मेरे साये में तुम्हारा भी अक्स आता है ।
एेसे आईने हैं जिनमें यह अक्स आता है।
तुम न समझोगे जिसे जानता भगवान नहीं
पर हकीकत है कि आता है अक्स आता है ।
तुममे कितना बचा, जिसको था समझता अपना
तू भी अपना था कभी कुछ तो याद आता है ।
क्या हुआ, क्यों हुआ, कारीगरी मालूम नहीं
भरम मिटाओ तो बढ़ता ही चला जाता है।
इतना लिखता है कि पढ़ने का वक्त है ही नहीं
बहुत कुछ होके सिफर बनने पर आमादा है ।।
Post – 2016-08-28
एक पेशेवर इतिहासकार का बयान
हम बताते हैं कि क्या गुजरी है क्या सहते रहे ।
झूठ को भी सच बना कर किस तरह कहते रहे ।
हम बताते हैं कि क्या होती है सच की रोशनी
जिस को अंधियारा बता कर कालिमा भरते रहे ।
हम बताते हैं कि कितने नीच थे पर नींव थे
उस इमारत के जिसे भाड़े पर हम गढ़ते रहे ।
डूबने को थे हमारे सामने सैलाब भी
पर न चिल्लू में था पानी सोच कर चलते रहे।
क्या किया हमने बताएं क्यो किया कितना किया
सिर्फ पैसे के लिए करना पड़ा करते रहे ।
Post – 2016-08-28
निदान – 33
उभय कल्याण की दिशा
”शास्त्री जी, मैं लाख तर्क दूँ आप मेरी बात के कायल नहीं हो पाते, क्योंकि भावना इतनी आहत है, चोट इतनी गहरी है कि आप मुसलमानों के प्रति अपनी नफरत से भी प्यार करने लगे हैं। इस प्यार को छोड़ना नहीं चाहते । ऐसी दशा में हम दोनों एक समझौता कर लें। मैं आपकी इस बात को तो मानता ही हूँ कि भारत हजारों साल तक, अपने ह्रास के दौर में भी जगद्गुरु रहा है ; आप मेरी बात मान लीजिए कि पच्छिम वालों का प्राचीन भारत के विषय में यह आरोप तो गलत है कि इसमें वैज्ञानिक सोच और तार्किकता का अभाव रहा है, परन्तु आज के विषय में उनका यह आरोप शतप्रतिशत सही है कि हमारी भावुकता इतनी प्रचंड हो गई है और उसी के अनुपात में बौद्धिकता का इतना निपट अभाव है कि जो अपने को बौद्धिक कहते और सारी बौद्धिक गतिविधियों को अपने नियन्त्रण में रखना चाहते हैं वे तक यह नहीं जानते कि उनके दिमाग में पश्चिम का कूड़ा भरा हुआ है, क्योंकि उन्होंने अपनी ऑंखों से काम ही नहीं लिया और इसके बाद भी यदि कहा जाय कि आज का विश्वगुरु पश्चिम है और पिछले चार सौ साल से या धर्मयुद्धों के दौरान अरबों के संपर्क में आने और कुछ समय तक उनका शिष्य बने रहने के बाद से जगद्गुरु बने हुए हैं। आज हमें नम्रतापूर्वक उनसे सीखना चाहिए।”
”डाक्साब, सीखेंगे कैसे ? एक ओर तो आप कहते हैं कि हमें उनकी भाषा की जगह अपनी भाषाओं को लाना चाहिए, उनके ज्ञान के स्थान पर अपना ज्ञान पैदा करना चाहिए और दूसरी ओर आप उनकी नकल करने की बात कर रहे हैं।”
”मैं पहले ये जानता था कि हम देखते और सुनते समय भी अनजाने ही फेरबदल कर लेते हैं। कहें सीखना तो वह आपको नकल करना सुनाई देगा। मैं कहूँ धैर्य तो आपको कायरता सुनाई देगा। इसमें आपका दोष नहीं है, सबसे होता है। मुझसे भी। हम जिन शब्दो, ध्वनियों, विचारों के आदी हैं उनसे निकट पड़ने वाले प्रतिरूप, थोड़ी भिन्नता रखने वाले ऐन्द्रिक संकेत उन्हीं में ढल जाते हैं। जमीन पर ही लीक नहीं हुआ करती, दिमाग में भी लीकें हुआ करती हैं और अलीक या लीक से कुछ निकट का लीक में दाखिल हो जाता है इसलिए अर्थभेद को समझने में सभी से कठिनाई होती है। मैं एक सरदार जी को यह समझाता रहा कि कृप्या को कृपया लिखिए और वह बार बार दुहराने पर बताते हॉं कृप्या ही लिखा है। यह बताइये धीर शब्द का पूरा भाव, उत्तेजना या आवेश के इस क्षण में आप मुझे समझा सकते हैं ?”
”डाक्साब, मैं आपको क्या समझा सकता हूँ । आप सभी दृष्टियों से मुझसे श्रेष्ठ हैं, पर यह न कहिएगा, धीरज रखो, भगवान भला करेंगे, या आगे जो होगा अच्छा ही होगा। हमारा धीरज पिछले और आज के अनुभवों के कारण चुक गया है।”
”मैं जानता था, भावना उग्र हो तो ज्ञान बेकार हो जाता है। वह इच्छित के लिए तर्क जुटाने का काम अवश्य करता है अन्यथा आप जैसे विद्वान को मुझे न याद दिलाना पड़ता कि धैर्य वीर रस का स्थायी भाव है और जिसका धैर्य चुक गया उसकी पराजय निश्चित है क्योंकि उसमें वीरभाव का ही अभाव हो जाएगा। आप परिस्थिति का सामना करने से पहले ही हारने की बात कर रहे हैं और उससे सन्तुष्ट भी अनुभव कर रहे हैं।”
सामान्य स्थिति होती तो वह मान जाते। अपने किसी लेख या व्याख्यान में वह इसे स्वयं कहते। परन्तु इस समय भावना की उग्रता अपनी बलि चाहती थी। तर्क बचा नहीं था इसलिए शास्त्री जी के मुँह से निकला, ‘डाक्साब” और वह अपने कहे शब्द के दबाव में नि:शब्द हो गए। पराजय की स्वीकृति का एक रूप यह भी होता है जब न आप कुछ कह पाते हैं, न अपनी गलती मान पाते हैं। गलती मान लेते तो जीत भी आपकी ही होती, सत्य का स्वीकार स्वयं विजय है।
मैंने इस स्थिति का लाभ उठाया, ”हममें यह धैर्य था, पश्चिमी संस्कृति मेंं धैर्य, क्षमा, दया आदि वे सात्विक गुण न थे न इसके प्रति आदर भाव था। आज उनके पास है, हमारे पास नहीं है, हम धैर्य से काम लेने तक को तैयार नहीं। इसलिए हमें अपनी चीजों को भी उनसे सीखना होगा, हम अपनी परंपरा से सीखने की शक्ति तक खो चुके हैं। मैं आपकाे एक उदाहरण से इसे समझाना चाहूँगा । मैं चाहूूँगा कि आप भी उस पुस्तक को देखें। वह अब इंटरनेट पर उपलब्ध है, डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर की पुस्तक The Indian Musalmans और सोचिए कि 1857 के क्रूर दमन के बाद भी उन्होंने अग्रेजी राज्य को किस तरह की चुनौती दे रखी थी। हालत हमारे आज के अनुभवों से अधिक विक्षोभकारी थी। इसे मैं हंटर के शब्दों में ही रखना चाहूँगा :
The Bengal Muhammadans are again in a strange state. For years a Rebel colony has threatened our frontier; from time to time sending forth fanatic swarms, who have attacked our camps, burned our villages, murdered our subjects, and involved our troops in three costly wars…. They disclose an organization which systematically levies money and men in the Delta, and forwards them by regular stages along our high-roads to the Rebel Camp two thousand miles off. Men of keen intelligence and ample fortune have embarked in the plot and a skillful system of remittances has reduced one of the most perilous enterprises of treason to a safe operating of banking.
While the more fanatical of the Musalmans have thus engaged in overt sedition, the whole Muhammadan community had been openly deliberating on their obligation to rebel. During the past nine months, the leading newspapers in Bengal have filled their columns with discussions as to the duty of Muhammadans to wage war against the queen. The collective wisdom of the Musalman Law Doctors of North India was first promulgated in a formal Decision (Fatwa). …
Somehow or other, every Musalman seems to have found himself called on to declare his faith, to state in the face of his coreligionists, whether he will or will not cooperate with the Traitors’ Camp on our Frontier; and to elect] once for all, whether he shall play a part of a devoted follower of Islam, or of a peaceable subject of the Queen. … The obligation of the Indian Musalmans to rebel or not rebel, hung for some months on the deliberations of the three priests in the Holy City of Arabia….
In my second chapter I shall explain the treasonable organization by which the rebel camp has drawn unfailing supplies of money and men from the interior Districts of the Empire….. The Musalmans of India are, and have been for many years, a source of chronic danger to the British Power in India. For some reason or the other they hold aloof from our system, and the changes in which the more flexible Hindus have cheerfully acquiesced, are treated by them as deep personal wrongs.
