Post – 2018-12-27

भले लोगों का बुरा हो कि वे भले क्यों हैं

किसी भी समाज का प्रत्येक व्यक्ति उसका प्रतिनिधि होता है। जिसने उस समाज के केवल एक व्यक्ति को देखा वह उसके आचरण के माध्यम से ही उस पूरे समाज को देखने को बाध्य होगा। जिस समाज में विरोधी गुणों विचारों और कार्यों वाले लोगों की संख्या अधिक हो वहां तय करना कठिन हो जाता है उसका कौन सा तबका उसका सही प्रतिनिधित्व करता है। कोई भी समाज एकपिंडीय नहीं होता। जड़ पदार्थों तक में प्राकृतिक रूप में किसी भी तत्व की प्रधानता हो सकती है परंतु अनेक दूसरे तत्व मिले होते हैं, जिन को अलग करने के बाद उसे शुद्ध रूप में पाया जाता है। इसलिए किसी भी पूरे समाज को उसके किन्हीं तत्वों, या प्रवृत्तियों को आधार बनाकर अच्छा या बुरा सिद्ध करना गलत है।

यूरोप के ईसाई स्पर्धा में कमजोर सिद्ध होने के कारण यहूदियों से नफरत करते थे। इसके लिए उन्हें अपनी पुराणकथाओं से नफरत का आधार भी मिल जाता था। यहूदी लोभी होता है, पैसे के लिए कुछ भी कर सकता है, उसने अपने मसीहा से भी विश्वासघात करते हुए उसे चंद सिक्कों के लिए शत्रुओं के हाथ में दे दिया। यह कहानी ईसाईयों ने गढ़ी थी। ईसा स्वयं यहूदी थे। उनके शिष्य यहूदी थे। यदि एक नया मजहब प्रचारित प्रसारित करने के कारण वह यहूदियों से अलग थे, पहले ईसाई थे, तो उनके वे शिष्य भी ईसाई थे। ईसा मसीह के साथ विश्वासघात यहूदियों ने नहीं, उनके विश्वास में दीक्षित ईसाईयों ने किया था।

संख्या में कम होने के बाद भी ईसाईयों से यहूदी अपने सांस्कृतिक कारणों से आगे पड़ते थे। कला, कौशल हो या व्यापार हो या ज्ञान-विज्ञान हो या दर्शन, किसी भी मामले में ईसाई यहूदियों के सामने ओछे दिखाई देते हैं। यूरोप को विश्व का सिरमौर बनाने में ईसाइयों से अधिक यहूदियों का हाथ है। अपने हीनता बोध के कारण उन्होंने आत्मरक्षा तंत्र (defense mechanism) के चलते उनसे घृणा करने का रास्ता अपनाया। इस हीनभावना ने यहूदीद्रोह (antisemetism) को जन्म दिया। हिटलर यहूदीद्रोह के लिए कुख्यात है, क्योंकि उसने उस घृणा को जो पूरे यूरोप के ईसाई समुदाय में व्याप्त थी, अपनी राजनीतिक जरूरतों के कारण, पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया, परंतु इससे, उसे अपराधी सिद्ध करके अपनी रक्षा करने वालों का अपराध कम नहीं होता।

किसी भी समाज को एक सिरे से किसी खाने में बंद करके देखना अपराध है। यूरोप जो यहूदीद्रोह का जनक था, वह आज इसे निंदनीय समझता है। इसके बाद भी यहूदीद्रोह अमेरिकी समाज में भी, जिसने मानवता का प्रथम उद्घोष किया था, बना रहा है और सोवियत संघ, जो नस्ल और मजहब से ऊपर उठ कर साम्यवाद का सपना दिखाते हुए, अस्तित्व में आया था, उसमें भी काम करता रहा।

यहां मैं न तो अमेरिका की निंदा करने के लिए यह बात कह रहा हूं न ही सोवियत संघ को अपराधी सिद्ध करने के लिए इसे उसके साथ जोड़ रहा हूं। मनुष्य का स्वभाव भौतिक और वैचारिक सीमाओं से आगे जाता है, इसे हम अपने यहां भी, उन लोगों में भी, जो वर्णवाद के विरोधी हैं, वर्णवादी प्रवृत्तियों के अवशेष के रूप में देख सकते हैं। लंबे अभ्यास के, बाद अवचेतन का हिस्सा बन चुके पूर्वाग्रह प्रयत्न करने के बाद भी आसानी से नहीं जाते। इसे समाज में परिवर्तन लाने को व्यग्र आंदोलनकारी नहीं समझ पाते। निरे उत्साह से उमड़ने वाले आंदोलनों में विचार और संतुलित दृष्टि का अभाव होता है। इसके कारण ही वे प्रायः अपने लक्ष्य के विपरीत प्रवृत्तियों को जन्म देते हैं। समस्या के समाधान को अधिक दुष्कर भी बनाते हैं। किसी पर अपराधी की मुहर लगाना आसान है, अपराध से मुक्ति का रास्ता निकालना बहुत धैर्य, और संतुलन की मांग करता है। इस मामले में दुनिया के सभी समाज इतिहास की परीक्षा में फेल हुए हैं।

किसी भी समाज को काले या सफेद रंग में रंग कर देखना, उसे फूटी आंख से देखने जैसा है। उसे अच्छा या बुरा कहने की जगह, इस बात पर ध्यान देना अधिक जरूरी है कि वह जो कुछ बना है वह किन परिस्थितियों में, किन कारणों से, बना है? उनको सुधरने में कितने प्रयत्न और कितने समय की जरूरत पड़ सकती है? बीमारी दवा से दूर हो सकती है, पर उससे पैदा हुई दुर्बलता दूर होने में समय, सावधानी और संयम तीनों की जरूरत होती है। इनमें से किसी की भी कमी जानलेवा हो सकती है। राजनीतिज्ञों से मुझे इसलिए डर लगता है कि वे, यदि उनका इरादा सही हो तो भी, जल्द से जल्द परिणाम चाहते हैं और इस जल्दबाजी के कारण न्याय के लिए खड़े होने वाले आंदोलनों द्वारा स्वयं जितना अन्याय किया जाता है उसका वजन प्रायः अपराधियों द्वारा किए गए समस्त कुकृत्य से अधिक पड़ता है। बीज डालते ही फल की कामना करने वाले, अधिक खाद, अधिक पानी देकर बीज को भी सड़ा सकते हैं ,परंतु मनचाहा फल नहीं पा सकते। राजनीतिज्ञों की बदहवासी दूर करने के लिए बुद्धिजीवियों की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि वही बता सकते हैं, कि कितनी खाद, कितना पानी, कितना धैर्य, और कितना समय फलागम के लिए जरूरी होता है। यही कारण है राजनीति से जुड़ने वाले बुद्धिजीवी राजनीतिज्ञों के चापलूस बन कर रह जाते हैं, वे अपने क्षेत्र के की मर्यादा में रहकर राजनीतिज्ञों को सही दिशा दिखाने का काम नहीं कर पाते।

इस बात का ध्यान बहुत कम लोग रख पाते हैं कि एक कट्टर मुसलमान, वर्ण की श्रेष्ठता में विश्वास करने वाला ब्राह्मण और एक नस्लवादी गोरे में गहरी समानता होती है फिर भी अपने ही समाज के दूसरे व्यक्तियों की अपेक्षा ये ही एक दूसरे से अधिक नफरत करते हैं, परंतु मैं इनमें से किसी को दंड या आतंक से न तो सुधारने का पक्षधर हूं न ही इस तरह किसी को सुधारा जा सकता है।

परंतु इस बोध के अभाव में यदि हम यह न समझ सकें किसके साथ हमें कैसे बर्ताव करना है, तो हम आत्मघाती तो सिद्ध हो सकते हैं, तत्वदर्शी नहीं। 19वीं शताब्दी के इतिहासकार एलफिंस्टन ने राजपूतों और मराठों के बीच अंतर बताते हुए कहा था, A Rajput Warrior, as long as he does not dishonour his race, seems almost indifferent to the result of any contest he is engaged in. A Maratha thinks of nothing but the result. and cares little for the means if he can attain his object.” इस पर अपनी ओर से टिप्पणी करते हुए अब्राहम इराली की टिप्पणी है For the Rajput, war was an end in itself, for the Maratha it was only a means. Rajput played the game, Marathas played to win. (The Mughal Throne,2004, p.435)

जब मैं फेसबुक पर दक्षिण वाम की नोक झोंक में एक दूसरे पर अपने अपने सड़े अंडे फेंकते देखता हूं तो दोनों में काफी समानता दिखाई देती है। उद्देश्य में भी काफी समानता। दोनों अपने अपने तरीके से हिंदू मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैं। एक राजपूतों की तरह, दूसरा मराठों की तरह। एक केसरिया बाने की चमक जौहर की कहानियां विरासत में सौंपते हुए अदृश्य हो गए, दूसरे किसी भी कीमत पर सफलता चाहते हैं क्योंकि सही और गलत का अंतिम फैसला सफलता से ही तय होता है। यह भी संयोग ही है कि दक्षिणपंथ की जन्मस्थली और राजधानी, दोनों मराठों की भूमि से ही संबंध रखते हैं।

हमने अपनी बात यहूदियों से इसलिए आरंभ की थी कि भारतीय सन्दर्भ मे, एक हजार साल यातना और अधोगति झेलने के बाद भी, हिंदुओं की भूमिका ठीक वही रही है जो यहूदियों की। ज्ञान, विज्ञान, कर्मठता, उद्योग, व्यापार, जीवनादर्श, सहिष्णुता सभी में अग्रणी रहे। यह मैं अपनी ओर से डींग हांकने के लिए नहीं कह रहा हूं। यह दो परस्पर उल्टी सोच वाले अग्रणी मुस्लिम नेताओं सर सैयद अहमद और अल्लामा इकबाल का कथन है। आधुनिक शिक्षा आदि के मामले मे हिंदुओं की अग्रता का रोना रोने के बाद सर सैयद कहते है:
In the whole nation there is no person who is equal to the Hindus in fitness for the work. (1887, लखनऊ)
Now our condition is this: that the Hindus, if they wish, can ruin us in an hour. The internal trade is entirely in their hands. The external trade is in possession of the English. Let the trade which is with the Hindus remain with them. But try to snatch from their hands the trade in the produce of the county which the English now enjoy and draw profit from. …But to make friendship with the Bengalis in their mischievous political proposals, and join in them, can bring only harm. If my nation follow my advice they will draw benefit from trade and education. Otherwise, remember that Government will keep a very sharp eye on you because you are very quarrelsome, very brave, great soldiers, and great fighters. (1888, मेरठ)

उनकी ही स्वीकृति के अनुसार कट्टरता को ढाल बनाने वाले मुसलमानों की उत्पादक क्षमता नगण्य रही है। तलवारबाजी और रंगबाजी के अतिरिक्त उनकी कोई भूमिका नहीं। वे केवल अशांति पैदा कर सकते हैं। उनमें कामकाजी लोग किन्हीं परिस्थितियों में इस्लाम कबूल करने के लिए बाध्य हुए हिन्दू ही रहे हैं।

