Post – 2017-07-24

मैं अभी कल के वादे के अनुसार नजर अपनी अपनी का अगला हिस्सा लिखने जा रहा था कि फेसबुक ने पिछले साल आज के दिन लिखी एक तुकबन्दी पेश कर दी। इसे मैंने इसलिए साझा कर लिया कि मेरा आधा जवाब इसमें दिया जा चुका है । आधा कुछ देर बाद।

Post – 2017-07-23

नजर अपनी अपनी समझ अपनी अपनी

कल जिन दो उपयोगी टिप्पणियों की बात कर रहा था उनमें से एक का उत्तर मैंने अपनी समझ से कल दे दिया था। जरूरी नहीं कि वह स्वीकार्य भी लगे।

दूसरी टिप्पणी डा.भगवान प्रसाद सिन्हा की थी। यह दो टुकड़ों में थी। एक में उनका आरोप था कि येदियुरप्पा ने भी अपने शासन काल में कर्नाटक राज्य के झंडे की बात की थी परन्तु उसकी मैंने निन्दा नहीं की।

सचाई यह है कि मुझे इसकी जानकारी नहीं थी और मैंने उनसे ही इसके स्रोत की जानकारी चाही तो उन्होंने किसी के वाल से एक चित्र प्रमाण स्वरूप भेज दिया। इस तरह की प्रवृत्ति को मैं निन्दनीय मानता हूं परन्तु उन्होंने जो स्रोत दिया है वह भी भरोसे का नहीं, आज कल सामाजिक मंचों पर कई तरह की हेराफेरी हो रही है। परन्तु इसके आधार पर मैं यह नहीं कह सकता कि येदियुरप्पा ने ऐसा न किया होगा। वह संदिग्ध चरत्रि के व्यक्ति हैं और इसके लिए उनको निष्कासन का भी सामना करना पड़ा था। ऐसे लोग दुस्साहसिक कृत्यों से अपने लिए आवरण तैयार करते हैं।

जिस बात को सिन्हा जी जैसा मनस्वी व्यक्ति भी लक्ष्य करने से चूक गया वह यह कि येदियुरप्पा ने राष्ट्रीय ध्वज की अवज्ञा कारते हुए ऐसा न किया था और इसीलिए यह उन दिनों भी यह चर्चा में न आया था । उसी चित्र में पहले राष्ट्रध्वज फहराया जा चुका है और उसके बाद एक राज्य ध्वज फहराने का प्रयत्न हो रहा है। इसके विपरीत कर्नाटक के नये मंत्री के कारनामे की जा सूचना है वह निम्न प्रकार हैः

पत्रिका
“आजाद भारत में पहली बार किसी राज्य ने अलग झंडे की मांग की है। वहीं इस मुद्दे पर कर्नाटक का पीएम भी बनाओ की बहस छिड़ चुकी है। जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर कर्नाटक में यह मांग उठी है। कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने 9 सदस्यीय कमेटी बनाई है जो झंडे का डिजाइन तैयार करेगी। केंद्र सरकार ने राज्य की इस मांग को खारिज कर दिया है। केंद्रीय मंत्री सदानंद गौडा ने कहा कि भारत एक राष्ट्र है, इसके दो झंडे नहीं हो सकते। कांग्रेस ने भी इसका विरोध किया है। इसके अलावा इस कमेटी को नए झंडे के लिए कानूनी दांव-पेंच से जुड़ी रिपोर्ट भी बनानी होगी। जम्मू-कश्मीर को संविधान की धारा-370 के तहत स्पेशल स्टेट्स दिया गया है।”

सिन्हा साहब जैसा विद्वान, मनस्वी, और सामाजिक रूप में जागरूक माना जाने वाला व्यक्ति इस गर्हित चेष्टा की कठोर शब्दों में निन्दा करने की जगह येदियुरप्पा की आड़ में इसका बचाव न किया होता तो यह उनकी गरिमा के अधिक अनुरूप रहा होता। परन्तु मोदी द्रोह में लोग जो चाहते हैं उसे ही बाहर देख लेते हैं और इस तरह अपने सामाजिक यथार्थ से कट जाते हैं जिसके परिणाम उनके लिए ही अनिष्टकर होते हैं। यदि वह वामपंथी सोच रखते हैं तो वस्तुपरक होना उसकी पहली जरूरत है।

उनकी दूसरी टिप्पणी मेरे इस दावे का खंडन करने के लिए थी कि मोदी का लक्ष्य सबका साथ और सबका विकास है। टिप्पणी निम्न प्रकार हैः

