Post – 2020-03-02

पन्द्रह (ग)

भारत की एक खोज गांधी ने भी की थी पर यह खोज न होकर भारत को अधिक गहराई से समझने का प्रयत्न था। इसके लिए उन्हें गोपालकृष्ण गोखले ने प्रेरित किया था। एक साल के इस भारत दर्शन ने, भारत की विपन्नता का जो साक्षात्कार कराया उसने उसने उनको किस तरह उद्वेलित किया था इसका अनुमान करना कठिन है, परन्तु बिहार के कुछ नेताओं ने आग्रह पर निलहे अंग्रेज जमींदारों के अत्याचार को अपनी आँखों देखने और कुछ करने का आग्रह किया तो चंपारन पहुँचने पर उनकी दृष्टि में जो परिवर्तन हुआ उसने उन्हें महात्मा बना दिया। मेरा काफी समय कल की पोस्ट पर प्रतिवाद में नष्ट हो गया इसलिए रुचिरा गुप्ता के कथन को जिसे मैं मोटे तौर पर सही पाता हूँ कट पेस्ट करके अपना काम आसान बनाना चाहूँगा, “गांधी जी जब चंपारण पहुंचे तब वो कठियावाड़ी पोशाक पहने हुए थे. इसमें ऊपर एक शर्ट, नीचे एक धोती, एक घड़ी, एक सफेद गमछा, चमड़े का जूता और एक टोपी थी …जब गांधी जी ने सुना कि नील फैक्ट्रियों के मालिक निम्न जाति के औरतों और मर्दों को जूते नहीं पहनने देते हैं तो उन्होंने तुरंत जूते पहनने बंद कर दिए…..8 नवंबर 1917 को गांधीजी ने सत्याग्रह का दूसरा चरण शुरू किया था. वो अपने साथ काम कर रहे कार्यकर्ताओं को लेकर चंपारण पहुंचें. इनमें से छह महिलाएं थीं. अवंतिका बाई, उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी, मनीबाई पारीख, आनंदीबाई, श्रीयुत दिवाकर (वीमेंस यूनिवर्सिटी ऑफ़ पूना की रजिस्ट्रार) का नाम इन महिलाओं में शामिल था. इन लोगों ने तीन स्कूल यहां शुरू किए. हिंदी और उर्दू में उन्हें लड़कियों और औरतों की पढ़ाई शुरू हुई. इसके साथ-साथ खेती और बुनाई का काम भी उन्हें सिखाया गया. लोगों को कुंओं और नालियों को साफ-सुथरा रखने के लिए प्रशिक्षित किया गया. गांव की सड़कों को भी सबने मिलकर साफ किया.”
हम उस इतिहास में न जाएँगे कि उनके इस प्रयोग का क्या हुआ, वे अपनी संस्थाओं को कितने समय तक चला सके। पर यह एक ऐसा मोड़ है जहाँ से अपने औसत हिस्से में आने वाले वस्त्र पर गुजर करने वाले, पाशविक अवस्था में पड़े भारतीय बनाना, उसमें शुचिता, आरोग्य, साक्षरता, आत्मावलंबन और मुक्ति गांधी का सपना था, सत्ता पर कब्जा करना दूसरों का। आजाद शब्द का प्रयोग गांधी ने शायद ही कभी किया हो, परंतु आजादी की कल्पना – दोहिक, दैविक और भौतिक दुखों, पारस्परिक कलह से मुक्त भारतीय समाज को शासनाधिकार मिले यही उनकी नजर मे भारत की स्वतंत्रता थी। यह अन्त्योदय से आरंभ होती थी। इसकी समझ किसी अन्य के पास न थीं। यही गाँधी, नेहरू तथा कम्युनिस्टों उनका अंतर था।

Post – 2020-03-01

पन्द्रह(क)

नेहरू जी जेल की बोरियत कम करने के लिए किताबों में भारत की खोज कर रहे थे। किताबों में देश और समाज नहीं मिलता, उनके विषय में कुछ सूचनाएँ मिलती हैं जो सही हों यह जरूरी नहीं। औपनिवेशिक जरूरतों के चलते भारत के इतिहास का जातक ही बिगाड़ दिया गया था और इतिहास के नाम पर किसी दूसरे स्रोत का उन्हें ज्ञान न था, यदि होता तो उस पर उन्हें भरोसा नहीं हो सकता था।

विलायती शिक्षा-प्राप्त व्यक्ति उस नकली इतिहास को सच मानता था जिसमें भारत का सब कुछ – लोग, भाषा, सभ्यता के औजार सभी पाँच हजार साल के भीतर ही बाहर से आया था। भारतीय समाज उतने ही नकली पुराण को अपना सच मानता था, जिसमें सृष्टि के आदि से भारतीय मनुष्य अपने समस्त सांस्कृतिक दाय के साथ इसी में बसा हुआ है और यहीं से पूरी दुनिया में फैला है।

भारत की खोज भारत का भौगोलिक सर्वेक्षण नहीं हो सकता था। यह भारतीय समाज के मानस की ही खोज हो सकती थी जिससे रागात्मक तादात्म्य स्थापित करने के बाद उसकी शक्तियों और सीमाओं की सही समझ रखते हुए उसकी ऊर्जा को एकदिश करते हुए किसी लक्ष्य की प्राप्ति में उसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जा सकता था।

उन्होंने जिस भारत को खोजा वह पश्चिमी जगत द्वारा खोजे और गढ़े हुए का परिचय मात्र था जिससे वह भारत को नहीं समझ सकते थे; भारत को विलायती भारतविद क्या समझता है, इसे अवश्य जान सकते थे और यही समझ पाए। वह न भारत को खोज सके, न भारत को पा सके और इसलिए इसके बाद के स्वतंत्रता आंदोलन में न तो इतिहास की उनकी समझ का उपयोग दिखाई देता है, भारतीयों के साथ बाद के उनके व्यवहार में इसी का आभास मिलता है। वह आजीवन भारतीयों के साथ अंग्रेज हाकिमों की तरह पेश आते रहे और जिस सतह पर थे उससे नीचे झाँकने की जगह ऊपर उड़ान भरने की सोचते रहे। इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है।

