Post – 2015-12-04

अन्धा-बाँटे-रेवड़ी-युग की विदाई

“हमारा देश सड़ चुका है यार! इसे ब्रह्मा भी नहीं सुधार सकते और तुमको मोदी पर इतना भरोसा है।“

“कोई भी एक व्यक्ति, या बड़ा से बड़ा संगठन भी, सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। परन्तु एक व्यक्ति भी, यदि उसमें प्रतिभा और संकल्प है तो, निर्णायक स्थिति में पहुँच कर ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जिसमें समस्याओं की पहचान बदल जाए, उनका चरित्र बदल जाए, उनका समाधान उसी के बीच से निकलने लगे। तुम समस्याएँ पैदा कर सकते हो, पहले की समस्याओं को बढ़ा सकते हो क्योंकि तुम निरा शावादी हो। तुम्हें यह देश सड़ा हुआ लगता है जिसमें एक सड़ी हुई चीज तुम भी हो। दूसरों को सड़ा सिद्ध करके अपने को साफ-पाक सिद्ध करने वाले। मोदी तुमसे ठीक उलट है। वह आशावादी है। वह मुहावरे बदल देता है, पुराने मुहावरों में से सही का चुनाव करना जानता है। वह कहता है यह मत कहो कि गिलास आधा खाली है, कहो गिलास आधा भरा हुआ है। याद है तुम्हें?”

वह बोला कुछ नहीं, मुस्कराता रहा।

“अभी कल तक लगता था हमारी जनसंख्या इतनी विस्फोटक हो गई है कि सँभालना मुश्किल है। आक्षेप लगते थे मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है और इसका संप्रदायवादी आशय निकाला जाता था। चिन्ता थी अगर अनुपात बराबर करने के लिए हिन्दू भी ऐसा ही करने लगें तो स्थिति विस्फोटक हो जाएगी, दाना तो दूर पानी तक नहीं मिल पाएगा सभी को, पीने के लिए। जन संख्या वही, मोदी ने कहा हम 125 करोड़ संख्या वाले लोग हैं। दुनिया के कई दूसरे देशों में आबादी में गिरावट आ रही है। उनके यहाँ कार्यदल की जरूरत पूरी करने को लोग नहीं मिल रहे हैं। हम इस जरूरत को पूरा कर सकते हैं। स्थिति वही है, केवल इंफैसिस बदल गई और समस्या का समाधान यह कि हमें तकनीकी कौशल बढ़ाने वाली शिक्षा की जरूरत है। स्किल्ड श्रमिक पैदा करने हैं।“

“कोरी बातें हैं भाई। तुम जैसा मूढ़ ही इसके चकमे में आएगा। इतने लोगों के लिए स्कूल, शिक्षक कहाँ से आएँगे। अभी तो प्राइमरी शिक्षा तक सही नहीं हो पा रही है।“

“पहले दृष्टि पैदा होती है, फिर दिशा मिलती है और फिर कदम बढ़ते हैं और मंजिलें मिलती हैं। मंजिल नहीं, मंजिले। उपलब्धि, दर उपलब्धि। परन्तु यह दृष्टि भी बेकार है, यदि अन्धा-बाँटे-रेवडी-युग की शक्तियाँ इतनी प्रबल हों कि वे अपने द्वारा फैलाई गई अशिक्षा और कुशिक्षा का लाभ उठा कर लोगों को बरगलाने में सफल हो जायँ कि उधर खतरा ही खतरा है। बढ़े कि खाई में गिरे। जब हमारे संस्थागत ढाँचे में ही ऐसी अड़चनें हों कि जनता जिसे अपना नेता चुने उसे काम करने ही न दिया जाय। जनता अपने प्रतिनिधि संसद में चुन कर भेजे कि वे उसकी समस्याओं पर विचार करके उनका समाधान निकालेंगे और रेवड़ी युग के उच्च सदन में बैठे प्रतिनिधि कहें जनता की ऐसी की तैसी। हम कोई काम होने ही न देंगे, करके दिखाए तो सही। जब पूर्ण बहुमत वाली एक सरकार को प्रतिपक्ष की योग्यता तक से शून्य दल यह ललकारते फिरें कि हम कोई काम होने ही न देंगे। कोई एक व्यक्ति क्या कर सकता है? और इसके बावजूद वह जितना कर पाया वह हैरानी पैदा करती है।“

“अभी कल ही अन्ना हजारे पूछ रहे थे, ‘अच्छे दिन आए?’’

मैंने कहा, ‘‘अन्ना हजारे को कितनी बार कितने लोगों ने बेवकूफ बनाया है, इसका कोई हिसाब है तुम्हारे पास?’’

वह चुप रहा।
‘‘अन्ना हजारे की समझ पर भरोसा मत करो। नीयत पर भी नहीं। महत्वाकांक्षा की बात अवश्य कर सकते हो और उसके लिए कुछ सहने झेलने और डटे रहने की ताकत को भी। परन्तु मैंने तुम्हें कितनी बार समझाया कोई कुछ कहे तो यह मत समझ लो कि वह जो कुछ कह रहा है, वही कह रहा है।

हँसना जरूरी था और वह खुल कर हँसा भी, ‘फिर क्या मान लूँ भाई।’

‘सोचो वह कब कह रहा है, क्यों कह रहा है और उसको सुनने वालों की संख्या घटी है या बढ़ी और फिर तय करो कि उसके वाक्य भरोसे लायक हैं भी या नहीं। और यह भी सोचो कि यदि उसे कुछ दिखाई नहीं दिया तो क्या तुम्हें भी कुछ दिखाई नहीं देता।’

‘‘क्या किया इस आदमी ने? क्या दिखई दे रहा है तुम्हें जो मैं नहीं देख पाता।’’

एक वाक्य में सुनना चाहो तो उसने ‘अन्धा-बाँटे-रेवड़ी’ युग का अन्त कर दिया जिसमें रेवड़ी तो छूने टटोलने से दीख जाती थी, अपने जन भी घेरे मिल जाते थे, पर देश और इसकी समस्यायें नहीं दिखाई देती थीं। इसी का दूरा नाम अच्छे दिन की नींव है। अब ‘विकास युग की थाप सुनाई पड़ने लगी है। अब पहले के लुटेरे दलों को भी, उन्हें भी जो जाति को जीवित करके सत्ता में आए हैं, विकास की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इस देश की समसे बड़ी समस्या तुम्हें क्या लगती है?’’

‘‘भ्रष्टाचार और बेकारी ।’’

‘‘ठीक कहा तुमने, इसमें एक सही शिक्षा प्रणाली को भी जोड़ लेते तो अच्छा रहा होता, जिसके अभाव में ही ये दोनों व्याधियाँ बढ़ती चली गई हैं।’’

‘‘तुम समझते हो मोदी भ्रष्टाचार खत्म कर देंगे!’’

‘‘नहीं, मैं इतना भोला नहीं हूँ। इसकी जड़ें मानव स्वभाव में हैं। उस लोभ में जिसे उन छह रिपुओं में से एक माना गया है जिनसे लड़ते हुए ही मनुष्य मनुष्य बना रह सकता है। इनसे तो मोदी को भी लड़ना पड़ता होगा। भ्रष्टाचार तो चन्द्रगुप्त के उस राज्यकाल में भी था जिस में ईमानदारी का स्तर यह था कि लोग दरवाजों पर ताले नहीं लगाते थे । चोर बेईमान वेद के समय में भी थे और आज तक बने आए हैं। अन्तर केवल एक बात में है। हमारे यहाँ इसे गर्हित माना जाता रहा है और दूसरी मूल्य व्यवस्थाओं में सफलता और समृद्धि को ही साधन की परख का आधार माना जाता रहा।“

“तुम मोदी की बात कर रहे थे, यार!”

“मेदी और नेहरू में एक अन्तर याद दिला दूँ। गाँधी ने अपने सत्य अहिंसा और सादगी के जीवन ने आदर्शों और साधन को भी साध्य की तरह पवित्र रखने के आन्दोलन से नैतिकता का एक ऐसा पर्यावरण तैयार किया था जिसमें असंख्य लोग अपने निजी जीवन में गाँधी बनने के प्रयोग कर रहे थे। नेहरू ने उसे उलट दिया। इसने उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार और कदाचार का आरंभ उनके साथ हुआ और इतने धूर्ततापूर्ण ढंग से हुआ कि लोग देख कर भी आँखें मूँदे रहे.

‘‘नेहरू के बारे में भ्रष्टाचार की बात तो कम से कम मत कर यार!”

‘‘1948 में सेना के लिए जीप खरीद का घोटाला किसके समय में हुआ था। मेनन ने यदि ब्रिटेन में राजदूत रहते पदीय मर्यादा का उल्लंघन किया था तो विदेश विभाग किसके पास था? नेहरू उनका बचाव क्यों करते रहे। उनको अपना सबसे प्रियपात्र ही नहीं मानते रहे, अपितु रक्षा मंत्री का पद भी सौंप दिया। किनकी गलत और असफल रक्षानीति और रखरखाव के कारण भारत चीन विवाद में देश को इतना अपमानित होना पड़ा? रक्षा उपकरणों का पैसा किन चीजों पर खर्च होता रहा?”

“फिर मूधड़ा कांड, जिसे दबाने के नेहरू के प्रयत्न का विरोध उन्हीं के दामाद फीरोज गांधी ने किया, जिससे उनके पहले से खराब संबन्ध और खराब हो गए परन्तु उसके बाद ही फीरोज गाँधी की पहल से बीमा कंपनियों का रा ष्ट्रीकरण हुआ था और फीरोज गाँधी ने कहा था यह संस्था पार्लमेंट की पुत्री है, और हमें हमेशा इस पर नजर रखनी होगी कि यह भ्रष्टाचार का शिकार न हो जाए। नेहरू ने यहाँ भी अपराधी के प्रति नरमी दिखाने का अपराध तो किया ही था।

और जहाँ तक चालबाजी का सवाल है अभी हाल ही में एक फेसबुक मित्र ने उस रहस्य का सप्रमाण खुलासा किया है जो उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद और पटेल दोनों के साथ किया था।

मोदी जब अपने को गांधीवादी कहता है, जब पटेल का उत्तराधिकारी मानता है तो राजनीतिक जीवन में व्यक्तिगत स्तर पर उन उच्च आदर्शों का पालन करने के अपने संकल्प के कारण। खैर, यहाँ कई बार प्रदर्शनप्रियता मोदी पर हावी हो जाती है जो पिछड़े दबे परिवेश से ऊपर उठने वालों में एक ग्रन्थि का काम करती है और ग्रन्थियाँ हमारे विवेक पर भी हावी हो जाती हैं अन्यथा वेशभूशा में प्रदर्शनप्रियता को कुछ संयत रखने पर ध्यान देते।

खैर तो मैं कह रहा था भ्रष्टाचार पूरे कांग्रेस शासन में कांग्रेस के काडर निर्माण का आधार बनता चला गया था और इसे जान बूझ का बढ़ाया जाता रहा और ऊपरी स्तर पर भी इसमें संकोच से काम नहीं लिया गया। इस देश को सड़ाने में सबसे बड़ी भूमिका इस व्याधि की रही है और मोदी ने इसके सिर पर भी कुठाराधात किया है और जड़ों को भी खत्म करने के लिए मठा डालना आरंभ किया है बिचौलियों की भूमिका खत्म करके। जनहित में दी जाने वाली अनुग्रह राशि को सीधे व्यक्ति के खाते में डालने की सूझ से। करोड़ों लाभार्थियों को खाताधारक बना कर, अद्भुत सूझ! साक्षात्कार के नाम पर धाँधलियों और रिश्वतखोरी को बन्द करने के लिए उस स्तर से साक्षात्कार की भूमिका ही ख़त्म कर दी । ये तरीके इससे पहले किसी अर्थशास्त्री को सूझे क्यों नहीं।

“और जहाँ तक कौशल के विकास का प्रश्न है, मेक इन इंडिया इसी कौशल विकास का एक हिस्सा है। कहने को तो इतना है कि सिर घूम जाएगा।”

“जैसे तुम्हारा घूम गया है। बहुत हो गया।“

Post – 2015-12-03

असर उस पर मगर नहीं होता

“बात अकेले मेरे मानने न मानने की नहीं है। कहीं कुछ है जो पोशीदा है। दिखाई नहीं देता, पर है। बीच बीच में उभरता है तो लगता है सक्रिय भी है। इसलिए मोदी की लोकप्रियता में भले खास फर्क न आया हो, मुझ जैसे लाखों लोग हैं जो संघ के इरादों पर विश्वास नहीं कर पाते। तुम्हीं बताओ, यदि तुम शान्तिप्रेमी हो तो यह शस्त्रपूजा की क्या आवश्यकता?”

