Post – 2016-10-19

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर (कच्‍चा चिट्ठा) – 12

अरविन्‍द कुमार के निदेशक बनने से पहले ट्रस्‍ट की पुस्‍तकें जितनी पाठकों के काम नहीं आती थी, उससे अधिक दीमकों के काम आती थीं। दीमकों के काम आने का एक लाभ यह था कि हिसाब किताब में अन्‍य खातों की तरह दीमक खाते भी हुआ करता था। अरविन्‍द ने अपनी असाधारण सूझ बूझ से इस मृत संस्‍था को एक जीवन्‍त संस्‍था बना दिया था, फिर उनके बाद ट्रस्‍ट वहां के अधिकारियों की चरागाह में कैसे बदल गया यह शोध का विषय है। ट्रस्‍ट की नियमावली में जरूर कुछ खामियां रह गई थी अन्‍यथा एक सुयोग्‍य व्‍यक्ति को तीन साल की अवधि की लक्ष्‍मण रेखा की उपेक्षा करके उन्‍हें तब तक काम करने दिया जाना चाहिए था जब तक उनके विरुद्ध कोई गंभीर आरोप न आता। नियम तो नियम है। फिर गिरावट । रह गया कुछ तो अरविन्‍द कुमार द्वारा आरंभ किए गए कुछ प्रयोगों का निर्वाह, जैसे देश के विभिन्‍न नगरों में पुस्‍तक मेले और दिल्‍ली में विश्‍वपुस्‍तक मेले का आयोजन पर संस्‍था पहले जैसी मरणासन्‍न अवस्‍था में नहीं पहुंची।

यह बात तो विपिन चन्‍द्रा के शोक समाचार से पता चला कि वह मुझसे आयु में केवल तीन साल ही बड़े थे। 2004 में मैं जब उनसे मिला था तो वह मुझसे एक युग बड़े लग रहे थे। उनकी आंखों से बहुत कम दिखाई देता था। वह एक मैग्‍नीफाइंग ग्‍लास जो कोरों से उठा हुआ चौकाेर सा था उसे पन्‍ने पर रख कर सरकाते हुए पढ़ते थे । मेरी एक आंखों में भी मोतियाबिन्‍द का असर हो रहा था और जब मैंने यह बताया तो वह बहुत चिन्तित भाव से वैसा ही शीशा खरीदने की सलाह देने लगे। वह अमेरिका से उन्‍होंने मंगाया था पर मैने अपने पुत्र और पुत्री को जब यह बताया तो वे उसकी बनावट समझ नहीं पाए। जो लाकर दिया वह मेरे काम का न था। मेरी समस्‍या मोतियाबिन्‍द के आपरेशन से दूर हो गई।

मैंने पाया अधीनस्‍थ अधिकारी उनकी बात पूरे आदर से सुनते थे, हामी भर कर भी चले जाते थे, पर उनके लिखित आदेश का भी पालन नहीं करते थे। ऐसा ही एक आदेश था कि मुद्रण के समय प्रतियों का उल्‍लेख हो जिससे मनमानी घालमेल न हो सके, इसका उनका आदेश यह कह कर निष्‍प्रभाव कर दिया गया कि यह पुरानी बात हो गई, अब ऐसा कोई नहीं करता। काशीराम शर्मा की कोई पुस्‍तक लंबे समय से स्‍वीकृत पड़ी थी, उसका प्रकाशन नहीं हो रहा था। फोन पर बात चीत में उन्‍होंने जिक्र किया था। मैंने इसका जिक्र किया तो विपिन जी ने उसके प्रकाशन के लिए लिखा, पर उसका पालन नहीं हुआ। बाद में उनके एक दो और आदेशों की अवज्ञा की ओर उनका ध्‍यान दिलाया तो पाया उन्‍हें इससे खीझ हो रही थी। अपमानजनक लग रहा होगा। अधिकारी विपिन चन्‍द्रा जो चाहते थे वह नहीं करते थे, विपिन चन्‍द्रा अधिकारी जो चाहते थे उस पर हस्‍ताक्षर करने की आदत डाल चुके थे।

मैं उसके बाद फिर न उनसे मिला न उधर ध्‍यान दिया और पाया कि मेरी पुस्‍तक के प्रति जो शत्रुभाव था जो विपिन चन्‍द्रा के पूर्ववर्ती और जनता शासन में नियुक्‍त ब्रजकिशोर शर्मा के काल में उसके प्रकाशन में अनियमितता आ गई थी वह पुन: लौट आई थी। रायल्‍टी के भुगतान रुक गए थे। एक पत्र मैंने चार साल बाद डाइरेक्‍टर को इस विषय में लिखा तो चार सालों की रायल्‍टी के एक लाख कुछ का चेक भेज दिया गया। आगे पुनर्मुद्रण रोक दिया गया, तो एक दो साल बाद मैंने ईमेल से कारण बताते उसका प्रकाशनाधिकार वापस लेने का पत्र लिखा तो कोई उत्‍तर नहीं आया। मैंने इसका अधिकार सस्‍ता साहित्‍य मंडल को दे दिया।

आश्‍चर्य कि उसके बाद मुझे पुस्‍तक के पुन:मुद्रण के प्रमाण स्‍वरूप लेखकीय प्रतियां भेजी गईं। मैंने प्रतिवाद करते हुए बलदेव सिंह प्रधान संपादक को जिनको अब प्रकाशन और मानदेय का काम मेरी शिकायत के बाद सौंप दिया गया था, फोन किया कि इसका प्रकाशनाधिकार ट्रस्‍ट से अमुक तिथि को वापस ले चुका हूं इसके बाद आपने इसे छापा कैसे। उन्‍होंने कहा, डाक्‍टर साहब छोडि़ये उसे, अब बीती बातों को। चलने दीजिए । इसकी सूचना मैंने सस्‍ता साहित्‍य मंडल को दी कि वह ट्रस्‍ट को लिखें कि वे अब उस पुस्‍तक का प्रकाशन या बिक्री नहीं कर सकते । वह इसके लिए तैयार न थे, चाहते थे मैं ही यह आफत मोल लूं। उसके बाद से वही पुस्‍तक एक ही समय में दो संस्‍थाओं से छप रही है और सस्‍ता साहित्‍य मंडल उतने से ही खुश है कि यह किताब फिर भी बिकती तो हैं।

मेरी मुलाकात विपिन जी से फिर एक पुस्‍तक के विमोचन के अवसर पर हो गई। हम दोनो ही मंच पर थे और मैंने उस पुस्‍तक का परिचय देते हुए मार्क्‍सवादी इतिहासकारों की आलोचना करते हुए यह सवाल उठाया कि यह काम उन्‍होंने क्‍यों नही किया। विपिन जी मुझे पहचान नहीं पा रहे थे और मुझसे पूछ रहे थे, आप कहां से आए हैं। उन्‍होंने कहा, भई रोमिला थापर मेरी मित्र हैं, उनकी आलोचना तो नहीं कर सकता । उस अवसर का उपयोग उन्‍होंने यूरोपीय मध्‍ययुग को अन्‍धकार युग कहने की पुरानी धारणा में बदलाव के और उस दौर में भी कई क्षेत्रों में सक्रियता बनी रहने की बात करते हुए भारतीय मध्‍ययुग की कुछ हिमायत भी की थी। मेरे साथ मेरे मित्र कांतिमोहन भी थे, उनके उनसे निकट के संबंध रह चुके थे, परन्‍तु उन्‍होंने नमस्‍कार किया तो उनकाे भी पहचान नहीं पाए थे ।

कोई सज्‍जन थे जो कांतिमोहन के यहां ही एक दावत में मिल गए थे। पता चला, एनबीटी में काम करते हैं। पूछा विपिन चन्‍द्रा के क्‍या हाल हैं तेा बताया, कभी कभी आ जाते हैं और अपना मेडिकल बिल भेजते रहते हैं।

मैंने इतने विस्‍तार से, थकाने वाले व्‍यौरों के साथ इसकी चर्चा की तो कुछ कारणों से। व्‍यक्ति कितना भी विद्वान हो, कितना भी सरल हो, कितना भी सर्वप्रिय हो, मेरी नजर में, यदि वह किसी कार्यभार को वहन करने में स्‍वास्‍थ्‍य, आयु या अन्‍य व्‍यस्‍तताओं के कारण समर्थ न हो तो उसे कोई पद या दायित्‍व नहीं लेना चाहिए और लेता है तो मेरी वह अनैतिक है। विपिन जी एनबीटी के हाथों में एक मुहर थे और उनके कार्यकाल में यह संस्‍था शीर्ष पुरुष के होते हुए भी उससे वंचित थी और फिर भी मुहर के रूप में उनका उपयोग हो रहा था।

जिस तरह की मौजमस्‍ती उनके दौर में मनाई गई देश की जगह विदेशों में पुस्‍तक मेलों की भागीदारी में वह पहले या बाद में न हुई।

ब्रजकिशोर शर्मा जो भाजपा काल में अध्‍यक्ष बन कर आए थे उनके बाद विपिन जी के आने पर जो विश्‍वपुस्‍तक मेले के पंडाल लगे उनकी कीमत लगभग दूनी कर दी गई और यह सूचना मुझे विकास नारायण राय ने दी थी और इस पर टिप्‍पणी करते हुए कहा था कि इससे अच्‍छे तो वे ही लोग थे। वह मेरे मित्र भी हैं और फेसबुक पर कटु आलोचक भी फिर भी शायद वह इसे भूले न होंगे।

तीसरी बात नेशनल बुक ट्रस्‍ट के इतिहास में सबसे योग्‍य निदेशक अरविन्‍द कुमार को अवधि की लक्ष्‍मण रेखा का पालन करते हुए हटा दिया गया और उसके बाद उस पद पर स्‍थापित व्‍यक्ति को काम आता ही नहीं था। वह कलकत्‍ता भागता रहता था। बाद में महिला मुस्लिम पुलिस अधिकारी को निदेशक बनाया गया उसके साथ भी तीन साल की अवधि ही रही। उसके बाद के निदेशक को उसी पद पर दो या तीन बार और स्‍वयं विपिन चन्‍द्रा तो तीन बार किस तर्क से रखा गया। मानव संसाधन मंत्री की कृपा।

चौथी बात जैसा मैं पहले बता चुका हूं, एनबीटी की थोक बिक्री राज्‍य सरकारों को एनबीटी द्वारा सुझाई गई पुस्‍तकों की होती है । यद्यपि जिस दौर के आर्डर की आपूर्ति रोकी गई वह उनके कार्यमुक्‍त होने के तीन साल बाद की है परन्‍तु यह उनके द्वारा अनुगृहीत निदेशक द्वारा पुराने तरीके पर सुझाया गया होगा । इससे यह लगता है यह काम पहले भी होता आ रहा था। स्‍वयं अध्‍यक्ष रहते हुए अपनी ही लिखी पुस्‍तक को थोक बिक्री में डाल कर प्रतिवर्ष चार पांच लाख रायल्‍टी के रूप में कमाना मुझे अनैतिक लगता है।

यह बहुत मामूली बात है, पर मार्क्‍सवादी नैतिकता में यह आता है और जिसकी आंख की रोशनी कम हो गई हो वह भी इतिहास अनुसंधान परिषद में जाकर पता लगा सकता है कि मार्क्‍सवादी अध्‍यक्षों के दौर में कितने सारे प्राजेक्‍ट चन्‍द लोग बांट कर उससे होने वाली दसियों लाख की आय स्‍वयं अर्जित करते रहे । यह सामाजिक अनुसंधान संस्‍थान में, आइएनसीआरटी में भी उनके दाैर में होता था। आश्‍चर्य है कि जिन दौरों में भाजपा (संघियों) का प्रभाव था उन दिनो इस तरह का कोई घोटाला सामने नहीं आया। उनके नैतिकता के मान भिन्‍न हैं।

यदि ईमानदार और कुछ कम योग्‍य व्‍यक्ति और ‘असाधारण’ योग्‍य पर लोभी लोगों के बीच, (गो यह असाधारणता भी मार्क्‍सवादियों के सांप्रदायिक दायरे के भीतर छवि निर्माण का परिणाम है) , चुनाव प्रबन्‍धकीय पदों के लिए करना हो तो मैं पहले को वरीयता दूंगा। मोदी को ऐसे ही लोग मिले हैं और मैं समझता हूं अपनी लाख प्रचारित खामियों के बाद भी ये उनसे अधिक उपयुक्‍त हैं जो योग्‍यता के नाम पर धंधा करते रहे । चाहे वह सेंसरबोर्ड हो, या इतिहासपरिषद या दूसरे संस्‍थान ।