कांग्रेसियों के बीच उन्हें समाजवादी तो लगभग सभी मानते थे, परन्तु हैरानी की बात है कि बिहार में जमीदारी उन्मूलन का प्रस्ताव रखने पर उन्होंने झिड़कते हुए बेनीपुरी जी को चुप करा दिया था। चौधरी चरण सिंह की दृढ़ता थी जिससे उत्तर प्रदेश में जमींदारी ‘उन्मूलन’ संभव हुआ।

वर्णवाद को कमजोर करने के लिए चरण ने यह सुझाव रखा था कि यदि कोई सवर्ण अस्पृश्य वर्ण से विवाह संबंध बनाए तो उसे सरकारी नौकरियों में विशेष रियायत दी जानी चाहिए। चरण सिंह के लिए यह खोखला सुझाव न था, उन्होंने इस पर अमल किया था, परंतु नेहरूजी ने बिहार के जमींदारी उन्मूलन की तरह इसे भी झिड़क कर किनारे कर दिया था कि प्रेम और विवाह जैसे संवेदनशील संबंध को इतना यांत्रिक नहीं बनाया जा सकता। आदर्श सही है, यथार्थ इस पर भारी पड़ता था, क्योंकि विवाह संबंध में जाति, वर्ण, गोत्र के साथ दहेज अधिक निर्णायक हुआ करता था। भाषावार राज्यों का गठन हो गया, पर नेहरू जी के जीवन काल में किसी भी राज्य में उसकी भाषा में काम करने की छूट न दी गई कि इस दशा में केन्द्रीय भाषा के रूप में हिंदी को आने से नहीं रोका जा सकेगा।

वह अपने धेवते को वह उद्योगपति बनाना चाहते थे और छोटी कार के उत्पादन की योजना को उसके इंजीनियर बन कर लौटने तक लटकाते जा रहे थे जिसका लोहिया ने इशारा करते हुए उपहास भी किया था। लोहिया जी इस पर भी तंज कसने के बाज न आते थे, परंतु अपने लक्ष्य की ओर उनकी प्रत्येक चाल शतरंज की गोटों जैसी दूर की सोच से निर्देशित होती थी। वंशाधिकार में विजय लक्ष्मी सशक्त प्रतिस्पर्धी न बन सकें इसलिए उन्हे लगातार राजदूत बना कर रखा।

नेहरू के पूरे जीवन को देखें ता यह चित्रवत सामने आ जाएगा कि वह त्यागने और गँवाने की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे और इसका ध्यान रखते हुए ही हम इस नतीजे पर पहुँचे थे कि स्वतंत्रता आंदोलन में पूरे परिवार की प्रतीकात्मक भागीदारी शासनाधिकार की योजना के साथ किया गया ‘विनिवेश’ था जिसकी सचाई उसकी चकाचौंध में लक्ष्य नहीं की जा सकती थी। इतिहास का व्यंग्य कि उनकी योजना ठीक उनकी चाहत के अनुसार घटित नहीं हुई परन्तु यह बात किसी से छिपी न थी कि वह अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसे तैयार कर रहे थे।

Post – 2020-02-29

पन्द्रह
भारत की खोज

सामान्यतः हम कई तरह के भ्रमों के शिकार रहते है। हम मानते हैं कि हम अपने को और अपने से जुड़ी हर चीज – अपना परिवार, परिवेश, देश, भाषा, संस्कृति, इतिहास – को किसी अन्य की तुलना में अधिक अच्छी तरह जानते हैं और इनके विषय में अधिकार पूर्वक बात कर सकते हैं, पर ऐसे अवसर भी आते हैं जब हमें पता चलता है कि कुछ मामलों में हम अपने को दूसरों से भी कम जानते है।

केवल इतर की नहीं स्व की खोज भी, अपने को जानना, अपने को पाने और इतर से जो कुछ लभ्य है उसको पाने और सुपाच्य बना कर अपनी ऊर्जा को अक्षय बनाने का एकमात्र उपाय है। इसके अभाव में अपने और अपनों के विषय में हमारा ज्ञान सतही और कामचलाऊ होता है। हमें यह तक पता नहीं हो पाता कि भविष्य की हमारी दिशा क्या हो सकती है।

इसलिए अन्य जरूरी कामों की तरह अपने को खोजने का समय अवश्य निकालना चाहिए, क्योंकि खोजना अपने को पाने का भी पर्याय है। स्व हो या पर, हम जिस सीमा तक इसे जानते हैं उसी के भीतर अपने लिए कुछ पा भी सकते हैं। उस पाने के साथ नई जिज्ञासा और खोज की नई दिशाएँ खुलती हैं और उन तक पहुँचने की प्रविधियों और युक्तियों का आविष्कार होता है। ये सभी एक-दूजे-पर-निर्भर या अन्योन्याश्रित प्रक्रियाएँ हैं। इसकी आदत पड़ जाने पर, इससे अधिक आकर्षक दूसरा कोई मनोरंजन नहीं रह जाता।

बहुत प्राचीन काल से भारत अपनी उपलब्धियों के कारण सभ्यता की दिशा में किन्हीं भी कारणों से अग्रसर समाजों के लिए रहस्यमय देश बना रहा है और अपना कुतूहल शांत करने के लिए उन देशों के कतिपय साहसी जन भारत आते रहे हैं जिनमें से केवल कुछ के विवरण हमें आज उपलब्ध हैं, जब कि भारत से बाहर जाने वालों के लिखे उन देशों के विषय में हमें कोई जानकारी नहीं मिलती, या मिलती है तो ठीक उस भाषा में जिसमें ईसाई मिशनरियों द्वारा गैर-ईसाई देशों और समाजों का वर्णन मिलता रहा है। बाह्य जगत के विषय में जिज्ञासा और पहल का अभाव गौरव का नहीं ग्लानि का विषय है, परंतु यह एक ऐसा रोग है जो अपनी असाधारण सफलता के बाद नशे की तरह सभी सभ्यताओं के भीतर दिखाई देता है- अन्यथा ब्रिटेन और अमेरिका ने आज के चुनौती भरे व्यस्त समय में दाशमिक प्रणाली अपना ली होती।

पर एक दौर ऐसा भी था जब वे दावा करते थे कि दुनिया के ऐसे अगम्य स्थलों पर पहुँच कर जहाँ उनसे पहले कोई न पहुँचा था (विश्वा धामानि अमिता मिमाना) उन्होंने अपने जनों के लिए बस्तियाँ बसाई हैं (स्वां प्रजां बृुदुक्थो महित्वा आवरेषु अदधात् आ परेषु।) वही भारतीय सभ्यता का चरम उत्कर्ष काल है।

