Post – 2016-09-17

राह चलने का शऊर
प्रयोग – 6

मुहावरा है ‘जिन्‍हें राह चलने का शऊर नहीं, वे भी …’

पर परख कर देखिए अपने देश में 95 प्रतिशत को राह चलने का शऊर नहीं है। यह हिसाब मैंने उस दूसरे पार्क में कुछ समय तक गिनती करने के बाद लगाया था जो उन दिनों हरा भरा हुआ करता था जिन दिनों अपना पार्क उजड़ा और उपेक्षित पड़ा था। टहलने के लिए कुछ समय उसी में जाता रहा। परन्‍तु उसके दो द्वारों के बीच केवल सौ फुट का ही अन्‍तर था जिसे ट्रैक पकड़ कर चलने पर दूरी बीस एक फुट बढ़ जाती थी। उतनी दूरी का श्रम बचाने के लिए लोग फेंस फलांग कर पार्क के लान को तिरछे काटते हुए चल देते जो उस हरियाली के बीच लोगों के चलने से एक चौड़ी पगडंडी में बदल गया था और ऑंखों को चुभता था। इसे रोकने के लिए एक बार उसे तार से रोकने का प्रबन्‍ध किसी ने किया पर वह अगले दिन नीचे पड़ा मिला। फिर एक लंबी पट्टी दोनों सिरों पर लगाई गई, कुछ उस तरह की जैसी लोगों की सज्‍जनता के भरोसे लगा दी जाती हैं, वे टूटी मिली। एक सज्‍जन ने, क्‍योंकि एमसीडी तो इस तरह की तत्‍परता दिखा ही नहीं सकता था, प्‍लास्टिक की जाली वाली बाड़ उस हिस्‍से पर लगा दिया। अब उसके दोनों सिरों से घूम कर प्रवेश और निकास जारी रहा । इस से उस निचाट लकीर की चौड़ाई और बढ़ गई । इतनी मामूली सी दूरी को कम करने के लिए 95 प्रतिशत लोग, इतना कुछ तोड़ने, गिराने और टेढ़े मेढ़े रास्‍ते निकालने के लिए तैयार थे, परन्‍तु ट्रैक से चलने को तैयार न थे।

इसके पीछे एक मामूली सा कारण था। यदि वहॉं भी हरी भरी घास होती तो फेंस का सम्‍मान करने हुए कम से कम 95 प्रतिशत ट्रैक से ही गुजरते, परन्‍तु किसी बुराई के लिए एक प्रतिशत ही काफी होता है, कई बार एक मच्‍छर तक। पांच प्रतिशत से तो महाव्‍याधि पैदा हो जाती है। उन पांच प्रतिशत आलसी लोगों ने समय और दूरी बचाने के लिए जो शार्टकट अपनाया तो निशान, गहरा होने और घासरहित होने के साथ प्रतिशत में वृ‍द्धि होती चली गई अौर इस तरह जो पॉंच प्रतिशत था वह 95 प्रतिशत में बदल गया। ये वे लोग थे जो सोचते, जब धूल मिट्टी ही है तो मेरे चलने से तो कोई नुकसान तो हाेगा नहीं। अब पहले का 95 प्रतिशत पॉंच प्रतिशत रह गया। इस आदत को बदलने के लिए माली ने अपनी आेर से कुछ प्रयत्‍न किए। पहले इस भाग को पानी से भर देता और रास्‍ता कुछ गहरा पहले से हो चुके होने के कारण कीचपथ में बदल जाता। इस बीच रास्‍ते से चलने वालों की संख्‍या कुछ बढ़ जाती फिर भी इतनी नहीं कि 95 प्रतिशत हो जाय। उन्‍होंने इस रास्‍ते के आगे पांच पाच चंपा के कुंज बना कर रास्‍ता अवरुद्ध करना चाहा पर दस पन्‍द्रह दिनों बाद उनका इतना निशान ही बच रहा कि पौधे इन्‍हीं थालों में पौधे लगाए गए थे। इसलिए पाया यह कि समाज के केवल पाँच प्रतिशत ही लोग ऐसे होते हैं जिनको सही रास्‍ते पर चलना पसन्‍द होता है, परन्‍तु इन पॉंच प्रतिशत में भी चलने की तमीज होती है यह तभी तक जब तक उनमें कोई पान न खाता हो।

एशियाई देश जिस बात के लिए जगद्विख्‍यात रहे हैं और आज भी हैं वह यह कि इन्‍हें थूकते रहने से इतना प्रेम है कि आप सावधानी से न चलें ताे आगे वाले के थूक की चपेट में आ सकते हैं। थूकने में आसानी हो इसके लिए वे पान खाते हैं जिससे अधिक से अधिक थूक का उत्‍पादन किया जा सके और पान की पीक घुल कर भीतर न चली जाए, इसलिए उसमें जर्दे का इस्‍तेमाल करते हैं कि थूकने का कर्तव्‍य पूरी तत्‍परता से निभा सकें। इसके बाद दीवारों पर सड़कों पर, यहां तक कि अस्‍पतालों और मन्दिरों तक में थूकने का अधिकार मिल जाता है। मध्‍यकाल में तो हैसियत का आदमी वह समझा जाता था जो थूकने का शौक पूरा करने के लिए उगलदान साथ लिए चलता था।

परन्‍तु जो बात मुझे सबसे असह्य लगती वह फिर 95 प्रतिशत की एक अलग श्रेणी का निर्माण करती। इसकी परीक्षा पार्कों में ही की जा सकती है जहॉं ट्रैक के निकट ही फूलों की कतारें लगी होतीं। फूलों के फूलों और कलियों की जो गत होती थी वह तो आप देख ही चुके हैं परन्‍तु उनकी पत्तियों का जो हाल होता है वह उससे भी दर्दनाक होता उनके डंठल दीखते, पत्तियॉं आधी फटी या टूटी नहीं तो टहनी पर अपने होने का निशान छोड़ कर गायब ।

अगले पार्क के अनुभवों का लाभ उठा कर मैंने अपने पार्क में हरियाली लौटने के बाद इस बात का पयत्‍न करना था कि वे बातें यहां न दुहराई जाऍं । परन्‍तु पहले आप यह तो समझ लें कि कुमार्ग बनते कैसे हैं, पत्तियॉं टूटती क्‍यों हैं। शार्ट कट अपनाने वालों की नजर रास्‍ते पर होती ही नहीं, वह लक्ष्‍य पर टिकी रहती है अर्थात् वह मंजिल जहां पहुंच कर आगे की मंजिल तय करनी है इसलिए उन्‍हें बीच का कुछ दिखाई ही नहीं देता। पांव अपने आप अपना रास्‍ता तैयार कर लेते हैं। हमारे पार्क में इसके खतरे अधिक थे। कारण प्रवेश और निकास के बीच की दूरी कम होने के कारण उसका एक छोटा सा हिस्‍सा उससे प्रभावित था। हमारे पार्क के मामले में यह पार्क की लंबाई के दोनों सिरों पर था जिसमें बीच का भी एक ट्रैक बना था और कई शार्टकट बनते थे। इसके लिए मैं बैठा होता और निकट से कोई राह छोड़ शार्टकट अपनाता तो उसे आवाज देकर बुला लेता । उसकी उम्र , भद्रता और लिंग का ध्यान रखते हुए कई तरह के जुमलों का सहारा लेना पड़ता जिनमें कुछ निम्न प्रकार हैं:
१. वयोवृद्ध सज्जन से:
क. क्षमा कीजिएगा । एक अनुरोध था । यदि हम बड़े बूढ़े ही सही राह न चलेंगे तो बच्चे तो गलत राह अपनाएंगे ही ।
ख . आप से एक छोटी सी मदद चाहिए । वह उन्मुख होते तो निवेदन करता, ‘हम इस कोशिश में हैं कि इस पार्क की हालत भी अगले पार्क जैसी न हो जाय। क्या इसमें आपका सहयोग मिलेगा ?
ग. बहन जी या भाइ साब, (आगे शब्द से काम न लेकर हँस कर हाथ से रास्ता दिदखाने से काम चल जाता।
२. नौजवाानों से:
क. इस उम्र में यह हाल, चार कदम अधिक चलना पड़ा तो बेहोश हो जाओग?
ख. आप मेरा एक काम करेंगे ? वह अनुरोध को ठुकरा कैसे सकता था । ‘आप कृपा करके इस रास्ते से उस । जगह जायँ जहाँ से आप ट्रैक से उतरे थेऔर िफर सही रासते से चल कर आगे जायँ ।’ इसका पालन करबद्ध क्षमायाचना और इस प्रतिज्ञा में होता कि आगे से ऐसा नहीं होगा।
३. कम उम्र के झुंड बना कर या अकेले दुकेलेलड़कों लड़कियों के मामले में: क. भेंड़ बकरियों की तक तरह चलते हो । आदमी की तरह चलना कब सीखोगे। पीछे जाओ रास्ते से आओ।
ख . रास्ते से चलना भी नहीं आता फिर पढ़ाई क्‍या करते होगे?
ग. चलो इधर। इधर से जाओ। रास्‍ता दिखाई नहीं देता।
ये कुछ नमूने हैं । वाक्‍य, भंगी, सब बदलता रहता और इस‍का पहला लक्ष्‍य होता सुनने वाले को अप्रत्‍याशित झटका लगे और वह बहस करने की जगह अनुपालन को तैयार हो जाय।
लोगों को यह जरूरी हस्‍तक्षेप भी लगता और लगता यह आदमी है क्‍या। न उम्र का खयाल न इज्‍जत बेइज्‍जत का । थकता भी नहीं। यह तो कोई नहीं कहता कि पागल तो नहीं हाे गया है क्‍योंकि बीच बीच में किसी न किसी प्रसंग में बात चीत का अवसर मिल ही जाता जिससे यह भ्रम दूर हो सके, परन्‍तु यह सोच कर कि किसी को क्‍या अधिकार है कि दूसरों को अपने अनुसार चलाए। किसी देश में किसी भी सभ्‍य समाज में किसी दूसरे के अटपटे व्‍यवहार पर चेहरे की भावभंगी से लोग अपनी असहमति या उपेक्षा भले प्रकट कर दें, सीधे कोई हस्‍तक्षेप नहीं करता न करना उचित माना जाता है। यह काम जरूरी होने पर पुलिस का है। परन्‍तु इस देश की विलक्षणता यह है कि आजादी का अर्थ हम काम न करने की आजादी या जो काम फायदे का हो उसे करने की आजादी समझते हैं इसलिए कोई अपना काम नहीं करता। लोग रिश्‍वत दे कर या बहुत बडी कीमत चुका कर योग्‍यताएं अर्जित करते हैं और नौकरी के बाद उसकी वसूली आरंभ कर देते हैं इसलिए चिकित्‍सा तक का व्‍यवसाय बूचड़खाने के करीब पहुंच गया है। निष्‍ठुरता में भी, भ्रष्‍टता में भी । जो अपवाद हैं वे देवतुल्‍य लगते हैं। ऐसे में नागरिक हस्‍तक्षेक की अपरिहार्यता बढ़ जाती है, परन्‍तु देश वही ठहरा इसलिए नागरिक भी समझते हैं, मुफ्त का सरदर्द क्‍यों लेना। कुछ लाभ हो तो धक्‍कामुक्‍की होने लगेगी। ऐसे देश और समाज को जहां जाना चाहिए वहीं जा रहा है। पता नहीं मोदी इसे कितना बदल पाएंगे। भींगा हुआ उपला यदि सुलग भी गया तो धुंआ देगा, आग की कल्‍पना करनी होगी।

