मित्रों की टिप्पणियों का मैं तभी जवाब देता हूं जब उनमें कोई आलोचना हो या जिज्ञासा हो। अनुकूल टिप्पणियों से बल तो मिलता है पर धन्यवाद तक नहीं कहता, संकोचवश। पसंद करने वालो की नामावली देखता हूं यह समझने के लिए कि किस रुचि के किन लोगों को यह पसंद आया।
Post – 2017-10-03
शास्त्र यदि जीवन से निकले और उसमें लोच हो तो हमारे जीवन को समृद्ध करता है। यदि उसमें लोच की कमी हो तो उस प्रयोजन के विपरीत चला जाता है जिसकी सिद्धि के लिए उसका निर्माण हुआ था । उसमे मानवीयता का स्थान यांत्रिकता ले लेती है। सर्जनात्मकता का अभाव हो जाता है। यह सौंदर्यशास्त्र से लेकर अर्थशास्त्र, राजनीति सभी पर समान रूप से चरितार्थ होता है। यदि शास्त्र का कठोरता से अनुपालन कराया जाय और जिस तंत्र के माध्यम से अनुपालन कराया जाय, उस पर हमारा पूरा नियंत्रण न हो, तो शास्त्रीयता सर्वनाशी भी हो सकती है।
परंतु शास्त्र की निपट उपेक्षा के परिणाम जहां अनिष्टकारी होते है वहां भी उनके परिणाम उतने डरावने नहीं होते।
हमारी हैसियत सामान्य किसानों से कुछ ही अच्छी थी। कहें। अपने को हम जमींदार मानते थे और जिन्हें हम असामी (प्रजा) कहते थे वे हमें राजा बाबू कह कर संबोधित करते थे। सुनकर अच्छा लगता था। मुझे भी, जिसे अपने ही घर में उन असामियों के बच्चो से भी अपमानजनक जीवन जीना पड़ता था।
कुछ बड़ा हुआ तो लगा ये इतने दबाए गए है कि अतिविनम्र हो गए है, और जब इतिहास की समझ पैदा हुई और उस समझ को पुस्तकीय रूप देने लगा तब यह समझ में आया कि गणराज्यों में, जैसे शाक्यों में, ऐसे किसानो को भी राजा क्यों कहा जाता था, जिनके अपने खेत खलिहान होते थे और जो हल भी चलाते थे। वे बारी बारी से अपना प्रधान चुनते थे।
इसके बाद यह समझ में आया कि भारतीय गणव्यवस्था क्या थी और आगे बढ़े गण भी पिछड़े गणों की मर्यादाओं का कितना सम्मान करते थे। इसका अवशेष सभी जातियों की बिरादरी पंचायतों और उनमें अगले साल के लए चुने जाने वाले पदाधिकारियों और उनके द्वारा लिए गए फैसलों के पूरी बिरादरी के लिए अनुल्लंघनीय होने में बचा रहा है। समझ में आया कि क्यों जो हमें राजा कहते थे उनको, हम तो नही पर, हमारे घरों की महिलाएं राउत (राजा), महरा (महाराज), महतो (महोदय) कहती हैं? क्यों युगों पुराना आगे बढ़ने वालों ने भुला दिया है परन्तु पिछड़े जनों और पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं ने बचा रखा है।
अब इस सिरे से सोचें तो क्या समाज के कुछ जनों का पिछड़ जाना यह सामाजिक दमन का परिणाम है या किन्ही कारणों से पहल और सक्रियता में कमी आने का परिणाम?
एक दूसरा प्रश्न, क्या हम पुस्तको में दर्ज घटनाओं और व्याख्याओं से अपने अतीत को समझ सकते हैं? सामाजिक नृतत्व पर काम बहुत कम और उनके द्वारा हुआ है जो हमें तोड़ने के लिए हमारी कमजोरियों को उजागर करना और अपनी अपव्याख्याओं से विषग्रन्थियां पैदा करना चाहतेथे।
कहां का फोड़ा कहां पिराया? दर्द देखो कहाँ से उट्ठा था। देखिये दर्द यह कहाँ पहुंचा?