परंतु यहाँ हम जिन तीन खोजों की बात कर रहे हैं, उनमें पहली है वास्को-डि-गामा द्वारा भारत पहुँचने के मार्ग की खोज; दूसरा गांधी द्वारा भारतीय अवस्था की खोज और तीसरा नेहरू द्वारा दो हजार साल से कुछ पीछे जाकर शांति का अग्रदूत बनने की खोज।
(जारी)

Post – 2020-02-28

धुँए से रोशनी पैदा अगर होती तो अच्छा था
परेशानी हमारी कारगर होती तो अच्छा था।
बँटे हैं, और टूटे हैं, तभी जब जुड़ना चाहा है,
हकीकत है, मगर इसकी खबर होती तो अच्छा था।
‘हमारा घर तुम्हारे भी लिए है फूँकने वालो’,
सुखन-तकिए की हद की भी समझ होती तो अच्छा था।
बहुत अच्छा था, देखे पर, सुने पर, हम यकीं करते
यह तकरीरों की महफिल मुख्तसर होती तो अच्छा था।
सभी को है समझ दिल था वहाँ से हट गया सा है
फटा कितना है, कैसे, किस कदर होती तो अच्छा था।।

Post – 2020-02-28

धुँए से रोशनी पैदा अगर होती तो अच्छा था
परेशानी हमारी कारगर होती तो अच्छा था।
बँटे हैं, और टूटे हैं, तभी जब जुड़ना चाहा है,
हकीकत है, मगर इसकी खबर होती तो अच्छा था।

Post – 2020-02-27

चौदह

कम्युनिस्ट पार्टी के विषय में मेरी जानकारी बहुत अच्छी नहीं, इसलिए तथ्यों में छोटी-मोटी गलतियाँ हो सकती हैं, उदाहरण के लिए बी.टी.आर. के विषय में यह तथ्य छूट गया कि 1954 में उन्हें दुबारा केंद्रीय समिति में ले लिया गया था और बाद के अनेक निर्णायक अवसरों पर जिनमें 1962 में पार्टी का विभाजन भी था, उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। प्रवृत्ति के आकलन के मामले में मुझ पर भरोसा किया जा सकता है। अनेक बार ‘रहस्यमय’ कारणों से आजीवन पार्टी के हित में काम करने वालों का अपमान, विश्वासघात और नेस्तनाबूदीकरण के बाद भी मार्क्सवाद में भुक्तभोगियों की आस्था का बना रह जाना, विस्मित करता है। शिकायत पार्टी में निर्णायक पदों पर आसीन लोगों से भले बनी रहे, पर निजी सोच-विचार में वामपंथिता ही बनी नहीं रहती है, अपितु जिन विचारों और पद्धतियों के प्रति उस दौर में नफरत सी पैदा कर दी गई थी, उनसे नफरत पर काबू पा भी लिया जाय तो भी, परहेज सा बना रहता है।

ऊपरी साझेदारी और दलगत निष्ठा के बाद भी, कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में अंदरूनी कलह लगातार बना रहा है। इस खास अर्थ में उसकी हिंसा के शिकार केवल वर्गशत्रु ही नहीं रहे हैं, अपितु अपने सहचर और सहयोगी भी रहे हैं। मात्र किसी एक मामले में असहमति के कारण, कल तक कंधे से कंधा मिला कर चलने वाला मित्र इतना जघन्य कैसे हो जाता है कि दोनों में किसी भी जुगत से अधिक ताकतवर ही सही रह जाता है, परंतु यह सही होकर भी इतना आशंकित रहता है कि दूसरे को मिटाए बिना निश्चिंत नहीं रह सकता।

कहने के लिए कम्युनिज्म मानव गरिमा की उच्चतम अवस्था है, परंतु नेतृत्व की इस असहिष्णुता के कारण पशु-जगत का, यूथपति बने रहने या उसे अपदस्थ करके प्राणान्तक द्वन्द्व से विजेता बन कर उसे पलायन के लिए विवश करने और यूथ की समस्त मादाओं पर एकाधिकार करने का संघर्ष याद आ जाता है। यहां भी यह सोच कर हैरानी होती है कि यूथबद्ध पशुओं का व्यवहार कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व की तुलना में कम गर्हित है, क्योंकि पराजय स्वीकार करने वाले पहले के यूथपति का भौतिक या नैतिक प्राणघात नहीं किया जाता। कुछ दूर तक कम्युनिस्ट दलों का व्यवहार वैचारिक चुनौती की आशंका से मार्जार वत्स के वध की याद दिलाता है, इसलिए दलगत प्रतिबद्धता पर गर्व करने वाले मित्रों पर मैं भीतर से बहुत विचलित अनुभव करता रहा हूँ। स्वतः अपने चुनाव से अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता और सर्जनात्मक ऊर्जा का समर्पण करने वाले मानव ड्रोन किसका भला कर सकते हैं, जब कि वे अपने रक्षणीय की रक्षा नहीं कर पाते?

आत्मविसर्जन की यह बाध्यता भूमिगत, संकटकालीन अवस्थाओं की देन हैं, जिसकी अपरिहार्यता का तर्क दिया जा सकता है, परंतु है यह आत्मनिषेध की अवस्था। तेलंगाना संघर्ष के दौर का चित्रण करते हुए राज ने लिखा है कि उस समय एक ओर तो नेताओं को बड़े पैमाने पर जेल में भर दिया गया था, इससे बचे वे ही रह गए थे जो भूमिगत हो गए थे, पार्टी के पत्र प्रतिबंधित थे। किसी से कोई सवाल इसलिए नहीं पूछा जा सकता था कि ऐसा करते हुए अनजाने में ही कहीं कोई ऐसी बात न निकल आए जिससे किसी दूसरे का जीवन संकट में पड़ जाए। किसी न किसी कदर आपको अपनी सभी ज्ञानेन्द्रयों सेे छुटकारा पाना होता था, उन्हें इस तरह छिपा कर रखना होता था जिससे वे आपको बेचैन न कर सकें। आपकी आँखें कहने को हैं पर आप कुछ देख नहीं सकते, कान हैं, पर सुन नहीं सकते, दिमाग है पर जो घुट्टी पिला दी गई है उससे अलग कुछ सोच नहीं सकते। इस रोबोटीकरण ने इतनी तकनीकी अग्रता क्यों हासिल कर ली, जब कि हमारी जरूरत सिर्फ इतनी सी थी कि हम दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों मे से किसी से भी सलाह ले सकते थे।[1]