मेरे पास इतनी अक्‍ल नहीं है कि मैं इतने पेचीदे सवाल पर अपना फैसला ले सकूं। बिरला आदि परंपरावादी पूंजीपतियों के असाधारण अधिकार प्राप्‍त व्‍यक्ति बहुत कम पढ़े लिखे लोग हुआ करते थे जब कि उनके नीचे असाधारण योग्‍यता के विशेषज्ञ इंजीनियर, केमिस्‍ट, प्रबन्‍धक आदि पदों पर काम करते थे। सुना है एक बार किसी ने घनश्‍याम दास बिरला से इसका राज जानना चाहा तो उन्‍होंने कहा, योग्‍य आदमी तो डिग्रियां लिए हुए घूमते रहते हैं, दर्जनों के भाव मिल सकते हैं जब चाहो खरीद लो। भरोसे का आदमी मिलना कठिन होता है। संचालन के लिए भरोसे का आदमी ही काफी है। मोदी सुयोग्‍यतम प्रतिभाओं से वंचित होते हुए थी जरूरी नहीं कि उपयुक्‍त कार्यनिष्‍ठों से वंचित हों ।

अब यदि कोई जानना चाहे कि नये अध्‍यक्ष ने उस पुस्‍तक की थोक बिक्री को रोक कर सही किया या गलत तो इसका फैसला उनको करना चाहिए जो इसे फासिज्‍म की आमद मान कर शोर मचा रहे थे।

परन्‍तु पुस्‍तक के गुणदोष पर चर्चा तो रह ही गई । कल देखेंगे

Post – 2016-10-18

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 11
इस दृष्‍टान्‍त को मैं एक किश्‍त में समेटना चाहता था, परन्‍तु विषय की मांग है कि इसे दो किश्‍तों में पूरा करूं।
इसका संबंध उस जनबल मैन पावर से है जो मोदी को अपने साहसिक और उनके आलोचकों की नजर में भी, किसी के लिए अलभ्‍य, लक्ष्‍य को पाने के लिए उन्‍हें मिला है।
मोदी के विषय में कुछ तथ्‍यों की ओर ध्‍यान दिलाते हुए मैंने यह कहा था कि वह संघ से निकले तो हैं, पर संघ के सांचे में ढल कर नहीं निकले हैं । वह कुछ अलग किस्म के नेता हैं। फ्रीक ।
संघ में शिक्षा और अध्‍ययन पर जोर नहीं दिया जाता। अधिकांश लोग अपना छोटा मोटा कारोबार चलाते या नौकरी चाकरी करते हैं। स्‍वजनों की दूकान पर काम करते हुए भी मोदी ने अपने अध्‍यवसाय से उच्‍चतम शिक्षा प्राप्‍त की। व्‍यापार काे बढ़ाने की ओर ध्‍यान न दिया। प्रथम दृष्‍ट्या वह अध्‍ययनशील नहींं दिखाई देते पर विरल अवसरों पर मननशीलता का परिचय मिलता है । रविशंकर प्रसाद को छोड़ कर मुझे किसी दूसरे के चेहरे से अध्‍ययनशीलता और मननशीलता का वह आभास नहीं मिलता जो अदृश्‍य आरेखों में और त्‍वचा की कोशिकाओं के विचित्र संकुुचन और विस्‍तार से एक स्‍थायी मुद्रा का रूप ले लेता है।
मैं पहले ही लाठी पर अधिक बल देने वालों के लिए अपनी भाषा परंपरा में प्रयुक्‍त शब्‍दों – उददंड और लंठ का हवाला दे आया हूं और मेरी नजर में इसकी छाप ही संघ से निकले लोगों की आम छाप बन जाती यदि उनके व्‍यवहार में मृदुता न होती । आडवाणी जी, रज्‍जू भैया, जैसे कुछ विरल अपवादों को छोड़ कर प्रथम दृष्टि में अध्‍ययनशीलता और चिन्‍तनशीलता का प्रभाव नहीं पड़ता। अलट जी भी बोलते और कविता पढ़ते हुए वीर मुद्रा में आ जाते थे जिसमें अंगचेष्‍टा शब्‍दों से कुछ अधिक बोलती थी और शब्‍द चयन भी सामान्‍य काव्‍य भाषा से कुछ अलग होता था। इससे जुड़ेे अध्‍यापकों, इसके पत्रों के संपादकोंं, और संरसंघ चालकों तक से यही शिकायत हो सकती है। कुछ के चेहरे और व्‍यहार से स्‍वभाव की सरलता और मृदुता का असर अवश्‍य पड़ता हैा
इसके ठीक विपरीत मार्क्‍सवादी सोच के सुपठित लोगों के मिजाज में मृदुता भले गायब मिले, ऐंठ तक मिल जाय, पर अध्‍ययनशीलता और चिन्‍तनशीलता का असर पड़े बिना नहीं रहता।
चेहरा दर्पण है ही इस अर्थ में कि गलत नहीं बोलता। अध्‍ययन और ज्ञान की दृष्टि से जितने योग्‍य व्‍यक्ति वाम पंथियों में मिलेंगे, उनसे काफी पीछेे पर दूसरों से आगे कांग्रेस से लगाव रखने वाले सुपठित लोगों में मिलेंगे।
भाजपा में ऐसे लोगों का अभाव रहा है और इन्‍हीं से मोदी कामचलाऊ प्रतिभाओं को लेकर अपना सांस्‍कृति काम चलाना है।
परन्‍तु यदि ज्ञान धूर्तता का रूप ले ले तो? धूर्तता किसी महान उद्देश्‍य से प्रेरित लगे और वह महान उद्देश्‍य एक छलावा लगे तो? यदि सुयोग्‍यतम डाक्‍टर किडनी के धन्‍धे में लग कर निठारी कांड तक जुड़ने लगे, या पैसे के लोभ में खून चूसने वालों में बदल जायं तो ? योग्‍यता अपने कृत्‍यों और परिणामों से अलग करके नहीं देखी जा सकती । ऐसी स्थिति में सही दिशा में काम करने वाले सामान्‍य समझ के लोग भी महिमामंडित विद्वानों और विशेषज्ञों से अधिक निरापद सिद्ध हो सकते हैं। इसके अधिक नमूनों पर चर्चा संभव नहीं है, इसलिए हम इसके लिए केवल एक सर्वमान्‍य और मेरे लिए भी आदरणीय विभूति को सामने रखेंगे और इसक कतिपय अरुचिकर तथ्‍य और यथार्थ की जटिलता को आपके सामने रखेंगे जो ऐसी ही विभूतियों के संरक्षण में फलीभूत हुआ है और कल इस महान विभूति को उसके भीतर रख कर अपने निष्‍कर्ष निकालेंगे । यह हैं विपिन चन्‍द्रा ।
पिछले दिनों विपिन चन्‍द्रा की पुस्‍तक सांप्रदायिकता: एक परिचय, अंग्रेजी मूल संभवत- ‘कम्यूनलिज्म: अ प्राइमर’ का या तो प्रकाशन इसके अध्‍यक्ष ने राेक दिया, या उसकी बहुत बड़ी बिक्री पर रोक लगा दी। इस पुस्‍तक को मेरे एक मित्र ने सांप्रदायिकता पर गीता कहने का मन बनाया पर उन्‍हें याद आया कि इस पर तो संप्रदायवादियों ने कब्‍जा जमा लिया है, उनके कब्‍जे से बाहर निकाल कर इसका उपयोग करने का साहस नहीं जुटाया और इसे कुरान कहने का तो साहस किसी का नहीं हो सकता, पर उन्‍होंने इसके आधार पर सांप्रदायिक खतरों की उग्रता के लिए ध्‍यानाकर्षक विशेषणों का प्रयोग करते हुए इसके अनन्‍य महत्‍व को समझाया। अर्थात् यह एक ऐसी पुस्‍तक है जिसके बिना सांप्रदायिकता को समझा नहीं जा सकता।
इसमें तीन पहलू आते है, हो सकता है उनमें से कोई चौथा भी निकल आए।
पहला प्रो. विपन चन्‍द्रा से संबंध रखता है। वह इतने निरहंकारी, मिलनसार और विद्वानो और मुझ जैसे विद्वानेतर जनों से भी इतने सहज, आत्‍मीय भाव से मिलते थे कि इसकी दूसरी मिसाल मेंरे स्‍वर्गीय मित्र ओमप्रकाश ग्रेवाल के अतिरिक्‍त नहीं मिलता । स्‍वभाव की उनकी ऋजुता का और किसी सही प्रस्‍ताव पर सहमत होने की उनकी क्षमता का मैं अनन्‍य प्रशंसक हूं। उनका अकेला चेहरा था जो उस तनाव या ऐंठ से मुक्‍त था जो मार्क्‍सवादियों की ऐसी छाप बन जाती है कि उनकी हंसी और मुस्‍कराहट में भी बनी रहती है । उनकी विद्वत्‍ता से मेरा बहुत गहरा परिचय नहीं है, क्‍योंकि न तो उनका छात्र रहा न सहकर्मी और न हीं उनकी एक पुस्‍तक को छोड़ कर जो भी नेबुट्र (ट्रस्‍ट) से ही छपी थी, कोई अन्‍य पुस्‍तक पढ़ी। उनके विषय प्रतिपादन में सरलता और स्‍पष्‍टता ही उसमें लक्ष्‍य कर सका था। इस पुस्‍तक की चर्चा आई तो इसकी ओर ध्‍यान गया, पर कोई चारा न देख कर इंटरनेट पर जाना पड़ा जहां इस पुस्‍तक के ऐसे चौदह अंश दिए गए थे जिन पर संघ और भाजपा को आपत्ति हुई हो सकती है ।
दूसरा पक्ष इस तथ्‍य से है कि सामान्‍य नियम के विपरीत वह तीन पारियों तक – 2004 -१२ तक (ट्रस्‍ट) के अध्‍यक्ष बने रहे । मेरा उनसे मिलना (ट्रस्‍ट) में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टता को ले कर हुआ था जो इतनी व्‍यापक थी कि उसमें सबके अंधेरे कोने सुरक्षित थे और किसी पर आंच आने पर सभी एक दूसरे की मदद करते थे । इससे पहले मैं (ट्रस्‍ट) को एक वकील की नोटिस भी भेज चुका था।
हुआ यह था कि एक बार मेरी पुस्‍तक पंचतन्‍त्र की कहानियां की चौसठ हजार प्रतियों की बिक्री हुई । ऐसी बिक्री (ट्रस्‍ट) की पहल से ही होती है। सरकारों के पुस्‍तक खरीद के प्रस्‍ताव आते हैं जिसमें अधिकारी पुस्‍तक का नाम सुझाते हैं और उसका आर्डर मिल जाता है। उस साल तीन राज्‍यों को पुस्‍तक सप्‍लाई की नौबत आई और एक ही साल में उसके तीन संस्‍करण हुए। रायल्‍टी चार लाख साठ हजार बनती थी। उपनिदेशक लेखा को यह समझ में नहीं आ रहा था कि हिसाब कैसे लगाया जाय और उन्‍होंने मुझे इसमें सहायता के लिए बुलाया। सहायता मोलभाव का था। कुछ प्रतिशत उन्‍हें चाहिए था।
मैं पूरी रायल्‍टी गंवा सकता था पर रिश्‍वत नहीं दे सकता था इसलिए उन्‍होंने एक लाख का चेक लगे हाथ दे दिया और बाकी को समझने को उन्‍हें टाइम चाहिए था। मेरे लिए जो मिल गया वह भी कल्‍पनातीत था। पर साल के अन्‍त तक उनको हिसाब समझ में नहीं आया और उनकी अपेक्षा के अनुसार मैं उनके इस सन्‍देश को समझने को तैयार न हुआ कि इसकी बिक्री में हमारा भी योगदान होता है इसलिए हमारा ध्‍यान रखेंगे तो आगे भी इसका लाभ रहेगा। मैं आगे का लाभ भी त्‍यागने को तैयार था पर ध्‍यान रखने को नहीं अत: उन्‍होंने कंप्‍यूटर फिगर को अविश्‍वसनीय बताते हुए अनुमान लगाया कि बिक्री इतने से अधिक की नहीं हो सकती और मुझे एक लाख पचीस हजार का शेष भुगतान किया।
मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता था क्‍योंकि यदि वह मुझे न मिला तो सरकार के पास तो रहा।
परन्‍तु जो शरारत अगले साल की गई वह यह कि पुस्‍तक का मुद्रण ही न किया गया, जब कि यह अधिकार एकांउट्स का नहीं था। मुझे इस बात का खेद तो न था कि रायल्‍टी का पैसा नहीं मिला, वह तो अपेक्षा से अधिक था, पर मेरे पाठकों को पुस्‍तक न मिले यह कष्‍टदायक था। इस समय पर अध्‍यक्ष का पद रिक्‍त था और निदेशक साहित्‍य अकादमी से गए हुए एक सज्‍जन थे जिनका अधिकतर समय कलकत्‍ता में कटता था। यह वहां के स्‍टाफ को सूट करता था।
इस‍के बाद भाजपा की सरकार आई और उसकी रुचि के अख्‍यक्ष और निदेशक जो आइ ए एस थे आए। मैने पुस्‍तक का प्रकाशन न होने का कारण स्‍पष्‍ट करने के लिए पिछले घोटाले का जिक्र लिखित रूप में किया तो उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि चार साल पुराने मामले को उठा कर भुगतान कैसे किया जाय जब कि फाइल पर ऐसा नोट है।
मैंने सुझाया, इस पुस्‍तक की छपाई के लिए कागज खरीदा गया होगा, इसके प्रिंंट आर्डर दिए गए होंगे, आपके गोदाम के रजिस्‍टर में इसकी प्रतियों की ऐंट्री होगी, इनसे वास्‍तविक बिक्री का पता चल जाएगा और उसी क्रम में पता चला कि सभी एक दूसरे के इस हद तक सहयोग करते हैं कि स्‍टाक रजिस्‍टर गायब, प्रिंट आंर्डर का पता नहीं, जो आर्डर सप्‍लाइ के मिले थे वे नहीं। भाजपा की पसन्‍द के अध्‍यक्ष स्‍वभाव से बहुत सरल और प्रकटत: ईमानदार भी थे। मुझे उनकी ईमानदारी पर आज तक शक नहीं। उनको कारण समझ में आने से प्रकाशन तो तुरत आरंभ हो गया, पर पीछे के बारेे में उनकी समझ में न आए कि इतनी चीजों के गायब होने पर , नोट के विरुद्ध किसी को भुगतान कैसे किया जाय ।
मेरा आग्रह था, मुझेे भुगतान नहीं चाहिए, मुझे हिसाब चाहिए। वह हिसाब बैठ ही न रहा था। इसकी भरपाई के लिए लेखा बिभाग द्वारा एक नया तरीका निकाला गया कि जिन संस्‍करणों का पूरा भुगतान मुझे मिल चुका था उसकी रायल्‍टी देते हुए कम से कम आर्थिक क्षतिपूर्ति तो कर दी जाय और पहले संस्‍करण का अठारह हजार का चेक उसके वाउचर के साथ भेजा गया। मैंने लिखा, इसका पूरा भुगतान मुझे मिल चुका है, इसलिए यह मुझे नहीं चाहिए। मैंने चेक लौटा दिया।
स्‍वयत्त निगमों और संस्‍थाओं में हिसाब किस हद तक गड़बड़ किया जा सकता है इसका यह एक नमूना था। हिसाब देने को कोई तैयार नहीं। इसी मुद्दे को लेकर मैंने वकील के माध्‍यम से नोटिस भेजा था परन्‍तु इसी बीच सत्‍ता पलटी और विपिन जी आ गए तो सोचा उनसे मिल कर शिकायत करूं। यही वह अवसर था जिस पर मैं उनसे मिला था और उन्‍होंने समुची स्थिति को समझने के बाद सलाह दी, अब मुकदमे की बात छोडिए और इसे इग्‍नोर कर दीजिए। मैंने केवल यह आश्‍वासन चाहा कि वह भ्रष्‍टाचार पर अंकुश लगाएं। इसके लिए मैंने जो उपाय सुझाए वे भी उनको ठीक लगे और मेरे सामने ही उसका निर्देश भी दे दिया। अभी निदेशक के पद पर कोई नहीं आया था, उन्‍होंने कहा कि मैं इस पर एक योग्‍य और ऐसे व्‍यक्ति को नियुक्‍त करने का प्रयत्‍न करूंगा जो भ्रष्‍टाचार पर रोक लगा सके और कुछ समय बाद निदेशक के रूप में एक मुस्लिम महिला ने पद भार संभाला जो पुलिस सेवा में थीं।