परन्‍तु मैं एक प्रयोग कर रहा था। व्‍यावहारिक शिक्षा का जिसमें मेरे छात्र सभी उम्रों, लिेंगों, जातियों, भाषाओं, धर्मों और क्षेत्रों के लोग थे। यह एक ऐसा अनूठा विश्‍वविद्यालय था जिसके चरित्र को केवल मैं जानता था क्‍योंकि मैं इसका कुलपति, अध्‍यापक, चपरासी, चौकीदार सब था।

यह जानता था उन्‍हें मैं एक पहेली जैसा लगता रहा हाेऊंगा। एक साथ सभी योजनाओं पर काम करते हुए लोग हैरान होते कि यह थकता या ऊबता क्‍यों नहीं। विनोद में अपना मूल्‍यांकन स्‍वयं करते हुए बताता इस पार्क में मेरे सिवा एक मेरा सीनियर भी है, और उस पागल की याद दिलाता जो लगभग पूरे दिन पार्क में ही बिताता, खिन्‍न बैठा रहता। बेंच पर नहीं, चबूतरे के किनारे और फिर दंड बैठक लगाने लगता। उम्र कोई तीस की होगी। किसी को तंग नहीं करता। एक बार पुलिस वाले दूसरे असामाजिक तत्‍वों की तरह उसे भी भगाने लगे तो मैंने रोक दिया। कभी कभी ही वह हैल्‍युसिनेशन के दौर से गुजरता जिसमें किसी अदृश्‍य से बाते करता और कुछ भंगियां भी करता परन्‍तु कभी कोई ऐसा व्‍यवहार नहीं जिससे किसी को आपत्ति हो। एक बार मैंने उसको गाते सुना, कोई फिल्‍मी गीत गुनगनाते हुए चल रहा था। स्‍वर बहुत अच्‍छा था परन्‍तु पांच छह साल के बीच ही उसका वजन कुछ कम हो गया था, अौर बालों में सफेदी आने लगी थी। मैं बताता, मेरा सीनियर वह है मैं उसके अंडर काम करता हूँ तो सुनने वाला या किसी बात पर जिद करने वाला कंधा डाल देता। मेरा सुबह शाम मिला कर चार घंटे पार्क में ही बीतता। वहीं अखबार पढ़ना और कुछ लिखना पढ़ना भी परन्‍तु यह काम मुझे उतना ही जरूरी और महत्‍वपूर्ण लगता और इसमें उतना ही सर्जनात्‍मक आनन्‍द आता जैसा लिखने में।

परन्‍तु यदि ऊपर के विवरण से यह लगे कि केवल समझाने से ही पूरा काम हो गया तो यह भ्रम होगा। कुछ स्‍थलों को पहचान कर राह रोकने के लिए ट्रीगार्ड के साथ पौधे भी लगवाने पड़े । यह सन्‍तोष जरूर है कि उस तरह की पगडंडियां जिनका आभास मिलने लगा था नहीं बन पाईं न ही उन पौधों से छेडछाड हुई। चलने का शऊर कितनों को आया यह तो आज भी नहीं कह सकता। पार्क से गुजरते हुए उनका चाल चलन अवश्‍य सुधर गया। विरल अपवाद आज भी देखे जा सकते हैं परन्‍तु वह पहली बार पार्क में आने वालों के साथ ही देखने में आता है। वह तो रहेगा ही नहीं तो पार्क कैदखाने में बदल जाय।

Post – 2016-09-16

पत्रं पुष्‍पं फलं चैव यो उद्याने विलुंचति। तं अहं सर्वपेभ्‍यो मोक्षयिष्‍यामि मा शुच ।
प्रयोग – पांच

हमें जिस संस्‍कृति पर गर्व है उसका सारसूत्र यह है कि हम जिसे प्‍यार करते हैं उसे लोभ और मूढ़ता के कारण नष्‍ट कर देते हैं। यह नियम सार्वजनिक क्षेत्र में ही काम करता है। हमसे पहले यह किसी दूसरे के हाथ न लग जाय इस चिन्‍ता के कारण इस सद्कार्य में बहुत तेजी दिखानी होती है । यही कारण है जब तक फौजी पहरे का इन्‍तजाम न हो, नीम का कोई पौदा उग तो सकता है पर पेड़ बनने का सौभाग्‍य नहीं पा सकता। पार्को में फूल के पौदे लगे हो पर फूल नजर नहीं आगए तो समझिये यहॉं हिन्‍दू नहीं रहते, या रहते हैं तो संस्‍कृति-च्‍युत हो गए हैं।

पानी का प्रबन्‍ध कई उपायों से करना पड़ा। सोच में बदलाव से क्‍या नहीं होता। मैंने सोच लिया कि यह पार्क तो मेरी सहन जैसा है तो उस पर कुछ पैसा लगाना अपनी चीज पर लगाने जैसा लगता, पर ध्‍यान यह रखना होता कि यह किसी को कब्‍जा जमाने जैसा न लगे। जो पौधे सूखने के कगार पर थे उनको बचाने के लिए स्‍वयं पानी भर कर ले जाता। पार्क के गेट पर बैठने वाले गार्ड को एक बाल्‍टी पानी पांच रूपये के हिसाब से पर किसी को पता न चले कि मेरे कहने से ऐसा किया जा रहा है। और दूसरे भी उपाय किए जिनका उल्‍लेख आत्‍मरति होगा। फिर माली की नियुक्ति भी हो गई क्‍योंकि डीडीए से एमसीडी को हस्‍तान्‍तरण की प्रक्रिया इस बीच पूरी हो गई थी। पंप भी चल पड़ा।

पौधों में जान आई तो फूल के पौधे और फूल की झाडियों ने फूल कर दिखा दिया कि हम मरी नहीं थी

इस‍की सूचना किसी तरह हिन्‍दू देवताओं तक पहुँची तो उन्‍होंने पहले प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए कृतसंकल्‍प राक्षसों का संहार करने की अपनी भूमिका की याद करते हुए पहले तो अवतार लेने की सोची
:
यदा यदा च पार्कस्‍य विकास: भवति भारत ।
फुल्‍लनं च प्रसूनानां तदात्‍मानं सृजाम्‍यहम् ।।

फिर दुबारा सोचने पर उन्‍हें लगा, अवतार की झंझट में क्‍यों पड़ो। इतनी सारी मूरतें, इतने सारे मन्दिर, इतने सार भक्‍त। इनको जगा दो, उद्यान के सत्‍यानाश के लिए ये ही पर्याप्‍त हैं।

अब क्‍या था। इतना सारा सौन्‍दर्य अपने ठीक पड़ोस मे सहन न कर पाने के कारण लोगों के घरों में बैठे भगवान फूल मांगने लगे, फल मिले तो वह भी लाना और कुछ न मिले तो पत्तियॉं तक नोच लाना।

भक्‍तजन और जन‍नियॉं, उनकी सन्‍ततियां सभी पोलीथिन की पन्नियां और थैलियां ले कर इस इरादे से लेकर आने लगे कि पार्क को भले अपने छोटे से फ्लैट में रखने की जगह न हो पर फूल और खुशबू तो अट ही सकते हैं। बटवारा यह कि पार्क का भूभाग उसमें घूमने टहलने वालों का, और गंध भाग हमारा टहलने के समय को भजगोविन्‍दं भजगोविन्‍दं पर समर्पित करने वालों का।

मुझे फूल तोड़ने वालों से उससे अधिक चिढ़ है जितनी कुत्‍ता पालने वालों से । पुष्‍पलुंचक मुझे मानवता के भी शत्रु लगते हैं और सौन्‍दर्य, सुरुचि और नैतिक विवेक से भी वंचित ।

फूल देखते ही यह आकर्षण तो स्‍वाभाविक है कि उसे अधिक निकट से देखा जाय – ज्‍यों ज्‍याें निहारिए नेरे ह्वै नैन‍नि त्‍यों त्‍यों खरी निखरी सी निकाई – और इसकी गंध को अपने प्राणों में भर लिया जाय। अगर आप विश्‍वास कर सकें तो इस पर अज्ञेय जी की एक कविता भी है जो इस समय आधी याद और आधी याद से परे रह गई है। सौन्‍दर्य को आत्‍मसात् करना सत्‍य और आनन्‍द दोनों को आत्‍मसात् करने का पर्याय है। आ तू आ, मेरी अनगढ़ता को ढक ले और मेरे रूप को अपने योग ने निखार दे।

फूलों को आभरण बनाना और फिर टिकाऊ आनम्‍य धातुओं और फिर मूल्यवान और चमकदार धातुओं से फूल बना कर अपने को सजाया जाय यही तो अलंकरण का इतिहास है। काया को कांचन या रजत पुष्‍पगुच्‍छों से सजाते हुए पुष्पित वृक्ष में बदल कर इतराना इसी पर तो इतनी नाजुक इबारतें लिखी गई हैं कि साहित्‍य जिन्‍दगी की जरूरत बन जाता है। इस निकटता के साथ तो हमारी सौन्‍दर्यचेतना जुड़ी है।

परन्‍तु भगवान के नाम पर उस सौंदर्य का सत्‍यानाश करने वाले जिस तरह फूल तोड़ते है और जिस तरह उसे थैलों में भरते हैं उसमें सौन्‍दर्य चेतना का स्‍पर्श तक नहीं होता। केवल एक भाव प्रबल कि मुफ्त का है अधिक से अधिक नोच लो ।
फूल नोचे नहीं जाते, लोढ़े जाते हैं। लोढ़े से आपको सिलबट्टे की याद आएगी, पर सिलबट्टे को यह नाम इसके उस वर्तुल वेलनाकार के कारण मिला है। आशय है स्‍पर्शमात्र से या अल्‍पतम आयास से उसका अपने दंड भाग से अलग हो कर लुढ़कते हुए आपके हाथ में आ जाना। लढिया और लढ़ा इसी अल्‍पतम प्रयास से चक्रगति से आगे बढ़ने के कारण कही जाती है जौर जहां रलयोरभेद: की छूट मिलती है यह लढ़ा रेढ़ा और रेढू या रोलर बन जाता है।

