Post – 2018-12-15

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्ताँ वालों

इकबाल की दार्शनिकता का प्रेरक वह उपहास था, जिसे अपनी ओर से भारतीय धर्म संस्कृति और समाज की बात करते हुए उन्हें अंग्रेजों से झेलना पड़ा था। हम इसके ब्यौरे में न जाकर केवल इतना ही कहना चाहेंगे उन्हें जिन प्रश्नों का जवाब देते न बनता था,या जो जवाब देते थे उसे भी वे हंसकर उड़ा देते थे, वे भारतीयता राष्ट्रीयता और धर्म को लेकर थे। इसका उन्होंने अलग से उल्लेख नहीं किया है, परंतु यह उनके लेखन से ही स्पष्ट।

उनकी पहली आपत्ति भारतीय राष्ट्रीयता को लेकर थी। वे राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयभावना के बीच में फर्क नहीं करते थे, क्योंकि दोनों ही रूपों में भारतीय राष्ट्रीयता उनके शासन के लिए खतरे की घंटी थी। राष्ट्रीय भावना का स्रोत था विविधता में एकता। अंग्रेजी कूटनीति का प्रयत्न था, विविधता को विघटनकारी बनाना। अपने उदाहरणों से यह दिखाना कि राष्ट्रवाद तो, जाति भाषा क्षेत्र और धर्म के एक हुए बिना संभव ही नहीं है। भारत में हिंदू समाज में जहां वर्ण व्यवस्था है, ऊंच-नीच का भेद है, जहां हिंदू और मुसलमान दो कौमें बसती हैं, इनमें भाई चारा नहीं है, राष्ट्र की बात करना हास्यास्पद तो है ही।

कांग्रेस, जिस की स्थापना और नामकरण एक अंग्रेज ने किया था, अब अपने नाम को बदल नहीं सकती थी, सहयोग के बिना स्वतंत्रता आंदोलन अपनी प्राण शक्ति खो देती थी। इसी में विविधता में एकता की चेतना, जो धर्म, भाषा जाति और क्षेत्र की भिन्नताओं के बावजूद हजारों वर्षों से बनी चली आ रही थी, उसका उपयोग करते हुए कांग्रेस सब को एक सूत्र में बांधना चाहती थी। और उसी भावना का आदर करते हुए इकबाल ने वह तराना लिखा था जिसमें भारत विविध रंगो के फूलों वाला गुलिस्तान, और भारतीय उसमें अपने-अपने गीत गाने वाले पक्षियों जैसे दिखाए गए। अंग्रेजों से बहस करते हुए, उपहास सहते हुए, इकबाल का विश्वास डगमगा गया था। इस दौर में कौमी जुनून जिस तरह उभारा गया था, उसका बी परिणाम था लौटने के साथ ही उसे डिसओन करते हुए उसी तर्ज पर मिल्ली तराना लिखना। इसके बाद किसी को इसे जबान पर लाना ही नहीं चापिए था, परन्तु मेलमिलाप के फरेब रचे जाते रहे उसमें किसी को यह समझाना तक संभव नहीं कि इस गीत को कवि द्वारा ही वापस ले लिया गया था। राष्ट्रगान के साथ यदि उपराष्ट्रगान की जरूरत है ही तो वंदे मातरम गाओ, भारति जय विजय करे गाओ पर उस बेचारे को तो माफ करो, तो किसी की समझ में नहीं आएगा।

उनके साथ अब समस्या अपनी अस्मिता की खोज की थी , यह कि यदि हिंदुस्तान राष्ट्र नहीं तो उनका अपना राष्ट्र क्या है? यह उनकी निजी खोज हो, या बहस में सुझाया गया विचार हो, या उनकी उस मुकाम पर वापसी हो, जहां सर सैयद अहमद खान दो कौमों की बात करते हुए हिंदुओं से अलग मुसलमानों की कौमी एकता की बात करते थे।

हमें ऐसा लगता है कि सर सैयद अहमद खान और इकबाल दोनों के मन में यह बात अंग्रेजों ने भरी थी, क्योंकि सर सैयद ने हिंदुओं की राष्ट्रीय एकता पर जो सवाल खड़े किए वे सवाल इकबाल के दिमाग में भी उतारे गए थे। अंतर केवल एक था, सर सैयद ने इसे समग्र भारत की भौगोलिक एकता को नकारते हुए बंगाल महाराष्ट्र और मद्रास के ब्राह्मणों को अलग अलग राष्ट्र माना था, जबकि इकबाल इसके पीछे वर्ण व्यवस्था की भेद रेखाओं को मुख्य कारण मानते थे।

हिंदुओं के पास देश था, धर्म और पौराणिक विरासत की संस्कृत भाषा में सब की निष्ठा थी, अतः इनकी राष्ट्रीयता को खंडित करने वाली एक ही मजबूत विभाजन रेखा वर्णों के आधार पर थी जिस में खानपान विवाह का निषेध था। इसे इकबाल पूरी तल्खी से महसूम करते थे, इसलिए इसका कायल करने के लिए एक संकेत ही पर्याप्त था।

इसका परिणाम था उस देश से ही उनका मोहभंग जिसमें एक मनुष्य दूसरे का स्पर्श करने से भी इंकार करता है। ऐसे अपमान के शिकार केवल हिंदू समाज के अस्पृश्य ही नहीं थे, शासक होते हुए भी स्वयं अंग्रेज थे। शासन कर चुके, ऊंची जातियों में रह चुके, मुसलमानों को भी इस अपमान को सहना पड़ता था, इसलिए वे इसे जिस तल्खी से महसूस करते इससे कितनी घृणा करते थे यह समझ पाना सवर्ण हिंदुओं के लिए संभव ही नहीं।

इकबाल को हमने मनोभग्नता का शिकार अपने मन को कड़ा करके ही लिखा था। उनकी आंतरिक व्यग्रता का अनुमान करते हुए। वह मानवीय थे, ईमानदार थे, साहसी थे। जो सही लगा उसे कहने के खतरे उठाने को तैयार। पर खतरे आकर ही हम जैसों को यह समझा पाते हैं कि किसी व्यक्ति ने खतरा उठाया था।

वह हिंदुओं को काफिर नहीं मानते थे, और इस कारण कट्टर मुसलमान उनको काफिरों के नजदीक मानते थे और उनका मजाक उड़ाया करते थे । इसी मजाक में किसी ने तंज कसा थाः
सुनता हूं कि काफिर नहीं हिन्दू को समझता
है ऐसा अकीदा असर-ए-फलसफा दानी।

जब गौतम बुद्ध, कृष्ण, राम पर लिखा था और राम को एक मुसलमान की पूरी जिम्मेदारी निभाते हुए ईश्वर का अवतार नहीं, पैगंबर भी नहीं, मात्र इमाम कहा थाः
है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज
अहले नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिन्द
तो कट्टरपंथियों ने उन्हें काफिर कहना शुरू कर दिया जिसका जवाब उन्होंने उसी दृढ़ता से दिया थाः
जाहिद-ए-तंग नजर ने मुझे काफिर जाना
और काफिर ये समझता है मुसलमान हूं मैं।

इसलिए जब इंग्लैंड प्रवास के दौरान उन्हें जाति व्यवस्था की क्रूरता का तीव्रता से बोध हुआ तो उन्होंने अपनी स्वाभाविक तड़प के साथ की वेदना को व्यक्त करते हुए लिखा
आह! शूद्र के लिए हिन्दोस्तां गम-खाना है
दर्द-ए-इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है।
और संभवतः इसी प्रसंग में अपनी व्यथा को उससे भी प्रखर रूप में व्यक्त करते हुए लिखा
करदे फकत इशारा अगर शाहे खुरासान
सजदा न करूं हिंद की नापाक जमीन पर।

हिंदुओं में भी अपनी कठोर आलोचना झेलने की ताकत होनी चाहिए अन्यथा मुसलमानों को बंद दिमाग का बंदा कहने का उनका कोई अधिकार नहीं है।

हम विषय से भटक गए। बात मुसलमानों के लिए अस्मिता की खोज और इस्लाम को लेकर पश्चिमी जगत में जो धारणाएं, प्रचलित हैं, जैसे कि यह हिंसा पर पलने वाला मजहब है, इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए जगह नहीं है, इसमें गुलामी मानसिकता भरी हुई है, यह हिंदुओं से अलग एक कौम तो है, पर राष्ट्र नहीं है। इस्लाम सबसे ज्यादा पिछड़ा मजहब है जिसम जिसमें ज्ञान, विज्ञान, कला, सौंदर्यबोध और मानवीयता के लिए जगह नहीं है। ऐसे अनेक सवाल थे जिनका जख्म लेकर वह इंग्लैंड से लौटे थे और जिनका जवाब तलाशने में लंबा समय लगाया था। इसी के कारण वह कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन का सबसे कीमती समय इस्लाम के अध्ययन में लगाया है, परंतु यह अपनी मान्यताओं को सही ठहराने की कोशिश से आगे नहीं बढ़ पाता।