होना यह चाहिए कि इसको किसी भी अवस्था में व्यवहार्य न मान कर अधिक निरापद तरीके अपनाए जाएँ, परंतु जब कम्युनिस्ट पार्टियों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को स्वीकार कर लिया, जिसका उन्हें लाभ भी मिला, उसके बाद भी इनका आदर्श भूमिगत दौर का आचार क्यों बना रहा? सैद्धांतिक शुद्धता की आड़ में इसने अपने सर्वसमादृत नेताओं – ज्योति बसु, सोमनाथ चटर्जी – के साथ लगभग वही व्यवहार किया जो कभी जोशी जी के साथ किया था। अंतर केवल मात्रा का था, न कि मर्यादा का। नए यूथपतियों ने अपनी ताकत तो दिखा ही दी, आपनी नियति भी तय कर दी।

एक ‘प्रगतिशील’ कथाकार ने एक बार अपने लेखन की उपेक्षा से आहत हो कर ‘कम्युनिस्ट नैतिकता’ शीर्षक से एक पुस्तिका लिख कर अपने साधनों से छापी और वितरित की थी। पुस्तिका मेरे पास नहीं है और लगभग चालीस साल पहले उलट-पलट कर देखी गई उस पुस्तिका में दर्ज शिकायतों की जो याद है उनमें कुछ भी गलत नही था, सिवाय इसके, जिसका उस समय तक मुझे अंदेशा तक नहीं हो सकता था। वह था यह कड़वा सच कि लेखक पार्टी के आंदोलनों और कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए अपनी जान लड़ा देते हैं और पार्टी-नेतृत्व अपने भाषणों और लेखों में कभी उनका नाम तक नहीं लेता। वह उसे पढ़ता भी है, इसका भी पता नहीं चलता। जिन मज़दूरों किसानों को अपनी रचनाओं मे पात्र बनाता है वे फुर्सत हो तो भी वह साहित्य नहीं पढ़ेंगे और अपने मनोरंजन और मस्ती के लिए झाल-मजीरा बजाता है, कभी उस साहित्य को पढ़ता तक नहीं जिसमें उसे नायक बनाया गया है। साहित्य में रुचि रखने वालों, को ऐसी रचनाओं से कुछ मिलता नहीं। उनके साहित्यिक सांस्कृतिक संगठन लेखकों के हित के सवालों को कभी उठाते नहीं।
एक बात जिसका जिक्र उन्हें खास तौर से करना चाहिए था कि जिस यथार्थ की अपनी कल्पना से सृष्टि करके मज़दूरों को संघर्ष करते और विजय प्राप्त करते दिखाता हैं उसका वास्तविकता से कोई मेल नहीं खाता, और इसलिए अपनी रचनाओं के माध्यम से वह साहित्य में भूसा भरता है, जो किसी के काम का नहीं होता और जिन लोगों को हिंदी क्षेत्र से यह शिकायत रही है कि इसमें साहित्य के पठन-पाठन में लोगों की रुचि नहीं है। सच पूछें तो उन्हें शिकायत यह होनी चाहिए कि काउ-बेल्ट तक में भूसा चरने वाले बैलों का अभाव है। तथाकथित हिंदी क्षेत्र में वामपंथी राजनीतिक सक्रियता का निपट अभाव और साहित्य पर प्रगतिशीलता के नाम पर नकली यथार्थ, नकली चरित्र और नकली संघर्ष दिखाते हुए जिस तरह का सर्जनात्मक निर्वात तैयार किया गया, वह इसे सांस्कृतिक दृष्टि से सबसे पिछड़ा प्रदेश बनाने में सबसे प्रधान कारक रहा है।
[1] So many leaders were underground, party papers had been banned, questions were taboo just in case you unwittingly revealed something which could endanger someone else’s life. Somehow you had to take leave of all your senses, hide them away where they could never make you uncomfortable. Your eyes could no longer see, your ears could no could no longer hear and your mind could no longer think anything apart from what the party fed you. Why robotisation took such advanced technical know-how when all we needed to know was to consult the communist parties of the world, I will never know. 69

Post – 2020-02-25

तेरह
पंडित सोइ जो गाल बजावा

इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त करने वाले और अंग्रेजी जीवन शैली अपनाने वाले, काया से भारतीय और मिजाज से अंग्रेज बनने के प्रयत्न में लगे रहते थे। वे हिंदुस्तान और हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजों की नजर से देखने की आदत डालते रहे थे। इतनी ‘उन्नत’ शिक्षा पाने के बाद भी इनमें से किसी का दिमाग उतना रौशन नहीं था, जितना उनसे आधी शताब्दी पहले इंग्लैंड पहुँचे, सर सैयद का या इंग्लैंड पहुँचे बिना भी भारतेन्दु का और यह अंतर देश और समाज से जुड़े और उससे उखड़े (उच्छिन्न मूल आकाशबेलि) होने का अन्तर है। यह कथन नेहरू सहित पश्चमी चाल में ढले सभी तीसमारों पर लागू होता है, इसे निम्न उद्धरणों से समझा जा सकता है:
“The sole reason for all this progress in England is that its learning (‘ul?m) and crafts (fan)—everything it has—are in the language of its people…. The people who truly desire India’s good and progress should firmly understand that India’s good depends on only one thing, that its people receive instruction in everything, from the most elevated to the most mundane, in their own languages. These words of mine should be carved in big bold letters on the Himalayas. If India does not get instruction in all branches of learning in its own language, India will never gain any status for civilization (sh?yastag?) and refinement (tarbiyat). That alone is true, true, true. सर सैयद।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। भारतेन्दु। ध्यान रहे कि यहाँ भारतेंदु भारत के सभी जनों के लिए हिंदी के प्रयोग की बात नहीं करते, अपितु निज भाषा की बात करते हैं।