अनायास, छूटे ही लुढ़क कर आपकी हथेली में आ गिरना पूर्णविकच फूलों के मामले में ही संभव है जिनका पुष्‍पदंड से संबंध कमजोर पड़ने लगा है। जो अपना जीवन लगभग पूरा कर चुके हैं। दंड से आने वाला दूध सूखने वाला है और यदि उन्‍हें लुढ़काया न जाय तो वे स्‍वत: अपने गंधभार सहित नीचे आ गिरेंगे। यदि इसका चयन किया जाय तो सर्वोत्‍तम। फूल का अवतरण कराया जाता है, उतारा जाता है, चयन किया जाता है, लोढ़ा जाता है, उसे तोड़ा या नोचा नहीं जाता । तोड़ना और नोचना क्रूरता है। इसलिए किसी को एक दो फूलों से अधिक उतार कर जेब में या थैले में भरते देख कर मुझे बेचैनी होती है। यह मेरे उसी स्‍वभाव का हिस्‍सा है जिसे मैंने आयासपूर्वक अपनाया नहीं, किसी अज्ञात प्रक्रिया से बन गया है।

पार्क के सौन्‍दर्य को नष्‍ट करने के इरादे से तड़के भोर से ही हमला करने वाले अपने काम पर जुट गए हैं। झोलियॉं थैलियॉं लिए पौधों को झुका झुका कर फूल तोड़ रहे हैं । महिलाऍं भी, बच्‍चे भी, कुछ वृद्ध भी। कुछ अपनी सोसायटियों के शिक्षित और देखने में सुसंस्‍कृत लोग और पार्क हमारा है इस अधिकार बोध से भरे हुए और कुछ सुना है उस पार्क में फूल बहुत हैं की शाेहरत सुन कर पास पड़ोस की बस्तियों के लोग जो इससे पहले इधर रुख नहीं करते थे। अजीब असमंजस की स्थिति ।

अपने को रोक नहीं पाता, ”यह क्‍या कर रहे हैं आप?”

”फूल तोड़ रहे हैं’, कहना चाहते, ऑख फूट गई है, देखते नहीं, लेकिन उम्र का खयाल करके कहते, ”देख तो रहे हैं, फिर पूछने का मतलब?”

”ये फूल पार्क की सुन्‍दरता के लिए लगाए गए हैं, इसे उजाड़ने वालों के लिए नही।”

”फूल तो होते ही तोड़ने के लिए हैं, नहीं तोड़ेंगे तो दो दिन बाद खुद ही झर जाऍंगे।”

जी में आता कहें, ”आपको किसी न किसी दिन मरना है, यह सोच कर उससे पहले आपका गला तो नहीं उतारा जा सकता, पर इसका अनुकूल असर तो पड़ता नहीं, झगड़े का शौक हो तो बात अलग। इसलिए चिन्तित स्‍वर में कहता, ”क्‍या करेंगे इतने फूलों का।”

”भगवान को चढ़ाने के लिए । पूजा के लिए ।”

चाहता समझाऊं कि यदि भगवान सचमुच है तो वह इतना मूर्ख नहीं हो सकता है कि कहे जिसे मैंने सिरजा है उसका सत्‍यानाश करके मेरे चरणों में अर्पित कर, परन्‍तु भावुक लोग दिमाग से कोरे होते हैं, कोई लाभ न होता, कहता, ”इन वृक्षों को ही भगवान मान लीजिए । हमारे यहां तो वृक्षों को सूर्य (नीम), वासुदेव (पीपल), शिव (वट) मानने की परंपरा है ही, इन फूलों को उन्‍हें अर्पित मान कर यहीं ध्‍यान लगाइये और मन्‍त्र पढ़ कर नमस्‍कार कीजिए। मैं तो यही करता हूँ।”

वे अनसुनी कर देते ।

”पूजा के लिए तो ध्‍यान और भक्तिभाव चाहिए फूलों की क्‍या जरूरत । और फिर इतने फूलों का क्‍या करेगे। श्रद्धा के लिए तो एक दो फूल ही काफी है।”

”बड़ेे नास्तिक हैं आप। लोगों की भावना तक को नहीं समझते।”

पार्क में पांच तरह फूल थे । एक चांदनी जिसमें गन्‍ध नहीं होती और जिस फूल में गन्‍ध न हो उसे देवता को नहीं चढ़ाया जाता, परन्‍तु इसको ही सबसे अधिक झेलना पड़ता। इसकी झाडि़यां फूलों से लद जातीं। पूरी पॉंत थी इनकी । एक डेढ़ घंटे के भीतर फूल गायब और टहनियॉं तुड़ी, मुडी, झुकी हुई ।

दूसरा कनेर इसके पौधे दस बारह ही थे पर इसकी टहनियों को उछल उछल कर पकड़ते हुए नीचे लाते और उछाल की पहुंच की टहनियों पर फूल तो रह नहीं जाते, टहनियां भी टूटी, ऐंठी मिलतीं।

तीसरा कटीली चंपा इसने जो सहा वह किसी दुश्‍मन को भी न सहना पड़े।

चौथा अड़़हुुुल इसके पौधों की परिक्रमा करते हुए इसकी कलियां तक उतार ली जाती। उस पार्क के इतिहास में कलियां तो अनगिनत दीखी होंगी पर फूल एक भी नहीं।

पांचवां हरंसिंगार जिसका एक ही पौधा था परन्‍तु उसके विषय में सबको पता है कि तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाने की सोचें उससे पहले ही वह नीचे आ गिरता है, इसलिए उसे नीचे से ही चुना जा सकता है।

बेगुन बेलिया को तो कागजी फूल की नकल पर प्रकृति ने कांटे सजा कर बनाया था । कॉंटों के कारण कठिनाई होती पर उसे भी हाथ लगाने से बाज न आते।

यह केवल हमारे देश में होता है कि हम सार्वजनिक जगहों की ऐसी कोई चीज जो वहां से हटाई जा सकती हो, वह हमें पसन्‍द आ जाय तो हम उसे ले न मरे। जो ऐसा करना उचित नहीं समझते वे लोग इतने सभ्‍य हैं कि उनके सामने यह हो रहा है पर कुछ बोलते नहीं, ‘जाता है तो जाय, अपना क्‍या जाता है।’ रोकने वाले को बहुत नम्र उत्‍तर मिलेगा, ‘तुम रोकने वाले कौन होते हो, यह तुम्‍हारे बाप का है। जो चीज आपके बाप की नहीं हो सकती वह स्‍वयं सिद्धि से ही उसके बाप की हो जाती है।

यदि महाव्‍याधि हो तो आपको यह सोच कर घबराहट होती है कि किस मुर्दे को हाथ लगाऍं और किसे सड़ने दें। किसी विकार का बड़े पैमाने पर घटित होना अपना औचित्‍य स्‍वयं तलाश लेता है। समझ में नहीं आता करें क्‍या। यदि वे केवल अपनी पहुंच के भीतर के फूलों को तोड़ते तो उतनी तकलीफ न होती। वे अपनी पहुंच से बाहर के फूलों के लिए डालियों टहनियों को झुकाते और इस क्रम में उनके टूटने पर भी कोई मलाल नहीं, जल्‍दी जल्‍दी फूल तोड़ थैली के हवाले करते इससे पीड़ा होती।

चंपा की तो तो जैसा कहा, शामत थी। चंपा के दस पौधे परन्‍तु कोई ऐसा नहीं जिसका कई बार अंगभंग न हुआ हो और उसकी शक्‍ल न बिगड़ी हो।

पौधों की टहनियाँ झुकाने पर वे यदि टूटती नहीं भी थींं तो उनके झुकने से रास्‍ता भी रुकता जिसके लिए उन्‍हें काटना ही पड़ता।

इस समय तक दो तीन लोगों की रुचि भी पार्क के रख रखाव में हो गई थी और रोकने बरजने में उनका भी सहयोग मिलने लगा था। पर किसी के लिए एेसे प्रसून प्रेमियों को समझाना आसान नहीं था। फिर भी हमने अपना प्रयत्‍न आरंभ किया। उनमें से एक के पास पहुंचो तो उनका तर्क ‘आप दूसरे किसी को तो रोकते नहीं।’

”सबको एक साथ तो रोका नहीं जा सकता । आप भी चलिए, हम दोनों मिल कर उनको रोकते हैं।”

”मैं क्‍या रोकूंगा, मैं क्‍या आप की तरह नास्तिक हूँ। फूल तो होते ही पूजा के लिए हैं।”

”जिस चीज को आपने पैदा नहीं किया, जो सार्वजनिक है, जो पार्क की सुन्‍दरता और वातावरण को सुगन्धित बनाए रखने के लिए है, उसे इस तरह उतारना तो चोरी है।”

”भगवान तो खुद ही माखनचोर हैं।”

त‍र्क करने का असर नहीं पड़ता, उल्‍टे हठ बढ़ता । अब हमने कठोरता का रास्‍ता अपनाया। पर केवल उन मामलों में जिनमें फूलों से झोलियॉं भरने की सनक देखने में आती।” उनके पास जा कर खड़े हो जाते, उनको वितृष्‍णा से देखते और इस पर भी हा‍थ न रुकता तो, कठोर निर्णायक स्‍वर, ‘निकलो यहां से । भागो।’ उनके हाथ रुक जाते और वे खिसक लेते। मेरे पार्क में कहीं किसी कोने में रहते यदि किसी ने किसी फूल की डाल झुकाने की कोशिश की तो वहीं से ऊची आवाज में ‘छोडिए उसे। दूर। दूर हटो।’ ऊ़ॅची आवाज इसलिए जरूरी होती कि यदि वहॉं पहुंच कर रोकने बरजने का प्रयत्‍न करते तब तक डाल टूट चुकी होती।’ विरल अपवादों को छोड़ कर परिणाम आशा के अनुरूप होता, जहॉं नहीं होता वहॉं तेजी से चल कर वहां पहुँच जाता, और फटकार के साथ छोड़ो उसे, बेवकूफ । पूरे पार्क का सत्‍यानाश कर दिया।”

परन्‍तु यदि समझें कि हम पूरी तरह सफल हुए तो गलत होगा। माली को समझा कर उछाल की पहुँच में आने वाली डालियों टहनियों को कटवाना पड़ा और जो उछाल के भीतर थे उन पर कोई वश नहीं चला क्‍योंकि वे हमारे पार्क पहुंचने से पहले अंधेरे मुंह ही अपना काम कर जाते। फिर भी स्थिति सुधरी। सभी प्रयोग सफल नहीं होते। कुछ प्रश्‍न छोड़ जाते हैं । भावना से जुड़े सवालों का तार्किक समाधान हो तो सकता है पर यह आसान नहीं।

Post – 2016-09-15

न विश्‍वसेत अविश्‍वस्‍ते
अर्थात् कुत्‍तोंं की संगत में रहने वालों पर भरोसा न करें
प्रयोग – 4