“पहली बात यह कि मैं संघ को शान्तिप्रेमी नहीं मानता। मैं कहता हूँ इसका गठन और तैयारी प्रतिरक्षात्मक रही है और चेतना सांप्रदायिक। स्वतन्त्र भारत में इसकी जरूरत नहीं रह गयी थी। गान्धी ने अपनी मृत्यु से वह काम कर दिया था जो जीवित रह कर भी नहीं कर सकते। वह था हिन्दू सांप्रदायिक संगठनों का सफाया। कांग्रेस ने अपनी जरूरत से इसका हौवा खड़ा करते हुए इसे पुनर्जन्म दिया और फिर इसकी शक्ति का विस्तार किया। अंग्रेजी राज में लीग को उकसा कर दंगे कराए जाते रहे और अब कांग्रेस खुद ही दंगे उभार कर सांप्रदायिकता का डर पैदा करने लगी। यदि संघ की संलिप्तता होती तो उन जाँच आयोगों की रिपोर्ट प्रकाश में अवश्य आई होती जिनमें उसकी संलिप्तता थी। दंगे उकसाना, आयोग बिठाकर लीपा पोती करना, और फिर रिपोर्टो को दबा जाना यह कांग्रेस की नीति रही।“

“जहाँ तक शस्त्रपूजा की बात है, यह उसी प्रतिरक्षा तन्त्र का प्रतीकात्मक विधान है। यह कर्मकांड है न कि हिंसक तैयारी। परन्तु यह आज तो आरंभ हुई नहीं। यह तो हजारों साल, चार पाँच हजार साल पुरानी परंपरा लगती है। उन औजारों, हथियारों, साधनों और विधियों के प्रति सम्मान जताने के लिए उनका देवीकरण कर दिया जाता रहा है। यहाँ तक कि उपयोगी वनस्पतियों तक का देवीकरण कर दिया जाता रहा है। तुलसी हो या पीपल का पेड़। मैंने गलत कहा कि शस्त्रपूजा चार पाँच साल से प्रचलित है, यह तो तो आठ दस हजार साल से चला आ रहा है।

क्या बात करते हो तुम। इसीलिए तो हमलोग भड़कते हैं कि तुम हर एक चीज को सृष्टि के आदि से जोड़ने को बेचैन हो जाते हो।“

“तो पूजा केवल अस्त्र की नहीं होती है। विश्वकर्मा या बढ़ई के रूप में धरती आकाश का भवन या भुवन बनाने वाले की भी की जाती है और आज तो यह यन्त्रमात्र की पूजा का प्रतीक बन गया है। परिवा के इसी दिन बनिया अपने बाट और तराजू को धो-धा कर साफ करता है, नई बही तैयार करता शुभ लाभ की आशा में, कलम दावात वाले अपने कलम दावात की पूजा करते रहे हैं। दावात की पुरानी स्याही धोकर साफ करके नई दावात और नई कलम। खैर अब तो यह इतिहास की बात हो गई। स्मृतियों को जीवित रखने के पुरातन विधान हैं, इनका उपहास नहीं किया जाना चाहिए और अभियोग के लिए इनका इस्तमाल करना तो शरारतपूर्ण है।“

“भई तुमने बताया तो मैंने भी उस चित्र को देखा। उसमें मुद्रा पूजा की नहीं, युद्ध की है।“

“रहेगी। उससे मत घबराओ। जैसे बच्चे मूँछ लगाकर जवान होने का आनन्द लेते हैं कुछ वैसा ही परिहास है यह। जब तक कहीं संलिप्तता सिद्ध न हो, तब तक आरोप नहीं लगा सकते। मेरे मुहल्ले में एक चैहान थे। उनके पास बन्दूक थी। वह शस्त्रपूजा के दिन हवाई गोलियाँ दागा करते थे। यह सब प्रतीकात्मक है। जहाँ तक पूजा का सवाल है संघ वाले गुरुपूजा भी करते हैं परन्तु पढ़ाई लिखाई का यह हाल कि मुझे एक भी ऐसा नहीं मिला जिसे इतिहास, संस्कृति, संस्कृत भाषा तक का अच्छा ज्ञान हो।“

“क्या यह तुमसे छिपा रह गया है कि संघ को अमेरिका आतंकी संस्थाओं की सूची में रखे था और शायद अभी तक रखे हो।“

“अमेरिका ही तुम्हारी आँखें खोल रहा हो तो आँखें खुलने से पहले ही फूट जाएँगी। बताया था न, वह हमारा अन्नदाता बने रहने के लिए अन्न की सहायता की आड़ में विषैली घासों के बीज मिला कर भेजता रहा कि हमारी कृषि भूमि ही नष्ट हो जाय। वह जिसका दोस्त हुआ उसकी खैर नहीं। लेकिन अमेरिका आज कल हमारे मार्क्सवादी भाइयों को बहुत रास आने लगा है। क्या सर्वहारा की क्रान्ति अब वह लाने जा रहा है? मार्क्सवाद से और कम्युनिस्ट पार्टियों से उसका अनुराग बढ़ गया है? बुलावे आते हैं वहाँ से और अर्जिया भेजी जाती हैं यहाँ से। कभी सोचा है इस पर?”

“कभी ध्यान नहीं दिया।“

“अब देना। जब से सोवियत संघ का विभाजन हुआ, इनका दाना पानी मिलना बन्द हुआ, क्रान्ति के नारो का स्थान हिन्दुत्व के लिए गालियों के आविष्कार ने ले लिया। ये जितना गर्हित चित्र हिन्दुत्व का पेश करते हैं उतना ही गर्हित चित्र पेश करते हुए झारखंड और छत्तीसगढ़ में धर्मान्तरण पर जुटे ईसाई अपना प्रचार करते हैं। इस धर्मान्तरण का विरोध केवल संघ के लोग करते हैं। मैंने कहा न इनकी भूमिका आक्रामक नहीं प्रतिरक्षात्मक है। धर्मान्तरितों में से कुछ को समझा बुझा कर ये घर वापसी करा देते हैं। जैसे ईसाई प्रलोभन देते हैं और रोजगार आदि दिलाने का भी एक जाल सा बिछा रखा है उस तरह का साधन तो इनके पास नहीं है, परन्तु ये अकेले इस काम में सक्रिय हैं। समर्पित भाव से। यह कंटक ही उनको अमेरिका की नजर में आतंकवादी बना देता है। सेकुलरिस्ट बिरादरी भारत में भी ईसाई संगठनों को बहुत अपनी लगती है। धर्मान्तरण का अभियान करते हुए भी सेकुलरिस्ट तो वे भी हैं। मुझे तो डर है कि जुकरबर्ग ने जो अपनी आय का 99 प्रतिशत कल्याणकार्यों में लगाने का संकल्प लिया है उसका भी एक बड़ा हिस्सा भारत में धर्मान्तरण पर न खर्च होने लगे।“

“अमेरिका में तो खुद ही चर्च जाने वालों की संख्या घटती जा रही है। उसकी क्या दिलचस्पी हो सकती है भारत में ईसाइयत के प्रचार में?”

“नेहरू ने और उनसे भी अधिक दृढ़ता से इन्दिरा गांधी और राजीव ने भारत में अमेरिकी अड्डा तो न बनने दिया परन्तु एक चूक हुई कि धर्मप्रचार की आड़ में धर्मान्तरण कराने के अभियान को कभी रोक नहीं सके। वह आज भी जारी है। अमेरिका के आम नागरिकों को स्वयं चर्च जाने में दिलचस्पी कम हुई हो सकती है, पर जिस तरह के दारुण दृश्य संचार माध्यमों से तैयार करके वहाँ के पुरालेखागार को भरा जाता और मनोरंजन के लिए देखा-दिखाया जाता है उसमें इन कारुणिक स्थितियों से लोगों के उद्धार का काम उन्हें धर्मान्तरित करके किया जा रहा है। उसके लिए तो सहायता देने के लिए वे सदा तत्पर रहेंगे। यह दूसरी बात है कि पश्चिम के लोग अपने पालतू कुत्तों तक को बूढ़ा, बीमार या लुंज पुंज हो जाने पर मैंगर में डाल आते थे जिसमें पहले से भूखे और मरणासन्न कुत्ते उन्हें चबाने खाने के लिए युद्ध रत हो जाते थे, परन्तु भारतीय संपर्क में आने के बाद ईसाइयत के चरित्र में जो बदलाव आया और समृद्धि ने जिसे संभव बनाया वह पशुओं तक के प्रति दयाभाव। आज वहां पशुओं तक के प्रति अन्याय के निवारण के लिए संस्थाएँ काम करती हैं फिर मनुष्यों को हिन्दुत्व की पीड़ा से मुक्त करने के लिए मिशनरियों को फंड क्यों न मिलेंगे? भारतीय समाज का जितना ही गर्हित, क्रूर, आक्रामक चित्र वे पेश कर सकेंगे, सहायता राशि में उतनी ही वृद्धि होगी। अमेरिकी राजनीति इसे विविध देशों में अस्थिरता पैदा करने के खेल के लिए काम में लाती है। इस तरह उसका कूटनीतिक हित इससे जुड़ा हुआ है। भारत में हुए और कांग्रेस की खुली शह से बारबार होने वाले नरसंहारों की तुलना में गुजरात उपद्रव को रख कर देखो और अपने आप से पूछो कि कांग्रेस को आतंकवादी संगठनों की सूची में क्यों नहीं रखा गया, संघ को ही क्यों?”

“तुम भी हद करते हो। कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी है, संघ एक दक्षिणपन्थी गैर- राजनीतिक संगठन है। यह बताओ तुम मोहन भागवत के कल के बयान को क्या कहोगे?? मन्दिर बनाने के लिए वह जान तक देने को तैयार हैं। मोदी को संघ से अलग कैसे कर सकते हो?”

“मोहन भागवत को मोदी के बयान के ठीक बाद और बंगाल के चुनाव के पहले इस तरह के उल्टे बयान के बाद भी तुम्हें यह पता नहीं चला कि मोदी संघ की उस मध्यकालीन मानसिकता के विरुद्ध भी अभियान चला रहा है। तुमने मोहन भागवत का बयान ही सुना होठों की मुस्कराहट नहीं देखी जिसमें उनकी मूछ के बाल भी फड़फड़ा रहे थे। भाजपा का काम सांप्रदायिकता के बिना चल सकता है, परन्तु संघ का, अपने को सेकुलर कहने वाली पार्टियों का जिनके पास सांप्रदायिकता का भूत खड़ा करके उससे लड़ने के अलावा कोई कार्ययोजना ही नहीं है, सांप्रदायिकता के बिना काम नहीं चल चकता। मोहन भागवत ने भाजपा के विरुद्ध उसी दिन मोर्चा सँभालना शुरू कर दिया जिस दिन एक महान और आधुनिक राष्ट्र की कल्पना से प्रेरित उसने भाजपा को उस नाभिनाल से अलग करने के लिए अपने, यानी भाजपा के सदस्य बनाने का अभियान आरंभ किया। इसीलिए कहता हूँ कि इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए । जो लोग इस देश को सांप्रदायिकता की आग से बचा कर आगे ले जाना चाहते हैं उन्हें, बिना इस झिझक के कि उनकी राजनीति क्या रही है, मोदी का साथ देना चाहिए और उनकी आर्थिक नीतियों और उनके क्रियान्वयन आदि को ही केन्द्र में रख कर उनकी आलोचना करनी चाहिए।“

“तुम तो ऐसा कहोगे ही।“ उसने कहा और खड़ा हो गया।

Post – 2015-12-02

मन पछितइहैं अवसर बीते

“कल तो मोदी ने सचमुच बड़े कमाल का भाषण दिया यार, कहा, एकसौपचीस करोड़ लोगों में से किसी की भी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जा सकता न ही हर समय अपनी देशभक्ति का सबूत देने की आवश्यकता है। कहा, भारत जैसे विविधता वाले देश में बिखरने के कई बहाने हो सकते हैं, जुड़ने के अवसर कम होते हैं। हमारा दायित्व है कि हमें जुड़ने के अवसर खोजने चाहिए। कहा, यदि किसी के खिलाफ अत्याचार होता है तो यह समाज और देश के लिए कलंक है। हमें इस पीड़ा को महसूस करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फिर ऐसा न हो। कहा कि देश सौहार्द के जरिए ही आगे बढ़ सकता है। कहा, समानता और स्नेह में काफी षक्ति होती है। कहा हमें एकता को मजबूत करने के लिए एक भारत, श्रेष्ठ भारत के विचार को बल देना चाहिए। कहा हमें कभी कभी पक्ष विपक्ष से पर उठ कर निष्पक्ष हो कर भी सोचना चाहिए।’’ अखबार उसके हाथ में था और वह खासे मजाकिया लहजे में मोदी के भाषण की वे पंक्तियाँ सुना रहा था जो कल उसने संसद में दी थी। भई कहो कुछ भी, पट्ठा सूक्तियाँ बहुत अच्छी गढ़ लेता है। कहीं तुम उसे चुपके से लिख कर तो नहीं दे आते।

“मेरे लिख कर देने की जरूरत नहीं है। वह मुझसे अधिक अनुभवी और सूझ बूझ का आदमी है. अधिक योग्य अधिक ऊंचे सपने देखने वाला. जो सत्य की साधना करता है उसी के विचार में इतनी स्पष्टता होती है कि वह मणिभाकार हो कर सूक्तियों का रूप ले सके।”

“छोड़ यार, मक्खन वैसे भी देश में कम पैदा हो रहा है। यह क्यों नहीं देखता कि उसे राज्यसमा में अपना बिल पास कराने के लिए विपक्ष का समर्थन चाहिए और वह उसका रवैया नरम करने के लिए मस्का लगा रहा था।”

मैं चिढ़ गया, ‘‘साँभर झील में हाथी घुस जाय तो वह भी नकम का हाथी बन जाता है, सुना है न। यदि तुम्हारा चित्त ही विकृत है तो उसमें सही अर्थ आ कैसे सकता है।”

वह अड़ा रहा, ‘‘मैंने कुछ गलत कहा क्या?’’