“ग़रीबी हटाओ जैसे नारे का हश्र भी देखा और सबका साथ सबका विकास नारे की दुर्गति भी तीन साल में लोग महसूस कर रहे हैं ,अंबानी की संपत्तियों में रेकॉर्डतोड़ विकास और किसानों और जवानों की आत्महत्या और हत्या में रेकॉर्डतोड़ बढ़ोतरी ! गोरक्षकों के ज़रिये और ख़ननमाफ़ियाओं को उपकृत कर सबका साथ सबका विकास जारी है । नौकरियों के अवसरों में रेकॉर्डतोड़ गिरावट से सबका साथ सबका विकास हो रहा है । आपके ही पोस्ट पर कभी लिखा मैंने पाया था कि योगी आदित्य जैसे कट्टर साम्प्रदायवादियों की अवहेलना कर मोदी ने पंथनिरपेक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जता दी । चुनाव के बाद आपके इस विश्वास की साख का ध्वंस होते देखा मैंने । शायद उस समय यह आपके ज़ेहन में नहीं आया होगा कि योगी का कद मोदी से बड़ा है जैसे कभी वाजपेयी को यह पता नहीं चला था कि गुजरात का मुख्यमंत्री भारत के प्रधानमंत्री से बड़ा हो चुका है । आपलोगों के पास एक weeping boy है वामपंथी ! बस उससे जनता में काल्पनिक ख़ौफ़ भरते हैं जबकि उसका वास्तविक ख़ौफ़ आपके शासकों के पास होता है जिसको अगर विश्वास हो जाय कि शुद्ध मुनाफ़े की 300 प्रतिशत गारंटी है तो आप ही जैसे विचारकों से सौ तर्क गढ़वा लेंगे कि देश का टुकड़ा हो जाने में फ़ायदा है जैसे सोवियत संघ के पतन के बाद रूस , चेकोस्लोवाकिया , उक्रेन , यूगोस्लाविया के टुकड़े कर दिये जाने के तर्क गढ़े गए थे ।“

इसमें उनका आवेश अधिक और विवेक कम प्रकट हुआ है क्योंकि उत्तर में उस धारणा से असहमति ही पर्याप्त थी। पर मोदी का नाम आते ही हमारे मित्र अपने मन का सारा गुबार बाहर कर देते हैं और इस गुबार के कारण भी सामने की सचाई आंखों से ओझल हो जाती हैः
पुर हूं मैं शिकवे से यूं राग से जैसे बाजा
इक जरा छेड़िए फिर देखिए क्या होता है।
पूरा बाजा सभी मित्रों द्वारा आवेश में और आविष्ट भाव से बार बार भाव कुभाव अनख आलस हूं बजाया इस तरह जाता है कि इसका सुरीलापन समाप्त हो गया है सिर्फ कर्कश शोर बचा रह गया है।

फिर भी इसमें मेरी सोच और दृष्टि और रुझाान को ले कर भी सवाल उठाए गए हैं और जब मैं कहता हूं कि हमें अपने लिखे और कहे के लिए जवाबदेह होना होगा तो यह जवाबदेही मुझ पर भी आती है। डर यह कि यदि इसकी मीमांसा में आज गए तो पाठकों को झपकी आने लगेगी, इसलिए कल।