उपेक्षित पड़े पार्क की केवल कुत्‍ता पालने वाले उपेक्षा नहीं करते। उनकी दिलचस्‍पी के कारण ऐसे छोटे पार्क का, जिसका एक पूरा चक्‍कर लगाने के लिए 450 डग ही काफी होते है, नजारा कुछ ऐसा हो जाता है जिसके रास्‍ते पर या तो कुत्‍ते आराम से चल सकते है या उनके मालिक जो कुत्‍ता प्‍लस आदमशक्‍ल प्राणी होते हैं। आप कुत्‍तों की भाषा नहीं जानते तो कुत्‍ता पालने वालों से बात नहीं कर सकते। कुत्‍तों की संगत में रहते रहते वे इन्‍सानों की भाषा भूल चुके होते हैं । कुत्‍तों की भाषा इस हद तक समझ लेते हैं कि यदि कुत्‍ता उनकी गोद में सर रख कर गर्दन ऊपर किए उनकी ऑंखों में ऑंखें डाल दे तो वे तुरत समझ जाते है यह गुदगुदी करने को कह रहा है और उसकी उंगलियॉं उसके गले पेट, पीठ पर बड़ी नजाकत से उसे स्पर्शसुख देते हुए घूमने लगती है और मात्र इस बोध से कि उसे स्‍पर्श सुख अनुभव हो रहा है ये स्‍वयं स्‍पर्शसुख अनुभव करने लगते हैं और यदि अपने परिवार के साथ बैठे हों तो पूरे परिवार को स्‍पर्शसुख की अनुभूति होने लगती है। आप यह नहीं समझ सकते कि कुत्‍ता हंसता भी है, वे समझते हैं, क्‍योंकि कुत्‍ते के दीनता में दॉंत चियारने और पुलकित भाव से हॅसने की सूक्ष्‍म भेदरेखा को वे लक्ष्‍य कर लेते हैं, दोनों अवस्‍थाओं में उनकी पुतलियों की धुंध और चमक में भी जाे अन्‍तर होता है, उसे वे जानते हैं। हम नहीं जान पाते। गरज कि कुत्‍तों की सोहबत में रहने के कारण कुत्‍ते की आत्‍मा उनमें प्रवेश कर जाती है, जिसे वह नहीं समझ सकता जो मनुष्‍य है और मनुष्‍यता से कोई पाशविक समझौता नहीं करना चाहता।

समस्‍या हमारी यह थी कि हम किससे बात करें, कुत्‍तों से या उनके मालिकों से। कुत्‍तों की भाषा जानते होते तो उन्‍हें समझा लेते। उनसे कहते अजीजों, तुम जो यह जान चुके हो कि यह तुम्‍हारे भी घूमने टहलने की जगह है और इस पर तुम्‍हारा भी हक है । उस पर हम कुछ नहीं कहते। जब तक तुम्‍हारे साथ एक आदमी है, तुम्‍हारा सोचना ठीक हो सकता है। आओ, पर घर से फारिग हो कर तो आया करो। या यह नहीं कर सकते तो तब तक जब्‍त तो रखो जब तक तुम्‍हारा मालिक थक कर बैठ नहीं जाता और उसके बैठेने के बाद उसकी गोद में बैठ कर तेरी तुझको सौंपता गाते हुए जो करने के इरादे से लाए गए थे वह कर दिया करो। मेरे आत्‍मविश्‍वास का स्‍तर पिछले अनुभवों से इतना बढ़ा हुआ था कि मुझे पूरा विश्‍वास था कि कुत्‍ते उसी तरह मेरी बात मान लेते जैसे वे बच्‍चे मेरे समझाने से मान गए थे, जब कि उनके अभिभावकों को समझाने में मैं नाकाम रहा था।

विवशता थी कि हमें उनसे बात करनी थी जो मनुष्‍यों की भाषा ही नहीं, कभी कभी कई भाषाऍं जानते थे परन्‍तु कुत्‍तो की सोहबत में स्‍वभाषा की जगह श्‍वभाषा में बात करना अधिक पसन्‍द करते थे। श्‍वभाषी संख्‍या में नगण्‍य होने के बाद भी पूरे स्‍वभाषी समाज को इस हद तक आतंकित कर चुके थे कि वह न उनके सामने आने का साहस नहीं कर सकता था।

यदि श्‍वभाषा के साथ स्‍वभाषा को भी चलने दिया जाय तो भी श्‍वभाषा के आतंक से स्‍वभाषा उठ ही न पाएगी, चलने की तो बात ही अलग। साे, यह देश्‍ा श्‍वभाषियों के नियन्‍त्रण में है, स्‍वभाषियों को उन्‍होंने इतनी ही रियायत दे रखी है कि साल में एक दिन स्‍वभाषा दिवस मना लो या अधिक से अधिक स्‍वभाषा पखवाड़ा जिसमें तुम श्‍वभाषियों को गालियॉं देने की छूट तो पा सकते हो, परन्‍तु उन दिनों पर भी पूरे तन्‍त्र को श्‍वभाषा ही सँभाले रहेगी।

श्‍वभाषा का सीधा संबंध हैसियत से है। जो कुत्‍ता पालते हैं, कुत्‍ता लेकर चलते हैं वे अपनी हैसियत कुत्‍ते से ही ऑंकते हैं, गरज कि किसका कुत्‍ता कितना दुर्लभ, कितना मँहगा है, और उसके रख रखाव पर कितना खर्च करना पड़ता है, उसकी सेवा के लिए कितने आदमी लगे हैं। इसलिए श्‍वभाषियों के बीच भी हैसियत का अन्‍तर बना रहता है, परन्‍तु जिसने कुत्‍ता पाला ही नहीं उसे वे अपने आगे इतना तुच्‍छ समझते हैं कि वह कुछ कहे तो वे सुनते तक नहीं, यह आभास देना तक अपनी तौहीन समझते हैं कि उसकी आवाज उनके कानों तक पहुँच गई है। इन्‍हें समझाने की समस्‍या आसान नहीं थी, परन्‍तु इस बार दो तीन लोगों ने इससे निबटने में सहयोग किया अत: उनके प्रवेश का आभास मिलते ही उनके सामने उपस्थित हो कर करबद्ध हो जाते। महानुभाव यह पार्क आदमियों के लिए है। उन्‍हें कुत्‍तों से डर लगता है। कुत्‍ते जाे कुछ कर गुजरते हैं उससे रास्‍ता चलना मुश्किल हो जाता है । वे समझाते, नहीं, यह काटेगा नहीं।

काटेगा तो नहीं लेकिन उनके डर को तो दूर नहीं करेगा। यहां पहुंच कर यह कुछ भी करेगा, वह पार्क के हित में तो नहीं ही होगा। धीरे धीरे उनकी भी समझ में आ गया परन्‍तु सबसे विलंब से समझ में आया उस सज्‍जन के जो सीबीआई में किसी पद पर थे और जिन्‍होंने जुड़वॉं कुत्‍ते पाल रखे थे । आश्‍चर्य यह कि उन पर भी एक वाक्‍य काम कर गया, ”यदि आप भी नियम कायदे का ध्‍यान नहीं रखेंगे तो अपने विभाग में आप क्‍या करते होंगे।”

इतनी बड़ी सफलता, पर सफल हुए क्‍या ! टहलने के लिए आने वाले एक दंपति ऐसे जो स्‍वभाव से खासे शालीन, किसी से बात भी नहीं करते, उनकी पत्‍नी उठतीं बाहर चली आतीं और आवारा कुत्‍तों को दूध पिलातीं। फिर उनके पूरे दल को इतनी पसन्‍द आने लगीं कि वे उनको घेरे हुए पार्क तक चले आते और यहां भी कुछ बिस्किट वगैरह मिल जाता। अब दूध पिलाने का काम भी यहीं होने लगा। जीवदया का यह प्रसंग संभवत: किसी मनौती से जुड़ा था परन्‍तु इसके बाद जो आवारा कुत्‍तों का प्रवेश हुआ तो वे तो समझाने पर मान गये और फिर बाहर जा कर ही उन्‍हें दूध बिस्‍कट देतीं, पर उनका अधिकार पूरे पार्क पर हो गया। उनको बाहर निकालने का कोई उपाय हमारे पास भी नहीं रह गया। गनीमत इन कुत्‍तों के साथ यही कि ये कभी रास्‍ते पर विसर्जन नहीं करते, इसके लिए उन्‍हें गन्‍दी जगह ही पसन्‍द है। रास्‍ते पर दौड़ भाग भी नहीं लगाते । किसी को इनसे डर भी नहीं लगता। इनकी संख्‍या में कमी तब आई जब हमारे फुटपाथ पर एक आदमी ने पर्दा लगा कर सामने लिखा ‘चाइनीज रेस्‍त्रॉं।” कुत्‍तों की संख्‍या घटने लगी और अब वे नहीं दिखाई देते। यदि आप भी इस समस्‍या से परेशान हैं तो अपने इलाके में चाइनीज रेस्‍त्रां लिखवा कर टॉंग दीजिए । इस नाम में ही कुछ ऐसी विशेषता है कि कुत्‍तों की संख्‍या कम हो जाती है ।

Post – 2016-09-13

आनेस्‍टी इज द बेस्‍ट पालिसी – प्रयोग 2

जिन लड़कों को दूसरे शैतान समझते थे, सोचते थे वे मारपीट कर देंगे, जो आपस में लड़ते और गाली गलौज करते रहते थे, उनके बारे में मेरा यह खयाल था कि ये बच्चे हैं जिनको सही परिवेश नहीं मिली, जिनका समुचित विकास नहीं हुआ है और समझ की कमी के कारण शैतानी करते हैं, परन्तु़ शैतान नहीं हैं। उनके डर से हमारी सोसायटियों के बच्‍चे मैदान में नहीं आते। यदि आते तो वे मारपीट कर, गाली दे कर भगा देते। बच्‍चे ही नहीं बड़े भी उनसे डरते थे यह तो हम देख ही चुके हैं। मुझे विश्‍वास था कि टइनको सही राह पर लाया जा सकता है। मैं उनके पास पहुंच नहीं सकता था। एक तो वे बिखरे हुए होते, दूसरे आप उनमें से जिसके पास पहुंचते वह बहस करने लगता और आप चल कर उसके पास पहुंचे थे, इसलिए आपका सिरा दबा हुआ होता।

मैं उनको आदेश के स्‍वर में आवाज देता, ”चलो इधर, इधर आआे। नहीं एक दो नहीं, सभी के सभी, उनको भी बुलाओ जो उधर ठिठके हुए हैं ।” वे चले आते।

मेरे पास आने के साथ ही उनके उस तनाव में कमी आ जाती जो उस दशा में होती जब मैं स्वयं उनके पास गया होता। मैं पूछता, तुम लोग पढ़े लिखे हो। मुसीबत यह कि उनमें आधे अनपढ़ या पढ़ना लिखना छोड़ चुके थे और दूसरे ऐसे जिनका पढ़ने में मन नहीं लगता। कुछ तेज भी निकलते। कम से कम बात चीत में तेज। अब एक दूसरी समस्या विभिन्न स्तरों, संस्कारों और योग्य़ताओं वाले बच्चों के साथ ऐसा संवाद जो इस बात का कुछ अनुमान करके आए हैं कि आप उनको बरजने वाले हैं इसलिए आधे अकड़े, आधे सिकुड़े और असरानी गणित से आधे सहमे हुए। वार्तालाप की एक कड़ी यह रही:

”तुम लोग जानते हो यहॉं लोग शान्ति से बैठने और थोड़ी ताजी हवा के लिए आते हैं और तुम लोगों के शाेर, धूल धक्‍कड़ से परेशान होते हैं, एक दो बार तुम्‍हारी गेंद भी लग चुकी है। उन्‍हें यह हुड़दंग पसन्‍द नहीं, फिर भी कोई बोलता नहीं।”

इसका क्‍या जवाब हो सकता था, उन्‍होंने सिर झुका लिए । एक दो यह कयास लगाते हुए देखने लगे कि यह भूमिका है किस बात की है।

”वे इसलिए नहीं बोलते हैं कि उनकी हिम्‍मत नहीं होती है। वे सोचते हैं तुम लोग गुंडे-बदमाश हो। मेरे साथ भी कोई आ कर तुमसे बात करने को तैयार नहीं। मैंने कहा, ये बच्‍चे उतने ही अच्‍छे हैं जितने आपके अपने बच्‍चे। और इसी विश्‍वास से मैं अकेले तुमको बुला कर बात कर रहा हूँ और जैसे गलती करने या शरारत करने पर अपने बच्‍चों को डॉंटता हूँ उसी तरह तुमको डॉंटने भी आया हूँ और रोकने भी। तुम यह खेल बंद करो।”

आप समझ सकते हैं इसकी क्‍या प्रतिक्रिया होती थी। उसमें सबसे अधिक घबराहट उन बच्‍चों को होती जो कुछ सयाने होते और दूसरों पर रोब दाब रखते थे।

”अंकल, बस थोड़ा सा खेल लें । बस पॉंच मिनट।” वे ही रिरियाते।

”नहीं, एक मिनट भी नहीं। अगर कोई चीज गलत है तो पॉंच मिनट भी क्‍यों। बिल्‍कुल बन्‍द ।”

आप मानेंगे विश्‍वास कायम रखना और विश्‍वास पैदा करना बल प्रयोग से अधिक कारगर हथियार है ? मानेंगे कि आनेस्‍टी इज द बेस्‍ट पालिसी मुहावरा केवल शब्‍दों का खेल नहीं है, अनुभव का निचोड़ है । परन्‍तु इस पालिसी का एक अगला मंत्र यह कि आप सब कुछ बक न दें । किन्‍हीं परिस्थितियों में दूसरा व्‍यक्ति अभी या देर से जो कुछ जान सकता, या अनुमान कर सकता या जिसका उसे तनिक भी सन्‍देह हो सकता है, उसे छिपाइये नहीं, स्‍वयं कह दीजिए । प्रथम दृष्टि में वह आपके लिए अहितकर प्रतीत हो तो भी। इसके बाद जो आत्‍मविश्‍वास का सेतु बनेगा उससे होने वाला लाभ इससे कई गुना होगा।

दूसरे, दूसरों की भलमनसाहत पर किताबी ढंग से मत सोचिए कि किसी को अच्‍छा समझेंगे तो दूसरा आपके साथ अच्‍छा ही व्‍यवहार करेगा। यह भोलापन आपको खतरे में डाल सकता है। लोग कितने अच्‍छे होते हैं और किन स्थितियों में अच्‍छे लोग बुरे हो जाते हैं, और कितनी चालाकी से एक दुष्‍ट आदमी अच्‍छे होने का फरेब रच सकता है यह जीवन के अनुभवों से हम सभी जानते हैं। जिस आधार पर दूसरे उन बच्‍चों को दुष्‍ट, झगड़ालू, जंगली समझ रहे थे वह उसके घरेलू परिवेश का हिस्‍सा था। उसी में वे पूरे सुकून के साथ रह सकते हैं। परन्‍तु परिवेश बदल दीजिए तो उनके आचरण में बदलाव अवश्‍यंभावी है। मेरी नजर में कोई समुदाय, कोई जाति, किसी धर्म के लोग जिनको सतही सूचनाओं, अफवाहों और अपने एक आध बार के बुरे अनुभवों के कारण हम भी दुष्‍ट मान लेते हैं, वे उतने ही अच्‍छे या बुरे होते हैं जितने वे जिनके बारे में हमारे खयाल बहुत अच्‍छे होते हैं। इसके पीछे किसी दार्शनिक का सूत्र नहीं, यह अनुभव है, कि यदि दो चार उपद्रवी तत्‍व हों तो पूरे इलाके का जीना हराम हो जाता है, यदि ये सारे लोग दुष्‍ट हों तो समाज एक पल भी चल नहीं सकता। चल रहा है यही इस बात का प्रमाण है कि हमारी पुरानी सोच में कहीं गड़बड़ है और इसी सोच का परिणाम था कि जहां वे दल बल के साथ, संख्‍या में अधिक होने पर भी जाने से डरते थे, वहाँ मैं अकेले उनकी सामूहिक ताकत के सामने खड़ा हो कर अपनी बात मनवा सकता था।

एक और मंत्र बता दूं। सबको एक साथ जुटा लेने के पीछे मेरी एक चाल भी थी। अकेला आदमी अधिक मीनमेख निकालता है, बहस करता है, भीड़ बन जाने के बाद उसमें पैसिविटी बढ़ जाती है। प्रत्‍येक इस प्रतीक्षा में रहता है कि कोई दूसरा कुछ कहेगा, फिर यह सोच कर चुप रह जाता है कि जब दूसरा कोई नहीं बोलता तो मैं ही क्‍यों बोलूँ। इसलिए यदि आपकी बात तर्क संगत लगती है तो वे सभी चुपचाप मान लेते हैं। परन्‍तु यदि आपसे तनिक भी चूक हुई और किसी में भी उत्‍तेजना पैदा हुई तो वही पैसिविटी उन्‍मत्‍त व्‍यवहार में बदल सकती है और यदि आप बल प्रयोग पर आमादा है तो अपना सिर फोड़वा कर ही वापस आएंगे जैसा कि इससे पहले हुआ था।

परन्‍तु मैंने जो यह विवरण दिया है वह विस्‍तार से बचने के लिए एक संक्षेप है ।इस समस्‍या का समाधान न उतना आसान था न ही किसी भी अन्‍य समस्‍या का समाधान उतना आसान होता जितना हमारे विवरण में आया है। फिर जिस जत्‍थे को समझा चुका खिलाडि़यों में केवल वही नहीं होता। एक ही नुस्‍खा हर बार काम नहीं करता। मेरे सामने जो निरुत्‍तर हो जाते वे मन से ऐसा मान ही नहीं लेते। मेरे आंख से ओझल होते ही वे फिर लौट आते और कई बार मुझे दुबारा आना पड़ता। बात केवल उन उजड्ड लड़कों तक सीमित न थी। उनके विदा होन के बाद जो उनके रहते खेल के लिए आने का साहस नहीं करते थे उनका शौक जाग जाता। वे पढ़ लिखे और जब तक सुशिक्षित भी होते ।

मैं कहता, तुम गलत काम कर रहे हो, यह खेलने की जगह नहीं है। वे बताते पार्क में नहीं खेलेंगे तो कहॉं खेलेंगे। मैं बताता, खेल का मैदान अमुक जगह है। यह पार्क है। खेल के मैदान में पेड़ पौधे नहीं होते जिस पर गेंद या शटल जा कर टंग जाय। बेंच या ऐसा कोई अवरोध नहीं होता जिससे भागते समय टक्कतर लगे। और फिर गाडी पार्क करने की जगह का हवाला दे कर समझाता कि यह ठहरने या बैठने की जगह होती है। उनसे ही पार्क का मतलब पूछता। वे उलझन में पड़ते तो बताता कि पार्क पर्च शब्द से निकला है। चिडि़या जब थक कर किसी डाल या झाड़ी पर आराम से बैठती है उसे पर्च कहते हैं। यह सिर्फ बैठने की जगह है, दौड़ लगाने, टहलने की जगह है, पर गेंद खेलने की जगह नहीं जिससे चलते फिरते लोगों को चोट लगे।

एक आध बार पुलिस की भी मदद लेनी पड़ी, पर वह भी बेकार। पुलिस को आते देख वे भाग खड़े होते, उसके चले जाने के बाद फिर इकट्ठा हो जाते। पर मैं अपने प्रयत्न में लगा रहा और वे मित्र जो इस हुडदंग से चिन्तित रहते थे, उन्हें अब भी मेरे साथ खड़े होने में संकोच होता। अब समस्‍या दूसरी थी। साथ खड़े होने का मतलब मेरा वर्चस्‍व स्‍वीकार करना। कुछ को वातावरण में इस सुधार से भी कुछ शिकायत बनी रहती, लगता सारा श्रेय इस आदमी को मिल रहा है, जब कि मुझे मिलने को एक ही चीज मिल सकती थी, उन बच्‍चों की बददुआएं और गालियां जिनको समझा बुझा कर भगा देता था या जो बाद में मेरे पार्क में पहुंचते ही बिना मेरे कहे ही खिसकने लगते थे।

लुका छिपी का यह खेल लंबे समय तक चलता रहा। जब तक इस पर रोक नहीं लगती तब तक खुली जगह को धूल धक्‍कड़ से बचाया नहीं जा सकता था । इसके लिए मुझ उसके बीच में एक वृत्‍ताकार घेरे में फाइकस के बारह पौधे लगवाने पड़े ।

Post – 2016-09-12

संचार भी हथियार है: समस्‍या की पहचान- 2

क्‍या हम हितबद्ध लोगों के अपने स्‍वार्थ के विरुद्ध खड़े हो कर उनको परास्‍त कर सकते हैं। यहॉं हम हितबद्धता के उन रूपों को छोड़ दें जिनको हम नैतिक मूल्‍यों या दृष्टिकोण की भिन्‍नता के कारण दूसरे को अपनी मान्‍यता का कायल बनाना चाहते हैं, जैसे आपकी लड़की या लड़के के आपकी मान्‍यता से भिन्‍न प्रेमप्रसंग के मामले में आता है। यहाँ दोनों के पास अपना तर्क और औचित्‍य होता है और इसमें जीत अक्‍सर नई पीढ़ी की होती है, और कुछ मामलों उसमें ‘समझ’ भी पैदा हो जाती है और वह ‘स‍ही’ रास्‍ते पर आ जाते हैं। यहाँ हम उस स्थिति की बात कर रहे हैं जिसमें एक व्‍यक्ति जानता तो है कि वह गलत कर रहा है, कम से कम ठीक तो नहीं ही कर रहा है, और इससे प्रभावित लोग खिन्‍न अनुभव कर रहे हैं फिर भी वह इसे तब तक छोड़ना नहीं चाहता जब तक इसके लिए बाध्‍य न कर दिया जाय। यह बाध्‍यता ऐसी हो जिससे वह भी सहमत हो जाए कि जो हुआ वह ठीक ही हुआ है और आगे उसकी भूमिका उसको विफल करने की न हो ।