अल्लामा इकबाल के अनुसार
The Hindus, though ahead of us in almost all respects, have not yet been able to achieve the kind of homogeneity which is necessary for a nation, and which Islam has given you as a free gift. पूर्व. 26

यदि उक्त कथनों से बात समझ में न आती हो तो इस उदाहरण से समझें कि विभाजन से पहले पूर्वी बंगाल भारत का सबसे समृद्ध प्रदेश माना जाता था। नहरों की सुविधा के बाद पंजाब का भी वही हाल हो गया था। फिर भी बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों की आर्थिक दुर्दशा का कारण यह है कि वहां हिन्दू नहीं रह गया।

यह विचित्र संयोग है कि सभी दृष्टियों से अग्रता के बावजूद हिंदू के साथ भारत में ठीक वैसा ही नजरिया अपनाया जाता रहा जैसा यूरोप में यहूदियों के साथ। हिंदू शब्द, उसके संस्कृति का प्रतीक, मूल्य व्यवस्था अभी का उपहास किया जाता रहा। जो अपने खुराफाती होने पर गर्व करते हैं उनकी ऐसी आदतों विचारों और विश्वासों के तोष के लिए जिससे उनका भी अहित होना है, और होता रहा है, उल्टे हिंदू समाज को दोष दिया जाता रहा है।

Post – 2018-12-26

यारब न वे समझे हैं न समझेंगे मेरी

सीआईए के प्रधान ने जब कहा था कि मुझे एक अरब डालर दे दो और मैं सोवियत संघ की ऐसी गत कर दूंगा कि वह अपनी घरेलू समस्याओं में ही उलझ कर रह जाएगा, तब किसी को विश्वास भी न हुआ होगा कि वह सोवियत संघ को छिन्न भिन्न कर सकता है। अमरीका ने कम्युनिज्म के रास्ते पर चलने वाले चीन को पूंजीवादी रास्ते पर डाल दिया। सीआईए ने न जाने कितनी हत्याएं कराईं, कितने तख्ते पलटे इसका आंकड़ा किसी के पास होगा तो सीआईए के पास ही। जो रहस्य सबको पता है उसका भी सही तरीका और चेहरा दिखाई नहीं देता है। यह सब कूटनीतिक चतुराई और कम से कम पैसे के बल पर अधिक से अधिक कारीगरी के कौशल से ही संभव हो पाया ।

यूं तो दुनिया की हर बुराई के पीछे अमेरिका का हाथ देखना अन्यैय होगा, परंतु यह सही है, कि सऊदिया के तेल भंडार पर उसकी पकड़ रही है और सउदिया के निर्णय अमेरिका की सलाह पर होते रहे हैं। अमेरिका हो या उसका गुरु ब्रिटेन, ये जिसके दोस्त हो जाएं, उसे किसी दुश्मन की जरूरत नहीं है।

इनकी मोटी चाल यह रही है की जिन देशों और समाजों का दोहन करना है उनको मध्यकालीन पिछड़ेपन में घेर कर रखना है। यह जानवरों की रेवड़बंदी से काफी मिलता-जुलता है। तरीका जाना पहचाना हैः

उन देशों और समाजों की भावुकता को इतना प्रबल करना कि वह महाव्याधि की शक्ल ले ले। बौद्धिकता को हतोत्साहित करना कि यह आस्था पर उंगली उठाने जैसा है। किताब को खूँटे की तरह इस्तेमाल करते हु्ए, किताब के युग में बांध कर रखना, और किताब की व्याख्या का अधिकार अपने पास रखते हुए समाज को अपनी गिरफ्त में रखना, कि वे अपने हित और अहित को पहचानने और पहले से नियत सीमाओं से आगे बढ़ने से घबराहट अनुभव करें।

ब्राह्मणों ने हिंदू समाज को भी वेद पुराण से बांधकर रखने की। यह भी नहीं कहा जा सकता कि उनके प्रयत्न पूरी तरह निष्फल गए। परंतु वेद में हर एक विचार का प्रतिवाद है। हम भारतीय मुस्लिम समाज की मानसिकता पर विचार कर रहे हैं इसके विस्तार में नहीं जाएंगे। यहां केवल इतना ही कह सकते हैं कि मुस्लिम समाज में भावुकता की जैसी प्रबलता रही है, उसकी संगठित किंतु अंध प्रतिक्रिया समय-समय पर जैसी इनमें देखी जाती रही है वैसी हिंदू समाज में नहीं। इसमें ईश्वर से लेकर वेद पुराण सभी पर प्रश्न करने, संदेह प्रकट करने का, अधिकार सभी व्यक्तियों को अपनी ज्ञान सीमा के अनुसार मिला रहा है।

मुस्लिम समाज में वैज्ञानिक और तार्किक व्यक्ति भी कुरान का नाम आते ही हाथ खड़े कर देते हैं। मुस्लिम देशों के लिए संसाधनों का अपने लाभ के लिए एकाधिकार करने के लिए प्रयत्नशील पूंजीवादी देश इस कमजोरी को जानते और इसका भरपूर लाभ उठाते रहे हैं । ऐसी स्थिति में वे बहुत चतुराई से कट्टरपंथी विचारों को हवा देते रहे हैं। यह ध्यान देने की बात है कि अरब देशों और ईरान के तेल भंडारों पर अधिकार जमाने के लिए प्रयत्नशील अमेरिका इन देशों का हितैषी बनकर इनको अपने इशारे पर चलाने का प्रयत्न करता रहा है ।ईरान में शाह का शासन ऐसा ही था। यदि वहाबी प्रवृत्तियों को बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक में प्रोत्साहन दिया जाना आरंभ हुआ, मदरसों और मजदूरों की पढ़ाई के प्रति आसक्ति पैदा करने की प्रवृत्ति बढ़ी, और सउदिया, जो अमेरिकी इशारे पर चलता रहा है, मुस्लिम जगत का नेतृत्व संभालने के लिए इस पर पानी की तरह पैसा बहा रहा है, डॉलर भले उसका लगता रहा हो, दिमाग अमेरिका का ही लगता रहा है।

अमेरिकी सरकार के ही एक आकलन के अनुसार अकेले सऊदिया की राजधानी रियाध ने वहाबी असहिष्णुता वाले इस्लाम को प्रचारित करने पर 10 अरब डालर खर्च किए (The US State Department has estimated that over the past four decades the capital Riyadh has invested more than $10bn (£6bn) into charitable foundations in an attempt to replace mainstream Sunni Islam with the harsh intolerance of Wahhabism. Wikipedia) ।

सऊदिया के विषय में कामिल दाऊद ने कहा है कि यह देश इस्लामिक कट्टरता पैदा करता, फैलाता और कट्टरपंथियों को शरण देता है जबकि वे ही इसे जड़ से उखाड़ने पर तुले हुए हैं और इसके भविष्य के लिए खतरा हैं (The country produces, sponsors, shelters and feeds the Islamism that threatens its foundations and its future.)।

यहां दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पहला यह कि 40 साल के भीतर इसमें तेजी आई है। और यही समय अमेरिका के सऊदी तेल भंडारों में दिलचस्पी लेने का भी है। दाऊद जब कहते हैं कि आरंभ में सउदिया एक ओर तो धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दे रहा था और दूसरी ओर मुस्कुराते हुए अमेरिका से हाथ मिला रहा था, अमेरिका ने इसकी और ध्यान नहीं दिया, (It took the West being heavily hit by Islamist terrorism for it to appreciate fully the measure of this menace, long camouflaged. Indeed, even as Saudi leaders were shaking hands and smiling at their Western counterparts, they were hosting preachers advocating jihad to the hundreds of thousands of people gathered in Mecca for the annual pilgrimage. Today, everyone sees through the facade beer.), तो वह इस सचाई को समझ नहीं पाते कि यह अमेरिका के गुदगुदाने से पैदा हुई मुस्कराहट थी।

मुसलमानों के तीर्थ मक्का और मदीना सऊदी में ही पड़ते हैं इसलिए धार्मिक कट्टरता बनी रहे, और बढ़े, इसमें उसकी दिलचस्पी हमेशा से रही है क्योंकि हज के लिए जुटने वाली भीड़ उसके आय का स्रोत रही है। संबंध वही रहा है जो हमारे कुंभ आज का पंडों पुरोहितों से रहा है। पंडे आज के होटल उद्योग की पुराने रूप हैं और अपने आचार व्यवहार में धार्मिक आस्था से मुक्त शुद्ध व्यावसायिक रहे हैं। व्यावसायिक कारणों से मुसलमानों के पिछड़ेपन में उनकी धार्मिक आस्था में सउदिया का रुचि लेना और मानसिक रूप में मध्यकालीन बने रहना एक अपरिहार्यता थी।

परंतु हम जिस दौर की बात कर रहे हैं उसने कमाने से अधिक खर्च करने का अभियान पहले से ठीक उलट था। यह उसकी कमजोरी को भुनाने वालों की चाल लगती है।

मुझे इसके पीछे अमेरिका का हाथ दिखाई देता है जिसे कुछ फैलाकर पश्चिमी जगत की चाल भी कहा जा सकता है। इसका सीधा संबंध पेट्रोल के उत्पादन, पेट्रोल के कमीशन, और पेट्रोल डालर को आधुनिकीकरण पर खर्च करने की जगह पिछड़ेपन की खेती कर खर्च करने की जुगत थी। सही इस्तेमाल से आधुनिक सोच और शिक्षा से अपनी संपदा और साधनों पर अमेरकी अधिकार से उबरने की चिंता पैदा हो सकती है । इसे रोकने के लिए, मध्यकालीन पिछड़ेपन में घेर कर रखने के लिए धार्मिकता को बढ़ावा दिया गया और इसके पीछे अमेरिका का हाथ था।

हम पीछे कह आए हैं इस्लाम के प्रचार में तलवार और पैसे की भूमिका प्रधान रही है , वह माले गनीमत के रूप में हो, या जजिया कर के रूप में, लगान वृद्धि और उसकी वसूली के उत्पीड़न के रूप में। इसमें पहले दो कारकों की ओर विद्वानों का ध्यान गया है तीसरे की ओर नहीं । चीन में भू राजस्व उत्पाद का नवां हिस्सा था। प्राचीन भारत में छठां, शेरशाह के समय तक एक तिहाई, अकबर ने शेरशाह का अनुकरण किया था। परंतु शाहजहां के समय में यह तीन गुना होू गया था। किसान खेती करने से इंकार करते हुए खेती बंद कर देते थे और तलवार के जोर पर उन्हें खेती के लिए बाध्य किया जाता था। जिन दिनों तख्तताऊस बनाने पर अकूत धन खर्च किया जा रहा था मुगल साम्राज्य के सबसे उपजाऊ माने जाने वाले गुजरात में ढाई साल तक अकाल पड़ा रहा और बादशाह ने कृपा करके लगान का 14 वां हिस्सा माफ किया था। इसका मतलब, यदि मरने की नौबत है तो इस्लाम कबूल करो और जिंदा रहो, वर्ना मरो। यह मेरी समझ है। हो सकता है गलत हो परंतु औरंगजेब की क्रूरता हमें दिखाई देती है शाहजहां की क्रूरता ताजमहल के संगमरमर में छिप जाती है।