Post – 2016-10-17

क्‍या थे कल तक देखते ही देखते क्‍या बन गए ।
अपने बारे में भी सोचो क्‍या थे और क्‍या बन गए ।
है बहुत मुश्किल बयां करना मगर आसां भी है
तुम अगर मुजरिम थे तो मुसिफ कहां से बन गए ।

Post – 2016-10-17

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्टर – 10

दूसरा नमूना साहित्‍यकारों के आन्‍दोलन का है। इसका आरंभ मेरे एक प्रिय लेखक ने किया जो बहुत प्रतिभाशाली हैं, पर जो कुछ विचित्र लिखने, विचित्र दिखने और विचित्र कर गुजरने के आदी है और इसके कारण समय समय पर चर्चा में रहते हैं। चर्चा में रहने वाले चर्चा से बाहर रहना पसन्‍द नहीं करते और ध्‍यानाकर्षण के लिए अक्‍सर अटपटी बातें करते रहते हैं, यह हम जानते हैं।

दूसरों से अलग और ऊपर दिखने की कलाकारों की चाह जिसे एक पद में लस्‍ट फार एक्‍सलेंस कहा जा सकता है – लीक छाडि़ तीनों चलें शायर, सिंह, सपूत – वह तो सभी साहित्‍यकारों की दुर्बलता है।

कर्नाटक में एक साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार से सम्‍मानित लेखक कलबुर्गी की हत्‍या हो गई । उन्‍हें पहले से धमकियां मिल रही थीं, इसलिए अपराधी की मोटी पहचान रही होगी। कलबुर्गी ने अपनी सुरक्षा को ले कर चिन्‍ता जताई थी, और वहां की कांग्रेस सरकार ने उन्‍हें सुरक्षा प्रदान भी की थी। सुरक्षा का आर्थिक पहलू या उससे उत्‍पन्‍न रुकावटों के चलते उन्‍होंने सुरक्षा लौटा दी थी और इसके एक पखवारे बाद ही बहुत जघन्‍य तरीके से उनकी हत्‍या कर दी गई थी। कर्नाटक सरकार की विफलता यह कि वह आज तक हत्‍यारों को गिरफ्तार नहीं कर पाई ।

कलबुर्गी साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त थे और दो वर्ष पहले ही उदयप्रकाश को भी साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त हुआ था, इसलिए इस बात से खिन्‍नता प्रकट करते हुए उदय प्रकाश ने साहित्‍य अकादमी की अकर्मण्‍यता पर चिन्‍ता जताई थी। विवादास्‍पद लेखन तो वह भी करते ही हैं। यदि कलबुर्गी के साथ यह हो सकता है तो किसी दिन हमारे साथ भी यह हो सकता है, यह चिन्‍ता भी रही होगी। मैंने भी उस चिन्‍ता को सही माना था और दूसरे बहुत मामूली राजनीतिक सवालों पर लामबन्‍द होने वाले साहित्‍यकारों से अपील की थी कि उन्‍हें इस विषय में सक्रियता दिखानी चाहिए। मेरी जानकारी समय से कुछ पीछे रहती है, क्‍योंकि तब तक कुछ संगठनों में इसे लेकर कई स्‍थानों पर क्षोभ जताया जा चुका था। अभी तक मुझे यह शुद्ध साहित्यिक सरोकार प्रतीत हो रहा था।

उदयप्रकाश ने अपने विरोध स्‍वरूप अकादमी पुरस्‍कार भी लौटाने की बात की थी। जल्‍द ही उन सभी लेखकों ने जो यह मोदी की आलोचना करते आए थे एक एक कर अपने पुरस्‍कार लौटाने आरंभ कर दिए। कन्‍नड के कुछ साहित्‍यकारों ने राज्य सरकार से प्राप्‍त पुरस्‍कार लौटा दिए। जब बात इज्‍जत की आ जाए तो आदमी जान तक दे देता है, पुरस्‍कार वापस करना तो छोटी बात है। मनोविज्ञान यह बन गया कि जो लोग पुरस्‍कार नहीं लौटा रहे हैं वे पुरस्‍कार के इतने लोभी हैं कि उनकी नजर में साहित्‍यकार की जिन्‍दगी की कोई कीमत नही। सम्‍मानित साहित्‍यकार लोभी सिद्ध किए जाने से बचने के लिए कतार में खड़े होने लगे। फिर इसे साहित्‍य से अलग ले जा कर राजनीति से जोड़ने के लिए दाभोलकर और पनसारे की हत्‍याओं को भी जोड़ा जाने लगा। मार्क्‍सवादी शब्‍द इस समय तक अपनी साख इस सीमा तक खो चुका था कि हत लेखकों के साथ बुद्धिवादी विशेषण का प्रयोग किया गया। सबमें एक बात समान केवल यह थी कि ये सभी वामपंथी थे और जैसा कि हम कई बार कहते रहे हैं, समाज को सुधारने से अधिक इनका ध्‍यान उसे आहत और अपमानित करने का रहता है और यह हिन्‍दू समाज तक सीमित रहता है।

यदि कोई आपसे पूछे कि बुद्धिवादी का अर्थ क्‍या होता है, तो आप कह सकते हैं, जो बुद्धिमान नहीं होता है उसे बुद्धिवादी कहते हैं। पर कलबुर्गी तो हंपी विश्‍व विद्यालय के उपकुलपति रह चुके थे, दूसरे दोनो साहित्‍यकार पत्रकार और खासे पढ़े लिखे थे। इसलिए कहा जाएगा जो धार्मिक आस्‍थाओं की अतर्क्‍यता काे मिटाने के लिए लेखन करते और आन्‍दोलन चलाते हैं उनके लिए यह प्रयोग आता है। आप इसे भी मान सकते हैं।

हम यहां इसके उस पक्ष को रखना चाहते हैं जो उस मूर्खता से जुड़ा हुआ है जिसमें यह मान लिया गया कि समझदार लोग यदि बाकी समाज को बेवकूफ मान ले और बेवकूफों को समझदार बनाने के लिए यह विश्‍वास पाल लें कि उनको उल्‍टा सीधा कुछ भी समझाया जा सकता है तो वे इसे मान लेंगे, यह समझदारी का चरम रूप है। इससे उत्‍तेजित जनता को लेकर इतना बड़ा विद्रोह आरंभ किया जा सकता है जिससे तख्‍ता पलट जाय। ऐसा ही हाल के दिनों में कुछ पश्चिमी देशों में हुआ भी और इसकी एक मिसाल गुजरात ने भी दी थी। यदि ऐसा हो गया, फिर सिंहासन खाली करो कि जनता आती है गाते हुए उल्‍टे सिंहासन पर कांग्रेस को बैठाया जा सकता है और अपने अच्‍छे दिनों की वापसी की जा सकती है। इस तरह की सोच को पारानॉयड सोच कहा जाता है । इसी सोच के लोग तर्कवादी की श्रेणी में वे लोग रखे जा सकते हैं जो कुतर्क और तर्क में अन्‍तर नहीं कर पाते। तर्क से समझ पैदा होती है, कुतर्क से उत्‍तेजना और उसके दुष्‍परिणाम।

जाने-माने वैज्ञानिक जयंत नार्लीकर ने एमएम कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने को नामंजूर करते हुए कहा था कि कानून-व्यवस्था सरकार की जिम्मेदारी है और जनाक्रोश इसे बनाए रखने के लिए जिम्मेदार लोगों की तरफ होना चाहिए।

परन्‍तु तीनों मामलों जिन सरकारों के प्रशासन में ये घटनाएं हुई वे कांग्रेस शासित थी जब ये सभी अकथित रूप में उसके और मोदीपलट खेल खेलने के लिए मैदान में आ चुके थे। इसे एक ‘प्रभावशाली’ अभियान का रूप देने के लिए जो घालमेल किए गए वे निम्‍न थे:

1. इस अभियान को सफल बनाने के लिए अखबारों, लेखों और दृश्‍य माध्‍यमों से जो तथ्‍य पेश किए जा रहे थे वे अधूरे या लगभग सुनी सुनाई बातों के स्‍तर के थे इसलिए उनमें ही परस्‍पर विरोध था। अनेक में यह बताया गया था कि हत्‍यारों ने सांकल खटखटाई और कलबुर्गी ने दरवाजा खोला और उसी समय उन्‍हें गोली मार दी । कुछ में यह बताया गया कि हत्‍यारे दो थे और छात्र बन कर गए थे । पर उनमें भी अनेक का मानना था कि कलबुर्गी ने दरवाजा खोला और उन्‍हें गोली मार दी गई। फिर यह कैसे पता कि वे छात्र बन कर गए थे। कुछ ने इसे सुधारते हुए कहा कि वे कुछ देर तक उनसे प्रश्‍न पूछते रहे और फिर गाेली मार कर चल भाग गए। कलबुर्गी मर गए तो किससे पता चला कि वे उसने प्रश्‍न करते रहे। इसकी जरूरत क्‍या पड़ी।

बहुत सारे कोनों को छानने के बाद आपको वह तस्‍वीर गढ़नी पड़ती है कि वे दो छात्र थे। कालबेल सुन कर उनकी पत्‍नी ने दरवाजा खोला। उन लड़कों के हाथ में कुछ कागज थे। उन्‍होंने कुछ सवालों के विषय में शंकानिवारण के लिए उनसे समय चाहा था। कलबुर्गी बहुत ही खुले और निरहंकारी स्‍वभाव के विद्वान थे, अन्‍यथा वह उनको भीतर न ले जातीं। वह मुड़ीं तो उनके साथ केवल एक छात्र भीतर गया, जिसे कुछ ‘समझना’ या समझाना था, दूसरा बाहर रहा । वह उसके लिए चाय आदि के लिए रसोई की ओर गईं कि इसी बीच उसने गोली मार दी और आवाज सुन कर वह मुड़ीं तब तक वह खुलेे दरवाजे से बाहर हो गया और उस मोटर सायकिल या स्‍कूटर पर जो तैयार था बैठ कर भाग गया।

2. हत्‍या के कारणों में हिन्‍दू संगठन, राम सेने आदि का नाम लिया जाता रहा और इन्‍हें हिन्‍दू संगठन मानते हुए हिन्‍दू सांप्रदायिकता के उभार से जोड़ते हुए भाजपा से और फिर मोदी प्रशासन की असहिष्‍णुता से जोड़ा जाता रहा। इस बात को समझने में आपको स्‍वय कुछ खोजबीन करनी पड़ती है कि कलबुर्गी लिंगायत संप्रदाय के थे और लिंगायत संप्रदाय के विषय में कुछ टिप्‍पणियाें के कारण दो दशक पहले ही उनके संप्रदाय के लोग धमकियां देने लगे थे। कुछ टिप्‍पणियों में भी यह पता नहीं चलता कि कलबुर्गी की वे टिप्‍पणियां या उनमें से कोई टिप्‍पणी किस बात को ले कर थी। खोज करने पर पता चलता है कि कलबुर्गी ने वीरशैव मत के संस्थापक, बासव, उनकी पत्नी और बहन के बारे में कुछ अशोभन तथ्य उजागर किए थे ।

उनके ये विचार मार्ग 1 में प्रकाशित हुए थे जिनमें दावा किया गया था कि बासवेश्व र की दूसरी पत्नीव नीलंबिके के लिखे वचनों की छानबीन के आधार पर यह दावा किया था कि अपने पति से उनका शारीरिक संबन्ध न था। इसके बाद उन्होंने एक दूसरे लेख में वीरशैव संप्रदाय के एक दूसरे कवि चन्न‍बासव के विषय में लिखा कि वह बासव की बहन नागमल्लिके के एक मोची से हुए विवाह से पैदा हुए थेा। इससे लिंगायत संप्रदाय के लोग आहत हुए थे और लिंगायत मन्दिर के प्रधान ने उनको 1989 में बुला कर आपत्तिजनक अंशों को निकाल देने को मजबूर किया तो उन लेखों को निकाल दिया था। इन्हें निकालने के बाद उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी जान और परिवार की रक्षा की चिंता से कातर हो कर मैंने बौद्धिक आत्मंहत्या कर ली थी।

1914 में बंगलूर में एक संगोष्ठी में अन्धविश्वास निवारण के औचित्य पर बोलते हुए उन्होंने यू आर अनन्तमूर्ति की 1996 में प्रकाशित पुस्तक ‘प्रतिमा-पूजन क्यों गलत है’, में उनके द्वारा दर्ज, उनके बचपन के अनुभव का हवाला दिया था जिसमें उन्होंने एक प्रतिमा पर यह जांचने के लिए पेशाब कर दिया कि देखें देवता इस पर नाराज होते हैं या नहीं और इस पर कहते हैं दक्षिण पन्थी संगठनों के लोगों ने दोनों लेखको को धमकाया था। संभवत: यही वह पृष्ठभूमि थी जिससे आतंकित अनुभव करते हुए यू आर अनन्तमूर्ति ने अपना वह बयान दिया था कि यदि मोदी के हाथ में सत्ता आई तो वह इस देश में नहीं रहेंगे। कुछ दिनों के बाद उन्‍हें अपनी गलती का बोध हो गया था और इसे स्‍वीकार भी किया था।

3. इस बात पर परदा डालते हुए कि कलबुर्गी को उनके ही संप्रदाय के रूढि़वादी और ऐसे लोगों ने भारा था जिनकी शिनाख्‍त करना कठिन न था, क्‍योंकि उन्‍होंने उन्‍हें धमकाया था, बुला कर अपना कथन बदलने को बाध्‍य किया था, फिर ऐसा करने के बाद यह कहने पर कि मैंने दबाव में ऐसा किया, अपने पूर्व मत को सही मानता हूं और फिर हत्‍या से पहले उन्‍होंने फिर उस संप्रदाय की दुखती रंग को छेड़ा था, इसलिए इस हत्‍या को किसी अन्‍य हत्‍या से नहीं जोड़ा जा सकता। इसके बावजूद न केवल इसके लिए लगातार खींचतान की जाती रही, अपितु जब एक रपट पर, जिसमें यह कहा गया था कि तीनों हत्‍याओं के पीछे एक ही संगठन का हाथ था, अपनी प्रतिक्रिया देते हुए रिरिजू ने बयान दिया कि इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि तीनों के पीछे किसी एक दल का हाथ था, तो उनकी भर्त्‍सना की जाती रही।

4. अब हम यदि यह जानना चाहें कि कांग्रेस सरकार आज तक अपराधी को पकड़ क्‍यों न सकी जब कि उसके बाद सत्‍ता में आई भाजपा सरकार ने महाराष्‍ट्र् में कांग्रेस शासन में हुई पनसारे और दाभोलकर की हत्‍याओं के अपराधियों को उनकी सही जगह पहुंचा दिया, तो इसका कारण यह है कि कर्नाटक में लिंगायत संप्रदाय केे मतदाताओं का अनुपात 15 -16 प्रतिशत है जो वोटबैंक की तरह काम करता है और इसके ही समर्थन से क्रांग्रेेस सत्‍ता में आई थी इसलिए इसके अपराधियों को हाथ लगाने का उसका साहस नहीं हुआ। परन्‍तु इस तथ्‍य काेे आज तक की चर्चाओं में लगातार छिपाया जाता रहा क्‍योंकि इससे भाजपा पर और उसके माध्‍यम से मोदी सरकार पर निशाना साधने का अवसर हाथ से जाता रहता है।

हम जब कह रहे थे कि आज की दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति के लिए, जिसमें मोदी केन्‍द्रीय राजनीति में आए, हमारे बुद्धिजीवियों की जिम्‍मेदारी बनती है क्‍योंकि समाज की मानसिकता सरकारेंं नहीं साहित्‍यकार और बुद्धिजीवी बनाते हैं और वे अपनी भूमिका तक न समझ कर राजनीतिज्ञों के इशारे पर तमाशे दिखाते रहे तो ऐसा क्‍यों कह रहे थे। यदि बुद्धिजीवी अपने को अधिक चालाक और अपने पाठकों और श्रोताओं को मूर्ख समझने लगें, और यह मान लें कि वे उन्‍हें जो चाहें समझा सकते हैं तो वे अपने को तर्कवादी मूर्ख तो मान सकते हैं पर बुद्धिमान नहीं। वे अपने को धूर्त तो कह सकते हैं पर बौद्धिक नहीं।

उन्‍हें धूर्त कहते हुए मुझे दुख होता है, बिरादरी अपनी ही है,पर सक्रिय राजनीति से जुड़ाव ने उनको धूर्तों और फरेबियों की जमात में बदल दिया। वे गैर जिम्‍मेदार राजनीतिकारों की तरह लगातार तथ्‍यों को तोड़, मरोड़, स्‍थानान्‍तरित और अतिरंजित करने की ऐसी आदत डाल चुके हैं कि उन्‍हें यह भी पता नहीं कि वे कुछ गलत कर रहे हैं। हालत यह कि स्‍वयं अपना सम्‍मान और पुरस्‍कार फेंकने वाले उसे फेंकू कहने लगे हैं जो जोड़ और मिला कर रखने की राजनीति कर रहा है। कबीरदास का हमाारे मित्र लगातार नाम लेते रहे हैं, पर वे आज होते तो उनकी लड़ाई किन नए पाखंडियों से होती । जाहिर है उनसे जो पुरस्‍कार ही नहीं अपना देश तक फेंकने का कारोबार कर रहे हैं और जो इसे संभाल और बचा कर रखने के लिए कृतसंकल्‍प है उसे फेंकू कह रहे हैं।

Post – 2016-10-16

मैं चाहता हूं तुम भी करो अपने दिल की बात
देखें तो वहां क्‍या है और कितने जुगों से ।
मैं चाहता हूं तुमको भी देखूं करीब से ।
बुत हो या बुतपरस्‍त हो और कितने जुगाें से ।
मैं चाहता हूं तुमको भी इंसान बनाना
किसकी धुनों पर नाचते हो कितने जुगाें से।
मैं चाहता हूं नीद से गफलत की उठो तुम
सपनों में कैद कबसे हो और कितने जुगों से ।

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बुरा नहीं है जमाना मगर भला भी नहीं
जिस से टकराता था सिर आज बह मिला ही नहीं
उम्र के साथ क्‍या हर चीज बदल जाती है
पीछे चलता था तेरे अब वह काफिला भी नहीं
न हकीकत में मगर याद में बहुत कुछ है
था कभी, अब न रहा, देखिए गिला भी नहीं।
मुझे भी देख, तेरे सामने हूं देख तो ले
न बुरा सोचा कभी आज तक भला भी नही।
16.10.16
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Post – 2016-10-16

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्टर – 9

मैं अपने बारे में जितनी खराब राय रखता हूँ उससे अधिक खराब राय कोई दूसरा रख नहीं सकता। जिन लोगों के लिए मतिमन्द का प्रयोग होता है, उनकी बिरादरी में अपने को क्यों शरीक करता हूं इसका कुछ आभास पीछे की किसी डाक में दे चुका हूं, पर पूरा नहीं। परन्तु इस सीमाबोध के बाद भी मैं अपने समवयस्कोंं और अग्रजों में से अधिकांश को कच्चे दिमाग का पाता हूं और अफसोस करता हूं कि जिन्दंगी भर ज्ञानकेन्द्रों की बादशाहत करने वालों तक दिमाग के इतने कच्चे क्यों हैं कि जो कुछ मुझ जैसे अल्प मति को भी दीख जाता है वे उनमें से कोई उसे देख क्यों न सका। इसका पहला बोध मुझे वैदिक इतिहास पर काम करते हुआ था और फिर सामाजिक प्रश्नों पर उनकी अधकचरी समझ से यह पक्का होती गई। इसका कारण यह है कि असाधारण प्रतिभा संपन्न होते हुए भी, उन्हों ने अपने सक्रिय जीवन के उतने घंटे उस ऊहापोह में नहीं गुजारे होंगे जितने मैंने सचाई को समझने के लिए लगाए होंगे। अधिकांश ने अपने निर्माणकाल में ही अपने को किसी विचारदृष्टि से जोड़ लिया और आगे केवल अध्ययनरत रहे, उसी दृष्टि के अनुरूप तथ्यों को अपनी ज्ञानसंपदा का अंग बनाते रहे, जब कि मैं जिसे जानता हूं या मानता हूं उसे भी कोई भी नया और अनमेल विचार या प्रमाण आने पर नये सिरे से जांचता हूं और जरूरी होने पर अपनी पुरानी मान्यता में परिवर्तन करता हूं। दूसरे लोगों के लिए जहां कुछ लोग या ग्रन्थं आप्त होते हैं, और इसलिए उनका नाम आते ही वे अपने सोच विचार को स्थगित कर देते हैं, मैं किसी को आप्त नहीं मानता। कुछ को आप्त मानने वाले उससे विपरीत दृष्टि वाले विचारक का नाम आते ही तौबा करने लगते है, मेरे लिए वह भी कभी तिरस्करणीय नहीं होता। मैंने यह गांधी जी से नहीं सीखा, पर देखा उनकी भी यही दृष्टि थी। व्यवक्ति नहीं, गुण या दुर्गुण या व्याधि के ग्रहण और निवारण का प्रयत्न हो तो हम आत्म- विजय कर सकते हैं, अपने मनोबन्धों से मुक्ति पा कर अपनी स्व को पा सकते हैं।