”जिनकी तलवारों ने बादशाह की सन्तानों के सिर काट कर उन्हें तोहफे में पेश किए थे, जिन्होनेे दिल्ली की गली गली में घुस कर मुसलमानो को मौत के घाट उतार कर दहशत सी फैला दी थी वे उस विद्रोह को दबा न पाए थे जो धार्मिक उत्तेजना की आड़ में पूरे देश में भड़का दिया गया था।
”इस उत्तेजना भरे माहौल में उन्होंने जिस धैर्य से उनके पूरे जाल का अध्ययन किया, यह समझा कि बलप्रयोग से काम नहीं चलेगा, कूटनीतिक चातुरी, दृढ़ता और संयम से उन्होंने इस बिगड़े हुए माहौल में एक भरोसे का आदमी पाया और उसका कूटनीतिक उपयोग करते हुए उस लपट को जो उनकी ओर बढ़ती जा रही थी हिन्दुओं की ओर मोड़ दिया।
”आप का कहना है, पहले हिन्दुओं और मुसलमानों के संबन्ध बहुत अच्छे थे। सांप्रदायिकता के बीज अंग्रेजों ने बोए।
”मैं उसी किताब के भरोसे यह कह रहा हूँ क्योंकि पश्चिमी लेखक तथ्यों में हेराफेरी केवल चुनाव के मामले में करते हैं जिससे मनचाहा नतीजा निकाला जा सके। परन्तु जो तथ्य रखते हैं, उन पर काफी दूर तक भरोसा किया जा सकता है । सरसैयद से पहले एक और सैयद अहमद हुए थे वे लुटेरे थे, स्वयं संभवत: सीमान्त क्षेत्र में अफीम की तस्करी का काम करते थे। मूलत: बरेली के थे। रणजीत सिंह की नशे के कारोबार पर सख्ती के कारण उन्होंने दो एक साल कुरान के अध्ययन पर लगाया और फिर रणजीत सिंह से बदले के लिए उनके द्वारा गोवध पर लगाए प्रतिबन्ध को उत्तेजना का मुद्दा बना कर हिन्दुओं और सिक्खों के खिलाफ जिस धर्मयुद्ध का आरंभ किया उसमें दोनों ओर से न जाने कितनी हत्यायें होती रहीं। सांप्रदायिकता तो सामी मतों की घुट्टी में है जिसमें अपने धर्म समुदाय को छोड़ दूसरे सभी मनुष्यों से नफरत और उत्पीड़न के बीज पाए जाते हैं। वह अहमदिया आन्दोलन जिसका हमने हवाला दिया उसी सैयद अहमद के अनुयायियों का परिणाम था। अंग्रेजों ने इसका बहुत कुशलता से उपयोग किया कि आपसी घृणा कम न होने पाए और दोनों समुदायों की उन पर निर्भरता बनी रहे। पर इस बात का ध्यान रखा कि स्थिति नियन्त्रण से बाहर न जाने पाए ।”
”फिर तो बात वहीं पहुँची न ।”
”बात को कहीं और पहुँचने ही न देंगे आप । चलिए, आपकी पंडितानी कलेवा तैयार करके आपकी प्रतीक्षा में होगी। पर कलेवा करते समय इस बात का ध्यान रखिएगा कि मुख्य शत्रु ने जो छोटा शत्रु था उसकी ओर सारा गुस्सा कैसे मोड़ दिया था। जिस सैयद अहमद को ले कर वह चिन्तित था उसके पीछे भी उसकी कारगुजारी रही हो तो आश्चर्य नहीं। कारण रणजीत सिंह ने फ्रासीसी प्रशिक्षकों के अधीन अपनी सेना का जो आधुनिकीकरण किया और वह जैसी प्रबल शक्ति बनते जा रहे थे उसके कारण सिख भी अंग्रेजों के निशाने पर थे। यह तूफान पहले सीमान्त प्रान्त में उनको कमजोर करने या उखाड़ने के लिए ही किया गया था। यह दूसरी बात है कि सत्तावन के समर में रणजीत सिह ने भाग नहीं लिया। उनकी सामरिक तैयारी अंग्रेजो के मामले में प्रतिरक्षात्मक ही थी।
”मैं केवल जनाक्रोश पैदा करने अथवा अपने विरुद्ध उभरे जनाक्रोश की दिशा को अपने संभावित शत्रुओं की ओर मोड़ने के लिए अपेक्षित धैर्य, आत्मविश्वास, भावनाओं पर नियन्त्रण की कला पश्चिम से सीखने की बात कर रहा था जिसके कारण भारत और पाकिस्तान दोनों के प्रधान एक दूसरे से क्या कहते हैं, इससे अधिक ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि अमेरिका ने कब किसके पक्ष में क्या कहा । अर्थात् हमारी कूटनीतिक अदूरदर्शिता के कारण दाेनों स्वेच्छा से उसका खिलौना बने हुए हैं जिसको भारतीय उपमहाद्वीप में स्थायी शान्ति अपने हितों के विपरीत लगता है। इस धार को उसकी ओर मोड़ना सरकारों के लिए असंभव है। इसकी तनिक भी टोह मिलने पर वह और बखेड़ा खड़ा कर सकता है, परन्तु सामाजिक स्तर पर यह समझ पैदा हो तो इसके परिणाम उभय कल्याणकारी होंगे। यह सरकारों का काम नहीं, बुद्धिजीवियों का काम है।
Post – 2016-08-27
निदान – 32
माइंड बिहाइंड मैडनेस
”पूरी बात सुनते तो सही, मैं यह याद दिला रहा था कि उन्होंने हमारा भी जो उपयोगी था उसे अपना ही नहीं लिया उसके आधार पर वे इतना आगे बढ़ चुके हैं कि यदि हमारी अपनी खोई हुई समस्त उपलब्धियॉं आज हासिल भी हो जायँ तो उनके बल पर उनके सामने ठहर नहीं सकते। याद यह दिला रहा था कि हमने उनसे यह नहीं सीखा कि दुनिया भर में कहीं भी कोई उपयोगी विचार हो, उपयोगी कच्चा माल हो, खनिज संपदा हो, स्वयं उन्हें न मालूम हो तो तुम खोज कर निकालो और उस पर कब्जा कर लो। तुम जानते हो, उन्हें यदि किसी पिछड़े से पिछड़े समाज में लोग किसी चीज को खाते हैं, यहॉं तक कि कोई कीड़ा मकोड़ा भी और वे पाते हैं कि उससे उन्हें कोई समस्या पैदा नहीं हुई तो उसे भी आजमाने से बाज नहीं आते। यह लोच उन्होंने पैदा कर ली है। हमने उनसे बना हुआ माल और हमें बौद्धिक परजीवी बनाए रखने के लिए तैयार किए गए विचार लिए हैं जिसे हमारे लिए पैदा करते रहने में वे आज भी पूरी तरह सक्रिय हैं और उनके अनुसंधाता सभी क्षेत्रों में तुम्हारे देश में भी मिल जाऍंगे।
”हमने अपना रक्षणीय खो दिया और अरक्षणीय को अपनी संस्कृति मान कर चिपके हुए हैं, और उनकी समकक्षता के आने के लिए उनके भी अरक्षणीय को अपना लिया। हम पहले आपदा में भी काफी सुरक्षित थे, आज संपदा में भी सर्वथा अरक्षित है। सुरक्षा को सैन्यबल और आयुधबल तक सीमित करके मत देखो। इसके लिए उस रीढ़ की भी जरूरत होती है जो इन्हें सँभाल सके। उन्होंने अपना अरक्षणीय इस तरह ओझल कर दिया मानो यह कभी उनके पास था ही नहीं और लभ्य और रक्षणीय को बचाया, परिष्कृत किया, बढ़ाया। दूसरों से लिए हुए में भी थोड़ा फेरबदल करके अपना बना लिया वह चाहे तुम्हारा योग हो, नृत्यशैलियॉं हों, या संगीत और अभिनय की बारीकियॉं । वे सीखते हैं तो तुम सोचते हो पश्चिम पर यह तुम्हारी सांस्कृतिक विजय है, यह नहीं जानते कि इस पर अधिकार करक वापस जाने वाले सुरुचि और संस्कृति का अवदोहन करके अपने को अधिक समृद्ध कर रहे हैं। तुम्हें लगता है पिकासो ने आदिम कलारूपों से सीखा और उनकी पूजा करने लगते हो, यह नहीं देखते कि उसको रूपान्तरित करके उसने आधुनिक कला के शीर्ष पर पहुँचा दिया। न तुमने अपनी परंपरा का पुनराविष्कार किया न उनका ग्रहण करके उसको रूपान्तरित करके नयी सर्जना की। अधिक से अधिक थोड़ा घालमेल जिसमें उसकी पहचान अलग बनी रहती है, याने फ्यूजन, रिमिक्स आदि।
”अभी कुछ दिन पहले सर्वसुलभ और हमारे आलस्य के कारण लगता है ज्ञान का एकमात्र स्रोत रह जाने वाले इंटरनेट से ईसाइयत के मध्यकालीन उपद्रवों, हत्याओं, विध्वंसों का इतिहास जानना चाहा वह गायब था। यदि पुरानी पोथियाँ न रह जायॅगी तो वह उनके इतिहास के गर्हित चरणों को, उनके पैशाचिक कुकृत्यों को मिटा दिया जायेगा। उन्होंने कितनी धूर्तता और कमीनेपन से अमेरिका सभ्यताओं को नष्ट किया, उनकी उदारता के बदले उनके साथ क्रूरता से पेश आए, उनसे मैत्री करते उनके बीच शराब आदि की लत डाल कर उन्हें अपने ही लोगों के विरुद्ध काम करने वाला एजेंट बनाया, कैसे उस मैत्री के चलते प्लेग के विषाणुओं से युक्त कंबल बॉंट कर जाड़े में आराम पहुँचाने की जगह प्लेग फैला कर उनका सफाया किया यह जानने के लिए अमेरिकी उपनिवेशीकरण का इतिहास तलाशने लगा तो सभी उपलब्ध स्रोतों से यही पता चल पाया कि सब कुछ कितने सलीके से हुआ। आरंभ में इन आव्रजकों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा बस दुख के नाम पर वह था। केवल अपनों का दुख था। अभी इंग्लैंड की उस रानी के कारनामें तलाश रहा था जिसे ब्लडी मेरी के नाम से जाना जाता था और जिसने प्रोटेस्टेंटों का नरसंहार कराया था और जिसके डर से जान बचा कर वे अपने प्राण की बाजी लगा कर अटलांटिक पार करके अमेरिका की ओर भागे थे और बहुतों का जहाज का बोझ बढ़ जाने के कारण जहाजो के डूबने से ही अन्त हो गया, तो गूगल, विकीपीडिया, सभी जगहों से ब्लडी मेरी नाम की कल्पित कथाऍं, होटलों आदि के नाम तो मिले वह रानी और उसके कारनामे गायब थे जिसके अत्याचार से तडप कर मिल्टन ने पैराडाइज लास्ट लिखा था, जिसकी वेधक पंक्ति है ‘अवेंज ओ लार्ड दाइ स्लाटर्ड सन्स अवेंज।”
”कितने घंटे तक यह कार्यक्रम चलेगा ?”