‘‘इस आदमी ने आज तक कुछ भी ऐसा कहा है जिसकी भावना इसके विपरीत रही हो। मैं अधिक नहीं जानता, पिछले तीन सालों के बीच जब से उसकी आवाज कान में पड़ने लगी तब से। अभी कल तक शोर मचा रहे थे मोदी कुछ बोलता क्यों नहीं, और बोला तो इबारत समझ में ही नहीं आ रही। इतनी साफ सुथरी जबान होते हुए भी। तुम लोग लाइलाज ही नहीं हो खुद बीमारी हो।’’

वह ठठाकर हँसा, ‘‘अरे भाई, बीमारी कह कर कहीं हमारा सफाया न करा देना। टोटल एलिमिनेशन, पार्टी तो वही नाजियों वाली है।’’

मैंने सिर पीट लिया, ‘‘तुम से बात करना ही बेकार है।’’

उस पर कोई असर नहीं पड़ा, मजा लेते हुए बोला, ‘‘अभी मैं फेस बुक पर हरबंस मुखिया की टाइमलाइन पर नजर डाल रहा था, इसमें एक चित्र था जिसमें एक चित्र था जिसमें विजयदशमी के अवसर पर संघ के शस्त्रपूजा का एक चित्र : संघ के स्वयंसेवको के गणवेष में कुछ बोलते हुए एक ओर को खिचे हाथों का स्टिल था, और नीचे प्रोफ. इरफान के अलीगढ़ में दिए किसी भाषण का कैप्शन था जिसमें कहा गया था कि आइ एास आई और संध दोनों एक जैसे हैं।
No doubt that, in its narrative, ISIS is the most violent form of Islam. But the RSS worships firearms. Why would any peace-loving organisation on earth worship “firearms”? There have been instances of violence where RSS activists have been allegedly involved. Who killed Mahatma Gandhi is no matter of guesswork.
“इस पर तुम क्या कहोगे ?”

“अगर मेरा भी इरादा कौमी नफरत फैला कर देश को हर तरह की गंदगी और फसाद से भरने का होता और मैं भी सेकुलरिज्म के नाम पर जहर फैलाना पसन्द करता, उतना ही गैर जिम्मेदार होता जितने ये रहे हैं, तो मैं पूछता कि इस देश को बाँटने का खेल कौन खेलता रहा है और आज भी जब मोदी सबको आश्वस्त करते हुए, एक महान राष्ट्र का सपना ले कर सबको साथ जोड़ने का काम कर रहे हैं तो इनमें तिलमिलाहट क्यों है।
“आरोप लगाता कि प्रो. इरफान मुस्लिम आतंकवाद के समर्थक रहे हैं, इसी योजना के तहत वह इतिहास लिखवाया गया जिसमें प्राचीन भारत का कुत्सित चित्रण करने के हर तरह के प्रयत्न किए गए और प्राइमरी स्तर तक के बच्चो बच्चियों के मन में आत्मधृणा और अपमानबोध भरने का प्रयत्न एन सी ई आर टी की बालपोथियों से किया गया और यही उच्चतम स्तर तक पढ़ाया जाता रहा, कहता कि आज जब सारी दुनिया आइ एस आई के पैशाचिक चेहरे को देख कर आतंकित अनुभव कर रही है प्रो. इरफान उसी अलागढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों को रैडिकल बनाने और आइ एस आई में भर्ती होने के लिए उकसा रहे हैं, जहां हिंदुस्तान के नक़्शे को बदलने और तोड़ने के फैसले किये गए थे, परन्तु ऐसा कहूँगा नहीं। क्योकि यदि यह सच भी हो तो इसकी चिन्ता मुझे नहीं कानून व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों और संस्थाओं को करनी है। और इसलिए भी नहीं, कि इस तरह की चर्चाओं से उनके सामाजिक माहौल को बिगाड़ने के खेल में परोक्ष हम भी शामिल हो जाते हैं।

उसके चेहरे पर पहली बार हवाइयाँ उड़ती दिखाई दीं। उससे कुछ बोलते न बना।

मैंने आगे कहा, ‘‘तुम इस सन्दर्भ में सोचो। मोदी का ऐतिहासिक महत्व क्या है। आज तक लगातार हमारे देश को तोड़ कर अपनी राजनीति करने वाले और अपना घर भरने वाले नेता मिले और देश को उन्होंने वहाँ पहुँचा दिया जहा रोज हत्या और बलात्कार की कहानियाँ मुख्य समाचार बन गई हैं, और देश की क्या दशा है किसी को पता ही नहीं चलने पाता। मैं मोदी को इसीलिए इतिहास पुरुष कहता हूँं। इसे एक अवसर कहता हूँ जिसे हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। उस आदमी को काम करने देना चाहिए। इसलिए जिन इबारतों को अखबार से तुम व्यंग में सुना रहे थे उनका तब तक सोते जागते पाठ करो जब तक तुम्हारे भीतर की मलिनता धुल नहीं जाती।“

Post – 2015-12-01

किस्से हैं किस्सों का क्या

देखो यश और सत्ता तो सभी चाहते हैं। जो नहीं चाहते हैं वे सन्यासी हो सकते हैं, राजनेता नहीं।

सन्यासी तो मौका मिलने पर सत्ता और यश के लिए पागलों जैसा व्यवहार करने लगते हैं। दृश्य माध्यमों ने इसे तो उजागर कर ही दिया है। यदि इन दोनों के प्रति उदासीन कहीं मिल सकते हैं तो कलाकारों, चिंतकों और गृहस्थों में ही और नहीं तो भावावेश में आकर मूर्खता में ही सही, किसी महान कार्य के लिए अपने प्राण तक देने के लिए तैयार लोगों में। मैंने कहा था न एक बार कि ऐसे निस्पृह युवक उन हिंसक संगठनों की ओर भी आकर्षित हो सकते हैं जहाँ उनके खयाल से एक महान लक्ष्य हासिल करना हो, इसलिए इनसे घृणा करने की नहीं, इनको समझने और शिक्षित करने की जरूरत है।

“तुम्हें दिमाग से काम लेने का मौका ही न मिला, जिन्दगी भर क्लर्की करते रहे, इसलिए जब भी मुझ जैसा श्रोता फँस जाय यह दिखाने पर जुट जाते हो कि तुम्हारी खोपड़ी भी खाली नहीं है, गो बजती खाली की तरह ही है।

“सीधी सी बात मानने के लिए भी कि यश और सत्ता महान लोगों की भी दुर्बलता है, नेहरू में भी थी तो कुछ गलत नहीं था, तुमने इतने कुलाबे बाँधे।“

“बाँधना इसलिए पड़ा कि नेहरू में यह दुर्बलता व्याधि के स्तर तक थी। योग्यता ताबड़ तोड़ जुटाई जा रही थी। इतिहास पढ़ो, दुनिया को समझो। किसान आन्दोलन की भी खबर रखो, पर जो जी कर जाना जा सकता है वह पढ़ कर नही जाना जा सकता। गांधी ने भारत को जिया था, उनकी नजर बहुत पैनी थी।“

“व्यक्तिगत आकांक्षा या अवलेप से मुक्त व्यक्ति की नजर बहुत पैनी होती है।“

“ठीक कहा तुमने, परन्तु यह सब इस तरह किया जा रहा था जैसे गाइडेड लाइन पर किया जा रहा हो। पृष्ठभूमि से प्राम्प्ट करने वाला कोई और हो। फिर त्यागभाव का प्रदर्शनीय आयोजन जिसमें सरकार की भी दबी सहमति का आभास हो इतनी सावधानी से किया गया कि गाँधी भी मात खा गए सादगी और पुरकारी में फर्क करने में। स्वतन्त्रता आन्दोलन में दूसरे अनगिनत नेता आए थे, अकेले मोतीलाल थे जिन्होंने अपने पूरे परिवार को झोंक दिया था। अपने निवास को ही गतिविधियों का केन्द्र बना दिया था। अपने जीवन में भी नाटकीय परिवर्तन लाए थे और जाते जाते अपने पुत्र को कांग्रेस का अध्यक्ष बना गए थे और इससे ऐसा आभामंडल तैयार हुआ कि इसकी राजनीति समझ में आए तब तक तब नेहरू-गाँधी, गाँधी नेहरू की जुगलबन्दी कम से कम उत्तर भारत में तो शुरू हो ही गई थी। इस तरह किसी अन्य नेता का नाम गाँधी के साथ नहीं जुड़ा। एक मित्र ने कहा कि गाँधी ने अपना वीटो पावर इस्तेमाल करके नेहरू को प्रधानमन्त्री बना दिया। अरे भाई, जनता तो उन्हें पहले ही अनन्य विकल्प बना चुकी थी, जनता में यह इस रूप में प्रचारित हो चुका था कि गाँधी के बाद नेहरू ही आते हैं। नेहरू इसी प्रतिस्पर्धी भाव से अपने विचार भी गाँधी के सामने रखते थे कि आपकी नहीं चलेगी, मैं इस रास्ते चलूँगा और गाँधी उन्हें समझाने-बुझाने पर लगे रहते थे कि हमारी सामाजिक आर्थिक स्थिति भिन्न है। तुम क्या समझते हो सुभाष को उस स्थिति में लाने का काम गाँधी ने किया था कि वह कांग्रेस से हट कर अलग चले जायँ? इसके पीछे जितनी गांधी से सुभाष की असहमति रही होगी उससे अधिक नेहरू की सुभाष से असहमति थी।“

“सुभाष की बात छोड़ो। वह निरे तानाशाही मिजाज के थे। आजाद हिंद फौज के चलते उन्हें जो असाधारण लोकप्रियता मिली वह अभिभूत करने वाली है, परन्तु यदि आजाद हिन्द फौज ने एक काल्पनिक स्तर ही सही, अंग्रेजों को भगा दिया होता तो भी एक नई तानाशाही ही आती, जिसे सुभाष खुद बोसिज्म कहते थे। उनकी सत्ता की कामनाएँ स्पष्ट थीं, लोगों को संगठित करने की उनकी क्षमता अद्भुत थी, वह मुरदों में भी जान फूँक सकते थे, परन्तु राजनीतिक व्यवस्था के बारे में उनके विचार बहुत उलझे हुए थे। वह फासिज्म और नाजिज्म में फर्क नहीं करते थे या बहुत मामूली फर्क करते थे ऐसा सुना जाता है। लेकिन भारतीय जनमानस की उनकी पकड़ गहरी था जब कि नेहरू की समझ, जैसा कहा, किताबी और कुछ दूर तक बचकानी, जिद्दी बच्चे जैसी, हुआ करती थी।

वह चैक गया, क्या कहते हो तुम। समझा नहीं।

उनकी कांग्रेस से जुड़ने वि शेषतः तीसरे दशक के बाद की सारी गतिविधियाँ, पढ़ाई लिखाई प्रधान मंत्री बनने की तैयारी में ठीक उसी तरह की गई थी जिस तरह आई सी एस के लिए उम्मीदवार तैयारियाँ करते करते थे, पद बहुत ऊँचा था इसलिए तैयारी अधिक लंबी और घुमावदार थी। इसे मैं दोष नहीं गुण ही कहूँगा, न तो उनकी प्रतिभा को लेकर सवाल करूँगा।

मैं जिस रुग्णता की बात कर रहा था वह यह कि दुनिया के दूसरे नेताओं ने अपने दूसरे साथियों को रास्ते से हटाते हुए अपने लिए रास्ता भले बनाया हो, इसे अपनी वंशागत संपत्ति नहीं बनाया। इसके लिए अपने वंशज को राजकुमार या राजकुमारी की तरह तैयार नहीं करते रहे। विरल मामलों में उनके पुत्र भी उच्चतम पदों पर पहुँचे होंगे, पर उनके द्वारा इसके लिए तैयार किए जाने के कारण नहीं। यह लोकतन्त्र की भावना के विपरीत है, दो बार से अधिक उच्चतम पद पर रहना भी इसके विपरीत ही है परन्तु यह प्रतिबन्ध हमारे संविधान में क्यों नहीं रखा गया, पता नहीं।“

“ऐसा क्यों हो पाया बता सकते हो?”