मैं कहना चाहता था कि हम अपने को और दूसरे हमको जमींदार मानते तो थे परन्तु अंग्रेजों ने जिस तरह के जमीदार बंगाल और बिहार में पैदा किये और उनसे भी पहले सुल्तानों और मुगलों और नवाबों ने पैदा किए, उनके सामने हमारी हैसियत उनकी रिआया जैसी थी, परन्तु उसकी रिआया भी उसे अपना राजा नहों मानती थी।
हम फिर भी अपनी बात सलीके से नही रख पाए, कहना यह चाहते थे की छोटे बाबा का यह निर्णय कि बाबा की शाहखर्ची आर्थिक दिवालियेपन की ओर ले जा रही है, इससे समय रहते, बचना चाहिए और जिन के मर्यादाओं के कारण भाई अपने छोटे भाइयों का जवाब तक नहीं दे पाता उनको तोड़ना होगा उनसे कूई चूक न हुई पर कैसे अम्ल करना है इसमें उनसे चूक हुई। परंतु यदि भूमिका सुरसा का मुंह बन जाए तो आगे कुछ कहा जा सकता है क्या?
Post – 2017-10-02
बंटवारा
छोटे बाबा के इस प्रस्ताव को समझने में कि ‘ए भइया, तुहरे एक्कै लइका बा आ हमरे पांच बाटें। हम एतना खर्चा नाहीं उठा सकेलीं।‘ मुझे बहुत लम्बा समय लगा. यह वाक्य उन्होंने जब कहा था तब मैं बहुत छोटा था। यह मुझे किससे और कितने बाद सुनने को मिला था, यह याद नही। वह इसे जब तब बाद में भी दुहराया करते थे। पर साझे चूल्हे में तो दूसरे के एक के साथ उनके पांच पलते। लाभ में वही थे, पर गणित इतना सादा नहीं था। सच तो यह है कि उस समय तक उनकी ओर कुल सात प्राणी थे हमारी ओर पांच।
असल कारण यह था कि बाबा जिह्वापराय थे। नित्य आमिषभोजी। वह स्वभाव से दयालु थे। मांसाहार छोड़ना चाहते थे। छोड़ नहीं पाते थे। उनकी दशा याज्ञवल्क्य जैसी थी। याज्ञवल्क्य वस्तुवादी थे, बाबा परलोकवादी. याज्ञवल्क्य ने इस आधार पर गोमांस भक्षण की कठोरतम भाषा में निंदा की थी हमारा अपना जीवन और हमारी अपनी भावी पीढ़ियो का जीवन इन बछड़ों-बैलों पर निर्भर है और जो व्यक्ति इन का भक्षण करता है वह अपनी भावी पीढ़ियों का भक्षण करता है. इतनी कठोर वर्जना के बाद भी वह स्वीकार करते हैं कि मैं अपने को रोक नहीं पाता। उनका सरोकार शुद्ध आर्थिक था, हिंसा-अहिंसा, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक के लिए इसमें स्थान न था।
बाबा की चिंता का कितना संबंध दयालुता से था यह तय कर पाना मेरे लिए आसान नहीं है, क्योंकि मांसाहार के कारण वह नरक जाने से बच नहीं सकते थे इसलिए एक ओर तो मांसाहार छोड़ना चाहता थे पर याज्ञवल्क्य जैसी विवशता थी।
पर वह यह जरूर चाहते थे कि उनके बाद घर में कोई दूसरा मांसाहार न करे। इसके लिए उन्होंने बाबूजी (मेरे पिता) को विष्णु का गुरुमंत्र दिलवाया था और वह आजीवन शाकाहारी रहे। पति शाकाहारी तो अर्धांगिनी आमिषभोजी हो नहीं सकती। बच्चे गुरुमंत्र से पहले कुछ भी खाएं-पिएं उन्हें दोष-पाप नहीं लगता, इसलिए हम बच्चों को कोई रोक न थी। यहां तक कि हम टोंइआ (मिट्टी का वालकों के लिए बना गेड़ुआ, टोइआ का अर्थ है त्रोट या चोंच वाला पात्र। इसका इतिहास बलि-बामन की कथी तक जाता है इसलिए इसे अरब या इस्लाम सा ल जोड़ें ) ताड़ी भी पी सकते थे। दूसरी ओर नरक से बचने के लिए उनको अजामिल की तरह मरने के समय रामनाम का सहारा था, इसलिए उन्होंने बाबूजी का नाम रामधारी, भैया का विष्णुदेव, मेरा भगवान, मुझसे छोटे भाई का रामकृष्ण रखा था। लड़कियों मे से भी किसी की याद अन्तकाल में आ सकती थी, यह कल्पनातीत था, इसलिए उनका नामकरण करते समय इसका ध्यान नहीं रखा गया था।