Post – 2017-07-22

अलं विस्तरेण

बढ़ चढ़ कर बात करना, बड़बोलापन तो यूं भी असहनीय होता है, अधिक समझा कर बात करना भी एक तरह की गुस्ताखी है। दूसरों को सीख देने वाला सही और जरूरी सीख दे रहा हो तो भी सुनने वाले को यह लगे कि यह आदमी मुझे मूर्ख समझता है, और अकड़ जाय कि मुझसे ज्ञान बघारने चला है तो आप ने उसका भला करना चाहा और वह उल्टे आपको सबक पढ़ाने पर उतारू हो जाएगा। आपका सिखाना तो बेकार जाएगा ही, जिसका भला करने की सोच रहे थे वह आपको मिटाने की सोचने लगेगा। मुझ बया और बन्दर की कहानी पढ़ लें।
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मुझे स्वयं अपने आप से शिकायत है कि मैं अपने कथ्य को बोधगम्य बनाने के लिए इतने विस्तार में चला जाता हूं कि सुनने या पढ़ने वाले को ही नहीं, स्वयं मुझे भी सिर पीटने का मन करता है। इसलिए आज मैं यथा संभव संक्षेप में बात करूंगा।
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संक्षेप का एक कारण यह है कि मैं उन सभी विषयों पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे सकता जो मुझे किसी रूप में उद्वेलित करती है। विस्तार में जाने पर तो निश्चय ही नहीं।
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आज जिस घटना ने मुझे आहत किया वह है कुछ युवकों का सेल्फी लेने के चक्कर में प्राण गंवाना। ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं, खिन्न तब भी हुआ था। इन सभी दुर्घनाओं का दोषी मैं अपने प्रधानमंत्री को मानता हूं जिन्होंने संल्फी कल्चर का आरंभ न भी किया तो उसे प्रचारित करके इसकों सम्मोहक बनाया और भूल गए कि राजा जो करता है प्रजा उसका अनुकरण करती है। वह जो मानदंड स्थापित करता है, लोग उसी की नकल करने लगते हैं, परन्तु उनको या किसी को यह पता नहीं हो सकता कि उसके किस कार्य का क्या परिणाम हो सकता है इसलिए उन्हें दोषमुक्त मानते हुए भी यह निवेदन करना चाहता हूं कि वह पदीय गरिमा का ध्यान रखते हुए फैशन परेड वाली पोशाकें बदलने पर पुनर्विचार करें । यह पदीय गरिमा की रक्षा के लिए भी जरूरी है, मध्यवर्गीय नक्काल जनों के लिए भी हितकर है और हमारी अर्थव्यव्स्था के भी अनुरूप है। किसी को इस बात का हिसाब रखना चाहिए कि महीने में वह कितनी बार वेश परिवर्तन करते हैं और उसका खर्च उनके वेतन की सीमा में आता है या नहीं। मुझमें बहुत सारी ग्रन्थियां हैं और मैं उनकी शक्ति को जानता हूं, वे हमें बन्दर की तरह नचाती हैं। मैंने कुछ दृष्टियों से मोदी जी से अधिक सामान्य और कुछ दृष्टियों से उनसे अधिक असामान्य जीवन जिया है, इनकी शक्ति को इनके सम्मुख व्यक्ति की विवशता कोजानता हूं। इसीलिए इन्हें इतना बड़ा दोष न मानते हुए भी हानिकारक मानता हूं फिर भी क्या मोदी जी इस प्रवृत्ति से बच कर नेहरू की तरह एक शालीन पोशाक पर ध्यान देंगे। अब तो लगता है नये महामहिम भी वेश पर ही ध्यान देंगे उनकी सादगी से अधिक चर्चा उनके दर्जी की है। एक के सधने से सभी सध जाते हैं सबको साधन चलें तो सभी चले जाते हैं इसलिए यह आरंभ देश के कार्यकारी शक्तिसंपन्न व्यक्ति से हो तो देशहित में होगा।
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मैंने अपना कार्यक्षेत्र छोड़ते हुए पहली बार तात्कालिक राजनीति में हस्तक्षेप किया था कि हम एक लेखक के रूप में, एक बुद्धिजीवी के रूप में स्वतन्त्र तभी तक हैं जब तक हम अपनी स्वतन्त्रता का उठाईगीर के रूप में, लगे हाथ कुछ ले भागने के इरादे से इस्तेमाल नहीं करते हैं, अपितु समाजहित को देखते हुए अपनी निजी स्वार्थका कुछ बलिदान करते हैं। स्वतन्त्रता अपने लिए कुछ पाना नहीं हैं, समाज के किए अपना कुछ खोना है और इसकी हससे भिन्न कोई भी परिभाषा उचक्कों की परिभाषा है।
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सही कौन है गलत कौन यह तो पक्षधरता से तय नहीं हो सकता। यहीं वस्तुपरकता का महत्व समझ में आता है, परन्तु यह अजूबा है क्या और इसे कैसे पाया जा सकता है? तरीका एक ही है, प्रमाण, साक्ष्य, आंकड़े, और उनसे निकलने वाले निष्कर्ष के प्रति समर्पण अथवा इसका अभाव वस्तुपरकता और आत्मग्रस्तता का फर्क बताता है।

हम एक ऐसे सांस्कृतिक दौर से गुजर रहे हैं जिसमें उन लोगों के बीच भी जो अन्य बातों में असहमत हैं, एक सहमति है है कि हमारा सांस्कृतिक ह्रास हुआ है। यह किस कारण हुआ है इसे लेकर मतभेद अवश्य है। मतभ्सेद में जो सबसे केन्द्रीय सवाल है वही गायब है क्योंकि यह कोई मानने को तैयार नहीं कि सामाजिक शिक्षा का दायित्व बुद्धिजीवी पर आता है और व्यवस्था प्रशासन से भी संबंध रखती है परन्तु चिंतक व्यवस्था के प्रति भी विद्रोह कर सकता है। संकट यह है कि बुद्धिजीवी न तो समाज शिक्षा कोअपना काम मानता है न ही समाज में आई गिरावट के लिए अपने को उत्तरदायी। जिसके पास कार्यक्षेत्र नहीं उसके कुछ भी करने की जगह ही नहीं रह जाती अतः उसके किए कुछ हो ही नहीं सकता ।