“यहीं आकर अपने पूरे परिवार, धन-धाम सभी को लगा कर स्वतन्त्रता आन्दोलन से जुड़ने की कलाकारी समझ में आती है। इसी से यह भ्रम पैदा किया जा सकता था कि स्वतंत्रता के लिए सबसे अधिक कुर्बानी नेहरू परिवार ने दी है इसलिए स्वतन्त्र भारत पर राज उसके वंश का चलेगा। राजाओं महाराजाओं के मुकदमे लड़ने वा ले कूटनीतिक दृष्टि से अधिक मजे खिलाड़ी ने अंग्रेजो को हटा कर भारत को स्वतन्त्र करना नहीं चाहा था, उनके राज्य के स्थान पर अपने वंश का राज्य स्थापित करना चाहा था। इसमें सफल भी हुआ और इसी के कारण भारत औपनिवेशिक ग्रास से पूरी तरह मुक्त भी नहीं हो पाया। यह भाव नेहरू वंश की चेतना में है परन्तु कभी उस तरह खुल कर सामने नहीं आया था जितना राहुल के वक्तव्यों से।

भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार के समानान्तर या उसी के रूपान्तर वंशवाद के जन्मदाता नेहरू रहे हैं और भारत का सर्वनाश करके सत्ता अपने हाथ में ही रखने की जिद के जनक भी वही कहे जाएँगे। नेहरू ने कहा था वह अपनी तानाशाही प्रवृत्ति का पूर्वाभास पा चुके थे इसलिए वह तानाशाह नहीं हो सकते। तानाशाही की उनको जरूरत भी नहीं थी, केवल कंटक शोधन की जरूरत थी। उस पर पूरा ध्यान दिया गया।
किस्से तो कई तरह के सुने सुनाए जाते रहे हैं।
गलती तो एक ही थी, सत्ता पाने की जल्दबाजी में नई गुलामी स्वीकार करने को तैयार हो जाना और कांग्रेस के बैंक खाते में जमा समस्त राशि उन्हें सौंप देना जिनसे वह ताजपोशी का मोल भाव कर रहे थे। वे जो जानते थे अब भारत को सँभालना उनके वश का नहीं, वे यह भी जानते थे कि हमारे हट जाने के बाद हमारे मूल्यों और इरादों की पूर्ति इसी के द्वारा होगी। लोग कहते हैं, पटेल और नेहरू की प्रतिस्पर्धा में गांधी ने नेहरू को अपना उत्तराधिकारी बनाया। यह गलत है, गाँधी को किनारे कर के ब्रितानी साम्राज्य का उतराधिकारी उन्होंने चुना जो सत्ता सौंप कर जा रहे थे और चुना भी इसलिए कि नेहरू मनसा अंग्रेज और तनसा भारतीय थे। वह मनसा ईसाइयत को वरीयता देते थे, और तनसा हिन्दुत्व को। इसमें कोई बदनीयती नहीं थी। यही उनकी सोच थी। और उनकी कतिपय बड़ी गललियाँ इसी से पैदा हुईं। पहली स्वतंत्र होने के बाद भी केवल आधी स्वतन्त्रता स्वीकार करना।

“इन शर्तों को कुछ तो नेहरू की मानसिकता को समझ कर और कुछ अपनी कूटनीतिक चाल से विधुर और गोरी चमड़ी के आगे ख़म खाने वाले नेहरू को माउंटबैटेन ने अपनी पत्नी को खुली छूट दे कर, राजतिलक के लिए आतुर नेहरू के माध्यम से भारत को नए बन्धनों में बाँध लिया। वैसे भी वह अपने चांचल्य के कारण नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखम्, बहु स्यात् बहुधा स्यात वाली प्रकृति की महिला थी। जिस बाल दिवस को हम नेहरू के सन्दर्भ में याद करते हैं, जिस गुलाब के फूल को उनकी शेरवानी पर जरूर देखते हैं और सोचते हैं इस फूल के लिए सबसे सही जगह यही है, और नेहरू के साथ जिस ‘चाचा’ को जुड़ा पाते हैं वह एल्विना की पुत्री के ‘अंकल’ का हिंदी तर्जुमा है। वायसराय बना कर एक माउंटबेटन को रोकना, और सबसे नाजुक फैसलों को माउंट बेटन की सलाह लेना भी इसी का परिणाम था।
“परन्तु सोचो तो भारत स्वाधीन हो गया और इस पर वायसराय का राज्य चल रहा है, रानी का क्षत्र चवर चालू है। यह माउंटबैटन की विजय थी। उसकी कूटनीति की। जिन्ना ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। चर्चिल ने ठीक ही कहा था वह मांस पर चोंच मारते गिद्ध को भी विरत करने की कूटनीतिक क्षमता रखता था। पन्द्रह अगस्त को ईस्टर्न कमांड के सामने जापानी सेना ने सरेंडकर किया था और वही तिथि उसने भारत की स्वाधीनता की रखवाई थी।

कितना करुण था वह दृश्य, असंख्य चीत्कारों के बीच भाग्य सुन्दरी से मिलन का वह उल्लास. जिन्ना एक दिन पहले ही ने कम से कम पाक के स्वाधीनता दिवस पर कीड़ों खाया पाकिस्तान कह कर खिन्नता तो प्रकट की थी. यहां संगीत ही संगीत था.
पर अगर तुम नेहरू की सबसे बड़ी गलती जानना चाहते हो तो वह था यह आश्वाशन देना कि जो हिन्दू जहां हैं वही रह जांय, बाद में आबादी के शांतिपूर्ण अदला बदली की उपेक्षा, जब की जिन्ना ने बहुत पहले कहा था कि यह तो हमें करना ही होगा और पाकिस्तान बहुत बाद तक भारत से मुस्लिम आबादी को भावी असुरक्षा का अंदेशा जताते हुए पाकिस्तान में आने की सलाह देता और इसके लिए परचे बांटता रहा था.
तुमने नुक्कड़ नाटक देखे होंगे पर ताजपोशी की इतनी विराट सुख-दुखांतकी जिसमे फार्स और मेलोड्रामा भी था आँखों से गुज़र जाने तो दिया होगा पर इसे देखने का साहस न जुटा पाये होगे.

Post – 2015-11-30

गए वक्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो

“प्यारे भाई, तूने कल तो नेहरू को रसातल में पहुँचा दिया, मगर यह तो बताओ, हिन्दुस्तान में एक आला दिमाग तू ही पैदा हुआ है जिसे इतना कुछ दीख गया, पर वह न दीखा, जिसके कारण लोग नेहरू की पूजा करते थे। वे सभी लोग, जिनमे विद्वान, कवि, कलाविद, यहाँ तक कि विरोधी दलों के लोग भी थे, नेहरू का आशीर्वाद पाने को लालायित रहते थे। जानते हो, तुम्हारे वाजपेयी को नेहरू का एक आशीर्वचन मिल गया तो वह संघ और जनसंघ और भाजपा में रहते हुए भी उससे ऊपर उठा अनुभव करते थे। तुमने इतने महान युग पुरुष को कूड़ेदान में डाल दिया और खाक से एक पुतले को उठाकर सातवें आसमान पर चढ़ा दिया।”

“खाक के पुतले तो हम सभी हैं, भाई। अगर तुम मानते हो नेहरू खाक के पुतले नहीं थे तो इससे कठोर टिप्पणी क्या हो सकती है। सातवें आसमान की बात तो करो ही नहीं, उसका भूगोल तो इतना गड़बड़ है कि वह भूतल और रसातल अर्थात् अंडरवल्र्ड तक में फर्क नहीं कर पाता। तुम जिनके साथ हो वे समझते थे और उसका उपयोग भी करते थे। आज भी करते हैं। उनकी राजनीति ही अंडर हैंड और अंडरवर्ल्ड के भरोसे चलती है।

“तुम पहले यह बताओ कि नेहरू क्या उतने गए बीते थे जितना तुमने दिखा दिया?”

“नहीं भाई, कुछ खास तरह की योग्यताएँ कुछ खास तरह की अयोग्यताएँ पैदा करती हैं। नेहरू कवि मनस्क थे। साहित्यिक मिजाज था। कुछ शायरों से प्रधानमन्त्री होने के बाद भी उनका संबन्ध दोस्ताना था। जोश के साथ तो सुनते हैं तू-मैं वाली आत्मीयता थी। इस निकटता के बाद भी असुरक्षा की भावना जोश की चेतना में घुली हुई थी और नेहरू के लाख मनाने के बाद भी वह पाकिस्तान चले गए। सुनते हैं वहाँ उस सर्वहारा के पक्ष में शायरी करने वाले को सरकार ने सौ रिक्से दिलवा दिए। ‘शायरे इन्क़लाब! अब उसी शोषण पर पलो’, और वह अपनी बेहुरमती पर रोते भी रहे पलते भी रहे और हो सकता है भारत में गुज़ारे दिनों को याद भी करते रहे हों। लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे।“

“खैर भारतीय मुसलमान के मन से असुरक्षा की भावना को दूर किया ही नहीं जा सकता। वह उसने अपनी ही चूक से पैदा की और कोई दोष न भी दे तो उसकी चेतना से मुक्त होना संभव नहीं। हम जिन दुखद समृतियों से मुक्त होना चाहते हैं उन्हें भी भुला तो नहीं पाते और यदि भुला बैठे तो वे अवचेतन में ग्रन्थि बन कर और भी उपद्रवकारी रूप ले लेती हैं। तुम्हें याद होगा, क्रिकेट मैचों पर उन दिनों पाकिस्तान के जीतने पर मुस्लिम दर्शक अधिक तालियाँ बजाते थे। ‘हँस के लिया है पाकिस्तान लड़ कर लेंगे हिन्दुस्तान’ के नारे भी तभी अधिक लगते थे। खून की नदियां बहा देंगे की धमकियां भी तभी अधिक आती थीं और इनके अनुपात में ही असुरक्षा भी बढ़ती जाती थी. कहो, नेहरू के दौर में मुसलमान भारत में अधिक असुरक्षित अनुभव करता था। ताजी ताजी यादें थीं।
फिर जब पता चला कि पाकिस्तान जाने वालों की हालत तो और बुरी है, कि पाकिस्तान को अपना देश मान कर वहाँ जाने वाले आज तक मुहाजिर या शरणार्थी की बने रह गए हैं, कि जिस उर्दू को अपनी जबान मान कर पाकिस्तान बनाया, उसकी सरकारी जबान कहने को उर्दू हुआ करे, काम काम अंग्रेजी में ही होता है, कि उर्दू मुहाजिरों की ज़बान है, पंजाबी अपनी, सिंधी अपनी, बलूची अपनी, और सिराइकी अपनी जबान को अधिक प्यार करता है, फैज़ भी आखिरी दिनों में उर्दू छोड़ पंजाबी में लिख कर पुराना पाप धोने लगे थे, उर्दू के ज़ेर जब्र और ऐन गै़न का निर्वाह न कर पाने के कारण मुहाजिर दूसरों को जिस हिकारत से देखते हैं उससे बिदक कर वे उर्दू से चिढ़ते हैं, कि सिन्धी मुसलमान जीये सिन्ध देश के नारे लगाता है, जिन्दाबाद नहीं, जीये, और वतन या मुल्क नहीं देश, और फिर जब पता चला कि अल्पमत में होते हुए भी वे वोट बैंक बन कर सभी को नचा सकते हैं और मनचाही रियायतें पा सकते हैं या पाने के ख्वाब देख सकते हैं, तब धीरे धीरे असुरक्षा की भावना कुछ कम हुई और आत्मविश्वास बढ़ा। लेकिन हाल के उद्गारों से लगा गया नहीं है और जिनकी राजनीति उनकी असुरक्षा पर ही पनपती रही है वे सभी दल असुरक्षा आई असुरक्षा आई का नारा लगाने लगे है.”

“मैं तुमसे नेहरू पर बात करने को कह रहा हूँ और तुम कहाँ बहक गए?”

“मैं नेहरू पर ही बात कर रहा हूँ। नेहरू ने इस असुरक्षा भाव को और बढ़ाया था और यह भ्रम पैदा करने में सफल हुए थे कि मुसलमान उन्हीं के कारण सुरक्षित हैं इसलिए मुस्लिम वोट बैंक, दलित वोट बैंक तैया र करने में तो सफलता पाई ही थी, उनके नाम के साथ पंडित को बोल्ड अक्षरों और बोल्ड आवाज में लगाते हुए एक ब्राह्मण लाबी या ब्राह्मण वोट बैंक तैयार हुआ था। हिन्दुओं में शिक्षा की दृष्टि से ब्राह्मण सदा से आगे रहे हैं और पद और अवसर का अनुपात से अधिक लाभ उन्हें ही मिला है। इन सबसे लिए नेहरू हारिल की लकड़ी बन गए थे।

“अपनी प्रतिभा, अभिरुचि, कलाप्रेम, साहित्यकारों और प्रबुद्ध भारतीयों से अच्छे संबंध, पत्रकारों के बीच अपनी लोक प्रियता आदि के कारण वह प्रचार के सभी स्रोतों के लिए शिखर-पुरुष थे, और फिर एक नया भारत बनाने का उनका अपना सपना भी था जो ससाधनिक कम और प्रसाधनिक, कहो कास्मेटिक, अधिक था। कुछ उम्दा इमारतें, नई संस्थाएँ, पर वे भारत की जमीनी आवश्यकताओं को देखते कम नहीं थी। फिर उनका उनके जीवन काल में कोई विकल्प तो बन नही पाया, जिसकी प्रशासनिक क्षमता से उनकी तुलना की जा सके। पटेल अधिक समय तक जीवित न रहे, और दूसरे व्यक्ति जो हम जैसे बहुतों की नजर में नेहरू से अधिक योग्य प्रधान मंत्री सिद्ध हो सकते थे, रफी अहमद किदवई, उनको भी अवसर तो उन परिस्थितियों में मिल ही नहीं सकता था, फिर उनका निधन भी हो गया। जहाँ प्रचार के सभी साधन उपलब्ध हों और बैंक के इतने खाते मतदाताओं के बीच हों, वहाँ उनकी पूजा तो होनी ही थी।

“परन्तु कलाप्रेमी अच्छे प्रशासक नहीं सिद्ध हुए हैं। निकट की मिसाल बहादुरशाह जफर और वाजिद अली शाह और दारा शुकोह हैं और कुछ दूर के भोजराज और भर्तृहरि। भर्तृहरि को तो वैराग्य ही लेना पड़ गया था। कल्पना विलास यथार्थ को भी काल्पनिक बना देता है और वे जमीनी समस्याओं के हवाई समाधान तलाशने लगते हैं।“

“तुमको यह क्यों नहीं दिखाई देता कि स्टील उत्पादन के बड़े कारखानेे, विद्युत आपूर्ति के बैेराज और डैम और आधुनिकीकरण की पहल नेहरू ने की।”

“इस पर बहस हो सकती है कि बड़े उद्योंगो की जगह छोटे उद्योगों और छोटे संयन्त्रों के विकास से मानव संसाधनों का भरपूर उपयोग करने के बाद अतिरिक्त ऊर्जा और साधनों की जरूरत के अनुसार आगे बढ़ना अच्छा रहा होता, या राष्ट्रीय पूँजीवाद को विकास का भरपूर अवसर दे कर, समाजवादी सपने को कुछ समय तक स्थगित रखना । इसकी योग्यता नहीं, परन्तु उनके किये का लाभ सन्तोषजनक न रहा। दूसरे, हमसे पिछड़े और अल्पविकसित अधिरचना वाले देशों की तुलना में बात कर रहा हूँ। परन्तु एक जमीनी सचाई पर आओ।”

वह प्रश्नाकुल आँखों से मेरी ओर देखने लगा.