Post – 2018-12-14

हिंदू था यह मुसलमां, क्यों भूलता नहीं है

इकबाल के व्यक्तित्व का निर्माण 19वीं शताब्दी में हुआ था। वंशागत संस्कार हिंदू थे, जिसके लिए ईश्वर सर्वत्र विद्यमान होता है। ईश्वर के बाद धर्म की सर्वव्यापकता आती थी। हिंदू समाज में धर्म विश्वास नहीं है, निसर्गजात गुण और नैतिक विधान है इसलिए कर्तव्य बोध से जुड़ता है। इस्लाम में मजहब की ठीक वही व्याख्या नहीं मिलती जो हमारे यहां धर्म की मिलती है। उसका खुदा भी सर्वव्याप्त नहीं है, अपनी सृष्टि से ऊपर, दूर कहीं किसी सातवें आसमान पर विराजमान है। अपने ही रचे संसार से उसका संबंध फरिश्तों के माध्यम से होता है और उसकी इच्छा का पालन इसी निमित्त पैदा हुए या पैदा किए गए इंसान के माध्यम से होता है जो अपनी अंतरानुभूति से और उन फरिश्तों के संदेश को सुन या देख पाता है।

यह पूरी रूपरेखा भावना और विश्वास पर टिकी है क्योंकि यह तर्क की आंच नहीं झेल सकती। उदाहरण के लिए यदि कोई पूछे यदि अल्लाह निराकार, निर्गुण और इसलिए अनिर्वाच्य है तो उसके लिए आसमान या जगह की जरूरत क्या है? किसी मुकाम की जरूरत साकार के लिए होती है। तो इसका उत्तर देना कठिन होगा।, पूछे कि जिसने कहा, ‘प्रकाश हो’ और प्रकाश हो गया, वह अपने संदेश अपने भेजे हुए प्रतिनिधि से सीधे संपर्क क्यों नहीं कर सकता? यदि उसने कहा प्रकाश हो, तो वाकतंत्र के बिना यह कहा कैसे? तो जवाब देने में परेशानी होगी। यह परेशानी अकेले इस्लाम के साथ नहीं है सभी सामी मजहबों के साथ है और किसी एक मामले में नहीं, हर निर्णायक कड़ी के साथ है, इसलिए उनमें तर्क के लिए, सोचने- विचारने के लिए अवकाश नहीं है। वे विचारधारा से नहीं विश्वासधारा से प्रचलित होते। स्वयं सोचने की जगह किताब का सहारा लेना पड़ता है। किताब से बाहर या अलग जाने की छूठ ही नहीं है। नैतिक और अनैतिक का विचार करने की गुंजाइश ही नहीं है। यदि किताब में वैसा लिखा है वह सही है, अन्यथा गलत। उचित और अनुचित, नैतिक या अनैतिक नहीं। सही या गलत, यथालिखित या उससे अलग। अलग है तो गर्हित है।

हम यह नहीं कहते कि भारतीय चिंता धारा में तर्कातीत के लिए जगह नहीं है। हमारी सीमा है कि इस समय हम इस्लाम पर बात कर रहे हैं और उसी के गुण दोष देख रहे हैं। यह याद दिला दें कि जब गार्गी याज्ञवल्क्य से ऐसा करती है जिसका उत्तर वह नहीं दे पाते हैं तो कहते हैं, अतिप्रश्न मत कर गार्गी, नहीं तो तेरा सिर फट जाएगा। विज्ञान भी, जो ईश्वर को न करता है, इस बात का जवाब नहीं दे सकता कि यदि ब्रह्मांड का विकास भूत से हुआ है तो वह भूत कहां से आया और उससे पहले क्या था। हम केवल यह कह सकते हैं कि सामी मजहबों में प्रश्न तक अतिप्रश्न बन जाता है और इसलिए मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग जो कुछ किताबों में लिखा है उसे सही सिद्ध करने में करता है।

हम इस चर्चा में इसलिए पड़ गए कि यह समझ सकें कि जिसे इकबाल का दार्शनिक योगदान माना जाता है वह हिंदुत्व के प्रभाव या सामंजस्य का परिणाम है, जिसे वह स्वयं नकारने की भी कोशिश करते हैं। इसलिए जब वह कहते हैं कि “राजनीति की जड़ें मनुष्य के आत्मिक जीवन में है और मजहब वह शक्ति है जो मनुष्य और राष्ट्र के जीवन में सर्वाधिक महत्त्व रखता है”, तो हमें वह गांधीजी के मुहावरे में बोलते प्रतीत होते हैं
“politics have their roots in the spiritual life of man,” and that “religion is a power of the utmost importance in the life of individuals as well as nations”.
परंतु वह इसका निर्वाह इसलिए नहीं कर सकते कि वह इसी से विरोध रखते हुए इस्लामी मान्यताओं को स्वीकार्य और एक ख्याल को हकीकत बनाना चाहते हैं, जिसके लिए इस्लाम में जगह ही नहीं है। नीचे लिखे वाक्यों में पर ध्यान दें। जहां किताब के सामने जिज्ञासा करने का भी अवकाश नहीं है, वहां इंडिविजुअलिटी या निजता का प्रश्न ही नहीं आता, परंतु इकबाल इसका आरोपण कर लेते हैं और निर्वाह नहीं कर पाते। नीचे के वाक्यों पर ध्यान देंः

The whole system of Islamic ethics is based on the ideal of individuality; anything which tends to repress the healthy development of individuality is quite inconsistent with the spirit of Islamic law and ethics. A Muslim is free to do anything he likes, provided he does not violate the law. The general principles of this law are believed to have been revealed; the details, in order to cover the relatively secular cases, are left to the interpretation of professional lawyers.

फिर स्वतंत्रता कहां है ? बात संस्कारों की है। जैसे हम अपने गुणसूत्रों को नहीं जानते हैं और जानें भी तो आसानी से यह नहीं समझ पाते कि हमारी आनुवंशिक व्याधियों और विशेषताओं के सूत्र पिछली पीढ़ियों में किस से जुड़े हुए हैं, उसी का तरह का रहस्य संस्कारों के साथ भी जुड़ा होता है। लिबास बदलने से आदमी नहीं मदल जाता, न ही मजहब बदलने से संस्कार बदल जाते हैं, अन्यथा हिंदुओं को धर्मांतरित मुसलमानों के इन दोषों के लिए न कोसा जाता जिन्हें हिंदुत्व की देन माना जाता है और जिसे इकबाल स्वयं भी कोसते हैंः
there are castes and sub-castes like the Hindus’. Surely we have out-Hindued the Hindu himself; we are suffering from a double caste system—the religious caste system, sectarianism, and the social caste system, which we have either learned or inherited from the Hindus.

बुराइयों की तरह ही अच्छाइयों और विचारों का भी प्रवेश हो सकता है और स्वयं इकबाल की दार्शनिकता का एक पहलू यह है। दूसरा इससे पलायन से जुड़ा है, जिसके प्रति भी वह सचेत नहीं हैं। इकबाल के सचेत होने से भी अधिक अंतर नहीं आता, क्योंकि धर्मान्तरित व्यक्ति को स्वयं उसकी मान्यताओं पर खरा उतरना होता है, वह उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यह काम उन लोगों का था जिन्होंने इकबाल को दार्शनिक कवि माना और उनकी गहराइयों को समझने से चूक गए, अन्यथा इस समझ के माध्यम से ही भारतीय इस्लाम का एक नया चरित्र उभरता जो इस्लाम को भी नया रास्ता दिखाता और अपने ही घर में बेगाना होने से बच जाता। उसे अपने अस्तित्व के लिए किसी पराए का मुंह नहीं देखना पड़ता। पान इस्लामिज्म आत्मविश्वास की इसी कमी की क्षतिपूर्ति है।

Post – 2018-12-13

कौन लिखता है इबारत किसकी

प्रमोद जोशी ने मेरी एक भूल को दुरुस्त करते हुए बताया है कि कौमी तराने में परिवर्तन किसी अन्य ने नहीं इकबाल ने स्वयं किया था। इंग्लैंड जाने से पहले 1904 में उन्होंने वह गाना लिखा था जिसे हम कौमी तराना मानते आए हैं, लौटने के बाद 1910 में उन्होंने उसी तर्ज पर मिल्ली तराना लिखा था, जो पहले लिखे तराने की पैरोडी तो था ही, उसे भूल मानते हुए उसे वापस लेने जैसा निर्णय भी था । यह तराना विकीपीडिया पर उपलब्ध है फिर भी इसे देना जरूरी है, क्योंकि यह उनके नजरिए में बदलाव को समझने में एक कुंजी का काम करता है। उनकी बौद्धिक अपरिपक्वता को भी समझने में सहायक होता है। सबसे अधिक आम मुसलमानों के नजरिए को बदलने में इकबाल की भूमिका को भी स्पष्ट करता है। यह मात्र एक तराना नहीं था, एक राजनीतिक अभियान का हिस्सा था। इकबाल कहते जरूर हैं कि उनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं, परंतु यह इस सीमा तक ही सही है क्वि वह किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े थे, अन्यथा वह सबसे अधिक राजनीतिक कवि हैं और इसे हटा दिया जाए तो उनकी कविता में और कुछ बचेगा ही नहीं । राजनीतिक अभियान से जुड़े होने के कारण उनमें गर्मजोशी अधिक है, वह बारूदखाने से अपनी भाषा निकालते हैं और हम जानते हैं बारूद का प्रयोग करने वालों के पास मारक क्षमता तो होती है, विवेक का अभाव होता है। जिस तराने की बात हम कर रहे हैं वह निम्न प्रकार हैः
चीनो अरब हमारा, हिंदोस्ताँ हमारा
मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा।
तौहीद की अमानत सीनों में है हमारे
आसां नहीं मिटाना नोमो-निशां हमारा।
दुनिया के बुतकदों में पहला वो घर खुदा का
हम उसके पासबां हैं, वह पासबां हमारा।
तेगों के साये में हम पलकर जवां हुए हैं
खंजर हिलाल का है कौमी निशां हमारा।।
मगरिब की वादियों में गूंजी अजां हमारी
थमता न था किसी से सायल रवां हमारा ।।
बातिल से दबने वाले ऐ आसमां नहीं हम
सौ बार कर चुका है तू इम्तहां हमारा।।
ऐ गुलसिताने अंदलुस वह दिन है याद तुझको
था तेरी डालियों पर जब आशियां हमारा।।
ऐ मावजेय दजला तू पहचानती है हम को
अब तक है तेरा दरया अफसाना ख्वां हमारा।।
ऐ अर्जे पाक तेरी हुरमत पर मर मिटेंगे
है खून तेरी रग में अब तक रवां हमारा ।।
सालारे कारवां है मीरे हिजाज अपना
इस नाम से है बाकी आरामे जां हमारा।।
इकबाल का तराना बांगे दरा है गोया
होती है जादा पयमा फिर कारवां हमारा।।