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राजनीति वह क्षेत्र है जिसमें गलत कोई नहीं होता,सही कोई हो नहीं सकता, जो जहां है वहां अटल है इसलिए उसमें यथास्थितिवाद से बाहर के रास्ते ही बन्द हैं।
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हम नहीं जानते कि सामाजिक संचार माध्यम का यह मंच कितना महत्वपूर्ण है और यदि हमने इसे व्यर्थ किया, शगल और भडैंती के लिए इस्तेमाल किया तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। समाज के बीच आप को अपनी संगत और गोष्ठी चुननी होती है। यह एक जिम्मेदारी है और इससे प्रमाद करके हम अपने को और उन चीजों और मूल्यों को बचा नहीं सकते जिनके लिए हम चिन्तित रहते हैं।
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मैं मानता हूं कि हमें अपने शब्दों के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। इसका मतलब है हम जो कुछ कहें या लिखें उसके समर्र्थन में हमारे पास तर्क और प्रभाण होने चाहिए। वे हमारे सर्वोत्तम ज्ञान और बोध के अनुसार सही होने चाहहिए और इस लिए हमें अपनी बहसों में इसकी मांग करनी चाहिए और जहां इसकी मांग हो वहां अपनी जवाबदेही अनुभव करनी चाहिए।
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मैने अपनी कल की पोस्ट में जो कुद कहा था उस पर दो बहुत सार्थक टिप्पणियां पढ़ने को मिली थीं। वे निम्न प्रकार थीः

धर्म विशेष की राज नीतिकौन कर रहा है?

धर्म की राजनीति की जगह धर्मविशेष कहां से पैदा हो गया? प्रश्नकर्ता उत्तर जानता ही नहीं अपितु अपने माने हुउसे सब पर मढ़ना चाहता है और किसी विशेष धर्म के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। वह धर्म कोई भी हो क्या उसके पक्ष में बुद्धिजीवी खड़ा हो सकता है? विशेष विशेष की प्रतिक्रिया होता है । इसका एक इतिहास है और लम्बा है, उसे पढ़ें। संभव हो तो हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास देखें।

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अगला प्रश्न इसी से पैदा हुआ, पर विस्तार तो आज भी हो गया। कल के लिए रखें!

Post – 2017-07-21

मैं लाख कोशिश करू अपने मित्रों को इस बात का कायल नहीं कर सकता कि सोनिया चालित कांग्रेस और वामपंथियों की रुचि देश को तोड़ने, बांटने में में रही है परन्तु कारण अलग रहे हैं। उनकी तफसील में जाना जरूरी नहीं, पर यदि कर्नाटक कश्मीर के बाद पहली बार अपने अलग झंडे की आवाज बुलन्द करता है तो इस बात पर नजर जानी चाहिए कि वहां किस पार्टी का शासन है और उसे चला कौन रहा है।

Post – 2017-07-21

हे मोर दुर्भागा देश जादेर करेछो अपमान

मैं यह किसी को दोष देने के लिए नहीं कह रहा हूं पर हमारे समाज में इस विषय में इतनी संवेदनशू न्यता है कि पिछले आठ दस सालों में ही हजारों व्यक्तियों की मौत मैन मोल में उतरने के बाद उसकी गैस से हुइ है जो नहीं मरे उनको किन व्याधियों और यातनाओं से गुजरना पड़ा, किन लतों का सहारा ले कर वे अपनी यातना और कमतरी के बोध से बचने का प्रयास करते हैं, उसमें हमें नहीं जाना। इसके बाद भी हमारे समाज के किसी भी व्यक्ति, संगठन, सरकार, या राजनीतिक दल ने इस अधोगति को समाप्त करने का औपचिारिक प्रयत्न तक नहीं किया। इसके निराकरण की तो बात ही अलग। इसका राजनीतिक उपयोग करने के लिए संसद या विधानसभा में या बाहर मंच से वे सत्ता में न होने पर विरोधी दल की आलोचना के लिए भले उठाएं पर दोषारोपण से आगे न उनके पास कोई ठोस प्रस्ताव होता है न ही सही कार्य योजना, न ही इच्छाशक्ति।