लेकिन इस पर पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता था। पता नहीं अंतिम क्षणों में होश में रहें भी या न रहें। बाबा रामचंद्रदास या राघवदास किसानों के बीच कितने समादृत थे इसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। मेरे गांव भी उनका आना जाना होता था। बाबा ने उनके सामने अपनी समस्या रखी, “बाबा, मैं लाख कोशिश करके हार गया। जीभ मानती ही नहीं। कोई ऐसा उपाय बताइए कि मेरी मांसाहार की आदत छूट जाय।“
परभंस (परमहंस, राघोदास) महराज के पास तो हर समस्या का समाधान था। बोले, “मन करता है तो मन को क्यों मारिएगा। खाइए। जीभ के कारण यह होता है न, उसे सजा दीजिए। राम राम कहा कीजिए।“
यह हुआ सही उपाय। सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे।
बाबा खाली समय में अनवरत राम राम जपते रहते। बाबा बहुत अच्छे सूपकार (पाकशास्त्री) थे। परंतु आमिष भोजन वह स्वयं पकाते। इसका प्रधान कारण यह कि जो शाकाहारी है उसको मांस पकाने को न तो कहा जा सकता है, न उसका पकाया खाया जा सकता है। ईंधन कोयला, गैस या बिजली का था नहीं कि रख कर रसोई से हिला जा सके। ईंधन को लगातार चूल्हे में सरकाते रहने के लिए रसोइए को वहीं जमे रहना पड़ता था। एक ओर कलिया पक रहा है। उसका आमिष गंध वातावरण फैल रहा है और दूसरी ओर उसी के बीच राम राम का मन्दनादी पाठ चल रहा है और दोनों के योग से जो स्वाद पैदा होता था वैसा तीस चालीस साल के बाद एक बार मिला तो याद आया यह तो वही स्वाद है जो बाबा के पाक में हुआ करता था।
मुझे दो बातों को लेकर हैरानी हुई। कोई और भी हो सकता था जो उतना सुस्वाद भोजन बना सके। अधिक विस्मय इस बात को लेकर कि हमारे सवाद के स्मृति-संकेत इतने स्पष्ट रूप में मस्तिष्क में कैसे सुरक्षित रह सकते हैं।
बाबा की नरकवास की चिंता राम नाम के जाप या लोगों का ईशपरक नाम रखने से भी दूर नहीं हो रही थी। एकमात्र अचूक उपाय था काशी में प्राणत्याग, पर वह फिर कभी।
छोटे बाबा का मांसाहार के प्रति दृष्टिकोण याज्ञवल्क्य की तरह शुद्ध अर्थशास्त्रीय था, परन्तु उनमें कुछ मामलों में असाधारण आत्मनियन्त्रण था। वह दूर की सोचते थे और उन्हे अपनी दूरदर्शिता पर अटूट विश्वास था और उनकी जितनी भी भविष्यवाणियां होती थों उनमें से मैने किसी को गलत होते नहीं पाया।
उन्होंने यह समझ लिया था कि तबतक की पारिवारिक एकता केवल सद्भावना पर नहीं टिकी थी, बल्कि इस कठोर सचाई पर टिकी थी कि वंशपरंपरा एकल थी। पहली बार उनके पांच पुत्र हुए थे जब कि बाबा के एक बाबू जी। जब भी बंटवारे की नौबत आएगी, बाबूजी को आधा मिलेगा और उनकी संतानों को आधे का पांचवां, अर्थात् दसवां हिस्सा मिलेगा। तब क्या उनके बच्चों को वही जीवन स्तर मिलेगा जिसके वे आदी हो चुके रहेंगे।
यही वह बिंदु है जिस पर उन्होने कहें-या-न-कहें के संशय पर विजय पाकर तर्कसहित विभाजन का प्रस्ताव रखा था।
Post – 2017-10-01
यदि आप मेरी पोस्ट से परिचित हैं तो भी जरूरी नहीं कि मेरे उस मित्र से भी परिचित हों जिससे मेरी दोस्ती इस बात पर टिकी है कि वह मुझे मूर्ख समझता है और मैं उसकी मूर्खता उजागर करता रहता हूं। जिस दिन किसी को दूसरे की समझदारी पर विश्वास हो गया, दोस्ती टूट जाएगी। उसने मेरे वाल पर एक कविता पोस्ट टैग की । उसका अंग्रेजी अनुवाद अपेक्षित था, हम हिंदी इरादानुवाद देने का प्रयत्न कर रहे हैः
ग़ारती
क्षय क्षय क्षय क्षय
ग़ारत माता!
क्षय जग ठगनी
क्षय डकारिणि
शत्रु दारिणि मां!
संकट आता, संकट जाता
संकट बन कर क्रांति विधाता
तुझको झुक कर शीश नवाता
फिर भी धिक धिक बकता निशि -दिन
तुझको ग़ारत करता जाता
गारत-गारत
गाता-गाता
गारत माता गारत माता।
और हमें कुच्छौ नहिं आता॥
क्षय क्षय क्षय क्षय
गारत माता!