”तब तक जब तक तुमको यह विश्वास नहीं हो जाता कि वे अपने इतिहास से अपने पैशाचिक कृत्यों को हटा रहे हैं कि अपने को और पूरी दुनिया को यह विश्वास दिला सकें कि उनका समाज सदा से बहुत सदाचारी और न्यायपरायण रहा है और उनके ऐजेंट मानवाधिकार की ओट में उनको वह सामग्री पहुँचा रहे हैं कि दूसरे समाज कितने कुत्सित है, कितने हैवान है।
”जब तक तुम यह नहीं समझ जाते की धर्म और धर्मान्धता की सीमाओं को समझ लेने के कारण उनके अपने देशों में गिरजाघरों में हाजिरी कम हो रही है, परन्तु अन्य या जिसे वे वेस्ट से अलग रेस्ट की कोटि में रखते हैं उनमें उनके प्रत्यक्ष और परोक्ष शह से धार्मिकता और अन्धविश्वासों को प्रबल किया जा रहा है। पता लगाओ पिछले पचास सालों में कितने नये गिरजे या कैथेड्रल पश्चिमी देशों में बने हैं और मुझे भी बताओ । मुझे स्वयं भी बोध है ज्ञान नहीं है। पर उनके सीधे या पराेक्ष उकसावे से शेष जगत में कितने मन्दिर, गिरजे, मस्जिदें, गुरुद्वारे बन रहे हैं और उनमें लोगों का उत्साह किस तरह बढ़ाया जा रहा। जब तक यह समझ में नहीं आता, तुम्हें उनके उकसावे पर तुम्हें भोंकने के लिए खंजर लिए एक दुश्मन दिखाई देगा, यदि समझ में आ गया तो तुम्हें अपने दुश्मन के पीछे, परदे में बैठा, उसे सुपारी देने वाला दिखाई देगा। मेरा मतलब है, देखना चाहोगे तब। अभी तक तो तुमको हमारी ऐतिहासिक उपलब्धियों पर शर्म आती है, परन्तु यदि उसी इतिहास को अधिक विकृत करने के लिए वर्तमान प्रक्षिप्त करने के उनके पुरासंग्रहालय के लिए और उनके समाज के उपभोग के लिए वाटर और फायर या ऐसी दूसरी अपराध और हिंसा की ऐसी फिल्में बनाई जाती है जिनसे अपराधियों को प्रेरणा और सूझ मिलती है तो ये फिल्में तुमको प्रगतिशील लगती है और इन पर सेंसर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन लगता है। जब तुमकों मेरी बात समझ में आजाएगी तो इन कृतियों की चमक कम हो जाएगी । तब उसका अर्थशास्त्र ही नहीं उनका घिनौना चेहरा भी दिखाई देने लगेगा जो इन प्रवृत्तियों के पीछे हैं। तुम तो यह तक मान कर न दोगे कि अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम में अपराधजगत का पैसा लग रहा है, अपराध को कलात्मकता की ऊँचाई दे रहा है और काले धन को सफेद करने का साधन बना हुआ है।”
जिन्हें शास्त्री जी कल पागल कह रहे थे वे सचमुच पागल हैं। और यह भी मानता हूँ कि उनका इतिहास भी बहुत उजला नहीं रहा है, परन्तु भावुकता को चरम पर पहुंचा कर, उसी इतिहास का उपयोग उनके अपने अहित के लिए, उन्हें दुर्दान्त दरिन्दों के रूप में पेश करने के लिए किया जा रहा है और वे समझते हैं पूरी दुनिया उनसे थर्रा रही है। आज नहीं तो कल पूरे विश्व पर इस्लाम का विस्तार हो जाएगा। यह तक नहीं दिखाई दे रहा मुसलमान मुसलमान को मार रहा है, और मुसलमान मुसलमानों को जलील कर रहा है। शास्त्री जी हिन्दुओं को संकटग्रस्त देखते हैं तो मैं उनसे असहमत नहीं होता, परन्तु यदि वह यह देखते कि कैसी चालें चलते हुए मुसलमान को पहली बार संकटग्रस्त बनाया जा चुका है, और उसे उसी के द्वारा बर्बाद करते हुए मुस्लिम देशों की खनिज संपदा को पर कब्जा करने की योजना सफल होती जा रही है, उसी समुदाय के दूसरे देशों के नौजवानों को खूखार दहशतगर्दो में बदलने की योजनाएँ कारगर होती जा रही हैं तो उन पर क्रोध आने की जगह यह समझ पैदा होती कि आज की घड़ी में मुझे अपने पुराने दुश्मन को भी बचाने की फिक्र करनी होगी और अपने को बचाने का भी जतन करना होगा। ये दोनों अलग नहीं है। वेस्ट ऐंड दि रेस्ट की इस जंग में केवल हिन्दू-मुसलमान ही नहीं शेष दुनिया के सभी विचारों और देशों के लोगों काे एक दूसरे को समझने की और एक दूसरे के साथ खड़ा होने की जरूरत है। पश्चिम के लिए आप हिन्दू या मुसलमान नहीं हैं, एशियाटिक हैं। इस ऐशियाटिक चेतना को मजबूत करने की जरूरत है।”
”क्षमा करें डाक्साब, इसका अनुभव है हमें। एक बार खिलाफत आन्दोलन का फल भुगत चुके हैं, दुबारा वह प्रयोग नहीं कर सकते। हमारे मित्र ठीक कहते हैं बबूल को शहद से सींचने से उसके कॉंटे मुलायम नहीं हो जाते ।”
”उनको समझाइये, शहद को सिंचाई पर खर्च क्यों करते हैं। अधिक हो तो हमारे पास पहुँचा दीजिए सुना बड़ा गुणकारी होता है, पर यदि किसी पेड़ को उससे सींचिएगा तो चींटियां उसकी जड़ों तक को खा जाऍंगी और वह सूख जाएगा, भले वह बबूल ही क्यों न हो। मैं कोई आन्दोलन करने को नहीं कर रहा हूँ। मैं कहता हूँ, आन्दोलन मत करें। अब देश आपका है, राज्य आपका है। राज्य को अपना काम करने दीजिए। शिकायत राज्य की नजर में ले आइए। राज्य अपने कर्तव्य के निर्वाह में शिथिल मिले तो संचार माध्यमों से जनता को सचेत कीजिए। अगले चुनाव में उसको सत्ता से बाहर करने का संकल्प लीजिए पर कानून अपने हाथ में न लीजिए। यह सभ्य लोगों का काम नहीं है। यह उस चरण को शोभा देता था जब राज्य संस्था न था या अराजकता थी और इससे अराजकता ही पैदा होती है। जो अपने देश को प्यार करते हैं वे अराजकता न तो पैदा कर सकते हैं, न उसमें सहभागी हो सकते है। आपको अपनी ओर से कुछ नहीं देना है, सिवाय अपने दूसरे कामों पर ध्यान देने के जो आपके सरकार के काम में हाथ डालने के कारण ठीक से नहीं हो पा रहे हैं । स्वधर्म का पालन कीजिए। अपने क्षेत्र का काम पूरी निष्ठा से कीजिए। इतने से ही बहुत कुछ बदलेगा। यह पहला कदम है, अन्तिम समाधान नहीं । अभी कई गुत्थिया सुलझानी होंगी।”
शास्त्री जी ‘हँअँअ’ इस तरह कहते हुए उठे जिसका अर्थ था वह सन्तुष्ट नहीं हुए ।
Post – 2016-08-26
निदान – 31
आत्मराग से बचते हुए
”शास्त्री जी, पिछले तीन सौ सालों से पश्चिम वाले यह प्रचार करने में लगे हैं कि हिन्दू देववादी रहे है, अतिरंजना से काम लेते हैं, स्वभाव से भावुक और अन्धविश्वासी रहे हैं, इसलिए ज्ञान-विज्ञान में पिछड़े रहे हैं, इनकी सोच वैज्ञानिक हो ही नहीं सकती। आपको तो पुराने साहित्य का इतना अच्छा ज्ञान है, इसमें कितनी सचाई है ?”
”डाक्साब, यह उसी सोच का विस्तार है जिसमें वे यह विश्वास दिलाने को व्यग्र थे कि पश्चिम सदा से अग्रणी रहा है, गोरी नस्लें रंगीन कौमों से उत्कृष्ट हैं, जिसका पूरक पद है वे सदा से वैज्ञानिक समझ रखती रही है और दूसरे भावुक, अन्धविश्वासी रहे हैं और वैज्ञानिक सोच और विज्ञान के जन्मदाता वे हैं। ”
मैं कुछ कहता इससे पहले ही मेरा मित्र बोल पड़ा, ”इसमें गलत क्या है ?”