मुझे आज भी नरेन्द्रमोदी के नेतृत्व पर भरोसा है पर कई बातों को लेकर संन्देह भी है। वह अपने को विज्ञापित अधिक करते हैं, और काम उससे बहुत कम कर पाते हैं। इसका एक उदाहरण उनका स्वच्छता अभियान और अन्त्योदय का उनका नारा भी है। जिस बिन्दु पर ये दोनों नारे किसी ठोस पहल की मांग करते हैं वह है जलमलनिकास प्रणाली को अद्यतन बनाना जिसके अनगिनत कुपरिणाम प्रतिवर्ष भारतीय नगरों में देखने में आते हैं जिनमें गंन्दे पानी का पेय जल में मिलना, भरी बरसात में सड़कों का नालों में बदल जाना, कूड़े की ढेरियों और उनसे उत्पन्न बीमारियां तो हैं ही, जिसके हृदयविदारक दृष्टान्त उन जघन्य स्थितियों के रूप में भी आते हैं जिनसे हमने अपनी चर्चा आरंभ की।

यह काम किसी ने नहीं किया, यह उन संगठनों या संस्थाओं की कारगुजारी के क्षेत्र में नहीं आता जिनको केन्द्र का दायित्व माना जाता है, मैं मोदी जी को उससे अधिक खराब नहीं मानता जैसी पिछली व्यवस्थाएं रही हैं । परन्तु वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने स्वच्छता को एक गंभीर समस्या के रूप में उठाया और यह नारेबाजी तक सीमित न रह जाय इसलिए सफाई के यंन्त्रों पर बल और इसकी दिशा में धनप्रबन्धन की ओर ध्यान देने की मैं आशा करता था। अपेक्षा के अनुरूप कुछ नहीं किया गया। संभवतः यह उनके सरोकार का हिस्सा बन ही नहीं पाया।

जिन कामों को केन्द्रीय सरोकार मान कर हाथ में लिया गया है जैसे गंगा जमुना की सफाई उनमें भी जबानी काम अधिक दिखाई देता है वास्तविक कम। गंगा के किनारे से ऐसे कारखानों को तो एक आदेश से बन्द किया या स्थानान्तरित किया जा सकता था जिनका अशोधित जल गंगा में मिलता है परन्तु क्या यही काम उन शहरों के मलशोधन की दिशा में उसी तत्परता से किया गया है जो इन नदियों के तट पर बसे हैं? यहा आदेश से काम नहीं चलेगा। ठोस योजना, सूझ और सक्रियता की जरूरत पड़ेगी, इसलिए गंगा की सफाई का काम गंगा की पूजा से आगे नहीं बढ़ पाया।

मेरा जो सरोकार है और जिसके बिना मैं किसी भी प्रयत्न को अधूरा या निकम्मेपन के निकट मानता हूं वह यह है कि यह चिन्ता किसी में दिखाई नहीं देती कि इस अमानवीय और गुलामी के सबसे गर्हित रूप को समाप्त कैसे किया जाय? बहुतों को लगता होगा कि इसमें सुधार संभव ही नहीं इसलिए मेरे निम्न प्रस्ताव हैं जिन को किसी आवेश में लिखा गया और दूसरों द्वारा पढ़ा गया लेख न मान कर व्यक्तिगत अभियान मान कर, सभी इस दिशा में सक्रिय हों तो इससे मुक्ति पाई जा सकती है। सुझाव निम्न हैं और नये भी नहीं हैं, उन्नत देशों में इनका पालन होता है और उन्नत देश बनने की हमारी यात्रा सभ्य बनने से आरंभ होती है।

राजनीतिज्ञ सत्ता के पीछे दौड़ते हैं उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह सामाजिम समस्या है, समाज के सवाल बुद्धिजीवी के सरोकार हैं, हमारे साहित्य में तो इन त्रासदियों पर कहानियां और कविताएं तक नहीं। साहित्य को गन्दगी से वचा रखा है हमने। ले दे कर दो उपन्यास जिनको केन्द्रीयता न मिली – मुर्दा घर और नरककुंड में वास। इसे हमें उठाना चाहिए और तब तक चैन से बैठना नहीं चाहिए जब तक यह समस्या है। यह हमारी राजनीतिक पहल का मोर्चा है।