बौद्धिकों और सर्जकों के राजनीतीकरण ने उन्हें पैकिग बक्सों में दिया जिनमें उन उनके अकाट्य सत्य भरे मिलते हैं। वे अपने मनोलोक को अधिक और वस्तुअजगत को कम देखते हैं या मनोलोक को दृश्य जगत पर आरोपित करके देखते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वस्तुगत यथार्थ में जितना भी परिवर्तन हो जाए, उनके निर्णय नहीं बदलते। मतलब बौद्धिक अचलता का यह भाव उन्हें जड़ बनाए रहता है। मैं इसे तीन उदाहरणों से समझने-समझाने का प्रयत्न करूंगा।

पहला यह कि जैसा कि हम प्रमाण देते हुए बता आए हैं कि कैसे वामपंथी दलों और कांग्रेस में लीग की मानसिकता का प्रवेश हुआ। यदि उसका कोई निषेध कर सके तो उसका अनुग्रह मानूंगा। परन्तु कुछ तो उनकी निगाह काफिर थी कुछ हमें भी खराब होना था। हिन्दू या मुस्लिम में जो परहेज का भाव है और इसके कारण इनमें आरंभ से ही एक दूसरे से बचने का ही नहीं, अनिष्ट चाहने तक का भाव घर कर जाता है उससे न मुस्लिम लीग को मुक्त माना जा सकता है, न संघ को, न हिन्दूस महासभा, या उसकी संतान विश्व हिन्दू् परिषद को [कभी आपनेे गौर किया कि विश्वल हिन्दू‍ परिषद क्यास है? मुझे लगता है, यह पान इस्लामिज्म की ललक का हिन्दू संगठन में प्रवेश है। जिसे सचमुच विश्व पूर्वपद का प्रयोग करने का अधिकार है, वह है ईसाइयत। पर, यहां पर बातेंं ही बातें, ईसाई काम करता है।] मुक्त माना जा सकता है। और जिन दलों और संगठनों की आत्मा‍ में मुस्लिम लीगी सरोकारों ने प्रवेश पा लिया वे हिन्दू संगठनों और हिन्दू शब्द से उसी तरह का विरोध रखने की आदत डाल चुके हैं जैसे लीग, अन्य‍था आज के हिन्दू संगठनों के प्रति अपने असंतोष को प्राचीन इतिहास पर प्रक्षेपित न करते।

यदि इनमें कोई भी सर्वसमावेशी होता तो मोदी के पक्ष में खड़े हो कर दूसरों की इतनी तीखी आलोचना न करनी होती, जिसे सुनने की उन्हें आदत नहीं है। मेरी इस पक्षधरता के मूल में यह तथ्य है कि संकीर्णता और कुछ अन्यू सीमाओं के बावजूद जिनका दूसरों को पता तक नहीं है, मैं यह पाता हूं कि सर्वसमावेशिता का दर्शन न ईसाई समाज में था, न ही इस्लाम में। यह केवल हिन्दू मूल्यों में एक विचित्र अन्त र्विरोध के साथ रहा है । हम तुम्हें अपने में मिलाएंगे नहीं, तुम्हेंं अपने ढंग से रहने देंगे। असमावेशी समुदायों में रहा है कि हम तुम्हें सहन नहीं कर सकते, परन्तुं अपने में मिला सकते हैं।

ईसाई जगत में सोलहवीं शताब्दी तक भिन्ने को सहन करने की क्षमता नहीं रही। या तो उसे मिटा देते थे या धर्मान्तंरित कर लेते थे। यह दूसरा भी बहुत बाद में आरंभ हुआ अन्यथा रंगभेद के कारण पहले वे उन्हें इस योग्य भी नहीं समझते थे। कम से कम इस मानी में इस्‍लाम उनसे बहुत आगे था।

जिन कारणों से उनमें विगत कुछ शताब्दियों में अपने से भिन्न को सहन करने की उदारता आई उसका एक प्रधान कारण भारतीय सभ्यता से उनका परिचय था। व्यवहार में भी हिन्दू संगठनों ने दंगे नहीं भड़काए हैं और इसके कारण कई बार इनका उपहास करते हुए हिन्दू समाज को कायर तक बताया जाता रहा है जिससे बड़ा प्रमाण मेरे कथन का नहीं हो सकता। फिर भी इस समस्या पर निर्णायक रूप में कुछ कहने के लिए जितनी गहरी जानकारी चाहिए वह मेरे पास नहीं है।

गोधराकांड की प्रतिक्रिया में गुजरात का घट जाना हिन्दू संगठनों और मूल्यों से परहेज करने वालों के लिए अन्धे के हाथ में बटेर आने जैसा था। इससे पहले और बाद में भी गुजरात में कई बार अकारण, निरपराध लोगों की हत्या और उपद्रव के कांड होते रहे हैं। हिन्दू चेतना में अपराधी को दंडित करने और निरपराधों को अपराधियों के किए का दंड न देने का विवेक अनेक कटु अनुभवों के बाद भी बना रहा है, जब कि दूसरे समुदाय अंधो की तरह निरपराधों की हत्या और आगजनी पर जुट जाते रहे हैं। यदि कुछ लोगों का यह दावा मानी रखता है कि पुलिस बल का सांप्रदायीकरण हुआ है तो इसके कारण अन्यत्र तलाशे जा सकते हैं। यदि पुलिस बल की तरह अधिकांश हिन्दू जगत सांप्रदायिकता का शिकार हो चुका होता तो वोट बैंक की राजनीति करने वालों के बुरे दिन कबके आ चुके होते।

हिन्दू समाज में वह समावेशिता आज भी है, दूसरों में नहीं है, इसके बाद भी सारे आक्रमण हिन्दू मूल्यों मानों और इसकी सांस्कृतिक उपलब्धियों पर होते रहे। इस बोध ने मेरे चित्त को कई रूपों में पिछले चालीस सालों से मथना और विनाशवादी व्याख्यााओं का खंडन करने को प्रेरित किया, यह बता चुका हूं।

जिन्हें यह भ्रम हो कि मैं मोदी का समर्थन करता हूें उन्हें यह जान लेना चाहिए कि मैं मोदी को अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप पा कर उनकी उस समावेशी सोच को देखने की शक्ति रखता हूं जब कि दूसरे इसे खो चुके हैं।

देका ने कहा था ”मैं सोचता हूं, इसलिए मैं हूं।’ इसी सूत्र को ले कर मैं मानता हूं कि जो सोचते नहीें, जो संगठनों और दलों की सोच से बंधे हुए हैं, जो भीड़ की मानसिकता से ग्रस्त हैं, वे असंख्य हो कर भी शून्य’वत होते हैं। वे अपना आपा, अपना बजूद, खो चुके होते हैं और इसलिए उनकी मान्य ताओं में अन्तर नहीं आता और उनकी मान्‍यताओं से लोक प्रभावित नहीं होता। वे आपस में ही सही गलत होते रहते हैं।

पहली बात, जिन सांसदों ने और इसी तर्ज पर बहुत चमकदार प्रतीत होने वाले बुद्धिजीवियों के दल ने हस्ताक्षर अभियान चलाते हुए गुजरात कांड की आड़ ले कर मोदी पर और संघ पर हमला बोल दिया, क्या उनमें से किसी ने गोधरा के कर्ताओं और उसकी नृशंसता की निन्दा की ? नहीं। उल्टे उन्हों ने अपनी अकल्पनीय संवेदनहीनता का परिचय देते हुए उसका बचाव करने की कोशिश की।

क्या उनमें से किसी में यह बोध बना रहा जिसे हमने ‘शूच्यग्रा हि अनर्थका भवन्ति’ के माध्यम से याद दिलाने का प्रयत्न किया था ? नहीं।

याद दिलाने के बाद भी किसी के विचार में परिवर्तन आया ? नहीं।

क्या उनमें से किसी ने उसका तार्किक खंडन किया? नहीं ।

क्या इस कांड से पहले संघ के बारे में उनके मन में कम जुगुप्सा थी? नहीं।

क्या किसी ने अपनी चर्चाओं में इस बात पर ध्यान दिया कि सांप्रदायिक दंगों से बचने का सबसे अधिक श्रेय माकपा के शासन को दिया जा सकता है, परन्तु उसमें भी उसके एक घटक दल के नेता ने किदिरपुर कांड कराया तो इसके नियन्त्रण में तीन दिन लग गए थे और तीन दिन में ही मोदी ने गुजरात के इतने भीषण कांड पर नियंन्त्रण पा लिया और इसके लिए हिंसा या आगजनी में लिप्त किसी व्यक्ति को गोली मारने के विकल्प का प्रयोग तक किया? नहीं।

क्या जांच पड़ताल की सभी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद, केन्द्र में कांग्रेस शासन के दौरान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल की पड़ताल के बाद मोदी को दोष मुक्त करार देने के बाद आप में से किसी ने दोष मुक्त माना ? नहीं।
मानते तो 2013 के अपने मूर्खतापूर्ण ज्ञापन में गुजरात को ले कर वही हो हल्ला न मचाते।

अब आगे देखें कि जो लोग अमेरिकी राष्ट्रपति को मोदी को वीजा देने से इन्कार करने की अर्जी दे रहे थे, उसके कारण उनकी घरेलू लोकप्रियता घटी या बढ़ी? घटी, यह तो उन भर्त्सनापूण टिप्पणियों से ही प्रकट है जिनमें एक भी उनके समर्थन में न थी।

मोदी को इसका लाभ मिला या हानि हुई ? लाभ मिला, सीमित ही सही, यह तो वह भी मानेंगे, पर यह नहीं मानेंगे कि उन्हों ने कुछ गलत किया।

उसी ओबामा ने मोदी की ‘ताजपोशी के समारोह में स्वयं शरीक हो कर और बन्धु्त्व के स्तर पर व्यवहार करते हुए उनके मंसूबों पर पानी फेरा, और बाद में मोदी ने मोदी मोदी मोदी कोरस के बीच अमेरिका को एक सिरे से दूसरे सिरे तक मापा, इससे मन में कोई अपराध बोध पैदा हुआ? नहीं । मोदी के सूट पर दूरबीन से नजर रखने वालों को यह तो दिखाई दिया कि उसकी धारियों में मोदी का नाम अंकित था, पर पूरे आयोजन में अपनों को, पड़ोसियों को, और दुनिया को शान्ति प्रयास और पारस्परिक सहयोग से आगे बढ़ने का जो अपूर्व कूटनीतिक कदम उठाया उसकी महत्ता भी दिखाई दी या नहीं? उत्तर नहीं में मिलेगा।

भारत का आम आदमी और भारत से बाहर पूरी दुनिया को जो कुछ दिखाई दे रहा था वह उन्हें दिखाई दे रहा था? नहीं ।

आज तक के कारनामों में मोदी का कोई कारनामा उन्हें ठीक लगा? नहीं।

उनके विचारों में आज तक कोई परिवर्तन आया? नहीं ।

वे जहां थे वहीं खड़े हैं । ऐसे लोगों को जड़मति कहना उचित नहीं लगता, किसी और शब्द की तलाश करनी होगी जिसमें अरविन्द कुमार जी और अजित वडनेरकर हमारी सहायता कर सकते हैं । कारण मैं पहले ही बता आया हूं, जो सोचते नहीं वे होते नहीं। वे जो कुछ थे वही बने रहते हैं।