” जिस देश ने शून्य का आविष्कार किया, पहिये का आविष्कार किया, नौचालन में वायु की शक्ति के प्रयोग किये और श्येनपत्वा जहाज बनाए, स्थल का पता लगाने के लिए और सन्देश भेजने के लिए पक्षियों को प्रशिक्षित किया, रात में दिशाबोध और कालबोध के लिए नक्षत्रों औ ग्रहों का अवेक्षण करते हुए ज्योतिर्विज्ञान की नींव रखी, सौर और चान्द्र संवत्सरों का यहा सापेक्ष्य उपयोग करते हुए वर्षमान निर्धारित किया और इनके बीच अन्तर का समायोजन करते हुए अधिमास की कल्पना की, त्रिधातुओं अर्थात् चिकित्सा के आयुर्वेदिक सिद्धान्त का विवेचन किया, सबसे उन्नत लेखन प्रणाली का आविष्कार ही नहीं किया, सुवाह्य लेखन सामग्री पर लिखने और कठोर फलक पर टंकन की युक्तियों का पृथक विकास किया, डेयरी फार्मिंग का आविष्कार किया, कृषि का आविष्कार किया और उसे हलाधारित बनाते हुए उन्नत बनाया, पत्थराें को पालिश करने और मणिवेध और अन्त:खचित मनकों का आविष्कार किया, और, यह सब तो डाक्साब भी लिख आए हैं कि यह चार हजार साल से भी पहले कर लिया गया था, जो अन्यत्र कहीं नहीं हुआ था और जिसे बहुत बाद तक अपनाने की योग्यता तक उनमें पैदा न हुई थी, उसे क्या वैज्ञानिक ज्ञान से शून्य माना जा सकता है। जिसने अष्ठाध्यायी लिखी, महाभाष्य लिखे, जिसमें अर्थशास्त्र लिखा गया, जिसमें भाषाविज्ञान को, चिकित्सा को, दर्शन को, धातु विद्या को, वस्त्र उद्योग में अकल्पनीय प्रगति हुई उसे वैज्ञानिक सोच से शून्य और विज्ञानविमुख मानने वालों को क्या कहा जाय…
शास्त्री जी तनिक ठिठके तो मैंने हँसते हुए कहा, ”पागल कह लीजिए । आपको यह शब्द बहुत पसन्द आ रहा है आज कल।” हँसी में शास्त्री जी भी शामिल हो गए । पर मेरा मित्र शामिल न हो सका।
मैंने कहा, ”खैर आप नहीं कहते तो मैं ही कह देता हूँ कि पन्द्रहवीं शताब्दी तक पश्चिमी समाज धर्मान्ध पागलों के हाथ का खिलौना समाज था। सोलहवीं कहें तो भी गलत न होगा। वे धर्म के नाम पर सबसे अधिक खून बहाते थे लेकिन सामान्य जीवन में भी बात बात भेंड़ा-भिड़न्त से बाज न आते थे, डुएल में। अब उबरे हैं उन मूर्खताओं को त्यागकर। वे विचार और ज्ञान-विज्ञान को अपना शत्रु समझते थे। आज वे पूरी तरह उससे बाहर आ चुके हैं।”
मित्र फिर बीच में टपका,
”उनकी परंपरा ग्रीस तक जाती है जिसके दार्शनिको और चिन्तकों की असाधारण उपलब्धियों का तुम्हें ज्ञान ही नहीं। वे अपने ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को उससे जोड़ते हैं जिसमें बौद्धिकता इतनी प्रबल थी कि साहित्य और कला के सामाजिक औचित्य पर बात की जा सकती थी। देव थे पर देवभक्ति नहीं थी। यह है उनकी वैज्ञानिक सोच की जड़ जहॉं से उन्हें प्रेरणा मिलती रही है।”
मुझे स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ गया, ”उनकी परंपरा ग्रीस तक ही नहीं जाती है, कृतघ्नता तक जाती है। उन्हें अपनी भाषा, संस्कृति, दर्शन, साहित्य अनातोलिया से मिला, वहां बसे भारतीयों से, अपना शिल्प मिस्री स्रोत से, अपना अक्षर ज्ञान फीनीशियनों से और अंतिम को छोड़ कर वे स्वयं पके पकाए ज्ञान और शिल्प का जनक मानते रहे जैसे आज के युग में उनको वह आधार जहां से धर्मयुद्धों के दौरान पैदा हुई ऊर्जा ने उस स्रोत को एकदिश किया जो उसे अरबों के माध्यम से एशिया से मिला था। इन सबका नकार पश्चिम की कृतघ्नता को ही नहीं प्रकट करता उसके महान से महान चिन्तक की साख पर भी प्रश्न खड़ा करता है।
”हमने धर्म के नाम पर अत्याचार सहे परन्तु कभी लड़ाई नहीं की क्योंकि यह धर्म की समारी समझ के विपरीत था। जहॉं केवल आततायी का ही वध किया जा सकता था, वहॉं युद्ध एक विवशता तो हाे सकती थी, चुनाव नहीं और धर्म के नाम पर तो असंभव। इसलिए हमने यातना और उत्पीड़न सहे तो पर धर्म के नाम पर हिंसा कभी नहीं की। करने के साथ ही हमारा धर्म नष्ट हो जाता। कितने अकल्पनीय उकसावों में भी हमने इसकी रक्षा की है यह तुम न सोच सकते हो न समझाऊँ तो समझ सकते हो।
”यदि छेंड़ ही दिया तो समझो, हमारे यहां धर्म का आधार औचित्य, नैतिकता और मानवतावाद था इसलिए बिचारों से दूसरों को कायल करना आसान था। मैं भी मानता हूँ कि जिसके पास औचित्य है उसे हथियार उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। हमारे यहाँ भी पंडों के अखाड़ों और मठों के बीच झगड़े होते थे परन्तु वे संपत्ति को लेकर होते थे इसलिए उसका प्रभाव धार्मिक निष्ठा पर नहीं पड़ता था। निष्ठा हमारे यहॉं व्यक्तिगत थी, आरती आदि के समय अवश्य निश्चित होते थे, पर उस तरह के आयोजन संभव नहीं थे जो गिरिजाघरों और मस्जिदों में संभव था।”
शास्त्री जी गदगद । ”डाक्साब, अाप ने तो मेरे मुॅंह की बात छीन ली।”
”मैं न किसी के मुंह का नवाला छीनता हूँ न किसी के मुंह की बात । मैं जानता था कि आप यही कह सकते थे और आप की ओर से मैंने कह दिया।इनमें से अधिकांश को लिख चुका हूँ लेकिन ये मीठी गोली की तरह चूसने के काम आती है आज के दिन हम अपने ही मूल्यों से हट गए हैं। एक बार नये सिरे से इस खास कोण से पश्चिम और पूर्व के अन्तर को समझना होगा। आप खुले मन से इसे समझने को तैयार होंगे?” मैं शास्त्री जी की ओर मुड़ गया था।
”डाक्साब आप भी…” शास्त्री जी ने अपना वाक्य पूरा नहीं किया।
”तो फिर कागज कलम तो है नहीं, मोबाइल में नोट ले सकें तो लेते चलिए । पहली बात यह कि पश्चिम ने हमारे ज्ञान का, जिस पर आप गर्व करते हैं और जिससे वंचित हो जाने के कारण मैं अफसोस करता हूँ, उसका अस्सी प्रतिशत हमसे ले लिया है। आधा अरबों के माध्यम से और आधा हमारे संपर्क में आने के बाद और हम भारतीय ही नहीं अरब भी और दुनिया के मुसलमान भी उस चरण को भूल चुके हैं या उसमें अपनी दिलचस्पी खो चुके हैं जब उनके पास सभ्यता के सभी घटक थे और पश्चिम को अंधकार का देश, ज्ञान के और सूर्य के अस्त होने की दिशा, मगरिब, कहते थे। इसलिए जो हमारा था वह हमारा रहा ही नहीं। उन्होंने अपना लिया और हमारे मन में उनके प्रति ऐसी विरक्ति पैदा की कि हम उनसे स्वयं विमुख हो गये। उनकी रक्षा करने को भी अपनी तौहीन समझने लगे। हम विपन्नों की स्थिति में हैं । आज की हमारी भूख पिता जी के जमाने में आप किस तरह जी भर कर खाते और चटखारे लेते थे, उसकी याद करने से नहीं मिट सकती।”
शास्त्री जी ने इसे नोट किया या नहीं, पता नहीं, पर मेरा मित्र मैदान में उतर आया, ”यह तो तुम पुरानी अवस्था में लौटने की बात कर रहे हैं, पश्चगामिता का समर्थन कर रहे हो, पुनरुत्थानवादिता पैदा करना चाहते हो, ये सारी बातें तो प्रगतिविरोधी हैं । इनके बल पर आगे कैसे बढ़ोगे यार ।”
”तुम्हारी समझ में नहीं आएगा। तुम गधे हो। तुमने तो यही सोच कर अपना इतिहास ही नष्ट कर डाला। मैं पीछे जाने को नहीं कह रहा, चेतना के स्तर यह बोध पैदा कर रहा हूँ कि हम विपन्न नहीं थे। हमारी जलवायु, हमारे स्वभाव में कोई खोट न थी। हमारी परंपरा ज्ञान और विज्ञान के साथ मानवमूल्यों की भी चिन्ता करती थी और कुछ अधिक ही करती थी। इसका संबंध हार्दिकता से है, भावना से है। हमारा विकास सन्तुलित था। आज पश्चिम उसके निकट पहुंचने का प्रयत्न तो कर रहा है पर उसे हासिल नहीं कर सकता क्योंकि उपभोगितावादी इन्द्रियपरायणता का उन मूल्यों से मेल बैठ ही नहीं सकता, इसलिए वे एक ढोंग ही नहीं, विघटनकारी औजार का काम भी कर सकते हैं। मात्र उसकी कोशिश ही यह बताती है कि हम जिस आदर्श को जीवन में उतार चुके थे उसकी ललक आधुनिक मानवतावाद में पैदा हुई है।”
वह मेरी बात से प्रभावित नहीं हुआ, ”कुल लेकर वही आत्मराग, वही चौपाई अपने मुंह तुम आपन करनी, भाँति अनेक बार बहु बरनी।” इस आत्मरति से बाहर आओ ।”
Post – 2016-08-26
एक पुरानी तुकबन्दी
क्या कोई लफ्ज मुझे भी बयान करता है
तुमने तो देखी है हर इक लुगात बोलो तो।
नाम भगवान है हिंदी में लिखा करता हूँ
वही हिन्दी जो बनी है बिसात बोलो तो।
तुम्हें देखा और मुझे तुम भी देखते ही रहे
हम एक सवाल हैं या खुद जवाब बोलो तो।
रोज लिखता हूँ और वह भी बदहवासी में
पढ़ते हो, सुनते हो मुझको, जनाब बोलो तो।
मैं फलसफा नहीं एक तल्ख हकीकत हू मगर
तुम भी कुछ हो कि नहीं हो, जनाब बोलो तो।
प्यार करते हैं मगर शक भी कम न होता है
सवाल दर सवाल है जवाब, बोलो तो।
6 जून 2015
Post – 2016-08-25
निदान -30
एक तिनका ही सही, एक इरादा ही सही
”मैंने आप की कविता फेसबुक पर पढ़ी । आप उनके फटे और चिंथे को कैसे सिल और रफू कर पाएंगे डाक्साब जो उस सिले और रफू किए को फिर फाड़ और चींथ देंगे। आज तक का इतिहास उनका यही रहा है। जब जब हाथ मिलाया उनसे तब तब धोखा खाया है।”
”आप तो कविता भी करने लगे शास्त्री जी। अच्छे लक्षण है, पर यह बताइये अपने ही कपड़े को फाड़ने वाले को क्या कहते हैं ?”
