Post – 2019-01-28

को बड़ छोट कहत अपराधू

तीसरा वर्ग निषादों और गड़रियों और दूसरे चरवाहों का है, जो न तो नगर में स्थाई बस्ती बसाकर रहते हैं, न देहातों में। ये कहीं भी डेरा जमा लेते हैं। ये हानिकारक पक्षियों और जानवरों से देश को मुक्त करते रहते हैं। ये बड़ी लगन से अपने काम में जुटे रहते हैं, इसलिए ये भारत को हानिकारक कीट- पतंग से, जिनकी यहां बहुतायत है, मुक्त रखते हैं और ऐसे पक्षियों और साथ ही जंगली जानवरों से भारत को मुक्त रखते हैं, जो किसानों के बीज और फसल को खा जाते हैं।

यहां और अन्यत्र भी यह बहुत स्पष्ट है, कि मेगास्थनीज की नजर जन्मजात श्रेष्ठता या कनिष्ठता, अर्थात् जाति पर नहीं, अपितु कर्म या व्यवसाय पर है, जिसमें अस्पृश्यता के लिए भी स्थान नहीं है। यह जानकारी की कमी के कारण भी हो सकता है, और दृष्टिकोण की भिन्नता के कारण भी। फिर भी शिकारियों और पशुपालकों को एक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। दृष्टि के इस इकहरेपन के कारण पशुधन में भारत की समृद्धि में पशुपालकों की भूमिका का और उनके द्वारा दिए जाने वाले राज-भाग का उल्लेख होने से रह गया।

Ancient India as Described by Megasthanese का संपादक अपनी पादटिप्पणी में याद दिलाता है कि निषाद हिंदू वर्णों में नहीं आते, संभवत: ये अहीरों की तरह एक जनजाति ( ड्राइव) थे, परंतु मेगास्थनीज के सामने हिंदू समाज है ही नहीं। उसके सामने भारतीय समाज है, भारतीय राज्य है, और भारतीय शासन व्यवस्था है।

एक दूसरी बात कि प्राचीन भारत में और बाद में भी मध्येशिया से पशुपालकों के जत्थे भारत में प्रवेश करते रहे हैं जिनके सबसे नए नमूने गूजर हैं, जो भारतीय समाज में रच-पच गए हैं, फिर भी कुछ चारणजीवी भी रह गए हैं। भारतीय पशुपालक (ब्राहुई) मध्येशिया तक विचरण करते रहे हैं। परंतु पशुपालन भारत में इनके साथ आरंभ नहीं हुआ।

गुजरात, जो पशु धन की दृष्टि से हड़प्पा काल से चर्चा में रहा है, उसमें हड़प्पा के नागर चरण से बहुत पहले से पशुपालन के प्रमाण मिलते हैं । हड़प्पा सभ्यता के पशुधन में गुजरात का बहुत बड़ा योगदान है। जिन सांड़ों का अंकन हड़प्पा की मुद्राओं पर हुआ है, वे आज भी गुजरात में पहचाने जा सकते हैं।

ऋग्वेद में पशुपालक यादवों (याद्वानां पशु:) का उल्लेख है। यजुर्वेद में अजपाल और अविपाल समुदायों का उल्लेख है। मैं जिस पक्ष पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं, वह यह कि मानवीय बलबूते पर किया जाने वाला उत्पादन दो शाखाओं में विभक्त दिखाई देता है। एक खेती-बारी जिससे आधुनिक सभ्यता का विकास हुआ। दूसरा पशुपालन, जो इस सूझ से पैदा हुआ कि जिन शावकों का शिकार किया जाता या पकड़ा जाता है और अनुकूल मौसम में उनकी संख्या अधिक हो जाने पर उनको घेर कर रखा जाता है और उनमें से कुछ उसी अवधि में प्रजनन करके अपनी संख्या बढ़ाने लगते हैं, यदि इनको पाल-पोष कर रखा जाए तो शिकार करने की झंझट से मुक्ति मिल सकती है ।

जिस सूझ से आहार के लिए जुगाई जाने वाली वन्य औषधियों को अपने प्रयत्न से सुनियोजित ढंग से उत्पादित करने की पहल हुई थी, वही आखेटजीवियों में रेवड़बन्दी से पैदा हुई थी। इसकी ओर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। गो, पशुपालन में विकास की अधिक संभावनाएं नहीं थीं।

एक विचार यह था कि वही समाज पहले शिकार से पशुपालन की ओर अग्रसर हुआ और उसके बाद वन्य अनाजों को उत्पादित करने की सूझ पैदा हुई। दूसरा विचार यह है कि पहले खेती आरंभ हुई और उसके बाद पशुपालन आरंभ हुआ। इसके समर्थन में कॉलिन रेनफ्रू ने जो तर्क दिए हैं उन्हें दोहराने का अवसर यहां नहीं है, परंतु यहां प्रश्न पूर्वापर का नहीं है, दो समानांतर विकासों की बात है।

शिकार पर अधिक निर्भर करने वाला समाज पशुपालन की ओर अग्रसर हुआ और वानस्पतिक भंडार से अपना आहार चुंगने वाला कृषि की ओर। किसने किसको प्रेरित किया यह तय करना जिस गहन और व्यापक अध्ययन की अपेक्षा करता है, वह मेरे पास नहीं है।

परंतु पशुचारण और पशुपालन को आदिम मानना, जनजातीय मानना, वस्तुस्थिति को समझने से इन्कार करने का पर्याय है। भारतीय प्राकृतिक संपदा और अर्थव्यवस्था में दोनों के लिए पर्याप्त अवसर था, यद्यपि इस पर अन्तिम रूप से कुछ कहने से बचना होशियारी हो सकती है, समझदारी नहीं। यदि हम रेन्फ्रू पर ध्यान दें तो पशुपालन खेती के बाद ही संभव था, इसलिए अन्यत्र रेवड़बंदी होती रही और कृषि के सफल प्रयोग से प्रेरित होकर पशुपालन आरंभ हुआ जिसका आधार भारत में था।

सही सिद्ध होने से मुझे डर लगता है। मैं चाहता हूं मेरी गलतियों पर ध्यान दिया जाए जिससे मेरे सोचने में यदि इकहरापन बना रह गया हो, वह दूर हो और मेरी समझ में भी सुधार आए।