Post – 2016-10-15

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 8

राजनीतिक दलों के लिए साहित्‍य और साहित्‍यकार की राजनीतिक पहल में अन्‍तर है। साहित्‍य विचारशून्‍य नहीं हो सकता, विचार और भाव एक दूसरे से प्राय: इतने जुड़े होते हैं कि दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। कहें विचारशून्‍य साहित्‍य भावशून्‍य लफ्फाजी का रूप ले सकता है। शब्‍द कौशल से आगे नहीं बढ़ सकता।

परन्‍तु जब हम विचार को राजनीति तक सीमित कर देते हैं तो वैचारिक पंगुता के शिकार होते हैं। इनमें भी दो रूप होते हैं, एक किसी राजनीतिक दल या उसकी विचारधारा से लामबन्‍द हो कर उसके कार्यों, अशक्‍यताओं, दुष्‍कृत्‍यों का समर्थन करना और इस समर्थन के लिए जुटाए तर्कजाल को विचार मान लेना। वामपंथी दलों के अपने अपने प्रगतिशील संगठनों की सीमा यही रही। यहां आप बौद्धिक तक नहीं रह जाते, बौद्धिक लठैतों में बदल जाते हैं, जो एक दूसरे का सिर फोड़ सकते हैं परन्‍तु सचाई को समझ नहीं सकते। इनका नेतृत्‍व जाहिर है, निखट्टू किस्म के साहित्‍यकार करते हैं, या यदि अच्‍छे साहित्‍यकार पार्टी से अपनी संबद्धता के कारण इनसे जुड़ गए तो जुड़ने के बाद और जुड़े रहने की अवधि तक निखट्टू बने रहते हैं । एेसे लोग अपने को और अपने दल को सही सिद्ध करने के लिए हर तरह की घपलेबाजी कर सकते हैं और इस क्रम में साहित्यिक और सांस्‍कृतिक क्षरण ही नहीं अपितु बौद्धिक और भाषागत क्षरण का भी आरंभ कर सकते हैं। यह प्रधान कारण है कि संगठनों को निकट से देखने के बाद इनसे जुड़े लेखकों के बारे में मेरी राय बहुत अच्‍छी नहीं रही है । किसी संगठन या मंच के सहारे ऊपर चढ़ने वाले लेखक लताओं की तरह होते हैं जिनकी रीढ़ या तना कमजोर होता है और वे अपने दम पर खड़े नहीं हो सकते। परजीवी तो नहीं, परन्‍तु परावलम्‍बी निश्‍चय ही।

जो लेखक अपने बल पर खड़ा नहीं हो सकता वह बौद्धिक बौनेपन का शिकार रहेगा ही । परन्‍तु यदि किसी देश या समाज का बौद्धिक क्षरण इस सीमा तक हो चुका हो कि उसमें बौनेपन को ही महिमा का मानदंड बना दिया जाय तो उस समाज का बौद्धिक, नैतिक और सांस्‍कृतिक पतन टाला नहीं जा सकता। हमारे देश के साथ ऐसा ही हुआ।

बंधुआ बौद्धिक विभिन्‍न राजनीतिक दलों के खूंटों से बंध कर अपने बंधुआ या प्रतिबद्ध होने पर इस हद तक गर्व करते रहे कि अभिव्‍यक्ति और विचार की स्‍वतन्‍त्रता तक उन्‍हें वैयक्तिक ढुलमुलेपन का प्रमाण प्रतीत होती रही! ऐसे लेखकों और विचारकों के प्रति वे घृणा का प्रचार करते रहे और एक दौर था कि वे इनसे इतने सहमे हुए थे कि सम्‍मान का क्रमिक ह्रास होते देखते हुए वे विलीन हो गए और अपने पीछे वह शब्‍दसंपदा इस विश्‍वास से छोड़ गए कि कभी न कभी तो इसे कोई कहीं समझेगा।

अपने उत्‍साह में प्रतिबद्ध समुदाय ने अपनी बुद्धि तक उन पार्टियों को अर्पित कर दी जिनकी सलाह थी कि अच्‍छे बच्‍चे सोचा नहीं करते । बड़ों का कहना मानते हैं । अच्‍छे लेखक अपनी अक्‍ल से काम नहीं लेते, उस दल के निर्देशों का पालन करते हैं जिससे वे जुड़े हैं, और ढिठाई करने पर बाहर भी किए जा सकते हैं। बाहर उनका इतिहास जान कर कोई आश्रय न देगा। इस विवशता में वे अपनी विचार और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता भी उन संगठनों को अर्पित करते रहे, उनके किए को ही नहीं, उनके अनकिए और अपकार्यों को भी सही मानते और दूसरों काे सही बताते रहे और दूसरी ओर अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता की उस हद तक वकालत करते रहे जहां पुलिस को भ्रम पैदा हो जाए कि यह राष्‍ट्रद्रोह है और अदालत को इस बात की प्रतीक्षा रहे कि अभी कहा है, कर लें तो आना। वैसे तो पुलिस का व्‍यवहार भी ऐसा ही होता है जब तब । सुना एक व्‍यक्ति ने शिकायत की कि अमुक मुझे जान से मारने की धमकी दे रहा है तो पुलिस का जवाब था अभी कहा है न, जब जान से मार दे तो आना। वह मारा तो गया पर पुलिस के पास नहीं पहुंच पाया।

इस देश के सार्विक क्षरण का एक रूप यह भी रहा कि इसमें सभी तरह की स्‍वतन्‍त्रताएं मिलती चली गई हैं और लोग मर्यादा तक भूल गए हैं इसलिए विचार का क्षरण, भाषा का क्षरण और नैतिकता का क्षरण एक दूसरे को अनिवार्य बनाते चले गए । इसका श्रेय केन्‍द्रीय प्राेत्‍साहन से चलने वाले विश्‍वविद्यालयों को और उनको संचालित करने वाली नीति को सबसे अधिक जाता है। यह क्षरण प्राइमरी शिक्षा से ले कर विश्‍वविद्यालय स्‍तर तक दिखाई देता है। चिंतको, आलोचकों, रचनाकारों और कलाकारों की सोच और सर्जनात्‍मकता से लेकर पत्रकारों, शिक्षकों, संचारमाध्‍यमों, राजनीतिकारों और राजनेताओं तक ही इस गिरावट को नहीं देखा जा सकता, प्रशासनतन्‍त्र पर, न्‍यायतन्‍त्र पर, विधायिका पर भी इसे देखा जा सकता है।

इसे प्रतिरक्षा प्रणाली के राष्‍ट्रीय अभाव या नैशनल इम्‍यून डिफिशिएंसी के रूप में रेखांकित करना होगा और इस महाव्‍याधि की जिम्‍मेदारी उन पर आती है जो चेतना और नैतिक प्रतिरोध क्षमता का निर्माण करते हैं।

यह है बौद्धिक का अपना स्‍वायत्‍तक्षेत्र जिसके अनुशासन में वह राजनीति और राजनेता आते हैं जिनके पीछे उसने भिखारी की तरह भागना आरंभ कर दिया। यह भिखारी प्रवृत्ति जो आज जनता तक पहुंच चुकी है वह आपात काल के साथ या उससे कुछ पहले नूरुल हसन साहब के शिक्षामंत्री बनने के साथ आरंभ हुई थी जिसमे जी भर कर खाओ पर जैसा मैं कहता हूं वैसा इतिहास लिखो, वैसा साहित्‍य पाठ्यपुस्‍तकों में आने दो, वैसा समाजशास्‍त्र लिखो। हम तुम्‍हारा मुह चांदी से इतना भर देेेगें तुम बोलना चाहोगे, बोलेगी चांदी, तुम सोचना चाहोगे सोचेगी चांदी और तुमकाे इस चांदी के बल पर ही इतना पवित्र बना देंगे कि तुम आसमान में चांद की तरह चमकोगे। बस एक ही प्रबन्‍ध करना है कि यह अंधेरा बना रहे। कोई तुम्‍हारी चीरफाड करने वाला न पैदा हो जाय। इसलिए शिक्षकों और पत्रकारों के वेतन में जिस तरह की वृद्धि उन दिनों में की गईं वह पहले अकल्‍पनीय थी। पत्रकारों को इतना महत्‍व दिया गया कि उनमें से अधिकांश को यह भ्रम पैदा हो गया कि सरकार में बैठे लोग हमारे इशारे पर फैसले लेते हैं। प्राथमिक कक्षाओं से ले कर उच्चतर माध्यमिक स्तर तक की सभी पाठ्य पुस्तकों का लेखन उस मंडली को सौंप िदया गया जिनको इस योजना का अंग बनाया जा चुका था और उनकी अकूत रायल्टी उनके अकादमिक विवेक पर ब्लिंकर का काम करती रही।

इसी सार्विक क्षरण के दौर का परिणाम था वह क्षरण जिसमें भारतीय संसद के दोनों सदनों के हतचेत सांसदों ने सीधे अमेरिकी राष्‍ट्रपति को संबोधित करते हुए वह ज्ञापन दिया था जिसे अाप भूल चुके होंगे इसलिए इसकी याद ताजा कराना जरूरी है। अमेरिका से उद्घाटित इस अनुरोधपत्र को हिन्‍दू न छापता तो छापता कौन:

WASHINGTON, July 23, 2013
Updated: July 24, 2013 04:27 IST
64 MPs urged Obama to keep visa ban for Modi
diplomacy
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Sixty-four members of India’s Parliament, 25 from the Lok Sabha and 39 from the Rajya Sabha, petitioned U.S. President Barack Obama to advise the State Department to hold firm to its 2005 decision to deny Gujarat Chief Minister Narendra Modi an entry visa, owing to his association with the 2002 Gujarat riots, in which more than a thousand people, many Muslim, were killed.
In their letters to Mr. Obama, one from each House of the Legislature sent on November 26 2012, the MPs from 15 political parties across 15 states said that they “respectfully urge [Mr. Obama] to maintain the current policy of denying Mr. Modi a visa to the U.S.” considering Mr. Modi “presided over one of the worst sectarian massacres in the history of independent India, which led to the killing of over 2,000 people, the rape of hundreds of women and the displacement of over 150,000 people.”
Although the letters were sent nearly eight months ago their release to the media appears to be timed to coincide with the ongoing trip of BJP President Rajnath Singh to the U.S. East Coast. Mr. Singh is visiting New York and Washington for a slew of mostly private meetings with friends among the Indian-American community here, although he has been quoted saying to reporters in New York that he would “appeal to the U.S. government to clear US visa to the Gujarat CM.”
Reacting to the release of the letters Ahsan Khan, President of the Indian American Muslim Council said, “It is noteworthy that Mr. Modi evokes such strongly negative reactions from elected representatives in India as well as the U.S., across the ideological spectrum.” Raja Swamy, a representive of the Coalition Against Genocide remarked, “After long having denied any desire on the part of Mr. Modi to acquire a U.S. visa, Mr. Rajnath Singh’s visit to the U.S.,to lobby lawmakers here for Modi’s visa reeks of hypocrisy.”
The petitioners in the letter to Mr. Obama hail from a diverse range of Indian states, including Tamil Nadu, West Bengal, Uttar Pradesh, Kerala, Jammu and Kashmir, and Andhra Pradesh.
Among them are several members of the Congress Party, the DMK, Sitaram Yechury of the Communist Party and pro-Dalit leader Thol Thirumaavalavan of the Viduthalai Chiruthaigal Katchi.
The letters from New Delhi were sent out even as senior State Department Officials including erstwhile Department Spokesperson Victoria Nuland and now-retiring Assistant Secretary of State for South and Central Asia, Robert Blake, were quoted saying that Mr. Modi was “welcome to apply” again for a visa and that the review of that application would be “grounded in U.S. law.”
Alluding to these comments among “disconcerting” reports that the State Department could be considering a change in its “longstanding policy” with respect to Mr. Modi’s U.S. visa, the Indian MPs were unequivocal in their request that Mr. Obama recognise Mr. Modi’s “personal complicity in the pogrom,” as documented by India’s National Human Rights Commission (NHRC) and others.
While some of these State Department comments came in April this year, in May pro-Modi lobbies faced strong “push back” when the U.S. Commission on International Religious Freedom (USCIRF), which monitors religious freedom violations abroad, urged the State Department not to reconsider the decision to deny Mr. Modi a visa.
The letters from the Indian MPs noted that along with the USCIRF’s recommendations a number of U.S. Congressmen wrote to then-Secretary of State Condoleezza Rice to express their profound concern over a possible visit to the U.S. by Mr. Modi in March 2005 and again in June 2008, and it was based on these concerns, that the visa denial was “rightly kept in place.”
Similar to the USCIRF report the MPs’ letters referenced the conviction of a sitting member of the Gujarat Legislative Assembly, Maya Kodnani of the BJP, and described it as a “damning indictment of the Modi administration,” and “proof that the pogrom was planned and executed at the highest levels of the state government.”
The MPs also made a broader case for the Obama administration to stick to its line in the sand so far as Mr. Modi’s entry into the U.S. was concerned. They argued that the visa ban would be consistent with U.S. law and the shared values of the U.S. and India.
It was important for the ongoing struggle for justice in Gujarat, they noted, where over 16,000 survivors of the 2002 pogrom continue to live in refugee colonies lacking basic amenities and of the hundreds of women raped in 2002 there have been convictions in only two cases.
Further, the MPs cautioned, any change in the policy to deny Mr. Modi’s visa application “would legitimise human rights violations and seriously impact the nature of U.S.-India relations by sending a message that the U.S. values economic interests over and above the universal values of human rights and justice.”
In this context the MPs highlighted Mr. Modi’s “relentless efforts” at rehabilitating his image, including a campaign by his PR firm APCO Worldwide to create “an illusion” of Gujarat as a prosperous, progressive state. “The reality on the ground could not be further from the truth,” they said.
The initial denial of visa by the U.S. was issued under Section 212(a)(2)(g) of the U.S. Immigration and Nationality Act, which makes any foreign government official who was responsible for or directly carried out, at any time, “particularly severe” violations of religious freedom ineligible for a visa.
आप थक रहे होंगे फिर भी यह बता दें कि यह ज्ञापन जिसने तैयार किया था उसने अपनी ओर से लोगों के नाम जोड़ लिए थे क्‍योंकि सीताराम येचुरी ने इस बात से इन्‍कार किया था कि उन्‍होंने इस पर हस्‍ताक्षर किए थे। ऐसे दूसरे बहुतेरे रहे हो सकते हैं। इसके हिन्‍दू में प्रकाशित होने के बाद छत्‍तीस के लगभग टिप्‍पणियां आईं थी जो विविध दृष्टियों से इनके अनौचित्‍य को प्रकट कर रही थीं और एक भी ऐसी टिप्‍पणी नहीं थी जो इन टिप्‍पणियों के वेध से आहत बुद्धिभ्रष्‍टों के घाव पर मरहम ही लगाती। उसे हिन्‍दू तो बोल्‍ड और बिग फेस में प्रकाशित करने के इन्‍तजार में भी रहा होगा।