Post – 2017-09-30
किसको दुश्मन कहें सगा किसको
मकान बड़ा था, परन्तु जितना बड़ा था उससे अधिक रहस्यमय लगता था। यह बिना किसी विभाजन रेखा के दो भागों में बंटा था। इन्हें हम अलंग कहते थे। इसका दृश्य भाग धुंधला और शेष डरावनी संभावनाओं वाले अंधकार और सन्नाटे से भरा लगता, जिसमें अकेले घुसने की न मुझे जरूरत पड़ सकती थी, न घुसने का साहस कर सकता था। इसका सबसे रहस्यमय और सबसे अंधेरा कोना था, दक्खिन-पच्छिम कोने की कोठरी जिसमें लगभग जीवन से निर्वासित की तरह बुटुका काकी रहती थीं। वह सबकी काकी थीं, बाबा की भी, सच कहें तो बाबा लोगों की ही। वह हमारे परदादा छत्तर बाबा के सबसे छोटे भाई नैपाल ठकुराई की पत्नी थीं जिनके एक बेटी तो हुई थी, बेटा कोई नहीं। वह होकर भी न होने जैसी जिन्दगी जी रही थीं। मेरी दादी की मौत कब हुई इसे न किसी ने बताया न पूछने का साहस हुआ। छोटी दादी की मौत मेरे जन्म के कुछ ही बाद हुआ होगा क्योंकि उनकी अन्तिम संतान, जगदीश काका थे जो मुझसे छह महीने ही बड़े थे और आगे की कक्षाओं में मेरे सहपाठी थे। जैसे बुटुका काकी सबकी काकी थीं वैसे ही जगदीश काका मेरे और अपने सभी सहपाठियों के काका बनने वाले थे।
उस तीस पैंतीस फुट लंबाई के बिना खिड़की-रोशनदान के सुरंग जैसे अंधेरे आठ कमरों वाले घर में दो महिलाओं का राज था। माई काकी से पद में बड़ी थी, इसलिए वह भैयाजी ’ब कह कर माई के गोड भी लगती थीं और अनुभव और उम्र में बड़ी थीं इसलिए माई को दबाकर रखने के तरीके भी निकालती रहती थी जिसमे उसे अपमानित करने के तरीके भी शामिल थे, परन्तु औपचारिक व्यवहार इतना सम्मानजनक कि शिकायत करने वाला जिससे शिकायत करे उसकी ही नज़र में गिर जाये।
भैया और दीदी को मां की याद थी और अपनी माँ का स्थान लेनेवाली स्त्री को स्वीकार करने को तैयार न थे। ऊपर से माई के व्यवहार में, प्रकृति प्रेरित, सपत्नघातिनी वाले तत्व तो थे ही, इसलिए उन्होंने विद्रोह सा कर दिया था। मेरी स्थिति दूसरी थी।
शिशुओं के चेतना जगत में असंभव और प्रतिलोम भी इतने विश्वसनीय रूप में घटित होते हैं कि बड़े होने पर हम उस अनुभव और उसके अतार्किक सत्य को, एक भिन्न भाषा में, अधिक विश्वास से, व्यक्त करने वाले तंत्र को समझ ही नहीं पाते और उसकी याद दिलाई जाय तो ठहाका भरने लगते हैं। हम स्वप्नतंत्र की अकाट्य प्रामाणिकता के पीछे काम करने वाले तर्कातीत दबाव को नहीं समझ सकते और यह तो समझ ही नहीं सकते कि मूर्खता के कितने आयाम और सत्य के साक्षात्कार के कितने अकल्पित द्वार होते हैं।
मै मानता था, और भैया और दीदी के समझाने के बाद भी मानता था कि माँ मरी नहीं है। मुझसे ओझल हो गई है। जीवन के साथ इसकी समाप्ति से अधिक क्रूरता की मैं कल्पना नही कर सकता था, इसलिए पहले ही साक्षात्कार में वह मेरा नाम आदि पूछती, उससे पहले ही मैंने स्वयं पूछा था, ‘तू कहाँ चलि गइल रहलू, हमसे कौनो भूल हो गइल रहल का?’
