grandeur and our empire? (लखनऊ, 1887)

इसलिए:
If Government be wise and Lord Dufferin be a capable Viceroy, then he will realise that a Mahomedan agitation is not the same as a Bengali agitation, and he will be bound to apply an adequate remedy.
हम शासक रहे हैं, हमें शासक रहना है, हिन्दुओं को शांति से रहना है तो हमारी शर्ते माननी होंगी। भाई यदि चारा बनने को तैयार हो, आपसी भाईचारे का निर्वाह करते हम साथ रह सकते हैं ।

हम शासक रहे हैं, सल्तनत भले चली गई हो परंतु उसका गुरूर नहीं जा सकता, मरते दम तक यह आन बनी रहनी चाहिए, यह परदेसी मूल के मुसलमानों की चेतना में लगातार बना रहा और भावुक क्षणों में प्रकट भी होता रहा:
सरे खुसरू से ताजे कज कुलाही छिन भी जाती है
कुलाहे खुसरवी से बूए सुल्तानी नहीं जाती।।

यह बूए सुल्तानी ही भारतीय सांप्रदायिकता की जननी है और जिनमें यह बनी रही वे सांप्रदियिकता के लिए उत्तरदायी हैं पर उनसे अधिक बड़े अपराधी वे हैं जो इस कटु यथार्थ पर पर्दा डालते हुए इसका दोष उलट कर हिंदुओं पर मढ़ते रहे हैं।

हम अपनी बात को कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करें। हिन्दू समाज सदा से दो या अधिक समुदायों के समानता के आधार पर साथ रहने का समर्थक रहा है, इस्लाम के साथ पहली बार यह समस्या उत्पन्न हुई की दो समुदाय एक साथ बराबरी के स्तर पर नहीं रह सकते। एक को दूसरे को दबा कर रखना ही पड़ेगा। मिजाज का यह अन्तर लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों का अंतर है। लोकतंत्र में सबका सम्मान के साथ रहना संभव है, अधिनायकवाद में नहीं। अधिनायकवाद मध्यकालीन स्वेच्छाचारी शासनतंत्र का ही विकास है।

सर सैयद अहमद खान के मेरठ भाषण में इन सभी बातों को बहुत स्पष्ट रूप में रखा गया था।
Is it possible that under these circumstances two nations — the Mahomedans and the Hindus — could sit on the same throne and remain equal in power? Most certainly not. It is necessary that one of them should conquer the other and thrust it down. To hope that both could remain equal is to desire the impossible and the inconceivable.

शासन चला गया, वह मिल नहीं सकता यह भी पता है, संख्या बल के आधार पर धौंस नहीं जमाई जा सकती, परंतु सरकार के समर्थन से भूत की लंगोट हासिल की जा सकती है, और उसकी जो भी कीमत चुकानी होगी, चुकाने के लिए तैयार रहना है।

परिवर्तन को रोका नहीं जा सकता, बचाया क्या जा सकता है? कम से कम उस प्रदेश में जिसमें हिंदी और उर्दू दोनो बोली जाती हैं अदालतों में फारसी का चलन, उर्दू जबान की सर्वस्वीकार्यता तो बनाए रखी ही जा सकती है। हमारे बुद्धिजीवियों में जिन हिंदुओं को संप्रदायवादी सिद्ध करने की होड़ लगी रही, वे क्या चाहते थे? चाहते यह थे नागरी लिपि को भी अदालतों में स्थान मिले। उनकी इस माँग को ही सांप्रदायिक करार दे दिया गया। इसी समझ को कम्युनिस्ट पार्टी में तत्समय प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव सैयद सज्जाद जहीर के माध्यम से ट्रांसफर किया गया :“आरंभ से ही मुसलमानों के निकट हिंदी और देवनागरी लिपि आंदोलन हिंदुओं की कट्टर सांप्रदायिकता और मुस्लिम संस्कृति विरोध का द्योतक है… उन्नीस सौ में जब देवनागरी भी उर्दू के समान अदालतों में जारी की गई, तो सर सैयद आमद को विश्वास हो गया कि अब हिंदू और मुसलमानों का एक राष्ट्र होकर अपने अभियान के लिए सम्मिलित प्रयत्न करना असंभव हो गया है उसी समय उर्दू रक्षा समिति सर सैयद के तत्वावधान मैं कायम हुई।” ( रामविलास शर्मा द्वारा उद्धृत, भारत की भाषा समस्या,2003, पृ. 255).