“नेहरू के समय में आरंभ से ले कर अन्न की समस्या रही जो आरंभ के वर्षों में बहुत विकट थी। वास्तविक से अधिक कृत्रिम और उससे निपटने के लिए कोटा-परमिट-सप्लाई विभागों की बदइन्तजामी से जिसे आपूर्ति विभाग सौंपे जाने के बाद किदवई ने जादू की छड़ी से खत्म कर दिया था। परन्तु नेहरू कृषि उत्पाद की दिशा में कोई जमीनी कदम उठाने में विफल रहे। अमेरिका शान्ति-सहयोग योजना के पी. एल. 480 के तहत घटिया गेहूँ की आपूर्ति कर रहा था। इस गेहूँ में गाजर घास (बवदहतमेे हतंेे) के बीज भी मिले होते थे जिसके दाने बिखर जाने पर यह दूसरी वनस्पतियों, यहाँ तक कि घास पर भी इतनी भारी पड़ती है कि खेती को बर्वाद कर दे। अमेरिकी तन्त्र अपना बाजार तैयार करने के लिए हमारी कृषि को ही नष्ट करने पर तुला था। अमेरिकी विशेषज्ञ सलाह देते थे कि भारत खाद्यान्न के मामले में कभी आत्मनिर्भर नहीं हो सकता इसलिए उसे अमेरिका से अच्छे संबन्ध बना कर रखना चाहिए। शास्त्री ने सत्ता सँभाली तो पाकिस्तानी आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। सैन्य तैयारी भी लंगड़ी लूली ही थी, परन्तु पाकिस्तान के लिए भारी थी। अमेरिकी टैंक भी ढेर हो गए। इसके साथ ही उन्होंने जै जवान जै किसान का नारा दिया अर्थात् सैन्य और कृषि क्षेत्र पर समुचित ध्यान दिया और देखते देखते भारत कई गुना जनसंख्या के होते हुए भी अन्न के मामले में सरप्लस हो गया।

परन्तु जिस चीज की नेहरू से लेकर बाद तक कमी रही वह थी राष्ट्र निष्ठा. आत्मनिष्ठा की प्रबलती और राष्ट्र निष्ठा का अभाव। सब कुछ अपनी मुट्ठी में करने की झक में बहुत कुछ बर्वाद कर देने और देश को विपन्न बनाए रखने की नैतिक गिरावट। इस सरप्लस उत्पादन के लिए किसानों को समुचित मूल्य दिए बिना इतना अधिक खरीद लेना कि उसका भंडारण तक न किया जा सके, उसे सड़ा कर औने पौने भाव पर शराब कंपनियों को बेच दिया जाय और फिर कृत्रिम अभाव पैदा करके उससे दूने मूल्य पर खाद्यान्न का आयात करते हुए कमीशन खाया जाय।”

“तुम झूठा आरोप लगा रहे हो।“

”हो सकता है हिन्दू में प्रकाशित एक समाचार कथा की इन पंक्तियों से तुम्हें बात समझ में आ जायः
Hindu, Jul 20, 2007
Wheat import
“The Government was importing wheat at $ 317 – $330 a tonne in July 2007, while Indian farmers were only paid Rs.8,500 a tonne, which is less than $200 a tonne. And it is not the case that Indian farmers are not growing enough wheat to feed the people of India. This is a decision that will aggravate the food insecurity of the poor in India and undermine the country’s food sovereignty, is being presented as a step that will protect our food security.”
“The high cost of wheat import makes no political sense, because it threatens our food sovereignty. It makes no economic sense because there is no domestic scarcity and the imported wheat is more costlier than domestic wheat. And it makes no sense in terms of health and nutrition because the imported wheat is of inferior quality. Instead of importing high-cost, low-quality wheat the Government should be procuring wheat domestically to secure farmers’ livelihood, national food security and the food rights of the poor to safe and affordable food,” she said.
राष्ट्र निष्ठा की जो कमी विरल अपवाद को छोड़ कर पूरे कांग्रेसी और गैर कांग्रेसी प्रशासनों के दौरान बनी रही, जो ही ‘सब- कुछ-मेरे-लिए, ‘मर गया देश, जिन्दा रहे हम’ वाली मानसिकता की जननी बनी, और जिसके कारण ही राष्ट्र का नाम आते ही तुम्हें कँपकँपी आ जाती है, उसे दूर करने वाला नेतृत्व तुम्हें पहली बार मिल रहा है और इसमें ही अडंगे लगा कर तुम पहली वाली दशा में लौटने को आतुर हो।

Post – 2015-11-29

“हाँ, अब शुरू करो अपना मोदीनामा ।“

“मै ऐसा कुछ नहीं बता सकता जो तुम्हे पहले से मालूम नहीं। सिर्फ यह याद दिला सकता हूँ कि तुम्हारा प्रचार-तंत्र उसके किए पर परदा डालता रहा और काल्पनिक या मनोवैज्ञानिक मुद्दों को अनावश्यक तूल इसलिए देता रहा है कि लोगों का ध्यान उधर से हटाया जा सके। हैरानी इस बात की है कि तुम जैसे पढ़े लिखे लोग भी इतने उदासीन हो चुके हैं कि उनकी याद दिलाओ तो उसे प्रशस्तिगान कहने लगते हैं। देखो पहले भी कह चुका हूँ मोदी का जिक्र तो हमारी बहसों में आएगा ही।

“एक बात और बता दूँ, मोदी स्वतंत्र भारत का सबसे महान प्रधान मंत्री है.”

“नेहरू से भी बड़ा?” वह हंसने लगा.

“नेहरू ने देश को तोड़ा, पटेल ने देश को जोड़ा. शास्त्री को मौक़ा मिला होता तो बिखराव को रोकते. यह काम दूसरे किसी के वश का नहीं था. मोदी में जोड़ने की दृष्टि भी है, संकल्प भी है और इस दिशा मैं उसने पहल भी की है. नेहरू को न तो देश ने समझा न ही नेहरू ने इस देश को समझा. नेहरू जिसके सगे लगते थे उसका भी उन्होंने अहित ही किया. अपनी जिस बेटी को वह इतना प्यार करते थे उसका घर परिवार इस महत्वाकांक्षा के चलते की भारत का राज नेहरू परिवार से बाहर न जाने पाये, तबाह कर दिया. दामाद फ़्रस्ट्रेशन में शराबी और शिथिल कटिबन्ध बना दिन काटता रहा और असमय कालकवलित हो गया. जिस उत्तर प्रदेश के थे वह उनके पूरे शासन काल में उपेक्षित रहा और उनकी करनी से ही वह भूभाग जो युगों से देश का ह्रदय या heartland माना जाता था वह गोबर पट्टी में बदल गया. जिस कश्मीर से उनका नाभि नाल जुड़ा था उसकी सारी समस्याएं उनकी पैदा की हुई हैं, जिस पंडित कुल के थे उनकी दुर्गति के हज़ार किस्से हैं पर उन्हें सुनने वाला कोई नही. पहली बार उधर निगाह गई है तो मोदी की. जिस शेख अब्दुल्ला से उनका भाई जैसा प्रेम था उनको अपनी किन्ही नीतियों से इतना खफा कर दिया कि उनका मन सरहद के पार भागने लगा था. उसे संभालने की जगह सीधे जेल मैं डाल दिया और एक कूटनीतिक समस्या को घर फूँक तमाशा बना कर रख दिया. अपने को उदार दिखाने के लिए एल्विन वेरियर को आदिवासी कल्याण योजनाओं का काम सौप कर और नागालैंड में ईसाइयत के प्रचार की खुली छूट देकर उ से नागालैंड से बागी देश बना दिया और पूरे उत्तर पूर्व को इतना भारत विमुख बना दिया कि उसे फ़ौज़ से नियंत्रित किया जाने लगा. लोकतंत्र के उपासक ने केरल में चुनी हुई नंबूदरी सरकार को इसलिए गिरा दिया कि इससे कम्युनिज्म रुक जाएगा. तिब्बत बफर देश था जिसकी स्वायत्तता की रक्षा का भार भारत पर था. उस पर बिपदा आई तो दुबक कर बैठ गए और साम्राज्यवादी मंसूबों वाले एक बड़े देश को सीधे अपने सर पर लाद लिया और फिर नानएलाइंड आंदोलन आ अग्रणी नेता बनने की झक में सामरिक तैयारी की जरूरत ही न समझी। अस्त्रागारों में सोलर कुकर बनते रहे। खुफिया तन्त्र इतना कमजोर कि पता ही नहीं चला कि चीन की तैयारी क्या है। लोहिया ने चीन की यात्रा से लौटने के बाद आगाह किया था कि इससे भारत को खतरा हो सकता है, परन्तु आप चीनियों को अफीम के नशे में धुत रहने वाली कौम मान कर अपने गरूर में खोये रहे। शानितपथ और न्यायमार्ग के नामकरण से ही मान बैठे कि अब राष्ट्र मंडल बन जाने के बाद युद्ध की समस्या सदा के लिए समाप्त हो गई और विश्व संस्था जो करेगी न्याय ही करेगी कूट व्यवहार नहीं। बिना अपनी सामरिक तैयारी की पडताल किए पहले ही उकसावे पर युद्ध की घोषणा कर दी। बिना रसद, और असले के, बिना गर्म पोशाकबूट, और क़ायदे के बूट के लड़ते हुए हमारे निहत्थे, ठण्ड में ठिठरते, भूखे- प्यासे जवानो का कत्ले आम करा दिया और इसी सदमे में अपनी जान गवाँ दी.. ऐसे किताबी और आत्म ग्रस्त और देशघातक प्रधानमन्त्री की तुलना तुम मोदी से करने की सोच ही नही सकते.

नेहरू को किंवदन्तियों ने पतंग की तरह आसमान में टांग रखा था: बड़े बाप का बेटा, बड़े नाज़ों से पला, जिसके कपड़े इंग्लॅण्ड के धोबी नहीं धो पाते थे, पेरिस में धुलते थे, जेल में भी दूसरों से अधिक सुविधाओं से दिन काटने के बावजूद सबसे अधिक कष्ट झेलने वाले नेता जैसी कहानियों ने उसे देश का लाडला बना रखा था. दुनियादारी में वह लाडलों जैसा ही नादान भी था. होशियारी बस एक कि राज खानदान से बाहर न जाने पाये., उनकी भव्य काया और सौंदर्य ने, जिस पर वह खुद भी रीझे रहते थे, उनके सलीके और सुरूचिपूर्ण पोशाक आदि ने उनके व्यक्तित्व को इस तरह मंडित कर रखा था कि रखा था कि तुम नेहरू के आभामंडल को ही नेहरू मान बैठते हो. इस चायवाले के बेटे के पास सम्मोहित करने लायक कुछ नही, सब कुछ मिटटी की तरह मटियाला, फिर भी इसने उस मिट्टी की महक को पहचाना है और आध्यात्मिक शान्ति के लिए भटकते हुए उस मेरुदण्ड को भी समझा है जिसने इस देश को हज़ारों साल से तन कर खड़ा रहने की शक्ति दी है.”

वह खीझ रहा था, यह तो उसके चहरे से ही ज़ाहिर था, उसने मेरा कहा गौर से सुना भी न होगा. बोलने चला तो हकलाने लगा, “तुतुम्हे तो चारण होना चाहिए था.”

मैंने उसकी और ध्यान ही न दिया, “और सुनो, एक दिन मैंने कहा था कि इस देश के विभाजन और इसकी समस्याओं के लिए तुम्हारी पार्टी ज़िम्मेदार है, वह आधा सच था. पूरा सच यह है कि इसके विभाजन और उससे जुडी असंख्य त्रासदियों के लिए केवल दो आदमियों की प्रधान मंत्री बनने की महत्वाकांक्षएं जिम्मेदार थीं. और जानते हो, दोनों सेक्युलर मिज़ाज के थे. जिन्ना और नेहरू. गांधी जी इस रहस्य को समझ गए थे. कहा था, देश का बटवारा मेरी लाश पर होगा इसलिए अंतिम प्रयास किया था विभाजन की त्रासदी से बचने कि लिए जिन्ना को प्रधानमंत्री पद दे दिया जाय. परन्तु यह नेहरू थे जो अपनी महत्वाकांक्षा का त्याग करने को तैयार नहीं हुए थे. गांधी उसी दिन जीवित लाश बन गए थे. उपेक्षित, त्यक्त, विरक्त. ज़िंदगी को प्रार्थना के माध्यम से ढोते हुए. जब विभाजन कि दस्तावेज़ तैयार हो रहे थे तब उसकी आंच से बचने कि लिए नोआखाली चले गए थे कि कौन जाने कोई सिरफिरा उनकी जान ही लेले और वह अपनी उस प्रतिज्ञा पर खरे उतरें कि विभाजन उनकी लाश पर ही हुआ. नाथूराम ने तो अपनी विक्षिप्तता में उन्हें सद्गति दी थी, उनकी वह इच्छा पूरी की थी जो नोआखाली में पूरी न हो पाई थी. उन्हें सद्गति दी थी, जैसे कोई पुत्र पिता को चिताग्नि देता और कपाल क्रिया करता है.”

“इतना बोर तुमने इससे पहले कभी नहीं किया होगा.” वह पछता रहा होगा कि कहाँ से नेहरू का प्रसंग छेड़ बैठा.