यह विचार को नैतिक सहभागिता के स्‍तर पर पहुँचाने की समस्‍या है। मैं इसे जीवन में लगातार प्रयोग करता रहा हूँ और इसका इतना लाभ मिला है जो चालाकी करने वालों को भी नहीं मिलता। उदाहरण मैं इस पार्क का ले रहा हूँ परन्‍तु अकेले उन विकारों को दूर करने के साहस के पीछे मेरा पुराना अनुभव था। दूसरों को साथ खड़ा रखने के प्रयत्‍न के पीछे मेरी आकांक्षा इसे लोकतान्त्रिक बनाए रखने की थी, क्‍योंकि इससे सशक्‍त आज तक कोई दूसरा तन्‍त्र नहीं। इसकी बुनियाद ही नैतिकता, समानता, स्‍वतंत्रता और बन्‍धुत्‍व पर है। यह दूसरी बात है कि नैतिकता या औचित्‍य को फ्रांसीसी नारे में शामिल नहीं किया गया इसलिए हम इसे भूल जाया करते हैं।

हमारे सामने तीन हितबद्ध कोटियॉं थीं। वे बच्‍चे जिनको खेल से नहीं, ऊधम मचाते हुए अपना समय थ्रिल में गुजारना था। वास्‍तव में ये दल्‍लूपुरा के उन परिवारों के बच्‍चे नहीं थे जो यहॉं की जमीन पर अपना खयाली कब्‍जा छोड़ना नहीं चाहते थे। उनकी अलग समस्‍या थी और अलग से निपटायी जानी थी। ये लड़के सामान्‍यत: उन परिवारों के थे जो पढ़ाई लिखाई में रुचि न ले पाने, या शिक्षा के माध्‍यम के कारण यह सोच बैठे थे कि वे कुछ भी कर लें मुकाबले में ठहर नहीं सकते। उनका कोई भविष्‍य नहीं है इसलिए वे अपनी किशोर वय काे मौजमस्‍ती का एकमात्र दौर मान कर खेल में भी कोई भविष्‍य न देख कर, हुड़दंग मचाते है, परन्‍तु सभी दृष्टियों से लक्ष्‍यहीन हैं।

मुझे इनके विषय में दृढ़ता अपनाने के साथ एक नैितक अन्तर्द्वन्द्व से गुजरना पड़ा । ये हमारे ही दरबानो, ड्राइवरों, घरों में मदद करने वाली महिलाओं के बच्‍चे हैं, जिनके भविष्‍य को हमारी शिक्षाप्रणाली ने बन्‍द कर रखा है, जिनको उल्‍लास और आत्‍मविश्‍वास का कोई अवसर उनकी जिन्‍दगी देने वाली नहीं है, क्‍या हमें जिनके पास औचित्‍य के विरुद्ध बहुत कुछ है, इन्‍हें इस सुख से वंचित करने का अधिकार है ? स्‍वार्थ हो या दर्शन, मुझे ऐसे अवसरों पर बीए के समय से ही मेरे जीवनादर्श कांट और उनके सिद्धान्‍त याद आ जाते । गीता की इस उलझन का कि क्‍या करें क्‍या न करें इस पर समझदार लोग भी भ्रमित हो जाते हैं – किं कर्मं किं अकर्मेति कवय: अपि अत्र मोहिता: – इसके दो जवाब मुझे सुझते थे, कांट का कि जिस क्रिया को सर्वसुलभ न बनाया जा सके वह अनैतिक है। अर्थात् यदि इसी आर्थिक और सामाजिक स्‍तर के सभी बच्‍चे इसका लाभ नहीं उठा सकते तो इसका औचित्‍य नहीं। और इसका भारतीय पाठ ‘महाजना: येन गत: स पन्‍था’ महान लोगों या आदर्श लोगों के आचरण के अनुरूप हो तो इस का पालन किया जा सकता है। यह दोनों कसौटियों पर गलत सिद्ध हाेता था और हमारे लिए समस्‍या तो था ही इसलिए इससे निपटना था।

दूसरी समस्‍या कुत्‍ता पालकों से निपटने की थी। वे ट्रैक को चलने के योग्‍य रहने ही नहीं देते थे। पर वे अपने कुत्‍तों को घुमाने कहॉं ले जायँ ? समस्‍या उनको समझाने की थी कि पार्क कुत्‍तों के लिए नहीं आदमियों के लिए होते हैं। मानता मैं तब भी था कि सोहबत के असर से बचना आसान नहीं और जो कुत्‍ता पालते हैं उनपर कुत्‍तों के स्‍वभाव का असर होगा ही, इसलिए इनको समझाते समय कुत्‍तों से अधिक उनके व्‍यवहार से ही डर लगता था।

और तीसरी समस्‍या, पत्रं पुष्‍पं फलं तोयं यो मे भक्‍त्‍या प्रयच्‍छति से प्रेरित फूल के पौधों और झाडि़यों से ऑंचल भर ही नहीं टोकरी भर फूल उतारने के प्रयत्‍न में उनकी डालियॉं झुकाने अौर झुकाने के साथ उन्‍हें तोड़ देने वालो की थी। इनमें उत्‍साह महिलाओं का ही अधिक होता है और उन्‍हें समझाने के बारे में जो कहावतें है मैं उन्‍हें दुहराए बिना भी सही मानता हूँ और इसके लिए यदि महिला आयोग बुलाए तो उसके सामने अपने बयान देने के बाद, उसकी सन्‍तुष्टि न होने पर दंड झेलने को तैयार हूँ पर यह टिप्‍पणी वापस लेने के लिए तैयार नहीं। मणिका माहिनी के यह चीखने के बाद भी कि यह क्‍या कर दिया आपने, इसके लिए तो हम तैयार नहीं थे। यह लिंगभेद और वह भी आपके द्वारा जिन्‍हें हम नारी सरोकारों का समर्थक मानते आए थे। बालहठ राजहठ त्रियाहठ में समानता है, यह तो मुझे फूल की टोकरियॉं भरने के बाद भी टहनियों को झुकाने वाली महिलाओं और समझाने के दायरे से ऊपर पड़ने वाली महिलाओं के माध्‍यम से ही जाना।

इन सभी पर न तो एक तरीका काम कर सकता था न किया। क्‍या किया और कितना सफल हुआ यह कल बताएंगे।yy

Post – 2016-09-11

हम उसकी गली से भी परेशान ही निकले ।
उसने हमें जांचा तो हम इन्‍सान ही निकले।
ऐसों का यहॉ काम क्या जो सोचते भी हो
आदम की तरह खुल्‍द से हैरान ही निकले ।

Post – 2016-09-11

हम लौहे उफक पर यह सबक लिखते रहेंगे ।
कोई न पढ़े फिर भी सबक लिखते रहेंगे ।
समझें इसे गुरूर न, मजबूरियां समझें
कुछ और न सीखा है फकत लिखते रहेंगे ।।

Post – 2016-09-11

संचार काव्‍यशास्‍त्रीय समस्‍या नहीं है : एक प्रयोग

संचार की समस्या का एक पक्ष इस बात से जुड़ा है कि जो विमुख है उसे क्या उन्मुख बनाया जा सकता है? जो सुन कर भी नहीं सुन पाता उसकी मानसिक बधिरता को कम किया जा सकता है? जो जिस गर्हित स्तर पर है, और बोलचाल में अपने भदेसपन पर गर्व करता है उसे यह समझाया जा सकता है कि इससे तुम अपने का ही अपमानित कर रहे हो?

हम जिस समाज में रहते हैं उसमें ये सभी मनोवृत्तियाँ पाई जाती हैं। जो मेरा लिखा पढ़ते हैं और ‘लाइक’ करते हैं, हो सकता है, उसे पसन्द भी करते हों, और यह भी सोचते हों कि इससे मैं तुष्ट अनुभव करता हूँ। परन्‍तु फेसबुक की महिमा से हम जानते हैं कि गालियॉं देने और फूहड़ मजाक करने वालों को पसन्द करने वालों की संख्या मुझे पसन्द करने वालों से कहीं अधिक है। यह बोध नम्र बनाता है।

मैं प्रशंसा की चिन्‍ता न कर, अपमान झेल कर भी अपनी पहुँच के दायरे में आने वाले समाज को उस रास्तेे पर लाना चाहता हूँ जिसे वह भी सही मानता हैं पर लोग जिसके निर्वाह की चिन्ता नहीं करते।

मैं गलत चीज, गलत विचार, गलत व्यवहार के विरोध में इसलिए खड़ा होता हूँ कि इसके बिना मेरे जीने का कोई अर्थ नहीं, और इसमें अपमान झेलने के भी क्षण आते है जिनसे खीझ होती है पर अगले ही क्षण यह बोध भी पैदा होता है कि अपमानित करने वाला हार गया। आज अपने भीतर अपने को बदलने का साहस नहीं पैदा कर सका है, शायद किसी दूसरे के सुझाव पर बदलाव लाने को अपनी प्रतिष्‍ठा के विपरीत पा रहा हो, पर उसकी अभद्रता के बाद भी मेरी दृढ़ता से वह प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। खीझ का स्‍थान मुस्‍कराहट में तो नहीं, पर होठो की चमक में अवश्य बदल जाती है। और बाद में पाता परिणाम अनुमान के अनुरूप हुआ । जहॉं भी रहूँ यह ‘पंगेबाजी’ मुझे अपने जीवन का पर्याय प्रतीत होती है।

यह व्यवहार की समस्‍या नहीं, संचार को क्रिया में रूपान्‍तरित करने या उसकी संभावना पैदा करने की समस्‍या है। केवल साहित्‍य की या विचार की समस्‍या नहीं है इससे जुड़े बहुत सारे पहलू हैं । इसे एक प्रयोग से समझा जा सकता है।

मैंने आज से साढ़ आठ साल पहले वसुन्धरा एन्क्‍लेव के जिस फ्लैट को पसन्द किया उसके पीछे आकर्षण यह था कि मेरे फ्लैट के बिल्कुकल पास, इतने पास कि उसे अपना लान समझा जा सके, एक पार्क था। वह वीरान और उपेक्षित था। कुल दो एकड़ का पार्क और उसको घेरे छह बहुमंजिली सोसाटियों का घेरा, जिनके लिए वही सांस लेने की खुुली जगह, पर पेड़ अधमरे, हरियाली नदारद। मौसमी पेड़ पौदे सूखे हुए । मौसम भी पतझड़ का। सिंचाई का प्रबन्‍ध नहीं। उस पर डीडीए का बोर्ड जिस पर लिखा मिला दो माली और दो पहरेदारों का नाम। इस बीच उसको म्‍युनिस्‍पैलिटी को सौंपा जाना था इसलिए न कोई माली, न ही पहरेदार । पंप टूटा हुआ और लोग उदासीन । कुछ लोग उसका उपयोग कुत्ते घुमाने और जिन प्रयोजनों से वे कुत्ते घुमाने निकलते हैं उसके लिए करते थे। निकट के गॉंव, दल्‍लूपुरा, के एक डेढ़ दर्जन बच्चेे उसमें क्रिकेट खेलते और खेल का पूरा मजा लेने के लिए शोर मचाते और गालियों में बात करते। उस सूखे मैदान में उनके बल्ले और जमीन की टकराहट और दौड़ भाग के कारण धूल चारों ओर फैलती। सांस की बीमारी के कारण मेरी घुटन बढ़ जाती । जिस आकर्षण से चुनाव किया था उसका उल्टा असर। दो चार लोग जो खुली जगह में आ कर बैठ जाते थे, खीझे से रहते।