Post – 2019-01-27

नहीं भूखा रहा जो दूसरों का पेट भरता है

मेगास्थनीज के अ्नुसार दूसरा वर्ग किसानों का है, जो संख्या में दूसरों की तुलना में बहुत अधिक है। इनको युद्ध करने या दूसरे सरकारी कामकाज में लगाए जाने से मुक्ति मिली रहती है, इसलिए ये अपनी पूरी शक्ति खेती पर लगाते हैं। कोई दुश्मन भी आक्रमण करते समय इस बात का ध्यान रखता है कि किसान को कोई असुविधा न होने पाए, क्योंकि इस वर्ग के लोगों को लोक हितकारी माना जाता है। इसलिए इस बात का ध्यान रखा जाता है इनको कोई खरोंच तक न आने पाए। इस तरह सभी दृष्टियों से निरापद होने के कारण यह बहुत अच्छी फसल पैदा करते हैं और यह भारत के निवासियों को मौज मस्ती के सारे जरूरी सामान प्रदान करते हैं।

किसान और उसकी पत्नी और बच्चे देहात में रहते हैं और ये नगर में आने से कतराते हैं। ये राजा को भूमि का लगान चुकाते हैं, क्योंकि पूरा भारत राजा की संपत्ति है। इस लगान के अतिरिक्त ये धरती की उपज का एक चौथाई राजकोष में देते हैं।

यहां मेगास्थनीज से कुछ भूल हुई लगती है। लगान उत्पाद का राजभाग या कर है। वह चौथाई था यह भी सच है। किसी भौगोलिक क्षेत्र की सभी तरह की संपदा राजा के अधिकार में आती है, क्योंकि वह सभी की रक्षा करता है। जिस संपदा पर किसी का निजी दावा नहीं है – जंगल, पहाड़, जलाशय — वह भी राजा की संपत्ति मानी जाती थी। यदि कोई व्यक्ति बिना किसी उत्तराधिकारी के मर जाए तो उसकी संपदा भी राजा की हो जाती थी। परंतु अपनी संपदा में वह जो वृद्धि करता था, वह सुरक्षा होने के कारण ही कर पाता था, इसलिए उसमें भी राजा का अंश होता था। इस नियम से उसके राज्य में बसने वाला प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ अर्जित करता था उसमें राजा का भाग होता था। इसी के आधार पर राजा अपनी सत्ता कायम रखता था। इसी तर्क से राजा को जनभक्ष (सत्रासाहो जनभक्षो जनंसह श्च्यवनो युध्मो अनु जोषं उक्षितो ) कहा जाता था।

परंतु कृषिभूमि पर अधिकार उस व्यक्ति का है जिसने उसे साफ किया और समतल बनाया है। राजा अपनी पहल से भी जमीन की सफाई करा सकता था जिसे राजा की भूमि या सीता कहा जाता था। इस निजी भूमि पर ही दोनों प्रकार के कर लेता रहा हो सकता है, एक भूमि के बदले और दूसरा सुरक्षा के बदले।

हमारे लिए विशेष महत्व की सूचना यह है युद्ध के समय या सैनिकों के अभियान के समय इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता था किसान को किसी तरह की सुविधा न होने पाए और उसकी संपत्ति पर कोई आंच न आने पाए। इस नियम का पालन शेरशाह सूरी भी करता था परंतु उससे आगे या पीछे का कोई दूसरा मध्यकालीन शासक इसका ध्यान नहीं रखता था।

जहां तक किसानों के उत्पीड़न और सुविधा का सवाल है औरंगजेब जिसकी धार्मिक क्रूरता के विषय में बहुत सी बातें सही है, परंतु उसके विषय में यह जानकर आश्चर्य होगा कि वह शाहजहां और जहांगीर से अधिक मानवीय शासक था। शेरशाह के बाद वह पहला शासक था जो इस बात का ध्यान रखता था कि किसानों को अधिक तकलीफ न होने पाए। इस बात का ध्यान मराठों ने भी नहीं रखा और इस दृष्टि से औरंगजेब मराठाें से अधिक मानवीय था। शाहजहां के शासन में जितने हिंदुओं को इस्लाम कबूल करने के लिए बाध्य किया गया, उतने हिंदुओं का धर्मांतरण औरंगजेब के कारण नहीं हुआ।

पहली बार, स्वतंत्र भारत में, किसान की कीमत पर औद्योगिक विकास पर इकहरा बल देने और किसानों में से कुछ को कर्जखोरी की आदत डालने से यह स्थिति पैदा की गई कि वह आत्महत्या कर रहा है। रोटी को लाले पड़ जाने पर मशीन का उत्पादन भी ठहर जाता है, रोटी मशीन और उसको चलाने वाले, दोनों पैदा करती है, इसे समझना होगा।

हमारा समाज वस्तुपूजक है, उपयोगी वस्तुओं का देवोपम सम्मान करने का आदी है। मेरे बचपन में किसान जमीन पर पड़े एक दाने को भी ‘अन्न ही ब्रह्म है’ वाली श्रद्धा से उठाकर माथे लगाता था। जिस समय का चित्र मेगास्थनीज ने प्रस्तुत किया है, उसमें किसान को भी समाज इसी तरह जमीन से उठाकर माथे लगाता था। प्राकृतिक विपर्यय का कोई निदान नहीं, पर अकाल कम पड़ते थे, क्योंकि लोग नई फसल का अनाज नहीं एक साल पहले का अनाज खाते थे और एक अनावृष्टि झेलने की ताकत रखते थे जो खत्म होकर हैंड टु माउथ वाली दशा तक आ पहुंची है।

Post – 2019-01-26

समाज विभाजन

मेगास्थनीज ने भारतीय समाज के विषय में जो धारणा बनाई वह निम्न प्रकार है:
“समूचा भारतीय समाज सात वर्गों में विभाजित है। इनमें सबसे पहले उस समुदाय का स्थान है जो संख्या में सबसे कम है, परंतु सम्मान की दृष्टि से सबसे ऊपर हैं। यह है दार्शनिकों का समुदाय। दूसरे सभी इनसे नीचे माने जाते हैं। यह न तो किसी का मालिक है न किसी के अधीन। इनको कोई काम करने को नहीं कहा जा सकता। परंतु यजमान इनको जीवन काल में यज्ञ आदि के लिए और मरने के बाद अंत्येष्टि के निमित्त काम पर लगाते हैं और ये मृत व्यक्ति के परवर्ती संस्कार करते हैं, क्योंकि ऐसा विश्वास किया जाता है यह प्रेतों के विषय में अच्छी जानकारी रखते हैं। इन सेवाओं के लिए उनको प्रचुर दान दक्षिणा मिलती है। भारतीय जनों के लिए यह एक बहुत बड़ी सेवा यह करते हैं कि वर्ष के आरंभ में लोगों को इकट्ठा करके उनको अगले साल के अनावृष्टि और वृष्टि और हारी- बीमारी की जानकारी कराते हैं इसलिए सामान्य जनों से लेकर राजा तक आने वाली आपदाओं का मुकाबला करने की तैयारी कर लेते थे और अभाव के दिनों के लिए अपनी जरूरत का सामान जुटा कर रख लेते थे।”
The whole population of India is divided in seven castes, of which the first is formed by the collective body of philosophers which in point of number is inferior to other classes, but in point of dignity preempted over all. For the philosophers, being exempted from all public duties, are neither the masters nor the servants of others. They are, however, engaged by private persons to offer sacrifices due in lifetime, and celebrate the obsequies of the dead: for they are believed to be the most conversant with matters pertaining to the Hades. In requital of such services they receive valuable gifts and privileges. To the people of India at large they also render great benefits, when gathered together at the beginning of the year they forewarn the assembled multitudes about the droughts and wet weather, and also about propitious, winds and diseases, and other topics capable of profiting the hearers. Thus the people and sovereign learning beforehand what is to happen always make adequate provision against a coming deficiency.