Post – 2017-07-21

हिन्दू राष्ट्रवाद का दमन

हिन्दू राष्ट्रवाद का दमन करने के लिए इन्दिरा जी ने आपात काल लगाया था। पता नहीं क्यों उसमें हिन्दुओं से अधिक परेशान मुसलमान ही हो गए थे। हिन्दू राष्ट्रवाद को रोकने के लिए मणिशंकर ऐयर और खुर्शीद आलम खान पाकिस्तान हो आए थो, “तुम कश्मीर में उूधम मचाओ हम तुम्हारे साथ है। सेना पर हमला तुम करो सेना की कार्रवाई की आलोचना और दंगाइयों का समर्थन हम करेंगे।” हिन्दू राष्ट्रवाद को खत्म करने के लिए सुनते हैं राहुल और प्रियंका चीनी दूतावास में नाश्ते पर पहुंच गए, “तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं।” शायद सोनिया जी ने कहा “मैं नाश्ते में नही तुम्हारे विजय भोज में शरीक होना चाहती हूं।” मेरा खयाल है कि हिन्दू राष्ट्रवाद को परास्त करने के लिए हमारे सभी सेक्युलर मित्र चीन की धमकी के हकीकत में बदलने का समथन करेंगे। “जिसका राष्ट्र है वह बचाए, हम तो राज से और राजघराने से वास्ता रखते हैं। जब राज ही चला गया तो देश लेकर क्या करेंगे?” मैं इन गतिविधियों और उक्तियों को राष्ट्रघाती नहीं कहूंगा, क्योंकि ऐसा कहना या सोचना फासिज्म का समर्थन है।

Post – 2017-07-21

इस अंश को मैंने दो दिन पहले लिखा था और कंप्यूटर की समस्या के कारण एक दूसरे वाल पर पोस्ट कर दिया था। इससे बाद की कड़ी कल आपने पढ़ी और कल के बाद की कड़ी को आज अपराह्न में कभी पढ़ सकते हैं ।
21 Jul at 7:57 AM

हम जिस देश में रहते हैं उस देश में भंगी रहते हैं

{मेरा डेस्क टॉप कल बैठ गया. जो कुछ लिखा था और हाज़िर करना चाहता था न कर सका. पर मैं इस विफलता पर जितना खिन्न था उतना कभी न हुआ था. कुशल यह कि उसे पेन ड्राइव में भी बचा लिया था, अब उसे दे रहा हूँ. इस बीच इस पर संसद में कुछ नज़ारे भी देखने को मिले. उनसे उठे सवालों को भी इसमें जोड़ने की कोशिश करूँगा, कर पाऊँगा या नहीं नहीं जानता.}

मेरा इरादा किसी का अपमान करने का नहीं. यह इरादा तो हो ही नहीं सकत्ता कि अपने देश का अपमान करूं. ये दोनों स्वयम अपना अपमान करने जैसे हैं. परन्तु यदि यह लगे कि हमने अपना सम्मान खो दिया है और इसके लिए हम स्वयम् उत्तरदायी हैं तो क्या उस दशा में भी आत्मश्लाघा करते रहेंगे. इस देश की सामाजिक या आर्थिक व्यवस्था यदि पाशविक रही हो और आज भी वही रह गई हो तो इसका कीर्तन तो नहीं किया जा सकता. देश बहुत सारी चीजों से बनता है जिनमें से कुछ प्रकृति प्रदत्त है, जैसे भौगोलिक स्थिति और भू संरचना, परन्तु यदि वह बहुत अनुकूल हुआ तो घने जंगल उगाने के लिए उपयुक्त होता है, और ऐसे जंगलों से भरे देशो के बारे में हम जो कुछ जानते हैं वह यह कि वे जानवरों के काम के ही रह जाते हैं, और यदि मनुष्य ने उसे अपने हस्तक्षेप से अपने अनुकूल नही बनाया, आलस्य, आत्मविश्वास के अभाव या सूझ की कमी के कारण अन्य पशुओं की तरह प्रकृति पर ही निर्भर रह गया तो वह भी पशुओं में से एक पशु और वह भी सबसे दीन-हीन बन कर रह जाता है. वह भूभाग एक भौगोलिक क्षेत्र बन कर रह जाता है, देश बन ही नहीं पाता. देश मानव समाज और उसकी व्यवस्था से, उसकी मूल्य प्रणाली से बनता है, और यदि उसमें कोई खोट नज़र आये तो वह उसी अनुपात में विकृत हो जाता है और ऐसे देश पर गर्व नही किया जा सकता.