भटकने की आदत है क्या कीजिए। कहना यह चाहता था कि वहाबी आंदोलन के साथ एक स्तर पर मौज मस्ती परंतु दूसरे स्तर पर नितांत सादगी और कबीलाई सहभागिता का ऐसा योग था कि एक डॉलर सौ डालर का काम करता है। यदि एक बिलियन डॉलर से रूस का सत्यानाश किया जा सकता था, तो उससे 10 गुना खर्च करने के बाद उसके बहुगुणित प्रभाव का अनुमान ही किया जा सकता है।

पश्चिमी देश पहले कांटे बोते हैं और फिर कांटो का सफाया करने के नाम पर कांटे बोते हुए जो लाभ कमाया था उससे कुछ अधिक लाभ कमाने का प्रयत्न करते हैं। वे रूस को हराने के लिए तालिबान पैदा करेंगे , और जब उनकी उपयोगिता समाप्त हो जाएगी, और वे उनके लिए ही खतरा बनने लगेंगे तो उनकी सफाई के नाम पर उन देशों को भी मटिया मेट कर देंगे जो उनके सहयोगी रहे थे।

राजनीतिक मामलों की मेरी समझ इतनी कम है इस तरह की बातें करते हुए स्वयं शंकित रहता हूं क्या मैंने सही निष्कर्ष निकाला। परंतु जिस बात को स्वयं अधिकारियों ने स्वीकार किया है उनके अनुसार हज करने वाले देशों के तीर्थयात्री कट्टरवादी प्रचार के लक्ष्य हुआ करते थे। और जिस बात को समझने के लिए किसी आधिकारिक ज्ञान की जरूरत नहीं है, वह यह कि हमारी धर्मनिरपेक्ष सरकार हज को प्रोत्साहित करती रही है
इसके लिए अनुदान भी देती रही है। वोट बैंक के लिए भारतीय मुसलमानों को कट्टरपंथी बनाने में हमारे राजनीतिज्ञों का भी योगदान रहा है।

सउदिया में नए शासक शासक ने इस पिछड़ेपन से अपने समाज को बाहर लाने का संकल्प कर लिया है:
The appearance of the man known as the “iron prince” — Mohammed bin Salman, the 32-year-old heir to the throne — suggests that there may be a solution to the Saudi problem. Young, fiery, seen as a reformer, the crown prince has been making a splash since his father placed him at the forefront of the political scene about two years ago. He is proposing, for example, another kind of economic model than the one, built around oil and gas, that prevails today, and has announced development mega projects and plans to open up the country to tourism unconditionally….
Whatever the real effect of these changes in Saudi Arabia, they already are being felt elsewhere. If this country, the motherland of fatwas, undertakes reforms, Islamists throughout the world will have to follow suit or risk winding up on the wrong side of orthodoxy.
कट्टरपंथी इस सुधार कार्यक्रम से घबराए हुए जहालत का अपना साम्राज्य बचाने के लिए प्रयतनशील हैं। भारतीय मुसलमान भी अपनी पहचान पिछड़ेपन से जोड़ कर पिछड़ते रहने के लिए संघर्ष कर रहा है।

Post – 2018-12-24

ऐसी मूढ़ता या मन की
(संपादित)

सामी मजहब कबीलाई मजहब है । इस्लाम में कबीलाई संस्कार अधिक प्रबल रहे हैं। कबीलाई व्यवस्था में भाईचारा होता है। सरदार को छोड़ कर सभी लोगों की स्थिति एक समान होती है। सरदार का चुनाव सबकी सहमति से होता है, इसे हम कबीलाई लोकतंत्र कह सकते हैं। इकबाल इसे मुस्लिम लोकतंत्र (Muslim Democracy) कहते थे। यदि सरदारी के दावेदार एक से अधिक हुए, और जनमत से कोई निर्णय नहीं हो सका फैसला तलवार के बल पर होता है।( “When the tribe was equally divided between two leaders, the rival sections separated from each other until one of the candidates relinquished his claim; otherwise the sword was appealed to.” Political Thought in Islam. op.cit.138)

इस्लाम के विस्तार में तलवार की भूमिका प्रधान रही है (The life of early Muslims was a life of conquest. Their whole energy was devoted to political expansion which tends to concentrate political power in fewer hands; and thus serves as an unconscious handmaid of despotism.) तलवार की ताकत लूटपाट की छूट ( माल ए गनीमत), से पैदा होती रही है। लुटेरों और तस्करों का एक छोटा सा जत्था भी इतना उपद्रव मचा सकता है कि उन्नत समाजों की फौज और पुलिस भी परेशान हो जाए पर उन्हें काबू में न कर सके। लुटेरों के साथ फिर भी एक कमी होती है, वे जानते हैं कि वे अपराध कर रहे हैं, समाज की नजर में गिरे हुए हैं। यदि लूट और हिंसा को मजहब का समर्थन मिल जाए, ऐसे कुकर्मों को महिमामंडित किया जाने लगे तो ऐसे जत्थों का आकार और मनोबल दोनों बढ़ जाता है और दुर्दांतता कल्पनातीत हो जाती है। जघन्य क्रूरता का प्रदर्शन गौरव का विषय बन जाता है।

लुटरों और तस्करों की उत्पादकता शून्य होती है, और इनकी लूटपाट के कारण उत्पादक समाजों की उत्पादकता बाधित होती है। कबीलाई अर्थव्यवस्था में अन्यथा भी संग्रह की प्रवृत्ति नहीं होती। लूटो, छीनो, मौज करो, बर्वादी का भोंड़ा प्रदर्शन करो और जब हाथ खाली हो जाए तो फिर जान पर खेल कर लूट-पाट में लग जाओ। इन कारणों से मानवता के आर्थिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक उत्थान में इस्लाम की भूमिका नकारात्मक रही है और इसका चरित्र सभ्यताद्रोही रहा है।

इस नियम का अपवाद वह दौर था जब दूरदर्शी अब्बासी खलीफाओं या अन्यत्र किसी साहसी शासक के हस्तक्षेप से इसकी कट्टरता में कमी आई और स्वतंत्र चिंतन को बढ़ावा मिला। तलवार तब भी म्यान में नहीं लौटी थी पर अब्बासी खलीफाओं ने देश-विदेश के विविध विषयों के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर उनको अपूर्व सम्मान और सुख सुविधा देकर उनके ज्ञान, विज्ञान, दर्शन का अरबी में अनुवाद कराया और तकनीकी कौशल को अपनाया। इसमें प्रमुख भूमिका ईरान और उसके माध्यम से ग्रीस और रोम की तथा भारत की थी। सैद्धांतिक ज्ञान के मामले में चीन का योगदान नगण्य था जब कि भारत का प्रधान – गणित, ज्यामिति, ज्योतिर्विज्ञान, रसायन, चिकित्सा, शल्यचिकित्सा- योगदान था, पर चीन से चरखा, कागज भारत बहुत बाद तक न अपना सका जब कि अरबों ने इसे अपना लिया था। यूनान और रोम के ज्ञान के रक्षक उस दौर में जब पोप इंनोसेंट प्रथम के ज्ञानद्रोही, बहुदेववाद द्रोही, कलाद्रोही अभियान में विद्वानों, चिंतकों का संहार और उत्पीड़न आरंभ हुआ तो अपनी प्राणरक्षा के लिए सासानी शासकों की शरण में आ गए। यूनानी और रोमन ज्ञान विज्ञान उनके संरक्षण में स्थापित केंद्रों में पलता रहा था। इसलिए अरबी चिंतकों मे ईरानी मूल के चिंतकों की संख्या अधिक प्रभावशाली रही है। इन दो प्रमुख प्रभावों के अतिरिक्त दूसरे सभी सुलभ स्रोतों – मिस्री, ईसाई आदि – काे भी उसी आदर से अपनाया गया था। यह अरब संस्कृति का स्वर्ण काल था। विश्व सभ्यता की शिरो रेखा अरब संस्कृति थी। विश्व का अधिकतम ज्ञान अरबों के पास था। सभ्यता का मुकुट अरबों के सिर पर था।

आप यदि मुसलमान हैं तो आप खीझ सकते हैं कि इसे सीधे इस्लामी या मुस्लिम सभ्यता क्यों नहीं कहते? ऐसा इसलिए नहीं कहता कि इस्लाम भक्ति भावना का संप्रदाय है। तर्क के लिए इसमें जगह नहीं है। अब्बासी खलीफों ने किताब के भीतर घुसने की जगह किताब में से उन बिंदुओं को पहचानने का प्रयास किया जो किताब से बाहर, दूसरी किताबों और विचारों की ओर ले जाते हैं। यदि यह सच है कि मोहम्मद साहब ने कहा थाी ज्ञान यदि चीन से भी हासिल हो उसे हासिल करना चाहिए। उस समय चीन अरबों के ज्ञात जगत में सबसे दूर था।

अब्बासी खलीफों ने कुरान और हदीस के ऐसे ही संकेतों का उपयोग करते हुए, किताब से बाहर का रास्ता निकाला। हिन्द्स्तानी मुसलमानों में ऐसे ही विद्वान हुए हैं जो एक ओर अरबी सभ्यता पर गर्व करते रहे हैं और दूसरी ओर किताब में वापस जाने की वकालत करते रहे हैं। दुर्भाग्य से इकबाल ऐसे ही लोगों में आते हैं।

अरबी संस्कृति किताब से बाहर निकलने की कोशिश है इस्लाम किताब में बंद होने का प्रयास है। इस्लाम और ईसाइयत का तंत्र ज्ञान-विरोधी, और सभ्यता द्रोही है। वह अरब संस्कृति जिस पर कोई मुसलमान गर्व कर सकता है वह किताबों से बाहर जाने का संघर्ष है , विश्व की अन्य किताबों और ग्रंथागारों तक पहुंचने का प्रयास है। किताब जलाने वाले पुस्तकालय जलाने वाले ज्ञान के केंद्रों को नष्ट करने वाले, अरब संस्कृति को नहीं समझ सकते।

अरब संस्कृति का विनाश करने वाले मंगोल थे जिन्होंने खलीफाओं के साम्राज्य का नाश कर दिया था। सामरिक विजय के बाद भी धार्मिक रूप में वे उनसे पराजित हुए थे और इस्लाम कबूल कर लिया था।