यह मेगास्थनीज के लेखह का मैक्क्रिंडल द्वारा किया गया अनुवाद है जिसका अनुवाद हमने अपने ढंग से किया है। यहां हम दो बातों की ओर ध्यान दिलाना चाहेंगे। मैक्क्रिंडल ने अपने अनुवाद में सामाजिक विभाग के लिए कास्ट का प्रयोग किया है। यह दो कारणों से गलत है। कास्ट शब्द पुर्तगाली भाषा का है, मेगास्थनीज इसका प्रयोग नहीं कर सकता था।

दूसरे, मैक्क्रिंडल भारतीय समाज के वर्गीकरण को वर्ण-व्यवस्था के अभाव में समझ ही नहीं सकता था, क्योंकि उसके सामने साहित्य और शास्त्र था। हमारे सामने भी शास्त्रीय विधान होते हैं इसलिए हम भी नजर से काम नहीं लेते, शास्त्र लिखित को प्रमाण मानकर अपने को उसके अनुसार ढालने का प्रयत्न करते हैं। मेगस्थनीज के सामने शास्त्र नहीं था समाज था। वह उसे देख रहा था और समझने का प्रयत्न कर रहा था। प्रयत्न सराहनीय है इसके बावजूद जरूरी नहीं कि यह सटीक भी हो।

एक दूसरा पक्ष हमारे अपने विद्वानों की ज्ञान सीमा का है। हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि भारत ने फलित ज्योतिष का ज्ञान युनानियों से प्राप्त किया, जबकि यहां में जो साक्ष्य मिल रहा है वह एक यूनानी द्वारा है जो भारतीय ज्योतिष और वर्षफल को एक आश्चर्य के रूप में दर्द कर रहा है।

प्रसंगवश याद दिला दें कि द्विवेदी जी ने यवनिका शब्द के आधार पर यह नतीजा निकाला था कि नाटकों में पर्दे का प्रयोग यूनानी प्रभाव का द्योतक है, जबकि यूनानी रंगमंच खुले हुआ करते थे उनमें पर्दे का प्रयोग होता ही न था। इस पर हमने अन्यत्र अपना मत रखा है, इसलिए इसके विस्तार में नहीं जाएंगे।

उन्होंने अंग्रेजी आवर hour और ज्योतिष के होरा चक्र के बीच संबंध देखते हुए अपनी कल्पना से एक सत्य का आविष्कार कर दिया, जो लंगड़ा है। भोजपुरी में ‘होरहा’ अर्थ है सीधे आग पर भुना हुआ चने या मटर का गट्ठर से उसकी फली से होता है। ‘होलिका’ उस आदिम अवस्था का पर्व है जब मनुष्य पाक शास्त्र से अपरिचित था, पात्रों का विकास नहीं हुआ था, वह सीधे आग पर भूनकर, हथेली से मसल कर अनाज खाया करता था। आगे चलकर होला या होलिका कई चरणों के बाद, कथाओं, उपकथाओं मे लिपटकर रहस्य में हो गया। होलना- जलाना किस बोली से आया है यह हमें भी नहीं पता, परंतु होराचक्र का संबंध वर्ष चक्र से है जो फाल्गुनी पूर्णमासी या वार्त्रघ्नी पूर्णमासी है, और इसमें वृत्र का वध इस नाम के राक्षस का वध नहीं है, वर्ष चक्र का अंत है। वृत्र का अर्थ यहां वर्तन करने वाला, घूमने वाला है। यही होराचक्र है।
समाज के अन्य विभागों पर कल।

Post – 2019-01-25

समाज व्यवस्था और वर्णव्यवस्था

जब मैं कह रहा था कि हम अपने को पूरी तरह नहीं देख पाते हैं, उसके कुछ पक्ष हमारी आंखों से ओझल रह जाते हैं, जब कि एक परदेसी की नजर में वे आ जाते हैं तो उनमें से एक पक्ष भारतीय समाज की बनावट से संबंध रखता है।

हम सामान्यतः भारतीय समाज को चार वर्णों में बांटकर देखने के आदी हैं। परंतु, इससे पूरे समाज का चित्र सामने नहीं आ पाता। हमें चार वर्णों से अलग एक पांचवें वर्ण की कल्पना करनी होती है जिसे हम अंत्यज या पंचम वर्ण कहते हैं। उसके बाहर फिर भी कुछ लोग बचे रह जाते हैं, जिनको किसी वर्ण में नहीं रखा जा सकता।

उदाहरण के लिए वर्ण समाज के भीतर आने वाले कायस्थों को ही लें
जो बहुत प्राचीन काल से ब्राह्मणों के प्रतिस्पर्धी रहे हैं, और उनके कर्मकांड की व्यर्थता का उपहास करते हुए – आज की परिभाषा के अनुसार – धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाते रहे हैं, उनके लिए वर्ण व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है। सन् याद नहीं, पर कोलकाता हाई कोर्ट के एक फैसले के अनुसार उनको शूद्र बताया गया था। ये थे कायस्थ।

हमारे पास कायस्थों की जन्मपत्री में जाने का अवकाश नहीं है, परंतु यह बताने का समय जरूर है कि कायस्थ कार्यस्थ अर्थात् प्रशासनिक पदों पर नियुक्त होने वाले लोगों की संज्ञा थी, जो उन वर्णों से निकल कर आते थे जिनको शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य।