इसे हम इकबाल की कविता मानें या उनकी जिन्होंने कौम की चिंता करने वाले कवि को, अपने माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते हुए, उसकी क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए, स्वयं यह कविता लिखी। आखिर कौम की बात करने वाले, अर्थात् राष्ट्रीय मनोभूमि वाले कवि के साथ ऐसा क्या हुआ, क्यों हुआ कि उसके पांव के नीचे से जमीन खिसक गई। यह उसका चुनाव तो नहीं था, परंतु यह इंग्लैंड जाने का प्रभाव अवश्य था। पहला तराना इकबाल ने लिखा था, दूसरा तराना ब्रिटिश कूटनीति ने इकबाल का इस्तेमाल करते हुए लिखा था। दिमाग वह काम कर रहा था, जिसे उन्होंने बनाया था। इबारत वह लिखी जा रही थी जो वे लिखाना चाहते थे। जुमलों में खूंरेजी उनके द्वारा भरी जा रही थी।

मैं जानता हूं, आपको मेरा यह कथन कुछ अटपटा लग रहा होगा, परंतु यदि आपने किसी प्रेतवाधित व्यक्ति के आचरण को देखा होगा, तो, प्रेत में विश्वास करते हों या नहीं, आविष्ट व्यक्ति के आचरण को समझ सकते हैं। आवेश किसने भरा था इसे मानने में आपको कठिनाई नहीं होगी। परंतु यदि आवेश बोल रहा है तो दिमाग काम नहीं कर रहा है, यह भी मानेंगे ।

इंग्लैंड से लौटने के बाद इकबाल का सारा लेखन, कविता और चिंतन आविष्ट व्यक्ति का लेखन, कविता और चिंतन है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से मेल नहीं खाते। वह शीजोफ्रेनिक हैं, जो अपने रीयल सेल्फ और फाल्ससेल्फ में फर्क न कर पाने के कारण दोनों से टकराता हुआ लहूलुहान होता रहता है पर अपनी अस्मिता को पहचान नहीं पाता। स्वयं से सवाल करता है, मेरा वजूद मेरे दिल में या दिमाग में है, और इसका उत्तर पाए बिना मर जाता है।

Post – 2018-12-12

हिंदी का मुसलमाँ होना

सुनते हैं पाकिस्तान में हमारे ‘कौमी’ तराने की एक लाइन बदल कर उसे ‘मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा’ कर दिया गया। इस पर अल्लामा इकबाल को भी आपत्ति न होती। राष्ट्रीयता की उनकी समझ में भी यही बदलाव आया था । वह खुद भी हिंदी से मुसलमान हो गए थे। इस लाइन का बदला जाना,उन्हीं के प्रयत्न से पैदा हुई मानसिकता की अभिव्यक्ति थी।

उनकी सोच में आया यह बदलाव भारतीय राजनीति में भी एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इससे पहले आम मुसलमानों का मुस्लिम लीग के प्रति वैसा ही रुख था जैसा हिंदुओं का हिंदू महासभा के प्रति था। मोहम्मद इकबाल ब्राह्मण से मुसलमान बनने के कारण कुछ खास हैसियत तो रखते थे, परंतु रईस तबके से नहीं जुड़े थे। अतः आरंभ में इनका दृष्टिकोण राष्ट्रवादी था, बाद में इसमें इतना बदलाव आया कि संप्रदायवाद भी उनकी नजर में श्लाघ्य हो गया:
Yet I love the communal group which is the source of my life and behaviour, and which has formed me what I am by giving me its religion, its literature, its thought, its culture, and thereby recreating its whole past as a living operative factor, in my present consciousness. Even the authors of the Nehru Report recognise the value of this higher aspect of communalism. ( All-India Muslim League, Allahabad Session, 29th December 1930, Presidential Address, Lahore, oc, 10.) ।

इस बदलाव के बाद इनकी कविता के प्रभाव से सभी तबकाें के शिक्षित मुसलमानों के नजरिए में बदलाव आना स्वाभाविक था, क्योंकि कवि की पहुंच राजनीतिज्ञों से अधिक व्यापक, अधिक गहरी, अधिक टिकाऊ होती है और उसका प्रभाव हमारे अवचेतन पर भी पड़ता है। उसे उनका भी दाद मिलता है जिनकी वे आलोचना करते हैं। दुश्मनों के दिलों पर राज्य करने वाला कलाकार ही होता है, राजनीतिज्ञ नहीं। यह जानते हुए भी कि इकबाल का नजरिया संप्रदायवादी था, हम उनकी कविता पर दाद दिए बिना नहीं रह पाते।

इस बदलाव का संबंध उनके इंग्लैंड गमन से जुड़ा दिखाई देता है। इंग्लैंड आने वाले भारतीयों के लिए ब्रिटिश कूटनीति इतनी व्यापक और परिष्कृत सिद्ध होती रही है कि यह विरोधी के सर पर चढ़ कर बोलने लगती थी। कारण, भारत में भारतीयों के साथ अंग्रेज अधिकारी जितनी हेकड़ी से बर्ताव करते थे उसका वहां आभास तक न होता था। यह किसी एक व्यक्ति की चालाकी से जुड़ी योजना नहीं थी,अपितु उनकी राष्ट्रीय सोच, मिजाज और सरोकार से जुड़ी थी, जिसमें सभी स्तरों के लोगों का योगदान था। कहीं यह नहीं लगता कि आपको कुछ सिखाया-पढ़ाया जा रहा है, या तर्क से अपनी बात का कायल किया जा रहा है । यहां तक कि आपको यह भी नहीं लगता की आपके दृष्टिकोण का अनादर किया जा रहा है, आपके विचारों को नजरअंदाज किया जा रहा है। अपनी मान्यताओं में दृढ़ लोग भी इस हल्की आँच का मज़ा लेते हुए पत्थर से मोम बनते चले जाते थे और खुद ही उस सांचे के लिए अपने को तैयार कर देते थे जो उनकी कूटनीतिक जरूरत पूरी करता है।

इस प्रक्रिया को समझने में इकबाल हमारी जितनी मदद करते हैं उतनी कोई दूसरा नहीं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। इकबाल कहते हैं जब भी मैं कभी पूरब की किसी विशेषता की बात करता था तो वहां का हर खास व आम की एक ही प्रतिक्रिया होती थी, ‘कितनी अजीब बात है!’ यह शब्द मेरे हैं, इकबाल के शब्दों में कहें तो: Asabiyyat is patriotism for religion; Patriotism, Asabiyyat for country. Asabiyyat simply means a strong feeling for one’s own nationality and does not necessarily imply any feeling of hatred against other nationalities. During my stay in England I found that whenever I described any peculiarly Eastern custom or mode of thought to an English lady or gentlemen, I, almost invariably, invoked the remark—”how funny” as if any non-English mode of thought was absolutely inconceivable.

हम इसका शब्दशः अनुवाद इसलिए नहीं कर सकते कि पहले ही वाक्य में शब्दों का खेल तो है, परंतु असलियत का सही चित्र नहीं। असलियत यह है कि मजहब और देश दोनों अलग अवधारणाएं जिनमें केवल नाम का अंतर नहीं है। दोनों का मतलब एक है – अ=ब= स इसलिए अ=स जैसा सीधा मामला नहीं है। दोनों में अल्ला कहें या खुदा कहें, जैसा नाम-भेद नहीं अपितु वस्तु-भेद है। एक का गुण दोष दूसरे पर नहीं लादा जा सकता। यदि वह कहते असबिय्यत का अर्थ है गहन निष्ठा। वह एक साथ मजहब के प्रति भी हो सकती है और देश प्रति भी, तो यह हमें भी अजीब न लगता। यदि कहते एक के प्रति गहन निष्ठा दूसरे के प्रति गहन निष्ठा का निषेध नहीं करती, या कहते अपने देश के प्रति गहन निष्ठा, दूसरे देशों के प्रति नफरत नहीं पैदा करती, अतः हमारा राष्ट्र प्रेम पश्चिम की तरह संकीर्ण और अन्य राष्ट्रों से नफरत करना नहीं सिखाता, तो पश्चिम से पूर्व का अंतर भी स्पष्ट होता और असहमति के बावजूद उन्हें भी यह फनी न लगता। परंतु कवि विचारों से अधिक चमत्कारों की चिंता करता है, जिससे हमारे समझ में कोई बात वहां भी स्पष्ट नहीं होती जहां हम किसी रचना से चमत्कृत होते हैं।