”कविता करने की बीमारी तो इधर आपके कारण बहुतों को लग गई है। आप उन्हें तुकबन्दी कहते हैं तो लोग सोचते है, जब काम इतना आसान है तो क्यों न हाथ आजमाया जाये। मैंने भी आजमा लिया। पर जो आपका सवाल है उसका जवाब है, ‘पागल ।’
”यह पागलों का समाज है, अाप यह कहना चाहते हैं?
आप क्या कहना चाहेंगे। है कोई दूसरी परिभाषा?”
”मैं तो आपके फैसले को मानूँगा। मान लिया पागलों और बददिमागों का समाज है। यह भी कि इसका इतिहास यही रहा है, इसलिए यह पागलपन भी बहुत पुराना है । बीमारी उग्र हो चली है। ऐसी दशा में आप क्या करेंगे, पत्थर मारेंगे या चिन्ता करेंगे उस व्याधि से उन्हें मुक्ति कैसे दिलाई जाए ?”
”अब यही काम रह गया, दूसरों के पागलों काे पकड़ कर अस्पताल पहुँचाने का। कोई ठान भी ले तो उस पर क्या बीतेगी इसका अनुमान है। लावारिस लाशों की अन्त्येष्ठि करने का तो एक रेकार्ड है, क्योंकि मुर्दे बोलते नहीं, यह तक नहीं कहते कि मैं तो हिन्दू था, मुझे तुम दफ्न क्यों कर रहे हो, या मैं तो मुसलमान था, तुम मुझे जला क्यों रहे हो। पर पागल तो जिसे नहीं जानना चाहिए उसे कुछ अधिक जानता है जिसे जानना चाहिए उसे जानने और मानने से इन्कार कर देता है। जो अपनी व्याधि से मुक्ति ही नहीं चाहता उसे मुक्ति कैसे दिलाएँगे आप ? जो अपने को पागल मानता ही न हो उसे तो आप मनोचिकित्सक के पास तक कैसं ले जाऍंगे?”
”कुछ तो करना होगा शास्त्री जी । इतने सारे लोगों को पागल बने रहने की छूट दे कर आप भी चैन से नहीं रह पाऍंगे?”
”नहीं रह सकते, इसीलिए तो कहते हैं इनसे सदा सदा के लिए छुट्टी मिलनी चाहिए। इनका सफाया कर देना चाहिए ।” शास्त्री जी जिस आवेश को अब तक नियन्त्रित किए हुए थे वह एक साथ फट कर बाहर आ गया।
मैंने अपने स्वर को पहले जैसा ही ठंडा रखा, ”तरीका तो ठीक है। उन्होंने कई बार आजमाया है, एक बार हम भी आजमा कर देख लें। पर इसमें आपकी भूमिका क्या होगी ? पीछे से ललकारने की या तलवार, मतलब है बन्दूक, बम कोई भी हथियार ले कर चलाने की ? घबराइये नहीं, मैं आपके साथ रहूँगा, कब से शुरू कर रहे हैं आप यह काम ?”
शास्त्री जी को पहली बार लगा कि उनसे कुछ गलती हुई है, ”मैं किसी की जान लेने की बात नहीं करता, क्रोध आता है तो …
”तो आपको लगता है आप भी पागल हो जाऍं, आप भी वैसा ही कुछ कर बैठें जैसा आपकी समझ से वे करते हैं। आप मानते हैं कि पागल को देख कर पागल होश में आ जाता है । अाप सोचते हैं जो आप को शोभा नहीं देता उसे कोई दूसरा कर दे तो आप बेदाग भी रहें और समस्या भी सुलझ जाए? आप इतने जरूरी और पवित्र काम का यश तक नहीं लेना चाहते।”
शास्त्री जी जितने मेरे तर्क से विचलित नहीं थे उतने मेरे ठंढे और अनुद्विग्न और अकंप स्वर से थे। मैंने अपने स्वर को बदले बिना ही कहा, ”शास्त्री जी, मैं पुन: आपको अपने उस कथन की याद दिलाऊँगा कि मनुष्य में नाभदान का कीड़ा बनने से ले कर महाकाश का ध्रुवतारा बनने के बीच की सभी संभावनाऍं मौजूद हैं। गर्हित कृत्य को भी गौरव का विषय बना दीजिए तो उस गर्हित काम के लिए लोगों की कतार लग जाएगी क्योंकि गौरवशाली बनने के बाद वह गर्हित रह ही नहीं जाएगा। गर्हित और श्रेयस्कर की परिभाषाऍं उलट जाऍंगी। उस कतार में ऐसे तेजस्वी लोग तक खड़े दिखाई देंगे जो सिर्फ नाम से ही तेजस्वी नहीं हैं अन्य कारणों से ख्यातिलब्ध हैं। महिमा की भूख आदमी को किसी सीमा तक गिरा सकती है और किसी ऊँचाई तक उठा सकती है। आप जानते हैं आप जिन कृत्यों से घृणा करते हैं, जिनके कारण उन्हें पागल और बददिमाग मान लेते हैं, वही काम करने के लिए आप स्वयं भी तैयार हो गए थे और सुरक्षित माहौल में आप वही कर भी सकते हैं। अर्थात् पागल होने की संभावना उनके साथ ही नहीं है, आपके साथ भी है। मैं आप से पूरी तरह सहमत हूँ कि आप जहां से बैठ कर चीजों को देख रहे हैं, उसमें स्थिति बिल्कुल वैसी है दीखती है और उसके बाद वैसे ही विचार आ सकते हैं। अर्थात् थोडी सी शिथिलता से हम सभी इस दुनिया को पागलों का और केवल पागलों का संसार बनाने में सहयोग कर सकते हैं, इसीलिए जरूरी है कि हम यह सोचें कि जो पागल हो चुके हैं उन्हें अपने को सुधारने में मदद कैसे की जाय।
”आपके पास एक ही तरीका है, उनकी मानसिकता में बदलाव लाने का। नहीं, बदलाव लाना तो आपके वश में है ही नहीं। बदलाव लाने का प्रयत्न करने का और इसके लिए स्वयं अपनी मानसिकता में बदलाव लाने का प्रयत्न करने का । क्योंकि अपनी मानसिकता भी चुटकी बजाते तो बदल नहीं जाती।
”जो आरोप आप दूसरों पर लगाते हैं वह आरोप कोई तीसरा , या वह सवयं आप पर लगा सकता है । हमारे समाज में बहुत सी विकृतियाँ बहुत पुराने समय से हैं । कहें पागलपन के कई रूप विविध समाजों में हजारों साल से है । परन्तु आप स्वयं पागल बन कर किसी दूसरे के पागलपन को दूर नहीं कर सकते, इतनी सीधी सी बात समझनी होगी।
”कभी फुर्सत रही तो फेस बुक पर मैं भी ताक झॉंक कर लेता हूँ । एक बात देखी है हिन्दुओं का एक बड़ा हिस्सा है जो मुसलमानों ने नफरत करता है, और जैसा कि मैं कहता आया हूँ, नफरत करने वाला न दूसरे काे समझ सकता है न अपने को। मुससलमानों में अनुपात की दृष्टि से शायद उससे भी बड़ा हिस्सा है जो हिन्दू शब्द से ही नफरत करता है। उनके लिए पहले हमारा प्रिय शब्द म्लेच्छ हुआ करता था और आपके लिए उनका काफिर । हिन्दू शब्द को भी उन्होंने गाली बना रखा था आैर हम उसी नफरत से मुसल्ला कह कर उनको एक झटके में विचार सीमा से बाहर कर देते थे। हिन्दू शब्द का वह अर्थ आज भी उनके कोशों में पाया जा सकता है। पर कोशों के अर्थ कई बार अपने अर्थ से विपरीत कहानियां कहते हैं। गोरों की असाधारण सफलता के कारण हम उनसे नफरत करते हुए जैसे फिरंगी कह कर नफरत करते थे और बहुत सारी बुराइयॉं इससे जोड़ लेते थे, ठीक वही दशा बहुत पहले से उन देशों में थी जिन पर भारतीय व्यापारियों ने अपना दबदबा बना रखा था। ईरान में देवों के प्रति घृणा, ग्रीस में वही आज के तुर्की में बसे भारतीयों के प्रति घृणा में बदल कर प्रकट किया जाता था। हम इतिहास की गालियों को न देख कर उनके कारणों को देखें तो बहुत से अन्याय मिमियाहट में बदल जाऍंगे ।
”इसलिए आज जरूरत है, उस शब्दकोश को बदलने का, जातीय फिक्स्ड डिपाजिट में जमा उस घृणा को बाहर लाने की है। वह जाहिर हो, पर यह बताते हुए कि यह अमुक कारण से पैदा हुई और आज उसका यह उपचार किया जाय तो दूर हो सकती है तो परस्पर संवाद और अापत्तियों के निराकरण की समस्या से भी निबटा जाय। जरूरत बौद्धिक हस्तक्षेप की है। कुशिक्षा की बीमारियों को सही शिक्षा से कुछ हद तक कम किया जा सकता है, कम हो जाने पर ग्रहणशीलता बढ़ेगी और अगले पाठ की भूमिका तैयार होगी।”
”डाक्साब, आप बहुत आशावादी हैं। खयाली दुनिया से बाहर आते ही नहीं। लिख कर देख लीजिए, वे आपका ऐसा लिखा पढ़ेंगे ही नहीं। समझा कर देख लीजिए, वे आपकी बात मानेंगे ही नहीं।”
”मैं वह भी जानता हूँ, क्योंकि जब आप को समझा नहीं पा रहा हूँ तो क्या उन्हें समझाना आसान हो सकता है। इसीलिए हम प्रयत्न करने की बात करते हैं, प्रयत्न करना तो हमारे वश में है न। हम केवल वही कर सकते हैं और आफलोदय कर्म के रूप में कर सकते हैं। नसीहत दूसरों से भी ले सकते हैं। वह कल बताऊँगा। आज आप समझ नहीं पाऍंगे।
Post – 2016-08-25