यह समाज या समुदाय अभिज्ञान के मामले में स्वयं सबसे अधिक भ्रमित है। जो प्रतिबंध दूसरे वर्णों के लिए लगाए गए हैं, उनमें से एक (असगोत्र विवाह) का तिरस्कार यहां देखने को मिलता है। कायस्थों में वर्मा वर्मा से ही शादी विवाह का संबंध रखेगा, श्रीवास्तव श्रीवास्तव के भीतर ही संबंध रखेगा। यही दूसरों के विषय में भी लागू है।

सुदूर अतीत का आग्रह कि हम ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय, वैश्य हैं, एकमेक होने के बाद भी बना रह गया। वर्ण व्यवस्था की दीवारें इतनी मजबूत हैं, कि हम अपना वर्ण भूल जाएं तो भी वर्ण सीमा बनी रहती है। धर्म बदल लें तो भी नहीं जाती। परन्तु यदि आपकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति ऐसी है कि आप वर्ण समाज के विधान को रीतिनिर्वाह मान कर विद्रोह नहीं करते तो भी हीनभावना पैदा नहीं होती तो उसका भी यह एक नमूना है।

जो लोग इस व्यवस्था की जड़ों को समझने से पहले समाज को बदलना चाहते हैं, उन्हें इसका अध्ययन करना चाहिए। समझ के बिना बदलाव नहीं किया जा सकता, विध्वंस अवश्य किया जा सकता है। अपनी नासमझी को भी एक उपलब्धि मानते हुए जो लोग, जो जी में आए वह करते हुए, समाज को बदलना चाहते हैं वे समाज का विध्वंस कर सकते हैं पर न तो समाज में सही बदलाव ला सकते हैं, न ही पलायन से अपने को बचा सकते हैं, क्योंकि बचाव सबके साथ ही संभव होता है।

मैं इस प्रश्न पर उस विदेशी की समझ की दाद देता हूं जिसने वर्ण व्यवस्था के अनुसार भारतीय समाज को समझने की चेष्टा नहीं की, अपितु जैसा देखा, जैसा समझ में आया, वैसा बयान किया। इसके कारण ही उसके आलोचक यह आरोप लगाते रहे कि उसे भारतीय समाज की समझ नहीं थी। वे मानते थे कि भारतीय समाज चार वर्णों में बटा हुआ है और जो इस बात को नहीं मानता वह भारतीय समाज को नहीं समझता।

इसके विपरीत हम यह कहना चाहते हैं कि मेगास्थनीज को भारतीय समाज की जितनी अच्छी समझ थी, उतनी हमें भी नहीं है, हमारे शास्त्रों को भी नहीं थी, उसके आलोचकों को भी नहीं थी। उसने भारतीय समाज को सात भागों में विभाजित किया था। यह विभाजन भारतीय समाज को समझने में किसी भी अन्य विभाजन की तुलना में अधिक सटीक और अधिक वस्तुपरक है। परन्तु इसे आज तो नहीं बताया जा सकता।

Post – 2019-01-25

समाज व्यवस्था और वर्णव्यवस्था

जब मैं कह रहा था कि हम अपने को पूरी तरह नहीं देख पाते हैं, उसके कुछ पक्ष हमारी आंखों से ओझल रह जाते हैं, जब कि एक परदेसी की नजर में वे आ जाते हैं तो उनमें से एक पक्ष भारतीय समाज की बनावट से संबंध रखता है।

हम सामान्यतः भारतीय समाज को चार वर्णों में बांटकर देखने के आदी हैं। परंतु, इससे पूरे समाज का चित्र सामने नहीं आ पाता। हमें चार वर्णों से अलग एक पांचवें वर्ण की कल्पना करनी होती है जिसे हम अंत्यज या पंचम वर्ण कहते हैं। उसके बाहर फिर भी कुछ लोग बचे रह जाते हैं, जिनको किसी वर्ण में नहीं रखा जा सकता।

उदाहरण के लिए वर्ण समाज के भीतर आने वाले कायस्थों को ही लें
जो बहुत प्राचीन काल से ब्राह्मणों के प्रतिस्पर्धी रहे हैं, और उनके कर्मकांड की व्यर्थता का उपहास करते हुए – आज की परिभाषा के अनुसार – धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाते रहे हैं, उनके लिए वर्ण व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है। सन् याद नहीं, पर कोलकाता हाई कोर्ट के एक फैसले के अनुसार उनको शूद्र बताया गया था। ये थे कायस्थ।

हमारे पास कायस्थों की जन्मपत्री में जाने का अवकाश नहीं है, परंतु यह बताने का समय जरूर है कि कायस्थ कार्यस्थ अर्थात् प्रशासनिक पदों पर नियुक्त होने वाले लोगों की संज्ञा थी, जो उन वर्णों से निकल कर आते थे जिनको शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य।

यह समाज या समुदाय अभिज्ञान के मामले में स्वयं सबसे अधिक भ्रमित है। जो प्रतिबंध दूसरे वर्णों के लिए लगाए गए हैं, उनमें से एक (असगोत्र विवाह) का तिरस्कार यहां देखने को मिलता है। कायस्थों में वर्मा वर्मा से ही शादी विवाह का संबंध रखेगा, श्रीवास्तव श्रीवास्तव के भीतर ही संबंध रखेगा। यही दूसरों के विषय में भी लागू है।

सुदूर अतीत का आग्रह कि हम ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय, वैश्य हैं, एकमेक होने के बाद भी बना रह गया। वर्ण व्यवस्था की दीवारें इतनी मजबूत हैं, कि हम अपना वर्ण भूल जाएं तो भी वर्ण सीमा बनी रहती है। धर्म बदल लें तो भी नहीं जाती। परन्तु यदि आपकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति ऐसी है कि आप वर्ण समाज के विधान को रीतिनिर्वाह मान कर विद्रोह नहीं करते तो भी हीनभावना पैदा नहीं होती तो उसका भी यह एक नमूना है।

जो लोग इस व्यवस्था की जड़ों को समझने से पहले समाज को बदलना चाहते हैं, उन्हें इसका अध्ययन करना चाहिए। समझ के बिना बदलाव नहीं किया जा सकता, विध्वंस अवश्य किया जा सकता है। अपनी नासमझी को भी एक उपलब्धि मानते हुए जो लोग, जो जी में आए वह करते हुए, समाज को बदलना चाहते हैं वे समाज का विध्वंस कर सकते हैं पर न तो समाज में सही बदलाव ला सकते हैं, न ही पलायन से अपने को बचा सकते हैं, क्योंकि बचाव सबके साथ ही संभव होता है।