पश्चिम और पूर्व के विचारों में एक अन्य भेद देखने में आता है विज्ञान और प्रौद्योगिकी में विकास के क्रम में विचारों के सूक्ष्म भेद, सटीक शब्दावली के प्रयोग की सावधानी भी उनकी भाषा में बढ़ती गई है। पूर्व में कुछ हमारी शिथिलता के कारण और कुछ उनके प्रयत्न से वैज्ञानिक सोच और तकनीकी प्रगति लंबे समय तक अवरुद्ध रही, इसके स्थान पर पौराणिकता हावी रही। इसलिए हम न तो विचारों की शुद्धता का निर्वाह करते हैं नाही वस्तुओं की। सटीक नहीं लगभग वाली भाषा में सोचते और व्यवहार करते हैं। इसलिए इकबाल कह सकते थे There are communalisms and communalisms.(पूर्व. 9) और यह किसी पाश्चात्य श्रोता को फनी लग सकता था, क्योंकि किसी संकल्पना की जमात नहीं होती, ला इलाह इल अल्लाह की तरह संकल्पनाएं भी एक और अनन्य होती हैं। व्यंग्य यह है की इकबाल सही होते हुए भी गलत सिद्ध हो रहे हैं उन्होंने विस्तार से यह समझाया है की कम्युनलिज्म से उनका क्या तात्पर्य है, The principle that each group is entitled to free development on its own lines is not inspired by any feeling of narrow communalism. बस चूक प्रस्तुति में है। उन्हें इस वाक्य में not inspired by any feeling of narrow का प्रयोग नहीं करना चाहिए था। और फिर बताना चाहिए था कि अंग्रेजों ने भारत में कम्युनल फसाद पैदा किया और उसको कम्युनलिज्म का नाम दे दिया, जिसे हम नहीं स्वीकार करते, परंतु यह बात वह नहीं कह सकते थे क्योंकि अब तक जिस राजनीति से जुड़ चुके थे, उसमें यह कहना आत्मघाती हो सकता था।
ब्रिटेन का बच्चा बच्चा यह चाहता था हिंदुस्तान में उसका राज्य बना रहे, बच्चा बच्चा यह जानता था कि इसमें कांग्रेस के कारण, राष्ट्रीय चेतना के कारण, समस्याएं पैदा हो रही हैं। अधिकांश को यह भी पता था कट्टर मुसलमान हमारे शासन को बनाए रखने में सहयोग कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई राष्ट्रीय भावना से बात करे, सामाजिक सौहार्द की बात करे और साथ ही मजहब से भी गहरे लगाव की बात करे, तो वह उनके निशाने पर भी आ जाता है, मजहब और देश में फर्क न करने के कारण हास्यास्पद भी लगता है। इसे इकबाल नहीं समझ पाए और उल्टी यूरोप की समझ को लताड़ने लगे, यह तो हमें भी फनी लगता हैः
it does not indicate any want of imagination; the country of Shakespeare, Shelley, Keats, Tennyson and Swinburne cannot be wholly unimaginative; on the other hand it indicates how deeply England’s mode of thought and life, her institutions, her manners and customs are rooted in the mind of her people.
और जब वह कहते हैं

The religious idea, then, without any theological centralisation which would unnecessarily limit the liberty of the individual, determines the ultimate structure of the Muslim Community
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उनके विचारों का कायल होने के स्थान पर हंसते हुए गोरे हो जाने की तलब होती है। इकबाल भावालोक में जिसमें जिसने जितने बड़े दिखाई देते हैं, विचार जगत में उतने ही कमजोर और कंफ्यूज्ड । ऐसे ही भावुक लोग मेधावी बनकर इंग्लैंड जाते थे और सरनामी औजार बनकर वापस आते थे। उनका प्रभाव विस्तार करने के लिए उन्हें अलंकृत भी किया जाता था। वे अपना कद गंवाकर पहले से बहुत ऊंचे हो जाया करते थे, पहले से अधिक चमकदार हो जाया करते थे, परंतु यह भी नहीं छिपा पाते थे कि चमक रंग की नहीं रोगन की है, और इसी अनुपात में बाद की पीढ़ियों के लिए बौने होते चले जाते थे। इकबाल जो कभी श्रद्धा के पात्र हुआ करते थे, आज सहानुभूति के पात्र बन चुके हैं।

Post – 2018-12-11

सर सैयद अहमद खान और अल्लामा इकबाल

यदि हम एक वाक्य में मुस्लिम समाज को प्रभावित करने वाली तीन विभूतियों का मूल्यांकन करना चाहें तो कहना होगा, सर सैयद मुस्लिम समाज को मध्यकालीन मानसिकता से बाहर लाकर आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाना चाहते थे, जिन्ना उनसे भी आगे जाकर, मजहब को केवल सामुदायिक पहचान के रूप में स्वीकार करते हुए सांप्रदायिक संकीर्णता और मजहबी बंदिशों से मुक्त आधुनिक मुस्लिम समाज निर्माण करना चाहते थे, जबकि मुहम्मद इकबाल समाज को मध्यकाल से भी पीछे, इस्लाम के आरंभिक चरण में पहुंचा कर, दरबाबंद मानसिकता में ले जाना चाहते थे।

सर सैयद और जिन्ना की सोच में मुल्लों और मकतबों के लिए जगह नहीं है, दोनों की दीठि यूरोप की ओर है, अकबर इलाहाबादी और इकबाल की सोच में मुल्लों और मदरसों के लिए जगह है, इनकी पीठ यूरोप की ओर है। इसमें उनकी असाधारण काव्य प्रतिभा ने चुंबकीय आकर्षण पैदा कर दिया था।

यह हैरानी की बात है इन तीनों मुस्लिम नेताओं में बौद्धिक रूप में सबसे कमजोर, सबसे जथातथवादी, व्यक्ति को दार्शनिक मान लिया गया, और जिनमें सचमुच बौद्धिक खुलापन था, उनका मुस्लिम समाज ने उपयोग करके कूड़ेदान में डाल दिया। यहां हम केवल यह दिखाना चाहते हैं कि अपने से आधी शताब्दी पहले पैदा हुए सर सैयद अहमद खान से वह कितने पीछे थे।

सर सैयद अहमद का दृष्टिकोण आधुनिक इस मानी में है, कि उनकी चिंता भले अपने वर्ग तक सीमित रही हो परंतु उसके केन्द्र में सामाजिक अवरुद्धता, आर्थिक दुर्गति, शैक्षिक पिछड़ापन, अवैज्ञानिक दृष्टिकोण, औद्योगिक और व्यापारिक उदासीनता, आदि थे। मजहब उनकी चिंता के केंद्र में नहीं आता था, या यदि आता था तो केवल हासिये की समस्या बन कर, जिसको बचाना जितना जरूरी था, उतनी ही जरूरी उसकी ऐसी व्याख्या थी जो समाज को मध्यकालीन भेंड़चाल से बाहर ला सके और आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में बाधक न बनने दे। यह देख कर हैरानी होती है कि अल्लामा इकबाल आधुनिकता को भी मजहबी दीवारों में घेर कर रखना चाहते हैं।

यहां याद दिला दें कि 19वीं शताब्दी में हिंदुस्तान में सैयद अहमद खान नाम के दो व्यक्ति हुए थे। पहले सैयद अहमद खान के विषय में उनके विचार इतने भ्रामक हैं कि इन्हें पढ़ने के बाद मुझे लगा कि वह सर सैयद अहमद को ही वहाबी आंदोलन का भारतीय प्रतिनिधि मान बैठे हैं।उनके विचार निम्न प्रकार हैं:
“19वीं शताब्दी में हिंदुस्तान में सैयद अहमद खान, अफगानिस्तान में सैयद जमालुद्दीन अफगानी और रूस में मुफ्ती पैदा हुए। ये लोग शायद सन 1700 नज्द मी पैदा हुए मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब से प्रेरित थे जिन्होंने तथाकथित वहाबी आंदोलन आरंभ कर किया था जिसे आधुनिक इस्लाम की पहली धड़कन कहा जा सकता है। सैयद अहमद का प्रभाव केवल हिंदुस्तान तक सीमित रहा। फिर भी संभवत है वह पहले आधुनिक मुसलमान हैं जिन्होंने आने वाले युग की झांकी का अनुभव किया। जैसे रूस में मुफ्ती ने सुझाया था उन्होंने भी प्रस्ताव रखा इस्लाम की कमियों का इलाज आधुनिक शिक्षा है। परंतु ऐसे व्यक्ति किसी व्यक्ति की असली महानता इस इस बात में है कि वह पहले हिंदुस्तानी मुसलमान हैं जिसने यह अनुभव किया इस्लाम का रुझान बदला जाना चाहिए, इसके लिए आजीवन काम करते रहे।”
During the nineteenth century were born Syed Ahmad Khan in India, Syed Jamal-ud-Din Afghani in Afghanistan and Mufti Alam Jan in Russia. These men were probably inspired by Muhammad ibn Abdul Wahab who was born in Nejd in 1700, the founder of the so-called Wahabi movement which may fitly be described as the first throb of life in modern Islam. The influence of Syed Ahmad Khan remained on the whole confined to India. It is probable, however, that he was the first modern Muslim to catch a glimpse of the positive character of the age which was coming. The remedy for the ills of Islam proposed by him, as by Mufti Alam Jan in Russia, was modern education. But the real greatness of the man consists in the fact that he was the first Indian Muslim who felt the need of a fresh orientation of Islam and worked for it. We may differ from his religious views, but there can be no denying the fact that his sensitive soul was the first to react to the modern age.
The extreme conservatism of Indian Muslims which had lost its hold on the realities of life failed to see the real meaning of the religious attitude of Syed Ahmad Khan. (Religion and Philosophy, Speeches, writings and Statements of Iqbal, Compiled and Edited by LATIF AH MAD S H E RWAN I, Iqbal Academy Pakistan Govt. of Pakistan, 229-30)
मेरे भ्रम का कारण यह था, और वह भ्रम अभी तक बना हुआ है, कि जिस सैयद अहमद खान की बात अल्लामा इकबाल ने की है उनके बारे में यह कहा है कि वह आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे, जबकि उनका अहमदियों का इस्लाम की मान्यताओं से संबंध है, जिहाद से संबंध है, कुरीतियों को दूर करने से संबंध है, और उनके इबादत के तरीके में कुछ नयापन है, परंतु शिक्षा के मामले में इनका कोई योगदान, कोई नया प्रयोग देखने में नहीं आता, आधुनिक शिक्षा का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यह काम सर सैयद अहमद ने किया था।