आप यदि सोच सकते हैं तो सोचें ऐसे जनप्रतिनिधि, ऐसे दल, इनसे जुड़े लोग मोदी के सत्‍ता में आने के बाद असुरक्षित न अनुभव करेंगे, अपने को बचाने के लिए असुरक्षा का विस्‍तार नहीं करेंगे तो, तो क्‍या करेंगे। असुरक्षा मोदी के कारण है जिसने ऐसे लोगों के विरुद्ध ऐसा कुछ नहीं किया कि वे यह तक शिकायत कर सकें कि हमारे विरुद्ध यह दंडात्‍मक या आपराधिक कार्रवाई इसलिए की जा रही है कि हमने मोदी का विरोध किया था, या उनके अपने भय के कारण कि अभी तक तो कुछ नहीं हुआ, कल पता नहीं क्‍या हो जाय और यह असुरक्षा की भावना दूसरे दलों के क्षरण और मोदी की लोकप्रियता मे परोक्ष वृद्धि के अनुपात में बढ़ती जा रही है। असुरक्षा का जनक कौन है ?

Post – 2016-10-14

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 7 (‍क्षेपक)

मुझे मोदी से अधिक चिन्‍ता भारतीय बुद्धिजीवियों की है जो स्‍वतन्‍त्रता प्राप्ति के बाद से ही वाम के प्रति अधिक आकृष्‍ट रहे हैं और इसके लिए खतरे भी मोल लिए हैं। इनमें से वे जो पहले अपने को कम्‍युनिस्‍ट मानते थे और राेजी रोटी के लिए माफी मांग कर सरकारी नौकरी में आ गए थे, वे भी लाचारी में जो कुछ भी कर बैठे हो, भीतर से वाम से ही जुड़ाव रखते थे और कम्‍युनिस्‍टों के सौ खून माफ करने को तैयार रहते थे। कुछ तो है वाम में जिसके सपने उन विवशताओं के कारण समझौता करने वालों के मन में भी बने ही रहते थे, जिनके कारण दूसरे सुयोग्‍य होते हुए भी बेकारी और तंगहाली में जीते रहे पर हार न मानी। मेरी बेकारी के दिन थे। मेरे मित्र विष्‍णुचन्‍द्र शर्मा को यदि उनके पैतृक स्‍नेह संबंध के कारण कोई नौकरी देने को कहता, तो वह मुझे लेकर पहुंच जाते, मुझे नहीं इसे दे देा। तंगदस्‍त होते हुए भी स्‍वयं इसलिए स्‍वीकार नहीं करते कि पुलिस जांच में यह तो पता चल ही जाएगा कि मैं कम्‍युनिस्‍ट हूं। माफी मांगूंगा नहीं, नौकरी चली जाएगी, या मिलेगी ही नहीं।

वामविरोधी साहित्‍यकारों में भी ऐसे तेजस्‍वी लोग थे, जो बेकारी झेल सकते थे पर सरकारी चाकरी नहीं कबूल कर सकते थे। उन्‍होंने सरकारी नौकरी को राजाश्रय बताते हुए खासी हुड़दंग भी की, पर उनमें से कुछ प्रतिभाशाली होते हुए भी ऊर्ध्‍वमेरु नहीं थे। अनेक स्‍वाभिमानी थे और कम्‍युनिज्‍म के अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर प्रतिबन्‍ध के विरोध्‍ा के कारण सीआइए के जाल में जा फंसे थे। कुछ अपनी प्रतिभा पर अधिक भरोसा करने के कारण ऊंचे मोल और ऊंचे बोल की प्रतीक्षा में थे। इनमें से एक किसी सेठ संचालित संस्‍था में काम करने लगा तो कुछ समय तक राजाश्रय वालों ने सेठाश्रय की बहस छेड़ी। ये दोनों बहसें मुझे वाहियात लगी थीं, पर राजाश्रय का सवाल उठा कर दूसरे साहित्‍यकारों को जलील करने की कोशिश को यह जवाब मिलना चाहिए था। सेठाश्रय की भर्त्‍सना करने वालों में कई ने वही सेठाश्रय अपनाया यह भी एक विडंबना है। एक तथ्‍य अंकित कर दें कि राजाश्रय का विरोध करने वाले और बाद में सेठाश्रय प्राप्‍त करने वाले व्‍यक्ति ने उससे पहले सीआईए से आर्थिक लाभ उठाना चाहा था, इसकी विश्‍वसनीय सूचना मेरे पास है, पर प्रमाण नहीं। जिस ‘अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता’ के वह पक्षधर थे, उसे वह अपने अधीनस्‍थों को देने को तैयार नहीं थे, यह रवीन्‍द्र कालिया पर विश्‍वास करें तो सही हो सकता है। जिस तानाशाही के विरोधी थे, वह अपनी संस्‍था में वैसे ही तानाशाह के रूप में जाने जाते रहे। ये लोग आत्‍मकेन्द्रित थे और अपने को आगे बढ़ाने के लिए समझौते कर सकते थे। जिस व्‍यक्ति की बात मैं कर रहा हूं उसने शंकर गुहा नियोगी के हत्‍यारों द्वारा अपना कलंक धोने के लिए तत्‍समय सर्जित और प्रदत्‍त अ-सम्‍मान मात्र एक लाख रूपये के लोभ में स्‍वीकार कर लिया। विडंबना देखिए, अपनी प्रतिभा के मामले में ज्ञानपीठ पुरस्‍कार पाने वाले बहुतों से बहुत बड़ा था। पैसे के पीछे पागल न होता, अपनी अध्‍यापकीय आय से ही सन्‍तुष्‍ट रहता तो जो कुछ और जितना उसने सिरजा होता उसमें उसके साहित्यिक कद का आरेख क्‍या बनता यह हम नहीं जानते, जो कुछ तब तक रचा था वही कलाकारों और साहित्‍यकारों काे मुग्‍ध करता रहा। आप न जानते हों तो यह जानना उपयोगी होगा कि जिन दिनों अज्ञेय की ज्ञानपीठ से प्रकाशित सभी पुस्‍तकों की रायल्‍टी एक हजार को पार नहीं कर पाती थी, गुनाहों के देवता की रायल्‍टी सत्‍ताइस सौ थी जिसे आज के मूल्‍य में कनवर्ट करें तो सत्‍ताइस लाख मानना होगा।

इसलिए उस सात्विक दौर से अपरिचित आज के दक्षिणपंथी सोच के लोग जब वामी कह कर किन्‍हीं लोगों को उसी तरह गालियां देते हैं जैसे वे इन्‍हें चुनिन्‍दा गालियां देते हैं तो मुझे अन्‍धे अन्‍धा ठेलियां की याद आती है। सचाई यह है कि हम अपने क्षेत्र की मर्यादाओं को भूल जाते हैं। अपने घर का बादशाह दूसरे के घर में चेरा या सेवक बन कर ही जगह पाता है। स्‍वामी बन कर घुसना चाहे तो निकाल दिया जाएगा। घर की अपनी पवित्रता उसकी अपनी आवश्‍यकताओं का पुंजीभूत रूप होती है। कोठे पर मनचलों का स्‍वागत और सम्‍मान है, पर ब्रह्मचारी जी घुस गए और ज्ञान बघारने लगे तो धक्‍का दे कर निकाल ही नहीं दिए जाएंगे, उनके प्रति कोई सहानुभूति भी नहीं दिखाएगा।

एक सदाचारी व्‍यक्ति यदि कोई पद्य रचना कर दे तो उसकी सदाचारिता के कारण क्‍या हम उस पिटी पिटाई तुकबन्‍दी को कविता मान लेंगे? अच्छी कविता मानने का सवाल ताे बाद में आता है। कविता का कविता होना, और कविताओं में उत्‍कृष्‍ट कविता होना, नैतिकता से संबंध नहीं रखता, किसी अन्‍य कार्यक्षेत्र की सेवा से संबंध नहीं रखता। नैतिकता, सौन्‍दर्य और पांडित्‍य चिकित्‍सा के लिए विजातीय मानक है। चिकित्‍सक के लिए उसके रोगी की नैतिकता का नहीं, उसके रोग की प्रकृति का प्रश्‍न ही केन्‍द्रीय होता है। नैतिकता के तकाजे कार्यक्षेत्र के अनुसार बदलते रहते हैं। हमने आरंभ में ही साहित्‍य की स्‍वायत्‍तता को क्‍यों साहित्‍येतर सरोकारों को समर्पित कर दिया, इसका फैसला करने की योग्‍यता यदि मुझमें हो भी तो इस पर जितने गहन अध्‍ययन की आवश्‍यकता है वह सुविधा और समय और तामझाम मेरे पास नहीं है, परन्‍तु कई लोगों द्वारा कई साहित्‍यकारों काे खारिज करने और अपने कार्यक्षेत्र से आगे बढ़ कर किसी दूसरे के घर में काम करने वालों को मैं उन घरेलू सहायिकाओं, या मेड सर्वेंट से अधिक नहीं आंक पाता जो न स्‍वयं उनकी समकक्षता का दावा कर सकती हैं जिनकी सेवा उन्‍हें करना पड़ता है, न ही उनके मालिक उनको वह सम्‍मान और उनके श्रम का उचित प्राप्‍य देना चाहते हैं। साहित्‍यकार जब साहित्यिक स्‍वाभिमान, जिसका एक नाम स्‍वायत्‍तता होता है, त्‍याग कर किसी भी दूसरे क्षेत्र की सेवा करने लगता है, वह धर्म हो या राजनीति या सदाचार, तो वह अपने क्षेत्र की सीमा में रह कर काम करने वालों की तुलना में उनके घरेलू सहायिका या मेड सर्वेंट की हैसियत में आ जाता है। यही वह बिन्‍दु है जहां मुझे अपने साहित्‍य की राजनीति करने वालों से भी शिकायत हुई और राजनीतिज्ञों की मांग पर साहित्‍य रचने वालों से भी शिकायत हुई और मैंने उस वाक्‍य को दुहराया जिसकी महिमा यह है कि मुझे यह तक याद नहीं कि यह किसकी पंक्ति है : यह पथ यहां से अलग होता है।