मैं इस प्रश्न पर उस विदेशी की समझ की दाद देता हूं जिसने वर्ण व्यवस्था के अनुसार भारतीय समाज को समझने की चेष्टा नहीं की, अपितु जैसा देखा, जैसा समझ में आया, वैसा बयान किया। इसके कारण ही उसके आलोचक यह आरोप लगाते रहे कि उसे भारतीय समाज की समझ नहीं थी। वे मानते थे कि भारतीय समाज चार वर्णों में बटा हुआ है और जो इस बात को नहीं मानता वह भारतीय समाज को नहीं समझता।

इसके विपरीत हम यह कहना चाहते हैं कि मेगास्थनीज को भारतीय समाज की जितनी अच्छी समझ थी, उतनी हमें भी नहीं है, हमारे शास्त्रों को भी नहीं थी, उसके आलोचकों को भी नहीं थी। उसने भारतीय समाज को सात भागों में विभाजित किया था। यह विभाजन भारतीय समाज को समझने में किसी भी अन्य विभाजन की तुलना में अधिक सटीक और अधिक वस्तुपरक है। परन्तु इसे आज तो नहीं बताया जा सकता।

Post – 2019-01-24

निर्वासित

हँसते हुए कहता था ‘कहीं कोई गम नहीं!
लगता था उसके गम की कोई इन्तहा नहीं।
‘हम कितने खुश थे, देखिए, उस बाग में मगर
वह बाग कहीं होगा सिर्फ उसमें हम नहीं ।।’
***
मर गए देखिए सितम वाले
नामलेवा तलक बचा न रहा।।
खिलजी, तुगलक कहीं ढूढ़े न मिले
लोदी गायब हैं, मुगल भी न रहा ।।

Post – 2019-01-24

दो दिन से मैं ऊपर से सामान्य रहने के प्रयत्न के बाद भी भीतर से व्यग्र हूँ। कारण अग्निशेखर द्वारा जम्मू के हाल पर भेजा गया एक लिंक है। आप को सलाह है कि चैन की नींद लेने के लिए आप उसे देखने से बचें। पर पता न दें तो आप यह कैसे समझेंगे कि किसे देखने से बचना है।

Post – 2019-01-23

हया को भी हया आ जाए लेकिन…

हम सभी भारत से अतीत काल में परिचित और इसके विषय में जानकारी देने वाले लेखकों में मेगस्थनीज के विचारों की मोटी जानकारी रखते हैं, क्योंकि इतिहासकार अपनी पुस्तकों में प्राय: इनके हवाले देते रहे हैं। परन्तु अधिकांश जानकारियां तत्कालीन समाज की नैतिकता और शासन व्यवस्था के विषय में होती हैं और इनमें कुछ इबारतों को ही बार बार इस तरह दुहराया जाता है मानो अधिकांश लेखकों ने पुस्तकों में उद्धृत वाक्यों पर भरोसा करके उन्हें ही दुहरा दिया हो।

कोई भी विदेशी लेखक किसी देश और समाज की बहुत अंतरंग और गहन जानकारी नहीं रख सकता और उससे कुछ पहलू छूट जाएं यह प्राचीन ही नहीं आधुनिक विदेशी लेखकों के विषय में सच है जिन्हें परिवहन, सूचना के माध्यमों और किसी भी पहलू पर उपलब्ध साहित्य की सुविधाएं प्राप्त हैं।

परन्तु विदेशी लेखक की नजर अल्प परिचय के बाद भी हमारे कतिपय ऐसे पहलुओं की ओर जा सकती है जिससे अति परिचय के कारण ध्यान ही नहीं देते। ये हमारी उपलब्धियां भी हो सकती हैं और सामाजिक विकृतियां भी। इसलिए हमारे लिए कोई भी विदेशी लेखक पूरी तरह भरोसे का नहीं हो सकता, उसका महत्व पूरक के रूप में ही हो सकता है।

परन्तु हमारा देश जो सूचना और ज्ञान के मामले में विदेशी ‘सेवकों’ पर निर्भर करता है उसे अपने स्रोतों से उपलब्ध सूचनाओं से अधिक भरोसा विदेसियों पर हो तो इस पर हैरान होने का कोई कारण इसलिए भी नहीं कि जहां तक प्राचीन साहित्य का प्रश्न है, हमारे इतिहासकारों को उसका पता ही नहीं और जितना कयास, आभास और अनुवाद से जान पाते हैं, वे उसे समझने से अधिक उसका सत्यानाश करने के प्रयत्न में रहते हैं और इस झक में उन्होंने जो तोड़फोड़ की है उससे विदेशी यात्रियों के वर्णन अप्रभावित रहे हैं।

मेगास्थनीज के भारत विषयक ज्ञान को इसी परिदृश्य में रख कर देखा जाना चाहिए और इस दृष्टि से वह यूनानी लेखकों में सबसे विश्वसनीय और अन्यथा भी बहुत भरोसे के हैं क्योंकि:
1. तत्कालीन भारतीय समाज और मूल्यों के विषय में जो मत व्यक्त किए हैं वे चीनी यात्रियों के विवरणों से मेल खाते हैं;
2. भारत के भौगोलिक यथार्थ के अनुरूप हैं;
3. भारतीय साहित्य में उपलब्ध सूचनाओं से अनमेल नहीं हैं; और
4. तहस नहस किए जाने के लाख प्रयत्नों और दमन, उत्पीड़न, अतिदोहन जनित दुरवस्था के बाद भी वे मूल्य हिन्दू समाज में ही नहीं अवशिष्ट रह गए हैं, किसी न किसी रूप में भारतीय भूभाग में बसने वाले दूसरे समुदायों में भी तलाशे जा सकते हैं जिनके कारण भारत के पारसी, मुसलमान, ईसाई अपने अभारतीय मजहबी लोगों से अलग पहचाने जा सकते हैं।