दुनिया का कोई भी व्यक्ति किसी भाषा को आधे अधूरे रूप में ही जानता है। कई बार गलत भी जानता है और इस गलत को सही मान कर सही को जानने या यदि बताया जाय तो उसे मानने को तैयार नहीं होता। इसका एक छोटा सा कारण है। दुनिया की सभी भाषाऍं अनगिनत बोलियों के और कतिपय अन्य भाषाओं से कुछ ले दे कर बनी हैं, जिनमें से कुछ का लोप हो गया इसलिए हम उनके शब्दों को किन्ही वस्तुओं और क्रियाओं से जोड़ तो लेते हैं, पर यह समझ नहीं पाते कि इसके लिए यही ध्वनि क्यों अपनाई गई, यही शब्द क्यों प्रयोग में लाया गया। यह तो बुनियादी क्षति है जिसको प्रयत्न किया जाय तो कुछ मामलों में सफलतापूर्वक दूर भी किया जा सकता है।
मुझे जब १९६८ में द्रविड़ भाषाऍं सीखने के क्रम में ऐसे शब्दों का पता चला जो मेरी बोली में थे परन्तु संस्कृत में नहीं, न ही उन्हें किन्हीं तत्सम शब्द का बिगड़ा या बदला हुआ रूप कहा जा सकता था तो पहली बार मुझ यह लगा कि ये जिस बोली के शब्द हैं उसे बोलने वाले उत्तर से दक्षिण तक विचरण करते रहे हो सकते हैं और उनके कुछ सदस्य बीच बीच में बस गए होंगे जिनके माध्यम से वे शब्द उन बोलियों में प्रवेश कर गए, जिनको वे स्वयं अपना चुके थे। मैंने भाषाओं को सीखने का काम अधुरा छोड़ कर उन स्थान नामों का अध्ययन करने का मन बनाया जिनका कोई अर्थ समझ में नहीं आता। सोचा इससे उनका अर्थ समझ में आए या नहीं, यह पता चल जाएगा कि वे किन्हीं चरणों पर स्थानीय जनों की प्रधान भाषा को अपनाने से पहले कहां कहीं पहुंचे थे। वह बहुत रोचक अध्ययन था और इसने मुझमें इतना आत्मविश्वास पैदा किया कि मैं अपने साक्ष्यों के बल पर किसी अनमेल पड़ने वाली स्थापना, या किसी बड़े से बड़ेे चिन्तक काेे खारिज कर सकता था
उदाहरण के लिए नीहार रंजन रे का बंगला भाषा पर असाधारण अधिकार था, वह जानते हैं कि बंगाली समाज अनगिनत छोटे मानव समुदायों के मिलने से बना है किसका पता लगाने के लिए नृतत्व, पुरातत्व, भाषाविज्ञान, सभी को मिल कर काम करना होगा, परन्तु इसके साथ ही वह संस्कृतीकरण से भी आक्रान्त हैं और उन सीमाओं से भी बँधे रह जाते हैं जिनमें पाश्चात्य अध्येताओं ने इतिहास और भाषाशाास्त्र, यहॉं तक कि पुरातत्व और नृतत्व को सतही और गलत ढंग से पेश किया था इसलिए उन्हें बंग की जगह वंग जातीयता दिखाई देती है:
History has kept no strict account of how many, different people’s, how many various races and how many currents of culture mingled together and how they eventually merged into one of the settlements of RaaTha, PuNDra, Vanga. And SamataTa, which have comprised Bengal from very early times. But such an account may be found in people’s physical appearance, language, culture and material Civilization.(Nih arranjan Ray, History of the Bengali People, Tr.John W. Hood, Orient Longman, 1994).
यदि समग्रता का बोध ही उलट दिया जाय तो ये सभी शाखाएं मिल कर भी किसी समस्या का हल नहीं तलाश सकतीें । वह बंग को वग का तद्भव मानते हैंं। उल्टे सिरे से समस्या को देखने समझने का प्रयत्न करते हैं।
संस्कृत का एक अर्थ होता है पका हुआ। यही उसके दूसरे रूपों में जैसे जुता हुआ, साफ, परिष्कृत आदि में भी पाया जाता है। पकवान से अनाज नहीं पैदा होता, अनाज के कुछ चरणों से गुजरने और कुछ तत्वों को जोड़ने मिलानेे और ताप देने के बाद पकवान तैयार होता है। इसलिए जो लोग संस्क़त शब्दों को या भाषा के दूसरे घटकों को शुद्ध और जन भाषाओं को अशुद्ध और उन्हीं से निकला मानते हैं वे सारे पोथे कंठस्थ कर लें तो भी न भाषा के विकास क्रम को समझ सकते हैं, न उस पकवान के निर्माण में प्रयुक्त उपादानों की भूमिका को समझ सकते हैं, न ही उन घटकों की उपलब्घि या साधित रूपों को।
एक ही पड़ोस में अंग, बंग, मगध, ओड प्रमुखता से बसे हैं और ये सभी आहारसंचयी जनजातियां हैं। वे केवल इस क्षेत्र तक सीमीत न थे। उदाहरण के लिए बंग, बांगड़, बंगलोर, बांका, वंका जिसे अंग्रेजों ने बैकाक बना दिया आदि तक फैले हैं। अंग, अंगकोरवात, अंगोला तक, ओड, औडि़हार, औध/अवध, उूटी, ऊटकमंड आदि में भी कभी पहुंचे थे। हम इस तरह भारतीय भाषाओं और जनसमाजों की रचना की एक जमीनी सूझ और सोच से गुजरते हैं जिससे किताबी ज्ञान समस्या से बचने की कवायद बन कर रह जाता है।
मैं यहां यह नहीं कह रहा कि संस्कृतज्ञ का बंग को वंग लिखना नहीं चाहिए। केवल यह कि संस्कृत में ब की ध्वनि उपलब्ध है इसलिए बंग को वंग करने की जरूरत न थी पर यदि किया ही तो तद्भव वंग हुआ और तत्सम बंग। इसके साथ हम एक् दूसरे सूत्र पर पहुँचते हैं कि बंग उन जनों में से केवल एक थे जो बंगाल में बसे थे। ऐसे अनगिनत भाषाई समुदायों का उसमें निवास था जिसका बोध सभी को है भी पर जिनका नाम तक हम नहीं जानते, न जान सकते हैं, परन्तु बंगला की बोलियों में जिनके कुछ तत्व तलाशे जा सकते हैं। इस तरह रचित कुछ कुछ अन्तराल पर बदलने वाली व्यवहार भाषाओं के क्षेत्र में प्रशासनिक, साहित्यिक, धार्मिक, शैक्षिक, विविध कारणों से जिस भाषा का प्रसार हुआ उसने सब कर एक आवरण डालते हुए ऐसी समरूपता पैदा कि जिससे एक बडे क्षेत्र में संचार संभव हो सका और इसने उन लक्षणों और घटकों का निर्धारण हुआ जो पूरे बंगाल में भाषाई जातीयता का बोध पैदा कर सके ।
परन्तु यह भाषा इन्हीं आदिम बोलियों में से एक थी जो सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने के साथ अनेक भाषाओं के प्रभाव में अपना परिवर्तन करते हुए उस मानक चरण पर पहुंची थी जिसका प्रथम साक्षात्कार ऋग्वेद में होता है और फिर उसी चरण पर उसमें घालमेल भी होने लगता है जिससे उसके मानक रूप के नमूने कुछ ही ऋचाओं में मिलते हैं और कुछ की भाषा तो बाद के संस्कृत से अभिन्न हो जाती है।
अब यहॉं आकर ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषाविज्ञान का पूरा ढांचा ही उलट जाता है और वह वैज्ञानिक सूत्र सामने आता है जो विकास के जैव नियमों को सामाजिक निर्मितियों के मामले में उलट देता है। प्राकृत विकास में एक बहु में, सरल जटिल में, बदलता है। सामाजिक संस्थाओं और निर्मितियों में बहुत सारे लोग मिल कर एक संस्था, समाज, देश, आदि का निर्माण करते हैं जिसमें विविधताओं और विचित्रताओं में कमी आती है, सुथरापन आता है, जटिलताओं का समाहार होता है।
अब हम पाते हैं कि स्वयं संस्कृत को भी धातु, प्रत्यय, उपसर्ग के सहारे नहीं समझा जा सकता, बोलियों को तो समझा ही नहीं जा सकता और इस रहस्य पर तो लगातार परदा डाला ही जाता रहा है कि कैसे भारोपीय की यूरोपीय शाखाओं में ‘मुंडा, द्रविड़ आदि संस्कृतेतर भाषाओं की शब्दावली पहुँच गई।
इस क्रम में हमें पता चलता है कि अपनी ही भाषाओं के ऐसे अनगिनत शब्दों को हम जानते ही नहीं जो अत्यन्त सूक्ष्म व्यंजनाओं को प्रकट करते है और एका एक विशाल शब्द भंडार है जिसका हम प्रयोग करते हैं पर अर्थ नहीं जानते और रोचक यह कि हम कोशों तक में कुछ शब्दों को गलत रूप में प्रस्तुत और गलत अर्थ के साथ पाते हैं। अब आपके लिए जरूरी है कि आप अपनी आंख और औचित्य पर ध्यान दें।
आप पाते हैं लिखा चिह्न जब कि शद्ध चिन्ह होना चाहिए । चिन का अर्थ किसी बोली में आग था। इसे हमने अपना लिया । चिनगारी में, चिनचिनाहट में, चिनार में यही चिन है। आग का प्रयोग प्रकाश और ज्ञान आदि के लिए । इसलिए चिह्-न नहीं, चिन्- ह सही प्रयोग हुआ। एक दूसरा शब्द लें कुष्मांड, कुष्मांड या कुसुमांड नहीं, कुम्हांड या घड़े जैसे बडा गोलाकार फल । पुत्र के साथ तोअनर्थ ही कर दिया गया और यह यास्क से लेकर आप्टे तक एक समान मिलेगा।