मैं कह चुका हूं, इस प्रश्न से वह विगलित हो गई थी और आगे कोई प्रश्न न कर सकी थी. उसने मेरा स्पर्श किया था, स्पर्श याद है, कहाँ, माथे पर या गाल पर या चिबुक पर या पीठ पर यह याद नहीं फिर भी यह याद रहा कि उसमें ममता थी, जो मेरे इस विश्वास को दृढ कर रहा था कि मेरी अपनी माँ ही लौट कर आई है. भैया या दीदी को भी मुझसे पहले इसी तरह अलग अलग बुलाया गया था. न कभी इस पर बात हुई, न यह जाना कि उनका अनुभव क्या था. मै प्रथम शक्ति परीक्षण में अपनी मैभा, विमाता, पर विजय पाकर, उसके मातृभाव को जगा कर लौटा था. भैया और दीदी युद्ध ठान कर लौटे थे।
मुझे कुछ समय लगा यह समझने में कि वह मेरी माँ है या कुछ और. वह कुछ और क्या होता है इसे समझने में भी उसने ही मदद की। वे इसे अपनी हथेली की रेखाओं से भी अच्छी तरह जानते थे। मुझे दो तटबंधों के बीच सही धारा का चुनाव करना था जिसमें जीवनयात्रा में व्यवधान दूर हो सकें, उन्हें अपने बचाव के लिए दूसरे को मिटाने के निर्णायक युद्ध में उतरना था। सभी सताए हुए थे और सभी अपने शत्रु को सताने का खेल खेल रहे थे और अपने उस विद्रोह के कारण दीदी और भैया काकी के हाथ लग गए थे और अपने व्यवहार से माई को उससे अधिक उत्पीडित कर रहे थे जितना वह उन्हें कर सकती थी।
अजीब स्थिति है। अत्याचारी पर अत्याचार हो रहा है। वह अपने अत्याचारियों के सामने निरुपाय है। वह उनका बदला उससे ले रहा है जो उससे अधिक निरुपाय है, उसी पर आश्रित है और उससे सहानुभूति रखता है। यह मैं था।
Post – 2017-09-29
स़च तो यह है मगर सच होने से क्या होता हे
वही होता है जो होकर भी नहीं होता है।।
सभी लोग दूसरों से कुछ अलग होते है। पहली नजर में एक जैसे लगने वाले परिवारों के सदस्यों को ध्यान से देखने पर वे दूसरों से काफी अलग और कुछ विचित्र लगते हैं। मेरे परिवार के साथ पाखंड का एक तत्व अलग से जुड़ गया था, इसलिए अनेक मामलों में यह दूसरों से अधिक विचित्र था। यह प्रेरक भी था और मारक भी, इसलिए इस विचित्रता पर हम गर्व करते थे। इसके कारण मेरी यातना कई गुना बढ़ गई थी। मेरे लिए मेरा घर अनाथालय से भी बुरा बन गया था और इसके बाद भी मैं इस पर बहुत बाद तक और, दूसरों से कुछ अधिक, गर्व करता था।
सामान्यतः दूसरे परिवारों में घरेलू कलह के कारण एक पुश्त के बाद बंटवारा हो जाता है। हमारा परिवार तीन पुश्तों से एक था और जब चूल्हे अलग हुए तो भी, खेती-बारी एक रही। पांच पुश्तों के बाद खेती भी बंट गई तब भी, आज सातवीं पुश्त चल रही और बाग-बगीचे बंटे नहीं हैं।
इसका शर्मनाक पक्ष यह कि जो लूटे सो खाए और सहयोग की गौरवपरंपरा की दुहाई देकर बंटवारे को असंभव बनाए और जो कमजोर या आलसी हो , वह दूसरे की नीयत की खोट और अपनी अकर्मण्यता को अपनी उदारता मान कर आत्मग्लानि से बचें और अपनों को समझाएं कि हम कितने उदार हैं और इस पर गर्व भी करने लगें और जिसकी खोट निकाल कर गर्व करें वह, उसे ही अपना चारित्रिक गुण मान कर उस पर गर्व करे, अपने को आश्वस्त करे और अपनों को उस पर गर्व करना सिखाए, परन्तु दूसरे को मूर्ख बनाने की सद्भावना गाथा की दुहाई देकर उसे मूर्ख बनाने की क्षमता पर भी गर्व करे और अपनों को गर्व करना सिखाए और इसकी एक अलग ‘गौरवशाली’ परम्परा कायम हो जाय।