दूसरे, वह सैयद अहमद खान को 19वीं शताब्दी में पैदा हुआ दिखाते हैं । यह सर सैयद के विषय में तो सही है, सैयद अहमद खान के विषय में नहीं। उनका जन्म 1786 में हुआ था, अर्थात वह अठारहवीं शताब्दी में पैदा हुए, यद्यपि उनका आंदोलन 19वीं शताब्दी में चला। इसमें उन्होंने वहाबी परंपरा का निर्वाह करते हुए विधर्मियों के विरुद्ध धर्मयुद्ध छेड़ा और जवानी में मौत को भी प्राप्त हुए हुए।

जहां तक हमारी जानकारी है वही भारतीय अहमदी संप्रदाय के संस्थापक भी थे। अहमदी समुदाय पर लिखते हुए इकबाल ने उनकी कड़ी आलोचना की है और यहां विचारधारा से असहमति के बावजूद उनका रुख प्रशंसात्मक दिखाई देता है। भ्रम को बनाए रखने में यह भी सहायक होता है।

जो भी हो, सैयद अहमद के वहाबी विचारों से भी उनकी असहमति थी और सर सैयद की आधुनिक शिक्षा से भी उनका विरोध था। इकबाल को इस मामले में अकबर (इलाहाबादी) के विचार सर सैयद से अधिक सही लगते थे और अकबर को देवबंद के मदरसों की संस्कृति और शिक्षा पद्धति पश्चिमी सभ्यता और शिक्षापद्धति की तुलना में अधिक अनुकूल लगती थी।

परंतु देवबंदियों को अंग्रेजों से वही शत्रुभाव था जो वहाबी आंदोलन के भारतीय जनक सैयद अहमद खान शाहिद को था। वे अंग्रेजी भाषा, सभ्यता के ही विरोधी नहीं थे, अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए प्रयत्नशील, उनसे सहयोग करने वालों के भी विरोधी और इसलिए मुस्लिम लीग के भी विरेधी थे, जब कि इकबाल लीग के साथ थे और आधुनिक पाश्चात्य ज्ञान के कायल थे, यह जानते हुए कि अंग्रेज अपनी सत्ता बचाने के लिए सांप्रदायिक तनाव पैदा करके स्वतंत्रता को टालते जा रहे हैं उनका अपने हित में उपयोग करने के लिए उनके साथ साथ सहयोग कर रहे थे। ऐसी स्थिति में उनकी इस टिप्पणी को (जिसका अनुवाद हम स्थान की सीमा के कारण नहीं दे रहे हे) ध्यान से पढ़ी जानी चाहिएः
In our educational enterprise we have hardly realised the truth, which experience is now forcing upon us, that an undivided devotion to an alien culture is a kind of imperceptible conversion to that culture, a conversion which may involve much more serious consequences than conversion to a new religion. No Muslim writer has expressed this truth more pointedly than the poet Akhar who, after surveying the present intellectual life of the Muslim Youngman, cries out in despair:
शेख मरहूम का मुझे यह कौल याद आता है
दिल बदल जाएंगे तालीम बदल जाने से।
We now see that the fears of the (शेख) the representative of the essentially Muslim culture, who waged a bitter bitter controversy with the late Sir Sayyed Ahmad Khan on the question of Western Education—were not quite groundless. Need I say that our educational product is a standing testimony to the grain of truth contained in the Sheikh Marhum’s contention. Gentlemen, I hope you will excuse me for these straightforward remarks. Having been in close touch with the student-life of to-day for the last ten or twelve years, and teaching a subject closely related to religion, I think I have got some claim to be heard on this point. It has been my painful experience that the Muslim Student, ignorant of the social, ethical and political ideals that have dominated the mind of his community, is spiritually y dead; and that if the present state of affairs is permitted to continue for another twenty years the Muslim spirit which is now kept alive by a few representatives of the old Muslim culture, will entirely disappear from the life of our community.
(वही, 131-132)
इस कथन के पीछे छिपी चिंता को हंस कर नहीं उड़ाया जा सकता। उनका जोर इस बात पर है कि हमें पाश्चात्य शिक्षा पर इतना इकहरा जोर नहीं देना चाहिए कि हम अपनी जड़ों को, अपने इतिहास को ही भूल जाएं। अपना आत्मविश्वास ही खो दें। यहां तक उनकी आशंका सही थी, परन्तु सर सैयद अहमद ने तो विश्वविद्यालय के खाके में भी इस बात का इतना ध्यान रखा था कि विज्ञान पढ़ते हुए अगली पीढ़ियों को खुदा ही न भूल जाए, इसलिए उन्होंने उसमें मस्जिद और नमाज का भी प्रबंध किया था। उनके प्रसंग में यह बात क्यों याद आई?

एक ही कारण हो सकता है। सर सैयद अपने समाज को आगे ले जाना चाहते थे, इकबाल उसे पीछे ले जाना चाहते थे। सर सैयद और इस मामले में जिन्ना भी, अपने समाज को मुक्त करना चाहते थे और कविता में जोश भरने के लिए ‘तू बाजी है, परबाज है काम तेरा/ तेरे सामने आसमां और भी हैं’ की ललकार लगाने वाला कवि यथार्थ जीवन में उसके पर कतर कर रखना चाहता था। खुले आसमान से, ऐसी तालीम से, बचा कर रखना चाहता था, जो सोचने समझने का तरीका बदल सकती हो। वह उसे कठमुल्ला बना कर रखना चाहता था. मरहूम शेख साहब उनके मार्गदर्शक थे और जिंदा विचारों से उसे घबराहट होती थी।

Post – 2018-12-09

इकबाल और जिन्ना

व्यक्ति या धर्माधिकार से वंचित व्यक्ति के लिए धर्म निजी मामला नहीं होता। उसकी अस्मिता से जुड़ा प्रश्न होता है। उसकी धार्मिक चेतना दूसरों की अपेक्षा अधिक प्रबल होती है। यह एक असामान्य स्थिति है और इसलिए चेतना का यह रूप भी किंचित् असामान्य होता है। इस तथ्य पर ध्यान न देने पर, अध्ययन, अनुभव और चिंतन में बहुत आगे बढ़े व्यक्तियों को इतना अधिक धर्म-केंद्रित पाकर हमें विस्मय होता है ।

इक़बाल बहुत बड़े कवि थे। कवि अपने मिजाज से ही मानव द्रोही नहीं हो सकता। अपने अस्तित्व की चिंता उसे हो सकती है परंतु दूसरों का अहित करते हुए स्वयं कोई लाभ उठाना उसके लिए कल्पनातीत है, जबकि राजनीतिज्ञों के लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सत्ता सदा अनैतिक और हिंसक तरीकों से ही हासिल की जाती रही है। इस अंतर के कारण ही वह अपने को राजनीतिज्ञ नहीं मानते। उनके व्याख्यानों और लेखों आदि का संकलन और संगा0ल करने वाले अहमद लतीफ शेरवानी के शब्दों में, His mind was incapable of the intrigues, trickeries and machinations, which constitute the mental and moral equipment of the common run of politicians। जहां तक राजनीतिक गतिविधियों का प्रश्न है वह बजट से लेकर दूसरे सभी प्रश्नों पर निजी राय रखते रहे और इसे उपयुक्त माध्यमों और मंचों से प्रकट भी करते रहे हैं।

मोहम्मद अली जिन्ना से उनका इसी मामले में अंतर है। जिन्ना राजनीतिक व्यक्ति थे। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं। उन्हें पूरा करने के लिए वह कुछ भी कर सकते थे और उसमें बाधक बनने वाले को कभी क्षमा नहीं कर सकते थे। इकबाल कला जगत के सम्राट थे और विचार या कार्य की दृष्टि से ऐसा कुछ नहीं कर सकते थे, यहां तक कि सोच भी नहीं सकते थे, जो उन्हें मानव द्रोही या संकीर्ण सिद्ध करता हो।