एक शब्दातीत संचार प्रणाली से बहुत सारे लोग यह मानते हैं कि यह हिन्दुओं का देश है और उनका काम उनसे सुविधाएं मांगना है जिन्हें जुटाने का काम भी उन्हीं का है. यदि इसकी किन्हीं विकृतियों का सवाल आजाये तब तो वे पूरी दृढ़ता से इसका ऐलान भी करेंगे, लानत भी भेजेंगे कि यह हिन्दुओं का देश है, इसलिए इसकी साड़ी विकृतियां हिन्दुओं के कारण हैं. इसकी पड़ताल में, विकृति के मामले में, हिन्दू सिकुड़ कर सवर्ण और सवर्ण सिकुड़ कर ब्राह्मण और ब्राह्मण सिकुड़ कर संघ और भाजपा हो जाएगा और फिर भर्त्सना यज्ञ की सर्वाहुति आरम्भ हुई तो अन्त्त्याहुति का ध्यान ही न रहेगा.

यह नहीं कहता की जिस घटना ने मुझे ग्लानि से भर दिया उसके लिए वे उत्तरदायी हैं जो हिंदुत्व को गालियां देते हैं, क्योंकि यह अपने को बचाने और उस कोढ़ को जारी रखने का एक बहाना बन जाएगा. यद्यपि इसमें सहापराधी वे भी हैं. हम यह कहना चाहते हैं की एक गौरवशाली परम्परा के उत्तराधिकारी होते हुए भी, इसके निराकरण के लिए अपेक्षित इक्षाशक्ति के अभाव के कारण हम सभी उत्तरदायी हैं और जब मैं इस देश में भंगी बसते कहता हूँ तो इसकी उस आबादी में अपने को भी शामिल करता हूँ !

हमने एक ऐसी व्यवस्था बनाई और चलाई है जिसमें, जिसे स्वच्छ होना चाहिए उसे भी गंदे नाले में बदल देते हैं, लफ्फाजी के कीर्तन से उसे साफ करने की प्रतिज्ञाएं करते हुए उसकी सफाई का पैसा भी खा जाते हैं जैसे पतित पावनी गंगा और जमुना या हमें मलिनता से बचाने वाले मेहतर अर्थात अपने से श्रेष्ठतर पर उसको इतनी मलिनता में रखते हैं, इतनी दीनता में रखते हैं, इतनी जुगुप्सा से उसके साथ पेश आते हैं कि वह हमशक्ल होते हुए भी इंसान नहीं रह जाता, उसकी यातनाओं पर कोई ध्यान नही देता. उसकी मौत पर कहीं कोई पत्ता तक नहीं हिलता.

उसे कहते सफाईकर्मी हैं पर उसे ही गन्दगी में रहने को बाध्य करते हैं. गंदगी से गन्दगी साफ़ कैसे हो सकती है? ओझल अवश्य की जा सकती है. ओझल भी इस तरह कि वह हमारे शारीर पर या परिवेश में तो न दिखाई दे पर दिमाग में भर जाय, आत्मा में उतर जाय और हम उसके इतने आदी हो जायं कि यह महसूस करना तक भूल जायं कि जब तक हमारे समाज में कुछ लोग भी इतनी गर्हित अवस्था में हैं तब तक ऊपर से चिकने सुथरे दीखने वाले स्वयम्ि गंदगी को छिपानेवाले के पिटारे हैं. सड़े हुए भीतर तक.

हमारे समाज का एक हिस्सा बाहर से गन्दा है दूसरा भीतर से सडा हुआ. दो तरह के भंगियों का समाज इस सचाई को रेखांकित करता हुआ कि हम उस देश के वासी हैं जिस देश में भंगी रहते हैं. एक भंगी दूसरे इंसान का हक छीन कर खा जाता है और उसे भंगी बना देता है. एक गन्दगी में जीने वाला भंगी और दूसरा उस गंदगी में से कुछ निकाल कर खाने वाला भंगी. एक बीमार, दूसरा डरा हुआ कि यदि उसकी की दुर्गति पर आह भी भरा तो पहचान लिया जायेगा.
{इसे दो टुकड़ों में ही रखना ठीक होगा पर मैं उन चार नौजवानों के मैंनहोल में घुट कर मरने से व्यथित था यह याद रहा तो इन सरल इबारतों का अर्थ समझ में आयेगा और मेरी पीड़ा और अगले और सवाल भी, }

Post – 2017-07-20

20 Jul at 11:29 PM

मैं जब गंदगी से पैसा बना कर खाने वाले सफ़ेदपोशों की बात कर रहा था तो लगा होगा चौंकाने के लिए एक तल्ख़ मुहावरे का प्रयोग कर बैठा. पर मेरे सामने जो तथ्य थे वे इस प्रकार हैं.