समस्‍या यह कि क्‍या इस स्थिति को झेला जाय या इसमें बदलाव लाया जाय। लोगों से बात की कि इस स्थिति में बदलाव लाना चाहिए तो उसे असंभव मान कर वे मुस्कराने लगे। कुछ लोगों को सुझाया कि यदि क्रिकेट को रोका जा सके तो डस्ट पोल्यूशन तो कम होगी। उन्होंने बताया, ये दल्लूंपुरा के लड़के हैं, रोकिएगा तो पूरा गांव पहुंच जाएगा। एक बार ऐसा किया था तो एक सज्जन का सर फूट गया था। दल्‍लूपुरा के निवासियों का मानना था कि सरकार ने यह जमीन उनसे ही ली थी। यहां उनके खेत हुआ करते थे। इसलिए इमारतें जिनके भी कब्‍जे में हों, बाकी जगह तो उनकी ही है।

मुझे यह समस्‍या जटिल ताे लगती थी परन्‍तु यहीं तो प्रयोग और प्रयत्‍न की कसौटी होती है । मैंने समझाया, इस बार सर मेरा फूटेगा, आपलोग केवल मेरे साथ खडे़ हो जायँ। तीन चार लोग ही सही। इससे उन्‍हें लगेगा कि हम सभी यह सोचते हैं। इतना जोखिम उठाने के लिए भी कोई तैयार नहीं। पत्‍थर चलेगा तो अकेले मेरा सिर तो फूटेगा नहीं। मुझे लगता पत्‍थर इसलिए चला होगा कि संचार स्‍थापित ही न हो सका होगा।

किताबों से नहीं, जिन्‍दगी से आरंभ होती है संचार की समस्या और जिन्‍दगी के लिए ही जरूरी है इसका स्‍थापित होता। यहीं से उसके अनुरूप शैली और युक्ति के आविष्कार की समस्या पैदा होती है। यहीं इसके वे पहलू सामने आते हैं जो संचार प्रणाली पर पोथे पढ़ने वालों की कल्‍पना तक में नहीं आते। इन पहलुओं पर हम अपने प्रयोग और परिणाम अगले खंड में देखेंगे । यहॉं पर समस्‍या का रूप यह कि लंबी, पुश्‍त दर पुश्‍त की जान पहचान वाले समुदायों में, चाहे वे पुराने शहरों के स्‍थायी निवासी हो या ग्रामीण समाज, संवाद कायम करना अधिक आसान होता है। नये विकसित नगरों, उनकी नई बस्तियों में यह कम होता है। महानगरों में यह अभाव अपने चरम पर होता है । अस्‍थायी संपर्क के दौरान जैसे यात्रा के दौरान यह सतही होता है। एक ही मत या विश्‍वास से जुड़े दूरस्‍थ लोगों के बीच यह अधिक प्रगाढ़ होता है, सुशिक्षित शहरी लोगों के बीच यह दिखावटी होता है और एक ही विभाग में काम करने वालों के बीच यह कार्यसाधक होता है। संचार भंग की स्थिति संदेह होने पर एक ही परिवार में, पति पत्‍नी तक के बीच दूरी पैदा हो सकती है या की जा सकती है । अत: संचार की पहली शर्त है पारस्‍परिक विश्‍वास, स्‍थायी जान पहचान, स्‍थायी हितबद्धता और बन्‍धुता या बराबरी का भाव । इसलिए राेबदार पद पर बैठा, या मौज मस्‍ती का जीवन जीने वाला व्‍यक्ति अपने समाज से सही संपर्क स्‍थापित कर ही नहीं सकता । हमारे साहित्‍य का अपने समाज से कटने का एक कारण साहित्यिक जगत का शैक्षिक व आर्थिक आभिजात्‍य है इसलिए वह लफ्फाजी कर सकता है, कलात्‍मक हथकंडे दिखा सकता है, नायाब अनुभूतियों को कलाग्राहकों के समक्ष पेश कर सकता है परन्‍तु जनसाधारण के अनुभवों से जुड़ नहीं सकता। मुझे ऐसा लगता है। क्‍या आप लोगों को भी ऐसा ही लगता ?

Post – 2016-09-10

रामसेवक श्रीवास्‍तव

न कुछ किया न करेंगे आगे । उठ कर चल देंगे बिन बताए हुए।

पंक्तियां तो मेरी हैं पर रामसेवक पर शायद मुझसे अधिक लागू होती हैं। रामसेवक श्रीवास्‍तव का जन्‍म सन् 1930 के संक्रान्ति के दिन हुआ था। दोनों जहां को छोड़ कर वापस जाने से पहले हमसे पहली तारीख, को मेरे क्रासिंग रिपवब्लिक के आवास पर आए तो हम लोग इस बात पर विचार कर रहे थे कि उन्‍हें घुटन भरे अपने प्रेस एन्‍क्‍लेव के आवास को छोड़ कर मेरे पड़ोस मे एक फ्लैट किराए पर ले लेना चाहिए और पुराना मकान जब तक बिकता नहीं है तब तक उसे किराए पर दे देना चाहिए। आर्थिक समस्‍याओं का भी समाधान हो जाएगा। विचार हो ही रहा था कि उस शख्‍स ने फैसला ही बदल दिया, घर छोडना ही पड़े ताे इस दुनिया में क्‍या रखा है। पांच दिन में इतने अलामात जुटा लिए और मैक्‍स में दाखिल हुए तो डाक्‍टरों ने दिन गिनने का समय दिया, जिन्‍दगी लौटाने का आश्‍वासन नहीं। 7 को उनकी दशा देखी तो केवल इस कामना के साथ आइसीयू से बाहर आया कि ऐ कालदेव इसे जल्‍द से जल्‍द दुखों से मुक्ति दे। नीलम सिंह से यह नहीं कह सकता था। आठ सितंबर को 10 बजे के आसपास फोन आया वह नहीं रहे। परिचय या समाधिलेख लिखना हो तो लिखा जाएगा:
रामसेवक श्रीवास्‍तव (जन्‍म 13 या 14 जनवरी 1930 : मृत्‍यु 8 सितंबर 2016) यह न लिखा जायेगा कि 86 साल 197 दिन उम्रखाते जमा।
यह न लिखा जाएगा कि उसके स्‍वभाव और व्‍यवहार में एक ऋजुता थी जिसके कारण वह संभ्रान्‍त समझे जाने वालों की कुटिलता को लक्ष्‍य कर सकता था और अपनी बिरादरी के विषय में भी आलोचनात्‍मक रुख अपना सकता था।
रामसेवक से मेरी प्रगाढ़ता तब बढ़ी थी जब मैं सातवीं या आठवीं में अपने उस किसान हाई स्‍कूल का छात्र था जहॉं के अध्‍यापकों में सभी मिडिल पास थे पर एक मात्र हाई स्‍कूल पास था उसका प्रधानाध्‍यापक। नहीं, यह सही नहीं है। बात इससे पहले की होनी चाहिए। कारण इस समय तक तो मेरे लिए भारती सदन पुस्‍तकालय का भंडार खुल गया था, जब कि जिस समय की बात कर रहा हूँ, मैं पाठ्य सामग्री के लिए आतुर कुछ भी पढ़ने के लिए ललकता था। मेरी बहन की एक सहली कुछ अमीर थी, वह पढ़ी लिखी थी। चिनगारी पत्रिका के कुछ अंक उसी से मिले थे। कुशवाहा कान्‍त की लेखन शैली, भाषा का मैं इतना कायल हो गया कि रामसेवक से जो तब बांसगांव में हाई स्‍कूल में पढ़ते थे, मिलने पर उसकी जो प्रशंसा की उसे पढ़ कर, उससे अभिभूत हो कर अपनी फाकामस्‍ती के बीच से वह मिर्जापुर जाने की जुगत निकाल ही बैठे, पर आज तो शहर का नाम भी गलत लगता है। वह जो भी रहा हो, वहां पहुंचने पर पता चला कि वह तो बनारस अमुक जगह पहुंचे हुए हैं। रामसेवक के वहॉं पहुंचने पर पता चला, वह आए तो थे पर लौट गए। रामसेवक वहां से फिर वापस लौटे और कुशवाहा कान्‍त को नोबेल मिलने से वह प्रसन्‍नता नहीं हो सकती थी जो एक बालक के उसकी लेखनशैली की प्रशंसा से हुई । उसने अपनी पुस्‍तकों का सेट और बहुत सारी आत्‍मीयता उस बालक को समर्पित कीं।

मैं व्‍यक्तियों और उनकी प्रतिभा की पहचान इसी से करता हूँ। क्‍या उसमें,‍ जिसे वह अपना समझता है, उसमें कुछ करने का जुनून है या नहीं। और यह वह बिन्‍दु था हमारी आत्‍मीयता का।

रामसेवक अच्‍छा लिखते थे। मूल प्रकृति कविता की थी। कविता के कारण ही नीलम से आत्‍मीयता हुई थी और लीजिए दोनों को मेरा ही घर पसंद था कि नीलम ने तय किया कि मैं अपने जीवन सहचर का निर्णय स्‍वयं करूँगी, दूसरा कोई नहीं, और यदि यह संभव नहीं तो उस बन्‍धन को ही तोड़ दूँगी और वह घर छोड़ कर दिल्‍ली पहुंच गई। नीलम में भी काफी आग थी, नारीवाद के नारे लगाने वालों को भी अपने योद्धाओं का पता नहीं। रामसेवक ने नीलम की कविताओं से प्रभावित हो कर कविता लिखना छोड़ दिया, बाकी रही पत्रकारिता। पर नीलम ने कविता लिखना क्‍यों छोड़ दिया यह मेरी समझ में आज तक नहीं आ सका या यदि आ सका तो यह कि उस कविता आन्‍दोलन में झाग था, सत्‍व न था और नीलम को कहीं इसका आभास हुआ होगा।

परन्‍तु मैं तो क्रम का ध्‍यान रख ही नहीं पाता। रामसेवक ने मिडिल स्‍कूल तो घर की रोटी से पास कर लिया, पर गॉंव में आगे का रास्‍ता बन्‍द था जो रोटी से नहीं, चांदी से खुलता था। उन्‍होंने मिडिल स्‍कूल के बाद आवारगी शुरू कर दी। तास खेलना, जुआ खेलना, जब कि घर में चूहे तक भागने का निर्णय ले चुके हो। और जिस जन्‍मदिन का उन्‍हें याद था उसी दिन घर में खाने को कुछ न था और जुए में उन्‍होंने इकन्‍नी जीती थी और उसी से खरीदे चावल और दाल से उस दिन पेट भर खाने को मिला था।