अब एक का गर्हित दूसरे का गौरवशाली हो गया। कृपया यह न समझें कि मैं भारत का राजनैतिक इतिहास बखान रहा हूँ। सच मानें, मै अपने घर की, अपने भोगे हुए अनुभव की, और केवल अपनी, बात कर रहा हूं।
माँ जब तक जीवित थी परिवार बंटे होने पर भी, छोटी मोटी गलतियों पर आँख मूदने के बाद भी, न्याय की तुला काम कर रही थी। बाबा जब तक जीवित थे और खेती का काम पिता जी देख रहे थे और सहायक के रूप में अवध काका काम कर रहे थे, तक जिन्दा थी। हिसाब बराबर। क्योंकि जब पिताजी खेती की देखरेख कर रहे थे तब भी छोटे बाबा हर चीज की खोज खबर रखते थे और अपना समय छावनी पर ही बिताते थे। छोटे बाबा के जीवन काल में ही उनके सबसे बड़े पुत्र, रामचंद्र को सिपाही की नौकरी लग गई थी, इसलिए उनकी मृत्यु के बाद छोटे बाबा की संतानों में दूसरे अवध काका (अवधेश) उनके सहायक बन गए थे । इस तरह संतुलन बना रहा और ईमानदारी भी बनी रही। बाबा की मृत्यु के बाद पिता जी कुछ भौतिक कारणों से और कुछ आराम तलबा: हि देवाः के सिद्धांत से यह बहाना बना कर घर पर बैठ गए कि दरवाजे पर भी कोई होना चाहिए, और तराजू का दूसरा पलड़ा खाली हो गया और यहाँ से आरम्भ हुई वह चोरी और बेईमानी जिसे सहन करते हुए माई अपनी उदारता और उनकी कृपणता और तुच्छता के नमूने पेश करती हुई मेरी नजरों में भी महान होने का भ्रम पैदा करने लगी।
Post – 2017-09-27
जिनकी रुचि बीएचयू कांड में अभी बनी रह गई हो वे मेकिंग इंडिया में अजित सिंह की रिपोर्ट पढ़ें। मैं अपनी कहानी तक सीमित रहना चाहता हूं।
Post – 2017-09-26
बतंगड़
एक ऐसे दौर में जब समाचारपत्र विज्ञापन पत्र बन गए हैं, दृश्य माध्यम सनासनी पैदा करने के लिए जघन्यतम अपराध कर सकते हों ( तहलका के माध्यम से फर्नांडीज का जालसाजी पूर्वक चरित्र हनन, एक गरीब बच्चे को शराब पिला कर और ५० देकर मध्य प्रदेश की शिक्षामंत्री के पाँव पड़ने को तैयार करना और उसके ऐसा करने पर उनका पाँव झटकना और इसका विडिओ बनाना, दिल्ली की एक स्कूल की एक शिक्षिका के खिलाफ जघन्य आरोप लगाते हुए उसका जीवन नरक बना देना और फिर इनका राज खुलना, एक प्रसिद्ध चैनेल के द्वारा संवेदनशील सैनिक एअरपोर्ट की रेकी करना, एक अन्य का अपनी प्रचारर्शक्ति से अरविन्द केजरीवाल को भगत सिंह बनाने का आश्वासन देते हुए एंकर द्वारा उनके घुटनों को हाथ लगाना, अभी BHU प्रकरण में यह आरोप कि एक चैनेल अपने साथ गाड़ी में भर कर लड़कियों को ले गया और उनके बयान दर्ज किए, और वाचाल लड़कियों के एक दल का मुंह छिपाकर शिकायती बयान देना और उनके आधार पर कहानी बनाना – दृश्य माध्यमों के अपराधीकरण की बात करते हुए मेरी जहन में हैं) बुद्धिजीवियों का अपरिवर्तनीय दृढ़ता से किसी एक राजनीतिक समझ से जुडा रहना और आनन फानन कुछ भी करने को दौड़ पड़ना, विश्वसनीय सूचना और विचार के ऐसे गहराते संकट की और संकेत करता जिसमे पूरे समाज के अर्धविक्षिप्त होते जाने की संभावना प्रबल होती जा रही है.