“मैं भी देख रहा था. कई बार तुम इधर उधर देखने लगते थे कि आसपास कोई ईंट पत्थर है या नही, पर सच मानो मुझे बहुत मज़ा आरहा था. मैं कहना यह चाहता था कि यह भारत का पहला राजनेता है जिसने सोचा, गोलियों से किसी को अपना बना कर नही रखा जा सकता. अपना बनाने के लिए उनके हित को अपना हित मानना होता है. इन अकड़े हुए क्षेत्रों और जनों को विकास की दिशा में आगे बढ़ाकर, प्रगति का सहभागी बनाकर, उन्नति के अवसर देकर ही अपना बनाया जा सकता है. यह सोच पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक है. यह इलेक्शन का नारा नही था, इस पर अमल की कोशिश शुरू हो चुकी है. यही उसके नारे सबका साथ सबका विकास में भी है. नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका से अपनापे में भी. यह आदमी नारा गढ़ना भी जानता है, नारे को हक़ीक़त में बदलना भी जनता है और यह भी जानता है कौन क्यों विकास और अपनापे का विरोध कर रहा है.”

उससे रहा नहीं गया तो उठते हुए बोला, “इति भगवान सिंह विरचित मोदीनाम्ने चाटुग्रन्थे प्रथम: अध्यायः”
11/29/2015 4:23:22 PM

Post – 2015-11-28

गतं न शोचामि कृतं न मन्ये

“बोलो कब शुरू हो रहा है तुम्हारा ‘अपने अपने मोदी?’”

“आजकल पूरे देश में एक ही काम हो रहा है। मोदी नामा का वाचन। कोटि कोटि कंठों से। अपनी अपनी भाषा में, जप भी, अजपा जाप भी। तुम भी वही करते हो। मोदी के तो तुमने इतने रूप बना दिये है कि मैं लिखने भी चलू तो अपने अपने मोदी नहीं, ‘सबके मोदी सबके पास’ लिखना पड़ेगा।“

“ठीक है यही लिख मारो, पर उस रूप को भी जरूर रखना जिससे लोग असुरक्षित अनुभव करते हैं।“

“लिखूँगा जरूर और यह भी लिखूँगा कि असुरक्षित कहने वालों ने इतिहास में असुरक्षा की भावना जगा कर, क्या क्या गुल खिलाए हैं।“

“दंगे भड़काए हैं, तुम एक बार कह चुके हो।“

“मैं कहता हूँ, इस बार भी यही चाहते हैं। तुमने शर्बत खालसा का आयोजन नहीं देखा। यह उस आदमी का लड़का कर रहा है जिसके बाप की करनी के कारण उस उपद्रव को बढ़ावा मिला था जिसमें हिन्दुओं को बसों से उतार कर कतार में खडा करके मारा जाता रहा। आइ एस आई के तर्ज पर। जिसके उग्र रूप धारण कर लिया और राज्य के लिए खतरा बन गया तो हरमिन्दर साहब पर हमला और कत्लेआम हुआ। जिसकी अगली कड़ी उसकी दादी की हत्या थी जिसमें पता नहीं किनका किनका हाथ था और फिर 1984 का वह नृशंस और राज्य प्रायोजित हत्याकांड हुआ था। नासमझ इतिहास भूल जाते हैं और उसे दुहराते रहते हैं। समझदार इतिहास की गलतियों से सीख कर उससे बाहर आ जाते हैं और गलतियों से बचते हैं। तुम जिसके साथ खड़े हो वह शर्बत खालसा कराने वाला है, और मैं जिसके साथ हूँ वह इतिहास की चूक से बाहर आने वाला और गलतियों से बचने के लिए असाधारण धैर्य का परिचय देने वाला किरात है। किरातार्जुनीयम् पढ़ा है तुमने?“

“संस्कृत पढ़ी ही नहीं तो पढ़ता क्या। नाम जरूर सुना है सामान्य ज्ञान बढ़ाने के चलते।“

“मुझे भी कहानी तो भूल गई है पर वह मुद्रा याद है। अर्जुन किरात पर वाणों से लगातार प्रहार करते हैं पर उसका कुछ बिगड़ता ही नहीं। अन्त में थक कर अर्जुन समर्पण कर देते हैं और तो किरात वेशधारी शिव अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं और अर्जुन की वीरता से प्रसन्न हो कर उन्हें पा शुपत अस्त्र देते हैं जिसका प्रयोग महाभारत में भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण के विरुद्ध किया जाता है।

“अन्तर केवल यह है कि इस बार बाण चलाने वालों में पूरा प्रचारतन्त्र शामिल है जिसने उतने भयानक आयोजन को आया-गया कर दिया पर सीधा हमला न बना तो असुरक्षा के माहौल को खड़ा करके छायायुद्ध करने लगे – रामायण में आता है ‘कूट योद्धा हि राक्षसाः।‘ जानते हो जिस दिन मैंने कहा सभी वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक और तार्किक नही होता उसी दिन मेरे पास हिन्दू के मालिक एन. राम का भी एक ट्विटर आया था, जिसमें उन्होंने एक वैज्ञानिक का इंटरव्यू ट्वीट किया था। इतना अच्छा इंटर व्यू, प्रश्न करने वाले का अन्दाज, उच्चारण, प्रश्नों का चुनाव इतना उम्दा कि एक-एक वाक्य मेरी समझ में भी आ रहा था, जब कि टीवी चैनलों की हिन्दी तक मेरी समझ में नहीं आती। और उतना ही नपा तुला सुविचारित उत्तर उस वैज्ञानिक का जो अखाड़े में उतर आया था और बता रहा था कि ठीक इस मौके पर वह दंगल में क्यों शामिल हो गया। लम्बे अरसे तक वह सन्तुलित, तटस्थ और एक वैज्ञानिक के अपने सरोकारों के साथ बोलता रहा, बस अन्त में जब उसने कोसम्बी को वैज्ञानिक इतिहासकार और उससे पहले के लेखन और सामग्री को पौराणिक वगैरह बताया तब पता चला, वह धुले दिमाग का वैज्ञानिक है, और जिन विषयों का ज्ञान नहीं है, उन पर भी बोल सकता है, क्योंकि वह अपने पढ़े को अन्तिम सत्य मान कर आगे पढ़ना-समझना बन्द कर चुका है। ठीक यही स्थिति एन. राम और उनके हिन्दू की भी है। पहले से ही एक पोजिशन ले कर उसी को सही साबित करने के लिए आतुर पत्रकार हो, पत्र का मालिक हो या वैज्ञानिक हो, वह केवल वही देखेगा जो उसकी पोजिशन को सही साबित करे। वह पढ़ता नहीं है अपने काम की चीज की तलाश करता है। उसका विकास रुद्ध हो चुका है। सोचना देखना बन्द। जाने और माने के अनुरूप तथ्यों और आँकड़ों की तोड़-मरोड ही उसके लिए चिन्तन बन जाता है। इंटरव्यू के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते एन राम और उस वैज्ञानिक पर हँसी आने लगी।“

“सभी अखबारों की अपनी एक नीति होती है। इसमें हँसने की क्या बात है, यार।“

“यदि पत्र पक्षधर है तो दूसरे पक्ष की पीड़ा को नहीं समझ सकता। वह अपनी कीर्तन मंडली के लिए ही ग्राह्य हो सकता है। उसके भी ज्ञान का विस्तार नहीं कर सकता। इतिहासकार और जिम्मेदार पत्रकार की भूमिका न्यायाधीश की होती है। जहाँ किसी तकाजे से, यहाँ तक कि देशप्रेम या या राष्ट्र प्रेम के तकाजे से भी इसमें समझौता किया जाता है, उसकी विश्वसनीयता घटती है। वह यदि किसी राजनीति से परोक्ष रूप से भी जुडा हुआ है तो धीरे-धीर उसका भोंपू बनता चला जाता है। मुझे हँसी हिन्दू के एक निष्पक्ष और साहसी पत्र से भोंपू बनते चले जाने की नियति पर आ रही थी, जिससे बेखबर एन. राम अपने ट्विटर में मुस्कराते नज़र आ रहे थे। बोफोर्स की दलाली उजागर करके धाक जमाने वाला उस जत्थे के साथ ताली बजा रहा है जो ‘लाज शरम तज दीनी रे तोसे नैना मिलाइके’ गाता झूमता रहा और मस्ती में बेपर्दा हो गया. इतिहास में कैसे कैसे समीकरण बनते हैं!”

वह हँसने लगा, “लाज शरम तज दीनी नहीं है. छाप तिलक सब छीनी है.”

“वही बात है। तुम्हारी बात भी सही। छाप-तिलक का भी फरक मिट गया है नही तो इतने झंडो और डंडों का मेल कैसे होता। सभी सुर मिला कर वही कौवाली क्यों गाने लगते।

“आपात काल के दौर में, बोफर की हेराफेरी के समय हिन्दू ने, जो निडरता दिखाई थी, उससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ी थी। उसके बाद लगता है सनसनी पैदा करते रहने का चश्का सा लग गया। सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम लीग वाली मानसिकता के लोगों का प्रवेश हिन्दू में उसी तरह हो गया जैसे एक निर्णायक मोड़ पर कम्युनिस्ट आंदोलन में हुआ था जिसकी चर्चा तुमसे कर चुका हूँ। लीग के प्रोग्राम को सेकुलरिज्म का नाम देकर आगे बढ़ाने में हिन्दू की भूमिका सबसे प्रधान रही है। कम्युनिस्ट पार्टी ने तो अपनी भूल मान भी ली हिन्दू की समझ तक में यह बात नहीं आई है।

“ये असुरक्षित अनुभव करने वाले लोग अपनी पुरानी बेवकूफियों से डरे हुए हैं। मोदी ने तो ठीक वही नीति अपनाई जो ‘अपने-अपने राम’ में राम की है – गतं न शोचामि कृतं न मन्ये। आगे बदले की कार्रवाई करते भी नहीं हैं। सभी अपने किये से डरे उन्हें मिटाने का प्रयत्न करते हैं और अपने ही कुकर्मों से अपना अनिष्ट करते हैं. तुमने ‘अपने-अपने राम’ की ठीक याद दिलाई यार। इस ओर तो मेरा ध्यान ही नही गया था।

“तो तुम समझते हो सब कुछ ठीक चल रहा है।“

“अभी तो किक लगा है, इंजन चालू हुआ है, चल-रहा का सवाल कहाँ से पैदा हो गया । ठीक चल रहा है नहीं, ठीक दिशा में चल रहा है। अगर अकेला आदमी भय, आतंक, फूट और पिछड़े पन से देश को मुक्ति दिलाने के लिए ऐसा प्रयत्न कर रहा हो जिसे भगीरथ प्रयत्न कहा जाता है, गलत कह दिया, इसे तो तुम समझ ही नहीं सकते, हरकूलियन प्रयत्न कहूँ तो समझ जाओगे, हां तो, हरकूलियन प्रयत्न कर रहा हो और दूसरे सारे लोग रस्सी बल्ला ले कर उसके पाँव फँसाने और पीछे खींचने में लगे हों, ओर इसके बाद भी वह खड़ा ही नहीं, आगे बढ़ता हुआ दीख रहा हो, तो इतना ही बहुत बड़ी उपलब्धि है। परन्तु उसने इतनी बाधाओं के बीच जितना कुछ कर दिखाया वह किसी दूसरे से सम्भव हुआ ही नही. किसी को सूझा तक नहीं.”

“मैं भी तो सुनूँ।“

“मिनटों में खत्म होने वाली बात तो है नहीं, इसे कल के लिए रखो।“
11/28/2015 9:32:32 AM

Post – 2015-11-26

कैसे कैसे मोदी

तुम नाहक उस पर नाराज हो गए थे। वह कहीं नहीं जा रहा है। और लोग कहते हैं और वह भी मानता है कि वह ठीक कह रहा था।
मैं भी जानता था कि वह कहीं नहीं जाएगा, क्योंकि दुनिया में मुसलमानों का केवल एक ही देश है भारत।

मैं भी जानता था कि वह ठीक कह रहा था। वही नहीं उस जैसे सारे मुसलमान, असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं और तब तक असुरक्षित अनुभव करते रहेंगे जब तक इस्लाम के नाम पर नृषंसता खत्म नहीं होती। उस पर उनका नियन्त्रण नहीं है इसलिए आज दुनिया के सारे शान्तिप्रेमी मुसलमान अपने भीतर ग्लानि अनुभव कर रहे हैं कि लोग भले प्रकट करें या न करें, हमें शक की नजर से देख रहे हैं। वह भी उन्हीं शान्तिप्रेमी मुसलमानों में से एक है।

तुमने यह क्या कह दिया कि दुनिया में मुसलमानों का केवल एक ही देश है, भारत। संघ वालों से पूछ लिया करो ?