वे परिस्थियॉं मुझे मालूम नहीं जिनमें बांसगांव के एक नि:सन्‍तान वकील से उनका परिचय हुआ जो अपनी नि:सन्‍तानता की पूर्ति अपने भाइयों की कन्‍याओं, साधनहीन छात्रों को पुत्रवत पालन से करते थे: नाम जहां तक याद है, था, ब्रहमदेव श्रीवास्‍तव परन्‍तु उनके संरक्षण में पलने वाले बच्‍चे जाति सीमा से बाहर के भी होते थे।

उनके संरक्षण में ही रामसेवक ने हाई स्‍कूल पास किया पर आगे फिर साधनहीनता। संभवत: उन्‍हीं के संपर्कों से रामसेवक नये नये खुले आपूर्ति विभाग के सुपरवाइजर बन गए । इस बार उनसे दुबारा संपर्क हुआ। राशन का अनाज मिलता न था। बाहर का अनाज कई गुना मँहगा होता था, इसलिए जिन्‍हें राशन का अनाज बिना कालाबाजारी के मिल गया, वे भाग्‍यशाली थे। मैं रामसेवक से पूर्व परिचित होने के कारण सौभाग्‍यशाली था।

फिर वे आपूर्ति विभाग से हट गए और शिक्षा की तड़प को पूरा करने के लिए प्रयत्‍नशील हुए। इन कवायदों में उन्‍होंने जो वर्ष गँवाए उनके प्रताप से हम कालेज के स्‍तर पर सहपाठी हो गए और यह सिलसिला एम ए तक बना रहा।

बीए में हमारे श्रद्धेय अध्‍यापक राम अधार सिंह कहते रामसेवक की अंग्रेजी तुमसे अच्‍छी है। यह अन्‍त तक अच्‍छी रही। यह दूसरी बात है कि हम दोनों में किसी ने अंग्रेजी से एम ए करने का निर्णय नहीं किया। एम ए में हम साथ थे और आप आश्‍चर्य न मानें तो कहें, आठ अंक से हम दोनों प्रथम श्रेणी चूके थे। अंक भी बराबर।

हम दोनों ने साधनहीनता के कारण रेलवे में क्‍लर्की करते हुए एम ए किया था और हम दोनों से अधिक अंक किसी अन्‍य का न था।

मैं यह पता चलने पर कि गोरखपुर विश्‍वविद्यालय चाकरी करने वालों को शोध का अवसर नहीं देगा, नौकरी छोड़ कर भाग्‍य आजमाने कलकत्‍ता पहुंच गया और इस बीच रामसेवक जो इससे पहले एक साहित्यिक पत्रिका के कुछ अंक रचना नाम की पत्रिका के निकाल चुके थे, दैनिक जागरण के भोपाल संस्‍करण के संपादक हो कर चले गए और फिर जब दिनमान में पहुुँचे तो मैं दिल्‍ली में अपना ठिकाना बना चुका था। उसके बाद घर अलग और परिवार एक जैसा संबन्‍ध अंत तक बना रहा।
विदा होना तो पड़ता है
विदा कहना तो पड़ता है
न जाता है न जाएगा
उसे रखना भी पड़ता है।

Post – 2016-09-10

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संचार की समस्‍या और विचार का संकट

मुझे भी दूसरों की तरह यह सुन कर अच्‍छा लगता है कि लोगों को मेरा लिखा पसन्‍द आता है। उर्दू मुशायरों में तो जितना समय लोग शेर पढ़ने पर लगाते हैं उससे अधिक समय घूम घूम कर ‘आदाब, आदाब, आदाब कहने में लगाते हैं और तारीफ नहीं हुई तो ”गौर फरमाइये जनाब” कहते हुए अपने मानीखेज शेर को दो तीन बार पढ़ते हैं और तारीफ हो गई तो आदाब बजाने के बाद थोड़ी साँस ले कर वही शेर फिर पढते हैं। पर मेरी जरूरत इससे पूरी नहीं होती।

मैंने फेसबुक पर लिखने का यह फैसला हमारे बौद्धिक पर्यावरण में आई उस गिरावट से अपने को और अपने मित्रों को बाहर निकालने के लिए किया जो शोर तो मचाते हैं, पर कुछ कह नहीं पाते। जिस शोर की पहुँच शोर मचाने वालों तक है और वे ही एक दूसरे को दाद दे कर शोर को सरापा तक पहुँचा देते हैं और अपनी ही व्‍यर्थताबोध से बोलने और लिखने के क्षणों में भी अप्रासंगकि सा महसूस करते हैं।

जरूरी नहीं कि आप जिनको विचलन से बचाना चाहते हैं वे आपकी बात सुनें या कि यह मानें कि वे विचलित है और आप सही रास्‍ते पर हैं। आपकी बात न मानने का एक कारण यह भी है कि शिक्षा देने वाला या सुधार करने वाला जिनको सिखाना या सुधारना चाहता है वहां उसके इस भूमिका में आने के साथ ही यह प्रयास श्रेष्‍ठता और कनिष्‍ठता का भाव जुड़ जाता है। सुधारने वाला यह कहे बिना भी सिद्ध करता है कि वह सही है, दूसरे गलत। गलत लोग अपनी गलती छोड़ कर उसके बराबर हो सकते हैं। इससे आत्‍मरक्षा का एक तन्‍त्र गलत मान लिए गए लोगों में, इस विषय में सचेत हुए बिना भी खड़ा हो जाता है जिसमें वह आपको पूरा सुनने से पहले, आपका इरादा भॉंप कर ही आपका विरोध करने लगता है या अपने कान बन्‍द कर लेता है। जहॉं चुप रह जाना पड़ता है वहॉं भी उस अवसर की तलाश करता रहता है जब आप से कोई बड़ी चूक हो और वह आपको नंगा कर दे। जिन बुराइयों के सभी कायल हैं, जिससे वे स्‍वयं भी बचना चाहते हैं, परन्‍तु आदत गुलामी का दूसरा नाम है सो उससे बच नहीं पाते, जैसे शराबनोशी, उसे भी छोड़ने की सलाह देने वालों को शराबियो से गालियां और फब्तियाँ ही सुननी पड़ती हैं। सुधारकों के बीच फूट और अपराधियों के बीच एक दूसरे के लिए जान देने तक की तैयारी से भी यह समझा जा सकता है कि बुराई का डंका बजाने वालों के बीच इतनी एक जुटता होती है क्‍यों होती है। कारण वे जानते हैं अकेले वे अपना बचाव नहीं कर सकते। संघबद्ध हो कर ही बचाव कर सकते हैं। अपने संगठन के बल पर अपनी हर‍कतें भी जारी रख सकते है और अपने आलोचकों को ही अपराधी सिद्ध कर सकते हैं।

हम अपने भाव या विचार दूसरों तक पहुँचाने के लिए बोलते या लिखते हैं। यदि संचार ही बाधित हो जाय तो यह लेखक, वक्‍ता, कलाकार सभी के इस गर्व को चूर करने के लिए पर्याप्‍त है कि वे बड़े लेखक हैं। वे उस काम की सफलता से ही बड़े हो सकते हैं जिसे वे कर रहे हैं, और उसकी व्‍यर्थता से ही वे कहीं के नहीं रह जाते। हमारे बुद्धिजीवियों, कवियों और कलाकारों को इस बात का प्रखर बोध है कि वे अपने ही समाज से कटे हुए हैं। उनका अपना ही समाज उनसे अलग थलग पड़ गया है। भतृहरि ने कहा था, जो लोग साहित्‍य, संगीत और कला से रहित हैं वे बिना सींग और पूँछ वाले पशु हैं। हमारे बुद्धिजीवी स्‍वयं अपनी कला और साहित्‍य से कट गए हैं। उसकी परंपरा से कट ही नहीं गए हैं, वह उन्‍हें व्‍यर्थ लगती है। वे कलाबाजी में कमाल रखने वाले एक तरह के पशु बन गए हैं तो उनका समाज साहित्‍य, संगीत, और कला से वचित हो कर एक दूसरी तरह के पशुओं के झुंड में बदलता गया है। भर्तृहरि को सही सिद्ध करने के लिए अपराध आज का सबसे बड़ा मनोरंजन, सबसे बड़ा समाचार और सबसे बड़ा कारोबार बनता चला गया है।

हमारे आलोचकों में यदि थोड़ी भी समझ होती तो वे पहले इस समस्‍या से जूझते कि ऐसा हुआ क्‍यों और हम अपने ही समाज से वैचारिक, साहित्यिक और कलात्‍मक संवाद कैसे स्‍थापित कर सकते हैं। इसलिए मैं उन्‍हें उन पशुओं में रखने को बाध्‍य अनुभव करता हूँ जिनकी पूछ भी है और इसलिए पूँछ भी है, गो है बकरी जैसी छोटी क्‍याेंकि यह पूछ सताज से कटे हुए उस मंडली तक ही है। सींग तो मुर्रा भेड़े को भी मात देती हुई पूरी शान से निकली और घूम कर अपने ही माथे में गड़ती हुई । इसलिए इस समस्‍या के चरित्र को समझने में भी वे असमर्थ है, इसको समझने की तैयारी तो उनसे हो नहीं सकती। पचास साल तक वे सभी चीजों का मूल्‍यांकन इस कसौटी पर करते रहे कि इसमें मार्क्‍सवाद है या नहीं और है तो कितने परसेंट। अब लगता है पैमाइश बदल गई है और देखा यह जा रहा है कि इसमें कहीं हिन्‍दू तो नहीं घुस आया है, यदि है तो कितने परसेंट। यह देखने वाला कोई नहीं कि इसमे जिन्‍दगी और समाज कितने परसेंट है और उसमें अपने समाज तक पहुँचने की क्षमता कितने परसेंट बची रह गई है और इस स्थिति से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है।

जब मैं कहता हूँ कि मुझे दाद से सन्‍तोष नहीं है, मैं जानना चाहता हूँ भाषा और संचार की इस समस्‍या को दूर करने में मेरे मित्र अपनी भाषा और अभिव्‍यक्ति में सुधार करते हुए इसे कितनी सार्वजनिक बना सकते हैं कि लोग सुनें भी, समझें भी, बदलें भी । आप में से कोई ऐसा नाकारा नहीं जो जैसा वह सोचता और लिखता है उससे अच्‍छा सोच और लिख न सके और इसे अपनी प्रतिक्रियाओं में भी प्रमाणित न कर सके। प्रतिभा लोक से आती है, परलोक से नहीं। साधारण लोगों की समझ और अभिव्‍यक्ति में निखार आता है तो अधिक संवेदनशील और सक्षम लोग उसे निखार देते हुए वह संवादी साहित्‍य और कला रच पाते हैं जिसके अभाव में हम अपनी अतीत का गौरवगान करने वाले एक उजड्ड समाज के बदल गए हैं।