जब इस सिरे से देखते हैं तो संस्कृतीकरण का एक इतिहास सामने आता है जिसको भारतीय सन्दर्भ में ही समझा जा सकता है । यह समझ ही उस पूरी मान्यता, उसे सही सिद्ध करने के लिए रचे गए पोथों, कोशों और व्याकरण ग्रन्थों को संग्रहालय की शोभा बना देता है। विषय इतना विस्तृत है कि इसकी रूपरेखा भी पूरी तरह स्पष्ट न की जा सकी । उसे अधिक ग्राह्य बनाने के लिए उदाहरण तो आ ही न सकेंगे पर एक उदाहरण्ा दें । तर, तिर, तुर, जिनमें व्यंजन स्थिर है, स्वर उन बोलियों के कारण या उनके लालित्य प्रेम के कारण बदले हैं और जिनमें अनिश्चय को देखते हुए इसे तृ नाम की धातु में उतार दिया गया और इसकी पूर्ति के लिए हमारी वर्णमाला मे ऋ नाम के एक स्वर की कल्पना की गई जिसका उच्चारण कोई नहीं जानता। कुछ क्षेत्रों में रु और कुछ में रि के रूप में उच्चरित किया जाता है। इस कल्पित स्वर की आवश्यकता न थी।
अब इस तर/तिर/तुर/ तृ का अर्थ है पानी । एक दूसरा शब्द है पानी के लिए इष । पानी के लिए प्रयुक्त शब्द इच्छा, कामना, लालसा आदि के लिए प्रयोग में आए । तृषा का अर्थ हुआ पानी की इच्छा। तृ और इष/इषा का संधि रूप तृषा हो सकता है इसे व्याकरण से नहीं समझा जा सकता। यह तृषा उत्कट कामना के लिए प्रयोग हो कर त़ष्णा बन जाती है। और पानी की जोर दार प्यास त्रास, पानी पिलाओ मेरी जान जा रही है के लिए त्राहि तो फिर रक्षा के सामान्य अर्थ में भी प्रयुक्त होने लगता है। त्रस्त, संत्रास आदि का अर्थ अब धातु को किनारे रख कर समझने की कोशिश कीजिए तो भाषा व्याकरणिक अन्धकार में की जाने वाली टोह वाली पद्धति की तुलना में लगेगा आखों के आगे उजाला छा गया है। व्याकरण बोझ न रह कर एक आलोक और क्रीड़ा में बदल जाएगा।
25 अगस्त
Post – 2016-08-24
मेरा सबसे प्रिय शायर, खुशमिजाज, खुशरू और सादादिल। हम दोनों एक ही सन् में पैदा हुए थे। वह मुझसे पांच महीने अठारह दिन बड़ा था और पांच मंजिल बड़ा लगता था। मैं तो उस तक पहुंचने के लिए अपनी बाॅह भॉज कर बाॅंहें गॅवा चुका था फिर वह मुझसे डर कर आज से आठ साल पहले ही क्यों भाग लिया।
अहमद फराज की आज नवीं पुण्यतिथि है और यह तुकबन्दी उसके विदा होने के चार साल बाद की थी। मेरे लिए वह आज भी एक सेतु है। राजनीतिज्ञ बॉटने की बात करते हैं, हमारा काम ही है फटे को सीना, चिथडे को रफू करना है और दूसरा काम आता ही नहीं ! वही हमें लेखक, विचारक और क्रान्तदर्शी बनाता है।
इसलिए इस बिगडे माहौल में भी अहमद फराज की याद में: आज अहमद फ़राज़ की नवीं पुण्यतिथि है:
दिल उसके पास था, मेरे भी पास हो शायद।
ज़बान वैसी मशक्क़त से खास हो शायद।
वह शख्स इतना था अपना कि दीखता ही न था
जो दीखता था वह उसका लिबास हो शायद।
फराज़ को न बताना कि उससे जलता हूं
मज़ार में भी यह सुनकर उदास हो शायद।
पता लगाओ कभी वैसा कोई था कि नही
हुआ नहीं है, यह मेरा क़यास हो शायद।
शेर कहता था बहा जाता हो दरया जैसे
जिसके पानी में आज भी उजास हो शायद।
कब्र से उठ कर भी आ जाता है अफवाह सी है
दिया जलाओ कहीं आसपास हो शायद।
टूटे जुड़ जाते हैं इल्मो कमाल से भगवान
यह संगो-खिश्त का मौजूं जवाब हो शायद ।
27. 07. 12.
Post – 2016-08-24
निदान – २९
भगवान बुरा मान जो कोई बुरा कहे
अपने लिए नहीं तो उसी के लिए सही!
‘एक बात कहूँ तो बुरा तो नहीं मानेंगे आप ?”
”बुरा लगने वाली बात कहें और बुरा न मानूँ तो आपका प्रयत्न बेकार हो जाएगा। यदि अपने लिए नहीं, तो आपके लिए मुझे बुरा तो मानना ही होगा।”
शास्त्री जी उलझन में ही थे कि मेरा मित्र जो कल श्राेता बना हुआ था, अट्टहास कर बैठा। अपनी झेंप मिटाने के लिए शास्त्री जी को भी हँसना पड़ा। इस दबाब में अट्टहास में मैं भी शामिल हो गया। अचानक याद आया कि अपनी ही कही बात पर, शिष्टाचार के नाते, नहीं हँसना चाहिए तो एक झटके में रुक गया। वे दोनों असमंजस में पड़ गयेे कि कहीं वे गलत तो नहीं हँस रहे थे। इसे आप छोटे पैमाने पर चेन रिऐक्शन कह सकते हैं।
अब स्थिति तो मुझे ही सँभालनी थी। मैंने अपने को संयत रखते हुए कहा, ”शास्त्री जी जब तक आप यह सोच कर कुछ कहना चाहेंगे कि कोई उसका बुरा मानेगा या भला, तब तक या तो आप ठकुर सुहाती कहेंगे, या ऐसे अवसर पर चुप लगा जाऍंगे जब आपका हस्तक्षेप जरूरी था। सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यं अप्रियं को मार्गदर्शक सिद्धान्त बना कर चलने वालेे प्रियवादी तो होते हैं, सत्यवादी नहीं। जिन लोगों को उनका कथन प्रिय लगता है वे भी उन पर भरोसा नहीं करते इसलिए अप्रीतिकर भी हो तो भी जो सही लगे उसे कहना चाहिए यदि वह व्यापक हित में हो तो।”
”अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता तु दुर्लभ: ।” शास्त्री जी ने जड़ दिया।
”श्रोता उपस्थित है, वक्ता बनिए आप ।”
”डाक्साब, सच कहूँ तो आप पर यही अभियोग लगाने जा रहा था कि आप किसी दल से भले न जुड़े हों, सोच आपकी वामपन्थियों वाली ही है और आप भी सारा दोष हिन्दुओं में ही देखते हैं। जिस तरह मुसलमानों में वर्जित खाद्य के रूप में एक पशु का मांस गिना जाता है, यदि उसी तरह हमारी भावनाओं का सम्मान करते हुए वे गाय को भी वर्जित मान लें तो सारा बवाल ही खत्म हो जाय।”
”इस विषय को आगे न बढ़ाया होता तो ही अच्छा था। मैं जो कुछ कहना था सांकेतिक रूप में कह आया था। उससे ही आप इतने खिन्न हैं, यदि इससे आगे कुछ और दो टूक कहना पड़ा तो आपको क्लेश ही होगा, समझ कुछ न पाऍंगे। सचाई यह है कि जिसे मुसलमान वर्ज्य मानते हैं उसकाेे दूसरे बहुतेरे वर्ज्य नहीं मानते इसीलिए उसका अस्तित्व है अन्यथा उस प्रजाति का सफाया हो चुका होता। जीवन के तर्क उन लोगों की समझ में नहीं आते जिन्हें आराम से खाने पीने को मिल जा रहा है। इसका साक्षात्कार अस्तित्व रक्षा के दारुण क्षणों में ही होती है। दुर्भिक्षों के विवरणों से यदि परिचित होंं तो पता चलेगा कि मनुष्य क्षुधा कातर हो कर मनुष्य को मार कर खा जाता था, माताऍं अपनी सन्तान तक को। सर्वसुविधासम्पन्नता में जीवन के रहस्य और दबाव को नहीं समझा जा सकता।
”यदि आपने मेरे कथन और मन्तव्य पर ध्यान दिया होता तो खिन्नता बढ़ती नहीं, कुछ वैसी ही राहत मिलती जैसे चुभा हुआ कॉंटा निकल जाने के बाद मिलती है। या किसी व्यक्ति के बारे में गलतफहमी दूर हो जाने के बाद मिलती है। आप यदि आगे बात भी करते तो शिकायत के स्वर में नहीं, इस समस्या को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए और उस समझ से ही आधा उपचार हो जाता और शेष आधे के निवारण के तरीके सूझ जाते।”
”मन तो मेरा वैसा ही है, मैंने तो, एक पक्ष की ओर ध्यान चला गया तो, उसकी याद आपको दिला दी।” शास्त्री जी इस बार पहले से अधिक दृढ़ दिखाई दिए।
”मैं लंबे समय से अपनी बात कहने की भूमिका बना रहा था, या उन सचाइयों से अवगत करा रहा था जिनको जाने बिना हम भोले बने और भटके हुए रह जाते हैं। इनको एक बार दुहरा दूँ:
पहली बात कि मनुष्य में व्यक्ति और समूह दोनों ही रूपों में तुच्छतम से महानतम, गर्हित से ले कर श्रेष्ठ तक कुछ भी बनने या होने की संभावना रहती है और इसका अपवाद कोई नहीं है, भले उसे ऐसे दौर से न गुजरना पड़ा हो। परिस्थितियो, प्रलोभवों, यातनाओं, विवशताओं के वश वह एक अति से दूसरी पर पहुँच सकता है। एक उदाहरण मैं शरतचन्द्र के अनुभव का दूँ । जब वह आज के म्यॉंमार में रहते थेे तब का। एक नौजवान ब्राह्मण था, पूजा पाठ करता था, चन्दन तिलक लगा कर निकलता। कुछ समय बाद एक दिन वह तहबन्द में मिला। पता चला उसका एक मुस्लिम लडकी से प्यार हो गया था और उस चक्कर में वह मुसलमान हो गया। पूछा गोमांस खाता है, बताया गाय काटता भी है। दो आवेगों में एक की प्रबलता ने दूसरे को जड़मूल से समाप्त कर दिया ।