भारत पर जिन मुसलमानों ने आक्रमण किया था या जिनके प्रभाव में अफगानों ने हमले किए थे वे उन्हीं तुर्कों और मंगोलों की संस्कृति से प्रभावित थे जिनके हस्तक्षेप से अरब संस्कृति पराभव का शिकार हुई। कबीलाई किताब अरबों के स्वर्ण युग पर हावी हो गई। मुल्ले खलीफों पर भारी पड़े।

आधुनिक पश्चिमी सभ्यता का जन्म, धर्मयुद्धों के दौरान अरब संस्कृति से परिचय से बाद उसका शिष्य बनकर प्राप्त शिक्षा से हुआ। उसी के माध्यम से उसने अपने यूनानी अतीत की भी खोज की और वर्तमान ऊर्जा को भी प्राप्त किया। सभ्यता की मसाल यूरोप को थमाकर उसे अंधकार युग से बाहर लाने वाला, यूरोप के नवजागरण का जन्मदाता, स्वयं उस अंधकार युग में लौट गया जिससे उसने यूरोप को बाहर निकाला था।

भारत हो या अरब या चीन, पश्चिम हमसे अलग नहीं है, वह हमारा वारिस है और अपनी विरासत को पाने के लिए उसका शिष्य बन कर उसी तरह उसकी उपलब्धियों को ग्रहण करना होगा जिस तरह शिष्य बन कर उसने पूर्व को आत्मसात करते हुए आधुनिक पश्चिम काे जन्म दिया था। पूरब पूरब है, पश्चिम पश्चिम, दोनों कभी मिल नहीं सकते, यह कविता है, पर सत्य नहीं। सत्य यह है कि पूर्व पश्चिम का जन्मदाता है, और उसे अपना नवजीवन प्राप्त करने के लिए पश्चिम का शिष्य बनना होगा। यह समझ एशिया के दूसरे सभी देशों में है, केवल इस्लामी जगत में नहीं है, क्योंकि वह अपने ही स्वर्ण युग की महिमा को भूल गया है। वह किताब में बंद होने को आतुर है, किताबों को जलाना तो उसके बस की बात नहीं, परंतु किताबों से कुछ सीखने के लिए तैयार नहीं है। भारत पर भी अपनी किताब लादने की कोशिश के कारण इसका बौद्धिक पर्यावरण कितना प्रभावित हुआ है, यह तय करना कठिन है।

Post – 2018-12-24

मेरी कल की टिप्पणी इकबाल के विचार का अनुमोदन थीः
Democracy lets loose all sorts of aspirations and grievances which were suppressed or unrealised under autocracy; it arouses hopes and ambitions often quite unpractical and it relies not on authority but on argument or controversy from the platform, in the Press, in Parliament, gradually to educate people to the acceptance of a solution which may not be ideal but which is the only practical one in the circumstances of the time.

(Iqbal, Extract from a Letter to Sir Francis Younghusband, published in The Civil and Military Gazette on 30th July, 1931 )

Post – 2018-12-23

लोकतंत्र में सभी असुरक्षित हैं

मैं नसीरुद्दीन की कला और संवेदनशीलता का कायल हूं। दो एक साल पहले इसी किताब (फेस बुक) के एक पन्ने पर लिख चुका हूं कि उनकी कलात्मक तन्मयता मेरे लिए प्रेरक है। वह स्वयं असुरक्षित नहीं हैं, अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित अनुभव करते हैं। जाहिर है मैं भी असुरक्षित अनुभव करता हूं और यदि मेरी असुरक्षा उनकी असुरक्षा से पैदा हो तो यह हैरानी की बात न होनी चाहिए।
अपने को असुरक्षित अनुभव करने की स्वतंत्रता भी केवल लोकतंत्र में होती है। दूसरी शासन प्रणालियों में सताए जाने वालों को भी अपने को असुरक्षित कहने की हिम्मत नहीं होती। उदाहरण कश्मीर का है। अपमानित, प्रताड़ित, निर्वासित होने के बाद भी किसी ने न पहले कहा कि वह असुरक्षित है न ही बाद मे कहा। भोगने वालों को अपने को असुरक्षित कहने का भी अधिकार नहीं होता, वह किसी नाम से जाना जाए, लोकतंत्र नहीं होता। लोकतंत्र में छोटी से छोटी असुविधा पर लोग असुरक्षित अनुभव करते और इसलिए असुरक्षित अनुभव करने वालों की संख्या में वृद्धि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पैमाना है। इसमें जिन पर दूसरों को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी है वे अपने को असुरक्षित घोषित करके अपनी सुरक्षा का इतना पक्का इंतजाम करते हैं, कि उसी अनुपात में जनता की असुरक्षा बढ़ती जाती है। जो सबसे अधिक सुरक्षित हैं वे अपने को सबसे अधिक असुरक्षित अनुभव करते हैं। असुरक्षित होना हैसियत से जुड़ा मामला है। ऐसों की संख्या में बढ़त यह जताता है कि लोकतंत्र लंबे अरसे बाद पहली बार स्थापित हुआ है।
इसलिए असुरक्षित मैं भी अनुभव करता हूं। इसके फायदे अधिक हैं नुकसान कोई नहीं।

Post – 2018-12-22

कम्युनिस्ट कठमुल्लापन

इकबाल सामाजिक और आर्थिक अवमानवीकरण के घोर विरोधी थे। यह उनके निजी स्भाव का हिस्सा था। वह एक ओर हिंदू वर्ण-व्यवस्था के कटु आलोचक थे और दूसरी ओर पश्चिमी पूंजीवाद के। दोनों मामलों में ऐसे अतिसंवेदनशील कि वह सर्वनाशवादी (निहिलिस्ट) तक हो सकते थे।
जिस खेत से दहकाँ को मयस्सर न हो रोटी
उस खेत के हर ख़ोश-ए-गंदुम को जला दो।

हिन्दू समाज में व्याप्त सामाजिक भेदभाव को वह लाइलाज पाते हैं क्योंकि कोई जाति नहीं है जो इस पर गर्व न करती हो –
Experience, however, shows that the various caste units and religious units in India have shown no inclination to sink their respective individualities in a larger whole. Each group is intensely jealous of its collective existence.

आर्थिक विषमता पर उनका आक्रोश उस मनोदशा को प्रकट करता है जिसके कारण मध्यकाल में क्षुब्ध किसान खेती करने से इन्कार कर देते थे, आज कल किसान अपना दूध, टमाटर, आलू जिसे इतने श्रम से पैदा किया है, उसका लागत मूल्य तक न मिल पाने के कारण, रास्तों पर फेंक देते हैं और मेरी जानकारी के अनुसार उनमें से कोई इकबाल की कविता से प्रेरित हो कर ऐसा नहीं करता।

परंतु इस मामले में वह पश्चिम को अपराधी मानते हैं
The peoples of Asia are bound to rise against the acquisitive economy which the West has developed and imposed on the nations of the East. Asia cannot comprehend modern Western capitalism with its undisciplined individualism.
इन दोनों विषमताओं का समाधान वह इस्लाम में पाते हैं परंतु मुस्लिम समाज में नहीं। उसमें दोनों विकृतियां हैं, इसलिए इस सामाजिक और आर्थिक विषमता से मुक्त साम्यवाद और मानवतावाद को पाने के लिए आदिम इस्लाम और कुरान शरीफ के विधानों की ओर लौटना होगा। और इसके लिए मुसलमानों को अपने को नए सांचे में ढालना होगा।
Let all come forward and contribute their respective shares in the great toll of the nation. Let the idols of class distinctions and sectarianism be smashed for ever; let the Mussalmans of the country be once more united into a great vital whole

अपनी अतिवादी इस्लामियत के कारण वह किसी अनीश्वरवादी दर्शन या विचारधारा के समर्थक नहीं हो सकते थे, वह भी जब उसका प्रेरक पश्चिम हो। इसलिए कम्युनिज्म के लिए उनके मन में कोई सहानुभूति नहीं थी। वह कम्युनिज्म के विरोधी थे। वह कम्युनिज्म और फासिज्म में कोई अंतर नहीं करते थे।
. But in spite of all these developments, the tyranny of imperialism struts abroad, covering its face in the masks of Democracy, Nationalism, Communism, Fascism and heaven knows what else besides. Under these masks, in every corner of the earth, the spirit of freedom and the dignity of man are being trampled underfoot in a way of which not even the darkest period of human history presents a parallel.

परंतु भारतीय कम्युनिज्म का जो हाल था उसमें ऐसी अंधी क्रांतिकारिता और भावाकुल लफ्फाजी के लिए काफी गुंजाइश थी जिसमें चांद तारे नोचने से लेकर आकाओं की हड्डियां चबाने तक का नुमाइशी गुस्सा था, और जबानी तूफान उठा कर जमाना बदलने का जोश क्षतिपूर्ति का काम करता और आत्मग्लानि से बचाता था, क्योंकि उनकी जीवनशैली और आय के साधन वही थे जिनके कारण ये परिस्थितियां पैदा होती हैं।

ऐसी स्थिति में प्रश्न यह है कि क्या भारतीय कम्युनिज्म ने यह मान लिया कि भारत में जनवादी क्रांति करने से अधिक आसान और अधिक उचित विकल्प इस्लामी मूल्यों का अनुमोदन है जिससे समर्थन के लिए पूरा मुस्लिम समुदाय मिल जाएगा, और मजहबी कारणों से यदि कोई हिचक है तो उसे हिंदुओं की भर्त्सना से पूरा किया जा सकता है।

भारतीय कम्युनिज्म आकाशबेलि की तरह आया, उसने जमीनी स्तर पर न काम किया न भारतीय यथार्थ को समझा, इसलिए पहले से किन्हीं कारणों से एकत्र समूहों को किसी भी कीमत पर हथियाने का प्रयत्न करता और उन्हें विषाक्त बनाता और दूसरों के उपयोग के लिए छोड़ता रहा है, वे मुसलमान हों, मिल मजदूर हों, या छात्र। यह विकल्प आकर्षक तो लगता है पर यह इतना इकहरा है कि इस पर विश्वास नहीं होता।

मैं इसे समझना चाहता हूं । क्या कोई समझा सकता है कि प्लेबीसाइट के समर्थन को अपनी चूक मानने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने आगे भी लगातार पश्चगामी मुस्लिम कट्टरवाद को ही अपना मुख्य कार्यभार क्यों बनाए रखा। मुसलमानों का हित तो उस मार्ग पर बढ़ने में था जिसे सर सैयद ने दिखाया था। यह यदि इकबाल का प्रभाव नहीं तो किसका प्रभाव है कि आर्थिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील मुस्लिम युवक भी कट्टरता का रास्ता अपना लेता है।

जहां हिंदुओं से उन्हें शिकायत थी, वहां भी वह हिंदुओं के अहित की बात सोच नहीं सकते थे, मुसलमानों का अहित करना नहीं चाहते थे, परंतु जो कुछ सोच और समझा रहे थे उससे हिंदुओं और मुसलमानों दोनों का अहित हो रहा था।