दोनों में समानता यह थी कि दोनों के पितामह ब्राह्मण थे जिन्होंने किन्हीं असामान्य परिस्थितियों में धर्मपरिवर्तन किया था । हिंदू समाज में निकास का रास्ता है परंतु प्रवेश का रास्ता लगभग बंद सा है । इस विवशता के कारण दूसरी मूल्य व्यवस्था से असंतुष्ट होने के बाद भी, जगह उसी में बनानी पड़ती है। जो भी हो इनकी स्थिति दूसरे धर्मांतरित हिंदुओं से ही अलग नहीं थी, एक दूसरे से भी अलग थी।
जिन्ना का मुसलमान होना उनकी विवशता थी, परंतु वह न तो उस धर्म को पसंद करते थे,न इसकी पाबंदियों के कायल थे। वह तिलक के सचिव थे। उनकी उस समय की महत्वाकांक्षाएं नहीं जानी जा सकती थीं, जैसे उनके अंतिम दिनों में किसी को यह तक पता न चला कि वह किस रोग से पीड़ित थे। इकबाल इस तरह का दुराव नहीं पाल सकते थे। उनके व्यक्तित्व में आए बदलाव का उनके लेखन के माध्मय से आरेख बनाया जा सकता है।
प्रकृति के अंतर के कारण ही, इकबाल आरंभ से ही जहां गलत हैं वहां भी बहुत विश्वशनीय और ईमानदार दिखाई देते हैं। मोहम्मद अली जिन्ना नास्तिक थे,जब कि मोहम्मद इकबाल आस्थावादी और निष्ठावान व्यक्ति थे। इसलिए केवल इस बात से कि इकबाल ने ही जिन्ना को मुस्लिम लीग का नेतृत्व संभालने के लिए राजी किया था और उनका समर्थन करते रहे, दोनों के बीच समानता तलाशना गलत होगा।

सच तो यह है कि आरंभ में मुहम्मद इकबाल का भी मुस्लिम लीग की पृथकतावादी दृष्टिकोण से सहमति नहीं थी। और इस मामले में दोनों में, अलग अलग कारणों से पुनः समानता मिलती है कि दोनों अपने को राष्ट्रवादी सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं, पर अधूरे मन से। दोनों के प्रयत्न दिखाई देते हैं, आवेग नहीं दिखाई देता। इकबाल की राष्ट्रवादी कविताओं को उनकी सबसे कमजोर रचना मानना होगा। ऊपरी मन से या सोच समझ कर जोड़ी गई रचनाएं, जिनमे लफ्फाजी है, आवेग नहीं। यह ईमानदारी की कमी के कारण नहीं है, विश्वास की कमी के कारण है। विश्वास की यह कमी, विश्वास किए जाने पर संदेह के कारण है। यह एक ऐसी सामाजिक त्रासदी है जिसे अपनी नीयत के प्रति हिंदुओं के मन में संदेह की संभावना से और अपने को सेक्युलर या मुसलमानों के प्रति संवेदनशील सिद्ध होने के लिए प्रयत्नशील हिंदुओं को झेलना पड़ता है। परंतु इस त्रासदी के पीछे व्यक्तियों या समुदायों से अधिक इतिहास की भूमिका है जिसे भुलाने की कोशिश की जाती है, फिर भी यह विश्वास नहीं पैदा हो पाता कि इसे मन से निकाला जा चुका है।

जब तक इकबाल सामाजिक सद्भाव कायम करने के लिए प्रयत्न कर रहे थे तब तक उनके मन में देश भक्ति के लिए स्थान था और यह विश्वास भी था कि हिंदुस्तान विविधताओं से भरा एक राष्ट्र है – हिंदी हैं हम वतन है हिंदुस्तान हमारा। हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलशितां हमारा। इसके बाद एक मोड़ आता है जिसके बाद राष्ट्र की परिभाषा बदल जाती है देश से लगाव जरूरी नहीं रह जाता। मोड़ को समझे बिना हम इकबाल के व्यक्तित्व, साहित्य और सरोकार में आए बदलाव को नहीं समझ सकते। उसी बदलाव का परिणाम था उनके प्रयत्न से जिन्ना की सोच में बदलाव आना।

परन्तु जिन्ना अपने दृष्टिकोण में आधुनिक हैं, इकबाल में इतना पिछड़ापन है कि वह कई बातों में सर सैयद से भी पिछड़े सिद्ध होते हैं।

Post – 2018-12-08

अल्लामा इकबाल -2

जब हम कहते हैं कि कवियों के विवेक पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो इसलिए कि वे अपने ज्ञान का भीअपनी भावना के लिए उपयोग करते हैं और उसके साथ छेड़छाड़ करते हैं। उदाहरण के लिए इकबाल की उस रचना का दृष्टांत दे सकते हैं जिसे भारत में राष्ट्रगान के बाद कौमी सदभाव के लिए सबसे प्रमुखता से गाया जाता है। इसमें वह कहते हैं मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, परंतु वह जानते हैं कि सामी मजहबों में दीगर मजहबों के लिए घृणा और बैर का भाव दूसरे मजहबों से अधिक प्रधान है।

धर्म के दो पक्ष हैं। एक का संबंध संगठन से है और दूसरे का धर्मदृष्टि से । पहला सत्ता का हिस्सा है इसलिए इसमें राजनीति प्रधान होती है।दूसरे का संबंध विश्वास से ज्ञान से है। जिसमें बैर भाव की जरूरत नहीं होती फिर भी पहले के प्रभाव से इसे भी कलह का क्षेत्र बना लिया जाता है। सामी मजहबों की बात अलग रखें। उनमें व्याप्त घृणा और धर्मयुद्धों का इतिहास सर्वविदित है। अपने देश में ही आस्था और विश्वास के इतिहास को देखें तो यहां भी वह वैर भाव अ्सहिष्णु रूप में मिल जाएगा।

इसका एक तर्क है। पहले के धर्मो और विश्वासों के रहते हुए या तो नए धर्म की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए, या यदि है तो इसलिए कि पहले कि धर्म और विश्वास अपर्याप्त है, इसलिए उनका सैद्धांतिक विरोध और यदि संभव तो बल प्रयोग से उनका दमन जरूरी हो जाता है।

असुर और देव, देवयाजी और अदेवयााजी, इंद्र में विश्वास करने वाले और अनींद्र के द्वंद्व से इसे समझा जा सकता है। भगवत गीता में श्री कृष्ण भी कहते हैं कि दूसरे सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ और मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिलाऊंगा – ‘सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि मा शुच।’ इसलिए यह कहना कि मजहब बैर रखना नहीं सिखाता है, सदाशयता का प्रकाशन तो हो सकता है परंतु सत्य नहीं।

इसीलिए, यूं तो सभी मजहब मानवतावाद की दुहाई देते हैं, परंतु मानवतावाद के लिए सबसे बड़ा संकट धर्मों के कारण ही पैदा होता है। धर्म इसके साथ ही सचाई पर पर्दा डालने का काम भी करता है और अत्याचार का कारण भी बनता है, फिर भी हम इसके भुलावे में आ जाया करते हैं, और अपने ही असली दुश्मन के औजार बनकर अपने ही मित्रों या सुख दुख के साथियों का अहित करते हैं, क्योंकि वे दूसरे धर्म से जुड़े होते हैं।

इकबाल इस बात का प्रभाव तो पैदा करते हैं कि उन्होंने धर्म का बहुत गहराई से अध्ययन किया है ( I lead no party; I follow no leader. I have given the best part of my life to a careful study of Islam, its law and polity, its culture, its history and its literature. ) परंतु हमारा विश्वास है कि यह अध्ययन धर्म विशेष की खूबियों को तलाशने और उसको उचित सिद्ध करने के लिए था, न कि धर्म की प्रकृति उसकी भूमिका, उसकी सामाजिक अतिजीविता की समस्याओं को समझने के लिए।
उनके अनुसार Every word of the Quran is brimful of light and joy of existence. इसे यदि धर्मांधता न कहें तो और क्या कह सकते हैं।

अंधापन जिस भी कारण से आए परिणाम एक ही होता है। हम यथार्थ को कम देख पाते हैं, कम समझ पाते हैं और इसकी क्षतिपूर्ति करते हुए अपने मनोगत को यथार्थ पर आरोपित कर देते हैं। कवि के साथ हम भाव मग्न हो सकते हैं, डूब सकते हैं, परंतु दुनिया को समझ नहीं सकते। संभव है मैं कवियों के साथ अन्याय कर रहा हूं, कुछ वैसा ही जैसा अफलातून ने किया था और कहा था कि कवियों को नगर राज्य से बहिष्कृत कर दिया जाना चाहिए ।

काव्य का सत्य हमारे दृष्टिगत यथार्थ से अधिक गहन होता है। हम सबको अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए कवियों के उद्गारों की सहायता लेनी पड़ती है, इसलिए उनके साथ कुछ रियायत तो करनी होती है परंतु अपनी बात को कहने के लिए वे जिन युक्तियों का सहारा लेते हैं वे इतने अतिरंजित, अन्योक्ति परक , या विचित्रतापरक होते हैं, कि एक ही कथन का अलग अलग व्यक्तियों और एक ही व्यक्ति के जीवन में अलग अलग संदर्भों में अलग अलग अर्थ हो जाया करते हैं। कवियों के कथन को अक्षरशः मानकर हम अनर्थ कर सकते हैं।

हमें उनका इरादा देखना होता है, उनसे संदेश ग्रहण करना होता है, परंतु उनके माध्यम से सत्य को देखना और समझना नहीं होता। वे स्वयं निःसंकोच सच्चाई को छिपाते भी हैं, बदलते भी हैं. और इसकी उपेक्षा भी करते हैं। इसलिए इकबाल की उसी कविता की एक दूसरी पंक्ति को याद करना उपयोगी होगा। ऐ आबरूदे गंगा वह दिन है याद तुझको, उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा। इसमें दो तरह से सचाई से अलग बात की गई है। हम जानते हैं कि भारत में आने वाले मुसलमान लुटेरों और हमलावरों के रूप में आते रहे थे, न कि व्यापारियों के रूप में। क्रूर यथार्थ पर पर्दा डाल कर बच्चों को बहलाया जा सकता है, परंतु यथार्थ से परिचित लोगों के बीच सद्भावना नहीं पैदा की जा सकती। आक्रमणकारी जिस नदी के पास सबसे पहले पहुंचते थे,वह गंगा नहीं, सिंध नद हुआ करता था। ऐसा नहीं है कि इकबाल इससे परिचित न हों। यह कवि की जरूरत है, पर हमारी जरूरत नहीं।