हिंदू तभी तक सेकुलर रह सकते हैं जब तक वे मुस्लिम सांस्कृतिक श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए मुस्लिम अपेक्षाओं की कसौटी पर सही सिद्ध होते रहें। इसके अभाव में वे ही नहीं, उनकी भाषा, लिपि, प्रदेश सभी को सांप्रदायिक माना जाएगा। हिंदी के काउबेल्ट बनने की कहानी भी यही है।

वर्तमान राजनीति को अपनी चर्चा में नहीं लाना चाहिए फिर भी यह बताना जरूरी है कि भाजपा के शासन में कोई भी ऐसा काम नहीं किया गया है जो मुसलमानों और हिंदुओं के बीच फर्क करता हो। सबका साथ और सबका विकास, सबका विश्वास के नारे के बावजूद यदि मुस्लिम समाज को लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है तो वह अन्याय यह है कि मुस्लिम वोट बैंक के दबाव से सभी राजनीतिक दलों के फैसलों को अपनी इच्छा अनुसार प्रभावित करने की शक्ति समानता के इस बरताव के साथ समाप्त तो हो गई हैं।

Post – 2020-03-25

अंधा युग
नव (अधूरा)

अब हम उन कहानियों पर नजर डालें जिनका एक तार 15-20 हजार साल पीछे जाता है।

विगत हिम युग में नाना दिशाओं से होकर भारत में आकर बसने वाले जत्थों को मौसम की मार से राहत मिल गई थी, परंतु आर्द्रता की कमी का वानस्पतिक उत्पादों और जीव जंतुओं की संख्या पर भी असर पड़ा था। भुक्खड़ों की उन जमातों की संख्या, और आपसी टकराव का हम सही अनुमान नहीं कर सकते। जब दूसरे साधनों की कमी हो तो दुर्भिक्ष की अवस्था में किसी अन्य जानवर की तुलना में मनुष्य के लिए मनुष्य का शिकार करना अधिक आसान हो जाता है। कपालिनी, चंडी, चामुंडा काली और दूसरी ओर साइबेरिया से पलायन करके आने वाले जत्थों के देवता जिनके लिए कैलाश के शिखर से उपयुक्त कोई निवास नहीं हो सकता था। महागजों का शिकार करने वाले इन्हीं जनों का देवता रुद्र या कपाली शिव है। ये जिस भयानक और न जाने कितने लंबे समय तक चलने वाली त्रासदी के प्रतीक हैं उसका सही अनुमान तक संभव नहीं।

कालीघाट की प्रतिमा में शव बने शिव की छाती पर पांव रखे खड़ी काली का रूप यदि इस महासंघर्ष में मातृप्रधान अरण्यानी दुर्गा की विजय की याद दिलाता है तो बहुत आगे चल कर काली का शिवा, पार्वती आदि में बदलाव, यहाँ तक कि लिंगभेदी प्रत्यय लगने पर एक की संज्ञा का दूसरे का द्योतक हो जाना सामाजिक समरसता की एक नई कहानी कहता है। पशुओं से लेकर मनुष्यों तक के प्राण लेने वाले (गोघ्न, पूरुषघ्न) का भोले शिव में बदलना, बैल की सवारी करना ऐतिहासिक क्रम में समाज में पारस्परिकता बढ़ने की महायात्रा के पदचिन्ह हैं, जिसका सबसे जीवंत अंकन यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय में मिलता है जिसमें नर वधिक (मा नो महांतं उत मा नो अर्भकं… मा नो वधीः पितरं मा उत मातरं मा नः प्रियाः तन्वो रुद्र रीरिषः) चोरोे ठगों, अपराधियों के आराध्य, मनुष्य के दुख-व्याधि को दूर करने वाले चिकित्सक (जलाषभेषज), शंभु, शिव बन जाते हैं।

प्रसंगवश कह दें कि मातृदेवी उस परंपरा की आदिम पहचान है जिसने क्रमशः कृषि का आविष्कार और विकास किया। वह शाकंभरी हैं। उन्हें कड़ाह प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसके विपरीत शिव उस आखेटजीवी जत्थे की याद दिलाते हैं जो साइबेरिया से आया था, जिसका प्रिय निवास भारत में भी हिमालय और पर्वतीय क्षेत्र बना रहा, जो कृषिकर्म अर्थात यज्ञ का विरोधी है, उसका विनाश करता है, और जिसे चढ़ावे के रूप में मादक पदार्थ और बेर, बेल, गन्ने की पोरियाँ भेट की जाती हैं ।