यह मोटी बात जिनकी समझ में नहीं आ सकती वे यह भी नहीं समझ सकते कि देश बँट कर आजाद हो गए तो फिर इनसे उपनिवेशकालीन मानसिकता से ले कर उपनिवेशकालीन समस्यायें तक ज्यों की त्यौं कैसे बनी रह गईं? पहले पीड़ा थी ‘पर धन विदेश चलि जात यहै अति ख्वारी’ और अब यह अपने ही देश के लुटेरों और लूट-पाट की राजनीति करने वालों के झोले में जाने लगा, क्योंकि स्वतंत्रता की चेतना और देश हित के समक्ष अपने क्षुद्र स्वार्थों का विसर्जन का भाव न तो औपनिवेशिक भाषा के माध्यम से पूरी दुनिया में कही आया है, न आ सकता है।

इसलिए मेरे आकलन में नेहरू सहित कम्युनिस्ट पार्टियों की दिशा और दशा निर्धारित करने वाले विलायती दिमाग, मिजाज और भाषा की श्रेष्ठता के कायल सभी, पिछड़े दिमाग और मिजाज के लोग रहे हैं जिन्होंने पुरानी औपनिवेशिक समस्याओं का विस्तार किया, नई समस्यायें पैदा कीं और अपने ही समाज को ‘बाँटो और राज करो/ बचे रहो’ की नीति पर बेशर्मी से अमल किया। इनको परखने की सीधी कसौटी यह है कि इन्होंने केवल समस्यायें पैदा कीं जब कि जमीन से जुड़े शास्त्री ने अपने सीमित काल में उनके द्वारा पैदा की हुई दुःसाध्य प्रतीत होने वाली समस्याओं का ऐसा हल निकाला कि हम भूल गए कि कभी ऐसी समस्याएँ पेश भी आई थीं।

विलायती सोच और तेवर पर गर्व करने वालों में अहंकार अवश्य भरा था पर देशाभिमान और आत्माभिमान का निपट अभाव था। वे अपनी ‘असाधारण योग्यता’ के बल पर अपने लिए कुछ ‘असाधारण’ पाना चाहते थे और नेहरू की इसी लालसा ने भौतिक स्वतंत्रता प्राप्त भारत को औपनिवेशिकता से बाहर आने नहीं दिया, और लोकतंत्र को वंशतंत्र बनाए रखा।

मैं यहाँ मोदी की बात नहीं करूँगा जिसके विषय में ‘मोदी है तो मुमकिन है’ जैसा मुहावरा उसके आलोचकों को भी आपत्तिजनक भले लगे, विचित्र नहीं लगता। यह एक मजेदार सच है कि भारत की सभी भाषाओं के बुद्धि-व्यवसायी जिन्होंने अभिव्यक्ति और संचार की दक्षता का आजीवन अभ्यास किया है, वे संगठित रूप में, एक स्वर से, जिसका विरोध करते हैं उनकी आवाज अपने ही समाज तक नहीं पहुँच पाती जब कि वह संचार के उपलब्ध सशक्त माध्यमों को भी धता बताता हुआ, अतिजीविता के लिए संघर्ष करते श्रव्य माध्यम से उस समाज से भी अपने को जोड़ लेता है, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक से सीधा संचार कर लेता है और विश्वमंच से अपनी उसी भाषा के माध्यम से आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति ही दर्ज नहीं कराता, बल्कि उनके द्वारा उसकी आवाज भारत की आवाज के रूप में पहली बार सुनी जाने लगती है। ऐसी स्थिति में अपने बुद्धि-व्यवसायी वर्ग के लिए तुलसी का प्रयोग “पंडित सोइ जो गाल बजावा’ याद आता है।

Post – 2020-02-24

बारह
भारतीय कम्युनिज्म की पूँजी

इस दुखद सच्चाई को कई बार दुहराने के बाद भी कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियाँ मुस्लिम लीग का कार्यभार पूरा कर रही हैं, इस तथ्य के सर्वविदित होने के बाद भी कि कम्युनिस्ट पार्टी ने धार्मिक आधार पर प्लेबीसाइट का समर्थन किया था, और इस समर्थन के बाद, ‘नई सोच और खुले दिमाग’ के नौजवानों के प्रचार के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार के मुसलमानों को लगा था कि देश का विभाजन उनके हित में है, जिसके कारण ही यह जनमत संग्रह बँटवारे के पक्ष में चला गया था, इसलिए विभाजन कम्युनिस्ट पार्टी ने किया था, न कि मुस्लिम लीग ने।

मेरी समझ में यह बात नहीं आती थी कि कम्युनिस्ट पार्टी के हिंदू नेताओं का सिर एकाएक इतना फिर क्यों गया था? दूसरी बात जो समझ से परे रही है वह यह कि इस गलती को स्वीकार करने के बाद भी, कम्युनिस्ट पार्टियाँ जिनका अनेक मामलों में आपस में मतभेद है, लगातार लीग की उसी लाइन पर क्यों चलती रहीं? तीसरी बात, इस सच्चाई को जानने के बाद भी, नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली नौजवान, उनमें भी विशेषतः हिंदी प्रदेश के नौजवान, कम्युनिस्ट पार्टियों की सोच से ही इतने आकर्षित क्यों अनुभव करते रहे हैं कि प्रतिभाशाली होने का पर्याय वामपंथी होना बना रहा है।

समस्या मुख्यतः यही है, परंतु इसके विश्लेषण के क्रम में हमें अनेक दूसरी समस्याओं को भी विचार क्षेत्र में लेना होगा, या वे स्वतः उपस्थित मिलेंगी।

भौतिक परिघटनाएँ घटित होने के साथ बीत जाती हैं, और हम न तो उनमें लौट सकते हैं, न ही उन्हें बदल सकते हैं, न उनको ठीक उसी रूप में दुहरा सकते हैं। केवल पढ़े लिखे मूर्ख या बेईमान ही यह शोर मचा सकते हैं, कि हिटलर दुबारा आ रहा है, या अमुक व्यक्ति हिटलर बनने जा रहा है।

परंतु चेतना के स्तर पर इतिहास की आकांक्षाएं, प्रवृत्तियाँ, और ग्रंथियां व्यक्ति के जीवन में और समाज के जीवन में हमारी चेतना में इतने लंबे समय तक जारी रहती हैं कि इनसे हुई क्षति को देखते हुए भी हम इनसे मुक्त होना चाहें तो भी मुक्त होना इतना आसान नहीं होता और कई बार तो हमारे प्रयत्न के विपरीत अनुपात में ये अधिक उग्र हो जाती हैं।