Post – 2018-12-20

इकबाल की मुल्लावादी दार्शनिकता

उर्दू कविता का मिजाज सूफी रहा है। धार्मिक कट्टरता का विरोध इसका मुख्य स्वर है। इस्लाम में अल्लाह रहम तो करता है, पर दहशत भी पैदा करता है। सूफी असर के कारण उर्दू कवि उससे डरता नहीं, सजदा नहीं करता, प्यार करता है। यह प्यार दिन में एक बार या चार-पांच बार नहीं पैदा होता, एक नशे के रूप में इसका असर बना रहता है, शायर होश में आना ही नहीं चाहता। वह मुसलमानों के लिए लगाई गई पाबंदियों का कायल नहीं है। मुअज्जिन (अजान लगाने वालों) का मजाक उड़ाता। धार्मिक उपदेशक, शेख. वाइज, नासेह, की खिल्ली उड़ाता है। वह खुदा को सातवें आसमान पर बैठा नहीं मानता, सर्वव्यापी मानता है ( वह जगह बता कि जहां पर खुदा न हो। संक्षेप में सूफी मत के माध्यम से उर्दू कविता पर वेदांत का प्रभाव रहा है। हिंदुओं से लेकर मुसलमानों तक उर्दू कविता की लोकप्रियता का एक रहस्य यह भी है।

इकबाल से पहले शायर हैं, जो मुल्लों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। अकबर इलाहाबादी भी, जो देवबंदी थे, मगर शायरी में उनका मिजाज भी सूफियाना था। उनकी मशहूर गजल, हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है। इकबाल में सज्दे की ओर लौटते हैं। शायरी में भी आदमी को मुसलमान बनाना उनकी प्राथमिकता है। आशनाई या प्रेमानुभूति एक दुर्बलता जिसे सच्ची खुदापरस्ती के लिए दिल से निकालना होगा।
मैं जो सर ब-सज्दा हुआ कभी तो जमीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम आसना मुझे क्या मिलेगा नमाज़ में।
हो सकता है कि मैं इसे जिस रूप में देख रहा हूं वह गलत हो, कविता के वाक्यों के तरह-तरह के अर्थ निकालते ही हैं लोग। परंतु मुझे लगता है यह हिंदुत्व के बचे हुए संस्कारों से मुक्त हो कर पक्का मुसलमान बनने का संकेत हो सकता है। सनम-आशना, मूर्ति में आसक्ति, हिंदू संस्कारों के अवशेष का द्योतक लगता है। तबलीग यहीं से शुरू होता है। यह अर्थ खींचतान भरा लग सकता है इसलिए, हम उनके गद्य में कहे गए वाक्यों पर ध्यान दें।
I suggest the formation of an assembly of ulema which must include Muslim lawyers who have received education in modern jurisprudence. The idea is to protect, expand and, if necessary, to reinterpret the law of Islam in the light of modern conditions, while keeping close to the spirit embodied in its fundamental principles. This body must receive constitutional recognition so that no bill affecting the personal law of Muslims may be put on the legislative anvil before it has passed through the crucible of this assembly. .. Indeed it declares that every code of law other than that of Islam is inadequate and unacceptable. This principle raises some political controversies closely connected with India.
(New Year Message, Broadcast from the Lahore Station of All-India Radio on 1st January, 1938.)
मुस्लिम पर्सनल लॉ मुस्लिम समाज मे अपनी ही महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को भी सही साबित करने और उसको चलते रहने देने के लिए खड़ा हो जाता है, तो इसके पीछे इकबाल का हाथ न भी देखा जाए, इसका समर्थन तो देखा ही जा सकता है।

हिंदू कोड बिल पहले इंडियन कोड बिल था। सुनते हैं मजमून तैयार करने के स्तर पर ही जब जाकिर हुसैन साहब को इसका पता चला और उन्होंने नेहरू जी को मुस्लिम पर्सनल लॉ संवेदनशीलता की याद दिलाते हुए इसे केवल हिंदुओं के लिए जारी करने को विवश किया। हम मुस्लिम पर्सनल लॉ की ताकत, आधुनिक युग के संदर्भ में इसको बनाए रखने के लिए मोहम्मद इकबाल की पहल और सामान्यतः राष्ट्रवाली माने जाने वाले मुसलमानों की मानसिकता को एक दूसरे से जुड़ा हुआ पाते हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ में केवल पुरुष मुसलमान है। स्त्री उसकी इच्छा पूर्ति का साधन है इसलिए उसका अलग कोई अधिकार नहीं है, अन्यथा मानवता की समानता की बात करने वाला मजहब स्त्री और पुरुष दोनों के अधिकार की समानता को तो स्वीकार करता। ऐसा नहीं है और इकबाल स्वयं स्त्री और पुरुष को समानता देने के पक्षधर नहीं है।
… I am not an advocate of absolute equality between man and woman. It appears that Nature has allotted different functions to them, and a right performance of these functions is equally indispensable for the health and prosperity of the human family. The so called “emancipation of the western woman” necessitated by western individualism and the peculiar economic situation produced by an unhealthy competition, is an experiment, in my opinion, likely to fail, not without doing incalculable harm, and creating extremely intricate social problems. Nor is the higher education of women likely to lead to any desirable consequences, in so far, at least, as the birth rate of a community is concerned. Experience has already shown that the economic emancipation of women in the west has not, as was expected, materially extended the production of wealth. On the other hand it has a tendency to break up the Physical life of Society. (The Muslim Community — a Sociological Study. पूर्व. 134)।

स्वाभाविक है कि वह तलाक के विधान को भी पूर्वाग्रह से मुक्त मानें। वह इस्लाम में ऐसी व्यवस्था की बात करते हैं जिसमें स्त्री को भी तलाक देने का अधिकार है, और पश्चिमी आलोचक इसे समझ नहीं पाते हैं इसलिए इसकी आलोचना करते हैं।
The laws of divorce in Islam are also of great interest. The Muslim woman has equality of divorce with her husband. This, however, is secured in Muhammadan Law by the wife calling upon her husband at the time of marriage to delegate his right of divorce to her, to her father, brother or any stranger. This is technically known as “tafviz”—that is to say, handing over or transfer. The reason why this roundabout way of security is adopted I leave to the lawyers of Europe to understand. 158

इसका व्यावहारिक रूप क्या है, इससे हम जितना परिचित हैं, उसमें यह नहीं मान सकते किस व्यवस्था का कोई लाभ मुस्लिम महिलाओं को मिला है।

हिजाब या बुर्का प्रथा को वह महिलाओं के लिए उचित मानते हैं, ऐसा करके ही वे अपने सम्मान की रक्षा कर सकती हैंः
The source and symbol of the greater respect which Eastern women enjoy is in that very veil. Nothing has happened to diminish the respect in which they were held for centuries, and the principle of protecting them from approaches of strangers and from all humiliations has been safely maintained.

उनकी समझ से इस्लामी जनतांत्रिक व्यवस्था सर्व मुस्लिम सुखाय (Commonwealth) पूर्ण समतावादी व्यवस्था हैः
That the Muslim Commonwealth is based on the absolute equality of all Muslims in the eye of the law. There is no privileged class, no priesthood, no caste system.
यह केवल मुस्लिमों तक सीमित है और इसे मुसलमान बन कर ही हासित किया जा सकता है, पर जो मुसलमान न हैं न बनने के तैयार वे इस कामनवेल्थ में चैन से नहीं रह सकते।

हम नहीं जानते अच्छे मुसलमान का मतलब पक्का मुसलमान या कट्टर मुसलमान से अलग भी कुछ होता है और सब को अच्छा मुसलमान बनाने की योजना तबलीग से अलग क्या हो सकती है। वह मानते हैं कि अच्छा मुसलमान हुए बना उद्योग व्यवसाय कुछ भी सफलतापूर्वक नहीं चल सकताः
If we want to turn out good working men, good shopkeepers, good artisans, and above all good citizens, we must first make them good Muslims.

यदि इकबाल का मतलब ईमानदारी, कार्य निष्ठा और सद्भाव से है जो अच्छे मनुष्य के गुण हैं, है अच्छा मुसलमान की जगह अच्छा इंसान कहते तो शायद उनकी बात हमारी भी समझ में आती। उद्योग, व्यवसाय अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए शांति और सुरक्षा चाहिए। अच्छे मुसलमानों ने सबसे पहले इसे ही नष्ट किया है जिसके कारण न वे अपनी प्राकृतिक संपदा का सही उपयोग कर सके, न उससे मिलने वाले लाभ का सही निवेश कर पा रहे हैं।

इस्लाम को सही सिद्ध करने के लिए, वह जाने कहां कहां से तिनके जुटाकर एक काल्पनिक महल खड़ा करते हैं जिसमें स्वतंत्रता इस्लाम में ही संभव है और गुलामी तक स्वतंत्रता का विस्तार है, That slaves had equal opportunity with other Muhammadans is evidenced by the fact that some of the greatest Muslim warriors, kings, premiers, scholars and jurists were slaves.

इकबाल को लगता है मुस्लिम समाज में दो कमियां, नेतृत्व में सक्षम व्यक्तियों का अभाव, दूसरे झुंड की मानसिकता का अभावः
Let me tell you frankly that, at the present moment, the Muslims of India are suffering from two evils. The first is the want of personalities. … the community had failed to produce leaders. By leaders I mean men who, by Divine gift or experience, possess a keen perception of the spirit and destiny of Islam, along with an equally keen perception of the trend of modern history. Such men are really the driving forces of a people, but they are God’s gift and cannot be made to order. The second evil from which the Muslims of India are suffering is that the community is fast losing what is called the herd instinct.