यह एक बार का संघर्ष नहीं था कई चरणों पर कई रूपों में प्राणघाती संघर्ष के रूप में जारी रहा था, और उसके बाद, थक हार कर वन्य क्षेत्र का आपसी बटवारा किया गया था, मर्यादाएँ नियत की गई थी जिन का उल्लंघन नहीं हो सकता था और विचार को हथियार पर वरीयता दी गई थी। हिंदुत्व की सबसे बड़ी पूंजी यही है – विचारों का खुलापन और जो अधिक तर्कसंगत है वह यदि अपने हित में नहीं है तो भी उसे स्वीकार करने की तत्परता। दूसरे सभी गुण इसी की परिधि में आ जाते हैं और इसलिए यदि हिंदुत्व की एक वाक्य मैं व्याख्या करनी हो तो हम कहेंगे विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, तार्किकता, औचित्य और न्यायसंगति का सम्मान।

मैं जानता हूं इस तरह का दावा करते ही वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यता से जुड़ी समस्याओं को उठाया जा सकता है, उठाया जाता है और आगे भी इसका हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। परंतु इसके चरित्र और इतिहास को समझने का कोई गंभीर प्रयत्न किया ही नहीं गया अन्यथा पता चलता कि इसके लिए वे भी कम दोषी नहीं हैं जिन्हें इससे गहरी शिकायत है। यह याद रखना होगा कि मनुवाद से जिसको शिकायत थी उसी को संविधान लिखने की जिम्मेदारी दी गई और उस पर किसी सवर्ण ने आपत्ति नहीं की। उसने जो भी विधान बनाए उसके साथ मनुस्मृति समाप्त है। इन विकृतियों के निवारण के लिए जो भी विधान किए गए उन्हें सभी ने नतमस्तक होकर स्वीकार किया। इससे अधिक कुछ नहीं किया जा सकता। रही चेतना के स्तर पर सम्मान की बात, वह एक जटिल समस्या है, और इस दिशा में अपने को दलित कहने वाले दलित होने का लाभ उठाना चाहते हैं परंतु अपनी छवि सुधारने के लिए उस तरह का त्याग बलिदान और आदर्श का निर्वाह नहीं करना चाहते जिसका निर्वाह और दिखावा ब्राह्मणों ने किया था। सम्मान उपहार में दिया नहीं जाता है अर्जित किया जाता है, त्याग और बलिदान से। ब्राह्मण पैदल चलता था हाथी पर सवार होते ही उसका ब्रह्मत्व कम हो जाता था, जमीदार होते ही वह नाम को ब्राह्मण पर समाज की नजर में ब्रह्मक्षत्र बन जाता था। अपनी संपन्नता के कारण नहीं, धन के प्रति अपनी अनासक्ति के कारण उसने वह अधिकार और सम्मान अर्जित किया था, भले उसकी भी कई सीमाएं हों। अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए व्यग्र, दलित अवस्था से खिन्न जनों को दलित चेतना से ऊपर उठकर, पुराने ब्राह्मणों से कुछ सीखना होगा।

हम इस तथ्य को रेखांकित करना चाहते हैं कि बुद्धि और विचार की प्रधानता शौर्य और बलिदान का विरोधी नहीं है। अहिंसा का व्यावहारिक अर्थ भारतीय समाज में प्राणी का उत्पीड़न और निष्प्रयोजन वध से परहेज रहा है न कि गांधीवादी अहिंसा जिसे गांधी ने भी एक प्रयोग के रूप में इस्तेमाल किया था अन्यथा वह भी मानते थे कि अंग्रेजों ने हमारे हथियार छीन कर हमें नामर्द बना दिया है।

अन्य के प्रति सम्मान और बराबरी का भाव तार्किक औचित्य की अनिवार्य अपेक्षा है। हिंदुत्व का यह मंत्र विजेताओं पर भी भारी पड़ता रहा है। पता नहीं चलता कौन कब विजेता होकर आया था और कहां विलीन हो गया। परंतु ब्रितानी कूट नीति के तहत मुसलमानों में यह भावना पैदा की गई कि हिंदू इक्के दुक्के का धर्म परिवर्तन नहीं करता, वह पूरी की पूरी जमात को आत्मसात कर लेता है।