मेगास्थनीज ने भारत के विषय में जो सूचनाएं प्रस्तुत की हैं उनको संक्षेप में भी रखना चाहें तो वह कई पन्नों में पूरा होगा। हम इसे सार रूप में रखना चाहेंगे:
1. भारत एक विशाल देश है जो तीन ओर से समुद्र से और उत्तर में हिमालय से घिरा है। इसको आयताकार मानना एक ऐसी मामूली भूल है जिसे दक्षिण की ओर जाती तटरेखा और उस युग की सीमा में नाविकों से उपलब्ध सूचनाओं को ध्यान में रखते हुए सटीक मानना होगा। ध्यान रहे कि यह तुर्कों और मुगलों के हिंदुस्तान से और मनु के आर्यावर्त से विशाल है, विष्णुपुराण के अनुरूप है।
1.1. इसमें अनेक पर्वत हैं, जिनको उनसे निकलने वाली अनगिनत नदियां काटती हैं। इसकी सबसे विशाल, बहुत चौड़ी, बहुत गहरी और पवित्र नदी गंगा है, जिसके समकक्ष नील, दजला, फरात, डेन्यूब कोई नहीं।
1.2. इसमें कई उर्वर भूभाग हैं, सिंचाई की सुविधाएं हैं, साल में दो बार बरसात होती है, साल में दो फसलें उगाई जाती हैं, इसलिए अन्न का बाहुल्य है।
1.3. मीठे कन्द नैसर्गिक रूप में पैदा होते हैं(अन्य कन्दों के साथ शकरकन्द को याद रखें), अपार खुशहाली है ।
1.4. सभी तरह के फलदार पेड़ों के बाग-बगीचे हैं. सभी तरह के पशु-पक्षी हैं और हाथी तो इतने विशाल और इतने अधिक, कि उनके सामने लीबिया के हाथी कुछ नहीं। और इनको पकड़कर पालतू बनाया जाता है प्रशिक्षित किया जाता है और युद्ध के काम में लाया जाता है जिससे ये किसी युद्ध का पासा पलट सकते हैं। इनके ही कारण सिकंदर का साहस गंंगा प्रदेश की ओर बढ़ने का नहीं हुआ, जबकि वह इसके निकट पहुंच चुका था।
1.5. यहां लोहा, तांबा, सोना,, चांदी, हीरा,जस्ता, टिन और दूसरी धातुओं के भंडार हैं, जिनसे विविध प्रकार के समान आभूषण, औजार, और हथियार बनते हैं। इस तरह यह सभी प्रकार से समृद्ध देश है जैसा दुनिया में कोई नहीं।
1.6 इसमें सभी तरह की कलाओं में दक्षता रखने वाले कलाकार और कारीगर हैं।

इसके साथ ही उसने ऊंचे आदर्शों और नैतिक मूल्यों और सर्वोत्तम शासन व्यवस्था नागरिकों की सच्चरित्रता, विद्वानों के पांडित्य, उनकी दार्शनिक चिंतन पद्धति, उनके ज्योतिर्वैज्ञानिक पूर्वकथन नागरिकों के स्वाभिमान, डील-डौल और तेजस्विता की बातें की है जिनमें से अधिकांश को इतनी बार दोहराया जाता रहा है उसका उल्लेख करना समय का अपव्यय होगा।

हम यहां भारत देश महान है का राग अलापने के लिए ऊपर के विवरण नहीं दे रहे थे। हम केवल यह याद दिलाना चाहते हैं जिन ग्रीक लेखकों ने भारत के विषय में लिखा है उनमें से जो सूचना के मामले में मेगस्थनीज को सबसे सही मानते हैं, उन्होंने भी उसकी उसकी विश्वसनीयता को संदिग्ध कह कर दुष्प्रचारित किया है:
The ancient writers, whenever they judge of those who have written on Indian matters, are without doubt wont to reckon Megasthenese among those writers who are given to lying and least worthy of credit, and to rank him almost on a par with Ktesias.

क्यों? एक ओर वे यह मानते हैं भारत के विषय में उनकी जानकारी बहुत कम है, इस मामले में सबसे भरोसे की मेगास्थनीज है और इसके बावजूद वे अविश्वसनीय भी ठहराते हैं। जिस सिकंदर ने दारा को परास्त करके केवल उसके साम्राज्य को अपना बना कर विश्वविजेता होने का दावा किया था, उसके शौर्य और साहस पर गर्व करने वालों को भारत के समक्ष अपनी यह तौहीन बर्दाश्त नहीं थी। वे मेगास्थनीज को ही झूठा सिद्ध करके अपनी लाज बचा रहे थे।

वह स्वयं झूठ बोल रहे थे, पोरस से सिकंदर की पराजय को छुपाते हुए झूठा इतिहास गढ़ रहे थे। यह विवाद का विषय हो सकता है की जीत पोरस की हुई थी या सिकंदर की, परंतु यह तो सच है कि मगध के सैन्यबल का अनुमान करके विश्व विजेता भाग खड़ा हुआ था।

बात केवल ग्रीक इतिहासकारों और यूरोपीय लेखकों की होती तो समझी जा सकती थी। सचाई को लगातार बदलकर भारतीय इतिहासकार भी पेश करते रहे। अपने को उसके सामने नगण्य पाकर प्राचीन भारत के गौरव को मिटाने की जितनी दुराग्रह पूर्ण चेष्टा मिल में मिलती है , उतनी यूरोप के दूसरे किसी इतिहासकार में भी नहीं पाई जाती। और वही स्टुअर्ट मिल हमारे मार्क्सवादी इतिहासकारों का शलाका पुरुष बना रहा और वह उसके मॉडल को वैज्ञानिक इतिहास की कसौटी मानते रहे।
धिक् तान् च, तं च, कुप्रं च इमान् जनान् च।

Post – 2019-01-22

उत्कर्ष का निष्कर्ष

गालिब के मन में छोटी उम्र में यह सनक सवार हो गई थी कि अमीरों की भाषा वही हो सकती है जो अाम लोगों की हैसियत से परे हो। पर उनकी उपेक्षा जितनी फारसी बोझिल भाषा के कारण हुई, उससे अधिक इस कारण कि दूसरे सभी शायर प्रतिभा में गालिब के सामने बौने सिद्ध होते थे। ग़ालिब की उपस्थिति ने उनकी हैसियत को कम कर दिया था और इस कारण वे सभी उनसे जलते थे। उनकी ताकत अपनी शायरी से अधिक गालिब के महत्व को कम करने पर खर्च होती थी। इस पीड़ा को जितने मार्मिक ढंग से गालिब ने व्यक्त किया है उस पीड़ा को अकेले उन्होंने नहीं सहा, दूसरों की अपेक्षा बहुत आगे बड़ी हुई सभी प्रतिभाओं, अग्रणी देशों और सभ्यताओं को एक नियम की तरह अनिवार्य रूप से सहना पड़ा है।
हसद, सजाए-कमाल-ए-सुखन है क्या कीजे
सितम बहा-ए-मता-ए-हुनर है क्या कहिए।
‘काव्यात्मक उत्कृष्टता का दंड है ईर्ष्या और असाधारण कलात्मक सिद्धि का इनाम है अत्याचार।’ यही है उत्कर्ष का निष्कर्ष। भारत को अपने पूरे इतिहास में इसी का दंड भोगना पड़ा है।