जिनके लिए, इस सचाई को जानना और इनका सामना करना जरूरी है, वे जितने भी बड़े विद्वान और गण्य-मान्य क्यों न हों, हमारे द्वारा उठाए जाने वाले प्रश्नों का क्षीण आभास मिलने के बाद इस लेख को पढ़ने को तैयार नहीं हो सकते। अपने कार्ड-धारकों से अपने निर्देश या आदेश के पालन में तनिक भी विचलन देखकर उनसे आत्मालोचन कराते हुए, उन्हें मिटाने की योजनाएं बनाने वालों ने, यदि कभी स्वयं आत्मालोचन किया होता तो उनका वजूद ही मिट जाता।

यह बात में चौंकाने के लिए नहीं कह रहा हूं, यह बताने के लिए कह रहा हूं, कि भारी रकम खर्च करके इंग्लैंड से ऐसी उपाधियां लेकर लौटने के इरादे से विदेश जाने वाले, अपने लिए ऐसे ही अवसर की तलाश में जाते थे, जो भारत में रहकर दुर्लभ था, और इंग्लैंड में पहुंचकर, अपनी चमड़ी के रंग पर ग्लानि अनुभव करते हुए, शेष सभी मामलों में अपने को अंग्रेज बनाने का प्रयत्न करते थे।

तत्कालीन इंग्लैंड में फैबियन समाजवाद के प्रबुद्ध वर्ग के एक दायरे में अधिक लोकप्रिय होने के कारण, इनका झुकाव उस दिशा में हुआ था, जो इनके मंसूबों को अधिक प्रभावित नहीं करता था। अपने श्रम को कम करने के लिए मैं इसके विषय में विकीपीडिया के एक वाक्य को उद्धृत करना चाहूंगा, “फ़ेबियन समाज ब्रिटेन में १८८४ में सगठित किया गया था और १९00 में वह साहित्यिक-पत्रकार दल के रूप में लेबर पार्टी से संलग्न हो गया। फ़ेबियन समाज के प्रवक्ता- बी. तथा एस. वेब्ब दंपत्ति, एम. फ़िलिप्स, एच. जी. वेल्स तथा जॉर्ज बर्नार्ड शॉ आदि थे। फ़ेबियन समाजवाद आधिकारिक रूप में दर्शन के साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता है, परन्तु उसके अनेक प्रवक्ता धर्म का समर्थन करते हैं। ये इतिहास के बारे में अपने विचारों में समाज में प्रत्ययों की निर्णायक भूमिका के मत के पक्षधर हैं और वर्ग संघर्ष से इनकार करते हैं। लेनिन के अनुसार, “फ़ेबियन समाजवाद, अवसरवाद तथा उदारतावादी मज़दूर नीति की सर्वाधिक पूर्ण अभिव्यक्ति है।”

हम जिस बात पर जोर देना चाहते हैं वह यह है कि इनमें समाजवाद से प्रेम या क्रांति के प्रति लगाव की तुलना में लोकतंत्र से जुगुप्सा अधिक प्रबल थी और इस मानी में मनोवैज्ञानिक रूप से ये उन रईसों, जमीदारों, समाज से कटे हुए परंतु महत्वाकांक्षा से भरे हुए छोटे तबके के अधिक निकट पड़ते थे, जिनकी चिंता सर सैयद अहमद के कांग्रेस विरोध में पैदा हुई थी। इनके भीतर ठीक वही डर था, जिसे सर सैयद अहमद ने अपने लखनऊ और मेरठ के भाषणो में व्यक्त किया था, जो लोकतंत्र विरोधी मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट पार्टी दोनों के भीतर काम करती गई और इस रिश्ते से दोनों को एक दूसरे के इतने करीब बनाए रही।
“I ask you — Would our aristocracy like that a man of low caste or insignificant origin, though he be a B.A. or M.A., and have the requisite ability, should be in a position of authority above them and have power in making laws that affect their lives and property?” “Never! Nobody would like it.” (Cheers.) लखनऊ, 1887

Men of good family would never like to trust their lives and property to people of low rank with whose humble origin they are well acquainted. (Cheers.) लखनऊ, 1887

We are those who ruled India for six or seven hundred years. (Cheers.)… Is Government so foolish as to suppose that in seventy years we have forgotten all our grandeur and our empire? लखनऊ, 1887

Men of good family would never like to trust their lives and property to people of low rank with whose humble origin they are well acquainted. मेरठ, 1888.

दूसरे शब्दों में कहें तो, यहां पहुंचकर निजी स्वार्थ की साझेदारी धर्म की दीवारों पर भारी पड़ती थी, मोहम्मद अली जिन्ना मोहन कुमारमंगलम की अपनी नजर में गांधी से अधिक करीब दिखाई देते थे। उनके साथ जुड़ना, उनकी इरादों को पूरा करने में मददगार होना, उनके अधूरे काम को पूरा करना नहीं था, स्वयं अपने भविष्य की ओर कदम बढ़ाने का एक प्रयास था। सर्वहारा के निकट दिखने के लिए भाषा और वेशभूषा की सादगी का प्रयत्न नाटकीय पाखंड से भरा हुआ था। निजी जीवन शैली में, अभिजात्य का निर्वाह सभी करते थे, और कुछ ने तो उतना भी प्रयास नहीं किया था, जितना मोहन कुमारमंगलम ने। उदाहरण के लिए :
Banne Bhai as he was affectionately called, belonged to a well-known landed family of Lucknow with one other brother in the civil service and the other in the upper rung of the congress party. He didn’t show any sign of struggle against his feudal upbringing…88

भारतीय समाज की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के विषय में इनकी जानकारी कम थी, यह हैरानी की बात नहीं है, हैरानी की बात यह है कि इस कमी को दूर करने का कभी गंभीर प्रयत्न आज तक नहीं किया गया। खयालों को सचाई पर लादकर यथार्थ के नाम पर स्वार्थ साधना की जाती रही:
It was failure all down the line, failure of assessment to such an extent that one should have wondered whether he or the communists had any idea of who and what the people of this country were, what they thought, what motivated them. The party had amply demonstrated that it operated in the realm of fantasy alone. 71
भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन पाखंड बनकर आया और पाखंड बनकर आज तक अपना अस्तित्व किसी न किसी रूप में कायम रखने में समर्थ रहा यह हमारी सामाजिक अधोगति का सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसे उसने अपनी ओर से भी बढ़ाने का प्रयत्न किया।
(जारी)