संघ वाले भी मानते हैं कि मुसलमान केवल भारत में सुरक्षित हैं। सभी तरह के मुसलमान। पाकिस्तान और बांग्ला देश मुस्लिम देश नहीं हैं, वे सुन्नी देश हैं । उनमें शिया मुसलमानों के लिए जगह नहीं। ईरान मुसलमानों का देश नहीं शिया लोगों का देश है उसमें सुन्नी सम्मान से नहीं रह सकते। दूसरे मुस्लिम देषों का भी यही हाल है। यदि शिया सुन्नी दोनो रहते है तो दोनों एक दूसरे के पीछे पड़े रहते हैं। अकेला भारत है जिसमें सभी प्रकार के मुसलमान, सभी धर्मो के लोग रहते हैं और यह उन सबका अपना देश है। क्योंकि यह हिन्दू देश है. इसमें सनातनी और पोंगापंथी भी रह सकते हैं क्योंकि इसकी यह उदारता और सहिष्णुता हमने भारी मूल्य देकर अर्जित की है. इस कीमती विरासत को हम प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं इतने जख्म खाने के बाद भी। इतनी लानत-मलामत के बाद भी। इसे तुम समझ नही सकते. जो इतिहास तुम पढ़ते और गढ़ते रहे हो उसमें इसी को नष्ट किया जाता रहा. संघ वाले वहाँ गलती करते हैं जहाँ कहते हैं वन्दे मातरम कहना होगा। इस कहना होगा में अपेक्षा नहीं उद्दंडता है, और यह उतना ही नागवार है जितना कोई मुझसे कहे कि चन्दन लगाना ही होगा, या जनेऊ पहनना ही होगा।
मोदी इसी संकीर्ण संघ-चेतना से आगे बढ़ कर राष्ट्रीयता की नई परिभाषा रच रहा है। जाति-धर्म से ऊपर एक ऐसी महिमामय राष्ट्रीय चेतना का निर्माण जिसकी कल्पना इससे पहले किसी ने की नहीं। जो इतना उदात्त लगता है और मोदी के संघ से संबन्ध के कारण इतना अविश्वसनीय लगता है कि इसके प्रमाण सामने होने पर भी तुम विश्वास नहीं कर पाते। यदि विश्वास करते हैं तो संघ वाले, विश्व हिन्दू परिषद वाले, रामनामी ओढ़ कर राजनीति के स्वाद के लिए लालायित लोग जो जो तुमसे अधिक बौखलाए हुए हैं. घबरा कर ऐसे मौकों पर ऐसे वचन बोलते रहते हैं जिससे मोदी के मंसूबों पर पानी फिर जाय। यदि विघटनवादी हिन्दुत्व न रहा तो उनका अस्तित्व मिट जायेगा।

तुम मुझसे इतने सवाल करते हो, क्या तुम बता सकते हो ब्राह्मणवाद और हिंदुत्व में क्या अंतर है?

क्या ब्राह्मण हिन्दू नही होता?

हिंदुत्व में ब्राह्मण के लिए भी जगह है, इस्लाम के लिए भी जगह है, ईसाइयत आदि के लिए भी जगह है, परन्तु ब्राह्मणवाद में, इस्लाम में, ईसाइयत में हिन्दुत्वा के लिए जगह नहीं है। ये सभी इंसान को बाँटते हैं. तीन कनौजिया तरह चूल्हा वाली कहावत सुनी है न. मजहबी लोग इंसानियत को तोड़ते हैं। हिंदुत्व जोड़ता. वसुधैव कुटुम्बकम हिन्दुत्वा का मूल मंत्र है. ब्राह्मणो अस्य मुखमासीत् ब्राह्मणवाद का मंत्र है. मोदी की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि वह चाय वाले का बेटा है बल्कि यह कि उसने ब्राह्मणवाद की पीड़ा को भी अनुभव किया है। एक छोटी सी भूल के बाद उसने लगातार जोड़ने वाला काम किया है. वह उस जोड़ने वाले हिंदुत्व का वाहक है, संघ की चेतना में ब्राह्मणवाद है. मोदी इससे आगे जाना चाहता है, संघ उसे पीछे खींचना चाहता है. संघ और दूसरे अजगलस्तनों का नारा रहा है मंदिर यहीं बनाएंगे, मोदी का देवालय से अधिक ज़रूरी शौचालय है।

यह सब झाँसा देने के लिए है भाई. तुम मुखौटे को असली चेहरा मान बैठे हो. हमें तुम जो कहते हो वह नहीं दिखाई देता, कुछ और दिखाई देता है.

दिखाई तक देगा भी नहीं। पैरानोइया को हिन्दी में क्या कहेंगे, याद नहीं, इसकी परिभाषा तुम किसी डिक्शनरी में देख लेना। जैसे कोई व्यक्ति पैरानाएड होता है वैसे ही लम्बे प्रचार और आत्मनिर्देशन से पूरा समाज या उसका बहुत बड़ा हिस्सा इसका शिकार हो जाता है। जो साधारण से साधारण आदमी को दिखाई देता है वह तक उसे दिखाई नहीं देता। इसकी सबसे ताजी मिसाल बेंगलूरु के एक कालेज की छात्राओं के बीच उपस्थित राहुल गाँधी थे। वह पूछते हैं अमुक काम तुम्हें दिखाई देता है, वे एक स्वर से कहती हैं, ‘हाँ’। वह कहते हैं मुझे दिखाई नहीं देता। फिर सोचते हैं दुबारा पूछ देखूँ, फिर जवाब मिलता है, हाँ दिखाई देता है। वह कहते हैं मुझे दिखाई नहीं देता। बच्चियाँ थी, जी में आया भी हो कि कह दें किसी मनोचिकित्सक के पास जाना था, यहाँ क्यों चले आए। अब तुम समझे तुम्हें कुछ क्यों दिखाई नहीं देता।

मुझसे बुरी हालत तो तुम्हारी है, इतने सारे लोग लगातार असुरक्षा देख रहे हैं, और वह तुम्हें दिखाई देता ही नहीं।

पहली बात यह कि वे देख कुछ नहीं रहे हैं, उन्हें भ्रम हो रहा है। जो देख रहे हैं वह दृष्टिभ्रम है, श्रुतिभ्रम है, हैल्यूसिनेशन है, क्योंकि एक को वह कहीं दिखाई दे रहा है दूसरे को कहीं। वे लगातार बोल रहे हैं और काफी ऊँची आवाज में बोल रहे हैं और कहते हैं बोलने की आजादी छिन गई है, हाल इमर्जेंसी से बदतर हो गए हैं। ये सभी पैरानोइया के ही लक्षण है। और पूछो कि आप चाहते क्या हो तो यह तक बता नहीं सकते। क्योंकि उन्हें किसी घटना से असुरक्षा नहीं अनुभव हो रही है। मोदी से असुरक्षा अनुभव हो रही है। यह तो कह नहीं सकते कि मोदी को सत्ता से हटा दो तो हमारी असुरक्षा मिट जाएगी।
और जानते हो इसका कारण क्या है? कारण यह है कि मोदी ऐसे काम कर रहा है जो किसी कि कल्पना तक में नहीं आया था. वे दर गए हैं कि यदि इसे पुरे पांच साल भी बेरोक टॉक काम करने को मिल गया तो हमारे दिन सदा के लिए लड़ जाएंगे.

तुम कहते हो वह बोले, पहले तुम तो बोलो कि तुम क्या चाहते हो। कह नहीं सकते और इसीलिए तुम इतने लोग इतने स्वरों में बोलते हुए भी केवल गुर्रा रहे हो । कह कुछ नहीं पा रहे। इंसानियत का स्तर इतना नीचे तुमने गिराया है मोदी तुम्हें भी ऊपर उठाना चाहता है। विश्व स्तर का मानव बनाना चाहता है जो अभी तुम बन नहीं पाए हो।

तुमने अपने अपने राम लिखा। अपने अपने मोदी क्यों नहीं लिख मारते।

इस पर शाम को बात करेंगे.

Post – 2015-11-24

जायें तो जायें कहां
तुमने तो मुझे सचमुच डरा दिया यार। पर तुम क्या चाहते हो हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और जो कुछ उल्टा सीधा होता है उसे टुकुर टुकर देखते रहें?

यह तो कर ही रहे हो, बस इसमें एक चीज और जुड़ गया है बार-बार खतरे और असुरक्षा की आवाज बुलन्द करके असुरक्षा का विस्तार करना।

असुरक्षा हम बढ़ा रहे हैं? तुम कहते हो हम बढ़ा रहे हैं, असुरक्षा। इतने सारे लोग, इतने सारे क्षेत्रों के, जिनका हमारी पार्टी से कभी सम्बन्ध नहीं रहा चिन्ताग्रस्त होते चले जा रहे हैं, और तुम कहते हो असुरक्षा हम बढ़ा रहे हैं।

“मुझे मुस्लिम लीग के उभार के बाद उसके पीछे से चलने वाली ताकतों की याद आ रही थी जो खास तौर से होली और मुहर्रम के आस पास इशारा करते थे और ‘इस्लाम खतरे में’ के नारे लगने शुरू हो जाते थे और फिर इस्लाम को खतरे से बचाने के लिए दबे सताए लोग जान को हथेली पर ले कर बाहर निकल पड़ते थे और लोग जान बचने के लिए इधर उधर भागने लगते थे । कहीं छुपके से किए इशारे पर, अपनी रोटी सेंकने वालों की शह पर, लगाई गई आग का नीचे तक विस्तार और सबसे अधिक निचले स्तर का हाथ और गर्दन । खुराफात किसी की; हाथ और जान-माल किन्ही औरों का।“

“पर इस तरह के अफवाहों से सु शिक्षित और साहित्य, कला और विज्ञान से जुड़े लोग तो प्रभावित नहीं होते थे।“

मैं हँसने लगा, “यार सबसे अधिक यही लोग प्रभावित होते हैं जो इमोशन की फसल उगाने और काटने के तरीकों में माहिर होते हैं, ‘‘मुसलमानों में खूँ बाकी नहीं है” इसी का दूसरा संस्करण था। उसी अफवाह को, उसी फुसफुसाहट को आवेश की ऊँचाई पर पहुँचा कर नक्कारे की आवाज बना दिया जाता था। सचाई यह कि मुसलमानों में खून था, वह ब दहवासी नहीं थी जो ऐसे बयानों से पैदा कर दी जाती थी। और सोचो ऐसे कवि को अक़्ल के धनी लो गों के बीच भी दार्शनिक कवि कहा जाने लगा था। अभी हाल ही में जिस सिंघल जी का निधन हुआ, वह वैज्ञानिक थे, मुरली मनाहर जो शी भौतिकशास्त्री है जिनके बारे में लाल बहादुर वर्मा ने कहा था उनके फीजिक्स पर मेटाफीजिक्स हावी हो गया, संघ के पूर्व सर चालक रज्जू भैया भी संभवतः भौतिकशास्त्री ही थे। हिटलर तो चित्रकार या वास्तुकार था शायद और बालासाहब तो चित्रकार थे ही। तुम्हें ऐसे अनपढ़ मिल जाएँगे जिनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो, जो चीजों में फर्क करना जानते हों, उन को बिना किसी भावुकता के परखते हों। ज्ञान और विज्ञान जिस कठाले में जा कर रच पच जाते हैं वह है हमारी ज्ञानव्यवस्था। इसलिए आवेशपूर्ण कथन, समर्थन, सहयोग सब आविष्ट मानसिकता की उपज होते हैं, वह प्रेताविष्ट हों यह जरूरी नहीं, प्रेत वे स्वयं पैदा कर सकते हैं, अपनी संचित उूर्जा से। जब मैं कह रहा था कि भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में आवेश अधिक था, तार्किकता कम, वस्तुपरकता लगभग गायब तो यह भी कह रहा था कि ये मार्क्सवादी हो ही नहीं सकते। कुछ ढोंगियों को तुमने रामनामी ओढ़ कर हर तरह के कुकर्म करते देखा हो गा । कुछ सदाचारी भी होते हैं यह भी मानना होगा। अनुपात तय करना मेरे वश में नहीं। उसी तरह ये मार्क्सनामी ओढ़े लोग मार्क्सवादी हों यह जरूरी नहीं। देखना यह चाहिए कि वे तर्क, विवेक, गुणदोष विचार का ध्यान रखते हैं या नारेबाजी में शामिल हो जाते है, ‘सड़ी गली सरकार को एक धक्का और दो’ दुहराने से कोई मार्क्सवादी हो जाता है क्या? ‘जो हक है हमारा हम लेंगे, उससे न जरा भी कम लेंगे’ दुहराने से हक मिलता है क्या? यह भीड़ जुटाने और मजमाबाजी करने के डमरू हैं। डमरू आज भी बज रहा है। अरे कल तो इसमें हमारा सबसे आला डमरूबाज शामिल हो गया। चारों ओर से यही सुनने में आ रहा है कि असुरक्षा बढ़ गई है तो उसकी बीवी को लगा असुरक्षा बढ़ गई होगी इसलिए निकल भागने के लिए एक बिल कहीं बाहर को बनाना चाहिए। अब तक उसको ऐसा नहीं लगा था, बीवी ने कहा तो कान्तासम्मित ही कहा होगा, अब उसे भी असुरक्षा अनुभव होने लगी। अफवाहें इसी तरह फैलती और खतरनाक आयाम लेती हैं, इसलिए हर बार पूछो, क्या हुआ, कहाँ हुआ, उसे तौलो, क्वांटिफाई करो और देखो किसी चीज को अनुपात से बढ़ा कर तिल का ताड तो नहीं बनाया गया है। इसे कहेंगे मार्क्सवादी सोच और मार्क्सवादी समझ और इसके बाद तुम्हारा मार्क्सवादी कार्यभार आरंभ होता है इस अफवाह और बदहवासी के खिलाफ लड़ने का। अकेले पड़ जाओ तो भी लड़ो तर्क देते और प्रतिवाद की तार्किक माँग करते हुए। तुम यह नहीं कर रहे हो। हाथ पर हाथ धरे नारेबाजों के साथ नारेबाजी कर रहे हो। मैं अकेला तुमसे भी लड़ रहा हूँ और उनसे भी और तुम मुझसे भी डरने लगते हो। है न! डरो मत, लड़ो। नफरत मत फैलाओ, नफरत के कारणों की व्याख्या करो, नफरत उस व्यख्या से ही दूर हो जाएगी।“

“इतनी ऊँची हाँकते हो? अकेले के वश का काम है यह?”