सचाई पर पर्दा डालने के कारण उनके सद्भावना पूर्ण लेखन में भी आडंबर दिखाई देता है, कवि की सच्ची भावना नहीं। राम, कृष्ण, बुद्ध आदि पर भी लिखी गई उनकी कविताओं में वह सिंसियरिटी नहीं है, वह प्रवाह और आवेग भी नहीं है, जिसके कारण उनका महत्त्व है। हमारा तात्पर्य यह है कि इकबाल को कवि के रूप में ही पढ़ा जाए विचारक या राजनीतिक आंदोलनकारी के रूप में नहीं।

Post – 2018-12-07

अल्लामा इकबाल और इस्लाम (1)
‘तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन’ (इकबाल)

इकबाल कवि थे। उनका अध्ययन विशद था। कवि जब गद्य लिखता है तो वह गद्य नहीं होता, वह कवि का गद्य होता है। उसमें सौष्ठव होता है, संवेद्यता होती है, आवेग होता है। गद्य का खुरदरापन और विचार की आप्तता नहीं होती। गद्य की किसी विधा में लिखता है तो उस विधा में लिखने वालों की तरह नहीं लिखता। वह उसकी उस विधा में कविरचित रचना होती है। इसकी ओर पहली बार मेरा ध्यान सर्वेश्वर और मुक्तिबोध की कहानियां पढ़ते हुए गया था और उसके बाद दूसरे कवियों के गद्यलेखन और वक्तव्यों की ओर गया। व्याख्यान, संवाद, यहां तक कि दैनंदिन का उसका व्यवहार, सब में कवित्व होता है, भले हम इस विषय में सचेत हों या नहीं। यह उनका चुनाव नहीं होता। अपनी ओर से वह दूसरों जैसा ही रहना चाहता है। प्रायः वह सचेत भी नहीं होता कि वह दूसरों जैसा करना चाहते हुए भी वैसा कर नहीं पा रहा है।

कवि होना प्रयास से जुड़ा मामला नहीं है मिजाज से जुड़ा सवाल है, जिसे हम प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा कहा करते हैं। हम अपनी चमड़ी को जरूरत के अनुसार पोशाक की तरह नहीं बदल सकते।

कवि भावुक होता है। उसके पास आग होती है जो पिघल कर बह सकती है पर रोशनी नहीं दे सकती। कवियों को पढ़ते या सुनते हुए हम उनकी मनो भूमि में पहुंच सकते हैं परंतु उन क्षणों में, न वह अपने दिमाग से काम लेता है न हम अपने दिमाग से काम लेते हैं। भाव जगत का एकात्म्य हमें तन्मय कर देता है, हम खो जाते हैं। एक ऐसे आनंद लोक में पहुंच जाते हैं जिसकी तुलना उस आनंद से की गई है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि वह विचारातीत होता है। परंतु इसी सीमा के कारण हम विचार के मामले में उस पर भरोसा नहीं कर सकते। वह लक्ष्य हीन बहा तो सकता हो सकता है, परंतु किसी सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचा नहीं सकता।

उदय प्रकाश मेरे कवियों में प्रिय लोगों की तालिका में आते हैं उनकी कहानियां कविता हैं और पाठक को अभिभूत कर देती हैं। वह मानते हैं उनकी मूल प्रकृति कवि की है। आज से लगभग15 वर्ष पहले एक आत्मीय बातचीत में मैंने विचार के मामले में कवियों की अविश्वसनीयता का जिक्र करते हुए, संयोगवश अल्लामा इकबाल का नाम लिया था। आज उसे दोहराना पड़ रहा है।

इकबाल के साथ एक और सीमा थी। उसके विषय में भी मैं फेसबुक पर यह लिख चुका हूं कि धर्मांतरित हिंदुओं को अपने को हर कदम पर सच्चा मुसलमान साबित करना होता है जिसकी जरूरत विदेशी मूल के मुसलमानों को नहीं पड़ती, या कम पड़ती है।

संजय ने अपने पिता से एक संवाद में कहा था कि पापा मेरी रगों मे मुसलमान का खून भी है और तमाम मुसलमानों के होते हुए अपने को किसी से कम मुसलमान न सिद्ध करने की ललक में ऐसे हथियार उसी को रखने पड़े जिनके लिए उसे दंड भी भोगना पड़ा और पैसे के प्रवाह से रियायतें भी मिली।

इस दूसरे कारण से भी न तो मैं सही विचारदृष्टि के मामले में मोहम्मद अली जिन्ना पर विश्वास करता हूं न ही अल्लामा इकबाल पर। परंतु इनकी ऐतिहासिक भूमिका की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती।

यह एक सच्चाई है कि मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस से निराश होने के बाद राजनीति से विमुख होकर इंग्लैंड में जा बसे थे। उन्हें मना कर मुस्लिम लीग का नेतृत्व संभालने के लिए जिस व्यक्ति ने राजी किया था उसका नाम अल्लामा इकबाल है और इस बात को जिन्ना आभार पूर्वक स्वीकार करते थे।

अपने 1938 के एक व्याख्यान में अल्लामा इकबाल ने उनके बारे में जो कुछ कहा था वह निम्न प्रकार हैः
“केवल एक ही रास्ता है। मुसलमानों को जिन्ना के हाथों को मजबूत करना चाहिए। उन्हें मुस्लिम लीग में शामिल होना चाहिए। भारत की आज़ादी का प्रश्न, जैसा कि अब हल किया जा रहा है, हिंदुओं और अंग्रेजी दोनों के खिलाफ हमारे संयुक्त मोर्चे द्वारा काउंटर किया जा सकता है। इसके बिना, हमारी मांगों को स्वीकार नहीं किया जाएगा । लोग कहते हैं कि हमारी मांग सांप्रदायिक है। यह मिथ्या प्रचार है। ये मांगें हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व की रक्षा से संबंधित हैं …. संयुक्त मोर्चा मुस्लिम लीग के नेतृत्व में गठित किया जा सकता है। और मुस्लिम लीग केवल जिन्ना के कारण सफल हो सकता है। अब जिन्ना ही मुसलमानों की अगुआई करने में सक्षम है।- मुहम्मद इकबाल, १९३८

Post – 2018-12-06

मेरे होने से सारी कुदरत है
न रहा मैं तो कुछ नहीं होगा।
बात यह सच है, मुझसे पहले भी
किसी शायर ने यह कहा होगा।।

Post – 2018-12-05

मैने आगे जोड़ा, “एक अन्य मित्र हैं, जिन्होंने 19वीं शताब्दी में हिंदी को लेकर हुई खींचतान का विवेचन करते हुए यह नतीजा निकाला कि नागरी लिपि की वकालत करने वाले भारतेंदु और दूसरे लोग सांप्रदायिक थे और अरबी लिपि और फारसी अरबी बोझिल उर्दू (शरीफों की जबान) के प्रचलन की वकालत करने वाले सर सैयद अहमद खान सेक्युलर।”

“अरे यार, तुम यह क्यों नहीं देखते कि भारतीय बुद्धिजीवियों – अध्यापकों, पत्रकारों, लेखकों में से भी अधिकांश की राय इसी से मिलती जुलती है। उनके बीच समझदार माने जाने की अनिवार्य शर्त है कि आप उनके निष्कर्ष से सहमत हैं। वे सोचते हैं, जिस आदमी की समझ में इतनी मोटी बात न आती हो कि हमारी दशा दूसरे समाजों से अधिक बुरी है, और इस समाज का बहुसंख्यक हिंदू है, इसलिए उसके बुरा हुए बिना यह संभव नहीं, उससे अधिक नासमझ कौन हो सकता है। यदि वह नासमझ नहीं है, तो पाखंडी है। ऐसे लोगों से संपर्क रखना, उनकी बातें सुनना, या संवाद करना तक गुनाह है। बौद्धिक अस्पृश्यता का यह नया संस्करण भारतीय सेकुलरिज्म की एकमात्र उपलब्धि है।”

मैं सहमत हो गया, “तुम ठीक कहते हो। बौद्धिक जगत में स्वयंसिद्धि का रूप ले चुके इन विचारों से मेल खाती कोई जानकारी है तो ही वह प्रामाणिक हो सकती है। अनमेल है तो वह विद्वान, ज्ञान की वह शाखा, सूचना का वह माध्यम, वह अनुसंधान, वे प्रमाण सभी संदिग्ध हैं। उदाहरण के लिए पुरातत्व हिन्दुत्ववादी है, जनगणना के वे आंकड़े जिनसे यह सिद्ध होता है कि आबादी में मुसलमानों की जन्म दर में होने वाली वृद्धि दूसरे समुदायों की तुलना में अधिक है वह हिंदू संप्रदायवादियों का दुष्प्रचार है। हिंदू संप्रदायवाद कितनी तेजी से बढ़ता हुआ संस्थाओं में भी प्रवेश करता जा रहा है इसका यह प्रमाण है। कोई दूसरा चारा न होने पर यदि मान लें कि वह सही है, तो भी उसे सही मानना हिंदुत्ववादियों के हाथ में खेलने जैसा है, इसलिए जो अकाट्य है, वह भी, सच होकर भी, मान्य नहीं है। सजदावादी बौद्धिकता का ऐसा नमूना विश्व इतिहास में ढूंढ़े न मिलेगा।