अपने उत्कर्ष के दिनों में भी, पराभव, उत्पीड़न और दमन के दौर में भी, जब उसे परास्त करने वाले अपने अहंकार और दुर्दांतता के बाद भी उसके सामने इसलिए अपने को तुच्छ समझते थे कि इतनी दुर्गति के बाद भी उसने उस मूल्य परंपरा की रक्षा की, या करने का यथासंभव प्रयास किया था जिसके सामने उनके समस्त धर्मोपदेश और सभ्यता के दावे वहशीपन के हाशिए पर दिखाई देते हैं। उसके इतिहास की उपलब्धियों के शिखरों को नष्ट करके बराबरी पर आने की कोशिश के बाद भी उन विकलित उपलब्धियों की ओर और उसके सांस्कृतिक मानकों की ओर नजर उठाने पर गर्दन इतने पीछे मोड़नी पड़ती कि सिर के ताज जमीन पर आ जाएं। इसका प्रमाण तो हम कल देंगे, परन्तु आज दो बातों की ओर ध्यान दिलाते हुए अपनी बात समाप्त करना चाहेंगे।

पहला उत्कर्ष के साथ दूसरे समुदायों की श्रद्धा और ईर्ष्या का एक साथ शिकार होना। आज पश्चिम के उत्कर्ष के कारण शेष दुनिया में उसकी नकल करने की, उसके समकक्ष आने की कोशिश और इसके बावजूद उससे घृणा, वैसा बनने से बचने की लगातार कोशिश, समानांतर चल रही है। ऐसा ही पहले भारत के साथ हुआ था।

दूसरे यदि ऐसा लग रहा हो कि मैं अतीत की स्मृतियों से आत्मश्लाघा पैदा करने का प्रयत्न कर रहा हूं, तो यह सही नहीं है। भारत के संपर्क में आने के बाद से पश्चिम ने लगातार उन मूल्यों को आत्मसात करने का प्रयत्न किया है जिनके लिए हमारे मन में सम्मान तो है परंतु भौतिक कारणों से, और सामंती मूल्यों के बने रह जाने के कारण अधिकांश लोग उसका निर्वाह नहीं कर पाते और इसलिए उन्हें अपने को दोबारा अपने को खोजने की और पाने की कोशिश करनी होगी जिसमें पश्चिम भी हमारी सहायता कर सकता है। कारण जिन मूल्यों कर हमें गर्व है उनको उन्होंने चुपचाप, यथासंभव शिष्यवत आत्मसात किया है और पालन कर रहे हैं जब कि उनके सामने अपने को उनका उत्तराधिकारी होने का दावा करते हुए हम हास्यास्पद सिद्ध होते हैं।

आश्चर्य यह है जो शिक्षा पाश्चात्य जगत ने इतनी अल्प अवधि में ग्रहण की उसे लगभग 900 साल के पड़ोस के बाद भी मुस्लिम समाज क्यों नहीं अपना सका? कारण बहुत स्पष्ट है। पश्चिम वैज्ञानिक सोच से भावुकता पर नियंत्रण करते हुए, धर्म की जकड़ और अतीत की ग्रंथियों से मुक्त होकर, आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था और मुस्लिम समुदाय वैज्ञानिकता को, विवेकशीलता को, ठुकराते हुए अपने अतीत में धंसने के लिए लगातार प्रयत्न करता रहा।

Post – 2019-01-21

कल्पना और यथार्थ

स्वप्न और दिवास्वप्न के पीछे भी यथार्थ होता है, कल्पना का तो अर्थ ही है गढ़ना। उसके लिए ईंट, पत्थर और गारा तो जरूरी है ही। परंतु कल्पना में जो नहीं है उसे, जो है, उसके नकार से भी गढ़ सकते हैं। भारत को समझने का प्रयत्न करने वालों ने इसकी महिमा से अभिभूत हो कर, यदि अज्ञान वश इसके आकार को शेष एशिया जितना मान लिया तो यह समझा जा सकता है “According to Ktesias, India was not smaller than all the rest of Asia —which is a palpable Exaggeration.” न तो उनमें से किसी ने पूरा एशिया देखा था, न ही उनको भारत के आकार का पता था। समझ में न आने वाली बात तो यह है, कि आज भी भारत को उपमहाद्वीप कहने वालों की कमी नहीं है। अज्ञान और कूटनीतिक धूर्तता में पर्याप्त निकटता है।

पर मैकक्रिडिल का यह कथन सही नहीं है कि तेसियस अतिरंजना कर रहा था, सही यह है कि वह भारत की विशालता को दूसरों के लिए विश्वसनीय बनाने के लिए दो सुनी सुनाई बातों को एक साथ रखते हुए अपने पाठकों को अपने विवरण का कायल बना रहा था। इनमें एक यह थी कि एशिया बहुत बड़ा महाद्वीप है, और फारस में उसे जो सूचनाएं मिली उससे पता चला कि भारत बहुत बड़ा देश है।

मैं उन ज्ञानी जनों को जो मानते हैं कि भारत को पहली बार अंग्रेजों ने एक किया, याद दिलाना चाहता हूं कि आठवीं नवीं शताब्दी के विष्णु पुराण के लेखक को ही नहीं, उनसे बहुत पहले भी दूसरे देशों को भारत की विशालता का पता था। वह देश और राज्य में फर्क करना जानते थे। यह मामूली ज्ञान आपने ज्ञानाधिक्य के चलते खो दिया है।

मैकक्रिडिल का तेसियस के विषय में अगला वाक्य है, Like Herodotus he considered the Indians to be the greatest of nations and the outermost, beyond whom there lived no other. (यूनानी हरिदत्त, हेरोडोटस, की तरह वह भी मानता है कि भारत महानतम राष्ट्र है और उससे आगे कोई इंसान नहीं रहता।)

आप चाहें तो मुझे राष्ट्रवादी करार देकर खारिज कर सकते हैं क्योंकि इसका जो अर्थ मैं ले रहा हूं वह यह है कि पूर्व की तरफ बढ़ते जाओ सभ्यता का महत्तर रूप मिलता जाता है और भारत महानतम देश है, इसलिए इससे आगे न कोई देश हो सकता है, न इंसान। आपने सत्ता के बल पर जबरदस्त के ठेंगेे की तरह, स्टुअर्ट मिल के मूर्खतापूर्ण दावे को मान लिया कि सभी विचारों और सिद्धांतों का जन्म यूरोप में हुआ है और वहीं से यह पूरब की तरफ फैला है – जितना ही पूरब बढ़ते जाओ, सभ्यता का स्तर गिरता जाता है। परंतु तेसियस का विचार सत्ता के बल पर लादा हुआ विचार नहीं है, स्वयं पश्चिम के सबसे प्रबुद्ध देश के दो प्रबुद्ध व्यक्तियों का विचार है कि पूरब की तरफ जितना ही बढ़ते जाते हैं सभ्यता का स्तर उतना ही ऊंचा होता जाता है और भारत इसकी पराकाष्ठा है। इसलिए उससे आगे न कोई देश हो सकता हैस न इंसान होंगे। मैं इसे सच नहीं मानता, पर जानना चाहता हूं कि आप इसे कितना गलत मानते हैं?