सचाई यह है किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को हिंदू बनाने में हिंदुत्व की कभी रुचि नहीं रही, इसका तंत्र ही अलग है। दूसरों को प्रयत्न करना होता है हिन्दू बनने के लिए। वे स्वयं इस बात के लिए प्रयत्नशील रहे हैं कि उन्हें उनके गुण और योग्यता के अनुसार हिंदू वर्ण व्यवस्था में सम्मिलित कर लिया जाए। उन्हें हिंदू नहीं होना पड़ता था – ऐसी कोई संज्ञा या पहचान नहीं थी। उन्हें किसी वर्ण में अपनी जगह तलाशनी होती थी। इसके बावजूद अपने को मूलतः उस जाति का मानने वाले लोग लंबे समय तक उन्हें अपनी बराबरी का नहीं मानते रहे हैं। इसके चलते एक ही वर्ण में गोत्र और प्रवर के अनुसार स्तरभेद पैदा हो जाते हैं।

हिंदू समाज की मूल प्रवृत्ति दूसरों को अपने जैसा बनाने की नहीं है, दूसरे जैसे भी रहना चाहें, उन्हें निर्विरोध, समानता के स्तर पर, अपनी निजता का निर्वाह करते हुए, रहने का अधिकार देने की है। समावेशिता इसका गुण नहीं है, सह अस्तित्व है, अपने से भिन्न विचारों और विश्वासों का सम्मान करने की प्रवृत्ति इसकी विशेषता है और इसके कारण अनेक समुदाय लंबे अरसे तक अपनी निजी विकृतियों के साथ बिना किसी भेदभाव के हिंदू समाज में जीवित रहे और उसका असर भी कुछ न कुछ पूरे समाज पर पड़ा। उनकी इन विकृतियों को भी ब्राह्मणों की देन बताया जाता है जो सही नहीं है और हमारे आलस्य का परिणाम है जिसमें हमने अपने इतिहास को बारीकी से समझने का प्रयत्न नहीं किया।

हिंदू समाज में, जिन भी कारणों से हो, लोकतंत्र के लिए एक निसर्गजात आकर्षण है। इसके पीछे प्राचीन भारतीय ग्राम पंचायतों, बिरादरी पंचायतों, और प्राचीन गणतांत्रिक व्यवस्थाओं, बीच-बीच में सभ्य समाज की धारा में मिलने के लिए पूरी तैयारी के साथ आने वाले गणों – शाक्य, मल्ल, लिच्छवि – आदि के संस्कार हो सकते हैं। इस्लाम का धार्मिक और ऐतिहासिक आधार तानाशाही या स्वेच्छाचारी राजतंत्र का है। यहां से दोनों की प्रकृति में एक आंतरिक विभाजन दिखाई देता है जिसकी प्रकृति को समझने का प्रयत्न नही किया गया।

Post – 2020-03-23

अंधा युग
आठ

हर कहानी कई कहानियों के अंत से आरंभ होती है। उसमें कई युगों के अंतःसत्य छिपे होते हैं। वह मानसिकता, जिसे कई नाम दिए जा सकते हैं, जिनमें से एक नाम से हम अधिक परिचित हैं, वह अंतरिक उपनिवेशवाद जो विदेशी शासन से अधिक पश्चिमी शिक्षा प्रणाली से उत्पन्न हुई है और जब तक अंग्रेजी की प्रधानता है तब तक बनी रहनी है ।

प्राचीन शिक्षा पद्धति में उच्चतम शिक्षा प्राप्त व्यक्ति का भी अपने समाज से गहरा लगाव (इंटीग्रेशन) बना रहता था। व्यक्ति अपने क्षेत्र में समाज के लिए अधिक उपयोगी होने के लिए शिक्षा प्राप्त करता था, और इसलिए अपेक्षा करता था कि उसे योग्य बनाने की दिशा में समाज सहयोग करे, जो वह करता भी था। यह पहली विशिष्टता थी जिसकी प्रकृति समझ में न आने के कारण मैकाले को हैरानी हुई थी। यह तो शिक्षा प्रणाली का अंतर था जिसे बदला नहीं जा सकता। परंतु दूसरा अंतर प्रयोजन से जुड़ा था। मैकाले को अपनी शिक्षा पद्धति का प्रयोजन कंपनी की सेवा के लिए एक अमला तंत्र तैयार करना था जो प्रशासनिक तंत्र में सहायक हो सके और जिसका मिजाज अंग्रेजी हो। इसके लिए मैकाले ने शिक्षा के प्राचीन माध्यमों को हतोत्साहित करते हुए ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली और अंग्रेजी शिक्षा की नीव रखी थी।