जो कमी थी उसे इकबाल पूरी कर रहे थेः नेतृत्व प्रदान कर रहे थे, नेता की जगह सरगना पैदा कर रहे थे और समाज को झुंड में भी बदल रहे थे।

शांति तो इस इस्लाम के नाम के साथ ही जुड़ी है, दूसरों का दुर्भाग्य है मुसलमानों के कारण शांति से रह नहीं पाते।
.. The post-Islamic history of the Arabs is a long series of glorious military exploits, which compelled them to adopt a mode of life leaving but little time for gentler conquests in the great field of science and philosophy.
समानता इस्लाम का दूसरा सबसे प्रधान गुण है, लेकिन यह इस्लाम में भी आरंभ की कुछ शताब्दियों तक ही बना रहाः
The absolute equality of all the members of the community. There is no aristocracy in Islam. … Now, this principle of the equality of all believers made early Mussalmans the greatest political power in the world. 80
क्यों आरंभिक शताब्दियों तक ही बना रहा इकबाल इसे जानते हैं परंतु ऐसे प्रसंगों में याद नहीं करते। यह उस दौर में ही संभव था जब वह कबीलाई जीवन के निकट और उसी के नियमों से प्रेरित था। उद्विकास एक से बहु, समान से विभिन्न की दिशा में चलता है। जिसे ऐरिस्टोक्रेसी की इस्लाम में इकबाल संभावना तक नहीं देते हैं उसके जितने भोंड़े रूप देशों में, इस्लामी शासन में देखने में आते हैं, जोअन्यत्र कहीं नहीं दिखाई देते।

Post – 2018-12-18

और आगे अंधेरा है

चिंतक के पास वर्तमान होता है और वह भविष्य का निर्माण करता है। भविष्य एक व्यक्ति की इच्छा या उद्योग से संभव होता तो वह अपनी कामना का भविष्य बना लेता। भौतिक परिस्थितियों को विचारों से पैदा नहीं किया जा सकता। विचार उन्हीं के भीतर से पेदा होते हैं। विचारक उन्हीं के नियमों को पहचानते हुए, उन्हीं से तैयार किए गए उपकरण से उसे बदलने का प्रयत्न कर सकता है। इसी का दूसरा नाम विज्ञान है।

विचार सही था या गलत इसका निर्णय उसके अमल के बाद उसके परिणामों से होता है। इकबाल के व्याख्यानों, लेखों और वक्तव्यों के संपादक को भी पता नहीं था कि इकबाल के चिंतन का परिणाम क्या होगा। परंतु, वह मानता था और ठीक मांनता था कि Iqbal stands in the front rank of Muslim thinkers of all times and the Indian Muslims cannot at this juncture afford to ignore or lose sight of anything that the great sage has said. वह महान तत्वदर्शी थे या असाध्य मनोरोगी यह इतिहास को तय करना था, जिस पर 1944 में संपादक की नजर भी नहीं जा सकती थी, क्योंकि परीक्षण काल अभी आया नहीं था। मुस्लिम समाज जोश में अवश्य था, और इतिहास में ऐसे मौके भी आते हैं जब जोश को ही उपलब्धि मान लिया जाता है, अन्यथा कुछ बातें, तार्किक संगति या असंगति से प्रयोग से पहले ही समझी जा सकती हैं।

उदाहरण के लिए, जब इकबाल जो, अपने लेखों आदि में 71 बार हिंदुस्तानी मुसलमान का जिक्र करते हैं, और सही सरोकारों के साथ याद करते हैं, यह कहते हैं कि हिंदुस्तानी मुसलमान को अपने को हिंदुस्तानी मुसलमान नहीं कहना चाहिए, क्योंकि मुसलमान का देश नहीं होताः The expression Indian Muhammadan, however convenient it may be, is a contradiction in terms: since Islam in its essence is above all conditions of time and space. Nationality with us is a pure idea; it has no geographical basis.
तो उनको इस बात का आभास तक नहीं होता कि वह जिनको इस कथन से उत्तेजित कर रहे हैं उसे घर से बेघर बना रहे हैं, अपने देश से निर्वासित तो कर रहे हैं पर इसकी एवज में कुछ दे नहीं रहे हैं। उसे अपनी ही धरती पर भार, उसके प्रति गैरजिम्मेदार परजीवी और लिःसत्व बना रह् हैं। मुसलमान का यथार्थ से निरे खयाल में बदल जाना, देश ही नहीं काल से भी बाहर निकल जाना, जीवन है या मृत्यु। गुजर जाने का मुहावरा मरने वालों के लिए ही होता है और वही अपने समय के साथ नहीं रह पाते। कालातीत केवल प्रेत होते है जिन का आवेश जिन पर होता है, उन्हें प्रेतबाधित कहा जाता है, और उनका आचरण स्वयं उनके लिए ही सबसे अधिक अनिष्टकर होता है, दुखी दूसरे भी होते हैं। आश्चर्य होता है यह सवाल उनसे किसी ने पूछा क्यों नहीं और पूरा समुदाय उनको तत्वदर्शी मानकर उनके बताए रास्ते पर चलता रहा।

अधिकांश लोगों को इकबाल से इस बात की शिकायत है कि उन्होंने देश के विभाजन की नींव रखी। यदि इससे हिंदुओं को जो भी क्षति होती, मुसलमानों का हित होता तो मुझे कोई शिकायत न होती। उल्टे उनके प्रति सम्मान बढ़ जाता, जैसे युद्ध में या खेल में पराजित होने के बाद भी विजेता के प्रति सम्मान बना रहता है।

मुझे शिकायत इस बात की है कि उन्होंने मुसलमानों के बारे में सोचना आरंभ किया, उनके अच्छे भविष्य की रूप रेखा तैयार करते रहे, परंतु उसके जो परिणाम आए वे सबसे अधिक मुसलमानों के लिए अनिष्टकर रहे और उनके संरक्षण में हिंदुओं को उत्पीड़ित होना पड़ा। वह देश के विभाजन के जनक ही नहीं रहे, उन्होंने मुसलमानों के स्वाभिमान को जगाते हुए उनकी भावनाओं को उग्र करते हुए जिस अंधी गली की ओर मोड़ दिया उससे बाहर निकलने का रास्ता वे तलाश भी करना चाहें, तो कर नहीं सकते। वर्तमान जितना भी कष्टकर, भविष्य जितना भी निराशाजनक हो, इतिहास में पीछे लौटने की गुंजाइश नहीं होती। पीछे लौटने पर भी कोई जगह है ही नहीं।

मैं हिंदू होने के नाते इस्लाम के इतिहास पर न तो बहुत सही ढंग से सोच सकता हूं, न ही, यदि मेरे विचार सही हों तो भी, कोई मुसलमान उन्हें सही मान सकता है और यदि सभी हिंदू सही मान लें तो भी आत्मविश्वास नहीं पैदा हो सकता। प्रश्न पाले का है ही नहीं, प्रश्न तार्किक संगति का है। इकबाल मानवीयता की बात करते हैं, और इंसानों की बड़ी बिरादरी से कटकर मुसलमानों के बीच मानवता तलाशते हैं, भारत के दूसरे लोग उनको नजर ही नहीं आते। उनके निम्न टिप्पणियों पर ध्यान देंः

Does the Indian Muslim possess a strong will in a strong body? Has he got the will to live? Has he got sufficient strength of character to oppose those forces which tend to disintegrate the social organism to which he belongs? 71

The life-force of the Indian Muhammadan, however, has become woefully enfeebled. The decay of the religious spirit, combined with other causes of a political nature over which he had no control, has developed in him a habit of self-dwarfing, a sense of dependence and, above all, that laziness of spirit which an enervated people call by the dignified name of ‘contentment’ in order to conceal their own enfeeblement. 71

Truly economic dependence is the prolific mother of all the various forms of vice. Even the vices of the Indian Muhammadan indicate the weakness of life-force in him. Physically too he has undergone dreadful deterioration. If one sees the pale, faded faces of Muhammadan boys in schools and colleges, one will find the painful verification of my statement. Power, energy, force, strength, yes physical strength, is the law of life. 72
पराधीनता और आर्थिक दुर्गति से क्या भारत के सभी निवासियों की यही स्थिति नहीं थी। वह समूचे भारतीय समाज में इसकी चेतना पैदा करने की जगह केवल मुसलमानों में पैदा करना चाहते थे, और फिर भी मानवीयता की बात करते थे। असलियत यह है कि वह आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान उन क्षेत्र में न करके, धर्म के क्षेत्र में करना चाहते थे। कवि के 100 खून माफ होते हैं, वह तुक में अपनी बात करता है, महाकवि के हजार खून माफ किए जा सकते हैं, लेकिन उसके किए का फल तो हमें ही भोगना पड़ता है और भोगना पड़ा है।

मुसलमानों में एकता कायम करने के लिए उन्होंने जिस नए मुसलमान की बात की थी, वह गढ़ने और जोड़ने से अधिक, उन्हें तोड़ने, अभी जो कुछ है वैसा न रहने देने का संकल्प है। हम अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए मुसलमानों के एक शुद्धतावादी समुदाय अहमदिया को ले सकते हैं। एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए उनके सामने जो चुनौती थी वह इसमेंकिस रूप में प्रकट होती हैः
Personally, I became suspicious of the movement when the claim of a new

Prophethood, superior even to the Prophethood of the Founder of Islam, was definitely put forward, and the Muslim world was declared Kafir. Later my suspicions developed into a positive revolt when I heard with my own ears an adherent of the movement mentioning the Holy Prophet of Islam in a most disparaging language. Not by their roots but by their fruits will you know them.

हम उनकी सलाह मानते हुए इसीलिए उनके परिणामों से आंकना चाहते हैं। यदि इनके विचारों में परिवर्तन लाकर मुसलमानों के बीच, उन्हें एक रास्ता बनाने के लिए, एकता लाई जा सकती थी या इस दिशा में कोई कोशिश या नतीजा दिखाई देता तो मेरे मन में, एक चिंतक के रूप में, इकबाल के प्रति सम्मान पैदा होता । अहमदिया हों, या कादियानी, या शिया सुन्नी विभेद, उलकी कविता के दौर के इतने साल बाद भी तनाव में कहीं कोई कमी नहीं आई । इस्लामिक मानवीयता की इक़बाली योजना में हिंदू से मुसलमान हुए और फिर भी हिंदू समाज से कुछ नाते रिश्ते रखने वालों को अधिक कट्टर मुसलमान अवश्य बनाया गया। पहले के सद्भभाव को कम भेद को अधिक पुख्ता बनाया गया और फिर भी इकबाल को कोई नहीं कहेगा कि वह तबलीग के समर्थक, तालिबान के जन्मदाता और मुस्लिम समाज में असहिष्णुता बढ़ावा देते हैं।

एक वाक्य में कहें तो वह भारतीय समाज को और भारतीय भूभाग को बांटने में तो समर्थक हुए ही, मुसलमानों को पहले से अधिक बांटने का अपराध उन्हीं के सिर आता है।

मुसलमानों की अपनी समझ से उनके हिस्से में एक बड़ा भाग आ गया और जो बचा था उसमें बचे भी रह गए परंतु इंसान के रूप में उनको बचाने के लिए भारत की ही जरूरत थी जहां सभी मतों के मुसलमान सुरक्षित हैं जबकि उनके सपने के विश्वव्यापी इस्लाम में एक को छोड़ किसी दूसरे मुसलमान के लिए जगह नहीं है। पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमान हैं मुसलमान नहीं माने जाते,
“But why did they declare you non Muslim? What were the pressures on them?”
“ you must ask Benazir Bhutto. Benazir will tell you why her father declared us non Muslims. he was very friendly with us and then he went and did that.” Mr. Sherwani, to V.S. Naipaul, Among the Believers, p.108