Post – 2020-02-23

ग्यारह

सत्य एक है, विद्वान लोग उसका वर्णन अलग अलग रूपों में करते हैं – एकः सद् विप्रा बहुधा वदन्ति, अर्थात् विद्वान लोग भी सत्य के किसी एक ही पक्ष को देख पाते हैं, और उस पक्ष को समग्र का ज्ञान मान लेने के कारण उनका वर्णन परस्पर अनमेल और विरोधी ही नहीं होता, सत्य के साक्षात्कार में बाधक भी होता है। उनके अहंकार के कारण सत्य का साक्षात्कार संभव ही नहीं हो पाता। यह बात केवल ईश्वर या परम सत्ता के विषय में ही सच नहीं है, वस्तु और वास्तविकता की समझ के विषय में भी सच है।

मैं, अपने विषय में कई बार, कई प्रसंगों में, यह बता आया हूं कि प्रतिभा और मेधा के मामले में मैं मझोले दर्जे का आता हूं, परंतु अपने विशेष जीवन अनुभव और उससे उत्पन्न जिज्ञासा तथा श्रम और धैर्य पूर्वक काम करते रहने की आदत के कारण, अपने निष्कर्षों में दुनिया के दूसरे किसी विद्वान से अधिक ठोस जमीन पर पाता हूं। यह मेरी आत्म छवि है, जिसके विषय में किसी बाह्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं, और दूसरा कोई मेरी इस छवि को सही माने यह जरूरी नहीं। आत्मछवि के मामले में सभी अतिरंजना से काम लेते हैं; इसका अपवाद मैं भी नहीं हो सकता।

इसलिए यह भी याद दिलाता रहता हूँ कि मैं अपनी स्थापनाओं में जितना दो निर्द्वन्द्व लगता हूं, अंतिम कसौटी पर जरूरी नहीं कि वे लचर, अथवा गलत न सिद्ध की जा सकें। यह दुहराने की जरूरत नहीं कि आपसी संवाद, हमारी वैचारिक सीमाओं को कम करते हुए सही निष्कर्ष के अधिक निकट पहुँचने की अनिवार्य शर्त है, जो मार्क्सवादी नव-ब्राह्मणवाद के चलते लंबे समय से अवरुद्ध है।

वैचारिक शुद्धता का दावा विचारों के अभाव में ही संभव है, और अपने विचारों को विचारणीय तक न मानते हुए खारिज कर देने की प्रवृत्ति, अंतिम सत्य का एकमात्र अधिकारी होने का विश्वास सामाजिक कूप-मंडूकता की ओर ले जाता है। मार्क्सवादी एकदिशता, और हिंदी भाषी क्षेत्र में इसका अधिक दबाव होने के कारण यहां का बौद्धिक ह्रास भारत के अन्य क्षेत्रों की तुलना में इतना उग्र रहा है कि इसे सही ढंग से उनके द्वारा भी रेखांकित नहीं किया जा सका जो इसे ले कर अपने को चिंतित दिखाते रहे हैं। पूरे देश के बौद्धिक पर्यावरण को भी प्रभावित करने में अन्य किसी विचारधारा की तुलना में, मार्क्सवादी भावधारा की भूमिका अधिक प्रबल रही है, इसलिए स्वतंत्र भारत के बौद्धिक विकास को भी उसने कम कुंठित नहीं किया है, परंतु इस पर कभी विचार नहीं किया गया।

सच कहें तो इस देश में दो क्षेत्र विचारातीत रहे हैं, एक इस्लाम और दूसरा मार्क्सवाद। दोनों में कुछ मामलों में गहरी समानताएँ भी हैं। दोनों का देश नहीं होता, पूरी दुनिया होती है। दोनों इंसानियत की रक्षा की तुलना में रक्तपात में अधिक निष्ठा रखते हैं। दोनों प्राचीन भारतीय संस्कृति को पिछड़ेपन का मूर्त रूप मानते रहे हैं, और इसका सबसे आसान इलाज उसे मिटा देना मानते रहे हैं। मिटाने के लिए, जिसे मिटाना है उसे समझना जरूरी नहीं, इससे उत्साह में कमी आ जाती है – मूर्ति भंजक मूर्तिकार नहीं होता, उसके हथियार अलग होते हैं। एक छेनी चलाता है दूसरा हथौड़ा। इसके प्रमाण उन्होंने बार बार दिए हैं । इसकी पराकाष्ठा यह रही है कि दोनों भाषा को ही सांप्रदायिक सोच का कारण मान बैठते हैं, और इस बुनियादी सच तक से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं कि भाषा आधार और अधिरचना तथा उद्विकास की अवस्थाओं, सभी की सीमाओं से ऊपर होती है, और इसलिए इसे किसी भी सीमा में रखकर समझा ही नहीं जा सकता।

परंतु विभिन्न कुटिलताओं का युद्ध क्षेत्र बन जाने के कारण हिंदी को हिंदुत्व और हिंदुत्व को सांप्रदायिकता के निकृष्टतम रूप के रूप में प्रस्तुत करते हुए, हिंदी भाषी क्षेत्र के लिए, हिंदी बेल्ट, कॉउ बेल्ट, और आह्लाद के निजी दायरों में गोबर पट्टी रूप में प्रस्तुत करने का शौक तथाकथित बुद्धिजीवियों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है, और बार-बार की आवृत्ति के बाद हो सकता है अपना दंश त्याग कर यह भी एक कलात्मक प्रयोग की तरह लोकप्रिय हो जाए।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह बोध है कि भारतीय मार्क्सवाद की विविध अभिव्यक्तियाँ उपनिवेशवाद, उसकी भाषा, उसकी मूर्खतापूर्ण मानी जा चुकी स्थापनाओं तक के पुनरुद्धार और समर्थन के लिए जितना तत्पर दिखाई देता है, उतना ख़याली रूप में भी भारतीय जन मन के आक्रोश और असंतोष और उनके निराकरण के उपायों के प्रति संवेदनशील दिखाई नहीं देता। इसे समझने के लिए हमें दोबारा अपना भविष्य उज्जवल बनाने के लिए इंग्लैंड जाने वाले अमीर घरानों के नौनिहालों की सीमाओं को समझना होगा जो प्रायः प्राचीन समय के उपनयन संस्कार की उम्र में ही ऐसे परिवेश में डाल दिए जाते थे जिसे कुछ सावधानी के साथ, ईसाई परिवेश कहा जा सकता है।

अपनी भाषा, सभ्यता और संस्कृति के विषय में या तो वे पूरी तरह अनभिज्ञ रहते थे अथवा ईसाई प्रचारकों के माध्यम से प्राचीन भारत के विषय में और हिंदू समाज के विषय में प्राप्त जो जानकारियाँ उनके मनस्वी गुरुओं के पास पहुंची होती थीं, उन्हें ही भारत विषयक समग्र ज्ञान मान बैठते थे। यह काम आज संभव नहीं लगता इसलिए इस पर हम कल विचार करेंगे।

Post – 2020-02-22

दस
लफ्फाजों को बोलना कब आएगा?