औपनिवेशिक मिजाज ब्रिटिश प्रणाली से संबंधित नहीं है, परंतु अंग्रेजी की शिक्षा से गहरा संबंध रखता है। हालत यह है के अन्य भाषा के माध्यम से अपने विषय का अधिकार रखने वाला व्यक्ति भी यदि अंग्रेजी नहीं जानता है या अंग्रेजी माध्यम का आधिकारिक उपयोग नहीं कर सकता है तो अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों की नजर में भी अर्धशिक्षित प्रतीत होता है।

शिक्षा अपने लिए उपयुक्त चाकरी तलाशने से प्रेरित रही है इसलिए ज्ञान, प्रतिभा, शिक्षा स्तर के साथ अमला तंत्र का मनोवैज्ञानिक पदक्रम भी चेतना का अंग बन जाता है। आंतरिक उपनिवेशवाद को सबसे पहले भारत में अमेरिकी राजदूत (1961-63) जॉन केनेथ गैलब्रेथ (John Kenneth Galbraith) मैं लक्ष्य किया था। यह इस समस्या का एक पक्ष है, जिसकी प्रकृति लोकतंत्र से मेल नहीं खाती, और इसलिए अपने को अधिक प्रतिभाशाली समझने वाले लोग – साहित्यकार, पत्रकार, अध्यापक और अमला तंत्र से जुड़े लोग – अपने अहंकार की तुष्टि के लिए ऐसी विचारधारा और संगठनों की ओर आकर्षित होते हैं जिनकी प्रकृति अलोकतात्रिक या अभिजनवादी होती है।

भारतीय संदर्भ में, मैं आज भी मानता हूं कि न तो साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों और विचारकों में से कोई शोषित और उत्पीड़ित जनों की वेदना से कातर होकर कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुआ था नहीं इसके किसी भी संगठन से निकटता बढ़ाई थी । इसके पीछे कई कारण थे। ज्ञान और संवेदन के विस्तार के साथ उसी अनुपात में अन्याय और कुरूपता के उन्मूलन का संकल्प भी पैदा होता है और यदि किसी दल या संगठन का घोषित लक्ष्य इनका उन्मूलन हो तो उसका वास्तविक चरित्र जो भी हो, उसके प्रति आकर्षण बढ़ जाता है। यह है मिजाज की वह समानता जो क्रान्तिकारी छद्म को बनाए रखने के बाद भी अपना ‘आपा’ खो चुकी थी। आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि हिंदुत्व के उन्मूलन, या हिंदू समाज के इस्लामीकरण में जिस दूसरी विचारधारा की भूमिका है, वह अपने को हिंदुत्व का रक्षक समझती है। यह सभी को पता है कि संघ में वेश, बाना, व्यायाम और प्रोग्राम में से कितना नाजियों से मिलता है पर यह जानना अधिक जरूरी है कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं जिससे हिंदुत्व का आभास होता हो। इसलिए किसी नाम का महत्व तभी तक है जब तक रूप सामने नहीं आ जाता।

जो भी हो, कम्यूनिज्म का रास्ता सुशिक्षित और प्रतिभाशाली जमात को रास आया और इससे इसका एक स्थायी एलीट जनाधार तैयार हुआ जो प्रगतिशीलता और सेकुलरिज्म के छद्म में साहित्य, कला और सूचना माध्यमों का हिंदुत्व द्रोही अभियान चलाता रहा। इन्हें आम हिन्दू से – उसकी संकुचित दृष्टि, सीमित ज्ञान, पुरातन विचार, रुचि, विश्वास, जीवनशैली सभी को लेकर गहरी शिकायत थी। प्रकट रुप से वे हिंदू द्रोही नहीं थे। वे इस पिछड़े समाज से दूरी बनाकर उसे सुधारना चाहते थे, या जब तक वह सुधार न जाए तब तक दूरी बनाए रखना चाहते थे। सुधारने का उनके पास एक ही तरीका था, तोहीन करना, उपहास करना, इसके अनुकूल काल्पनिक स्थितियां पैदा करना और फिर उसे मनोरंजन का सामान बनाना।

इस अभियान में उन्होंने हिंदुत्व का उतना नुकसान नहीं किया जितना स्वयं अपना, क्योंकि उनकी कारस्तानी समझ में आ जाने के बाद हिंदुत्व की भावना को बल मिला। समाज अपने ही बुद्धिजीवी से दूर हटता चला गया, उसकी विश्वसनीयता इतनी कम हो गई कि ज्ञान और सूचना के साधनों से भी हिंदी जगत और हिंदू समाज में उपेक्षा भाव पैदा हो गया। यह दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। इसकी व्याख्या आज संभव नहीं।