ऐसे में फेसबुक का पूरी ईमानदारी से, अपनी सर्वोत्तम जानकारी के तथ्यो, प्रमाणों के साथ रखते हुए विचारों का आदान प्रदान करें तो स्वयं एक संचार और विचार मंच तैयार कर सकते हैं। बात करें, बतंगड़ से बचें। बात में तथ्य, तर्क, प्रमाण पेश करते हैं, उनके साथ छेड़छाड़ नहीं करते, निष्कर्ष उनसे निकलता है। बतंगड़ में आप अभियोग लगाते, नई या पुरानी गालियां देते हैं, भड़ांस निकालते हैं और बहुत सारी लफ्फाजी के बाद भी कुछ कह नही पाते।
आप के आग्रह और पूर्वाग्रह हो सकते हैं. वे लंबी छानबीन का बाद निश्चित किए हुए विचार होते हैं। सबके अपने होते हैं, वे तब दुराग्रह बन जाते है जब आप उनसे भिन्न विचारों, प्रमाणों को सुनने को तैयार नहीं होते।
सच है मैं मोदी को इतिहासपुरुष मानता हूं, आप को जब तक ऐसा न लगे, न मानें। बहस का विषय यह नहीं है। सहमत लोगों के बीच तो विचार की जरूरत ही नहीं।
Post – 2017-09-25
शिखंडी आन्दोलन
मुझे बीएचयू की छात्राओं की मांग इतनी उचित और इतनी व्यावहारिक लग रही थी कि आश्चर्य इस पर हो रहा था कोई कुलपति किसी भी विचारधारा का क्यों न हो, उनको अस्वीकार कैसे कर सकता है। उल्टे उपकुलपति ने परिसर में माग रखने वाली लड़कियों को दंडित करने के लिए पुलिस को बुला लिया। ऐसे कुलपति को तत्काल निकाल दिया जाना चाहिए, यह मेरा मत था इसलिए आश्चर्य इस पर भी हो रहा था कि ऐसा क्यों नहीं किया गया।
आश्चर्य इस मांग के लिए चुने गए मौके पर भी हो रहा था जो मोदी बनारस के लिए जो चौदह उपहार देने गए थे उससे ध्यान हटाने के लिए ऐसा हंगामा खड़ा करने के प्रयोजन से आयोजित किया गया लगता था, कि समाचार चैनेलों का सारा जोर और शोर इसी पर केन्द्रित हो जाय। आधी रात के समय धरना और दोनों प्रवेश द्वारों को बन्द कर देना अहिंसक होते हुए भी उपद्रवी योजना प्रतीत हो रही थी इसलिए मैं उलझन में था कि इसका भीतरी सच क्या है? बाद में जब तोड़ फोड़, आगजनी की और पेट्रोल बम फोड़ने की वारदात हुई तो राजनीतिक षड्यन्त्र का चरित्र उजागर हो गया।
पर आश्चर्यों में परम आशचर्य यह एकता सिंह है जिसने कथित रूप से आरंभ में इसका नेतृत्व किया था। उसका मोहभंग और यह आरोप कि इसे जेएनयू, दिवि, इलाहाबाद से गए हुए छात्रों छात्राओं ने हाईजैक कर लिया । एक चैनल मनचाही रपट तैयार करने के लिए ट्यूटर्ड लड़कियों को अलग गाड़ी में भर कर ले कर गया था और उनका बयान लेकर रपट बनाई।
समाचार चैनलों का सुर एक झटके में ऐसा बदला था जैसे उनको खरीद लिया गया हो।
अब इसके तीन पक्ष चिन्ता पैदा करते हैं। पहला, इसके पीछे काम करने वाला पैसा । अयोध्या में प्रदर्शन के लिए अर्जुन सिंह ने सहमत को भारी रकम दी थी। यहां इतनी संस्थाएं और चैनल खरीदे गए।
दूसरा है समाचार चैनलों का आपराधिक चरित्र जो सुपारी किलर का हो चला है।
तीसरा है विरोध की राजनीति का अपराधीकरण। जो लड़के छेड़छाड़ के दोषी थे, वे आन्दोलनकारियों में शामिल थे और उन्हें गिरफतार भी किया गया।
जो लोग आन्दोलन से बहुत उत्साहित थे उन्हें एकता सिंह की पहचान करते हुए इन आशंकाओं का निराकरण करना चाहिए।
Post – 2017-09-25
माँ का जाना (३)
मैं वापस नहीं लौटना चाहता था। जहां बैठा था। वहां से हटना भी नहीं चाहता था। यह बताना भी नहीं चाह्ता था कि क्यों मुझे वहीं बैठे रहना है। जलाने की तो मैं कल्पना ही नहीं कर सकता था। अगर इसे सोचना कहा जा सके तो, मैं सोचता था कि जब लोग माँ को नदी में डुबायेंगे तो वह उसी तरह अफनायेंगी जैसे नहाते समय सि र पर एक साथ पानी डालने पर, साँस लेने में रुकावट से, मैं अफनाता था और तब बाबा को दया आजायेगी और वे उन्हें लेकर उसी तरह लौटेंगे जैसे लेकर गए थे। मैं लौटने वालों के साथ माँ के लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था।