मेरी जैसी विवशता में ही कवि ने यह पंक्ति लिखी होगी । उसे नमन।

विचार को साहित्‍य से अलग नहीं किया जा सकता। सच तो यह है कि जिसे हम अपना सर्वोत्‍तम साहित्‍य मानते हैं, जिसमें रामायण, महाभारत की गणना होती है उनकी लोकप्रियता और महिमा का प्रधान रहस्‍य यह है कि वे ज्ञानसागर भी हैं। सचाई यह नहीं है कि मार्क्‍सवाद आज तक के किसी दर्शन से साहित्यिक उपयोग के लिए घटिया दर्शन है, अपितु यह कि यह कतिपय विडंबनाओं का शिकार रहा है। जिस कम्‍युनिज्‍म का लक्ष्‍य लेकर यह चला था उसकी संभावना मार्क्‍सवाद और गांधीवाद के सम्‍यक संतुलन से ही संभव है। बडे पैमाने पर उत्‍पादन करने वालेे कारखाने और उपक्रम जो बहुतों को बेरोजगार बनाते हैं, कम्‍युनिज्‍म की प्रकृति से मेल नहीं खाते। पर मेरी जानकारी इस विषय में इतनी कम है कि मेरा इस विषय में ज्ञान बघारना हास्‍यरस की भी सृष्टि कर सकता है।

मुझे जिस बात का खेद है वह यह कि भारत में अपने प्रवेश के बहुत जल्‍द बाद ही कम्‍युनिज्‍म के अाटोप का इस्‍तेमाल करके इसे उस चिन्‍ता केे लिए इस्‍तेमाल किया जाने लगा जो मुस्लिम समाज में अपनी सांस्‍कृतिक श्रेष्‍ठता बोध और अल्‍पसंख्‍यता के मेल से पैदा हुई थी और जिसे साम्यवादी मुखौटा सबसे अधिक सुरक्षित और भव्‍य लगा था। केवल हिन्‍दू कम्युनिस्‍टों को ही नहीं, मार्क्‍सवादी मुसलमानों को भी उसकी असलियत और ब्रांडनेम के बीच का यह अन्‍तर समझ में नहीं आया और इसलिए उन्‍होंने इसे मुस्लिम लीग के कार्यक्रम का हिस्‍सा न मान कर सेक्‍युलरिज्‍म का हिस्‍सा मान लिया और इसपर मुग्‍ध रहे। कम्‍युनिज्‍म किसी भी देश में शहीदों का सपना रहा है और अपना बहुत कुछ उत्‍सर्ग करके भी यहां तक कि प्राण का संकट मोल ले कर भी दुनिया से अन्‍याय और विषमता की समाप्ति रोमानी तरुणों को आकर्षित करती रही है। रोमानी और यथार्थवादी का अन्‍तर अपनी समझ से समझा दूं तो जो आदर्शों से अभिभूत हो कर इस बात का ध्‍यान किए बिना जोखिम उठा लेते हैं कि इसे इन सीमाओं में हासिल किया जा सकता है या नहीं, वे रोमानी होते हैं, परन्‍तु जो उन्‍हीं परिस्थितियों में यह आकलन भी करते हैं कि यह संभव है या नहीे, और अधिक विचार की मांग करते हैं, रोमानी उनसे भी नफरत करने लगते हैं, परन्‍तु जब तक उस परिपक्‍वता का बोध हो, वे शिकार बन चुके होते है या यदि यह शब्‍द बुरा लगे तो वे शिकारी बन चुके होते हैं जिनका लक्ष्‍य व्‍यवस्‍था को निर्मूल करके अराजकता पैदा करना होता हैा

नक्‍सल आदि संगठनों में अपराधी मनोवृत्ति के तरुण नहीं खिचते चले गए थे, अपितु हमारे समाज की सबसे कीमती विभूतियां अपनी जिन्‍दगी जोखिम में डाल कर इससे जुड़ती रही हैं। एेसे सभी लोगों को व्‍यक्ति के रूप में किसी से घटकर नहीं माना जा सकता। परन्‍तु इसके बाद भी उन सबका इस्‍तेमाल कर लिया गया और वे न तब इस विषय में सचेत हुए न आज ही सचेत हैं कि वे गलत रास्‍ते पर हैं। मैं स्‍वयं भी इस विषय में सचेत न था, यद्धपि मैं कभी कम्‍युनिस्‍ट नहीं बना न किसी पार्टी गतिविधि में शामिल हुआ पर विचारों में मैं सदा मार्क्‍सवाद को सबसे उपयुक्‍त दर्शन और समतामूलक समाज के स्‍वप्‍न को अवश्‍यंभावी लक्ष्‍य मानता रहा हूं और वह सपना आज भी क्षीण नहीं हुआ है।

मेरे लेखन पर सहमति प्रकट करने वाले या प्रशंसा करने वालों में अधिकांश यथास्थिविवादी हैंं और उनका वश चले तो वैदिक समाज को आदर्श मान कर आगे की अपेक्षा पीछे की ओर चल पड़ें जिस पर अपार श्रम तो बर्वाद हो सकता है पर कुछ पाया नहीं जा सकता। यह मुस्लिम समाज के हिजरत काल में वापसी की ललक से भी बुरा है।

भारतीय कम्‍युनिस्‍ट आन्‍दोलन के पूरे चरित्र का अध्‍ययन करने या उधर ध्‍यान देने की मुझे आवश्‍यकता ही न होती यदि एकाएक यह आभास नहीं होता कि यह तो भारतीय सम्‍यता और संस्‍कृति को ही नष्‍ट करने के अभियान का दूसरा चरण है, पहला मन्दिरों, कलाकृतियों, वास्‍तुकृतियों, पुस्‍तकालयों, विश्‍वविद्यालयों और शोधकेन्‍द्रों का विनाश करने से जुड़ा था जिसकी याद आने पर मन अवसाद से भर जाता है। न जाने कितनी अकूत ज्ञानसंपदा का विनाश हो गया । वे विद्वान जो स्‍वयं चलते फिरते कामचलाऊ ग्रन्‍थागार बन जाते थे, उनके संहार ने उन कृतियों को भी बचाने से रोक दिया जिनका उनके माध्‍यम से संकलन, संपादन किया जा सकता था। परन्‍तु जिन का मन उन कांडों की याद से खिन्‍न हो जाता था उनमें भी कुछ विद्वान पैसे के लोभ में भारतीय सांस्‍कृतिक मूल्‍यों को नष्‍ट कर रहे थे।

यथास्थितिवाद और प्रगतिशीलता की परिभाषाएं परिस्थितियों के अनुसार बदल जाती हैं। जहां संहार किया जा रहा हो वहां जो हमारे पास है उसे बचाना या यथास्थिति की रक्षा करना भी प्र‍गतिशील कदम हो जाता है, और प्रगतिशीलता विनाश का पर्याय बन जाती है। दो बुराइयों के बीच अल्‍पतम का चुनाव करना होता है। मैंने बचाने और समझने और उसके विश्‍लेषण के बाद जो त्‍याज्‍य है उसे त्‍यागने का रास्‍ता अपनाया, दूसरों ने अपना विनाशकार्य करते हुए तालियां बजाने और झूमर नाच नाचने का वरण किया।

मुझे खिन्‍नता इस बात से होती है कि मैंने फेसबुक के माध्‍यम से अपनी बात ही इसलिए आरंभ की थी कि मुझे तत्‍समय व्‍यवस्‍‍था पर प्रहार करने वालों की लोक‍तांत्रिक समझ पर सन्‍देह हुआ था। मैं चाहता था कि फतवे देने, गालियां देने, कोसने के परिणाम जो मिले हैं, उन्‍हें हम देख चुके थे। मैंने वह पक्ष लिया था जिसकी लगातार भर्त्‍सना होती आई थी और यह सुझाया था कि मेरे प्रस्‍तावों का खंडन करते हुए मेरे मित्रगण तर्क और प्रमाण के साथ मुझे गलत सिद्ध करेंगे।अब तक उन्‍होने मुझे निराश किया। आज शाम इस उदासीनता पर सोच रहा था तो कुछ पंक्तियां उभर आईे। क्‍या हम सचमुच इतने नि:सत्‍व हो चुके हैं तार्किक बहस न चला सकें:
सवाल दर सवाल हैं, जवाब है ही नहीं ।
सवालियों के पास कोई ख्‍वाब है ही नहीं।
न ऐसी आग कि तासीर गर्म हो जिसकी
धुंआ तो है मगर रौशन दिमाग है ही नहीं ।

Post – 2016-10-14

सवाल दर सवाल हैं, जवाब है ही नहीं ।
सवालियों के पास कोई ख्‍वाब है ही नहीं।
न ऐसी आग कि तासीर गर्म हो जिसकी
धुंआ तो है मगर रौशन दिमाग है ही नहीं ।

Post – 2016-10-13

मेरे लिए सदा से यह समस्‍या रही है कि आदमी सच के सिवाय कुछ बोल कैसे सकता है, जो बोलता है उस पर सही सिद्ध होने से कैसे बच सकता है। मनुष्‍य हो कर ऐसा कोई कर नहीं सकता इसलिए यदि आप कहें कि आप दुनिया के महानतम चिंत‍क हैं तो मैं यह सोच कर कि अगला सही ही कह रहा होगा, मैं दुनिया का महानतम चिन्‍तक हूं अौर यह तेवर तब तक बना रहता है जब तक कोई ऐसा नहीं मिल जाता कि तुम टुकड़े के मोल हो। जैसा कि मैं दावा करता हूं कि मैं कभी गलत नहीं होता इसलिए इसका इसका पता लगाने लगता हूं कि इस अादमी ने जो कुछ कहा, वह भी सही होगा, क्‍योंकि आदमी है तो झूठ तो बोलेगा नहीं। कारण, आदमी को जानवर से अलग करने वाली कोई ए‍क विशेषता है तो यह कि मनुष्‍य के पास भाषा है और जानवरों के पास भाषा नहीं संकेत प्रणाली है और कुछ विशेष स्थितियों में वह भाषा से अधिक दुर्लभ हो सकती है। भाषा स्‍वयं भी एक संकेत प्रणाली है पर ऐसी कि जिसकी शक्ति इसकी पवित्रता से जुड़ी हुई है। पवित्रता उसके वाचिक अर्थ की व्‍यावहारिकता से जुड़ी हुई है। कथन का अर्थ सन्‍दर्भ और देश-काल से जुड़ा है और अंतत: उस व्‍यक्ति की अनवलिप्‍तता से, किसी तरह की कीचड़ या काजल से मुक्ति से जुड़ी है और इसलिए जो भाषा की पवित्रता की रक्षा नहीं कर पाता, उसके बारे में मेरी एक ही राय बनती है, ‘यह आदमी, आदमी नहीं बन पाया है। उसके प्रति क्रोध नहीं, करुणा उपजती है, यह आदमशक्‍ल, आदमी से अधिक बड़ा आदमी सिद्ध होने के लिए जिस चीज काे नष्‍ट कर रहा है वह ठी‍क वही चीज है जिसने उसे जानवर से आदमी में रूपान्‍तरित करना चाहता है। इसलिए मेरी समझ की कमी के कारण कोई मेरा तिरस्‍कार करे यह मुझे स्‍वीकार है, इससे अकेला मैं प्रभावित होता हूं, परन्‍तु उस उपलब्धि को जिसकें बल पर वह आदमी बना था और अपने अनुरूप पूरे समाज को बनाना चाहता है तो पीड़ा ऐसे लोगों के इरादों के सफल हो जाने की कल्‍पना से मानवता के भविष्‍य को सोचकर होती है।
मुझे अपने खतों के जवाब में जो प्रशंशोक्तियां मिलती हैं उनसे आत्‍मबल मिलता है, आलोचना से, यहां तक निन्‍दा से अपनी गलतियों पर पुनविचार का और अपनी गलतियों के सुधार का अवसर मिलता है और मैं उनसे नसीहत लेते हुए पहले से, गलतफहमी न हो इसलिए स्‍पष्‍ट करूं कि अपने ही पहले के लिखे से, अच्‍छा लिखता हूं। परन्‍तु मैं उन आलोचनाओं को समझ नहीं पाता जो साहित्‍य में राजनीति करती हैं अौर अपनी राजकीति ये …