हमारा दुर्भाग्य या सौभाग्य यह है कि हम बौद्धिक हैं। सोचने, समझने और लिखने के सारे काम अकेले ही किए जाते हैं। दूसरों पर नजर रख कर सोचोगे, लिखोगे तो जिन पर नजर रखोगे उनका तुम्हारी चेतना में प्रच्छन्न प्रवेश हो जाएगा। तुम्हारे विचार में मलिनता आ जाएगी। ऐसा विचार खुद अपनी दीवार तैयार करके, उससे टकरा कर लौट कर तुम्हारे पास आ जाता है। तुम्हारे विचार अपनी पूरी ईमानदारी से दूसरों तक पहुँचे, वे यदि सहमत हों तो, उनके कथन-लेखन के माध्यम से वे दूसरों तक पहुँचें। इस तरह बनता है वह महावृत्त जिसमें व्यक्ति के रूप में अकेले होते हुए भी तुम विचारों के स्तर पर एक बड़े समुदाय के साथ होते हो जो भीड़ बन कर तुम्हारे साथ खड़े नहीं होते, अपनी अपनी जगह पर मुस्तैदी से खड़े होते हैं। जो तुम्हारी बात नहीं मानते हैं, तुम्हारे विचारों और अपने विचारों के टकराव से जो चमक पैदा होती है उसे मशाल बनाते हैं इसलिए वे तुम्हारे अनुयायी नहीं होते, विचार बन्धु होते है जिनके अपने विचार है। तुम जब पार्टी के साथ होते हो, पार्टीजन होते हो, तो तुम्हारे पास विचार नहीं होते। तुम मान लेते हो पार्टी के पास विचार हो सकते हैं, और तुम उसकी लाइन पकड़ लेते हो। लाइन का एक मतलब मछली मारने की कँटिया भी होता है । तो लग्गी उसके हाथ में और मछली की तरह लाइन में फंसे तुम। तुम हो कर भी होते ही नहीं, सिवाय एक छटपटाहट के ।“

आज वह चुपचाप सुन रहा था।

“गणित जानते हो। भीड़ में लोग कहने को जुड़ते हैं, पर दर असल गुणित होते हैं। आवेग के कारण यदि बौद्धिकता आधी भी रह गई तो उन असंख्य लोगों के जुडने के कारण आधा असंख्य आधों से गुणित होता हुआ उस शून्य के निकट पहुँच जाता है जिसमें विवेक रह ही नहीं जाता, इसे मास हिस्टीरिया कहते हैं। लोग जब कहते हैं कि संख्या इतनी बढ़ गई तो मैं गणितज्ञों से पूछता हूँ, गणित मेरी कमजोर है इसलिए, कि विवेक का स्तर नैनोमीटर से तय करके बताओ भाई।

करने को तुम्हें बस यह है कि तुम अपने को सच्चा मार्क्सवादी सिद्ध करो। और उस नौटंकीवाले छोरे से मुलाकात हो तो उसे भी समझाना कि कलाकार तू बड़ा है, ठान ले तो आदमी से चूहा बन कर भी दिखा सकता है, परन्तु आदमी के रूप में तू खासा अच्छा लगता है। कि चूहा बन कर जीने का चुनाव करने से बेहतर है, आदमी बन कर जी। तुझे कुछ होने का नहीं, तू जितना सुरक्षित है उतना अपनी प्लस जेड सेक्योरिटी के बाद भी देश का प्रधानमंत्री तक सुरक्षित नहीं है जिस पर पत्थर फेंकने वालों में तू भी शामिल हो गया, पर यह नहीं जानता कि उसकी गलती क्या है, तेरी जोरू को भले पता हो कि उसकी गलती क्या है।
11/24/2015 12:24:49 PM

Post – 2015-11-23

हुए तुम दोस्त जिनके दुश्मन उनका आसमाँ क्यों हो

“भारतीय कम्युनिस्टों की सबसे बड़ी कमी यह है कि वे संजीदा नहीं रहे हैं, न अपने काम के प्रति, न अपने दल के प्रति, न देश के प्रति न ही मानवता के प्रति। वे रोमानी रहे हैं, आवेश में अपनी पहचान तक भूल जाते रहे हैं। “ मैंने सुबह की छूटी कड़ी को जोड़ते हुए कहा।

“और क्या सोचते हो तुम?”

” जिसे भी हाथ लगाया वह काम से गया। मैं सोचजा हूं इतना अशुभ हाथ क्या कम्युनिज्म का ही होना था जो मानवता की उदात्ततम आकांक्षा है?”

“और क्या सोचते हो तुम?”

“सोचता हूं प्रवेश का मुहूर्त गलत हो गया। यजमान भी निखट्टू और पुरोधा भी अनाड़ी, न वेदी का मान ठीक न समिधा का प्रबन्ध, मन्त्र रचे ही न गये पाठ क्या होता। उद्गाता मिले सिरफिरे, खुद ही मनमाने मन्त्र बना कर गाने लगे। यह महायज्ञ संपादित कैसे होता यार?”
जाहिर है मैं उसे खिझा रहा था। इसमें उस अन्याय का बदला लेने का दबा भाव भी रहा हो सकता है जो मुझे झेलना पड़ा था और जिससे तंग आकर मैंने पक्षधरता के आदर्श को सम्मान तो दिया पर दूसरे पाले में खड़ा हो कर जिरह करने लगा।

“तुम इतने पश्चगामी हो चुके हो कि मन्त्र-तन्त्र और यज्ञ-याग की दुनिया में जा कर आज की दुनिया को समझने का प्रयत्न कर रहे हो?”

“नहीं, तुमने अपनी नासमझी में अपनी इतनी दुर्गति की कि उसे बयान करने के लिए कई हजार पीछे लौटने पर ही तुम्हारे यथार्थ को बयान करने का प्रतीकविधान और रूपक मिल पाया।

“तुम्हारी समझ का यह हाल कि देखा रूस में रक्त क्रान्ति हुई तो क्रान्ति की बात तो भूल गए। याद रह गया रक्त पात। रक्त बहाने पर खुश होने लगे। हिंसा और उपद्रव को हथियार बनाने की सोचने लगे। तुम्हें राज थापर की किताब से एक और अंश की याद दिलाऊँ । विभाजन के दौर में खून खराबा मचा हुआ था। इससे पीड़ित राज ने जब कामरेड डांगे से दुखड़ा रोया तो जानते हो उनका उत्तर क्या था? राज के शब्दों में ही सुनोः
Dange looked at me impassively, with almost a gleam of secret delight. ‘Don’t worry, Raj,’ he said. ‘Let our people taste blood, let them learn how to draw it. It will make the coming revolution easier.’ 43

“तो यह थी तुम्हारी क्रान्ति की समझ और यह था मानवीय संवेदना का रूप। यह था देश प्रेम और पीड़ितों दुखियारों का पक्ष। डांगे के ही कार्यकाल में आपात काल आया था और उन्होंने ही उसका समर्थन किया था, यह जानते ही हो।

“भाई रूस में जनता और सेना के बीच की दीवार बहुत पतली थी। युद्ध छिड़ने पर अपने लबादे, घोड़े, जीन और बन्दूक के साथ जनता के बीच से नौजवानों को लामबन्द होना पड़ता था। कहो जनता हथियारबन्द थी और उसके आक्रोश को सैन्य बल से दबाया नहीं जा सकता था। सेना ने विद्रोहियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया था, यह तुम जानते हो। तुम्हारे यहाँ गाँधी जैसा अहिंसक का रोना यह था कि अंग्रेजों ने हमसे हथियार छीन कर हमें नामर्द बना दिया। इस निहत्थी जनता को तुम क्रान्ति में उतारना चाहते थे और उतारा तो बलि का बकरा बना दिया। आज तक यह मुगालता दूर नहीं हुआ। मेरा एक प्यारा सा कवि था, मुझसे दस पन्द्रह साल छोटा था। तेजस्वी। उसकी कविता की एक पंक्ति याद आ रही है, ‘‘जवाब दर सवाल है कि इन्कलाब चाहिए।’ कविता में, साहित्य में इन्कलाब न हो तो कविता कविता नहीं, साहित्य साहित्य नही। इन्कलाब के राग मजदूरों के नारों में आज भी मिलेंगे। बस इसी रूमानियत ने अक्ल पर परदा डाल दिया। जागते हुए भी सपने दिखाई देने लगे, जमीनी सचाई आँखों से ओझल हो गई।

“गाँधी ने इस देश को पहचाना था और इसके सही हथियार को पहचाना था। वह था सत्यव्रत और सत्याग्रह। अहिंसात्मक प्रतिरोध। इसने औरंगजेब जैसे दुराग्रही को झुकाकर रख दिया था।”

“यार, कब हुए गाँधी और उनसे कितने पहले हुआ औरंगजेब।”

“मैं जानता हूँ दोनों के काल का अन्तर, पर तुम नहीं जानते कि सत्याग्रह इस देश का बहुत पुराना हथियार है और इसने बादशाहों को झुकने पर मजबूर किया है। इसकी रीढ़ है अपमान सह कर भी सत्य के साथ खड़ा होना। बल्कि अपमान को अमृत और सम्मान को विष समझना। तुम तो पढ़ते लिखते ही रहे हो और मनुस्मृति को तो अंगीठी जलाने का रद्दी कागज ही समझते हो, पर उसी मनुस्मृति में यह भी लिखा है,
सम्मानात् ब्राह्मणो नित्यं उद्विजेत् विषात् इव। अमृतस्येव च आकांक्षेत् अवमानस्य सर्वदा।। 2.163

“तो यदि इतिहास की गहरी समझ होती तो अपने आयुधागार में से सबसे प्रभावी आयुध निकाला होता।

“तुम अपने इतिहास को नहीं जानते इसलिए इस देश की जनता को भी न तो जान सके न प्यार कर सके। उसे हिन्दू मुसलमान बना कर देखते रहे और उनकी उपेक्षा करते रहे जो इन दायरों को धता बता कर अपने रीति-रिवाज और सम्मान के साथ शताब्दियों से इस देश में रहे हैं और अपने लिए इससे अच्छा देश किसी अन्य देश को मानते ही नही। तुम लोग अपने को प्यार करते रहे। यश और लाभ की चिन्ता में अपने को बेचते हुए, अपने अतीत को बेचते हुए, अपने बाप दादों को बेचते हुए।

“दूसरे देशों से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विशेषता यह है कि उनमें एक कम्युनिस्ट पार्टी है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कई धड़े हैं और उनमें से प्रत्येक दूसरों को गलत मानता है और मैं सभी से सहमत हो जाता हूँ लेकिन सिर्फ इस बात पर।”

“कभी तो गंभीरता से बात किया करो।”

“मखौल नहीं कर रहा हूँ। एक विशेषता और है भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों की कि ये उन देशों की जानकारी रखते हैं जिनसे मदद मिलती रही है, अपने देश और समाज को नहीं जानते न इससे प्यार करते हैं। जब कि दूसरे देशों की कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपने देश को दूसरे देशों से अधिक जानती हैं और अपने देश को प्यार भी करती हैं।”

“क्या बेतुकी बात करते हो!”

“प्यार करने के लिए समाज को समझने की जरूरत होती है और समाज को समझने के लिए इतिहास को जानना जरूरी होता है क्योंकि हम अपने पूरे इतिहास को जीते हैं, केवल वर्तमान को नहीं, यह मैं कह आया हूँ।

“तुम इतिहास को नहीं जानते। उसे जानने के लिए जिन भाषाओं का ज्ञान जरूरी है उन्हें भी तुमने किनारे लगा दिया। नादानी में तुम अपने इतिहास से डरते हो इसलिए तुम्हें अपना समाज भी डरावना लगता है। डरावने इतिहास से बचने के लिए तुम इतिहास गढ़ते हो और गढ़े हुए इतिहास में समाज को कस कर रखना चाहते हो। यह हो नहीं पाता और तुम्हारे इतिहास और इतिहासबोध की धज्जियाँ उड़ जाती हैं। फिर तुम समाज को अपनी इच्छा के अनुसार बनाना चाहते हो और उसे समझने का काम तब तक के लिए स्थगित कर देते हो, जब तक वह तुम्हारे मनचाहे रूप में बन कर तैयार न हो जाय। वह बनने की जगह बिगड़ता चला जाता है। इतिहास की समझ स्थगित होती चली जाती है। तुम समस्याओं के भूत खड़े करते हो और उनसे लड़ते हो और समस्याये उग्र होती चली जाती हैं। तुमने प्रगतिशीलता के नाम पर प्रतिगामी शक्तियों से लड़ने के लिए उन्हें उभारा और अब वे तुम्हारे ऊपर ही भारी पड़ रही हैं। तुमने यह सोचा ही नहीं कि हमारी प्रगतिशीलता की समझ सही है या गलत। सही है तो उल्टे परिणाम क्यों आ रहे हैं?

“अर्थ व्यवस्था की तुम्हारी समझ यह कि पूँजीवाद के आने से पहले ही तुमने उससे लड़ाई मोल ले ली। राष्ट्रीय पूँजीवाद को विकसित ही नहीं होने दिया। इन सब बातों की जानकारी जैसी होनी चाहिए वह तो है नहीं पर इतनी मोटी बात समझ में आती है कि जिन हथकंडों के कारण कल कारखाने ही बन्द होने लगें, कहें मजदूरों की संख्या और ताकत बढ़ने के स्थान पर घटने लगे, वह उसी मजदूर वर्ग के साथ विष्वासघात हुआ जिसको एकत्र पाकर लगा कि इनके बल पर क्रान्ति की जा सकती है। नतीजा आर्थिक और औद्योगिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनने के स्थान पर हम पुनः बाजार बनते चले गए। राष्ट्रीय पूँजी का पलायन होने लगा। मर गया देश ज़िंदा रह गया इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा जिनकी आवाज़ बुलंद करने वालों की बोलती बंद होती जा रही है.
11/23/2015 9:30:07 PM