ईरान में सुन्नी और सुन्नी देशों में शिया मुसलमान नहीं माने जाते। कुर्दों को सुन्नी और शिया दोनों मिटाने पर आमादा हैं। अनीश्वरवादियों के लिए किसी मुस्लिम देश में जगह नहीं है। परंतु कड़वे और कषैले अनुभव के बाद भी भारत में सबके लिए जगह है। बिखरों को जोड़कर रखने की क्षमता, जिसे राष्ट्रीयता कहते हैं केवल भारत में भारतीय समाज के कारण है, हिंदुओं के कारण है। जिस उदार देशहीन राष्ट्रीयता की कल्पना पश्चिमी समाज नहीं कर पाता उस की संभावना ही नहीं उसका जीवन्त प्रमाण भारत में है जिससे पश्चिमी जगत ने भी कुछ सीखा है अन्यथा उनके सनकी राष्ट्रवाद और पवित्र ईसाइयत में संकटग्रस्त मुसलमानों को शरणार्थी बना कर रखने को भी दूसरा कोई देश भारत के संपर्क में आने से पहले तैयार नहीं होता।

इकबाल ने मुसलमानों को बेहतर मुसलमान बनाने की जगह कृतघ्न बनाया और ठीक उस मुकाम पर जब खनिज तेल से अर्जित संपन्नता से स्वयं को और दुनिया को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने की भूमिका निभा सकते थे, ऐसे जज्बाती मसीहाओं के हाथ में पड़ कर वह नई दासता का शिकार हो गया। दूसरे देशों में पिछड़ापन था भारत के मुसलमान अपनी संख्या और संस्कृति के बल पर उनको नई दिशा दिखा सकते थे परंतु, अपने कार्य भार को निभा नहीं सके।

Post – 2018-12-17

राष्ट्रीयता और मजहबपरस्ती

बिना पर्याप्त जानकारी और अधिकार के मुझे इस चक्करदार समस्या से उलझना नहीं चाहिए। परंतु, मुझे या भ्रम है कि मेरे पास कुछ ऐसी जानकारियां हैं, जिनका इन विषयों पर चर्चा करते हुए कभी उपयोग नहीं किया गया है, इसलिए एक ऐसे समय में जब देश, राष्ट्र, और राष्ट्रवाद पर नितांत बचकानी बातें की जा रही हों, और लोगों को यह भी पता न हो कि इस बचकानेपन का स्रोत क्या है, और इसके बावजूद उनको सुपठित और बुद्धिमान मानकर लोग उनके प्रभाव में आ जाते हो, चुप रहना भी उनके अपराध में सहयोग करना है। केवल और केवल इस नाते मुझे इसमें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता अनुभव हुई। इसका आरंभ अल्लामा इकबाल ने किया था, इसलिए उन पर चर्चा करते हुए, अपनी असहमति प्रकट करना जरूरी लगा।

रघुवीर सहाय ने जो भी सोच कर कहा हो, सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल, सुकवि की मुश्किल। मेरी समझ से सुकवि की मुश्किल यह है कि वह अपनी कविता पर, प्रभावशाली उदगार पर, इतना भरोसा करता है कि उसे लगता है कि वह यथार्थ को समझे बिना भी उसे अपने शब्दों की ताकत से बदल सकता है।

विश्वास नया नहीं है। हमारे यहां तो प्रभावोत्पादक छंदबद्ध और मनोयोग पूर्वक पढ़ी गई रचना को युगांतर कारी प्रभाव से युक्त माना जाता रहा है, जो निष्फल जा ही नहीं सकती। आधुनिक युग में यह जितने सटीक रूप में अल्लामा इकबाल पर घटित होता है किसी अन्य पर नहीं।

सुकवि की मुश्किल का कारण यह है कि वह वस्तु को भाव में बदल देता है, फिर भावगत परिवर्तन करके उसको दुबारा वस्तुजगत पर घटित मान लेता है। मनचाहा प्रभाव पैदा करने के लिए थोड़ी घालमेल भी कर लेता है, भावना के स्तर पर इसे हेराफेरी तक नहीं माना जाता, फिर भी इसका परिणाम तो भुगतना ही पड़ता है।

मुसलमानों को एक अलग राष्ट्र सिद्ध करने के लिए इकबाल ने जो तर्क दिया था उसमें इससे काम लिया गया था । इससे भी पहले जब सर सैयद ने दो कौमों की बात की थी उसमें भी घालमेल था। मजहब नश्ल नहीं हो सकता, रेस की धारणा मजहब से अलग है। दोनों में कोई मेल नहीं। परंतु राजनीतिक परिभाषाओं में बुद्धि काम नहीं करती, लाठी काम करती है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। और लाठी का मतलब होता है, जिसको राज्य या सत्ता का समर्थन प्राप्त है, उसके हाथ का तिनका भी लाठी की ताकत रखता है और मान्य हो जाता है। जो लाभ सर सैयद को मिला था वही लाभ अल्लामा इकबाल को भी मिलना ही था, क्योंकि किसी भी बहाने से सामुदायिक भेद और विद्वेष तिनके को लाठी बनाने वाले की जरूरत थी।

हमारी शिकायत यह है कि जिस फ्रेंच दार्शनिक रैनाँ के बहुचर्चित व्याख्यान के एक अंश को उन्होंने मुस्लिम राष्ट्रवाद का आधार बनाया था, उन्होंने उसमें व्यक्त भावना का भी उल्लंघन किया था।

राष्ट्र और राष्ट्रीयता पश्चिम के लिए नई संकल्पनाएं हैं जो 19वीं शताब्दी में पैदा हुई और पैदा भी इतनी ऊर्जा लेकर हुई कि उसे संभालने की शक्ति उनके पास नहीं थी, इसलिए जितने काम की सिद्ध हुई उससे अधिक बदनाम हुई। नई उद्भावना होने के कारण इनकी व्याख्या अपनी सुविधा के अनुसार किया जाता रहा, और इसलिए जहां कुछ लोगों ने इसे बिल्कुल नई अवधारणा माना वहीं ऐसे भी लोग थे जिन्होंने इसे मानवीय इतिहास के आदिम चरण से विविध रूप लेते हुए आज तक विद्यमान सिद्ध किया।

गुरुत्वाकर्षण की ओर जिस दिन हमारा ध्यान गया उसी दिन वह पैदा नहीं हुआ। वह था, उसके परिणाम से हम प्रभावित थे, उसका उपयोग करते थे, परंतु इस नाम से न पहचानते थे, न पुकारते थे।

भारत के लिए यह शब्द भी बहुत पुराना है और इसकी भावना भी उतनी पुरानी है। भावना है समग्र की शक्ति का एक दिशा में उपयोग। प्राचीनतम रूप है, एक दल के रूप में विचारने वाले समूह। और इनको जोड़ने वाली ताकत है एक भाषा। ऋग्वेद मैं एक साथ चलने वालों को जोड़कर रखने वाली जमीन नहीं थी, उनका धर्म भी नहीं था, थी एक भाषा – अहं राष्ट्री संगगनी वसूनां मैं संदर्भ कुछ आगे का है, परंतु है भाषा के महत्व पर।

वृत्र से सुरक्षा प्रदान करने के लिए इंद्र को विश के द्वारा अधिपति चुनने का उल्लेख बाद का है। समय-समय पर कुछ बदलते हुए इसने अनेक प्रादेशिक और आंचलिक देशों को जोड़ने वाली संकल्पना के रूप में स्थान पाया और फिर यह छोटी इकाइयों वाले देशों के ऊपर एक विराट देश की कल्पना को जन्म देकर उसका पर्याय बन कर प्रयोग में आता रहा। इसमें जोड़ने का भाव था, किसी से शत्रुभाव न था।

हमारे लिए यह संतोष की बात यह है कि यूरोप की राष्ट्र की परिभाषा भी जोड़ने वाली ताकत के रूप में अलग अलग रूपों में परिभाषित होती रही। इन्हीं में से एक का उपयोग करते हुए इकबाल ने मुस्लिम राष्ट्रवाद की संभावना को प्रकट किया, परंतु यह भी स्वीकार किया यह एक चुनौती भरा काम है। इसके लिए असाधारण प्रयत्न की आवश्यकता है। अर्थात उसे पैदा करना है। और इसे पैदा करने के लिए वह भावना की जमीन पर किसानी करते रहे।

मोटे तौर पर हम राष्ट्रीयता की जिस परिभाषा से परिचित हैं उसमें इस भावना को पैदा करने के लिए मजहब, सजातीयता, भाषा और भौगोलिक क्षेत्र या देश का एक होना जरूरी था। अपनी सुविधा के अनुसार इनमें से कुछ को छोड़ दिया जाता था और नया तत्व जोड़ लिया जाता था। छोड़ने का परिचय रेनां की परिभाषा में मिलता है, जिसमें देश ही गायब कर दिया जाता है और जोड़ने वाले समान दुश्मन को भी जोड़ लेते हैं।

यह बात ध्यान देने की है कि राष्ट्र और राष्ट्रीयता की परिभाषा बदलने में पत्रकारों और आंदोलनकारियों की भूमिका अधिक प्रधान रही है और इसलिए उन्होंने अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार परिभाषा को बदला है।
फ्रेंच दार्शनिक अर्न्स्ट रेनां ने 1882 में अपने एक भाषण में (‘What is a Nation? delivered at the University of Sorbonne) राष्ट्रीयता की अर्थात् बहुत बड़े समुदाय की समग्र भावनाओं को एकदिश करने में देश या अंचल की भूमिका को अनिवार्य न मानते हुए यह भी संकेत किया था की राष्ट्रवाद एक तरह की गुलामी है जिसके लिए दूसरे तरीके अपनाए जा सकते हैं। परंतु इसके उदात्त पक्ष को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा थाः
A nation is the culmination of a long past of endeavours, sacrifice and devotion. A heroic past, great men, glory, that is the social capital upon which one bases a national idea. To have common glories in the past, to have a common will in the present, to have performed great deeds together, to wish to perform still more, these are the essential conditions of being a people. A nation is therefore a large-scale solidarity.