१. मैनहोल में सफाई के लिए उतरने वाले, मानवीय गरिमा और सुविधा से वंचित किये गए लोग ठेकेदारों के द्वारा काम पर लगाए जाते हैं जो उनके भाई-बन्धु भी हो सकते हैं और सवर्ण भी. वह मुनिस्पलिटी से जिस रकम पर ठेका लेता है वह उससे कहीं अधिक होती है जितना इनको नियमित सेवा में रखकर चतुर्थ श्रेणी का वेतन देने पर खर्च होती. उसी का एक हिस्सा वह ठेका देनेवालों को रिश्वत में देता है. अब वह सस्ते से सस्ते भाव पर उसी समुदाय के लोगों को लगाता है जो सरकारी चाकरी में उससे चारगुना वेतन ले कर भी काम नही करता. शताब्दियों से सभी अधिकारों से वंचित रहने के बाद उसे पहली बार जातिगत टिप्पणी करने का आरोप लगा कर अपने से बड़े बड़ों को डराकर चुप करने का अधिकार मिला है और वह इसकी आड़ में कामचोरी करता है. सरकार में नौकरी की सुरक्षा ने निकम्मेपन क विस्तार किया है, वरिष्ठता क्रम से पदोन्नति ने श्रेष्ठता की स्पर्धा को समाप्त करके आलस्य को हमारे स्वभाव का अंग बना दिया, परन्तु आरक्षण के नाम पर पदोन्नति के वरिष्ठता क्रम को तोड़ की जानेवाली पदोन्नति ने लगेगा पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया. परन्तु पराकाष्ठा को भी तोड़नेवाली कुछ स्थितिया होती है. जिसे आरक्षण का भी लाभ नहीं मिला, क्योंकि वह जो काम करता है उसे कोई दूसरा करने को तैयार ही नहीं था. पदोन्नति का रास्ता ही बंद. ऐसा व्यक्ति उस एकमात्र अधिकार का दुरूपयोग करने से बड़ा कौन सा सुख पा सकता है. इसलिए मैं उस स्थिति के लिए उन्हें दोष नहीं देता कि वे कामचोरी करते थे और इस हेकड़ी से करते थे कि जो कुछ उन्होंने कर दिया उसे उनकी कृपा समझते थे.

परन्तु जिस देश में सभी स्तरों पर निकम्मापन, आलस्य और इस गिरावट पर गर्व करने की प्रवृत्ति उसके सबसे प्रबुद्ध तबकों – अध्यापकों, बुधिजीवियों और न्याय और विधिनिर्माण से जुड़े लोगों में भी आ गई हो उसमें क्या उन्हीं शिथिलताओं के लिए उस व्यक्ति या व्यक्तियों को दोष दिया जा सकता है जिसे/जिन्हें ज्ञान, अर्थ, सम्मान सभी से वंचित करके मानवाकार मानवेतर प्राणियों में बदल दिया गया हो. जिन्हें यह तक पता नहीं कि देश का मतलब क्या होता है, कर्तव्य और कार्य

निष्ठा का मतलब क्या होता है, जिसे दुसरे सभी अपना देश कहते हैं वह यदि उसका देश है तो उसमें उसकी जगह कहाँ है. जिस इतिहास की बात की जाती है उसमें वे कहाँ हैं और क्यों हैं.

इसलिए उनके गलत निर्णयों के लिए उन्हें नही उस देश और सरकार को जिम्मेदार मानना होगा जिसने न उन्हें वे सुविधाएं दीं न ही कर्तव्यबोध जाग्रत होने दिया, जिसका परिणाम ठेका पद्धति है और जिसे इसलिए अपनाया और यहाँ उसे पैसा ही तब मिलेगा जब काम करेगा.

परन्तु आप लोगों में से कुछ लोग तो उस पृष्ठभूमि से ही परिचित न होंगे जिसकी पोस्ट की अगली कड़ी यह लेख है. इसे पूरा करने में भी मुझे घबराहट हो रही है. अभी जो हमने कहा उससे आपकी सहमति और असहमति के बिंदु और कारण क्या है. मेरा कंप्यूटर मुझे दिन भर परेशां करता रहा . अब समस्या सुलझी है. इसके दूसरे पक्षों पर कल.तब तक आपकी प्रतिक्रिया भी इसमें शामिल हो जायेगी.

Post – 2017-07-18

दिन बुरे जा रहे हैं गो अपने
फिर भी खुश हैं कि हो रहा कुछ है ।
मानता क्यों मैं तोहमतों का बुरा
तुमने जी खोल कर कहा कुछ है ।

Post – 2017-07-18

देख कर तुमको रो नहीं पाया
मुझको देखा तो हंस पड़े होगे ।।
इतना बेकल था, सोच बैठा था
रास्ते में कहीं खड़े होगे ।।