क्या आप अपने को जानते हैं? सवाल पुराना है; एक बार किसी अन्य प्रसंग में मैं पहले भी उठा चुका हूँ। इसके कई पहलू हैं और किसी न किसी कोण से सभी सभ्यताओं में किसी न किसी संवेदनशील मेधा द्वारा उठाए जाते रहे है। इतना महान लेखक, जिसने अकेले दम पर युगधारा को बदल दिया, व्यर्थता बोध का शिकार: “न कियो ही कछू, करिबो न कछू, कहिबो न कछू, मरिबो ही रह्यो है।”

मीर की एक पंक्ति जिसने पढ़ी है, उसे वह भूल नहीं सकती, “यही जाना कि कुछ न जाना हाय, सो भी इक उम्र में हुआ मालूम।”

इन पंक्तियों के लेखक ने भी किसी के प्रभाव नहीं, गहन व्यर्थता बोध के किसी क्षण में लिखा था, “न कुछ किया, न करेंगे आगे, उठ के चल देंगे बिन बताए हुए।”

परन्तु आज एकाएक जिस परदे के खिसकते ही अपना नया साक्षात्कार हुआ, उस पर तो विस्मित हूँ।

अपनी सफाई दे कर कुतूहल को कम करने की जगह आप से पूछता हूँ, “आप लोकतंत्रवादी हैं, या भद्रतंत्रवादी? संविधान को मानते हैं, या संविधान की कसौटी अपने आचार को बनाना चाहते हैं?” प्रश्न इतने मार्मिक हैं कि आप इनका उत्तर देने की जगह, प्रश्न करने वाले की हँसी उड़ा कर, विषय को ही बदलना चाहेंगे।”

कई बार सवालों के उत्तर इतने दूर, इतने अधभूले प्रसंगों में छिपे होते हैं कि हम उन्हें पहचानते हैं तो डरते हैं और पहचानने से कतराते हैं तो उनके हाथों मारे जाते हैं।

क्या आप बता सकते हैं कि 2014 में अभी मतदान की तिथि भी घोषित न हुई थी, तभी से, हर कदम पर यह जानते हुए कि नमो की विजय को रोका नहीं जा सकता, अपनी निजी वाक्-शक्ति और अभिशापों की जादुई शक्ति पर भरोसा करने वाले और अपने को सर्वाधिक आधुनिक मानते हुए, नमो को पुरातनपंथिता का मूर्त रूप मानने वाले कौन थे? ये स्याही की गंध फीकी पड़ने से पहले नई से नई किताब को जल्द से जल्द पढ़ने के दावे के बल पर अपने को सर्वाधिक प्रबुद्ध मानने वाले जादू टोने की शक्ति में विश्वास करने वाले युगों पुरानी मानसिकता से ग्रस्त लोग थे जो यह तक नहीं मानने को तैयार थे कि उनका पाला सर्वाधिक आधुनिक चेतना, प्रखर दृष्टि और युगानुकूल नई कार्ययोजना से संपन्न व्यक्ति से पड़ा है।

बिना पर्याप्त कारण के किसी बहाने लामबंद होकर जनता द्वारा अप्रत्याशित बहुमत से जीतने वाले को प्रेस और प्रचार-माध्यमों के खुले समर्थन से तख्तापलट का स्वप्न देखने वाले अपने यथार्थ से कटे हुए और विश्वबोध से शून्य कितने दयनीय शेखचिल्ली थे और फिर भी अपने साहित्य लेखन और मूल्यांकन में अपने को यथार्थवादी और प्रगतिशील बताया करते थे। कहें, इन्हें अपनी भाषा के उन शब्दों का अर्थ तक पता नहीं था। हौरानी है, जिन बुद्धिजीवियों को भाषा का ज्ञान तक नहीं, पर गुमान यह कि पूरे देश को उनके बताए रास्ते पर चलना चाहिए।

उस समय तक यह शब्द चलन में न आया था, पर 2019 के बाद एकाएक छलांग मार कर सुर्खियों में आ गया । यह है लोकतंत्र को ठोकर मार कर अपनी मनमानी को लादने का प्रयत्न करने वाला दुश्नाम – मेजारिटिज्म – जो लोकतंत्र के जन्म के समय से ही उछाला जाता रहा है : जमहूरियत वह तर्जे हुकूमत है कि जिसमें बंदों को गिना करते हैं तोला नहीं करते, या डेमोक्रैसी इज द गवर्नमेंट ऑफ फूल्स, और इसकी आड़ में तानाशाही, अमलाशाही और स्वेच्छाचारी शासन की हिमायत की जाती रही, जिसके परिणाम स्वरूप पाकिस्तान में बार बार फौजी-तानाशाही सर उठाती रही है।

मेजारिटिज्म का प्रयोग करने वाले जब साथ ही यह भी कहते हैं कि मोदी से लोकतंत्र को खतरा है, सांवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन करने वाले या उनके साथ खड़े होने वाले जब संविधान का धैर्य की परीक्षा लेने वाली हद तक निर्वाह करने वाले को संविधान के लिए खतरा बताते हैं तो सोचता हूँ इतने सारे पोथे लिखने और पीठ पर लाद कर इतराते हुए चलने वाले बोलना कब सीख पाएँगे।

खैर, आज मैं आपको सिर्फ यह बताना चाहता था कि ऐसे ही लोगों ने इस देश में कम्युनिस्ट पार्टी की नींव रखी और लगातार उसका संचालन करते रहे।