अल्लामा इकबाल इसे ही गोल कर गए थे। इसकी पूर्ति उस राष्ट्रीयता से ही होती थी या हो सकती थी जिसे कांग्रेस ने अपनाया था और जिससे अल्लामा इकबाल मुसलमानों को दूर ले जाना चाहते थे। मुसलमानों को ऐसा ही फिलॉस्फर मिलना था। भावना भड़काने की क्षमता वहां वैचारिक उत्कर्ष कैसे बन जाती है इसे न मुस्लिम समाज को समझाया जा सकता है न वे इसे समझने की जरूरत समझते हैं। यह हमारी जरूरत है कि हम किसी को दबाव से मुक्त हो कर पढ़ें और यह तय करना है कि इन गलतियों का इलाज तलाश करें।

Post – 2018-12-16

मुस्लिम राष्ट्र

इकबाल की आलोचना करते हुए हम उन्हें अच्छा या बुरा सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं। यही बात दूसरे नेताओं के साथ भी है। हमारे लिए उनका केवल वह पक्ष महत्वपूर्ण है जिससे इतिहास बनता है। व्यक्ति वही है, उसमें जिन परिस्थितियों में जो परिवर्तन होता है वह हमें किस रूप में प्रभावित करता है हमारे समाज को उससे क्या सही या गलत दिशा मिलती है, यही हमारे उपयोग का है। जिस समय अंग्रेजों के प्रयत्न से बंगाल में समाज को बांटने की कोशिश की जा रही थी और मुस्लिम लीग की स्थापना कराई जा रही थी, उस समय देश के लिए इसे खतरा मानते हुए वतन की फिक्र करने की अपील करने वाले सबसे मुखर कवि इकबाल ही प्रतीत होते हैं-
वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में,
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्तां वालो
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।

इतिहास की यह कैसी विडंबना है कि वही कवि जिस सुदूर खतरे को भांप कर उससे बचने की चेतावनी दे रहा था, वही उसका समर्थक बना। जिस इंग्लैंड के कड़वे अनुभवों के साथ, पश्चिमी सभ्यता के प्रति मन में नफरत पाल कर, वह लौटा था, उसी की योजनाओं के अनुसार आगे काम भी करता रहा और अंत में तो उससे मदद की उम्मीद भी लगाए रहा। वह क़यामत जिससे बचने के लिए वह अपने समाज को आगाह करता रहा, वह सचमुच क़यामत बन कर ही आई। इसलिए हमें व्यक्तियों और समुदायों के चरित्र में आए बदलाव पर ध्यान देना चाहिए, न कि उनको अच्छा या बुरा सिद्ध करने पर।

इकबाल से पहले सर सैयद दो कौमों की बात करते थे, जिसको अंग्रेजी अनुवाद करने वालों ने नेशन बना दिया। इसकी बात पहली बार इकबाल ने इंग्लैंड से लौटने के बाद की ।

अंग्रेज मुस्लिम नेताओं के साथ पेश आते हुए एक ओर तो उनको बहुत आत्मीयता से जलील करते हुए समझाते कि तुम कुछ नहीं हो (देखें हंटर). अपही पिछली करतूतों के कारण, लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसका फल तुम्हे भुगतला पड़ेगा. लोकतंत्र में राज उनका होगा। इनकी प्रतिहिंसा से हम तुम्हें बचा सकते हैं और तुम्हारी मदद कर सकते हैं । हमारे अलावा तुम्हारा कोई रखवाला नहीं है।

इकबाल के मन में भी वही भाव पैदा करते हुए राष्ट्र के मामले में यह समझाया था कि भारत में न तो हिंदू मुस्लिम मिलकर एक राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं क्योंकि जातीयता का एक होना धर्म का एक होना राष्ट्रीयता की मांग है, न ही मुसलमान अपने तईं राष्ट्र हो सकते हैं क्योंकि उनका अपना कोई अलग देश नहीं है, पूरे भारत में हुए हैं, बिखरे हुए हैं, जहां हिंदू बहुमत में हैं । इसलिए मुसलमानों को एक ऐसी कौम मानते हुए जिसका हिंदुओं से भाईचारा निभ ही नहीं सकता, हिंदुओं के प्रति उनके मन में नफरत भरी थी और अलग रास्ता अपनाने के लिए उकसाया था। इसे मानते हुए ही इकबाल ने मिल्लत का तराना लिखा था, मुस्लिम राष्ट्र का नहीं।

अंग्रेजों का का यह अहंकार कि राष्ट्र यूरोप में ही हो सकते हैं उनके मन में कचोट पैदा करता रहा और वह इस प्रयत्न में लगे रहे किसी न किसी तरह यह साबित कर सकें कि मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं। इस ऊहापोह में उन्होंने जो अध्ययन किया उसमें रेनन नाम के एक दार्शनिक से एक नई दृष्टि मिल गई। रेनन का मानना था कि राष्ट्रीयता के लिए भौगोलिक इकाई की जरूरत नहीं है जातीय एकता इसके लिए पर्याप्त है। उनके मंतव्य को इकबाल ने जिस रूप में प्रस्तुत किया, वह इस तरह हैः
“Man,” says Renan, “is enslaved neither by his race, nor by his religion, nor by the course of rivers, nor by the direction of mountain ranges. A great aggregation of men, sane of mind and warm of heart, creates a moral consciousness which is called a nation.”
मुसलमानों के मामले में “इस तरह की संरचना बिल्कुल संभव है परंतु यह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है जिसमें लोगों को नए जज्बे से लैस करके उन्हें एक नए इंसान के रूप में ढालना होगा। ”
Such a formation is quite possible, though it involves the long and arduous process of practically re-making men and furnishing them with a fresh emotional equipment.

उन्हें इस रूप में ढालने का काम उन्हें ही करना था। काम आदत बदलने का था, मौज-मस्ती (मुसलमानों की फिक्र करने वालों को अमीरों की जबान, मिजाज की ही याद इसलिए आती है कि आम आदमी के स्तर पर हिंदू मुसलमान में कोई खास भेद नहीं रह जाता) के अनुपात गिरावट की ओर बढ़ते समाज को उठाने की जिम्मेदारी सभी नहीं संभाल सकतेः
नशा पिला के गिराना ता सबको आता है
मजा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी।

यह साकी इकबाल खुद बनना चाहते थे और चाहते थे कि उनका अय्याशी में डूबा हुआ समाज अध्यवसाय और नई ऊर्जा से लबरेज हो, नई ऊंचाइयों को छूने के लिए मुश्किलों से रूबरू होना सीखे और जैसे पश्चिमी लोगों ने खतरे मोल लेते हुए हर एक क्षेत्र में नए कीर्तिमान रखे हैं, वैसा ही करें।
नहीं तेरा बसेरा क़स्रे सुल्तानी के गुंबद पर
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में।

इसी मनो भूमि पर उनके कई और शेर हैंः
तू बाजी है परवाज है काम तेरा
तेरे सामने आसमा और भी हैं।

ऐसी पंक्तियों को यदि उनके समग्र चिंता जगत को दरकिनार करके पढ़ें, केवल भारतीय संदर्भ में रख कर पढ़ें तो इनके दूसरे अर्थ लिए जा सकते हैं, और पश्चिमी जगत के उत्थान में अरबों की भूमिका को याद करते हुए आज की तोहीन को महसूस करने वाले कवि के रूप में देखें और उनसे भी आगे बढ़ने की चुनौती को सामने रखें तो इसका अर्थ उससे हट कर एक व्यापक चुनौती का रूप ले लेता है। जो भी हो उस दौर में मुस्लिम समाज को देखते हुए परिणाम निराशा जनक ही थे परंतु इकबाल अपना प्रयत्न छोड़ने वाले नहीं थेः
नहीं है नाउमीद इक़बाल अपनी किश्ते वीरां से
ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बहुत ज़रखेज़ है साक़ी।

उनकी ऐसी पंक्तियां जिनमें वह मुसलमानों में नया जोश पैदा करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं, उन्हें हिंसा के लिए उकसाने वाला समझा जा सकता है। मैं उनको कुछ अधिक जानने से पहले ऐसी पंक्तियों का यही अर्थ लगाया करता थाः
मोहब्बत का जुनूँ बाकी नहीं है
मुसलमानों में खूँ कि नहीं।
अभी बाकी हैं मिस्रो रोमो चीना
सभी बाकी हैं तू बाकी नहीं है
इस उद्धरण में तीसरी पंक्ति में कुछ गलती हो सकती है परंतु तात्पर्य स्पष्ट है, आज कोई अरब संस्कृति का नाम लेने वाला भी नहीं रह गया। मुसलमान ऐयाशी में डूबे हुए हैं।
Does the Indian Muslim possess a strong will in a strong body? Has he got the will to live? Has he got sufficient strength of character to oppose those forces which tend to disintegrate the social organism to which he belongs? I regret to answer my questions in the negative. The reader will understand that in the great struggle for existence it is not principally number which makes a social organism survive. Character is the ultimate equipment of man, not only in his efforts against a hostile natural environment but also in his contest with kindred competitors after a fuller, richer, ampler life. The life-force of the Indian Muhammadan, however, has become woefully enfeebled. The decay of the religious spirit, combined with other causes of a political nature over which he had no control, has developed in him a habit of self-dwarfing, a sense of dependence and, above all, that laziness of spirit which an enervated people call by the dignified name of ‘contentment’ in order to conceal their own enfeeblement. 107
या

The Indian Muslim has long ceased to explore the depths of his own inner life. The result is that he has ceased to live in the full glow and colour of life, and is consequently in danger of an unmanly compromise with forces which, he is made to think, he cannot vanquish in open conflict. He who desires to change an unfavourable environment must undergo a complete transformation of his inner being. 45

परंतु व्यंग्य देखिए, जो कभी भारतीय राष्ट्रीयता के साथ जुड़कर जिन संस्कृतियों को समाप्त मानता था, कहता था दूसरे सभी मिट गए सिर्फ हमारा नाम-ओ-निशां बचा हुआ है अपनी अलग राष्ट्रीयता की तलाश में उसने पाया की सभी बचे हुए हैं खुद वह कहीं नहीं है। जो भी हो, राष्ट्रीयता की इसी तलब में इकबाल ने हिंदुस्तान के मुसलमानों को अपनी अलग राष्ट्रीयता का दावा करने का समर्थन कियाः
Sir Fazl-i-Husain’s advice to Indian Muslims to stand on their own legs as an Indian nation is perfectly sound and I have no doubt that Muslims fully understand and appreciate it. Indian Muslims, who happen to be a more numerous people than the Muslims of all other Asiatic countries put together, ought to consider themselves the greatest asset of Islam and should sink in their own deeper self like other Muslim nations of Asia in order to gather up their scattered sources of life and, according to Sir Fazli’s advice, “stand on their own legs.”

और यहीं से आरंभ होता है मुसलमान का अपने घर से बेघर होते हुए भी सारी दुनिया का बनने का सपना जिसे पैन इस्लामियत कहा गया।
इस बेतुके प्रस्ताव का एक ही जवाब है अगर सारा जहां तुम्हारा है तो फिर हिंदुस्तान में मुसलमानों के एक अलग देश की जरूरत क्यों ?

हम यह नहीं कहते कि जिस तरह की दहशत ब्रिटिश कूटनीति ने मुसलमानों के मन में भर दी थी और जिस तरह मुसलमानों के सेंटीमेंट का इस्तेमाल करते रहे उसमें एक अलग देश की मांग गलत थी। दिमाग की उस बदहवासी में कुछ भी जायज था। माइनॉरिटी सिंड्रोम के कारण सहवासी की जगह सहद्वेषी की जो भावना भरी गई थी उसमें अलग क्षेत्र की मांग भी तर्क के लिए मानी जा सकती है, परंतु यह नहीं माना जा सकता कि तुम्हारी राष्ट्रीयता देश और भूमि से ऊपर है और फिर भी तुमको एक अलग देश और भूमि चाहिए। मुसलमानों में दबाए जाने का भय उनके मन में पलने वाली हिंदुओं को दबाकर रखने की लालसा का दूसरा नाम था। भय उस लालसा के पूरा न हो पाने से पैदा होता था जो आज भी बना हुआ है न कि इस कारण कि हिंदू अपने प्रति अपकार का बदला लेंगे।