मैकक्रिडिल तेसिअस के एक अन्य कथन को कि भारतीय लोगों के वस्त्र पेड़ों द्वारा पैदा किए जाते हैं, निम्न रूप में प्रस्तुत करते हैं, The expression, garments produced by trees, can only mean cotton garments. मैं इसके पीछे सुनी सुनाई बातों के आधार पर भारत के प्राचीन इतिहास में वल्कल के प्रयोग की झांकी देखता हूं। कपास के विषय में उपलब्ध जानकारी का इसमें कुछ घालमेल हुआ हो सकता है परंतु ईरान में भारत को आधा वर्तमान और आधा पुरानी कहानियों के आधार पर जाना जाता था। यही कारण है इतिहास की जानकारियां वर्तमान सूचना में घुल मिल जाती हैं।

कपास की जानकारी दूसरे यूनानियों पर उजागर हुई थी जो मानते थे, भारत में ऊन पेड़ों पर उगता है। उन्हें पता चला यहां शहद वनस्पतियों से निकलता है, परंतु इसकी विचित्रताएं और पश्चिमी जगत को और भी पहले से ज्ञात थी जिनके हवाले देने चलें तो विषयांतर हो जाएगा।

यहां हम मैकक्रिडिल के माध्यम से यूनान के मन में 2500 साल पहले बनी हुई छवि को प्रस्तुत कर रहे हैं। यूरोप को यह पता नहीं था कि अनाज से भी तेल निकल सकता है। उन्हें इसका पता पिगमी जनों के माध्यम से मिला, परंतु भारत में यह कारोबार बहुत पुराना है। मैकक्रिडिल कहते हैं, Ktesias has without doubt stated that the Indians from preference use oil of sesame, and it can only be the fault of the author of the extract if the use of this oil, together with that of the oil expressed from nuts, is ascribed to the pygmies.आज तो पश्चिमी जगत पत्थर से भी तेल निकालना सीख चुका है, इसलिए इसे केवल दर्ज किया जा सकता है, आज के दिन इस पर गर्व नहीं किया जा सकता।

हम यहां होमर के उस कथन को लें जिसे यूरोप में इतिहास के जनक माने जाने वाले हेरोडोटस (हरिदत्त ) ने दोहराया है, और जिसकी व्याख्या मैकक्रिडिल ने विस्तार से करते हुए, विचित्र कल्पनाएं करते हुए, इसे काले रंग से जोड़ने का प्रयत्न किया है। 1200 ईसा पूर्व में होमर का यह कथन भारत कि पूर्व का इथोपिया है, रंग पर आधारित नहीं है, एक गहन ऐतिहासिक सत्य पर आधारित है। इथोपिया मिश्र के बाद अफ्रीका का सबसे सभ्य देश था और था भी इसलिए कि सुमेरिया से व्यापार करने के लिए जिस तरह भारतीय व्यापारियों ने दिलमुन (बहरीन) को अपना अड्डा बनाया था, उसी तरह मिस्र से व्यापार करने के लिए उन्होंने इथोपिया में पुंट (पुंड्र) अपना अड्डा बनाया था। कई बार वे इस अड्डे से सुमेर को भी अपना माल भेजते थे इसलिए वहां के अभिलेखों में जिन देशों से आए हुए जहाजों का उल्लेख मिलता है उनमें दिलमुन और पुंत का नाम विशेष रूप से आता है। मिस्र की एक रानी ने पुंत को अपने जहाज भेज कर वहां से जो माल मंगवाया था वह शुद्ध भारतीय था, साथ ही उसने कारीगर भी मगवाए थे। इन दोनों सभ्य देशों से कुछ अलग हटकर अपने व्यापारिक अड्डे बनाने के कारणों का विवरण देने के लिए यहां अवकाश नहीं है। परंतु यह सूचना देना जरूरी है की इथोपिया के पास किसी छोटे द्वीप पर आज भी गुजराती से मिलने वाले शब्द मिलते हैं। भारत में बाजरा, टांगुन और मडुआ अफ्रीका के साथ इसी संपर्क से पहुंचे थे। यह ईसा ढाई हजार साल पहले के कुछ स्थलों से मिलने लगते हैं। एक दूसरी बात यह कि पुंत के समुद्री क्षेत्र में शंख बहुत बड़े आकार का मिलता था जिस को काटकर पात्र के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता था। गीता में जिस असाधारण शंख का उल्लेख “पौंड्रं दध्मौ प्रतापवान्” मैं आया है, वह इसकी याद ताजा कराता है।

अतः होमर जब भारत को पूरब का इथोपिया कहते हैं, तो उसका अर्थ यह है कि इथिओपिया से भारतीय दुर्लभ वस्तुएं प्राप्त की जाती थीं, अर्थात् पूरब में भी कहीं इथिओपिया है न कि इसके निवासियों का रंग काला है और भारत के दक्षिणी भाग के लोग काले रंग के हैं। हेरोडोटस ने क्या सोचकर उस कथन को दोहराया था, यह हमें भी पता नहीं।

अतीत को याद करते हुए अपना महिमा-गान करने से अधिक ग्लानि का कोई विषय नहीं हो सकता, परंतु जब ऐसे व्याख्याएं की जाएं जो यह बताएं कि तुम सदा से यही निखट्टे रहे हो और इससे अधिक का जीवट तुम्हारे भीतर नहीं है तो अपने ऐसे उपेक्षित पक्षों की याद दिलाना प्रतिरोध और आत्मसम्मान की मांग बन जाता है। अतः याद दिला दें कि पश्चिम ने विस्मय के साथ देखा था कि भारतीय द्रव्यों के धुएं से भी सुगंध निकलती है और अगुरु की मांग भी हुई थी। उन्हें पता चला था यहां लकड़ी से भी सुगंध निकलती है। यह उनके लिए आश्चर्य की बात थी जिनके फूलों से भी सुगंध नहीं निकलती। और यदि भारत को लेकर आपके मन में हीन भावना पाश्चात्य शिक्षा के कारण घर कर गई हो तो विदेशों में जाकर उनके फूलों को सूंघे और फिर लौट कर भारत की मिट्टी को सूंघें तब पता चलेगा यहां मिट्टी का तिलक क्यों लगाया जाता है। यहां के रज में भी राम बसे हैं – रामरज ‍ ।