मैं कई तरह की असम्भव प्रतीत होने वाली संभावनाओं के बीच माँ को जीवित पाना चाहता था और इसे किसी को समझा नही सकता था। दीदी को भी नहीं। मेरे पास अपने मन की बात कहने की भाषा भी नहीं थी। भाषा होती भी तो अपनी भावनाओं की पवित्रता के सम्मान के लिए, जिसे मै समझता था, किसी दूसरे को इसलिए नहीं समझा सकता था कि यदि उसने, उस पर संदेह प्रकट किया तो वह गलत नहीं होगा, उसके संदेह के साथ ही उसकी पवित्रता भंग हो जायेगी। गलत होना मुझे सह्य था, पवित्रता का भंग नहीं सह सकता था। यह अपराध मेरे अपनों के द्वारा भी हो सकता था। मेरी अपनी दीदी के द्वारा भी। यदि उसने कोई शंका जताई तो उस पवित्रता के साथ ही मेरा वर्तमान और भविष्य का सपना टूट जाएगा। दीदी मुझे घसीट कर वापस ले जाना चाहती थी और मैं उठने और चलने को तैयार न था। यह बताने को भी तैयार न था कि क्यों अपनी जिद पर अड़ा हूँ।
यह कोई अप्रत्याशित घटना न थी। आए दिन हमारा पाला ऐसे बच्चों से पड़ता है जो किसी बात की जिद ठान लेते हैं और उन्हें समझाने में हमारे सभी तर्क, यहाँ तक कि पुचकारने फुसलाने के नुस्खे भी बेकार हो जाते है। हम मानते हैं कि बच्चे, बच्चा होने के कारण, हमारी बात नहीं समझते। यह नहीं सोचते कि हम अपने बचपन को खो बैठने के कारण, बच्चों के विचारों को, जो मनोभावों और विचारों की अविभाजित अवस्था की संपदा होते हैं और जिसे हम बौद्धिक विकास के क्रम में खो चुके होते हैं, इसलिए वे हमारी समझ में नहीं आते। इसे परखने के लिए शोध होना चाहिए कि सही होने के लिए बुद्धि और भावना और नैसर्गिक क्षमताओं का सही अनुपात क्या होना चाहिए? मनुष्य के मनुष्य बने रहने और पशु और यन्त्र बनने के बीच की कोई चीज बनने के बीच की दूरियां कितनी बढ़ी हैं या कम हुई हैं?
दीदी अपनी जिद पर अड़ी थी कि मुझे तुरत लौटना होगा और मै इस जिद पर अड़ा था कि वहां से हटना नहीं है। इसलिए जब वश न चला तो उसने मुझे मेरे विरोध के बाद भी गोदी में उठा लिया।
विवशता के भी कुछ लाभ हैं, ऐसे ही दासता के भी होंगे। मुझे वापसी में पैदल नही चलना पड़ा । वे कब लौटे इसका पता न चला। वापसी गोदी में ही हुई हो पर इतनी लम्बी यात्रा और प्रतीक्षा के बाद मै इतना थक गया था कि जब वे लौटे तो उसका कोई दृश्य नहीं । मैं थकान से सो गया होऊंगा।
उसके बाद एक शून्य है जिसमें जो घटित हुआ होगा उसकी कोई छाप या निशान नहीं। इस बात का भी नहीं कि उसका ब्रह्मभोज हुआ था। इसका तो हो ही नहीं सकता कि उसके महाभोज के बाद उसकी वर्षी भी इसलिए कर दी गई थी कि घर में कोई रोटी देनेवाला न था। शुभम् शीघ्रम् के न्याय से वे जल्द से जल्द अपनी जरूरतें पूरी करना चाहते थे और मैं अपने सपने पूरा करना चाहता था। दोनों की अपेक्षाओं की संधिभूमि थी माई, जो मेरे तो माँ की वापसी थी और प्रकृति के यंत्र के रूप सपत्न घातिनी थी जिसे प्रकृति ने अपने नियम से बनाया था और जिसे मानवीय व्यवस्था से आजीवन लड़ना पड़ा और जो जीत कर भी हारती रही और हारते हुए भी जानती रही कि वह किसी दूसरे से नहीं अपने से हार रही है।
सभी के लिए मेरी माँ मर गई। केवल मेरे लिए वह जिन्दा थी और पहले से अधिक जिंदा माई के कारण रही, उसकी यातना के कारण । मेरी रचनाओं में, ‘महाभिषग’ और ‘अपने अपने राम’ में ही नहीं मेरी अन्य कृतियों में भी रहस्यमय तरीके से माँ जिंदा है। पर मैंने अपनी पीड़ा से ग्रस्त होकर विमाता की पीड़ा को भुलाया नहीं, वह भी इन में जीवित है। आश्चर्य इस बात पर अवश्य है कि अपनी पीड़ा से ऊपर उठ कर मुझे पीड़ित करनेवाली की पीड़ा का बोध मुझमें इतनी कम आयु में कैसे पैदा हो गया था। यह किसी विशेष प्रतिभा के कारण न था यह विश्वास के साथ कह सकता हूं?