”एक दूसरी बात मैंने कही थी कि व्यक्ति के मानस के निर्माण में शिक्षा की प्रबल भूमिका होती है और यह शिक्षा हमें केवल अपनीी औपचारिक शिक्षा और पाठ्यपुस्तकों या अध्यापकों से ही नहीं मिलती अपितु माता-पिता, परिवेश, धर्म और संस्कार, मनोरंजन, व्यक्तिगत अनुभव, मित्रमंडली, अनगिनत माध्यमों से मिलती है।
”एक तीसरी बात कही था कि कोई समाज जिस अनुपात में तार्किक और विवेेकवान है उसी अनुपात में वह अपने यथार्थ का सामना कर सकता है। अन्यथा उसके आग्रह और उसकी भावुकता के कारण उसे उनसे मुँह चुराना या ऑंखें मूंदनाा पड़ेगा। वह अपनी समस्याओं का समाधान नहीं तलाश कर पाएगा।
एक चौथी बात यह कि तार्किक या बुद्धिगम्य विचारों की तुलना विश्वास और अन्धविश्वास की ताकत अधिक होती है। तार्किक व्यक्ति या समाज को समझाया और अपने विचारों में परिवर्तन लाने को प्रेरित किया जा सकता है, तर्कातीत भावुकता, अन्धविश्वास, आवेग उसी बुद्धि का उपयोग अपने विश्वास या मान्यता को सही सिद्ध करने में तो लगा सकता है, परन्तु बदलाव में लंबे समय और बहुत अधिक परिश्रम की आवश्यकता होती है।
”तार्किकता हमें मनुष्य बनाती है, तार्किकता की अति जिसमें भावना केे लिए स्थान न हो हमें यन्त्रमानव बनाती है और तार्किकता का निपट अभाव और भावुकता की प्रबलता हमें पशु बनाती है। मनुष्य बने रहने के लिए असाधारण संतुलन की आवश्यकता होती है।
”इसलिए किसी को दोष देने से पहले हमें अपनी ओर देखना होगा कि क्या हम जिन समस्याओं के प्रति अतिसंवेदनशील हैं, उनकी अतिसंवेदनशीलता के कारणों को समझने में वस्तुपरकता से काम लेते हैं। जब गोपालन आरंभ नहीं हुआ था, तो हमारा सबसे प्रिय पशु बकरा था। यह आज से सात हजार साल से पहले की अवस्था की बात है। बकरी को प्रजनन और दूध आदि के लिए बचा कर रखा जाता था, पर बकरे की उपयोगिता कोई दूसरी नहीं थी, इसलिए उसका मांसाहार प्रचलित था। खेत को चर जाने वाले शाकाहारी जानवरों का वध धार्मिक कार्य माना जाता था और उनका मांसाहार अनिवार्य था। गोपालन के बाद जब तक बछडे का उपयोग हल और वाहन के लिए नहीं किया गया, उनका मांसाहार विहित था। ऋग्वेद में भी गाय या मादा गाय को ही अघ्न्या कहा गया है और बन्ध्या बछिया और सांड आदि को बध्य माना गया है। अवेस्ता में भी गाय को तो उसी तरह पवित्र माना गया है, अग्न्या कहा गया है परन्तु सांंड़ों की बलि का उल्लेख है।
”जब इसके बधियाकरण की जुगत निकल आई और उन्हें नियन्त्रित करके उनके श्रम का उपयोग हल और गाड़ी खींचने में होने लगा तब इन पर भी प्रतिबन्ध लगाने का अभियान आरंभ हुआ। मोटे तौर पर कहें हमारे स्वार्थ संबंध ही हमारी भावुकता, प्रेम आदि के निर्धारण में कारक भूमिका निभाते हैं, इसका याज्ञवक्ल्य और मैत्रेयी के संवाद में उपनिषदों में भी वर्णन किया गया है।
“जब भी हम अपनी माता के प्रति भी श्रद्धा की बात करते हैं तो उपकार ही गिनाते हैं जो उसने हमारे लिए किए। परन्तु ऐसी माताऍं भी खबर बनती हैं जिन्होंने अपने अनुचित प्रेम के कारण अपनेे पति और संतान तक की हत्या कर दी। कुमाता भी हो सकती है, भले अपवाद स्वरूप ही और उसके प्रति हमारा वही आवेग नहीं रह सकता।
“कल तक कृषि का आधार ही गोवंश पर निर्भर था। आज दूध की आवश्यकता हमें गाय रखने को प्रेरित करती है, पर ट्रैक्टर आदि ने हल का स्थान ले लिया और कटाई छँटाई के आधुनिक तरीकों के कारण भूसा तक खेतों में ही उड़ा दिया जा रहा है। पशुओं के चारे की समस्या अधिक गंभीर हुई है। जब भावुकता पैदा करनी होती है तो गाय के गुण गाये जाते हैं, पर बछड़े की कहीं चर्चा नहीं आती। गोरक्षा सरकारी धन के लूट का एक भ्रष्टतन्त्र बन चुका है। गायपालने वालों के बछड़े उनके खूंटो पर कुछ ही दिन रहते हैं । इस बीच कोई खरीदने वाला मिल गया तो उसे यह जाने बिना भी बेच देते हैं कि वह उनका क्या उपयोग करेंगे। हम उनके अन्तिम गन्तत्व की कल्पना ही कर सकते हैं। इसलिए अपने चुनाव भाषण में एक बार मोदी ने लालक्रान्ति की बात तो की थी, पर आगे उस पर चुप रहने लगे थे, क्योंकि श्वेत क्रान्ति और रक्तक्रान्ति एक ही सचाई के दो सिरे हैं।
“यदि कोई सचाई है जिसको टाला नहीं जा सकता, उससे भ्रष्टाचार, क्रूरता और दूसरे तरह के उपद्रवों को बढ़ाया जा सकता है पर उन्हें नियन्त्रित नहीं किया जा सकता तो हमें उसकी अनदेखी करने की आदत डालनी चाहिए । यदि नहीं डाली गई तो आत्मविनाशी क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं का ऐसा दौर आरंभ हो जाता है जिसके परिणाम अनिष्टकर होने को बाध्य हैं। अपने देश और समाज से प्यार करने वाला कोई व्यक्ति उपद्रव और अराजकता को बढ़ावा नहीं दे सकता । आप अधिक अतिसंवेदनशील होंगे तो पूरा जीवन आन्तरिक उद्वेलन और बाहरी कलह में बीतेगा।
”आदिम पाप की चर्चा करने वाला उस पाप से अपने को बचा नहीं सकता । बचाए तो उसके धर्म और वंश का नाश हो जाएगा। इसलिए वह आत्मग्लानि में जीने के लिए अभिशप्त है, वह पापबोध अनुभव कर सकता है और सामान्य होते हुए पापियों का समाज खड़ा कर सकता है, पाप से मुक्त नहीं रह सकता।
”यहॉं भी स्थिति यही है। हमाराा परंपरागत तरीका उपेक्षा का रहा है और अधिक से अधिक अपने लिए वर्ज्य का सेवन करने वालोंं तक से परहेज का रहा है, परन्तु आज की तिथि में यह भी उचित नहीं। हॉं, खान-पान में दूरी बनाए रखने का व्यक्ति को अधिकार भी है और यदि इस पर रोक विधान या संविधान द्वारा लगाया जाता है तो वह प्राकृत नियम और हमारी अपनी खानपान की स्वतन्त्रता का निषेध है, जिसका पालन नहीं हो सकता।
”दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारी सारी समस्यायें सत्ता के लोभ में कांग्रेस द्वारा पैदा की गईं, जातिवादी राजनीति, संप्रदायवादी राजनीति, दलितवादी राजनीति और यह प्रतिबन्ध जिसका विस्तार करते हुए इसकी परिधि में घोोड़रोज या नीलगााय तक को गाय मान लिया गया। पर यह चुनावी दाव था। न इस पर उसका विश्वास था, न ही इसे लागू किया और आज उसके परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं जिसका भी लाभ वही उठाना चाहती है।
”मैं मानता हूँ मेरे कथन से आपको क्लेश हुआ होगा, परन्तु अर्थतन्त्र और इतिहास का दबाव ऐसा है कि आप पाखंड को और उपद्रव को बढ़ावा तो दे सकते हैं, पर इसे रोक नहीं सकते। अधिक से अधिक होगा यह कि यह आपके देश से निर्यात किया जाएगा जो आज भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। आप अपने लोगों को उनके खान पान के वैध अधिकार से सत्ता के बल पर रोक और दंडित कर सकते हैं, इसके परिणाम जिस भी अनुपात में आएंगे अनिष्टकर होंगे, उन अनिष्टों को भुगत सकते हैं, परन्तु इतिहास के फैसले का आप नहीं रोक सकते।”
मुझे आश्चर्य हुआ, शास्त्री जी उत्तजित नहीं हुए। धैर्य से सुनते रहे और जब मेरी दृष्टि उनकी ओर गई तो देखा दूर किसी लक्ष्यहीन दिशा में सूनी ऑखों से कुछ देखते हुए भी कुछ नहीं देख रहे हैंं। और आश्चर्य इस बात पर हुआ कि मुझे लगा, इस सच को बयान करते, मेरी ऑंखों से ऑंसू गिर रहे थे और मुझे इसका पता तक न था।