“हमारे शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसकी पैतृकता हिंदू है, परंतु वह अपने को हिंदू कहने में लज्जित अनुभव करता है। इसकी प्रतिक्रिया यह है कि हिंदुत्व की रक्षा के लिए चिंतित नेता हिंदुओं से अपने को गर्व से हिन्दू कहने को कहता है, और उपहास का पात्र बनता है। बनना भी चाहिए। वह यह तक नहीं जानता कि अपने को गर्व से हिंदू या मुसलमान कहने का मुहावरा किसका है? वे यह भी नहीं जानते कि इसका इस्तेमाल जिन्ना ने अपने मुसलमान होने के सन्दर्भ में किया था। वह सच्चा मुसलमान होने की कसौटी खरे नहीं उतरते थे, पोर्क से उन्हें परहेज न था। इसलिए अपने को गर्व से मुसलमान कहना उनकी जरूरत हो सकती थी । गांधी को चुनौती देते हैं कि जैसे वह गर्व से अपने को मुसलमान कहते थे, उसी तरह गर्व से वह अपने को हिंदू क्यों नहीं कहते। गांधी ने कभी अपने हिंदू होने की बात को छिपाया नहीं । राम राज्य की बात तो वह पहले से ही करते आए थे। जिन्ना का उद्देश्य कांग्रेस को हिंदू संगठन सिद्ध करने का था, न कि हिंदू या मुसलमान होने पर गर्व करने का।

“स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से आज तक हमारी मुख्य समस्या शैक्षिक और आर्थिक विकास की न रह कर सामाजिक मेलजोल की बनी रही है। आज इसकी मांग इतनी बढ़ गई है कि कुछ लोगों को लगता है कि जब तक इसका समाधान नहीं हो जाता दूसरी समस्याएं रुकी रहें। वे छोटी से छोटी घटना को एक सुर से इतना विस्फोटक बना देते हैं कि अधिक जरूरी समस्याओं की ओर ध्यान ही नहीं जाता। केवल भाव तेजी से बढ़ने पर महंगाई, अराजकता बढ़ने पर शांति और व्यवस्था, चुनाव आने पर रोजी-रोजगार को समस्या बनाया जाता है। इकहत्तर वर्षों के इस वर्णांध अभियान में समस्या का समाधान निकालने की कोशिशों के साथ हम गलत दीवारों से टकराते हुए समाधान के नाम पर भी अपना सर ही फोड़ते रहे हैं।

“हम भी यही कर रहे हैं इस पर सोचना होगा। इस पर बहस की जरूरत नहीं है। बहस का कोई मतलब तक नहीं रह गया है। सभी के पास समझाने को बहुत कुछ है, समझने को कुछ नहीं। विचार इतने ठोस हो चुके हैं, कि उन्हे पत्थर की तरह चला कर विरोधी का सिर फोड़ा जा सकता है, पर समझाया नहीं जा सकता। कुछ भी लिखो, न कोई ध्यान देने वाला है, न कोई अंतर आने वाला है । हां, तुम्हारे नाम से एक और किताब अवश्य तैयार हो जाएगी। और कुछ नहीं होने वाला।”

“मेरी समझ इससे ठीक उल्टी है । हमने लंबे समय तक आंदोलन करते हुए बौद्धिक निर्वात पैदा कर लिया है जिसमें प्रतिबद्धताओं के खूंटे दिखाई देते हैं, विचारों की प्राणवायु नहीं। हमने संप्रदायों की राजनीति की है, उनको समझने या उनका विश्लेषण करने का प्रयत्न नहीं किया। हमारे आंदोलन में ही एक तरह का कामचलाऊपन था। इसके कारण ही विकृतियां पहले से अधिक उग्र हुई हैं। गांधी जी ने सिर्फ एक अवसर पर छात्रों की राजनीतिक भागीदारी की अपेक्षा की थी आज छात्रों के लिए पढ़ने की जगह राजनीति करना अधिक जरूरी हो गया है। समझदार कहे जाने वाले अध्यापकों का भी मानना है कि छात्रों को कूप मंडूक बनने से बचाने के लिए उनको राजनीति में झोंकना जरूरी है ।”

वह मुझसे सहमत न था, “लोकतंत्र में सबको मताधिकार मिला है इसलिए इसकी जिम्मेदारी को समझने के लिए राजनीतिक चेतना और शिक्षा जरूरी है। सच कहो तो राजनीति की समझ, उसकी जिम्मेदारी का बोध राजनीतिज्ञों तक में नहीं है, क्योंकि उन्हें इसकी शिक्षा मिली ही नहीं।”

“छात्रों को शिक्षित नहीं किया जा रहा है, उनका राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसी राजनीति ऊंची शैक्षिक योग्यता के अभाव में अधिक सफलता से की जा सकती है। सबसे बड़ी राजनीति है अपने को समर्थ बनाना, और यह अपने विषय के आधिकारिक ज्ञान से ही संभव है। राजनीति का दूसरा काम है यदि स्वतंत्र नहीं हैं तो स्वतंत्रता प्राप्त करना, यदि स्वतंत्र हो चुके हैं तो उसकी रक्षा करना। हम पांवों की बेड़ियां तोड़ चुके हैं, पर दिमाग की बेड़ियां पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई हैं। बौद्धिक परजीविता के चलते हम बौद्धिक विकलांगता के शिकार हो चुके हैं जिसमें हमारे संवेदी तंतु तक इतने कुंद हो चुके हैं कि विकलांगता को विकलांगता नहीं मानते, अपनी उपलब्धि मानते हैं। हमें गहराई में उतर कर इस बात की पड़ताल करनी होगी कि शिक्षा का हुड़दंगीकरण किसी साजिश के तहत तो नहीं किया जा रहा है? इस गिरावट का वास्तविक आधार क्या है?”

”तुम इतनी सारी समस्याओं का निपटारा करने जा रहे हो तो नाम भी उसी जैसा धाकड़ होना चाहिए था। खैर, यह भी भारतीय परंपरा में खप जाएगा। यहां तो गजानन की सवारी चूहा है, यह विद्रूप तक किसी को हैरान नहीं करता।”

मैंने उसकी फिकरेबाजी पर ध्यान नहीं दिया, “सबसे पहले हम उस निष्कर्ष को सही मानकर उसका परिणाम देखें जिसका कई रूपों में प्रचार किया जाता रहा कि सारा दोष हिंदुओं का है। यदि यह हिंदू के कारण है तो इसका एक आसान उपाय यह है कि भारत को हिंदू या हिंदूबहुलता से मुक्त कर दिया जाए। परिणाम क्या होगा ? हमारी दशा बांग्लादेश या पाकिस्तान जैसी हो जाएगी। परंतु तब वे भी कहेंगे कि हिंदुओं के न होने या अल्पसंख्यक होने के कारण भारत की दशा पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसी होती जा रही है।”

वह चुप रहा।

“अर्थात् वे भी मानते हैं कि इन देशों की दशा भारत की तुलना में बहुत बुरी है और अपने काल्पनिक प्रयोग में हमने पाया हिंदू को हटाते ही या उसके अल्पसंख्यक होते ही ही हमारी दशा उन देशों जैसी हो जाएगी जिनसे देश को बचाने की चिंता उनको भी है। वे भी मानते हैं यदि भारत की दशा वैसी नहीं है तो इसका एकमात्र कारण यह है कि यहां हिंदू बहुमत में है।

“हमारा ध्यान इस तथ्य की ओर गए बिना भी नहीं रह सकता कि इस श्रेणी में आने वाले वाचाल लोगों में अधिकांश प्रसादग्राही रहे हैं, अथवा इसकी जुगत में रहे हैं। उन पर अधिकस्य अधिकं फलं का नियम भी लागू होता है, जो उनके उत्साह को कायम और आवाज़ को बुलंद रखने में सहायक रहा है। हम उनके निर्णय को मानने पर भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हमारी समस्याएं उल्टी सोच के कारण हैं। इसके ही कारण मुस्लिम समाज में असंख्य विकृतियों के होते हुए भी यह मानसिकता पैदा हुई है कि वे विकृतियां नहीं धर्माचार हैं और मुस्लिम कट्टरपंथी को यह प्रमाणपत्र मिल जाता है कि हिंदू बुद्धिजीवी भी उन्हें विकृति नहीं मानते और स्वीकार करते हैं कि सारी विकृतियां हिंदू समाज में हैं।

भारत पर तलवार से आक्रमण करके मुसलमानों को उतनी बड़ी विजय कभी न मिली जितना बड़ी विजय स्वतंत्र भारत में प्रसादग्राहियों के कारण मिली है। हिन्दू यशप्रार्थियों को सेक्युलर का प्रमाणपत्र वह बांटता या वापस लेता है जो हिंदू नहीं है। सेक्युलर छवि को बचाने को चिन्तित मित्र कुछ भी कहने या लिखने से पहले यह सोचते हैं कि उसके परिचित मुस्लिम मित्रों की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। अर्थात् वह उनका conscience keeper बन चुका है।

कुछ मुसलमान भारत में बाहर से आए, शासन किया यह इतिहास का सच है परन्तु यह भारतीय मुसलमान स्वतंत्र भारत के प्रसादग्राहियों, सहमकर सोचने वालों और समवेत आतंक के आगे घुटने टेकने वालों की रचना है जो कट्टर इस्लामी देशों मे आए सुधारों का भी विरोध करता है।